Monday, 2 April 2012

नरेश मेहता मतलब कविता में वैचारिक सत्ता की उपस्थिति

‘व्यक्ति का केवल इतिहास पुरुष बन जाना तथा/ प्रिया का मात्र प्रतिमा बन जाना/व्यक्तिगत जीवन की/सब से बड़ी दुर्घटनाएं होती हैं राम!’ जैसी कविताएं लिखने वाले नरेश मेहता का महाप्रस्थान कविता से वैचारिक सत्ता का प्रस्थान बिंदु भी है शायद। मनुष्य के इतिहास बनने की त्रासदी भोगते हुए किसी को देखना हो, कविता को आकाश से धरती पर उतरता देखना हो, मनुष्य होने की सीमा में सूर्य पुत्री धूप को थाहना हो, सत्ता और प्रजा के प्रश्नों से दो-चार होना हो, तो नरेश मेहता की कविताओं में डूबना ज़रूरी है। दरअसल कविता में वैचारिक सत्ता की उपस्थिति जितनी नरेश मेहता के यहां है और जिस विरलता से है कहीं और उसे ढूंढना तकलीफदेह है। तो शायद इस लिए भी कि नरेश मेहता के लिए काव्य, एक शब्द यज्ञ था। क्योंकि वह बारीक पलकों वाले कवि नहीं थे।


‘समय देवता’ जैसी उन की लंबी कविता की राजनीतिक मान्यताएं और उस की ऐतिहासिकता आज भी उन की कविताओं की बहस में शुमार है। एक समय तो ‘समय देवता’ ही नरेश मेहता की पहचान मान ली गई थी। हालां कि नरेश मेहता कहते थे कि ‘कविता की कोई संज्ञा नहीं है, क्यों कि वह तो शुद्ध शक्ति है। उस का अनुभव या साक्षात भी निपात जैसा होता है। निपात का साक्षात भी मात्र व्यक्ति नहीं, मनीषी ही कर सकता है।’ वह कहते थे कि ‘काव्य के साथ सब से बड़ी कठिनाई यह होती है कि उस में गद्य की भांति देश और भाव नहीं होते। ‘राम थे’ यह गद्य है, पर ‘राम हैं’ यह कविता है। खंडकाव्य ‘महाप्रस्थान’ में नरेश मेहता ने युधिष्ठिर, अर्जुन और कृष्ण से द्रोपदी और अश्वत्थामा के बहाने कई-कई प्रश्न पूछते हुए सत्ता और प्रजा के सवालों को आज की तारीख में भी उस जलने को जो उपस्थिति दी है, जिस तरह रेखांकित कर मन को खौलाया है, वह अप्रतिम है। सत्ता विमर्श का ऐसा दाहक और मारक सवाल वह खड़ा करते हैं कि मन झनझना जाता है। ‘कालवृक्ष’ जैसी कविताओं तथा ‘प्रवाद पर्व’ और ‘संशय की एक रात’ में भी महाप्रस्थान के कुछ बिंदु सुलगते हैं। पर इनका तेवर और है।

