Monday, 12 September 2016

यह आहिस्ता ही जैसे तेजेंद्र की कहानियों की शिनाख़्त है कि कहीं कुछ शोर न हो और सब कुछ टूट जाए


तेजेंद्र शर्मा की कहानियां जैसे दादी की रजाई हैं 
 
जैसे बचपन में दादी रजाई में दुबका कर दुलार में भर कर पुचका कर क़िस्सा सुनाया करती थीं और हम कब सुख की नींद सो जाते थे पता नहीं चलता था । ठीक वैसे ही तेजेंद्र शर्मा अपनी कहानियों में हमें समेट कर किसिम-किसिम के क़िस्से सुनाते हैं और हम उन के कथा लोक में डूब-डूब जाते हैं , ऊभ-चूभ हो जाते हैं । गोया उन की कहानियां जैसे कहानियां न हों दादी की रजाई हों । कहानी के तार चाहे दुःख में डूबे हों या सुख में तेजेंद्र की कहानियां दादी की उसी दुलार और पुचकार की आगोश में समेट लेती हैं । अगर आप ने तेजेंद्र शर्मा से कभी उन की कहानियों का पाठ सुना हो तो इस बात को आप ज़्यादा बेहतर समझ सकेंगे । मुझ से अगर कोई पूछे तो मैं साफ कहूंगा और कि तुरंत कहूंगा कि तेजेंद्र शर्मा का कहानी पाठ उन के कहानी लेखन पर भारी है । मैं ने बहुतेरे कहानीकारों से उन का कहानी पाठ सुनने का सौभाग्य पाया है । लेकिन हिंदी में एक तेजेंद्र शर्मा और दूसरे हृषिकेश सुलभ जैसा कहानी पाठ दुर्लभ है । दूसरे , मणिपुरी में राजकुमा्री हेमवती देवी का कहानी पाठ । संवेदना में भीगा ऐसा कहानी पाठ मैं ने अभी तक और नहीं सुना। मुझे कहने दीजिए कि तेजेंद्र शर्मा स्टोरी राइटर ही नहीं स्टोरी टेलर भी अद्भुत हैं ।

तेजेंद्र शर्मा की कहानियों की सरलता ऐसी है जैसे कोई पहाड़ी नदी का पानी हो । उज्ज्वल और धवल । शीशे के मानिंद साफ-शफ़्फ़ाक़ । कल-कल बहती कथा की नदी अपने साथ सब कुछ लिए आती है । सीप , घोघा , हीरा , मोती , मिट्टी , पत्थर , लकड़ी , लोहा , पानी सब । लेकिन इस सब में समाया संवेदना का सागर निरंतर बड़ा होता जाता है । तिनका-तिनका , रेशा-रेशा , गोशा-गोशा घायल मिलता है । दुःख का हिमालय कातर हो कर जब बहता है तो जैसे करुणा का प्रपात टूट पड़ता है । लेकिन आहिस्ता । यह आहिस्ता ही जैसे तेजेंद्र की कहानियों की शिनाख़्त है । कि कहीं कुछ शोर न हो और सब कुछ टूट जाए । भीतर ही भीतर । बिना किसी छौंक के , बिना किसी तड़के के दाल में जैसे देसी घी आ जाए । चुपके से । तेजेंद्र शर्मा की कहानियों का बस यही स्वाद है । बिना बघार के , बिना शोर , बिना चमत्कार के तेजेंद्र की कहानियां अचानक ऐसे मोड़ और ऐसे आश्वस्त फ़ैसले पर बिना किसी फासले के ला कर खड़ा कर देती हैं कि आप मुड़ कर देखने लगते हैं कि अरे कहानी ख़तम हो गई ? दरअसल तेजेंद्र की कहानियों की समाप्ति पर ही उस का प्रस्थान बिंदु शुरु होता है । और तेजेंद्र की कमोबेश सभी कहानियों की तफ़सील यही है । यही उन की ताक़त है । प्रवासी होने की चाशनी और निर्वासित होने की यातना में लिपटी तेजेंद्र की कहानियों में निर्मल वर्मा की कहानियों में पसरे सन्नाटे और अकेलेपन की गहरी पदचाप भी है । 

