लेख

मीडिया तो अब काले धन की गोद में
[आलेख]
लेखक- दयानंद पांडेय
पृष्ठ- 208 मूल्य- 400
प्रकाशक- सर्वोदय प्रकाशन 512-B, गली नं.2 विश्वास नगर दिल्ली-110032
प्रकाशन वर्ष- 2013

1.  अमरकांत जी को  मिले ज्ञानपीठ के बहाने मठाधीशों की खोज खबर


2.  महिला लेखन यानी भूख की मारी चिड़िया      

3. हिंदी लेखकों और पत्रकारों के साथ घटतौली की अनंत कथा


4. भोजपुरी गायकी अपनों से ही हार गई


5. बाल श्रमिक से शब्दाचार्य तक की यात्रा


6. ए भाई अइसे ही आग जलाएंगे आप?


7. एकतरफा और तिहरे तलाक़ की तलवार सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही है


8. अज्ञेय : फिर कहां से तुम ने विष पाया और कहां से सीखा डसना?


9. सोचने की इच्छा लगभग शराब हुई है


10. मार्निंग वाक या पत्रकारिता के नहीं दलाली के चैंपियन हैं राजनाथ सिंह


11. राजनाथ सिंह को खुली चुनौती दे रहा हूं कि मेरे खिलाफ़ आरोप सार्वजनिक करें!


12.निष्ठा, नैतिकता, चरित्र, शुचिता... सब बातें हैं बातों का क्या !


13.नतिनी पूछे नानी से नानी चलबू गौने !


14.२०२५ : कोई लोक भाषा भी हुआ करती थी


15. तो क्या फ़ेसबुक अब फ़ेकबुक में तब्दील है?


16. नरेश मेहता मतलब कविता में वैचारिक सत्ता की उपस्थिति


17. सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल भारत भूमि जिन्हें बार-बार पुकारती है


18. भोजपुरी अइसे कब तक भकुआती फिरेगी ?


19. 2050 तक हिंदी दुनिया की सब से बड़ी भाषा बनने जा रही है


20. यह समय यशवंत के खिलाफ़ आग में घी डालने का नहीं, यशवंत के साथ खडे होने का है


21. मीडिया तो अब काले धन की गोद में 


22. शिष्य हो तो नामवर सिंह जैसा, मुद्राराक्षस जैसा नहीं


23. अरविंद कुमार की जीवन यात्रा देख कर मन में न सिर्फ़ रोमांच उपजता है बल्कि आदर भी


24. लुट गया राजा प्रणय की चांदनी में


25. शिवमूर्ति की स्वीकृति का बैंड-बाजा


26. लखनऊ के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलाने और गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते योगेश प्रवीन


27. शेखर जोशी और श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी


28. ब्लैकमेलर सुधीर चौधरी, बेजमीर पुण्य प्रसून वाजपेयी


29. एक बेटी की विदा का शिलालेख!


30. हिंदी की लाठी हैं लता मंगेशकर

31. हमारे गांव का गोबर तुम्हारे लखनऊ में है


32. क्या प्रकांड पंडित होना इतना बड़ा पाप है?


33. जेहन में कबीर, जीवन में आर्केस्ट्रा


34. अरविंद कुमार ने अभी-अभी भारतीय कोशकारिता में तीन परिवर्तनकारी क़दम उठाए


35.गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है तो हमें उस से खतरा है


36.भोजपुरी की मिठास और खुशबू को दुनिया में मालिनी को फैलाने दीजिए मनोज जी !


37.अब भारतीय प्रकाशन जगत में एक और चमत्कार बृहत् समांतर कोश, पहला मुद्रण पाँच हज़ार प्रतियाँ



38.सरोकारनामा मतलब अब सारे सरोकार मेरे, सारा आकाश मेरा !


39.तो क्या मनीषा कुलश्रेष्ठ को लमही सम्मान लौटा नहीं देना चाहिए !


40. जाति न पूछो साधु के बरक्स आलोचना के लोचन का संकट ऊर्फ़ वीरेंद्र यादव का यादव हो जाना !


41.आईने पर इल्ज़ाम लगाना फ़िज़ूल है, सच मान लीजिए, चेहरे पर धूल है

42. कंवल भारती, कांग्रेस, रामपुर का तानाशाह आज़म खान, कायर और लफ़्फ़ाज़ दोस्तों का दलदल

43. ढाई नहीं, तीन आखर की कविताएं

44. कंवल भारती तो पांच दिन में ही कांग्रेस के कमलापति त्रिपाठी बन गए !

