Saturday, 29 December 2012

एक बेटी की विदा का शिलालेख!

सरकार का दूध अगर निरंतर काला न होता तो यह बेटी इस तरह अपमानित हो कर सिंगापुर की धरती से हम से विदा न हुई होती। उस की विदाई पर शिलालेख न लिखना पड़ता। बेटी का इस तरह विदा होना हम सब के मुंह पर करारा तमाचा है, जूता है, जाने क्या-क्या है। अगर सरकार समझती है कि सिंगापुर भेज कर उस बेटी के निधन पर उपजी आग पर वह पानी डाल लेगी तो सरकार की बुद्धि पर तरस आता है। सरकार भूल जाती है कि ब्रिटिश हुकूमत ने बहादुरशाह ज़फ़र को भी निर्वासन दे कर रंगून भेजा था। उन्हें वहीं दफ़नाया भी गया था। ज़फ़र को लिखना पड़ा था :

 कितना है बदनसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिए
दो गज ज़मीन भी न मिली कूए-यार में।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद. अंग्रेजों ने उनके दोनो बेटों मिर्ज़ा मुगल और ख़िज़ार सुलतान का सर काट कर थाली पर उनके पास भेजा था और उनको बर्मा के रंगून में तड़ी-पार की सजा दे कर भेजा था । वही पर उनका देहांत हुआ 1862 में । तो क्या इस २०१२ में डेढ़ सौ साल बाद सिंगापुर फिर वही इतिहास दुहराने की याद दिला रहा है? क्यों कि तब1862 में ज़फ़र की आज़ादी की लगाई आग देश में बुझी नहीं और ब्रिटिश बहादुरों को तमाम जतन के बाद भी देश छोड़ कर जाना पड़ा था। तो क्या यह सरकार बहादुर शाह ज़फ़र की शहादत को, उस इतिहास को दुहराने की राह पर है? और उसी धुन में मगन निरंतर अपने दूध को काला बताने और जीत लेने की फ़िक्र में है?

आप पूछेंगे कि यह काला दूध की कैफ़ियत क्या है? तो जानिए कि यह एक लतीफ़ा है। लतीफ़ा यह है कि एक लड़का एक दिन स्कूल से वापस आया और अपनी मां से पूछा कि मम्मी दूध काला होता है कि सफ़ेद? मां ने पूछा कि माज़रा क्या है? तो बेटे ने पूरी मासूमियत से बताया कि आज स्कूल में एक लड़के से शर्त लग गई है। वह लड़का कह रहा था कि दूध सफ़ेद होता है और मैं ने कहा कि दूध काला होता है। तो दूध कैसा होता है मम्मी? मम्मी ने मायूस होते हुए कहा कि बेटा फिर तो तुम शर्त हार गए। क्यों कि दूध तो सफ़ेद ही होता है। बेटा यह सुन कर निराश हो गया। लेकिन पलटते ही बोला कि, मम्मी शर्त तो मैं फिर भी नहीं हारूंगा। शर्त मैं ही जीतूंगा। मम्मी ने पूछा कि वो कैसे भला? बेटा पूरी हेकड़ी से बोला, मैं मानूंगा ही नहीं कि दूध सफ़ेद होता है, मैं तो अड़ा रहूंगा कि दूध काला होता है। जब मानूंगा कि दूध सफ़ेद होता है तब तो हारूंगा? मैं तो कहूंगा कि दूध काला ही होता है। मम्मी बेटे की इस अकलमंदी पर मुसकुरा पड़ीं।

हमारी सारी सरकारें, केंद्र की हों, प्रदेशों की हों या कोई भी सत्ता प्रतिष्ठान हो, कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका, कारपोरेट हो, मीडिया हो या और जो भी कोई प्रतिष्ठान हों, सभी के सभी दूध को काला बताने की मुहिम इस कदर न्यस्त हैं कि वह सचमुच भूल चुके हैं कि दूध सफ़ेद होता है। हेकड़ी, झूठ और अहंकार में जकड़ी यह सरकारें और सत्ता प्रतिष्ठान सच से कोई नातेदारी रखना ही नहीं चाहते। गोया सच से बड़ा कोई पाप नहीं होता। यह सरकारें, यह व्यवस्था ऐसे ट्रीट करती हैं जनता के साथ  जै्से कभी किसी कारखाने के मालिकान और मैनेजमेंट कारखाने के कर्मचारियों के साथ ट्रीट करते थे। कि सारे सच और तर्क मालिकान और मैने्जमेंट के और सारी गलती कर्मचारियों की। सारे सरकारी कानून कर्मचारियों के हित में पर सारा सरकारी  अमला  मालिकान के पक्ष मे। तो कानून उस का हो जाता था जिस के हाथ में लाठी। और अंतत: साबित हो जाता था कि समरथ को नहीं दोष गोंसाई ! नतीज़ा सामने है कि अब इन कारखानों मे कहीं कोई कानून नहीं चलता। मालिकान जो चाहते हैं, वही कानून होता है।

सरकारें भी अब इसी राह पर हैं। वह सरकार नहीं, देश नहीं कोई कारखाना चला रही हैं। अपनी मिलकियत और जागीर समझ कर। कहीं कोई प्रतिपक्ष नहीं है। पक्ष और प्रतिपक्ष का खेल बस इतना ही बाकी रह गया है कि अभी हमारा टर्न, फिर तुम्हारा टर्न ! बस ! जनता-जनार्दन  बस उन के लिए सत्ता पाने का इंस्ट्रूमेंट भर है।

नहीं इस बेटी के साथ हुए दुराचार पर जनता खास कर युवा जिस तरह उद्वेलित और आंदोलित हुए और सरकार और सिस्टम ने उन से निपटने के जो तरीके अपनाए, जो लाक्षागृह बनाए वो बेहद शर्मनाक है। यह और यही तरीके वह अन्ना हजारे, रामदेव और अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के साथ भी आजमा चुकी है। जैसे अभ्यस्त हो चली है आंदोलनों के लिए लाक्षागृह बनाने के लिए। अब कि जैसे इसी बार नहीं कुछ मिला तो सिपाही सुभाष तोमर की आंदोलनकारियों की पिटाई से हुई मौत का ढिंढोरा पीट दिया। जब कि हार्ट अटैक से वह अपनी मौत मरा। मेट्रो स्टेशन बंद कर दिया, रास्ते बंद कर दिए। निहत्थे बच्चों की पिटाई की। उन पर इस बला की ठंड में पानी चलाया। वाटर केनन से। और जब सब कुछ से हार गए तो बता दिया कि दस आतंकवादी दिल्ली में घुस आए हैं जो इस आंदोलन में शरीक हो कर कुछ अप्रिय कर सकते हैं। हद है भई ! एक दांव आंदोलन के राजनीतिज्ञ होने का भी चलाया पुलिस कमिश्नर की चिट्ठी के जरिए। बताया कि इस आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लोग भी शामिल हो गए हैं। हद है। आखिर क्यों नहीं शामिल हों भला? क्या उन के पास नागरिक अधिकार नहीं हैं? गनीमत कि इस पर कम्युनिल कलर चढ़ा कर सेक्यूलर चश्मा नहीं लगाया। तो शायद इस लिए भी कि इस में वामपंथी छात्र संगठन भी खुल कर सामने थे। तो सरकार की यह तरकीब तितर-बितर हो गई। फिर शुरु हुई पुलिस और प्रशासन की नूरा कुश्ती। एस.डी.एम. की बात सामने आई कि पुलिस ने उन्हें पीड़ित का बयान ठीक से नहीं लेने दिया पुलिस ने। शीला दीक्षित की चिट्ठी और शिंदे की लुकाछुपी शुरु हो गई। अब यह देखिए शिंदे बेअसर होते दिखे तो वित्त मंत्री चिदंबरम को कमान संभालनी पड़ी। फिर ट्रांसपोर्ट और परिवहन विभाग आमने-सामने हो गए। एक दूसरे की गलती बताते हुए। आंदोलन फिर भी शांत नहीं हुआ। भ्रष्टाचार में डूबी सरकार के हाथ-पांव फूल गए। फिर सब की समझ में आ गया कि अब लड़की बचने वाली तो है नहीं और कही उस के निधन की आग में दहक कर आंदोलन उग्र हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। सो सिंगापुर भेज दिया उसे आनन-फानन ! तो क्या आंदोलन अब ठंडा पड़ जाएगा?

पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के समय उन के लिए एक स्लोगन चलता था कि निर्णय न लेना भी एक निर्णय है। उन्हीं नरसिंहा राव के वित्त मंत्री रहे आज के प्रधानंत्री मनमोहन सिंह ने उस स्लोगन को और आगे बढ़ाया है। कि निर्णय लेते हुए तो दिखो पर निर्णय मत लो। संसद में महिला आरक्षण बिल पेश कर के भी वह पास नहीं करावा पाए तो इस लिए कि वह ऐसा चाहते ही नहीं थे। लोकपाल के साथ भी वह यही खेल खेल गए। और अभी ताज़ा-ताज़ा दलितों को प्रमोशन में आरक्षण मसले पर भी वह इसी खेल को दुहरा गए हैं। नहीं याद कीजिए कि अमरीका के साथ वह परमाणु समझौते को ले कर कैसा तो खेल गए थे? सरकार गिरने की चिंता नहीं की। क्यों कि वास्तव में वह भारत की पसंद के प्रधानमंत्री नहीं, अमरीका और वर्ड बैंक की पसंद के प्रधानमंत्री हैं। इतने लाचार और असहाय कि उन्हें राहुल और सोनिया से मिलने के लिए टाइम मांगना पड़ता है। कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता है। अपनी मर्जी से वह मंत्रिमंडल तो क्या खांसी जुकाम भी नहीं तय कर सकते है। आर्थिक सुधार और उदारीकरण के नाम पर महगाई और भ्रष्टाचार का जो निर्मम खेल खेल रहे हैं वह इस का देश और लोगों पर क्या असर पड़ रहा है इस की रत्ती भर भी उन को फ़िक्र नहीं है। तो शायद इस लिए भी कि वह जनता द्वारा चुन कर नहीं आते। जनता का जो दर्द है, वह नहीं जानते। उन के पांव बिवाई फटे पांव नहीं हैं। इस लिए इस का दर्द नहीं जानते वह। वह सिर्फ़ प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाए रखने का दर्द जानते हैं। येन-केन-प्रकारेण। लेकिन दुराचार और हिंसा की मारी यह बेटी अपने बलिदान की  इबारत लिख कर आंदोलन और उबाल की जो आग बो गई है, वह राख होने वाली नहीं है। समय की दीवार पर लिखी इस आग को राजनीतिक पार्टियां पढे़ और समय रहते यह चोर-सिपाही का खेल खेलना और नूरा-कुश्ती बंद करें नहीं जनता उन को जला कर भस्म कर देगी। इस बेटी की आह को असर करने की उम्र अब खत्म होने को है। क्यों कि हालात अब बद से बदतर हो चुके हैं। ज़फ़र के एक शेर में ही जो कहें कि:

 चश्मे-क़ातिल मेरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी

तो राजनीतिक पार्टियों के दुकानदार और यह सरकारें, कार्यपालिका और न्यायपालिका भी होश में आ जाएं। नहीं जनता अभी तक तो सिर्फ़ बलात्कारियों को मांग रही है, बेटी को इंसाफ़ देने के लिए। कल को आप राजनीतिक आकाओं को भी बस मांगने ही वाली है। फिर तो यह पुलिस, यह सेना सब इस जनता के साथ में होगी, आप की सुरक्षा में नहीं। जनता को इस कदर बगावत पर मत उकसाइए। इस अनाम बेटी की शहादत, जिस की मिजाजपुर्सी में समूचा देश खड़ा हो गया, खुद-ब-खुद, यही कह रही है। आंदोलनों के लिए लाक्षागृह बनाने से बाज़ आइए।  नहीं जनता, यह व्यवस्था बदलने को तैयार खड़ी है। इस भारत को मिस्र की राह पर मत ले जाइए। खूनी क्रांति से इस देश समाज को बचाने की ज़रुरत है। उस बेटी को प्रणाम कीजिए, और सुधर जाइए राजनीति, न्यापालिका और कार्यपालिका के हुक्मरानों। इस देश के नौजवान आप के गरेबान तक पहुंच चुके हैं। बहुत हो गया काला दूध बताने का खेल। यह लतीफ़ा अब देश बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।

Tuesday, 27 November 2012

ब्लैकमेलर सुधीर चौधरी, बेजमीर पुण्य प्रसून वाजपेयी

ज़ी न्यूज़ के संपादक सुधीर चौधरी और बिज़नेस हेड समीर आहुलवालिया की आज हुई गिरफ़्तारी का स्वागत किया जाना चाहिए। मीडिया के लिए यह बहुत अच्छा सबक है। यह और ऐसा कुछ बहुत पहले होना चाहिए था। आगे यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। भस्मासुर में तब्दील होती जा रही मीडिया और उस के सरोकार जिस तरह हमारे सामने है, यह झटका बहुत पहले मिलना चाहिए था। जिस तरह मीडिया पर प्रबंधन और उस का व्यवसाय हावी होता जा रहा है, संपादक नाम की संस्था अब दलाल, लायजनर, मैनेजर और मालिकों का पिट्ठू बन कर जन-सरोकारों से मुह मोड़ कर सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय देखने में लग गई है, वह हैरतंगेज़ है। सिर्फ़ और सिर्फ़ मीडिया मालिकों के हित साधने में लगे संपादकों को उन की इस कुत्तागिरी के लिए जितनी सज़ा दी जाए कम है। मीडिया को बचाने के लिए यह बहुत ज़रुरी हो गया है। गिरफ़्तार तो ज़ी न्यूज़ के मालिक सुभाष गोयल को भी किया जाना चाहिए। और ऐसे तमाम मालिकों और संपादकों को गिरफ़्तार किया जाना चाहिए जो समाचार और व्यवसाय का फ़र्क भूल कर सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय जानते हैं। मालिकों की तिजोरी भरना जानते हैं। और फिर सुधीर चौधरी तो पेशेवर ब्लैकमेलर हैं। सांसद और उद्योगपति नवीन ज़िंदल तो कोयला स्कैम में गले तक धंसे पड़े हैं, उन की भी जगह जेल ही है। कानून अगर ठीक से काम करेगा तो ज़िंदल भी एक-न-एक दिन जेल में ज़रुर होंगे। लेकिन दिक्कत यह है कि कानून बड़े अपराधियों के खिलाफ़ काम करते समय सो जाता है और यह बड़े अपराधी बेल ले कर मज़े लेते हैं। अब देखिए न कि फ़ेसबुक पर कमेंट करने वाली लड़कियां कितनी जल्दी गिरफ़्तार हो जाती हैं, पुलिस और जज सभी एक साथ सक्रिय हो जाते हैं। पर बाल ठाकरे जीवन भर कानून हाथ में लिए रहे पर उन का क्या हुआ? उन्हें तिरंगे में लपेट कर विदा किया गया। यह देश और देश के स्वाभिमान पर एक गंभीर तमाचा है। जूता है देश-प्रेमियों के मुह पर। पर मीडिया इस पर खामोश है।

खैर, सुधीर चौधरी और समीर की तो गिरफ़्तारी हुई है और समूची ज़ी टीम इसे गलत ठहराने में पिल पड़ी है। और तो और पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे लोगों की आत्मा इतनी मर गई है कि इस घटना को इमरजेंसी से जोड़ने में अपनी सारी प्रतिभा उड़ेल कर रख दी है, अपनी सारी साख मिट्टी में मिला दी है। सफलता की चांदनी रात के इन उल्लुओं को बाज़ार और अपनी नौकरी के सिवाय कुछ दिखता ही नहीं, यह तो हद है। समूची पत्रकारिता को मालिकों की पिछाड़ी धोने में खर्च करने वाले यह बेजमीर लोग पत्रकारिता की मा-बहन करते हुए देश की सेलीब्रेटी बनने की मुग्धता में सारे सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे कर उसे राजनीति, कारपोरेट, क्रिकेट और सिनेमा में ध्वस्त करने में जी-जान से लगे पड़े हैं। यहीं उन की दुनिया शुरु होती है, और यहीं खत्म होती है। इन्हीं के आंगन में उन का सूरज उगता है, और इन्हीं के नाबदान में इन का सूरज डूबता है। इस और ऐसी कृतघ्न मीडिया की क्या इस भारतीय समाज को ज़रुरत है? वह मीडिया जो बीस रुपए कमाने वाले लोगों की ज़रुरत को नहीं जानती। वह जानती है ठाकरे जैसे गुंडों और देश-द्रोहियों को महिमामंडित करना। अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर जैसे पैसे के पीछे भागने वाले लोगों की खांसी-जुकाम की खबर रखना। अंबानी, ज़िंदल जैसे लुटेरों, देशद्रोहियों के हित की रक्षा करने वाली यह मीडिया, ब्लैकमेलर मीडिया जो अपने ही यहां काम करने वाले लोगों की सुरक्षा नहीं जानती, जिस मीडिया में काम करने वाले तमाम लोग मनरेगा से भी कम मज़दूरी में काम करते हैं, उस मीडिया में जहां सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया जैसे ब्लैकमेलर ऐश करते हैं, वह मीडिया जो नीरा राडिया जैसी दलालों के इशारे पर नाचती है, वह मीडिया जो अमर सिंह जैसे खोखले और दलाल लोगों के आगे गिड़गिड़ाती है, मौका पड़ने पर रंग बदलने में गिरगिट को भी मात दे देती है, वह मीडिया अगर सचमुच इमरजेंसी के टाइम में रही होती तो सोचिए कि भला क्या हुआ होता? और यह बेशर्म और ब्लैकमेलर मीडिया आज अपनी ब्लैकमेलिंग को इमरजेंसी की तराजू पर तौलने में जिस बेशर्मी से लगी है, यह तो मीडिया को मार डालने की कोशिश है।

जिस तरह मीडिया मालिकों ने सिर्फ़ और सिर्फ़ व्यवसाय को ही अपना मुख्य लक्ष्य बना रखा है वह किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज और देश के लिए शुभ नहीं है। ज़िंदल चाहे जितने बड़े बेइमान हों पर अभी पहले दौर में तो उन्हों ने सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया का स्टिंग कर उन की ब्लैकमेलिंग का जो वीडियो जारी किया है वह सुधीर चौधरी और समीर को अपराधी साबित करने के लिए बहुत है। अब कुछ वकीलों और संपादकों के मुंह में अपनी बात डाल कर ज़ी न्यूज़ के एंकर सुधीर-समीर को चाहे जितना जस्टीफ़ाई कर लें, कानून और समाज की नज़र में हाल-फ़िलहाल तो वह अपराधी हैं। जिस भी किसी ने वह वीडियो देखा होगा, सुधीर, समीर का ब्लैकमेलर चेहरा साफ देखा होगा। क्या तो हेकड़ी से सौ करोड़ रुपए सीधे-सीध मांग रहे हैं। और वह लोग रिरिया कर बीस करोड़ दे रहे हैं और कोयला स्कैम न दिखाए जाने का आदेश भी फ़रमा रहे हैं। ऐसे ब्लैकमेलरों को मीडिया-जगत को खुद-ब-खुद शिनाख्त कर उन्हें उन की राह दिखा दी जानी चाहिए। शुचिता, नैतिकता और मीडिया के प्रति निष्ठा का तकाज़ा यही है कि सुधीर चौधरी और समीर आहुलवालिया की इस ब्लैकमेलिंग को जितना कोसा जाए कम है, और उन की इस गिरफ़्तारी का दिल खोल कर स्वागत किया जाए, न कि इसे कंडम कर घड़ियाली आंसू बहाने में ज़ी घराने को कंधा दिया जाए। दिल्ली पुलिस को बधाई दी जानी चाहिए।

नवीन जिंदल द्वारा किए गए सुधीर चौधरी और समीर अहलूवालिया की स्टिंग की सीडी:

Friday, 2 November 2012

अपनी ही अदालत में मुकदमा हारते खड़े अटल !


