Thursday, 31 May 2012

‘अपने-अपने युद्ध’ और पत्रकारों की बिरादरी



अमिताभ ठाकुर

दयानंद जी एक स्थापित पत्रकार और लब्धप्रतिष्ठ उपन्यासकार हैं और इस रूप में उनके उपन्यासों में पत्रकार बिरादरी और पत्रकारिता का एक अच्छा-खासा ब्यौरा स्वाभाविक तौर पर रहता है. जाहिर है कि कोई भी व्यक्ति अपनी पृष्ठभूमि से अलग नहीं हो सकता. सूरदास जी के “जैसे उड़े जहाज के पंछी, पुनि जहाज़ पे आवे” की तरह हम में से हर व्यक्ति अपने पास्ट से इस कदर जुड़ा होता है कि वह चाह कर भी उससे जुदा नहीं हो पाता.


अपने अपने युद्ध
पृष्ठ सं.264
मूल्य-250 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2001

मैं कुछ लिखूंगा-पढूंगा या बातें करूँगा तो अपने जन्मस्थान सीतामढ़ी, अपने निवास स्थान बोकारो, अपने कॉलेज आईआईटी कानपुर, अपनी नौकरी आईपीएस जैसी बातों से बहुत अलग कैसे रह पाऊंगा, घूम-फिर कर इन पर आ ही जाऊँगा. इसी तरह दयानंद जी जब कुछ लिखेंगे तो अपने गोरखपुर, अपने पूर्वांचल, अपनी पत्रकारिता, जनसत्ता, स्वतंत्र भारत, लखनऊ प्रेस क्लब आदि से बहुत दूर कैसे जा सकते हैं. जिस प्रकार अपने-अपने युद्ध का हर पात्र अपनी-अपनी परिधि में, अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार अपनी लड़ाइयों में लगा रहता है, उसी प्रकार से ज्यादातर उपन्यासकार भी अपने स्वयं के जीवनवृत्त से प्रभावित होते रहते हैं.

इस उपन्यास में मुख्य पात्र संजय स्वयं ही पत्रकार हैं और लगभग हर तरह से वह एक नायक की तरह प्रस्तुत है, जो अनवरत व्यवस्था से लड़ता रहता है और हार-जीत की परवाह किये बगैर अपने उसूलों पर खड़ा रहता है. संजय जैसे पत्रकार शायद अब गिनती में हों. अपना इतना नुकसान करा कर, अपने उसूलों के लिए अपने आप को क्षति पहुंचा कर और अद्वितीय क्षमता के धनी होने के बावजूद लघु स्वार्थों को निरंतर तिरस्कृत करते हुए, अपनी मान्यताओं और अपने नैतिक मानदंडों पर स्वयं को खड़ा रख पाने की चाहत में नुकसान पाता हुआ संजय जिस प्रकार से पूरे उपन्यास में एक पारदर्शी और समरूप आचरण करता है, वह निश्चित तौर पर अनुकरणीय है. संजय के पात्र में मुझे साफ़ तौर पर दयानंद जी का स्वयं का अक्स नज़र आता है और इस रूप में उपन्यासकार के प्रति आदर के भाव जागृत होते हैं.

लेकिन इसके साथ मुझे इसमें जो तीन मजेदार किस्म के पत्रकार नज़र आये मैं उनका ही विषद विवरण पेश करना चाहूँगा. इसमें पहले हैं अलोक जोशी, जो संजय जी के साथ नयी दिल्ली में काम करते हैं. उपनाम जोशी लिखा है पर जितनी मेरी जानकारी है ये एक वास्तविक, बहुत ही जीवंत, जुझारू, होनहार पत्रकार हैं, जिनका लोहा आज भी हर कोई मानता है. मस्तमौला, झक्की और कुछ लड़ाका सा, यह व्यक्ति तान कर लिखता है, अपनी मर्जी से लिखता है, ऐसा लिखता है जिसे लोग पढ़ते और पसंद करते हैं और जिसे चाहने वालों के साथ उससे नाराज़ लोगों की भी एक अच्छी-खासी संख्या रहती है, जो उनके पीछे पड़े तो रहते हैं पर उनका कुछ खास बिगाड़ नहीं पाते, क्योंकि इस मर्जी के मालिक और प्रतिभाशाली पत्रकार में इतनी सारी खासियतें भी हैं कि बड़े से बड़ा संस्थान इनकी अनिवार्यता को स्वीकार करता है. जो मन हो सो कहा, जो मन हो लिखा, जिस तरह मन हो बर्ताव किया, फिर भी अपनी शर्तों पर इस दम से बने रहे क्योंकि प्रतिभा ऐसी है कि क्या कर लोगे. तभी तो संपादकों से सीधी कच-कच करते रहते, एक बात के बदले तीन उत्तर देते पर फिर भी अपने आप को सुरक्षित रख पाते. मैं यही सोचता हूँ कि काश इस तरह के लोग और अधिक संख्या में हो सकें. ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ कि अब ये आम मान्यता हो गयी है कि अब पत्रकारों में भी ऐसे लोगों की भारी कमी होती जा रही है जो अपनी मर्जी के मालिक हों, जो अपने मन से चल सकें और जिनकी रीढ़ की हड्डी पूरी तरह लचीली नहीं हो गयी हो. “जंजीर” फिल्म में प्राण अमिताभ बच्चन के पात्र के लिए कहते हैं कि उनकी पूरी रक्षा होनी चाहिए, क्योंकि जंगल में शेर बहुत कम रह गए हैं, यही बात अलोक जोशी के लिए भी लागू होती है.

दूसरे पात्र हैं दिल्ली में संजय के कार्यकाल में उसी अखबार के एक दूसरे पत्रकार, सुरेन्द्र मोहन तल्ख़, उर्दू में सिद्धहस्त पर हिंदी में काफी दिक्कत महसूस करने वाले ये महोदय कोई कम खिलाड़ी नहीं हैं, पर अपनी एक अलग विधा के. मैं उनके चरित्र के दो पहलुओं को खास तौर पर चित्रित करना चाहूँगा. एक तो उनके ऐंठे रहने की अदा और दूसरे उनके रसिक मिजाज होने का मामला. मैंने स्वयं अपने जीवन में छोटे-बड़े हर जगह पर कुछ ऐसे वरिष्ठ पत्रकार देखे हैं जो बने-ठने रहते हैं, अपने बनाव-श्रृंगार को ले कर काफी चिंतित रहते है और साथ ही घमंड में फूले भी रहते हैं. ऐसे पात्र बहुधा अपने वर्क-प्लेस पर तथा पत्रकार बिरादरी में अन्य साथी पत्रकारों से कोई खास सम्बन्ध नहीं बना पाते और इस तरह दूसरे पत्रकार इन्हें परेशान करने, चिढ़ाने का कोई ना कोई बहाना खोजते ही रहते हैं. जैसा तल्ख़ साहब के साथ हुआ, जब उन्होंने रस-सिद्धि और मौजमस्ती के लिए अपने दफ्तर की टेलीफोन ऑपरेटर को एक शो के टिकट दिए, जो एक हाथ से दूसरे हाथ चल के एक दूसरे पत्रकार सुजानपुरिया के हाथों में चला गया और इस तरह जब तल्ख़ अपने बगल में बैठे सुजानपुरिया को वह टेलीफोन ऑपरेटर समझते हुए उनका हाथ मसलने की कोशिश करते हैं और उनकी भयानक भद्द होती है. फिर उनका अकड़ा हुआ स्वभाव भी उनकी इस कहानी को तुरंत पूरे दफ्तर में फैलाने और दूसरे पत्रकारों को मज़ा ले कर किस्सागोई करने का काम करता है, लेकिन मजेदार बात यह दिखती है कि इतना सब के होने के बाद भी तल्ख़ महोदय की पेशानी पर बल नहीं आता और वे अपनी मगरूरी में उतने ही मगन रहते हैं, जितना पहले रहा करते थे. “कुत्ते की पूंछ” मुहावरा ऐसे ही थोड़े बनाया गया है.

अब मैं तीसरे पात्र को प्रस्तुत करता हूँ. ये वही हैं जो अंत में संजय को चित-पट करने में सफल होते हैं. संयोग से मैंने ऐसे भी कुछ पत्रकारगण अपने वास्तविक जीवन में देखे है जो श्याम सिंह सरोज की तरह ही हैं- पूरी तरह. गज़ब के चिपकू, पूरी तरह घाघ, ऊपर से बाहरी तौर पर बहुत ही मासूम, देखने के सीधे-सादे, चौबीस घंटे अपने स्वार्थ-हित में लगे हुए, अंदर से बहुत ही क्रूर और भयानक पर बाहर से बहुत साधारण तथा सरल. हद दर्जे के महत्वाकांक्षी पर निरंतर बहुत चतुराई से अपने मन की उछालों को छिपा कर रख सकने में निपुण. सरोज जी, जैसा कि उन्हें सब कहते हैं और स्वयं संजय भी नहीं चाहते हुए उनके लिए इसी नाम का प्रयोग करते हैं, ऐसी शख्सियत हैं जिनके बगैर कोई भी अखबारी (या शायद कोई भी) दफ्तर पूरा नहीं हो सकता. अंदर से भयानक सांप-जहरीले और खतरनाक और ऊपर से बेहद निरीह, इन श्याम सिंह सरोजों की यह खासियत होती है कि वे ना कुछ करते हैं और ना कुछ नहीं करने देते हैं- बस बैठे बैठे अपनी गोटियां खेलते रहते हैं. और चूँकि वे कभी मैदान छोड़ते नहीं, इसीलिए आगे-पीछे कुछ ना कुछ हासिल भी कर लेते हैं- किसी भी शर्त पर.

अंत में इन तीनों के अलावा मैं संजय जी के लखनऊ प्रवास के दौरान उनके पहले संपादक नरेन्द्र जी का जिक्र करूँगा, जिन्होंने अपने संपादक काल में मुख्यमंत्री तक के रात्रिभोज के प्रस्ताव को अपने और अपने अखबार की गैरत के लिए, अपनी प्रतिष्ठा के लिए एक सिरे से ठुकरा दिया. मैं ऐसे सभी नरेन्द्र जी को सलाम करता हूँ और दयानंद जी से निवेदन करूँगा कि इस महान व्यक्तित्व का वास्तविक नाम हम लोगों को भी बताने की कृपा करें.

सेक्स, प्यार और मोरालिटी

अमिताभ ठाकुर 

 मैं इधर दयानंद पाण्डेय जी का चर्चित उपन्यास “अपने-अपने युद्ध पढ़ रहा था. मैंने देखा कि इसका नायक संजय, जो एक पत्रकार है और कई दृष्टियों से अपनी नैतिकता के प्रतिमानों को लेकर काफी सजग और चौकन्ना है. विभिन्न प्रकार की लड़कियों के साथ शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने में भी उतना ही महारथी है. पूरे उपन्यास में उसके संबंधों के बनने और फिर अलग-अलग कारणों से बिखर जाने का कार्यक्रम चलता ही रहता है.

अपने अपने युद्ध
पृष्ठ सं.264
मूल्य-250 रुपए

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जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2001
यह भी सही है कि दयानंद जी संभवतः उन कतिपय हिंदी उपन्यासकारों में होंगे जो सेक्स सम्बंधित घटनाक्रम या दृश्यावलियों का इतना विषद और खुला वर्णन करते हों. कारण यह कि हमारे देश में सेक्स एक टैबू की तरह माना जाता है, जिसमे बहुधा यह अवधारणा होती है कि जिसे जो करना हो सो करे, इस विषय पर बहुत ज्यादा चर्चा की जरूरत नहीं है. यानी कि एक लुका-छिपा शास्त्र.

आप और हम यह देखते हैं कि अंग्रेजी के तमाम उपन्यासों में सेक्स एक अनिवार्य आवश्यकता होती है. यानी कि हर कुछ पन्नों के बाद कुछ ऐसे दृश्य शुरू हो जायेंगे जिनमे उपन्यास के पात्र शारीरिक रतिक्रिया में संलग्न हो जायेंगे. यानी कि उस पूरी प्रक्रिया का विधिवत विवरण होगा, काफी विस्तार से होगा और खास कर पाठक की सेक्स-जन्य जुगुप्सा तथा उत्तेजना के दृष्टिगत होगा. कई बार तो ऐसा साफ़ दिख जाएगा कि इस सेक्स सीन की और कोई जरूरत नहीं थी, सिवाय पाठक को बहलाने, फुसलाने और उसकी काम-इच्छाओं को टारगेट करने के, कुछ वैसे ही जैसे हमारी पुरानी फिल्मों में जानी वाकर या महमूद का किसी भी प्रकार से अधिरोपण मात्र इसीलिए किया जाता था ताकि दर्शकों को किसी भी तरीके से हंसा दिया जाए. यानी कि कहानी की मांग हो, ना हो इस बात से फर्क नहीं पड़ता. बस हँसाना है तो हँसाना है या फिर सेक्स सीन दिखाने हैं तो दिखाने हैं.

पर हिंदी के उपन्यासों में यह लगभग ना के बराबर रहा है और संभवतः आज भी यही स्थिति होगी. मैं इस रूप में दयानंद जी के इस कार्य की सराहना करता हूँ कि जो बात आम तौर पर परदे में छिपी रही थी उसे उन्होंने उत्साह और निर्भीकता के साथ सामने लाने का कार्य किया. सेक्स की मानव जीवन में महत्ता के विषय में मुझे या किसी और को लेक्चरर बनने की कोई जरूरत नहीं है. हम लोगों के परमप्रिय विद्वान मनोविज्ञानी फ्रायड ने इस पर अद्भुत कृतियाँ लिख कर इसे हमेशा के लिए सामने ला कर रख दिया है. बाद में फ्रायड के सिद्धांतों पर बड़ी बहसें हुईं, आलोचनाएं हुईं, वाद-प्रतिवाद हुए पर फ्रायड इतने सशक्त निकले कि लोग उनकी आलोचना तो करते रहे पर उन्हें खारिज नहीं कर सके.

भारत में फ्रायड के वैज्ञानिक सिद्धांतों की स्वीकार्यता भले हुई हो पर साहित्य में उनके असर के कारण सेक्स को सीधे-सीधे प्रकट किये जाने की परंपरा बहुत नहीं बन सकी है, कम से कम हिंदी साहित्य में तो नहीं. इसे और अधिक सीमित करते हुए यदि कहूँ तो कम से कम मेरी जानकारी और विस्तार के अनुसार. मैं यह नहीं कह रहा कि दयानंद जी ने जिस प्रकार से सेक्स को अपने उपन्यास में स्थान दिया है वह बिलकुल जेम्स बोंड का भारतीय प्रतिरूप बन गया हो, जहां मौके के सम्बन्ध का मतलब मात्र उसी क्षण के शारीरक सम्बन्ध से हो- ना आगा ना पीछा. यानी कि बैंकॉक गए, टोक्यो गए, लिस्बन गए या वाशिंगटन, बस कोई कन्या जेम्स भाईसाहब के संपर्क में आई, सम्बन्ध बना और फिर अगले ही क्षण दोनों अपने-अपने रास्ते.

इसके विपरीत दयानंद जी के संजय सम्बन्ध तो बनाते ही रहे, कभी रीना तो कभी साधना तो कभी मनीषा या चेतना से. पर फिर भी ये सम्बन्ध, सिवाय मनीषा वाले मामले को ले कर, कभी भी भावनात्मक अनुरागों और राग-विराग से अलग नहीं हो पाते. इसमें भी एक काबिलेगौर बात यह है कि इन समस्त सम्बंधों में भी स्त्री और पुरुष की मानसिकता में अंतर बहुत ही साफ़ तरीके से दिखता है. अखबार की टेलीफोन ऑपरेटर नीला को देखें या मंत्री की बेटी रीना को या फिर दूरदर्शन की कैजुवल एनाउंसर को या फिर लखनऊ की दिल पर चोट खायी लड़की को, इनमे से हर लड़की संजय से सेक्स सम्बन्ध बनाने के साथ ही उससे नियमित और वैधानिक सम्बन्ध (अर्थात विवाह बंधन) के पीछे भी पड़ जाती है. बल्कि उनमे से कई तो संजय को इस प्रकार से सम्बन्ध बना लेने और उसे एक स्थायी नाम और रूप नहीं देने के लिए उसे आरोपित भी करती हैं. मतलब यह हुआ कि आज भी, तमाम आधुनिकताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों में बाद भी भारतीय स्त्री के मन की कई सारी वर्जनाएं यथावत हैं, जो बिना स्थायी और सामाजिक रूप से मान्य रिश्तों के, शरीर का सम्बन्ध बना तो लेती हैं पर कहीं ना कहीं उसकी मानसिक पीड़ा और बोझ से ग्रसित जरूर रहती हैं.

