Tuesday, 30 September 2014

स्वच्छकार का झाडू लिए फोटुओं में मंत्रियों ,नेताओं और अफसरों की धूर्त छवि छुपाए नहीं छुप रही

कुछ फेसबुकिया नोट्स 

  • कृपया यह नौटंकी बंद करें माननीय लोग !
इन दिनों तमाम मंत्री,नेता,अफसर स्वच्छकार के अभिनय में ऊभ-चूभ फोटो खिंचवाने और उसे जगह-जगह परोसने में बहुत सक्रिय दिख रहे हैं। स्वच्छकार का झाडू लिए इन फोटुओं में इन मंत्रियों ,नेताओं और अफसरों की धूर्त छवि छुपाए नहीं छुप रही। साफ-सुथरी सड़कों पर झाडू लिए मुसकुराती इन फोटुओं में प्रधान मंत्री द्वारा सफाई के आग्रह की हवा निकलती साफ दिखती है। यह सफाई का आग्रह अगर गांधी के सफाई आंदोलन के मद्देनज़र है तो यह एक बहुत बड़ा बेहूदा मज़ाक है गांधी के साथ। गांधी तो खुद का शौचालय साफ करते थे। तब उठाने वाला सिस्टम था। इस बाबत आप सब को याद होगा कि वह अपनी पत्नी कस्तूरबा द्वारा विरोध करने पर वह कस्तूरबा के साथ मार पीट पर आमादा हो गए थे। कस्तूरबा को भी अपना शौच साफ करना शुरू करना पड़ा था । यह दक्षिण अफ्रीका की बात है । बाद के दिनों में यह काम भारत में भी गांधी ने जारी रखा । वह दलित बस्तियों में ठहरते भी थे और वहां भी सफाई आंदोलन जारी रखते थे । और एक बड़ा सच यह है जिसे लोग भूल गए है कि यह सफाई आंदोलन और पूरी अवधारणा मदन मोहन मालवीय की है जिसे गांधी ने फालो किया था । और प्राण-प्रण से स्वीकार किया था । लेकिन आज के दिन तो ये मंत्री, नेता,अफसर, अंगुली कटवा कर शहीद बन लेना चाहते हैं । क्या इन मंत्रियों , नेताओं और अफसरों को अपने शहर के स्लम या सार्वजनिक शौचालयों की भी जानकारी नहीं है ? तो धिक्कार है इन्हें । अगर इन्हें सफाई करनी ही है तो गंदी जगहों पर जाएं । देश में नदियों से लगायत बस्तियां तक गंदी हैं । क्या शहर , क्या गांव हर जगह गंदगी का ढेर पहाड़ की तरह उपस्थित है । सार्वजनिक शौचालय कहीं के भी हों , साक्षात् नर्क हैं , बीमारी के घर । तो क्या इन धूर्तों को अपना अभिनय परोसने के लिए इन जगहों पर नहीं जाना चाहिए ? इन साफ-सुथरी सड़कों पर स्वच्छकारों की झाडू ले कर फोटो खिंचवाना तो देश को और गांधी को भी सिर्फ और सिर्फ गाली देना है । बहुत हो चुका यह गाली अभियान ! जनता को आगे बढ़ कर इस गाली अभियान का विरोध करना शुरू कर देना चाहिए ! कृपया यह नौटंकी बंद करें यह माननीय लोग ।


  •  राजदीप सर देसाई को शहीद बता कर उन को सर चढ़ा लेने वाले मित्र एक बार इस लिंक को ज़रूर देखें । उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात समझ में आ जाएगी । राजदीप ने कितने दिनों तक अंबानी की दलाली की है आई बी एन 7 में और कितनों के पेट पर लात मारा है क्या यह भी लोग भूल गए हैं ? खैर उन की ताज़ा गुंडई के दीदार करें !
https://www.youtube.com/watch?v=9nVswhKG9So


  •  काश कि सुब्रमण्यम स्वामी की नज़र मायावती की आय से अधिक सम्पत्ति पर भी पड़ जाती !


  •  जयललिता को जेल पर लोग इतना चुप क्यों हैं ?


  •  सुब्रमण्यम स्वामी को आप चाहे जो कहिए लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ उन की मुहिम को एक बड़ा सा सैल्यूट तो बनता ही है । अदालती लड़ाई लड़ कर भ्रष्टाचारियों को उन की औकात में ले आना इतना आसान भी नहीं है । टू जी के भ्रष्टाचारी ए राजा से लगायत जयललिता तक को जेल तक पहुंचाना सुब्रमण्यम स्वामी की अनथक लड़ाई का ही सुफल है।


  •  लीजिए जयललिता को चार साल की सज़ा हो गई। अब विधायकी और मुख्यमंत्री का पद तो गया ही , जेल भी आज ही जाना होगा। हां हेकड़ी लेकिन नहीं जाएगी । जातीय और भ्रष्ट राजनीति की यह भी एक कमाई है ।


  •  जातीय राजनीति और भ्रष्टाचार क्या एक दूसरे के पर्याय हो चले हैं ? क्या लालू , क्या ए राजा , क्या मुलायम , क्या मायावती और क्या करुणानिधि और क्या जयललिता सब के सब जातीय राजनीति के अलमबरदार, ठेकेदार और सब के सब भ्रष्टाचार की गंगोत्री में आकंठ डूबे हुए । नाबदान में कीड़ों की तरह बजबजाते हुए । फिर बेशर्मी का भी बैंडबाजा यह बजाएंगे ही , बजाते ही हैं । गाल बजाना इसी को कहते हैं । जेल को गुरुद्वारा भी बताने की बेहयाई अपनी जगह है ।

  • नेपाल , भूटान , जापान और अब अमरीका , बीच में चीनी राष्ट्रपति की भारत यात्रा को भी जोड़ लीजिए , अंध मोदी विरोध अब खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे में तब्दील दिखता है । पकिस्तान तो मांगे पानी नहीं पा रहा है। कम से कम विदेश नीति पर तो यह हो ही गया है। यह मोदी की नहीं भारत की कूटनीतिक विजय है , इसे खुले मन से स्वीकार कर लेने में कोई नुकसान नहीं है ।

  • उद्धव ठाकरे ने अपने पांव में बड़े ज़ोर से कुल्हाड़ी मार ली है | भाजपा ने भी अपना गुरुर और गाढ़ा कर लिया है तो शरद पवार ने भी अपना पावर लूज ही किया है | कांग्रेस तो पहले ही से बड़ी लूजर है | तो क्या महाराष्ट्र विधान सभा के हंग होने की बुनियाद खुद गई है ? जय हो !

  • कुछ दिनों के लिए लिखना बंद कर देने से भी क्या शैली बदल जाती है ? दिनकर तो यहां यही बता रहे हैं । वह कविता में रोमांस को दबाने की भी बात करते हैं ।
https://www.youtube.com/watch?v=qimgrJs6Euc&list=PLqv0Iyru1V1T6JLBH3P5A5TP-
 rnTj_IUQ&index=5


  • मित्रो , एक दुविधा में आ गया हूं । फेसबुक पर दोस्तों की शाख पर पांच हज़ार की संख्या छू गई है । बहुत इधर उधर कर के भी छंटनी करनी कठिन लग रही है । जुड़ना तो अच्छा लगता है , बिछड़ना बाऊर लगता है । तो भी कुछ बिना चेहरे वाले साथियों से छुट्टी ले ली है । फिर भी बात बन नहीं पा रही । बहुत सारे मित्रों का निवेदन लंबित हैं । मित्रों , निवेदन है कि फालो का विकल्प चुन सकें तो खुशी होगी ।

  • यह संदेश उन मित्रों के लिए लिखा है जिन की रिक्वेस्ट अभी पेंडिंग है । और ऐसे मित्रों की संख्या जब बहुत लंबी हो गई तो यह उन की सहूलियत के लिए यह लिखा है । जो पुराने मित्र हैं , उन से बिछड़ने के लिए यह संदेश नहीं है ।  

  • हमारे प्रिय मित्र और गीतकार धनंजय सिंह आज संध्या सिंह के कविता संग्रह आखरों के शगुन पंछी के लोकार्पण कार्यक्रम में लखनऊ आए तो हमारे घर भी आए । तैतीस साल पुरानी हमारी दोस्ती आज फिर से ताज़ा हुई । हम जब दिल्ली में थे तब हमारे संघर्ष में साथ देने वाले, हमारे दुःख सुख के साथी धनंजय सिंह तब कादम्बिनी में थे और हम सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में । बाद में मैं जनसत्ता में आ गया । फिर लखनऊ आ गया । पर हमारी मित्रता और संपर्क कभी टूटा नहीं । मेरी कई किताबों की समीक्षा भी कादम्बिनी में धनंजय जी ने छपवाई और सहर्ष । बिना किसी इफ बट, बिना किसी नाज़-नखरे के । अब वे कादम्बिनी से अवकाश ले चुके हैं लेकिन अपने गीतों और मित्रों से नहीं सो आज हम लोगों ने बहुत सारी नई पुरानी यादें ताज़ा कीं और आनंद से भर गए ।

  • तो दिलीप मंडल ने पोस्ट डिलीट कर दी !
दिलीप मंडल ने संस्कृत को ले कर एक जहर बुझी टिप्पणी लिखी थी फेसबुक पर । कल मैं ने उन की उस पोस्ट को शेयर करते हुए उन की इस प्रवृत्ति को कंडम करते हुए उस पर एक नोट लिख कर उन्हें सलाह दी कि किसी भी भाषा को ले कर इस तरह विष वमन करना ठीक नहीं । जातीय जहर बोने के बाद अब भाषा के नाम पर भी अब जहर न बोएं । क्यों कि भाषाएँ मनुष्यता की नदी हैं । उन्हें इस तरह प्रदूषित नहीं करें । क्यों कि संस्कृत सिर्फ पंडितों की ही भाषा नहीं है , हिंदी सिर्फ हिंदुओं की ही भाषा नहीं है , न ही उर्दू सिर्फ मुसलमानों की भाषा है और न ही अंगरेजी सिर्फ गोरों की भाषा है । सभी भाषाएँ सभी की हैं । कोई भी भाषा किसी की कोई बपौती नहीं हैं । भाषा के नाम पर इस तरह जहर घोलना बंद करें और कि दिमाग का जाला साफ करें ।और कि यह और ऐसा विष बुझा प्रलाप बंद करें । अब फेसबुक है तो इस पर तरह - तरह की टिप्पणियां भी आने लगीं । दिलचस्प यह कि अभी देख रहा हूं कि दिलीप मंडल ने वह पोस्ट ही डिलीट कर दी है । यह अच्छी बात है । समाज में और कि फेसबुक समाज में भी सकारात्मक बातें ही होनी चाहिए । एक दूसरे को जोड़ने की बात होनी चाहिए , न कि किसी को तोड़ने या जहर बोने की नकारात्मक बातें । 

  • मनीषा जी , लगता है आप पृथ्वी पर नहीं रहतीं । इसी लिए आप को सदभाव की बात में भी फाईट दिख रही है । अंध ब्राह्मण विरोध की थियरी की बीमारी आप चलाती रहिए , पालती रहिए , यह आप की भावना और आप की सुविधा है , आप का व्यक्तिगत है , इस अंतहीन बहस में मुझे पड़ना भी नहीं है । आप अपने पूर्व सम्पादक की पैरवी भी डट कर कीजिए मुझे इस से भी गुरेज नहीं पर भाषाओं को घृणा के चौराहे पर खड़ा कर उन का तमाशा बनाने में शरीक मत होइए । दुनिया की सारी भाषाएं हम सब की साझी हैं , मनुष्यता की नदी हैं । कृपया इन्हें बख्शिए । 

  • मनीषा जी , आप पहले तय कर लीजिए कि आप कहना क्या चाहती हैं ? या कि अंगरेजी की लाल कालीन में कुछ छुपाने - धमकाने के यत्न कर रही हैं ? 