इंतजाम ऐसी ही एक कहानी है । छीजते दांपत्य में विवाहेतर संबंधों की आश्वस्ति और उस के जस्टिफिकेशन की । जिल का पति टैरेंस बाद के दिनों में एक टी वी ऐक्ट्रेस के साथ जुड़ जाता है । उस के दांपत्य जीवन में , देह संबंधों में खटास ही नहीं आता , भूचाल भी आ जाता है । देह की भूख जिल को तोड़ डालती है , ' वह अपने प्यार में व्यस्त था और जिल अकेली तड़पती थी।' लेकिन टैरेंस स से निरंतर मुंह फेरे रहता है । जैसे उस की उसे परवाह ही नहीं है । अचानक जिल के जीवन में जेम्स आ जाता है जो उस से उम्र में छोटा भी है । जिल के जीवन में जैसे बहार आ जाती है । जिल और जेम्स का साहचर्य उन के जीवन में संगीत सी उपस्थिति देती है ।


कितना खालीपन था जिल के जीवन में! उसके आसपास सन्नाटे का साम्राज्य था। सन्नाटा जो कभी ठोस हो जाता तो कभी तरल...! बैठे-बैठे सन्नाटा नटखट हो जाता फिर वापिस गंभीर! सन्नाटे के साथ खेलना, उससे डरना, उससे बातें करना सभी जिल के जीवन का हिस्सा बन गए थे। सन्नाटा कभी उसका मजाक उड़ाता तो कभी उसका दर्द बाँटता। एक विशेष किस्म का रिश्ता बन गया था जिल का सन्नाटे के साथ। सन्नाटे की इस दीवार में से एक दिन निकल आया था जेम्स, जिसके आने के बाद सन्नाटे में एक खास तरह का संगीत सुनाई देने लगा था। 

जिल अब हर वक्त एक खुमारी सी में रहती थी। चेहरे पर एक मुस्कुराहट सदा विराजमान। टैरेंस अगर अपने चक्करों में न फँसा होता तो अवश्य ही उसे दिखाई देता कि जिल किसी और ही दुनिया में रहने लगी है। जिल को अब शुक्रवार की प्रतीक्षा रहती। टैरेंस शुक्रवार की शाम चला जाता और रविवार को देर रात या फिर सोमवार को ही लौटता। यह समय जैसे जिल के लिए दुनिया भर की रूहानी किताबों में दर्शाई जन्नत का समय होता। एलिसन को शनिवार की सुबह कॉलेज भेजने के बाद जिल का सारा समय जेम्स के साथ ही बीतता। 

जिल का जीवन तो संगीतमय हो गया था । पर जब उस की बेटी एलिसन का दांपत्य भी मुश्किल में आ जाता है । तो जिल परेशान हो जाती है । जैसे मां जिल का इतिहास दुहरा रही हो एलिसन । अब जिल अपने बीते दिन याद करती और बेटी का दुःख समझती । वह भूल नहीं पाती थी वह क्षण जब उस के पति ने बिस्तर में उसे बेइज्जत किया था और कहा था कि अब तुम में बचा ही क्या है ? तुम बहुत बोर करती हो । तुम अपना कुछ और इंतजाम कर लो ।

इंतजाम! यही तो किया था जिल ने। ...इंतजाम...! जेम्स उसका इलाज था - उसके अकेलेपन, निराशा और डिप्रेशन का इलाज। उसे याद भी नहीं आता कि उसका पति टैरेंस किसी और महिला के साथ रंगरलियाँ मना रहा है। उसे उस सेलेब्रिटी से जरा भी जलन नहीं होती क्योंकि जेम्स पति न होते हुए भी उन अँधेरे पलों में वह सब जिल को दे जाता था जो टैरेंस बरसों सूरज के उजाले में नहीं दे पाया। 