दूसरी बात जो देखने लायक है वह यह कि संजय एक विवाहित पुरुष है और उसकी पत्नी उपन्यास में हैमलेट के पिता के भूत की तरह अचानक आती-जाती रहती है. कुछ ऐसा लगता है कि संजय की पत्नी एक ऐसी व्यक्तित्व हो जिसका कोई वजूद ही नहीं हो, जिसकी कोई सोच या बुद्धि ही नहीं हो और जो मात्र एक चलती-फिरती जीव हो जिसका ना तो संजय से कोई विशेष लगाव हो, ना ही कोई हक हो और ना ही कोई इंसानी भावनाएं. तभी तो संजय महाराज जो चाहते हैं कर के आते हैं, जहां चाहते हैं सोते-जागते हैं और अपने पारिवारिक और विवाहित जीवन को ले कर पूरी तरह निश्चिन्त रहते हैं. इसके विपरीत यदि यह बात सोची जाए कि संजय की पत्नी भी एक भरा-पूरा और आज़ाद व्यक्तित्व होती और आचार्य रजनीश के देह, काम और सम्भोग विषयक सिद्धांतों का उसी हद तक, उसी तरीके से पालन कर रही होती जैसे संजय कर ले पा रहे थे, तब ही संजय के वास्तविक मन-मस्तिष्क और उसकी विचारधर्मिता की सच्ची परीक्षा हो पाती और इन सिद्धांतों का उचित निरूपण हो सकता.

कहने का अर्थ यह है कि सेक्स और काम-विषयक तमाम सिद्धांत एक पूरे सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए, ना सिर्फ केवल एक ऐसे पुरुष की मानसिकता से जिसे दोनों तरह के सुख मिल रहे हों- घर में एक स्थायी पत्नी की सुरक्षा और बाहर इच्छानुसार बदल-बदल कर मनभावन कन्या. साथ ही इस पूरी प्रक्रिया का नैतिकता के प्रश्न से जुड़ाव भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. जैसा कि रीना संजय से प्रश्न भी करती है कि एक तरफ आप किसी की चमचागिरी या चरणचुम्बन को अनैतिक मानते हैं, किसी को अन्य प्रकार से धोखा देना अनैतिक मानते हैं, ससुर के बल पर आगे बढ़ने को अनैतिक मानते हैं पर क्या एक पत्नी के रहते हुए अन्येतर सम्बन्ध कायम करने को धोखागिरी या अनैतिक कर्म नहीं मानते. संजय इस प्रश्न का उत्तर देते हैं जिसमे वे देह के विज्ञान और शरीर की जरूरतों को विशेष बल देते हुए उसे मन के लगाव से अलग बताते हैं और कहते हैं कि उनका रीना (और इसी तरह शायद अन्य तमाम लड़कियों) से सम्बन्ध बनाना इसीलिए अनैतिक नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह दोनों की रजामंदी से हुई थी, जिसमे संजय ने कोई छलावा नहीं किया था और ना ही किसी प्रकार के कोई सब्ज-बाग दिखाए थे. यह सही हो सकता है पर फिर भी रीना यह कह ही देती है कि ना चाहते हुए भी इस तरह के सम्बन्ध के पूर्व उसके मन में स्थायी रिश्ता बना लेने की चाह अवश्य थी.

मैं इससे बढ़ कर मात्र यह प्रश्न पूछना चाहता हूँ कि यदि संजय या कोई भी व्यक्ति आचार्य रजनीश या किसी भी विचारक के सोच या स्वयं के विचारों के परिप्रेक्ष्य में फ्री सेक्स या परस्पर सहमति से शारीरिक संबंधों को बनाना इतना जायज़ और सहज मानता है तो फिर वह अपनी पत्नी के सामने यह भेद खुल जाने के डर से यकबयक क्यों घबराने लगता है? क्यों वह ऐसे कार्य उन तमाम लड़कियों के परिवारों से छिप-छिपा कर करना चाहता? इसके अलावा वह क्यों अपने और अपनी पत्नी के इस आयाम के प्रति समरूपी दृष्टिकोण नहीं अपना पाता है?

मैं इन प्रश्नों के साथ अपनी बात समाप्त करता हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि दयानंद जी द्वारा संजय के जरिये उठाये गए प्रश्न इतने सरल नहीं हैं जो मैं चंद शब्दों में उसका निश्चित और अंतिम उत्तर दे दूँ. मैंने भी यही उचित समझा है कि मैं इसी दिशा में कतिपय अन्य प्रश्न प्रस्तुत करूँ, जो इस डिबेट को आगे बढाने में सहायक हो सके.

''कचहरी तो बेवा का तन देखती है''

अमिताभ ठाकुर 

"अदालतों के बारे में तथ्‍यपरक सच्‍चाई कहना कोर्ट ऑफ कंटेम्‍प्‍ट नहीं है"
“न्याय वहाँ सीता है और क़ानून मारीच.” “न्याय मिलता भी है पर राम को नहीं. रावण को और उसके परिजनों को.” “हत्यारों, डकैतों को जमानत मिलती है. हाँ, राम को तारीख मिलती है.” “कचहरी तो बेवा का तन देखती है, खुलेगी कहाँ से बटन देखती है.” ये कुछ ऐसे वाक्य हैं जो दयानंद पाण्डेय जी के चर्चित उपन्यास 'अपने अपने युद्ध' में उपन्यास के मुख्य पात्र संजय के अपने मुकदमे के सिलसिले में न्यायपालिका की शरण में जाने के बाद में उसके अनुभवों के रूप में प्रस्तुत किये गए हैं.

अपने अपने युद्ध
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30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
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लिखा तो और भी बहुत कुछ गया है पर मैं उन्हें यहाँ उद्धृत नहीं कर पा रहा हूँ. पर फिर भी इन शब्दों को आधार बनाते हुए मैं एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकरण पर अपनी रायशुमारी करना चाहूँगा. कोर्ट को लेकर इस देश में ज्यादा बहस नहीं हुआ करते. कारण है एक ऐसे कानून का भय जिससे लगभग हर कोई कहीं ना कहीं डरता और घबराता है- कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट अर्थात अदालत की अवमानना. कोर्ट यानी “होली काउ” (पवित्र गाय) यानी एक ऐसा क्षेत्र जिसके सम्बन्ध में ज्यादा चर्चा परिचर्चा की जरूरत नहीं हो- जो कह दिया सो कह दिया, जो हो गया सो हो गया.

लेकिन यह मात्र आम धारणा या अवधारणा ही है. क्योंकि सच्चाई यह है कि अवमानना सम्बंधित कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट 1971 किसी भी तरह से कोर्ट के आदेशों की चर्चा-परिचर्चा करने से रोक नहीं लगाता. इस एक्ट की धारा दो में कहा गया है अवमानना दो किस्म के होते हैं- सिविल कंटेम्प्ट और क्रिमिनल कंटेम्प्ट. इसी धारा में सिविल कंटेम्प्ट परिभाषित किया गया है- “कोर्ट के किसी भी निर्णय, डिक्री, आदेश, रिट या कोर्ट के किसी प्रक्रिया का जानबूझ कर अनुपालन नहीं करना या कोर्ट को दिए गए किसी अंडरटेकिंग का जानबूझ कर उल्लंघन करना. क्रिमिनल अवमानना से अर्थ है-“ लिखित, मौखिक, संकेतात्मक या चाक्षुक ढंग से किसी ऐसी बात का प्रकाशन करना- (i) जो कोर्ट की ऑथोरिटी/ महत्ता को कम करता है या उसे अपमानित करता है या ऐसे प्रयास करता है. (ii) न्यायिक प्रक्रिया में द्वेषपूर्ण भाव पैदा करता है या उसमे हस्तक्षेप करता है या करने की कोशिश करता है (iii) न्यायिक प्रशासन मे हस्तक्षेप करता है या करने की कोशिश करता है.

सिविल कंटेम्प्ट के बारे में लगभग सभी लोगों का एक जैसा ही मत है कि यह न्यायिक प्रणाली और प्रक्रिया की महत्ता और ऑथोरिटी को कायम रखने के लिए नितांत आवश्यक है. कोर्ट के पास अपने आदेशों के अनुपालन के लिए कोई अलग से व्यवस्था तो होती नहीं है. कोर्ट को उसी कार्यपालिका के माध्यम से अपने आदेशों का अनुपालन कराना होता है जिसके कार्यों के विरुद्ध वे बहुधा निर्णय करते हैं. ऐसे में कई बार कार्यपालिका के सम्बंधित अधिकारियों की ऐसी मानसिक अवस्था बन जाती है जिसमें वे इस प्रकार के आदेशों को अपनी सत्ता की चुनौती के रूप में ले लेते हैं. ऐसे में इस तरह के अधिकारी न्यायालय के आदेशों को अंत तक नहीं मानने की कोशिश करते हैं. एक या अनेक प्रकार से उनका यह प्रयास होता है कि कोर्ट के आदेशों को टाला जाता रहे. ऐसी स्थितियों में वह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का सिविल कंटेम्प्ट हिस्सा ही है जो कोर्ट को बल देता है और उसे अपने आदेशों को क्रियान्वित करा सकने की शक्ति देता है. ऐसे में यदि सिविल कंटेम्प्ट समाप्त कर दिया जाए तो उसके बाद न्यायपालिका का मतलब ही समाप्त हो जाएगा. “भय बिन होई ना प्रीती” की कहावत यहाँ भी उतना ही खरा उतरता है जितना किसी अन्य स्थान पर.

असली वाद-विवाद और मत-मतान्तर क्रिमिनल कंटेम्प्ट को ले कर है. इस बारे के एक साथ दो शक्तियां काम करती हैं- एक तो कोर्ट की गरिमा और प्रतिष्ठा और दूसरे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता. ऐसा नहीं कि इन दोनों में सीधा विरोधाभास हो. बल्कि दोनों एक साथ लागू हो सकते हैं. व्यक्ति किसी मामले में अपनी खुली राय भी रख सकता है, उसे व्यक्त भी कर सकता है और इसके साथ कोर्ट की मर्यादा और गरिमा को भी बचाए रख सकता है. शायद इन्ही बातों के मद्देनज़र कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट में कई धाराओं की भी व्यवस्था की गयी. इसमें तमाम इनोसेंट प्रकाशन को अवमानना नहीं माना जाता. एक तो ऐसा तब होगा जब अपनी बात कहने वाले व्यक्ति को यह जानकारी ही नहीं हो कि वर्तमान में कोई न्यायिक प्रक्रिया जारी है. इसी तरह से वाजिब मूल्यांकन को कंटेम्प्ट नहीं माना जाता और फेयर तथा सत्यपरक रिपोर्टिंग भी अवमानना की श्रेणी में नहीं आते.

इसी तरह से दर्ज़नों सुप्रीम कोर्ट निर्णयों में भी यह आदेशित किया गया है कि कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का इस्तेमाल वाजिब कारणों से ही किया जाये, अकारण भय पैदा करने या अपने गलत कार्यों की रक्षा के लिए नहीं. यानी कुल मिला कर उच्चतम न्यायालय का प्रारम्भ से ही यह मत रहा है कि अवमानना कोई औज़ार नहीं जिसका बेजा इस्तेमाल किया जाता रहे, लेकिन इसकी जरूरत भी है ताकि न्यायालयों की गरिमा और प्रतिष्ठा बनी रहे. यह सर्वमान्य तौर पर माना जाता है कि न्यायालय की प्रतिष्ठा और गरिमा हर तरह से जनहित में आवश्यक है. इसमें वैसे भी किसी को कोई गुरेज नहीं होगा कि कोई भी व्यक्ति किसी भी आदमी या संस्था को अकारण बदनाम नहीं करे, उसके लिए अनुचित शब्दों का प्रयोग नहीं करे. यानी अपनी प्रतिष्ठा का ख़याल रखें और दूसरों की प्रतिष्ठा भी बनाए रखें.

यही उद्देश्य कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट का है और इस रूप में यह सर्वथा उचित प्रतीत होता है. फिर ऐसा नहीं है कि इस प्रकार के प्रावधान केवल न्यायपालिका के लिए हैं. बल्कि हमारे क़ानून हर सामान्य व्यक्ति और हर संस्था को अपनी गरिमा बचाए रखने के लिए कानूनी अधिकार प्रदान करते हैं. आईपीसी की मानहानि से सम्बंधित धाराएँ बिलकुल इसी उद्देश्य के लिए दी गयी हैं, जिनके तहत हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा या संस्थागत प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए विधि का सहारा ले सकता है. इस धारा में जेल तक का प्रावधान है और इस रूप में यह कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट से बहुत अलग नहीं है.

पर फिर ऐसा क्यों है कि आदमी किसी दूसरे से गाली-गलौज करने, उसे डराने-धमकाने, उसकी इज्जत उतारने और उसका मान-मर्दन करने से तो तनिक नहीं घबराता और मिनटों में किसी की भी बेइज्जती कर देता है, पर कोर्ट के बारे में बोलने से पहले पांच सौ बार सोचता है, तब जबकि कानून दोनों के लिए है, क़ानून में दोनों निषिद्ध है और सजा भी दोनों जगह है. जहां तक मैं समझ पाया हूँ इसका कारण भी यही है- “भय बिन होई ना प्रीत.” आदमी को लगता है कि कोर्ट एक ताकतवर संस्था है, उसमें अपनी शक्ति का उपयोग कर पाने की क्षमता है, जबकि औरों के बारे में ज्यादातर लोग आश्वस्त हैं कि वह कुछ नहीं बिगाड़ पायेगा. इसीलिए दूसरों के प्रति एक किस्म का आचरण और कोर्ट के प्रति दूसरे तरह का.

लेकिन ऐसा कहीं नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति कोर्ट-कचहरी या न्यायपालिका से जुड़ी सही बातें लिखेगा तो न्यायपालिका उसे बिलावजह कंटेम्प्ट में घसीट देगी. आज हम देख रहे हैं कि न्यायालयों, न्यायिक निर्णयों और न्यायाधीशों तक के आचरण को ले कर चर्चाएं हुईं, न्यूज़ और आर्टिकल लिखे गए और अंततोगत्वा उनमें से कई मामलों में उन सम्बंधित व्यक्तियों पर आपराधिक से लेकर अनुशासनात्मक कार्रवाईयां तक हुई. लेकिन इनमें किसी भी प्रकरण में कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट तो नहीं हुआ? कहने का अर्थ मात्र यह है कि कोर्ट अवमानना को लेकर कोई अनावश्यक रूप से संवेदनशील नहीं हैं. पर साथ ही सभी पक्षों को यह देखना होगा कि इस क़ानून का उद्देश्य कोई भय का राज्य स्थापित करना नहीं है और ना ही इसके जरिये किसी संस्था को गलत-सही करने की इजाजत देना है.

इसका कुल मतलब यही है कि चूँकि न्यायपालिका का पूरा वजूद ही इसकी जनमानस में स्वीकार्यता और इसकी उचित प्रतिष्ठा पर है, अतः हर प्रभावित पक्ष की यह जिम्मेदारी है कि वह इस प्रतिष्ठा को बचाए रखने का प्रयास करे. आज हमारे पास यही न्यायपालिका है जिसकी ओर हम अन्य तमाम संस्थाओं से निराश हो जाने की स्थिति में आशा की दृष्टि से आखिरी रहनुमा के रूप में देखते हैं और यह भी सत्य है कि यदि किसी भी व्यवस्था में एक न्यायपालिका ना हो तो समाज में पूरी तरह अराजकता और तानाशाही कायम हो जाये. ऐसी स्थिति से बचने के लिए इसके अंदर और बाहर वाले हर व्यक्ति का यह नैतिक, शासकीय और न्यायिक उत्तरदायित्व है कि इसे इस तरह निष्कलंक और निष्पाप बनाए रखने में अपना पूर्ण सहयोग दें, जिससे इसकी मर्यादा पर आंच आने और इसके विषय में चर्चा-कुचर्चा होने की नौबत ही नहीं आये.

नहीं तो फिर बातें होंगी, बात का बतरंग होगा और देश तथा समाज के हर किसी व्यक्ति का अहित भी. दयानंद जी के उपन्यास के संजय को ऐसा सोचने और कहने की जरूरत ही नहीं आये, यही हम सभी लोगों की कोशिश रहनी चाहिए. ऐसे हालातों में ही कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट जैसे कानूनी प्रावधान अपना पूरा मकसद हासिल कर सकते हैं. नहीं तो खींचा-तानी की स्थिति आ जाने पर किसी भी पक्ष का भला नहीं होगा. प्राकृतिक न्याय का बहु-स्वीकृत सिद्धांत है-“न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, उसे होते दिखना भी चाहिए.” आज इस सिद्धांत के मूर्त-स्वरुप के स्थापना की पहले से भी अधिक जरूरत आन पड़ी है, क्योंकि जहां भी गड़बडि़यां नग्न आँखों से दिखने लगती हैं तो उसके लिए माइक्रोस्कोप की जरूरत थोड़े ही होती है.

दयानंद जी के हारमोनियम के सूर्य प्रताप कौन हैं?


अमिताभ ठाकुर
हारमोनियम के हज़ार टुकड़े हों ना हों, दयानंद पाण्डेय का यह उपन्यास पढ़ने के बाद कतिपय कैरेक्टरों के टुकड़े-टुकड़े जरूर हो जाते हैं. मैंने पत्रकारिता और पत्रकारों के सम्बन्ध में कम ही ऐसे उपन्यास पढ़े होंगे, जिनमें इतनी साफगोई और ईमानदारी के साथ इस प्रोफेशन के सम्बन्ध में चर्चा हुई हो. ऊपर से यदि हम इस तथ्य को भी ध्यान में रखें कि उपन्यास के लेखक भी एक लब्धप्रतिष्ठित पत्रकार हैं, जिनका इस क्षेत्र में तीस सालों से ऊपर का तजुर्बा है, तो इस उपन्यास की प्रामाणिकता तथा महत्व और अधिक बढ़ जाता है.