45. वीरेंद्र यादव के विमर्श के वितान में आइस-पाइस यानी छुप्पम-छुपाई का खेल 

46. कथाक्रम और शुतुरमुर्गी अदा के मारे लफ़्फ़ाज़ रणबांकुरे !

47.  विपदा की नदी से पार ले जाती, विलाप की बांसुरी में डूबी कविताएं 

48.  प्रीति करीं अइसे जइसे, कटहर क लासा !

49.  तो क्या तरुण तेजपाल की झांसेबाज़ी रंग लाएगी, कि जेल की हवा खिलाएगी ?

50.  अपनी वैचारिकी से पलटी मारना किसी को सीखना हो तो वह लखनऊ के साहित्य भूषण वीरेंद्र यादव से सीखे
 

51.रवींद्र वर्मा का महुआ तोड़ कर खाना-खिलाना

52.देश को चाहिए कि अपने गुस्से का इज़हार किसी किन्नर को अपना प्रधान मंत्री चुन कर कर दे !

53.  जीवन में प्रेम की पवित्रता
54.  हाय ! हम क्यों न हुए खुशवंत !
55. कितना भी महीन बूको, घुसता ही नहीं मूढ़ सेक्यूलर दुकानदारों के मोटे दिमागों में
56.  आखिर नरेंद्र मोदी के सचिव नृपेंद्र मिश्र कैसे बन गए सी आई ए एजेंट ?
57.  नवीन जोशी, दावानल और उन का संपादक
58. अखिलेश के निर्वासन के बहाने कुछ बतकही , कुछ सवाल
59. वेद प्रताप वैदिक पर दाग दूसरे हैं , हाफिज सईद से मुलाक़ात कोई दाग नहीं , कोई अपराध नहीं 
60.  मुख़्तारी तो ऐसे भी दिख जाती है , आंगन में बंदूकें बोना ठीक नहीं
61.  मनो किताब न हो किसी मल्टी नेशनल कंपनी का प्रोडक्ट हो, हिंदी सिनेमा हो कि विज्ञापन चालू !
62.  अगर - मगर किंतु -परंतु करना छोड़िए भी बिटिया है नहीं है कोई जंतु 
63.  टी वी पत्रकारिता कर रही औरतें राजनीतिज्ञों के लिए एक बड़ा ख़तरा 
64. वह तुलसी , वह कबीर और थे , हिप्पोक्रेसी का मारा, सत्ता का चाटुकार यह लेखक कुछ और ! 
65.  आप रहिए अपने घर ,कार्यालय और अपने गैंग में ख़ुदा बन कर इस फ़ेसबुक पर यह खुदाई नहीं चलने वाली
66.  भारतीय पत्रकारों के लिए तो शारबोनिये की बात बिच्छू के डंक की तरह हैं
67.  अरविंद कुमार का नया इश्क है - अरविंद वर्ड पावर
68.  मैं नहीं देता इस धोखे में सने मज़दूर दिवस की बधाई। आप बुरा मानते हैं तो मान जाइए , अपनी बला से ! 
69. तो क्या नीलाभ डूब जाएंगे भूमिका के इस भंवर में ?
70.  आत्म-मुग्धता, हिप्पोक्रेसी और बौखलाहट का मिला-जुला एक नाम है उदय प्रकाश
71. गीतों की चांदनी में एक माहेश्वर तिवारी का होना 
72. प्रेम की आरती के नेह में नतगीतों की एक सरिता 
73. प्रेम के शून्य को हेरते-हेरते सुलोचना की सुरसतिया का अचानक प्रेम में आर्यभट्ट हो जाना
74. अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर के सिर्फ़ और सिर्फ़ नौटंकी की है
75. किताबें छापने के नाम पर लोगों को ठगने और लूटने वाले इस अरुण चंद्र राय को ठीक से पहचान लीजिए 
76.  आंधी फिल्म सिनेमा घरों से उतार उस के प्रिंट जलवा दिए संजय गांधी ने तब क्या किया था गुलज़ार साहब !
77.  यशोदा बेन ने धरना दे दिया है कि आज वह नरेंद्र मोदी को सामने से देख कर ही करवाचौथ का व्रत तोड़ेंगी
78. साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने का तमाशा
79.  आख़िर मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों की ज़िद से लौटे अशोक वाजपेयी 
80. समय से न लिखने पर रचनाएं भी रिसिया जाती हैं 