भारतीय राजनीति क्या विश्व राजनीति में भी अगर कोई एक नाम बिना किसी विवाद के कभी लिया जाएगा तो वह नाम होगा अटल बिहारी वाजपेयी का। यह एक ऐसा नाम है जिस के पीछे काम तो कई जुड़े हुए हैं पर विवाद शून्य हैं। राजनीति काजल की कोठरी है, इस में से बिना कोई कालिख का निशान लिए निकलना टेढ़ी खीर है। लेकिन अटल जी निकले हैं। सार्वजनिक जीवन में अगर किसी को शुचिता और मर्यादा का पाठ पढ़ना हो तो वह अटल बिहारी वाजपेयी से सीखे। राजनीति में अगर राजधर्म का पाठ किसी को सीखना हो तो अटल जी से सीखे। भारतीय राजनीति और समाज में जो स्वीकार्यता अटल जी को मिली है, वह दुर्लभ है। उन की यह स्वीकार्यता भारतीय समाज और राजनीति की हदें लांघती हुई विश्व के पटल पर भी उभरती है। यहां तक की पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी जहां के राजनीतिज्ञ सुबह-शाम पानी पी-पी कर भारत और भारतीय राजनीति को कोसते फिरते हैं, वहां भी अटल जी की स्वीकार्यता निर्विवाद है। कोई एक अंगुली तक नहीं उठाता। तब जब कि कारगिल को ले कर पाकिस्तान के दांत खट्टे अगर किसी ने किए तो वह अटल जी ही थे। पर कारगिल के खलनायक परवेज़ मुशर्रफ़ तक वाजपेयी का झुक कर न सिर्फ़ इस्तकबाल करते हैं, बल्कि उन की बाडी लैंग्वेज़ भी बदल जाती है। वह लगभग नत-मस्तक हो जाते हैं। तो शायद इस लिए भी कि वाजपेयी जी जितना विनम्र और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ मुशर्रफ़ या किसी और भी की ज़िंदगी में कम आते हैं। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही इकलौते विनम्र राजनीतिज्ञ इस लिए हैं क्यों कि उन के जीवन का मूल-मंत्र ही यह है:

मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रुखाई
कभी मत देना।

और ऐसा भी नहीं है कि यह बात वह सिर्फ़ अपनी कविता में ही कहते हैं। उन को ऐसा जीवन में भी करते मैं ने ही नहीं, सब ने बारंबार देखा है। कि समय, समाज और सत्ता ने जो ऊंचाई उन्हें बार-बार दी, बावजूद उस के वह सब को गले भी बार-बार लगाते रहे और रुखाई तो जैसे उन की डिक्शनरी में कभी किसी ने देखी ही नहीं। भाजपा, जनसंघ या आर.एस.एस. से जिस के मतभेद रहे हैं या हैं उन से भी अटल जी के मतभेद नहीं रहे। विरोधी भी जब-जब अटल जी के विरोध की बात आई तो सिर्फ़ यह कह कर कतरा गए कि एक सही आदमी, गलत पार्टी में है। चंद्रशेखर और नरसिंहा राव जैसे लोग तमाम-तमाम मतभेदों के बावजूद जब अटल जी की बात आती तो उन्हें गुरुदेव कह कर नत हो जाते थे। बहुत कम लोग हुए हैं भारतीय राजनीति में जिन्हें जनसभा हो या लोकसभा हर कहीं पिनड्राप साइलेंस यानी नि:शब्द हो कर सुना जाए, अटल बिहारी वाजपेयी उन गिनती के लोगों में शुमार होते हैं।

न सिर्फ़ भाषणों में बल्कि व्यक्तिगत बातचीत में भी उन्हें सुनना एक अनुभव से गुज़रना होता था एक समय। अब तो वह बीमारी और बुजुर्गी के चलते लगभग निर्वासन भुगत रहे हैं पर जब एक बार बतौर प्रधानमंत्री लखनऊ आए तो मैं ने पूछा, 'अब क्या फ़र्क पाते हैं?'

'फ़र्क?' कह कर उन्हों ने आदत के मुताबिक एक लंबा पाज़ लिया। फिर जैसे उन के चेहरे पर एक तल्खी आई और बोले, 'लोगों से कट गया हूं। पहले लोगों के साथ चलता था, अब अकेले चलता हूं।' कह कर वह एक फीकी मुस्कान फेंक कर रह गए। अब जब वह स्वास्थ्य कारणों से ज़्यादा किसी से मिलते-जुलते नहीं, दिनचर्या भी उन की लगभग डाक्टरों और परिवारीजनों के बीच की बात हो चली है। अब वह ज़्यादा बोल नहीं पाते, सुन नहीं पाते, पहचान नहीं पाते आदि-इत्यादि खबरें जब-तब मिलती रहती हैं तो जान-सुन कर तकलीफ़ होती है। लेकिन उन का सार्वजनिक जीवन जितना चमकीला और निरापद रहा है उस से बड़े-बड़ों को रश्क हो सकता है। लेकिन राजनीति भी उन का प्रथम प्यार नहीं रही। एक समय वह खुद कहते रहे हैं कि राजनीति ने उन के कवि को भ्रष्ट कर दिया। राजनीति और पत्रकारिता दोनों ही ने उन के कवि को नष्ट किया ऐसा वह बार-बार मानते रहे हैं। राजनीति की रपटीली राह शीर्षक लेख में उन्हों ने खुद लिखा है, ' मेरी सबसे बड़ी भूल है राजनीति में आना। इच्छा थी कि कुछ पठन-पाठन करुंगा। अध्ययन और अध्यवसाय की पारिवारिक परंपरा को आगे बढ़ाऊंगा। अतीत से कुछ लूंगा और भविष्य को कुछ दे जाऊंगा, किंतु राजनीति की रपटीली राह में कमाना तो दूर रहा, गांठ की पूंजी भी गंवा बैठा। मन की शांति मर गई। संतोष समाप्त हो गया। एक विचित्र-सा खोखलापन जीवन में भर गया। ममता और करुणा के मानवीय मूल्य मुंह चुराने लगे हैं। क्षणिक स्थाई बनता जा रहा है। जड़ता को स्थायित्व मान कर चलने की प्रवृत्ति पनप रही है।' लगता है जैसे अटल जी यह लेख आज की परिस्थिति में लिख रहे हैं। लेकिन यह तो वह १९६३ में लिखा उन का लेख है। वह लिखते हैं, 'आज की राजनीति विवेक नहीं, वाक्चातुर्य चाहती है; संयम नहीं, असहिष्णुता को प्रोत्साहन देती है; श्रेय नहीं, प्रेय के पीछे पागल है।' सोचिए कि १९६३ में ही यह सब अटल जी देख रहे थे। आसान नहीं था यह देखना। वह लिख रहे थे, 'मतभेद का समादर करना तो दूर रहा, उसे सहन करने की प्रवृत्ति भी विलुप्त होती जा रही है। आदर्शवाद का स्थान अवसरवाद ले रहा है।'

अटल जी इन सारी चुनौतियों को देखते हुए ही आगे बढ रहे थे। वह लिख रहे थे, ' पद और प्रतिष्ठा को कायम रखने के लिए जोड़-तोड़, सांठ-गांठ और ठकुरसुहाती आवश्यक है। निर्भीकता और स्प्ष्टवादिता खतरे से खाली नहीं है। आत्मा को कुचल कर ही आगे बढ़ा जा सकता है।'

तो क्या अटल जी अपनी आत्मा को कु्चलते हुए ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे?

इस प्रश्न की पड़ताल होना अभी बाकी है। देर-सबेर समय इस का भी हिसाब लिखेगा ही। पर अभी और तुरंत अभी तो अगर मुझ जैसों से पूछा जाए तो अटल जी जैसा राजनीति में पारंगत और निरापद भारतीय राजनीति में कोई दूसरा नहीं दिखता। जो काजल की कोठरी से निकल कर भी अपनी धवलता बरकरार रखे है।

अब वह सार्वजनिक मंचों पर भले नहीं दिखते पर उन की चर्चा के बिना सार्वजनिक मंच कम से कम भाजपा के तो नहीं ही होते। बाकी मंचों पर भी वह अनायास चर्चा में बने रहते हैं। और याद आ जाता है उन का ओज और कविता की लय में गुंथा भाषण। जिस में आंख बंद कर के वह कहीं शून्य में खो जाते थे, एक लंबा पाज़ लेने के बाद वह बोलते थे। भारतीय राजनीति के भीष्म पितामह बन चुके अटल जी जैसे शर-शैय्या पर लेट कर सूर्य के उत्तरायण होने का इंतज़ार कर रहे हैं। पर जैसे महाभारत में भीष्म पितामह से आशीर्वाद लेने के लिए कतार लगी रहती थी, अटल जी के साथ वैसा नहीं है। भाजपा में चुनाव के समय तो वह अभी भी प्रासंगिक हैं, बिना उन के नाम के किसी की नैया पार नहीं होती। पर बिना चुनाव के कोई उन की सुधि भी नहीं लेता। न ही उन की तरह की राजनीति में कोई दिलचस्पी लेता है अब।

एक बार की बात है। अटल जी लखनऊ आए थे। उन से मिलने वालों की कतार लगी थी। मैं भी उन से इंटरव्यू करने के लिए पहुंचा हुआ था। इंतज़ार में मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता भी थे। बलिया के एक विधायक भरत सिंह भी थे। मंत्री पद की आस में। और भी कुछ लोग थे। भरत सिंह को जब मालूम हुआ कि मैं पत्रकार हूं और अटल जी से इंटरव्यू की प्रतीक्षा में हूं तो वह लपक कर मिले। वह चाहते थे कि अटल जी के सामने उन की अच्छी छवि प्रस्तुत हो जाए। उन्हों ने अपना परिचय दिया, 'माई सेल्फ़ भरत सिंह।' मैं ने छूटते ही पूछा कि बलिया वाले न?' वह बोले,' हां।' मैं ने बताया उन्हें कि जानता हूं आप को आप की अंगरेजी की वज़ह से। जब आप बी.एच. यू. में बतौर छात्र संघ अध्यक्ष बोलते थे। आई टाक तो आइऐ टाक, यू टाक तो यूऐ टाक, डोंट टाक इन सेंटर-सेंटर !' सुन कर भरत सिंह सकपकाए। पर मुरली मनोहर जोशी ठठा कर हंसे। इसी बीच उन्हें अटल जी ने बुलवा लिया। वह हंसते हुए अंदर पहुंचे तो अटल जी ने उन से हंसने का सबब पूछा। उन्हों ने मेरा और भरत सिंह का वाकया बताया। और कहा कि पत्रकार को ही बुला कर पूछ लीजिए। अटल जी ने मुझे भी बुलवा लिया। और पूछा कि किस्सा क्या है? तो मैं ने कहा कि भरत सिंह से सीधे सुनिए। सेकेंड हैंड संवाद सुनने से क्या फ़ायदा? भरत सिंह भी बुला लिए गए। पर भरत सिंह नो सर, नो सर, सारी सर, सारी सर, करते रहे, बोले कुछ नहीं। खैर भरत सिंह मुझे आग्नेय नेत्रों से देखते हुए विदा हुए। कि तभी लाल जी टंडन आ गए। एक डिग्री कालेज के उदघाटन का न्यौता ले कर। कि अटल जी उस का उदघाटन कर दें। अटल जी ने वह न्यौता एक तरफ रखते हुए टंडन जी से कहा कि यह उदघाटन तो आप खुद देख लीजिएगा। और अपनी ज़ेब से एक पर्ची निकाल कर उन्हें निशातगंज की गली और मकान नंबर सहित खड़ंजा और नाली के व्यौरे देने लगे। हैंडपंप के बारे में बताने लगे। और कहा कि मार्च का महीना है और हैंडपंप से पानी नदारद है। मई-जून में क्या होगा? पानी नदारद है और नाली चोक है, सड़कें खराब हैं, बरसात में क्या हाल होगा? यह और ऐसे तमाम व्यौरे देते हुए अटल जी ने कहा कि, टंडन जी वोट मिलता है, नाली, खडंजा, सड़क ठीक होने से और हैंडपंप में पानी रहने से, डिग्री कालेज के उदघाटन से नहीं।' और सारी लिस्ट देते हुए भरपूर आंखों से तरेरते हुए कहा कि टंडन जी आगे से यह शिकायत नहीं मिले।' जी, जी कह कर टंडन जी उलटे पांव लौट गए। बैठे भी नहीं।

उस दिन मुझे समझ में आया था कि अटल जी लखनऊ में सब की ज़मानत ज़ब्त कराते हुए हर बार रिकार्ड वोटों से कैसे जीत जाते हैं। मुसलमानों तक के रिकार्ड वोट उन्हें मिलते रहे हैं। और तो और बाद के दिनों में तो बीते चुनाव में जब टंडन जी खुद लखनऊ लोकसभा से चुनाव में उतरे तो अटल जी की चिट्ठी ले कर ही चुनाव प्रचार करते दिखे। तब भी जितने मार्जिन से अटल जी जीतते थे, टंडन जी जीत कर भी उन के मार्जिन भर का वोट भी नहीं पा पाए। ऐसे ही एक बार राम जेठमलानी भी अटल जी के खिलाफ़ लखनऊ से चुनाव में उतरे। बोफ़ोर्स के समय में वह रोज जैसे राजीव गांधी से पांच सवाल रोज़ पूछते थे, अटल जी से भी पूछने लगे थे, कांग्रेस के टिकट पर चुनाव में थे ही। तब जब कि वह अटल जी के मंत्रिमंडल में कानून मंत्री रह चुके थे और एक विवाद के चलते उन्हें इस्तीफ़ा देना पडा़ था। उसी की कसर वह चुनाव में रोज़ सवाल पूछ कर निकाल रहे थे। उन के तमाम सवालों के जवाब में अटल जी ने एक दिन अपना हाथ घुमाते हुए बस एक ही बात कही थी कि, 'हमारे मित्र जेठमलानी को चुप रहने की कला नहीं आती।' बस अटल जी का इतना कहना भर था कि जेठमलानी चुप हो गए थे। और लखनऊ से अंतत: ज़मानत गंवा कर लौट गए। ऐसे जाने कितने किस्से अटल जी के हैं। अब अलग बात है कि उन्हीं कांग्रेस पलट जेठमलानी, जो विवादित बयान देने और हत्यारों को ज़मानत दिलाने के लिए ज़्यादा जाने जाते हैं, को भाजपा ने फिर से राज्यसभा में बैठा दिया। पर वाजपेयी ने कभी उफ़्फ़ भी नहीं किया।

दुश्मन तो दुश्मन अटल जी का तो इतिहास ऐसे तमाम किस्सों से भरा पड़ा है कि जो दोस्त भी, हमसफ़र भी उन के पीछे पड़े तो बरबाद हो गए। जाने अटल जी की कुंडली ऐसी है कि उन की अदा ऐसी है कि लोगों का दुर्भाग्य, समझना काफी कठिन है। लेकिन इतिहास गवाह है बलराज मधोक से लगायत गोविंदाचार्य, कल्याण सिंह, उमा भारती, मदनलाल खुराना और यहां तक कि लालकृष्ण आडवाणी तक तमाम-तमाम नामों को गिन लीजिए। अटल विरोधी राजनीति करने वाले लोग न घर के रहे न घाट के। और अटल जी ने कभी किसी का प्रतिवाद भी नहीं किया।

असल में अटल जी वह शीशा हैं जिसे आप अगर पत्थर से भी तोड़ने चलें तो पत्थर टूट जाएगा, वह शीशा नहीं। ऐसा मेरा मानना है। याद कीजिए गोवा का सम्मेलन। जिस में पार्टी की राय को दरकिनार कर अटल जी ने नरेंद्र मोदी को राजधर्म की याद दिला कर इस्तीफ़ा देने की सलाह दी थी। लेकिन आडवाणी खेमे ने अटल जी की इस सलाह पर पानी फेर कर अटल जी को शह देने की बिसात बिछा दी थी। उन्हें टायर्ड-रिटायर्ड के खाने में बिठाने की जुगत लगाई। अटल जी भांप गए पूरे खेल को और बोले, ' न टायर्ड, न रिटायर्ड ! आडवाणी जी के नेतृत्व में विजय की ओर प्रस्थान !' अटल जी के इस एक जुमले से समूची भाजपा दहल गई और फिर उन के चरणों में मय आडवाणी के समर्पित हो नतमस्तक हो गई थी। असल में अटल जी जैसा नायक भारतीय राजनीति में इसी लिए दूसरा नहीं मिलता। यह वही अटल थे जो १९७१ में पाकिस्तान को हराने और दुनिया के भूगोल पर बांगलादेश बनाने वाली अपनी कट्टर विरोधी इंदिरा गांधी को दुर्गा कह कर सम्मानित भी कर चुके थे।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी अटल जी इसी अदा के कायल रहे हैं। याद कीजिए संयुक्त राष्ट्र संघ में बतौर विदेश मंत्री उन का हिंदी में भाषण। याद कीजिए जिनेवा। तब नरसिंहाराव प्रधानमंत्री थे। पर प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ा दिए थे। तब यही सलमान खुर्शीद विदेश राज्यमंत्री थे।
बाद के दिनों में जब अटल जी प्रधानमंत्री बने तो जिस पाकिस्तान ने देश में निरंतर आतंकवाद की खेती में खाद-पानी देने में कभी संकोच नहीं किया, उसी पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बहुत गरमजोशी से बढा़या। यह कहते हुए कि हम सब कुछ बदल सकते हैं, पर पड़ोसी नहीं बदल सकते। पर पहले परमाणु बम बनाया। क्यों कि पाकिस्तान की फ़ितरत वह जानते थे। और यह भी कि जानते थे कि भय बिनु होई न प्रीति। अमरीकी प्रतिबंधों की भी परवाह नहीं की इस के लिए। फिर बस से लाहौर गए। नवाज़ शरीफ़ से गले मिले। पर लौटे तो पीठ में कारगिल का घाव मिला। फिर भी उन्हों ने दोस्ती की आस नहीं छोड़ी। कारगिल के खलनायक मुशर्रफ़ को आगरा बुलाया। बातचीत टूट गई। अंतत: उन्हों ने कूटनीतिक दांव-पेंच से अमरीका को पाकिस्तान के साथ अटैचमेंट तोड़ने पर राज़ी किया। देश में लालकिला सहित संसद तक पर आतंकवादी हमले पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने किए। अटल जी ने भरपूर ताकत से पाकिस्तान पर वार किए। ज़्यादातर कूटनीतिक। वह लालकिले से भाषण भी देते रहे कि आतंकवाद और संवाद साथ-साथ नहीं चल सकता। सीमाओं पर सेना तैनात कर दी। समूचा देश लड़ने को तैयार था। पक्ष क्या प्रतिपक्ष क्या, सब एक थे। पाकिस्तान की घिघ्घी बंध गई। पर यह अटल बिहारी वाजपेयी ही थे कि सब कुछ हो जाने के बावजूद उन्हों ने युद्ध नहीं होने दिया। इस लिए कि वह युद्ध के विनाशकारी परिणामों से अवगत थे। उन की एक कविता याद आती है; जंग न होने देंगे। वह लिखते हैं :

भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना मंहगा सौदा,
रुसी बम हो या अमेरिकी, खून एक बहना है।
जो हम पर गुज़री बच्चों के संग न होने देंगे।
जंग न होने देंगे।

हिरोशिमा पर भी वह हिरोशिमा की पीड़ा कविता लिख चुके थे: 'किसी रात को/ मेरी नींद अचानक उचट जाती है/ आंख खुल जाती है,/ मैं सोचने लगता हूं कि/ जिन वैज्ञानिकों ने अणु अस्त्रों का/ आविष्कार किया था:/ वे हिरोशिमा-नागासाकी के/ भीषण नरसंहार के समाचार सुनकर,/ रात को कैसे सोए होंगे?' यह कविता लिखने के बावजूद अटल ने परमाणु परीक्षण तो करवा दिया पर युद्ध नहीं होने दिया। और अंतत: उन्हों ने शांति के कबूतर उड़ा दिए। सेनाएं बैरकों में लौट गईं। लेकिन कूट्नीतिक रुप से यह तो कर ही दिया कि तकरीबन दो तिहाई दुनिया ने पाकिस्तान को घोषित या अघोषित रुप से आतंकवादी देश मान लिया। पाकिस्तान दुनिया में अकेला हो गया और आज अगर भारत में आतंकवाद की घटनाओं में ज़बरदस्त कमी आई है तो यह अटल बिहारी वाजपेयी की डिप्लोमेसी का नतीज़ा है, कुछ और नहीं। सोचिए भला कि अगर खुदा न खास्ता तब पाकिस्तान से युद्ध छेड़ दिया होता वाजपेयी ने तो दुनिया की क्या सूरत होती? क्या तीसरा विश्वयुद्ध नहीं हो गया होता? और फिर पाकिस्तान एक पागल देश है, कहीं परमाणु बम का इस्तेमाल कर ही देता तो मनुष्यता का क्या हुआ होता? मेरा तो मानना है कि दुनिया को युद्ध से बचाने के लिए तब अटल जी को शांति का नोबल प्राइज़ दिया जाना चाहिए था। क्यों कि तब पाकिस्तान ने सारी स्थितियां युद्ध के लिए निर्मित कर दी थीं। संसद पर हमला देश की अस्मिता पर हमला था। पर यह वाजपेयी ही थे कि तमाम सारे चौतरफ़ा दबाव के बावजूद उन्हों ने युद्ध नहीं होने दिया। सीमाओं पर सेना तैनात कर कहते रहे कि अब आर या पार होगा पर युद्ध को फिर भी रोक लिया। यह काम कवि हृदय अटल बिहारी वाजपेयी ही कर सकते थे, कोई और नहीं। हालां कि वह कहते रहे हैं कि मेरी कविता जंग का ऐलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय-संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। लेकिन इस सब के बावजूद इस एक युद्ध को रोकने के लिए वाजपेयी को जितना सैल्यूट किया जाए कम है।

अटल के और भी कई ऐसे काम हैं जो काबिले ज़िक्र हैं। और सलाम करने लायक हैं।

सौ साल से भी ज़्यादा पुराने कावेरी जल विवाद को वाजपेयी ने ही सुलझाया। नदियों को जोड़ने की योजना बनाई। राष्ट्रीय राजमार्गों पर आप को जहां कहीं भी अच्छी और चमकदार सड़क मिले तो आप ज़रुर अटल बिहारी वाजपेयी को शुक्रिया कहिए। काम अभी भी जारी है। यह योजना भी अटल जी की ही बनाई हुई है। हवाई अड्डों का विकास, केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग आदि का गठन भी उन्हों ने ही किया। यह और ऐसे विकास की तमाम योजनाएं उन के खाते में दर्ज हैं। जो सब से बड़ी बात राजनीतिक रुप से उन के खाते में दर्ज है वह यह कि भारतीय राजनीति में गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री के रुप में उन्हों ने सब से लंबी पारी खेली। पहले तेरह दिन ,फिर तेरह महीने के आंकड़े के बावजूद बाद में गठबंधन सरकार को न केवल स्थायित्व दिया बल्कि उन समाजवादियों के साथ सफलपूर्वक सरकार चलाई, जिन समाजवादियों को कहा जाता है कि उन को साथ ले कर चलना मेढक तौलना है। वह विपक्ष की राजनीति में मील का पत्थर तो बने ही, आर.एस.एस. स्कूल से निकले अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हों ने भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी होने के शाप से मुक्त किया। जार्ज फर्नांडीज़, शरद यादव, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार जैसे सेक्यूलर नेताओं ने आगे बढ कर हाथ मिलाया तो यह अवसरवादिता तो थी पर यह अटल बिहारी वाजपेयी की रणनीति का भी कमाल था। यह लोग अपने मुस्लिम वोट बैंक को भी खतरे में डालने की हिम्मत दिखा पाए तो अटल जी की साफ-सुथरी छवि के ही कारण। इस लिए भी कि वह जितने सीधे हैं, उतने ही सच्चे भी। अटल जी के इस जादू का ही नतीज़ा था कि लालकृष्ण आडवाणी को भी सेक्यूलर बनने का नशा सवार हो गया। और वह पाकिस्तान जा कर ज़िन्ना की कब्र पर फूल चढ़ा कर ज़िन्ना को सेक्यूलर होने का सर्टिफ़िकेट दे बैठे। और बरबाद हो गए। आज तक आडवाणी इस विवाद और अवसाद से मुक्त नहीं हो सके हैं। अटल जी की ही एक कविता है: एक पांव धरती पर रखकर ही/ वामन भगवान ने आकाश, पाताल को जीता था।/ धरती ही धारण करती है/ कोई इस पर भार न बने/ मिथ्या अभिमान से न तने।' उन की ही एक और कविता यहां मौजू है:

छोटे मन से कोई बडा़ नहीं होता।
टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता।
मन हार कर मैदान नहीं जीते जाते,
न मैदान जीतने से मन ही जीते जाते हैं।

और कि, 'निर्दोष रक्त से सनी राजगद्दी,/ श्मशान की धूल से भी गिरी है,/ सत्ता की अनियंत्रित भूख/ रक्त-पिपासा से भी बुरी है।' पहले आडवाणी और अब मोदी जाने क्यों अटल जी की यह और ऐसी कविताएं पढ़ कर अपने बारे में जाने क्यों नहीं कुछ सोचते? तय मानिए कि अगर यह पढ़ते-सोचते तो आडवाणी बाबरी मस्ज़िद के गिरने का और कि मोदी गुजरात दंगे का बोझ ले कर प्रधानमंत्री पद की यात्रा का रुख शायद नहीं करते। पर क्या कीजिएगा विवश अटल जी ने ही यह भी लिखा है कि, ' बंट गए शहीद, गीत कट गए,/ कलेजे में कटार गड़ गई।/ दूध में दरार पड़ गई।' वाजपेयी को आखिर क्यों लिखना पडा़, ' बेनकाब चेहरे हैं,/दाग बड़े गहरे हैं,/ टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूं।/ लगी कुछ ऐसी नज़र,/ बिखरा शीशे-सा शहर,/ अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं।' आखिर वाजपेयी कितनी यातना से गुज़र कर यह लिखने को मज़बूर हुए होंगे, सोचा जा सकता है।

एक बार लखनऊ में वह राजभवन में मिले। कल्याण सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उन के साथ कई माफ़ियाओं और बाहुबली हिस्ट्रीशीटरों ने भी बतौर मंत्री शपथ ले कर अटल जी के पांव छू कर आशीर्वाद भी लिया था। बाद में उन से मैं ने पूछा कि यह सब क्या है पंडित जी? वह बिना कोई समय लिए आदत के मुताबिक गरदन हिला कर, हाथ भांज कर फ़ौरन बोले, 'आखिर जनता ने चुन कर भेजा है !' कह कर उन का चेहरा थोडा़ बुझ गया। उन की विवशता मैं समझ गया। थोड़ी देर बाद तत्कालीन राजनीति पर बात चली तो मैं ने धीरे से पूछा यह सब कैसे और किस तरह आप झेल लेते हैं? वह आंख मूंद कर, पाज़ ले कर धीरे से ही बोले, 'यह कविता है न ! यह मुझे संभाल लेती है।' कह कर वह उठ कर खड़े हो गए। उन की ही एक कविता याद आ गई: 'इस जीवन से मृत्यु भली है,/ आतंकित जब गली-गली है/ मैं भी रोता आसपास जब/ कोई कहीं नहीं होता है।' उन का ही एक और मशहूर गीत है:

टूटे हुए सपने की कौन सुने सिसकी?
अंतर को चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी।
हार नहीं मानूंगा,
रार नहीं ठानूंगा,
काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं।
गीत नया गाता हूं।

यह उन के नित नए गीत गाने की ही पराकाष्ठा है कि उन के तमाम विरोधी भी उन के चरण-स्पर्श कर उन से आशीर्वाद ले कर प्रसन्न होते हैं। और वह बहुत भाउक हो कर आशीर्वाद भी देते हैं। गले लगा लेते हैं। मुलायम सिंह यादव तक को मैं ने उन के चरण-स्पर्श करते हुए देखा है। एक बार एक इंटरव्यू के दौरान बातचीत में मैं ने उन से कहा कि पंडित जी, मुलायम सिंह जी आप का इतना आदर करते हैं, आप भी उन्हें इतना स्नेह देते हैं तो जो राजनीति मुलायम सिंह कर रहे हैं, मुस्लिम तुष्टिकरण की जाति-पाति की कभी आप रोकते क्यों नहीं? समझाते क्यों नहीं। वह ज़रा देर चुप रहे, फिर बोले, 'सब की अपनी-अपनी राजनीति है। कोई समझने समझाने की इस में बात नहीं है।' मैं ने उन्हें लगभग टोकते हुए कहा कि फिर भी ! तो वह बोले यह लिखिएगा नहीं। और बोले, 'वास्तव में मुलायम सिंह जैसे लोग भी बहुत ज़रुरी हैं।' उन्हों ने एक छोटा पाज़ लिया और बोले, 'हमारे मुस्लिम भाइयों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि उन के पास कोई अपना नेतृत्व नहीं है, उन के बीच से कोई कद्दावर नेता नहीं है तो वह अपना दुख ले कर कहां जाएं? किस के कंधे पर सर रख कर रोएं? तो हमारे मित्र मुलायम सिंह जी उन की यह ज़रुरत पूरी कर देते हैं। उन का दुख संभाल लेते हैं।' वह मुस्कुराए, 'हां ज़रा वह राजनीति की अति भी कर देते हैं। पर ज़रुरी हैं मुलायम सिंह जी, उन के लिए। वह उन के लिए प्रेशर कुकर में सीटी का काम करते हैं। सीटी न हो तो फट जाएगा प्रेशर कुकर!' जैसे उन्हों ने जोड़ा, 'मेरे लिए यह काम कविता करती है। साहित्य मुझे जोड़ता है। टूटने नहीं देता। आप याद कीजिए कि कई बार वह राजनीति की कठिन घड़ियों में भी कैसे तो कई सवालों का जवाब अपनी कविताओं से देते रहे हैं। सवालों के जवाब में उन्हें लगभग काव्य-पाठ कर देते मैं ने कई बार पाया है। वह चाहे प्रेस कानफ़्रेंस हो या कोई कार्यकर्ता सम्मेलन या कोई जनसभा।

बहुत लोग यह तो मानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी बहुत घटिया कवि हैं, या कि वह भी कोई कवि हैं?और भी कई बातें लोग कहते मिलते ही हैं। ठीक वैसे ही जैसे बहुत लोग उन्हें एक सांप्रदायिक पार्टी का नेता मानते हैं। पर यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि अटल जी न सिर्फ़ कविता के बल्कि साहित्य की अन्य विधाओं में भी गहरी दिलचस्पी रखते रहे हैं। नाटक और उपन्यास आदि में भी वह वैसी ही दिलचस्पी रखते रहे हैं। प्रेमचंद, के अलावा,अज्ञेय की शेखर एक जीवनी, धर्मवीर भारती का अंधा युग, वृंदावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास आदि के साथ-साथ वह तसलीमा नसरीन तक को पढ़ते रहे हैं। उर्दू शायरी में भी उन की गहरी दिलचस्पी रही है। गालिब और मीर जैसे शायरों के शेर उन के भाषणों में बार-बार आते रहे हैं। अब तो गज़ल गायक मेंहदी हसन नहीं रहे पर आप को याद होगा ही कि ज्ब मेंहदी हसन कुछ समय पहले बीमार पड़े और पाकिस्तान में उन का ठीक से इलाज नहीं हो पा रहा था तब अटल बिहारी वाजपेयी ने उन को भारत आदर पूर्वक बुला कर इलाज करवाया था।अटल जी मानते रहे हैं कि जो राजनीति में रुचि लेता है, वह साहित्य के लिए समय नहीं निकाल पाता और साहित्यकार राजनीति के लिए समय नहीं दे पाता। किंतु कुछ लोग ऐसे हैं जो दोनों के लिए समय देते हैं। एक समय वह कहते थे कि जब कोई साहित्यकार राजनीति करेगा तो वह अधिक परिष्कृत होगी। यदि राजनेता की पृष्ठभूमि साहित्यिक है तो वह मानवीय संवेदनाओं को नकार नहीं सकता। कहीं कोई कवि यदि डिक्टेटर बन जाए तो वह निर्दोषों को खून से अपने हाथ नहीं रंगेगा। तानाशाहों में क्रूरता इसी लिए आती है कि वे संवेदनहीन हो जाते हैं। एक साहित्यकार का हृदय दया, क्षमा. करुणा आदि से आपूरित रहता है। इसी लिए वह खून की होली नहीं खेल सकता। वह बहुत स्पष्ट मानते रहे हैं कि आज रा्जनीति के लोग साहित्य, संगीत, कला आदि से दूर रहते हैं। इसी से उन में मानवीय संवेदना का स्रोत सूख-सा गया है। अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए कम्यूनिस्ट अधिनायकवादियों ने ललित कलाओं का गलत उपयोग किया। वह राजनीति और साहित्य को संतुलित रखने के हामीदार रहे हैं।

शायद इसी लिए उन का मुझ पर स्नेह कुछ ज़्यादा ही रहा अन्य की अपेक्षा कि मैं लिखने-पढ़ने वाला आदमी हूं। एक बार १९९८ में मेरा बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया था। लगभग पुनर्जन्म ले कर मैं लौटा। तब वह अस्पताल में मुझे देखने आए थे। और बड़ी देर तक मेरा कुशल क्षेम लेते रहे। मेरे पिता जी और पत्नी को दिलासा दिया। मैं अर्ध-बेहोशी में था पर उन्हें हमेशा की तरह पंडित जी ही कह कर संबोधित करता रहा। डाक्टरों, प्रशासन आदि को वह ज़रुरी निर्देश भी देते गए। वह मेरी चिकित्सा का हालचाल बाद में भी लेते रहे थे। सहयोगियों को भेज कर, फ़ोन कर के। तो उन के जैसे व्यस्त व्यक्ति के लिए अगर मेरे जैसे साधारण आदमी के लिए भी मन और समय था तो सिर्फ़ इस लिए कि वह सिर्फ़ राजनीतिज्ञ ही नहीं एक संवेदनशील व्यक्ति भी हैं। एक समर्थ कवि भी हैं।

अटल जी को मैं ने पहली बार १९७७ में गोरखपुर की एक चुनावी सभा में सुना था तभी से उन के भाषण का मैं मुरीद हो गया। तब विद्यार्थी था। लेकिन सब के भाषण तब भी अच्छे नहीं लगते थे, अब भी नहीं लगते। इंदिरा गांधी, चरण सिंह, जगजीवन राम, चंद्रशेखर, शरद यादव, सुषमा स्वाराज आदि कुछ लोग हैं जिन के भाषण मुझे अच्छे लगते रहे हैं। पर इन सब में अटल जी शीर्ष पर हैं। नहीं बहुत छोटा था तब शास्त्री जी का भी भाषण सुना था। लेकिन बहुत गूंज उस की मन में नहीं है। बस याद भर है। कि तब उन के साथ इंदिरा गांधी भी थीं। खैर फिर अटल जी को लखनऊ सहित तमाम जन सभाओं, प्रेस कानफ़्रेंसों में बार-बार सुनते हुए जीवन का अधिकांश हिस्सा गुज़रा है। उन के साथ यात्रा करते, उन को कवर करते, इंटरव्यू करते बहुत सारी यादें हैं। पर एक याद तो जैसे हमेशा मन में टंगी रहती है। उन की लखनऊ के हज़रतगंज चौराहे पर की गई जनसभाएं। बीच चौराहे पर उन का मंच बनता था। और वह पांचों तरफ़ जाने वाली सड़कों के तरफ़ बारी-बारी रुख कर जब हाथ घुमाते हुए, गरदन को लोच देते हुए ललकारते हुए बोलते थे तो क्या तो समां बंध जाता था। वह बोलते हुए जिधर भी मुंह करते लगता जैसे दिशा बदल गई हो, सूरज उधर ही उग गया हो। पांचों सड़कें दूर-दूर तक खचाखच भरी हुई और किसी नायक की तरह बोलते हुए अटल बिहारी वाजपेयी॥ तब के दिनों वह बाद के दिनों की तरह लंबे-लंबे पाज़ नहीं लेते थे। धारा-प्रवाह बोलते थे। कभी जाकेट की ज़ेब में हाथ डाल कर खडे़ होते तो कभी दोनों हाथ लहराते हुए। अदभुत समां होता वह। तब के दिनों लोग बाग उन्हें भाजपा का धर्मेंद्र कहा करते थे। मतलब हर फ़न में माहिर। लोकसभा में उन के भाषणों की भी याद वैसे ही टंगी हुई है मन में। चाहे वह पहले प्रधानमंत्रित्व के १३ दिन बाद ही संख्या-बल के आगे सर झुका कर इस्तीफ़ा देने की घोषणा हो या दूसरी बार मायावती और जयललिता के ऐन वक्त पर दांव देने और उड़ीसा  के तत्कालीन मुख्यमंत्री गिरधर गोमांग द्वारा बतौर सांसद वोटिंग करने के नाते एक वोट से उन की सरकार के गिर जाने पर दिया जाने वाला वक्तव्य हो। या ऐसे ही ढेर सारे दृष्य मन में वैसे ही बसे हैं जैसे अभी कल ही की बात हो।