हारमोनियम के हज़ार टुकडे
पृष्ठ सं.88
मूल्य-150 रुपए

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दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2011

उपन्यास की कहनी एक अखबार के बिकने और एक हाथ से निकल कर दूसरे और फिर दूसरे से तीसरे में जाने से सम्बंधित है, पर पाण्डेय जी ने इसके साथ ही पत्रकारिता के कई वृह्त्तर आयामों पर भी प्रश्न उठाते हुए उनकी ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है. वे यहीं नहीं रुकते बल्कि इससे आगे बढ़ कर पत्रकारिता के साथ राजनीति, बिजिनेस और समाज के अन्य पहलुओं का भी गहराई से सम्बन्ध स्थापित करते हुए इसका छिद्रान्वेषण करते हैं. एक से एक पात्र भी उन्होंने तैयार किये हैं इस उपन्यास में. यदि एक तरफ मध्यम स्तर के पत्रकारों में सुनील है और सूर्यप्रताप तो संपादक स्तर पर भैया जी जोर मनमोहन कमल जैसे खुर्राट पात्र भी हैं.

प्रदेश के दो नामचीन राजनेताओं को भी उपन्यासकार ने बड़ी खूबसूरती से बीच में ला दिया है और उनके जरिये कई सारी अंदरखाने छिपी या भूली-बिसरी बातें भी रख दी हैं. पात्र और भी हैं लेकिन अक्सर वे बस आते हैं और झलक दिखा कर चले जाते हैं. मैं खास कर दो पात्रों का जिक्र करूँगा जिनमें एक मेरे व्यक्तिगत रूप से पसंदीदा संपादक हैं. दयानंद जी ने उस पात्र का नाम आधा ही पेश किया है मेहता. करीब दस-बारह साल से आउटलुक पत्रिका पढ़ता हूँ और दावे से कह सकता हूँ कि यदि किसी एक व्यक्ति को इसका श्रेय जाता है तो वह हैं अलोक मेहता. अब हर आदमी के कई रंग होते हैं, कुछ जाने - कुछ अनजाने. हो सकता है आउटलुक के संपादक के रूप में आलोक मेहता साहब जो नज़र आते हैं वह वास्तविक रूप से वैसे ना हों, पर फिर भी मैं इस बात को उतनी आसानी से नहीं मान सकूंगा. वैसे तो जीवन में इतनी सारी अकस्मात घटनाएं देख चुका हूँ कि अब अनायास किसी बात पर आश्चर्य नहीं होता पर इस बारे में ऐसा लगता नहीं, खास कर के तब जब दयानंद जी भी इस उपन्यास के जरिये यह जानकारी देते हैं कि अलोक मेहता साहब का खुद का एक बड़ा बंगला लखनऊ के कैंट क्षेत्र में है, जिसे वे अपने रसूख के बल पर जब चाहते खाली करा सकते थे, पर उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा. ऐसी बातें मन को गहरे तक झकझोर देती हैं और सम्बंधित व्यक्ति के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न करती हैं.

दूसरे बड़े पात्र मित्रा हैं जो निश्चित रूप से चन्दन मित्रा होंगे. मैं उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता, ना उनकी लेखनी से और ना ही किसी व्यक्तिगत जानकारी से. जो कुछ भी जानता हूँ वह टीवी और अन्य समाचार पत्रों के उनके बयान आदि से ही. अतः मैं इस पर कोई टिप्पणी कर पाने का अधिकारी नहीं हूँ सिवाय इस बात के कि उन्हें आज आम तौर पर एक विचार विशेष के संवाहक से रूप में जाना जाता है और संभवतः वे भी इसे किसी प्रकार से अन्यथा नहीं समझते. वे एक विचारधारा से कटिबद्ध हैं और अपनी जगह पर स्थित हैं तो यह उनका व्यक्तिगत दृष्टिकोण है, इस पर किसी तीसरे व्यक्ति का कोई खास अधिकार बनता नहीं दिखता. वैसे यदि इस बात को आलोक मेहता के सन्दर्भ में देखा जाए तो कई लोग उन्हें भी इससे विपरीत धारा के सहज संवाहक के रूप में इंगित करते दिख जाते हैं.

लेकिन इस उपन्यास के जो असली मजेदार पात्र हैं वे हैं भैयाजी और मनमोहन कमल. आप उन्हें घिनौने कहें, गंदे कहें, कलुषित कहें, घटिया कहें या फिर पूरी पत्रकारिता को बिगाड़ने वाले कहें, पर इस बात से आप इनकार नहीं कर सकते कि वे अपने आप में मजेदार हैं. जानने वाले सभी जानते हैं कि ये दोनों पात्र कौन हैं क्योंकि दयानंद जी ने बहुत झीनी सी दीवार बनायी है और इनके असली आइडेंटिटी को लगभग साफ़ जाहिर कर दिया गया है. अब इन दोनों में से कोई इस दुनिया में नहीं हैं. दोनों इह्लोक में महिला पत्रकारों, महरी, नौकरानी और अन्य जो भी उन्हें नसीब हुई, उनके साथ कर्म-कुकर्म करते हुए अब परलोक के साथी बन चुके होंगे, जहां संभव है उनके ये कार्यक्रम बदस्तूर जारी हों. पर इसमें कोई शक नहीं कि इन लोगों के सफ़ेद-स्याह कारनामों का असर आज तक पत्रकारिता के संसार में देखा जा सकता है, जिसमें इन लोगों ने कितने ही अपने मिनी और जूनियर टाइप बना कर छोड़ दिए ताकि वे आने वाली पीढ़ियों को इन महानुभावों की याद दिलाते रहें. मैं डरवश और व्यक्तिगत रूप से उनके सम्बन्ध में सुनी-सुनाई बातों के अलावा कोई अन्य साक्ष्य नहीं होने के कारण उनका नाम नहीं ले रहा और यह बात खुलेआम स्वीकार करता हूँ.

मैं जो समझ सका उसके अनुसार मुझे सुनील में तो दयानंद जी ही नजर आये, क्योंकि एक परम क्रांतिकारी और चेतनाधर्मी व्यक्ति के रूप में दयानंद जी का कोई मुकाबला जल्दी नहीं मिलने वाला है. यद्यपि मुलाक़ात के दौरान दयानंद जी से इस पर पूछने पर उन्होंने मुस्कुरा कर इस बात को टाल दिया पर जितनी बातें मैं जान सका हूँ उसके अनुसार मुझे सुनील में वे ही दिखते हैं. लेकिन सूर्य प्रताप को ले कर अभी मुझे कुछ कन्फ्यूजन है. जहां तक मुझे याद है गोरखपुर के एक काफी नामी-गिरामी पत्रकार लखनऊ में आज से करीब सात-आठ साल पहले स्कूटर दुर्घटना में मारे गए थे, संभवतः सूर्य प्रताप वही हैं. पर मुझे उनका नाम याद नहीं आ रहा है, उनके प्रति मन में सम्मान जरूर पैदा हो रहा है कि किस प्रकार से यह आदमी कुछ समझौतों के बावजूद अंत तक इंसानियत की लानत-मलानत नहीं कर सका और इंसान बना रहा.

मैं यह समझता था कि मुझे उपन्यास आदि पढ़ने का धैर्य नहीं है पर इस उपन्यास के विस्तार, फिसलाव, विषय-वस्तु और तरलता ने मुझे ऐसे बिंध लिया कि मैं इससे एक बार जो चिपका तो समाप्त होने के पहले अलग ही नहीं हो सका.
                                                    

अनिल यादव, अब ऐतराज भी सुनिए

दयानंद पांडेय

कहानी का साजन तो उस पार था : माफ़ करिए डियर अनिल यादव क्योंकि ''...क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढतीं'' को लेकर अभी तक आप प्रार्थना सुन रहे थे, अब ऐतराज़ भी सुनिए। अव्वल तो इस विषय की स्थापना ही बसियाई हुई है। आप जानिए कि आज की नगर वधुएं अखबार ही नहीं, इंटरनेट भी बांचती हैं। यकीन न हो तो आप कुछ साइटों पर जाइए, बाकायदा उनकी प्रोफ़ाइल की भरमार है, किसिम-किसिम की फ़ोटो, व्योरे और देश, शहर सहित। डालर फूंकिए और इस नरक में कूद जाइए।

चैटिंग में भी आप को यह नगर वधुएं मिल जाएंगी। नेट पर भी और मोबाइल चैट में भी। नगर वधुएं अब हाइटेक हो चुकी हैं कि सिस्टम ने बना दिया है, दोनों ही बातें हैं। अखबारों में मित्र बनाने के विज्ञापन का रैकेट भी इन्हीं नगर वधुओं का विस्तार है। इस छल-कपट में लुटे-पिटे लोग बहुतेरे मिल जाएंगे। रही बात मंडुवाडीह की तो सुनते हैं मंडुवाडीह का शिवदासपुर तो अब भी आबाद है। कोई बिल्डर, कोई सिस्टम अभी हिला नहीं पाया है। खैर। कहानी पर आते हैं।

विषय निश्चित ही तलवार की धार पर चलने वाला है। और अच्छी बात यह है कि अनिल ने इसे शुचितावादियों के आक्रमण से बचा लिया है। मतलब इसे अश्लीलता की रेखा भी नहीं छूने दी है, बस एक कविताई को छोड़ कर। पर दिक्कत यह है कि इस बहाने कई मह्त्वपूर्ण चीज़ें गुम हो गई हैं। बहुतेरे लोग जानते हैं- रांड़-सांड़-संन्यासी की काशी को। और कि वहां नगर वधुओं को बसाने में कुछ राजाओं और पंडों का खासा योगदान भी। अनिल उनको भी फ़्लैशबैक के बहाने बांच सकते थे, नहीं बांचे। बांचे होते तो इस कथा में काशी का वैभव और उस वैभव में नगर वधुओं का लगा पैबंद और भी लोमहर्षक बयान लेकर उपस्थित होता।

आज़ादी के तुरंत बाद १९४७ में जब पंडित नेहरू ने देश भर में वेश्यालयों को शहर से बाहर करने की मुहिम शुरू की थी तब काशी का चौक कैसे बचाने के लिए लोग सामने आए, खासकर कुछ संगीत की दुनिया के लोग। दालमंडी की उपकथा भी जुड़ सकती थी, फिर कैसे बसा मंडुवाडीह! वगैरह-वगैरह का जोड़-घटाना इस कथा को और समृद्ध बना सकता था।

जाने क्यों यह कहानी पढ़ते समय एक फ़िल्मी गाना भी लगातार याद आता रहा- नदी नारे न जाओ श्याम पैंया परूं ! इसी गाने में एक बंद है- बीच धारे जो जाओ तो जइबै करो, उस पारे न जाओ श्याम पैयां परूं! तो कुल मुश्किल यही है कि अनिल इस कहानी में नदी के किनारे-किनारे ही घूमे-घुमाए हैं। न बीच धारे गए-ले गए हैं, न उस पार ले गए हैं। ले जाना चाहिए था। क्योंकि कहानी का साजन तो उस पार ही था। जो उसे मिला नहीं। कहानी अधूरी रह गई।

माफ़ करिए मित्रों, मैं अपनी बात कहने के लिए एक पाठक के पत्र की याद करना चाहता हूं। बहुत पहले संभवतः १९८२ में दिनमान पत्रिका में कवि समीच्छक विनोद भारद्वाज ने दिल्ली में चल रहे देह व्यापार पर एक आमुख कथा लिखी थी और बताया था कि ऐसी भी लडकियां हैं जो एक रात के दस हज़ार रूपए लेती हैं। तब का दस हज़ार आज दस लाख रूपए में इस देह बाज़ार में बदल चुका जानिए। बहुत लोगों की तब साल भर की तनख्वाह भी साल भर की दस हज़ार रूपए नहीं होती थी। खैर तब एक पाठक ने दिनमान को चिट्ठी लिख कर कहा था कि ठीक है लडकियां एक रात के दस हज़ार रूपए लेती हैं पर वह हैं कौन लोग जो एक रात के दस हज़ार रूपए खर्च कर देते हैं? और अनुरोध किया था कि कृपया इन लोगों के बारे में भी एक स्टोरी छापें।

दिनमान ने उस पाठक का पत्र तो छाप दिया लेकिन उस के अनुरोध पर खामोशी मिली। एक पूंजीवादी पत्रिका में वैसे भी हिम्मत की कमी होती है, कैसे छापती भला उन सफ़ेदपोशों के बारे में जो एक रात के दस हज़ार किसी देह पर लुटा देते थे। उन लोगों के बारे में, जिन पर सिस्टम टिका है, न्यौछावर है ! पत्रिका और पत्रकार न सही पर एक कहानीकार तो यह काम कर ही सकता है। अनिल यादव तो कर ही सकते थे। उन के पास भाषा भी थी, हिम्मत भी। पर जाने क्यों वह नदी के किनारे-किनारे ही टहल-टहला कर छुट्टी ले बैठे? एक डीआईजी इस सिस्टम में क्या होता है? बच्चों के खेलने वाले साइकिल के टायर से ज़्यादा कुछ नहीं। उसकी हैसियत ही क्या होती है? काशी जैसे नगर में?

कहानी इस बात की चुगली ज़रूर खाती है कि अब पूरा शहर ही वेश्यालय में तब्दील हो चला है। सच यह है कि दुनिया के सारे शहर अपनी पूरी उपस्थिति में अब वेश्यालयों में तब्दील हैं। यह ठेकेदारी, यह मैनेजमेंट बिना औरतबाज़ी के चलता ही नहीं। यह राजनीति, यह फ़िल्म, यह समाज भी नहीं चलता। अब लोग दो ही चीज़ देखते हैं। या तो क्रिकेट या लड़कियों का डांस। कहानी में निचले दर्जे की लगभग रिटायर और बूढी वेश्याओं की यातना के तार ज़रूर ठीक से छुए गए हैं, उनकी उधड़ी तिरूपन दिखाई भी देती है। बिल्डरों और सत्ता की सीवन भी उसी तरह जो उधेड़ी होती तो बात में और ताब आया होता। सी. अंतरात्मा की यातना की कैफ़ियत को भी और कातना चहिए था। एक रिपोर्टर सारे तथ्य हाथ में होने के बावजूद किसी दबाववश सही खबर नहीं, लिख छाप सकता। जैसा कि यहां फ़ोटोग्राफ़र प्रकाश के साथ होता भी है और कि वह लांछन भी भोगता है। पर एक कहानीकार? सब कुछ जान कर भी? (यहीं आचार्य चतुरसेन शास्त्री की गोली की याद आ जाती है। फासिस्ट आलोचकों की साज़िश भले चतुरसेन शास्त्री को खारिज़ करती रहे पर नारी विमर्श पर हिंदी में इस से सशक्त उपन्यास या कथा अभी भी दुर्लभ है। गोली मतलब दासी। बंधुआ। पीढी दर पीढी की बंधुआ दासी। छुपे शब्दों में लगभग वेश्या। राजाओं और उनके कारिंदों के लिए। जब धारावाहिक रूप से गोली साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी थी तब चतुरसेन शास्त्री पर दबाव, धमकी और लांछन सभी अपनी पूरी ताकत के साथ उपस्थित थे। ब्लैकमेलर तक कहा गया था उन्हें। पर वह झुके नहीं थे)

अखबार का प्रबंधन अब अखबार को पाठकों के लिए नहीं, अपने विज्ञापनदाताओं, अपनी तिजोरी, और अपने एसोसिएट्स के लिए छापता है, यह हकीकत भी उभर कर सामने नहीं आ पाई है इस कहानी में। कुल मिला कर यह जो व्यवस्था नाम की वेश्या है, अनिल यादव उस को उजाड़ नहीं पाए हैं। तोड़-फोड़ तो खूब की है पर वह जो कहते हैं कि सीधी चोट, वह इस कहानी में अनुपस्थित दिखती है। और यह जो भडास4मीडिया के संपादक हैं यशवंत सिंह, कंडोम गुरु का काम कर गए हैं। सेक्स में कंडोम को मैं स्पीड ब्रेकर मानता हूं। सारा मज़ा सत्यानाश कर देता है। इस कहानी को छोटी-छोटी किश्तों में परोस कर यशवंत सिंह ने यही किया। स्पीड ब्रेकर का काम। एक साथ दे सकते थे। ज़्यादा से ज़्यादा दो किश्त। गनीमत बस यही रही कि जल्दी-जल्दी दिए। महीनों नहीं लगाया। लगाते तो निरोध गुब्बारा हो जाता।

डियर अनिल यादव फिर भी बधाई तलवार की धार पर चढ़ कर यह कहानी कहने के लिए। बस थोड़ी जल्दबाज़ी से बचना चाहिए था और कि चटकीली हेडिंग की पैकेजबाज़ी से भी। आमीन!

