Saturday, 24 March 2018

तो मायावती राज्यसभा में होतीं ज़रूर लेकिन इतिहास यह जीत अखिलेश के खाते में दर्ज किए होता

लेकिन अखिलेश यादव को दूरगामी राजनीति का ककहरा भी नहीं आता



कोई माने या न माने पर सच यही है कि अखिलेश यादव को दूरगामी राजनीति का ककहरा भी नहीं आता। अगर आता तो राज्य सभा चुनाव में वह ऐसा दांव चलते कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती को अपना उम्मीदवार बना कर भाजपा की हवा रोकने की नई ज़मीन बना लेते। ऐसी ज़मीन जिस को भाजपा को तोड़ने में लोहा चबाना पड़ता , फिर भी भाजपा तोड़ नहीं पाती। पर अब यह मौका अखिलेश न सिर्फ गंवा चुके हैं बल्कि अपनी 2019 की नाव भी जला चुके हैं। राजनीतिक जोड़-तोड़ और दांव-पेच अपनी जगह हैं। लेकिन समय की सचाई यह है कि दलित और पिछड़े स्वाभाविक साथी हैं। राजनीति के शब्द में उत्तर प्रदेश के अर्थ में कहें तो सपा और बसपा स्वाभाविक साथी हैं। शुरु में थे भी। लेकिन मायावती के अहंकार और पैसे की लालच में यह साथ झुलस गया। तिस पर मुलायम की मूर्खता भरे गेस्ट हाऊस कांड ने सपा-बसपा गठबंधन के धागे को जला कर स्वाहा कर दिया। दिक़्क़त यह भी है कि पिता-पुत्र दोनों ही लोहिया-लोहिया की माला जपते हैं , लोहिया की प्रतिमा पर माला चढ़ाते हैं लेकिन लोहिया से राजनीति का ख ग भी नहीं सीखा है। 

अब सत्ता की चाहत कहिए , अस्मिता और अस्तित्व का पहाड़ा कहिए बीते लोकसभा के चुनाव में मायावती ने अपना गुरुर तज कर , पुराना वैमनस्य भूल कर , अपनी हैसियत जान कर समाजवादी पार्टी को बिना शर्त समर्थन दे दिया। चुनाव परिणाम में मायावती के इस समर्थन का सपा को लाभ भी भरपूर मिला। अखिलेश इस चुनाव परिणाम से इतने विह्वल हुए कि मायावती को धन्यवाद देने उन के घर पहुंच गए। इतना ही नहीं बाद के दिनों में अखिलेश ने राजयसभा के चुनाव में बसपा को समर्थन देने की भी बात कर दी। मायावती ने अखिलेश के इस समर्थन को स्वीकार भी कर लिया। यहां तक तो सब ठीक था। लेकिन यह सब कुछ ठीक वैसे ही था कि मैं ने तुम्हें चाय पिलाई , अब तुम मुझे सिगरेट पिलाओ , वाली लौंडों की रस्म अदायगी ही थी। मायावती घाघ राजनीतिज्ञ हैं। इसी लिए उन्हों ने ख़ुद या अपने भाई को राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने के बजाय एक कार्यकर्ता को बनाने का दांव खेला। ऐसे में खुद उम्मीदवार बनतीं तो बड़ी फज़ीहत होती और कहीं की नहीं रहतीं। 

लेकिन अखिलेश ने अगर यहीं राजनीतिक दिमाग लगाया होता और कि दूर तक सोचा होता , न सिर्फ दूर तक बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव तक भी सोचा होता तो वह मायावती की राजनीतिक सदाशयता का जवाब इस से आगे बढ़ कर देते। वह यह कि वह मायावती के घर फिर से जाते और बुआ जी से खुला प्रस्ताव रखते कि आप खुद राजयसभा चुनाव लड़िए।  समाजवादी पार्टी का पूरा और खुला समर्थन आप को रहेगा। सपा अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी। रही बात बचे हुए वोट की तो वह उसे नरेश अग्रवाल के सिपुर्द कर देते और कहते नरेश से कि बाक़ी वोट की व्यवस्था आप खुद कर लीजिए। तब नरेश अग्रवाल भी पार्टी में बने रहते और सम्भवत: अपनी तिकड़मी , कुटिल और व्यवसाई बुद्धि से वह विजयी भी हो जाते। लेकिन इस से भी बड़ी बात यह होती कि मायावती का राजनीतिक उपकार न सिर्फ अखिलेश मायावती को राजयसभा में भेज कर उतार देते बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव खातिर बसपा के साथ एक मज़बूत गठबंधन बना कर भाजपा के लिए दोतरफा चुनौती बल्कि कड़ी चुनौती पेश कर देते। बुआ , भतीजे के रिश्ते को एक गरिमा भी मिली होती।  बुआ-भतीजा जिंदाबाद का नारा एक नया अर्थ पा गया होता। गठबंधन को स्थाई भाव मिला होता। लालू प्रसाद यादव आज भले जेल में हैं अपने कुकर्मों के चलते सज़ा दर सज़ा पाते जा रहे हैं लेकिन इस बात के बीज वह जेल जाने से पहले बो गए थे। लालू ने मायावती को सीधा प्रस्ताव रखा था उन को राज्यसभा भेजने के लिए। अखिलेश को दूरदृष्टि दिखाते  हुए इस लालू के इस बीज को वृक्ष बना लेना चाहिए था।

अगर अखिलेश ऐसा करते तो दूध की जली छांछ भी फूंक-फूंक कर पीने वाली मायावती राजयसभा का चुनाव खुद लड़तीं और भाजपा की मंशा पर दोनों मिल कर पानी फेर देते। न सिर्फ इतना बल्कि अगले लोकसभा चुनाव में बाकी दलों को भी एकजुट कर तीसरा मोर्चा या कांग्रेस के साथ ही सही एक महागठबंधन बना कर मोदी , अमितशाह और योगी का विजयरथ न सिर्फ रोक लेते बल्कि कुचल कर रख देते। इस लिए भी कि आप लाख सिद्धांत , संविधान और शुचिता की राजनीति का बखान कर लें , उदघोष कर लें पर जाति भारतीय राजनीति की निर्मम सचाई है। और सपा तथा बसपा जातीय राजनीति का संगम हैं। जातीय राजनीति ही इन की पहचान है। इसी ताकत को पहचान कर कांशीराम ने नब्बे के दशक में मुलायम से हाथ मिलाया था। हाथ मिला कर भारतीय राजनीति में जातीय घृणा की विषबेल रोपी थी।  वह विषबेल अब अपने उरूज पर है। संविधान की खामियां इस विषबेल को पूरा-पूरा खाद-पानी देती हैं। कोई कुछ कर नहीं सकता। और जब तक आरक्षण नाम का जहर संविधान में सुरक्षित रहेगा तब तक आप जातियों के जहर से लड़ नहीं सकते। यह जातीय जहर ही सपा और बसपा की सामाजिक और राजनीतिक ताकत है। जिसे मुंह छुपाने के लिए घाघ लोग सामाजिक न्याय या सामाजिक समता का नाम लेते हैं। इसी ताकत को पहले कांग्रेस डायलूट कर के दोहन करती थी अब भाजपा सामाजिक समरसता के नाम पर दूहना चाहती है। लेकिन इस बिसात पर कहा न बसपा और सपा ही स्वाभाविक साथी हैं।

अगर गेस्ट हाऊस कांड का मलाल भूल कर मायावती सपा जैसी अपनी दुश्मन को बीते लोकसभा उपचुनाव में भी बिना मांगे , बिना शर्त समर्थन दे कर नई राजनीति का सूत्रपात किया तो अखिलेश को भी बड़प्पन दिखाते हुए उन्हें बिना शर्त राजयसभा हर मुमकिन भेज देना था। लोकसभा बड़ी लड़ाई थी , राजयसभा छोटी लड़ाई। बस बात राजनीतिक विजन की थी। ऐसा कर के वह पिता मुलायम के माथे पर लगा गुंडई का कलंक भी धो सकते थे। लेकिन वह कहते हैं न कि यादव इज अल्टीमेट यादव। यादव तो अखिलेश के पिता मुलायम भी हैं तिस पर पहलवान भी। लेकिन मुलायम के पास जनेश्वर मिश्र , मधुकर दीघे जैसे सलाहकार थे जो उन्हें राजनीति की नित नई ऊंचाइयों पर ले गए। लेकिन अमर सिंह ने आ कर मुलायम के राजनीतिक पतन की पटकथा लिख दी।

दिक्कत यह भी है कि अखिलेश के पास कोई जनेश्वर मिश्र या मधुकर दीघे नहीं है। अखिलेश को पिता की तरह ही अपने सलाहकार सही लोग रखने चाहिए। जहर में बुझे और यादवी अहंकार में डूबे लोग नहीं। ठेकेदारी और राजनीति दोनों दो बात है। राजनीति सब कुछ है , ठेकेदारी बिलकुल नहीं है। कुछ पाने के लिए , खोना भी पड़ता है।  झुकना और रुकना भी पड़ता है। अखिलेश को जानना चाहिए कि सपा अगर नदी है तो बसपा नदी का पानी। बिना पानी के नदी का कोई अस्तित्व नहीं है। नदी में पानी लाने के लिए उन्हें भगीरथ की तरह तपस्या करनी पड़ेगी। अब यह एक दुर्लभ मौका अखिलेश ने गंवा दिया है। न सिर्फ गंवा दिया है बल्कि मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को न सिर्फ विजयी मुस्कान दे दी है बल्कि उन को यह कहने का मौका भी दे दिया है कि सपा सिर्फ लेना जानती है , देना नहीं। अभी तक सपा का इतिहास यही रहा भी है। मैं तो मुलायम के लिए कई बार लिख भी चुका हूं कि मुलायम बिजली का वह नंगा तार हैं जिन्हें आप दोस्ती में छुएं या दुश्मनी में , दोनों सूरत में आप को ही मरना है। लेकिन अखिलेश के हाथ में था इस बार कि यह मिथ वह तोड़े देते। लेकिन कहा न कि अखिलेश को दूरगामी राजनीति नहीं आती।

अगर जया बच्चन की जगह अखिलेश ने मायावती को बिना शर्त अपना उम्मीदवार बना लिया होता। तो आज की तारीख में देश की राजनीति अभी की अभी बदल गई होती। अमित शाह का चाणक्य धूल चाट कर धूल-धूसरित हो गया होता।  मायावती राजयसभा में होतीं ज़रूर लेकिन इतिहास यह जीत अखिलेश के खाते में दर्ज किए होता। आसन्न 2019 के लोकसभा चुनाव के चाणक्य हुए होते अखिलेश। जया बच्चन को राज्यसभा भेज कर अखिलेश ने सिर्फ रस्म अदायगी की है और व्यक्तिगत संबंध पुख्ता किया है। मायावती को राजयसभा भेज कर वह भारत की वर्तमान राजनीति को विश्वनाथ प्रताप सिंह की तरह नई ज़मीन दे दिए होते। अफ़सोस अखिलेश ऐसा नहीं कर सके। आप पूछेंगे और मायावती ? मायावती अभी भी अपनी राजनीति के अहंकार युग में जी रही हैं। उन को अपनी रणनीति में कमी नहीं दिखती। वह अपनी सारी बीमारी की जड़ अभी भी भाजपा के दलित विरोधी होने की अपनी लफ्फाजी में तलाश रही हैं। आज की राजनीति में दलित , पिछड़े मिल कर बड़ी ताकत हैं ज़रूर। पर बिना किसी रणनीति के पूरी तरह शून्य हैं। तिस पर इन दलित और पिछड़ों की जहर बुझी भाषा उन्हें समाज की मुख्य धारा से विलग कर देती है। भाजपा ने इन को इन की जहर बुझी भाषा को ही सवर्णों के पक्ष में करने का हथियार बना रखा है। पर यह अंधे यह तथ्य देखना ही नहीं चाहते। बिकाऊ मीडिया के पास भी ऐसे सवालों के लिए न विजन है , न समय। वह तो भाजपा की जीत का जश्न ऐसे मना रहे हैं गोया , यह उन की ही जीत है। 

