Friday 24 November 2023

गहरे संवेदनशील उच्छ्वास से चंदन का लेप और मालकौंस राग में सनी तीर्थ सी समुज्जवल विपश्यना

 डा० रंजना गुप्ता 

‘विपश्यना’ का चरम यथार्थ’

देह, प्रेम में एक आवश्यक वस्तु है अनिवार्य नहीं, ये मेरा मानना है,पर देह के बिना तो कुछ भी संभव नहीं ! ‘शरीरमाद्यम खलु धर्म साधनम् '

देह हमारी वायवीय चुनौतियों के मध्य भी सदा से आ ही जाता है। संपूर्ण समर्पण प्रेम की एक थाती है। पर सृष्टि के संचालन के लिए संपूर्ण समर्पण बिलकुल आवश्यक नहीं है। स्त्री पुरुष की दैहिक संरचना इतनी गहन और परिपूर्ण है, इतनी दाहक और चुंबकीय है, इतनी मारक और विस्फोटक है, कि स्त्री पुरुष जहाँ भी एकांत में होते हैं, उन का प्राकृतिक आकर्षण अपना कार्य करने लगता है। इसी लिए स्त्री देह को अग्नि के समक्ष कहा गया है। प्रख्यात लेखक दयानंद पांडेय जी का वाणी प्रकाशन से अभी शीघ्र ही प्रकाशित हुआ उपन्यास ‘विपश्यना में प्रेम ’ अपनी ख्याति की ऊंचाइयों को आजकल छू रहा है। इस का तात्पर्य है, कि उन की यह कृति अपनी संपूर्णता में, कथात्मकता के अनिवार्य तत्वों के कारण, प्रस्तुतीकरण के लालित्य और शैली की विरलता आदि सभी समवेत औपन्यासिक गुणों से संपन्न होने से स्वयं में अद्भुत अवश्य है।

विनय और दारिया मुख्य दो पात्रों के मध्य घटित होने वाले इस कथा प्रसंग में बाक़ी पात्र लगभग गौण हैं। दैहिक आकर्षण को और दैहिक संबंधों को वर्णनात्मक शैली में रचते हुए प्रथम दृष्टि में यह उपन्यास कहीं कहीं वल्गर लगा मुझे, पर शीघ्र ही इसके साध्य या मंतव्य का बोध होते ही मन की भावना और धारणा दोनों पूर्णतः बदल गई।

संतानोत्पत्ति, ईश्वरीय विधान में स्त्री पुरुष संबंधों का लक्ष्य भी है और कारण भी ! प्राचीन काल में विवाह व्यवस्था ही इस हेतु निर्मित की गई, ताकि संयमित समाज, दैहिक आवश्यकताओं की नैतिक परिधि में रह कर पूर्ति भी कर सके और संतानोत्पत्ति द्वारा सृष्टि को आगे भी बढ़ा सके। प्रकृति का कार्य मनुष्य और सभी प्राणियों को संपादित करना ही है, ऐसी बाध्यता भी देह के कारण ही है। कोई विरला ही होगा, जो इस घाट न आया हो, या संन्यासी या फिर कोई महा मनस्वी ब्रह्मचारी !

प्राचीन काल में नि:स्संतान दंपति या राजाओं के लिए संतानोत्पत्ति के लिए एक प्रथा प्रचलित थी, जिसे नियोग कहते थे, महाभारत काल में इस विधि द्वारा ही पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर जी का जन्म भी हुआ था। नियोग का सुंदर वृतांत इस विपश्यना उपन्यास में मिलता है। दयानंद जी ने इस विधि को आश्चर्य जनक रूप से विपश्यना के शिविर में क्रियान्वित किया। वास्तव में नियोग की व्यवस्था उन दंपत्तियों के लिए थी, जो किन्हीं कारणवश संतानोत्पत्ति में असमर्थ हैं, और कुल वंश चलाने के लिए संतान प्राप्ति के इच्छुक भी हैं। नियोग का नियम यह भी था, कि इसे आनंद हेतु न किया जाए , बल्कि संतानोत्पत्ति ही प्रथम और अंतिम लक्ष्य हो। पर यहां तो दारिया ने कुछ स्पष्ट ही नहीं किया। और नायक को अपने रूप यौवन के जाल में फंसा कर,अपनी देह के अनंतिम आनंद में ऊभ चूभ करने दिया। लेकिन उस का स्त्री मन अवश्य संयमित और पवित्र रहा, जो कार्य-कारण संबंध की पूर्ति के बाद दैहिक स्तर पर निष्प्रयोज्य हो गया। संयमित और निस्पृह भी ! 

विपश्यना शिविर जहां लोग मन को साधने का, सांसों को बांचने का लक्ष्य ले कर आते हैं, वहां पर यह साधना शिविर किसी की मौन कामना किंबहुना किसी की याचना शिविर में परिवर्तित सा हो जाता है। ये सब कुछ मात्र आनंद हेतु न हो कर किसी निर्भ्रांत प्रयोज्य हेतु जब होता है, तो विपश्यना की निर्विकार निष्काम साधना भी अकस्मात् पुष्पित और पल्लवित हो जाती है। धन्य होती है, दारिया भी ! जो गर्भ धारण की कामना से आ कर विपश्यना शिविर को कोई उज्ज्वल सा अर्थ दे जाती है। उपन्यास का अंत इतना मर्मभेदी, रोमांचक और पवित्र है, कि मन आनंद से विभोर हो उठता है। उपन्यास पढ़ते समय जो दैहिक मांसलता मन पर आरोपित हो कर सात्विक भावों पर थोड़ी प्रत्यंचा खींचती सी दिखी थी ,वह फिर अपने हव्य अर्थात् उपन्यास के परिपुष्ट ध्येय को पा कर परितृप्त हो जाती है। अंत में गंगा की धार सा पावन, उपन्यासकार का मंतव्य थोड़ा सा हिचकते नाक भौं सिकोड़ते मन के अनमनेपन पर भी, एक गहरे संवेदनशील उच्छ्वास से चंदन का लेप सा लगा जाता है !

विपश्यना शिविर के अविरल मौन की राजधानी में रची गई यह रचना मन को अंत में अभिभूत कर ही जाती है। घंटियां , चेतनाएं , सावधानियां  ,वर्जनाएं , निषेधाज्ञाओं के सारे पुल उस देह गंध की मदिर बाढ़ में बह जाते हैं। वास्तव में उस सागर मंथन से जो नवनीत निकला, वह तो शुद्ध बुद्ध प्रज्ञा ही था न ! सृजन साधना के कारण ही यह वासना भी मालकौंस राग बन जाती है, और तीर्थ सी समुज्जवल बन जाती है सारी कामुकता !

विनय एक माध्यम है इस उपन्यास में, उपन्यास की नायिका की लक्ष्य पूर्ति का ! संतान कामना का !

यही सहज भाव बोध का सत्य ही वास्तव में उपन्यास की सार्थकता है,और उपन्यास की आत्मा भी वही है, जिस बिंदु को दयानंद पांडेय जी ने उभारा है दैहिक संवादों में। मौन की मुखरता में। वासना के चरम आनंद में। यदि उस की परिणति और लक्ष्य दोनों इतने सत्य और शिव न होते, तो ये उपन्यास सुंदरम् भी कदाचित् नहीं होता !

दयानंद पांडेय अपने औत्सुक्य पूर्ण औपन्यासिक कथानक रचने के लिए और अपनी बेबाक़ पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं। उनकी कृतियां , ब्लॉग और फ़ेसबुक वाल उन का व्यक्तिगत चरित्र सब कुछ एक अनोखे तालमेल के साथ हमारे समक्ष उपस्थित होता है। वे दोहरी ज़िंदगी नहीं जी पाते। उन का जीवन दर्शन अपनी संपूर्ण मौलिकता के साथ समाज और परिवार में एक विराट सोच के साथ उपस्थित भी है।

मुझे उन के इस कृतित्व में कहीं प्रेम दृष्टिगत नहीं होता ! वास्तव में है भी नहीं। क्यों कि दारिया बहुत योजनाब्द्ध तरीक़े से अपनी मंशा को अपने ध्येय को पूर्ण करती है। उसे विनय से संतान के सिवा कुछ नहीं चाहिए। वह संतान के लिए ही विनय से रमण करती है ! संपूर्ण समर्पण और दैहिक प्रेम का लक्ष्य यहां महज़ दैहिक संतृप्ति नहीं, संतानोत्पत्ति है। इसी कारण उस का कार्य या मंतव्य सफल होते ही, वह अपने देश रुस अपने पति के साथ वापस चली जाती है। और हक़बकाये से विनय को सूचित करती है, पुत्र होने के बाद ! यदि प्रेम होता, तो वह अपने पति को छोड़ कर यहीं कहीं भारत में विनय के आसपास रहना चाहती। सो प्रेम तो नहीं है। हां , उस के प्रचंड पौरुष की लालसा में दारिया अवश्य उस के पास आई थी। और जहां तक विनय का प्रश्न है, वह अवश्य भटकता हुआ लगता है। गफ़लत उसे ही हुई। देहाकर्षण उसे ही था। धोखे में भी वही था। इसी लिए कहते हैं, न स्त्री को समझना बहुत कठिन है ! विनय पूर्ण रूप से सांसारिक व्यक्ति भी है। थोड़ा झटका लगता है उसे, जब दारिया जाने लगती है, पर शीघ्र ही वह संभल जाता है। अपने दैनिक जीवन में व्यस्त भी हो जाता है। यहां पर विपश्यना के मूल लक्ष्य से भी लोगों की भटकन रेखांकित हुई है। साधु-साधु कहना अलग बात है, साधु बनना बिलकुल अलग ! लोग शिविर में मन की शांति हेतु आते अवश्य हैं, पर विपश्यना के वास्तविक लक्ष्य को कितने ही लोग प्राप्त कर पाते हैं, या आज तक कर पाए हैं  ?

जीवन बहुत अद्वितीय है,अद्भुत है ! इस की नाना संभावनाओं, क्रियाकलापों, घटनाओं, दुर्घटनाओं, संयोगों, वियोगों को समझना समझाना असंभव है,और गुत्थियों को सुलझाना विकट असंभव ! 