क्या बात है रवीश जी! बहुत खूब!!

दयानंद पांडेय

क्या बात है रवीशजी! हालांकि हमारे ही क्या अधिसंख्य लोगों के घर आप अकसर आते ही रहते हैं। तो भी हमारी आप की वैसी मुलाकात नहीं है| पर मैं तो सच कहूं आप से अकसर मिलता ही रहता हूं। आप से आप की आवाज़ से। आप की आवाज़ जैसे बांध सी लेती है। कई बार आप को सुनते हुए लगता है कि मैं एक साथ मोहन राकेश, निर्मल वर्मा और मनोहर श्याम जोशी को पढ रहा होऊं। ऐसा आनंद देते हैं आप और आप का नैरेशन। सच कहूं तो मुझे ओम पुरी, कमाल खान और रवीश कुमार की आवाज़ बहुत भाती है। निधि कुलपति की साड़ी और उनका सहज अंदाज़ जैसे सुहाता है। पुण्य प्रसून वाजपेयी का खबरों को कथा की तरह बल्कि किसी फ़िल्म की तरह पेश करने का अंदाज़ भी मुझे भाता है। कई बार लगता है जैसे गुरुदत्त की कोई फ़िल्म देख रहा होऊं।

प्रसून जी से एक बार फ़ोन पर मैंने कहा भी कि आप को फ़िल्म बनानी चाहिए। तो वह हंसने लगे। इस चीख पुकार और भूत-प्रेत, अपराध, क्रिकेट, धारावाहिकों की छाया और लाफ़्टर शो के शोर के भूचाली दौर में आप लोग ठंडी हवा के झोंके सा सुकून देते हैं। देते रहिए। नहीं अब तो आप का एनडीटीवी इंडिया भी कभी- कभी इस फिसलन का संताप देता ही है, देने ही लगा है। खासतौर पर जिस तरह एक शाम हेडली की तसवीर चीख-चीख कर सस्पेंस की चाशनी में भिगो-भिगो कर परोसी है कि बड़े-बड़े तमाशेबाज़ पानी मांग गए। बाज़ार की ऐसी मार कि बाप रे बाप जो कहीं भूत होता-हवाता हो तो वह भी डर जाए। यहां तक कि रजत शर्मा और उनका चैनल भी। आजतक वाले भी। कौवा चले हंस की चाल तो सुनता रहा हूं पर हंस भी कौआ की चाल चलने लगे यह तो हद है। ब्योरे और भी बहुतेरे हैं पर क्या फ़ायदा?

ऐसे में रवीश कुमार, कमाल खान, पुण्य प्रसून वाजपेयी और हां, निधि कुलपति की नित-नई सलीकेदार साड़ी और उनका अंदाज़ मन को राहत-सी देते हैं। गोया अपच और खट्टी डकार के बीच पुदीन हरा या हाजमोला मिल गया हो। और हां, कभी मन करे तो इस पर भी कभी कोई स्पेशल रिपोर्ट ज़रूर करने की सोचिएगा कि चैनलों में इतने साक्षर, जाहिल और मूर्ख लोग कैसे और कहां से आकर बैठ गए। पर क्या कहें, आज- कल आप भी तो स्पेशल रिपोर्ट कहां करते दिखते हैं। बाज़ार की मार है यह कि रूटीन में समा जाने की नियति?

न मन करे तो मत बताइएगा। पर ऐसे तो आपकी लोच बिला जाएगी ! फिर कैसे कोई इसी ललक के साथ बुलाएगा कि फिर आइएगा। क्योंकि यह दुनिया बडी ज़ालिम है। अरहर की दाल सौ रूपए किलो भूल चली है। गांधी को भूल गई। चैनल और कि अपना समाज भी भगत सिह को भूल अमर सिंह को याद रखने लगा। अमर सिंह की दलाली भी लगता है, अवसान पर है। तो उन्हें भी हम जल्दी ही भूल जाएंगे। वैसे भी इस कृतघ्न समाज में संबंध अब पर्फ़्यूम से भी ज़्यादा गए-गुज़रे हो चले हैं। कि महक आई और गई। लोग मां-बाप भूल जा रहे हैं तो यह तो रिपोर्टिंग के संबंध हैं। आप, आप की आवाज़, आप का नैरेशन, स्पेशल रिपोर्ट छोटे परदे से गुम हो गई, जिस दिन गुम हुई, आप भी गुम। फिर संस्मरण,डायरी और आत्मकथा के हिस्से हो जाएंगे यह सब।

मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा होगा!

इब्राहिम अल्काज़ी को जानते ही होंगे आप। उन के पढाए सिखाए बहुतेरे अभिनेताओं को पद्म पुरस्कार कब के मिल गए। ओम शिवपुरी, मनोहर सिंह, नसीरूद्दीन शाह, ओमपुरी सुरेका सीकरी, उत्तरा बवकर, नीना गुप्ता से लगायत जाने कितने नामी-बेनामी लोगों ने क्या-क्या पा लिया। पर नेशनल स्कूल आफ ड्रामा के संस्थापक इब्राहिम अल्काज़ी जैसे थिएटर और पेंटिंग के श्लाका पुरूश को अब पद्म पुरस्कार मिला है। छॊडिए अपने बिहार में महाकवि जानकी वल्लभ शास्त्री को याद कीजिए।उन को भी अब पद्मश्री मिली तो वह बिफर गए। अपमान लगा उन को यह।

खैर छोडिए भी मैं भी कहां भूले बिसरे लोगों की याद में समा गया। अभी तो आप हैं आप की आवाज़ है, कोने- कोने से मिल रहे आमंत्रण हैं। मज़ा लीजिए। क्यों कि बच्चन जी लिख ही गए हैं कि इस पार प्रिये तुम हो, मधु है, उस पार न जाने क्या होगा !

हा, पर स्पेशल रिपोर्ट ले कर आइएगा ज़रूर। हम भी देखेंगे घर में अपने रजाई ओढ कर अगर बिजली आती रही तो! आमीन!

Thursday, 24 May 2012

पौराणिक संविधान औरतों की गुलामी का संविधान है: मैत्रेयी पुष्पा

कलावती चाची और सारंग जैसे महिला चरित्रों ने मैत्रेयी पुष्पा को एक समय चर्चा के शिखर पर बिठा दिया था। आज भी उस की गूंज गई नहीं है। मैत्रेयी की बात चलती है तो कलावती और सारंग साथ हो लेती हैं। अनायास। मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास ‘चाक’ में एक स्त्री, एक पुरुष के भीतर पुंसत्व जगाने के लिए देह समर्पण करती है और दूसरे संदर्भ में एक स्त्री अपने संघर्ष के सहचर मित्र के घायल होने पर अचानक इस हद तक आसक्ति अनुभव करती है कि उस के प्रति समर्पित हो जाती है। यानी दोनों प्रसंग यौन शुचिता की बनी बनाई धारणा को तोड़ते हैं। यह दोनों स्त्रियां क्रमश: ‘चाक’ की कलावती चाची और सारंग हैं। ‘चाक’ में एक संवाद है कि ‘हम जाट स्त्री बिछुआ अपने जेब में रखती हैं। जब चाहती हैं पहन लेती हैं जब चाहती हैं उतार देती हैं।’ इस संवाद के बहाने मैत्रेयी स्त्री में बगावत के बीज बोना चाहती हैं।

दरअसल बीते कुछेक वर्षों में ही मैत्रेयी पुष्पा ने हिंदी कथा साहित्य में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। ‘इदन्नमम’ और ‘चाक’ उनके दो उपन्यासों से वह लगातार चर्चा बनी हुई हैं। ‘चाक’ में एक बहुत पिछड़े गांव की स्त्री सारंग व्यक्तिगत संघर्ष को पूरी दृष्टि के साथ सामाजिक संघर्ष में बदलती है और स्त्री की मुक्ति का एक अनोखा दर्शन प्रस्तुत करती है। पुरुष प्रधान सामंती समाज के विरुद्ध खड़े होने पर जो साहस वह दिखाती है वह स्त्री मुक्ति पर नए सामाजिक रक्षण के रूप में देखने लायक है। वास्तव में मैत्रेयी पुष्पा आंचलिकता की उसी ज़मीन पर खड़ी हैं जिस पर रेणु खड़े मिलते हैं, लेकिन मैत्रेयी पुष्पा रेणु से भी आगे हैं तो इस लिए कि उन के यहां उन की अंतर्वस्तु बहुत अग्रगामी और क्रांतिकारी नज़र आती है। अब तो अल्मा कबूतरी, इसुरी फाग जैसे उपन्यास और उन की आत्मकथा कस्तूरी कुंडल बसे भी आ कर चर्चा में आ चुकी हैं। राजेंद्र यादव से उन का जुडाव भी खूब चर्चा में आया। तब और जब उन्हों ने मैत्रेयी को एक बार मरी हुई गाय कह दिया। अभी बीते दिनों नया ज्ञानोदय को दिए गए एक इंटरव्यू में जब विभूति नारायन राय ने लेखिकाओं को छिनाल शब्द से नवाज़ा, तो मैत्रेयी ने विभूति नारायन राय समेत नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया और उन की मंडली को जिस तरह अकेलेदम दौड़ा लिया, और बहुत दूर तक। वह भी हैरतंगेज़ था। मंज़र यह हो गया कि जैसे शिकारी ही शिकार से भागने लगा। और भागते-भागते हांफने लगा हो। अंतत: विभूति नारायन राय और रवींद्र कालिया को आफ़िशियली, सार्वजनिक रुप से इस के लिए माफ़ी मांगनी पड़ी। मैत्रेयी जैसे विजयी नायिका बन कर उभरीं। और मैं समझता हूं कि इस पूरे विवाद की खुमारी हिंदी समाज के मन से अभी भी उतरी नहीं है। खैर, १९९७ में कथाक्रम की एक गोष्ठी में भाग लेने वह लखनऊ आई थीं। दयानंद पांडेय ने राष्ट्रीय सहारा के लिए तभी उन से यह बात-चीत की थी। पेश है उन से बातचीत के अंश -


पहले आप के बारे में ही जानें?
अलीगढ़ के एक गांव सिकुर्रा में 30 नवंबर 1944 में पैदा हुई। प्राइमरी पढ़ाई भी वहीं की। पिता के निधन के बाद मां के साथ झांसी के खिल्ली गांव आ गई। पिता खेती करते थे पर मां ने नौकरी शुरु की। फिर एक यादव परिवार में मेरी परवरिश शुरु हुई। मेरा पालन पोषण और पढ़ाई-लिखाई यादव परिवार में ही हुआ।

लिखना कब से शुरू किया?
कालेज के समय से ही। कविताएं। फिर शादी हो गई तो लिखना बंद हो गया। शादी तो बीच पढ़ाई में हो गई थी। बच्चों को संभालने में लग गई। जब बच्चे बड़े हो गए तो लिखना शुरू किया।

बच्चे कितने हैं?
तीन बेटियां हैं और तीनों डाक्टर हैं। पति डा. आर सी शर्मा भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में एडिशनल डरायरेक्टर जनरल हैं। वह भी डाक्टर रहे हैं। अलीगढ़ से ही वह भी हैं।

कभी आप ने भी नौकरी की?
मैं ने कभी नौकरी नहीं की। लिखने के अलावा कुछ नहीं किया।

बाकायदा कब से लिखना शुरू किया?
1985 से। चिन्हार, ललमनिया और गोमा हंसती है तीन कहानी संग्रह और 4 उपन्यास स्मृति दंश, बेतवा बहती रही, इदन्नम और चाक हैं।

पर चर्चा इदन्नमम से शुरू हुई?
हां।

लगातार चर्चा में बने रहने से क्या महसूस करती हैं?
एक लेखक के इतना चर्चित होने का मतलब अपने चर्चित रहने से नहीं, हां किताब लोगों तक पहुंची तो!

यह जो एक साथ आपने दलित और स्त्री दोनों का विमर्श शुरू किया तो क्या यह सब कुछ नियोजित कर के किया?
नियोजित नहीं किया।

फिर?
स्वभाविक रूप से दलित एक साथ होगा। आप ने देखा होगा कि अगर घर में दो नौकर होते हैं तो एक हो जाते हैं। गुलामी उन्हें आपस में जोड़ देती है और आज़ाद होने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।

लेकिन अमूमन घरों में नौकर इन दिनों गुलाम नहीं होते। वह जीविका के लिए नौकर बने होते हैं। तो यहां उन की आज़ादी से क्या मतलब?
नौकर वाली बात आप छोड़ दीजिए। दास मान लीजिए और जो भी दास होगा, जिस के ऊपर दासता थोपी जाएगी वही अपने को शोषित पाएगा। अपने ही से मिलेगा। किसी मालिक से तो मिलेगा नहीं।

औरतों को आप भी शोषित और दासता के फ्रेम में बांधती हैं?
पांच हज़ार साल का पौराणिक संविधान औरतों की गुलामी का संविधान है।

और आज का संविधान?
आज के संविधान में लिखित रूप में तो औरतो को हक है, व्यवहारिक रूप में नहीं। गांव की औरत आज भी अपने मन से वोट तक डालने नहीं जाती। तो यह दोगली नीति हुई कि नहीं!

यह जो फ़ेमिनिस्ट औरतें हैं उन की भी वकालत करना चाहेंगी?
नहीं। पर मैं औरतों को खाने में बांट कर नहीं देखती। हां, वुमेनिज़्म जब नारेबाजी में आ जाती है तो इस को मैं नहीं मानती। क्यों कि किसी आंदोलन के लिए संघर्ष ज़रूरी होता है नारा नहीं। फ़ेमिनिस्ट स्त्री भी, कहीं भी हो जब तक मानसिक गुलामी से नहीं छूटती, आज़ाद नहीं होगी। चाहे वह कितने भी नारे लगाए।

आप अपनी स्त्री को संघर्ष के भीतर पाती हैं?
मैं अपनी स्त्री को संघर्ष के भीतर पाती हूं।

तो आप भी दासता में जी रही हैं? आजाद नहीं हैं?
अगर आजादी पा ली होती तो क्यों लिखती? क्यों किसी त्रासदी की बात करती? तब तो जद्दोजहद खत्म हो गई होती।

यह बताइए कि कलावती चाची और सारंग एडाप्टेड करेक्टर हैं कि क्रिएटेड।
कलावती चाची तो एडाप्टेड करेक्टर हैं पर सारंग क्रिएटेड।

कलावती चाची इस समय किस स्थिति में हैं?
अपनी ही स्थितियों में।

कलावती चाची को मालूम है क्या अपने इस चरित्र के बाबत कि वह ‘चाक’ में किस तरह उपस्थित हैं?
कलावती पढ़ी लिखी नहीं है। पर जब कलावती चाची यह जानेंगी तो मेरी गरदन काट लेंगी।

तो कब तक बची रहेगी आप की गरदन?
नहीं बचेगी। गांव में तो लोग पूछते रहते हैं चाक के बारे में कि कब छपेगी किताब, लेकिन मैं टाल जाती हूं।

क्या ओरिजिनल कलावती चाची भी ऐसी ही हैं जैसी चाक में उपस्थित हैं?
हां।

कि किसी पुरूष का पुसंत्व जगाने के लिए देह समर्पित कर दें?
उन का स्वभाव यही है।

कलावती का चरित्र फ्रेम करते समय क्या जैनेंद्र कुमार की सुनीता भी कहीं आप के जेहन में थी?
नहीं। क्यों?

इस लिए कि सुनीता की नायिका भी एक क्रांतिकारी के सोए क्रांतिकारी को जगाने खातिर एक निर्जन जगह अचानक निर्वस्त्र हो जाती है और आप की स्थिति थोड़ी अलग है कि पुंसत्व जगाने के लिए स्त्री समर्पित हो जाती है!
नहीं मेरे जेहन में यह नहीं था। सुनीता की याद भी नहीं है। पर यह सब परिस्थितियों की डिमांड है। सारंग का संसर्ग या कलावती का संसर्ग। फिर वह बिछुआ वाला संवाद भी इसी अर्थ में है कि हम जाट स्त्री बिछुआ अपनी जेब में रखती हैं। जब चाहती हैं पहन लेती हैं, जब चाहती हैं उतार लेती हैं।

संदेश क्या देना चाहती हैं इस संवाद से?
यह कि सुहाग चिह्न पुरूष को क्यों नहीं दिए? क्यों स्त्री को ही दिए, उसे वह संस्कार दे दिए कि वह सजने संवरने लगती है। क्यों ?

तो क्या आप चाहती हैं कि पुरुषों को भी सुहाग चिह्न दिया जाना चाहिए?
नहीं। किसी को भी सुहाग चिह्न नहीं दिया जाना चाहिए।

आप को नहीं लगता कि कलावती चाची और सारंग जैसे चरित्रों के चलते ही आप चर्चा में छा गईं?
आप इस बहाने अश्लीलता का आरोप मढ़ना चाहते हैं?

नहीं। शील-अश्लील की बात नहीं। पर यह तो हो ही गया है कि कई महिला लेखिकाओं के लिए आप एक बैरियर रेखा बन कर उभरी हैं। सब की चिंता यही है कि इस मैत्रेयी पुष्पा बैरियर से बड़ा बैरियर कैसे गढ़ें?
इस की तरफ तो मैं ने नहीं सोचा पर यह बात ज़रुर है कि गांव की स्त्री पहली बार इस रुप में आई है तो इस से किसी को परेशानी होती है या बैरियर दिखता है तो मैं क्या करूं?