  •  मित्रों , कोई भी टिप्पणी करने में संयम ज़रूर बरतें । किसी भी के लिए असंसदीय शब्द नहीं लिखें । दिलीप मंडल जी से या अन्य किसी भी से आप या हम किसी बात पर , किसी विचार पर असहमत हो सकते हैं लेकिन इतना जान लें कि वह पढ़े - लिखे व्यक्ति हैं । सो कृपया किसी अपशब्द का इस्तेमाल उन के लिए नहीं करें । अपशब्द इस्तेमाल करने से आप की वैचारिक विपन्नता तो जाहिर होती ही है मेरी वाल का और मेरा भी अपमान होता है । सो मित्रों , निवेदन है कि असहमति और सहमति आप ज़रूर जाहिर करें लेकिन शालीनता और संयम के साथ ।

  • सौ ग्राम सच में कुंटल भर गप्प मिला कर लिखने की कला अगर किसी को सीखनी हो तो हमारे फ़ेसबुकिया मित्र संजय सिनहा से सीखिए। कल्पना की उड़ान इतनी कि सारे कवि और रवि आदि सब के सब शर्मा जाएं ! अद्भुत ! कहां की ईंट कहां का रोड़ा वह कब और कैसे मिला दें और भानुमति का कुनबा जोड़ कर एक अनूठा गप्प खिला दें यह शायद वह भी नहीं जानते। ऐसा विशुद्ध गपोड़ी मैं ने आज तक नहीं देखा ! आगे भी देखने को क्या मिलेगा भला ?

  • आज हमारे जानेमन यशवंत सिंह का शुभ जन्म-दिन है । मैं उन को उन की फकीरी, फ़क्कड़ई और बहादुरी के लिए जानता हूं । मीडिया के थके-हारे, पराजित लोगों , को जिस तरह सुस्ताने के लिए , रोने के लिए , साहस और भरोसा देने के लिए अपना अनमोल कंधा वह सर्वदा उपस्थित कर देते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है । मीडिया के असंख्य स्पीचलेस लोगों के लिए जिस तरह वह भड़ास 4 मीडिया के मंच के मार्फत स्पीच आफ स्पीचलेस बन जाते हैं , वह बहुत ही सैल्यूटिंग है । आज वह 41 साल के हो गए हैं । अभी कुछ समय पहले वह जेल गए थे , मीडिया घरानों के खिलाफ लड़ते हुए । कई सारे मीडिया हाऊस मिल कर उन के खिलाफ पिल पड़े थे । कि वह जेल से बाहर ही न आ पाएं । पर वह आए और एक दिलचस्प किताब जानेमन जेल भी लिखी । लेकिन जब वह जेल में थे तभी मैं ने उन की बहादुरी और संघर्ष को रेखांकित करते हुए एक लेख लिखा था । उन के इस जुझारू जज़्बे को सैल्यूट करते हुए उन के पुण्य जन्म-दिन को इस लेख के साथ ही आज मैं सेलीब्रेट कर रहा हूं। लव यू जानेमन यशवंत सिंह , लव यू !
http://sarokarnama.blogspot.in/2012/07/blog-post.html 


  • गांधी जैसी सर्वकालिक और प्रामाणिक फिल्म बनाना रिचर्ड एटनबरो के ही वश की बात थी । उन का महाप्रयाण बहुत दुःख देने वाला है । उन्हें नमन ! 

  • अभी - अभी मर्दानी फिल्म देख कर उठा हूं ।आज कल के बिगड़े माहौल में यह एक ज़रूरी फिल्म बन कर सामने आई है। इसे तो समूचे देश में तुरंत टैक्स फ्री कर देना चाहिए। 

  • यशवंत सिंह को कुछ लोग अराजक और जाने क्या-क्या कहते हैं । लेकिन मैं उन को उन की फकीरी, फ़क्कड़ई और बहादुरी के लिए जानता हूं । मीडिया के थके-हारे, पराजित लोगों , को जिस तरह सुस्ताने के लिए , रोने के लिए , साहस और भरोसा देने के लिए अपना अनमोल कंधा वह सर्वदा उपस्थित कर देते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है । मीडिया के असंख्य स्पीचलेस लोगों के लिए जिस तरह वह भड़ास 4 मीडिया के मंच के मार्फत स्पीच आफ स्पीचलेस बन जाते हैं , वह बहुत ही सैल्यूटिंग है । यही यशवंत सिंह तीन दिन लखनऊ में थे । कल की शाम हम भी उन के साथ हमप्याला-हम निवाला बने ।





Monday, 29 September 2014

ये खत तो जला डालिए , तहरीर तो जलती ही नहीं !


मेरे महबूब शायर वसीम बरेलवी से कल अरसे बाद मुलाकात हुई । वह् खुश हो गए और मैं झूम गया ।  मैं ने उन्हें उन की पुरानी यादों का ज़िक्र करते हुए उन के ही एक गीत का एक मिसरा जब सुनाया कि , ये खत तो जला डालिए  , तहरीर तो जलती ही नहीं ! और कहा कि आप भले भूल जाएं, हम कहां और कैसे भूल सकते हैं आप को भला ? हमारी यादों की तहरीर तो नहीं ही जलने वाली। और उन के ही एक गीत की फिर याद दिलाई कि , इक तो गोरी नदी के जल में दूजे भरी जवानी में , जैसे कंवल खिला हो पानी में । तो यह सुन कर वह मगन हो गए। मुझे गले लगा लिया। कहने लगे कि आप की यही मुहब्बत तो हम शायरों को ज़िंदा रखती है। राम स्वरूप सिंदूर की चौरासवीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में शिरकत करने कल वह लखनऊ आए थे । मैं ने उन से एक शिकायत भी कि अब वह शेर पढ़ने से ज़्यादा तकरीर करने लगे हैं इस से सुनने में रसाघात होता है , यह गुड बात नहीं है। इस से हम जैसे आप के आशिकों को तकलीफ होती है। लेकिन वह तमाम सफाई देते रहे कि सब को समझाना भी जरूरी है। मैं ने कहा कि अपने चाहने वालों को इतना जाहिल भी मत समझिए । लेकिन वह आधा सहमत हुए इस बात से आधा नहीं  । पर कहा कि ज़रूर आप की बात पर गौर करूंगा।  मैं ने फर उन्हें उन के ही दो शेर सुना दिए :

हर शख्स दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ
और चाहता है कि उसे रास्ता मिले

इस दौरे मुंसिफी में जरूरी नहीं वसीम
जिस शख्स की खता हो उसी को सजा मिले

फिर तय हुआ कि उन की अगली लखनऊ यात्रा में इत्मीनान से बैठकी होगी । आप मित्रों के लिए उन की कुछ गज़लें जो मुझे बहुत पसंद हैं , यहां पढ़वाता हूं :




 मैं इस उम्मीद पे डूबा के तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा


ये एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा


मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ जो फिर जला लेगा


कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा


मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी जला लेगा


हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा





 

तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते

मुहब्बतों के दिनों की यही ख़राबी है
ये रूठ जाएँ तो फिर लौटकर नहीं आते

जिन्हें सलीका है तहज़ीब-ए-ग़म समझने का
उन्हीं के रोने में आँसू नज़र नहीं आते

ख़ुशी की आँख में आँसू की भी जगह रखना
बुरे ज़माने कभी पूछकर नहीं आते

बिसाते -इश्क पे बढ़ना किसे नहीं आता
यह और बात कि बचने के घर नहीं आते

'वसीम' जहन बनाते हैं तो वही अख़बार
जो ले के एक भी अच्छी ख़बर नहीं आते  

 









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  उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है 





लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आँसू ज़ुबाँ नहीं होता

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटायेगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाई
के मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता

मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिये मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता





Tuesday, 23 September 2014

पुस्तक मेले में आज़ादी की लड़ाई की किताबें खोजते नारायण दत्त तिवारी


 

आज लखनऊ के राष्ट्रीय पुस्तक मेले में नारायणदत्त तिवारी जी से मुलाक़ात हो गई। मिलते ही वह भाव विभोर हो गए । हालचाल पूछा और उलाहना भी दिया कि, ' मैं इतने दिनों से लखनऊ में हूं लेकिन आप कभी मिलने आए ही नहीं।' मैं संकोच में पड़ गया । फिर भी धीरे से कहा कि  , 'आप ने कभी बुलाया ही नहीं । ' लेकिन वह सुन नहीं पाए । अब वह ज़रा ऊंचा सुनने लगे हैं । तो मैं ने फिर ज़रा ज़ोर से यही बात कही तो  उन्हों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोले , 'आप बिलकुल नहीं बदले !' वह बोले , ' अब से आप को बुला रहा हूं ,  '  आप माल एवेन्यू आइए !'  वह ह्वीलचेयर पर थे सो मैं खड़े-खड़े उन से बात कर रहा था तो वह कहने लगे , 'आप विद्वान आदमी हैं मेरे सामने आप इस तरह खड़े रहें अच्छा नहीं लग रहा।' फिर उन्हों ने अपने एक सहयोगी से कह कर बग़ल की दुकान से एक कुर्सी मंगाई  और कहा कि , 'अब बैठ कर बात  कीजिए । '

