Tuesday, 5 April 2016

फ़िल्मी कहानियों के आगे हिंदी में छप रही कहानियां गोबर लगती हैं

फ़ोटो : गौतम चटर्जी

नैतिकता और मौलिकता के सारे तकाजे 
सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी और थोथे विमर्श में ही शेष क्यों हैं पार्टनर ? 

आज कल हिंदी में कहानियां भले कचरा लिखी जा रही हैं लेकिन हिंदी फ़िल्मों में कहानियां बहुत अच्छी आ रही हैं । कहानी ही नहीं संवाद और पटकथा भी लाजवाब हैं। एक से बढ़ कर एक । फार्मूला फ्रेम की ज़मीन को तोड़ती हुई यह फ़िल्मी कहानियां हिंदी में इन दिनों छप रही कहानियों से कोसों आगे निकल गई हैं । सामाजिक , पारिवारिक और प्रेम के सरोकारों में सनी यह कहानियां ताज़ी हवा बन कर आई हैं । जाली एल एल बी , क्वीन , अलीगढ़ से लगायत कपूर एंड संस और की & का तक देख लीजिए । क्या टटकापन है , क्या तेवर हैं , क्या ठाट । इन फ़िल्मी कहानियों के आगे हिंदी में छप रही कहानियां गोबर लगती हैं । 

जानते हैं क्यों ? 

क्यों कि हिंदी में इन दिनों थोक के भाव छप रही कहानियां ज़मीन से कटी कहानियां हैं । भाई बहन लोग ख़ुद ही लिख रहे हैं , ख़ुद ही पढ़ रहे हैं । एक दूसरे की पीठ खुजला रहे हैं । इस लिए भी कि इस समय के लगभग सारे संपादक गोबर गणेश हैं । आलोचक खऊरहा या पालतू कुकुर । और आज के कहानी लेखक इन्हीं गोबर गणेश संपादकों और खऊरहा कुकुर या पालतू कुकुर आलोचकों को प्रसन्न करने के लिए लिख रहे हैं , अपने को प्रसन्न करने के लिए नहीं , पाठकों को प्रसन्न करने के लिए नहीं । लेकिन इन गोबर गणेश और कुकुरो के लिए लिख कर जीते जी अमर हो रहे हैं । 

इन अमर हो जा रहे लोगों से कोई पूछने वाला नहीं है कि सवा अरब की आबादी में तुम्हें दो ढाई सौ या पांच सौ लोगों की आंखें ही क्यों देखती हैं ? इन देखने वालों में भी तुम्हें पढ़ते कितने हैं ? या फिर इतनी ही किताबें या पत्रिकाएं क्यों छपती हैं ? प्रकाशक से रायल्टी रूपी मज़दूरी मांगने में तुम्हारी आत्मा , क्रांति या बहादुरी क्यों मर जाती है ? पैसा दे कर भी अपनी रचनाएं क्यों छपवाते हो ? लोकार्पण भी अपने ही खर्च पर ? भाई वाह ! और इस शाही शौक के लिए भी इतना पैसा कहां से लाते हो ? कि आयोजन में भाग लेने के लिए लोगों को जहाज या ए सी क्लास का टिकट देते हो , मंहगे होटलों में ठहरा कर बड़ी कार में घुमाते भी हो । नैतिकता और मौलिकता के सारे तकाजे सिर्फ लफ़्फ़ाज़ी और थोथे विमर्श में ही शेष क्यों हैं पार्टनर ? ज़रा आंख से आंख मिला कर कभी ख़ुद से भी बात कर लिया करो पार्टनर !

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2016) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी" (चर्चा अंक-2304) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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