गांव पर ही लिखती रहेंगी या?
गांव को समस्या छोड़ेगी नहीं तो कैसे छोड़ सकती हूं गांव पर लिखना!

गांव अब भी जाती हैं?
हर महीने गांव जाती हूं।

बरसों से अब आप शहर में रह रही हैं। किसी शहरी प्लॉट पर लिखने का मन नहीं होता?
मैं शहरी नहीं बन पाई।

क्यों?
यह व्यक्तिगत बात है। क्यों कि गांव से ही मानसिक स्तर पर जुड़ी हुई हूं। आज भी।

इस्मत चुगताई, महाश्वेता देवी, मृदुला गर्ग और मैत्रेयी पुष्पा इन चार बिंदुओं को मिलाना हो किसी रेखा द्वारा तो कैसे मिलाएंगी आप?
मैं नहीं मिलाना चाहूंगी।

आप एक तरफ दलितों, दासों की बात करती हैं दूसरी तरफ ‘बोल्ड’ हो जाती हैं, इसलिए भी इस रेखा की अर्थवत्ता और इयत्ता बनती है!
फिर भी मैं कुछ नहीं कहूंगी।

अच्छा महाश्वेता देवी से आप अपने को कितना करीब या कितना दूर पाती हैं?
अगर किसी के करीब हूं तो रेणु और महाश्वेता के। महाश्वेता के बहुत करीब पाती हूं। दूर का सवाल कहां उठता है वहां जहां शोषण हो!

मैत्रेयी पुष्पा आपका मूल नाम है?
मैत्रेयी मेरा मूल नाम है। पुष्पा बोलने का।

जिस पारिवारिक पृष्ठभूमि को आप ने बताया उसमें मैत्रेयी नाम कैसे?
पत्रा और पंडित के अनुसार राशि का यही नाम निकला था। और आप यह बताइए कि गांव में विद्वान मनुष्य होना क्या आप को आश्चर्य में डाल रहा है?

नहीं मैं भी गांव का हूं। चलिए बताइए कि आप की अरेंज्ड मैरेज थी या?
अरेंज्ड!

Sunday, 20 May 2012

पूर्वांचल की नई स्त्री को व्यक्तित्व देती कथा : ‘बांसगांव की मुनमुन’

- रामदेव शुक्ल

‘राग दरबारी’ के पाठक शिवपालगंज और ‘गंजहा’ बहादुरों के करिश्मे याद कर के अब भी मुस्कराने लगते हैं। श्रीलाल शुक्ल बताते थे कि एस.डी.एम. के रूप में जो अनुभव उन्हों ने बांसगांव में एकत्र किए, उन्हीं के आधार पर आगे चल कर शिवपालगंज की रचना संभव हुई। उसी बांसगांव को जानने समझने और भोगने वाले कथाकार दयानंद पाण्डेय इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आरंभ में प्रत्यक्ष रूप से अपने नए उपन्यास ‘बांसगांव की मुनमुन‘ की कथाभूमि बनाते हैं। बांसगांव तहसील में से खजनी और गोला दो नई तहसीलों के बन जाने से बांसगांव का सिकुड़ना दर्ज करते हैं। यह बताना भी नहीं भूलते कि ‘बांसगांव के बाबू साहब लोगों की दबंगई और गुंडई अभी भी अपनी शान और रफ़्तार पर थी। और यह शान और रफ़्तार इतनी थी कि बांसगांव बसने की बजाय उजड़ रहा था।’ दबंगई गुंडई के अनेक दृश्य अंकित करने के बाद लेखक बताते हैं कि, ‘और ऐसे बांसगांव में मुनमुन जवान हो गई थी ......एक तो जज अफसर और बैंक मैनेजर की बहन होने का गरूर दूसरे मांता-पिता का ढ़ीला अंकुश, तीसरे जवानी का जादू।..... बांसगांव की सरहद लांघते ही राहुल के दोस्त की बाइक पर देखी जाती। कभी किसी मक्के के खेत में, कभी गन्ने या अरहर के खेत में साथ बैठी बतियाती दिख जाती। ‘अब हम कइसे चलीं डगरिया, लोगवा नजर लड़ावेला’ से आगे बढ़ कर गुनगुनाने लगी थी, ‘सैंया जी दिलवा मांगे लें अंगोछा बिछाइ के।’

बड़े भाई जज, मझले एस.डी.एम., सझले बैंक मैनेजर और चौथे थाइलैंड में एन.आर.आई. उर्फ घर-जमाई। पिता मुनक्का राय वृद्ध हो गए। वकालत लगभग खत्म हो चली। बेटी के विवाह की चिंता सब से बड़ी। शत्रुवत पट्टीदार गिरधारी राय ने अपने जाल में फंसा लिया। एक मास्टर के फ़ुल फ़ेलियर शराबी बेटे से मुनमुन की शादी पक्की कर बैठे। मुनमुन फ़ोन पर अपने भाइयों से रोती गिड़गिड़ाती रही कि वे एक बार अपने होने वाले बहनोई से मिल कर उस के चाल-चलन का पता कर लें। उच्च शिक्षित और बड़ी नौकरियों में व्यवस्थित भाइयों के पास फुर्सत नहीं थी। शादी के लिए एक दिन पहले आ कर, जल्दी-जल्दी शादी करा कर अपने-अपने ठौर चले गए। मुनक्का राय पंद्रह दिन बाद बेटी को देखने उस की ससुराल गए, तो पता चला कि अभी तक पति से उस की देखा-देखी भी नहीं हुई है। कई दिन भूखी रही। यह सब जान सुन कर रोते हुए पिता रोती हुई बेटी को ले कर घर आ गए। गनीमत इतनी थी कि शादी से पहले मुनक्का राय ने बेटी को अपने गांव में शिक्षा-मित्र की नौकरी दिलवा दी थी।

एक समय सब से ज़्यादा कमाने वाले वकील मुनक्का राय की बेटी और चार कमाऊ भाइयों की बहन मुनमुन को माता-पिता की जर्जर गृहस्थी का सारा बोझ अपने कंधे पर उठाना पड़ा। शिक्षा-मित्र का वेतन पाने पर पहले वह सोचती, ‘कैसे खर्च करे यह पैसा ? अब के दिनों में वह सोचती कि कैसे खर्च चलाए वह इन पैसों से ?’ चिंता अभाव और कठोर श्रम के कारण मुनमुन टी.बी. की मरीज बन बैठी। तब भी लगातार जूझती रही। अगला अध्याय शुरू किया उस के धूर्त ससुर ने। वह मुनमुन की शिक्षा-मित्र वाली नौकरी छुड़वा कर उसे अपने घर ले जाने के लिए तरह तरह के तमाशे करने लगा। जिन भाइयों ने अपनी तथाकथित व्यस्तता में से कुछ घंटे निकाल कर होने वाले बहनोई को देखना भी ज़रूरी नहीं समझा था, वे ही बहन और पिता पर हर तरह का दबाव बनाने लगे कि मुनमुन को ससुराल जाना ही चाहिए। बहन को राक्षसों के घर भेजने की चारो भाइयों की हड़बड़ी का विरोध उन के फुफेरे भाई दीपक ने किया। उस की कोशिश का भी कोई नतीज़ा नहीं निकला। हद कर दी, बड़े भाई जज साहेब ने। उन्हों ने कहा, ‘झोंटा पकड़ कर, खींच कर कर जबरिया घसीट कर विदा कर दूंगा।’ मुनमुन तब भी नहीं गई। अब उस के लुक्कड़ पियक्कड़ पति ने सारी हदें पार कर दी। वह बारबार ससुराल आ कर मुनमुन और उस की मां को मारने पीटने लगा। जीवन-संघर्ष का आखिरी हिस्सा मुनमुन ने खुद संभाला। लुक्कड़ पियक्कड़ पति की जम कर पिटाई की। उस से तलाक लेने की प्रक्रिया शुरू की और क्षेत्र की पति-पीड़ित लड़कियों की मार्ग-दर्शक बन गई।

कथाकार ने मुनमुन के जुझारू व्यक्तित्व के विकास को आत्मीयता के साथ गढ़ा है। पति के हाथों अपनी मां की बुरी तरह पिटाई से क्षुब्ध मुनमुन ने दीपक से कहा, ‘मन तो करता है जाऊं अभी उस को गोली मार दूं।’ दीपक पूछते हैं, ‘गोली कैसे मारोगी।’ मुनमुन कहती है, ‘अरे भइया, बांसगांव में रहती हूं। कट्टा खुले-आम मिलता है, जिसे आप लोग इंगलिश में कंट्रीगन कहते हैं।’ मुनमुन उसे गोली तो नहीं मारती, लेकिन तलाक का मुकदमा लड़ती है और ससुराल पीड़ित युवतियों की रहनुमा बन जाती है। अपने खिलाफ झूठी शिकायत पर बी.एस.ए. के बुलावे पर उन के कार्यालय में जा कर अपनी तर्क-बुद्धि और निर्भीकता से उन को वास्तविकता से परिचित कराती है। उन्हें मानना पड़ता है कि मुनमुन का पक्ष ही सही है। आर्थिक आत्मनिर्भरता स्त्री-मुक्ति में कितनी महत्वपूर्ण है, इसे कथाकार ने कुशलतापूर्वक कथा में रचा है। आंगनबाड़ी कार्यकर्त्ती सुनीता का शराबी पति उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव बनाता है। सुनीता मुनमुन से पूछती है, ‘पति छोड़ूं कि आंगनबाड़ी?’ मुनमुन पूछती है, ‘खाना कौन देता है, पति या आंगनबाड़ी?’ जवाब है, ‘आंगनबाड़ी।’ मुनमुन का निर्णय है, ‘तो पति को छोड़ दो।’ पूरी व्यवस्था से संघर्ष करती हुई मुनमुन मेघालय और थाइलैंड की मातृ-सत्तात्मक व्यवस्था का उल्लेख करती है। ‘मुनमुन राय अब न सिर्फ़ बांसगांव बल्कि बांसगांव के आस-पास की परित्यक्ताओं, सताई और ज़ुल्म की मारी औरतों का सहारा बनती जा रही थी।’ कथाकार मुनमुन के संघर्षशील व्यक्तित्व की स्वीकृति लोक-चेतना के स्तर पर ले जाता है। पान वाला गाने लगता है - ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो बांसगांव की रानी है।’ बांसगांव बस-स्टैंड पर चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी गाने लगते हैं, ‘मेरा चना बना है चुनमुन। खाती बांसगांव की मुनमुन। सहती एक न अत्याचार। चनाजोर गरम।’

इन्हीं परिस्थितियों में पिता को सूचित कर के मुनमुन पी.सी.एस. की परीक्षा में बैठने का निर्णय करती है। स्कूल से छुट्टी लेती है। रात-दिन अथक परिश्रम कर के पी.सी.एस. अफसर बन जाती है। एक ज़िले में एस.डी.एम. के पद पर तैनात होती है। पाठक को क्लाइमेक्स का सुख देने के लिए कथाकार पुराने वाले बी.एस.ए. को एस.डी.एम. मुनमुन को सलाम करते दिखाता है। अशिक्षा, कुशिक्षा और अनेक तरह की रूढ़ियों, कर्मकांडों में फंसी यह जड़ता बांसगांव की ही नहीं, पूरे हिंदी प्रदेश की है। मुनक्का राय मुनमुन से कहते हैं, ‘महिलाओं के लिए बांसगांव की आबोहवा ठीक नहीं है।’ मुनमुन कहती है, ‘महिलाओं के लिए तो सारे समाज की हवा ठीक नहीं है। बांसगांव तो उस का एक हिस्सा है।’ अन्य मुद्दों के संदर्भ में भी यही सच है। पुत्र-मोह पुत्र की महिमा को यहां तक ले जाता है कि पुत्र मनुष्य को पुं नामक नरक से तारता है। इस उपन्यास में एन.आर.आई. बेटा तपे हुए वकील जर्जर वृद्ध पिता से कहता है, ‘ऐसे मां-बाप को तो चौराहे पर खड़ा कर के गोली मार देनी चाहिए।’ मां-बाप का कसूर यह है कि दिन-रात शराब पी कर पत्नी को पीटने वाले पति के घर बेटी को झोंटा पकड़ कर क्यों नहीं ठेल देते। जज साहेब इसी कसूर के लिए फ़ोन पर अपनी मां से बहन को रंडी कह कर गाली देते हैं। मां शालीनता से कहती हैं, ‘जज हो, जज बने रहो। जानवर मत बनो।’ दौलत शोहरत सब कुछ कमाने वाले चार भाई बूढ़े लाचार मां-बाप को रोटी दवा तक के पैसे नहीं भेजते। अपने पैरों पर खड़ी होते ही बेटी पहली पोस्टिंग में ही मां-बाप को साथ ले कर जाती है। यथार्थ यह है कि ऐसे पुत्र मां-बाप का जीवन नरक करते हैं, बेटियां नरक से उन का उद्धार करती हैं।

दयानंद की कथा-भाषा निखरती जा रही है। पुराने मुहावरों को नए तेवर दे कर व्यंजकता बढ़ाने में वे समर्थ हो रहे हैं। मुनक्का राय के बेटे राहुल का व्याह थाईलैंड के धनी परिवार में पक्का हो गया। राहुल को एन.आर.आई. बन कर उसी परिवार में रहना होगा। कथाकार लिखते हैं, ‘ अंततः लड़की वाले थाईलैंड से आए और राहुल को व्याह ले गए।’ एन.आर.आई. अर्थात नए किस्म के घर-जमाई की पूरी विडंबना एक वाक्य में मूर्त हो उठी है। अंग्रेजी शब्दों की खपत गांव कस्बे की बोली-बानी में जिस तेज़ी से बढ़ती जा रही है, उस के नमूने इस कथा में मिलते हैं। ‘मुनमुन जो पहले ब्यूटीफुल थी, अब बोल्ड भी हो रही थी। विवेक कहने लगा था ‘बोल्ड एंड ब्यूटीफुल।’ पड़ोसी से झगड़ा होने पर मुनमुन ने एस.डी.एम. को फ़ोन मिलाया और रमेश तथा धीरज भइया का रिफरेंस दे कर पड़ोस के झगड़े का डिटेल दिया।. . . . कहा, ‘काइंडली हमें सुरक्षा दीजिए और हमें सेव कीजिए. . . . आखिर आप के भी मांता-पिता आप के होम टाउन या विलेज में होंगे. . . .’ मुनमुन की बातों से एस.डी.एम. कनविंस हुआ और कहा कि, ‘ घबराओ नहीं, अभी थाने से कहता हूं। फोर्स पहुंच जाएगी।’ शुद्धता-वादियों को मान लेना चाहिए कि ये शब्द और प्रयोग आम-फ़हम हो चले हैं।

मुनमुन के विकास की रफ़्तार और ऊंचाई किसी को समस्या के दिवाःस्वप्न वाले समाधान की तरह लग सकती है। जैसे निराला के आरंभिक उपन्यासों ‘अप्सरा’ और ‘अलका’ में प्रख्यात आलोचक डॉ रामविलास शर्मा को लगी थी। ‘काले कारनामें तक आते आते निराला ने सब का समाधान कर दिया था। हिंदी प्रदेश और खास तौर पर पूर्वांचल की रूढ़िग्रस्त आत्महंता जड़ता में से युवक-युवतियों को उबारने के लिए ऐसे ही ब्रांड की ज़रूरत है -मुनमुन ब्रांड की। दयानंद पांडेय इस उपलब्धि के लिए बधाई के पात्र हैं।

समीक्ष्य पुस्तक :

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

Friday, 18 May 2012

स्त्री स्वतंत्रता और उस की अस्मिता को सही संदर्भों और अर्थों में पहचानने की एक सशक्त कोशिश

नमिता सुंदर

दयानंद पांडेय का उपन्यास बांसगांव की मुनमुन स्त्री स्वतंत्रता और उस की अस्मिता को सही संदर्भों और अर्थों में पहचानने की एक सशक्त कोशिश है। ऐसे अहम् मसलों पर चर्चा और बहस तो बड़े-बड़े शहरों के वातानुकूलित सभागारों में हो सकती है, जोशीले भाषण दिए जा सकते हैं, जुलूस निकाले जा सकते हैं पर इस सब आंदोलनों का समस्या की जड़ या उस के समाधान से कोई वास्ता नहीं होता, यह हम इतने दशकों के अनुभव से जान चुके हैं। औरत स्वतंत्र तब तक नहीं हो सकती जब तक उस का खुद अपनी सामर्थ्य पर विश्वास नहीं होता और यही विश्वास पुरजोर रूप से दिलाती है बांसगांव की कस्बाई माटी में पली बढ़ी मुनमुन।