वास्तव में चंचल मन सहज ही विकृतियों के दबाव में आ जाता है। स्थान, समय, नीति और अनीति देखने का उस के पास ह्रदय नहीं होता है। न समय होता है। उतावला सा मन अपनी बुनावट में वह सृष्टि के आदि से ही बैचेन सा है। मन ऐसा ही है। इसे साधने की अनेकों विधियां खोजी गईं। अनेक वर्जनाएं लादी गईं। और अनेक प्रतिबंध थोपे गए। पर मन तो मन है। टस से मस न हुआ, आज तक ! इसी मन की दुर्निवार शक्ति के कारण ही अनेक राजा भोगी बन गए , अनेक भोगी योगी ! 

ये मन का ही हठयोग है,कि तनिक सी देर में कभी धूप, कभी छाया बन कर हमें रिझाता है, तो कभी खिजाता भी है !

इसी मन की करतूत से विवश हुआ था विनय भी। वरना अपने परिवार में लगभग सुखी और समर्थ ही तो था वह। थोड़ी विसंगतियां , थोड़ी असहजता, और थोड़ी अन्मस्यकता से ऊबा हुआ विनय, इस मौन की राजधानी में आया तो। पर जब तक ध्यान की अवधारणा, सांसों का व्यतिक्रम समझता, तब तक देह धर्म ने मन के अनुशासन को मानने से इंकार कर दिया। और वह रूसी बाला के देह में विपश्यना की खोज में रम गया। तल्लीन हो गया। उसे अंदाज़ा भी नहीं था, कि उस का उपयोग किया जा रहा है। सदा पुरुष ने स्त्री का उपभोग किया, पर यहां स्थिति दूसरी है। एक स्त्री भरसक उस को , उस के ईमान और चरित्र से अपदस्थ कर रही थी। और उसे अपना उपभोग्य बना रही थी। पर विनय मात्र देहगंध में डूबा हुआ सत्यता की थाह नहीं पा सका। हालां कि उस ने किंचित् सफलतापूर्वक विपश्यना की साधना भी की थी !

अंत में उपन्यास कथ्य के विस्तार के साथ ही अत्यंत रोचक होता हुआ अपने चरम को प्राप्त होता है। कथावस्तु की बुनावट और शैली की मोहकता, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के मनोहारी संदर्भ के साथ प्रस्तुत होती है। लेखक अपनी लोकप्रिय लेखन शैली से चमत्कृत करता हुआ अपने दायित्व के निर्वहन के साथ ही उपन्यास को उस की संपूर्णता में जीते हुए जय का शंखनाद करते हुए आगे बढ़ता ही है, पर  तभी दारिया के एक फ़ोन से उस के एक वाक्यांश से, कथा की सारी परतें अचानक ही तात्कालिक विस्फोट के साथ ही उधड़ जाती हैं,और उपन्यास अपने औचक लेकिन स्तब्धकारी चरम को छू लेता है।

कहना नहीं होगा,कि दयानंद पांडेय जी का यह उपन्यास एक लघु उपन्यास होते हुए भी, इन की तमाम विराट रचनाधर्मिता पर भारी पड़ा है। सृजन का सुख भी लेखक के लिए यही है। बहुत कम ही कृतियां अमरत्व को प्राप्त होती हैं, और दयानंद पांडेय जी की ‘विपश्यना में प्रेम ’ इस अमरत्व की पूर्ण अधिकारी है।


विपश्यना में प्रेम उपन्यास पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक कीजिए 


विपश्यना में विलाप 


समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

पृष्ठ : 106 

अमेज़न (भारत)
हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl


     

     

               





Tuesday 21 November 2023

प्रेम जब देह की लिपि से लिखा जाता है

डॉक्टर सुरभि सिंह

विपश्यना में प्रेम पर स्त्री मनोविज्ञान के मद्दे नज़र  एक ज़रुरी नोट 

साहित्य के क्षेत्र में दयानंद जी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उन्होंने अनेक रचनाएं लिखी हैं। जिन्हें मैं  कृतियां कहना चाहती हूं।  पहले मैं ने उन की कम रचनाएं पढ़ी थीं लेकिन धीरे-धीरे उन की विभिन्न रचनाओं से और रचना शैली से परिचित होती चली गई। आज उन की रचना शैली और लेखन शैली के विषय में कुछ कहना चाहती हूं ।

उन के उपन्यास “विपश्यना में प्रेम” को पढ़ने के बाद मैं ने बहुत गहराई के साथ अनुभव किया कि दयानंद जी एक ऐसे लेखक हैं जिन्हें नारी  मन की बहुत गहरी समझ है। मेरे विचार से आज के पहले बहुत कम लोगों ने नारी मन को संवेदनात्मक अनुभूतियों के तहत समझने का प्रयास किया है। लेखक ही नहीं बल्कि लेखिकाओं ने भी बहुत कम समझा है। उन्हों ने उसके व्यक्तित्व के जिन बिंदुओं  का स्पर्श किया है उस तक  बहुत कम लोग  पहुंच पाएंगे । मेरी साहित्य यात्रा अभी इतनी समृद्ध नहीं है कि मैं दयानंद जी जैसे  लेखक की किसी रचना की समीक्षा कर पाऊं। इस लिए  इसे  समीक्षा नाम न दे कर बस  अपने विचारों की  अभिव्यक्ति कहना चाहती हूं ।

जब मैंने दयानंद जी की रचनाओं को पढ़ा तो उस में एक बात बहुत अधिक उभर कर सामने आई और वह थी नारी मन की शाश्वत कामनाएं और आदिम अनुभूतियां।

उन्हों ने उन बिंदुओं की बात की उन स्वाभाविक इच्छाओं और कामनाओं की बात की जिस की बात वह स्वयं करना चाहती थी और सदियों से वह दबा दी गई ।चाहे हम “विपश्यना में प्रेम” की नायिका दारिया की बातें करें चाहे किसी अन्य रचना की नायिका का जिक्र हो।

प्रेम सदियों से गंगा की पावन धारा के समान बहता रहा है। यह पावन धारा बहुत बार उच्छृंखल भी हुई है और जब वह उच्छृंखल हुई है तो उस ने पहाड़ों और चट्टानों को भी तोड़ दिया है । ईश्वर ने जब नारी और पुरुष दो शक्तियों को बनाया तो उनके मिलन की व्यवस्था भी की और उन का यह मिलन  किसी भी रूप में अनैतिक नहीं कहा जा सकता ।

जब दो लोग एक दूसरे से प्रेम करते हैं तो फिर उस प्रेम में कोई दूरी नहीं रह जाती है यदि कोई किसी का किसी  अनुचित फायदा नहीं उठा रहा है शोषण नहीं कर रहा है और उनके बीच मौन अनुबंधन हो चुका है तो फिर किसी तीसरे को बोलने का कोई अर्थ नहीं है। 

आज तक स्त्रियों को विभिन्न प्रकार की मान मर्यादाओं के पाठ लेखन की हर विधा में  सिखाए गए हैं।कभी उन की तुलना धरती से की गई है, कभी उन को देवी का रूप माना गया है और कभी उन को अन्नपूर्णा माना गया है । उसे गृह लक्ष्मी कहा गया है लेकिन कभी भी किसी ने यह देखने का प्रयास नहीं किया कि उस का मन भी  जीव वैज्ञानिक तरीके से निर्मित है। जो रासायनिक प्रक्रियाएं पुरुष के मन में घटित होती हैं, और जिन्हें समाज “स्वाभाविक” कह कर छुट्टी कर लेता है , वही उस के मन में भी सिर उठाती हैं।

हारमोंस की स्वाभाविक प्रक्रियाओं से वह भी गुजरती है । अपने मन में दबी  इच्छाओं के उद्दाम आवेग से वह भी जूझती है। उस के पास उस की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है। ऐसी उद्याम कामनाओं को स्वर देने का कार्य दयानंद जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से  किया । 

जब आप उन की रचनाओं को पढ़ाना शुरू करेंगे और उस में प्रेम के खुलेपन को देखेंगे तो एक बार के लिए आप को झटका लगेगा। आप को लगेगा कि आप क्या पढ़ रहे हैं लेकिन जब आप समझना शुरू करेंगे तब आप को लगेगा इतना निर्दोष और इतना मासूम लेखन कभी किसी ने नहीं किया । सच बात तो यह है कि नारी मन  की स्वाभाविक इच्छाओं को एक पुरुष के द्वारा संवेदना के धरातल पर देखा जाना एक बहुत बड़ी पहल है ।

बहुत दिनों से सोच रही थी कि मैं लिखूं तो कैसे लिखूं? क्या लिखूं? कई सारी बातें मन में उठ रही थीं, फिर लगा कि जब लिखना है तो बिल्कुल लिखना है।

मैं बहुत से लोगों से मिलती रहती हूं अनेक महिलाओं से उन की दिल की  बातें सुनी हैं। मैं ने उन का अकेलापन देखा है। उन का अकेलापन सुना है। उन का अवसाद और तकलीफ़ महसूस की है। और ऐसे में जब मैं दयानंद जी के लेखन का स्मरण करती हूं या उन के पात्रों का स्मरण करती हूं तो लगता है कि शायद ये वही पात्र हैं जो      अविकसित रह गए हैं। अनकहे रह गए हैं। उन को विकास का अवसर मिलना चाहिए था। उन्हें कहने का अवसर मिलना चाहिए था। जब आप “विपश्यना में प्रेम “ पढ़ेंगे तब आप को समझ में आएगा कि प्रेम जब देह की लिपि से लिखा जाता है तब भी वह बहुत सुंदर होता है और  एकाग्रता की सीमा तक पहुंच जाता है ।

प्रेम इस संसार की सब से प्यारी और शाश्वत अनुभूति है। और यह भी सत्य है कि जब दो विपरीत लिंगीय लोग  एक दूसरे से प्रेम करते हैं तो वह प्रेम केवल मानसिक या भावनात्मक नहीं रह जाता वह शरीर के बिना अधूरा है । यह एक ऐसा सत्य है जिस को स्वीकारना ही पड़ेगा क्यों कि बिना शारीरिक अनुभूति के प्रेम अपनी पूर्णता को नहीं प्राप्त हो सकता इस लिए इस रचना को जब आप पढ़ेंगे तब आप को एहसास होगा कि नारी मनोविज्ञान साथ-साथ प्रेम की सच्ची संवेदना भी इस उपन्यास में रची गई है। इस में एक अलौकिकता है।  एक मदमस्त अल्हड़पन है। एक बेलगाम भाव है। और एक ऐसी भाषा है जो सिर्फ़ सुनना जानती है। कहना जानती है। और अपनी बात बेबाक हो कर कह देती है ।

