Sunday, 17 November 2019

मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सम्मान दे कर विदा हुए जस्टिस रंजन गोगोई


होते हैं कुछ लोग जो अपनी पहचान सिर्फ ईमानदार और काबिल व्यक्ति के तौर पर ही रखना चाहते हैं। बाक़ी कुछ नहीं। आज रिटायर हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को भी मैं समझता हूं लोग ईमानदार और क़ाबिल शख्स के रूप में याद रखना चाहेंगे। कम से कम उन का न्यायिक इतिहास इस बात का साक्षी है। एक नहीं अनेक किस्से हैं , फ़ैसले हैं जस्टिस रंजन गोगोई की इस यात्रा के पड़ाव में। अभी अगर तुरंत-तुरंत कोई मुझ से किन्हीं दो जस्टिस का नाम पूछे इस बाबत तो मैं धड़ से दो जस्टिस लोगों का नाम ले लूंगा। ईमानदार और काबिल। एक जस्टिस जगमोहन लाल सिनहा का दूसरे जस्टिस रंजन गोगोई का। जस्टिस जगमोहन लाल सिनहा ने भी न्यायिक इतिहास में अपने एक फैसले से अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में  दर्ज करवाया था। तब की सर्वशक्तिमान इंदिरा गांधी को चुनाव में अयोग्य ठहरा कर भारत की राजनीति और उस की दिशा बदल दी थी। भारतीय न्यायिक इतिहास में ऐसा फ़ैसला न भूतो , न भविष्यति। तब जब कि सारी सरकारी और न्यायिक मशीनरी का उन पर बेतरह दबाव था। ढेरो प्रलोभन थे। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बना देने तक का प्रलोभन। लेकिन जस्टिस सिनहा नहीं झुके तो नहीं झुके। जस्टिस सिनहा ही क्यों उन के निजी सचिव मन्ना लाल तक पर दबाव था। मन्ना लाल भी किसी दबाव में नहीं आए। 

पर यहां अभी हम जस्टिस रंजन गोगोई की बात कर रहे हैं। पहली बार जस्टिस रंजन गोगोई का नाम मैं ने तब सुना जब उन्हों ने बड़बोले रिटायर्ड जज मार्कण्डेय काटजू को अवमानना नोटिस जारी कर दिया। यह 2016 की बात है। जब जस्टिस काटजू सुप्रीम कोर्ट में न सिर्फ़ पेश हुए बल्कि अपनी फेसबुक पोस्ट के लिए बिना शर्त माफ़ी मांगी। कोलकाता हाईकोर्ट के बिगड़ैल जस्टिस सी एस कर्णन को भी जेल भेजने वाली बेंच में जस्टिस गोगोई की उपस्थिति थी। जो जस्टिस अपने जस्टिस लोगों के साथ भी न्यायिक प्रक्रिया में कोई रियायत न बरते वह जस्टिस रंजन गोगोई अब जब रिटायर हो गए हैं तब वह मुझे न सिर्फ अपनी न्यायिक सक्रियता के लिए याद आ रहे हैं , बल्कि न्यायिक पवित्रता को भी बचाने के लिए याद आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के 25 न्यायाधीशों में से जिन 11 न्याययधीशों ने वेबसाइट पर अपनी संपत्ति का सार्वजनिक विवरण पेश किया , रंजन गोगोई भी उन में से एक हैं। रंजन गोगोई के खाते में कई सारे न्यायिक कार्य हैं जो उन्हें न्यायिक इतिहास में सूर्य की तरह उपस्थित रखेंगे। आसाम में एन आर सी की राह सुगम बनाने में जस्टिस रंजन गोगोई को हम कैसे भूल पाएंगे। ठीक वैसे ही राफेल विवाद में भी गोगोई का नजरिया बिलकुल साफ़ रहा। राफेल की राह भी आसान की और सरकार को क्लीन चिट भी दी। सुप्रीम कोर्ट को भी आर टी आई के दायरे में रखने का आदेश जस्टिस गोगोई ने ही दिया। प्रेस कांफ्रेंस के लिए भी उन्हें कौन भूल सकता है। 

जस्टिस रंजन गोगोई ने लेकिन जो एक सब से बड़ा काम किया वह है अयोध्या में राम जन्म-भूमि मुकदमे का सम्मानजनक और खूबसूरत फैसला। सदियों पुराना विवाद एक झटके में 40 दिन की निरंतर सुनवाई के बाद निर्णय सुनाना आसान काम तो नहीं ही था। लेकिन वह जो कहते हैं न कि न्याय हो और होता हुआ दिखाई भी दे। राम मंदिर के फैसले में यही हुआ। ऐसा फैसला दिया जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली बेंच ने जिस का स्वागत लगभग पूरे देश ने किया। कुछ लोग पुनर्विचार याचिका की बात भी कर रहे हैं , यह उन का कानूनी और संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जस्टिस गोगोई की बेंच ने ऐसा खूबसूरत फैसला एकमत से दिया है कि अब इस में कोई भी अदालत कुछ इधर-उधर नहीं कर सकती। सो सदियों पुराने इस विवाद का यह फैसला लोग सदियों याद रखेंगे। यह फैसला दुनिया के लिए एक नज़ीर बन चुका है। 

तमाम जगहों की तरह सुप्रीम कोर्ट भी काजल की कोठरी है। तो इस काजल की कोठरी में रंजन गोगोई को भी घेरा गया। एक महिला के मार्फत गोगोई पर यौन शोषण का आरोप लगा कर घेरा गया। लेकिन गोगोई बेदाग निकले। माना गया कि गोगोई राम मंदिर का मसला नहीं सुन सकें , इस लिए यौन शोषण का यह व्यूह रचा गया। ठीक वैसे ही जैसे कभी चीफ जस्टिस रहे दीपक मिश्रा पर महाभियोग का दांव संसद में चला गया था। सो दीपक मिश्रा चुपचाप इस मंदिर मामले को ठंडे बस्ते में डाल कर किनारे हो गए। लेकिन गोगोई हार कर किनारे नहीं हुए। डट कर मुकाबला किया। और तय मानिए मिस्टर गोगोई अगर किसी बहाने आप भी इस फैसले से चूक गए होते तो जनता-जनार्दन का न्यायपालिका नाम की संस्था से यकीन उठ गया होता। और स्थितियां इतनी बिगड़ गई थीं कि अब न्यायपालिका की राह भूल कर इस राम मंदिर के लिए लोग संसद की राह देख रहे थे। कि अब संसद में क़ानून बना कर राम मंदिर निर्माण की बात हो जाए। लोगों का धैर्य जवाब दे रहा था। न्यायपालिका से लोग अपनी उम्मीद तोड़ चुके थे। लेकिन यह रास्ता शायद निरापद न होता। सो आप ने राम की , लोक की मर्यादा तो रख ही ली , न्यायपालिका की खोती हुई मर्यादा भी संभाल ली है रंजन गोगोई । न्यायपालिका का बुझता हुआ दीप भी बचा लिया है। इस एक स्वर्णिम फैसले से। 

ज़िक्र ज़रूरी है कि जस्टिस रंजन गोगोई आसाम के उस राज परिवार से आते हैं जिसे अहम राजपरिवार कहा जाता है। माना जाता है कि आसाम में जितने भी छोटे-बड़े मंदिर हैं , इसी राज परिवार ने बनवाए हैं। और अब इस परिवार के खाते में अयोध्या का राम मंदिर बनवाने का श्रेय भी आ जुड़ा है। यह एक विरल संयोग है। 

संयोग ही है कि रंजन गोगोई दो भाई हैं। इन के पिता केशव गोगोई जो आसाम के मुख्य मंत्री भी रहे हैं , चाहते थे कि कोई एक बेटा सैनिक स्कूल में पढ़ने जाए। यह तय करने के लिए कौन जाए , टॉस किया गया। टॉस में बड़े भाई अंजन गोगोई को सैनिक स्कूल जाने की बात आई। वह गए भी। और एयर मार्शल बने। संयोग ही है कि रंजन गोगोई गौहाटी , पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट होते हुए सुप्रीम कोर्ट आए। चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया हुए। और बतौर चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया राम जन्म-भूमि मामले की सुनवाई की बेंच बनाई और इस की अध्यक्षता करते हुए एक स्वर्णिम फैसला लिख कर अपना नाम न्यायिक इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने का सौभाग्य भी पाया। और देखिए न कि आज रिटायर होते ही वह सपत्नीक तिरुपति मंदिर पहुंच गए। सचमुच मिस्टर जस्टिस रंजन गोगोई , भारतीय न्यायिक इतिहास में इस फैसले के लिए लोग सदियों तक आप को सर्वदा-सर्वदा याद करेंगे। इस लिए भी कि न सिर्फ आप ने सदियों पुराना विवाद चुटकी भर में सुलटा दिया बल्कि आप ने सही मायने में संपूर्ण न्याय किया। बिना किसी पक्षपात के। तो क्या वह टॉस इसी के निमित्त हुआ था। इस शानदार फैसले के निमित्त। 

मजाक भले चल रहा है कि एक भगवान का न्याय , इंसान कर रहा है। पर सच यही है। कि इस कलयुग में भगवान को भी न्याय इंसान से मिला है। यह हमारा अंतर्विरोध है। दुर्भाग्य भी। लेकिन न्याय तो न्याय ही होता है। इतना कि आप के इस शानदार फैसले से लोग वह मुहावरा भी भूल चले हैं कि देर से मिला न्याय भी अन्याय होता है। यह सब भूल कर लोग न्याय महसूस कर रहे हैं। सदियों बाद ऐसा क्षण आया है। ऐसा न्याय आया है। सचमुच में राम राज्य वाला न्याय , राम को भी मिला है। बहुत आभार जस्टिस रंजन गोगोई , बहुत आभार। पूरा देश आप का ऋणी है। समूची मनुष्यता आप की ऋणी है। कि आप ने ऐसा फैसला दिया है कि जिसे बिना किसी मार-काट के लोगों ने स्वीकार लिया है। अब अलग बात है कि इस मार-काट न होने के पीछे नरेंद्र मोदी के शासन का संयोग भी है। फिर भी इस के लिए असल बधाई के पात्र सिर्फ़ और सिर्फ आप हैं जस्टिस रंजन गोगोई। कभी राम ने एक पत्थर को छू कर अहिल्या को फिर से जीवन दे दिया था। श्राप से मुक्त कर दिया था। आप ने यह फैसला दे कर राम को सम्मान दे दिया है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का सम्मान। लोहिया ने लिखा है , राम,कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। तो यह एक टूटा हुआ स्वप्न भी पूरा किया। 

तिरुपति मंदिर में रंजन गोगोई 


Friday, 8 November 2019

देह का गणित सपाट सही , वंदना गुप्ता रिस्क ज़ोन में गई तो हैं

दयानंद पांडेय

वंदना गुप्ता की कहानी देह का गणित पर अगर कोई यह आरोप लगा दे कि कहानी बहुत कमज़ोर है। बहुत उथली और इकहरी है। वंदना गुप्ता को कहानी लिखनी नहीं आती। अखबारों , पत्रिकाओं में छपने वाले सेक्स समस्याओं के समाधान से भी खराब ट्रीटमेंट है। आदि-इत्यादि। तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। अगर कोई यह आरोप भी लगाता है कि संपादक ने इस देह का गणित कहानी को छापने में संपादकीय कौशल का परिचय नहीं दिया है। तो यह आरोप भी मैं सुन सकता हूं। लेकिन जो भी कोई लोग इस देह का गणित कहानी को अश्लील होने का फतवा जारी कर रहे हैं , मैं उन से पूरी तरह असहमत हूं। उन के इस आरोप को फौरन से फौरन ख़ारिज करता हूं। यह आरोप ही अपने आप में अश्लील है। क्यों कि साहित्य में कुछ भी अश्लील नहीं होता। 

मैं कहना चाहता हूं कि अश्लीलता देखनी हो तो अपने चैनलों और अखबारों से शुरू कीजिए। जहां पचासों लोगों को बिना नोटिस दिए मंदी के नाम पर नौकरी से निकाल दिया जाता है। पूंजीपति जैसे चाह रहे हैं आप को लूट रहे हैं। हर जगह एम आर पी है लेकिन किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य। आखिर क्यों ? कार के दाम घट रहे हैं, ट्रैक्टर महंगे हो रहे हैं। मोबाइल सस्ता हो रहा और खाद-बीज मंहगे हो रहे हैं। एक प्रधानमंत्री जब पहली बार शपथ लेता है तो भूसा आंटे के दाम में बिकने लगता है। वही जब दूसरी बार शपथ लेता है तो दाल काजू-बादाम के भाव बिकने लगती है।

तो मित्रों अश्लीलता यहां है, देह का गणित में नहीं। अगर हमारा जीवन ही अश्लील हो गया हो तो समाज का दर्पण कहे जाने वाले साहित्य में आप देखेंगे क्या ? स्वर्ग ?