सच पूछिए तो मुनमुन कोई काल्पनिक चरित्र नहीं है, अकेले अपने दम पर अपनी और दूसरों की भी लड़ाइयां लड़ने वाली ऐसी महिलाएं हमारे गांव, कस्बों में हर पीढ़ी में होती हैं, पर हां उन की आपबीती, उन का संघर्ष अकसर गांव-घर में दफ़न हो कर रह जाता है। मुनमुन की आवाज़ में हमें अपने आस-पास घूमती आवाज़ों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है जिन्हें बिना सुने ही चुप करा दिया जाता रहा है।

मुनमुन का संघर्ष पुरुषों की बराबरी का दर्जा पाने या अपने औरत होने के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने मात्र का नहीं है वरन उस की लड़ाई अपने आप को एक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करने की लड़ाई है और सच पूछिए तो हर औरत को यह समझना चाहिए कि यही मांग उस की स्वतंत्रता और सम्मान का आधार है।

मुनमुन का जुझारूपन, उस की ललकार और दबंगई में एक अजब सा आकर्षण है। उसे अपनाने की हिम्मत न जुटा पाएं तो उसे नकारना भी संभव नहीं है। एक औरत के इर्द गिर्द घूमने के बावजूद इस उपन्यास का सरोकार केवल नारी से जुड़े हुए ही मुद्दे नहीं है। हमारे बदलते सामाजिक परिवेश, भौतिक सफलता के संग मानवीय संबंधों में पनपती क्रूरता की हद तक की संवेदनहीनता, शहरी चकाचौंध के बढ़ते आकर्षण के चलते गांव, कस्बों में ढहती चौखटों के संग ढूह होते बुजुर्गों की व्यथा की भी अभिव्यक्ति भीतर तक सोचने को मजबूर करती है।

लेखक की भाषा और शैली ने कहानी के परिवेश को पाठक के लिए सजीव बनाने में खासा सहयोग दिया है। कस्बाई माटी में पले बढ़े पात्रों का व्यक्तित्व, उनकी मानसिकता, भावनाओं के उतार-चढ़ाव उन्हें पाठकों के लिए विश्वसनीय बना देते हैं। कुल मिलाकर यह ऐसा उपन्यास है जिससे आप स्वयं को जुड़ा हुआ पाएंगे, जो आप को झकझोरेगा, दुखी करेगा, शर्मसार भी करेगा लेकिन कहीं यह विश्वास भी दिलाएगा कि रात कितनी भी लंबी हो, उस की सुबह होती है।

समीक्ष्य पुस्तक:

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

Thursday, 17 May 2012

दूधनाथ के निष्कासन और अखिलेश के ग्रहण के बहाने दलित विमर्श पर कुछ सवाल

दयानंद पांडेय

यहां दलित पृष्ठभूमि पर आधारित दो लंबी कहानियां चर्चा-ए-नज़र हैं। जो कोई एक दशक पहले कथादेश में एक साथ छपी थीं। एक दूधनाथ सिंह की निष्कासन, दूसरी अखिलेश की ग्रहण। अलग बात है अगर इन दोनों कहानियों को दलित पृष्ठभूमि का ठप्पा लगा कर न भी छापा गया होता तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। क्यों कि इन कहानियों की क्रमश: नायिका और नायक किसी अन्य वर्ग से होते तो भी उन के इस संघर्ष में, उन की इस अपमान कथा और यातना में कोई कमी आने वाली नहीं थी। हालां कि अखिलेश ने अपनी कहानी ‘ग्रहण’ के शुरू में ही नोट दर्ज कर दिया है कि इस कहानी को दलित गैर दलित लेखक की कसौटी पर परखने के लिए हर कोई स्वतंत्र है। और कि उन का आग्रह भी है कि इसे सब से पहले एक कहानी के रूप में पढ़ा जाए ! तो क्या यह माना जाए कि जैसे पहले ब्राह्मणवादी व्यवस्था दलित को मंदिर में आने से रोकती थी, और अब दलित विमर्श के इस नए ‘मंदिर’ में दलित गैर दलित को आने से रोक रहा है ! 

मज़ा यह कि अखिलेश की तरह दूधनाथ सिंह की कहानी ‘निष्कासन’ के भी शुरू में प्रेमचंद का एक उद्धरण बतौर नोट दर्ज है। दोनों ही कहानीकारों ने अपनी-अपनी कथाओं के काल्पनिक होने की भी चुगली चलाई है। दूधनाथ सिंह ने तो एक सांस में तीन काम कर दिए हैं। कहानी के पहले। पहला काम प्रेमचंद का उद्धरण ठोंका है दूसरे, इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं बताया है और तुरंत ही ‘उस लड़की’ से क्षमा याचना सहित जिस की यह कहानी है दर्ज कर दिया है। भई वाह! क्या बात है। ‘काल्पनिक’ भी क्षमा-याचना भी। यह कौन सा अपराध बोध है? दलित-विमर्श के दरवाज़े में बिना इज़ाज़त घुस जाने का ? 

जो भी हो दूधनाथ सिंह के निष्कासन की लड़की अगर खटिक नहीं कायस्थ, गुप्ता, ब्राह्मण, ठाकुर या किसी भी अन्य वर्ग से होती तो भी उस की अपमान कथा, उस के संघर्ष, उस की यातना, उस के सपने जोड़ने और टूटने में ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ने वाला था। उस की अवश दारुणता और करुणा की कसक ऐसे ही मथती। फिर भी दूधनाथ सिंह ने लड़की को खटिक के बाने में गूंथ कर ही सही कथा कही है। महत्वपूर्ण यही है। यह कहानी बताती है कि बाकी कानून तो दोगले हैं ही अनुसूचित जाति के लिए बनाए गए विशेष कानून और भी ज़्यादा दोगले और दिखावे वाले हैं। और इन के नेता और भी बड़े हिजड़े ! यूनिवर्सिटियों, कॉलेजों या राजकीय संवासनी गृहों की लड़कियां बड़े लोगों और धन्ना सेठों के लिए ‘सप्लाई’ होती हैं। ऐसी घटनाएं जब-तब अखबारों में खबरों का विषय बनती रहती हैं। पर बड़े लोगों का कभी कुछ नहीं होता। यह तथ्य अखबारी खबरों में भी गूंजता है और दूधनाथ सिंह के निष्कासन में भी। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि दूधनाथ के यहां लड़की की यातना ज्यादा सघन, मनोवैज्ञानिक और ब्यौरेवार है जब कि अखबारों में लड़की की यातना, मनोविज्ञान और उस की सघनता अमूमन अनुपस्थित  होती है। लड़की की यातना में कानून और समाज की भी व्यवस्थाएं उसे न सिर्फ नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़तीं बल्कि उसे तोड़ने में भी चार कदम आगे-आगे ही चलती हैं। दूधनाथ के यहां यह ब्यौरा भी बड़ी विकलता और आजिजी के साथ रेशा-रेशा उपस्थित है और पूरी तल्खी के साथ। हॉस्टल की अधीक्षिका, संरक्षिका, अधिष्ठाता, मुख्य कुलानुशासक से लगायत कुलपति तक लड़की के न सिर्फ़ खिलाफ हैं बल्कि नख-दंत विहीन अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष भी कितने विवश हैं। दलित राज्यपाल जो इस दलित लड़की की मदद भी करना चाहते हैं, राजनीतिक चश्मे में फिट हो कर कितने अवश हो जाते हैं। दूधनाथ के निष्कासन में यह छटपाटहट भी दर्ज होते जाना न सिर्फ़ हिला कर रख देता है बल्कि यह बात भी रेखांकित होती है और कि पूरी ताकत से कि व्यवस्था से लड़ने वाला , व्यवस्था भले न तोड़ पाए खुद ज़रूर टूट जाता है। बतर्ज वाली आसी कि: ‘टूटना मेरा मुकद्दर है कि मैं शीशा हूं / और शीशा कभी फौलाद नहीं हो सकता।’ 

मुख्यमंत्री समेत कामरेडी और बसपाई गलियारों में अपमान भरी धूल खाते टहलते सभी जगह से थक-हार कर लड़की को लगता है कि ‘खुदा का दरवाज़ा बंद हो सकता है, माननीय न्यायमूर्तियों का नहीं। उन्हीं के भरोसे हम सब कुछ सह लेते हैं, लड़ते-भिड़ते, थकते-थकाते मुंह के बल गिरते हैं और आंख उठाते हैं तो पाते हैं कि माननीय न्यायमूर्ति का सघन तर्क मंडित पुलिंदा पकड़े खड़े हैं… तो लड़की भी अपनी उसी शाश्वत और तर्क-संकुल घिघियाहट के साथ माननीय न्यायमूर्ति के चैंबर में खड़ी थी- ‘आप ही मुझे न्याय दिला सकते है।’ और माननीय न्यायमूर्ति आदेश भी देते हैं: मेरे विचार से इस तरह के आदेश में दखलंदाज़ी की कोई ज़रूरत नहीं। अत: याचिका नियमत: खारिज की जाती है।’ लड़की हॉस्टल से पहले ही भगाई जा चुकी है अंतत: वह ज़िंदगी से भी भाग लेती है। लड़की की आत्महत्या इस कहानी में उपजे विरोध को हालां कि कुंद भी करती है और सवाल भी। कि जब सारी व्यवस्था लड़की के खिलाफ थी, बावजूद हॉस्टल में उस के सामाजिक बहिष्कार की घोषणा के लड़कियों का एक बड़ा हिस्सा लड़की के पक्ष में गोलबंद हो कर उसे न सिर्फ़ नैतिक, व्यावहारिक समर्थन भी देता है, हरिजन एक्ट का समर्थ कानून भी है देश में, उस की बड़ी बहन और उस का दोस्त मनोज पांडेय भी उस के साथ है, फिर वह लड़की इतनी अकेली कैसे पड़ गई कहानीकार की कलम में, कि उस का अवसाद इतना घना कैसे हो गया कि अंजाम आत्महत्या में तब्दील दीखता है?
छेद और भी बहुत हैं दूधानाथ के निष्कासन में। और इस कदर कि जैसे लड़की के सलवार कुर्ते के भीतर काले चींटे का रूपक कहानी में भी बार-बार उतरता रहता है। 

जैसे कि पृष्ठ-57 पर वह राज्यपाल के साथ पचासों गाड़ियों का काफिला गुज़ार देते हैं। राज्यपाल राजनीतिक चोले में नहीं होता कि उस के साथ पचासों गाड़ियां चलें। पचास छोड़िए, कुल दस गाड़ियां भी नहीं होती। पृष्ठ-29 पर लड़की की बड़ी बहन कहती है, ‘और घर फ़ोन मत कर देना!’ पहले ही कहानी के ब्यौरे है कि लड़की का पिता ठेला लगाता है। ठेले वाले के घर भी फ़ोन? विकास दर तब इतना तो उछाल नहीं खा पाई थी, जब कि यह कहानी है, न ही तब मोबाइल का ज़माना था इस तरह। पृष्ठ-33 पर लड़की कहती है, ‘मेरा ऐडमिशन हो गया है सर!’ पर इस के 7 लाइन बाद ही वह कहती है, ‘ऐडमिशन हो जाएगा सर!’ पृष्ठ-37 पर राज्य के कैबिनेट सचिव का ज़िक्र चलता है। लेकिन कैबिनेट सचिव भारत सरकार में ही एक होता है। किसी प्रदेश में तो यह पद तब अलग से था ही नहीं। अब फिर नहीं है। मुख्य सचिव में ही यह पद निहित होता है। बीच के एक अपवाद कोछोड कर। पर अब यह कौन बताए दूधनाथ जी को? इसी तरह कहानी के कई हिस्से विश्लेषण और अखबारी रिपोर्ट की गंध देते हैं। तो यह खटकता है। अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष कम अफसर को एक जगह ‘राजनीति’ से असहाय दिखाया गया है। दिक्कत यह है कि अफसरों से ज़्यादा दलित राजनीति कर कौन रहा है? और वह भी उन के छागला साहब? प्रशासनिक अधिकारी होते हुए भी यह राजनीतिक पद क्या यों ही हथिया ले गए थे? और इस कहानी में यह और ऐसे बहुतेरे छेद हैं। पर सब से बड़ा छेद जो है वह यह कि दूधनाथ सिंह लड़की के समूचे संघर्ष को आत्महत्या में सुला देते हैं। व्यवस्था से वह जीतती भले न, न सही पर लड़ती तो रह सकती ही थी! 


अखिलेश की ग्रहण कहानी इस मामले में दूधनाथ के निष्कासन से अलग है। अखिलेश का राजकुमार आत्महत्या नहीं करता। मरता नहीं, मारता है लोगों को। यह एक दूसरे किसिम की अति है, कहानी में। और सत्तर के दशक में ‘लाल सलाम’ के उबाल में पकी ‘क्रांतिकारी’ कहानियों की याद दिलाती है। वह कहानियां जो देखते-देखते ही दफन हो गई हैं। 

तो भी ‘ग्रहण’ में विपद का व्यक्ति-चित्र अच्छा बन पड़ा है। उस का अनथक संघर्ष मथता है। खास कर महात्मा गांधी से इस गांव के गांधी विपद का तुलनात्मक ब्यौरा। यह सिर्फ़ ब्यौरा नहीं, सामाजिक व्यवस्था की दुरभिसंधि पर तमाचा भी है और जूता भी। पर महिपाल बाबा का ब्यौरा ‘वर्ग चेतना’ नहीं अंधविश्वास बोता है। ‘ग्रहण’ में एक ऐसे राजकुमार की कथा पिरोई गई है जो पैदाइशी अन्याय का शिकार है। वह बिना गुदा के पैदा होता है। सो पेट में छेद बना कर डॉक्टर द्वारा उस का मलद्वार बनाया जाता है। दलित है, निर्धन है सो ‘बड़ा ऑपरेशन’ नहीं होता और राजकुमार बड़ा हो जाता है। (अब अलग बात है कि पहले इस तरह के ऑपरेशन सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में मुफ़्त में हो जाते थे और अब भी दस-पंद्रह ह्ज़ार रुपए में हो जाते हैं।) साथ ही उस के साथ हो रहा निरंतर अन्याय भी दिन-ब-दिन गाढ़ा होता जाता है। स्कूल में गुरू जी लोग, समाज में सवर्ण लोग उसे पेटहगना कह कर न सिर्फ़ अपमानित करते रहते हैं, उसे तोड़ते भी रहते हैं। वह भट्ठे पर मजूरी कर आर्थिक स्थिति ठीक करने और आपरेशन के इरादे से दो मुर्गियां लाता है ताकि अंडा बेच सके। पर वह दलित है, बुद्धि है नहीं सो मुर्गा नहीं लाता। फिर ले जाता है दोनों मुर्गियां बदलने। रास्ते में मंदिर के सामने खड़े हो कर हाथ जोड़ रहा होता है कि सवर्णों के लड़के पेटहगना को देख लेते हैं। उसे मुर्गा बना कर मुर्गियां उस की पीठ पर रखने की सज़ा देते हैं। फिर मारते पीटते हैं, उस की मुर्गियां छीन लेते हैं। 

मुर्गियां छिनवा कर टूटा फूटा वह अस्पताल में होता है। वह पुलिस में मुकदमा लिखवाना चाहता है। पर प्रधान जी के दबाव में उस का पिता विपद और मां बटुली झुक जाते हैं। नतीज़तन एक सुबह राजकुमार अस्पताल से ‘गायब’ हो लेता है। विपद अनिष्ट से सहमा-सहमा पत्नी बटुली के साथ घर पहुंचता है। फिर तो राजकुमार उर्फ़ पेटहगना रॉबिनहुड उर्फ़ क्रांतिकारी बन पुरोहित के बेटे को मार डालता है, पुरोहित की आंखें फोड़ डालता है आदि-आदि करना शुरू कर देता है। गांव में ताकतवर लोग स्टैब्लिश कर देते हैं कि यह सब राजकुमार की प्रेतात्मा कर रही है। फिर उस की पिटाई स्थल को पुण्य स्थल मान उस की आत्मा को खुश करने की गरज से वहां भजन कीर्तन शुरू कर दिया गया। यहां वही लोग सब से ज़्यादा झूम-झूम कर गाते, जिन लोगों ने राजकुमार को पीटा था, सताया था। पर राजकुमार के माता पिता वहां नहीं आते। अचानक एक रात राजकुमार अपने घर ‘प्रकट’ होता है। बताता है कि वह जीवित है। फिर स्थितियों को देखते हुए तय होता है कि बार बार मिलना तो अब हो नहीं पाएगा सो महिपाल बाबा की समाधि पर फूल चढ़ाते रहना ताकि कुशल क्षेम मिलती रहे। समाधि पर पहले एक या दो फूल मिलते। फिर आठ हुए और फिर बारह फूल। गरज यह कि अब प्रतिशोध और हिंसा में जलते जलाते एक नहीं बारह राजकुमार हो गए थे। 