यह जन्म सिर्फ़ एक बार मिला है। पुनर्जन्म की अवधारणा निश्चय ही होती होगी। किंतु अपने स्वाभाविक कर्म करते हुए बिना किसी पाप कर्म में प्रवृत्त हुए यदि अपने मन और अपने तन को खुश रखा जा सकता है तो इस से बड़ी कोई बात नहीं है। ऐसा ही मुझे दयानंद पांडेय जी के लेखन में अनुभव होता है। आप से अनुरोध है आप इस उपन्यास को अवश्य पढ़ें । इस को पढ़ने के बाद आप को अनुभव होगा कि आपने बहुत कुछ समझा है ।


विपश्यना में प्रेम उपन्यास पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक कीजिए 


विपश्यना में विलाप 


समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

पृष्ठ : 106 

अमेज़न (भारत)
हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl


     

     

               






Saturday 18 November 2023

विपश्यना में प्रेम : गद्य में पद्य की छांव

 आशीष कुलश्रेष्ठ 


               'चुप चुप सी है ज़िंदगी, चुप चुप से हैं लोग।

               विपश्यना में प्रेम का,  छिप कर होता रोग।।'                                                 

विपश्यना का अर्थ होता है ' शांत चित्त से अपने अंतर्मन में झांकना '। अवध नगरी से प्रेम नगरी रेलगाड़ी से आते हुए मैंने 'विपश्यना में प्रेम' उपन्यास को पढ़ना प्रारम्भ किया। उपन्यास पढ़ते हुए रेलगाड़ी मेरे लिये विपश्यना का केंद्र बन चुकी थी, नितांत कोलाहल से दूर। हां , यही माद्दा रखती है श्री दयानंद पांडेय जी की लेखनी। निर्भीक  पत्रकारिता, साहित्य का पर्याय बन चुके श्री पांडेय जी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। 75 से अधिक कृतियों के सृजनकर्ता, अपने ब्लॉग 'सरोकारनामा' के  माध्यम से लाखों पाठकों तक अपनी पहुंच रखने वाले लेखन के सशक्त हस्ताक्षर श्री पांडेय जी झूठ के अंधेरे में सच की लौ जलाये रखते हैं। भले ही इस आहुति में स्वयं को जला बैठें, पर झूठ को झूठ और सच को सच लिखने वाला ही निर्भीक पत्रकार अपना विशिष्ट स्थान बना पाता है और यह स्थान श्री दयानंद पांडेय जी को प्राप्त है।

श्री पांडेय जी की लेखनी का मैं प्रशंसक रहा हूं। जब इस उपन्यास की समीक्षा लिखने की बात आई तो मैं संभ्रम में था कि एक कवि भला कैसे सुचिंतित समीक्षा लिख पाएगा , लेकिन यह दुष्कर कार्य मेरे पाठक मन की दृष्टि से बन पड़ा है।

वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित श्री पांडेय जी का उपन्यास 'विपश्यना में प्रेम' का प्रारंभ बहुत ही शांत वातावरण से होता है, जैसे कि, "वह जैसे कोई चुप की राजधानी थी। आदमी तो आदमी पेड़ , पौधे, फूल, पत्ते, प्रकृति, वनस्पति सब चुप थे। जाने क्यों कोई चिड़िया भी नहीं चहकती थी। न भीतर की आवाज़ बाहर जाती थी, न बाहर की आवाज़ भीतर। अगर कोई आवाज़ कभी-कभार सुनाई देती थी तो आचार्य की। या टेप पर आचार्य के निर्देश। निर्देशों की झड़ी सी। या फिर घंटे या घंटी की। जो भी कुछ कहना-सुनना था, आचार्य कहें, आचार्य सुनें। या फिर घंटा कहें या रुनझुन बजती घंटी। या फिर लिखित निर्देश थे, जिन को पढ़ कर मान लेना और जान लेना था। लेकिन उस का इज़हार नहीं करना था। संकेतों में भी नहीं। आंखों-आंखों या संकेतों में भी किसी से कुछ कहना या सुनना  नियमों की अवहेलना थी। आप शिविर से बाहर हो सकते थे, किए जा सकते थे। मन के भीतर का शोर था कि थमता ही नहीं था। लेकिन आचार्य कहते थे कि मन को नियंत्रित करना ही हमारा ध्येय है। मन को नियंत्रित करना था और मन में बसा शोर था कि थमता ही नहीं था। लगता था गोया शोर का ही निवास हो मन में। इस शोर का क्या करें आचार्य ? वह कई बार यह पूछने की सोचता था। पर जाने कोई भीतर एक और बैठा था इस शोर के सिवाय भी जो पूछने ही नहीं देता था।" 

उपन्यास के ये प्रारंभिक अंश ही कथानक का ताना बाना बुन देते हैं। यह अंश पाठक को एकाग्रता प्रदान करने में सहायक होता है। जैसे जैसे कथानक आगे बढ़ता है, पाठक स्वयं समाधिस्थ हो जाना चाहता है। कोलाहल से दूर किसी शिविर का लगना और अनुशासन, मन पर नियंत्रित करना अंतर्मन को आनंदित व शांत चित्त करता है।

उपन्यास की केंद्र भूमि एक विपश्यना शिविर है, जहां विनय मन की शांति की तलाश में घर की कुछ समस्याओं से दुखी होकर घर से भाग आता है। यहां पर उसे शांति के नाम पर घोर कोलाहल से दूर नितांत चुप्पी मिलती है। वाणी के नाम पर मात्र टेप पर आचार्य के निर्देश अथवा कभी-कभी उनके निर्देशों की झड़ी या फिर घंटे/घंटी की आवाज़। सांकेतिक वाणी की भी मनाही है, यानि कुल मिला कर चुप की राजधानी। 

विनय ने अनुभव किया है कि,"अब मौन में ही सोना था, मौन में ही जगना था। मौन में ही नहाना था, मौन में ही खाना था। मौन क्या था मन के शोर में और-और जलना था। तो क्या मौन मन को जला डालता है? पता नहीं, पर अभी तो यह मौन मन को सुलगा रहा था। बिना धुएं और बिना आंच के। धीमी आंच पर जैसे सांस दहक रही थी। मौन की मीठी आंच एक अजीब सी दुनिया में ले जा रही थी। आंखें बंद थीं और जैसे मदहोशी सी छा रही थी। यह कौन सी दुनिया थी ? दुनिया थी कि सपना थी ? सपना कि कोई और लोक ? मदहोशी की यह खुमारी भीतर-भीतर जैसे गा रही थी, 'आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन,....मुसकुराए रे मेरा मन !' शाम होते न होते यह मदहोशी भी टूटने लगी थी। ध्यान कक्ष में ध्यान , अब देह की थकान में तब्दील हो रही थी यह मदहोशी। कमर टूट रही थी। शाम के नाश्ते ने कुछ थकान मद्धिम तो की पर प्रवचन में यह बिलकुल ही उतर गई। प्रवचन में विचारों की खिड़की थी , जो भावों की शुद्धता थी और तर्किकता की जो कड़ी दर कड़ी थी।" 

लेखक ने विनय के माध्यम से एक सामान्य व्यक्ति के किसी शांत वातावरण में मन में चल रहे नाना प्रकार के झंझावतों को उकेरा है। लेखक की लेखनी से शिविर में व्याप्त शांति और मन में चल रहा द्वंद्व बच नहीं पाया है। सामान्य मनुष्य का यही स्वभाव है पर विनय तो बुद्ध की शरण में बुद्ध को जानने समझने आया है और महात्मा बुद्ध के नाम पर यहां उसे कुछ नहीं मिलता है। मिलती है तो बस बुद्ध की तपस्या। बुद्ध को समझने के लिये विनय स्वयं ही चिंतन करने लगता है। वह वहां उपस्थित वातावरण पर मनन करता है। वह बुद्ध, उन की पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल की मनोस्थिति पर चिंतन करता है कि जब बुद्ध ने घर छोड़ा तो बुद्ध की, यशोधरा की और राहुल की तत्कालीन मन:स्थिति व स्वयं की इस वातावरण की स्थिति की तुलना करने लगता है क्यों कि इस कड़े अनुशासन, मौन वातावरण और ध्यानावस्था में उसे अपनी पत्नी, बेटे-बेटी,अम्मा-पिता की याद आने लगती है। वह आचार्य से मिल कर जाने की अनुमति चाहता है पर विवश है क्योंकि शिविर में प्रवेश करते समय भरे गये बॉन्ड और अनुशासन के नियम उसे बांधे रखते हैं। वह सोचता है,"क्या जब बुद्ध ने घर छोड़ा रहा होगा तो क्या उन्हें भी अपने बेटे और पत्नी की सुधि नहीं आई होगी ? माता-पिता, कुटुंब याद नहीं आए होंगे। वह महल, वह ऐश्वर्य, वह सुविधा-साधन और भोग नहीं याद आए होंगे? 