Thursday, 22 March 2018

एक गोल्डमेडलिस्ट का बेरोजगारी में सुशील सिद्धार्थ बन जाना

 साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहे कवि , आलोचक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के साथ हम और सुशील सिद्धार्थ 

ज़माने ने मारे जवां कैसे कैसे , ज़मीं खा गई आसमां कैसे कैसे । सुशील सिद्धार्थ को मैं जब भी देखता मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा यह गीत याद आ जाता। लेकिन उन की फक्क्ड़ई , उन की फकीरी उन के गम के निशान धो डालती थी। लेकिन बेरोजगारी का दंश उन्हें जीवन भर सताता रहा था। इस की कुंठा और हताशा में वह आकंठ डूबे रहे। एक गोल्ड मेडलिस्ट नौकरी के लिए दर -दर ठोकर खाता फिरे यह हिंदी जगत में ही मुमकिन है। हिंदी को जितना सुशील सिद्धार्थ ने दिया उस का शतांश भी हिंदी जगत ने उन्हें नहीं दिया। अब क्या देगा भला। जो भी कोई उन का शरणदाता बना , अंतत: उन का शोषक बना। वह चाहे लखनऊ के लोग हों , मुंबई के लोग हों या अब दिल्ली के लोग। किन-किन का नाम लूं , किन-किन का छोड़ दूं ? हिंदी जगत के जाने कितनों का चेहरा सुशील सिद्धार्थ ने साफ़ किया , संवारा-सजाया , बच्चों की तरह उन के पोतड़े धोए , उन्हें स्थापित करने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया लेकिन वही लोग उन के मुंह पर थूकते हुए निकल गए। नतीज़तन सुशील के जीवन में इतनी तल्खी आ गई , इतना तनाव आ गया कि वह निरंतर बिखरते गए। बिखरते गए और समझौतों की नदी में गहरे और गहरे उतरते गए। छोटी-छोटी नौकरियां , छोटे-छोटे दैनंदिन समझौते। वह टूट कर रह गए थे।बेरोजगारी के दंश ने उन्हें क्या से क्या बना दिया था , अब ज़रा ठहर कर सोचता हूं तो दहल जाता हूं। सोचता हूं कि अगर मैं सुशील सिद्धार्थ की जगह होता तो क्या इतना जी पाता ? इतना सक्रिय रह पाता , इतना कुछ कर पाता भला ? शायद बिलकुल नहीं। यहां तो ज़रा-ज़रा सी ठेस पर भी ठहर जाता हूं और फिर उस राह पर नहीं जाता हूं। हालां कि कभी सिर उठा कर , सीना तान कर जीने वाला मैं भी कुछ ठोकरों के बाद झुकने लगा। परिवार पालने की गरज से नौकरी के लिए बहुत से समझौते मैं ने भी बाद के दिनों में किए हैं , छल और कपट झेले हैं। लेकिन सुशील सिद्धार्थ तो जैसे समझौतों के सागर थे। उन के झुकने की कोई सीमा नहीं रह गई थी। अंततः संघर्ष का समुद्र ही असमय उन्हें बहा ले गया। 

सुशील सिद्धार्थ अब के दिनों में कभी किसी को कुछ भी मना नहीं करते थे।  आप कुछ भी काम उन्हें सौंपिए वह सहर्ष स्वीकार कर लेते थे।  लेकिन कंप्यूटर भी एक सीमा के बाद हैंग कर जाता है , सुशील सिद्धार्थ तो फिर भी आदमी थे। स्वीकार कर लेना और काम कर देना , आसान नहीं होता। वह भी लिखना। कितनी किताबों पर कितना लिखते वह। अब उन की छवि बन गई गच्चा देने की। बल्कि बयाना लेना , गच्चा देना और फिर पंगा लेना सुशील सिद्धार्थ की जैसे नियति बनती गई। झूठ बोलना भी। संपादन और फुटकर लेखन ने उन के रचनाकार को जैसे खा लिया। यह ज़िंदगी में एक बार , एक नहीं कहने की क़ीमत थी। कह सकते हैं प्रेम में डूब कर नहीं कहने की क़ीमत थी।  सुशील सिद्धार्थ ने इस एक नहीं कहने की क़ीमत ज़िंदगी भर चुकाई। ऐसे , जैसे कोई हिंदी फ़िल्म की कथा हो उन की ज़िंदगी। और वह उस के मुख्य किरदार। तब के दिनों वह सुशील अग्निहोत्री हुआ करते थे। उन के पिता डाक्टर चंद्रशेखर अग्निहोत्री प्रतिष्ठित डी ए वी डिग्री कालेज में हिंदी के प्राध्यापक थे और सुशील सिद्धार्थ लखनऊ यूनिवर्सिटी में विद्यार्थी। उन दिनों प्रोफेसर हरेकृष्ण अवस्थी हिंदी विभाग में आचार्य थे। लोग बताते हैं कि सुशील अग्निहोत्री के पिता की कक्षा में छात्र खिड़कियों तक में बैठ जाते थे , उन से पढ़ने के लिए। बाद में सुशील अग्निहोत्री ने एम ए हिंदी में दाखिला लिया। और यह देखिए योग्य पिता के योग्य पुत्र ने यूनिवर्सिटी टॉप कर लिया। पी एच डी में रजिस्ट्रेशन करवा लिया। पी एच डी के आचार्य सुशील की मेधा पर मुग्ध थे। पी एच डी आनर होने के बाद लखनऊ यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग में उन की नियुक्ति की बात हो गई।  ज्वाइनिंग का दिन आ गया। फूल माला , मिठाई आ गई। पर ऐन वक्त पर सुशील अग्निहोत्री की ज्वाइनिंग पर रोक लग गई। किसिम-किसिम की बातें। मुख्य बात सामने आई कि एक आचार्य ने अपनी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा था जिसे सुशील अग्निहोत्री ने विनय पूर्वक मना कर दिया। नहीं कह दिया। क्यों कि सुशील अग्निहोत्री आशा गुप्ता जी के साथ प्रेम में थे। इस प्रेम में ईमानदारी का तकाजा यही था। सुशील अग्निहोत्री  इस नहीं की कीमत ज़िंदगी भर कई सारे मूर्खता भरे हां में गुज़ारने के लिए अभिशप्त रहे। अब यह यूनिवर्सिटी टॉपर छोटे-छोटे स्कूलों में पढ़ा रहा था। उस का गोल्ड मेडल उस पर हंस रहा था।

अब इस सुशील अग्निहोत्री को हिंदी जगत सुशील सिद्धार्थ नाम से जान रहा था। जिस डी ए वी डिग्री कालेज में पिता सम्मानित प्राध्यापक थे , पुत्र वहां संविदा पर पढ़ाने लगा। इस आस में कि कभी तो नियमित नियुक्ति भी मिल जाएगी , जो कभी नहीं मिली।   लोक सेवा आयोग के मार्फत भी कुछ नहीं हो पाया। क्यों कि आचार्य के लोग हर जगह मुस्तैद थे। वर्धा में आचार्य के लोग नहीं थे पर वर्धा में भी कोशिश नाकाम रही। नतीज़तन वह इसप्वायल जीनियस बन कर रह गए। अब कोई भी छोटा-मोटा कार्य उन को मिल जाता , वह मना नहीं करते। उन का विशद अध्ययन सर्वदा उन के काम आता। बोलना हो , लिखना हो , पढ़ाना हो , प्रूफ पढ़ना हो , संपादन करना हो सुशील हर कार्य के लिए हाजिर। रात-बिरात हाजिर। काम देने , दिलाने की लालच दे कर कई लोग सुशील से बेगारी भी करवा लेते थे। पता चला सुशील छोटे-मोटे अख़बारों की नौकरी , अध्यापन , संपादन , लेखन सब कुछ एक साथ करने लगे। कविता , कहानी , व्यंग्य भी लिखने लगे। गोया वह आदमी नहीं मशीन हो गए हों। घर में भी वह प्रेम विवाह की परिणति भुगत रहे थे। माता-पिता उन की पत्नी के हाथ का पानी भी नहीं पीते थे। यह उन के ब्राह्मण होने की यातना थी। बाहर उन का गोल्ड मेडलिस्ट पिट रहा था , घर में उन का ब्राह्मण। अजीब यातना थी। लेकिन यह सब वह किसी से कहते नहीं,थे , न ही किसी से सहानुभूति मांगते थे। अब तक वह सुशील अग्निहोत्री से सुशील सिद्धार्थ हो चले थे। पता चला वह मुंबई चले गए। कमलेश्वर के राइटर्स वर्कशाप में काम करने लगे। फ़िल्में , धारावाहिक लिखने लगे। कमलेश्वर के साथ। पर कमलेश्वर ने कभी सुशील सिद्धार्थ का नाम नहीं दिया कहीं। बस आश्वासन देते रहे कि समय आने पर दूंगा। सुशील एक समय अफना गए। कुछ जगह सीधे काम मांगने पहुंच गए। यह कहते हुए कि सब कुछ तो मैं ही लिखता हूं ,  सीधे मुझ से लिखवाइए। बात कमलेश्वर तक पहुंचनी ही थी। पहुंची भी। मुंबई से उन का दाना पानी उठ गया। सुशील सिद्धार्थ लखनऊ लौट आए। फिर वही फुटकर काम। वही अध्यापन , संपादन ,लेखन , प्रूफ रीडिंग। सब कुछ एक साथ। तेली के बैल की तरह। वह कभी किसी पत्रिका से जुड़े , किसी अख़बार से जुड़े , किसी स्कूल , किसी कालेज से। कब कहां पकड़ लिया , कब कहां छोड़ दिया जानना कठिन होता गया। फुटकर और टेम्परेरी कामों की मियाद वैसे भी नहीं होती। इन्हीं दिनों वह क्रमश: कथाक्रम , तद्भव और लमही से भी जुड़े । बतौर सहायक संपादक, अतिथि संपादक । कथाक्रम परिवार का हिस्सा तो मरते दम तक वह रहे। कोई 23 साल तक।

