Monday 15 November 2021

लेकिन मन्नू भंडारी को वामपंथी बता कर उन पर अनर्गल आरोप लगाने से परहेज़ करें

दयानंद पांडेय 


सवाल सिर्फ़ मृत्यु का नहीं है। सच यह है कि मन्नू भंडारी वामपंथी नहीं थीं। मन्नू जी की रचनाओं में भी वामपंथ की धज नहीं है। उलटे मन्नू भंडारी तो राजेंद्र यादव की परित्यक्ता थीं। ज़िंदगी भर यह त्रास ढोया मन्नू जी ने। अलग बात है कि राजेंद्र यादव भी वामपंथी नहीं थे। मन्नू जी की रचनाओं पर वामपंथी आलोचकों ने कभी कुछ लिखा भी नहीं। बल्कि एक वामपंथी लेखक जो राजेंद्र यादव के प्रिय भी रहे हैं वह तो दबी जुबान ही सही मन्नू भंडारी पर चोरी का आरोप भी लगाते रहे हैं कि उन की रचना को चुरा कर मन्नू भंडारी ने महाभोज लिखा है। वह रचना जिसे उन्हों ने हंस में छपने के लिए भेजा था।

वामपंथी आलोचना की ध्वजा उठाए नामवर सिंह ने मन्नू भंडारी की कभी नोटिस भी नहीं ली। सिर्फ़ इस लिए कि वह वामपंथी नहीं थीं। तब जब कि दोनों की पारिवारिक मित्रता थी।  घनिष्ठ्ता थी। रोज का आना-जाना था। बावजूद इस सब के मन्नू भंडारी हिंदी की बड़ी लेखिका हैं। रहेंगी। एक से एक कालजयी रचनाएं हैं मन्नू भंडारी के पास। महाभोज, आप का बंटी जैसी रचनाएं वामपंथी हो कर लिखी भी नहीं जा सकतीं । 

मन्नू जी शायद हिंदी की इकलौती लेखिका हैं जो अपने पति राजेंद्र यादव की परित्यक्ता हो कर भी दांपत्य धर्म निभाया और राजेंद्र यादव की ज्यादतियों को सार्वजनिक कर उन्हें निन्दित भी खूब किया। अलग रहने के बावजूद राजेंद्र यादव की सेवा भी की और उन्हें पर-स्त्री गमन के लिए कभी माफ़ नहीं किया। राजेंद्र यादव को छलात्कारी कहती रहीं। खुल्लमखल्ला। 

तब जब कि हिंदी ही नहीं और भी भाषाओं की बहुत सी लेखिकाएं परित्यक्ता हैं, लेखक या अलेखक की पत्नी हैं पर लब सिले रहती आई हैं। महादेवी वर्मा से लगायत कितनी ही लेखिकाओं का यह काला सच है। बल्कि बहुत सी स्त्री लेखिकाएं भयंकर रुप से बेवफ़ा भी हैं , उन का स्कोर भी जबरदस्त है पर सार्वजनिक रुप से सती सावित्री का रुप धरे रहती हैं। लेकिन मन्नू जी पर कोई भूल कर भी कोई एक आक्षेप नहीं लगा सकता। 

फिर मन्नू जी कथा लेखिका ही नहीं, पटकथा लेखिका भी बहुत अच्छी हैं। फिल्मों और धारावाहिकों का लेखन दिल्ली में रह कर किया है। रजनीगंधा , स्वामी जैसी रोमैंटिक फ़िल्में , रजनी जैसे लोकप्रिय धारावाहिक मन्नू जी के खाते में हैं।

 मोहन राकेश के अकेले होते बेटे और उन के टूटते दांपत्य को आधार बना कर आप का बंटी जैसा उपन्यास लिखना मन्नू जी के ही वश का था। तब जी कि राजेंद्र यादव और मोहन राकेश की प्रगाढ़ मित्रता मशहूर है। मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की तिकड़ी आज भी हिंदी जगत में मशहूर है। बल्कि कमलेश्वर और राजेंद्र यादव लगभग शिष्य थे , मोहन राकेश के।

कम लोग जानते हैं कि आपातकाल में मन्नू भंडारी को इंदिरा गांधी ने पद्मश्री देने की पेशकश की थी। पर मन्नू जी ने बड़ी शालीनता से इमरजेंसी का विरोध दर्ज करते हुए पद्मश्री लेने से इंकार कर दिया था। तब जब कि वामपंथीयों ने तो इमरजेंसी का समर्थन किया था।

किसी भी को बिना जाने समझे मन्नू भंडारी जैसी बड़ी लेखिका पर कोई अनर्गल आरोप लगाने से भरसक बचना चाहिए। परहेज करना चाहिए। सहमति-असहमति अपनी जगह है। मतभेद भी अपनी जगह है। होते रहते हैं।

रही बात वामपंथीयों की तो वह तो भगत सिंह , चंद्रशेखर आज़ाद और राम प्रसाद बिस्मिल को भी वामपंथी बता देते हैं। प्रेमचंद और अमृतलाल नागर को भी वामपंथी बता देते हैं। जब कि  ज़िंदगी भर वामपंथ की सेवा करने वाले राहुल सान्कृत्यायन , रामविलास शर्मा , निर्मल वर्मा जैसे लेखकों को आखिरी समय में वामपंथ से धकिया देते हैं। अपमानित कर देते हैं। और तो और नामवर सिंह तक को आखिरी समय में निर्वासित कर अकेला कर दिया था। क्यों कि यह लोग वेद उपनिषद और भगवान की बात करने लगे थे।

नतीज़ा यह हुआ कि  नामवर सिंह का जन्म-दिन भाजपाई मनाने लगे थे। राजनाथ सिंह जैसे लोग उन्हें सम्मानित करने लगे थे। बातें बहुत सी हैं। इन का विस्तार भी बहुत। पर सिर्फ़ इस लिए कि कुछ वामपंथी मन्नू भंडारी को अपना बता कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं तो आप उन पर कुपित हो कर जद-बद बकने लगें। यह गुड बात नहीं है। मन्नू जी को नमन !

कोई भी लेखक वामपंथी , भाजपाई , कांग्रेसी आदि नहीं होता। ऐसा सोचना संकीर्णता है। लेखक , सिर्फ़ लेखक होता है। सभी का होता है। तो विदा और शोक की वेला में मन्नू भंडारी पर अनर्गल और अशोभनीय टिप्पणी कर  खुद को अपमानित करने से परहेज करें। 

आमीन !

2 comments:

  1. मन्नू जी को नमन

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  2. बिलकुल सही लिखा । आजकल किसी को भी कुछ भी कह कर चर्चा में आने का नया चलन निकला है, इस प्रक्रिया में लोग समय की मर्यादा भी भूल जाते हैं। लेकिन ऊपर मुँह करके सूरज पर थूकने का क्या नतीजा होता है ये तो जानने वाले जानते ही हैं न

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