ज़रुर याद आए होंगे। 

तब फिर क्यों नहीं लौटे बुद्ध ? अपने घर क्यों नहीं लौटे बुद्ध ? बुद्ध नहीं लौटे और कि वह दो चार दिनों में ही लौट जाना चाहता है ? क्या यह मौन रहने की, अनुशासन में रहने का नतीज़ा है।" 

और फिर खो जाता है विनय बुद्ध के चिंतन में। उसे बुद्ध का त्याग, यशोधरा का दुःख और राहुल के बाल मन स्थिति याद आते हैं। वह इसी संदर्भ में निरंतर चिंतन मनन करता रहता है।

कथानक में एक ऐसा भी पड़ाव आता है जहाँ ग्रामीण/शहरी , देशी विदेशी स्त्री पुरुषों के मध्य ध्यानावस्था से निकल कर ध्यान टूटता है, "आंख खुलती है। एक गोरी सी रशियन स्त्री के अकुलाए वक्ष पर उस की आंख धंस गई है। उस की स्लीवलेस बाहें जैसे बुला रही हैं। अब ऐसे में कैसे कोई ध्यान करे। जब मन में देह का ध्यान आ जाए तो सारे ध्यान बिला जाते हैं। सारे विलाप बिला जाते हैं। सारी विपश्यना बिला जाती है। बिलबिला जाती है।"  और फिर धीरे-धीरे  वह  गौरी रसियन उस के संपर्क में आने लगती है। इस के पश्चात यह चुप की राजधानी  उस के लिये उत्साह उमंग की राजधानी बन जाती है लेकिन फिर भी कहीं न कहीं चुप्पी अभी भी बनी हुई है , सांकेतिक हाव भाव को छोड़ कर। उस के हृदय में गौरी रसियन के प्रति प्रेम पुष्प पल्लवित होने लगता है। वह स्वयं को उस के प्रति प्रेम या कहिये देह आकर्षण के अंतरद्वंद्व में फंस जाता है और एक शाम ,"अचानक उसे लगता है कि कोई उस के पीछे आ रहा है। यह पहली बार है। सो मुड़ कर देखता है। वही रशियन स्त्री है। वह अपने क़दम धीमे कर लेता है। धीरे-धीरे वह स्त्री उस के बगल में चलने लगी है। विनय ने मुड़ कर फिर पीछे देखा है कि क्या कोई और भी है क्या पीछे। देखा तो पाया कि कोई नहीं है। वह निश्चिंत हो जाता है। वह स्त्री आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए उस के क़रीब आती जाती है। स्पर्श की हद तक। विनय अब क्या करे भला ? यह सोचते ही उस के भीतर कोई बिजली सी चमक जाती है। ऐसे जैसे कोई शार्ट सर्किट हो गया हो। बिजली गुम हो गई हो। सहसा उस ने बढ़ कर उसे बाहों में भर कर चूम लिया है। वह रशियन स्त्री अवाक रह गई है। उसे विनय इस तरह इतनी जल्दी चूम लेगा , इस का बिलकुल अंदाजा नहीं था। प्रत्युत्तर में वह भी चूम लेती है विनय को। दोनों ज़रा देर आलिंगनबद्ध हो कर एक दूसरे को चूमते रहते हैं। आहिस्ता-आहिस्ता फिर बेतहाशा। बाहों के दरमियां रात गहरी हो रही है। वह दोनों लिली के फूल की झाड़ की ओट ले लेते हैं। फिर आम के वृक्ष की तरफ सरक जाते हैं। जहां बिजली की हलकी रौशनी भी नहीं पहुंच पा रही। दोनों में कोई शाब्दिक संवाद नहीं है। दोनों की देह संवादरत हैं। अजब कश्मकश है। यह देह का संघर्ष है , मन का संघर्ष है , वासना का संघर्ष है कि विपश्यना के कारण निकले विकार का संघर्ष है ?"

वाचिक भाषा से अधिक दैहिक भाषा असर करने लगती है। विनय भोगे गए आनंदित पलों को कभी यथार्थ, कभी कल्पना और कभी स्वप्न में अनुभूत करने लगता है। वार्तालाप के अभाव में विनय उस का नाम मल्लिका रख देता है। जब मौन वार्तालाप का क्रम टूटता है और वह मल्लिका अपना नाम दारिया तथा विनय अपना नाम बताता है।  विपश्यना शिविर में उपजे प्रेम की गहराइयों की पड़ताल, मन:स्थिति को लेखक ने बहुत ही बारीकी से भाव-भूमि प्रदान की है। कथानक जैसे जैसे आगे बढ़ता है , शिविर में आए लोगों की सच्चाई सामने आने लगती है। सभी एक ही उद्देश्य से न आ कर अपने-अपने स्वार्थवश शिविर में आए हैं।  शिविर के अंतिम दो दिनों में जब आलिंगनबद्ध मल्लिका वाचिक भाषा में अपना संक्षिप्त परिचय देती है तब चुप की राजधानी अपनी ख़ामोशी तोड़ देती है, पर मेरा कवि मन तो पहले ही सृजन कर चुका है-

           'मेरा शहर आज कल बहुत चुप चुप है,

           ख़ामोशियों से कह दो वो मेरा शहर छोड़ दे।'

अब आचार्य द्वारा सबसे मिलने, बात करने, घूमने फिरने की छूट दे दी गई है। सब अपने-अपने परिचय, अनुभव प्रदान कर रहे हैं।

विनय को  विदाई के दिन एक आघात लगता है जब उस की मल्लिका अपने पति से मिलवाती है और यहीं चुप की राजधानी उस का चित्त नाना प्रकार के वैचारिक कोलाहल से व्याप्त हो जाती है। अब वह घर लौट आया है और उस की जीवन शैली भी बदल गई है। कई महीनों पश्चात दारिया का फोन आता है और वह बताती है कि वह उसके बच्चे की मां बन गई है। फ़ोन पर  वार्तालाप के पश्चात विनय के एक बार बच्चे से मिलवाने के आग्रह और अंत में दारिया के बोल "साधु-साधु" के साथ कथानक का अंत होता है।

"कैसे कहती अपनी पीड़ा, खेला विपश्यना में प्रेम रास,

खाली झोली भर दी जो, फलीभूत हुआ जीवन आकाश।" 

संपूर्ण कथानक में अंतर्मन के  एवं परस्पर संवाद पाठक को विचलित नहीं करते हैं , लगता है जैसे पाठक स्वयं विपश्यना केंद्र में हो। यह उपन्यास एकाग्र हो कर पढ़ने को विवश करता है। कथानक शिविर में उत्पन्न विभिन्न स्थितियों को वर्तमान सामाजिक राजनीतिक स्थितियों से जोड़ने का क्रम पाठक को विपश्यना से बाहर लाने का प्रयास करता है तथा पुनः विपश्यना में लौट जाना इसकी विशेषता को दर्शाता है। कहीं-कहीं यह क्रम पाठक मन की निरंतरता को कुछ क्षण के लिए बाधित करता है लेकिन कसा हुआ कथानक ही पूरे उपन्यास को एक बार और बार-बार पढ़ने का मोह त्याग नहीं पाता है। लेखक अपनी पत्रकारिता का अनुभव भी इस उपन्यास मे समेटते दिख पड़ते हैं।                            

आलंकारिक भाषा-शैली को समेटे हुए कथानक/संवाद अपना चुंबकीय प्रभाव बनाएरखते हैँ। उपन्यास के मध्य तक तो कथोपकथन न के ही बराबर है। इस का मूल कारण यही है कि पूरी पृष्ठभूमि विपश्यना केंद्र है और उस पर भी विभिन्न देशों/प्रदेशों के लोगों के मध्य भाषिक कठिनाई है। बिना संवाद के भी उपन्यास की रोचकता को बनाए  रखना श्री पांडेय जी की लेखनी से ही संभव है। उपन्यास में मुख्य पात्रों का जमावड़ा नहीं है।  कथानक को गति देने के लिये गौण पात्रों को गढ़ा गया है।  शिविर के वातावरण को शब्दश: लेखनी मिली है।  उपन्यास में समाज और दर्शन के वैचारिक भाव प्रकट होते हैं। जहां इस उपन्यास में विपश्यना का दर्शन मिलता है वहीं मानवीय दुर्बलताओं का चित्रण हुआ है।  

यहां यह कहना पुनः अतिश्योक्ति नहीं ही होगी कि उपन्यास की भाषा शैली चमत्कृत करती है और पाठक को कथानक/वातावरण से दूर नहीं जाने देती है। लेखक इसी आधार बिंदु पर अपनी लेखनी को सफल कर ले जाते हैं। गद्य शैली में लिखे गए उपन्यास का ही प्रभाव है कि कवि मन इस में पद्य की छांव देखता है। यह उपन्यास साहित्याकाश में धवल प्रकाश फैलाए , इसी शुभकामना के साथ- साधु-साधु !


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विपश्यना में विलाप 


समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

पृष्ठ : 106 

अमेज़न (भारत)
हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl


     

     

               




विपश्यना में प्रेम : घट भीतर भी जल और घट के बाहर भी जल

सुधा शुक्ला 

दयानंद के नवीनतम उपन्यास विपश्यना में प्रेम की अनेक विद्वानों ने समीक्षा की है ,सभी अपनी शैली में पूर्ण हैं। मैं नया कुछ लिख भी पाऊंगी ,समझ नहीं पा रही। बस यह एक प्रयास है , कोई समीक्षा नहीं। विपश्यना और प्रेम दोनों का तालमेल दयानंद ही कर सकते हैं ,दोनों ही चाहते हैं पूर्ण समर्पण। विपश्यना जहां अपने अंतस में मैं  यानी मानव की शाश्वत खोज है , वहीं प्रेम सृष्टि के आरंभ की। समय समय पर यह खोज निरंतर विद्वानों द्वारा  अपने स्तर और अपने तरीके से चलती रही है और अनंत कल तक चलती रहनी है। यों सही मायने में पूर्ण समर्पण भाव से किया गया प्रेम तप से कम नहीं होता ,वरना मीरा हो या वारिस शाह उन का नाम जिंदा नहीं रह पाता। दयानंद के लेखन में देह निरंतर विभिन्न रुपों में आती ही रहती है। लोक कवि अब गाते नहीं  ,एक जीनियस की विवादास्पद मौत कहानी हो या अन्य उपन्यास। और यह सायास भी नहीं लगता। बस कभी वर्णन विस्तृत हो जाता है। गौतम चटर्जी जी जैसे कला और आध्यात्म दोनों पर समान अधिकार रखने वाले विद्वान की तरह मेरा लिखना कठिन है । 

मुझे इस उपन्यास में सब से अधिक अपील करने वाली बात जो लगी वह है लेखक का निरंतर दो स्तर पर अपनी यात्रा को व्याख्यायित करना। एक तरफ वे नींद की गहरी सुरंग की यात्रा की बात करते रहते हैं साथ ही विदेशी महिलाओं की स्लीवलेस बाहों के परिधान में भी न्यस्त रहते हैं, मानो वो शरीर से बाहर , शरीर और मन दोनों की गतियों को निहार रहे हों , घट भीतर भी जल और घट के बाहर भी जल। यह ही तो समाधि की अवस्था है जब आत्मा बाहर से शरीर और सृष्टि दोनों को देख सके । 

