Tuesday, 31 January 2012

बाल श्रमिक से शब्दाचार्य तक की यात्रा

अरविंद कुमार
अरविंद कुमार
पत्रकारिता और भारतीय समाज के रीयल हीरो हैं अरविन्द कुमार : हम नींव के पत्थर हैं तराशे नहीं जाते। सचमुच अरविन्द कुमार नाम की धूम हिन्दी जगत में उस तरह नहीं है जिस तरह होनी चाहिए। लेकिन काम उन्होंने कई बड़े-बड़े किए हैं। हिन्दी जगत के लोगों को उन का कृतज्ञ होना चाहिए। दरअसल अरविन्द कुमार ने हिन्दी थिसारस की रचना कर हिन्दी को जो मान दिलाया है, विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं के समकक्ष ला कर खड़ा किया है, वह न सिर्फ़ अदभुत है बल्कि स्तुत्य भी है। कमलेश्वर उन्हें शब्दाचार्य कहते थे। 1996 में जब समान्तर कोश नाम से हिन्दी थिसारस नेशनल बुक ट्रस्ट ने प्रकाशित किया तो हिन्दी में बहुतेरे लोगों की आंखें फैल गईं। क्योंकि हिन्दी में बहुत सारे लोग थिसारस के कांसेप्ट से ही वाकिफ़ नहीं थे। और अरविन्द कुमार चर्चा में आ गए थे। इन दिनों वह फिर चर्चा में हैं। हिन्दी-अंगरेज़ी थिसारस तथा अंगरेज़ी-हिन्दी थिसारस और भारत के लिए बिलकुल अपना अंगरेज़ी थिसारस के लिए। इसे पेंग्विन ने छापा है।

उम्र के 81वें वसन्त में अरविन्द कुमार इन दिनों अपने बेटे डॉक्टर सुमीत के साथ पाण्डिचेरी में रह रहे हैं। अरविन्द कुमार को कड़ी मेहनत करते देखना हैरतअंगेज ही है। सुबह 5 बजे वह कंप्यूटर पर बैठ जाते हैं। बीच में नाश्ता, खाना और दोपहर में थोड़ी देर आराम के अलावा वह रात तक कंप्यूटर पर जमे रहते हैं। उम्र के इस मोड़ पर इतनी कड़ी मेहनत लगभग दुश्वार है। लेकिन अरविन्द कुमार पत्नी कुसुम कुमार के साथ यह काम कर रहे हैं। समान्तर कोश पर तो वह पिछले 35 सालों से लगे हुए थे।
अरविंद कुमार अपनी पत्नी के साथअरविन्द हमेशा कुछ श्रेष्ठ करने की फिराक़ में रहते हैं। एक समय टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ग्रुप से प्रकाशित फिल्म पत्रिका माधुरी के न सिर्फ़ वह संस्थापक संपादक बने, उसे श्रेष्ठ फिल्मी पत्रिका भी बनाया। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया ग्रुप से ही प्रकाशित अंगरेज़ी फिल्म पत्रिका फिल्म फेयर से कहीं ज्यादा पूछ तब माधुरी की हुआ करती थी। माया नगरी मुम्बई में तब शैलेन्द्र और गुलज़ार जैसे गीतकार, किशोर साहू जैसे अभिनेताओं से उन की दोस्ती थी और राज कपूर सरीखे निर्माता-निर्देशकों के दरवाजे़ उनके लिए हमेशा खुले रहते थे। कमलेश्वर खुद मानते थे कि उनका फि़ल्मी दुनिया से परिचय अरविन्द कुमार ने कराया और वह मशहूर पटकथा लेखक हुए। ढेरों फि़ल्में लिखीं। बहुत कम लोग जानते हैं कि अमिताभ बच्चन को फि़ल्म फ़ेयर पुरस्कार के लिए अरविन्द कुमार ने ही नामित किया था। आनन्द फि़ल्म जब रिलीज़ हुई तो अमिताभ बच्चन के लिए अरविन्द जी ने लिखा - एक नया सूर्योदय। जो सच साबित हुआ। तो ऐसी माया नगरी और ग्लैमर की ऊभ-चूभ अरविंद कुमारमें डूबे अरविन्द कुमार ने हिन्दी थिसारस तैयार करने के लिए 1978 में 14 साल की माधुरी की संपादकी की नौकरी छोड़ दी। मुम्बई छोड़ दी। चले आए दिल्ली। लेकिन जल्दी ही आर्थिक तंगी ने मजबूर किया और खुशवन्त सिंह की सलाह पर अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका रीडर्स डाइजेस्ट के हिन्दी संस्करण सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के संस्थापक संपादक हुए। जब सर्वोत्तम निकलती थी तब अंगरेज़ी के रीडर्स डाइजेस्ट से ज्यादा धूम उसकी थी।
लेकिन थिसारस के काम में फिर बाधा आ गई। अन्तत: सर्वोत्तम छोड़ दिया। अब आर्थिक तंगी की भी दिक्कत नहीं थी। डॉक्टर बेटा सुमीत अपने पांव पर खड़ा था और बेटी मीता लाल दिल्ली के इरविन कॉलेज में पढ़ाने लगी थी। अरविन्द कुमार कहते हैं कि थिसारस हमारे कंधे पर बैताल की तरह सवार था, पूरा तो इसे करना ही था। बाधाएं बहुत आईं। एक बार दिल्ली के मॉडल टॉउन में बाढ़ आई। पानी घर में घुस आया। थिसारस के लिए संग्रहित शब्दों के कार्डों को टांड़ पर रख कर बचाया गया। बाद में बेटे सुमीत ने अरविन्द कुमार के लिए न सिर्फ कंप्यूटर ख़रीदा बल्कि एक कंप्यूटर ऑपरेटर भी नौकरी पर रख दिया। डाटा इंट्री के लिए। थिसारस का काम निकल पड़ा। काम फ़ाइनल होने को ही था कि ठीक छपने के पहले कंप्यूटर की हार्ड डिस्क ख़राब हो गई। लेकिन ग़नीमत कि डाटा बेस फ्लापी में कॉपी कर लिए गए थे। मेहनत बच गई। और अब न सिर्फ़ थिसारस के रूप में समान्तर कोश बल्कि शब्द कोश और थिसारस दोनों ही के रूप में अरविन्द सहज समान्तर कोश भी हमारे सामने आ गया। हिन्दी-अंगरेज़ी थिसारस भी आ गया।
अरविंद कुमारअरविन्द न सिर्फ़ श्रेष्ठ रचते हैं बल्कि विविध भी रचते हैं। विभिन्न देवी-देवताओं के नामों वाली किताब 'शब्देश्वरी' की चर्चा अगर यहां न करें तो ग़लत होगा। गीता का सहज संस्कृत पाठ और सहज अनुवाद भी 'सहज गीता' नाम से अरविन्द कुमार ने किया और छपा। शेक्सपियर के 'जूलियस सीजर' का भारतीय काव्य रूपान्तरण 'विक्रम सैंधव' नाम से किया। जिसे इब्राहिम अल्काज़ी जैसे निर्देशक ने निर्देशित किया। गरज यह कि अरविन्द कुमार निरन्तर विविध और श्रेष्ठ रचते रहे हैं। एक समय जब उन्होंने 'सीता निष्कासन' कविता लिखी थी तो पूरे देश में आग लग गई थी। 'सरिता' पत्रिका, जिसमें यह कविता छपी थी, देश भर में जलाई गई। भारी विरोध हुआ। 'सरिता' के संपादक विश्वनाथ और अरविन्द कुमार दसियों दिन तक सरिता द़फ्तर से बाहर नहीं निकले क्योंकि दंगाई बाहर तेजाब लिए खड़े थे।
'सीता निष्कासन' को लेकर मुकदमे भी हुए और आन्दोलन भी। लेकिन अरविन्द कुमार ने अपने लिखे पर माफी नहीं मांगी। न अदालत से, न समाज से। क्योंकि उन्होंने कुछ ग़लत नहीं लिखा था। एक पुरुष अपनी पत्नी पर कितना सन्देह कर सकता है, 'सीता निष्कासन' में राम का सीता के प्रति वही सन्देह वर्णित था। तो इसमें ग़लत क्या था? फिर इसके सूत्र बाल्मिकी रामायण में पहले से मौजूद थे। अरविन्द कुमार जितना जटिल काम अपने हाथ में लेते हैं, निजी जीवन में वह उतने ही सरल, उतने ही सहज और उतने ही व्यावहारिक हैं। तो शायद इसलिए भी कि उनका जीवन इतना संघर्षशील रहा है कि कल्पना करना भी मुश्किल होता है कि कैसे यह आदमी इस मुकाम पर पहुंचा।
अरविंद कुमार
कमलेश्वर अरविन्द कुमार को शब्दाचार्य ज़रूर कह गए हैं। और लोग सुन चुके हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अमरीका सहित लगभग आधी दुनिया घूम चुके यह अरविन्द कुमार जो आज शब्दाचार्य हैं, एक समय बाल श्रमिक भी रहे हैं। हैरत में डालती है उनकी यह यात्रा कि जिस दिल्ली प्रेस की पत्रिका सरिता में छपी सीता निष्कासन कविता से वह चर्चा के शिखर पर आए उसी दिल्ली प्रेस में वह बाल श्रमिक रहे।
अरविंद कुमारवह जब बताते हैं कि लेबर इंस्पेक्टर जांच करने आते थे तो पिछले दरवाज़े से अन्य बाल मज़दूरों के साथ उन्हें कैसे बाहर कर दिया जाता था तो उनकी यह यातना समझी जा सकती है। अरविन्द उन लोगों को कभी नहीं समझ पाते जो मानवता की रक्षा की ख़ातिर बाल श्रमिकों पर पाबन्दी लगाना चाहते हैं। वह पूछते हैं कि अगर बच्चे काम नहीं करेंगे तो वे और उनके घर वाले खाएंगे क्या? वह कहते हैं कि बाल श्रम की समस्या का निदान बच्चों को काम करने से रोकने में नहीं है, बल्कि उनके मां-बाप को इतना समर्थ बनाने में है कि वे उनसे काम कराने के लिए विवश न हों। तो भी वह बाल मजदूरी करते हुए पढ़ाई भी करते रहे। दिल्ली यूनिवर्सिटी से अंगरेज़ी में एम. ए. किया। और इसी दिल्ली प्रेस में डिस्ट्रीब्यूटर, कंपोजिटर, प्रूफ रीडर, उप संपादक, मुख्य उप संपादक और फिर सहायक संपादक तक की यात्रा अरविन्द कुमार ने पूरी की। और 'कारवां' जैसी अंगरेज़ी पत्रिका भी निकाली। सरिता, मुक्ता, चंपक तो वह देखते ही थे। सचमुच अरविन्द कुमार की जीवन यात्रा देख कर मन में न सिर्फ़ रोमांच उपजता है बल्कि आदर भी। तिस पर उनकी सरलता, निश्छलता और बच्चों सी अबोधता उन की विद्वता में समुन्दर-सा इज़ाफा भरती है। यह एक विरल संयोग ही है कि अरविन्द उसी मेरठ में जन्मे हैं जहां खड़ी बोली यानी हिन्दी जन्मी।


Sunday, 29 January 2012

किन्नर समाज की पुरज़ोर पैरवी और शिनाख्त


दयानंद पांडेय

किन्नर समाज पर बहुत कम लिखा गया है। और लगभग उपेक्षित ढंग से। लेकिन महेंद्र भीष्म का उपन्यास किन्नर कथा पूरी तरह किन्नर समाज पर केंद्रित है। न सिर्फ़ केंद्रित है बल्कि उन की तकलीफ, उन की उपेक्षा, उन की व्यथा और उन की तमाम सम्स्याओं से भी दो चार करवाता है। और बताता है कि किन्नर होना कोई जुर्म, पाप या कि अपराध नहीं है। और कि किन्नरों को भी मुख्य समाज और मुख्य धारा में जीने रहने का अधिकार है और कि होना चाहिए। अगर एक वाक्य में कहूं तो किन्नर कथा उपन्यास किन्नर पीडा की पैरवी में लिखा गया उपन्यास है।



कथा का ताना बाना बुंदेलखंड है। और यह अनायास नहीं है कि वीरता और ओज के लिए छाती चौडी करने वाले एक क्षत्रिय परिवार में जो कि राजपरिवार का भी दर्जा रखता है, राजनीतिग्य भी है के घर पैदा हुई जुडवा संतानों में एक किन्नर निकल जाने का जो रुपक रचा है महेंद्र भीष्म ने वह विरल है। इस उपन्यास में वह समाज, परंपरा और खोखले मूल्यों पर एक साथ चोट करते हैं। इस किन्नर कथा में समानांतर कथाओं के बहाने महेंद्र भीष्म जो रुढियों से रह-रह टकराते मिलते हैं उस से एक नया फलक हमारे सामने उपस्थित होता है। किन्नर कथा के बहाने किन्नरों की आह और उस के निर्वाह का अदभुत संसार हमारी आंखों से गुज़रता दिल में उतरता जाता है। कि किन्नरों की पीर पर्वत बन जाती है। राजा जगत राज जैतपुर के राजा हैं। सांसद भी। उन की पत्नी आभा सिंह जुड्वा संतान की मां बनती हैं। एक संतान बेटी है और दूसरी किन्नर। आभा और उन की खास दासी को ही यह बात पता चलती है। बाकी किसी और को नहीं। आभा दासी को मना भी कर देती है किसी भी को यह बताने के लिए। ममता का बंधन पति को भी यह बात नहीं पता लगने देता। रुपा और सोना दोनों बडी होने लगती हैं। एक ही रुप, एक ही रंग। घर में किलकारियां लेती दोनों बेटियों को राजा जगतराज भी एक जैसा प्यार देते हैं। इस बीच खानदान का चिराग कुंवर भी पैदा हो जाता है। दोनों बहनें उस से खेलती खिलाती रहती हैं, 'चौखरियन से कान कटा लो/ आलो बालो चना चबा लो !' लेकिन एक दिन सोना खेलते खेलते गिर जाती है। कपडा हट जाने से जगतराज को पता चल जाता है कि सोना किन्नर है। अब वह अपने क्षत्रिय कुल और खानदान की झूठी बातों, दिखावे की शान में पड कर सोना को मरवाने का निर्ण्य ले लेता है। पहले तो वह अपने दीवान पंचम सिंह को सारी बात बता कर दासी को ठिकाने लगाता है। पंचम सिंह जब उसे मारने जंगल ले जाता है तो वह दुहाई भी देती है कि उस का जन्म भी उसी ने कराया है। पर वह उस की एक नहीं सुनता, हत्या कर देता है। अब नंबर आता है सोना का। सोना को भी वह सोते ही मुंह अंधेरे उठा ले जाता है। पर जंगल में जिस चाकू से वह उस की हत्या करना चाहता है उसी चाकू से उस की अंगुलियां कट जाती हैं तो सोना द्रवित हो जाती है। पूछ बैठती है, 'अरे कक्काजू ! तुमाई उंगली पे खून...' अपना फ़ीता खोल कर घायल उंगली बांधने का प्रयास करती कहती है, 'हमाए कक्काजू हां चोट लग गई, ठीक हो जेहे....'' पंचम सिं द्रवित हो जाता है। फिर मारने की बजाय एक महंत जी के आश्रम चला जाता है। महंत जी को सारी कथा बताता है। वहीं तारा नामक किन्नर आता है। फिर सोना को महंत जी के कहने पर तारा किन्नर के हवाले कर पंचम सिंह वापस आ कर जगतराज को मार देने की सूचना देता है। पर वह जल्दी ही ऊब कर कामकाज छोड करकहीं चला जाता है। अंतत: संन्यासी रुप में पंद्रह साल बाद लौटता है।तब जब रुपा की शादी की तैयारियां जोरों पर है।

इस बीच बहुत कुछ घट जाता है। पंचम का बेटा सोबरन उस का काम संभाल चुका है। जगतराज का बेटा बडा हो चुका है। उधर सोना भी तारा के डेरे में चंदा बन कर जवान हो कर मनीष नामक लडके के प्यार में है। मनीष कोई और नहीं तारा का भतीजा है। तारा भी एक संभ्रांत व्यवसायी परिवार से है। पर किन्नर होने के नाते घर से बेघर हो जाता है। घर के लोग उसे समाज से भी ज़्यादा अपमानित करते रहते हैं। तारा किन्नरों का गुरु है। संवेदनशील और भाउक है। पर नकली किन्नरों से परेशान रहता है। यह एक अलग कथा है।
वस्तुत: तारा का चरित्र ही पूरे उपन्यास पर न सिर्फ़ भारी है बल्कि इसी बहाने किन्नर जीवन की सारी आह, सारी आंच, सारी कडवाहट और सारी यातना का तार और सार हमारे सामने उपस्थित होता है। तारा है तो उपकथा का चरित्र इस किन्नर कथा में पर कई बार वह मुख्य कथा बन कर हमारे सामने उपस्थित होता है। किन्नरों का समाज और परिवार से सारा संघर्ष भी तारा के बहाने हमें जानने को मिलता है। मातिन नाम की एक औरत भी है तारा के डेरे में। जो किन्नर नहीं है। पर पति की मृत्यु के बाद जेठ की ज़्यादतियों और लालच से भाग कर तारा की शरण में है। और उस की खास भी।