 फिर वह अचानक पूछने लगे कि , ' आज़ादी को ले कर कोई किताब मिलेगी , आज़ादी की लड़ाई के बारे में ?' मैं ने कहा कि , ' हां लेकिन घर पर है , लानी पड़ेगी !' वह कहने लगे , ' यहां मेले में ? ' तो मैं ने बताया कि , मिलेगी तो !' तो पूछने लगे , ' कहां ?' बताया फला -फला  के स्टाल पर मिल सकती है । फिर उन्हों ने कागज़ मंगवाया और कहने लगे , ' कुछ किताबों के नाम लिख दीजिए । ' मैं ने लिख दिया । तो वह बोले , 'अपने घर का पता और फोन नंबर भी लिखिए । ' वह भी लिख दिया । बात ही बात में मैं ने उन्हें अपने ऊपर किए गए उन के उपकारों को गिनाना शुरू किया और याद दिलाया कि कैसे वह मेरे एक्सीडेंट में भी मुझे देखने आए थे और मेरी मदद की थी तो वह बोले , ' यह तो मेरा धर्म था । ' जब भी कोई बात कहूं  तो हर बात पर वह  यह एक बात दुहराते , ' यह तो मेरा धर्म था !' बतौर मुख्यमंत्री , उद्योग मंत्री , वाणिज्य मंत्री , वित्त मंत्री के अपने दिनों को भी याद करते रहे । भीड़ बढ़ने लगी तो कहने लगे कि , 'अब घर आइए । ' अचानक फ़ोटो  खिंचती देखे तो कहने लगे , ' हमारे साथ आप की भी एक फ़ोटो  जैसी फ़ोटो  खिंच जाए !' फिर जब चलने लगा तो उन के एक सहयोगी बोले , ' मैडम से भी  मिलते जाइए !' मैं ने पूछा ,  ' कौन मैडम ?'  सहयोगी ने पीछे की दूकान पर बैठी किताबें देख रही उज्ज्वला जी की तरफ़ इशारा किया ।  मैं ने कहा कि , उन्हें अभी किताबें खरीदने दीजिए और तिवारी जी को नमस्कार कर उन से विदा ली । सचमुच  इतने विनम्र, मृदुभाषी  और संवेदनशील राजनीतिज्ञ मैं ने कम ही देखे हैं और तिवारी जी उन में विरले हैं ।  हालां कि अब वह बिखर से गए हैं और वह जो कहते हैं न कि वृद्ध और बालक एक जैसे होते हैं ! तो हमारे तिवारी जी उसी पड़ाव पर आ गए दीखते हैं ।



 


मनो किताब न हो किसी मल्टी नेशनल कंपनी का प्रोडक्ट हो, हिंदी सिनेमा हो कि विज्ञापन चालू !

हिंदी अखबारों और पत्रिकाओं में समीक्षाएं अब इस कदर प्रायोजित हो गई हैं कि इस का कोई हिसाब नहीं है। अखबारों में समीक्षाएं भी पैरे दो पैरे की जो छपती हैं उन पर तो कुछ कहना ही नहीं है ।  कहना भी पड़े तो यही कहूंगा कि इसे भी छापने की क्या ज़रूरत है ? तिस पर संपादकों और उन के सहयोगियों का दंभ देखते बनता है। पहले खीझ होती थी , अब मज़ा आता है इन का 'अमरत्व ' देख कर। लेकिन हिंदी पत्रिकाओं के संपादकों की अहमन्यता भी खूब है ।  जुगाड़ के आगे सभी नतमस्तक हैं ।

समीक्षा के लिए मैं भी पहले किताब ज़रूर  भेजता था । देर सबेर समीक्षाएं छपती  भी थीं । राजेंद्र  यादव ने तो मेरे एक उपन्यास अपने अपने युद्ध की समीक्षा हंस में छापी ही , इस उपन्यास पर चार पेज का एक संपादकीय भी लिखा, केशव कहि न जाए का कहिए !  शीर्षक से । तब जब कि मैं राजेंद्र यादव का कोई 'सगा ' या ' प्रिय ' जैसा भी नहीं था । न कोई जर - जुगाड़ किया था । बाक़ी जगह भी समीक्षाएं स्वत्:स्फूर्त ही छपती थीं । लेकिन यह सब अब पुरानी बातें हैं । पर समीक्षा का वर्तमान परिदृश्य देख कर मैं अब चार साल से किसी को समीक्षा के लिए किताब भी नहीं भेजता । जब कि मेरी किताबें हर साल छपती हैं । एक साल में एक दो नहीं चार पांच छपती  हैं । तो भी मुझे इन लोकार्पण और समीक्षा की बैसाखियों के मार्फ़त न तो अमर बनना है न खुदा बनना है । जो बन रहे हैं उन्हें ये बैसाखियां मुबारक़ ।  मेरी किताबें और मेरा ब्लॉग सरोकारनामा बिना इन बैसाखियों के अपना पाठक खुद ब खुद खोज लेने में सक्षम हैं ।

खैर , लखनऊ में एक लेखक हैं शिवमूर्ति । राजकमल  प्रकाशन ने उन की एक किताब छापी है सृजन का रसायन । कोई चार पांच महीने पहले ही छपी है । पर अभी तक इस किताब की कहीं एक भी समीक्षा नहीं आ सकी है ।  किताबघर से छपे उन की किताब मेरे साक्षत्कार का भी यही हाल है । इस की भी समीक्षा गुल है । लेकिन लगभग इसी समय, इसी प्रकाशक ने इसी लखनऊ के अखिलेश का एक उपन्यास छापा निर्वासन । पुरस्कृत कर के छापा । इस उपन्यास की दो दर्जन से अधिक समीक्षाएं छप चुकी है ।  इन्हीं चार महीनों में । सब जगह हरी-भरी समीक्षाएं । बिलकुल चारणगान करती हुई । कहीं कोई खोट नहीं , कमी नहीं । बल्कि किताब लोगों के हाथ में आई - आई ही थी कि समीक्षाएं भी धड़ाधड़ आ गईं । क्या पाखी , क्या हंस , क्या ये , क्या वो ! मनो किताब न हो किसी मल्टी नेशनल कंपनी का प्रोडक्ट हो । कोई हिंदी सिनेमा हो । कि प्रोडक्ट आया नहीं , सिनेमा आया नहीं कि विज्ञापन चालू ! आने के पहले ही से विज्ञापन ! कि  प्रोडक्ट या सिनेमा में डीएम हो न हो , विज्ञापन में डीएम होता है और कारोबार चल जाता है । मुनाफ़ा वसूली हो जाती है । गुड है ! तो क्या यह पत्रिकाएं भी अब लोगों का मार्केटिंग टूल बनती जा रही हैं ? लोगों के महत्वोन्माद का शिविर बनती जा रही हैं ? जुगाड़ के जंगल में तब्दील हो रही हैं ? खैर जो भी हो , जय हो ऐसे संपादकों , लेखकों और समीक्षकों की । उन की पूत के पांव पालने में ही चीन्ह  लेने की इस क्षमता को सलाम !

और यह सब तब है जब इस उपन्यास 'निर्वासन' पर प्रभात रंजन ने लिखा है कि वह अपठनीय है और कि  चुके हुए लेखक हैं अखिलेश।  वह लिखते हैं , ' प्रकाशक द्वारा लखटकिया पुरस्कार के ठप्पे के बावजूद अखिलेश का उपन्यास 'निर्वासन' प्रभावित नहीं कर पाया।  कई बार पढने की कोशिश की लेकिन पूरा नहीं कर पाया।  महज विचार के आधार पर किसी उपन्यास को अच्छा नहीं कहा जा सकता है । साहित्य भाषा के कलात्मक प्रयोग की विधा है.।  'निर्वासन' की भाषा उखड़ी-उखड़ी है। . 'पोलिटिकली करेक्ट' लिखना हमेशा 'साहित्यिक करेक्ट' लिखना नहीं होता है.।  सॉरी अखिलेश! एक जमाने में आप को पढ़ कर लिखना सीखा.।  लेकिन आज यही कहता हूँ- आप चुक गए हैं! (और हाँ! एक बात और, 349 पृष्ठों के इस उपन्यास की कीमत 600 रुपये? क्या यह किताब सिर्फ पुस्तकालयों के गोदामों के लिए ही है, पाठकों के लिए नहीं)। मैत्रेयी पुष्पा की राय और  है । वह कहती हैं, ' इन दिनों समीक्षकों की योग्यता क्या है, दोस्ती और दुश्मनी की दलबंदी। पाठकों में यह दुर्गुण नहीं होता। दोस्त समीक्षक पीठ ठोकें और पाठक अपना माथा पीटें तो हमारी रचना की जगह कूड़ेदान में होनी चाहिए।'

मैं तो अपनी किसी किताब का अव्वल तो लोकार्पण नहीं करवाता। किताब का लोकार्पण करवाना मतलब विवाह योग्य बेटी का पिता बन जाना है । कि हर कोई लेखक पर एहसान करने का भाव ले कर आता है । और लेखक को वक्ता से ले कर श्रोता तक की खातिरदारी बारातियों की तरह करनी है , उन के नाज़ नखरे उठाने हैं , खर्च बर्च करना है और अंतत: अपमान की नदी में कूद जाना है । और वक्ता लोग सीना ताने हुए आते हैं और दिलचस्प यह कि किताब बिना पढ़े हुए आते हैं । लेखक भी एक से एक कि मूर्ख और भ्रष्ट राजनीतिज्ञों या सो काल्ड सेलीब्रेटीज को भी लोकार्पण समारोहों में बुला कर अपनी शान समझते हैं। वह राजनीतिज्ञ , वह सेलेब्रिटीज़ लोग जिन का किताब या साहित्य से कोई सरोकार नहीं । जो समाज पर सिर्फ और सिर्फ दाग हैं और कि बोझ भी । अभी फेसबुक पर शशिभूषण द्विवेदी ने अपनी वाल पर विष्णु खरे के एक बयान को उद्धृत करते हुए एक पोस्ट लिखी है , आप भी पढ़िए :