हमारे विक्टोरियन मानसिकता वाले समाज में लोग लेडी चैटरलीज़ लवर को नंगी अश्लीलता ही समझते रहे हैं। पर आम जीवन का यौन व्यवहार कितना गोपनीय अश्लील है यह कोई दिखाता ही नहीं। लोहिया  ने किसी पुस्तक में सेठानियोँ और रसोइए महाराजों का ज़िक्र किया है , वह अश्लील नहीं है। दशकों पहले हमारे समाज में रईसोँ के रागरंग बड़ी आसानी से स्वीकार किए जाते थे, समलैंगिकता जीवन का अविभाज्य और खुला अंग थी। उर्दू में तो शायरी भी होती थी— उसी अत्तार के लौंडे से दवा लेते हैं जिस ने दर्द दिया है। पठानों के समलैंगिक व्यवहार के किस्से जोक्स की तरह सुनाए जाते थे।  लिखित साहित्य अब पूरी तरह विक्टोरियन हो गया है, पर मौखिक साहि्त्य… वाह क्या बात है।

इटली की ब्रौकिया टेल्स जैसे या तोता मैना, अलिफ़लैला, कथासागर जैसे किस्से खुले आम सुन सुनाए जाते थे। हम में से कई ने ऐसे चुटकुले सुने और सुनाए होंगे। उन की उम्र होती है। पीढ़ी दर पीढ़ी वही किस्से दोहराए जाते हैं। सोशल मीडिया की एक बड़ी खासियत है ,वो खबर हो चाहें खबरों से परे कोई बात ,उसे अपने तरीके से देखना चाहती है ,वो उसे उस ढंग से स्वीकार नहीं कर पाती, जैसी वो मूलतः है । वर्तमान समय में सेक्स से जुडी वर्जनाओं के टूटने की सब से बड़ी वजह सोशल मीडिया खुद है। 

निहायत शरीफ़ लोग अगर इस तरह के नंगे यथार्थ को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो ज़ाहिर है कि यह दुनिया उन के लिए नहीं है। हाल के महीनों में जो खबरें सामने आई हैं, उस से मैं यह भी नहीं कह सकता कि आशाराम बापू जैसे संतों के आश्रम भी उन के लिए सब से महफूज़ जगह है।

साहित्य में अश्लीलता पर बहस बहुत पुरानी है। यह तय करना बेहद मुश्किल है कि क्या अश्लील है और क्या श्लील। एक समाज में जो चीज़ अश्लील समझी जाती, वह दूसरे समाज में एकदम शालीन कही जा सकती है। यह जो वाट्स आप पर नान वेज़ जोक्स का ज़खीरा है, होम सेक्स वीडियो है , उस से कौन अपरिचित है भला?  भाई जो इतने शरीफ़ और नादान हैं तो मुझे फिर माफ़ करें। 

ऐसे तो हमारे लोकगीतों और लोक परंपराओं में कई जगह गज़ब की अश्लीलता है। मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखता हूं। हमारे यहां शादी व्याह में आंगन में आई बारात को भोजन के समय दरवाज़े के पीछे से छुप कर घूंघट में महिलाएं लोक गीतों के माध्यम से जैसी गालियां गाती हैं उसे यह लोग घोर अश्लील कह सकते हैं।  लेकिन समाज इस में रस लेता है और इसे स्वीकृति देता है। पर मेट्रो के दर्शकों को यह कार्यक्रम अश्लील लग सकता है। फ़र्क सिर्फ़ हमारे सामाजिक परिवेश का है।

एक मुहावरा हमारे यहां खूब चलता है–का वर्षा जब कृषि सुखाने ! वास्तव में यह तुलसीदास रचित रामचरित मानस की एक चौपाई का अंश है। एक वाटिका में राम और लक्ष्मण घूम रहे हैं। उधर सीता भी अपनी सखियों के साथ उसी वाटिका में घूम रही हैं, खूब बन-ठन कर। वह चाहती हैं कि राम उन के रूप को देखें और सराहें। वह इस के लिए आकुल और लगभग व्याकुल हैं। पर राम हैं कि देख ही नहीं रहे हैं। सीता की तमाम चेष्टा के बावजूद। वह इस की शिकायत और रोना अपनी सखियों से करती भी हैं, आजिज आ कर। तो सखियां समझाती हुई कहती हैं कि अब तो राम तुम्हारे हैं ही जीवन भर के लिए। जीवन भर देखेंगे ही, इस में इतना परेशान होने की क्या ज़रूरत है? तो सीता सखियों से अपनी भड़ास निकालती हुई कहती हैं—का वर्षा जब कृषि सुखाने !

यह तब है जब तुलसी के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। और फिर मानस में श्रृंगार के एक से एक वर्णन हैं। केशव, बिहारी आदि की तो बात ही और है। वाणभट्ट की कादंबरी में कटि प्रदेश का जैसा वर्णन है कि पूछिए मत। भवभूति के यहां भी एक से एक वर्णन हैं। हिंदुस्तान में शिवलिंग आदि काल से उपासना गृहों में पूजनीय स्थान रखता है। श्रद्धालु महिलाएं शिवलिंग को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर अपना माथा उस से स्पर्श कराती हैं। यही शिवलिंग पश्चिमी समाज के लोगों के लिए अश्लीलता का प्रतीक है।

कालिदास ने शिव-पार्वती की रति क्रीड़ा का विस्तृत, सजीव और सुंदर वर्णन किया है। कालिदास ने शंकर की तपस्या में लीन पार्वती का वर्णन किया है। वह लिखते हैं—- पार्वती शिव जी की तपस्या में लीन हैं। कि अचानक ओस की एक बूंद उन के सिर पर आ कर गिर जाती है। लेकिन उन के केश इतने कोमल हैं कि ओस की बूंद छटक कर उन के कपोल पर आ गिरती है। कपोल भी इतने सुकोमल हैं कि ओस की बूंद छटक कर उन के स्तन पर गिर जाती है। और स्तन इतने कठोर हैं कि ओस की बूंद टूट कर बिखर जाती है, धराशाई हो जाती है। कालिदास के लेखन को उन के समय में भी अश्लील कहा गया। प्राचीन संस्कृत साहित्य से ले कर मध्ययुगीन काव्य परंपरा है। डीएच लारेंस के ‘लेडीज़ चैटरलीज़ लवर’ पर अश्लीलता के लंबे मुकदमे चले। अदालत ने भी इस उपन्यास को अश्लील माना लेकिन अदालत ने यह भी कहा कि साहित्य में ऐसे गुनाह माफ़ हैं। ब्लादिमीर नाबकोव की विश्व विख्यात कृति ‘लोलिता’ पर भी मुकदमा चला। लेकिन दुनिया भर के सुधि पाठकों ने उन्हें भी माफ़ कर दिया। आधुनिक भारतीय लेखकों में खुशवंत सिंह, अरूंधति राय, पंकज मिश्रा, राजकमल झा हिंदी में डा. द्वारका प्रसाद, मनोहर श्याम जोशी, कृश्न बलदेव वैद्य उर्दू में मंटो, इस्मत चुगताई आदि की लंबी फ़ेहरिश्त है। 

साहित्यिक अश्लीलता से बचने का सब से बेहतर उपाय यह हो सकता है कि उसे न पढ़ा जाए। यह एक तरह की ऐसी सेंसरशिप है जो पाठक को अपने उपर खुद लगानी होती है। उस की आंखों के सामने ब्लू फ़िल्मों के कुछ उत्तेजक दृश्यों के टुकडे़ होते हैं, जवानी के दिनों की कुछ संचित कुंठाएं होती हैं। 

द्वारिका प्रसाद के उपन्यास घेरे के बाहर में सगे भाई, बहन में देह के रिश्ते बन जाते हैं। उपन्यास बैन हो जाता है। अनैतिक है यह। लेकिन क्या ऐसे संबंध हमारे समाज में हैं नहीं क्या। मैं लखनऊ में रहता हूं। एक पिता ने अपनी सात बेटियों को अपने साथ सालों सुलाता रहा। बेटियों को घर से बाहर नहीं जाने देता था। किसी से मिलने नहीं देता था। बेटियों से बच्चे भी पैदा किए। अंतत: घड़ा फूटा पाप का। वह व्यक्ति अब जेल में है। ऐसे अनगिन किस्से हैं हमारे समाज में। हर शहर , गांव और कस्बे में। गोरखपुर में तो हमारे मुहल्ले में एक ऐसा किस्सा सामने आया कि एक टीन एज लड़का , पड़ोस की दादी की उम्र से जब तब बलात्कार करता रहा। वृद्ध औरत जैसे-तैसे बर्दाश्त करती रही। लेकिन किसी से कुछ कहा नहीं। जब भेद खुला तो लड़का शहर छोड़ कर भाग गया। तो इन घटनाओं को ले कर कहानी लिख दी जाए तो वह अश्लील कैसे हो जाती है भला ? बहुत से ऐसे मामले हैं मेरे सामने गांव से ले कर शहरों तक के हैं कि पिता और बेटी के संबंध हैं। बहू और ससुर के संबंध हैं। राजनीतिक हलके में तो कुछ ऐसे संबंध सब की जुबान पर रहे हैं। कुछ बड़े नाम लिख रहा हूं। कमलापति त्रिपाठी , उमाशंकर दीक्षित , देवीलाल आदि। हमारे पूर्वांचल में ऐसे संबंधों को कोड वर्ड में पी सी एस कहा जाता रहा है। प्रमोद महाजन की हत्या उन के भाई ने क्यों की थी , याद कीजिए। नेहरू , मोरारजी देसाई , तारकेश्वरी सिनहा , इंदिरा गांधी , फिरोज गांधी आदि के अनगिन और अनन्य किस्से कौन नहीं जानता। 

जब दिल्ली में मैं रहता था तब घर के सामने ही सड़क उस पार एक परिवार में चाचा , भतीजी खुल्ल्मखुल्ला संबंध में रहते थे। पूरी कालोनी को पता था। जैनेंद्र कुमार की सुनीता एक एकांत स्थान पर एक पुरुष चरित्र के सामने अचानक निर्वस्त्र हो जाती है ताकि उस का क्रांतिकारी जाग जाए और अपना काम करे। यह कहती हुई कि इसी के लिए तो तुम यहां अपना काम छोड़ कर रुके हुए हो। वह हकबका जाता है। यह शॉक्ड था , उस के लिए। तो क्या जैनेंद्र कुमार की सुनीता  अश्लील हो गई ? अज्ञेय की पहली पत्नी ने तलाक लेने के लिए मेरठ की एक अदालत में अज्ञेय पर  नपुंसक होने का आरोप लगाया था। जिसे अज्ञेय ने चुपचाप स्वीकार कर लिया था। तलाक हो गया था। लेकिन नदी के द्वीप पढ़ने वाले जान सकते हैं कि नपुंसक व्यक्ति उन दृश्यों को , उन प्रसंगों को नहीं लिख सकता था। तो अज्ञेय का नदी का द्वीप अश्लील है ?