कालांतर में किन्नर कथा में बहुत सारे पडाव आते जाते हैं और खास बात यह कि किन्नर कथा की किस्सागोई में भी यह उतार-चढाव उसी तरह हिचकोले लेता है। कई जगह उपन्यास निबंध या लेख के व्यौरों में चला जाता है। खास कर किन्नरों के बारे में तमाम सूचनाओं और जानकारियों को परोसने में यह समस्या आती है। और कथारस में आघात सा होता है। यह जानकारियां या सूचनाएं संवाद के तौर पर भी परोसी जा सकने की गुंजाइश थी और पूरी तरह थ थी। कुछ असहज दृष्य भी उपन्यास में वर्णित है। खास कर ज़िलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक का प्रसंग। वह जिस तरह किन्नरों खास कर तारा को ले कर चिंतित दिखते हैं और जितना समय देते हैं वह उपन्यास में नकलीपन की छौंक लगाता है। इसी तरह उपन्यास का अंत भी फ़िल्मी होने से लेखक को बचाना चाहिए था। जो वह नहीं बचा पाए। शायद इस फेर में कि उपन्यास का अंत सुखद होना चाहिए। पर दुखद ही है कि इस सुखांत के चक्कर में एक अच्छा खासा उपन्यास फ़िल्मी परिणति की भेंट चढ गया। तो भी उपन्यासकार को इस के लिए बधाई ज़रुर देनी चाहिए कि न सिर्फ़ समाज में बल्कि लेखन में भी एक नितांत उपेक्षित विषय पर न सिर्फ़ उपन्यास लिखा बल्कि किन्नर समाज के लिए समाज और लेखन में एक नया परिवेश, एक नई और सकारात्मक धारणा का भी सूत्रपात किया है। अभी तक तो लगभग सभी समाज में किन्नर उपेक्षा और हंसी का ही पात्र रहे हैं पर यह उपन्यास पढ कर किन्नर समाज के बारे में सम्मान और अपनेपन का स्थाई भाव मन में उपजता है। शायद यही इस उपन्यास की बडी ताकत है। इस उपन्यास को पढते समय खुशवंत सिंह की दिल्ली और मिथिलेश्वर के बाबू जी की भी याद आई और श्याम बेनेगल की फ़िल्म वेलकम टू सज्जनपुर की भी याद आती रही। साथ ही गोरखपुर के दो किन्नर भी याद आए। एक अमरनाथ जो गोरखपुर के मेयर थे और
दूसरे लक्ष्मी तिवारी जो इन बिग बास में अपनी मह्त्वपूर्ण और सम्मनजनक भूमिका निभा रहे है। खुशवंत सिंह के दिल्ली उपन्यास में एक किन्नर ही सूत्रधार है । दिल्ली के निर्माण में किन्नरों की भूमिका और दिल्ली के चरित्र को भी खुशवंत सिंह ने किन्नर से जोड कर एक मोहक रुपक रचा है। पर महेंद्र भीष्म ने अपनी किन्नर कथा में किन्नरों के मनोभाव और उन के समाज में हो रहे अपमान, उपेक्षा और तनाव पर बात की है। किन्नरों को मुख्यधारा में जोडने की प्रकारांतर से पैरवी की है। प्रकृति द्वारा उन पर हुए अन्याय को समाज द्वारा कैसे कम किया जा सकता है, उसे बताने की कोशिश की है। मिथिलेश्वर के उपन्यास बाबू जी में एक अजीब यातना है। बाबू जी नामक चरित्र को नौटंकी और गाने बजाने का शौक है। घर परिवार से उपेक्षित हो कर वह दूर चला जाता है। उस की यातना देखिए कि एक बार वह लौटता भी है अपने गांव तो अपनी ही बेटी की शादी में नौटंकी का सट्टा लिखवा कर नौटंकी करने के लिए ही। यहां किन्नर कथा में भी सोना उर्फ़ चंदा आती है नाचने अपने ही महल में अपनी जुडवा बहन की शादी में नाचने। पर व्यथा और यातना वही बाबू जी वाली ही है। लेखक उस की देहयष्टि का वर्णन भी करता है केले के तने जैसी जाघ ! श्याम बेनेगल के वेलकम टू सज्जनपुर में तो एक किन्नर बाकायदा एक माफ़िया को चुनौती देते हुए चुनाव भी लडता है। अलग बात है कि उस की हत्या हो जाती है। तो यहां किन्नर कथा में भी तारा की हत्या एक माफ़िया ही करवा देता है। उसी के घर में। खैर। 
तमाम बातों के बावजूद महेंद्र भीष्म का यह उपन्यास किन्नर कथा इस अर्थ में अलग और अप्रतिम है कि किन्नर समाज को समाज में सम्मान और मुख्यधारा से जोडने की न सिर्फ़ पुरज़ोर पैरवी करता है बल्कि इसे तर्किक परिणति की ओर भी ले जाता है। महेंद्र भीष्म इसीलिए बधाई के हकदार हैं।


समीक्ष्य पुस्तककिन्नर कथा
लेखक- महेंद्र भीष्म
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन
3020-21, जट्वाडा, दरियागंज, एन.एस. मार्ग, नई दिल्ली- 11002
पृष्ठ 192
मूल्य 300 रुपए

अमरीका की धरती पर भारतीयता की खुशबू में लिपटी कहानियां

दयानंद पांडेय



हिंदी कहानी में अमरीकी आकाश के अक्स में भारतीय स्त्री की छटपटाहट को, उस की तकलीफ, उस की संवेदना की नसों में निरंतर चुभ रही नागफनी के त्रास की आंच की खदबदाहट और उस की आहट का कोई मानचित्र पाना हो, उस का पता पाना हो तो इला प्रसाद का कहानी संग्रह 'उस स्त्री का नाम' ज़रूर पढिए। अमरीकी सफलता का नशा और उस के जादू का जो मोतियाबिंद तमाम तमाम लोगों की आंखों में बसा है, वह भी उतर जाएगा। इला प्रसाद की यह कहानियां लगातार अमरीका में भी एक भारतीय संसार रचती मिलती हैं। ऐसे जैसे वह अमरीकी समाज में भारतीयता का कोई थर्मामीटर लिए घूम रही हों। भारत और भारत की याद की खुशबू हमेशा ही उन के संवादों में, स्थितियों और संवेदनाओं में सहज ही उपस्थित मिलती है। भारत से अमरीका गए लोगों के त्रास और उस की खदबदाहट, उस का संघातिक तनाव भी यत्र-तत्र इला की कहानियों में ऐसे पसरा पडा है जैसे किसी लान मे घास। जैसे किसी देह मे सांस । अमरीका में बसा भारतीय समाज ऐसे मिलता है इला की कहानियों में गोया कोई नदी बह रही हो और अपने साथ हीरा, कचरा, शंख, सीपी, सुख-दुख सब को समाहित किए हुए ऐसे कल-कल कर बहती जा रही हो जैसे सब ही उस के संगी साथी हों। कौन अपना, कौन पराया का बोध इस नदी को नहीं है। सब ही उस के हिस्से हैं। यही इन कहानियों की ताकत है।
उस स्त्री का नाम कहानी की नायिका एक वृद्धा है। जो भारत से गई है। अपने बेटे के पास। पर बेटा उसे अपने साथ रखने के बजाय ओल्ड एज होम में रख देता है। खर्च देता है और फ़ोन से हालचाल लेता है। और स्त्री है कि भारत में रह रही अपनी अविवहित बेटी जो अब शादी की उम्र पार कर प्रौढ हो रही है, उस की शादी की चिंता में घुली जा रही है। उस स्त्री का सारा दुख एक दंपति से कार लिफ़्ट लेने के दौरान छन छन कर सामने आता जाता है। अनौपचारिक बातचीत में। वह स्त्री अपने गंतव्य पर उतर जाती है। तब पता चलता है कि वह तो ओल्ड एज होम में रहती है। फिर भी उसे कार में लिफ़्ट देने वाले दंपति उस वृद्धा का नाम पूछना भी भूल जाते हैं। इसी कहानी में अमरीकी जीवन की तमाम रोजमर्रा बातें भी सामने आती है। यह एक सच भी उभरता है कि अमरीका में मंदिरों की उपयोगिता अब बदल रही है। लोग पूजा पाठ करने वहां कम जाते हैं, एक दूसरे से मिलने ज़्यादा जाते हैं। यह सोच कर कि एक दूसरे के घर जाने या आने की ऊब या झंझट से फ़ुरसत मिले। तो यह समस्या क्या भारत में भी नहीं आ चली है? मंदिर नहीं, न सही, कोई आयोजन, कोई कैफ़टेरिया या फ़ेसबुक ही सही लोग मिलने लगे हैं। इसी अर्थ में यह कहानी वैश्विक बन जाती है। और कि जो कुछ आदमी के भीतर कहीं गहरे टूट रहा है, उस का एक नया आख्यान भी रचती है।
इला के यहां असल में टूट-फूट कुछ ज़्यादा ही है। इस संग्रह की पहली कहानी से ही यह टूट-फूट शुरु हो जाती है। एक अधूरी प्रेमकथा से ही। यह कहानी भारत की धरती पर घटती है। इस कहानी की नायिका निमिषा है जो अपने पिता द्वारा छली गई अपनी मां की यातना कहिए, भटकाव कहिए कि अपनी मां की यातना की आंच में निरंतर रीझ और सीझ रही है। दहक रही है, उबल रही है पानी की तरह कि उफन भी नहीं पाती। भीतर भीतर घायल होती रहती है। कि आत्मह्त्या की कोर तक पहुंच जाती है। मां को मिस करती हुई। रूममेट को वह दीदी कहती है और उसी में अपनी मां को भी ढूंढती है। बैसाखियां की सुषमा को भी देखिए एक वॄद्ध स्त्री मिल जाती है। जैसे उस स्त्री का नाम में शालिनी को एक वृद्धा मिली थी। पर वहां वह भारतीय थी। पर यहां आइरिश। हां एक विकलांग लडकी भी। पर मुश्किलें, यातनाएं और भावनाएं क्या हर जगह एक सी नहीं होतीं?
खास कर स्त्रियों की। इला की कहानियों में हमें यह एक सूत्र निरंतर मिलता चलता है। लगभग हर कहानी में। वह चाहे भारत की धरती की कहानी हो चाहे अमरीका की धरती की कहानी। एक टूट-फूट का अंतहीन सिलसिला है गोया धरती भले अलग-अलग हो पर दुख, हताशा और हैरानी का आकाश एक ही है। भावनाओं और यातनाओं का आकाश एक ही है। स्त्रियों की छटपटाहट और व्याकुलता का धागा जैसे एक ही सांस में, एक ही स्वर और एक ही लय में बुना गया हो। इला की कहानियों में स्त्रियों की छटपटाहट का यह बारीक व्यौरा अलग-अलग गंध लिए यत्र-तत्र उपस्थित है। दिलचस्प यह कि बावजूद इस सब के अमरीकी धरती पर भी वह अपने भारतीय होने के गर्व और गुमान में लिपटी खडी है। वह वहां अन्य लोगों की तरह अंगरेजियत की चाशनी में अपने को नहीं डुबोती। जैसे रिश्ते कहानी की संचिता एक जगह साफ कहती है, 'आई हैव नो प्राब्लम विद माई आइडेंटीटी।' रिश्ते की यह संचिता मंदिर जाती है, क्लब नहीं। हिंदी बोलती है। भारतीय भोजन पसंद करती है। और खुलेआम घोषणा करती फिरती है, 'आई हैव नो प्राब्लम विद माई आइडेंटिटी।' बाज़ारवाद के खिलाफ़ खडी यह कहानी एक भरपूर तमाचा तब और मारती है जब संचिता कहती है, 'बिलकुल ठीक हैं आप। रिश्ते विग्यापन की चीज़ नहीं होते।'
मुआवजा भी रिश्ते की इबारत को और चमकदार बनाने वाली कहानी है। जो बताती है कि नहीं बदलता न्यूयार्क का मिजाज भी। श्रुति जो एक लेखिका है पत्रकार नहीं। लेकिन जब तब लोग उस से इन उन विषयों पर लिखने की कभी चुनौती तो कभी फ़र्माइश, कभी इसरार करते फिरते हैं और वह असहाय होती जाती है। एक दुर्घटना के बाद मुआवजे के लिए संघर्ष का दौर दौरा चलता है, जो कि नहीं मिलना होता है, मिलता भी नहीं, वह तो उसे तोडता ही है। हालांकि वह तो मानसिक संताप का भी मुआवजा चाहती है। पर यह व्यवस्था तो मानसिक संताप क्या चीज़ होती है जानती ही नहीं। हां देती ज़रुर है। जब-तब। एक पूंजीवादी देश और उस की व्यवस्था कैसे तो सिर्फ़ बाज़ार के लिए ही होती है उसे किसी इंसानियत, किसी मानवता, किसी के दुख-सुख से कोई सरोकार नहीं होता, इस तत्थ्य की आंच में झुलसना हो तो इला की एक कहानी तूफ़ान की डायरी ज़रुर पढनी होगी।
चुनाव कहानी भी इसी सिक्के की दूसरी तसवीर है। चुनाव के नाम पर जो छल-कपट भारत में है वही अमरीका में भी। बस व्यौरे और बही बदल गई है। लेकिन प्रवंचना और मृगतृष्णा का जाल तो वही है। इला की कुछ कहानियों में गृहस्थी के छोटे-छोटे व्यौरे भी हैं। जो कभी-कभी जीवन में बहुत बड़े लगने लगते हैं। हीरो ऐसी ही एक कहानी है। पानी के एक पाइप टूट जाने से घर में कैसी आफ़त आ जाती है। और एक नालायक सा आदमी जिम जो प्लंबर भी है पर जिस के हर हाव भाव से चिढने वाली कला को लगता है है कि वह प्लंबर अगर उस का पाइप ठीक कर दे तो वह उस का हीरो है। उस का पति कहता भी है उस से फ़ोन पर कि, 'मेरी वाइफ़ कहती है अगर आज तुम आ गए तो यू आर अ हीरो!' वह ना ना करते हुए आता भी है और हीरो बन भी जाता है। वह कृतग्यता से भर कर रुंधे गले से, 'थैंक यू जिम।' कहती भी है।
होली भी ऐसे ही बारीक व्यौरे वाली मनोवैज्ञानिक कहानी है। हां कुछ स्मृतियों की होली कभी नहीं जलती जैसे सूत्र पर कहानी का अवसान स्मृतियों के गहरे वातायन में पहुंचा देता है। एक हाउस वाइफ़ का मनोविज्ञान भी इला की कहानी मेज़ में एक गहरे सरोकार के साथ उपस्थित है। सुधा के भीतर जैसे पक्षी पलते हैं । किसिम-किसिम के। गोया वह खुद एक पक्षी हो। पक्षी और मेज़ का जो औचक रुपक गढा है इला ने इस कहानी में और जो छोटे-छोटे व्यौरे रेशे-रेशे में गूंथे हैं वह अविरल है।
मिट्टी का दिया कहानी भी कुछ ऐसी ही है। भारत में लोग भले मिट्टी का दिया बिसरा चुके हों पर अमरीका में तन्वी की मिट्टी के दिए की हूक उसे बेचैन करती जाती है। दीपावली पर अमरीका में भी बालीवुड की गंध, बाज़ार की धमक और तन्वी का अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति जुडने की जूझ, विरासत बच्चे को सौंपने की अथक बेचैनी एक नया ही दृष्य उपस्थित करती है। भारत से अमरीका जा कर घर के बुजुर्गों को क्या समस्या आती है, कि वह खुद भी समस्या बन जाते हैं, इस के तमाम व्यौरे और इस यातना की आंच साज़िश कहानी में बडे हौले हौले सामने आता है। यह स्थितियां हालां कि भारत में भी हूबहू है। मनमुताबिक बात न हो, डांस भी न हो पाए तो आदमी कैसे कुंठा के जाल में गिर जाता है, कुंठा कहानी के जाल में लिपट कर ही पता चल पाता है। बदलती पीढी का गैप, खाती पीती अघाई औरतों के चोचले भी बांच सकते हैं आप इस अर्थ में। और इन सब से उपजी जो खीझ है न वह बेहिसाब है। ज़रा गौर कीजिए: 'डांडिया नृत्य के बाद जब वे वापस हो रहे थे तब भी अन्विता बार-बार भीड में शामिल हो कर नृत्य करती-दो मिनट और फिर लोगों को अपनी ओर बुलाने की असफल कोशिश करती। टीम इंडिया बन ही नहीं रही थी। अकेली कप्तान सिर पीट रही थी।'
भारतीयता की यह हूक तो इला की लगभग हर कहानी में ऐसे मिलती रहती है जैसे कोई औरत स्वेटर बुन रही हो निश्चिंत भाव से और उसे इस बात की परवाह ही न हो कि कोई फ़ंदा गलत भी पड सकता है। ऐसे जैसे उसे अपनी बुनाई पर अटल विश्वास ही नहीं घरों की गिनती का ज्ञान भी हो सहज ही। और यह सब हम सब जानते हैं कि सहज अभ्यास से ही संभव बन पाता है। तो इला की इन कहानियों में भारतीयता का तत्व सहज अभ्यास से बिना कोई शोर किए, हंगामा किए सहज ही समाया रहता है। इला की इन कहानियों की एक खास ताकत और है कि जहां तमाम देसी परदेसी स्त्री कहानीकारों की कहानियों में पुरुष खलनायक और अत्याचारी रुप में उपस्थित मिलता है यत्र-तत्र, वहीं इला प्रसाद की कहानियों का पुरुष चरित्र हर कहीं सहयोगी, मददगार और पाज़िटिव चरित्र बन कर उपस्थित है। चाहे वह स्त्री का पति चरित्र हो या कोई और चरित्र वह अपने सहज स्वभाव में हर कहीं उपस्थित है, पानी की तरह। परिवारीजन बन कर। खलनायक बन कर नहीं। सहभागी बन कर।
हिंदी कहानी में यह बदलाव और इस की आहट दर्ज करने लायक है। जो कि आसान नहीं है।

समीक्ष्य पुस्तक:
उस स्त्री का नाम
कहानीकार-इला प्रसाद
प्रकाशक-भावना प्रकाशन
109-A, पटपडगंज, दिल्ली-110091
मूल्य 150 रुपए

Friday, 27 January 2012

हिंदी फ़िल्मों की खाद है, खनक और संजीवनी भी है खलनायकी

खलनायक जैसे हमारी समूची ज़िंदगी का हिस्सा हैं। गोया खलनायक न हों तो ज़िंदगी चलेगी ही नहीं। समाज जैसे खलनायकों के त्रास में ही सांस लेता है और एक अदद नायक की तलाश करता है। सोचिए कि अगर रावण न होता तो राम क्या करते? कंस न होता तो श्रीकृष्ण क्या करते? हिरण्यकश्यप न हो तो बालक प्रह्लाद क्या करता? ऐसे जाने कितने मिथक और पौराणिक आख्यान हमारी परंपराओं में रचे बसे हैं।
आज के समाज और आज की राजनीति में भी ऐसे जाने कितने लोग और रुप मिल जाएंगे, जो नायकत्व और खलनायकत्व को नए-नए रंग रुप और गंध में जीते भोगते और मरते मिल जाएंगे। तो हमारी फ़िल्में भला कैसे इस खलनायक नामक तत्व से महरुम हो जाएं भला? वह भी हिंदी फ़िल्में? जिन की नींव और नाव दोनों ही खलनायक की खाद पर तैयार होती है। जितना मज़बूत और ताकतवर खलनायक उतनी ही मज़बूत और सफल फ़िल्म। कोई माने या न माने यह एक प्रामाणिक सत्य है। कन्हैया लाल, जीवन से लगायत प्राण, प्रेमनाथ, प्रेम चोपड़ा, रंजीत, अजीत, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्‍हा, अमजद खान, डैनी, अमरीश पुरी, उत्पल दत्त, कादर खान, शक्ति कपूर, गुलशन ग्रोवर, गोगा कपूर, सदाशिव अमरपुरकर, परेश रावल, मोहन आगाशे, अनुपम खेर, नाना पाटेकर, मनोज वाजपेयी और आशुतोष राणा तक यह सिलसिला बरकरार है और जारी भी। ललिता पवार, शशिकला, बिंदु और अरुणा इरानी आदि को भी जोड लें तो कोई हर्ज़ नहीं है।

मदर इंडिया में खलनायकत्व का जो ग्राफ़ कन्हैयालाल ने गढ़ा उस का रंग इतना चटक, इतना सुर्ख और इस कदर कांइयांपन में गुंथा था कि नर्गिस के हिस्से की तकलीफ और यातना भी उस में ऐसे छिप जाती थी जैसे बादलों में चांद। बाढ़ की विपदा में सब कुछ नष्ट हो गया है, दुधमुहा बच्चा भी चल बसा है लेकिन कन्हैया लाल को अपने सूद और वासना का ज्वार ही दिखता है, कुछ और नहीं। वह खेत में चने ले कर पहुंचता है और बच्चों को चने का चारा भी फेंकता है। लेकिन बात बनती नहीं। फिर भी वह हार नहीं मानता। तीन-तेरह करता ही रहता है। कन्हैयालाल का यही तेवर फिर व्ही शांताराम की फ़िल्म दुनिया ना माने में भी और तल्ख हुआ है, और सुर्खुरु हुआ है। हम त्वार मामा वाला संवाद जो उन के हिस्से है वह अलग अलग शेड में इस कदर गज़ब ढाता है कि पूछिए मत। जिस भांजी को वह एक वृद्ध से व्याहता है और फिर उस का वैभव देख और उस से मिले तिरस्कार से तिलमिलाया जब एक गधे के सामने पड़ते ही गधे से भी हड़बड़ा कर हम त्वार मामा कहने लग जाता है। ठीक उसी तर्ज़ में जो कहा जाता है कि मौका पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। तो इस में जो सहज ही कसैलापन उभर कर आता है उस में शांताराम का निर्देशन तो है ही कन्हैयालाल की अदायगी और उन का अभिनय भी सर चढ़ कर बोलता है। पर जल्दी ही कन्हैयालाल के कांइयांपन को भी सवा सेर मिल गया हिंदी फ़िल्म को जीवन के रुप में। इंतिहा यह थी कि परदे पर जब जीवन आते थे तो औरतें और बच्चे सहम जाते थे। मर्द बेसाख्ता चिल्ला पडते थे, 'हरमिया!' जीवन की पहचान कांइयां और हरामी दोनों के रुप में थी। चश्मा ज़रा नाक के नीचे तक ला कर जब वह आधा चश्मा और आधा बिना चश्मा के देखते हुए अपने कांइयांपन को बड़ी सरलता और सहजता से परोसते, जिस में धीरे से, मनुहार से बोले गए संवादों का छौंक लगा कर जब वह अपना हरामीपन दर्शकों से शेयर करते तो खलनायकी का एक नया आकाश रच डालते। पौराणिक फ़िल्मों में जब वह नारद के रुप में नारायण-नारायण कहते परदे पर अवतरित होते तो सुस्त पडी फ़िल्म में जैसे जान आ जाती। उन का मुनीम हो या नारद सब कहीं उन का कांइयांपन ऐसे छलकता जैसे आधी भरी गगरी में से पानी।