विष्णु खरे ने मिथिलेश श्रीवास्तव के कविता संग्रह के विमोचन में नए लेखकों की किताबों की तुलना जो सुअरिया के बच्चों से की है वह सुनने में ख़राब तो है और घटिया भी है। उसकी निंदा होनी भी चाहिए लेकिन उनकी बात का जो निहितार्थ है उस पर भी विचार किया जाना चाहिए। दरअसल तकनीकी की सुलभता के कारण जब से छपना-छपाना आसान हो गया है तब से कचरा किताबों की बाढ़ आ गई है। हाँलाकि ऐसा नहीं है कि पहले घटिया किताबें नहीं छपती थीं। समर्थ लोगों की घटिया किताबें पहले भी छपती रही हैं और उन पर प्रायोजित चर्चा भी होती ही थी। लेकिन घटिया किताबों की ऐसी बाढ़ नहीं आई थी। आज प्रकाशन व्यवसाय का विस्तार हुआ है, किताबें खूब छप रही हैं लेकिन उसी के साथ सचाई यह भी किताबों की गुणवत्ता में भयानक कमी आई है। आज कूड़ा किताबों के ढेर में अच्छी किताबों की पहचान मुश्किल होती जा रही है। सोचने वाली बात है कि साल में कुछ नहीं तो दस हजार किताबें तो छपती ही होंगी लेकिन उनमें सचमुच कितनी किताबें होती हैं जिन्हें पढ़ा जाना अनिवार्य लगे। नए लेखकों से उम्मीद होती है कि वे अपना बेहतरीन देंगे लेकिन वहां भी छपास और बायोडाटा बढ़ाने की ऐसी हड़बोंग है कि आश्चर्य और दुःख होता है। आलोचकों की भूमिका यहाँ महत्त्वपूर्ण हो सकती थी लेकिन उसका और भी बुरा हाल है। ऐसे में विष्णु खरे की बात बुरी लगते हुए भी सोचने लायक तो है।

तो क्या समीक्षा , क्या लोकार्पण सभी में घुन लग गया है । तिस पर प्रकाशकों द्वारा लेखकों का शोषण अंतहीन है । अभी एक बड़े कवि मिले एक समारोह में । वह बता रहे थे कि दिल्ली में दरियागंज के एक बड़े कहे जाने वाले प्रकाशक से कविता संग्रह छापने की बात की तो रायल्टी देने की बात करने के बजाय उलटे वह किताब छापने के लिए एक लाख रुपए की मांग कर बैठा । कवि यह सुन कर चौंके । कहा कि यह तो बहुत ज़्यादा है तो प्रकाशक बोला , ' आखिर हमारा ब्रांड भी तो बड़ा है , हमारे बैनर का नाम बहुत है , इतना पुराना और बड़ा हमारा नाम है ।' भोजपुरी में एक कहावत है कि , ' बड़ -बड़ मार कोहबरे  बाक़ी !' तो बात और दंश और इस के डाह की कई सारी परती परकथाएं लिखनी अभी शेष हैं । 


Friday, 19 September 2014

देवेंद्र आर्य की ग़ज़लें ऐसे हमलावर हो जाती हैं, गोया किसी शहर से नाराज़ नदी उस पर टूट पड़ी हो

देवेंद्र आर्य और हम गोरखपुर के हैं । मतलब हमारा जन्म-भूमि का रिश्ता है । गर्भ और नाल का  रिश्ता  है ।  हम से छ  महीना बड़े हैं देवेंद्र । उम्र में भी और रचना में भी । सो हमारे बड़े भाई भी हैं । सत्तर के दशक में हम विद्यार्थी थे। उन दिनों यह बी एस सी में पढ़ते थे , हम बी ए में । हिंदी कविता में वह दिन मुक्तिबोध , धूमिल और दुष्यंत कुमार के सर चढ़ कर बोलने के दिन थे । इसी ताप और अपनी  रुमानियत में क़ैद हम दोनों ही कविताएं  लिखते थे । कवि गोष्ठियों और कवि सम्मेलनों में मिलते रहते थे । उन दिनों गोरखपुर के विद्यार्थी कवियों में देवेंद्र आर्य महबूब कवियों में शुमार थे । सब से ज़्यादा छपते भी थे और सुने भी जाते थे । उन दिनों यह एक गीत सुनाते थे सस्वर , ' याद तुम्हारी आई,  जैसे बरखा फूल झरी / छलक उठी कान्हे माथे से माटी की गगरी !' और हम अपने प्रेम के अवकाश में, उस की याद में डूब जाते थे । हालां कि यह गीत गोरखपुर के ही माहेश्वर तिवारी  के एक गीत , ' याद तुम्हारी जैसे कोई / कंचन कलश भरे / जैसे कोई किरण अकेली / पर्वत पार करे !' को दुहराते हुए था । फिर भी दोनों ही गीतों की तर्ज़ एक होने के बावजूद दोनों की कल्पना, उपमान और बिंब जुदा -जुदा थे । और मन को मोहते थे । प्रेम को एक उड़ान , एक छांव और मांसलता परोसते थे । ठीक वैसे ही जैसे कभी परमानंद श्रीवास्तव सस्वर सुनाते थे , ' पल छिन चले गए / जाने कितनी इच्छाओं के दिन चले गए !'  लेकिन उन दिनों देवेंद्र कुमार आर्य , हां देवेंद्र कुमार आर्य एक दूसरे देवेंद्र कुमार जिन्हें पूरा हिंदी समाज बंगाली जी के नाम से जानता है, उन के साथ ज़्यादा घूमते और मिलते।  कहूं कि उन से ज़्यादा हिले हुए थे । बंगाली जी गीतों के अनूठे राजकुमार थे । और कविता के बादशाह । ' एक पेड़ चांदनी / लगाया है आंगने / फूले तो आ जाना / एक फूल मांगने ' जैसे गीत ने उन्हें खूब मशहूर किया था । बंगाली जी का मिजाज भी यही था । वह सब को सर्वदा देने की ही मुद्रा में रहते थे । कई बार मैं ने देखा कि एक कवि,  कवि सम्मेलनों में उन की खड़ी की खड़ी कविता, उन की उपस्थिति में ही पढ़ देते थे। वापस आ कर उन के पांव छूते हुए कहते कि,  'माफ़ कीजिएगा , बंगाली जी ज़रूरत पड़ गई थी । ' बंगाली जी , मुह में पान कूचते हुए मुस्कुरा कर रह जाते । अकसर चुप-चुप रहने वाले और ' तावे से जल भुन कर / कहती है रोटी / अंगूर नहीं खट्टे / छलांग लगी छोटी।’ जैसी मुहावरा तोड़क कविताएं लिखने वाले देवेंद्र कुमार बंगाली जी ने बहस ज़रूरी है जैसी अविरल कविता लिखी है :

दिक्कत है कि तुम सोचते भी नहीं
सिर्फ दुम दबा कर भूंकते हो
और लीक पर चलते-चलते एक दिन खुद
लीक बन जाते हो
दोपहर को धूप में जब ऊपर का चमड़ा चलता है
तो सारा गुस्सा बैल की पीठ पर उतरता है
कुदाल,
मिट्टी के बजाय ईंट-पत्थर पर पड़ती है
और एकाएक छटकती है
तो अपना ही पैर लहुलुहान कर बैठते हो
मिलजुल कर उसे खेत से हटा नहीं सकते?

एक से एक गीत और गज़ब की कविताएं लिखी हैं देवेंद्र कुमार ने। जैसे , ' अब तो अपना सूरज भी आंगन देख कर धूप देने लगा है’ या फिर ‘न जनता/ न नेता/ आप पूछेंगे!/ फिर मुझे इस देश से / क्या वास्ता? सो तो है मगर...।’ जैसी मारक  कविताएं लिखने वाले देवेंद्र कुमार साइकिल से चलते थे । साइकिल से क्या चलते थे , साइकिल उन के साथ चलती थी । अकसर पैदल ही वह साइकिल लिए चलते मिलते , पान मुह में घोलते हुए।  कभी अकेले , तो कभी कोई साथ में भी । साथ में कोई भी हो सकता था , पैदल ही । अगर साइकिल लिए हो तो वह भी अपनी साइकिल के साथ पैदल । हम भी कई बार यह सुख भोग चुके हैं । पर देवेंद्र कुमार आर्य ने बहुत ज़्यादा । तो इन्हीं देवेंद्र कुमार बंगाली जी से हिले मिले देवेंद्र कुमार आर्य भी उन से बहुत कुछ प्राप्त कर रहे थे, सीख रहे थे । जैसे मिट्टी सोखती है पानी , वैसे ही देवेंद्र कुमार को सोख रहे थे , ज़ज़्ब कर रहे थे । उन की चुप्पी , बहुत कम बोलना , उन की शालीनता , उन की भाषा , उन का कहन , कविता का मुहावरा , उन का रूपक और बिंब विधान भी , उस में धार चढ़ाना , उसे मांजना भी। आदि-इत्यादि भी । और फिर खुद चुप रहना पर रचना का सर चढ़ कर बोलना ! यह सब का सब । उन का पान भी, उन का अंदाज़ भी । धीरे-धीरे देवेंद्र कुमार और देवेंद्र कुमार आर्य एक तसवीर के दो पहलू  बन गए । देवेंद्र कुमार आर्य को देवेंद्र कुमार की छाया कहने लगे लोग । लेकिन यह देखिए देवेंद्र कुमार आर्य ने इस चुभन को इस शिद्द्त से महसूस किया कि कविता और अपने  गीतों का तेवर ही बदल लिया । बहुत जल्दी ही।  बंगाली जी की कविता में जो तिलमिलाहट थी , उस तिलमिलाहट को देवेंद्र कुमार आर्य ने चीख और चीत्कार में बदल दिया । बाद में हम गोरखपुर छोड़ कर दिल्ली चले गए । अखबारी नौकरी में । फिर लखनऊ आ गए । लेकिन देवेंद्र कुमार आर्य गोरखपुर में ही रहे। बंगाली जी और अपने पिता जी की ही तरह रेलवे की नौकरी में । और कविता के साथ रहे । हम से गोरखपुर ही नहीं , कविता भी हम से छूट गई । वह हमारे पैदल और साइकिल से चलने के दिन छूट गए। लेकिन देवेंद्र कुमार आर्य नहीं छूटे ।  इस बीच कभी पैदल ही नाप लिया जाने वाला शहर गोरखपुर भी पसर कर बड़ा हो गया ।  हां , पर देवेंद्र कुमार आर्य का नाम छोटा हो गया । वह देवेंद्र कुमार आर्य से देवेंद्र आर्य हो गए । नाम भले उन्हों ने छोटा कर लिया अपना, लेकिन उन का कवि बड़ा बन गया । उन के गीत,  जनगीत बन गए । नुक्क्ड़ नाटकों में गाए जाने लगे:

अगल-बगल खेतों से मिट्टी काटी जाएगी, 
रोडवेज के लिए यह सड़क पाटी जाएगी। 
सड़क किनारे गांव की अपनी क़ीमत होती है 
बंगला गाड़ी और फार्मिंग इज़्ज़त शहरों की 
बिजली डीज़ल खेत बेच के ढाबा खोलेंगे 
खुलने को है गांव से थोड़ी दूर नई मंडी । 