81.  लालू प्रसाद यादव को मिले राजनीतिक जनादेश के बहाने हाराकिरी करते , मिठाई बांटने वाले यह लेखक 
82.  इनामों को वापस करने से क्या होगा 
83. सुन रहे हो आमिर ख़ान और शाहरुख़ ख़ान !
84.  काले धन की आंच , लपट और सनक में झुलसती असहिष्णुता
85.  इन जहरीले लोगों की दुकान बंद कीजिए इन्हें उपेक्षित कर के , ख़ुद-ब-ख़ुद यह अपनी मौत मर जाएंगे
86. जैसे मां की याद में डूबी यह कविताएं , कविताएं न हों मां की लोरी हों
87.  सुतत नाहीं हईं अम्मा , सोचत हईं !
88.  दो लाईन की बकलोल कविता और सौ-पचास लाईन की फटीचर फ़ोटो
89. अगर निरुपमा पांडेय की चले तो वह मुझे लेखक नहीं , लेखक का कारखाना बना दें 
90. मेरे कथा संसार के विलक्षण पाठक जनार्दन यादव 
91. जहां आप पहुंचे छलांगें लगा कर वहां मैं भी पहुंचा मगर धीरे-धीरे
92.  यह विधवा विलाप अशोक वाजपेयी का नया नहीं है 
93. गतरे गतर घाव की तफ़सील बांचती मनोज भावुक की भोजपुरी ग़ज़लें 
94.  आतंकवादियों की फांसी पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
95. कामरेड , जे एन यू का नुकसान तो बहुत हो गया है
96. यहां तो स्त्री कंधा से कंधा मिला कर चलती मिलती है
97. सच यह है कि रवीश कुमार भी दलाल पथ के यात्री हैं 
98. दलाली वाया सेक्यूलरिज़्म भी होती है
99.  यह पुरुष प्रधान समाज स्त्रियों के लिए तेज़ाब की नदी है
100. भारतीय पत्रकारिता में सेक्यूलरिज्म का तड़का और उस का यह हश्र 
101. लेकिन राष्ट्रपति को लिखी कृष्णा सोबती की इस चिट्ठी के मायने भी क्या हैं ?
102. एक सूक्ति , क़िस्सा , लतीफ़ा उर्फ़ कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना वाले पानी में आग लगाने वाले आचार्य !
103. फ़िल्मी कहानियों के आगे हिंदी में छप रही कहानियां गोबर लगती हैं 
104. दूसरी भाषाओं की मुंडेर पर विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की रचनाएं 
 105. यह आहिस्ता ही जैसे तेजेंद्र की कहानियों की शिनाख़्त है कि कहीं कुछ शोर न हो और सब कुछ टूट जाए
106. धर्म भले ही अफीम हो , मगर आस्था तो जलेबी है 
107. एन डी टी वी मतलब जहर और नफ़रत की पत्रकारिता 
108. आज की तारीख में कौन समाज है जो मनुस्मृति से भी चलता है 
109. किसी मुस्लिम या दलित के साथ हादसा या हत्या होने पर देश में एक आंदोलन क्यों खड़ा हो जाता है 
110. अमरनाथ यात्रियों पर आतंकी हमला कर कुछ लोगों को मार डालते हैं तो कम से कम मुझे आश्चर्य नहीं 
111. तो क्या कुमार विश्वास के परोसने से बच्चन की कविताओं का स्टारडम गड्ढे में जाता रहा था 
112. सुशोभित सक्तावत के सवालों की आग बहुतों को जला रही है 
113. प्रतिबद्धता के नाम पर साहित्यकारों को अपनी इस दोगलई से हर हाल बाज आना चाहिए



 रचनाओं का रिसिया जाना 
[लेख-संग्रह ]
लेखक- दयानंद पांडेय
पृष्ठ- 248 मूल्य- 650
प्रकाशक- गीतांजलि प्रकाशन , 418 , महाराम मोहल्ला , विश्वास नगर 
दिल्ली - 110032



वैचारिकी से पलटी 
[लेख-संग्रह]
लेखक- दयानंद पांडेय
पृष्ठ- 232 मूल्य- 550
प्रकाशक- सजल पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स  503-L , गली नं.2 विश्वास नगर दिल्ली-110032