कथाक्रम 2014 में लंच के बाद हम कुछ साथियों के साथ सुशील सिद्धार्थ 

खैर , संघर्ष और सुशील सिद्धार्थ का अब चोली दामन का साथ हो गया था। बहुत कम लोग जानते हैं कि सुशील सिद्धार्थ ज्योतिष विद्या की भी अच्छी जानकारी रखते थे। सो अब तक वह शायद अपना भाग्य भी पढ़ चुके थे। सो अपनी मुश्किलों के बाबत अब वह किसी से खुल कर चर्चा नहीं करते थे। यह ज़रुर हो गया था कि अब वह किसी काम के लिए किसी को कभी मना नहीं करते थे। काम करने का बयाना वह सब से लेते थे। फिर काम पूरा न हो पाने पर गच्चा देना भी उन के स्वभाव में आने लगा। झूठ बोलना भी। और जो कोई उन्हें इस बाबत टोक दे तो वह अब पंगा लेने से भी गुरेज़ नहीं करते थे। बयाना , गच्चा और पंगा उन का स्थाई भाव बनता गया। उन की पहचान बनती गई। सूचना विभाग , हिंदी संस्थान जैसी जगहों के भी वह फुटकर काम करते रहे। कई अख़बारों के लिए नियमित लिखना भी जारी था। एक बार मुद्राराक्षस का एक इंटरव्यू उन का छपा। मैं ने पढ़ कर उन से खिन्न हो कर कहा कि , यह इंटरव्यू है कि डिक्टेशन ? वह सकुचाए और बोले , अब ऐसा ही करने का आदेश था , क्या करें ? एक अख़बार में एक सज्जन ने उन से तय किया कि वह हर हफ्ते लिखें। अच्छा पैसा मिलेगा। लेकिन एक लेख अलग से  उन के नाम से भी हर हफ्ते उन को लिखना होगा। इस अतिरिक्त लेख का पैसा वह अलग से दिया करेंगे। सुशील सहर्ष मान गए। बहुत दिनों तक यह सिलसिला चला। एक बार उन सहयोगी की शिकायत हो गई अख़बार में कि वह दूसरों से अपने लिए लेख लिखवाते हैं। लेकिन बात आई गई हो गई। एक बार शिकायत करने वाले ने सुशील की राइटिंग में वह लेख पकड़ लिया जो अख़बार के सहयोगी के नाम से छपा। हुआ यह था कि जिन के नाम से लेख छपना था , वह अपने गांव गए थे तो सुशील वह दोनों लेख उन के कनिष्ठ सहयोगी को दे गए। कनिष्ठ सहयोगी ने कंपोजिंग में दे दिया दोनों लेख। अब शिकायत करने वाले सहयोगी पहले से तड़े हुए थे। उन्हों ने सुशील की राइटिंग वाली कॉपी फोटोकापी कर संपादक को थमा दी। कंपोजिटर ने यह बात कनिष्ठ सहयोगी को बता दी। कनिष्ठ सहयोगी ने अपने वरिष्ठ को फोन पर यह सब बताया। फिर यह लेख फैक्स से उन के पास से भेजा। उन्हों ने फैक्स को फिर से लिख कर फैक्स किया। और जब जांच हुई तो कनिष्ठ ने बता दिया कि फैक्स पढ़ने में नहीं आ रहा था तो सुशील जी से उस को फिर से साफ-साफ लिखवा लिया।

जाहिर है यह सब सुशील जी की सहमति से हुआ। बाद के दिनों में उस अख़बार के संपादक ने सुशील जी पर बहुत दबाव बनाया कि वह किसी भी तरह स्वीकार कर लें कि वह उस सहयोगी के नाम से लिखते रहे हैं। इस के लिए सुशील जी को नौकरी का प्रस्ताव भी दिया गया। सुशील जी तब भी बेरोजगार थे। चाहते तो लपक कर नौकरी पा सकते थे। अच्छी खासी नौकरी। लेकिन वह दबाव में नहीं आए , तो नहीं आए। हां , यह ज़रूर हुआ कि अब वह उसी अख़बार में हफ्ते में तीन लेख लिखने लगे। यह तीसरा लेख , उस अख़बार के संपादक के नाम से छपने लगा। लेकिन सुशील सिद्धार्थ का संघर्ष थम नहीं रहा था। हिंदी में छिटपुट लेख लिख कर , संपादन करने और अस्थाई अध्यापन कार्य से घर की रसोई और बच्चों की पढ़ाई तथा ज़रूरत का खर्च कहां चल पाता है भला ? फिर सुशील ने जाने और कितने लोगों के लिए लेख , कविताएं , समीक्षाएं आदि लिखीं। इन का विवरण लिखने बैठूं तो पूरी एक पुस्तक लिख जाएगी । और कि जाने कितनों की पैंट और पेटीकोट उतर जाएगी।

यह देखिए समय जैसे सुशील सिद्धार्थ के लिए अच्छे समय ले कर आ गया । रवींद्र कालिया कोलकाता से वागर्थ छोड़ दिल्ली आ गए। ज्ञानोदय का संपादन करने। ज्ञानपीठ के निदेशक बन कर। लखनऊ से सुशील सिद्धार्थ को बुला लिया अपना सहयोगी बना कर। ज्ञानोदय पत्रिका अब सुशील सिद्धार्थ के खून पसीने से तरबतर थी। जल्दी ही ज्ञानपीठ की नई छपने वाली किताबें भी सुशील का स्पर्श पाने लगीं। रवींद्र कालिया ने सुशील सिद्धार्थ की प्रतिभा का सदुपयोग कर लिया था। एक रात फोन पर लंबी बातचीत में मैं ने सुशील सिद्धार्थ को समझाया कि पंडित जी अब जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर एक अच्छे और प्रतिष्ठित संस्थान में नौकरी मिली है , इसे किसी भी सूरत में पूरी निष्ठा से निभा लीजिए। अंतिम नौकरी मान कर। वह बिलकुल बड़े भाई , बिलकुल ! कह कर मुझे बारंबार आश्वस्त करते रहे। उन दिनों अपने विद्यार्थी जीवन के साथी भारतेन्दु मिश्र के साथ वह दिल्ली में रह रहे थे। भारतेंदु मिश्र पहले से भारत सरकार की नौकरी में दिल्ली में थे। उन दिनों भारतेंदु मिश्र , सुशील सिद्धार्थ की तारीफ़ करते थे , सुशील सिद्धार्थ भारतेंदु मिश्र की तारीफ़ करते।  दोनों के बीच विद्यार्थी जीवन का संबंध तो था ही , अवधी भाषा का अनुराग भी था। दोनों ही अवधी के ज्ञाता और कवि। अवधी जैसे दोनों की जान थी , और दोनों एक दूसरे की जान। लेकिन अवधी का यह रस बहुत समय तक बना नहीं रह पाया। दुर्भाग्य से यह रस बहुत जल्दी ही सूखने लगा। मैं समझ गया कि सुशील सिद्धार्थ फिर गड़बड़ कर गए हैं। बहुत समझाया। वह हां-हां , हां बड़े भाई , हां कहते तो रहे पर मेरी बात उन्हों ने सुनी नहीं।

दिल्ली में सुशील सिद्धार्थ का यह पहला भटकाव था। और यह देखिए रवींद्र कालिया का सुशील सिद्धार्थ से , सुशील सिद्धार्थ का रवींद्र कालिया से मोहभंग की आहट मिलने लगी। मैं ने अपने तौर पर पता किया तो पता चला कुणाल जो रवींद्र कालिया के वागर्थ , कोलकाता के दिनों के सहयोगी रहे थे , दिल्ली एक फेलोशिप पा कर पहुंच चुके थे , दोनों के बीच गांठ बन कर उपस्थित हो चुके थे। बिना ज्ञानपीठ में नौकरी किए , वह पूरा दखल देने लगे थे और सुशील को पैदल करने की सारी कसरत करने लगे। सुशील ने बौखला कर फिर पंगा ले लिया। वह जगह-जगह कहने लग गए कि कालिया जी ठीक से चल तो पाते नहीं , काम क्या करेंगे ? सब कुछ तो मैं करता हूं।  मैं ने उन्हें फिर फोन किया। समझाया कि कालिया जी सुलझे हुए आदमी हैं , संघर्ष जानते हैं। एक बार क्षमा मांग कर फिर से बात बना लीजिए। और कि यह डायलॉग बंद कीजिए कि सब कुछ मैं करता हूं। यह ठीक बात नहीं है।  नौकरी करना , अब से सही सीखिए। अपमान पीना सीखिए। वह हां , ना में बात करते रहे। लेकिन झुकने को तैयार नहीं थे। असल में तब तक वह दिल्ली की साहित्यिक राजनीति में शामिल हो कर कुछ लोगों के टूल बन चुके थे। मैं ने उन्हें समझाया भी। लेकिन वह समझे तब जब ज्ञानपीठ से उन की बाकायदा छुट्टी हो गई। किसिम-किसिम के लांछन लगे सो अलग। ज्ञानोदय के छिनाल प्रकरण में भी वह इस्तेमाल हो चुके थे।

मैं ने फिर उन्हें समझाया कि अब जो हो गया सो हो गया। लौट आइए लखनऊ। वह कहने लगे अब लखनऊ ऐसे तो नहीं लौटूंगा। एक बार खुद को साबित तो करना ही है बड़े भाई। फिर समझाया। पर वह कहने लगे राजेंद्र यादव से बात हो गई है। आशीर्वाद दीजिए। कार्यकारी संपादक बनने की बात हो गई है। हम ने कहा , बधाई ! लेकिन ज्ञानपीठ की नौकरी के बाद हंस की नौकरी का कोई तुक नहीं है। और फिर हंस जैसी नौकरी में आप को सम्मानजनक पैसा भी नहीं मिलेगा , जीवनयापन खातिर। ज्ञानपीठ में भी कुछ बहुत सम्मानजनक पैसा नहीं मिलता था। लेकिन जीवनयापन भर का तो था। मैं ने उन से यह भी कहा कि ऐसी नौकरी तुरंत ज्वाइन करवा ली जाती है , इतना टाइम नहीं लिया जाता। लेकिन सुशील सिद्धार्थ की समझ में नहीं आया। लखनऊ में भी सुशील साहित्यिक राजनीति के टूल कई बार बन चुके थे , मैं ने उन्हें समझाया कि अब वह दिल्ली है। आप वहां लोगों की राजनीति के टूल बनने गए हैं कि नौकरी करने। आप समझ क्यों नहीं रहे कि कालिया कैंप का विरोधी कैंप आप का इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन सुशील सिद्धार्थ ने मेरी बात नहीं सुनी। अब वह हंस का कार्यकारी संपादक नहीं , राजकमल प्रकाशन में मामूली पैसों में संपादक हो गए थे। दिन भर राजकमल की नौकरी , शाम को सामयिक प्रकाशन के महेश भारद्वाज की बेगारी। मैं लगातार समझाता रहा , लखनऊ लौट आने की तजवीज देता रहा। यह भी बताया कि दिल्ली के प्रकाशकों से अच्छा पैसा लखनऊ के किसी स्कूल में आप को मिल जाएगा। लेकिन सुशील सिद्धार्थ अब दिल्ली की साहित्यिक राजनीति में रम चुके थे। इस राजनीति का नशा छोड़ने को वह तैयार नहीं थे। उन को लग रहा था कि वह लेखकों की नर्सरी तैयार कर रहे हैं। दिल्ली में लेखकीय राजनीति का नशा , अड्डेबाज़ी का नशा उन्हें रास आ गया था। वह लखनऊ पहले आते थे तो मिल-मिला कर जाते थे। अब कब आए , कब लौट गए पता ही नहीं चलता था। लेकिन जल्दी ही राजकमल से भी वह विदा हो गए। नशा जैसे टूटा। अब फिर उन से लखनऊ लौटने की बात करता। सावित्री शर्मा का गीत , दे रहे गीत नयन सौगंध तुमको, हम अकेले हैं प्रवासी लौट आओ ! सुनाते हुए कहता , प्रवासी अब तो लौट आओ ! वह कहते हां , बड़े भाई आप के आदेश का पालन जल्दी ही करता हूं।