और कहानी उस समय अप्रत्याशित मोड़ पर आ खड़ी होती है जब वह अपनी बेटी के लिए भी अपने साथी जेम्स का इंतजाम तजवीज करती है । दरअसल तेजेंद्र शर्मा की इंतजाम कहानी सिर्फ कहानी भर नहीं है । एक ऐलान भी है । पुरुष सत्ता के ख़िलाफ़ । वह ऐलान जो स्त्री चुपचाप करती है । बिना शोर शराबे और चीख़-पुकार के ।

देह की कीमत कहानी में नायिका परमजीत भी पुरुष सत्ता के ख़िलाफ़ चुपचाप ऐलान ही तो करती है , ' उसने तीन लाख रुपए का ड्राफ्ट उठाया... उसे समझ नहीं आ रहा था कि यह उसके पति की देह की कीमत है या उसके साथ बिताए पाँच महीनों की कीमत। ' तेजेंद्र शर्मा अपनी लगभग सभी कहानियों में ऐसे ही चुपचाप वाली जिरह करते हैं और ख़ामोश छोड़ देते हैं । कहानी ख़त्म  हो कर भी ख़त्म नहीं होती । क्यों कि उस के ख़त्म होने में भी प्रस्थान बिंदु उपस्थित रहता है । देह की कीमत में एक संपन्न दिखने वाला स्वार्थी परिवार किस तरह संवेदनहीन हो कर विपन्न दीखता है कहानी में यह तसवीर भी अपने पूरे कसैलेपन के साथ उपस्थित है । एक बार फिर होली कहानी की नजमा का हिंदुस्तानीपन , उस का हिंदू प्रेमी और पाकिस्तानी फौजी पति का कंट्रास्ट तेजेंद्र ने इस शालीनता , संवेदनशीलता , सघनता और सावधानी से बुना है कि कहानी कहीं से भी लाऊड नहीं होने पाती । जब कि इस की गुंजाइश पूरी थी । एक भारतीय औरत के गले किस तरह एक पाकिस्तानी फौजी बांध दिया जाता है जो न सिर्फ़ अड़ियल है हद से ज़्यादा कट्टर भी है कि पाकिस्तान के कराची में उस का जीना भी दुश्वार हो जाता है । तहज़ीब , तेवर और पासपोर्ट तक बदलने में जो यातना नजमा झेलती है , जो सांघातिक तनाव उस के हिस्से क़दम-क़दम  आता है उस का निर्वाह तेजेंद्र शर्मा ने इस शालीनता से किया है गोया कोई पक्षी अपना घोसला बना रहा हो , तिनका-तिनका जोड़ कर । अपने ही देश भारत में वीजा ले कर आना नजमा को जैसे तोड़ देता है । उस की भारतीयता को तोड़ देता है । टूटती तो वह पाकिस्तान जा कर भी रही है भारतीयता के आग्रह तले पर यह उस का विधवा हो कर भारत लौटना उसे गहरे तनाव में धकेल देता है । लेकिन प्रेम की फुहार और उस की याद बड़े-बड़े तनाव डायलूट कर देती है । नजमा का भी कर देती है  , ' दिल्ली से बुलंदशहर का सफर उसकी रंगों में रक्त का बहाव बहुत तेज करता गया। सोच-सोच कर परेशान थी कि क्या चंदर आज भी वहाँ रहता होगा, क्या डाक्टर बन गया होगा, क्या उसे याद करता होगा? ' और कहानी ख़त्म होती है कैसे भला देखिए :

अगले सप्ताह एक बार फिर होली है। नजमा के दिल में अपनी आख़िरी होली की याद अचानक ताजा होने लगी है। कराची की घुटन के बाद अचानक एक और होली की खुली खुशबू! कैसी होगी अगले सप्ताह की होली? क्या उसके भतीजा-भतीजी भी होली खेलते होंगे? अचानक नजमा को लगा कि किसी ने उसके चेहरे पर गुलाल लगा दिया है। उसका चेहरा आज फिर ठीक वैसे ही लाल हो गया, जैसे छब्बीस साल पहले हुआ था। बस आज उसे देखने के लिए दुर्गा मासी जिंदा नहीं थी। 