आलोचक मानते हैं कि नरेश मेहता की रचनाएं ऋचाओं का सौंदर्य समेटे हैं, तो शायद इस लिए भी कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में उन की खास दिलचस्पी थी। वैष्णव व शैव मतों को तो उन्हों ने करीब से जिया ही, जैन तथा अन्य विचारों को भी अपने चिंतन में समोया। कई बार शायद इस लिए उन की कविताएं उन्हें चिंतक कवि के रूप में उपस्थित करती हैं। पर, जैसे उन की कविताओं में चिंता, विचार और इस बहाने मन को समझने और सुलगाने वाले सवाल सुलगते हैं, ठीक यही लय उन की प्रेम कविताओं में भी फूटती है और अपनी पूरी मांसलता औद उद्दीपन के साथ। ‘तुम मेरा मौन हो’ संग्रह में संकलित कविताएं ऐसी ही प्रेम कविताएं हैं, जो देश और काल की देहरी लांघती लाल एड़ियों सी दिखती हैं। वह इस की भूमिका में कहते हैं, ‘कविता ऐसी मध्यकालीन माधवता के साथ मेरे निकट आएगी, इस की कभी कल्पना भी नहीं थी।’ प्रेम कविता लिखना उन की राय में ‘तलवार की धार पर धावनी है।’ उन्हों ने ‘कभी तो’ में लिखा भी है ‘और कोई क्यों विश्वास करेगा, कि/ फाल्गुन/ खिलता ही नहीं, बजता भी है/ प्रिया! मुझे भी बजा लेने दो/ वह ठुमरी/ वह बोल/ जिस से व्यक्ति/ रविशंकर से देवगंधर्व बनता है।’ ‘चौंको नहीं’ में वह लिखते हैं, ‘चौंको नहीं प्रिया/ यह मेरा हाथ नहीं/ बल्कि मेरी भाषा जैसी हवा थी।...यह नारी एकांत/ केवल सूर्य के लिए ही नहीं/ हवा/ और मेरी भाषा दोनों के लिए वर्जित है।’ दरअसल नारी मनोविज्ञान का जो विन्यास और तनाव नरेश मेहता अपनी कविताओं में रचते हैं, वहीं तनाव और उस का विन्यास उन की कहानियों और उपन्यासों में भी उपस्थित मिलता है। कहीं ज्यादा सघन, कहीं ज्यादा सुलगन लिए। उन के चरित्र ‘सेंटीमेंटल’ और ‘इमोशनल’ के बीच की क्षीण रेखा में अपना परीक्षा क्षेत्र ढूंढते दिखते हैं।

‘दो एकांत’ नरेश मेहता का ऐसा ही उपन्यास है। ‘डूबते’मस्तूल की नायिका रंजना की स्मृति ही तनाव के तंतुओं में जीती है। प्रश्नों के समाधान, उत्तर की कथा नरेश मेहता की कविताओं की ही नहीं, उपन्यासों की भी है। दो खंडों वाला उन का उपन्यास ‘उत्तरकथा’ भी इसी समाधान और उत्तर की कथा वाला उपन्यास है। बिलकुल किसी राजकुमार सा दिखने वाले और ज़्यादातर समय इलाहाबाद और फिर बाद में भोपाल में रह कर महाप्रस्थान कर जाने वाले नरेश मेहता लिखते थे, ‘जब भी मैं/ फूल, नदी या आकाश पर कविता लिखता हूं/ तो वह मानवीय प्रकरण ही होता है/ क्यों कि जब भी मनुष्य की आखों में आंसू होते हैं/ मैं ने फूल, नदी, आकाश को रोते देखा है।’ ‘पक्षी, पंडित’सरीखी कविता लिखने वाले और धूप को सूर्यपुत्री बताने वाले नरेश मेहता कहते थे ‘यह वह सूर्य नहीं, जिसे गायत्री मंत्री खोज रहा है।’ जाने वह किस सूर्य को खोज रहे थे। उन का सूर्य उन्हें मिला कि नहीं कौन जाने, पर वह हम से विदा हो गए हैं, बिछड़ गए हैं अपनी कविता से यह हम ज़रूर जानते हैं। स्वर्गाश्रम जाते समय युधिष्ठिर से जाने कितने अप्रिय और सुलगते सवालों की झड़ी वह लगा गए थे। ढेरों किताबों, सम्मान और सवालों से लदे शायद अपने महाप्रस्थान में भी वह ज़रूर खुद से भी अप्रिय और सुलगते प्रश्न पूछते हुए ही गुज़र रहे हों, स्वर्गाश्रम की ओर। वह मानेंगे नहीं। हम सब यह जानते हैं, ‘ओ मेरे तुम!/भूल से केवल तुम ने ही/अपनी भूमिका के बदले वास्तविकता के वस्त्र उतार दिए हैं।’

2 comments:

  1. behad rochak aur saargarbhit jaankari se paripoorn aapke is lekh ko padhne ke baad ab naresh mehta ji se unki lekhni ke madhyam se milna jaroori lag rahaa hai ...dhanyvaad pandey ji

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  2. "यह पथ बंधु था " के लेखक के रूप में मैंने उन्हें हमेशा याद किया है ।
    इला

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