लगभग उसी समय एक और खलनायक हिंदी फ़िल्मों में आए के. एन. सिंह। पूरी नफ़ासत और पूरे शातिरपन के साथ शूटेड-बूटेड जब वह परदे पर आते तो लोग मारे दहशत में दांतों तले अंगुली दबा लेते। शराफ़त का मुखौटा पहन कर बहुत आहिस्ता से वह अपना कमीनापन परदे पर परोसते तो बिल्कुल किसी पिन की तरह चुभते। रहमान भी इसी नफ़ासत और शराफ़त के मुखौटे के सिलसिले को खलनायकी में आज़माते थे। कई बार वह के. एन. सिंह से इस मामले में बीस पड़ जाते थे। बिन बोले आंखों से ही कोई खलनायक अपना काम कर जाए यह आज के दौर के खलनायकों को देख कर सोचा भी नहीं जा सकता। पर के. एन. सिंह और रहमान दोनों ही इसे बखूबी करते थे। के. एन सिंह की हावडा ब्रिज़ हो अशोक कुमार वाली या फिर रहमान की गुरुदत्त वाली चौदवीं का चांद हो या साहब बीवी गुलाम, मल्टी स्टारर वक्त हो या कोई और फ़िल्म इन दोनों की शराफ़त और नफ़ासत में पगी खलनायकी का ज़हर साफ देखा जा सकता है। बहुत कम खलनायक हैं जिन पर गाना भी फ़िल्माया गया हो। रहमान उन्हीं में से हैं। दिल ने फिर याद किया जैसा गाना भी उन के नसीब में है। असल में असल ज़िंदगी के खलनायक भी इसी तरह के होते हैं, जिन्हें हम सफ़ेदपोश के विशेषण से नवाज़ते हैं।

प्राण ने इस सफ़ेदपोश खलनायक के सफ़र को और आगे बढ़ाया पर शराफ़त के मुखौटे को उन्हों ने खलनायक के लिबास से उतार फेंका। एक तरह से वह एक साथ कई खलनायकों के सम्मिश्रण बन कर उभरे। कन्हैयालाल और जीवन का कांइयांपन, के.एन.सिंह और रहमान का सफ़ेदपोश चेहरा और संवाद में कसैलापन, व्यवहार में हरामीपन सब कुछ एक साथ लेकर वह परदे पर उपस्थित हुए तो खलनायकी के वह एक बडे़ प्रतिमान बन गए। खलनायकी का जो शिखर छुआ और एक तरह से जो कहूं कि खलनायकी का स्टारडम जो प्राण ने रचा वह अप्रतिम था। कह सकते हैं कि खलनायकी के खल में उन्हों ने प्राण डाल दिया। इतना कि जीवन, के. एन. सिंह, रहमान वगैरह खलनायक प्राण के आगे बेप्राण तो नहीं पर बेमानी ज़रुर हो गए। उस ज़माने में तो अशोक कुमार हों, दिलीप कुमार हों, देवानंद या राजकपूर या फिर शम्मी कपूर, सुनील दत्त, मनोज कुमार या कोई और सब के बरक्स खलनायक तो बस प्राण ही प्राण थे। कोई और नहीं। खलनायकी की लंबी पारी खेली उन्हों ने। इतनी कि वह इस से ऊब गए। सार्वजनिक जीवन में भी उन से बच्चे, औरतें दूर भगते, देखते ही डर जाते। प्राण में उन्हें एक जालिम और जल्लाद दिखता। इस जल्लादी से उन्हें मुक्ति दिलाई मनोज कुमार ने उपकार में। अब वह जल्लाद और जालिम नहीं रह गए। एक चरित्र अभिनेता बन कर वह गाने लगे थे कस्मे वादे प्यार वफ़ा सब बाते हैं बातों का क्या! फिर तो वह ज़बरदस्त चरित्र अभिनेता बन कर उभरे। लगभग सभी चरित्र अभिनेताओं की जैसे छुट्टी करते हुए। उन के खलनायकी के समय में ही प्रेम चोपड़ा का बतौर खलनायक परदे पर आगमन हो चला था। उपकार में वह ही खलनायक हुए। पर प्राण को वह जो कहते हैं कि रिप्लेस नहीं कर पाए। अब खलनायकी में भी हीरो की ही तरह हैंडसम दिखने वाले लोग आने लगे।

विनोद खन्ना और शत्रुध्‍न सिन्‍हा ऐसे ही लोगों में शुमार थे। लेकिन अफ़सोस कि इन खलनायकों की दिलचस्पी खलनायकी में नहीं हीरो बनने में थी। सत्तर के दशक में इन दोनों ने ही खलनायकी को एक नया तेवर और नई तकनीक दी और छा से गए। यह खलनायक भी अपने हीरो की तरह ही सजते संवरते और हीरो की तरह ही दिखते थे। हीरोइन की तरफ प्यार की पेंग यह भी मारते। पर तरीका बस दुर्योधन वाला हो जाता। खलनायक जो ठहरे। अनोखी अदा में जीतेंद्र के पलट रेखा के लिए विनोद खन्ना भी उतने ही मोहित हैं और उसी तेवर में पर दुर्योधन वाली अप्रोच के साथ। ऐसे ही ब्लैकमेल में शत्रुध्‍न सिन्‍हा भी राखी के लिए उतने ही बेकरार हैं जितने कि धर्मेंद्र। पर बाद में शत्रु रेखा की उन्हें लिखी चिट्ठियों पर ही ब्लैकमेल करने लग जाते हैं तो खलनायक बन जाते हैं। विनोद खन्ना को तो फिर गुलज़ार मेरे अपने में हीरो बना देते हैं पर उसी मेरे अपने में शत्रु विनोद खन्ना के पलट खलनायक बने रह जाते हैं। दोनों ही योगिताबाली के बालों में गिरफ़्तार हैं। खैर शत्रुध्‍न सिन्‍हा भी ज़्यादा समय तक खलनायकी की खोल में नहीं रहे। जल्दी ही वह भी नायक बन कर छा गए। लेकिन दिलचस्प है यह याद करना भी कि विनोद खन्ना की चौड़ी छाती और उन की लंबाई पर औरतें उन की खलनायक के टाइम से ही थीं जब कि शत्रुध्‍न सिन्‍हा के घुंघराले बालों की स्टाइल भी उन के खलनायक टाइम पर ही लोकप्रिय हो गई थी। और देखिए न कि शत्रुध्‍न सिन्‍हा को फ़िल्मों में प्रमोट करने वाले खलनायक तिवारी और अनिल धवन शत्रुध्‍न सिन्‍हा के बतौर हीरो परदे पर छाते ही गुम से हो गए।

शत्रुध्‍न सिन्‍हा की बात हो और हम खलनायक अजीत को भूल जाएं भला कैसे मुमकिन है? जिस को पूरा शहर लायन के नाम से जानता था, कालीचरन में उन की याद हिंदी फ़िल्मों के दर्शक मोना डार्लिंग सोना कहां है, के संवाद से भी करते हैं। सोचिए कि कभी यही अजीत नायक होते थे हिंदी फ़िल्मों के। हिरोइन के साथ गाना भी गाते थे। फिर वह सहनायक भी हुए। याद कीजिए मुगल-ए-आज़म या नया दौर की। जिस में वह दिलीप कुमार के साथ होते हैं। यादों की बारात से खलनायकी की बादशाहत कमाई थी अजीत ने। जंज़ीर में अमिताभ बच्चन के बरक्स वह खलनायक हुए। अमिताभ फ़िल्म लूट ले गए। अजीत पीछे रह गए। ऐसे ही वह कालीचरन में शत्रुध्‍न सिन्‍हा के बरक्स हुए। फ़िल्म शत्रुध्‍न सिन्‍हा लूट ले गए, अजीत फिर पीछे रह गए। खलनायकों के साथ यह बार-बार हुआ। अकेले अजीत के ही साथ नहीं। नायक आगे होते गए, खलनायक पीछे, बहुत पीछे। प्रेम नाथ भी कभी नायक थे हिंदी फ़िल्मों के, पर समय ने उन्हें खलनायक बना दिया। जानी मेरा नाम जैसी फ़िल्मों में खलनायकी करते करते वह भी चरित्र अभिनेता बन बैठे। अब जब फ़िल्में नायकों के हवाले पूरी तरह हो गईं तो अब खलनायक रह गए अजीत, प्रेम चोपड़ा, रंजीत और मदनपुरी। हां इसी बीच डैनी डैंगजोप्पा भी बतौर हीरो असफल हो कर खलनायकी में हाथ आज़माने लगे। जीवन के बेटे किरन कुमार भी असफल नायक हो कर खलनायकी आज़माने लगे। कि तभी आई शोले! और यह देखिए कि इस फ़िल्म ने तो जो कीर्तिमान और प्रतिमान गढ़ने तोड़ने थे तोडे़ और गढे़ ही एक सुपर खलनायक भी ला कर परदे पर उपस्थित कर दिया। गब्बर सिंह के रुप में अमजद खान को। जिधर देखिए गब्बर सिंह की धूम। यह पहली बार हो रहा था कि किसी खलनायक के डायलाग जनता सुन रही थी। और कैसेट कंपनियां गाने के बजाय डायलाग की सी.डी. बाज़ार में उतार रही थीं। गब्बर के डायलाग। गब्बर सिंह जैसा सुपर खल चरित्र अभी तक फिर हिंदी फ़िल्म के परदे पर उपस्थित नहीं हुआ। गब्बर आज भी खलनायकी का बेजोड़ चरित्र है हमारी हिंदी फ़िल्म का। जैसे कि पौराणिक आख्यानों में कभी रावण या कंस थे।

इस गब्बर के जादू से खुद सिप्पी इतने प्रभावित हुए कि जल्दी ही उन्हों ने एक और फ़िल्म बनाई शान। और शान में शोले से भी ज़्यादा ताम-झाम से एक खलनायक परोसा शाकाल के रुप में कुलभूषण खरबंदा को। सारा ज़ोर पूरी फ़िल्म में खलनायक को ही पेश करने में खलनायक को ही प्रोजेक्ट करने में सिप्पी ने लगा दिया। पर यह सारा कुछ फ़िल्म में दाल में नमक की जगह नमक में दाल की तरह हो गया। मल्टी स्टारर फ़िल्म होने के बावजूद फ़िल्म धडाम हो गई और शाकाल भी अपने सारे स्पेशल इफ़ेक्ट सहित स्वाहा हो गया। बाद के दिनों में अमजद खान और कुलभूषण खरबंदा चरित्र अभिनेता की राह पर चल पडे़। अमजद खान तो कामेडी भी करने लग गए। लव स्टोरी और चमेली की शादी की याद ताज़ा कीजिए। खैर अब फ़िल्मों का ट्रेंड भी बदल रहा था। मल्टी स्टारर फ़िल्मों का दौर तो था ही, एंटी हीरो का भी ज़माना आ गया। अब खलनायक और कामेडियन दोनों ही खतरे में थे। यह अमिताभ बच्चन के स्टारडम का उदय और उन के शिखर पर आ जाने का समय था। वह स्मगलर, मवाली और जाने क्या क्या बन रहे थे। कालिया से लगायत....... तक। वह खलनायकों वाले काम भी कर रहे थे और कामेडियनों वाला भी। उन के आगे तो सच कहिए हीरोइनों के लिए भी कोई काम नहीं रह गया था। सिवाय उन के साथ चिपट कर गाने या सोने के। एक नया ही स्टारडम था यह। जिस में सिवाय नायक यानी अमिताभ बच्चन के लिए ही काम था। बाकी सब फ़िलर थे। मदन पुरी और रंजीत, कादर खान और शक्ति कपूर जैसे बिचारे खलनायक ऐसे परदे पर आते, इस बेचारगी से आते गोया वह अभिनय नहीं कर रहे हों किसी नदी में डूब रहे हों और डूबने से बचने के लिए उछल कूद या हाय-तौबा मचा रहे हों। कि अस्सी के दशक में आई अर्धसत्य। ओमपुरी के पलट बतौर खलनायक आए सदाशिव अमरापुरकर। ओमपुरी सरीखे अभिनेता पर भी भारी। पर बस याद ही रह गई उन के अर्धसत्य के अभिनय की। बाद में वह अमिताभ बच्चन के ही साथ आखिरी रास्ता और धर्मेंद्र के साथ भी एक फ़िल्म में आए पर जल्दी ही वह भी चरित्र अभिनेता की डगर थाम बैठे।

पर यह देखिए इसी अस्सी के दशक में एक फ़िल्म आई शेखर कपूर की मिस्टर इंडिया। और मिस्टर इंडिया में अवतरित हुए मुगैंबो! गब्बर की धमक के वज़न में ही यह मुगैंबो भी छा गया परदे पर। और सचमुच लगा कि जैसे हिंदी फ़िल्मों में खलनायकी की वापसी हो गई है। हुई भी। प्राण के बाद अगर खलनायकी की इतनी सफल इनिंग किसी ने हिंदी फ़िल्म में खेली है तो वह अमरीश पुरी ही हैं जो मदन पुरी के छोटे भाई हैं। अमरीश पुरी मिस्टर इंडिया में हिंदी फ़िल्मों के लिए कोई नए नहीं थे, वह पहले ही से हिंदी फ़िल्मों में थे। और श्याम बेनेगल की निशांत और भूमिका जैसी फ़िल्मों में खलनायक रह चुके थे। तमाम और फ़िल्मों में उन्हों ने छोटी बड़ी तमाम भूमिकाएं की थीं पर मिस्टर इंडिया में जो उन का खलनायक शेखर कपूर ने उपस्थित किया वह अविरल ही नहीं महत्वपूर्ण और नया मानक भी बन गया। इतना महंगा कास्ट्यूम हिंदी फ़िल्म के किसी खलनायक ने नहीं पहना था, न ही इतना स्पेस किसी खलनायक को हिंदी फ़िल्म में मिल पाया था। कहते हैं कि फ़िल्म बजट का एक बड़ा हिस्सा अमरीशपुरी के कास्ट्यूम पर खर्च किया गया था। उतना कि जितना अमरीशपुरी को पारिश्रमिक भी नहीं मिला था। इतना चीखने-चिल्लाने वाला खलनायक भी हिंदी सिनेमा पहली बार देख रहा था। फिर तो अमरीश पुरी ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। हां वह ज़रूर चरित्र भूमिकाओं में भी बार-बार दिखे। और सचमुच मेरे लिए यह कह पाना कठिन ही है कि वह खलनायक की भूमिका में ज़्यादा फ़बते थे कि चरित्र भूमिकाओं में। मुझे तो वह दोनों में ही बेजोड़ दीखते थे। पर बावजूद इस सब के उन का मोगैंबो उन पर भारी था यह भी एक सच है।

परेश रावल भी कभी बेजोड खलनायक बन कर उभरे। पर जल्दी ही वह भी चरित्र भूमिकाओं मे समा कर रह गए। उन्हों ने अभिनय के अजब गज़ब शेड हिंदी फ़िल्मों में परोसे हैं जिन का कोई सानी नहीं है। अमानुष जैसी कुछ फ़िल्मों में खलनायक की भूमिका में उत्त्पल दत्त की भी याद आती है। पर बाद में वह भी चरित्र भूमिकाओं में आने लगे। यही हाल कादर खान और शक्ति कपूर जैसे खलनायकों का भी हुआ। वह भी कामेडी से लगायत सब कुछ करने लगे। नाना पाटेकर की परिंदा और मनीषा कोइराला के साथ वाली फ़िल्मों में वह खलनायक के ज़बरदस्त शेड ले कर उपस्थित हुए। पर वह भी चरित्र अभिनेता ही बन गए। अनुपम खेर भी कर्मा में डा. डैंग की भूमिका में आए और वापस वह भी चरित्र अभिनेता हो गए। मोहन अगाशे, पुनीत इस्सर, अरबाज़ खान जैसे तमाम अभिनेता हैं, जिन्हें खलनायक के बजाय चरित्र अभिनेता की राह ज़्यादा मुफ़ीद लगी। आशुतोष राणा ने भी खलनायकी में नई इबारत दर्ज़ की है। तो मनोज वाजपेयी ने सत्या और रोड में रामगोपाल वर्मा के निर्देशन में खलनायकी की एक नई भाषा रची। पर मौका मिलते ही वह भी नायक बनने के शूल में बिंध गए। पर शूल ने भी हिंदी फ़िल्मों को एक नया और हैरतंगेज़ खलनायक दिया। रज़ा मुराद ने भी खलनायकी में अपनी आवाज़ बुलंद की है। डर्टी मैन फ़ेम गुलशन ग्रोवर और गोगा कपूर भी याद आते हैं। पर जाने क्या बात है कि ज़्यादातर खल चरित्र जीने वाले अभिनेता या तो नायक हो गए या चरित्र अभिनेता। कभी यह सोच कर हंसी भी आती है कि क्या अगर रावण या कंस सरीखे लोग भी इस हिंदी फ़िल्म के चौखटे में आते तो क्या वह भी चरित्र अभिनेता तो नहीं बन जाते बाद के दिनों में?