यह ज़रुर है कि उन्हों ने राजनीति में कइयों को जीवन दिया, मायावती, जयललिता और ममता जैसी मनमर्जी मिजाज वाली महिलाओं को संभाला बल्कि मायावती की तो उन्हों ने जान भी बचाई और लाख विरोध के बावजूद , पार्टी में धुर विरोध के बावजूद बार-बार भाजपा की मदद से मुख्यमंत्री भी बनवाया। तो भी मायावती ने उन के हर एहसान पर पानी डाला और बार-बार। पर अटल जी ने कभी इस बात का इज़हार भी भूले से किया हो, मुझे याद नहीं आता। एक बार मैं ने बहुत कुरेदा तो वह मुसकराते हुए ही बोले राजनीति है, कोई पूजा-पाठ नहीं।

एक बार मैं ने उन के अविवाहित रह जाने पर चर्चा करते हुए पूछा कि आप को क्या लगता है कि यह ठीक किया? सुन कर वह गंभीर हो गए। वह बोले, 'क्या ठीक, क्या गलत? अब तो समय बीत गया।' पर बाद में उन्हों ने स्वीकार किया कि अगर वह विवाहित रहे होते तो शायद जीवन में और ज़्यादा ऊर्जा से काम किए होते। ठीक यही बात मैं ने नाना जी देशमुख से भी एक बार पूछी थी तो लगभग यही जवाब उन का भी था। लता मंगेशकर से भी जब यही बात पूछी थी उन के मन में इस तरह की कोई बात नहीं थी। पर अटल जी के मन में थी। एक समय वह हरदोई के संडीला में भी अपनी जवानी में रहे थे। संडीला में लड्डू बड़े मशहूर हैं। तो वाजपेयी जी परिहास पर आ गए। बोले, 'यह तो वो लड्डू हैं जो खाए, वह भी पछताए, जो न खाए वो भी पछताए।' उन का एक गीत है सपना टूट गया:

हाथों की हल्दी है पीली
पैरों की मेंहदी कुछ गीली
पलक झपकने से पहले ही सपना टूट गया।

हालां कि यह गीत उन्हों ने जनता पार्टी के टूटने के समय लिखा था। पर उन के विवाहित जीवन के सपने से भी जोड़ कर इस कविता को देखा गया है। तो भी उन का जीवन प्रेम से या स्त्रियों से शेष रहा हो, ऐसा भी नहीं रहा है। उन के कई सारे प्रसंग-संबंध बार-बार हवा में उड़ते रहे हैं। चर्चा पाते रहे हैं। ग्वालियर, लखनऊ से लगायत दिल्ली तक में। ज़मीन से ले कर आकाश तक में। पर यह चर्चा कभी सतह पर नहीं आई। कभी नारायणदत्त तिवारी या किसी अन्य स्तर की चर्चा कभी नहीं हुई। एक गरिमा और खुसफुस-खुसफुस के स्तर पर ही रही। उन की एक कविता है, आओ मर्दों नामर्द बनो ! जो उन्हों ने इमरजेंसी में हुई नसबंदी की अंधेरगर्दी पर उन्हों ने लिखी थी, उस पर गौर करें:

पौरुष पर फिरता पानी है
पौरुष कोरी नादानी है
पौरुष के गुण गाना छोड़ो
पौरुष बस एक कहानी है
पौरुष विहीन के पौ बारा
पौरुष की मरती नानी है
फ़ाइल छोड़ो, अब फ़र्द बनो।

मनाली उन की प्रिय जगह है। मनाली पर भी उन्हों ने गीत लिखे हैं। गौर करे इस में उन की मस्ती:

मनाली मत जइयो, गोरी
राजा के राज में।
जइयो तो जइयों.
उड़ि के मत जइयों,
अधर में लट्किहो,
वायुदूत के जहाज में।

लेकिन वह यह भी लिखते थे:

मन में लगी जो गांठ मुश्किल से खुलती,
दागदार ज़िंदगी न घाटों पर धुलती।
जैसी की तैसी नहीं,
जैसी है वैसी सही,
कबिरा की चादरिया बड़े भाग मिलती।

उन का भांग प्रेम भी खूब चर्चा में रहा है। माना जाता रहा है कि वह बोलने में जो अचानक लंबा पाज़ खींच लेते हैं, वह उन की भंग की तरंग का ही नतीज़ा है, कमाल है, कुछ और नहीं। प्रेस कानफ़्रेंसों में तो कई बार अजीब स्थिति हो जाती रही है। वह एक सवाल का जवाब थोड़ा सा दे कर आंख बंद कर पाज़ में चले जाते तो कुछ अधीर पत्रकार तब तक दूसरा, तीसरा सवाल ठोंक देते। तो उन्हें किसी तरह रोका जाता। उन की इस तरंग का मज़ा कई और मौकों पर भी बार-बार लिया जाता रहा है। एक बार पंद्रह अगस्त को वह लालकिले पर भाषण देने के लिए कार से नीचे उतरे। एक पैर में जूता पहने हुए। दूसरे पैर का जूता कार में ही रह गया। पर वह इस से बेखबर घास पर छ्प-छप करते हुए चल पड़े। एक पैर में जूता, एक पैर में मोज़ा। बिलकुल किसी शिशु सी मासूमियत लिए अटल जी चले जा रहे हैं। अदभुत दृश्य था। सी.एन.एन जैसे चैनलों ने इस शाट को बहुत दिनों तक बार दिखाया। और लोग मज़ा लेते रहे।

ऐसा भारत जो भूख, भय, निरक्षरता और अभाव से मुक्त हो की कामना करने वाले अटल बिहारी वाजपेयी एक समय मानते रहे हैं कि क्रांतिकारियों के साथ हमने न्याय नहीं किया, देशवासी महान क्रांतिकारियों को भूल रहे हैं, आज़ादी के बाद अहिंसा के अतिरेक के कारण यह सब हुआ।' अब लगता है कि इस छुद्र राजनीति की आपाधापी में देश के लोग तो क्या खुद भाजपाई भी अब अटल बिहारी वाजपेयी को भूलने लग गए हैं। तो यह खटकता है। ऐसे शानदार राजनेता को हम उस के जीते जी ही भूलने लगें तो उन्हीं की एक बहुत लोकप्रिय शब्दावली में जो गरदन पर लोच डालते हुए, हाथ हिलाते हुए कहें कि, 'यह अच्छी बात नहीं है !' तो गलत बात नहीं होगी। अब की २५ दिसंबर को वह ८८ वर्ष पूरे कर ८९वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। तो मन करता है कि उन्हें समूचे देशवासियों की तरफ से उन की कविता ही में अग्रिम बधाई दूं:

हर पचीस दिसंबर को
ज़ीने की नई सीढ़ी चढ़ता हूं,
नए मोड़ पर
औरों से कम, स्वयं से ज़्यादा लड़ता हूं।
मेरा मन मुझे अपनी ही अदालत में खड़ा कर
जब जिरह करता है
मेरा हलफ़नामा, मेरे ही खिलाफ़ पेश करता है
तो मैं मुकदमा हार जाता हूं।

आज की तारीख में ऐसा कोई राजनेता या कोई कवि जो यह और इस तरह मुकदमा हारने की कूवत या कौशल रखने वाला हो, है क्या कहीं? ऐसे में उन की विनम्रता भरी वह पंक्तियां भी फिर से याद आ जाती हैं:

मेरे प्रभु !
मुझे इतनी ऊंचाई कभी मत देना
गैरों को गले न लगा सकूं
इतनी रुखाई
कभी मत देना।

वह तो आज की तारीख में भले ठीक से सुन या बोल नहीं पा रहे तब भी क्या सचमुच कुछ नहीं सोचते-गाते होंगे? ठन गई !/ मौत से ठन गई !/ रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,/ यों लगा ज़िंदगी से बड़ी हो गई गुनगुना रहे होंगे कि काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूं।/ गीत नया गाता हूं।' गा रहे होंगे?

या कि इस निर्मम समय में कुछ और भी गा रहे हों? क्या पता ?

अटल बिहारी वाजपेयी को उन के निवास पर भारत रत्न से सम्मानित करते राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी

Wednesday, 31 October 2012

कुनिका के नाते मेरा दांपत्य नहीं बिखरा : कुमार शानू

जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए, तुम देना साथ मेरा, ओ हमनवा । जैसे मेलोडी गीत गाने वाले कुमार शानू की तमन्ना अब संगीत निर्देशक बनने की है। अभी तक उन्हों ने कोई साढ़े सात हजार से भी अधिक गीत 14 भाषाओं में गाए हैं और अभी पांच साल तक लगातार वह गाते ही रहना चाहते हैं। इन दिनों वह बंगला फिल्म में अभिनय भी कर रहे हैं, पर अभिनय को कैरियर बनाने का उनका इरादा बिलकुल नहीं है। किशोर कुमार उन की ज़िंदगी है। सब से बड़े प्रेरणास्रोत हैं। गायकी में भी और शायद ज़िंदगी में भी। किशोर कुमार भी अभिनय करते थे और कुमार शानू भी इन दिनों अभिनय कर रहे हैं। किशोर कुमार भी गायकी में मैलोडी की वकालत करते थे और कुमार शानू भी। किशोर कुमार का दांपत्य भी बिखरा-बिखरा था और कुमार शानू का भी दांपत्य अब उजड़ा-उजड़ा सा है। अपनी पत्नी से अब वह अलग हैं और बाकायदा लड़ाई चल रही है। पर वह इस बारे में कोई बातचीत नहीं करना चाहते हैं। कहते हैं कि कोई पर्सनल बातचीत नहीं करना चाहता। अब तो कुमार शानू के गायकी का कैरियर लगभग स्थगित है। हालां कि बीते दिनों प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने से कुछ समय पहले ही उन का एक अलबम आया जिस कि प्रणव मुखर्जी ने रिलीज़ किया। तो भी अब वह नया कुछ गा रहे हों पता नहीं चलता। तो भी अभी भी वह सुने जाते हैं, पुराने गानों के मार्फ़त ही सही। खैर, ज्योतिष में विश्वास रखने वाले, नई-नई कारों के शौकीन और पालिटिक्स से घृणा करने वाले कुमार शानू १९९७ में लखनऊ एक कार्यक्रम में आए थे। तब दयानंद पांडेय ने राष्ट्रीय सहारा के लिए कुमार शानू से खुल कर बातचीत की थी। बात पुरानी भले है पर प्रासंगिक आज भी है। पेश है वही बातचीत:

-आप ने अंगुलियों और गले में ढेर सारे पत्थर आदि पहन रखे हैं। मतलब आप ज्योतिष में विश्वास रखते हैं।
हां, ज्योतिष में विश्वास करता हूं।

-आप जानते हैं कि कौन सा ग्रह और कौन सा पत्थर गायक बनाने में मदद कर सकता है?
नहीं, गायन तो पैदाइशी है। अगर आप गाना नहीं जानते तो रूबी पहन कर नहीं गा सकते।

-आप गाना गाते समय क्या फ़िल्म के हीरो की छवि भी ध्यान में रखते हैं?
नहीं। हां, सिचुएशन तो सुनता हूं। क्यों कि गाना तो अब पहले रिकॉर्ड होता है और हीरो बाद में सैलेक्ट होता है। पहले बताते भी थे कि कौन हीरो है, पर आज अगर बताते भी हैं तो अगर बताया कि हीरो गोविंदा है तो फ़िल्म जब आती है तो अक्षय कुमार हीरो हो जाता है। तो मैं खुद को हीरो मान कर गा लेता हूं।

-तो क्या इसी नाते आप अब फ़िल्मों में अभिनय करने लगे हैं?
ऐसा कारण नहीं है। बात ऐसी है कि वह स्टोरी ही सिंगर के लिए है और मेरी मातृभाषा बंगला की फ़िल्म है। इस के लिए मैं ने अपना वज़न भी घटाया है कोई 27 किलो। पहले मेरा वजन 102 किलो का था।

-आप गायकी खातिर अपने गले को फिट रखने के लिए परहेज भी करते हैं?
परहेज नहीं करता, क्योंकि यह तो नेचर की चीज़ है। हां, अगर मैं गले का परहेज रखना शुरू कर दूंगा तो ज़रूर गला खराब हो जाएगा। मैं तो तेल फ्राई की तमाम चीज़ें खाता हूं। आइसक्रीम खाता हूं। स्पाइसी खाना मुझे बहुत पसंद है। चाइनीज और मुगलई मेरा फेवरिट खाना है और मैं खुद भी एक अच्छा कुक हूं। जब जो चाहता हूं, बना लेता हूं।

-पर जब आप ने इधर वज़न घटाया है तो क्या डाइटिंग की थी?
डायटिंग जैसी कोई बात नहीं। खाने में थोड़ी क्वांटिटी घटा दी और एक्सरसाइज की।

-लखनऊ आप पहली बार आए हैं?
हां, लखनऊ मेरे लिए फर्स्ट टाइम है।

-कभी उत्तर प्रदेश के किसी और शहर में आना हुआ है क्या पहले?
दिल्ली क्या यूपी में है। दिल्ली आया हूं।

-पर दिल्ली तो यूपी में नहीं है?
तो नहीं आया। आज फ्लाइट के रास्ते में बनारस पड़ा था।

-क्या लखनऊ घूमने का इरादा है?
घूम नहीं पाऊंगा। कल शाम को चार बजे बंबई में रिकॉर्डिंग है। राजेश रौशन जी का एक गाना गाना है, इस लिए चला जाऊंगा।

-किस फ़िल्म के लिए?
फ़िल्म का नाम पता नहीं। गाने का ट्यून और गीतकार का नाम भी पता नहीं।

-आप कुछ पढ़ते भी हैं?
पढ़ना अब नहीं हो पाता। पहले डिटेक्टिव नॉवेल्स पढ़ता था। अब डिस्कवरी चैनल और कार्टून टीवी पर देखता हूं।

-अखबार भी नहीं पढ़ते?
अखबार मंगाता तो हूं। टाइम्स आफ इंडिया। बाथरूम में देख लेता हूं, पर पढ़ नहीं पाता। पर मंगाता इस लिए हूं कि लोगों को लगे कि मैं पढ़ता हूं। (कह कर वह हंसते हैं।)

-हिंदी सिनेमा देखते हैं?
बहुत कम। वैसे अंगरेजी फ़िल्में देख लेता हूं। खास कर फाइट, थ्रिलर वाली फ़िल्में।

-आर्ट फ़िल्में?
आर्ट फ़िल्म देखने के लिए सोने का वक्त चाहिए। जिंदगी में टेंशन वैसे ही बहुत है। आर्ट फ़िल्में देखकर टेंशन और बढ़ाना नहीं चाहता।

-पॉलिटिक्स?
आई हेट पॉलिटिक्स। अब क्यों? आप जानते हैं, क्यों कि पॉलिटिक्स में रियालिस्टिक कुछ है नहीं।

-वोट तो देते हैं?
वोट मैं ने दिया नहीं। कम से कम आठ-नौ साल से। मेरा वोट कोई और दे देता है, तो यह भी रियालिस्टिक है।

-आप को पसंद क्या है?
कंट्री घूमना पसंद है। मुझे पहाड़ और समुद्र पसंद है। आई लव नेचर।

-माना जाता है कि जिन को प्रकृति से लगाव होता है, वह इमेजिनेशन भी काफी रखते हैं?
मैं नहीं रखता। सुबह उठ कर सोचता हूं कि इमेजिनेशन कुछ करूं। पर यह भी जानता हूं कि वह कभी होने वाला नहीं है। तो कहता हूं चुपचाप गाने पर निकल जाओ बेटा, पर सपने तरह-तरह के देखता हूं। बिल्कुल फैंटेंसी भरे।

-आप को गाने किस तरह के पसंद हैं?
गाने मैं हर किस्म का गा चुका हूं। पर सेमी क्लासिकल, सैड सांग्स और रोमांटिक गाने मेरी पसंद के गाने हैं।

-आप का अपना गाना, कौन सा गीत आप को पसंद है?
जुर्म फिल्म का जब कोई बात बिगड़ जाए, जब कोई मुश्किल पड़ जाए। साजन फिल्म का ये दिल कितना पागल है, ये प्यार तुम्हीं से करता है तथा 1942 ए लव स्टोरी का गाना कुछ न कहो, कुछ ना सुनो भी पसंद है। ऐसे देखने जाऊं तो मुझे अपना गाया बहुत सारा गाना पसंद है।

-गायकी का स्टारडम इन दिनों हिंदी फ़िल्मों में किस के पास है?
मैं खुद स्टारडम के दौर से गुज़र रहा हूं। आशिकी के बाद से। दरअसल स्टारडम शब्द एक्टिंग से है। पर जैसे कि लोग सिंगर को फेस वाइज पहले पहचानते नहीं थे, पर अब इतना मीडिया आ गया है कि लोग जान गए हैं और कहते हैं, देखो वो जा रहा है।

-तो एक्टर स्टार और सिंगर स्टार में फर्क क्या है?
एक्टर स्टार्स और हम में फर्क यह है कि एक्टर या एक्ट्रेस आंखों से दिल में उतरते हैं और हम कानों से दिल में उतरते हैं। पर आंख एक दिन में सात बार झपकती है, तो स्टार चेंज होते रहते हैं। तो आंख के कई पर्दे होते हैं। आंख एक बार आप की झपकी तो दिलीप कुमार, फिर झपकी तो अमिताभ, शाहरूख वगैरह-वगैरह। पर कान में ऐसा कोई पर्दा नहीं होता। कोई झपकी-वपकी नहीं होती। एक बार आपने सुना तो हम आप के हो गए।

-ऐसा क्या हो सकता है कि कोई आप का फैन हो, आपका फॉलोवर हो और आपकी ज़िंदगी में आ जाए?
फॉलोवर? मेरी जिंदगी में क्यों आएगा? मैं खाली तो नहीं हूं कि कोई आ जाए। बड़ी परेशानी है।