आप की मर्जी पाले रहिए मोह  कुछ होने का 
फटी योजना थूक लगा के साटी जाएगी । 
लोगों का गुस्‍सा विस्‍फोटक रूप न धारण कर सके, 
सदन सेफ्टीवाॅल्‍व अग्निशामक यंत्रों से  हैं । 
कब होगी पहचान फर्श पर बिखरे खून की , कब 
सुविधा की मोटी कालीन उलाटी जाएगी ।

या कि  फिर  

जो भी अपनी रोटी का 
हिसाब देने से डरता है 
सौ की सीधी बात है 
दो नंबर का धंधा करता है 

या फिर 
घघ्घो रानी बड़ी सयानी 
बोल री मछली कितना पानी । 

शहरों की शैतानी आंतें 
पचा रही हैं पर्वत , जंगल ,
बहबूदी की बरबादी में 
मना रहे हम दुःख का मंगल । 

ऐसे बहुतेरे गीत लिखे हैं देवेंद्र आर्य ने और लोगों ने गाए  हैं , गाते ही हैं । अब तो जैसे आंदोलनों के दिन हवा हुए। पर जब होते थे आंदोलन तो देवेंद्र आर्य के गीत उन में हौसला भरते थे और खूब भरते थे । कई तर्ज़ और तेवर वाले उन के अनगिनत गीत , आंदोलनों की जान होते थे । एक बार मैं गोरखपुर गया तो दूरदर्शन द्वारा आयोजित एक कवि सम्मेलन हो रहा था और देवेंद्र आर्य एक ग़ज़ल  पढ़ रहे थे :

गोरख की सरज़मीं पर गुजरात का ख़याल
चेहरे की आइने से कहीं जंग होती है !


अब देवेंद्र आर्य न सिर्फ कद्दावर गज़लगो बन गए थे बल्कि हम जैसे लोग उन के शेर अपने कहानी - उपन्यास में कोट करने लगे थे । अपनी बात को और धरदार ढंग से कहने का कोई और तरीक़ा ही नहीं बचा था। देवेंद्र आर्य अब अगर गोरखपुर में रह कर भी यह और ऐसे शेर कह रहे हैं कि ,  ‘गोरख की सरज़मीं पर गुजरात का ख़याल/चेहरे की आइने से कहीं जंग होती है!’ और लगभग चुनौती देते हुए कह रहे हैं तो उन के शेर कहने की यह क्षमता तो है ही, उन की बहादुरी भी दिखती है । यह बात गोरखपुर में रहने वाले लोग समझ सकते हैं। सांप्रदायिक शक्तियों को उन की माद में ही रह कर चुनौती देना आसान नहीं है ।  रिस्क ज़ोन है यह । यह वैसे ही है जैसे धूमिल की कविता में कहें तो , ' लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो / घोड़े से पूछो जिस के मुंह  में लगाम है। '
बावजूद तमाम मुश्किलों और दुश्वारियों के सांप्रदायिकता से लड़ने में उन की ग़ज़लें और गीत कभी पीछे नहीं रहे  ।  सही नब्ज़ और सही बात वह कहते  ही हैं बिना किसी रौ - रियायत के ।

हिंदू में सभी ठाकरे , मोदी नहीं होते 
मुस्लिम में भी सभी लोग तो नदवी नहीं होते

इंसानियत दरिया है और दरिया से अधिक प्यास 
इंसानियत के फ़ैसले फस्ली नहीं होते 

क्या क्या न हुआ देश में गांधी तेरे रहते 
क्या होता अगर देश में गांधी नहीं होते

उन की कविताएं भी इस से अछूती नहीं हैं :

फलां की जीत को फलां की हार समझने का
ख़ास मनोविज्ञान , आम के गले नहीं उतरा
काशी को काशी ने बता दिया
कि काशी को समझने के लिए
थोडा सा मगहरवासी होना जरूरी है .

सच के पीछे का झूठ सच है
या झूठ है झूठ के पीछे का सच , पता नहीं
काशी जीती या हारी , ये भी पता नहीं
पर वे दानिश्वर क्या झाकेंगे अपने देश छोड़ने के
उत्तेजक बयानों की आत्मा में
क्या साहित्यकारों के राजनीतिक बयान
राजनीतिज्ञों के साहित्यिक बयानों की तरह ही होते हैं
निरर्थक,पानी का बुलबुला
क्या तानाशाह सिर्फ व्यक्ति होता है
प्रवृत्ति नहीं
कि किसी एक के लिए जलावतन हो जाया जाय
क्या वाकई देश इतना कमज़ोर है
भरोसा, कहाँ गया लोक पर अटूट भरोसा ?

और सचमुच ! चौपट हो चले सिस्टम को , समाज और सरकार को सट - सट  सोटा मारने का मन हो तो देवेंद्र आर्य की ग़ज़लों और गीतों से मिलिए । इन गजलों और गीतों में आप को न सिर्फ़ सिस्टम, समाज और सरकार को मारने के लिए सोटा मिलेगा बल्कि एक बेपनाह ऊर्जा और अधिकार भी मिलेगा जो कि कहीं किसी बाज़ार से खरीद कर नहीं , किसी क़ानून और संविधान से नहीं बल्कि कलेजे के भीतर से आता और मिलता है। इतने जलते और खौलते हुए शेर देवेंद्र की ग़ज़लों और गीतों में मचलते हैं कि एक - एक हर्फ़ से लिपट जाने को जी चाहता है। मुश्किल इतनी बड़ी आ जाती है कि किस ग़ज़ल को छोड़ें , किस गीत को छोड़ें और किस शेर से न लिपटें । सभी तो अपने आगोश में ऐसे लेते जाते हैं गोया कोई सरदी की शीत हो कि सभी वनस्पतियों को भिंगो कर सर्द करना ही है , अपने ज़ज़्बात में भिंगोना ही है ।  जैसे कोई तपती हुई बेपरवाह लू हो कि हर किसी को गरम थपेड़े में झुलसाना ही है । देवेंद्र आर्य की ग़ज़लों और गीतों के ताप में जो तेवर , जो तल्खी , जो तुर्शी है वह अब से पहले मैं ने दो और शायरों में पाई है । एक दुष्यंत कुमार , दूसरे अदम गोंडवी । और अब तीसरे हैं देवेंद्र आर्य। दुष्यंत के यहां सारी खदबदाहट के बावजूद उन की कहन में एक सलाहियत , और मासूमियत निरंतर तारी है। लेकिन अदम के यहां दुष्यंत की यह सलाहियत और मासूमियत की ज़मीन टूट जाती है , टूटती ही जाती है । अदम जैसे चीख पड़ते हैं, चीखते ही रहते हैं । एक हल्ला बोल की गूंज अदम की ग़ज़लों से अनायास फूटती मिलती है । जब कि देवेंद्र आर्य के यहां दुष्यंत की खदबदाहट में तर सलाहियत , मासूमियत तो है ही , अदम का हल्ला बोल भी है पर अचानक ही देवेंद्र आर्य की गज़लें जैसे हमलावर हो जाती हैं , ऐसे जैसे किसी शहर से नाराज़ नदी बाढ़ की शक्ल में उस शहर पर टूट पडी हो । धार - धार उस शहर को ध्वस्त करती और अपने पूरे वेग में उस शहर को उजाड़ती हुई । गुरिल्ला हमला नहीं , सीधा हमला करती हैं देवेंद्र की गज़लें और चौपट सिस्टम को सांस भी नहीं लेने देतीं । मुक्तिबोध की तरह आह्वान या ऐलान नहीं करतीं देवेंद्र आर्य की गज़लें कि , ' तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब !' बल्कि वह तो जैसे शंखनाद करती हुई एक ही वार में सारे मठ और सारे गढ़ तोड़ डालना चाहती हैं ।  इन ग़ज़लों और गीतों का सिस्टम पर यह हमला बिना किसी रियायत , बिना किसी ऐलान के औचक परमाणु हमले की शक्ल ले लेता है । जैसे कोई हरावल  दस्ता हों देवेंद्र आर्य की यह ग़ज़लें, उन के गीत । देवेंद्र अपनी रचनाओं  में जो यह तेवर अपनाते हैं तो अचानक , एकबैग नहीं । इन के जनगीतों की याद कीजिए ।

फिर नंगी  ले जाई जाएगी कोई औरत, 
पुलिस सदन में बैठे-बैठे डांटी जाएगी।

वह जनगीत जो नुक्क्ड़ नाटकों में नाटक मंडलियां गाती रही हैं, गाती ही हैं । मुझे पूरा यकीन है कि अब देवेंद्र आर्य के जनगीतों के साथ - साथ उन की यह मोती मानुष चून की गज़लें भी लोगों के गुस्सा , लोगों के प्रतिरोध  और लोगों के आक्रोश का बायस बनेंगी । इस में रत्ती भर संदेह नहीं ।

शुरू तो हुई थीं विरासत की बातें
मगर छिड़ गई हैं सियासत की बातें

शराफ़त की बातें, नफ़ासत  की बातें
लुटेरों के मुंह से हिफाज़त की बातें

मोहल्ला  कमेटी के हल्ले के पीछे
सुनी  जा रही हैं रियासत की बातें

मुझे भी मज़ा है , कमाई उसे भी
समझता है हाथी महावत की बातें

तो यह जो हाथी और महावत की जुगलबंदी है व्यवस्था की बुनियाद में उस बुनियाद को ही हिलाने की कसरत में देवेंद्र आर्य की ग़ज़लें निरंतर बेचैन और युद्धरत हैं । नरेश सक्सेना के यहां भी यह बुनियाद ध्वस्त करने की बात चलती है लेकिन वह इस बुनियाद में उतरने के लिए पहले सीढ़ी खोजते हैं:

मुझे एक सीढ़ी की तलाश है
सीढ़ी दीवार पर
चढ़ने के लिए नहीं
बल्कि नींव में उतरने के लिए
मैं किले को जीतना नहीं
उसे ध्वस्त कर देना चाहता हूं 

लेकिन देवेंद्र को सीढ़ी नहीं सोटा की दरकार है ।

नहीं करते थे खेतिहर आत्महत्या
उपज बेशक थी कम सौ साल पहले

न जी डी पी थी ना थी एफ़. डी. आई.
न मनरेगा का गम सौ साल पहले

बरास्ता पूंजी आती है गुलामी
ये मुद्दा था अहम सौ साल पहले

देवेंद्र यहीं नहीं रुकते । वह तो जैसे ऐलान करते चलते हैं :

