Saturday, 23 November 2013

तो क्या तरुण तेजपाल की झांसेबाज़ी रंग लाएगी, कि जेल की हवा खिलाएगी ?

तरुण तेजपाल या आशाराम जैसे लोग समाज और कानून को इतना कमजोर और गधा क्यों समझते हैं? आशाराम कहते थे कि मैडम और उन के सुपुत्र के इशारे पर मुझे फंसाया जा रहा है। अब यही राग तरुण तेजपाल भी आलाप रहे हैं कि राजनीतिक कारणों से मुझे फंसाया जा रहा है। तो क्या जो पश्चाताप के वह माफ़ी के स्वर थे, एडीटरी ६ महीने के लिए छोड़ने का जो शहीदाना ज़ज़्बा था, वह फ़र्ज़ी था? कि कानून की एक नज़र पड़ते ही सब धूल चाट गया? सच तो यह है कि वह चाहे आशाराम हों चाहे तरुण तेजपाल दोनों की ही खेती चार सौ बीसी पर टिकी है। दोनों ही का उद्योग झांसेबाज़ी का है। आशाराम का सारा सच  प्याज की परत दर परत सब के सामने है। तरुण तेजपाल का भी सच सब के सामने है। लेकिन तब चूंकि  उन्हों ने एन डी ए के नेताओं के खिलाफ़ एक फ़र्जी स्टिंग चलाया था सो धर्मनिरपेक्षता की आड़ में लोगों ने उस नाज़ायज़ स्टिंग को भी ज़ायज़ मान लिया था। अर्जुन सिंह का पालतू कुत्ता बन कर तरुण तेजपाल ने जो शोहरत पाई थी, जो तेज कमाया था वह इतनी जल्दी धूल धूसरित हो जाएगा, यह भला कौन जानता था? एक स्त्री देह की भूख में वह तेज भस्म हो जाएगा यह भी कौन जानता था? आशाराम जैसा ड्रामा और लफ़्फ़ाज़ी तो तरुण तेजपाल ने भी शुरु कर ही दी है। गोवा पुलिस दिल्ली में तरुण तेजपाल की फ़िराक में  है और उन का कहीं अता-पता नहीं है। तू डाल-डाल, मैं पात-पात का खेल जारी है।

बताइए कि आप एक फ़र्जी कंपनी के नाम पर फ़र्ज़ी सौदा कर नेताओं के घर में घुस कर ज़बरदस्ती चंदा देने पर आमादा हो जाएं और उस सब को हिडेन कैमरे में उतार कर सब के सामने परोस दें और राणा प्रताप बन कर हुंकार भी भरें कि यह देखिए, मैं ने फला-फला को नंगा कर दिया ! और हमारे देश में धर्मनिरपेक्षता के जाड़े में कुम्हलाए लोग इस पर वाह-वाह ! की टेर लगाने लगे तो कुछ क्या बहुत अजीब था। एक मूर्ख  बंगारु
लक्ष्मण जो भाजपा का तब राष्ट्रीय अध्यक्ष था चंदे की रकम जल्दी-जल्दी मेज़ की दराज में सहेज रहा है, ऐसे जैसे बाप की जागीर सहेज रहा हो और पूछ रहा है कि डालर में भी मिल सकता है क्या? सोचिए कि भाजपा में भी कैसे-कैसे नवरत्न भरे पड़े हैं। कि चंदा भी डालर में बटोरना चाहते हैं। जाहिर है कि बंगारु लक्ष्मण यह बात तो जानते ही थे कि यह चंदा के रुप में रिश्वत है, सो डालर की प्यास भी जताते जा रहे थे। एक महिला हैं जया जेटली जो जार्ज फ़र्नांडीज़ की महिला मित्र हैं और सच्ची महिला मित्र हैं यह उन्हों ने अब तो सौ फ़ीसदी साबित कर दिया है कि अल्जाइमर जैसी बीमारी से जूझ रहे जार्ज को भावनात्मक संबल देने के लिए इस उम्र में भी कि लोग क्या कहेंगे को बिसार कर हाईकोर्ट तक का दरवाज़ा खटखटा लेती हैं और हाईकोर्ट से आदेश ले कर ही सही उन से नियमित मिलती भी रहती हैं। उन को बार-बार सैल्यूट करने को मन करता है इस एक नेक काम के लिए। तो जार्ज के घर में इन्हीं जया जेटली को भी चंदा देने के लिए तरुण तेजपाल और उन की तहलका टीम पहुंची कि लीजिए यह चंदा, और हमारी एक रक्षा सौदे की डील में मदद कीजिए। जया बार-बार कहती हैं कि डील में मदद करने के लिए चंदा देने की ज़रुरत नहीं है। मैं वैसे ही कह दूंगी। लेकिन तरुण तेजपाल की टीम है कि बस चंदा ज़बरदस्ती उन्हें थमा देना चाहती है। जया चंदे की रकम फिर भी बंगारु लक्ष्मण की तरह हाथ में नहीं लेतीं और कहती हैं कि यह कोषाध्यक्ष को दे दीजिए। और रसीद ले लीजिए। लेकिन तहलका ने इस ज़बरदस्ती दिए गए चंदे को भी स्टिंग का मसाला बना कर परोस दिया और धर्मनिरपेक्षता की मोतियाबिंद के मारे लोगों ने तरुण तेजपाल को सर पर बिठा लिया। और अब इसी धर्मनिरपेक्षता की मोतियाबिंद के मारे लोग यह भी कहना शुरु कर चुके हैं कि तरुण तेजपाल ने चूंकि भाजपाइयों का स्टिंग किया था सो भाजपाई उन्हें फंसा रहे हैं। हद है यह तो !