दारिया के साथ संभोग के समय के वर्णन पर ध्यान दें। जब एक ओर वे विशुद्ध काम क्रिया में निबद्ध है , वहीँ चारो और विस्तृत प्रकृति का उन्हें पूरा भान है। भांति-भांति के पुष्प पत्ते सब के सौंदर्य से वे बेखबर नहीं हैं।एक-एक फूल पौधों के सौंदर्य का वर्णन वे लगभग कवि भाव में करते हैं। गोभी के फूल का इतना सुंदर वर्णन साहित्य में मिलना आसान नहीं । लेखक के लिए देह या संभोग लुकाव-छिपाव की वस्तु नहीं रही है। विभिन्न अवसर पर वे किसी काम शास्त्री की भांति मुद्राओं की चर्चा करते रहे हैं लेकिन इस कथा में उन का प्रेम काम में सौंदर्य भाव छलकता है। जब दारिया उन्हें पुत्र होने की सूचना देती है और सायास किए गए चुनाव की बात भी कहती है तो प्रेम मेंअनुरक्त लेखक ठगाया सा अनुभव करता है। 


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समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

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Tuesday 14 November 2023

विपश्यना में प्रेम : एक-एक पृष्ठ में बहती रसधार

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

मूलतः पत्रकार रहे आदरणीय दयानंद पांडेय जी ने अपने विशद साहित्यिक लेखन से अपने विशुद्ध पाठकों को अपना प्रशंसक तो बनाया ही है, लेकिन विशुद्ध साहित्यकार का चोला ओढ़े अनेक स्वनामधन्य लेखकों के पेट में दर्द भी पैदा कर दिया है। बेखटक और बेलाग लेखन ही इन की पूंजी है। इस की चोट किसी को पहुंचती हो तो वह जाने। 'अपने-अपने युद्ध' से मची खलबली तो बहुतों को याद होगी। 

कोई नंगा सच जो इन्हें अपनी आंखों से दिखता है उसे वैसे का वैसा अपनी कलम से चित्रलिखित कर देना इन्हें बखूबी आता है। मन के भीतर विचारों व भावनाओं की श्रृंखला जैसी पैदा होती है उसे वैसे ही नैसर्गिक रूप में कागज पर उतार देना इन की फितरत है। जिस सच्चाई को ये महसूस करते हैं उसे ऐसा शब्द देते हैं कि पढ़ने वाला भी सहज ही उस सच्चाई को खुद महसूस करने लगता है। न केवल भौतिक घटनाओं का विवरण बल्कि किसी चरित्र के मन में उमड़ते - घुमड़ते भाव विचार भी इन की लेखनी से निकल कर पाठक के मन पर हुबहू वही छाप छोड़ देते हैं। इन की बातें पानी की धार जैसी बहती हैं। मन को तर करती जाती हैं। किस्सागोई ऐसी कि बैठ कर सुनने वाला आगे झुकता जाय। जिज्ञासा की धार टूटने का नाम न ले। 

सहज लेखन की ऐसी ही शैली में पगा उपन्यास 'विपश्यना में प्रेम' पढ़ते हुए मन बार-बार मुस्करा देता है। एक विपश्यना केंद्र जिसे लेखक चुप की राजधानी कहता है वहां नायक विनय के साथ कुछ ऐसा घटित होता है जिस की उसने कल्पना भी नहीं की होगी। शांति की तलाश में मौन साधना का अभ्यास करने की राह में कुछ ऐसा क्षेपक आता है जिस का शोर उसे मतवाला कर देता है। लेखक के शब्दों में - विपश्यना शिविर में विनय भी अपने मौन के शोर को अब संभाल नहीं पा रहा था। मौन का बांध जैसे रिस-रिस कर टूटना चाहता था। शोर की नदी का प्रवाह तेज़ और तेज़ होता जाता था। देह का दर्द अब बर्दाश्त होने लगा था। ध्यान का कुछ आनंद भी आने लगा था। पर शोर का सुर ? 

एक बानगी यह भी - लोग कहते हैं , मौन में बड़ी शक्ति होती है। तो मौन , मन के शोर को क्यों नहीं शांत कर पाता। किसी चट्टान से सागर की लहरों की तरह पछाड़ खाता यह शोर बढ़ता ही जाता है। विपश्यना के वश का भी नहीं लगता यह शोर।

उपन्यास की जो विषय वस्तु है वह आप को चकित कर सकती है। मुझे तो यह उपमा भी चकित करती है - जैसे किसी युवा होती लड़की के लिए उस का वक्ष ही भार हो जाता है, ठीक वैसे ही विनय के लिए यह साधना भी भार हो चली थी।

उपन्यास में किसी वातावरण का चित्रण पढ़ कर लगता है जैसे पाठक स्वयं वहां पहुंच गया हो। साधना स्थल का माहौल महसूस कराती ये पंक्तियां देखिए - आचार्य के टेप की आवाज़ में वह डूब गया है। अजब आनंद है इस आवाज़ में भी। इतनी सतर्क, इतनी स्पष्ट और इतने व्यौरे में सनी, किसी नाव की तरह थपेड़े खाती, बलखाती आवाज़ से इस से पहले वह कभी नहीं मिला था। आरोह-अवरोह और श्रद्धा का ऐसा मेल, जैसे कानों में जलतरंग बज जाए, जैसे कोई मीठी सी हवा कानों में चुपके से स्पर्श कर जाए। 

चुप की राजधानी में मन को आध्यात्मिक शांति के लिए एकाग्र करने में लगे विनय को चुपके से चिकोटी काटती मल्लिका की पूरी योजना का पता तो उपन्यास के अंत में चलता है, लेकिन पाठक को वहाँ तक पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है। वह तो एक-एक पृष्ठ में बहती रसधार से सिक्त होता चलता है। कथा के बीच अचानक कोई अदभुत दृश्य उपस्थित हो जाय, कोई मनभावन दृष्टांत आ पड़े, कोई मन को छू जाने वाली खूबसूरत उक्ति मिल जाय, अकस्मात रोम-रोम पुलकित करने वाली कोई टिप्पणी मिल जाय या देह - संगीत का कोई नया टुकड़ा आ पड़े, इस संभावना से यह पूरा उपन्यास इस तरह लबरेज है कि आप इसे कूद-फांद कर नहीं पढ़ना चाहेंगे। 

यहां तो प्रत्येक पृष्ठ आप को बांध कर रखता है। बिल्कुल जैसे गुलज़ार की कोई नज़्म हो। दुबारा तिबारा सोचना भी अच्छा लगता है। बुद्ध और यशोधरा के बिलगाव का संदर्भ है तो मांसलता और कामुकता का चरम भी है। इसे सारंगी, गिटार और वीणा के मधुर संगीत सा पेश किया गया है। यहां माउथऑर्गन की धुन पर थिरकता नृत्य भी है और तबले की थाप पर उचकता जिस्म भी है। यह सब ऐसा दृश्य उपस्थित करता है और ऐसी अनुभूति देकर जाता है कि इसे केवल 'वयस्कों के लिए' उपयुक्त ठहराने का मन होता है। लेकिन यह इस उपन्यास की सीमा नहीं है बल्कि दयानंद जी की एक विलक्षण उपलब्धि है। 

[ www.satyarthmitra.com से साभार ]


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विपश्यना में विलाप 


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विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

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Thursday 9 November 2023

विपश्यना में प्रेम : प्रेम का महाकाव्य

 तरुण निशांत 

आप इश्क़-ए-मजाज़ी, काम या सेक्स को जितना लांछित कर लीजिए, प्लैटॉनिक लव, अशरीरी प्रेम या इश्क़-ए-हक़ीक़ी को जितना भी ऊंचा स्थान दे दीजिए, इस धरा पर मानव जीवन का यथार्थ इन सबसे बदलने वाला नहीं है। सामाजिक यथार्थ को उस की सूक्ष्मता में पकड़ना ही एक रचनाकार का लक्ष्य होता है और वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार दयानंद पांडेय ने अपनी नवीनतम कृति "विपश्यना में प्रेम" में इस सच को उजागर किया है। प्रेम में तन-मन-धन, सब कुछ समाहित होता है और देह की छुअन से प्रेम अपवित्र या कम मूल्यवान नहीं हो जाता। प्रेम मन का मिलन है तो तन की तृप्ति भी।

इस उपन्यास को पढ़ाते हुए गुलज़ार निर्देशित फिल्म "इजाज़त" की याद आती है। रेखा और नसरुद्दीन शाह अभिनीत यह फिल्म रेलवे प्लेटफार्म के एक वेटिंग हॉल से शुरू होकर उस की कहानी प्लेटफार्म के उसी वेटिंग रूम में खत्म होती है, बीच-बीच में फ्लैशबैक में कहानी को विस्तार देते हुए। यहां भी इस उपन्यास की कथा एक विपश्यना शिविर की चारदीवारी के भीतर शुरू होती है और कथा का अंत भी यहीं होता है। इस प्रकार यह उपन्यास पाठकों को बाहरी दुनिया का भ्रमण नहीं कराता बल्कि व्यक्ति के मन और मस्तिष्क में चल रहे उद्वेलन से साक्षात्कार कराता है। यह भी गौरतलब है कि इस कृति में मुख्य रूप से सिर्फ़ दो ही चरित्र हैं: विनय और दारिया। बाकी चरित्र कहानी के बीच में आते जाते रहते हैं।