कि जिस दिन आसमान बिकने लगेगा
उसी दिन समझो आएगी क़यामत

खुदा महफ़ूज रक्खे प्यास मेरी
बदल डालूंगा मैं नदियों की क़िस्मत

ये गज़लें जब कहीं हालात भी बयान करती हैं तो भी उन की कहन  में रिरियाहट या मिमियाहट नहीं होती  , साफ तल्खी और तंज भरा  तेग लिए गुस्से में डूब कर बोलती हैं ।

पानी कैसे पकड़ में आया , तुम क्या जानोगे
कैसे मैं ने साथ निभाया , तुम क्या जानोगे

बासी भात में ख़ुदा का साझा , खुदा की रहमत में
किस ने किस ने हिस्सा खाया , तुम क्या  जानोगे

राजनीतिक बयानों में तो देश विकास की राह पर है लेकिन देवेंद्र की गज़लें कुछ और खुसफुसाती हैं । आप भी सुनिए :

देखा तुम ने मौसम कैसा है
चौबीस घंटे पैसा-पैसा है

अगड़ा बच्चा कंप्यूटर जैसा
पिछड़ा बच्चा , बच्चों जैसा है

देवेंद्र  की गज़लें असल में बहुत महीन मार करती है , आहिस्ता से। पर भरपूर ।

दो मुट्ठी चावल और मुट्ठी भर दाल
इस के आगे क्या है भूख की मजाल

पूंजी से टकराए , इतनी हिम्मत
सत्ता की आंखों में सूअर के बाल

भट्ठी सा धधक रहा जीवन का सच
थर्मामीटर जैसा कविता का हाल

देवेंद्र की ग़ज़लों में छटपटाहट तो है ही मसलों की शिनाख्त और उस पर पत्थर सी मार भी है :

अन्न भरे गोदामों में , फिर भी अकाल देखो
जल , जंगल , ज़मीन से पैदा यह सवाल देखो

रौशनियों ने रौशनियों को यूं उलझाया है
अंधियारे की कीमत में आया उछाल देखो

यह विकास है या विनाश है, प्रगति है या पर-गति
रेल पटरियों पर जा बैठी है कुदाल देखो

लोगों की संसद लोगों की संसद नहीं रही
बदल रहे हैं अब लोगों के ख्याल देखो

अभी अयोध्या लंका नहीं हुई है भाई जी
हल कैसे होंगे आने वाले सवाल ,  देखो


वह जैसे आगाह करते हैं कि , आप अगर किरकिरा सको तो अलबत्ता / वरना पूजित होती जाएगी सत्ता । ' आज कल अच्छे दिन की बात बहुत होने लगी है ।  लेकिन देवेंद्र पूछते हैं :

मांगे भीख न देती दुनिया , बिन मांगे मोती  देगी ?
उलटे सीधे ख़्वाब दिखाना , यह भी कोई बात हुई

जिस को पनही और पगड़ी में कोई अंतर नहीं दिखे
उस के आगे शीश झुकाना , यह भी कोई बात हुई 

उन के कुछ और शेर यहां गौरतलब हैं :

दिये की लौ से हवा को पछाड़ देता है ।
वो एक नज़र से अंधेरे को फाड़ देता है ।

अंधेरे को ज़रा महफ़ूज रखिए
ये मनबढ़ रौशनी अंधा न कर दे। 


या फिर

सीमा के उस पार है साज़िश सीमा के इस पार इलेक्शन,
अब के झंडारोहण में फूलों की जगह झरे हथगोले ।

या फिर :

हमने आज ख़रीदा कल के बदले में ।
जैसे कोका-कोला जल के बदले में ।

रास ना आया भूख का देसीपन हम को,
प्लेटें चाट रहे पत्तल के बदले में ।

आने वाली पीढ़ी करनेवाली है,
धरती का सौदा, मंगल के बदले में ।

ऐसे ही तीस्ता सीतलवाड़ पर लिखी उन की कविता बहुत महीन मार करती है :

क़ीमत  फिर भी बड़ी चीज़ है
हमा शुमा के लहज़े को
मामूली अनुदान बदल के रख देता है ।

सपनों में आया हलका सा परिवर्तन
भीतर से इंसान बदल के रख देता है ।

रिंग जा रही होती है लेकिन रिस्पांस नहीं होता है
हो निर्वात तो संवादों का कोई चांस नहीं होता है ।

किसी देश के किसी काल के
किसी भी गांधी को देखो तुम
डेढ़ हड्डियों पर एक गाल बराबर मांस नहीं होता है ।

या फिर :

सागर ने कर लिए हैं दरवाज़े बंद 
रेत  ने भी तोड़ लिए सारे संबंध 
तुम्हीं कहो कहां जाए , क्या करे नदी । 

छिलके सी छील के उतार ली गई 
नेकी तो बूंद - बूंद मार ली गई 
खुज्झे की तरह बची रह गई बदी 
तुम्हीं कहो  , कहां जाए , क्या करे नदी । । 

देवेंद्र की कविताओं में तल्खी और तंज का यह चाबुक इतनी तेज़ और इतनी सख़्ती से चलता है कि कविताएं सीधा मार करती हैं । उन का निशाना चूकता नहीं है कभी । सीधा निशाने पर जा गिरती हैं । देवेंद्र की कविताओं की , उन के गीतों और उन के ग़ज़लों की एक बड़ी खासियत यह भी है कि  वह लफ़्फ़ाज़ी भी नहीं करतीं , न ही कोरी वैचारिक जुगाली । आम बोलचाल में आज-कल एक शब्द चलता है, 'कमिश्नरी!' तो अब कहानी , कविता और आलोचना आदि में भी यह कमिश्नरी डट कर हो रही है। नतीज़ा सामने है । रचनाएं ज़मीन से कट गई हैं । लेकिन सुखद यह है कि देवेंद्र इस कमिश्नरी की बीमारी की गिरफ़्त  में नहीं हैं ।  वह तो खरी बात और खरी रचना के तलबगार हैं । और वो जो शमशेर कहते थे कि बात बोलेगी/ हम नहीं/ भेद खोलेगी आप ही ! को साकार करती चलती हैं देवेंद्र की रचनाएं । अदम गोंडवी लिख ही गए हैं कि , '  भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो/ या अदब को मुफ़लिसों की अंजुमन तक ले चलो/ जो गज़ल माशूक के जलवों से वाकिफ़ हो गई/ उसको अब बेवा के माथे की शिकन तक ले चलो।' देवेंद्र अदम की इस बात को लगता है जैसे गांठ में बाध  कर रखते हैं हमेशा । फ़िराक गोरखपुरी कहते थे कि लिटरेचर की भाषा तरकारी बेचने की भाषा होती है । तो देवेंद्र आर्य वही तरकारी बेचते हैं । उन के यहां नकली और लफ़्फ़ाज़ भाषा और फसली बातों की कोई जगह नहीं है । उन की ग़ज़लों , गीतों और कविताओं में देशज शब्दों की आवाजाही भी बहुत है । ओरहन जैसे शब्द जब इन की ग़ज़लों में नगीना की तरह जगमगाते मिलते हैं तो मन हरियरा जाता है । भोजपुरी और हिंदी के बहुत सारे लुप्तप्राय शब्द भी जब-तब देवेंद्र के यहां उपस्थित मिलते हैं । कई बार उन की ग़ज़लों के रदीफ़ -काफ़िया भी अनगढ़ रूप में जब झन्न - झन्न करते हुए अपने ऊबड़-खाबड़ रूप में उपस्थित मिलते हैं तो उन की ग़ज़लें  इतरा-इतरा जाती हैं । उन की यह तोड़ फोड़ सुकून देती है । छंद और मीटर भी है ही देवेंद्र के यहां । परंपराएं , दस्तूर और सपने भी खूब हैं । साड़ी का परदा हमने घर में बचपन में देखा था , अब देवेंद्र की रचनाओं में उसे अभी भी बाक़ी पाता हूं तो मन हुलस जाता है । और यह साड़ी का परदा देवेंद्र के यहां किसी नॉस्टेलजिया में नहीं बल्कि अस्मिता के तौर पर उपस्थित है । ऐसे ही भोजपुरी के बहुतेरे शब्द ठाट मारते मिलते हैं देवेंद्र के यहां । भोजपुरी के बिंब , उस के रूपक और तमाम कार्य व्यवहार देवेंद्र की रचनाओं की थाती हैं । इस लिए भी कि वह जीवन और ज़मीन से बहुत गहरे जुड़े हुए हैं ।  गगन बिहारी कवि नहीं हैं देवेंद्र आर्य । हालां कि गौरैया उन के गीत में भी धूल खेलती है पर वह कइन, बांस और गौरैया के रूमान में नहीं जीते । उन की ही कविता में जो कहूं तो , ' सच में झूठ का हलका सा भी खारापन / लोगों के दिल में उपजा / सम्मान बदल के रख देता है । ' तो मैं यह बात बहुत ज़ोर से कहना चाहता हूं  कि देवेंद्र की रचनाओं में झूठ का खारापन लेशमात्र भी नहीं मिलता और इसी लिए उन के लिए , उन की रचनाओं के लिए सम्मान बदलता नहीं है  और - और बढ़ता जाता है । भोजपुरी में भी  तमाम कविताएं और गीत लिखे हैं देवेंद्र ने । और क्या खूब लिखे हैं :

बापू में एगो भगत सिंह उगा के
मार्क्स में तनी एक ' भीम ' मिला के
फिर से अज़दिया के सपना जगा के
छेड़ल जा सन सत्तावन हो सखि
हक़  दिलवावन ।


ऐसे बहुतेरे गीत हिंदी और भोजपुरी में देवेंद्र रचते मिलते हैं जो भोजपुरी के पारंपरिक गीतों, उन के शिल्प और उन की टेर के साथ अपनी पूरी भाव भंगिमा में सारी ठसक के साथ धंस कर लिखे गए हैं । नागार्जुन , त्रिलोचन और गोरख पांडेय के तत्व भी उन के यहां यत्र-तत्र उपस्थित हैं अपने पूरे सम्मोहन के साथ। पता नहीं क्या है कि  बहुत सारे कवि गीत से भागते हैं । पहले खूब गीत लिखते थे अब बिसार गए हैं । केदारनाथ सिंह कभी लिखते ही थे , 'धान उगेंगे की प्राण उगेंगे ।' नरेश सक्सेना भी लिखते ही थे गीत । ऐसे बहुत सारे कवि हैं जो गीत को भूल भाल कर ' कोरे कवि ' बन बैठे हैं । पर देवेंद्र ऐसा नहीं करते । बल्कि देवेंद्र के कई सारे गीत निर्गुण की भी याद दिलाते हैं पर बात और वज़न में वह आज के बाज़ार को तौलते और खदेड़ते हुए दहाड़ लगाते हैं, ' होगा जो भी साला / देखा जाएगा ।/ क्या कर लेगा ऊपर वाला , देखा जाएगा ।'  उन का एक गीत है लोन मेला :