सुहेब इलियासी की याद है आप लोगों को? भारत में फर्ज़ी स्टिंग मास्टरी के लिए बहुत जाने गए थे एक समय।
याद है ! तो चलिए उन के भी फ़र्ज़ी स्टिग भी याद होंगे आप लोगों को। नहीं याद है तो चलिए हम याद दिला देते हैं। सुहेब इलियासी एक लड़की ले कर कुछ फ़िल्मी कलाकारों के पास पहुंचते थे। लड़की उन कलाकारों को अपने देहजाल में फंसाती थी और जो न फंसना चाहे उसे ज़बरदस्ती फंसाती थी। अब बताइए कि दुनिया में ऐसे कितने मर्द होंगे जो किसी स्त्री के देह आमंत्रण को आसानी से ठुकरा देंगे? खैर वो फ़िल्मीे कलाकार भी नहीं ठुकराते थे और सुहेब इलियासी  के स्टिंग में फंस जाते थे। और सुहेब इलियासी इसे इंडिया टी वी. पर दिखाते थे। लंबे-चौड़े नैरेशन के साथ। चीख-चीख कर। याद कीजिए कि शक्ति कपूर जैसे कई सिने कलाकार  सुहेब इलियासी के इस लड़की जाल के ट्रैप में आ गए थे। कहते हैं कि सुहेब इलियासी  ने तब कई  कलाकारों को ब्लैकमेल भी किया था और खूब पैसा बटोरा था। कहते यह भी हैं कि तब राजेश खन्ना तक उन के इस ट्रैप में आ गए थे। लेकिन उन से डील हो गई सो वह परदे व्पर नहीं आए। ऐसी और भी कई कथाएं हैं। और इन्हीं आबिद सुहेल के खाते में चीख-चीख कर एक क्राइम शो भी पेश करना भी दर्ज है। और बाद के दिनों में उन के दूध में इतना उबाल आ गया कि वह अपनी पत्नी की हत्या के जुर्म में जेल की हवाखोरी पर चले गए।
और अब देखिए कि एक और फर्ज़ी स्टिंग मास्टर तरुण तेजपाल जेल की हवाखोरी पर बस निकलने ही वाले हैं। धर्मनिरपेक्षता का अंध मोतियाबिंद उन के हाथ से सरक चुका है। आशाराम की तरह वह झांसेबाज़ी वाली ट्रिक पर आ चुके हैं। और कह रहे हैं कि मुझे फंसाया गया है। लेकिन आप को क्या लगता है कि उन के यह ट्रिक काम आ जाएंगे? गोवा में जो भाजपा के अलावा किसी और की सरकार होती तो शायद हां। पर वहां भाजपा सरकार उन्हें छोड़ने वाली है नहीं। अभी बहुत दिन नहीं हुए एक दूसरे पत्रकार तरुण विजय पर भी भोपाल में उन की महिला मित्र जो मुस्लिम थी की हत्या में उन का नाम घसीटा गया, उन के टूटते-रिसते दांपत्य की कहानियां भी खूब उछाली गई पर वह सारी जांच में बेकसूर साबित हुए।

तो क्या तरुण तेजपाल भी जांच में बेकसूर साबित होंगे?
मुझे नहीं लगता। ठीक है कि लिफ़्ट की क्लिपिंग सी सी कैमरा वहां न होने से नहीं है। पर क्या उस लड़की की आहत आंखों और आहत देह-मन के कमरे से तरुण तेजपाल निकल भागेंगे? कैसे भला? जो कानून आशाराम के झांसे में नहीं आया, वही कानून तरुण तेजपाल के झांसे में कैसे झुलस जाएगा भला? सिर्फ़ इस लिए कि वहां भाजपा सरकार है? तो क्या इंडियन पेनल कोड राजस्थान के लिए अलग है और गोवा के लिए अलग? तरुण तेजपाल का पक्ष लेने वाले मित्रों , बंद कीजिए यह सारा प्रलाप और तरुण तेजपाल को कानून की आंच में तपने दीजिए। तरुण तेजपाल निर्दोष होंगे  तो खुद बाहर आ जाएंगे नहीं तो उन्हें भुगतने दीजिए जेल की हवा। यह तरुण तेजपाल जैसे लोग ही हैं कि जिन के कारण मीडिया की महिलाओं को समाज अब बहुत अच्छी नज़र से नहीं देखता। औरतों की हर कीमत पर आगे बढ़ते जाने की भूख भी इस के लिए ज़िम्मेदार है। हालां कि यह मौका नहीं है यह सवाल करने का। पर फिर भी उस पीड़ित महिला पत्रकार से पूछ ही लेता हूं कि जब पहली बार यौन उत्पीड़न हुआ, लिफ़्ट में आप की बिकनी उतार कर तरुण तेजपाल झुका, आप का यौन उत्पीड़न किया, जैसा कि अपनी चिट्ठी में लिखा है आप ने, तो तभी क्यों नहीं पुलिस में जा कर रिपोर्ट दर्ज करवाई? क्यों नहीं वह मीटिग और वह गोवा छोड़ दिया तभी? आखिर किस दबाव और किस लालच में वहां बनी रहीं? और फिर जब दूसरी बार भी उत्पीड़न हुआ तब भी क्यों नहीं पुलिस में गईं? यहां-वहां आफ़िशियल मेल भेज कर, फ़ोन कर के न्याय मांगने की मूर्खता क्या इतनी ज़रुरी थी? आप पत्रकार हैं और अपने ही हितों और कानून से आप वाकिफ़ नहीं हैं?

शाहजहांपुर की एक नाबालिग लड़की राजस्थान में इतने बड़े फ़्राड आशाराम के द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार हो कर दिल्ली में आ कर रिपोर्ट लिखा सकती है और आप दिल्ली में रह कर भी इतने दिन बाद भी रिपोर्ट नहीं दर्ज करवा पातीं? तो यह क्या है? अगर गोवा पुलिस न जागती तो क्या आप अभी भी सोई रहतीं? तरुण तेजपाल तो माफ़ी मांग कर प्रायश्चित भी बड़ी मासूमियत के साथ घोषित कर ही चुके थे। लेकिन आप की दिक्कत मैं समझ सकता हूं फिर भी। क्यों कि हमारी सी बी आई का डाइरेक्टर बलात्कार को जब इंज्वायमेंट की बात कहता हो और हमारा देश, समाज और कानून उसे सज़ा देने की बजाय उस की इस बात को ही भूल जाने की क्षमता रखता हो तो इस धिक्कार समय में कोई जिए भी तो कैसे, और कोई प्रतिरोध करे भी तो कैसे? आखिर यह तरुण तेजपाल नाम का गिद्ध भी तो  तुम्हारे पिता का दोस्त और सहकर्मी ही तो है। तुम्हारा तो खैर बलात्कारी भी है ! माफ़ मत करना इसे किसी भी कीमत या किसी भी प्रलोभन पर, यह कसम है तुम्हें इस अपरिचित दोस्त की ! हालां कि मैं एक सत्य यह भी जानता हूं कि हमारे देश में न्याय भी लक्ष्मी की दासी है। और हां, गांधी का वह एक कहा भी याद आता है कि साध्य ही नहीं, साधन भी पवित्र होने चाहिए। तरुण तेजपाल, सुहेब इलियासी या आशाराम जैसे व्यापारियों और धूर्तों को लेकिन यह बात भला कैसे गले उतरेगी, हम यह भी जानते हैं।  आमीन !

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज रविवार को (24-11-2013) बुझ ना जाए आशाओं की डिभरी ........चर्चामंच के 1440 अंक में "मयंक का कोना" पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. तफसील से लिखा भाई -संतुलित और जबर्दस्त भी! यह एक अंदरूनी प्रेम कहानी (?) थी मगर तेजपाल का घड़ा भर चुका था -खबर हो गयी ज़माने को। आशाराम के साथ भी यही हुआ -नहीं तो बित्ता भर की लड़की और एक मातहत की इतनी ही हिमाकत कि वे साम्राज्य को पटखनी दे दें !

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  3. अच्छा , संतुलित लेखन।

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  4. बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन। सेकुलर किस्म के प्राणियों की आपने अच्छी खबर ली है।अपने आपको सेकुलर घोषित करने वाली यह होमोसेपियन्स की एक खतरनाक नस्ल है।

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  5. आपने अच्छा लिखा,समय हर आदमी की खबर रखता है,अपने आप को साफ सुथरा दिखाने वाला अंदर से इतना गन्दा,शर्म आती है,इनकी करतूत सुनकर आपको धन्यबाद

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  6. सटीक विवेचना की है, बधाई

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  7. aapse yahi ummid thi. achha likhaa aapne. shukriya.
    manoj kumar
    editor
    shodh patrika SAMAGAM, Bhopal

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