-आप का बिखरा दांपत्य हमेशा चर्चा में रहता है?
पर्सनल लाइफ के बारे में बिल्कुल बात नहीं।

-बीते दिनों आपने एक ट्रस्ट बनाया था?
ट्रस्ट बनाया तो अच्छे के लिए।

-कहा गया कि आप ने ऐसा अपनी संपत्ति से पत्नी को वंचित करने के लिए किया?
यह सब गलत बात है। सब झूठ खबरें हैं।

-अभी आप का एक वीडियो एलबम आया है, उस में आप काफी शर्माते हुए दिखते हैं?
हां, सिंगर को एडमायर करने वाला करेक्टर है।

-कुनिका के साथ आप की दोस्ती की चर्चा भी खूब होती है?
हां, हमारी बहुत अच्छी दोस्ती है।

-यह भी कहा जाता है कि आपका दांपत्य इसी लिए बिखरा है?
दांपत्य इस लिए नहीं बिखरा।

-आप के बिखरे दांपत्य का गायकी पर भी असर पड़ा होगा?
गायकी पर कोई असर नहीं पड़ा।

-आप गायकी की दुनिया में आए कैसे?
पहला चांस जगजीत सिंह ने दिया। आंधियां फ़िल्म के लिए। पर पहला ब्रेक जादूगर फ़िल्म से मिला। फर्स्ट हिट फ़िल्म आशिकी थी। 26 गाने एक दिन में रिकॉर्ड करने का गिनीज रिकॉर्ड भी है मेरा। पांच बार लगातार फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड भी मुझे मिला है।

-आप ने संगीत की कोई विधिवत शिक्षा भी ली है?
बिल्कुल नहीं। कोई गुरु भी हमारा नहीं है, पर हमारी फ़ैमिली म्यूजिकल है। खानदानी। बड़े भाई रापन भट्टाचार्य बंगला फ़िल्मों में म्यूजिक डॉयरेक्टर हैं। पिता जी प्योर क्लॉसिकल हैं।

-आप के इस तरह के गाने से पिता नाराज नहीं होते?
बिलकुल नहीं।

-रियाज कितनी देर करते हैँ?
रियाज बिलकुल नहीं। दिन में जो गाने गाता हूं, वहीं रियाज है।

-बंबई में घर में कौन-कौन है?
घर में मैं अकेला हूं। एक डॉग है। टाइगर।

-घर के और लोग?
दांपत्य की बात अभी खुद कर चुके हैं आप। पर मदर, ब्रदर, सिस्टर सब कलकत्ता में हैं। सब गाने बजाने में।

-इन दिनों जो पॉप का चलन चला है, आप क्या कहना चाहेंगे?
बरसाती मेंढ़क हैं। जैसे तीन-चार महीने मेंढक चलता है। आता है, जाता है। तो पॉप भी ऐसा ही है। फिर भी चेंजेज होना चाहिए, अच्छा है।

-लोक संगीत का भी पॉप में इस्तेमाल खूब हो रहा है?
फोक रिजनल है। फोक तो बेसिक है हमारा। पर पॉप में इसे ढालना ठीक नहीं है। पर सिर्फ़ फोक भी कोई नहीं सुनता, तो कुछ डाल कर लोग देख रहे हैँ। यह भी ठीक है।

-तमाम गायक इन दिनों कंपोजिंग में लग गए हैं। टीवी कार्यक्रमों के एंकर बन गए हैं?
मैं नहीं करना चाहता। इस के लिए बहुत समय चाहिए होता है। मेरे पास समय नहीं है।

-लेकिन आप बंगला फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं, तो क्या यह माना जाए कि आप किशोर कुमार को भी फॉलो करने में लगे हैं, क्यों कि वह भी अभिनय करते थे।
इस तरह से लोग समझे तो यह बात अलग है। पर है यह को-इंसीडेंस।

-हिंदी फ़िल्मों में काम करने का इरादा है?
हिंदी फ़िल्मों में आफर तो बहुत हैं, पर काम नहीं करूंगा।

-एक गायक हैं शैंलेंद्र सिंह। उन्हों ने भी कुछ फिल्मों में काम किया, पर पिट गए। कहीं इस डर से तो नहीं, हिंदी फ़िल्में मना कर रहे हैं?
इस डर से नहीं।

-आप की जिंदगी की खास तमन्ना क्या है?
म्यूजिक डॉयरेक्टर बनना चाहता हूं।

-तो दिक्कत क्या है? आप जब चाहें, जिस को कह सकते हैँ?
जब चाहे नहीं कह सकते। सिंगिंग कैरियर को अहिस्ता कर के जाएंगे। पांच साल और गा लूं, तो उस के बारे में सोंचूं।

-आप ने कई धारावाहिकों किस्मत, अंदाज आदि में गाया है। खुद धारावाहिक नहीं बना रहे हैं?
बनाया है। बंगाली में। कुमार शानू प्रा.लि. की ओर से। डीडी-7 के लिए।

-ऐसा क्यों होता है कि चाहें हेमंत कुमार हों, एस.डी. बर्मन हों, सब के सब वापस कलकत्ते की ओर जाने लगते हैँ?

अपनी मां को कोई भूल नहीं सकता न। जहां कहीं भी जाऊं, खाऊं-पीऊं, अपनी मां को नहीं भूल सकता।

-सिनेमा और वीडियो में इन में किसके दिन ज़्यादा अच्छे दिखते हैं, आप को?
निश्चित रूप से वीडियो। वीडियो और धारावाहिक ज्यादा मार्केट में हैं। क्यों कि यह कम खर्चीला है।

-सुनते हैं आप को कारों का बड़ा शौक है?
सही सुना है। मेरे पास इस समय तीन कारें हैं। प्रीविया, शेना और सेलो। ड्राइविंग खुद भी करता हूं। जहाज में भी बैठने का शौक है।

-सुपर कैसेट्स ग्रुप के छोड़ने के बाद आप के कैरियर मे कोई फ़र्क नहीं आया?
कोई नहीं। अब यहां अनुराधा पौंडवाल हर गाने में दखल देने लगीं थीं। डिक्टेटिव नेचर था उन का। तो छोड़ दिया और फिर नौ मन का तेल जलेगा भी नहीं और मिलेगा भी नहीं तो क्या फ़ायदा।

-पर अब तो अनुराधा पौंडवाल फ़िल्मों में गाना बंद कर चुकी हैं। अब आप की वापसी हो सकती है सुपर कैसेट्स में?
अनुराधा ने गाना नहीं बंद कर दिया। लोगों ने उन्हें लेना बंद कर दिया था। पहले बोली थी कि गाऊंगी नहीं, पर अब गा रही हैं। मेरे साथ भी गा रही हैं। अब डिक्टेट नहीं करतीं।

-किस-किस संगीतकार के साथ आप अनुराधा पौंडवाल के साथ गा रहे हैँ?
अन्नू मलिक, दिलीप सेन, समीर सेन और बप्पी दा के साथ।

-ऐसा क्यों हुआ कि मुहम्मद रफी, मुकेश और किशोर कुमार की जगह तमाम लोगों ने लेनी चाही, पर किशोर कुमार की जगह तो दो-तीन लोगों ने जैसे-तैसे कवर की है, पर रफी और मुकेश की आवाजों का कोई वारिस नहीं दिख रहा?
इस लिए कि हर कोई किसी न किसी को फॉलो कर के इंडस्ट्री में आया है। फॉलो करना बुरी बात नहीं है। सहगल को मुकेश और किशोर दा ने भी फॉलो किया था। नूरजहां को लता ने फॉलो किया था और गीता दत्त को आशा भोसले ने। दुर्रानी को रफी साहब ने। पर इन सब लोगों ने अपना रास्ता बाद में अलग बनाया। आपनी अलग पहचान बनाई। अपनी क्रियेटिविटी को कायम किया। जैसा कि मैं ने भी किया किशोर दा को फॉलो कर के।

-पर किशोर कुमार की मैलोडी आप की गायकी में काफी छाई रहती है?
किशोर दा की मैलोडी ही नहीं, उनकी पूरी सिंगिंग टेक्निक, स्टाइल, एक्टिंग, ब्रोइंग सब इस्तेमाल किया।

-पर जैसे कि रफी और मुकेश की आवाज़ों की लोगों ने वल्गर कॉपी की, कान में शीशा डाला, आप इस से कैसे बच पाए?
कान में शीशा उन लोगों ने इस लिए डाला कि उस में वो अपना कुछ मिला नहीं पाए। स्कूल में टीचर को कई बार फॉलो करते हैं तो इसका मतलब तो यह नहीं होता कि हम टीचर बन जाएं।

रघुवीर सहाय: बाजा फिर बेताल हो गया

जैसे मैं ने कहा
मैं भी देश का नागरिक हूं
बाजा बेताल हो गया।

रघुवीर सहाय की यह कविता देश के तमाम-तमाम नागरिकों की विवशता, सच्चाई और उस की त्रासदी की एक निर्मम सच्चाई और उस की त्रासदी को उकेरती है। और इस त्रासदी की एक निर्मम सच्चाई यह भी है कि रघुवीर सहाय खुद भी इन तमाम नागरिकों में से एक थे। उन के निजी जीवन में हमेशा ही कुछ ऐसा घटता रहा कि बाजा बजते-बजते बेताल हो जाता रहा।

उन की कुछ दिनमानीय टिप्पणियों को छोड़ दें तो मुझे उन की कविता से ज़्यादा प्रिय उन का गद्य लगता है। बहुत भाता है उन का सरल-सहज गद्य। उन की रचनाओं में हमें उन का काल, सहजता, सौंदर्य और जिस कठिन सरलता की जो छौंक मिलती है, खास कर उनके गद्य में गमकती है, छलकती है, नासूरों को फोड़ती, विसूरती हमें कहीं बांधती चलती है कि हम उसे पूरा बांचे बिना नहीं रह पाते।
जैसे :

नीचे घास
ऊपर आकाश
ऐसा ही होता यदि जीवन में विश्वास

बहुतेरे आज भी यह कहते अघाते नहीं कि रघुवीर सहाय जब तक दिनमान के संपादक रहे, तब तक वह दिनमान पढ़े बिना रह नहीं पाते थे, खाना ही हजम नहीं होता था। तो यह भी कहने वाले भी कम नहीं हैं कि रघुवीर सहाय के जमाने का दिनमान उनके पल्ले ही नहीं पड़ता था। ऐसा कहने वाले साक्षरों को तब का दिनमान क्यों नहीं आता था समझ में? क्या सिर्फ़ इस लिए कि रघुवीर सहाय का दिनमान नारी देह के ब्यौरे देने के बजाय स्त्री की आकुलता, विवशता के ब्यौरे देता था। उसके शरीर सौष्ठव पर सिसकारियां भरने के बजाय शरीर शोषण पर सरल और तल्ख टिप्पणियां देता था। इसी लिए?

इसी लिए कि राजनेताओं के बेडरूम और उन की गासिप के बजाय विकास योजनाओं का थोथापन, राजनेताओं के थेथरपन की थाह लेता और देता था, ‘पैनी नजर’ का स्वांग नहीं भरता था। भड़काऊ विज्ञापन और देह उभारू आवरण कथाएं नहीं परोस पाता था रघुवीर सहाय का दिनमान। इसी लिए कि इसी लिए रघुवीर सहाय का दिनमान आदिवासियों के अंतहीन शोषण, नक्सलियों का जुझारूपन, कामगारों के कठिन जीवन को जगह देता था। पंचसितारा होटल या बहुमंजिले भवनों में आग से ज़्यादा तबाही होती है कि दिल्ली की सीमापुरी और मंगोलपुरी की झुग्गियों में आग ज़्यादा तबाही की तरहें बताता था इस लिए? यह और ऐसे बहुतेरे कारण हैं दिनमान के इस या उस खोने में जाने के। या कहूं कि रघुवीर सहाय को इस या उस खाने में खोजने के।

अब कि जैसे वह घोषित लोहियावादी थे, लेकिन मंडल आयोग की सिफरिशों के खिलाफ भी खुल कर खड़े हुए थे। रघुवीर सहाय का स्पष्ट मानना था कि मंडल सिफारिशों में लोहिया जी की बात है ही नहीं। लोहिया जो साठा की बात करते थे। मतलब साठ प्रतिशत आरक्षण में सिर्फ़ पिछड़ी जातियां भर नहीं है। इस साठ में सभी जातियों के पिछड़े इस में शुमार थे। महिलाओं को स्पष्ट रूप से वह पिछड़ा मानते थे।

आकाशवाणी के संवाददाता तथा कल्पना और प्रतीक के संपादक मंडल में रह चुके सहाय जी हमेशा ज़मीन के साथी रहे। वह अंग्रेजी में एम.ए. थे, लेकिन रोटी हिंदी की खाते थे। हिंदी के वह प्रखर प्रवक्ता थे। आजीवन हिंदी के लिए लड़ाई लड़ते रहे, लेकिन कभी-कभी दिक्कत भी हो जाती थी। जाने यह व्यवस्था का दोष था कि उन का खुद का कहना थोड़ा मुश्किल है। कुछ लोगों को जान कर शायद तकलीफ हो सकती है कि हिंदी के पहरुआ रघुवीर सहाय के संपादन में निकलने वाले दिनमान में भी ज़्यादातर अंग्रेजी अखबारों का उथला ही छपा करता था। क्या तो हिंदी मेंसोर्स नहीं था, लेकिन तब तो और हद हो जाती थी, जब दिल्ली की भी खबरें अंग्रेजी ही में लिखवा कर उस का हिंदी अनुवाद दिनमान में छपता था। लगता नहीं था यह वही रघुवीर सहाय हैं, जो हदें लांघते हुए हिंदी के लिए हुंकारते थे, लेकिन क्या कीजिएगा, बाजा बेताल हो जाने के क्रम में यह भी वही रघुवीर सहाय होते थे, लोहियावादी रघुवीर सहाय।

सहाय जी के जमाने में दिनमान में एक तो समाचार कम विचार ही ज़्यादा होते थे। तिस पर भी ज़्यादातर वैचारिक टिप्पणियां भी बिना किसी नाम के होती थीं। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना चरचे चरखे लिगते थे और श्यामलाल शर्मा पत्रकार संसद और नियमित, लेकिन तब नाम नहीं जाता था इन का। (बाद में जाने लगा स.द.स.) यह हाल बाकी स्तंभकारों, लेखकों और रिपोर्टरों का भी था। किंचित इक्का-दुक्का ही नाम जाता था किसी का सहाय जी के दिनमान में। परंपरा भी यही थी। बाद के दिनों में टाइम्स के प्रबंधकों से भी उन की खटक गई थी। बनवारी जिन को सहाय जी 10 इंक्रीमेंट दे कर ले आए थे, पहले ही समझ गए थे कि अब सहाय जी ज़्यादा दिन दिनमान में बने रहने वाले नहीं। सो वह सहाय जी से पहले ही दिनमान छोड़ सड़क पर चले गए। बाद के दिनों में बनवारी गांधी शांति प्रतिष्ठान होते हुए जनसत्ता चले गए। पर सहाय जी के जीवन में बाजा फिर बेताल हो गया था।

वह दिनमान के संपादक नहीं रहे, नवभारत टाइम्स के सहायक संपादक के अपने पुराने पद पर स्थानांतरित कर दिए गए थे। यह उन का स्थानांतरण नहीं, अपमान था। पर कहा न बाजा बेताल हो गया था। वह नौकरी से तुरंत इस्तीफा देना चाहते थे, पर ज़िम्मेदारियां विवश किए थीं, वह लंबी छुट्टी पर चले गए। बेटियों की शादी अभी नहीं हुई थी। प्रेस एंक्लेव वाले मकान की किश्तें। बेटा भी तब नौकरी में नहीं था। अजीब सी असंमजस में उन्हों ने छुट्टियां खत्म कर नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर लिया। एक भरी-पूरी पत्रिका निकालने वाला एक प्रतिष्ठित संपादक अब चार पृष्ठों वाला रविवारीय नवभारत टाइम्स निकालने पर विवश था, फिर भी वह अपना प्रिय काम कविताओं का अनुवाद और पुस्तक समीक्षा लिखते रहे थे। फिर खबर आई कि वह स्टेट्समैन समूह से निकलने वाले हिंदी दैनिक ‘नागरिक’ के संपादक तय हो रहे हैं। फिर सुना कि वह लखनऊ से निकलने जा रहे नवभारत टाइम्स की कमान संभालेंगे। पर अंतत: हुआ यह कि वह नवभारत टाइम्स से इस्तीफा दे कर फ्रीलांसर हो गए। सहाय जी इस षडयंत्र के कोई अकले शिकार नहीं थे। इस बनियातंत्र ने पहले भी कई को तार-तार किया था। इस तंत्र को देखते हुए ही सर्वेश्वर दयाल सक्सेना को सहायक संपादक बना कर जब पराग की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, तो उन्हों ने प्रिंट लाइन पर बतौर संपादक अपना नाम देने से इंकार कर दिया। बाद में उन का नाम बतौर संपादन गया, संपादक नहीं। सहाय जी के बाद दिनमान का भार संभालने वाले नंदन जी के साथ भी बनियातंत्र ने फिर वही सुलूक दुहराया, जो सहाय जी के साथ किया था। सहाय जी तो खाली दिनमान के संपादक थे, पर नंदन जी तो एक समय, एक साथ दिनमान, सारिका, पराग तीनों के संपादक रहे थे, बल्कि 10, दरियागंज के वह संपादक कहे जाते थे। वह भी बाद में नवभारत टाइम्स में फीचर संपादक बना कर रविवारीय परिशिष्ट में डाल दिए गए। नंदन जी तो फिर संडे मेल के प्रधान संपादक हुए, पर सहाय जी ने फिर कोई नौकरी नहीं की, तो नहीं की। बीच में भारत भवन खातिर किसी पीठ पर अशोक बाजपेयी ने उन्हें बुलाया तो भी वह नहीं गए। कभी-कभार वह दिल्ली की सिटी बसों में धक्के खाते रहे, पर किसी पूंजीवादी या सरकारी प्रतिष्ठान की नौकरी में नहीं गए। लेकिन नौकरी की आकुलता वह समझते थे।