चलो  लोन मेला में हो आएं 

फ्रीज  मिले , कार मिले 
सोलहो सिंगार मिले 
लोन में मिलें मम्मी - पापा 
पूंजी है शेषनाग 
ब्रह्मज्ञान पूंजी को 
व्यापे न दैहिक दैविक भौतिक तापा 

पुनर्पाठ  नश्वर दुनिया की नश्वरता का 
मंडी का दर्शन अपनाएं । 

किसी भी डिजाइन का टूटा - फूटा लाओ 
बदले में नया प्रेम ले जाओ 
बंपर डिस्काउंट है 
एक प्यार खर्च करो तीन प्यार पाओ । 

नया नया लांच हुआ सच का हूबहू झूठ 
चलो क्लोन  हो आएं । 

थोड़ा सा फिसलो 
और गट्ठर भर नेम - फ़ेम 
करनी में चार्वाक कविता में शेम-शेम 
भीतर से चाटुकार , बाहर से भगत सिंह 
द्वंद्व ही कला है , जीवन है । 

ख़तरा  है 
ख़तरे से बचने के लिए बिकें 
बिकने के लिए खरीदवाएं 
ए सुगना।, 
हम भी दुनिया से ऊपर तो नहीं 
एक क़दम अमरीका हो जाएं । 
 
देवेंद्र  की ग़ज़लों में चुभन और टीस की इबारतें इतनी ज़्यादा हैं कि जैसे नागफनी में कांटे ही कांटे । जीवन और समाज जैसे कैक्टस के जंगल में पैबस्त हो । और इन्हीं कांटों में फूल कहीं - कहीं महकते भी मिलते हैं तो इस लिए कि यह जीवन का अनिवार्य हिस्सा हैं कि  लाख दुःख हों , सुख का एक टुकड़ा भी तो है ही । तो देवेंद्र की ग़ज़लों में यह खुशबू भी है पर एक गहरी छुवन और एक निर्मल सरलता के साथ ।

बंद हवा में खिड़की जैसी खुलती दादी मां 
मेरे मन में लालटेन सी जलती दादी मां 

चीनी-रोटी , चंदा मामा , आंटे की चिड़िया 
बच्चों के भीतर बच्चे सी पलती दादी मां 

देवेंद्र कुमार के यहां प्यार भी खूब है । ' याद तुम्हारी आई,  जैसे बरखा फूल झरी / छलक उठी कान्हे माथे से माटी की गगरी !' जैसे रूपक वाला गीत उन के पास पहले ही से था । जिस में वह,   ' दिन दुपहरिया , फूल की थरिया '  जैसे मोहक बिंब रच रहे थे । साथ ही , 'रह-रह झूमे , चेहरा घूमे / डूबा मन तेरी खुशबू में / धूल -धूल खेले गौरइया घिर आई बदरी !' गा  रहे थे । तमाम सीरीज कविताओं में उन की एक सीरीज प्रेम कविताओं पर भी बाकायदा है ही ।

यहां तनहाई का मतलब विसाले-यार भी तो है
अगर दुनिया में दुःख-जंजाल है तो प्यार भी तो है

तो देवेंद्र के यहां प्यार और इस की हरारत , इस की खुमारी और इस का हुलास भी खूब है । वह कहते ही हैं कि  :

मेरी कविताओं में दुविधा , निराशा खोजने वालो
मैं केवल मैं नहीं हूं , मुझ में यह संसार भी तो है
या फिर :

जिसको प्यार संजोना आए ।
उसको जादू-टोना आए ।

पत्थर मिटटी हो सकता है,
तुम को अगर भिंगोना आए ।

ऐसे क्यों मिलती हैं ख़ुशियां ,
प्यार में जैसे रोना आए ।

प्यार के अनगिन रूप , अनुपम अनभव और अनूठी भंगिमाएं परोसते हैं देवेंद्र । ऐसे जैसे प्यार परोस नहीं रहे हों , जी रहे हों।

तुम से मिल कर कौन सी बातें करनी थीं, मैं भूल गया ।
शब्द चांदनी जैसे झर गए, मन महुए-सा फूल गया ।

तुम ने एक ओरहना क्या भेजवाया मिलने का,
अपनी ख़ुशी छिपा लेने का मेरा एक उसूल गया ।

बचपन से बचपन टकराया, गंध  उड़ी चिंगारी-सी,
मैं अपने ही कंधे  पर अपने बेटे-सा झूल गया ।

जैसे औरत वैसे पानी, धीरे-धीरे रिसता है,
पानी में रहते-रहते पत्थर भी एक दिन फूल गया ।

दोनों प्यार के राही थे ,गलबहियां थीं, दीवाने थे,
एक सपने में झूल रहा है, एक पंखे से झूल गया ।

वह कहते ही हैं कि , ' होगी जो मुहब्बत तो बताया न जाएगा / और चेहरा भी दर्पण से हटाया न जाएगा।' वह बताते भी चलते हैं , ' तोड़ देती है ज़रा सी चूक, हल्की सी चुभन / चाहना पर तुम किसी को टूट के मत चाहना ।' या फिर , ' दूरी से अगर मिटती दूरी तो मिटा लेते / मौसम के क़रीब आओ , ये प्यास की बातें हैं । ' अब अलग बात है कि वह यह भी लिखते हैं , ' स्त्री के पार जा  के ही / उस के प्यार का पता चलता है / स्त्री के करीब आ के ही उस की नफ़रत का ।'

हिंदी दिवस हमारे देश में एक ख़ास परंपरा बन कर लोगों के दिल-दिमाग में बस चुका है पर देवेंद्र पूछते हैं कि

दोनों बहनें हैं तो फिर उर्दू दिवस काहे नहीं
है कहीं भाषा के नक्शे में हमारे उर्दू ?


वह बताते हैं कि , ' सियासी ताने बाने का सुनहरा जाल हो गई हैं / हमारी अस्मिताएं जातिगत फ़ुटबाल हो गई हैं ।' ऐसे ही तमाम और विषय पर भी देवेंद्र की रचनाओं का हस्तक्षेप निरंतर होता रहता है । दुःख-सुख , घर-परिवार , मित्र -अहबाब , बाज़ार और उस की मार,  हेन -तेन, कुढ़न , तपन , गरमी -बरसात सारा कुछ सहज ही देवेंद्र बांचते रहते हैं । और पूरी सहजता , पूरी सादगी से । ऐसे जैसे कोई स्त्री चावल बीन रही हो , मटर छील रही हो , स्वेटर बीन रही हो । अनायास फंदे पर फंदा डालती-उतारती , घटाती-बढ़ाती । सारे संबंधों की किसी मां की तरह तिरुपाई करती देवेंद्र की रचनाओं की कुल ताकत मनुष्यता और मनुष्यता की पहचान ही है। एक समय देवेंद्र कुमार बंगाली के पास मैं जब भी जाता चाहे उन का घर हो या दफ़्तर । वह अगर कुछ रच रहे होते तो अगर पूछता कि  क्या कर रहे थे तो वह शर्माते हुए झिझकते हुए कहते, ' कुछ नहीं ज़रा एक कविता को साफ कर रहा था । ' या कहते , ' एक कविता को माज रहा था । ' वह लिखते भी थे , ' कविता को अच्छी होने के लिए / उतना ही संघर्ष करना पड़ता है, जितना एक लड़की को औरत होने के लिए।’ तो देवेंद्र आर्य भी अपनी रचनाओं पर मेहनत बहुत करते हैं । उसे साफ बहुत करते हैं , मांजते बहुत हैं । यह उन की रचनाओं को देख कर बार-बार लगता है । वह लिखते भी हैं , ' जानना , पहचानना , फिर छानना , तब मानना / इतना उद्यम हो सके तुम से तो कविता ठानना ।' हमारे गोरखपुर में विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं । वह कहते हैं और अकसर कहते रहते हैं कि जो अच्छा आदमी नहीं हो सकता , वह अच्छा रचनाकार भी नहीं हो सकता । अच्छा आदमी ही,  अच्छा रचनाकार भी होगा । तो लगता है देवेंद्र आर्य ने विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की इस बात को अपने जीवन में जी लिया है । सच , देवेंद्र आर्य जितने अच्छे हैं,  उतने ही सच्चे भी । कोई दिखावा नहीं । और ऐसी  ही अच्छी और सच्ची उन की रचनाएं भी हैं । उन के अच्छे होने का ऐलान करतीं उन की रचनाएं सनद हैं इस बात की। मजनू गोरखपुरी , फ़िराक़ गोरखपुरी , मन्नन द्विवेदी , राम आधार त्रिपाठी जीवन , विद्याधर द्विवेदी विज्ञ , रामदरश मिश्र, देवेंद्र कुमार, परमानंद श्रीवास्तव , रामदेव शुक्ल और  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की धरती गोरखपुर का नाम देवेंद्र आर्य भी उसी ताक़त से रोशन कर रहे हैं, जिस ताक़त और तेवर के साथ इन पुरखों ने किया  है । हमें इस बात की बेहद खुशी है । बस बाक़ी अगर कुछ है तो यही कि निराला की तरह इन की भी रचनाओं को एक राम विलास शर्मा का मिलना । ताकि इन की रचनाओं का सही मूल्यांकन भी हो सके । हालां कि आज हिंदी आलोचना का मृतप्राय होना और आलोचकों की निष्क्रिय स्थिति बहुत निराश करती है । तिस पर खेमेबाजी  ने रचना और आलोचना का सारा खेत खन दिया है । कहूं कि गोड़ दिया है । खनन माफियाओं ने जो हाल धरती , नदी, वन  और अन्य संसाधनों का किया है आलोचकों ने उस से भी कहीं ज़्यादा बुरा आलोचना के साथ किया है । बहरहाल अब जो है सो है । इसी में जीना और मरना है ।

बहुतेरे गीतकारों , कवियों का हाथ गद्य में अमूमन मैं ने बहुत तंग पाया है । लेकिन देवेंद्र की किताबों की भूमिकाएं पढ़िए । उन का फुटकर गद्य पढ़िए । उन का गद्य भी उन की रचनाओं की तरह आग से भरा हुआ है । लगभग सभी किताबों की भूमिकाएं बहस-तलब और तार्किक हैं । खौलते हुए सवाल लिए यह भूमिकाएं बहुत सारे विमर्श की राह खोलती हैं । रचनात्मक पीड़ा और रचनात्मक जद्दोजहद की पगडंडी पर खड़ी यह भूमिकाएं लेकिन लोग पी गए । कहीं से कोई सदा न आई वाली बात हो गई । यह दर्द मैं उन का समझ सकता हूं । उन के ही एक गीत में जो कहूं तो :

कितना पीड़ा दायक होता है 
सुर में रह कर बेसुर होना । 
जैसे गऊ माता के तलवे और 
आदमी का  खुर होना । 
सुर में रहने की अभिलाषा 
लय में रहने का अनुशासन । 
देशभक्ति की बात तो तब है 
जब रहने दे हमें प्रशासन । 
काम पड़े तो आ तू तू तू S S
गरज़ मिटे तो दुर दुर होना ! 


मैं ने बहुत सारे शहरों और जगहों पर लिखी गज़लें, कविताएं पढ़ी और सुनी हैं । लेकिन  ' कितना कष्टसाध्य होता है / दिल्ली में गोरखपुर होना !' लिखने वाले देवेंद्र आर्य ने जिस शिद्द्त और मुहब्बत से हमारे शहर गोरखपुर पर ग़ज़ल लिखी है और क्या झूम कर लिखी है और उस को  वहां की ही तरह गोरखपूर से नवाज़ा है , पहले तो कभी किसी ने नहीं नवाज़ा  , आगे भी खैर कोई क्या नवाज़ेगा  ! यह अपने शहर से इश्क की इंतिहा भी है । हां , इतना इश्क नज़ीर बनारसी को करते पाया है मैं ने लेकिन वह भी गंगा से । लिखने को तो कभी 1967 में पालकी फ़िल्म  के लिए हमारे इस शहर जहां कि तीन दशक से अब हम खुद रहते हैं इस लखनऊ के लिए शकील बदायूनी  ने भी लिखा है और मुहम्मद रफ़ी ने नौशाद के संगीत में गाया है , ' ऐ शहरे लखनऊ ! तुझे मेरा सलाम है / तेरा ही नाम दूसरा जन्नत का नाम है !'  लेकिन लखनऊ शहर शकील बदायूनी का अपना शहर नहीं है । हां , नौशाद के बहनोई हैं वह तो उन की ससुराल ज़रूर है । यह गीत भी सुंदर है, बहुत दिलकश है और रुमानियत से भरा हुआ भी । पर वह नाज़ नहीं है इस गीत में जो अपने शहर का किसी को होता है। पर अपने शहर पर इतना नाज़ किसी और को क्या होगा जितना देवेंद्र को अपने गोरखपूर पर है ! यह नाज़ और यह अंदाज़ ख़ुदा सब को दे । बताइए भला कि किसी शहर का मुख्य बाज़ार क्या उस की मांग का सिंदूर भी हो सकता है ? देवेंद्र आर्य ने गोरखपूर शहर की मांग और उस का सिंदूर भी देखा है गोलघर में । अपने शहर और शहर से जुड़े रहने की सक्रियता और  उस की अस्मिता का बेमिसाल नमूना है यह ग़ज़ल ।

दिलों की घाटियों में बज रहे संतूर जैसा हो ।
हो कोई शहर गर तो मेरे गोरखपूर जैसा हो ।

इधर कुसमी का जंगल हो, उधर हो राप्ती बहती,
शहर की मांग में इक गोलघर सिंदूर जैसा हो ।

कबीरा की तरह ज़िद्दी, तथागत की तरह त्यागी,
वतन के नाम बिस्मिल की तरह मगरूर जैसा हो ।

यहीं के चौरीचौरा कांड ने गांधी को बदला था,
भले यह इस समय अपने समय से दूर जैसा हो ।

बहुत मशहूर है दुनिया में गोरखपुर का गीता प्रेस,
नहीं दिखता जहां  कुछ भी कि जो मशहूर जैसा हो ।

हुए मजनूं , फ़िराक़ और विज्ञ, राही, हिंदी , बंगाली,
शहर में एक परमानंद  कोहेनूर जैसा हो ।

ये है पोद्दार, शिब्बनलाल, राघवदास की धरती,
यहां  का आदमी फिर किस लिए मज़बूर जैसा हो ?

है दस्तावेज़, रचना, भंगिमा, जनस्वर, रियाजुल का,
कहां  मुमकिन  है कोई शहर गोरखपूर जैसा हो ?

हो गोरखनाथ का मंदिर तो एक ईमामबाड़ा भी,
उजाला घर से बेहतर दिल में हो और नूर जैसा हो ।

इबादत इल्म की, इंसानियत की, भाईचारे की,
हमारा रूठना भी प्यार के दस्तूर जैसा हो ।

यही दिल से दुआ करता हूं मैं, तुम को मेरे भाई,
तुम्हारा शहर मेरे शहर गोरखपूर जैसा हो ।


 [ राष्ट्रीय पुस्तक मेला , लखनऊ में 20 सितंबर, 2014 को मोती मानुष चून के लोकार्पण पर पढ़ा गया  ]



Friday, 12 September 2014

और कई दिन तक मुनमुन मेरे दिल- दिमाग में चहलक़दमी करती रही

 दिव्या शुक्ला

आप लोग चाहते हैं कि मैं जियूं और अपने पंख काट लूं । ताकि अपने खाने के लिए उड़ कर दाने भी न ले सकूं।   मैं  पति छोड़ दूंगी पर नौकरी नहीं ! तल्खी भरे यह सख़्त  वाक्य --अपने स्वार्थी भाइयों को दो टूक जवाब एक करार तमाचा सा था । मुनमुन के पास स्वाभिमान से जीने का यही तो एक हथियार था । और साथ ही गांव , कस्बों और शहरों में भी दोहरा जीवन जीती उन हज़ारों औरतों के लिए संदेश भी ---और फिर मां  के टोकने पर - बेटी सुहाग के यह चिन्ह मत छोड़ो । चलो पहनो चूड़ी।  सिंदूर लगाओ । बोल पड़ी मुनमुन मन का दबा ज्वार फूट पड़ा --जिस चूड़ी सिंदूर की न तो छत है न छांव , न सुरक्षा उसे लगा कर भी क्या करना --अगर यह सुहाग चिन्ह है तो जो पुरुष अपना न हो वो कैसा सुहाग ? उस के चिन्ह क्यों धारण करना -जो हमारे लायक़ नहीं उसे झटक फेंक देना ही उचित --क्यों ढोना उसे ? जिस चुटकी भर सिंदूर ने उस की दुनिया ही नर्क कर दी उसे तिलांजलि देना ही उचित ।

मुनमुन की पहचान पहले बांसगांव के नामी वकील की बेटी फिर उच्च पदों पर आसीन भाइयों की बहन के रूप में सम्मानित बहन बेटी की । फिर जल्दी  ही लोगों की निगाहों में ललक भी झलकी परंतु शीघ्र ही वह एक सताई हुई औरत हो गई । लोगों की आंखों में दया करुणा या अकसर उपेक्षा झलकने लगी । पर समाज और परिवार की सताई औरतें मुनमुन में अपनी मुक्ति भी तलाशने लगी उस से सलाह लेती वह इन सब का आदर्श बन गई और अपना रास्ता अपनी मंजिल खुद तलाशी और अपना मुकाम हासिल किया। अपने संघर्ष के बारे वह यही कहती है कि सब कुछ बदलता है कुछ भी स्थाई नहीं न सुख न दुःख न समय। मुनमुन की यह कहानी समाज में संयुक्त परिवार के विघटन और उनमे पनपते स्वार्थो का उदाहरण है । बेटियां मां बाप का सुख दुःख अपने कलेजे में ले कर जीती  हैं । वहीं अधिकांश बेटे सफल होते ही उपेक्षित कर देते है अपने माता पिता को । 

दयानंद पांडेय जी का यह उपन्यास गांव कस्बों की तसवीर आईने की तरह सामने लाता है बांसगांव की मुनमुन के रूप में। परिवारों में आगे निकलने की होड़ कितना पतित बना देती है --संयुक्त परिवार का विघटन , पैसा कमाने की होड़ में जहां आगे बढ़ते गए पीछे अपने रिश्तों को दफ़न करते गए । लाचार बेबस माता पिता भले ही दवा और दाने को तरसे परंतु बेटे के ऊंचे  पद की चर्चा मात्र से आंखें गर्व से चमक जाती हैं । वहीं बुढ़ौती  में पुत्रों पर आर्थिक रूप से निर्भर पिता कितना लाचार होता है। यह उपन्यास पढ़ते हुए मानो कितने मुनक्का राय हमारे इर्द-गिर्द नज़र आने लगते हैं । तो क्या सफलता स्वार्थ भी साथ ले कर आती है? 

कभी-कभी अभाव खून का रंग सफ़ेद कर देता है । जिस बहन को बचपन में नन्ही परी चांदनी के रथ पर सवार/ गुनगुनाते हुए झुलाते थे उसे जीवन की उबड खाबड़ राहों में धकेल दिया। विवाह का बोझ उतार कर विदा किया और निशचिंत हुए।अपनी लड़ाई लड़ना, अपने घाव से टपकते रक्त को अपनी जिह्वा से चाटना कितना पीड़ादायक है यह वह स्त्री ही जानती है । तब जन्म लेती है एक दूसरी स्त्री जो अपने प्रति किए  सारे अपराधों  का दंड स्वयं तय करती है। यह उस की अपनी अदालत, अपना मुक़दमा और हाक़िम वही । कटघरे में है कुछ रक्त से जुड़े नाते तो कुछ समाज द्वारा तय किये गए जन्मांतर के नाते, जो कांटे की तरह चुभने लगे ! यह एक नया रूप था पति परमेश्वर की महिमामंडित छवि की खंडित करती नकारती नारी का, जिसे पुरुष समाज पचा नहीं पा रहा था। पर सफलता के आगे सदैव स्वार्थ झुकता है।  

समाज ने अंतत स्वीकार किया । पर नायिका का तो प्रेम और रिश्ते नातों से विश्वास उठ गया । लेखक ने इसे बड़ी बखूबी से दर्शाया है । ऐसा लगता है पात्रों के मस्तिष्क में चल रही हलचल भी पाठकों तक पहुंच रही है । यही सफलता होती है एक अच्छे लेखक की। जातिवाद भी है।  राजनीति  के पहलुओं को भी छुआ है। कुल मिला कर गांव कस्बों के जीवन और एक स्त्री के संघर्ष पर आधारित यह पुस्तक पठनीय है । यह उपन्यास इतना रोचक है कि इसे मात्र तीन दिन में पढ़ा । और कई दिन तक मुनमुन मेरे दिल-दिमाग में चहलक़दमी करती रही। 

[ दिव्या शुक्ला अपनी फेसबुक वाल पर ]




समीक्ष्य पुस्तक :


बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012