अपनी जीवन साथी आशा जी के साथ सुशील सिद्धार्थ 

अब वह किताब घर में थे। खुश थे और सक्रिय भी खूब थे। बेटी इशिता की शादी हो चुकी थी। बेटा ईशान भी कैरियर पकड़ चुका था। वह बेटे ईशान की गर्लफ्रेंड के साथ उस की फ़ोटो फ़ेसबुक पर पोस्ट करते हुए लिख रहे थे , बेटा अपनी गर्लफ्रेंड के साथ। ऐसे पिता कहां होते हैं। आशा जी भी स्कूल में प्रिंसिपल हो गई थीं। बीमारियां देह में घर बसा चुकी थीं। शुगर से दोस्ती पहले से थी , अब यह दोस्ती प्रगाढ़ हो चुकी थी। एन जी ओ प्लास्टी हो चुकी थी। मैं कहता अब क्या करने के लिए दिल्ली में अपने को दुहवा रहे हैं , किसी गाय की तरह ? वह हंसते हुए कहते लौटता हूं जल्दी। फिर एक दिन कहने लगे , लौट कर करुंगा क्या लखनऊ में । मैं ने कहा , हिंदी पढ़ाइएगा। वह हंसने लगे। कहने लगे , हिंदी में लोग लिख तो रहे हैं , छप भी रहे हैं , लेकिन हिंदी अब पढ़ कौन रहा है ? ऐसे ही जब एक अख़बार लखनऊ से निकला था तो संपादक ने उन्हें बुलाया काम करने के लिए। सुशील आए भी बात करने। मुझ से मिले घर आ कर।  मैं ने बधाई दी। और पूछा कुछ पैसे की भी बात हुई ? तो वह बोले , हुई तो बड़े भाई पर मैं ने संपादक से पूछ लिया है , कि इस अख़बार की आयु कितनी है ? और हंसने लगे। जाहिर है नौकरी मिलने के पहले ही वह पंगा ले चुके थे। बयाना लेना , गच्चा देना , पंगा लेना अब उन का स्वभावगत स्वाभिमान बन चुका था। सब कुछ था पर मैं सिर्फ इतना सा चाहता था कि बहुत हो गया भटकाव। अब वह आशा जी के साथ पारिवारिक जीवन शांति से जीना सीखें। लखनऊ लौट आएं या आशा जी को ही दिल्ली लेते जाएं।

पर वह तो भटकाव और उलझाव के अलक जाल में पूरी तरह फंस चुके थे।

फेसबुक पर इन दिनों वह खूब सक्रिय थे। उन के प्रशंसकों की भारी फ़ौज थी। लगभग रोज ही उन की दो चार पोस्ट रहतीं। व्यंग्य वह पहले भी लिखते थे लेकिन अब वह लगभग व्यंग्य में पूरी तरह रम चुके थे। पूरी रौ में थे। लेकिन मैं देख रहा था अब बीमारी के बवाल में फंस कर वह खुद व्यंग्य बन रहे थे। तो भी व्यंग्य ने उन को जैसे आक्सीजन सी दे दी थी। जितना जहर जीवन में पिया था सुशील सिद्धार्थ ने जैसे सब कुछ व्यंग्य में उड़ेल देना चाहते थे। उन की गुरु चेला सीरीज में उन की गुरुओं के प्रति वितृष्णा की इबारत को बहुत आसानी से पढ़ा जा सकता है। जितना शोषण गुरुओं ने उन का किया , उन की ज़िंदगी को नरक बनाया , वह सब उन के व्यंग्य में झलक ही नहीं रहा था , बदक रहा था। जैसे चूल्हे पर रखा कोई अदहन हो। एक बानगी देखें :

गुरुदेव : चेला , कर्मकांड शब्द का क्या मतलब है ?

चेला : गुरुदेव ,यह शब्द कर्म और कांड से मिलकर बना है।

गुरुदेव : इन शब्दों का ही मतलब बताओ।

चेला :गुरुदेव ,मैं जो करता हूं उसे कर्म कहेंगे ।

गुरुदेव : और मैं जो करता हूं ?

चेला : आप तो कांड करते हैं ।

सच यही है कि सुशील सिद्धार्थ का कर्म असल में सही अर्थों में शिनाख्त नहीं पा सका। जिस-जिस को धो-पोंछ कर खड़ा किया उस-उस ने उन्हें डसा। यही उन के जीवन का एकमेव सत्य था। नहीं उन जैसा गंभीर अध्येता , वक्ता और संपादक हमारी पीढ़ी में दुर्लभ है। सुशील बहुत अच्छी कविताएं लिखते थे। अवधी में भी , हिंदी में भी। मोतियों जैसे उन के लिखे अक्षर आज भी मन में टंगे पड़े हैं। बच्चों पर लिखी उन की कविताएं भी मैं ने पढ़ी हैं।  उन की आलोचना में उन का अध्ययन देखते बनता है। उन की भाषा में तुर्शी और उस के ठाट के क्या कहने। मेरी भी कुछ कहानियों की किताबों की समीक्षा उन्हों ने जगह-जगह लिखी। मेरी ग्यारह प्रतिनिधि कहानियों की भूमिका भी लिखी है सुशील सिद्धार्थ ने। मेरे उपन्यासों पर वह समग्र रुप से लिखना चाहते थे। कहते थे नोट बना रहा हूं। हालां कि वह बहुत नोट बना कर लिखने के अभ्यस्त नहीं थे। परमानंद श्रीवास्तव की तरह उन की आलोचना भी तुरंता आलोचना की शिकार थी। यह बात भी मैं जानता था। तो उन से कहता था , पंडित जी , हम को तो यह टॉफी खिलाइए नहीं , यह टॉफी अपनी किसी नायिका को खिला दीजिए। बता दूं कि बावजूद तमाम मुश्किलों के उन के पास नायिकाएं भी खूब थीं , किसिम-किसिम की। तो वह हंसते हुए कहते , नहीं बड़े भाई गंभीरता से कह रहा हूं। लेकिन सुशील के पास इतना लिखने का अवकाश अब नहीं था। इधर लगातार जब वह व्यंग्य और ज्ञान चतुर्वेदी को शरणागत हो गए थे तो एक बार मैं ने उन्हें मनोहर श्याम जोशी की याद दिलाई और कहा कि फुटकर व्यंग्य में क्यों खर्च हुए जा रहे हैं। मनोहर श्याम जोशी की तरह कोई बड़ा व्यंग्यात्मक उपन्यास लिखिए तो बात बने। तो कहने लगे बात तो ठीक कह रहे हैं , लेकिन यहां तो ज़िंदगी ही फुटकर हो गई है। मैं ने उन से कहा कि यह फुटकर व्यंग्य और फुटकर समीक्षा से छुट्टी ले कर व्यंग्यात्मक उपन्यास लिखिए। श्रीलाल शुक्ल के साथ का लाभ कमाइए। नागर जी को याद कीजिए। लखनऊ के पानी का कुछ ऋण उतारिए। या फिर आलोचना पर कुछ गंभीर कीजिए। अपने अध्ययन और अपनी मेधा का , अपनी भाषा का कुछ तो सदुपयोग कीजिए। पर वह सुन कर हां-हां ज़रूर ! कह कर खिसक लेते। पता नहीं उन्हें क्या हड़बड़ी थी, क्या योजना थी।

पंडित अमृतलाल नागर मुझ से अक्सर कहते रहते थे , रचा ही बचा रह जाएगा। संयोग से सुशील सिद्धार्थ भी इतना रच गए हैं कि हमारे बीच सर्वदा बचे रहेंगे। मेधा तो सुशील सिद्धार्थ की यह थी कि किसी विषय पर दो-तीन घंटे में भी बढ़िया लेख लिख कर वह दे देते थे। अचानक कहीं कुछ बोलना हो , आप सुशील से कहिए वह फौरन तैयार। मान लीजिए पीपल पर सेमिनार हो रहा है। वक्ता कम पड़ गए हों। सुशील सिद्धार्थ  उधर से गुज़र भर रहे हों और आप उन्हें रोक कर निवेदन कर लें कि पीपल पर बोलना है। वह फौरन हां कर देंगे। और यह देखिए सब से बढ़िया बोल दिए। पीपल , तुलसी , बरगद , घास-पतवार  किसी भी विषय पर वह धुआंधार बोल देंगे। घनानंद , रसखान , कबीर , अज्ञेय , मुक्तिबोध , नागार्जुन , नीरज , ज्ञानरंजन , कालिया , प्रेमचंद सब उन के पास। जिस पर चाहिए , उस पर। किसी बिलकुल नए लेखक या कवि की कोई किताब हो बिना पढ़े , वहीँ उलट-पुलट कर देख कर ही वह धाराप्रवाह बोलने की महारत रखते थे। इसी लिए पुस्तक मेलों में लोग उन्हें खोजते। और वह सर्वसुलभ। अपनी पूरी भाषा-भंगिमा के साथ। संस्कृत , अवधी , हिंदी की अगरबत्ती सुलगा कर वह पूरी सभा को सुगंधित करने का हुनर जानते थे। कालिदास और केदार के बिंब बखान कर वह निराला , पंत , प्रसाद , महादेवी की गंगा में नहला कर तुलसी , कबीर और खुसरो की सरलता से भी भिगो सकते थे। सेमिनारों का संचालन ऐसा कि कई बार विशेषज्ञ वक्ताओं पर भी भारी पड़ जाते। असल में आप को एक साथ खुश और घायल कर देने वाले सुशील सिद्धार्थ ने अगर अपनी प्रतिभा का , अपने अध्ययन का , अपनी भाषा का ठीक से प्रबंधन किया होता , सदुपयोग किया होता तो वह हमारी पीढ़ी के , हमारे समय के बड़े आलोचक और बड़े रचनाकार के रुप में आज उपस्थित होते। यह सब ज़रुर होता बशर्ते उन के पास एक स्थाई और सम्मानजनक नौकरी होती। तब हो सकता था कि मालिश महापुराण उन का व्यंग्य संग्रह न हो कर कालजयी उपन्यास के रूप में उपस्थित रहता। क्या पता तब ज्ञान चतुर्वेदी सुशील सिद्धार्थ के कसीदे लिख रहे होते। तेजेंद्र शर्मा लंदन बुला कर सुशील सिद्धार्थ को इंदु शर्मा पुरस्कार दे रहे होते। विवेक मिश्र उन की किताब छाप रहे होते। काश कि ऐसा हुआ होता। सुशील सिद्धार्थ की भाषा में क्या तो चमक थी। क्या तो धार , गठन और गंध थी। तलवार क्या चलती होगी युद्ध में जो तुर्शी सुशील भाषा में बोते थे। भाषा में वह टटकापन , वह गमक और वह चटकार आसान नहीं है जैसी सुशील सिद्धार्थ के पास है। उन की भाषा में जो सहजता का स्पेस है वह दुर्लभ है। अब अलग बात है और कि तात्कालिकतावश ही सही अब वह व्यंग्य के व्यक्ति मान लिए गए हैं। आलोचना या अन्य विधाओं के लोग भले सुशील सिद्धार्थ को औपचारिक श्रद्धांजलि दे कर सो गए लेकिन देश भर के व्यंग्यकारों ने ही सुशील सिद्धार्थ के लिए आंसू बहाए।  लखनऊ में किसी और ने नहीं , व्यंग्य लेखक संघ [ वलेस ] ने ही सुशील सिद्धार्थ के लिए श्रद्धांजलि सभा आदि आयोजित की। उन के निधन की खबर को खोने नहीं दिया।