पासपोर्ट का रंग कहानी के पंडित गोपाल दास त्रिखा की यातना भी किसी थर्मामीटर के वश की नहीं है । कुछ सुविधाओं की खातिर एक भारतीय ब्रिटेन की नागरिकता लेते समय कितनी बार मरता है , कितना अपमान सहता है , अपनी आत्मा को , स्वाभिमान और आन को गिरवी रख कर ब्रिटेन की नागरिकता लेता है यह तफ़सील पासपोर्ट का रंग कहानी पढ़ कर ही जानी जा सकती है । 

 ‘मैं भगवान को हाजिर नाजिर जान कर कसम खाता हूँ कि ब्रिटेन की महारानी के प्रति निष्ठा रखूँगा।’

लेकिन इस यातना से उबरने ख़ातिर पंडित गोपाल दास  त्रिखा एक बार फिर फंसते हैं जब एक भारतीय प्रधान मंत्री दोहरी नागरिकता का राजनीतिक ऐलान करता है । प्रधान मंत्री बदलते रहते हैं और यह दोहरी नागरिकता के झांसे वाला ऐलान टी वी पर जारी फिर भी रहता है । जाने कितने गोपाल दास त्रिखा इन ऐलानों तले अपने को बेज़मीर कर गए होंगे , मर खप  गए होंगे पर उन की यातना ख़त्म नहीं होती । 

तेजेंद्र शर्मा सिर्फ़ स्त्रियों की बग़ावत के ऐलान की ही यातना नहीं बांचते , गोपाल दास त्रिखा जैसों की भारतीयता के लिए मरते-मिटते लोगों की ही यातना नहीं बांचते । वह बाज़ार और बाज़ार में बिछे ख़ुशहाल लोगों की यातना का भी बहुत बारीक व्यौरा बांचते हैं । कहानी है कब्र का मुनाफ़ा । आराम से , ऐश से रह रहे लोग मरने के बाद भी पॉश इलाक़े में अपनी पसंदीदा और आलीशान कब्र में ठाट से रहने का मंसूबा गांठते हैं । ह्विस्की से गला तर करते हुए , अपनी-अपनी एक्सक्लूसिव कब्रें बुक करते हुए । बात ही बात में कब्रें बुक भी हो जाती हैं । फिर तफ़सील बहुत सारी होती हैं । यकबयक बात बहुत बढ़ जाती है । और बात यहां  तक आ जाती है कि कब्रें कैंसिल करनी पड़ जाती हैं । लेकिन यह कब्र कैंसिल करना भी एक फायदेमंद धंधे में अचानक तब्दील हो जाता है । आप भी देखें :


नादिरा थैंक्स कह कर फोन रख देती है। ‘लीजिए खलील, हमने पता भी कर लिया है और कैंसिलेशन का आर्डर भी दे दिया है। पता है उन्होंने क्या कहा? उनका कहना है कि आपने साढ़े तीन सौ पाउंड एक कब्र के लिए जमा करवाए हैं। यानी कि दो कब्रों के लिए सात सौ पाउंड। और अब इन्फलेशन की वजह से उन कब्रों की कीमत हो गई है ग्यारह सौ पाउंड यानी कि आपको हुआ है कुल चार सौ पाउंड का फायदा।’

खलील ने कहा, ‘क्या चार सौ पाउंड का फायदा, बस साल भर में! ‘उसने नजम की तरफ देखा। नजम की आँखों में भी वही चमक थी।

नया धंधा मिल गया था!

दरअसल कहानी में तेजेंद्र शर्मा के यही ठाट हैं । और हम उन के इसी ठाट के मुरीद हैं , रहेंगे । 





4 comments:

  1. Bahut hi sunder..... badhai ho sir..

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  2. बहुत सुंदर विश्लेषण तेजेन्द्र जी की कहानियो का । शुभकामनाये तेजेंदर जी

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  3. बहुत सुंदर विश्लेषण तेजेन्द्र जी की कहानियो का । शुभकामनाये तेजेंदर जी

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-09-2016) को "हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक-2465) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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