खैर यहां यह जानना भी खासा दिल्चस्प है कि कुछ चरित्र अभिनेताओं ने भी खलनायकी के पालने में पांव डाले हैं। और तो और सीधा-साधा और अकसर निरीह चरित्र जीने वाले अभिनेता ए.के. हंगल ने भी खलनायकी की भूमिका की है। एक दीवान के रुप में राजकाज पर कब्जा जमाने के लिए इस खूबसूरती से वह व्यूह रचते हैं कि कोई उन पर शक भी नहीं करता और वह कामयाब होते भी दीखते हैं, पर जैसी कि हिंदी फ़िल्मों की रवायत है आखिर में उन का भेद खुल जाता है। हंगल के खलनायक का इस फ़िल्म को फ़ायदा यह मिला कि सस्पेंस आखिर तक बना रहा। वह सस्पेंस जो कभी हमराज या वह कौन थी जैसी फ़िल्मों में क्रिएट किया जाता था। कुछ नायकों ने भी कभी कभार खलनायकी की भूमिका में अपने को सुपुर्द किया है और कामयाब भी खूब हुए हैं। जैसे कि ज्वेल थीफ़ में अशोक कुमार। दर्शक आखिर तक सस्पेंस की अनबूझ चादर में फंसा रहता है। फ़िल्म के आखिरी दृष्यों में राज़ फास होता है कि ज्वेल थीफ़ तो अपने अशोक कुमार हैं। अमिताभ बच्चन भी अक्स में खलनायकी को बखूबी निभाते हैं तो शाहरुख खान डर में खलनायक बन कर खूब डराते हैं। ऐसे ही अजय देवगन कंपनी में खलनायकी का रंग जमाते हैं। सनी देवल भी खलनायक बन जाते हैं तो संजय दत्त तो खलनायक फ़िल्म मे खलनायकी के लिए कई शेड्स बिछाते हैं। इतने कि हीरो लगने लगते हैं और गाने भी लगते हैं कि नायक नहीं खलनायक हूं मैं! वास्तव में भी उन की खलनायकी का सिक्का खूब खनखनाता है।

खलनायकी की बात हो और अपनी आधी दुनिया की बात न हो तो बात कुछ जमती नहीं है। ललिता पवार, बिंदु, शशिकला या अरुणा इरानी ने अपने खल चरित्रों को जिस तरह से जिया है और अपने चरित्रों के लिए जो नफ़रत दर्शकों में बोई है उस का भी कोई जवाब है नहीं। काजोल की खल भूमिका की भी याद ज़रूरी है। बात फिर वही कि बिना खलनायक के नायक नहीं बनता। तो फ़िल्म चाहे जैसी भी हो खलनायक के बिना न उस की नींव तैयार होगी न ही उस की नैया पार लगेगी। प्रतिनायक की यह भूमिका हमारी हिंदी फ़िल्मों की संजीवनी भी है, इस से भला कौन इंकार कर सकता है?

नूतन के नयनों की आग अब नहीं दहकती


उन बोलते, मद भरे अकुलाए नयनों को मुदे हुए अब कोई दो दशक बीत गए। नूतन के नयनों की आग अब नहीं दहकती। वह आग अब थिरती, थरथराती सेल्यूलाइड के परदे पर कोई नया दंश, नया देश, नया वेग और नूतन अभिनय नहीं गढ़ती। आग सौंदर्य की, बेकली की और अब लगभग बिसरते हुए नारी सुलभ झिझक की। झिझक और संकोच का जो शऊर हिंदी फ़िल्मों में नूतन परोस गई हैं वह अविरल ही नहीं कहीं-कहीं अनबूझ भी है। उनके इस अभिनय की गूंज और उसके विस्तार ही का सुफल था कि वह फ़िल्म नायिकाओं के लिए एक मानदंड बन कर उभरीं और छा गईं। धुर व्यावसायिक फ़िल्मों में काम करते हुए भी वह बरबस कलात्मक अभिनय की रेखाएं गढ़ जाती रहीं। एक नहीं अनेक बार। उनका मुखाभिनय ही उनकी ख़ास शैली थी। बल्कि कहूं कि यह मुखाभिनय उनकी पहचान में शुमार भर नहीं था, उन्हें मील का पत्थर भी बना गया।
उनके मुखाभिनय का फलक भी काफी विस्तार के साथ उनकी आंखों में, तरल आंखों में उपस्थित रहता था। उनकी हिरनी सी आकुल आंखों और पतले होठों की जो मार थी, वह हलके से हलके दृश्यों को भी दमदार बना देती थी। इतना ही नहीं मुझे तो लगता है शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, दीप्ति नवल, तब्बू और अब बिपाशा बसु सरीखी अभिनेत्रियों की नींव में हैं नूतन। यह सारी अभिनेत्रियां नूतन ही का विस्तार जान पड़ती हैं। बंदिनी नूतन की महत्वपूर्ण फ़िल्म है। इस एक बंदिनी में नूतन का अभिनय संसार एक साथ कई क्षितिजों को छूता है। ‘मोरा गोरा अंग लइ ले, मोहि श्याम रंग दई दे’ गुलज़ार लिखित और निर्देशित इस गीत में नूतन बिलकुल लरिकइयां का सा माहौल बुनती हैं। जेल में गाने वाले गीत में जो सरलता वह विकट विह्वलता के साथ बुनती हैं वह गुनने और गुनगुनाने की गमक को चमक दे जाता है। अशोक कुमार के साथ वाले दृश्यों में वह दुस्साहसी प्रेमिका का रूप इस विकलता से जीती हैं कि अशोक कुमार भी कई बार भहरा जाते हैं। ख़ास कर फ़िल्म के उस अंतिम फ्रेम में जब ‘मेरे साजन हैं उस पार, मैं इस पार’ गीत को एस.डी. बर्मन की गायकी लगभग गुहारती है तो नूतन के होंठ तो हिल हिल के ख़ामोश रह जाते हैं।

पर आंखें? आंखें ख़ामोशी तोड़ कर बोलती ही नहीं लगभग चीख़ती हुई पुकारती हैं, अशोक कुमार को ‘मैं बंदिनी पिया की।’ और वह दौड़ती क्या बिलकुल आंधी की तरह स्टार्ट स्टीमर में ऐसे चढ़ जाती हैं गोया भूचाल आया हो। उनके अभिनय की आग भी दरअसल यही है। नूतन की आंखों का उनके मुखाभिनय, बल्कि समूचे अंगाभिनय का इस एक फ्रेम में विमल राय ने नूतन का बेस्ट ले लिया है। मन के द्वंद्व को यहां देह से दिखाना नूतन ही के वश की बात थी। और न सिर्फ़ मन का द्वंद्व, मन की तरलता भी इस आर्द्रता से वह परोसती हैं कि मन उद्वेलित हुए बिना नहीं रह पाता। एस.डी. बर्मन की गायकी की गुहार और नूतन की आंखों की पुकार विमल राय के निर्देशन में मथ कर, एक साथ मिल कर हिंदी सिने दुनिया को एक ऐसा यादगार फ्रेम थमा जाती हैं जिसका रंग बड़ा दाहक है। इसी फ़िल्म में कै़दी का जीवन जीते हुए ख़ास कर चक्की पीसने वाले दृश्य में जो रंग वह भरती हैं उससे धर्मेंद्र भी ध्वस्त हो जाते हैं।

संकोच, झिझक, अकुलाहट और तिस पर आग भरी आह जब वह एक मीठे से गीत में भी भर देती हैं अपने अभिनय के बूते तो वह अभिनय का अनुपम अनुभव संसार भी हमें थमा जाती हैं। ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देस, पिया का घर प्यारा लगे।’ गीत इस का सर्वोत्तम उदाहरण है। फ़िल्म सरस्वती चंद्र के इस गीत में नूतन तल्ख़ी और चुलबुलापन एक साथ चुआती हैं तो उसकी चुभन चिहुंकाती भी है। नूतन के ठुमके में इस गीत के दो अंतर्विरोधी रंग इस कसाव के साथ कसमसाते हैं कि कूतना कठिन हो जाता है। मोहक मादकता का रंग ‘पिया’ के लिए तो तल्ख़ी की तुर्शी और ताव प्रेमी के लिए। ‘छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए, यह मुनासिब नहीं आदमी के लिए।’ गीत में भी उनका तेवर देखने लायक है।

नूतन ने सुजाता और सीमा जैसी यादगार फ़िल्में की तो छलिया जैसी चालू फ़िल्मों से भी वह बाबस्ता रहीं। ‘दिल ने फिर याद किया’ फ़िल्म में नूतन धर्मेंद्र और रहमान के साथ हैं। ‘दिल ने फिर याद किया’, बर्क सी लहराई है’ गीत में हालांकि बाज़ी रहमान मारते हैं और बीस ठहरते हैं पर नूतन सुमन कल्यानपुर की आवाज़ में जब शम्मआ की क़िस्मत क्या है उच्चारती हैं तो लगता है कि जैसे बर्फ़ पिघल गई हो और उनका बुर्का इसमें काफी इज़ाफ़ा भरता है। कोई चार दशक से भी ज़्यादा समय तक हिंदी सिनेमा में समाई हुई नूतन जैसे विविध चरित्र जीती रहीं, किसी एक फ्रेम या चौखटे में फिट नहीं रहीं। कहूं कि ग्लैमर गर्ल बन कर नहीं (इस्मत चुगताई वाली फ़िल्म छोड़ कर जिसमें वह बलराज साहनी और तलत महमूद के साथ थीं) रहीं। पर करोड़ों दिलों पर बड़ी संजीदगी से राज करती रहीं और शायद अभी भी करती रहेंगी। बीच में कुछ समय तक वह शादी वादी करके बच्चे पालने में लग गईं। फिर कुछ दिन बाद जब वह पलटीं तो मैं तुलसी तेरे आंगन की में विजय आनंद और आशा पारेख के साथ राज खोसला के निर्देशन में।

‘मैं तुलसी तेरे आंगन’ की गीत हालांकि फ़िल्माया मुख्यतः आशा पारेख पर गया है पर वह दर्ज नूतन ही के खाते में होता है। सौतिया डाह की जो शिफ़त जिस श्रेष्ठता और शिद्दत के साथ, जिस जूझ और जद्दोहद के साथ नूतन उकेरती हैं वह दहला देने वाला है। ख़ास कर रौशनदान के पास उनकी तनाव भरी चहलक़दमी उनके अभिनय का सबसे चटक रंग गढ़ती है। दरअसल सच यह है कि नूतन बनी ही थीं बेचारगी के अभिनय के ख़ातिर। वह जानी भी इसी लिए गईं पीड़ित और अपमानित पत्नी की ढेरों भूमिकाएं उन्होंने हिंदी फ़िल्मों में की। सौदागर में तथा साजन बिना सुहागन फ़िल्मों के फ्रेम भी इसी बेचारगी में भीगे हुए हैं। सौदागर में अमिताभ बच्चन और पदमा खन्ना उनके साथ हैं। इसमें शोख़ी पदमा के हिस्से है और बेचारगी नूतन के हिस्से। नूतन ने दिल बैठा देने वाली परित्यकता की जो त्रासदी सौदागर में जिया है, वह हिला कर रखी देती है।
छः फ़िल्म फे़यर एवार्ड समेटे सादे नाक नक्श वाली नूतन संजीदा अभिनेत्री के नाते दर्शकों के एक ख़ास कोने में हमेशा जमी रहीं। सही मायने में नूतन स्टार वाली हिरोइन नहीं थी। वह तो अभिनेत्री थीं। शायद इसी लिए चार दशक का लंबा फ़िल्मी सफ़र बिना ज़्यादा उतार चढ़ाव के वह जी गईं। और ग्लैमर के गंध को वह ज़्यादा नहीं जी पाईं तो यह अच्छा ही हुआ। अगर नूतन भी ग्लैमर की गमक में डूब गई होतीं तो हम से एक संवेदनशील अभिनेत्री क्षमा करें विरल संवेदना को जीने वाली यह छरहरी अभिनेत्री हम से बहुत पहले ही बिला गई होती। जब कि नूतन का फिगर उनकी उम्र के आख़ीर चौवनवें बसंत में भी ऐसा था कि षोडषी की भूमिका में भी फिट पड़ती थीं। शुरू ही से उनका फिगर ऐसा था और वह चाहतीं तो ग्लैमर गर्ल बन कर काफी चमक बटोर सकती थीं। अपनी छोटी बहन तनूजा की तरह। या मां शोभना समर्थ की तरह। लेकिन उन्होंने अपने फिगर से चमक बटोरने के बजाय दमक ही बटोरना ठीक समझा। अभिनय की दमक। तब जब कि नूतन की समकालीन वहीदा रहमान, शर्मिला टैगोर जैसी संवेदनशील अभिनेत्रियां ग्लैमर में ऊभ चूभ रहीं।

पर नूतन? नूतन तो अपनी सादगी और उनके दर्शक भी उनकी सादगी पर ही मरते मिटते रहे। वह अस्सी के दशक में अपने बेटे मोहनीश बहल को तो फ़िल्मों में ठीक से नहीं टिका पाईं पर खुद की उपस्थिति पर उंगली नहीं उठने दी। मेरी जंग और कर्मा में चरित्र अभिनेत्री क्या मां बन के वर्ह आइं। पर नई नवेली हीरोइनों की छुट्टी करती हुई। नूतन के दपदपाते सौंदर्य की सौम्यता की आंच में इन हीरोइनों का लपलपाता मेकअप वाला सौंदर्य बुझ-बुझ जाता है। सिर्फ़ यह पर्दे पर देख कर कोई कह नहीं सकता था कि वह पचास की हो गई हैं शायद इसी लिए कर्मा और मेरी जंग दोनों फ़िल्मों के मुख्य गाने नूतन पर फ़िल्माए गए। मेरी जंग में जिस विक्षिप्त स्त्री को वह जीती हैं और जिस संक्षिप्तता में जीती हैं उसमें भी उनकी आंखों का अंगार लपलपाता रहता है। जबकि ‘ज़िंदगी हर क़दम एक नई जंग है’ गीत में उनकी आंख की ललक दर्ज करने लायक़ है। कर्मा में तो वह दिलीप कुमार के साथ हैं और ‘ऐ वतन तेरे लिए’ और ‘दुनिया भर में अफसर हूं पर आई लव यू।’ में वह साबित करती हैं कि दिलीप कुमार से उनकी परफार्मेंस दबती नहीं है, वरन उभरती है।

आखि़री बार नूतन छोटे पर्दे पर आईं विमल मित्र के मुजरिम हाज़िर में विधवा की केंद्रीय भूमिका में। उत्पल दत्त के साथ उन्हें अभिनय की नई रेखाएं फिर गढ़ने को मिलीं। डोली वाले दृश्यों में जो बेकली वह उड़ेलती हैं लगभग उसी अनुपात में उत्पल दत्त के साथ के दृश्यों में धारदार संवादों के बावजूद संकोच भी परोसती हैं तो उनका अभिनय अंगार बन जाता है, उनकी आह हाहाकार बन जाती है। मिलन फ़ि़ल्म के ‘युग-युग से ये गीत मिलन के गाते रहे हैं गाते रहेंगे’ गीत में नूतन की आंखों में जो उल्लास उमड़ता है, ‘सावन का महीना पवन करे सोर’ में जो अबोधता छलकती है, वह उल्लास और अबोधता पर्दे पर अब नहीं गढ़ी जाती। क्यों? क्योंकि नूतन को हमसे बिलाए दो दशक हो गए हैं। वह पिया के घर दूर कहीं चली गई हैं। कबीर के पिया के घर। वह गीत गाती हुई ‘मैं तो भूल चली बाबुल का देस, पिया का घर प्यारा लगे।’ ठीक वही तल्ख़ी ठीक वही दंश, वही आह, और वही अंगार जो वह सरस्वती चंद्र में ठुमके लगा कर बो जाती हैं। (साभार-लमही)