दो समानताएं ग्रहण और निष्कासन दोनों कहानियों में यह है कि कहानीकार बेवजह ही टिप्पणी करने जब-तब बतौर कहानीकार कूद पड़ते हैं। इस से रसाघात होता है। दूसरी समानता इन दोनों कहानियों में यह है कि दोनों ही कहानियां बहन मायावती की आंच में झुलसी हुईं है। दूधनाथ के निष्कासन की लड़की बहन जी के पास उम्मीदों की गठरी ले कर लखनऊ जाती है तो वह मिलती ही नहीं। जब कि अखिलेश के ग्रहण का राजकुमार बहन जी चूंकि उस के कस्बे में जनसभा करने गई हुई हैं सो एक पत्रकार के मार्फ़त उन से मिलने में सफल हो जाता है।[पत्रकार भी मिल पाते रहे हैं क्या कभी बहन जी से? वह भी छोटी जगह पर भी?] पर चूंकि वह पेटहगना है और बदबू कर रहा होता है सो वह उसे बेइज़्ज़त कर ढकेलवा कर भगा देती हैं। वह भाषा भी ऐसी बोलती हैं जो राजकुमार समझ नहीं पाता। 

इस एक बिंदु के बहाने, इस एक सच के बहाने दलित लेखक और गैर दलित लेखक बहस चलाने वाले दलित विमर्श के पुरोधाओं से कहने का मन होता है कि मायावती के तानाशाह रवैए, भ्रष्टाचार में आकंठ सने उन के रुप और बसपा विमर्श पर भी ज़रा लिखिए न? क्यों कि आज का असली दलित विमर्श यही है। दलितों के ठेकेदार राजनीतिज्ञ और अफसर जितना दलितों को दूह रहे हैं, शोषण, अपमान और नुकसान कर रहे हैं उतना कोई और नहीं। सत्ता और धन के शिखर पर बैठा दलित नीचे कतार के आखिरी दलित को कैसे और कितना पीछे कर के अपने व्यवस्था की मलाई उड़ाए, इस कुचक्र में लगा बैठा है। पूछने का मन होता है दलित विमर्श के ठेकेदारों से क्यों भई क्यों? क्या इस लिए कि आप की वर्ग चेतना हेरा गई है? और आप जातियों के परनाले में गच्च हैं! यह वर्ग चेतना जाति चेतना में क्यों तब्दील हो गई? तभी तो आज की तारीख में दलित विमर्श के नाम पर ब्राह्मण ही नहीं ब्राह्मण की लड़कियां भी निशाने पर हैं। दलित या पिछड़ा जो किसी वर्ग का नायक है वह एक ‘ब्राह्मण’ लड़की फसांता है, ‘प्रेम’ के बाद संभोग करते हुए वह ‘आघात पर आघात’ प्रतिशोध लेता है। आज के दलित विमर्श में ज़्यादातर खल चरित्र ब्राह्मण होगा और दलित नायक उस से, उस की लड़की से संभोग कर प्रतिशोध लेगा। 

गरज यह कि कहानी में अब एक नया सामंत टोह ले रहा है। दलित सामंत! दलित विमर्श के पुरोधा दलित सामंतवाद के इस नन्हे और मुर्च्छित बीज को रातो-रात बरगद बनाने की फिराक में युद्धरत हैं। अनवरत! मनुवादी सदी में हुए ज़ुल्म–अत्याचार को आज के समाज में तौल कर! वह मुहम्मद गोरी, गजनवी और बाबर के आक्रमण-अत्याचार यहां तक कि विक्टोरियन गुलामी और अत्याचार तक को भूल जाना चाहते हैं। पर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अत्याचार, उस के घाव हरे हैं तो इस लिए कि उन की, उन के दलित विमर्श की दुकान की भट्ठी गरम रहनी चाहिए! दिक्कत तब और होती है जब श्रीलाल शुक्ल जैसा परिपक्व और प्रतिष्ठित लेखक भी इसी डगर पर चला गया। ‘तद्भव’ में छपे उन के एक लघु उपन्यास ‘राग विराग’ का नायक भी ब्राह्णणी नायिका के साथ और कुछ नहीं कुछ तो ‘मड बाथ’ ही कर लेता है। स्कूटर पर बिठा कर उस के वक्ष का ताप और दाब ही ले लेता है। तब जब कि उस ब्राह्मणी नायिका के पिता को नायक अपने पिता की मौत का ज़िम्मेदार ही नहीं, दोषी भी मानता है। यह कैसा प्रतिशोध है? गौर तलब है कि यह कहानियां जा कहां रही हैं? और किस समाज की कथा कह रहीं हैं? यह कहानियां यह कैसे भूलती जा रही हैं कि दुनिया के किसी भी समाज में दो ही वर्ग होते हैं, एक शोषक , दूसरा शोषित। बस! और कहानियां या दुनिया का कोई भी साहित्य हमेशा शोषक के खिलाफ पीड़ित के पक्ष में रचा जाता है और रचा जाएगा। 

फसली साहित्य की शौकिया बाजीगरी यहां अपवाद है। जिस के नतीज़े में अगर कोई लेखक, ‘साले हरामजादे, कुलटा लौड़िया टहलाता है?’ जैसा संवाद भी लिख देता है तो कोई उफ नहीं करता। नहीं पूछ पाता कि पुरूष के लिए ‘कुलटा’ विशेषण कैसे और कब से चलन में आ गया? उलटे उस की विरुदावली गाते हुए ये दलित विमर्श के पुरोधा उस रचना पर केंद्रित गोष्ठियां आयोजित कर के उस को चमकाने में लग जाते हैं। खैर...दलित विमर्श के पेंदे में ऐसी ढेरों विसंगतियां हैं। लेकिन हमारा साहित्य शोषक-शोषित , सत्ता-प्रजा, जमींदार, सामंत, गुंडा और पूंजीपति के समीकरण भूल कर जातियों की पैमाईश और प्रतिशोध में अटा और डटा पड़ा है। तो क्या यह पुरोधा समाज की ओर बिल्कुल नहीं देखते? झांकते भी नहीं? यह तथ्य भी अनदेखा करते चलते हैं कि बड़े बड़े पूज्यपाद टाइप के ब्राह्मण भारी भारी टीका लगाए हुए भी बहन मायावती के पैरों पर गिरते हुए कैसे तलवे चाटते हैं? तो यह क्या वह ब्राह्मणवाद को स्थापित कर रहे होते हैं कि सत्ता का शहद चाट रहे होते हैं? समाज का दर्पण कहे जाने वाले साहित्य के सारथी क्या यह दर्पण भी नहीं निहार पाते? या कि कुतर्क की नींव खड़ी करके एक नए डरबन में जाने की तैयारी है यह हिंदी कहानी में? कहना और बूझना दोनों मुश्किल है और यह हद बूझना तब और मुश्किल हो जाता है जब मुद्राराक्षस जैसे लेखक यह लिखते नहीं अघाते कि चूहे की देह के किस हिस्से का मांस अच्छा होता है कोई ब्राह्मण कैसे बता सकता है? अब मुद्रा जी से यह कौन बताए कि ब्राह्मण भी अब खुलेआम भांति-भांति के मांस खाता है। और रही बात चूहे की तो उसे अब ‘मुसहर’ कहे जाने वाले दलित भी नहीं पूछते। और तो और मुद्रा जी को कारखानों में मजूरी करते या रिक्शा चलाते कोई क्षत्रिय या ब्राह्मण भी नहीं मिलता। ऐसा वह लिखते हैं। मुद्रा जी ही क्यों उन के जैसे तमाम और लेखकों को भी सवर्णों में विपन्नता नहीं दिखती सुहाती। वह तो बस ‘खल चरित्र’ हैं उन के लिए बस! तो क्या कीजिएगा अगर ब्राह्मण विरोध का उन का यह खोखला तिलिस्म टूट जाएगा, तो दलित विमर्श की दुकान के लिए उन्हें तेल कहां से मिलेगा? तिस पर शिकायत यह भी कि लोग पढ़ते नहीं, किताबें खरीदते नहीं! तरस तब और आता है कि यह दलित विमर्श के पुरोधा समाज में बढ़ती बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, गुंडई, राजनीतिक पतन और उसके दोगलेपन, बढ़ते उपभोक्तावाद, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दबाव, खेतिहरों मज़दूरों और ट्रेड यूनियनों के क्षरण क्या लगभग समाप्ति जैसे तमाम मसलों को अनदेखा कर वोटों के भुखाए राजनितिज्ञों के मानिंद जातियों की पैमाइश और पड़ताल में पस्त लेकिन मस्त दीखते हैं। सारा हल यहीं ढूंढ लेना चाहते हैं। एक नए डरबन की नींव डालती यह फसली कहानियां यह कौन सा दर्पण रच रही हैं? 

दलित विमर्श ज़रूरी है। पर क्या ऐसे और इसी तरह? इन्हीं खोखली कहानियों से, और इन कहानियों में इस्तेमाल जंग लगे इन्हीं औज़ारों से?


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 अखिलेश के निर्वासन के बहाने कुछ बतकही , कुछ सवाल

Wednesday, 16 May 2012

प्रणव मुखर्जी के निष्पक्ष नहीं, बोनलेस राष्ट्रपति बनने के पूरे आसार

कभी अध्यापक और फिर पत्रकार भी रहे प्रणव मुखर्जी अपनी सारी विद्वता और विनम्रता के बावजूद जिस तरह इन दिनों लगातार झुकने का रिकार्ड बनाए जा रहे हैं, वह एक निष्पक्ष राष्ट्रपति भी बन कर दिखाएंगे, मन में संदेह खड़ा करता है। क्यों कि आज कल जिस तरह वह लगातार झुक रहे हैं, बात-बेबात झुक रहे हैं, वह उन्हें कटघरे में खड़ा करता है। अभी ताज़ा मामला एन.सी.आर.टी. की किताबों में छपे कार्टूनों का है। दलित वोटों की ठेकेदारी करने वाले लोगों ने दशकों पुराने शंकर के कार्टून को ले कर बेहद वाहियात ऐतराज किया। और सरकार लेट गई उन के आगे। अंबेडकर से भी ज़्यादा चोट इंदिरा गांधी और नेहरु के कार्टूनों में किए गए हैं उस किताब में, और अंबेडकर पर तो खैर चोट है भी नहीं। लेकिन कांग्रेसी उलझे तो सिर्फ़ अंबेडकर के कार्टून पर। और दलित वोटों के ठेकेदारों के आगे लेट गए। एक सेकेंड की भी देरी किए बिना कपिल सिब्बल ने माफ़ी मांग ली, किताब से कार्टून हटाने का ऐलान कर दिया। पर प्रणव बाबू और आगे निकल गए। बोले, 'कार्टून क्या हम पूरी किताब हटा देंगे।' क्या वह दलित वोटरों के ठेकेदारों से डर गए? कि इतना बदहवास हो गए यह सोच कर कि कहीं ऐसा न हो कि यह दलित लोग उन्हें राष्ट्रपति की उम्मीदवारी से ही खारिज न कर दें? मायावती ब्रिगेड या पूनिया की जुबान उन्हें वोटों से महरुम न कर दे? अजीब अफ़रा-तफ़री है। समझ नहीं आता कि यह देश किस संविधान से चलता है?

अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस तरह गला घोटना किसी भी संविधान और कानून से परे है। मायावती और पी.एल. पूनिया इसी तरह की जुगलबंदी प्रकाश झा की फ़िल्म आरक्षण के साथ भी कर चुके हैं। पूरी फ़िल्म आरक्षण के पक्ष में खडी दीखती है पर इन दोनों के दलित वोटों की दादागिरी ने उत्तर प्रदेश में फ़िल्म को बेवज़ह बैन कर उस की पब्लिसिटी मुफ़्त में कर दी। और मैं पूछता हूं कि दलित क्या देश और संविधान से ऊपर हैं? जो बात-बेबात दलित हिंसा का बवंडर खड़ा कर पूरे देश, समाज और संसद को बंधक बना ले रहे हैं इन दिनों। यह किसी लोकतांत्रिक और संवैधानिक देश के हित में तो नहीं है। मायावती खरबों रुपए का भ्रष्टाचार कर के मुस्कुराती खड़ी हैं, ए राजा ज़मानत ले कर जश्न मना रहे हैं पूरी अश्लीलता से तो सिर्फ़ इस लिए कि वह दलित हैं? काहें के दलित हैं? और किस कानून से ऊपर हैं? हैं तो क्यों हैं? लेकिन कांग्रेस और देश के तमाम राजनीतिक दल इस बात को समझने को तैयार नहीं हैं। यही स्थिति देश के मुसलमानों की भी है। वह देश में अब अल्पसंख्यक नहीं हैं। पर ज़रा-ज़रा सी बात पर यह राजनीतिक दल उन के लिए सर पर कफ़न बांध लेते हैं। क्या ऐसे ही लोकतंत्र चलता है? उत्तर प्रदेश के हालिया विधान सभा चुनाव में मुसलमानों के लिए घड़ियाली आंसू बहाने वाली कांग्रेस को मुसलमानों ने अच्छा सबक सिखाया है। पर कांग्रेस है कि मानती नहीं। वह जिस तौर-तरीके से अन्ना हजारे या रामदेव से निपटती है वह भी तर्क से परे है। और प्रणव मुखर्जी अभी कांग्रेस के नीति नियंताओं में हैं। क्या देश के लोग भूल गए हैं कि रामदेव को एयरपोर्ट पर रिसीव करने गए चार मंत्रियों के समूह में एक प्रणव मुखर्जी भी थे। प्रणव मुखर्जी को इस तरह अगुवानी करने जाने की ज़रुरत क्या थी आखिर? सारी वरिष्ठता और विवेक क्यों पानी मांग गया? और अन्ना या रामदेव को जिस वकीली तौर-तरीकों से निपटाया गया वह क्या था? प्रणव मुखर्जी के साथ एक बड़ी दिक्कत यह है कि आज की तारीख में वह जिस राजनीतिक कद की ऊंचाई को छू रहे हैं वह अपनी योग्यता के दम पर नहीं बल्कि सोनिया गांधी के प्रति अमोघ निष्ठा के दम पर छू रहे हैं। जिसे आम बोल-चाल में चमचई कहा जाता है। वह हर संकट में सोनिया के हनुमान बन कर प्रकट हो जाते हैं और जैसा कि हम बचपन में रामलीला में देखते थे कि हनुमान राम को पीछे से कहते क्या ललकारते रहते थे कि, 'मारिए महराज जी !' कुछ-कुछ ठीक वैसे ही प्रणव मुखर्जी सोनिया गांधी से कहते हैं कि ऐसी स्थिति में जो आप की सास इंदिरा जी होतीं तो ऐसे करतीं! और वह इस तरह सोनिया गांधी के राजा बाबू कहिए, राजा बेटा कहिए, बन जाते हैं। और कि प्रणव मुखर्जी के यही तत्व सोनिया और उन के राजकुमार राहुल को भा गए हैं और प्रणव उन्हें क्लिक कर गए हैं। इस लिए भी कि एक बोनलेस व्यक्ति उन्हें महामहिम की कुर्सी खातिर चाहिए। प्रणव उन की यह शर्त भी पूरी करते हैं। पर दुर्भाग्य से यही तत्व प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति योग्य नहीं बनने का कारण भी बनते हैं।


इस लिए भी कि भले ही हमारे देश में राष्ट्रपति रबर स्टैंप की तरह माना जाता हो पर उस की रीढ़ तो फिर भी होनी ही चाहिए। आखिर फखरुद्दीन अली अहमद भी हमारे राष्ट्रपति हो कर गए ही हैं जिन्हों ने बिना कैबिनेट की मंज़ूरी के देश में आपातकाल लगाने की प्रधान मंत्री इदिरा गांधी की सिफ़ारिश मान कर आपातकाल लगाने पर मुहर मार दिया था। पर यह संविधान का सरासर उल्लंघन था। यह भी भला हम कैसे भूल सकते हैं? और यह घटना भी हमें मालूम ही है कि ज्ञानी जैल सिंह राष्ट्रपति थे लेकिन चौरासी के सिख दंगे में वह राष्ट्रपति भवन में भी खुद को महफ़ूज़ नहीं महसूस रहे थे। उन की उस विवशता का, उन की उस लाचारी और असहाय होने का बड़ा मार्मिक चित्रण खुशवंत सिंह ने किया है। इस देश ने राजेंद्र प्रसाद और राधाकृष्णन जैसे राष्ट्रपति भी देखे हैं। उन की शान और रफ़्तार भी देखी है। नीलम संजीव रेड्डी को भी हम कैसे भूल जाएं कि जगजीवन राम के पास सांसदों की संख्या ज़्यादा होने के बावजूद उन्हों ने पक्षपात कर के चरण सिंह को प्रधान मंत्री की शपथ लेने के लिए बुला लिया था तो सिर्फ़ इस लिए कि उन्हें जगजीवन राम से एक पुराना हिसाब चुकता करना था। हुआ यह था कि तब जगजीवन राम रक्षा मंत्री हुआ करते थे और नीलम संजीव रेड्डी राज्यपाल। एक मौके पर जगजीवन राम के सामने ही आदत के मुताबिक वह बीड़ी पीने लगे तो जगजीवन राम ने उन्हें प्रोटोकाल की याद दिला कर अपनी नापसंदगी जताई और उन की बीड़ी बुझवा दी थी। नीलम संजीव रेड्डी को यह अपना अपमान लगा था। तब तो वह चुप रह गए थे। पर १९७९ में उन्हें इस अपमान का बदला इस तरह चुकाया कि भले ही आप के पास सांसद ज़्यादा हों, हम तो नहीं मानते और चरण सिंह को प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलवा दी। महामहिम के पद के लिए इस बात को भी दाग की तरह ही आज भी याद किया जाता है। देश ने ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को भी बतौर महामहिम देखा है जिस ने अफ़जल गुरु जैसे आतंकवादी की फांसी की फ़ाइल मिलते ही उसी शाम दस्तखत कर गृह मंत्रालय को भेज दिया था। कोई दबाव स्वीकार नहीं किया था। अब अलग बात है कि उन के मुस्लिम होने का भ्रम फैला कर कांग्रेस बिना कुछ कहे संकेतों ही में सही सारी देरी का ठीकरा उन पर फोडवाती रही। देश प्रतिभा सिंह पाटिल को भी देख ही रहा है जो पद पर रहते हुए ज़मीन घोटाला और भ्रष्टाचार के अन्य आरोपों में घिरी पडी हैं। तो क्या प्रणव मुखर्जी राजेंद्र प्रसाद, राधाकृष्णन, कलाम जैसों की राह पर चल पाएंगे? कि फखरुद्दीन अली अहमद, ज्ञानी जैल सिंह, प्रतिभा पाटिल को ही दुहराएंगे? कि राष्ट्रपति हो कर भी वह सोनिया के हनुमान बन कर ही उन्हें बताते फिरेंगे कि इंदिरा जी होतीं तो ऐसी घड़ी में ऐसे करतीं! बतर्ज़ मारिए महराज जी ! कहना ज़रा कठिन भी है और बहुत आसान भी। क्यों कि पूत के पांव तो पालने में दिख ही रहे हैं।

फ़िलहाल तो जैसा कि वह बताते रहे हैं कि प्रधानमंत्री होने के बावजूद अभी भी मनमोहन सिंह उन्हें 'सर !' कह कर संबोधित करते हैं। जैसा कि वह रिज़र्व बैंक के गवर्नर के टाइम उन से कहते थे। जब कि प्रणव बाबू इस के लिए उन्हें हमेशा टोकते रहते हैं कि नहीं अब आप 'सर !' हैं। जो भी हो अब समय एक बार फिर करवट ले रहा है और तमाम इफ़-बट के बावजूद प्रणव मुखर्जी, मनमोहन सिंह के फिर से सर होने जा रहे हैं। महामहिम सर !