हालां कि सुशील सिद्धार्थ ने अब के दिनों में उगते सूरज को बाक़ायदा प्रणाम करना सीख लिया था। लेकिन अब इस सीखने में देर बहुत हो गई थी। शायद इसी लिए अब उगते क्या डूबते सूरज को भी प्रणाम करना उन की आदत में शुमार हो गया था। सो सुशील सिद्धार्थ के दोस्त बहुत थे अब। इन्हीं दोस्तों में उन के ढेर सारे दुश्मन भी थे। जिन में कुछ की तो शिनाख्त थी उन के पास। लेकिन अपने ज़्यादातर दुश्मनों को वह नहीं ही पहचानते थे। घात पर घात खाते रहते थे। उन के गुरु लोग तो गुरु लोग , कुछ शिष्यजन भी उन पर पीठ पीछे आक्रमण से नहीं चूकते थे। उन की कुछ नायिकाएं भी समय देख कर उन के लिए जहर उगलती मिलती थीं। वह नायिकाएं भी जिन को सुशील सिद्धार्थ ने धो-पोंछ कर बड़े परिश्रम से लेखकों की पांत में बिठाया था। इन आक्रमण और घात-प्रतिघात ने सुशील को कुंठित ही नहीं , अब खासा बेधड़क भी बना दिया था। तो कई बार रसरंजन के समय बातचीत में वह कुतुबमीनार उलट कर खड़ी कर देते थे। अपना सारा गर्दो-गुबार चटक गालियों में बेधड़क उतार कर फेंक देते थे। गालियों का उन का गायन और वाचन भी बहुत दिलचस्प होता। लोग उसे सुनने के लिए कान लगाए खड़े हो जाते। बड़ी-बड़ी मूर्तियां खंडित हो जातीं उन की गालियों में। बड़ी-बड़ी देवियां दस्तूरन उन की गालियों में समा जातीं। उन देवियों के करतब ही ऐसे होते। चाहे लखनऊ की हों , चाहे दिल्ली या कहीं और की। किसी के लिए माफ़ी नहीं होती थी। न किसी को अनुपस्थित होने की अनुमति । संस्कृत के श्लोकों में गालियों का छंदबद्ध वाचन जब वह करते ऐसे लोगों के बाबत तो उन की पीड़ा छलक पड़ती। उन की इस पीड़ा परायण को छोड़ दें तो सामान्य स्थितियों में वह बातचीत में बहुत संजीदा थे।

नब्बे के दशक के आख़िर की बात है। वागर्थ में मेरी एक कहानी बड़की दी का यक्ष प्रश्न पढ़ कर पहली बार वह मुझ से मिलने आए थे। मेरे पांव छू कर बोले , आप का अनुज हूं। आप से छ महीने छोटा। कहानी के साथ परिचय भी छपा था। तब से वह मेरी कहानियां पढ़-पढ़ कर बात करते। कई समीक्षाएं लिखीं।  पर बड़े भाई , बड़े भाई कहते-कहते कब आहिस्ता से हमारी ज़िंदगी में भी उतर आए पता ही नहीं चला। बाद के दिनों में उन की विद्वता और विनम्रता से प्रभावित हो कर मैं सुशील सिद्धार्थ का प्रशंसक बन गया।  आज भी हूं , रहूंगा। उन की नायिकाओं को ले कर उन से ठिठोली भी कर लेता। अकसर मेरी बात सुशील सिद्धार्थ टालते नहीं थे , कभी कोई अड़चन आ जाती तो वह सकारण बता कर हाथ जोड़ लेते। यह भी जोड़ देते कि लेकिन फला से इस का ज़िक्र न हो तो बेहतर। मैं ने उन की इस रेखा को कभी लांघा नहीं। मित्रता का तकाज़ा भी यही था। बस झुक कर नौकरी करने और लखनऊ आने की बात को वह ज़रुर टालते गए। बिना कारण। झुक कर नौकरी किए होते या समय से लखनऊ लौट आए होते तो शायद वह अभी हमारे साथ होते। बड़े ठाट से बड़े भाई कहते हुए , इन की , उन की ठिठोली फोड़ते हुए। पर शायद समय और सुशील सिद्धार्थ को यह मंज़ूर नहीं था। प्रवासी लौटा तो पर तब जब सुशील सिद्धार्थ नाम का यह मेरा छोटा भाई देह छोड़ चुका था। हम सब को छोड़ कर हंस अकेला उड़ गया था । मैं अकेला गाता ही रह गया , दे रहे गीत नयन सौगंध तुम को, हम अकेले हैं प्रवासी लौट आओ ! अपने स्वभावगत स्वाभिमान में प्रवासी अंतत: मुझे भी गच्चा दे गया। स्मृतियों में समा गया। वीरेंद्र मिश्र के गीत में जो कहूं तो भीतर घुट-घुट रहना / बाहर खिल-खिल करना ! की विवश यात्रा सुशील सिद्धार्थ की समाप्त हो गई।




Wednesday, 7 March 2018

उत्तर प्रदेश के कुख्यात एन.आर.एच.एम. घोटाले की चपेट में आए लोगों के जेल जाने की कहानी

अनूप शुक्ल 


समाज ने अपने संचालन के लिये कानून की व्यवस्था की है। उन के अनुसार काम न करना अपराध की श्रेणी में आता है। अपराध करने पर अपराधी के दण्ड की व्यवस्था है। कुछ में जुर्माना कुछ में जेल। जेलों की वयवस्था के पीछे उद्धेश्य व्यक्ति को सुधारना रहा होगा। लेकिन आम तौर पर देखा गया है कि जेल जा कर व्यक्ति और बड़ा अपराधी बन जाता है। साथ ही जेल से बचने के गुर भी सीख आता है।

एक औरत की जेल डायरी -प्रख्यात लेखक दयानन्द पांडेय की नई कृति है। पांडेय जी अनेक किताबों के रचनाकार हैं। जबरदस्त किस्सागोई के हुनर के साथ उन्होंने बांसगांव की मुनमुन, वे जो हारे हुए , हारमोनियम के हज़ार टुकड़े, लोक कवि अब गाते नहीं, दरकते दरवाजे, जाने अनजाने पुल जैसे उपन्यास और कई कहानी संग्रह, गजल संग्रह, संस्मरण, साक्षात्कार, अनुवाद , संपादन के जरिये तीस से ऊपर किताबें लिखी हैं। एक औरत की जेल डायरी इस मामले में खास है कि इस में वे बकौल उन के ही इस को पेश करने का माध्यम हैं। किताब की भूमिका में पांडेय जी लिखते हैं:

विश्वनाथ प्रताप सिंह की एक कविता का शीर्षक है लिफ़ाफ़ा:

पैगाम तुम्हारा
और पता उन का
दोनों के बीच 
फ़ाड़ा मैं ही जाउंगा।

तो डायरी की नायिका लिफ़ाफ़ा बनने को अभिशप्त हो गई । एक निरपराध औरत की जेल डायरी की नायिका का सब से त्रासद पक्ष यह है कि इस लिफ़ाफ़ा का डाकिया हूं। डायरी मेरी नहीं है। बस मैं परोस रहा हूं। जैसे कोई डाकिया चिट्ठी बांचता है, ठीक वैसे ही मैं यह डायरी बांट रहा हूं। एक अनाम और निरपराध औरत की जेल डायरी परोसते हुए उस औरत की यातना, दुख और संत्रास से गुजर रहा हूं। उस के छोटे-छोटे सुख भी हैं भी हैं इस डायरी की सांस में। सांस-सांस में। पति और दो बच्चों की याद में डूबी इस औरत और इस औरत के साथ जेल के सहयात्री स्त्रियों की गाथा को बांचना सिर्फ़ उन के बड़े-बड़े और छोटे-छोटे सुख को बांचना ही नहीं है। एक निर्मम समय को भी बांचना है। सिस्टम की सनक और उसकी सांकल को खटखटाते हुये प्रारब्ध को बांचना है।“

’एक औरत की जेल डायरी’ उत्तर प्रदेश के कुख्यात एन.आर.एच.एम. घोटाले की चपेट में आए लोगों में से एक के जेल जाने की कहानी है। इस घोटाले के सूत्रधार कभी आई.ए.एस. के टापर रहे अधिकारी थे। मंत्री की शह पर उन्होंने यह घोटाला अंजाम किया। बाद में घोटाला खुलने पर वे भी जेल गए , मंत्री साथ में और तमाम अनगिनत ऐसे लोग भी जिन को शायद पता ही नहीं था कि वे भी अनजाने इस घोटाले में शामिल हैं। आई.ए.एस. टापर ने घोटाले में भी टॉप किया। उन के बारे में बताते हुए महिला लिखती हैं:

“सोचिए तीन-तीन विभागों के कैबिनेट मंत्री तीन थे पर इन सब का प्रमुख सचिव एक ही जो यही थे। सारे घोटाले के जनक यही। बीबी भी आई.ए.एस.। पूरा परिवार आई.ए.एस. लेकिन पैसे की हवस नहीं गई। तब के प्रधानमंत्री कार्यालय में इन के एक रिश्तेदार आई.ए.एस. तैनात थे। मतलब कि पीएमओ का भी जोर था। लेकिन फ़िर भी बच नहीं सके।

जो भी हो जब कभी कचहरी में व्हील चेयर पर उन्हें बैठे देखती हूं तो बहुत तरस आता है। कभी यह गाजियाबाद के जिलाधिकारी हुआ करते थे। बतौर जिलाधिकारी इस पूरी कोर्ट का शिलान्यास इन के ही हाथों हुआ है। जिस कोर्ट का शिलान्यास हुआ उसी में कोर्ट में मुजरिम। और तो और जिस डासना जेल में बार-बार आते जाते रहते हैं बतौर कैदी उस डासना जेल का शिलान्यास भी बतौर डी.एम. यही जनाब कर गए थे। वहां भी इन जनाब का नाम पत्थर पर लिखा हुआ है। जहां यह बतौर कैदी दिन गुजारते हैं। समय क्या-क्या न करवा दे।“