अमिताभ बच्चन की सफलता और विनम्रता की मार्केटिंग



अमिताभ बच्चन अब तो जब-तब लखनऊ आते रहते हैं। पर पहले ऐसा नहीं था। बहरहाल वह जब 1996 में एक बार लखनऊ आए थे तब मैं ने उन से एक लंबा इंटरव्यू लिया था। हिंदी फ़िल्मों में ऊट-पटांग ट्रीटमेंट पर जब बात की तो वह अपनी तरफ से कुछ कहने के बजाय हरिवंश राय बच्चन की शरण में चले गए।
बोले, 'बाबू जी कहते हैं कि हिंदी फ़िल्में पोयटिक जस्टिस करती हैं।' और भी बहुतेरी बातें अमिताभ ने बताईं। जिन सब का व्योरा दे पाना यहां मुमकिन नहीं है। हां पूरी बातचीत में उन की अतिशय विनम्रता ने मुझे बहुत चकित किया। क्यों कि बहुतेरे फ़िल्मी अभिनेताओं-अभिनेत्रियों,राजनितिज्ञों या और अन्य तमाम लोगों से मिलने बतियाने का मुझे मौका मिलता रहा है। दिलीप कुमार तक से दो बार मिला हूं। वह कलफ़ लगी उर्दू ही बोलते हैं या फिर अंगरेजी। और उन के मिलने-बतियाने में भी वह कलफ़ उतरती नहीं है। बल्कि और चढ़ जाती है। ज़्यादातर लोगों का मिजाज बहुत दिखावे वाला होता है। उपेक्षित भाव से मिलते हैं। कई बार अपमानित करने का भाव भी मिल जाता है। लेकिन भीतर से। बाहर से तो वह हंसते हुए ही मिलते हैं। पर पता तो चल ही जाता है। पर तब मैं ने पाया कि अमिताभ बच्चन इस से बिलकुल उलट हैं।
उन की अतिशय विनम्रता से जब मैं अफना गया तो उन से पूछ ही लिया इंटरव्यू खत्म होने के बाद कि,'यह जो आप की अतिशय विनम्रता है, वह ओढ़ी हुई है, अभिनय है या सचमुच ही आप इतने विनम्र हैं?' यह सवाल सुन कर कोई भी भड़क सकता है। पर यह देखिए अमिताभ बच्चन बिलकुल नहीं भड़के। उलटे और विनम्र हो गए। हाथ जोड़ कर बोले, 'अब आप जो समझ लें।' यह कह कर मुसकुरा पडे़। बहुत बाद में जब कौन बनेगा करोड़पति आया तब भी सब के साथ उन की विनम्रता की वही भंगिमा, विनय की उसी भाषा से हम बार-बार परिचित होते रहे। तो क्या अमिताभ बच्चन तमाम अंतरविरोधों के बावजू्द इस लिए सफल हैं कि वह विनय की भाषा जानते हैं और कि अतिशय विनम्र हैं?
मित्रो, आप की क्या राय है? तब और जब उन के प्रबल प्रतिद्वंद्वी शत्रुघ्न सिन्‍हा को भी उन की नकल करते हुए भोजपुरी में उतरना पड़ता है। शत्रुघ्न सिन्‍हा भी पहले लखनऊ बहुत आते थे। तब वह भी यहां से चुनाव लड़ने का मन बना रहे थे। बावजूद इस के बतियाते वह तिरछा हो कर ही थे। पर अब तो वह भी विनम्रता का चोला ओढ़ चले हैं। हालां कि रस्सी भले जल गई हो पर अकड़ अभी गई नहीं है उन की। सारी विनम्रता उन की एक 'खामोश' में डूब जाती है। फिर भी बाज़ार में सफलता की कुंजी अब विनम्रता की तराजू पर चढ़ कर ही मिल रही है। सो विनम्रता का चोला मुफ़ीद पड़ने लगा है। यकीन न हो तो एक ही परिवार के राहुल गांधी और वरूण गांधी से मिल लीजिए। बात समझ में आ जाएगी। जब कि काम और लक्ष्य दोनों का एक ही है।
खैर बात यहां अमिताभ बच्चन और उन की विनम्रता की हो रही थी। तो उन के फ़िल्मी रुतबे को छीनने के सब से बडे़ दावेदार शाहरूख भी उन का कद छीनते-छीनते उन्हीं के जिए को दुहराने लगते हैं। सवाल यह भी है कि क्या यह सिर्फ़ उन की विनम्रता ही है या मार्केटिंग मैनेजमेंट भी है? कि वह अपने को बेचने के लिए कहिए या जमाए रखने के लिए कुछ भी बेच लेते हैं। हाजमोला से ले कर तेल, ट्रैक्टर, सीमेंट वगैरह सब। इतना कि लोग कहते हैं कि वह पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यहां तक कि पैंट भी उतार सकते हैं। सफलता और द्रौपदी जीतने के लिए। तो फिर अकड़ क्या चीज़ है।
यह इस लिए भी कहा कि यह वही अमिताभ बच्चन हैं जो एक समय जब शुरुआती शिखर पर थे तब प्रेस का ही क्या अपनी इस विनम्रता का भी बायकाट किए हुए थे। पर जब वह शिखर से सरके तो लौटे विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन कर ही। और वह अब अपने ही गढे़ शिखर पर फिर विराजमान हैं। जहां लोग फटक भी नहीं पा रहे। नहीं होने को तो राजेश खन्ना भी हम लोगों के बीच अभी भी हैं, जिन से स्टारडम छीन कर ही अमिताभ बच्चन सुपर स्टार बने। तब जब कि राजेश खन्ना की फ़िल्मोग्राफी में अमिताभ से ज़्यादा फ़िल्में हैं, ज़्यादा सफल फ़िल्में हैं, ज़्यादा अच्छे गाने हैं। तब के समय वह अमिताभ से भी ज़्यादा लोकप्रिय थे। फिर भी राजेश खन्ना आज की तारीख में बिसर गए हैं।
तो यह क्या है? क्या वह विनम्रता और मार्केटिंग मैनेजमेंट में गच्चा खा गए? जो भी है आज की तारीख में अमिताभ से लोहा लेने वाला कोई और दीखता नहीं फ़िल्म इंड्स्ट्री में। न विनम्रता में, न मार्केटिंग मैनेजमेंट में। पर इस विनम्रता में मिलावट कितनी है इस की निर्मम पडताल भी ज़रूरी है। बेहद ज़रूरी। हम सभी जानते हैं और देखते भी हैं कि अमिताभ बच्चन अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताओं का पाठ बडे़ मन और जतन से करते हैं। खास कर मधुशाला का सस्वर पाठ कर तो वह लहालोट हो जाते हैं। अपने अशोक वाजपेयी भी अमिताभ के इस बच्चन कविता पाठ के भंवर में जैसे डूबे ही नहीं लहालोट भी हो गए।
अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल की जन्मशती पर उन्हों ने योजना बनाई कि इन कवियों की कविताओं का पाठ क्यों न अमिताभ बच्चन से ही करवा लिया जाए। उन्हों ने अमिताभ बच्चन को चिट्ठी लिखी इस बारे में। और सीधा प्रस्ताव रखा कि वह इन कवियों की कविताओं का पाठ करना कुबूल करें। और कि अगर वह चाहें तो कविताओं का चयन उन की सुविधा से वह खुद कर देंगे। बस वह काव्यपाठ करना मंजूर कर लें। जगह और प्रायोजक भी वह अपनी सुविधा से तय कर लें। सुविधा के लिए अशोक वाजपेयी ने हरिवंश राय बच्चन से अपने संबंधों का हवाला भी दिया। साथ ही उन के ससुर और पत्रकार रहे तरुण कुमार भादुडी से भी अपने याराना होने का वास्ता भी दिया। पर अमिताभ बच्चन ने सांस नहीं ली तो नहीं ली।
अशोक वाजपेयी ने कुछ दिन इंतज़ार के बाद फिर एक चिट्ठी भेजी अमिताभ को। पर वह फिर भी निरुत्तर रहे। जवाब या हां की कौन कहे पत्र की पावती तक नहीं मिली अशोक वाजपेयी को। पर उन की नादानी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्हों ने जनसत्ता में अपने कालम कभी कभार विस्तार से इस बारे में लिखा भी। फिर भी अमिताभ बच्चन नहीं पसीजे। न उन की विनम्रता जागी। इस लिए कि कवितापाठ में उन के पिता की कविता की बात नहीं थी, उन की मार्केटिंग नहीं थी, उन को पैसा नहीं मिल रहा था।
अशोक वाजपेयी आईएएस अफ़सर रहे हैं, विद्वान आलोचक और संवेदनशील कवि हैं, बावजूद इस सब के वह भी अमिताभ बच्चन के विनम्रता के टूल में फंस गए। विनम्रता के मार्केटिंग टूल में। तो हम आप क्या चीज़ हैं? पता नहीं क्यों मुझे कई बार लगता है कि अमिताभ उतने ही विनम्र है जितने कि वह किसान हैं। बाराबंकी में उन की बहू ऐश्वर्या के नाम पर बनने वाला स्कूल उन के किसान बनने की पहली विसात थी। किसान नहीं बन पाए तो स्कूल की बछिया दान में दे दी। स्कूल नहीं बना तो उन की बला से। वह तो फिर से लखनऊ में किसान बन गए। और विनम्रता की बेल ऐसी फैली कि यह देखिए वह अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर फ़ोटो भी खिंचवा कर अखबारों में छपवा बैठे। अब जो संतुष्टि उन्हें अपने पिता की कविताओं का पाठ कर के या अपने खेत में ट्रैक्टर चला कर मिलेगी, उन की विनम्रता को जो खाद मिलेगी वह अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन या केदार की कविताओं के पाठ से तो मिलने से रही।
यह भी एक अबूझ रेखा है कि वह अपनी रेखा को भी उसी विनम्रता से भुलाए बैठे हैं। किसी से उस बारे में बात तक नहीं करते। पर जब इंडिया क्रिकेट में विश्वकप जीतती है तो अद्भुत विनम्रता से वह चैनल वालों को सूचित कर के आधी रात को मुंबई की सड़कों पर जश्न मनाने निकल पड़ते हैं। बेटे, बहू को साथ ले कर। पूरी विनम्रता से सब का अभिवादन स्वीकार करते। आइए हम भी, आप भी उन की इस विनम्रता को प्रणाम करें। तब और जब अभी वह आरक्षण की आग अभी बस जलाने ही वाले हैं बरास्ता प्रकाश झा।

हिंदी फ़िल्मों में रोमांस का रस



हिंदी फ़िल्मों में रोमांस उतना ही पुराना है, उतना ही शाश्वत और चिरंतन है जितना कि हिंदी फ़िल्म है, जितना कि हमारा जीवन है, जितना कि यह ब्रह्मांड है। सोचिए कि बिना प्रेम के यह दुनिया होती तो भला कैसी होती? और फिर फ़िल्म और वह भी बिना प्रेम के? शायद सांस भी नहीं ले पाती। और मामला फिर वहीं आ कर सिमट जाता कि 'जब दिल ही टूट गया तो जी के क्या करेंगे?' और फिर जो 'दिल दा मामला' न होता तो 'तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा' भी भला कहां होती और भला कैसे बहती?
हम कैसे गाते भला 'बचपन की मुहब्बत को दिल से न जुदा करना! जब याद मेरी आए मिलने की दुआ करना!' कैसे सुनते 'जब तुम ही चले परदेस/छुड़ा कर देस/ तो प्रीतम प्यारा/ दुनिया में कौन हमारा!' कहां से सुनते 'ओ दुनिया के रखवाले/ सुन दर्द भरे मेरे नाले! मंदिर गिरिजा फिर बन जाता/ दिल को कौन संभाले?' दरअसल हिंदी फ़िल्मों में प्रेम का पाग इतना गहरा, इतना रसीला, इतना मधुर और इतना चटक है कि उसकी महक और उस की चहक झूले में पवन के आई बहार भी प्यार बन के ही छलकती है। इतना कि कोयल कूकने लगती है, मोर नाचने लगता है और मन मल्हार गाने ही लगता है। प्यार की चादर हिंदी फ़िल्मों में इतनी तरह से बीनी गई कि उसे किसी एक रंग, एक पन और एक गंध में नहीं बांध सकते हैं, न जान सकते हैं। परदे पर यों तो प्रेम के जाने कितने पाग हैं पर राजकपूर ने जो चाव, जो चमक और जो धमक प्रेम का उपस्थित किया है वह अविरल है। आवारा हालां कि एक सामाजिक फ़िल्म थी पर चाशनी उस में प्रेम की ही गाढ़ी थी। शायद तभी से प्यार को आवारगी का जामा भी पहना दिया गया। आवारा हूं गाने ने इस की चमक को और धमक दी। हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा, दीवाना सैकड़ों में पहचाना जाएगा जैसे गीतों के मार्फ़त राज कपूर ने इस आवारगी के जामे को और परवान चढ़ाया।
बाबी में तो वह साफ कहते ही हैं- देती है दिल दे, बदले में दिल ले। संगम, हिना, राम तेरी गंगा मैली हो गई जैसी उन की फ़िल्में प्रेम के ही बखान में पगी हैं तो प्रेम रोग, श्री चार सौ बीस, जिस देस में गंगा बहती है का कथ्य अलग-अलग है, बावजूद इस के बिना प्यार के यह फ़िल्में भी सांस नहीं ले पातीं। प्रेम रोग है तो विधवा जीवन की त्रासदी पर लेकिन उस की बुनियाद और अंजाम प्रेम की मज़बूत नींव पर टिकी है। इसी तरह जिस देस में गंगा बहती है है तो डाकू समस्या पर लेकिन इस की नाव भी प्रेम की नदी में ही तैरती मिलती है। मेरा नाम जोकर तो जैसे राजकपूर के प्रेम की व्याख्या ही में ही, उस की स्थापना में ही रची-बसी है। जाने कहां गए वो दिन कहते थे तेरी याद में नज़रों को हम बिछाएंगे जैसे गीत राजकपूर के प्यार की समुंदर जैसी गहराई का पता देते हैं। प्यार कि जिस विकलता और उस की विफलता को सूत्र दिया है मेरा नाम जोकर में वह अविरल ही नहीं अनूठा और अंतहीन है।
राजकपूर के बाद अगर किसी ने प्यार को उसी बेकली को विभोर हो कर बांचा है तो वह हैं यश चोपड़ा। उन की भी लगभग सभी फ़िल्में प्यार की ही पुलक में पगी पड़ी हैं। वह जैसे प्यार को ही स्वर देने के लिए फ़िल्में बनाते रहे हैं। कभी-कभी से लगायत वीर जारा तक वह एक से एक प्रेम कथाएं परोसते हैं। चांदनी, लम्हे, कुछ कुछ होता है, दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे भी उन की इसी राह का पता देती हैं। लम्हे तो अविस्मरणीय है। प्यार की बनी बनाई लीक से कोसों दूर ही नहीं, पलट कर भी है। गुरुदत्त की कागज के फूल और चौदवीं की रात या फिर साहब बीवी और गुलाम और प्यासा भी प्यार की अकथ कहानी ही कहती हैं। गुरुदत्त की फ़िल्मों में प्यार का जो ठहराव और बुनाव है वह अन्यत्र दुर्लभ है। दिलीप कुमार, देवानंद और राजकपूर जब प्रेम को ग्लैमर में बांध रहे थे तब गुरुदत्त प्यार को सादगी की चांदनी में चटक कर रहे थे। यह आसान नहीं था। दिलीप कुमार अभिनीत और विमल राय द्वारा निर्देशित देवदास हिंदी फ़िल्म में रोमांस का मानक बन कर उभरी तो गुरुदत्त की कागज के फूल रोमांस का एक नया क्राफ़्ट ले कर हमारे सामने उपस्थित है। देवानंद की गाइड प्रेम का एक नया ही बिरवा रचती है। प्रेम पुजारी, तेरे मेरे सपने में प्रेम की दूसरी इबारत वह भले लिखते हैं पर गाइड को वह छू भी नहीं पाते।
प्यार की बात चले और पाकीज़ा को हम भूल जाएं? भला कैसे संभव है। एक सादी सी फ़िल्म हो कर भी अपने गीतों और संवादों के चलते पाकीज़ा प्रेम की एक नई डगर पर हिंदी सिनेमा को ले जाती है। फिरते हैं हम अकेले/ बाहों में कोई ले ले/ आखिर कोई कहां तक तनहाइयों से खेले की जो स्वीकारोक्ति है वह आसान नहीं है। पांव ज़मीन पर मत रखिएगा, नहीं मैले हो जाएंगे या फिर अफ़सोस कि लोग दूध से भी जल जाते हैं जैसे मोहक और मारक संवाद और इस के दिलकश गाने पाकीज़ा को उस की पाकीज़गी तक इस आसानी से ले जाते हैं कि फिर कोई और फ़िल्म इस को छू नहीं पाती। तो कमाल अमरोही के समर्पण और उन के संवादों की ही यह तासीर है कुछ और नहीं। लेकिन जो कहते हैं कि मुहब्बत में बगावत वह पहली बार अपने दाहक रुप में अगर उपस्थित हुआ तो मुगले-आज़म में ही। कमाल अमरोही की ही कलम का यह कमाल है कि मुगले-आज़म में प्यार का जो अंदाज़ पेश किया के आसिफ़ ने उसे अभी तक कोई लांघना या साधना तो बहुत दूर की बात है कोई छू भी नहीं सका है। 'जब प्यार किया तो डरना क्या' का मानक अभी भी सिर चढ़ कर बोलता है। प्रेम कहानी पर इतनी मेहनत, इतना समर्पण, इतनी निष्ठा कभी फिर देखी नहीं गई किसी फ़िल्म में। सोचिए भला कोई निर्देशक फ़िल्म पर इतना आसक्त हो जाए कि फ़िल्म स्टूडियो में ही चटाई बिछा कर रोज-ब-रोज सोने लगे? पर के. आसिफ़ तो सोते थे। इस फ़िल्म को ले कर जाने कितनी कहानियां, किताबें लिखी और सुनाई गई हैं कि पूछिए मत। दो तीन वाकए यहां हम भी सुनाए देते हैं। बल्कि दुहराए देते हैं। सुनाए तो और लोगों ने हैं।
कभी नौशाद साहब यह वाकया सुनाते थे। एक दिन के आसिफ़ ने उन से पूछा कि ये तानसेन वाला गाना किस से गवाया जाए! तो नौशाद साहब ने फ़र्माया कि आज के तानसेन तो बडे़ गुलाम अली साहब हैं। उन्हीं से गवाना चाहिए। पर एक दिक्कत यह है कि वह गाएंगे नहीं। क्यों कि वह प्लेबैक नहीं देते। पर के आसिफ़ ने नौशाद से कहा कि वह गाएंगे। आप चलिए उन के पास। नौशाद ने बहुत ना-नुकुर की। पर के आसिफ़ माने नहीं। पहुंचे नौशाद को ले कर बडे़ गुलाम अली खां साहब के घर। नौशाद ने जैसा कि वह बताते थे बडे़ गुलाम अली साहब से सब कुछ बता दिया यह बताते हुए कि मैं ने इन्हें बता दिया है कि आप प्लेबैक नहीं देते हैं फिर भी यह आ गए हैं हम को ले कर। तो बडे़ गुलाम अली खां ने नौशाद से कहा कि ऐसा करते हैं कि इन से इतना ज़्यादा पैसा मांग लेते हैं कि यह खुद ही भाग जाएंगे। तो नौशाद साहब ने उन से कहा कि इस पर आप को पूरा अख्तियार है। नौशाद साहब बताते थे कि उन दिनों सब से महंगी गायिका थीं लता मंगेशकर। वह एक गाने का तब पांच सौ रुपए लेती थीं। और बडे़ गुलाम अली खां साहब ने के आसिफ़ से तब एक गाने का पचीस हज़ार रुपए मांग लिया। के आसिफ़ तब सिगरेट पी रहे थे। पचीस हज़ार सुनते ही उन्हों ने सिगरेट से राख झाड़ी और बोले, 'डन !' फिर अपनी जेब से दस हज़ार रुपए बडे़ गुलाम अली साहब को देते हुए बोले, 'अभी इसे रखिए बाकी भिजवाता हूं।'
अब जब गाना रिकार्ड होने लगा तो जो चाहते थे नौशाद वह नहीं मिल पा रहा था। अंतत: बडे़ गुलाम अली खां नाराज हो गए। और बोले कि पहले फ़िल्म शूट करो फिर मैं गाऊंगा। अब देखिए रातोंरात दिलीप कुमार और मधुबाला को बुला कर फ़िल्म शूट की गई और फिर गाना रिकार्ड किया गया। नतीज़ा देखिए कि क्या राग आलापा खां सहब ने! ऐसे ही एक दृश्य में तपती रेत पर पृथ्वीराज कपूर को चलवाया के आसिफ़ ने। किसी ने कहा कि तपती रेत पर चलाते या ठंडी रेत पर चलाते कैमरा तो सिर्फ़ रेत ही दिखाएगा। तो के आसिफ़ बोले कि तपती रेत पर जो चेहरे पर तकलीफ़ चाहता था पृथ्वीराज कपूर से वह सिर्फ़ अभिनय से नहीं मिल पाता। इसी तरह एक दृश्य में उन्हों ने दिलीप कुमार को सोने के जूते पहनाए। जूते बनने के जब आर्डर के आसिफ़ दे रहे थे तब कैमरामैन ने उन से कहा कि ब्लैक एंड ह्वाइट में तो हमारा कैमरा वहां जूते को ठीक से दिखा भी नहीं पाएगा कि सोने का है तो क्या फ़ायदा? तो के आसिफ़ ने कहा कि सोने के जूते पहने कर हमारे हीरो के चेहरे पर जो भाव आएगा, जो चमक आएगी वह तो कैमरे में दिखेगा न? तो इतने समर्पण, इतनी निष्ठा से बनाई गई यह फ़िल्म मुगले आज़म रोमेंटिक फ़िल्मों का मानक और मक्का मदीना बन गई। जिस की मिसाल हाल फ़िलहाल तक कोई और नहीं है। एक एक दृश्य, एक एक संवाद और एक एक गाने आज भी उस के सलमे सितारे की तरह टंके हुए हैं।
बाद के दिनों में भी रोमेंटिक फ़िल्में बनीं आज भी बन रही हैं लेकिन मुगले आज़म के एक गाने में ही जो कहें कि पायल के गमों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं वाली बात हो कर रह गईं। और जो उस में एक संवाद है न कि दिल वालों का साथ देना दौलत वालों का नहीं। वह बात भी, वह तासीर भी बावजूद तमाम कोशिशों के नहीं बन पाई, नहीं आ पाई। हां प्यार के ट्रेंड ज़रूर बदलते रहे हैं, मिजाज और मूड बदलता रहा है। राजकपूर का अपना तेवर था, उन के प्यार में एक अजब ठहराव था। तो दिलीप कुमार के अंदाज़ में ट्रेजडी वाला ट्रेंड था। इतना कि उन्हें ट्रेजडी किंग कहा जाने लगा। तो वहीं शम्मी कपूर उछल कूद करते हुए याहू ट्रेंड सेटर हो गए। राजेश खन्ना अपनी फ़िल्मों में एक नया अंदाज़ ले कर एक नए तरह के प्रेमी बन कर उपस्थित हुए और एक नया स्टारडम रचा। बीच में अनिल धवन दोराहा और हवस के प्रेमी बन कर चल रहे थे। विजय अरोडा भी थे। हां धर्मेंद्र, जितेंद्र सरीखे नायक भी थे। ठीक वैसे ही जैसे पहले विश्वजीत, जाय मुखर्जी जैसे नायक भी थे। लेकिन राजेश खन्ना की फ़िल्मों का प्रेमी एक साथ प्रेम की कई इबारते बांच रहा था। प्रेम की एक नई पुलक की आंच में वह जो पाग पका रहे थे, उस में एक टटकापन और मस्ती भी थी। सिर्फ़ रोना धोना ही नहीं। अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्मों ने प्यार को भी गुस्से में बदलने की फ़ितरत परोसी। मतलब एंग्री यंगमैन अब प्यार कर रहा था। जो कभी अभिमान में गायक था, कभी-कभी में शायर था या एक नज़र में जुनून की हद से गुज़र जाने वाला प्रेमी अब तस्कर था दीवार में और प्यार कर रहा था। उसी तस्करी वाले अंदाज़ में। कि पिता पहले बनता है शादी की बात बाद में सोचता है। यह अनायास नहीं है कि चंदन सा बदन चंचल चितवन जैसा मादक गीत लिखने वाले इंदीवर बाद में सरकाय लेव खटिया जाड़ा लगे लिखने लगे। और अब तो सब कुछ शार्ट में बतलाओ ना, सीधे प्वाइंट पर आओ ना! या फिर इश्क के नाम पर अब सब रचाते रासलीला है मैं करुं तो साला करेक्टर ढीला है! जैसे गानों से हिंदी फ़िल्मों में रोमांस की बरसात हो रही है।
खैर अस्सी के दशक में जब मैंने प्यार किया आई तो सलमान खान प्यार के नए नायक बन गए। प्यार का एक नया ट्रेंड हिंदी फ़िल्मों मे आया। एक नई बयार बहने लगी। एंग्री यंगमैन के अंदाज़ से अब टीन एज अंदाज़ का रोमांस हिंदी फ़िल्मों में सांस लेने लगा। कयामत से कयामत तक की बात आ गई। बात फिर चूडी मजा न देगी, कंगन मजा न देगा से होने लगी। लगा कि रोमांस लौट आया है। लेकिन ओ जो मुकेश ने एक गाना गाया है न कि तुम अगर मुझ को न चाहो तो कोई बात नहीं, गैर के दिल को सराहोगी तो मुश्किल होगी वाले अंदाज़ में हिंदी फ़िल्में सांस लेने लगीं। जिस्म जैसी फ़िल्में आने लगीं जो बिपाशा जैसी खुली तबीयत वाली अभिनेत्रियों के मार्फ़त प्यार के बहाने देह की खिड़की खोल रही थीं और बता रही थीं कि प्यार अब पवित्र ही नहीं रहा सेक्स भी हो गया है। फिर तो प्यार के रंग में सेक्स का रंग सिर चढ़ कर बोलने लगा। और अब फ़सल सामने है। एक से एक चुंबन, एक से एक बोल्ड और न्यूड दृश्य अब आम बात हो चली है। मुन्नी बदनाम और शीला जवान हो गई तो जलेबी बाई भी भला काहे पीछे रहतीं? इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं या आप की याद आती रही रात भर अब बिसर कर अब बारह महीने में बारह तरीके से प्यार की इबारत बांचने लगा हिंदी सिनेमा का रोमांस।
एक समय था जब मधुबाला, मीना कुमारी, वैजयंती माला, आशा पारिख, वहीदा रहमान की बाहों और आहों में हिंदी सिनेमा रोमांस की गलबहियां करता था, रोमांस की चादर बीनता था। शोला जो भड़के, दिल मेरा धड़के या फिर जवानी बीत जाएगी ये रात फिर ना आएगी गा कर मन को प्यार के हिडोले पर बैठाता था। अशोक कुमार, राजकुमार, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त के साथ देविका रानी,साधना, नूतन, तनूजा हेमा मालिनी, रेखा, श्रीदेवी, जयाप्रदा, तब्बू के तेवर में प्यार के तराने गाने वाला हिंदी सिनेमा अब इमरान हाशमी और मलिका शेरावत के चुंबनों में चूर होने लगा। रोमांस की यह एक नई धरती एक नया आकाश हिदी सिनेमा के दिल में धड़कना और बसना शुरु हुआ। पहले फ़िल्मी गानों में पेड़ों की डालियां हिलती थीं अब देह हिलने लगी। हिलने क्या लगी उछले कूदने और दौड़ने लगी। रोमांस का एक नया रंग था। आनंद बख्शी कभी लिखते थे देवानंद के लिए बैठ जा बैठ गई और गाते थे किशोर कुमार पर अब तो लिरिक के नाम पर खड़ा का खड़ा गद्य और संगीत के नाम पर शोर सुनाई देने लगा है रोमेंटिक गानों में। गाने अब गाने नहीं डांस नंबर बन चले हैं। लिखते थे कभी चित्रलेखा सरीखी फ़िल्म के लिए साहिर लुधियानवी कि सखी रे मेरा मन उलझे, तन डोले! अब तो यह है कि तन ही तन है मन तो किसी भयानक खोह में समा गया है। शोखियों में घोला जाए थोड़ा सा शबाब उस में फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब होगा यूं नशा जो तैयार वो प्यार है प्यार! जैसे मादक और दाहक गीत लिखने वाले नीरज और उस को संगीत देने वाले सचिन देव वर्मन को जिस को याद करना हो करे अब तो डेल्ही बेली का गाना सुन रहे हैं लोग भाग बोस डी के। अब इस के उच्चारण में लोगों के मुह से गालियां निकलती हैं तो उन की बला से। यह एक नया रोमांस है।
भारत भूषण और मीना कुमारी का वह दौर नहीं है कि आप तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा के संगीत में आप गोते मारें। एक दूजे के लिए में गाती रही होंगी कभी लता मंगेशकर सोलह बरस की बाली उमर को सलाम ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम! अब तो आप सुनिए ज़रा शार्ट में समझाओ ना सीधे प्वाइंट पर आओ ना! अब सब कुछ हाइटेक है तो रोमांस भी कब तक भला और कैसे भला पीछे रहता? अब उस रोमांस का ज़माना बीत और रीत गया जिस को कभी सहगल, बेगम अख्तर, लता मंगेशकर, मुबारक बेगम,मुहम्मद रफ़ी, मुकेश किशोर, मन्ना डॆ या तलत महमूद, सुमन कल्यानपुर, मनहर हेमलता की गायकी में निर्माता निर्देशक और संगीतकार हिंदी फ़िल्मों मे परोसते थे। कभी लिखते रहे होंगे भरत व्यास, राजा मेंहदी अली खां, शकील बदांयूनी, साहिर लुधियानवी, नरेंद्र शर्मा, शैलेंद्र, नीरज, मज़रूह सुल्तानपुरी, गुलज़ार, जावेद अखतर प्रेम गीत। एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा या फिर चांदनी रात में एक बार तुझे देखा है, या मोरा गोरा अंग लई ले, मोहि श्याम रंग दई दे! भूल जाइए पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है और मत सोचिए कि ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! आप तो बस सीधे प्वाइंट पर आइए ना! और गाइए भाग बोस डी के !। आज की हिंदी फ़िल्म में रोमांस की यही कैफ़ियत है। आगे और बदलेगी।

रेखा का रंग ही कुछ और है


पहले शोख फिर सेक्स बम से अभिनय की बढ़त बनाने वाली रेखा की शोहरत एक संजीदा अभिनेत्री के सफ़र में बदल जाएगी यह भला किसे मालूम था? सावन भादो से शुरुआत करने वाली रेखा ने जब चार दशक पहले सेल्यूलाइड की दुनिया में सर्राटा भरा था तो लोग कहते थे कि उसे शऊर नहीं. न अभिनय का न जीने का. लेकिन वह तब की तारीख थी. अब की तारीख में रेखा की कैफ़ियत बदल गई है. अभिनय का शऊर और अपने जादू का जलवा तो वह कई बरसों से जता ही रही थीं, जीने की ललक और उसे करीने से कलफ़ देने का शऊर भी उन्हें अब आ ही गया है.

वह जब तब इस की कैफ़ियत और उस की तफ़सील देती, बांचती और परोसती ही रहती हैं. कई बार तो मुझे लगता है कि काश कि मैं औरत होता. और कि औरत हो कर भी मैं रेखा होता. सचमुच उन से बड़ा रश्क होता है. रश्क होता है उन के जीवन जीने के ढंग से, उन के प्यार करने और उस पर कुर्बान हो जाने के रंग से. उन के उस ज़ज़्बात और खयालात और उन के अंदाज़ से. इतना कि आज भी, 'रेखा ओ रेखा, जब से तुम्हें देखा, खाना-पीना, सोना दुश्वार हो गया, मैं आदमी था काम का बेकार हो गया.' टूट कर गाने को दिल करता है. मैं ने बहुतेरी कहानियां और उपन्यास लिखे हैं. पर दो चीज़ों पर लिखने की हसरत बार-बार बेकरार करती है. एक तो बुद्ध को ले कर एक उपन्यास लिखने की. दूसरे रेखा की बायोग्राफी या उन के जीवन पर एक वृहद उपन्यास लिखने की. आप कहेंगे कि क्या तुक है? बुद्ध और रेखा? दोनों दो द्वीप. कोई ओर छोर नहीं.


रेखा-अमिताभ
पर सच मानिए जितना मैं ने बुद्ध और रेखा को जाना है, दोनों मुझे बहुत पास-पास दिखते हैं. दोनों की यातना में काफी साम्य है. यह प्यार भी एक तपस्या है. बतर्ज़ ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो!  दोनों की दृष्टि आनंद की ओर है. दोनों ही जो घर फूंके आपना, चले हमारे साथ वाले हैं. खैर यह द्वैत-अद्वैत, दुविधा-असुविधा मेरी अपनी है. मुझे ही भोगने-भुगतने दीजिए. आप तो यहां रेखा, हमारी-अपनी रेखा पर गौर कीजिए. सोचिए और देखिए कि वह इस सदी के सो काल्ड महानायक से कैसे तो टूट कर प्यार करती हैं. टूट कर चूर-चूर हो जाती हैं पर शायद टूटती नहीं. और कि जुड़ी रहती हैं. प्यार के उस अटूट डोर से बंधी जुडी सिहरती- सकुचाती- ललचाती और कि अपने प्यार को जताती मुस्कुराती रहती हैं. उस अकेली, प्यार करती महिला का दुख और सुख निहारने में जाने कितनी आंखें बिछ-बिछ जाती हैं. बहुत सारे सिने समारोह इस के गवाह हैं. चैनलों के कैमरे सायास अमिताभ बच्चन और रेखा पर डोलते ही रहते है. अमिताभ तो अभिनेता बन जाते हैं और ऐसे व्यवहार करते हैं, ऐसे पेश आते हैं गोया रेखा वहां अनुपस्थित हैं या फिर वह उन्हें जानते ही नहीं. बतर्ज़ मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं. वो जा रहे हैं ऐसे हमें जानते नहीं.

पर रेखा? वह तो अंग-अंग से, रोम-रोम से अपनी उपस्थिति जताती, अपना प्यार छलकाती अपने पूरे वज़ूद, अपने पूरे रौ में रहती हैं. एक सिने समारोह का वह नज़ारा भूले नहीं भूलता कि ऐश्वर्या, अभिषेक बच्चन और अमिताभ बच्चन एक साथ आगे की पंक्ति में बैठे हुए थे. रेखा अचानक आईं और उन की ओर बढ़ चलीं. किसी दुस्साहसी प्रेमिका की तरह. गोया वह कोई वास्तविक दृश्य न हो कर फ़िल्मी दृश्य हो. वह आ कर ऐश्वर्या से गले लगीं, अभिषेक से गले लगीं और अभी अमिताभ की बारी आने ही वाली थी कि वह उठ कर ऐसे भाग चले जैसे वहां कोई सुनामी आ चली हो. कैमरों ने एक-एक स्टेप उन का कैद किया.चैनलों ने बार-बार इस दृश्य को दिखाया, पत्रिकाओं ने छापा. अब रेखा के प्यार के इस चटक रंग को आप किसी टेसू के फूल में वैसे ही तो घोल कर भूल नहीं ही जाएंगे? शोखियों मे तो घोलेंगे ही प्यार के फूल के इस शबाब को. जो हो रेखा के इस प्यार की इबारत को बांचना अभिभूत करता है.

याद कीजिए उन दिनों को. जब दो अनजाने फ़िल्म रिलीज़ हुई थी और अमिताभ जया को भुला कर रेखा के रंग में रंग गए थे. इतना कि तब चर्चा चली थी कि अमिताभ रेखा की शादी हो गई. खैर शादी हुई ऋषि कपूर और नीतू सिंह की. रेखा-अमिताभ भी आए. रेखा के माथे पर सिंदूर, पांव में बिछिया पर लोगों ने न सिर्फ़ गौर किया बल्कि अखबारों में ऋषि- नीतू की शादी की जगह रेखा-अमिताभ की फोटो छपी. जिस में रेखा के माथे पर लगे सिंदूर की शोखी कुछ ज़्यादा ही शुरूर में थी. खैर रेखा ने इस के पहले भी प्यार किए थे. अच्छे-बुरे. बाद में भी किए. पर वो सौतन की बेटी में उन्हीं पर फ़िल्माया एक गाना है - हम भूल गए रे हर बात मगर तेरा प्‍यार नहीं भूले. झूले तो कई बाहों में मगर तेरा साथ नहीं भूले. के शब्दों का ही जो सहारा लें तो कहें कि वह अमिताभ बच्चन को, उन के साथ को अभी तक नहीं भूली है, आगे भी खैर क्या भूलेंगी? और अब तो उड़ती सी खबर आए भी कुछ दिन हो चले हैं कि वह अमिताभ बच्चन के साथ किसी फ़िल्म में उन की पत्नी की भूमिका में आ रही हैं. खुदा खैर करे. और कि वह फ़िल्म आए ही आए.

अब लगभग विधवा जीवन [हालां कि उन के जीवन व्यवहार में यह वैधव्य कहीं दीखता नहीं, माथे पर चटक सिंदूर मय मंगलसूत्र के अभी भी खिलता है.] जी रही रेखा, हालां कि मुकेश अग्रवाल से उन के ही फ़ार्म हाऊस में हुए प्रेम फिर शादी और फिर मुकेश की आत्म हत्या प्रसंग को एक क्षणिक सुनामी मान भूल जाया जाए तो भी रेखा ने दरअसल जैसे ढेरों रद्दी फ़िल्मों में काम किया, कमोवेश उसी अनुपात में इधर-उधर मुंह भी खूब मारा. जिस की कोई मुकम्मल फ़ेहरिस्त नहीं बनती. ठीक वैसे ही जैसे उन्हों ने गिनती की कुछ श्रेष्‍ठ फ़िल्में कीं कुछेक फ़िल्मों में सर्वश्रेष्‍ठ अभिनय किया. कमोबेश इसी अनुपात में सर्वश्रेष्‍ठ प्रेम भी उन्हों ने किया और डंके की चोट पर किया. किरन कुमार, विनोद मेहरा, राज बब्बर, जितेंद्र, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र, शैलेंद्र सिंह, अमिताभ बच्चन और संजय दत्त, फ़ारूख अब्दुल्ला जैसे उन के प्रेम प्रसंग के तमाम बेहतरीन पड़ाव हैं. ठीक वैसे ही दो अंजाने, खूबसूरत, घर, उमराव जान, उत्सव और इज़ाज़त उन की बुलंद अभिनय यात्रा के उतने ही महत्वपूर्ण बिंदु हैं. बहुत ही महत्वपूर्ण.

दरअसल 1975 से 1985 तक का समय रेखा के लिए बड़ा महत्वपूर्ण है. इसी बीच वह अपने प्रेम प्रसंग के सब से महत्वपूर्ण पड़ाव अमिताभ बच्चन से जुड़ीं और लगभग उन की हमसफ़र बन गईं. इन्हीं दस सालों में उन्हों ने खूबसूरत, उमराव जान, उत्सव जैसी फ़िल्मों में काम किया और अपनी चुलबुली छवि को चूर किया. चूर उन के सपने भी हुए. सिलसिला आई और अमित जिन्हें वह बाद में 'वो' तक कहने लगी थीं, पहनने मंगलसूत्र भी लगी थीं, का संग साथ छूट गया. सहारा बने संजय दत्त. इन्हीं दिनों मुजफ़्फ़र अली की उमराव जान आ कर उन्हें जान दे गई थी. क्यों कि तब तक व्यावसायिक सिनेमा में नंबर वन की पोज़ीशन उन से पंगा लेने लगी थी. लेकिन उमराव जान की सादगी ने उन की शान बढ़ा दी थी. तभी एक रोज़ उन की संजय दत्त से शादी की खबर आ गई. दिल्ली के एक सांध्य दैनिक ने सब से पहले यह खबर न सिर्फ़ उछाल कर छापी बल्कि पहले पेज़ पर बैनर बना कर छापी थी मय फोटो के.

मुझे याद है तब प्रसिद्ध फ़िल्म पत्रकार अरविंद कुमार [फ़िल्मी पत्रिका माधुरी के संस्थापक संपादक जो तब सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट के संस्थापक संपादक थे और मैं उन का सहयोगी था तब.] इस खबर से बड़ा उदास हो गए थे. इस लिए नहीं कि रेखा ने अपने से 12-14 बरस छोटे संजय दत्त से शादी कर ली थी. बल्कि इस लिए कि एक अभिनेत्री जो अब अभिनय के शिखर को छू रही थी, शादी के बाद से सेल्यूलाइड की दुनिया को सैल्यूट कर जाएगी. हुआ भी यही. खैर तब की ठुकराई रेखा को फिर व्यापारी मुकेश अग्रवाल की छांव मिली. जो अंतत: मृगतृष्‍णा ही साबित हुई. हालां कि उन्हीं दिनों सारिका जब बिन व्याह के ही कमल हासन के बच्ची की मां बनीं तब रेखा को कुछ लोगों ने कुरेदा तो वह अपने को रोक नहीं पाईं और धैर्य खो रहे लोगों को धीरज बंधाया,' घबराइए नहीं बिन ब्याही मां नहीं बनूंगी.' और अपना कहा वह दुर्भाग्य से ब्याह के बाद भी निभा नहीं सकीं. शायद मातृत्व सुख उन के नसीब में नहीं था. वह रेखा जो अपनी ही खिंची-गढ़ी रेखाओं से आडे़- तिरछे, तिर्यक, समानांतर-वक्र करती काटती रही हैं.

खैर, आप सत्तर के दशक की शुरुआत वाली उन की उन फ़िल्मों की याद कीजिए जिन में वह नवीन निश्चल, विश्वजीत, किरन कुमार, रणधीर कपूर, विनोद मेहरा, और फिर जितेंद्र और धर्मेंद्र के साथ हीरोइन रही हैं. जिन में वह महज़ शो-पीस वाली, हीरो के गले से लिपट कर नाच कूद बस गाने गाती होती हैं. खिलंदडी, शोखी और चुलबुलाहट में तर, अभिनय की ऐसी-तैसी करती होती हैं. सावन भादो से ले कर अनोखी अदा, किस्मत तक की उन की फ़िल्मी यात्रा [अभिनय यात्रा नहीं] भी दरअसल दूसरे, तीसरे दर्ज़े की फ़िल्मों में देह दिखाऊ यात्रा भी है. भले ही वह मैक्सी ही क्यों न पहने हों, या साडी ही सही उन के कुल्हे मटकने ही होते थे. भारी-भारी नितंब और स्तन 'दिखने' ही 'दिखने' होते थे. तब रेखा थुलथुल होती जा रही थीं. बाद में वह न सिर्फ़ वज़न कम करने में लग गईं बल्कि योगा पर भाषण भी भाखने लगीं.

वही रेखा इस के बाद के दौर में अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, विनोद खन्ना, शशि कपूर आदि की फ़ेवरिट हिरोइन होते-होते हेमा मालिनी से नंबर वन की पोज़ीशन छीन बैठती हैं. तो लोगों को अचरज होने लगता है. कि अरे ये तो वही रेखा हैं. वह जब जुदाई में जीतेंद्र के साथ बारिश में भीग कर जादू चलाती हुई गाती हैं, 'मार गई मुझे तेरी जुदाई, डस गई ये तनहाई' तो सीटियां बजवाती हैं और उसी फ़िल्म में फिर वृद्धा की भूमिका कर वह लोगों से आंसू भी बहवा लेती हैं. बाद में तो जीतेंद्र के साथ ढेरों फ़िल्मों में वह जवानी और बुढ़ापे दोनों की भूमिका में आईं. अमिताभ बच्चन जब नंबर वन हुए तो उन की लगभग हर तीसरी फ़िल्म की हिरोइन रेखा ही हुईं. मुकद्दर का सिकंदर बनीं, वह ही सलामे इश्क मेरी जां ज़रा कुबूल कर ले गाती रहीं. नटवरलाल में परदेसिया ये सच है पिया, सब कहते हैं मैं रेखा ने तेरा दिल ले लिया भी वही गा रही थीं. लेकिन सच यह भी है कि अगर सिलसिला जो इन दोनों की अब तक की अंतिम फ़िल्म है, को छोड़ दें तो अमिताभ के साथ की गई रेखा की फ़िल्मों में रेखा की कोई यादगार या महत्‍वपूर्ण भूमिका याद नहीं आती.

हां, आलाप की याद आती है. शायद इस लिए भी कि अमिताभ की फ़िल्मों में हिरोइन के हिस्से कुछ बचता ही नहीं रहा है. [हालां कि अमिताभ अभिनीत ज़ंज़ीर, अभिमान, शोले और की एक नज़र भी जोड लें में, जया उन की हिरोइन हैं और अपनी उपस्थिति भी दर्ज़ कराती हैं, तो शायद इस लिए भी कि वह पहले से स्थापित और कि बड़ी हिरोइन हैं] तो सिलसिला में अमिताभ के बावजूद रेखा ने अभिनय की रेखाएं गढ़ीं तो सिर्फ़ इस लिए कि यहां विरह उन के हिस्से न था तो भी विरहिणी की सी आकुलता को उन्हें जीना था. जया और संजीव कुमार की उपस्थिति ने उसे और सघन बनाया. 'नीला आसमां खो गया' गा के उसे हेर लेना चाहती हैं. 'कुडी फंसे ना लंबुआ' के दिनों को फिर से फिरा लेना चाहती हैं. क्यों कि वह विरहिणी हैं पर हिरनियों सी कुलांच भी भरना जानती है. तो यह त्रासद संयोग और उस चरित्र की बुनावट को रेखा से भी सुंदर कोई बीन भी सकता था भला?

दरअसल मुझे लगता है कि रेखा विरह की ही नायिका हैं. जहां-जहां और जब-जब विरह उन के हिस्से आया है, विरहिणी को जिस कोमलता से वह 'बेस' देती हैं उन के समय की नायिकाओं में उन के मानिंद कोई और नहीं दीखती. विरहिणी की अकुलाहट की सघनता को घनत्व देने वाली नायिकाएं तो हैं.पर उसे सहजता भरी सादगी भी देने वाली? और उस सहजता में भी चुलबुलापन चुआने वाली? मेरी मंशा यहां त्रषिकेश मुखर्जी की दो फ़िल्मों 'खूबसूरत' और 'आलाप' की याद दिलाने की है. 'खूबसूरत' जब आई तो लोग यकायक चकित हो चले कि क्या यह वही खिलंदड़, थुलथुल [नमक हराम में भी यह रूप था रेखा का.] देह दिखाती, इतराती फिरने वाली रेखा है? 'खूबसूरत' तो समूची फ़िल्म ही खूबसूरत थी. पर रेखा? रेखा के तो कैरियर का बदलाव ही इसी फ़िल्म से हुआ जो बाद में कलयुग, उत्सव, उमराव जान और इज़ाज़त में जा पहुंचा.

फिर आई मुज़फ़्फ़र अली की उमराव जान. उमराव जान में उन के हीरो थे फ़ारूख शेख और राज बब्बर. पर जैसे खूबसूरत फ़िल्म रेखा के ही इर्द-गिर्द घूमती थी, उमराव जान में केंद्रीय भूमिका ही उन्हीं की थी. पर जिस लयबद्धता में उमराव जान को उन्हों ने अपने आप में उतारा, जिया और जीवन दिया कोई दूसरी अभिनेत्री उसे वह रंग शायद न दे पाती. उन की विरहिणी का यही शोला 'उत्सव' में आ कर भड़क जाता है. मन क्यों बहका रे बहका आधी रात को गीत में तो जैसे वह कलेजा काढ़ लेती हैं.शशि कपूर की गिरीश कर्नाड निर्देशित उत्सव हालां कि अपने कुछ उत्तेजक दृश्यों के लिए ज़्यादा जानी गई. और रेखा के बोल्ड सीन के आगे उन का अभिनय लोगों की आंखों में कम ही समा पाया. पर दरअसल रेखा के अभिनय का बारीक रेशा हमें उत्सव में ही मिलता है. अभिनय की जो बेला रेखा ने उत्सव में महकाई है वह हिंदी फ़िल्मों में विरल ही है.

इस के कुछ ही समय बाद आई खून भरी मांग भी तहलका मचा गई थी. और लोगों ने रेखा में बदले की आग ढूंढने की कोशिश की और उस में सफलता भी पा ली. पर अगर आंख भर जो आप 'खून भरी मांग' की रेखा को देखें, रेखा की आंखों को देखें तो वहां विरहिणी की ही आंखें, हिरनी ही की आंखें आप को दिखेंगी. मुझे तो रेखा की आंखें दरअसल विरह में डूबी नहीं, बल्कि विरह में बऊराई, विरह में नहाई दीखती हैं. अब यह तो निर्देशक पर मुनसर करता है कि वह उन से क्या करवाता है? आप याद कीजिए मल्टीस्टारर फ़िल्म नागिन की. जिस में रेखा भी हैं. नागिन के दंश में डूबी उन की आंखों में मादकता का महुआ और विरह का विरवा एक साथ वेधता है. तो लोग घायल भी होते हैं और पागल भी. फिर तेरे इश्क का मुझ पे हुआ ये असर है गाना सोने पर सुहागा का काम कर जाता है. होने को इस फ़िल्म में रीना राय, योगिता बाली आदि अभिनेत्रियां भी हैं पर वह, वह कमाल नहीं दिखा पातीं जो रेखा कर गुज़रती हैं.

नहीं, करने को तो उन्हों ने विनोद पांडेय की एक घटिया सी फ़िल्म एक नया रिश्ता राजकिरण के साथ की. पर विनोद पांडेय उन की विरहिणी आंखों को न तो बांच पाए, न व्यौरा दे पाए. जब कि रेखा अपनी शुरुआती फ़िल्म धर्मा तक में- जिस में नवीन निश्चल हीरो हैं, अपनी आंखों का खूब इस्तेमाल किया है. इस फ़िल्म में एक कौव्वाली है, 'इशारों को अगर समझो, राज़ को राज़ रहने दो. है तो प्राण और बिंदू के हिस्से पर विषय रेखा ही हैं और तिस पर इस में उन की आंखों का ब्‍यौरा बांचना व्याकुल कर जाता है. यहां तक कि कई फिसड्डी फ़िल्मों जैसे कि 'माटी मांगे खून' जिस में कि शत्रुघ्‍न सिन्‍हा उन के हीरो हैं या फिर 'किला' जिस में दिलीप कुमार उन के हीरो हैं, जैसी बहुतेरी फ़िल्में हैं, जहां उन की आंखों, बौराई आंखों का अच्छा ट्रीटमेंट है. खास कर गुलाम अली द्वारा गाए गीत 'ये दिल, ये पागल दिल मेरा' फ़िल्माया भले शत्रु पर गया है पर फ़ोकस रेखा और उन की आंखों पर ही है.

मैं जो बार-बार रेखा की आंखों में विरह की लौ बार-बार जला-जला दिखा रहा हूं तो आप कतई संभ्रम में न पड़ें कि रेखा की आंखें विरह का ही विरवा बांधे रहती हैं हमेशा. ऐसा भी नहीं है. उन की आंखों में मस्ती भी है और मादकता भी भरपूर. तभी तो मुज़फ़्फ़र अली को उमराव जान में शहरयार से रेखा की आंखों की खातिर एक पूरी गज़ल ही कहलवानी पड़ी, 'इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं.' बात भी सच है. और यह शम्मअ-ए फ़रोज़ा किसी आंधी से डरने वाली भी नहीं है. यकीन न हो तो किसी अमिताभ बच्चन-वच्चन से नहीं, शहरयार से पूछ लीजिए. आमीन!

कन्हैयालाल नंदन मतलब धारा के विरुद्ध उल्‍टी तैराकी


किसी नागवार गुज़रती चीज़ पर/ मेरा तड़प कर चौंक जाना/ उबल कर फट पड़ना/ या दर्द से छ्टपटाना/ कमजोरी नहीं है/ मैं ज़िंदा हूं/ इस का घोषणापत्र है/ लक्षण है इस अक्षय सत्य का कि आदमी के अंदर बंद है एक शाश्वत ज्वालामुखी/ये चिंगारियां हैं उसी की जो यदा कदा बाहर आती हैं/ और ज़िंदगी अपनी पूरे ज़ोर से अंदर/ धड़क रही है-/ यह सारे संसार को बताती है/ शायद इसी लिए जब दर्द उठता है/ तो मैं शरमाता नहीं, खुल कर रोता हूं/भरपूर चिलाता हूं/ और इस तरह निष्पंदता की मौत से बच कर निकल जाता हूं।

कन्हैयालाल नंदन होना दरअसल धारा के विरुद्ध उल्‍टी तैराकी करना है. सिस्टम में हो कर भी सिस्टम से लड़ना किसी को सीखना हो तो नंदन जी से सीखे. और वह भी बडे़ सलीके से. अपनी एक कविता में वह सीधे ईश्वर से टकराते मिलते हैं. वह साफ कहते हैं कि, 'लोग तुम्हारे पास प्रार्थना ले कर आते हैं/मैं ऐतराज़ ले कर आ रहा हूं.' इतना ही नहीं वह एक दूसरी कविता में चार कदम और आगे जाते हुए कहते हैं; 'तुमने कहा मारो/और मैं मारने लगा/ तुम चक्र सुदर्शन लिए बैठे ही रहे और मैं हारने लगा/ माना कि तुम मेरे योग और क्षेम का/ भरपूर वहन करोगे/ लेकिन ऐसा परलोक सुधार कर मैं क्या पाऊंगा/ मैं तो तुम्हारे इस बेहूदा संसार में/ हारा हुआ ही कहलाऊंगा/ तुम्हें नहीं मालूम/ कि जब आमने सामने खड़ी कर दी जाती हैं सेनाएं/ तो योग और क्षेम नापने का तराजू/ सिर्फ़ एक होता है/ कि कौन हुआ धराशायी/ और कौन है/ जिसकी पताका ऊपर फहराई/ योग और क्षेम के/ ये पारलौकिक कवच मुझे मत पहनाओ/ अगर हिम्मत है तो खुल कर सामने आओ/ और जैसे हमारी ज़िंदगी दांव पर लगी है/ वैसे ही तुम भी लगाओ.'

सचमुच वह विजेता की ही तरह हम से विदा हुए. सोचिए कि भला कोई डायलिसिस पर भी दस बरस से अधिक समय जी कर दिखा सकता है? नंदन जी ने दिखाया. और वह भी बिना किसी प्रचार के. नहीं लोगों को तो आज ज़रा सी कहीं फुंसी भी होती है, खांसी-जुकाम भी होता है तो समूची दुनिया को बताते फिरते, सहानुभूति और चंदा भी बटोरते फिरते हैं. पर नंदन जी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया. करना तो दूर किसी को बताते भी नहीं फिरते थे कि वह डायलिसिस पर चल रहे हैं. अपने कवि मित्र रमानाथ अवस्थी की उस गीत पंक्ति की तरह कि, 'किसी से कुछ कहना क्या/ किसी से कुछ सुनना क्या / अभी तो और जलना है.' वह चलते रहे. और तो और इस डायलिसिस की भयानक यातना में भी वह ज्ञानपीठ के लिए अज्ञेय संचयन पर काम करते रहे. अपनी आत्म-कथा के तीन खंड पूरे किए. और कि तमाम कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संपादन भी. अपनी रूटीन यात्राएं, काम-काज भी.

डाक्टर हैरान थे उन की इस जिजीविषा पर. हालां कि अपनी मौत को साक्षात देख पाना आसान नहीं होता. और नंदन जी देख रहे थे. डाक्टरों की तमाम घोषणाओं को तो वह भले धता बता रहे थे लेकिन लिख भी रहे थे, 'बांची तो थी मैं ने/ खंडहरों में लिखी इबारत/ लेकिन मुमकिन कहां था उतना/ उस वक्त ज्यों का त्यों याद रख पाना /और अब लगता है/ कि बच नहीं सकता मेरा भी इतिहास बन पाना/ बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन जी नहीं पाऊंगा.' नंदन जी की यह यातना कि 'बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन जी नहीं पाऊंगा' को बांचना भी कितना यातनादायक है तो वह तो इस यातना को जी ही रहे थे, सोच कर मन हिल जाता है. नंदन जी यह कोई पहली बार यातना नहीं बांच रहे थे. यातना-शिविर तो उन के जीवन में लगातार लगे रहे. लोगबाग बाहर से उन्हें देखते थे तो पाते थे कि वह कितने तो सफल हैं. उन की विदेश यात्राएं. उन का पद्मश्री पाना, बरसों-बरस संपादक बने रहना सफलता के ही तो सारे मानक थे. और क्या चाहिए था. तिस पर कवि सम्मेलनों में भी वह हमेशा छाए रहते थे. बतौर कवि भी और बतौर संचालक भी. उन का संचालन बरबस लोगों को मोह लेता था.

एक पत्रकार मित्र हैं जिन का कविता से कोई सरोकार दूर-दूर तक नहीं है, एक बार नंदन जी को सुनने के बाद बोले, 'पद्य के नाम पर यह आदमी खड़ा-खड़ा गद्य पढ़ जाता है, पर फिर भी अच्छा लगता है.' तो सचमुच जो लोग नंदन जी को नहीं भी पसंद करते थे वह भी उन का विरोध कम से कम खुल कर तो नहीं ही करते थे. वह फ़तेहपुर में जन्मे, कानपुर और इलाहाबाद में रह कर पढे़, मुंबई में पढ़ाए और धर्मयुग की नौकरी किए, फिर लंबा समय दिल्ली में रहे और वहीं से महाप्रयाण भी किया. पर सच यह है कि उन का दिल तो हरदम कानपुर में धड़कता था. हालां कि वह मानते थे कि दिल्ली उन के लिए बहुत भाग्यशाली रही. सब कुछ उन्हें दिल्ली में ही मिला. खास कर सुकून और सम्मान. ऐसा कुछ अपनी आत्मकथा में भी उन्हों ने लिखा है. पर बावजूद इस सब के दिल तो उन का कानपुर में ही धड़कता था. तिस में भी कानपुर का कलक्टरगंज. वह जब-तब उच्चारते ही रहते थे, 'झाडे़ रहो कलक्टरगंज!' या फिर, 'कलेक्टरगंज जीत लिया.'

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कन्हैयालाल नंदन से लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास पर पुरस्कार लेते दयानंद पांडेय. इस मौके पर उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के तत्कालीन उपाध्यक्ष और सुपरिचित गीतकार सोम ठाकुर तथा पूर्व सांसद व कवि उदयप्रताप सिंह


बहुत कम लोग जानते हैं कि नंदन जी ने प्रेम विवाह किया था. वह भी अंतरजातीय. न सिर्फ़ अंतरजातीय बल्कि एक विधवा से. कन्हैयालाल नंदन असल में कन्हैयालाल तिवारी हैं. अब सोचिए कि अपने उम्र के जिस मोड़ पर नंदन जी ने यह प्रेम विवाह किया, पिछड़ी जाति की विधवा महिला से उस समय कितनी चुनौतियों से उन्हें दो-चार होना पड़ा होगा? एक ऊच्च कुल का ब्राह्मण और वह भी पिछड़ी जाति की विधवा महिला से विवाह करे, सो भी अपने गांव में ही, विरोध की पराकाष्ठा न झेलेगा तो क्या फूल बरसेगा उस के ऊपर? आज भी यही हालात हैं. पर नंदन जी ने तब के समय में यह किया. और न सिर्फ़ किया बल्कि डंके की चोट पर किया. हां, इस को भुनाते-बताते नहीं फिरे यह सब. सब कुछ भुगत लिया पर उफ़्फ़ नहीं किया. भगवान ने उन को जाने कितना धैर्य दे रखा था.
वह तो जब वह दिनमान-सारिका-पराग क्या दस दरियागंज के संपादक थे तब के दिनों की बात है. वह बार-बार भाग-भाग कानपुर जाते रहते थे. हफ़्ते में दो-दो बार. अंतत: सहयोगियों ने पूछा कि, 'आखिर बात क्या है?' तो नंदन जी के चेहरे पर संकोच और पीड़ा एक साथ उभर आई. बोले, 'असल में पिता जी बहुत बीमार हैं. उन का इलाज चल रहा है.' तो माहेश्वर्रदयालु गंगवार ने छूटते ही कहा, 'तो पिता जी को दिल्ली ले आइए. यहां ज़्यादा बेहतर इलाज हो सकेगा. और कि आप को भाग-भाग कर कानपुर नहीं जाना पडेगा.' वहां उपस्थित सभी ने गंगवार जी के स्वर में स्वर मिलाया. 'अरे कहां कि बात कर रहे हैं आप लोग?' नंदन जी धीरे से भींगे स्वर में बोले, 'कैसे लाऊ? मेरे हाथ का पानी तक तो वह पीते नहीं.' कह कर वह सर्र से अपनी केबिन में चले गए. फिर बाद में उन्हों ने बताया कि इस वज़ह से पिता उन के हाथ का पानी नहीं पीते. आज जब नंदन जी की याद आती है तो उन का वह कहा भी याद आता है, 'अरे कहां कि बात कर रहे हैं आप लोग?' ऐसे जैसे वह कोई तमाचा मार रहे हों अपने आप को ही. फिर उन्हीं की एक कविता याद आ जाती है;

अंगारे को तुम ने छुआ
और हाथ में फफोला भी नहीं हुआ
इतनी सी बात पर
अंगारे पर तो तोहमत मत लगाओ
ज़रा तह तक जाओ
आग भी कभी-कभी आपद धर्म निभाती है
और जलने वाले की क्षमता देख कर जलाती है

सचमुच नंदन जी की क्षमता ज़बर्दस्त थी. हाथ में जो जल कर फफोला पड़ भी जाए तो वह किसी को बताने वाले जल्दी नहीं थे. हां, यह ज़रूर था कि अगर किसी और के हाथ में फफोला पड़ जाए तो वह उसे सुखाने में ज़रूर लग जाते थे. युवाओं पर हमेशा मेहरबान रहते. मैं खुद जब उन से मिला तो युवा क्या बिलकुल लड़का ही था. बल्कि पहली बार जब उन से चिट्ठी-पत्री हुई तब तो मैं बी.ए. का छात्र ही था. गोरखपुर में. यह 1978 की बात है. गोरखपुर में प्रेमचंद ने लंबा समय गुज़ारा है. वह वहां विद्यार्थी भी थे और नौकरी भी किए. बल्कि वहीं बाले मियां के मैदान में गांधी जी का भाषण सुन कर शिक्षा विभाग के डिप्टी डायरेक्टर की नौकरी छोड़ दी. अंगरेजों के खिलाफ लड़ाई में कूद गए. दरअसल उसी गोरखपुर में प्रेमचंद ने जीवन के न सिर्फ़ कई रंग देखे, कई स्वाद चखे बल्कि कई रचनाएं भी रचीं. ईदगाह, पंच परमेश्वर से लगायत रंगभूमि तक की रचना की. अगर चीनी-रोटी खाने के लिए वह तरसे तो इसी गोरखपुर में, अफ़सरी भी की उन्हों ने इसी गोरखपुर में और नौकरी छोड़ कर खादी के लट्ठर कंधे पर लाद कर वह बेंचते भी फिरे इसी गोरखपुर में. लेकिन उन की याद में बने प्रेमचंद पार्क की बदहाली, उन की मूर्ति की फज़ीहत और कुल मिला कर प्रेमचंद की उपेक्षा को ले कर एक छोटी सी टिप्प्णी भेजी थी, तब सारिका को.