उपन्यास के शीर्षक से ही पाठकों को स्पष्ट हो जाता है कि यह रचना प्रेम के इर्द-गिर्द बुनी गई है। लेकिन चरित्र चित्रण में उपन्यासकार ने यहां यथार्थ का परिचय दिया है कि आदमी न तो देवता है और न ही जानवर। उस के अंदर यदि स्वार्थ की सतत् सलिला बहती रहती है तो अवसर आने पर व्यक्ति दूसरों के लिए भी अपने जान की बाजी लगा देता है। वस्तुत: विनय और मल्लिका (दारिया) के बीच शारीरिक संबंध का प्रादुर्भाव स्वार्थवश होता है। दारिया मां बनना चाहती है लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद अपने पति से वह अपनी गोद भरने में असफल रहती है। दारिया के अंदर मां बनने की लालसा इतनी तीव्र है कि वह पाप-पुण्य के द्वंद्व से पार चली जाती है। विपश्यना शिविर में जब वह विनय से जा टकराती है तो वहां उसे एक संभावना नज़र आती है। पाठक चाहे तो दारिया को कुलटा या वासना में लिप्त एक औरत समझ सकता है लेकिन दारिया का लक्ष्य उस के मस्तिष्क में बहुत स्पष्ट रूप से अंकित है और विपश्यना शिविर में पति की उपस्थिति को दरकिनार कर वह विनय से मां बनने को अपना ध्येय बना लेती है।

मल्लिका और विनय के बीच शारीरिक स्तर पर संबंध की शुरुआत भले ही स्वार्थ से होती है परंतु इस का अंत स्वार्थ के बिंदु पर नहीं होता बल्कि यह कहानी बहुत आगे बढ़ जाती है जब उपन्यास अपने अंत पर पहुंचता है। दारिया चाहती तो पुत्र प्राप्ति के बाद विनय नाम के पुरुष का अस्तित्व अपने अंतर से हमेशा हमेशा के लिए बाहर निकाल कर फेंक सकती थी और ऐसा करने में उसे किसी भी प्रकार की कठिनाई या झिझक नहीं होती। विपश्यना शिविर समाप्त होने के पश्चात वह अपने देश रूस लौट गई है और विनय को उस के या बेटे के बारे में कोई खबर नहीं मिलती यदि वह स्वयं विनय को फ़ोन कर इस की जानकारी नहीं देती। फ़ोन या वीडियो कॉल पर बात करते समय वह विनय से आज भी उतना ही जुड़ाव महसूस करती है जितना शिविर के समय था। जाहिर सी बात है कि यह जुड़ाव शारीरिक नहीं बल्कि आत्मिक है, हज़ारों किलोमीटर दूर अलग-अलग देशों में दो अलग-अलग सांस्कृतिक माहौल में पले बढ़े दो लोगों के बीच। दारिया के समक्ष विकल्प होने के बावजूद वह अपने बेटे के जैविक पिता यानी विनय से मानसिक स्तर पर दूर नहीं होती है और किसी समय रूस बुलाने और उस के बेटे से उस की मुलाक़ात  करवाने की बात भी कहती है। तो यह प्रेमकथा देह से शुरू हो कर दिल तक जा पहुंचती है और यही उपन्यास की ख़ूबसूरती  है।

यह कृति बुद्ध और यशोधरा के बहाने आधी दुनिया से संबंधित अलग-अलग सवालों से मुठभेड़ करती दिखाई पड़ती है। उपन्यासकार ने एक मौजूं सवाल उठाया है: यदि यशोधरा की संतान बेटी होती तो क्या बुद्ध उसे भिक्षा में लेते ? यह मसला सिर्फ़ बुद्ध और यशोधरा के बीच का नहीं है बल्कि इस प्रश्न को वह पूरी मानव सभ्यता के समक्ष उछाल रहा है। सभी जानते हैं कि बुद्ध अपने संघ में स्त्रियों के प्रवेश पर सहमत नहीं थे। आनंद जैसे अपने शिष्यों के दबाव में उन्हों ने स्त्रियों के संघ में प्रवेश की अनुमति दी थी। बुद्ध पूरी मानव जाति के लिए महात्मा थे लेकिन उपन्यासकार यहां बुद्ध नहीं, यशोधरा के साथ खड़ा होना दिखना चाहता है जब वह पूछता है कि बुद्ध ने यशोधरा को राहुल से क्यों अलग किया? यशोधरा का यह त्याग क्या बुद्ध के तप की तुलना में कमतर है ?

रचनाकार इस उपन्यास में "शोर" पर केंद्रित होते हुए अलग-अलग संदर्भों में इस की परख करता है: आप मौन हैं तो इस का अर्थ यह नहीं कि आप के अंदर सब कुछ शांत है। मन में उठता हुआ शोर बाहरी कोलाहल से कहीं अधिक आदमी को रौंदता है। विनय की आड़ में लेखक अपने आप से पूछता है कि सिद्धार्थ के राजमहल त्याग कर वन चले जाने के पीछे भी उन के मन में उठा कोई शोर ही तो नहीं था ! फिर वह अकेली रह गई यशोधरा के भीतर उठे शोर या विलाप पर कहता है कि क्या उस के बारे में सिद्धार्थ या किसी ने सोचा भी। इसी संदर्भ में वह राम द्वारा सीता त्याग की बात भी करता है। विपश्यना शिविर में ध्यान सत्र के दौरान एक स्त्री का ऊंची आवाज़ में बोलते हुए लगातार झूमने वाले दृश्य को भी एक सामान्य घटना मान कर वह इसे उपेक्षित नहीं करता। उस का मन इस बात से आहत है कि ध्यान कक्ष में विलाप कर रही इस स्त्री के दुख के बारे में वहां उपस्थित लोग अपने ध्यान में लगे रहे और किसी को भी मानसिक रूप से विचलित होते उस ने नहीं देखा। क्या विपश्यना ही अंतिम लक्ष्य है और क्या जगत के दुखों के प्रति हमें इस तरह संवेदनहीन हो जाना चाहिए? पता नहीं, उस स्त्री के पास कौन सा दुख था ? क्या उस का पति भी सिद्धार्थ की तरह घर छोड़ कर कहीं चला तो नहीं गया है ? मेडिकल साइंस इसे हिस्टीरिया कहता है लेकिन इस दुख का इलाज क्या है ? अपनी जवान देह का भार कोई स्त्री कब तक अकेले उठाती रहेगी। यहां उल्लेखनीय है कि डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने भी अपनी आत्मकथा में गांव की औरतों के ऐसे दुखों के बारे में लिखा है जिन की देह उनके जीवनसाथी की नादानी या मजबूरी से अतृप्त रह जाती है।

उपन्यास में एक स्थान पर तथ्यात्मक त्रुटि है जब लेखक पूछता है कि क्या लुंबिनी भी यशोधरा के साथ विलाप में डूबी थी ? यहां लुंबिनी नहीं, कपिलवस्तु होना चाहिए क्योंकि सिद्धार्थ का जन्म लुंबिनी में हुआ था लेकिन वह कपिलवस्तु के राजकुमार थे। पुन: विनय के मित्र का सेक्युलर प्रसंग इस उपन्यास की संगति/तेवर से मैच नहीं करता है। यदि यह प्रसंग नहीं होता तो भी इस से उपन्यास की पूर्णता पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। उपन्यास में एक जगह विरोधाभास भी है जब शुरू में लेखक यह कहता है कि विनय मन की शांति की तलाश में घर से लगभग पगहा तुड़ा कर, भाग कर इस शिविर में आया था और बाद के एक पृष्ठ पर वह यह लिखता है कि विनय के पास कोई ऐसा-वैसा तनाव भी नहीं था। वह तो सिर्फ़ घर की कुछ समस्याओं से आज़िज आ कर यहां आया था।

"विपश्यना में प्रेम" एक उपन्यास नहीं बल्कि मेरी समझ में एक महाकाव्य है, प्रेम का महाकाव्य। कृति के हर शब्द, हर वाक्य, प्रत्येक पैरा से काव्य की ध्वनियां प्रस्फुटित हो रही हैं। विपश्यना शिविर में ध्यान लगाने का अभ्यास करते-करते एक स्टेज के बाद व्यक्ति जैसे अमृत यात्रा पर निकल पड़ता है, कुछ कुछ वैसे ही इस उपन्यास को पढ़ते हुए प्रबुद्ध पाठक का हृदय संगीत से भर जाता है। यह है उपन्यासकार का भाषा कौशल। अद्भुत ! विलक्षण ! जिस प्रकार काव्य रचना का मूल तत्व लय होता है, आरंभ से अंत तक इस उपन्यास में ग़ज़ब की लयात्मकता है। ऐसा सिर्फ़ दो चार दस पैराग्राफ़ में नहीं बल्कि यह लयात्मकता उपन्यास के शुरू से अंत तक है। फिर कौन कहेगा कि गद्य में पद्य नहीं रचा जा सकता ! इस उपन्यास ने तो गद्य और पद्य के विभेद को मिटा दिया है। इस लिए मैं इस रचना को उपन्यास के साथ-साथ प्रेम का एक महाकाव्य मानता हूं।


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विपश्यना में विलाप 


समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

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Wednesday 8 November 2023

केजरीवाल शराब बेच रहे थे , नीतीश कुमार सेक्स !