राजनीति हमेशा ही से संभावनाओं का शहर रही है। पर यह राजनीति समझौता एक्सप्रेस भी अब बन चली है। प्रणव मुखर्जी इस के सब से बड़े उदाहरण बन कर हमारे सामने उपस्थित हैं। जैसी कि अटकलें और खबरें हमारे सामने हैं, प्रणव मुखर्जी देश के प्रथम नागरिक बनने की ओर तेज़ी से अग्रसर हैं। रायसीना हिल्स उन की प्रतीक्षा में है। प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने को ले कर अगर कोई मुझ से पहली प्रतिक्रिया पूछे तो कहूंगा कि शिष्या हो तो ममता बनर्जी जैसी। आज अगर प्रणव मुखर्जी का राष्ट्रपति बनना तय माना जा रहा तो सिर्फ़ इस लिए कि ममता बनर्जी आज की तारीख में एक उन्हीं के नाम पर आंख मूंद कर समर्थन कर सकती हैं। कर भी रही हैं। वह जैसे प्रणव बाबू को राष्ट्रपति बनवा कर गुरु-दक्षिणा देना चाहती हैं। प्रणव ममता के राजनीतिक गुरु हैं। ममता राजनीति के अपने इस नए अध्याय में चाहे जितनी बड़ी तानाशाह बन कर उभरी हों, पर एक बात तो तय है कि अभी वह जो चाहती हैं करवा लेती हैं। यह ममता भय ही है कि रेल का किराया रोल-बैक हो जाता है, दिनेश त्रिवेदी का मंत्री पद हजम हो जाता है। वह प्रणव को राष्ट्रपति बनवाने की भले पैरोकारी कर रही हैं पर प्रणव मुखर्जी को पेट्रोल के दाम नहीं बढ़ाने दे रहीं हाल-फ़िलहाल। कम से कम बजट सत्र में तो नहीं ही। बाद में चाहे जो हो। पर अगर अभी दाम बढ़ाया तो वह सरकार गिरा देंगी। कम से कम उन की धमकी यही है।

लीलाधर जगूडी की एक कविता है, 'भय भी शक्ति देता है।' तो सरकार को ममता का यह भय आम आदमी को शक्ति देता है। अस्थाई ही सही। एफ़. डी. आई. से लगायत एन.सी.टी.सी. तक पर ममता का सोटा केंद्र पर तना दिखता है। केंद्र सरकार सांस नहीं ले पाती। हालां कि अभी हिलेरी क्लिंटन उन्हें एफ़.डी.आई. पर ताज़ा-ताज़ा पिघला कर गई हैं। अभी देखना बाकी है कि ममता की मोमबत्ती हिलेरी की आंच में कितना पिघली है। खैर, पिछली यू.पी. ए. सरकार में कुछ दूसरे तरह से लालू अपनी गुंडई चलाते थे। अपने २५ सांसदों के समर्थन का डर दिखा कर। प्रणव तब भी डरते थे, प्रणव अब भी डरते हैं। सोचिए कि सरकार के प्रधानमंत्री हैं मनमोहन सिंह पर डरते प्रणव मुखर्जी हैं। सरकार जब-तब भंवर में फंसती ही रहती है। खेवनहार बनते हैं प्रणव मुखर्जी। यहां तक कि जब वह खुद चिदंबरम से सीधा टकराव ले कर उन्हें बिलकुल खा जाना चाहते थे। तब एक बार तो लगा कि वह अब सरकार से बगावत कर वी. पी. सिंह की भूमिका में तो नहीं आ जाएंगे? पर नहीं शायद हवा के खिलाफ़ खड़ा होने और बगावत करने का माद्दा अब उन में शेष नही रहा। तभी तो अपनी भावनाओं के खिलाफ़ खुद खेवनहार बन कर खड़े हो गए। और ऐलान कर बैठे कि उन की कोई जासूसी नहीं हुई। साथ ही चिदंबरम को टू-जी की खतो-किताबत की खता से भी उबार दिया। बगावत की जो गंध आ रही थी उन की बाडी लैंगवेज़ और उन की कार्यशैली से, वह अचानक काफूर हो गई। तो क्या यह दूध के जले प्रणव मुखर्जी छांछ भी फूंक-फूंक कर पीने लगे?

१९८४ में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब प्रणव मुखर्जी वित्त मंत्री थे। इंदिरा के बाद कौन? की बात पर उन्हों ने अपने नंबर दो की हैसियत बता कर दबी जुबान प्रधान मंत्री पद की दावेदारी जताई थी। अरूण नेहरु तब उन से इतना खफ़ा हुए कि उन्हें पहले राजीव गांधी मंत्रिमंडल से बाहर करवाया, राजीव के कान भर कर और फिर पार्टी से भी बाहर करवा दिया। प्रणव मुखर्जी को दूसरी पार्टी बनानी पड़ी। राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस। बाद के दिनों में बोफ़ोर्स की आंधी से सत्ता से बाहर हुए राजीव गांधी से फिर से उन का समझौता हो गया और अपनी पार्टी का विलय कर वह फिर कांग्रेस में लौट आए। बाद के दिनों मे नरसिंहा राव ने उन्हें योजना आयोग का अध्यक्ष बनाया। फिर विदेश मंत्री भी बनाया। फिर जब मनमोहन सिंह पहली बार प्रधान मंत्री बने तब भी प्रणव मुखर्जी ने एक गलती कर दी। जब मनमोहन का नाम चर्चा में आया तो मंत्रिमंडल में शामिल होने के सवाल पर वह बोल गए कि मैं ने तो उन्हें रिज़र्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किया था। प्रकारांतर से दबी जुबान फिर दावेदारी की बात आ गई। उन की राह में एक रोड़ा फिर आ गया। तो भी किसी तरह उन्हें सोनिया गांधी ने रक्षा मंत्री बनवा दिया और लोकसभा में सदन का नेता भी। बाद में विदेश मंत्री बने। फिर अंतत: वित्त मंत्री। और अब तो वह सरकार के संकटमोचक भी हैं। उन का व्यवहार, उन की विनम्रता, उन की विद्वता सभी राजनीतिक पार्टियों में उन की स्वीकार्यता बढाती है। हर कोई उन के गुन गाता है।

लेकिन उन की आर्थिक नीतियां?

वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के दौर में आम आदमी की जैसे कमर क्या रीढ़ ही टूट गई है। आखिर इंदिरा गांधी सरकार में भी वह वित्त मंत्री रहे हैं। एक समय इंदिरा गांधी का सब से लोकप्रिय नारा था गरीबी हटाओ। वह अपने भाषणों में कहती भी थीं कि मैं कहती हूं - गरीबी हटाओ, वह कहते हैं - इंदिरा हटाओ! तो उस दौर के वित्त मंत्री रहे प्रणव मुखर्जी और कांग्रेस ने गरीबों का जीना मुहाल कर दिया है। उन की आर्थिक नीतियों ने भ्रष्टाचार और काले धन का जो विष वृक्ष खड़ा किया है, पैसे को जिस तरह राक्षस बनाया है, जो कारपोरेट सेक्टर का पहाड़ खड़ा किया है, खेल के नाम पर आई.पी.एल यानी इंडियन पैसा लीग के मार्फ़त जो नंबर दो का एक करना सिखाया है उस से गरीबों की तो आह भी नहीं निकल रही। गरीब उजड़ कर रह गए हैं। तिस पर उन का योजना आयोग जो २८ रुपए रोज की कमाई वालों को भी ए.पी.एल.में गिन कर जले पर जिस तरह नमक छिड़क रहा है उस का क्या करें? आटा से भी मंहगा अब भूसा बिकने लगा है। दूध, सब्जी, दाल सब के दाम आसमान पर हैं। मनमोहन सिंह के आर्थिक उदारीकरण की जो चाबुक प्रणव मुखर्जी ने आम आदमी पर चलाई है, कैसे मान लें कि वह एक अच्छे राष्ट्रपति भी साबित होंगे?

सोचिए कि प्रणव मुखर्जी जाने कितनी बार कह चुके हैं कि मंहगाई इतने दिन बाद कम हो जाएगी। डेड लाइन पर डेड लाइन। पर मंहगाई है कि सुरसा की तरह बढ़ती ही जा रही है। सुरसा का मुंह तो फिर भी कम हुआ पर प्रणव मुखर्जी और मनमोहन प्लस सोनिया की मंहगाई के पिटारे का मुंह है कि बढ़ता ही जा रहा है। अमीर और अमीर होता जा रहा है, गरीब और गरीब। आटा के दाम पर भूसा बिक रहा है, काजू-बादाम के भाव दाल बिक रही है, घी के दाम दूध बिक रहा है, सब्जी और फल तो पूछिए मत। गरीब की थाली में वह कभी आता है तो कभी गूलर का फूल बन जाता है। शिक्षा और चिकित्सा भी गरीब आदमी कहिए, आम आदमी कहिए, मध्यम और निम्न वर्ग कहिए उस के लिए अब चांद पर जाने की मानिंद हो गया है। मेडिको इंश्योरेंस कंपनियां, अस्पताल और सारे निजी स्कूल सिर्फ़ लूट का अड्डा बन चले हैं। रुपया औंधे मुंह गिरा पड़ा है तो प्रणव मुखर्जी और उन की मंडली की बला से। सोना सुर्ख हो रहा है, चपरासी के घर से भी करोड़ो रुपए बरामद हो रहा है तो उन की बला से। उन को तो बस रायसीना हिल्स पहुंचना है। क्रिकेट के खेल में भी अब खेल भावना की जगह व्यवसाय भावना या गंदी भावना आ गई है तो क्या हुआ, प्रणव बाबू का आयकर विभाग उस से टैक्स नहीं लेगा। हां, वह सर्विस टैक्स तो लेंगे, वैट तो लगाएंगे और हर मद में। खैर मनाइए कि अभी संसद चल रही है, पर रायसीना हिल्स जाने के पहले पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस में भी वह आग लगा कर ही जाएंगे। किसानों का गेहूं रखने के लिए सरकार के पास बोरे नहीं हैं तो क्या डिस्टलरी तो हैं ना, वह सड़ा गेहूं खरीद कर शराब बनाने के लिए। सोचिए कि फ़रवरी-मार्च में आलू की नई फ़सल आई है अभी और आलू की किल्लत शुरु है। १८ रुपए किलो आलू अभी बिकने लगा है। कहां गया यह आलू? अखबारों मे खबर छपी थी कि बंपर आलू हुआ है। तो क्या वह खबर झूठी थी? या यह खबर झूठी है कि अभी टू जी के आरोपी ए राजा ने भले ही पंद्रह महीने बाद ही सही ज्यों ही पहली बार बेल की अप्लीकेशन दी, उन्हें ज़मानत दे दी गई। और दिल्ली से लगायत चेन्नई तक जो सडकों से ले कर होटलों तक में जश्न मनाया गया है खुलेआम, आतिशबाज़ी की गई है और पूरी अश्लीलता से, क्या यह खबर भी झूठी है?

प्रणव बाबू आप कैसे वित्त मंत्री हैं? आप कैसे संकटमोचक हैं इस सरकार के? यह सरकार है भी? यह लोक कल्याणकारी राज्य ही तो है? कि कारपोरेट सेक्टर और अमीरों की रखवाली का ठेका लेने वाली कोई एजेंसी? कि पूरी अर्थव्यवस्था सिर्फ़ एक सच मुनाफ़ा और सिर्फ़ मुनाफ़ाखोरी में तब्दील है? सच बताइए प्रणव बाबू आप रायसीना हिल्स जाने की आखिर सोच भी कैसे रहे हैं इतने सारे दाग ले कर? भला वहां सो भी पाएंगे आप? अभी तो आप रीढ़ गंवा कर वित्त मंत्री बने बैठे हैं अपनी शपथ भूल-भाल कर। कल को तो आप राष्ट्रपति बन कर मुझे डर है कि रबर स्टैंप बनने के साथ ही साथ बोनलेस भी हो ही जाएंगे। सोनिया और राहुल की इच्छा के अनुरुप। एक भी हड्डी नहीं शेष रह जाएगी आप की। फिर आप जाने किन-किन लोक-विरोधी, जन-विरोधी अध्यादेशों पर आंख मूंद-मूंद कर दस्तखत करते जाएंगे। सोनिया जी, मनमोहन जी के प्रति आप की यह अमोघ निष्ठा जाने क्या-क्या करवा ले जाएगी आप से। धृतराष्ट्र तो जन्मांध था, आप तो नहीं हैं? पढ़े-लिखे और विचारवान हो कर भी यह सब कैसे करते जा रहे हैं? श्रीकांत वर्मा ठीक लिख गए हैं कि, 'मगध में विचारों की बहुत कमी है !'

तो इस विचारहीन सत्ता में आप कैसे रहते-जीते हैं भला? दम नहीं घुटता आप का?

आखिर आप उस बंग-भूमि से आते हैं जहां से एकला चलो रे जैसा गान फूटता है। जहां से रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र, राजा राम मोहन राय, नेता जी सुभाष चंद्र बोस, खुदीराम बोस,शरत चंद्र,ऋत्विक घटक, नज़रुल इस्लाम, सत्यजीत राय, महाश्वेता देवी आदि जैसे स्वतंत्र-चेता लोगों की एक लंबी और समृद्ध परंपरा आती है। और तो और सोमनाथ चटर्जी जैसे आप के समकालीन लोग भी हैं जो बतौर लोकसभा अध्यक्ष संसदीय परंपरा को निभाने के लिए वर्षों पुरानी पार्टी से किनारे हो लेते हैं। तमाम जली-कटी सुन लेते हैं, लगभग बेगाने हो जाते हैं पर संसदीय परंपरा पर दाग नहीं लगने देते। कम से कम इन जैसों या बंग-भूमि की ही लाज निभाने की कोशिश आप भी कर लेते तो बात ही कुछ और होती ! 

आप ही बताइए प्रणव बाबू कि यह देश की कराहती जनता आप को राष्ट्रपति के रुप में कैसे देखेगी भला? इंदिरा जी का वह भाषण फिर याद आ रहा है कि मैं कहती हूं गरीबी हटाओ, वह कहते हैं - इंदिरा हटाओ ! यह गरीबी हटाने का छल-कपट कब बंद होगा हमारे भावी महामहिम श्री राष्ट्रपति महोदय ! मुहम्मद रफ़ी का गाया एक गीत है, 'जो तुम पर मिटा हो, उसे ना मिटाओ !' यह जनता आप सब को बडी उम्मीद से वोट दे कर भेजती है महामहिम ! अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, धृतराष्ट्रों की अनंत लिप्सा पूरी करने के लिए नहीं। काश कि आप राजनीतिज्ञों की यह अमोघ निष्ठा देश की बहुसंख्यक जनता के साथ बिना किसी भेद-भाव के होती, मुनाफ़े की अर्थव्यवस्था, घोटालों, काला-धन, भ्रष्टाचार, किसी परिवार और जाति-पाति आदि के साथ नहीं, तो क्या बात होती !