नंदन जी तब इस के संपादक थे. भेजते ही पहले उन का टेलीग्राम आया फिर चिट्ठी. वह वहां प्रेमचंद से जुड़ी फोटो भी चाहते थे. फोटो किसी तरह खिंचवा कर भेजी. किसी तरह इस लिए कि मेरे पास फ़ोटोग्राफ़र को एडवांस देने के लिए पैसे नहीं थे. और कोई फ़ोटोग्राफ़र बिना पैसे लिए फ़ोटो खींचने को तैयार नहीं था. सब कहते स्टूडेंट का क्या भरोसा? और मैग्ज़ीन से बाद में पैसा आए न आए? पिता से पैसे मांगने कि हिम्मत नहीं थी.खैर, किसी तरह एक फ़ोटोग्राफ़र, एक सज्जन की ज़मानत पर तैयार हुआ. भेज दी फ़ोटो. जुलाई में प्रेमचंद जयंती पर रिपोर्ट भेजी थी, अगस्त में फ़ोटो भेजी. अक्टूबर में मय फ़ोटो के रिपोर्ट छप गई. प्रेमचंद की मूर्ति की बगल में खडे़ हो कर मैं ने अपनी भी एक फ़ोटो खिचवाई थी.वह भी छप गई. शीर्षक छपा था जहां प्रेमचंद ने रंगभूमि की रचना की. मुझे यह सब कुछ इतना अच्छा लगा कि सारिका का वह पेज जिस में मेरी फ़ोटो भी छपी थी प्रेमचंद की मूर्ति के साथ, शीशे में फ़्रेम कर के घर की कच्ची दीवार पर टांग दिया.

एक बार रामेश्वर पांडेय घर पर आए. जाडे़ की रात थी. शायद दिसंबर का महीना था. लालटेन की रोशनी में भी उन्हों ने वह चित्र देख लिया. बड़ी देर तक देखते रहे. मैं ने पूछा क्या देख रहे हैं.
डीएनपी
कन्हैयालाल नंदन के साथ दयानंद पांडेय
इतनी देर तक? वह बोले, ' यह सारिका में छपी फ़ोटो.' वह ज़रा रूके और धीरे से बोले, ' बस एक गड़बड़ हो गई सारिका वालों से.' मैं ने पूछा, 'वह क्या?' वह बड़ा सा मुंह बनाते हुए बोले, 'शीर्षक गलत लग गया है.' उन्हों ने फ़ोटो पर फिर एक भरपूर नज़र डाली और बोले, ' शीर्षक होना चाहिए था कि जहां दयानंद पांडेय ने प्रेमचंद की खोज की.' मैं चुप रहा. क्या बोलता इस के बाद भला?पर समझ गया कि रामेश्वर तब क्या कहना चाहते हैं? मैं उन दिनों पढ़ता तो था ही. कविताएं भी लिखता था. रामेश्वर पांडेय भी तब कविता लिखते थे. वही मित्रता थी. हालां कि मेरे गांव में उन के गांव की एक रिश्तेदारी भी है. इस नाते मैं उन्हें फूफा कह कर चिढ़ाता भी खूब था. और वह चिढ़ते भी तब भरपूर थे. उन दिनों वह एक गीत पढ़ते थे, हम ने तो सिर्फ़ अंधेरे और रोशनी की बात की/ और हमें सज़ा मिली हवालात की.' और खूब वाहवाही लूटते थे. शायद उसी का नशा था या क्या था पता नहीं. पर दूसरे दिन रामेश्वर के जाने के बाद मैं ने वह चित्र दीवार पर से उतार कर किताबों में छुपा दिया. पर शाम को मेरे एक चचेरे बडे़ भाई ने उसे यह कहते हुए दीवार पर फिर से लगा दिया कि, 'उस लड़के की बात पर मत जाओ. वह तुम्हारी फ़ोटो छपने से जल गया है.'

खैर बात आई गई हो गई. बाद में डाक्टर कमल किशोर गोयनका की चिट्ठी पर चिट्ठी आने लगी. वह उन दिनों प्रेमचंद विश्वकोश पर काम कर रहे थे. वह प्रेमचंद के बारे में गोरखपुर से जुडी बातें जानना चाहते थे. लंबी-लंबी चिट्ठियों कई-कई सवाल होते. और हर बार वह एक सवाल ज़रूर पूछते कि आप क्या करते हैं? मैं हर बार इस सवाल को पी जाता था. अंतत: उन्हों ने लिखा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के फला कालेज में 14 सालों से मैं हिंदी पढ़ाता हूं, आप क्या करते हैं? मैं ने जवाब में थोड़ी बेवकूफी बघार दी, खिलंदडी कर दी और लिखा कि आप 14 सालों से हिंदी पढ़ाते हैं और मुझे अभी १४ साल पढ़ते हुए भी नहीं हुआ. बात आई गई हो गई. पर उन की चिट्ठियां फिर भी आती रहीं. पर एक बार क्या हुआ कि मैं पिता जी के साथ दिल्ली घूमने गया. तो बहुत सारे लेखकों से भी मिला. जैनेंद्र कुमार, विष्‍णु प्रभाकर से लगायत श्रीकांत वर्मा तक. कमल किशोर गोयनका से भी मिला. अद्भुत व्यक्ति थे वह. मेरी हर चिट्ठी उन्हों ने बहुत संभाल कर न सिर्फ़ रखी थी बल्कि फाइल बना रखी थी. ला कर वह सारी चिट्ठी पिता जी को दिखाने लगे. मेरा यह लिखना उन को बहुत बुरा लगा था कि आप 14 साल से हिंदी पढ़ा रहे हैं और मुझे अभी 14 साल पढ़ते हुए भी नहीं हुआ. पिता जी को उन्हों ने यह भी दिखाया. अब मुझे काटो तो खून नहीं. पिता जी ने मुझे बस पीटा भर नहीं, बाकी मेरे सारे करम हो गए. बाद में यह बात गोयनका जी ने नंदन जी को भी बताई. आखिर अध्यापक थे वह और किसी विद्यार्थी को बिगड़ते हुए वह देखना नहीं चाहते थे.

हुआ यह कि जब मैं दिल्ली बाकायदा रहने लगा था, नौकरी करने लगा था सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में, तब की बात है. सर्वोत्तम में लिखने की कुछ गुंजाइश तो होती नहीं थी तो मैं पत्रिकाओं के दफ़्तर के चक्कर मारा करता था. साप्ताहिक हिंदुस्तान से लगायत दिनमान तक. नंदन जी की वैसे भी मुझ पर विशेष कृपा रहती थी. नंदन जी ने मुझ से क्या - क्या नहीं लिखवाया. आज सोचता हूं तो अपने आप से भी रश्क हो आता है. सोचिए कि उस नादान उम्र में भी नंदन जी ने मुझ से चौधरी चरण सिंह के बागपत चुनाव क्षेत्र का बागपत भेज कर कवरेज करवाया बल्कि चरण सिंह का इंटरव्यू भी करवाया और खूब फैला कर छापा भी. उन दिनों क्या था कि नंदन जी एक साथ सारिका, पराग और दिनमान तीनों पत्रिकाओं के संपादक थे. और हर महीने इन में से किसी एक पत्रिका में क्या कई बार तो दो-दो में मैं छपता ही छपता था. आप कह सकते हैं कि मुझे तब छपास की बीमारी ने घेर रखा था. नंदन जी इन तीन पत्रिकाओं के तो संपादक थे ही बाद में निकली वामा और खेल भारती में भी वह पूरा हस्तक्षेप रखते थे. सो लोग उन्हें 10 दरियागंज का संपादक कहने लगे थे. उन की तूती बोलती थी उन दिनों. उन से मिलना उन दिनों बहुत दूभर था. एक तो वह बिल्कुल एरिस्टोक्रेटिक स्टाइल से रहते थे. दूसरे दफ़्तर आते ही कहीं जाने की तैयारी में होते थे. उन के पीए नेगी जी सब कुछ कैसे संभालते थे, देखते बनता था.

काम में नंदन जी हर किसी पर विश्वास करते थे. एक संपादक का सहयोगियों पर कैसे भरोसा होना चाहिए यह नंदन जी से सीखा जा सकता था. खास कर इस लिए भी कि वह जिस संपादक के साथ काम कर के आए थे धर्मयुग से, उस के संपादक धर्मवीर भारती थे तो विद्वान और सफल संपादक. पर परम अविश्वासी. इस बात की चुगली एक नहीं अनेक लोग कर गए हैं. और नंदन जी ने यह पीड़ा अपनी आत्म-कथा में बार-बार पिरोई है. नंदन जी ने हालां कि थोड़ी मुलायमियत बरती है पर रवींद्र कालिया ने गालिब छुटी शराब में नंदन जी की पीड़ा को जो स्वर दिया है, भारती जी द्वारा उन्हें सताए जाने का जो तल्ख व्यौरा परोसा है, वह भारती जी के लिए खीझ ही उपजाता है. ऐसे ही रघुवीर सहाय जब दिनमान के संपादक थे तो वह भले लोहियावादी थे, पर व्यवहार अपने सहयोगियों के साथ उन का घोर सामंती था. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जैसों तक से वह पूरी अभद्रता से पेश आते थे. बाकियों की तो बिसात ही क्या थी. तो ऐसे में नंदन जी का सहयोगियों से संजीदगी से पेश आना, उन पर विश्वास करना सब को भा जाता. लोग अपनी पूरी क्षमता से काम करते.

खैर हुआ यह कि नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामा पर एक विशेष रिपोर्ट लिखने के लिए नंदन जी ने मुझ से कहा. उन दिनों वहां भारी अराजकता फैली हुई थी. लड़के आत्महत्या करने लगे थे. डा. लक्ष्मीमल सिंधवी जो सुप्रीम कोर्ट के तब बडे़ वकीलों में शुमार थे. नेशनल स्कूल आफ़ ड्रामा के ट्रस्टी भी थे. उन से फ़ोन कर बात करने के लिए मिलने का समय मांगा. बड़ी मुश्किल से वह तैयार हुए. दस मिनट का समय दिया. पर जब साऊथ एक्स्टेंसन वाले उन के घर पहुंचा, बात शुरू हुई तो आधा घंटा लग गया. बाद में उन्हों ने नंदन जी से शिकायत करते हुए कहा कि बिल भेज दूं क्या? तुम्हारे उस बालक ने दस मिनट का समय मांग कर आधा घंटा का समय ले लिया. नंदन जी ने मुझे यह बात बताई और पूछा कि उन की आधे घंटे की फीस मालूम है? उतनी मेरी तनख्वाह भी नहीं है. फिर उन्हों ने हिदायत दी कि जो जितना समय दे उस का उतना ही समय लेना चाहिए. और गोयनका जी की चिट्ठी का ज़िक्र किया और कहा लिखते अच्छा हो इस लिए तुम्हें छापता हूं. पर यह लौंडपना और नादानी भी तो छोड़ो.

लेकिन गलतियां तो होती रहती थीं. कभी -कभी अनजाने भी. एक बार क्या हुआ कि अमृतलाल नागर का एक इंटरव्यू नंदन जी को दिया. सारिका के लिए. उन दिनों दिल्ली से एक सांध्य दैनिक सांध्य समाचार छपता था. उस का फ़ीचर पेज प्रताप सिंह देखते थे. नागर जी के उस इंटरव्यू का ज़िक्र किया तो उन्हों ने पढ़ने को मांगा. दे दिया. गलती यह हुई कि उन से यह नहीं बताया कि यह इंटरव्यू सारिका में छपने वाला है. उन को इंटरव्यू अच्छा लगा और सांध्य समाचार में झट छाप दिया. संयोग देखिए कि उसी दिन सारिका बाज़ार में आई और उस में नागर जी के उसी इंटरव्यू को अगले अंक में छापने की घोषणा भी. अब मुझे काटो तो खून नहीं. नंदन जी बहुत खफ़ा हुए. बोले, 'इस दो कौड़ी के अखबार के चलते मेरी सारी इज़्ज़त उतार दी तुम ने.' उन के कुछ सहयोगियों ने मुझे अंतत: ब्लैक लिस्ट करने की सलाह दी. नंदन जी इस पर भी भड़क गए. बोले, 'ऐसे तो एक लिखने वाले आदमी को हम मार डालेंगे!' और उन्हों ने मुझे ब्लैक लिस्ट नहीं किया. कुछ दिन खफ़ा- खफ़ा रहे फिर सामान्य हो गए. मैं फिर छ्पने लगा 10, दरियागंज में. पहले ही की तरह. बरबस उन के एक गीत की याद आ गई. जो वह सस्वर पढ़ते थे.

खंड-खंड अपनापन
टुकडों में जीना
फटे हुए कुर्ते-सा
रोज-रोज सीना
संबंधों के सूनेपन की अरगनियों में
जगह-जगह
अपना ही बौनापन
टांग गए

उन दिनों वह खुद फ़िएट चलाते थे. एक दिन मैं आईटीओ के बस स्टाप पर खड़ा था. दोपहर का समय था. अचानक बस स्टाप पर उन की फ़िएट रूकी. फाटक खोल कर मुझे बुला कर बैठा लिया. उन की बगल की सीट पर तमाम किताबें, कागज अटा पड़ा था. कार स्टार्ट करते हुए बोले, 'कहां जाओगे?' मैं ने बताया, 'बाराखंबा रोड.' पूछा, 'वहां क्या काम है?' बताया कि, 'सोवियत एंबेसी में रमाकांत जी से मिलना है.' बोले, 'अच्छा है. सब से मिलना चाहिए. पर इस सब से पढ़ने लिखने का समय बहुत नष्‍ट होता है. इस से बचो. जल्दी ही बाराखंबा रोड आ गया. मुझे उतार कर वह चले गए. जब रवींद्र कालिया ने वागर्थ का संपादन संभाला तो मैं ने देखा कि वह हर किसी छोटे-बडे़, इस खेमे, उस खेमे गरज यह कि बिना खेमेबाज़ी के सब को छापने लगे थे. एक बार वह मिले तो मैं ने उन से कहा कि यह अच्छा कर रहे हैं आप और उन्हें बताया कि नंदन जी भी सारिका में यही करते थे. सब को छापते थे. वह चुप रहे. तो मैं ने यह बात फिर दुहराई. तो कालिया जी बोले, ' वो तो ठीक है यार पर नंदन जी कहानीकार नहीं थे न?'

रवींद्र कालिया की पीड़ा समझ में आ गई. बाद के दिनों में जब वह नया ज्ञानोदय में आए तो उन की पीड़ा का विस्तार सामने था. नंदन जी अपने संपादक के गोल्डेन पीरियड में व्यस्त बहुत रहते थे. उन से न मिल पाने की शिकायत बडे़-बड़ों को थी. मैं ने उपेंद्रनाथ अश्क जैसे लेखक को भी उन का इंतज़ार करते देखा है. पर वह जब मिलते थे तब खुल कर मिलते थे. उन की व्यस्तता अपनी जगह थी और उन की जवाबदेही अपनी जगह. अब तो खैर किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री से मिलना फिर भी आसान है पर ज़्यादातर संपादकों से मिलना मुश्किल है. हिमालयी अहंकार के बोझ से लदे- फदे यह संपादक लोग लोगों की चिट्ठी का जवाब देना तो जैसे गाली ही समझते हैं. लेकिन नंदन जी या उन के समय के संपादकों के साथ ऐसा नहीं था. वह अगर कोई रचना अस्वीकृत भी करते थे तो मुकम्मल जवाब के साथ. मुझे याद है कि जब नंदन जी ने सारिका में प्रेमचंद वाला फ़ीचर छापा था तो लगभग उसी के बाद मैं ने पराग के लिए एक कविता भेजी. नंदन जी की एक चिट्ठी के साथ वह कविता लौटी थी.

उन्हों ने लिखा था कि बच्चों के लिए कुछ लिखने में बहुत सतर्कता बरतनी होती है. खास कर कविता में तो बहुत. और अगर बच्चों के लिए कविता लिखनी है तो छंदबद्ध लिखें. बिना छंद की कविता बच्चों के लिए ठीक नहीं है. सो अभी छंद का अभ्यास करें. फिर कुछ पराग के लिए भेजें. और उन दिनों नंदन जी ही क्या आप किसी को भी चिट्ठी लिखें, लोग जवाब तो देते ही थे. मेरे पास बनारसीदास चतुर्वेदी, मन्मथनाथ गुप्त, अमृतलाल नागर से लगायत शरद जोशी तक के पत्र हैं. और नंदन जी तो और तमाम मामलों में भी लोगों से और आगे रहे. जाने कितनों का करियर उन्हों ने बनाया. वायस आफ़ अमरीका, रेडियो जापान से लगायत बी.बी.सी तक में लोगों को रखवाया. टाइम्स ग्रुप में भी. लेकिन बाद के दिनों में वह राजनीति कहिए या और कुछ नवभारत टाइम्स भेज दिए गए. 10 दरियागंज का संपादक अब 4 पेज का रविवारी परिशिष्‍ट देखने लगा. इंतिहा यही नहीं थी जब वह धर्मयुग में संयुक्त संपादक ही नहीं नेक्स्ट टू धर्मवीर भारती थे तब सुरेंद्र प्रताप सिंह उन के साथ बतौर अप्रेंटिश रहे, उन सुरेंद्र प्रताप सिंह के अधीन कर दिया गया नंदन जी को. और बिना परदे की एक केबिन बीचोबीच दी गई. अद्भुत था यह. शायद ऐसी स्थितियों में ही उन्हों ने लिखा होगा:

सब पी गए पूजा नमाज़ बोल प्यार के
और नखरे तो ज़रा देखिए परवरदिगार के
लुटने में कोई उज्र नहीं आज लूट ले
लेकिन उसूल कुछ तो होंगे लूट मार के

अब यह संयोग कहिए या कुछ और. जिस प्रेमचंद की वज़ह से मैं नंदन जी से जुड़ा था वही प्रेमचंद ही नंदन जी से अंतिम मुलाकात के भी सबब बने. हुआ यह कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने मेरे उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं को प्रेमचंद सम्मान से नवाज़ा. अब तो यह सारे सम्मान समाप्त हो चुके हैं पर पहले परंपरा सी थी कि यह सम्मान मुख्यमंत्री दिया करते थे. पर उस बार मुख्यमंत्री विधानसभा में अपनी सरकार बचाने में मशगूल रहे. नहीं आए. तो पुरस्कार समिति में शामिल नंदन जी के हाथों मुझे यह सम्मान मिला. यह मेरा सौभाग्य ही था कुछ और नहीं. और दुर्भाग्य देखिए कि यही मुलाकात हमारी अंतिम मुलाकात साबित हुई. उन का एक क्या दो शेर याद आते है:

मुहब्बत का अंजाम हरदम यही था
भंवर देखना, कूदना, डूब जाना
ये तनहाइयां, याद भी, चांदनी भी
गज़ब का वज़न है संभल कर उठाना

सचमुच नंदन जी की यादों का वज़न उठाना अपने आप को भी उठाना लगता है मुझे. नंदन जी के बिना उन की पहली जयंती पर और क्या कह सकता हूं. उन की ही कविता पंक्ति में फिर कहूं

कि, ' कि बच नहीं सकता/ मेरा भी इतिहास बन पाना/ बांचा तो जाऊंगा/ लेकिन बच नहीं पाऊंगा.' सचमुच नंदन जी अब इतिहास बन चुके हैं यह कई बार यकीन नहीं होता.