दयानंद पांडेय 

अनपढ़ या पढ़े-लिखे का सेक्स चेतना से कुछ लेना-देना नहीं होता , इंजीनियरिंग की डिग्री लिए हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतनी सी बात भी नहीं जानते। इस मामले में भाषा या पढ़ाई-लिखाई के कोई मायने नहीं होते। एक पढ़े-लिखे इंजीनियरिंग की डिग्री लिए अरविंद केजरीवाल , शराब बेच रहे थे , नीतीश सेक्स बेच रहे हैं। फ़र्क़ बस इतना है कि केजरीवाल अन्ना आंदोलन से निकले तो नीतीश , जे पी आंदोलन से। धूर्त और कुकर्मी दोनों ही हैं। केजरीवाल तो ख़ैर राजनीतिक प्राणी नहीं हैं पर अपनी दमित कुंठा के चलते नीतीश ने अपने एक बयान से , अपने मुंह पर कालिख पोत ली है। अपना राजनीतिक जीवन कलंकित कर लिया है। समाप्त कर लिया है। इतनी कि अपनी निंदा ख़ुद करने के लिए विवश हो गए। मज़ा यह कि इस मामले पर नीतीश कुमार के माफ़ी मांगने पर बिहार विधान सभा का अध्यक्ष , अपनी मूर्खता और चमचई के चलते , सदन में नीतीश कुमार से कह रहा रहा था कि , यह आप का बड़प्पन है। दिलचस्प यह कि जद यू अध्यक्ष ललन प्रसाद भी नीतीश कुमार के भाषण से सहमत हैं। एक समय था कि राबड़ी देवी , भोजपुरी भाव में मज़ा लेते हुए नीतीश कुमार को ललन प्रसाद का बहनोई बताती थीं। वैसे राबड़ी ने मुस्कुराते हुए बड़े मुलायम ढंग से नीतीश की बात को ग़लत बताया है। जब कि तेजस्वी नीतीश की तारीफ़ में हैं। जाने लालू की क्या राय है। 

एक बात यह भी है कि नीतीश कुमार का कोई सलाहकार उन्हें सही राय देने वाला है। क्यों विधान सभा में असभ्य और अश्लील भाषण देने के एक घंटे बाद विधान परिषद में भी वह अभद्र , अश्लील और असभ्य भाषण नीतीश कुमार ने दुहरा दिया। अगर कोई सही सलाहकार होता , नीतीश कुमार का तो यह अभद्र भाषण फिर से नहीं दुहराते। सच ही राजनीति में नीतीश कुमार का अंतिम समय आ गया है। लोकतंत्र और संसदीय राजनीति का तकाज़ा यही है कि नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे कर राजनीति और सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले लेना चाहिए। अलग बात है कि अपनी जातीय अस्मिता के तहत वह ऐसा कुछ नहीं करने वाले। लालू याद आते हैं। याद कीजिए जब लालू ने नीतीश को भुजंग कहा था। पिछड़ी राजनीति , जातीय राजनीति की नफ़रत और ज़हर बहुत दूर तलक चला गया है। 

इसी लिए सुशासन बाबू अब , अभद्र , अश्लील और निर्लज्ज बाबू बन कर अब उपस्थित हैं। फिर भी कोई उन का बाल-बांका नहीं बिगाड़ सकता। क्यों कि वह इण्डिया के सूत्रधार है। जातीय जनगणना के अगुआ है। जातीयता के अलंबरदार हैं। नीतीश कुमार मानसिक रूप से अभी भी टीनएज हैं , वृद्ध नहीं। गांव के लाखैरे लवंडों की भाषा , उन की मानसिकता और ज़ुबान पर है। हमारे एक जानने वाले एक बार थाईलैंड की यात्रा पर गए थे। लौट कर अपनी अय्याशियों की डिटेल देते हुए हर बार नीतीश वाली बात बताते। किसी ने उन से पूछा , ऐसा हर बार क्यों करते थे ? उन का कहना था , ताकि एड्स न हो जाए ! अब वही तरीक़ा , नीतीश कुमार ने पढ़ी-लिखी स्त्रियों के बाबत , परिवार नियोजन के लिए तजवीज कर रहे हैं। हद्द है ! नीतीश कुमार के एक गुरु थे शरद यादव जो पढ़ी-लिखी स्त्रियों को बालकटी से विभूषित कर गए हैं। शरद ने तो इस बात के लिए कभी माफ़ी नहीं मांगी। 

नीतीश कुमार को जान लेना चाहिए कि निंदा करने वालों का अभिनंदन करने से , स्त्री का अपमान नहीं धुला करता। सरकार बनाने के लिए बारंबार पलटू राम बनना और बात है , स्त्रियों का अपमान करने के लिए अभद्र , अश्लील और निर्लज्ज भाषण दे कर पलटी मारना ,  कलंक है। फिर जिस बॉडी लैंग्वेज और चीख़-चिल्लाहट के साथ नीतीश कुमार ने माफ़ी मांगी है , उस में दुःख नहीं , हेकड़ी दिखी है। अहंकार दिखा है। पिछड़ापन इसे ही कहते हैं। किसी पिछड़ी जाति को नहीं। ताज्जुब बिलकुल नहीं है कि किसी हिप्पोक्रेट वामपंथी , किसी फ़रेबी सेक्युलरिस्ट आदि-इत्यादि की ज़ुबान निर्लज्ज बाबू की निर्लज्जता पर नहीं खुली। सब को लकवा मार गया है। बात-बेबात संसदीय राजनीति और संविधान की दुहाई देने वाले दोगले लोगों की यही कैफ़ियत है।

इस पूरे प्रसंग का एक मोड़ यह भी देखने को अगर मिल जाए कि नीतीश इस्तीफ़ा दे दें और तेजस्वी की ताज़पोशी हो जाए तो मुझे हैरत न होगी। क्यों कि इंडिया के लोग लाख चुप रहें पर नीतीश कुमार चौतरफा घिर गए हैं।

Sunday 5 November 2023

चुप की राजधानी में साधना बनी साधन, प्रेम हुआ ट्राई

शबाहत हुसैन विजेता

दयानंद पांडेय का उपन्यास विपश्यना में प्रेम पढ़ा। पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता ही चला गया। लगा जैसे नदी के बहाव के साथ बगैर मेहनत के बहता चला जा रहा हूं। चुप की राजधानी और जहां सांसें दहक रही थीं। जैसे शब्द शिल्प का बहाव हो वहां कहानी की गति कम कैसे हो सकती है।

दयानंद पांडेय के लेखन की खासियत यह है कि वह ज़िंदा शब्द गढ़ते हैं। उपन्यास कहानी के साथ फ़िल्म सा चलता है। हर शब्द के साथ एक चित्र भी पिरोते चलना उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करता है। वो मूलतः पत्रकार हैं इस लिए चाहे वो लेखक के रूप में हों, उपन्यासकार के रूप में हों या फिर कवि के रूप में उन के भीतर का पत्रकार माहौल को कुरेद कर उस के भीतर से कुछ नया निकालने में लगा रहता है।

विपश्यना में प्रेम का नायक विनय पारिवारिक कलह से ऊब कर घर से भागता है। आबादी से दूर एक ऐसे आश्रम को वह अपना ठिकाना बनाता है जहां न मोबाइल है, न बाज़ार है न दोस्त हैं। वह चुप की राजधानी है,  जहां ख़ामोशी की चादर ज़िंदगी को यंत्रवत चलाती है, जहां औरत-मर्द के मिलने की मनाही है, जहां न कोई सुख बांटने वाला है, न दुःख पर बात करने वाला है, जहां भीतर के शोर से अकेले ही लड़ते रहना पड़ता है। 

इस आश्रम में ढेर सारे विनय हैं। कोई रूस का है, कोई फ्रांस का है, कोई भारत का। सभी को शांति की तलाश है।  राजधानी चुप की है तो भाषाई समस्या नहीं है , सिर्फ़ चेहरे पढ़े जा सकते हैं। मतलब साफ है कि जाति, वंश, भाषा, रंग और सीमाओं से परे है मन की अशांति। हर कोई शांति की खोज में बेताब।

बारह- बारह घंटे के ध्यान के बावजूद मन में शांति का प्रवेश नहीं हो पाता। जिस शांति की तलाश में घर छोड़ा वह तो वापस मिली ही नहीं, मन की उथल-पुथल तो जैसी की तैसी।

इसी शांति की तलाश में ही तो बुद्ध ने घर छोड़ा था। बुद्ध तो राजकुमार थे, यशोधरा जैसी खूबसूरत पत्नी और राहुल जैसा बेटा था। शानदार भविष्य बाहें पसारे इंतज़ार कर रहा था, लेकिन मन में जो कोलाहल था वह दूर न हो पाए तो राजा बन कर भी क्या हासिल हो सकता है।

विनय भी शांति की तलाश में घर से भागा था। लगातार ध्यान की कक्षाओं के बावजूद वह साधू नहीं बन पाया। वह देखता था कि उसी की तरह दूसरे भी लगातार एक ही मुद्रा में बैठने से त्रस्त हैं। उस की तरह दूसरों के शरीर भी टूट रहे हैं। वह भी रशियन पुरुष की तरह दीवार से टिक कर बैठना चाहता धा। उस का ध्यान भी लड़कियों की वेशभूषा पर जाकर टिक जाता था। वह भी आकर्षण के मोहपाश से मुक्त नहीं हो पा रहा था। एक रशियन युवती के शरीर को वह किसी मूर्ति की खूबसूरती सा तकने लगा था।

ध्यान के बाद टहलते वक्त भी वह रशियन युवती पर ही लट्टू रहता। आग उधर भी लगी थी बराबर सी। दोनों पास आते गए-आते गए। कब एक हो गए पता भी न चला। न नाम जानते थे न शहर, लेकिन मौन की भाषा ने प्रेम पर विजय पा ली थी। दोनों शरीर से भी एक हो गए थे।

आश्रम ने साधना पूरी होने की घोषणा की। आश्रम छोड़ कर जाने का समय तय किया। विनय को फिर घर से निकलना था। पिछली बार पारिवारिक कलह की वजह से घर छोड़ा था, इस बार उस प्रेम को छोड़ कर निकलना था जिस का न नाम पता था , न मोबाइल नंबर , रूस में शहर कौन सा यह भी नहीं पता था।

वह हंसते हुए विदा हो गई। वह फिर टूटा सा वापस लौट पड़ा अपने उस घर की तरफ जहां कलह थी। वह सोच रहा था कि उस की यशोधरा उस के बिना कैसे रह रही होगी, उसके राहुल की ज़रूरतें कैसे पूरी हो रही होंगी। वह तो बुद्ध भी नहीं था जो परिवार के साथ राजपाट छोड़ कर आया हो।

घर लौटते में उस ने देखा कि साधना के लिए आए उस के साथी एक दूसरे से परिचय हासिल कर रहे थे। अपने विजिटिंग कार्ड दे कर अपने बिजनेस के बारे में बता रहे थे। फ़ायदे और नुकसान गिना रहे थे। सामने वाले को ठग लेने पर आमादा थे। वो महसूस कर रहा था था कि ध्यान के बावजूद मनोवृत्तियां बदलना आसान नहीं होता। यहां तो साधना भी साधन की तरह इस्तेमाल हो गई थी।

आश्रम में उसे सिर्फ़ वो रूसी युवती मिली थी जिस ने उसे भरपूर प्यार और तृप्ति दी थी। उस से बार-बार  मिलना चाहता था मगर इतनी बड़ी दुनिया में अपनी खुशी कहां तलाशने जाए, इस सवाल का जवाब नहीं था।