मुझे एक घटना याद आती है। अचानक दिल का दौरा पड़ने से सर्वेश्वर जी का निधन हो गया था। दिल्ली से निगम बोध घाट के शवदाह गृह पर सभी शोक में थे। हरिवंश राय बच्चन भी तेजी बच्चन के साथ उपस्थित थे। सर्वेश्वर जी बरसों सहाय जी के साथ काम कर चुके थे। सहाय जी में सर्वेश्वर जी के साथ का ताप पूरे घनत्व में उपस्थित था। वह बेचैन थे कि बच्चन जी से कुछ काम की बात हो जाए और इस के लिए वह कई लोगों को तैयार कर रहे थे। काम की बात यह थी कि बच्चन जी अपने प्रभाव से सर्वेश्वर जी की जगह उन की बड़ी बिटिया को टाइम्स संस्थान में तुरंत नौकरी दिलवा दें। बच्चन जी से कहा गया तो उन्हों ने हामी भर ली और सहाय जी निश्चिंत हो गए थे। नौकरी की आकुलता वह समझते थे, उस की ज़रूरत को तीव्रता से महसूस करते थे। अज्ञेय जी ने दिनमान का जो रूप रचा था, सहाय जी ने उसे और निखारा था। पर वह उसे बाज़ार में टिकाए रखने की गरज से बाजारू नहीं बना सके, बनाना ही नहीं चाहते थे वह उसे बाज़ारू। और दिनमान का बाजा बज गया। जैसे वह दिनमान का कलेवर बाज़ारू नहीं बना पाए। खुद भी बाजार लायक नहीं बन पाए। ‘व्यवहारिक’ होने के बावजूद वह सिद्धांत की लक्ष्मण रेखा को भी जीवन भर ढोते नहीं, जीते रहे। यह वही जी सकते थे। शायद तभी जिस दूरदर्शन पर उन की बिटिया मंजरी जोशी समाचार पढ़ती रही हैं, वहीं उन के निधन की खबर नदारद थी और तो और शहर लखनऊ में उन के ‘चले’ जाने के बाद परदेस बन गया। उस लखनऊ में जिसमें कृष्ण नारायाण कक्कड़ के नेतृत्व में रघुवीर सहाय ने गलियां छानीं, जीना और लिखना सीखा, उसी शहर के लोग उन्हें सही-सलामत अंजुरी भर फूल देने की तमीज भूल गए।

[३० दिसंबर, १९९० को रघुवीर सहाय के निधन पर ३१ दिसंबर, १९९० स्वतंत्र भारत में छपी श्रद्धांजलि]

Tuesday, 30 October 2012

शेखर जोशी और श्रीलाल शुक्ल सम्मान की त्रासदी

गालिब के बाबत बहुत सारे किस्से सुनने और पढ़ने को मिलते हैं। कुछ खट्टे, कुछ मीठे। पर एक किस्सा अभी याद आ रहा है। उन दिनों वह बेरोजगार थे। काम की तलाश थी। किसी जुगाड़ से कि किसी की सिफ़ारिश से उन्हें दिल्ली में ही फ़ारसी पढ़ाने का काम मिल गया। पहुंचे वह पढा़ने के लिए। बाकायदा पालकी में सवार हो कर। स्कूल पहुंच कर वह बड़ी देर तक पालकी में बैठे रहे। यह सोच कर कि जो भी कोई स्कूल का कर्ता-धर्ता होगा आ कर उन का स्वागत करेगा। स्वागत के साथ उन्हें स्कूल परिसर में ले जाएगा। वगैरह-वगैरह। पर जब कोई नहीं आया बड़ी देर तक तो किसी ने उन से आ कर पूछा कि आप पालकी में कब तक बैठे रहेंगे? पालकी से उतर कर स्कूल के भीतर क्यों नहीं जा रहे? तो वह बोले कि भाई कोई लेने तो आए मुझे? कोई खैर-मकदम को तो आए ! तो उन्हें बताया गया कि यह तो मुश्किल है। क्यों कि यहां का प्रिंसिपल अंगरेज है। वह आएगा नहीं। उलटे आप को जा कर उस को सलाम बजाना पड़ेगा। तो गालिब मुस्कुराए। पालकी वाले से बोले कि चलो भाई मुझे यहां से वापस ले चलो। मैं तो समझा था कि नौकरी करने से सम्मान और रुतबा बढेगा। पर यहां तो उलटा है। जिस काम में सम्मान नहीं, अपमान मिलता हो, वह मुझे नहीं करना। और गालिब वहां से चले गए। सोचिए कि यह सब तब है जब गालिब पर शराबी, औरतबाज़, जुआरी , अंगरेजों के पिट्ठू आदि होने के भी आरोप खूब लगे हैं। तब भी वह अपमान और सम्मान का मतलब देखने की हिमाकत तो करते ही थे।
पर अब?

लखनऊ के संत गाडगे सभागार में  शेखर जोशी को
श्रीलाल शुक्ल स्मृति सम्मान, २०१२ देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार के
लोक निर्माण मंत्री शिवपाल सिंह यादव। साथ में हैं
लखनऊ के मेयर डॉ दिनेश शर्मा , और उदयशंकर अवस्थी
अब हालात बहुत बदल गए हैं। अब तो लोग सम्मान का जुगाड़ करते हैं, सम्मान खरीदते हैं, लाबीइंग करते हैं। आदि-आदि, करते हैं। वगैरह-वगैरह करते हैं। राजनीतिक, उद्योगपति, फ़िल्म आदि के लोग तो यह सब अब खुल्लमा-खुल्ला करने लगे हैं। हमारे साहित्यकार आदि भी इसी चूहा दौड़ में खुल्लम-खुल्ला दौड़ लगाने लगे हैं। प्रायोजित-नियोजित आदि सब कुछ करने लगे हैं। कुछ लोग तो अब यह सब नहीं हो पाने पर खुद ही पुरस्कार आदि भी शुरु कर लेते हैं और ले भी लेते हैं। खुद ही संस्था गठित कर लेंगे। या पत्रिका निकाल लेंगे। या मित्रवत कह कर यह सब प्रायोजित करवा लेंगे। बाकायदा खर्चा-वर्चा दे कर। तो तकलीफ़ तो होती ही है। पर यह सब तो अलग बात है। अब सब लोग जानते ही हैं कि कौन क्या कर रहा है या क्यों कर रहा है। क्या नया, क्या पुराना, क्या युवा, क्या बुजुर्ग हर कोई इस अंधी दौड़ में बेतहाशा हांफ़ रहा है। इस लिए भी कि लोगों को लगता है कि इस के बिना उन्हें कुछ मिलने वाला नहीं है। आप के पास पाठक हैं कि नहीं, रचना है कि नहीं इस की कोई परवाह नहीं है। हां, पुरस्कार और सम्मान बहुत ज़रुरी है। जैसे कोई स्त्री चाहे जितनी पढ़ी-लिखी हो, कितनी भी आधुनिक और अमीर मनाती हो पर उस की एक पुत्र पाने की लिप्सा भी उतनी ही प्रबल होती है जितनी किसी अनपढ़, गंवार और गरीब स्त्री की होती है। यह सन कांपलेक्स उसे खा डालता है। जो पैसे वाली नहीं है और कि ईश्वर से डरती है तो वह लिंग परीक्षण से भी डरती है और बेटी पर बेटी पैदा करती जाती है। पढी़ लिखी है, पैसे वाली है तो लिंग परीक्षण करवा-करवा कर अबार्शन पर अबार्शन करवाती जाती है। पर चाहिए उसे हर हाल में बेटा ही। लगभग यही हाल हमारी लेखक बिरादरी का भी हो गया है। कि उसे बेटा मतलब पुरस्कार चाहिए ही चाहिए। भले किसी की पिछाडी़ के आगे-पीछे, होना, धोना, सोना या रोना पड़े। जैसे कार्पोरेट सेक्टर की नौकरी में लोग आत्मा गिरवी रख कर हर कीमत पर प्रमोशन और इनक्रीमेंट पा लेना चाहते हैं। उन के लिए नैतिक-अनैतिक कुछ नहीं होता। वैसे ही अपनी लेखक बिरादरी में सिद्धांत स्तर पर तो नैतिक-अनैतिक तो मौखिक भाव में रहता है। पर वहीं तक जहां तक इन सब कामों में कोई बाधा नहीं पड़ती हो। ज़रा सी भी कोई बाधा आते ही यह सब मौखिक भी नहीं रह जाता। सब कुछ विसर्जित हो जाता है। मल-मूत्र की तरह। यह बडी़ दुविधा है। तब और जब लेखक नाम का प्राणी हर दूसरे को नैतिक-अनैतिक के खाने में तौलता ही रहता है। दिक्कत यहीं से शुरु होती है और बतर्ज़ धूमिल जिस की पूंछ उठाया, मादा ही पाया की स्थिति आ जाती है। यहां मादा से लैंगिक भेद या कुछ और का आशय हर्गिज़ नहीं है। इस लिए भी कि अब तो महिलाएं भी वह सारे दंद-फ़ंद करने लगी हैं, बल्कि कहीं ज़्यादा। और कि किसी हद तक महिलाएं सफल भी बहुत हैं। अपनी पूरी तुनक मिजाजी और अहंकार में तर होने के बावजूद। पुरुष उन के आगे कई बार हारने से भी लगे हैं। उन की स्त्री शक्ति कहिए या यौन शक्ति कहिए उन के बहुत काम आने लगी है। और कि खुल कर। इस शक्ति के आगे बड़े-बड़े पानी भरने लगे हैं। बहरहाल अभी यहां मुझे इस विषय पर बहुत बात नहीं करनी है, इस विषय पर फिर कभी विस्तार से बात होगी।

अभी तो यहां बात करनी है कि सम्मान कार्यक्रमों में क्या आयोजकों द्वारा लेखक का अपमान करना ज़रुरी है? और कि क्या सम्मानित होने वाले लेखक को भी इस का ध्यान नहीं रखना चाहिए? उसे ऐसे समारोहों में जाने से इंकार नहीं कर देना चाहिए। लेखकीय अस्मिता की इतनी तलब तो बनती ही है। ऐसा कुछ एक्का-दुक्का मौकों पर लेखकों ने किया भी है। खैर। बीते दिनों प्रसिद्ध कथाकार शेखर जोशी को लखनऊ में क्रमश: दो सम्मान दिए गए। और दोनों ही सम्मान कार्यक्रमों में मुझे लगा कि उन का अपमान ही हुआ। जाने उन्हें कैसा लगा। पर मेरे जैसे उन के प्रशंसकों को तो यह सब कुछ अपमानजनक ही लगा। हालां कि इस में शेखर जोशी बिचारे भला कर भी क्या सकते थे। पर सम्मान के बहाने उन्हें लगातार दो-दो बार अपमानित होते देख कर तकलीफ़ बहुत हुई। यह ठीक है कि इस अपमान से बचना बहुत उन के वश में नहीं था। पर वह इस का प्रतिकार तो कर ही सकते थे। बच भी सकते थे। उन के पास बचने के बहाने भी थे। पर उन का बड़प्पन, उन की विनम्रता और सरलता या और जो भी हो उन्हें अपमान की इस नदी में बहा ले गई। लखनऊ में ही बीते महीने उन्हें राही मासूम रज़ा सम्मान से सम्मानित किया गया। राही मासूम रज़ा अकादमी की तरफ से। शेखर जोशी इस सम्मान को लेने के लिए इलाहाबाद से चल कर आए थे। पर एक दिक्कत यह हुई कि उसी दिन उन की पत्नी बीमार हो गईं। बीमार पत्नी को छोड़ कर वह आयोजन में पहुंचे किसी तरह। नमिता सिंह अलीगढ़ से इस सम्मान समारोह में शरीक होने आईं। पर दिक्कत यह रही कि आयोजकों ने हिंदी और उर्दू के तमाम लोगों को बुलाया तो था पर शेखर जोशी की कहानियों या उन के व्यक्तित्व पर बोलने के लिए एक भी वक्ता तय नहीं किया था। नतीज़ा यह हुआ कि सम्मान तो शेखर जोशी का हो रहा था पर बात राही मासूम रज़ा की होती रही। लगभग सभी वक्ता राही मासूम रज़ा, उन के आधा गांव, महाभारत और उन के फ़िल्मी जीवन पर बोलते रहे। लखनऊ के आलोचक वीरेंद्र यादव को शेखर जोशी पर बोलने के लिए बुलाया गया। वह माइक संभालते ही बोले कि मुझ से तो बोलने के लिए पहले कहा ही नहीं गया था। खैर वह शेखर जोशी पर बोलना शुरु किए पर दो मिनट में ही वह राही मासूम रज़ा पर आ गए। और फिर वह राही मासूम रज़ा पर ही बोलते रह गए। उस के बाद जो भी वक्ता आते शेखर जोशी को बधाई देते और राही मासूम रज़ा पर शुरु हो जाते। शेखर जोशी यह सब देख कर ऊबे। शकील सिद्दीकी भी बैठे थे। कभी उन्हों ने शेखर जोशी की कहानियों पर कोई लेख लिखा था। तो जोशी जी को यह याद आया और उन्हों ने आयोजकों को सलाह दी कि शकील सिद्दीकी से भी भाषण करवा दिया जाए। जाहिर है यह गुपचुप सलाह थी। पर कार्यक्रम संचालक इतने बड़े फ़न्ने खां थे कि उन्हों ने बाकायदा घोषणा की कि शेखर जोशी की विशेष फ़र्माइश है कि उन की कहानियों पर शकील सिद्दीकी साहब बोलें। खैर शकील सिद्दीकी आए। पर वह भी दो मिनट शेखर जोशी पर औपचारिक ढंग से बोल कर राही मासूम रज़ा पर आ गए। उर्दू के साथी तो आते ही राही मासूम रज़ा पर निसार हो जाते रहे। शेखर जोशी ज़्यादातर को याद ही नहीं रहे। एक मोहतरमा तो जो लखनऊ विश्वविद्यालय में अरबी भाषा पढा़ती हैं, बाकायदा लिखित परचा लाई थीं राही मासूम रज़ा पर और बिस्मिल्ला-ए-रहीम कह कर अपनी बात भी शुरु की पर शेखर जोशी को बधाई देने की भी औपचारिकता भूल गईं। अच्छा ऐसा भी नहीं था कि आयोजक कोई नए लोग थे। तब भी वह लोग ऐसा कर गए। इस के पहले यह आयोजक लोग अपनी बिस्मिल्ला भी ऐसे ही कर चुके थे। इस एकेडमी ने पहले यह राही मासूम रज़ा एवार्ड उर्दू के मशहूर लेखक काज़ी अब्दुल सत्तार को दिया था। अब बताइए कि सत्तार साहब खुद एक मकबूल कथाकार हैं। न सिर्फ़ इतना उन्हों ने राही मासूम रज़ा को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढाया भी है। इस लिहाज़ से राही मासूम रज़ा सत्तार साहब के शिष्य हुए। पर शागिर्द के नाम का एवार्ड आयोजकों ने उस्ताद को दे दिया। और मज़ा यह कि वह आ कर ले भी गए। खैर इस पूरे आयोजन में राही मासूम रज़ा पर अच्छी चर्चा हुई। उन की कई रचनाओं का ज़िक्र लोगों ने बड़े मन से किया। उन की कई गज़लें तरन्नुम से पढ़ी गईं। नज़्में भी लोगों ने पढीं। उन के व्यक्तित्व पर भी चर्चा हुई। यह बात भी हुई कि आधा गांव तो उन्हों ने उर्दू में लिखा था पर उर्दू में वह छपा नहीं। क्यों कि उर्दू के कठमुल्लों को उस से खतरा था। पाकिस्तान बंटवारे की खिलाफ़त थी उस में। आदि-आदि। अच्छी बात हुई कुल मिला कर राही मासूम रज़ा पर। लेकिन चर्चा तो शेखर जोशी पर भी होनी चाहिए थी। जो कि नहीं हुई। यह अफ़सोसनाक था।

अफ़सोसनाक ही था श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह भी। बीते साल यह सम्मान विद्यासागर नौटियाल को दिया गया था शरद पवार के हाथ। यह नैटियाल जी का भी अपमान था। और श्रीलाल शुक्ल का भी। इस लिए भी कि नौटियाल जी जैसा एक ईमानदार और सरल आदमी राजनीति और समाज के महाभ्रष्ट आदमी के हाथ से कोई सम्मान स्वीकार करे। पर नौटियाल जी जिस व्यवस्था और तंत्र के खिलाफ़ जीवन कुर्बान किए बैठे थे, उसी व्यवस्था और तंत्र के प्रतिनिधि से वह श्रीलाल शुक्ल सम्मान लेने को अभिशप्त हुए। पांच साढे़-पांच लाख के इस सम्मान के आगे उन के सारे जीवन मूल्य और सिद्धांत तिरोहित हो गए। पर तब यह सब बातें भी तिरोहित हो गई थीं शरद पवार को पड़े थप्पड़ की गूंज में। ज़िक्र ज़रुरी है कि उन्हीं दिनों अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मुहिम नया-नया शुरु हुआ था। और उन के निशाने पर शरद पवार भी थे। एक सिख युवक ने इफ़्को द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम का लाभ लिया और शरद पवार को खींच कर थप्पड़ मार दिया। यह ऐसी घटना थी कि अन्ना जैसा आदमी भी पहली प्रतिक्रिया में लड़खड़ा गया और बोल पड़ा कि, बस एक ही थप्पड़ मारा? अन्ना की इस प्रतिक्रिया की भी खूब निंदा हुई थी तब। बाद में अन्ना ने अपने इस बयान पर पानी डाला इस बयान को संशोधित कर के और इस घटना की निंदा कर के। खैर बाद में नौटियाल जी भी दुनिया से विदा हो गए।

अब की इफ़्को द्वारा श्रीलाल शुक्ल सम्मान फिर उत्तराखंड में ही जन्मे शेखर जोशी को दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार के भ्रष्टतम मंत्री शिवपाल सिंह यादव के हाथ से। इस बार भी जोशी जी के साथ एक त्रासदी गुज़री, उन की पत्नी का इसी हफ़्ते निधन हो गया। तो भी वह सम्मान समारोह में आए। उन्हें सम्मानित करने के लिए आना तो था मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को। अखबारों में इफ़्को की तरफ़ से छपे विज्ञापन में इस की घोषणा भी थी, निमंत्रण पत्र में भी। लेकिन एक दिन पहले एक पांच सितारा होटल में इफ़्को द्वारा आयोजित डिनर में ही मुख्यमंत्री ने शिरकत कर के शेखर जोशी को शाल उढ़ा कर सम्मानित कर दिया। ऐसा बताया गया। व्यक्तिगत बातचीत में। आयोजन में सार्वजनिक रुप से ऐसा कुछ भी बताने की ज़रुरत नहीं समझी गई कि आखिर मुख्यमंत्री मुख्य कार्यक्रम में क्यों नहीं आए। जंगल में मोर नाचा किस ने देखा वाली बात हो गई। बाद में चर्चा हुई कि वह नोएडा में आयोजित किसी कार्यक्रम में चले गए। अब जाने क्या हुआ। पर यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए न हो कर इफ़्को के एक कार्यक्रम में तब्दील था जिस में इफ़्को-जन की ही भीड़ और औपचारिकता थी। खचाखच भरे हाल में लग रहा था जैसे यह सारा कार्यक्रम शेखर जोशी के लिए नहीं शिवपाल सिंह यादव के ईगो मसाज़और सम्मान के लिए आयोजित था। या फिर श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए। शेखर जोशी के लिए तो हरगिज़ नहीं। समूचे कार्यक्रम में इफ़्को के प्रबंध निदेशक उदयशंकर अवस्थी जिस तरह मंच पर सरे आम शिवपाल सिंह की मिजाजपुर्सी में लगे रहे, वह बहुत अश्लील था। वक्ता बोल रहे हैं और उन का मुंह शिवपाल के कान में। दोनों लोग इस तरह हंस बतिया रहे थे कि लग रहा था गोया यह लोग किसी कार्यक्रम में नहीं किसी रेस्टोरेंट में बैठे गपिया रहे हों। हंसी ठिठोली कर रहे हों। ज़िक्र ज़रुरी है कि उदयशंकर अवस्थी न सिर्फ़ इफ़्को के प्रबंध निदेशक हैं बल्कि श्रीलाल शुक्ल के दामाद भी हैं। और कि आलोचक देवीशंकर अवस्थी के अनुज भी। आलोचना के लिए एक देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार भी वह चलाते हैं। खैर, श्रीलाल जी एक बड़े लेखक ही नहीं एक सुसंस्कृत व्यक्ति भी थे। उन के दामाद ने उन की याद में भी सम्मान शुरु किया सरकारी पैसे से सही, यह अच्छी बात थी। पर क्या ही अच्छा होता कि उदयशंकर अवस्थी इस श्रीलाल शुक्ल सम्मान समारोह को शालीन और सुसंस्कृत भी बने रहने देते। साथ ही इसे कभी शरद पवार तो कभी शिवपाल सिंह यादव जैसे भ्रष्टजनों से दूर रखते और कि इसे इफ़्को का औपचारिक कार्यक्रम बनाने की बजाय एक लेखक का सम्मान समारोह ही बने रहने देते। जिस लेखक का सम्मान हो रहा हो उसी की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित व्याख्यान या फिर उसी लेखक की रचनाओं पर आधारित नाट्य कार्यक्रम आदि भी रखते तो उस लेखक का वह सचमुच सम्मान करते। इफ़्को के पैसे से श्रीलाल शुक्ल को याद करने के लिए वह और भी कई मौके ढूंढ सकते हैं। उन की जयंती पर, उन की पुण्यतिथि पर। और फिर श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखक को याद करने के और भी कई तौर-तरीके हो सकते हैं। वह बड़े लेखक हैं। उन को रोज याद कीजिए, कोई हर्ज़ नहीं है अवस्थी जी। पर इस तरह किसी लेखक को अपमानित कर सम्मानित करने का यह तरीका ठीक नहीं है। सम्मान सहित अपमानित करने का मुहावरा शायद ऐसे ही बना होगा। फ़िराक गोरखपुरी ने शायद ऐसे ही किसी मौके से गुज़र कर यह शेर लिखा होगा कि , 'जो कामयाब हैं दुनिया में, उन की क्या कहिए/ है इस से बढ कर भले आदमी की क्या तौहीन !' संयोग से उसी इलाहाबाद में शेखर जोशी भी रहते हैं जहां फ़िराक साहब रहते थे। तो इस बात की तासीर और चुभन वह भी समझते और भुगतते होंगे।
क्या पता?

इस समारोह में अश्लीलता और अपमान की तफ़सील इतनी भर ही नहीं थी। बताइए कि सम्मान समिति के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र यादव अस्वस्थ होने के बावजूद दिल्ली से आए थे और मंच पर उपस्थित थे। बावजूद इस के शेखर जोशी के सम्मान के समय आयोजकों में से किसी भी को इस की सुधि नहीं आई कि राजेंद्र यादव को भी इस में शरीक किया जाए। उन का नाम तो पुकारा गया पर अपनी अस्वस्थता के नाते वह खुद उठ कर आ नहीं सके और दूसरे किसी को फ़ुर्सत नहीं थी कि उन्हें पकड़ कर वहां तक ले आता। इस लिए भी कि सारा मंच और आयोजन तो शिवपालमय था। राजेंद्र यादव उपेक्षित से अकले मंच पर बैठे टुकुर-टुकुर ताकते रह गए और शिवपाल के भ्रष्ट हाथों से शेखर जोशी का सम्मान कहिए, अपमान कहिए हो गया। यह मंज़र देख कर देवेंद्र आर्य का एक शेर याद आ गया : 'गरियाता हूं जिन्हें उन्हीं के हाथों से/ पुरस्कार लेता हूं इस का क्या मतलब !'

सच मानिए कि यह अपमान सिर्फ़ शेखर जोशी का ही नहीं, श्रीलाल शुक्ल का भी अपमान है और समूची लेखक बिरादरी का भी। इस पर गौर किया जाना चाहिए।

उदयशंकर अवस्थी ने अपने भाषण में कहा कि इफ़्को की तरफ़ से यह श्रीलाल शुक्ल सम्मान हर साल हिंदी के किसी ऐसे लेखक को दिया जाएगा और कि दिया जा रहा है कि जो किसानों और गांव की समस्या पर कहानी लिखता हो। तो दिक्कत यह है कि इफ़्को की किसानों वाली जो भी बाध्यता या मजबूरी हो पर सच यह है कि न तो श्रीलाल शुक्ल किसानों के बारे में कोई कहानी-उपन्यास लिख गए हैं न ही विद्यासागर नौटियाल लिख गए हैं न ही शेखर जोशी ने किसानों पर कोई कहानी-उपन्यास लिखा है। यह तीनों ही शहरी मध्यवर्ग के कहानीकार हैं। हां, नौटियाल जी और शेखर जोशी ने मज़दूरों पर ज़रुर लिखा है। पर किसानों पर तो बिलकुल नहीं। यह भ्रम भी टूटना चाहिए। इतना ही नहीं निर्णायक मंडल में बैठे लोग भी किसानों या गांव पर लिखने वाले लोग नहीं थे। खैर निर्णायक मंडल के लिए यह बाध्यता होती भी नहीं। पर इस सम्मान समारोह का जो सुर था वह पूरी तरह अश्लीलल और गैर लेखकीय था। किसी लेखक को अपमानित करने वाला। बताइए कि सम्मान समारोह शेखर जोशी का था और सम्मानित शिवपाल सिंह यादव हो रहे थे। सारे बुके, स्मृति चिन्ह और शाल शिवपाल सिंह यादव के हवाले थी और सारी चर्चा श्रीलाल शुक्ल पर हो रही थी। क्या शेखर जोशी इतने बौने लेखक हैं? कि एक औपचारिक प्रशस्तिवाचन छोड़ कर उन के नाम पर कुछ और भी नहीं हो सकता था? गनीमत यही रही कि यह शिवपाल जो कभी मुलायम राज में नोएडा में घटित निठारी जैसे कांड के लिए कहते थे कि बडे़-बडे़ शहरों में छोटी-छोटी घटनाएं घटती रहती हैं तो अब अखिलेश राज में अफ़सरों से अभी कहा था कि मेहनत कर के चोरी करो। फिर इलाहाबाद में महाकुंभ की तैयारियों का जायजा लेने के बाद कहा कि कमीशन में कोई कमी नहीं होने दी जाएगी। ऐसी भ्रष्ट बयानबाज़ी और बेलगाम लंठई के ट्रैक पर वह इस समारोह में नहीं आए।

हां, लखनऊ में इंदिरा नगर की एक सड़क का नाम श्रीलाल शुक्ल के नाम पर करने की घोषणा ज़रुर की। इस के पहले राजेंद्र यादव ने अपने संबोधन में सम्मान राशि साढ़े पांच लाख रुपए को कम बताते हुए इसे साढे ग्यारह लाख रुपए करने की बात कही थी साथ ही यह इच्छा भी जताई कि काश हिंदी में भी कोई सम्मान राशि पचास लाख रुपए की हो जाए। तो शिवपाल ने भी सम्मान राशि को पुरस्कार राशि बताते हुए दोगुना करने की बात कही। लेकिन उदय शंकर अवस्थी इस पर चुप रहे। शिवपाल के भाषण के बाद उदघोषक ने अचानक कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी। फिर तुरंत ही कहा कि अभी श्रीलाल शुक्ल पर वीरेंद्र यादव अपना वक्तव्य देंगे। महफ़िल उखड़ चुकी थी। पूरा महौल अफ़रा-तफ़री में आ गया। शिवपाल गए, भीड़ भी चली गई। पर हाल जो खाली हुआ था फिर भर गया। यह दुबारा आए लोग नाट्य संस्था दर्पण के लोग थे। जो अपने नाटक को कभी दर्शकों की कमी नहीं महसूस होने देते। श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं पर तैयार एक नाट्य कोलाज दर्पण को तुरंत प्रस्तुत करना था। पर बोलने आए वीरेंद्र यादव। श्रीलाल शुक्ल पर। अफ़रा-तफ़री के बीच अभी वह बोल ही रहे थे कि कार्यक्रम संचालक की पर्ची आ गई। नाट्य दल के लोग भी उतावले दिख रहे थे। वीरेंद्र यादव पांच -सात मिनट ही बोले होंगे कि संचालक उन के बगल में खड़े हो गए। वक्तव्य समाप्त हो गया। कोलाज शुरु हुआ। उर्मिल थपलियाल के निर्देशन में। जैसे भारी भीड़ के बावजूद कार्यक्रम बिखरा-बिखरा था, यह कोलाज भी वैसे ही बिखरा-बिखरा था। जल्दबाज़ी में तैयार किया हुआ। दो या तीन दृष्य छोड़ कर सब बेजान। लफ़्फ़ाज़ी से ओत-प्रोत।

जल्दी ही कोलाज खत्म हो गया। बाहर बने पांडाल में नाश्ते के लिए भगदड़ थी। गोया किसी राजनीतिक पार्टी के दफ़्तर में रोजा अफ़्तार की भगदड़। लेखक लोग असहाय और भौंचक इधर-उधर। यह इफ़्को की जनता थी। यह एक नया कोलाज था। एक लेखक की अपमान कथा पूरी हो चुकी थी।

सम्मान राशि चाहे जो हो पर सम्मान तो कम से कम हो ही, लेखक का अपमान कम से कम फिर से न हो, आगे से उदय शंकर अवस्थी और इफ़्को इस बात का खयाल रखें तो क्या ही अच्छा हो। श्रीलाल शुक्ल का दामाद और देवीशंकर अवस्थी का अनुज होने के बावजूद जो लेखकीय सम्मान और लेखकीय गरिमा से उन का फिर भी परिचय न हो तो इसी लखनऊ में ही हर साल संपन्न होने वाले कथाक्रम समारोह या लमही समारोह को आ कर देख लें, जायजा और जायका ले लें। सब कुछ समझ में आ जाएगा। कथाक्रम की ओर से बीते पंद्रह बरस से आनंद सागर स्मृति कथाक्रम सम्मान समारोह प्रति वर्ष आयोजित होता है। अब की साल ३ और ४ नवंबर, २०१२ को सोलहवां समारोह प्रस्तावित है। इस समारोह में देश के विभिन्न हिस्सों से आए लेखक शिरकत करते हैं। दो दिन का जमावड़ा होता है। जिस लेखक को सम्मानित किया जाता है, उस की रचना और व्यक्तित्व पर केंद्रित पूरा एक सत्र होता है। कोई बुजुर्ग लेखक ही सम्मानित करता है। और वो जो कहते हैं न कि न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे की तर्ज़ पर जो कहें कि इस समारोह में लेखक का सम्मान होता है और होता हुआ दिखाई भी देता है। बाकी दो या तीन सत्र में किसी एक विषय पर बहस-मुबाहिसा होता है। जैसा कि लाजिम है आपसी राजनीति, उखाड़-पछाड़ आदि भी इस समारोह का अनिवार्य हिस्सा होती ही है। इस आयोजन के संयोजक शैलेंद्र सागर भी यह सम्मान समारोह अपने पिता आनंद सागर की स्मृति में ही देते हैं। तो इस गरिमामय आयोजन से आनंद सागर की बिना कोई चरण-वंदना के आनंद सागर का भी सम्मान स्वयमेव होता ही है, सम्मानित होने वाले लेखक का भी सम्मान होता है, शैलेंद्र सागर और उपस्थित लेखकों का भी सम्मान होता है। यह सम्मान लाखों रुपए के बजाय कुछ हज़ार रुपए का ही भले होता है पर इस का पूरे देश में सम्मान होता है। प्रतिष्ठा मिलती है।

यही हाल, दो साल से शुरु हुए लमही सम्मान का भी है। स्पष्ट है कि यह प्रेमचंद की स्मृति में होता है, बिना प्रेमचंद की चरण-वंदना किए। लमही के संपादक विजय राय भी प्रेमचंद के परिवार के हैं। इन दोनों मौकों पर इन समारोहों के संयोजक-संपादक शैलेंद्र सागर और विजय राय की विनम्रता और सरलता भी देखते बनती है। सम्मान राशि प्रतीकात्मक होने के बावजूद लेखकीय गरिमा और उस की अस्मिता की तलब जगाते इस सम्मान समारोह में सचमुच लेखक का सम्मान होता है, उस की रचनाधर्मिता का सम्मान होता है। कुछ राजनीति-वाजनीति के बावजूद। उदय शंकर अवस्थी को इन या ऐसे और आयोजनों से सीख लेनी चाहिए। नहीं इस तरह तो वह सम्मानित होने वाले लेखक को तो हर साल अपमानित करेंगे ही, श्रीलाल शुक्ल के नाम की गरिमा को भी डुबो देंगे। वह अपने इर्द-गिर्द घूमने वाले चाटुकार लेखकों से भी बचें, तभी यह कर भी पाएंगे। अब इस प्रसंग का अंत भी गालिब से ही करने को मन हो रहा है। यह किस्सा अभी कुछ समय पहले कथादेश में विश्वनाथ त्रिपाठी ने भी दर्ज किया था। अब्दुल हलीम शरर जिन्हों ने गालिब की जीवनी लिखी है, उन्हीं के हवाले से। क्या था कि गालिब के निंदक उन के समय में भी खूब थे। कई बार उन के निंदक उन्हें गालियों से भी नवाज़ते थे। चिट्ठियां लिख-लिख कर गरियाते थे। एक दिन शरर गालिब के साथ बैठे थे कि तभी एक चिट्ठी आ गई। चिट्ठी देख कर गालिब उदास हो गए। बोले कि फिर किसी ने गाली लिख भेजी होगी। चिट्ठी खोली पढी़ और बताया शरर को कि इस को तो गाली भी देने नहीं आती। अब बताइए कि मुझे बहन की गाली दे रहा है। इतना भी नहीं जानता कि बूढे़ आदमी को बेटी की गाली दी जाती है। बहन की गाली तो नौजवान को दी जाती है। और बच्चे को मां की गाली। तो बताइए कि अपने उस्ताद लोग तो गाली भी सही ढंग से कबूल करते थे और कि उस की तफ़सील बता गाली देने का सलीका भी बताते थे। फिर इफ़्को और उदय शंकर अवस्थी को जानना चाहिए कि वह तो गाली नहीं सम्मान दे रहे हैं और इस तरह अपमानित कर के? इस से तो श्रीलाल शुक्ल की आत्मा भी कलप जाएगी !

Saturday, 27 October 2012

लखनऊ के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलाने और गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते योगेश प्रवीन



लखनऊ के हुस्न का हाल जानना हो तो योगेश प्रवीन से मिलिए। जैसे रामकथा बहुतों ने लिखी है, वैसे ही लखनऊ और अवध का इतिहास भी बहुतों ने लिखा है। पर अगर रामकथा के लिए लोग तुलसीदास को जानते हैं तो लखनऊ की कथा के लिए हम योगेश प्रवीन को जानते हैं। अब यही योगेश प्रवीन अब की अट्ठाइस अक्टूबर को पचहत्तर वर्ष के हो रहे हैं तो उन की कथा भी बांचने का मन हो रहा है। कभी नवाब वाज़िद अली शाह ने कुल्लियाते अख्तर में लिखा था :

लखनऊ हम पर फ़िदा है हम फ़िदा-ए-लखनऊ
आसमां की क्या हकीकत जो छुड़ाए लखनऊ।


तो योगेश प्रवीन भी इस लखनऊ पर इस कदर फ़िदा और जांनिसार हैं कि लोग-बाग अब उन्हें लखनऊ का चलता फिरता इनसाइक्लोपीडिया कहते हैं। आप को लखनऊ के गली-कूचों के बारे में जानना हो या लखनऊ की शायरी या लखनऊ के नवाबों या बेगमातों का हाल जानना हो, ऐतिहासिक इमारतों, लडा़इयों या कि कुछ और भी जानना हो योगेश प्रवीन आप को तुरंत बताएंगे। और पूरी विनम्रता से बताएंगे। पूरी तफ़सील से और पूरी मासूमियत से। ऐसी विलक्षण जानकारी और ऐसी सादगी योगेश प्रवीन को प्रकृति ने दी है जो उन्हें बहुत बड़ा बनाती है। लखनऊ और अवध की धरोहरों को बताते और लिखते हुए वह अब खुद भी एक धरोहर बन चले हैं। उन का उठना-बैठना, चलना-फिरना जैसे सब कुछ लखनऊ ही के लिए होता है। लखनऊ उन को जीता है और वह लखनऊ को। लखनऊ और अवध पर लिखी उन की दर्जनों किताबें अब दुनिया भर में लखनऊ को जानने का सबब बन चुकी हैं। इस के लिए जाने कितने सम्मान भी उन्हें मिल चुके हैं।

लखनऊवा नफ़ासत उन के मिजाज और लेखन दोनों ही में छलकती मिलती है। उन्हें मिले दर्जनों प्रतिष्ठित सम्मान भी उन्हें अहंकार के तराजू पर नहीं बिठा पाए। वह उसी मासूमियत और उसी सादगी से सब से मिलते हैं। उन से मिलिए तो लखनऊ जैसे उन में बोलता हुआ मिलता है। गोया वह कह रहे हों कि मैं लखनऊ हूं ! लखनऊ पर शोध करते-करते उन का काम इतना बडा़ हो गया कि लोग अब उन पर भी शोध करने लगे हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय की हेमांशु सेन का योगेश प्रवीन पर शोध यहां कबिले ज़िक्र है। लखनऊ को ले कर योगेश प्रवीन के शोध तो महत्वपूर्ण हैं ही, लखनऊ के मद्देनज़र उन्हों ने कविता, नाटक आदि भी खूब लिखे हैं। लखनऊ से यह उन की मुहब्बत ही है कि वह लिखते हैं :

लखनऊ है तो महज़, गुंबदो मीनार नहीं
सिर्फ़ एक शहर नहीं, कूच और बाज़ार नहीं
इस के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इस की गलियों में फ़रिश्तों के पते मिलते हैं

जैसे इटली के रोम शहर के बारे में कहा जाता है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ वैसे ही लखनऊ का निर्माण भी कोई एक-दो दिन में नहीं हुआ। किसी भी शहर का नहीं होता। तमाम लोगों की तरह योगेश प्रवीन भी मानते हैं कि राजा राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने इस नगर को बसाया। इस नगर को लक्ष्मणपुरी से लक्ष्मणावती और लखनावती होते हुए लखनऊ बनने में काफी समय लगा। प्रागैतिहासिक काल के बाद यह क्षेत्र मौर्य,शुंग, कुषाण, गुप्त वंशों और फिर कन्नौज नरेश हर्ष के बाद गुर्जर प्रतिहारों, गहरवालों, भारशिवों तथा रजपसियों के अधीन रहा है। वह मानते हैं कि इन सभी युगों की सामग्री जनपद में अनेक स्थानों से प्राप्त हुई है। लक्ष्मण टीले, गोमती नगर के पास रामआसरे पुरवा, मोहनलालगंज के निकट हुलासखेडा़ एवं कल्ली पश्चिम से प्राप्त अवशेषों ने लखनऊ के इतिहास को ईसा पूर्व लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व तक पीछे बढा़ दिया है। ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच यहां मुसलमानों का आगमन हुआ। इस प्रकार यहां के पूर्व निवासी भर, पासी, कायस्थ तथा ब्राह्मणों के साथ मुसलमानों की भी आबादी हो गई।

योगेश प्रवीन ने न सिर्फ़ लखनऊ के बसने का सिलसिलेवार इतिहास लिखा है बल्कि लखनऊ के सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व का भी खूब बखान किया है। कई-कई किताबों में। दास्ताने अवध, ताजेदार अवध, गुलिस्ताने अवध, लखनऊ मान्युमेंट्स, लक्ष्मणपुर की आत्मकथा, हिस्ट्री आफ़ लखनऊ कैंट, पत्थर के स्वप्न,अंक विलास आदि किताबों में उन्हों ने अलग-अलग विषय बना कर अवध के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। जब कि लखनऊनामा, दास्ताने लखनऊ, लखनऊ के मोहल्ले और उन की शान जैसी किताबों में लखनऊ शहर के बारे में विस्तार से बताया है। एक से एक बारीक जानकारियां। जैसे कि आज की पाश कालोनी महानगर या चांदगंज किसी समय मवेशीखाने थे। आज का मेडिकल कालेज कभी मच्छी भवन किला था। कि फ़्रांसीसियों ने कभी यहां घोड़ों और नील का व्यापार भी किया था। कुकरैल नाले के नामकरण से संबंधित जनश्रुति में वफ़ादार कुतिया को दंडित करने और कुतिया के कुएं में कूदने से उत्पन्न सोते का वर्णन करते हुए दास्ताने लखनऊ में योगेश प्रवीन लिखते हैं, ' जिस कुएं में कुतिया ने छलांग लगाई उस कुएं से ही एक स्रोत ऐसा फूट निकला जो दक्षिण की तरफ एक छोटी सी नदी की सूरत में बह चला। इस नदी को कुक्कर+ आलय का नाम दिया गया जो मुख सुख के कारण कुक्करालय हो गया फिर प्रयत्न लाघव में कुकरैल कहा जाने लगा।'

वह कैसे तो गुलिस्ताने अवध में बारादरी की आत्मकथा के बहाने लखनऊ का इतिहास लिखते हैं, ' फिर इस मिट्टी से एक तूफ़ान उठा जिस ने नई नवेली विदेशी सत्ता की एक बार जड़ें हिला दीं। इस तूफ़ान का नाम गदर था। बेगम हज़रतमहल ने जी-जान से सन सत्तावन की इस आग को भड़काया था। मैं ने हंस के शमाएं वतन के परवानों को इस आग में जलते देखा है। राजा जिया लाल सिंह को फांसी पर चढ़ते देखा है और मौलवी अहमदुल्ला उर्फ़ नक्कारा शाह की जांबाज़ी के नमूने देखे हैं, मगर मुद्दतों से मराज और मोहताज़ हिंदुस्तानी एक अरसे के लिए गोरों की गिरफ़्त में आ गए।

'कैसरबाग लूट लिया गया। करोड़ों की संपदा कौड़ी के मोल बिक रही थी। जिन के पांवों की मेंहदी देखने को दुनिया तरसती थी, वह बेगमात अवध नंगे सिर बिन चादर के महल से निकल रही थीं। जो नवाबज़ादे घोड़ी पर चढ़ कर हवाखोरी करते थे वे फ़िटन हांकने लगे थे।'

लक्ष्मणपुर की आत्मकथा में अवध शैली की उत्त्पत्ति के बारे में वह लिखते हैं, ' लखनऊ के स्वाभाविक आचरण के अनुरुप यहां राजपूत तथा मुगल वास्तु-कला शैली के मिले-जुले स्थापत्य वाले भवन बड़ी संख्या में मिलते हैं। भवन निर्माण कला के उसी इंडोसिरेनिक स्टाइल में कुछ कमनीय प्रयोगों द्वारा अवध वास्तुकला का उदय हुआ था।' वह लिखते हैं कि, 'लखौरी ईंटों और चूने की इमारतें जो इंडोसिरेनिक अदा में मुसकरा रही हैं, यहां की सिग्नेचर बिल्डिंग बनी हुई हैं।' वह आगे बताते हैं, ' इन मध्यकालीन इमारतों में गुप्तकालीन हिंदू सभ्यता के नगीने जड़े मिलेंगे। दिल्ली में गुलाम वंश की स्थापना काल से मुगलों की दिल्ली उजड़ने तक शेखों का लखनऊ रहा। इन छ: सदियों में सरज़मींने अवध में आफ़तों की वो आंधियां आईं कि हज़ारों बरस पहले वाली सभ्यता पर झाड़ू फिर गई। नतीज़ा यह हुआ कि वो चकनाचूर हिंदू सभ्यता या तो तत्कालीन मुस्लिम इमारतों में तकसीम हो गई या फिर लक्ष्मण टीला, किला मौहम्मदी नगर और दादूपुर की टेकरी में समाधिस्थ हो कर रह गई और यही कारण है कि लखनऊ तथा उस के आस-पास मंदिरों में खंडित मूर्तियों के ढेर लगे हैं।'

यह और ऐसी बेशुमार जानकारियां योगेश प्रवीन की किताबों में समाई मिलती हैं। तो बहारे अवध में लखनऊ के उत्तर-मध्य काल की तहज़ीब, रीति-रिवाज़, जीवन शैली, हिंदू और मुस्लिम-संस्कृति के इतिहास और उस के प्रभाव के बारे में उन्हों ने बड़ी तफ़सील से लिखा है। लखनऊ की शायरी जहान की ज़ुबान पर भी उन की एक बेहतरीन किताब है। लखनऊ से जुड़े तमाम शायरों मीर, हसरत मोहानी से लगायत मजाज, नूर, वाली आसी, मुनव्वर राना और तमाम शायराओं तक की तफ़सील से चर्चा है। और उन की शायरी की खुशबू भी। योगेश प्रवीन की ताजदारे अवध के बारे में अमृतलाल नागर ने लिखा था कि यह सत्यासत्य की दुर्गम पहाड़ियों के बीच कठिन शोध का परिणाम है। ज़िक्र ज़रुरी है कि अमृतलाल नागर की रचनाभूमि भी घूम-फिर कर लखनऊ ही रही है। गुलिस्ताने अवध की चर्चा करते हुए शिवानी ने लिखा है, ' गुलिस्ताने अवध में वहां के नवाबों की चाल-चलन, उन की सनक, उन का विलास-प्रिय स्वभाव, सुंदरी बेगमें, कुटिल राजनीति की असिधार में चमकती वारांगनाएं, अनिवार्य ख्वाजासरा, नवीन धनी इन सब के विषय में योगेश ने परिश्रम से लिखा है।' डूबता अवध के बारे में नैय्यर मसूद ने लिखा है कि किताब का नाम तो डूबता अवध है लेकिन हकीकत यह है कि इस किताब में हम को पुराना अवध फिर एक बार उभरता दिखाई देता है।

यह अनायास नहीं है कि जब कोई फ़िल्मकार फ़िल्म बनाने लखनऊ आता है तो वह पहले योगेश प्रवीन को ढूंढता है फिर शूटिंग शुरु करता है। वह चाहे शतरंज के खिलाड़ी बनाने आए सत्यजीत रे हों या जुनून बनाने आए श्याम बेनेगल हों या फिर उमराव जान बनाने वाले मुजफ़्फ़र अली या और तमाम फ़िल्मकार। योगेश प्रवीन की सलाह के बिना किसी का काम चलता नहीं। ज़िक्र ज़रुरी है कि आशा भोसले, अनूप जलोटा, उदित नारायण, अग्निहोत्री बंधु समेत तमाम गायकों ने योगेश प्रवीन के लिखे भजन, गीत और गज़ल गाए हैं।

वैसे तो पेशे से शिक्षक रहे योगेश प्रवीन ने कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता आदि तमाम विधाओं में बहुत कुछ लिखा है। पर जैसे पूरी गज़ल में कोई एक शेर गज़ल का हासिल शेर होता है और कि वही जाना जाता है। ठीक वैसे ही योगेश प्रवीन का कुल हासिल लखनऊ ही है। वह लिखने-बोलने और बताने के लिए लखनऊ ही के लिए जैसे पैदा हुए हैं। लखनऊ, लखनऊ और बस लखनऊ ही उन की पहचान है। उन से मैं ने एक बार पूछा कि आखिर अवध और लखनऊ के बारे में लिखने के लिए उन्हें सूझा कैसे? कि वह इसी के हो कर रह गए? तो वह जैसे फिर से लखनऊ में डूब से गए। कहने लगे कि छोटी सी छोटी चीज़ को भी बड़े औकात का दर्जा देना लखनऊ का मिजाज है, इस लिए। यहां लखौरियों से महल बन जाता है। कच्चे सूत का कमाल है, चिकन ! है किसी शहर में यह लियाकत? वह कहने लगे जादू सरसो पे पढ़े जाते हैं, तरबूज पर नहीं। आप दुनिया के किसी शहर में चले जाइए, कुछ दिन रह जाइए या ज़िंदगी बिता दीजिए पर वहां के हो नहीं पाएंगे। पर लखनऊ में आ कर कुछ समय ही रह लीजिए आप यहां के हो कर रह जाएंगे। आप लखनाऊवा हो जाएंगे। वह बताने लगे कि एक बार अपनी जवानी के दिनों में वह एक रिश्तेदारी में हैदराबाद गए। वहां एक प्रदर्शनी देखने गए। प्रदर्शनी में लखनऊ की बहुत गंदी तसवीर दिखाई गई थी। एक पिंजरे में बटेर, पतंग, मुजरा, हिजडा़, मुर्गा, झाड़-फ़ानूश आदि यहां की विलासिता। लखनऊ के सामाजिक इतिहास का कोई ज़िक्र नहीं, सिर्फ़ अपमान। तो मुझे बहुत तकलीफ़ हुई। फिर जब मुझे पढ़ने-लिखने का होश हुआ और मैं ने समाज में आंख खोली तो मैं ने देखा कि अवध कल्चर और लखनऊ का नाम लेते ही लोगों के सामने एक पतनशील संस्कृति, एक ज़नाने कल्चर और नाच-गाने का स्कूल, जहां रास-विलास का बडा़ प्रभाव है, यही तसवीर बन कर सामने आ जाता है। वह बताते हैं कि मुझे बहुत दुख हुआ और लगा कि हमारे समाज को राजघराने का इतिहास ही नहीं, आम आवाम का इतिहास भी जानना चाहिए। जो कि कहीं कायदे से नहीं लिखा गया। अब देखिए कि १८५७ की जंगे-आज़ादी में लखनऊ की जो भूमिका रही है वो किसी की नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी के ४ दुर्दांत सेना नायकों में से सिर्फ़ एक कालिन कैंपबेल ही यहां से सही सलामत लौट पाया था। लखनऊ का कातिल हेनरी लारेंस, कानपुर का ज़ालिम जनरल नील, दिल्ली का धूर्त नृशंस मेजर हडसन तीनों लखनऊ में यहां के क्रांतिकारियों द्वारा मार गिराए गए। और लखनऊ का मूसाबाग, सिकंदरबाग, आलमबाग, दिलकुशा, कैसरबाग, रेज़ीडेंसी के भवन हमारे पूर्वजों की वीरता के गवाह हैं। हिंदी की पहली कहानी रानी केतकी की कहानी यहीं लखनऊ के लाल बारादरी भवन के दरबार हाल में सैय्यद इंशा अल्ला खां इंशा द्वारा लिखी गई। उर्दू का विश्वविख्यात उपन्यास उमराव जान अदा यहां मौलवीगंज में सैय्यद इशा अल्ला खां इंशा द्वारा लिखा गया। हिदुस्तान का पहला ओपेरा इंदर-सभा यहां गोलागंज में मिर्ज़ा अमानत द्वारा लिखा गया। मामूली से मामूली को बडा़ से बडा़ रुतबा देना लखनऊ का मिजाज है। दूर-दूर के लोगों तक को अपना बना लेने का हुनर लखनऊ के पास है। उर्दू शायरी का लखनऊ स्कूल आज भी दुनिया में लाजवाब है। जाहिर है कि यह सारी बातें योगेश प्रवीन के पहले भी थीं पर लोग कहते नहीं थे। लखनऊ की छवि सिर्फ़ एक ऐय्याश संस्कृति से जोड़ कर देखी जाती थी। पर दुनिया के नक्शे में लखनऊ को एक नायाब संस्कृति और तहज़ीब से जोड़ कर देखने का कायल बनाया योगेश प्रवीन, उन के शोध और उन के लिखे लखनऊ के इतिहास ने। योगेश प्रवीन के लखनऊ से इश्क की इंतिहा यही भर नहीं है। योगेश प्रवीन की मानें तो लखनऊ बेस्ट कंपोज़िशन सिटी आफ़ द वर्ड है। लखनऊ का दुनिया में कोई जोड़ नहीं है। बेजोड़ है लखनऊ।


लगता है कि जैसे योगेश प्रवीन को ईश्वर और प्रकृति ने लखनऊ का इतिहास लिखने ही के लिए दुनिया में भेजा था। नहीं योगेश प्रवीन तो लखनऊ के मेडिकल कालेज में मेडिकल की पढ़ाई के लिए एडमीशन ले चुके थे। सी.पी.एम.टी. के मार्फ़त। उन्हें बनना तो डाक्टर था। पर बीच पढ़ाई में वह बीमार पड़ गए। मेडिकल कालेज से पढ़ाई कर बनने वाला डाक्टर अब डाक्टरों के चक्कर लगाने लगा। एक बार तो उन्हें मृत समझ कर ज़मीन पर लिटा भी दिया गया। वह बताते हैं कि खैर किसी तरह उठा तो फिर कलम उठा कर ही अपने को संभाला किसी तरह। पढ़ाई छूट गई। टाइम पास करने के लिए वह अपने एक रिश्तेदार की कोचिंग में केमिस्ट्री पढ़ाने लगे, सीपी.एम.टी. की तैयारी करने वाले लड़कों को पढ़ाने लगे। मुफ़्त में। कि तभी विद्यांत कालेज में किसी ने कहा कि वहां मुफ़्त में पढ़ाते हो, यहां आ कर पढा़ओ, पैसा भी मिलेगा। तो वहां पढ़ाने लगा। इंटर तक पढा़ था। फिर धीरे-धीरे हिंदी में एम. ए. किया, लेक्चरर हो गया। फिर संस्कृत में भी एम.ए,. किया। लखनऊ से इश्क था ही लखनऊ पर लिखने लगा। ज़िक्र ज़रुरी है कि योगेश प्रवीन चिर कुंवारे हैं। बीमारी के चक्कर में विवाह नहीं किया। फिर लखनऊ से इश्क कर लिया। अपने कुंवारेपन और लिखने-पढ़ने के शौक पर वह ज़ौक का एक शेर सुनाते हैं, 'रहता सुखन से नाम कयामत तलक है ज़ौक/ औलाद से तो बस यही दो पुश्त, चार पुश्त!'

योगेश प्रवीन पर अपनी मां श्रीमती रमा श्रीवास्तव का सब से ज़्यादा प्रभाव दिखता है। रमा जी भी साहित्यकार थीं। उस दौर में भी उन की दो किताबें छपी थीं। संचित सुमन नाम से कविता संग्रह और मधु सीकर नाम से कहानी संग्रह। वह बातचीत में अकसर अपनी मां का ज़िक्र करते मिलते हैं। उन की जुबान पर मां और लखनऊ जितना होते हैं कोई और नहीं। जैसे लखनऊ के किस्से खत्म नहीं होते वैसे ही योगेश प्रवीन के किस्से भी खत्म होने वाले नहीं हैं। बहुतेरी बातें, बहुतेरे फ़साने हैं लखनऊ और उस से योगेश प्रवीन की आशिकी के। ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में जाने आलम वाजिद अली शाह ने कलकत्ते में अपनी नज़रबंदी के दौरान कहा था कि, ' कलकत्ता मुल्क का बादशाह हो सकता है लेकिन रुह का बादशाह लखनऊ ही रहेगा क्यों कि इंसानी तहज़ीब का सब से आला मरकज़ वही है।' आला मरकज़ मतलब महान केंद्र। तो योगेश प्रवीन भी शायद लखनऊ में उसी रुह का आला मरकज़ ढूंढते फिरते रहते हैं। तभी तो वह लखनऊ की गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते फिरते हैं किसी फ़कीर के मानिंद। और लखनऊ के आंचल में खिलता हुआ फूल पा जाते हैं। यह आसान नहीं है। वाज़िद अली शाह के ही एक मिसरे में जो कहें कि दरो दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं। लखनऊ के प्रति उन की दीवानगी को देखते हुए उन्हें लखनऊ का मीरा कहने को जी चाहता है। हालां कि अब लखनऊ काफी बदल गया है। यह लक्ष्मणपुरी, नवाबों की नगरी से आगे अब आई. टी. हब बनने की ओर अग्रसर है। तो भी उन्हीं के शेर में जो कहूं कि, 'तब देख के छिपते थे, अब छिप के देखते हैं/ वो दौरे लड़कपन था, ये रंगे जवानी है।' अब जो भी हो जाए पर लखनऊ से मीरा की तरह आशिकी फ़रमाने वाला योगेश प्रवीन तो बस एक ही रहेगा। कोई और नहीं। उन को इस कौस्तुभ जयंती पर बहुत-बहुत सलाम ! बहुत-बहुत सैल्यूट ! ईश्वर करे कि वह शतायु हों और लखनऊ के आंचल में खिलते फूलों को और विस्तार दें और इसी मासूमियत से यहां की गलियों में फ़रिश्तों का पता ढूंढते हुए ही लखनऊ पर जांनिसार रहें, अपनी पूरी मासूमियत और रवानी के साथ।

[आप चाहें तो योगेश प्रवीन जी को उन की 75 वीं जयंती पर बधाई देने के लिए उन से इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं : 09336861204 ]