मृदुला गर्ग का चितकोबरा जब छप कर आया तो तहलका मच गया। हमारे जैसे लोगों ने उसे छुप-छुपा कर पढ़ा। गोया कोई चोरी कर रहे हों। विद्यार्थी थे ही। चितकोबरा को बाकायदा अश्लील घोषित कर दिया गया। जैनेंद्र कुमार तब सामने आए। कहा कि मृदुला गर्ग की यातना को समझिए। कहा कि यह उपन्यास अश्लील नहीं है। हालां कि सारा चितकोबरा सिर्फ़ चार-छ पन्नों के लिए ही पढ़ा गया। वह भी इस लिए कि तब ब्लू फ़िल्में बाज़ार में आम जन के लिए उपलब्ध नहीं थीं। अगर होतीं तो चितकोबरा की लोग नोटिस भी नहीं लिए होते। इस लिए कि चितकोबरा में जो भी देह दृश्य , जो भी कल्पना थी , ब्लू फिल्मों से ही प्रेरित थीं। काश कि उस के दो मुंह होते , काश कि उस के वह दो होते , यह दो होते , चार होते। आदि-इत्यादि। जल्दी ही ब्लू फिल्म आम हुई और चितकोबरा का जादू गायब हो गया। सारी सनसनी सो गई। मृदुला गर्ग का कठगुलाब भी ऐसे ही आया और चटखारे ले कर चला गया। चित्रा मुद्गल , रमणिका गुप्ता , मैत्रेयी पुष्पा आदि की एक खेप आ गई अश्लीलता के आरोप का वसन पहने। कृष्ण बलदेव वैद , मनोहर श्याम जोशी आदि भी इधर बैटिंग में थे। वर्ष 2000 में मेरे उपन्यास अपने-अपने युद्ध पर भी भाई लोगों ने अश्लीलता का आरोप लगाया। लेकिन मैं तो नहीं डिगा। न इस आरोप को कभी स्वीकार किया। लंबे समय तक विवाद और विमर्श का सिलसिला जारी रहा। अभी भी जारी है। जल्दी ही मेरे उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं पर भी यह आरोप दर्ज हुआ। मेरी कुछ कहानियों , कविताओं को भी अश्लील कहा गया। सो अश्लीलता के इस बेहूदा आरोप की यातना से खूब वाकिफ हूं। अश्लीलता का बखेड़ा सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बीमारी है। और कुछ नहीं। अगर मां , बेटे के संबंध जैसे भी घटित हो गए हैं देह का गणित में तो वह कृत्य घृणित है , कहानी नहीं। वंदना गुप्ता को बधाई दीजिए कि इस घृणित कृत्य को वह अपनी कहानी देह का गणित का कथ्य बनाने की वह हिम्मत कर सकीं। कहा ही जाता है कि औरत और मर्द का रिश्ता आग और फूस का रिश्ता होता है। आग लगती है तो लगती है। लगती ही जाती है। वर्जनाएं , शुचिता , नैतिकता , मर्यादा आदि का चलन इसी लिए बनाया गया है। जैसे मृदुला गर्ग की चितकोबरा में चार, छ पन्ने ही उस का प्राण थे , वंदना गुप्ता की देह की गणित में भी सौ , डेढ़ सौ शब्द ही हैं जिन के लिए लोग इस कहानी का नाम ले रहे हैं। चितकोबरा और देह का गणित में एक फर्क यह भी है कि चितकोबरा के वह पन्ने बार-बार हम ने पढ़े , रस लेने के लिए। लेकिन देह का गणित फिर दुबारा पढ़ने का मन नहीं हुआ। इस लिए भी कि वंदना गुप्ता ने इस में सेक्स का रस नहीं घोला है। सिर्फ घृणित कृत्य की सीवन उधेड़ी है। देह की गणित की मां अगर मदर इंडिया की नरगिस के चरित्र की तरह बेटे को गोली मार देती तो यह चरित्र बहुत बड़ा बन सकता था। पुलिस में रिपोर्ट कर जो जेल भेज देती बेटे को तब भी यह चरित्र निखर जाता। लेकिन फ़िल्मी कहानी और जीवन की कहानी में फर्क होता है। यहां देह की गणित की मां चूंकि खुद भी देह सुख में डूब लेती है तो वह ऐसा करती भी तो कैसे भला। कहानी की ईमानदारी और यथार्थ की मांग भी यह सब नहीं थी। मां , बेटे के नैतिक पतन और पाप को , व्यभिचार को यह कहानी सपाट ढंग से ही सही , कह जाती है। बावजूद इस सब के वंदना गुप्ता रिस्क ज़ोन में गई हैं। नहीं ऐसे संबंध हमारे समाज में बहुत पहले से हैं। पर हिंदी पट्टी में पाखंड के व्याकरण के तहत में इस संबंध पर कहानी लिखना पाप है , अपराध है। सो लोग बचते हैं। सोचिए कि ऐसे तो रामायण लिखने वाले बहुतेरे रचनाकारों द्वारा रावण द्वारा सीता के अपहरण की घटना लिखनी ही नहीं चाहिए था। क्यों कि यह अनैतिक था। पाप था। इस से बाल्मीकि , तुलसी दास या अन्य रचनाकारों को भी बचना चाहिए था। महाभारत में भी कंस , धृतराष्ट्र  , शकुनि , दुर्योधन , दुशासन , कुंती , कर्ण , द्रोपदी आदि फिर नहीं होने चाहिए थे। ऐसे ही तमाम निगेटिव करेक्टर नहीं होना चाहिए , किसी भी साहित्य में। क्या तो यह अनैतिक है। अपराध है। आदि-इत्यादि। फिर तो इस बुनियाद पर दुनिया भर का दो तिहाई कथा साहित्य अश्लील हो गया।

अच्छा देह का गणित तो कहानी है। मलयाली लेखिका कमला दास की आत्म कथा माई स्टोरी की याद कीजिए।  हिंदी में भी मेरी कहानी नाम से उपस्थित है। वह तो सच है। जिस में तमाम देह संबंधों के साथ ही वह अपने बेटे के दोस्तों के साथ भी देह सुख बटोरती रहती हैं। तो क्या वह अश्लील है ? तमाम हिंदी लेखिकाओं की कथाएं और उन का जीवन किन-किन किस्सों से नहीं भरा पड़ा है तो क्या वह अश्लील है ? कुछ लेखिकाएं सिर्फ़ इसी लिए ही जानी जाती हैं , अपने लेखन के लिए नहीं। अभी जो यहां इन लेखिकाओं के नाम लिख दूं तो स्त्री विरोधी का फतवा जारी करते हुए सब की सब मुझ पर हड्डों की तरह टूट पड़ेंगी। कुछ लेखिकाओं की आत्मकथा पढ़िए। कैसे तो अपनी साड़ियां खुद उतारती फिरती हैं। क्या-क्या नहीं लिख गई हैं। और जो वह नहीं लिख पाई हैं , क्या वह भी पब्लिक डोमेन में नहीं हैं ? यही हाल तमाम लेखकों का है। शिवरानी देवी की किताब प्रेमचंद घर में यह खुलासा है कि प्रेमचंद के अपने विमाता से निजी संबंध थे। निर्मला उन की ही अपनी कहानी है। रवींद्रनाथ टैगोर के संबंध अपनी सगी भाभी से थे। देवानंद के छोटे भाई और प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक , अभिनेता विजय आनंद ने अपनी सगी भांजी से तमाम विरोध के बावजूद विवाह किया। यह और ऐसे तमाम विवरण हैं। तो क्या यह सब अश्लील है ?

जी नहीं , यह जीवन है। निंदनीय ही सही यह जीवन सर्वदा से ही ऐसे चलता रहा है। पौराणिक कथाओं में भी यह और ऐसे चरित्र बहुतेरे हैं। वर्तमान में भी यह जीवन कहानियों में भी , उपन्यासों में भी , जल में परछाईं की तरह झलकता रहेगा। समय के दर्पण में दीखता रहेगा। साहित्य है ही , समाज का दर्पण। सो फिकर नाट वंदना गुप्ता । देह का गणित होता ही है ऐसा। आग , फूस जैसा। लोग जलते हैं तो जलने दीजिए। हम ने तो लिखने के लिए लोगों के अभद्र और अश्लील आरोप ही नहीं , हाई कोर्ट में कंटेम्प्ट का मुकदमा भी भुगता है , लेकिन सच लिखना नहीं छोड़ा। नहीं छोडूंगा। लोगों का क्या है , लोगों का तो काम ही है कहना। आप अपना काम पूरी निर्भीकता से करती रहिए। हमारे लखनऊ में भगवती चरण वर्मा कहते थे , संसार में अश्लीलता नाम की कोई चीज़ भी है , इस पर मुझे शक है। रही नैतिकता की बात तो मनुष्य का यह अपना निजी दृष्टिकोण है।

[ पाखी , नवंबर , 2018 अंक में प्रकाशित ]

Sunday, 27 October 2019

इस बदलाव की ख़ुशी में दीपावली के दो-चार दिए अधिक जलाइए और मिठाई खाइए , जश्न मनाइए


मुझे याद है जब अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में भारतीय सेना ने आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को मार गिराया था , तब मैं दिल्ली में ही रहता था। जनसत्ता में नौकरी करता था। दिनमान में तब रहे महेश्वर दयालु गंगवार हमारे पड़ोसी थे। उन के घर गया तो भिंडरावाले के मारे जाने की चर्चा करने लगा। ज़रा तेज़ आवाज़ में बोल रहा था। अचानक गंगवार जी ने अपने होठों पर उंगली रखते हुए मुझे चुप रहने का इशारा किया। मुझे समझ में नहीं आया तो धीरे से पूछा कि आखिर बात क्या है। तो भाभी जी ने खुसफुसा कर बताया कि उन के एक किराएदार पंजाबी हैं। कल से ही उन के घर में मातम पसरा हुआ है। मैं ने कहा , लेकिन वह तो आतंकवादी था। भाभी जी बोलीं , लेकिन यह लोग उसे आतंकवादी कहां मानते थे ? उस के शिष्य हैं। मैं ने भी गंगवार जी से खुसफुसा कर ही कहा , ऐसे आतंकपरस्त किराएदार से जितनी जल्दी हो सके घर खाली करवा लीजिए। बाद के समय में उन्हों ने ख़ाली करवाया भी। पर उन दिनों मैं ने दिल्ली के बहुत से पंजाबी परिवारों को भिंडरावाले के गम में निढाल देखा। इंदिरा गांधी की हत्या इन्हीं पंजाबियों की खुराफात थी। भिंडरावाले के मारे जाने का बदला थी। उन को लगता था कि उन का स्वर्ण मंदिर भारतीय सेना ने अपवित्र कर दिया है। लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए दंगे में देखा कि पंजाबियों में भी बंटवारा हो गया था। मोना पंजाबी भी सिख परिवारों को लूटने और मारने में आगे-आगे थे। जहां-तहां हत्या में भी। तब जब कि एक मां से पैदा हुए दो बेटे में भी कोई मोना , कोई सिख हो सकता है। होता ही है। मोना मतलब बिना केश , बिना दाढ़ी , बिना कृपाण के। बहरहाल , फिर शरणार्थी शिविरों में सिखों की मदद में भी यह मोना पंजाबी लोग दिखे। एक आदमी को जब मैं ने पहचाना और पूछा कि तुम तो दंगाईयों के साथ भी थे और यहां ब्रेड , दूध , बिस्किट भी बांट रहे हो ? वह होठों पर उंगली रखते हुए मुझे चुप रहने को बोला। फिर धीरे से वह बोला , तब गुस्सा था , इन के लिए। और हमें उन के साथ भी रहना है , सो उन का भी साथ देना था। यह भी हमारे भाई हैं , सो इन की मदद भी करनी है। फिर पता चला कि वह कांग्रेसी था। हरिकिशन भगत का चेला था। तब हरिकिशन भगत ने दंगा करने को कहा था तो वह दंगाई बन गया था। अब हरिकिशन भगत ही अब शरणार्थी शिविरों में दूध , बिस्किट , ब्रेड बंटवा रहा था। अजब था यह भी। 

ठीक ऐसे ही जब ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान के एटमाबाद में अमरीकी कमांडो द्वारा मारा गया तो लखनऊ में भी मुस्लिम समाज के तमाम लोगों को मातम मनाते देखा। दफ्तर में हमारा एक सहयोगी तो , जो मुस्लिम था , बाकायदा फातिहा वगैरह पढ़ने लगा था , ओसामा बिन लादेन की आत्मा की शांति के लिए। वह ओसामा बिन लादेन साहब , कह कर संबोधित करता रहा। जब बहुत हो गया तो मैं ने प्रतिवाद किया और बेलाग कहा कि एक आतंकवादी के लिए तुम्हारे मन में यह आदर भाव ठीक नहीं है। यह सुनते ही वह मुझ पर आक्रामक हो गया। कहने लगा कि , खबरदार जो ओसामा बिन लादेन साहब को आतंकी कहा। अगर कुछ साथियों ने बीच-बचाव न किया होता तो वह मुझ से मार-पीट कर लेता। इस के कुछ ही दिन बाद दिग्विजय सिंह को ओसामा बिन लादेन जी कहते जब सुना तो तमाम लोगों की तरह मुझे तनिक भी दिक्कत नहीं हुई। इस लिए भी कि मैं समझ गया था कि दिग्विजय सिंह , ओसामा जी कह कर अपनी कांस्टीच्वेंसी को एड्रेस कर रहे हैं। 

और अब जब आज आई एस आई एस चीफ़ अबु बकर अल-बगदादी के अमरीकी सेना द्वारा मारे जाने की खबर पर पड़ताल की तो पाया कि मुस्लिम समाज में अबु बकर अल-बगदादी के लिए भी मातम पसर गया है भारतीय मुस्लिम समाज के एक खास पॉकेट में। गनीमत बस इतनी सी है कि सार्वजनिक रूप से इस मातम को गुस्से में तब्दील कर कहीं तोड़-फोड़ की खबर नहीं आई है। नहीं याद कीजिए कि म्यांमार की किसी एक घटना पर भी भारतीय मुस्लिम किस तरह सार्वजनिक सम्पत्तियों की तोड़-फोड़ शुरू कर देते थे। शहीदों के स्मारक तक नहीं छोड़े थे तब अपनी हिंसा की आग में। अफजल और याकूब मेनन आदि के प्रसंग भी याद कर लीजिए। तो क्या भारत बदल रहा है ? कि भारतीय मुस्लिम समाज की मानसिकता बदल गई है ? या फिर नरेंद्र मोदी की सत्ता की हनक है यह। जो अबु बकर अल-बगदादी के मारे जाने की खबर के आने के इतने घंटे बाद भी एक ख़ास पॉकेट में मातम के बावजूद सार्वजनिक जगहों पर तोड़-फोड़ , हिंसा या नुकसान की ख़बर शून्य है। मेरा स्पष्ट मानना है कि यह भाजपा के नरेंद्र मोदी सरकार की कड़ी सख्ती का नतीजा है जो अबु बकर अल-बगदादी के मारे जाने के बाद भी , मातम के बाद , हिंसा , आगजनी , उपद्रव आदि की खबर शून्य है। अगर ऐसा न होता तो आप को क्या लगता है कि तीन तलाक़ और 370 के खात्मे के बाद भी पूरे देश में इस कदर शांति की आप सोच भी सकते थे क्या। नोट कीजिए कि तमाम विरोध और गुस्से के बावजूद हिंसा की , उपद्रव की एक भी खबर देश के किसी भी हिस्से से नहीं आई। पटना आदि कुछ जगहों का उपद्रव लाठी चार्ज से ही शांत हो गया। गोली न इधर से चली , न उधर से। यह बहुत बड़ा बदलाव है। इस बदलाव की ख़ुशी में दीपावली के दो-चार दिए अधिक जलाइए और मिठाई खाइए , खिलाइए। जश्न मनाइए। कि दुनिया से आतंक का एक बड़ा चेहरा चकनाचूर हो गया है। आई एस आई एस की कमर और रीढ़ टूट गई है। 

Wednesday, 2 October 2019

दस्तावेज निकालने वाले विश्वनाथ प्रसाद तिवारी अब खुद एक दस्तावेज हैं , साझी धरोहर हैं



होते हैं कुछ सम्मान जो व्यक्ति को मिल कर व्यक्ति को सम्मानित करते हैं। पर कुछ सम्मान ऐसे भी होते हैं जो मिलते तो व्यक्ति को हैं पर सम्मान ही सम्मानित होता है उस व्यक्ति को मिल कर। बीते 29 सितंबर , 2019 को संयोग से गोरखपुर में यही हुआ। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को साहित्य अकादमी , दिल्ली ने अपने सर्वोच्च सम्मान महत्तर सम्मान से सम्मानित कर खुद को सम्मानित कर लिया।  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को वैसे तो बहुत सारे सम्मान मिले हैं पर हिंदी को जो सम्मान उन्हों ने दिया है वह विरल है। यह पहली बार ही हुआ कि साहित्य अकादमी का अध्यक्ष हिंदी का कोई लेखक बना तो वह विश्वनाथ प्रसाद तिवारी बने। इस के पहले वह साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष भी हुए थे। साहित्य अकादमी के हिंदी परामर्श मंडल में भी रहे थे और संयोजक भी। यह भी पहली बार ही हुआ था कि हिंदी का कोई लेखक साहित्य अकादमी के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर आया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी , अज्ञेय , विद्यानिवास मिश्र , नामवर सिंह , अशोक वाजपेयी आदि बहुत से लेखक भी अध्यक्ष नहीं बन सके थे साहित्य अकादमी के । बात बनी हिंदी की  तो विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के साथ बनी। लेकिन हिंदी को यह सम्मान दिलाने वाले विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के मन को यह अभिमान लेश मात्र भी नहीं छूता। वह तो अपनी सरलता में ही मगन मिलते हैं। जैसे कोई नदी अपने साथ सब को लिए चलती है , विश्वनाथ प्रसाद तिवारी भी सब को अपने साथ लिए चलते हैं । सब को मिला कर चलते हैं । न किसी से कोई विरोध , न कोई प्रतिरोध । न इन्न , न भिन्न , न मिनमिन । किसी किसान की तरह। जैसे हर मौसम किसान का मौसम होता है , वैसे ही हर व्यक्ति विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का होता है। वह प्रकृति से कवि हैं , अध्यापन उन का पेशा रहा है , प्रोफेसर रहे हैं , संपादक भी हैं ही दस्तावेज के पर मिजाज से वह किसान ही हैं । यायावरी जैसे उन का नसीब है। उन की कविताओं में मां, प्रेमिका, प्रकृति और व्यवस्था विरोध वास करते हैं। उनके व्यक्तित्व में सादगी, सरलता, सफलता और सक्रियता समाई दिखती है। उन की कविताएं प्रेम का डंका नहीं बजातीं लेकिन लिखते हैं  वह, ‘प्यार मैं ने भी किए हैं / मगर ऐसे नहीं / कि दुनिया पत्थर मार-मार कर अमर कर दे।या फिर मेरे ईश्वर / यदि अतृप्त इच्छाएं / पुनर्जन्म का कारण बनती हैं / तो फिर जन्म लेना पड़ेगा मुझे / प्यार करने के लिए।

कविता, आलोचना, संस्मरण और संपादन को एक साथ साध लेना थोड़ा नहीं पूरा दूभर है। पर विश्वनाथ जी इन चारों विधाओं को न सिर्फ़ साधते हैं बल्कि मैं पाता हूं कि इन चारों विधाओं को यह वह किसी निपुण वकील की तरह जीते हैं। बात व्यवस्था की हो, प्रेम की हो, प्रतिरोध की हो, हर जगह वह आप को जिरह करते मिलते हैं। जिरह मतलब न्यायालय के व्यवहार में न्याय कहिए, फ़ैसला कहिए उस की आधार भूमि है जिरह। तमाम मुकदमे जिरह की गांठ में ही बनते बिगड़ते हैं। तो मैं पाता हूं कि विश्वनाथ जी अपने समूचे लेखन में जिरह को अपना हथियार बनाते हैं। उन की कविताओं को पढ़ना इक आग से गुज़रना होता है जहां वह व्यवस्था से जिरह करते मिलते हैं। ज़रूरत पड़ती है तो फै़सला लिखने वाले से भी, ‘देखो उन्हों ने लूट लिया प्यार और पैसा/धर्म और ईश्वर/कुर्सी और भाषा।अच्छा वकील न्यायालय में ज़्यादा सवाल नहीं पूछता अपनी जिरह में। विश्वनाथ जी भी यही करते हैं। कई बार वह कबीर की तरह जस की तस धर दीनी चदरिया का काम भी करते हैं। और यह करते हुए वह बड़े-बड़ों से टकरा जाते हैं। कविता में भी, आलोचना में भी, संस्मरणों में भी और अपने संपादकीय में भी। हां, लेकिन वह आक्रमण नहीं करते, बल्कि आइना रखते हैं। जिरह का आइना। आइना रख कर चुप हो जाते हैं। नामवर सिंह , राजेंद्र यादव सरीखों की धज्जियां उड़ाने वाले उन के संपादकीय गौरतलब हैं।



जिन दिनों पंडित विष्णुकांत शास्त्री राज्यपाल थे उत्तर प्रदेश के उन्हीं दिनों विश्वनाथ प्रसाद तिवारी गोरखपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के आचार्य पद से रिटायर हुए। लखनऊ के राजभवन में एक दिन विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जब उन से मिले तो छूटते ही शास्त्री जी ने स्नेहवश पूछा , वाइस चांसलर बनोगे ? तिवारी जी ने विनयवत हाथ जोड़ कर कहा , बड़ी इज़्ज़त से रिटायर हुआ हूं , ऐसे ही रहने दीजिए।‘ शास्त्री जी समझ गए और बात बदल दी।  

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी सही अर्थों में आचार्य हैं। उन से मेरा मिलना अपने घर से ही मिलना होता है। किसी पुरखे से मिलना होता है। जब मैं विद्यार्थी था और वह आचार्य तब से हमारी मुलाकात है। कोई चालीस साल से अधिक हो गए । लेकिन शुरू से ही वह जब भी मिलते हैं धधा कर मिलते हैं। वह हैं तो हमारे पिता की उम्र के लेकिन मिलते सर्वदा मित्रवत ही हैं। दयानंद जी , संबोधित करते हुए। स्नेह की डोर में बांध कर जैसे मुझे पखार देते हैं । वह एक बहती नदी हैं। किसी नदी की ही तरह जैसे हरदम यात्रा पर ही रहते हैं। लेकिन कभी उन को थके हुए मैं ने नहीं देखा। देश दुनिया वह ऐसे फांदते घूमते रहते हैं गोया वह कोई शिशु हों , और अपने ही घर में घूम रहे हों । धमाचौकड़ी करते हुए। हरदम मुसकुराते हुए , किसी नदी की तरह कल-कल , छल-छल करते हुए। मंथर गति से मंद-मंद मुसकुराते। उन की विनम्रता , उन की विद्वता और उन की शालीनता जैसे मोह लेती है बरबस हर किसी को। किसी को विश्नाथ प्रसाद तिवारी से अकेले में मिलना हो तो उन की आत्मकथा अस्ति और भवति पढ़े। उन से और उन के सरल जीवन से रोज ही मिले। हिंदी में बहुत कम लोग हैं जो विषय पर ही बोलें और सारगर्भित बोलें। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी उन्हीं कुछ थोड़े से लोगों में से हैं। और उन का मुझ पर स्नेह जैसे मेरा सौभाग्य ! उन का यह स्नेह ही है कि उन की आत्मकथा में मैं भी उपस्थित हूं। उस आत्मकथा में जिस में भवति का प्रवाह है और सत का आधार भी। उन को बिसनथवा कह कर पुकारने वाली उन की बुआ का चरित्र भी दुर्लभ है। उन की ज़िंदगी जैसी सादी और सरल है , उन की आत्मकथा भी उतनी सरल और सादी। छल , कपट , झूठ , प्रपंच से दूर। विश्वनाथ जी न जीवन में किसी विचारधारा की गुलामी करते हैं न रचना में। फिर भी सादगी का शीर्ष छूते हैं। 1978 से  दस्तावेज पत्रिका का संपादन कर रहे विश्वनाथ जी लेकिन नहीं जानते कि अब वह खुद एक दस्तावेज हैं। गोरखपुर ही नहीं , हिंदी समाज के दस्तावेज। गोरखपुर और हिंदी समाज को चाहिए कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी नाम के इस दस्तावेज को , इस धरोहर को अब बहुत संभाल कर रखे। गोरखपुर में साहित्य अकादमी के महत्तर सम्मान से सम्मानित होने वाले सिर्फ तीन लोग हैं। एक फ़िराक गोरखपुरी दूसरे , विद्यानिवास मिश्र और तीसरे,  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी हैं। डाक्टर राधाकृष्णन , चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे गिनती के लोग ही इस महत्तर सम्मान से अलंकृत हुए हैं। विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को देख कर कई बार रामदरश मिश्र का एक शेर याद आता है :

जहां आप पहुंचे छ्लांगे लगा कर,
वहां मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी धीरे-धीरे ही चले और शिखर पर उपस्थित हैं। जहां से अब उन को कोई डिगा नहीं सकता। याद कीजिए कुछ समय पहले जब अशोक वाजपेयी और कुछ और लेखकों ने अपने बड़प्पन की छुद्रता में साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी का एक नकली देशव्यापी अभियान चलाया था। दिखने में लगता था कि वह अवार्ड वापसी अभियान नरेंद्र मोदी के विरोध में है लेकिन वह उस का राजनीतिक रंग था और अकारण था। वास्तव में यह पूरा अभियान विश्वनाथ प्रसाद तिवारी को साहित्य अकादमी से उखाड़ने के लिए था। लेकिन उस तूफ़ान में जिस धीरज के साथ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने न सिर्फ अपनी व्यक्तिगत मर्यादा बचा कर रखी , साहित्य अकादमी की मर्यादा पर भी आंच नहीं आने दिया। यह आसान नहीं था। लेकिन विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने चुप रह कर , हरिश्चंद्र की तरह सत्य के मार्ग पर चल कर गांधीवादी तरीक़े से सब कुछ फेस किया। और न अपना , न साहित्य अकादमी का बाल बांका होने दिया। दिल्ली के लोगों ने सोचा था कि गंवई से दिखने वाले एक छोटे से शहर गोरखपुर के आदमी को मछली की तरह भून कर खा जाएंगे। लेकिन उन का मंसूबा कामयाब नहीं हुआ। तो इस लिए भी कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की सादगी से , विनय से वह लोग हार गए। वह लोग नहीं जानते थे कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कभी लाल बहादुर शास्त्री , हेमवती नंदन बहुगुणा और शिब्बनलाल सक्सेना जैसे लोगों के साथ काम कर चुके हैं। उस संग-साथ में तप चुके हैं। सो तिवारी जी कुंदन बन कर निकले। विश्वनाथ जी की एक कविता याद आती है जो उन्हों ने अभी अपने सम्मान भाषण में उद्धृत की :

दिल्ली में उस से छुड़ा लेना चाहता था पिंड 
जो चार बार विदेश यात्राओं में सहयात्री रहा 
मगर आख़िर वह आ ही गया मेरे साथ गोरखपुर 
उस गाय की तरह 
जो गाहक के हाथ से पगहा झटक कर 
लौट आई हो अपने पुराने खूंटे पर 

और अब , वह मेरे पुराने सामानों के बीच 
विजयी-सा मुस्करा रहा 
चुनौती देता और पूछता मुझ से 
' क्या आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी है 
उन्हें पीछे छोड़ देना 
जिन के पास भाषा नहीं है 

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी जिन के पास भाषा है , उन के साथ भी होते हैं और जिन के पास भाषा नहीं है , उस के साथ और ज़्यादा होते हैं। सिर्फ़ कविता में ही नहीं , जीवन में भी। उन की एक कविता फिर याद आ गई है :

कितने रूपों में कितनी बार
जला है यह मन तापो में
गला है बरसातों में
मगर अफसोस है मैं बड़ा नहीं बन सका
रोटी दाल को छोड़ कर खड़ा नहीं हो सका।



[ राष्ट्रीय सहारा , गोरखपुर में प्रकाशित ]

Saturday, 28 September 2019

रामदेव शुक्ल से गोरखनाथ के बारे में सुनना

आचार्य रामदेव शुक्ल को सुनना सर्वदा एक अनुभव होता है। उन को सुने की अनगूंज मन में ऐसे बस जाती है कि फिर मन से , जीवन से जाती नहीं। हिंदी में इतनी तैयारी के साथ , इतनी सरलता और इतनी सतर्कता के साथ बहुत कम लोगों को सुना है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को सुना है , अज्ञेय और नामवर सिंह को सुना है , अशोक वाजपेयी या फिर रामदेव शुक्ल को। तमाम लोगों की तरह रामदेव जी कभी भी इस डाल से उस डाल पर नहीं कूदते। अपने विषय पर पूरी तरह केंद्रित रहते हैं। भूल कर भी कभी सूत भर भी इधर-उधर नहीं होते। रामदेव जी आज उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ में हिंदी साहित्य पर नाथपंथ का प्रभाव विषय पर बोले। नाथ पंथ के बहाने गोरख पर भी खूब बोले। बताया कि शिव आदियोगी थे , कृष्ण योगेश्वर और गोरख महायोगी थे। गोरख के लिखे पद और उन के जीवन की चर्चा भी विस्तार से की। बताया कि गोरख और गोरक्ष एक ही हैं , अलग नहीं । ध्वनि और उच्चारण के अर्थ में बस अलग हैं। गोरख ने कैसे पाखंड और कुरीतियों को तार-तार किया। न सिर्फ उत्तर भारत बल्कि समूचे भारत में वह घूमे और अलख जगाया। गुजरात का अपना एक अनुभव जोड़ते हुए बताया कि वहां लोग गोरख को गोबरनाथ के रूप में भी जानते हैं।

किस्सा यह है कि गोरख के गुरु गुजरात के एक गांव से गुज़र रहे थे। एक नि:संतान स्त्री ने अपनी दुर्दशा बताई और कहा कि मुझे एक बेटा चाहिए। तो उस संन्यासी ने अपने झोले में से भभूत निकाल कर देते हुए कहा , इसे खा लो ! कोई बारह साल बाद वह संन्यासी उस गांव से लौट रहा था। तो उस औरत से पूछा , तुम्हारा बेटा कहां है , बुलाओ उसे। औरत ने कहा , मेरे बेटा कहां है ? तो संन्यासी ने पूछा कि वह भभूत क्या खाई नहीं ? औरत बोली , नहीं। तो संन्यासी ने पूछा , क्या किया ? औरत ने बताया कि उसे यहीं एक घूरे पर फेंक दिया था। संन्यासी ने घूरे के पास जा कर पुकारा और बारह साल का एक लड़का उस घूरे के गोबर से निकल आया। संन्यासी उसे ले कर चला गया। यही लड़का गोरखनाथ हुआ। जिसे गुजरात में लोग आज भी गोबरनाथ कहते हैं। जाने इस किस्से में कितनी सचाई है । पर गोरखनाथ ने बाद में योग की विधियां तो खोजी ही , तमाम अंध विश्वास और कुरीतियों से भी वह लड़े। रामदेव जी ने गोरख के अहिंसा,सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पांच यम पर भी बात की। कबीर , जायसी , नानक आदि पर गोरख और नाथ पंथ के प्रभाव पर बात की। और इतना डूब कर बात की कि सुनने वाले भी उन की बातों में डूब गए। गोरख के कई पद और शाबर पर भी रामदेव जी बोले।

रामदेव जी ने सूफियों पर भी विस्तार से बात की। बुद्ध पर भी बात की।अप्प दीपो भव की चर्चा की। गोरख के मूल से इसे जोड़ा। बताया कि इस्लाम से भी बहुत पहले सूफी भारत आए थे। सूफियों के कठिन जीवन की चर्चा की। कि कैसे खेत से फसल कट जाने के बाद खेत में गिरे एक-एक दाना बटोर कर भोजन करते थे। भेड़ , बकरियों के रोएं काटों में से निकाल कर अपने लिए कपड़ा तैयार करते थे। कितनी साधना करते थे। गोरखनाथ की साधना को भी इसी तरह रेखांकित किया। कृष्ण द्वारा सूर्य को भी योग सिखाने के प्रसंग का संदर्भ दिया।

अनुज प्रताप सिंह , राधेश्याम दूबे , प्रदीप कुमार राव , योगेंद्र प्रताप सिंह ने भी इस विषय पर विस्तार से बात की। गोरखनाथ किस जाति के थे , इस पर भी बात आ गई। फिर हुआ कि हजारी प्रसाद द्विवेदी ने गोरख को ब्राह्मण बताया है। फिर बात आई कि गोरख ने कैसे तो दलितों को भी बराबरी में बिठाया। देश भर में गोरख के सामाजिक सुधारों की भी चर्चा हुई। तमिलनाडु , कर्नाटक , पूर्वोत्तर तक में उन के काम और लिखे की चर्चा हुई। युग प्रवर्तक महायोगी गोरखनाथ पर त्रिदिवसीय गोष्ठी का आज आख़िरी दिन था। सो हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष सदानंद गुप्त ने समारोप वक्तव्य भी दिया। सदानंद गुप्त द्वारा परोसे गए तीन दिन की इस संगोष्ठी के विवरण सुन कर और आज विभिन्न विद्वानों द्वारा गोरखनाथ पर विशद चर्चा सुन कर बहुत पछताया कि बाकी दो दिन भी मैं क्यों नहीं गया। लोगों को गोरख पर सुनने। लेकिन सदानंद गुप्त ने बताया है कि अगले वर्ष फिर इस से बड़ा आयोजन महायोगी गोरखनाथ पर किया जाएगा। यह जान कर अच्छा लगा। इस लिए भी कि गोरख को जानना , खुद को जानना होता है ।

Wednesday, 25 September 2019

हे गांधी इन अज्ञानियों को क्षमा करना !

महात्मा गांधी और टैगोर 

महात्मा गांधी और नेता जी सुभाष चंद्र बोस , पटेल 
जो लोग नहीं जानते वह लोग अब से जान लें कि गांधी को महात्मा की उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था। जब कि गांधी को राष्ट्रपिता नेता जी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था। और समूचे देश ने एक स्वर में तब इसे स्वीकार कर लिया था। यह देश को आज़ादी मिलने से पहले की बात है।

सोचिए कि गांधी ने ही चंपारण में सत्याग्रह कर अंगरेज सरकार की आंख में अंगुली डाल कर उन की सत्ता का काजल निकाल लिया था। अंगरेज जज कहता ही रहा कि माफ़ी मांग लीजिए और जाइए। गांधी ने कहा , किसी सूरत माफ़ी नहीं मांगता। लाचार जज ने कहा , फिर भी आप को रिहा किया जाता है। दमनकारी ब्रिटिश सत्ता के लिए यह आसान नहीं था। यह पहली बार था। अंगरेजी वस्त्रों की होली जला कर गांधी ने उन की संस्कृति को जला दिया था। असहयोग आंदोलन कर अंगरेजों की सत्ता में भूचाल ला दिया था। गोरखपुर में एक चौरीचौरा कांड हो गया। अराजक भीड़ ने थाना बंद कर पुलिस वालों को जिंदा जला दिया। इस एक हिंसक घटना से विचलित हो कर गांधी ने पूरे देश से असहयोग आंदोलन वापस ले लिया था। नेहरु , पटेल सब के सब समझाते रहे थे। कि एक घटना के कारण आंदोलन वापस लेना ठीक नहीं रहेगा। पूरा देश आगे बढ़ चुका है। पर गांधी ने साफ़ कह दिया कि हमें ईंट का जवाब पत्थर से दे कर यह आंदोलन नहीं चाहिए , तो नहीं चाहिए। दांडी यात्रा कर , नमक क़ानून तोड़ते हुए , नमक बना कर अंगरेजों के क़ानून को तार-तार कर दिया था गांधी ने। और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया था। 1947 में अंगरेज भारत छोड़ कर गए भी।

दुनिया भर से कोई एक नाम बता दे कोई कि जिस ने उपवास कर के भयानक दंगा रोक दिया हो। गांधी ने रोका था , नोआखली दंगा। सिर्फ़ उपवास के बल पर। तब जब कि प्रशासन हार गया था। ऐसे जाने कितने किस्से , कितने काम , कितनी तपस्या गांधी के जीवन में हैं जिन की लोग कल्पना नहीं कर सकते। जब सब कुछ से हार जाते हैं लोग तो गांधी के सत्य के प्रयोग पर उतर आते हैं। चरित्र हत्या पर उतर आते हैं। कि वह तो नंगी औरतों के साथ सोते थे। हां , सोते थे। दरवाज़ा खोल कर सोते थे। अय्यास और बलात्कारी दरवाज़ा खोल कर नहीं सोते। उस में ब्रिटिशर्स , जर्मन , भारतीय आदि तमाम स्त्रियां थीं। अपनी खुशी से सोती थीं। प्रतिस्पर्धा थी उन में कि कौन सोएगा। आप क्या कहेंगे , गांधी ने खुद इस बाबत बहुत लिखा है और खुद छापा है अपने हरिजन में। जब बहुत हुआ तो अपने निजी सचिव महादेव तक से गांधी ने कहा कि जाओ मेरा भंडाफोड़ कर दो। आप को क्या लगता है कि अगर उन के कट्टर दुश्मन अंगरेजों को इस बाबत एक भी छेद मिलता तो वह गांधी को जीने देते। उन की चरित्र हत्या से बाज आते भला ? और जनता छोड़ती उन्हें। गाना गाती , दे दी आज़ादी हमें बिना खड्ग , बिना ढाल / साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ! अरे अंगरेज बाद में , जनता पहले ही उन्हें भून कर खा जाती। जानिए कि यह सारे विवरण गांधी ने खुद लिखे हैं , स्वीकार किए हैं। चिट्ठियों में लेखों में। तब आप जान पाए। किसी स्टिंग आपरेशन से नहीं। गांधी को समग्र में पढ़ना हो तो प्रकाशन विभाग , भारत सरकार ने सौ भाग में गांधी समग्र प्रकाशित किया है। हिंदी और अंगरेजी दोनों में। पढ़ डालिए। लेकिन लोग पढ़ेंगे नहीं , सिर्फ़ गाली देंगे।

लेकिन जिन अंगरेजों को गांधी ने भारत से खदेड़ दिया उन अंगरेजों ने गांधी को कभी गाली नहीं दी। उलटे ब्रिटिश संसद के सामने , सम्मान में गांधी की स्टैचू लगा रखी है। ब्रिटिशर्स ही थे रिचर्ड एटनबरो जिस ने गांधी पर शानदार फिल्म बनाई है। ब्रिटिशर्स ही थे बेन किंग्सले जिन्हों ने गांधी की भूमिका में प्राण फूंक दिए। भारत में हिंदी , अंगरेजी या किसी और भी भारतीय भाषा में गांधी जैसी कोई एक कालजयी फिल्म नहीं है। उस के आस-पास भी नहीं। गांधी के अवदान को ब्रिटिशर्स अब भी भूल नहीं पाते। दुनिया उन के सत्य , अहिंसा और सत्याग्रह के आगे शीश झुकाती है। लेकिन अफ़सोस कि भारत में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो गांधी को बिलकुल नहीं जानते। गांधी को सिर्फ़ गालियां देना जानते है। गांधी की चरित्र हत्या करना जानते हैं। अफ़सोस कि यह लोग अपने को भारतीय कहते हैं। हे गांधी , इन अज्ञानियों और नफ़रत से भरे लोगों को माफ़ करना ! यह आप को नहीं जानते। यह मनुष्यता , अहिंसा , सत्य और सत्याग्रह नहीं जानते। देश के लिए आप का संघर्ष नहीं जानते। नहीं जानते यह मूर्ख कि मूल्यों की रक्षा के लिए , मनुष्यता और सत्य के लिए आप ने जान दे दी। जैसे सोने का हिरन दिखा कर रावण सीता का हरण कर ले गया , वैसे ही आप के पांव छू कर गोडसे गोली मार कर आप की हत्या कर गया ! आप ने हे राम ! कहा और विदा हो गए। यह वही लोग हैं जिन्हों ने कभी राम को भी नहीं छोड़ा था। हे राम , हे गांधी इन अज्ञानियों को क्षमा करना !

आप गरियाते रहिए महात्मा गांधी को। खोजते रहिए उन में छेद पर छेद। पूरी तरह असहमत रहिए महात्मा गांधी से। कोई बात नहीं। यह आप का अधिकार है , आप का विवेक है और आप की समझ। इस लिए भी कि गांधी कोई देवता नहीं थे। मनुष्य थे। फिर हमारे यहां तो देवताओं को भी गरियाने की परंपरा है। गांधी कोई पैगंबर नहीं हैं कि आप उन को भला-बुरा नहीं कह सकते। कह देंगे तो तूफ़ान मच जाएगा। गांधी मनुष्य हैं। और जैसे भी हैं , मुझे पसंद हैं। आप कीजिए उन की निंदा। भरपेट कीजिए। लेकिन मैं महात्मा गांधी का गायक हूं। प्रशंसक हूं। अनन्य गायक। अनन्य प्रशंसक। उन की तमाम खूबियों और खामियों के साथ गाता हूं उन्हें । आप मुझे भी गरिया लीजिए। गरिया ही रहे हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता। सच यह है कि जो एक बार गांधी को ठीक से जान लेगा , वह गांधी को गाएगा। गाता ही रहेगा। मैं उन्हीं असंख्य लोगों में से एक हूं। राष्ट्र कवि सोहनलाल द्विवेदी की इस कविता को मन करे तो आप भी पढ़िए और गाइए। ऐसी कविता लिखना और ऐसी कविता पढ़ना भी सौभाग्य होता है।

चल पड़े जिधर दो डग, मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर ;
गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर,

जिसके शिर पर निज हाथ धरा
उसके शिर- रक्षक कोटि हाथ
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गए उसी पर कोटि माथ ;

हे कोटि चरण, हे कोटि बाहु
हे कोटि रूप, हे कोटि नाम !
तुम एक मूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटि मूर्ति, तुमको प्रणाम !

युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खीचते काल पर अमिट रेख ;

तुम बोल उठे युग बोल उठा
तुम मौन रहे, जग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना ;

युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक
युग संचालक, हे युगाधार !
युग-निर्माता, युग-मूर्ति तुम्हें
युग युग तक युग का नमस्कार !

दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम काल-चक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक !

हे युग-द्रष्टा, हे युग सृष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष मन्त्र ?
इस राजतंत्र के खण्डहर में
उगता अभिनव भारत स्वतन्त्र !



आप गरियाते रहिए नरेंद्र मोदी को , करते रहिए नफ़रत और कुढ़ते रहिए


आप गरियाते रहिए नरेंद्र मोदी को। करते रहिए नफ़रत और कुढ़ते रहिए। आज उस ने 50 हज़ार भारतीयों के बीच दुनिया की महाशक्ति अमरीका में ही , अमरीका के राष्ट्रपति ट्रंप को बच्चों की तरह सामने बैठा कर हिंदी में अपना भाषण सुना दिया। और ट्रंप लगातार ताली बजाते रहे। भाकपा महासचिव और मूर्ख डी राजा भले कहता फिरे कि हिंदी , हिंदुत्व की भाषा है। पर मोदी ने आज फिर साबित किया कि हिंदी , वैश्विक भाषा है , विश्व बंधुत्व की भाषा है। भारत में कुछ अराजक अकसर कहते रहते हैं कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन इसी सभा में ट्रंप ने साफ़ बता दिया कि इस्लामिक आतंकवाद से भारत और अमरीका साथ-साथ लड़ेंगे। बिना नाम लिए मोदी ने पाकिस्तान और शांति दूत इमरान खान का बैंड बजा दिया। कश्मीर से 370 हटाने की बात को भी खूब ललकार कर मोदी ने रखा। भारतीय मूल के हर क्षेत्र के अमरीकी यहां उपस्थित थे। व्यापारिक और रक्षा संबंधों की बात भी दोनों ने की। अमरीका में आज का दिन नरेंद्र मोदी के बहाने भारत के गौरव का दिन रहा। नरेंद्र मोदी का खूब बड़ा वाला सैल्यूट ! महाशक्ति के साथ कंधे से कंधा मिला कर , बराबरी के साथ खड़े होने पर सैल्यूट !

आप करते रहिए तीन-तिकड़म और कुढ़ कर , खीझ कर बताते रहिए कि ट्रंप ने मोदी का इस्तेमाल किया है अपने चुनाव खातिर। सच यह है कि मोदी ने ट्रंप को मित्रवत भारत के पक्ष में कर लिया है। मित्रवत ही नहीं , कूटनीतिक रूप से ही। यह पहली बार ही हुआ है कि महाशक्ति ट्रंप ने पब्लिकली कहा कि अगर मोदी बुलाएंगे तो भारत ज़रूर आऊंगा। और देखिए कि मोदी ने बिना समय गंवाए , फौरन ट्रंप को सपरिवार निमंत्रण दे दिया। दोनों ने एक दूसरे की तारीफ की। ट्रंप ने मोदी को टफ डील वाला बताया तो मोदी ने ट्रंप को आर्ट आफ डील के लिए याद किया। अभी दो तीन दिन में भारत के पक्ष में कुछ और चौकाने वाले फैसले आने वाले हैं। सचमुच यह नई हिस्ट्री और नई केमिस्ट्री है। सचमुच जैसा कि इस कार्यक्रम हाऊडी मोदी को परिभाषित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कई सारी भारतीय भाषाओँ में जो एक बात बार-बार कही , वह ठीक ही कही कि , भारत में सभी कुछ अच्छा है !

अलग बात है मुट्ठी भर दिलजले इस टिप्पणी को पढ़ कर मुझ से भी कुढ़ कर जल भुन जाएंगे। मुझे फिर गरियाएंगे। बताएंगे कि पत्रकार और साहित्यकार को सत्ता के ख़िलाफ़ रहना चाहिए। गुड है । ऐसे लोगों की बीमारी और मनोवृत्ति पर गोरख पांडेय की एक कविता याद आती है :

राजा ने कहा रात है
रानी ने कहा रात है
मंत्री ने कहा रात है
सब ने कहा रात है

यह सुबह-सुबह की बात है !

क्षमा कीजिए , मुझे सुबह को रात कहने की कला नहीं आती। इस कला से , इस बीमारी से मैं मुक्त हूं। मुझे मुक्त रहने दीजिए।

तो कूटनीति गिव एंड टेक से ही होती है , इस बात को नहीं जानते हैं तो अब से जान लीजिए। एक दूसरे की पीठ खुजा कर ही होती है। एक दूसरे को गरिया कर नहीं। एक दूसरे का अहित कर के नहीं। स्वार्थ ही एक दूसरे को एक करता है । नि:स्वार्थ कुछ नहीं होता । कहीं भी , कभी भी । किसी भी के साथ । फिर यह तो कूटनीति है । सो अपने आग्रह और बीमारी से छुट्टी ले लेने में नुकसान नहीं है। ठीक ?

जो लोग कभी कहते थे कि अमरीका , भारत के चुनाव में दखल दे रहा है। आज वही लोग कह रहे हैं कि भारत , अमरीका के चुनाव में दखल दे रहा है। बहुत कंफ्यूजन है कि यह लोग आखिर कहना क्या चाह रहे हैं ? अंगरेजी मुझे भी बहुत अच्छी नहीं आती। लेकिन नरेंद्र मोदी ने कल अंगरेजी में कहा था कि अमरीका में बीते चुनाव में ट्रंप ने भारत की तर्ज पर कहा था कि अब की बार ट्रंप सरकार ! बस कांग्रेस के आनंद शर्मा और कामरेड सीताराम येचुरी ने यही पकड़ लिया कि मोदी अमरीका के चुनाव में दखल दे रहे। ट्रंप का प्रचार कर रहे हैं। वेरी गुड है ! बात को पकड़ने भी ठीक से नहीं आता , तो बाक़ी क्या पकड़ेंगे ? वेरी बैड है !

वैसे तो अमरीका के ह्यूस्टन में 50 हज़ार लोग टिकट खरीद कर नरेंद्र मोदी का भाषण सुनने आए थे। हां , अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने टिकट नहीं खरीदा था। सो भारत के दस्तूर के मुताबिक उन को कुछ दिए जाने को ले कर एक लतीफ़ा भी मैदान में आ गया है। हद से अधिक मोदी से नफ़रत करने वाले मित्रों को बहुत पसंद आएगा। इसी गरज से इस लतीफे को यहां परोस रहा हूं।

हाउडी मोदी सभा संपन्न होने के बाद आयोजकों ने ट्रंप को दस डालर का लिफाफा और पूरी, सब्जी ,आचार का एक पैकेट दिया गया। तो ट्रंप ने पूछा, ' ये क्या है ? ' तो आयोजक बोला , ' भारत में सभा सुनने वालों को सभा समाप्त होने का बाद इसे देते हैं।' तो ट्रंप को गुस्सा आ गया। और नाराज हो कर कहा , ' इडियट , पव्वा कौन देगा फिर ? तेरा बाप ! '

कल रात एक मित्र ने फ़ोन किया और पूछा कि , ' भाई साहब और क्या हो रहा है ?' मैं ने बताया कि , ' फ़िलहाल तो टी वी चल रहा है ।' वह बिदके और बोले , ' वही मोदी , मोदी चल रहा होगा ! ' मैं ने हामी भरी और उन्हें बताया कि , ' लेकिन आज तो आप का पसंदीदा एन डी टी वी भी यही कर रहा है। ' वह बुरी तरह भड़के। एन डी टी को भद्दी-भद्दी गालियां देते हुए बोले , ' बंद कर दिया है इसे भी ! ' फिर एक गाली दी और बोले , ' आप सुनिए इस कमीने को !' फिर मोदी की मां-बहन भी न्यौती। मैं ने उन्हें बताया कि अभी मोदी का भाषण नहीं चल रहा , मोदी का इंतज़ार हो रहा है। फिर कहा कि , ' बाक़ी तो सब ठीक है। लेकिन आप लखनऊ में रहते हैं। सो गाली-गलौज न कीजिए। करते भी हैं तो कम से कम गाली देना तो शऊर से सीख लीजिए। ' वह थोड़ा दबे और उधर से धीरे से बोले , ' 4 पेग हो गई है भाई साहब , माफ़ कीजिएगा । लेकिन गाली , गलौज में कैसा शऊर ? '

मैं ने उन्हें ग़ालिब का एक किस्सा सुनाया। आप भी सुनिए।

ग़ालिब से भी उन के समकालीन लोग बहुत ईर्ष्या करते थे। जलते-भुनते बहुत थे। तब फ़ोन , सोशल मीडिया आदि तो था नहीं। सब कुछ आमने-सामने या खतो-किताबत के भरोसे ही था। अब ग़ालिब को सामने से गाली देने की जुर्रत नहीं थी किसी की तो खत लिख कर गाली-गलौज करते थे। एक दिन वह अपने एक दोस्त के साथ बैठे थे। बहुत से खत आए हुए थे। ज़्यादातर में गालियां थीं। ग़ालिब ने एक खत खोला और अपने दोस्त से कहने लगे कि , ' इन लोगों को गालियां देने का भी शऊर नहीं है। अब मेरी उम्र देखिए और फिर अम्मी की उम्र देखिए। और यह आदमी मुझे मां-बहन की गालियां लिख रहा है। देनी ही थी तो बेटी की गाली देता। बूढ़ी मां-बहन की गाली से उसे क्या मिलेगा ? '

जनाब समझ गए और ' सारी , वेरी सारी ! ' कह कर बोले , ' मेरी तो पूरी उतार दी आप ने ! ' और फोन बंद कर दिया।

कुतर्क की कमीज का कलफ उतर गया है। रक्तचाप बढ़ गया है। मधुमेह पहले ही से था। अब सांस भी फूलने लगी है। दिन को रात , रात को दिन कहने की बीमारी लग गई है। दिल , गुर्दा , यकृत आदि-इत्यादि आह , आह की राह पर हैं। आवाज़ भी हकला कर रह गई है। पुरवा हवा जब बहती है , पुराने सुख , दुःख देने लगते हैं। चिकित्सक ने हाथ खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया की गली में थोड़ा खांस-खखार कर दवाओं का आदान-प्रदान कर लेते हैं। जिस ने असाध्य बीमारियों की रेल पर बिठा दिया है , उसे गरिया लेते हैं तो थोड़ा सुकून मिलता है। फिर अचानक गरियाते-गरियाते रोने लगते हैं। लेकिन आदत है कि जाती नहीं। रियाज़ ख़ैराबादी की ग़ज़ल याद आती है :

दर्द हो तो दवा करे कोई
मौत ही हो तो क्या करे कोई

बंद होता है अब दर-ए-तौबा
दर-ए-मयख़ाना वा करे कोई

क़ब्र में आ के नींद आई है
न उठाए ख़ुदा करे कोई

हश्र के दिन की रात हो कि न हो
अपना वादा वफ़ा करे कोई

न सताए किसी को कोई ‘रियाज़’
न सितम का गिला करे कोई

बेशक दुनिया में नरेंद्र मोदी का कद बहुत बड़ा हो गया है इस समय। लेकिन इतना भी बड़ा नहीं हो गया है कि उन्हें फादर आफ इंडिया कह दिया जाए। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नरेंद्र मोदी को फादर आफ इंडिया कहना कुछ नहीं , बहुत ज़्यादा हो गया है। हमारे पास पहले ही से एक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हैं। भले इस बिंदु पर भी कुछ लोगों की असहमति सर्वदा से रही है , रहेगी भी। फिर भी राष्ट्रपिता का दर्जा महात्मा गांधी को ही प्राप्त है। माता एक , पिता दस-बारह की तरह इसे हास्यास्पद बनाने की ज़रूरत नहीं है। मोदी कितने भी बड़े डिप्लोमेटिक हों गए हों , सिकंदर हो गए हों , विश्व विजेता हो गए हों लेकिन महात्मा गांधी का नाखून भी नहीं छू सकते। नरेंद्र मोदी खुद भी महात्मा गांधी का दिन-रात गुण-गान करते रहते हैं। नरेंद्र मोदी को खुद आगे बढ़ कर इस फादर आफ इंडिया होने का प्रतिकार कर देना चाहिए। महात्मा गांधी ही हमारे राष्ट्रपिता हैं , वह ही रहेंगे। कोई और नहीं।

सूर्य कुमार पांडेय को बाल साहित्य भारती


कविता कैसी भी लिखनी हो अगर सीखनी हो तो सूर्य कुमार पांडेय से मिलिए। किसी भी छंद में , किसी भी रस में , किसी भी विषय पर आप सूर्य कुमार पांडेय से कविता , कभी भी लिखवा सकते हैं। सीख सकते हैं। कविता जैसे उन की नस-नस में बहती है , गंगा , यमुना , सरस्वती की तरह और वह कविता में। बहुत कठिन है व्यंग्य लिखना , अच्छा व्यंग्य लिखना। लेकिन सूर्य कुमार पांडेय पद्य और गद्य दोनों ही में समान अधिकार से लिखते हैं। और इतना सशक्त लिखते हैं कि बड़े-बड़े दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। हास्य लिखते हैं तो उन्हें पढ़ और सुन कर हंसी का झरना फूट पड़ता है। मुझे याद है कि जब मैं एक फीचर एजेंसी राष्ट्रीय समाचार फीचर्स नेटवर्क में संपादक था तो देश भर के अख़बारों के लिए रोज ही चार लेखों का एक बुलेटिन जारी होता था। तय हुआ कि रोज एक राजनीतिक व्यंग्य में सनी चार , छ लाइन की कविता भी परोसी जाए। इस काम के लिए मुझे जो पहला नाम सूझा वह सूर्य कुमार पांडेय का ही था। उन से जब इस बाबत बात की तो वह बिना किसी नखरे और हिचक के सहर्ष तैयार हो गए। न सिर्फ़ तैयार हो गए बल्कि रोज लिखने भी लगे।

चुटकी नाम से रोज एक छंद वह लिखते। देखते ही देखते सूर्य कुमार पांडेय की चुटकी उस फीचर एजेंसी में खूब चटक हो गई। अख़बार कोई लेख भले ड्राप कर देते थे पर सूर्य कुमार पांडेय की चुटकी ज़रूर छापते थे। लंबे समय तक पांडेय जी ने चुटकी लिखी। इस के पहले वह स्वतंत्र भारत में वह कांव-कांव भी लिखते रहे थे। अभी भी कई दैनिक अख़बारों में उन का साप्ताहिक व्यंग्य नियमित छपता है। टी वी चैनलों से लगायत कवि सम्मेलनों में वह निरंतर सक्रिय हैं। न सिर्फ़ सक्रिय हैं बल्कि मंच पर होने के बावजूद कभी अपनी कविता को बाजारू या स्तरहीन नहीं होने दिया है। लतीफा नहीं होने दिया है। जब मैं अपना उपन्यास बांसगांव की मुनमुन लिख रहा था तब लिखते-लिखते अचानक एक चनाजोर गरम बेचने का दृश्य उपस्थित हो गया। मुनमुन की बहादुरी की शान में चनाजोर गरम बिकना था । बड़ी मुश्किल में पड़ गया। मुझे आज भी छंद लिखने नहीं आता , तब भी नहीं आता था। और गाने के लिए छंद से बेहतर कुछ नहीं होता। वह भी जनता के बीच गाने के लिए। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करूं ? कलम अनायास थम गई। लाख कोशिश करूं , लिखा ही न जाए। फिर सहसा सूर्य कुमार पांडेय की याद आई। फोन किया उन्हें और अपनी मुश्किल बताते हुए मदद मांगी। उन्हों ने पात्र और स्थितियों की डिटेल पूछी। मैं ने विस्तार से बता दिया। दूसरे ही दिन मुनमुन के नाम से चनाजोर गरम उपन्यास में बिकने लगा। इस गीत ने मुनमुन के चरित्र को और सशक्त बना दिया। उपन्यास चल निकला। आप भी पढ़िए वह चनाजोर गरम वाला गीत जिसे सूर्य कुमार पांडेय ने मुनमुन खातिर लिखा :

मेरा चना बना है चुनमुन
इस को खाती बांसगांव की मुनमुन
सहती एक न अत्याचार
चनाजोर गरम!

मेरा चना बड़ा बलशाली
मुनमुन एक रोज़ जब खा ली
खोंस के पल्लू निकल के आई
गुंडे भागे छोड़ बांसगांव बाजा़र
चनाजोर गरम!

मेरा चना बड़ा चितचोर
इस का दूर शहर तक शोर
इस के जलवे चारो ओर
इस ने सब को दिया सुधार
बहे मुनमुन की बयार
चनाजोर गरम!

मेरा चना सभी पर भारी
मुनमुन खाती हाली-हाली
इस को खाती जो भी नारी
पति के सिर पर करे सवारी
जाने सारा गांव जवार
चना जोर गरम!

जब पढ़ता था तब कविताएं लिखता था। जगह-जगह बड़ी-बड़ी पत्रिकाओं में मेरी कविताएं छपती थीं। एक बार मन हुआ कि पराग में भी छपा जाए। पराग में कविताएं भेजीं। कन्हैयालाल नंदन ने वह कविता वापस करते हुए लिखा था कि बच्चों के लिए हमेशा छंदबद्ध कविताएं ही लिखनी चाहिए। फिर बाद में पराग में मेरी कहानियां तो छपीं। लेकिन कविताएं नहीं। लिखी ही नहीं। लेकिन अपने सूर्य कुमार पांडेय ने व्यंग्य से ज़्यादा बच्चों के लिए कविताएं लिखी हैं। सोहनलाल द्विवेदी सूर्य कुमार पांडेय की बाल कविताओं के घनघोर प्रशंसक थे। पांडेय जी ने युवा अवस्था में उन के साथ मंच भी शेयर किया है। सूर्य कुमार पांडेय के खाते में बच्चों के लिए एक से एक नटखट , एक से एक मासूम कविताएं हैं । बचपन की ओस में भीगी हुई। निर्दोष और सुकोमल। व्यंग्य लिखना जितना कठिन होता है , बच्चों के लिए लिखना उस से भी ज़्यादा कठिन। बाल हठ और बाल मनोविज्ञान को जानना दोनों ही किसी लेखक के लिए आसान नहीं। सब के मन को जानना , मापना और समझना भी कठिन ही होता है लेकिन बच्चों के मन को समझना , उसे लिखना और फिर बच्चों के दिल में बस जाना तो जादूगरी ही होती है। अपने सूर्य कुमार पांडेय बच्चों के मन को जानने और उन के दिल में बस जाने का जादू जानते हैं। सूर्य कुमार पांडेय की इसी जादूगरी को सम्मान देते हुए उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने उन्हें बाल साहित्य भारती से सम्मानित करने की घोषणा की है। बाल साहित्य सम्मान से सम्मानित होने के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय सूर्य कुमार पांडेय जी , कोटिश: बधाई ! आप ऐसे ही लिखते रहें और बच्चों से ले कर बड़ों तक को हंसाते , गुदगुदाते खूब सक्रिय और स्वस्थ रहें। बहुत-बहुत बधाई ! आप मित्र लोग भी सूर्य कुमार पांडेय को उन के मोबाइल नंबर 9452756000 पर बधाई दे सकते हैं।

नवनीत मिश्र को साहित्य भूषण


जब हम विद्यार्थी थे , हम उन्हीं की तरह बनना चाहते थे। उन्हीं की तरह बोलना और लिखना चाहते थे। तब के दिनों वह गोरखपुर में स्टार हुआ करते थे । लखनऊ से गए थे लेकिन आकाशवाणी , गोरखपुर की समृद्ध आवाज़ हुआ करते थे। एकदम नवनीत हुआ करते थे । एक समय हमारे लिखे रेडियो नाटकों में वह नायक बन कर उपस्थित हुए। फिर भी हम उन की तरह न बन पाए , न उन की तरह लिख पाए। पर उन का स्नेह खूब पाया है। कोई चार दशक से अधिक समय से वह मुझे अपने स्नेह की अविरल डोर में बांधे हुए हैं। जी हां , हमारे अग्रज और मुझे ख़ूब स्नेह करने वाले , अदभुत कथा शिल्पी , अपनी कहानियों में बार-बार रुला देने वाले , पुरकश आवाज़ और अंदाज़ के धनी , सरलमना , आदरणीय नवनीत मिश्र जी को उत्तर प्रदेश , हिंदी संस्थान का प्रतिष्ठित सम्मान साहित्य भूषण सम्मान देने की आज घोषणा हुई है। सच तो यह है कि साहित्य भूषण भी आज सम्मानित हुआ है। नवनीत जी , आप को बहुत आदर पूर्वक भरपूर बधाई ! हार्दिक बधाई ! आप ऐसे ही श्रेष्ठ और महत्वपूर्ण रचते रहें। आप मित्र भी नवनीत जी को इस नंबर पर उन्हें अपनी बधाई दे सकते हैं। नवनीत जी का मोबाईल नंबर है : 9450000094

Tuesday, 17 September 2019

धूर्तों के धूर्त , कमीनों के कमीने , दुश्मन के महादुश्मन , इवेंट और रणनीति के मास्टर नरेंद्र मोदी

अपनी मां के साथ भोजन पर नरेंद्र मोदी 

अच्छा तो आज पता चला है कुछ मतिमंद और जहरीले विद्वानों को कि नरेंद्र मोदी इवेंट के मास्टर हैं। ग़ज़ब ! अब से जान लीजिए कि नरेंद्र मोदी सिर्फ इवेंट के ही नहीं , रणनीति के भी मास्टर हैं। धूर्तों के धूर्त , कमीनों के कमीने , दोस्त के दोस्त और दुश्मन के महादुश्मन। असंभव को संभव करने वाले।  दुनिया इस का लोहा मानती है। यकीन न हो तो तीन तलाक़ , 370 जैसे कुछ असंभव कृत्य याद कर लीजिए। बिना धूर्तई और कमीनापन के यह मुमकिन नहीं था। बहुत सीधे और सरल थे अटल बिहारी वाजपेयी। महिला आयोग की सदस्य सईदा सईदेन हमीद ने जब तीन तलाक़ खत्म करने के लिए वायस आफ वायसलेस रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी और अटल जी उसे संसद में पेश करने की सोच ही रहे थे कि जामा मस्जिद के शाही इमाम बुखारी ने धमकी दे दी कि अगर यह रिपोर्ट , संसद में पेश हुई , लागू हुई तो देश में आग लगा दी जाएगी। 

अटल जी डर गए , बुखारी की इस ब्लैकमेलिंग में। वह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी। कश्मीर की आग को भी वह कश्मीरियत , जम्हूरियत और इंसानियत से बुझाना चाहते थे। नहीं बुझा पाए। इस लिए कि यह दोनों काम तिहरा तलाक़ और 370 दोनों ही कमीनेपन और धूर्तता के औजार से ही निपटाए जा सकते थे। सरलता , विनम्रता और सादगी से नहीं। सठे साठ्यम समाचरेत की तकनीक की ज़रूरत थी । मोदी ने इसी औज़ार और तकनीक का तागा लिया और इन की ही सुई में धागा डाल कर इन्हें सिल दिया। अब यह बाप-बाप कर रहे हैं और इन से भी ज़्यादा इन के अब्बा और शांति दूत इमरान खान। महबूबा कहती रही , ताल ठोंक कर , पूरी गुंडई से कि कश्मीर में कोई तिरंगा उठाने के लिए भी नहीं मिलेगा। और अब कैमरे पर अपनी शकल दिखाने के लिए भी तरस रही है। ऐसे कानून में जय हिंद हो गई है जिस में दो साल तक कोई सुनवाई ही नहीं है।

यह नोटबंदी और जी एस टी का पहाड़ा नहीं है। कमीनों और धूर्तों के साथ इसी कला का सर्वोत्कृष्ट नमूना है । आप ट्रम्प के मुद्दे पर संसद में मध्यस्थता पर बयान मांगते रहे और वाया राज्यसभा , लोकसभा ला कर 370 को हलाल कर दिया गया। आप राजनीति कर रहे हैं कि प्याऊ चला रहे हैं ? पहले यह तय कर लीजिए। किसी दो कौड़ी के बाबू को ख़रीद कर राफेल फ़ाइल की फोटो कापी करवा कर हिंदू अख़बार में छपवा कर या सी बी आई चीफ़ को बरगला कर वायर के मार्फ़त राजनीति में सनसनी पैदा करने का टोना-टोटका मोदी युग में दीपावली का पटाखा बन चुका है। अमित शाह और मोदी पर हत्या और नरसंहार के फर्जी मामले साबित नहीं हो सके लेकिन आर्थिक अपराध तो चिदंबरम , सोनिया , राहुल और रावर्ट वाड्रा पर साबित हो जाएंगे तब क्या करेंगे। क्यों कि हत्या में गवाह चाहिए और यहां साक्ष्य। गवाह इधर-उधर हो सकते हैं लेकिन आर्थिक अपराध के साक्ष्य नहीं। अटल जी तो एक वोट से सरकार गंवा देने वाले महामना थे। मोदी नहीं।

तब जब कि इस के पहले नरसिंहा राव अल्पमत की सरकार पांच साल चलाने की तजवीज दे गए थे। आप ने उसी महामना अटल की लकीर पर चलने वाली भाजपा समझ लिया मोदी की भाजपा को भी। यही गलती आप ने कर दी और आप के अब्बा इमरान खान ने भी। अभी पी ओ के जैसे कुछ इवेंट भी बस आने ही वाले हैं। ज़रा सब्र कीजिए। जन्म-दिन के इवेंट पर इतना स्यापा गुड बात नहीं है। अभी चचा जाकिर नाइक की आमद बस होने ही वाली है । नीरव मोदी और विजय माल्या के आमद की उल्टी गिनती गिननी शुरू कीजिए। तब तक नर्मदा के तीर पर बैठ कर इवेंट , इवेंट की आइस पाइस खेलिए। काले धन की बैंड बज रही है। अभी कुछ और बारात निकलनी हैं। कुछ और इवेंट प्रतीक्षा में हैं। आप चंद्रयान - 2 और प्रज्ञान की विफलता का , इसरो चीफ के रोने का जश्न मनाइए तब तक। आर्थिक मंदी , जी डी पी का तराना भी है ही आप के पास। गो कि सेक्यूलरिज्म का भुरता बन चुका फिर भी अभी राम मंदिर मसले पर सुप्रीम कोर्ट को कम्यूनल बताने का अवसर बस आप के हाथ आने ही वाला है। तनिक धीरज धरिए। अभी बहुत से गेम , बहुत से इवेंट , बहुत सी धूर्तई , बहुत सारा कमीनापन सामने आने वाला है। बतर्ज लोहा ही लोहा को काटता है। बताइए न कि अपने चिदंबरम पहले ई डी और सी बी आई की कस्टडी से बचने के लिए अग्रिम ज़मानत लेते रहने के अभ्यस्त हो गए थे । अब वही चिदंबरम तिहाड़ में बैठे गुहार लगा रहे हैं कि मुझे ई डी की कस्टडी में दे दीजिए। यह संभव कैसे बना ? अरे वही कमीनापन और वही धूर्तई !

मंदिर निर्माण बिना पिछड़ी और दलित जाति की मदद के भाजपा कभी नहीं कर सकती

कल्याण सिंह 

कल्याण सिंह भाजपा में पिछड़ी जाति की राजनीति के लिए ही सर्वदा उपस्थित किए गए। किसी पूजा-पाठ के लिए नहीं। सुनियोजित ढंग से। इस तरह कि इस बात को तब कल्याण सिंह भी नहीं समझ सके थे। भाजपा को तब राम मंदिर के लिए पिछड़ों की ज़रूरत थी। बिना पिछड़ी जाति के राम मंदिर आंदोलन को सफलता नहीं मिल सकती थी। न ही , विवादित बाबरी ढांचा बिना पिछड़ी जातियों के भाजपा ध्वस्त करवा सकती थी। कल्याण सिंह इसी कार्य और इसी रणनीति के तहत मुख्य मंत्री बनाए गए थे। विनय कटियार , नरेंद्र मोदी , उमा भारती , गोविंदाचार्य आदि बहुतेरे पिछड़े नेता अग्रिम पंक्ति के लिए इसी गरज से उपस्थित और सक्रिय किए गए थे। सवर्णों के बूते भाजपा अपने इस मकसद को किसी सूरत प्राप्त नहीं कर सकती थी। क्यों कि सवर्णों के पास न तो भीड़ है , न तोड़-फोड़ की वह स्किल और हुनर। आप इसे मेहनत का रंग भी दे सकते हैं। फिर उत्तर प्रदेश में भाजपा की राजनीति में कल्याण सिंह के जातीय आधार का मुकाबला न तो तब राजनाथ सिंह कर सकते थे , न कलराज मिश्र , न लालजी टंडन। राज्यपाल की पारी खत्म करने के बाद अब इस समय भी कल्याण सिंह का चेहरा इसी लिए आगे किया गया है। तब बाबरी ढांचा ध्वस्त करना मकसद था , अब राम मंदिर निर्माण का मकसद सामने है।

इस लिए भी कि यह मंदिर निर्माण बिना पिछड़ी और दलित जाति की मदद के भाजपा कभी नहीं कर सकती। सवर्णों के वश का यह है भी नहीं। भाजपा जानती है कि कब किस का कहां और कैसे बेहतर उपयोग किया जा सकता है। याद कीजिए कि एक समय था जब कल्याण सिंह का कद इतना बढ़ गया था कि अटल , आडवाणी के बाद तीसरे नंबर पर कल्याण सिंह का नाम लिया जाता था। लेकिन कुछ तो कल्याण सिंह में अचानक आए अहंकार और बहुत कुछ राजनाथ सिंह की शकुनी बुद्धि ने कल्याण सिंह को अटल बिहारी वाजपेयी से सीधे, सीध लड़वा दिया। कल्याण सिंह परास्त हो गए और भाजपा ध्वस्त हो गई उत्तर प्रदेश में। वह तो नरेंद्र मोदी की आंधी में 2014 के लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को धो-पोंछ कर फिर से खड़ा किया। न सिर्फ़ खड़ा किया भाजपा को बल्कि मुलायम , मायावती की बंदर-बांट से उत्तर प्रदेश को बाहर निकाला।

बहरहाल बात इतनी बिगड़ चुकी है कि अब उत्तर प्रदेश में पिछड़ी और दलित जाति की राजनीति बिना जहर उगले , नफरत की बात किए , मुमकिन नहीं। जहर उगलने की , नफरत बुझे तीरों से सवर्णों को अपमानित करने की नीति ही पिछड़ी जाति की , दलित राजनीति की अब नई राजनीतिक आधारशिला है। बिना इस व्याकरण के पिछड़ी और दलित राजनीति का एक वाक्य नहीं लिखा जा सकता अब। कम से कम उत्तर प्रदेश की राजनीति में। बल्कि देश में भी पिछड़ी और दलित राजनीति का यही राजमार्ग है। कल्याण सिंह इस राजमार्ग के पुराने योद्धा हैं। कोई अचरज की बात नहीं। याद कीजिए कि अभी बीते साल ही बतौर राज्यपाल , राजस्थान लखनऊ की एक सभा में कल्याण सिंह कह गए थे कि जो भी कोई पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ बोले , कोई भी हो उसे तुरंत थप्पड़ मार दो ! जाहिर है संवैधानिक कुर्सी पर बैठे किसी राज्यपाल की यह भाषा नहीं थी। राज्यपाल की मर्यादा ताक पर रख कर यह एक पिछड़ी जाति के नेता की जहर बुझी भाषा थी। भाजपा को इस अमर्यादित भाषा पर न तब ऐतराज था , न अब है। कल्याण सिंह भाजपा के लिए अब भी एक संभावना हैं। भाजपा के पिछड़ी जाति के आधार को और मज़बूत करने की संभावना। यह बात सर्वदा याद रखिए कि भारत में जाति एक कड़वी हक़ीकत है। सत्ता भोगने के लिए कामयाब औज़ार। और अफ़सोस कि इस मर्ज की अब कोई दवा नहीं है। कोई काट नहीं है। भूल जाइए कबीर के उस कहे या लिखे को :

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

भारतीय राजनीति और आरक्षण के खेल में जाति के इस मामले में कबीर अब पूरी तरह अप्रासंगिक हैं ।