डायरी में जेल जीवन से जुड़ी अनेक घटनाओं के विवरण हैं। जेल जीवन कैसा है। लोग वहां कैसे रहते हैं। सुविधायें , असुविधायें कैसी हैं। तमाम बंदिशें हैं लेकिन उन में भी कैसे लोग खुश रहने का उपाय खोजते हैं। कैसे निरपराध लोग जेल आते हैं। कोई छूट जाता है , कोई बना रहता है। जेल में आरुषी हत्याकांड में बंदी तलवार दम्पति हैं तो घोटाले में पकड़े गए विधायक और तमाम लोगों की भरमार भी। जेल में आई महिला बच्चे को जन्म भी देती है। प्रेम पत्र भी इधर-उधर होते हैं। शादी की सालगिरह में महिला के लिए कपड़े भी सिलती हैं जेल की साथी और चाकलेट भी खिलाती हैं। सुविधाओं की लड़ाई और असुविधाओं में जीने की कहानी है यह डायरी। अपने घर से अलग जेल में रहते हुए जीवन की वास्तविकताओं के एहसास को दर्ज करने की कहानी है यह जेल डायरी।

जेल डायरियां तो बड़े-बड़े, प्रसिद्ध हो गए लोगों ने भी लिखी हैं। लेकिन यह डायरी इस मामले में खास है कि इस में एक आम इंसान की नजर से घटनाओं को दर्ज करने की कोशिश है। जेल डायरी में कोई बनावट नहीं है। ’जैसा दिखा वैसा लिखा’ वाले अंदाज में रोजमर्रा की घटनाओं को दर्ज किया गया है इस में। यही इस की खासियत है।

जेल डायरी के अनुभव लिखने वाली महिला और उसको डाकिये के रूप में सामने लाने वाले दयानंद पांडेय दोनों ही इस मामले में बधाई के पात्र हैं कि उन्हों ने एक आम इंसान की नजर से जेल जीवन की तस्वीर पेश की।

किताब दुनिया भर की महिला कैदियों को इस आशा के समर्पित की गई है कि उन का जीवन सुंदर हो। इस कामना के दायरे में डायरी लिखने वाली महिला लेखिका भी आती हैं। कामना करता हूं कि उनकी आशा फ़लीभूत हो। 

जेल डायरी के कुछ अंश यहां पेश हैं

1. 25 सितंबर को भंडारे में आग लग गई थी। तब से खाना आदमियों की तरफ़ से आ रहा है। लेकिन साथ ही यह एहसास भी हो रहा है कि जिन्दा रहने के लिये बहुत कम जरूरते हैं।

2. जिंदगी की जरूरतें बहुत थोड़ी हैं। आधा लीटर दूध लेती हूं। कल चूल्हा बना कर उस में बोरा जला कर दूध गरम किया और चाय बनाई। कहां बिना गैस के काम नहीं चलता और कहां पुराना कपड़ा , बोरा , पॉलीथीन सब जला कर चाय बनाई। यह भी जिन्दगी का एक रूप है।

3. जमीन पर सोना, बैठना , खाना इन सब की आदत नहीं रही। अब एक-एक चीज का महत्व पता चल रहा है। एक हाल में 50-60 महिलायें रहती हैं। 10-12 ट्यूब लाइट परमानेंट जलती ही रहती हैं। कई रात से रोशनी से नींद नहीं आती थी। दो दिन से आंख में दुपट्टा रख कर सोते हैं।

4. आज हमारे बैरक के बाथरूम में कुछ लीकेज है तो पानी बंद कर दिया गया है। हम लोग 6.30 बजे शाम से अन्दर बंद कर दिये गये हैं और अब सुबह 6 बजे ही ताला खुलेगा तभी नीचे बाथरूम जा सकता है इंसान। सोचो ये होती है बेबसी। इंसान की कोई इज्जत नहीं, कीमत ही नहीं।

5. जेल रेलवे क्रासिंग के बाद है और ये क्रासिंग लखनऊ वाली है। जब भी ट्रेन की आवाज आती है मन करता है दौड़ कर इस पर चढ जायें और लखनऊ पहुंच जायें।

6. बुलबुल बेटा आज सुबह से तुम्हारी शक्ल आंख के सामने से हट ही नहीं रही है। ऐसा लग रहा है तुम बहुत उदास हो। तुम्हारे साथ तो नाइंसाफ़ी हो ही रही है। बेटा माफ़ कर देना हमें, अपनी जिम्मेदारी हम निभा नहीं पा रहे, तुम्हें अकेला छोड़ दिया है।

7. अब तुम्हारी नौकरी तुम्हारे लिए बहुत जरूरी है। मां बाप के जेल यात्रा होने का कलंक तो साथ लग ही गया है अब इसे कंपनसेट तो तुम्हें अपनी नौकरी से ही करना है।

8. यहां पर एक बात और समझ में आई कि जेल को आराम से ही काटा जा सकता है। अगर सारी एनर्जी इसी में लगा दो कि कैसे निकलेंगे तो तबियत और खराब होगी और होगा कुछ नहीं। इसलिए जिंदगी जीने के लिये जो न्यूनतम आवश्यकतायें हैं उन को पूरा करते हुये सब्र के साथ समय काटना चाहिए ।

9. आज मम्मी बहुत याद आ रही हैं। सोचो कितना दर्द होगा कि मम्मी याद आ गईं।

10. आजकल लिखने का भी मन नहीं करता। कितने निगेटिव हो गए हैं आजकल हम। हर समय शिकायत , शिकायत। लेकिन क्या करें पाजिटिव कुछ है ही नहीं।

11. जेल में रह कर इतना इंडिफ़रेंट हो गए हैं कि अब कहीं भी कैसे भी रह सकते हैं। कहीं भी एडजस्ट हो सकते हैं। अब तो लोगों की बातें भी बुरी नहीं लगती। कोई कुछ भी कहता रहे।

12. हे हे हे मेरी बेल हो गयी। विश्वास ही नहीं हो रहा। विधायक जी ने सुनाली से खबर भिजवाई है। डिटेल तो पापा से शनिवार को मिलेगी। बस इतनी न्यूज मिली। सुनते ही रोना आया।

13. जिंदगी में हार या बुरा वक्त भी उतना ही जरूरी होता है जितना जीत या अच्छा वक्त। ये आप को आसमान से जमीन पर लाता है। बताता है कि हर समय जीतते ही रहोगे। ऐसा नहीं है।

14. यहां पर वर्चस्व की भी लड़ाई चलती रहती है कि मैं ही बॉस हूं। मैं तो चुप ही रहती हूं। सोचो मेरे स्वभाव के विपरीत है बिल्कुल ये। लेकिन अपने मन को इस तरह से समझाते हैं कि नहीं ये तुम्हारा क्षेत्र नहीं है।

15. जेल यात्रा ने हमें चालाक भी बना दिया है। किस से कैसा व्यवहार करना है ये भी सीख ही रहे हैं।

16. आज शाम को जब सुंदर कांड पढते-पढते रोने लगे तो पुरानी लड़कियों ने समझाया आंटी आप तो 11 महीने बाहर रह आईं। हम तो निकल भी न पाए। तब लगा वाकई हम तो भाग्यशाली हैं कि कुछ दिन तो बाहर रह आए । लेकिन ये बच्चियां तो बाहर दो साल से गईं ही नहीं।

17. बैरक में रहना बिल्कुल ऐसे लगता है जैसे आप प्लेटफ़ार्म पर बैठ कर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं कि कब ट्रेन आएगी ।

18. डेढ हाथ की जगह मिलती है जिस पर अपना बिस्तर बिछाना होता है। इसे फ़ट्टा कहते हैं। जेल की तरफ़ से एक कंबल बिछाने को और एक कंबल ओढने को मिलता है। और इसी की सीध में सीखचों के सामने अपना सामान रखना होता है। बस इतनी ही जगह आप को मिलती है। और इसी को बनाए रखने का संघर्ष भी रोज का है। अगला आप की तरफ़ अपना सामान बढ़ाता ही जाता है कब्जा करने के लिए ।

19. 45 लोगों के लिए एक वाशरूम है। दिन में तो कोई बात नहीं, बैरक खुला रहता है आप बाहर के वाशरूम में भी जा सकते हैं। लेकिन बैरक बंद होने के बाद उसी एक वाशरूम का सहारा होता है।

20. दहेज हत्या अधिनियम का कितना दुरुपयोग हो रहा है ये जेल आ कर ही पता चला। लड़की वाले अपनी लड़की की मौत को भुनाते हैं और उस पर राजनीति करते हैं, अपना ईगो संतुष्ट करते हैं। इधर लड़की मरी नहीं , उधर लड़के का पूरा परिवार जेल के अंदर चाहे वो बुजुर्ग पिता हों या कम उम्र ननद।

21. इतनी राजनीति तो संसद में भी नहीं होती होगी जितनी जेल में है। और अपनी पढाई-लिखाई समझदारी सब यहां बेकार हैं। कदम-कदम पर राजनीति। एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश। चुगलखोरी आदि औरतों के सारे गुण यहां मौजूद हैं।

22. आदमियों की तरफ़ तो सुनते हैं पूरा हाता ही एन.आर.एच.एम. को दे दिया है। ऊपर नीचे दोनों बैरक मिला कर पूरा हाता। मिनिस्टर साहब का स्टॉफ़ बच्चा बैरक में। दो हिस्से में बंटा हुआ है पूरा एन.आर.एच.एम.।

23. मिनिस्टर साहब भले जेल में हैं लेकिन पर उन का प्रमुख सचिव जो आई.ए.एस. है, बीमारी के बहाने सुप्रीम कोर्ट से बेल करा कर जेल से बाहर है। नौकरी कर रहा है। अपने बैच का आई.ए.एस. टॉपर है। और इस एन.आर.एच.एम. घोटाले का भी टॉपर है।

24. सोचिए तीन-तीन विभागों के कैबिनेट मंत्री तीन थे पर इन सब का प्रमुख सचिव एक ही जो यही थे। सारे घोटाले के जनक यही। बीवी भी आई.ए.एस.। पूरा परिवार आई.ए.एस. लेकिन पैसे की हवस नहीं गई। तब के प्रधानमंत्री कार्यालय में इन के एक रिश्तेदार आई.ए.एस. तैनात थे। मतलब कि पीएमओ का भी जोर था। लेकिन फ़िर भी बच नहीं सके।

25. जो भी हो जब कभी कचहरी में व्हील चेयर पर उन्हें बैठे देखती हूं तो बहुत तरस आता है। कभी यह गाजियाबाद के जिलाधिकारी हुआ करते थे। बतौर जिलाधिकारी इस पूरी कोर्ट का शिलान्यास इन के ही हाथों हुआ है। जिस कोर्ट का शिलान्यास हुआ उसी में कोर्ट में मुजरिम। और तो और जिस डासना जेल में बार-बार आते जाते रहते हैं बतौर कैदी उस डासना जेल का शिलान्यास भी बतौर डी.एम. यही जनाब कर गए थे। वहां भी इन जनाब का नाम पत्थर पर लिखा हुआ है। जहां यह बतौर कैदी दिन गुजारते हैं। समय क्या-क्या न करवा दे।

26. जेल में कपड़ा सुखाने को रस्सी नहीं मिलती। पुराने दुपट्टे फ़ाड़ कर जोड़-तोड़ कर रस्सी बनाई जाती है और कपड़े सुखाए जाते हैं।

27. जिंदगी में जब जेल कचहरी आदि परेशानियां आती हैं तो मौत का भय खत्म हो जाता है। ज़िंदगी जब पल- पल भारी होने लगे। रोज के संघर्ष खत्म ही न हों तो मौत आसान लगने लगती है।

28. जेल में पर्ची कटती है। मतलब जब कोई नया कैदी आता है तो उसे जेल का काम करना पड़ता है, हर तरह का। जो नहीं करना चाहता उसे पर्ची कटवानी होती है। पुरुषों की ग्यारह हजार की पर्ची कटती है। महिलाओं में बारह सौ की। जो महिलायें पर्चा नहीं कटवातीं उन्हें झाड़ू , पोंछा, बरतन धोने आदि का काम करना पड़ता है। रोटी भी बनानी पड़ती है। इस बार देख रहे हैं पुलिस वाली पीछे ही पड़ जाती है कि पर्चा कटवाओ क्यों कि इस का हिस्सा सभी पुलिसवालियों में बंट जाता है।

29. जेल में ’सब सुनों और मुंह मत खोलो’ का सिद्धांत चलता है। अगर आप ने बिना सोचे समझे मुंह खोल दिया तो आप की फ़जीहत तय है।

30. आज तीनों बैरकों की तलाशी हुई। एक-एक सामान झाड़-झाड़ कर देखा गया। एक महिला के पास मोबाइल भी मिला जो उस ने अपने झोले के अंदर कपड़े के नीचे सिल रख था। झोला झाड़ने पर जमीन पर टन्न से बोला। पूरी बैरक में हल्ला मच गया। पुलिस वालियां तो घबड़ा गईं। तुरंत बात को दबाने लगीं कि बात ज्यादा फ़ैली तो उन्हीं पर कार्यवाही होगी।

31. यहां भी लोग कमाई के धंधे ढूंढ लेते हैं। हम जैसे कुछ लोग हैं जो लाइन में लग कर खाना नहीं लेते, बर्तन नहीं मांजते, उन लोगों के ऐसी कई औरतें मिल जाती हैं, जो आप का खाना ला देती हैं बर्तन साफ़ कर देती हैं। आप का बिस्तर झाड़ देती हैं। कपड़े धो कर, सुखा कर तहा कर रखती हैं। इस काम के एक हजार रुपए महीने लेती हैं तो उन का खर्च आराम से चल जाता है।

32. आज सभी लोग 50-50 रुपए इकट्ठा कर रहे हैं। कल त्योहार पर अच्छा खाना बनाया जाएगा । जेलर साहब को सब ने घेर लिया कि पनीर मंगा दीजिए । बेचारे बड़े परेशान कि अब आखिरी समय पर कहां से व्यवस्था करूं।

33. आज मेरी शादी की सालगिरह है। शादी को 26 साल हो गए । क्या 26 साल पहले शादी करते समय सोचा था कि कोई सालगिरह जेल में भी पड़ेगी? इस बार तो लग रहा सब कुछ यहीं जेल में पड़ेगा। लेकिन ये भी जेल का रुख है कि सुबह जगने पर गिनती करने आई ड्यूटी वाली ने ही सब से पहले बधाई दी। फ़िर औरों ने भी दी। ड्यूटी वाली से कुर्ती का कपड़ा मंगवा कर मोहिनी ने खुद सिल कर मुझे दिया कि ये पहनना है। ड्यूटी वाली नीता ने एक डियो और चाकलेट दी।

34. कल सकीना को लड़का हुआ। आज वो अस्पताल से भी आ गई। बिल्कुल नार्मल डिलीवरी हुई। सकीना बलात्कार के केस में आई है। उस की ननद ने आरोप लगाया था कि अपने ब्वायफ़्रेंड के साथ मिल कर भाभी ने मेरा रेप कराने की कोशिश की। इस चक्कर में सकीना और उस का दोस्त दोनों ही अंदर आ गए । लगता था कि शायद पहले जमानत हो जाएगी । लेकिन नहीं बच्चा यहीं हो गया उस का। कोई नहीं बैरक को एक रौनक मिली।

35. आज जेलर ने सकीना के लिए जेल की तरफ़ से सारे मेवे भेजे जिस के लडडू बनाए गए कि उस को कुछ तो ताकत मिले।

36. समय बीतता है और खर्च हम होते हैं। अत: हर क्षण का उपयोग करें। बात सही है धीमे-धीमे समय तो बीत ही रहा है अच्छा या बुरा। लेकिन अगर इसी में जूझे रहे तो हम वो तो नहीं रहे जो पहले थे। समय के चक्कर में जूझ कर हम ने अपने को भी गंवा दिया।

37. आज चार औरतें आईं। बेटी, मां, मौसी और नानी। इन लोगों ने दामाद को दहेज के केस में फ़ंसा कर अंदर करवा दिया। दामाद जब जेल से निकला तो उसने बीवी को घर से निकाल दिया। इन लोगों ने बड़ा धरना-प्रदर्शन किया। इसी चक्कर में मार-पीट हुई और दामाद ने एफ़.आई.आर. कर इन चारो को जेल भेजवा दिया।

38. इंसान छोटी-छोटी बातों में खुशियां ढूंढ लेता है। यहां कोई महिला बंदी अगर पार्लर का काम जानती है तो सारी महिलायें उस के पीछे पड़ जाती हैं।

39. जेल में रह कर मेरा गाना खूब निखर गया है। हमें तो लगता था कि बस काम चलाऊ है। लेकिन यहां तो सब फ़रमाइश कर-कर के गाना सुनते रहते हैं।

40. यहां पर एक कैदी है अब्दुल, आजीवन कारावास में है वो। उसे मेडिकल की थोड़ी बहुत जानकारी थी बाकी यहां रह कर उस ने धीमे-धीमे सीख लिया है और कंपाउंडर बन गया। अब तो खैर वो डाक्टर से भी बड़ा हो गया है। महिला बैरक का अस्पताल वही संभालता है।

41. कोर्ट कहता है कि जेल में आप का आचरण सुधारा जाता है। यहां आने पर पता चला कि उसे और बढ़ावा मिलता है।


समीक्ष्य पुस्तक :

नाम: एक औरत की जेल डायरी
लेखक: दयानंद पांडेय 
प्रकाशक : जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36 गली नं 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
पेज -151 , हार्डबाउंड 
मूल्य- 400.00










यह किताब पढ़ने के लिए इस लिंक को पढ़ें :
1 . एक औरत की जेल डायरी 


Thursday, 1 March 2018

शिष्या हो तो मालिनी अवस्थी जैसी


प्रणामी सुन कर अभी लौटा हूं । मन चकाचक है । एक अरसे बाद ऐसी गमकती और खनकती शाम से मुलाक़ात हुई । मालिनी अवस्थी के गरिमामय गायन ने आज की शाम को रंग और उमंग से भर दिया । गिरिजा देवी की याद में सोनचिरैया द्वारा संत गाडगे प्रेक्षागृह में आयोजित प्रणामी में मालिनी को आज सुन कर कहने को दिल करता है कि शिष्या हो तो मालिनी अवस्थी जैसी हो । ऐसा शिष्य भाव मैं ने हिंदी साहित्य में भी एक नामवर सिंह में देखा है । नामवर सिंह भी अपने गुरु आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को जितना मान देते हैं और जिस तरह अपने गुरु के लिए बिछ-बिछ जाते हैं वैसे ही आज मैं ने मालिनी अवस्थी को देखा । मालिनी ने अपनी गायकी से न सिर्फ़ गिरिजा देवी को प्रणामी भेंट की बल्कि कई बार लगा कि गिरिजा देवी की आत्मा उन में प्रवेश कर गई है। वही ठसक , वही मटक , वही शोखी , वही अल्हणपन , वही चपलता और वही अंदाज़ । वही खटका , वही मुरकी , वही लोच , वही नखरा । और बीच गायकी में बड़ी नाजुकी से जैसे गिरिजा देवी तंबाकू खा कर चबाने लगाती थीं , ठीक वैसे ही मालिनी के सादा मसाला खाने का वही बेलौस अंदाज़ , वही  मेच्योरिटी । गिरिजा देवी को सुनने का कई बार सौभाग्य मुझे मिला है । अस्सी के दशक में लखनऊ के दिलकुशा में पंडित हनुमान मिश्र के साथ उन की युगलबंदी जैसे मन में अभी भी बसी हुई है । पंडित हनुमान मिश्र की सारंगी और गिरिजा देवी का गायन । बीच गायकी में क्या तो चुहुल और क्या तो ठिठोली फोड़ती थीं गिरिजा देवी । इतना कि हनुमान मिश्र से गिरिजा देवी ने किसी षोडशी की तरह मचल कर किंतु लजाते हुए कहा कि छोड़िए सारंगी आप भी मेरे साथ गाइए । और यह देखिए पंडित हनुमान मिश्र गिरिजा देवी के साथ गाने भी लगे , सेजिया चढ़त डर लागे ! कुमार गंधर्व , भीमसेन जोशी या किशोरी अमोनकर जैसी गंभीरता का माहौल नहीं बुनती थीं अपनी गायिकी में गिरिजा देवी । हंसती बतियाती गाती थीं । मालिनी ने भी गिरिजा देवी से यही सरलता और सहजता सीखी है । मालिनी को गिरिजा देवी के साथ तानपुरे के साथ गायकी में संगत करते भी देखा है । गिरिजा देवी के सामने स्वतंत्र गायिकी भी देखी है मालिनी की । लेकिन मालिनी पर तब गिरिजा देवी का साया था । एक संकोच था तब उन की गायिकी में । लेकिन आज मालिनी की गायिकी में जो ठाट था , जो मनुहार और मादकता थी , जो परिपक्वता और पुकार थी , जो पुलक और पहचान थी वह अविरल और दुर्लभ थी । मालिनी की गायिकी में जैसे खांटी देसी घी का स्वाद था । वही खुशबू और वही लज्जत । मालिनी मारे चाव से गिरिजा देवी को अप्पा कह कर संबोधित करती रहती हैं । आज अप्पा कहने का अर्थ भी परिभाषित कर दिया अपनी गायिकी में । ऐसी प्रणामी को प्रणाम । मालिनी की गायिकी का यह मुकाम उन्हें बहुत दूर तक ले जाएगी ।

मालिनी अवस्थी को मैं बहुत शुरू से सुनता आ रहा हूं । गोरखपुर में उन के छात्र जीवन से । तब के दिनों वह स्टेज पर अपनी बड़ी बहन मल्लिका के साथ गाती थीं । मिर्ज़ापुर , झांसी  में बचपन से ही संगीत की शिक्षा ले चुकी मालिनी ने उस्ताद शुजात हुसैन खान से आठ बरस तक शास्त्रीय संगीत सीखा । आकाशवाणी में भजन , गीत और ग़ज़ल गाए । पटियाला घराने के मशहूर ग़ज़ल गायक राहत अली तब उन के उस्ताद हुआ करते थे । वह गोरखपुर के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की एक पहचान और धड़कन सी थीं । किसी ताज़ा हवा की तरह , फूल की खुशबू की तरह । गोरखपुर से निकलीं तो लखनऊ के भातखण्डे में संगीत भी पढ़ने लगीं । संस्कृत और अंगरेजी साथ-साथ पढ़ने वाली मालिनी का तब ग़ज़लों पर खासा ध्यान था । मुझे याद है जगजीत सिंह तब मालिनी के आदर्श हुआ करते थे । वह जगजीत की लोकप्रियता का राज़ भी बताती थीं तब एक ख़ास अंदाज़ में । बताती थीं कि जगजीत की लोकप्रियता का राज़ छोटी बहर की ग़ज़लों का गाना है । लखनऊ में भी मालिनी को ग़ज़लें गाते देखा मैं ने । लेकिन उन की गायकी को वह मुकाम नहीं मिल पा रहा था , जो उन को मिलना चाहिए था । लेकिन मालिनी का मुक़द्दर उन्हें बनारस ले गया । बनारस में गिरिजा देवी का आशीर्वाद और सानिध्य मिला उन्हें । भातखण्डे की पढ़ाई साथ थी , सोने में सुहागा यह कि गिरिजा देवी की खास शिष्या बनते देर नहीं लगी । गिरिजा देवी ने शास्त्रीय गायन तो सिखाया ही मालिनी को लोक गायिकी से भी नाता जोड़ दिया । ग़ज़ल गाने वाली मालिनी को हम अचानक भोजपुरी और अवधी गाते देखने लगे । ज़ी टी वी के अंत्याक्षरी और संगीत कार्यक्रमों में मालिनी दिखने लगीं । एक टी वी कार्यक्रम जूनून में इला अरुण का साथ मिल गया मालिनी को । उस कार्यक्रम में तमाम कोशिश के वह विनर नहीं बन पाईं पर रनर अप ज़रुर बन गईं । पर उस से एक बात यह ज़रुर हो गई कि इला अरुण के प्रभाव में आ कर मालिनी परफार्मर बनने की दिशा में मुड़ गईं । धीरे-धीरे मालिनी बड़ी स्टेज परफ़ॉर्मर बन कर हमारे सामने उपस्थित हो गईं । भोजपुरी और अवधी के गीत गाती हुई । लोकप्रियता की तमाम सीढ़ियां चढ़ती हुई सफलता की डगर पर सरपट दौड़ती हुई । टी वी चैनलों पर फगुआ गाती , किसिम किसिम के परफॉर्म करती हुई । मुझे डर लगने लगा कि एक अच्छी खासी गायिका का अब क्या होगा । मित्रों से चर्चा करते हुए तकलीफ से भर कर कहता स्टेज परफ़ॉर्मर बन कर अपने को नष्ट करती हुई मालिनी अवस्थी का क्या करें , कैसे समझाएं उन्हें । कोई पांच-छ बरस पहले एक लेख में संकेतों में यही बात लिखी तो मालिनी हल्का सा बुरा मान गईं । 


लेकिन मालिनी को आज सुन कर लगा कि अरे तमाम स्टेज शो और चैनलों की सक्रियता के बावजूद मालिनी ने न सिर्फ अपने को बचा कर रखा है बल्कि बहुत समृद्ध भी किया है । मेरी वह चिंता धूल-धूसरित हो गई । मालिनी की गायिकी ने आज बहुत आश्वस्त किया । इस लिए भी कि जो शास्त्रीय संगीत बचा सकता है , वही लोक धरोहरों को भी सजा संवर कर संजो सकता है । मालिनी ने अपनी शास्त्रीय गायिकी को इतना चमका कर रखा है कि आज मैं अभिभूत हो गया । यह चमक , यह निखार बिना रियाज और बिना साधना के किसी सूरत संभव नहीं । फिर जिस तरह गिरिजा देवी जैसी बड़ी गायिका की गायकी को उसी लोच और उसी खनक के साथ , पूरी विनम्रता के साथ पेश करना कठिन काम था । कोई दो घंटे लगातार मालिनी आज गाती रहीं , बिना किसी ब्रेक के । मालिनी की गायिकी की फुहार में भीगते रहना आज बरसों याद रहेगा । सुधी संगीत समीक्षक यतींद्र मिश्र ने गिरिजा देवी की गायिकी की विस्तार से चर्चा करते हुए उसे मालिनी की गायिकी से जोड़ कर इतनी संजीदगी से पीठिका तैयार कर दी थी कि मालिनी के लिए एक चुनौती थी । लेकिन मालिनी की गायिकी की गमक ने इस चुनौती को बड़ी शालीनता से लांघ लिया । 

यतींद्र मिश्र 
महादेव की बंदिश शंकर शिव महादेव महेश्वर से मालिनी ने मन मोह लिया । फिर देखे बिना नहीं चैन में जो तान छेड़ी वह भीज जाऊं पिया बचाव लेव की गायिकी में गमक गई । आरोह अवरोह और उन की नाजुक अदायगी ने जैसे मालिनी की गायिकी को दिलकशी की उस नदी में बहा दिया जहां बचना नहीं डूबना ही लाजिमी था । फिर तो कैसी धूम मचाई में मालिनी की धूम मच गई । पता लग रहा था कि गिरिजा देवी ने कितनी मेहनत से अपनी शिष्या को तैयार किया है । फिर एक टप्पा गाने के बाद मालिनी होली पर आ गईं । रंग डारूंगी नंद के लालन पर की गायकी में मालिनी के क्या तो ठाट थे । मालिनी ने दो चइता भी सुनाए बिलकुल गिरिजा देवी के ही रंग और रस में , रात हम देखलीं सपनवा हो रामा पिया घर अइलैं में मालिनी की गायिकी का मधु ऐसे बह रहा था , गोया मधु की नदी हो । गया शैली के चइता बैरन रे कोयलिया तोरी बोली न सोहाय ,  में जो झूमी मालिनी वह तो अदभुत था । वह गा रही थीं , कौन देस तू जइबा बटोहिया मोरा संदेसा ले जावे और लोग आनंदित हो कर झूम रहे थे । वह जोड़ रही थीं आहिस्ता से , मदन रस जगाए तोरी बोली न सोहाय ! और लोग डुबकी मार रहे थे , फागुन में । उड़त अबीर गुलाल लाली छाई है जैसी फरमाईशी चीज़ें भी वह सुना रही हैं । जैसे गुहरा रही हैं अपनी गायिकी में चलो गुइयां आज खेलें होरी । उसी अल्हड़ता और चपलता के साथ जैसे गिरिजा देवी गाती थीं झूम-झूम कर । और यह देखिए मालिनी होरी खेलें रघुवीरा पूरे बनारसीपन के साथ गा रही हैं और श्रोताओं में से लोग साथ दे रहे हैं । साथ देने वालों में भी कौन ? एक से एक गायिकाएं । आकाशवाणी गोरखपुर में जब मालिनी नई-नई गाने गई थीं , गाना सीख ही रही थीं , तब वहां पद्मा गिडवानी वरिष्ठ गायिका हुआ करती थीं , केवल कुमार के साथ गाती थीं , पद्मा जी । वही पद्मा गिडवानी आज मालिनी की गायिकी में श्रोताओं में से साथ दे रही थीं , बिलकुल निश्छल भाव से , यह मैं देख रहा था । मैं यह भी देख रहा था कि कमला श्रीवास्तव जो कभी भातखण्डे में पढ़ाती थीं जिन के साथ मालिनी अवस्थी को मैं ने तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकट रमन के एक कार्यक्रम में सरस्वती वंदना गाते देखा है , वही कमला श्रीवास्तव आज मालिनी के लिए तालियां बजा रही थीं और मालिनी के सुर में सुर लगा रही थीं दर्शक दीर्घा से , सामने बैठ कर । यह सब देखना मेरे लिए अविस्मरणीय सुख था । 


कार्यक्रम के बाद मैं और मालिनी अवस्थी 
तो क्या गिरिजा देवी भी अपनी इस शिष्या के लिए जहां कहीं भी होंगी वहां से तालियां बजा रही होंगी , सुर में सुर मिला रही होंगी । निश्चित ही ।

बहरहाल मालिनी आज मंच पर थीं और गा रही थीं , मियाँ नजरें नही आंदा वे , हाय रे बन्नी नोशा मेरा । मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अपनी गायिकी में होली खेलते हुए दिखाती हुई , राम पहिरें फूलन का सेहरा । वह गिरिजा देवी को बार-बार याद कर रही हैं और गा रही हैं , तुम को आने में , तुम को भुलाने में कई सावन बरस गए साजन ! कार्यक्रम में मालिनी अपनी गायिकी के शिखर पर हैं और अंतिम दौर में । राग गौरी अहीर भैरव में गा रही हैं मालिनी , दीवाना किये श्याम क्या जादू डारा । वह गा रही हैं , उन गलियन में आना और जाना / और हम से करना बहाना / क्या जादू किया ।

सच आज मालिनी अवस्थी का जादू , उन की गायिकी का जादू सिर चढ़ कर बोला । मालिनी अवस्थी आप ऐसे ही गाती रहिए । आप की गुरु गिरिजा देवी बड़ी गायिका थीं , आप उन से भी बड़ी गायिका बनिए । वह जहां भी कहीं होंगी , आप को आशीष देंगी । इस लिए भी कि अभी आप के पास बहुत समय है , स्वास्थ्य है और सुविधा भी । फिर भारतीय परंपरा में यह है कि परमहंस विवेकानंद बनाते रहे हैं और विवेकानंद से परमहंस को लोग जानते रहे हैं । भगवान करें कि एक दिन मालिनी अवस्थी से लोग गिरिजा देवी को जानें । गिरिजा देवी इस बात पर हम से ज़्यादा खुश होंगी । अभी तो गिरिजा देवी सरस्वती बन कर आप में वास करती हैं , आप उन की गायिकी को ही नहीं अपनी गायिकी को भी आगे बढ़ाइए । इस लिए भी कि चकाचौंध और बाज़ार के दबाव में साफ-सुथरी गायिकी अब दांव पर है । गिरिजा देवी की वारिस तो आप हैं , शहनाई वादक बिस्मिला खां का वारिस शहनाई में अब कोई एक नहीं है । हनुमान मिश्र के बाद सारंगी का वैसा वादक कहां है । रवि शंकर के बाद सितार और तबला में किशन महराज के बाद कौन ? तमाम कलाओं में लोग हैं तो सही पर वह गुणीजन कहां हैं ? गुलाम अली खां के बाद लोग थे पर अब ?

मंच पर मालिनी अवस्थी के साथ संगत करते हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्र ,
तबले पर पंडित राम कुमार मिश्र और सारंगी पर मुराद अली खान