विनय परिवार में लौट गया। उस के लौटने से उस के परिवार में फिर से खुशियां लौट आईं। धीरे-धीरे आश्रम की यादें भी धुंधली होती गईं। याद थी तो सिर्फ़ वह रूसी युवती जो अचानक से ढेर सारा सुख दे गयी थी। एक दिन उस के मोबाइल की घंटी बजी। रूसी युवती का फ़ोन था। वह मां बन गई थी, विनय के बच्चे की मां। उस ने बताया कि दीवार से टिक कर बैठने वाला रशियन पुरुष उस का पति है, उस की कमर में समस्या है, वह सीधा नहीं बैठ सकता। पति-पत्नी में बहुत प्यार है मगर वह मां नहीं बन पाई। बहुत इलाज कराया, आईवीएफ तक कोशिश कर डाली, सब फेल हो गया। विनय तुम्हें देखा तो सोचा तुम्हें भी ट्राई कर लूं। तुम्हें ट्राई किया तो कामयाबी मिल गई। नाक नक्श तुम्हारे ही जैसे हैं कद रूसियों का है। उस का नाम विपश्यता रखा है। कभी मास्को आओगे तो मिलवाऊंगी। फ़ोन कट गया था।

जड़वत विनय, तो सिर्फ़ साधना को साधन ही नहीं बनाया गया बल्कि प्रेम में भी ट्राई कर लिया गया। वह समझ पाने की स्थिति में नहीं है कि रिश्तों की सौदागरी यही दुनिया में विश्वास का अस्तित्व है भी या नहीं...।

मन को छू लेने वाले उपन्यास को वाणी प्रकाशन , दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस उपन्यास में शेक्सपियर जैसी काबलियत और पंडित शिवकुमार शर्मा के संतूर जैसी मिठास वाला संगीत हासिल होता है। मन की खिड़कियां खोलना है तो दयानंद पांडेय के इस उपन्यास का दरवाज़ा खटखटाना ही पड़ेगा।


विपश्यना में प्रेम उपन्यास पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक कीजिए 


विपश्यना में विलाप 


समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

पृष्ठ : 106 

अमेज़न (भारत)
हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl


Wednesday 1 November 2023

मैं इस उपन्यास की अबाध गति के साथ बहती चली गई

ज्योत्स्ना कपिल 

निर्भीक पत्रकार एवं प्रखर रचनाकार, दयानंद पांडेय जी से शायद ही कोई गंभीर रचनाकार अपरिचित होगा। ढेरों कहानियां, एक दर्जन से अधिक उपन्यासों, लेखों, संस्मरण के सर्जक दयानंद जी का लेखन न सिर्फ़ मन को मोहता है, बल्कि निर्बाध गति से पाठक को अपने प्रवाह में बहा ले जाने में सक्षम है। पांडेय जी के सृजन से ,मेरा प्रथम परिचय एक कहानी के द्वारा हुआ। किसी व्हाट्स ऐप समूह में आप की लिखी कहानी ' शिकस्त ' जब मैंने पहली बार पढ़ी तो चमत्कृत रह गई। कहानी की महीन बुनावट, घटनाक्रम की उठापटक और कथानक की रोचकता ने मुझे अत्यंत प्रभावित किया। यह एक ऐसी कहानी थी, जिस ने मेरे ज़हन में ऐसा असर छोड़ा, जिसे भुला पाना लगभग असंभव था।

इस के पश्चात उन का बहुचर्चित उपन्यास- ' विपश्यना में प्रेम ' पढ़ा। जिस की चर्चा, मैं काफ़ी समय से सोशल मीडिया में पढ़ रही थी। उसे पढ़ने के लिए मैं भी उत्सुक हो उठी थी। फिर मालूम हुआ कि उन की सभी रचनाएं उनके ब्लॉग - सरोकारनामा, पर उपलब्ध है 

इस उपन्यास को पढ़ना मेरे लिए एक अलग अनुभव रहा। उपन्यास का प्रमुख पात्र विनय, सांसारिक उपक्रमों से ऊबा हुआ आदमी है। जो पंद्रह दिन की मौन साधना के लिए, विपश्यना शिविर में आता है। इस शिविर में आते ही सब के मोबाइल, लैपटॉप इत्यादि शिविर संचालकों द्वारा जमा करवा लिए जाते हैं। अर्थात अब वहां उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का संपर्क, बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुका है। अब सुबह चार बजे से, रात नौ बजे तक की साधना प्रारंभ हो जाती है। प्रत्येक साधक को घंटी के स्वर पर , प्रातः चार बजे शैय्या त्याग कर, साधना के लिए तैयार होना है। कई - कई घंटों की साधना चलती है। पंद्रह दिन तक मौन रहना है। इशारे में भी, किसी से कोई बात नहीं करनी है। बैठते समय दीवार का सहारा भी नहीं लेना है। ऐसे में शिविर के कठोर नियमों से, विनय ऊबने लगता है और वहां से भाग जाने को व्याकुल होने लगता है। जब उस के चारों ओर मौन था, तो अंतर्मन का शोर बढ़ता चला जाता है। वह बहुत प्रयास के बावजूद भी, उस से छुटकारा नहीं पाता। साधना करते हुए वह अकसर निद्रा की शरण में चला जाता है, उस की नाक बजने लगती है। जब चैतन्य होता है, तो कक्ष में उपस्थित लोगों पर उस का ध्यान भटकता रहता है। वहां कुछ दक्षिण भारतीय हैं तो कुछ महाराष्ट्रियन। बड़ी संख्या में विदेशी भी, साधना के लिए आए हैं। एक अंग्रेज लड़का है जो उसे हाथ जोड़ कर नमस्कार करता है। फ्रांसीसी है, सिंगापुरी है, राशियन है। विनय की दृष्टि अकसर नारी देह के अवयवों का भी निरीक्षण करती रहती है। बहुधा वह स्वयं को डपटता भी है, कि वह साधना के लिए आया है, लंपटई के लिए नहीं। अच्छी खासी ठंड होने के कारण जहां लोग गर्म कपड़ों से ढके रहते हैं, वहां एक रशियन युवती स्लीवलेस टॉप और स्कर्ट में रहती है। फिर एक रात जब विनय साधना समाप्त होने के पश्चात, नींद न आने के कारण टहलने निकला है, तभी उस रशियन युवती के साथ उस की अंतरंगता हो जाती है। ऐसा कई बार होता है और विनय का मन, अब साधना में लगने लगता है। 

अंत में वह यह जान कर सन्न रह जाता है कि वहां आए लोगों के आने का उद्देश्य मात्र साधना नहीं था, बल्कि वे अपने स्वार्थों की पूर्ति हेतु भी आए थे। कुछ लोग वहां अपने टूरिज्म के व्यवसाय हेतु आए थे, तो कुछ घूमने के उद्देश्य से और सबसे सस्ते, उपलब्ध स्थान होने के कारण वहां आए थे। उपन्यास का अंत, विनय के साथ पाठक को भी एक तेज झटका देता है और मन के भीतर उल्लास भर देता है। पूरे उपन्यास का मूल स्वर यह है कि अधूरी लालसाओं के साथ व्यक्ति साधना नहीं कर सकता। जब उस का मन हर तरह से तृप्त होगा, तभी वह पूरे मन से किसी साधना को साध पाएगा। यह उपन्यास ओशो की पुस्तक - संभोग से समाधि, की सटीक और रोचक व्याख्या प्रस्तुत करती है।

पूरे उपन्यास का कलेवर इतना रोचक है, कि पाठक इसे एक ही सिटिंग में पढ़ने को बाध्य हो जाता है। पूरा उपन्यास, पाठक के मन में उत्सुकता, हर्ष, विषाद जैसे भाव जगाने में सक्षम है। भाषाई कौशल तो इस कदर अद्भुत है कि सभी दृश्य दर्शनीय हो उठते हैं। इतना वास्तविक कि जैसा लेखक दिखाना चाहता है पाठक भी वैसा ही अनुभव करता है। इस की कुछ बानगी मैं अवश्य दिखाना चाहूंगी -

यह कौन सा शोर है? शोर है कि विलाप ? कि शोर और विलाप के बीच का कुछ ? विपश्यना तो नहीं ही है तो फिर क्या है ?

विराट दुनिया है स्त्री की देह। स्त्री का मन उस की देह से भी विराट ।

बाहर हल्की धूप है , मन में ढेर सारी ठंड। 

विपश्यना में वासना का कौन सा संगीत है यह ?

कौन सी कंचनजंघा है जिस की गोद में बैठ कर सूर्य शिशु बन कर झांक रहा है। मां की गोद में बैठा , आहिस्ता से झांकता शिशु। टुकुर-टुकुर। सूर्य की लाली लावण्य बन कर उपस्थित है। 

चांद भी इस सर्दी में जैसे स्लीवलेस हो गया है। जैसे अपनी मां की गोद में बैठ कर , मां के आंचल में छुपा हुआ आहिस्ता से झांक रहा है। टुकुर-टुकुर। तो क्या चांद को भी मल्लिका की प्रतीक्षा है। प्रतीक्षा तो इन ठंडी हवाओं को भी है। लिली के फूल की झाड़ियों को भी है। आम के वृक्ष को भी। आचमन करते पल्लव को भी। इस नीरव सन्नाटे को भी…

नए-नए प्रयोग मुझे मोहित करते रहे और मैं इस उपन्यास की अबाध गति के साथ बहती चली गई। इसे पढ़ने का अनुभव अद्भुत रहा। एक ऐसी रचना, जिसमें सर्वत्र मौन ही है, संवाद न के बराबर, वह पाठक के मन की लगाम कस कर थामे रखता है और आप को कहीं भी ऊबने नहीं देता। 

मैं दयानंद जी को बहुत बधाई देती हूं इस लाजवाब उपन्यास के लिए और अपेक्षा करती हूं कि पुस्तक की गूंज , लंबे समय तक, चहुंओर व्याप्त रहेगी।


विपश्यना में प्रेम उपन्यास पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक कीजिए 


विपश्यना में विलाप 


समीक्ष्य पुस्तक :



विपश्यना में प्रेम 

लेखक : दयानंद पांडेय 

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 

4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 

आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 

पेपरबैक : 299 रुपए 

पृष्ठ : 106 

अमेज़न (भारत)
हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl