Thursday, 30 August 2018

अथ पुस्तक विमोचन जाल-बट्टा कथा

यश:प्रार्थी एक युवा कवि आज घर पर मिलने आए । अभी-अभी लखनऊ में एक कविता पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम देख कर अभिभूत थे और अपनी कविता पुस्तक के लिए खर्चा भी जोड़ रहे थे । खुद ही बता रहे थे कि मान लीजिए पचास हज़ार रुपए पुस्तक प्रकाशित करवाने में लग जाएंगे । पचास हज़ार रुपए का बजट वह पुस्तक विमोचन के आयोजन पर भी बता रहे थे । कह रहे थे ख़ूब धूम-धाम से करेंगे । फिर कुछ बड़े कवियों , आलोचकों को बाहर से बुलाने और उन के रहने , खाने-पीने , शराब आदि के लिए भी वह पचास हज़ार रुपए का बजट बताने लगे । कहने लगे कुछ बढ़ा भी देंगे । पचास से पचहत्तर भी हो सकता है । स्थानीय पत्रकारों के शराब और डिनर की चर्चा भी की । मैं ने उन से पूछा कि आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हैं ? वह कहने लगे कि बस आप की राय जानना चाहता हूं । मैं ने कहा कि मेरी राय तो यह है कि एक तो पैसा खर्च कर कविता-संग्रह छपवाने की कोई ज़रूरत नहीं है । दूसरे , अपना पैसा खर्च कर अपनी झूठी तारीफ करवाने के लिए पुस्तक विमोचन कार्यक्रम आयोजित कर इतना पैसा पानी में मत बहाइए । न ही झूठी तारीफ करने के लिए बाहर से कवियों , आलोचकों को भाड़े पर बुलाइए । न यह ड्रामा कीजिए । वह किंचित दुखी होते हुए बोले , आप तो सर , मेरे इरादे पर ही पानी डाल दे रहे हैं । मैं ने कहा कि आप ने राय मांगी तो सही राय दे दी । आप मत मानिए । किसी डाक्टर ने थोड़े कहा है कि आप मेरी राय मानिए ही मानिए । मैं ने उन्हें स्पष्ट बताया कि मैं ने पैसा दे कर कभी कोई किताब नहीं छपवाई । न ही किसी किताब का कभी कोई विमोचन आदि करवाया है । अब तो समीक्षा के लिए भी कहीं किताब नहीं भेजता । क्यों कि यह सारी चीज़ें , लेखक को अपमानित करने वाली हो चुकी हैं । सो हो सके तो आप भी इस सब से बचिए । क्यों कि दिल्ली , लखनऊ से लगायत पूरे देश में हिंदी जगत का यही वर्तमान परिदृश्य है । खास कर अगर वक्ता अध्यापक है तो वह पुस्तक पर न बोलते हुए भी , दाएं-बाएं बोलते हुए भी अपने अध्यापन के बूते लंबा बोलते हुए लेखक का इगो मसाज अच्छा कर लेता है । इस विमोचन में भी यही सब हुआ । अध्यापक वक्ताओं की बहार थी । बल्कि एक लेखक ने तो संचालिका से चुहुल करते हुए कहा भी कि आप ख़राब कविताएं भी बहुत अच्छा पढ़ती हैं । वह नाराज होने के बजाय हंस पड़ीं ।

लेकिन उन युवा कवि पर पुस्तक छपवाने और विमोचन का जैसे भूत सवार था । मैं ने आजिज आ कर उन से पूछा कि क्या कविताएं भी पैसा खर्च कर लिखवा रहे हैं ? वह भड़क गए । बोले , लिखना मुझे आता है । मैं ने उन से कहा कि चलिए आप के पास पैसा है , आप यह सब कर भी लेंगे । लेकिन कोई क़ायदे का कवि या आलोचक आप की कविता की तारीफ करने आएगा भी क्यों ? आप संपादक हैं क्या कि सब को बटोर लेंगे ? कि आप पुलिस अफ़सर हैं कि आई ए एस अफ़सर ? कि कोई सुंदर स्त्री ? कि किसी लेखक संघ के धंधेबाज पदाधिकारी हैं , सदस्य हैं , कि कोई गिरोहबाज लेखक हैं कि लोग अपना मान-सम्मान भूल कर भागे-भागे आ जाएंगे ? वह एक विद्रूप हंसी हंसे । कहने लगे एक एयर टिकट , या रेल का ए सी टिकट , होटल में रहने , शराब की बात पर हर कोई आ जाता है । बड़े से बड़ा भी । कविता कैसी भी हो तारीफ़ के पुल बांध कर जाता है । मैं ने कहा कि तारीफ़ के पुल बांधने वाले दिग्गजों ने बीते विमोचन कार्यक्रम में कितनी बात उस कवि की कविता पर की और कितनी बात कवि के बारे में की । और कितनी बात इधर-उधर की , की आप को याद है ? वह बरबस हंस पड़े । बोले यह तो ठीक है पर एक समां तो बंध ही गया न !

मैं ने उन से कहा कि कमज़ोर कविताओं पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दिग्गजों से पूछिएगा कभी कि आप उन कविताओं पर क्या इतना हर-भरा लिख कर कहीं छपवा भी सकते हैं ? देखिएगा सभी के सभी तो नहीं पर ज्यादातर कतरा जाएंगे । नामवर जैसे लोग भी बोलते बहुत थे कभी विमोचन कार्यक्रमों में लेकिन उन किताबों पर लिखते नहीं थे कभी । और कई बार तो बहुत दबाव में आ कर वह कार्यक्रम में आ तो जाते थे पर अप्रिय भी बोल जाते थे । जैसे गोरखपुर में किसी कार्यक्रम में एक ग़ज़ल संग्रह का विमोचन करते हुए बोल गए कि फ़िराक के शहर में कुत्ते भी शेर में भौंकते हैं । दूरदर्शन के पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम में लंदन के एक लेखक के कहानी संग्रह पर वह अपमानजनक ही बोल गए । अशोक वाजपेयी के भी पुस्तक विमोचन , पत्रिका विमोचन के ऐसे अनेक किस्से हैं । कहूं कि तमाम स्थापित लेखकों के अनगिन किस्से । लखनऊ में नरेश सक्सेना भी विमोचन कार्यक्रमों में अटपटा और अपमानजनक बोल कर फज़ीहत उठाने के आदी हो चले हैं । विमोचित किताब पर अमूमन वह नहीं ही बोलते । इधर-उधर की बोलते हैं । अध्यापक हैं नहीं , सो जलेबी भी नहीं छान पाते ।लेकिन नरेश सक्सेना को उस दिन सुन कर लगा कि वह मौक़ा और पात्र देख कर ही अटपटा और अपमानजनक बोलते हैं , हर जगह नहीं । वह जानते हैं कि कहां क्या बोलना है , और कहां क्या नहीं बोलना है । कम से कम उस दिन यही लगा । आदतन वह एक बार फिसले तो पर अचानक फिसलते-फिसलते भी बच लिए । फिसल कर हर-हर गंगे कहने से बच गए । बल्कि बचा ले गए अपने आप को । मेरा मानना है कि नरेश जी को पुस्तक विमोचन कार्यक्रमों में जाने से भरसक बचना चाहिए । इस लिए भी कि पुस्तक चाहे जितनी भी बकवास हो , उस का लेखक उस समय उस समारोह का दूल्हा या दुलहन होता है । और दुलहन या दूल्हा काना हो , अंधा हो , लंगड़ा हो , गंजा हो , बुड्ढा हो , जैसा भी हो उस की तारीफ ही की जाती है । अवगुण नहीं देखा जाता । नरेश जी अवगुण देखने लगते हैं । या फिर पुस्तक पर बात ही नहीं करते । चाय , समोसा की लोगों की तलब पर बात बताने लगते हैं । अपने बारे में बताने लगते हैं । दुनिया भर की कविताओं आदि की बात करते हैं पर विमोचित पुस्तक की बात नहीं करते । गरज यह कि दूल्हे की भरपूर उपेक्षा ही उन का मकसद दीखता है । यह उन की चिर-परिचित अदा है अब । नतीजतन पुस्तक का लेखक और उस के संगी-साथी कुढ़ते बहुत हैं । बाकी लोग मजा लेते हैं ।

यश:प्रार्थी युवा कवि अब सहज हो रहे थे । और किचकिचा कर कहने लगे कि इन को तो मैं बुलाऊंगा ही नहीं । फिर जब मैं ने उन्हें बताया कि पैसा खर्च कर समीक्षाएं आदि भी लिखवाई और छपवाई जाती हैं अब तो ।

क्या कह रहे हैं आप ? पूछते हुए युवा कवि उछल पड़े । मैं ने उन्हें कई सारे दृष्टांत दिए । वह बहुत चकित हुए तो मैं ने उन्हें बताया कि हंस में एक लेखिका की किताब पर एक नामी आलोचक की लिखी समीक्षा राजेंद्र यादव ने बतौर विज्ञापन छाप दी थी और पूरी प्रमुखता से । प्रकाशक ही पैसा ले कर किताब नहीं छापते , संपादक भी पैसा और देह भोग कर सब कुछ छापते हैं । पैसा और देह भोग कर लोग पुरस्कार भी दे रहे हैं । ऐसे पुरस्कृत और उपकृत कुछ नायक , नायिकाओं के नाम भी बताए । लेकिन वह यश:प्रार्थी युवा कवि भी घाघ निकले । बोले , इस दिशा में भी सोचता हूं सर ! मैं ने उन से कहा कि यह सब मैं ने आजमाने के लिए आप को नहीं बताया । इस लिए बताया कि इन सब चीज़ों से आप दूर रहिए । सिर्फ़ और सिर्फ़ रचनारत रहिए । अपनी रचना पर यकीन कीजिए । किसी नौटंकी आदि-इत्यादि में नहीं । क्यों कि रचा ही बचा रहता है । तिकड़मबाजी और शार्टकट आदि नहीं । सिर्फ़ बदनामी मिलती है इन सब चीज़ों से । वह मुझे शर्मिंदा करते हुए बोले , जब हमारे सीनियर लोग रास्ता बता और बना गए हैं तो इसे आजमाने में कोई हर्ज नहीं है । मेरे पांव छू कर आशीर्वाद लिए और ख़ुश हो कर वह बोले , बड़ी फलदायी रही आप से यह मुलाकात । और विजयी भाव लिए चले गए । वैसे भी आज की तारीख में यही और ऐसे ही लोग विजयी लोग हैं । इन मीडियाकर्स के घोड़े खुले हुए हैं , इन का अश्वमेघ यज्ञ जारी है । अनवरत ।

Thursday, 23 August 2018

भारतीय पत्रकारिता के कुलदीप रहे हैं , कुलदीप नैय्यर


उर्दू पत्रकारिता से कैरियर शुरू करने वाले कुलदीप नैय्यर अंगरेजी पत्रकारिता में आ कर भारतीय पत्रकारिता में एक मानक बन कर हमारे बीच उपस्थित रहे थे। इंडियन एक्सप्रेस में बहुतेरे संपादक आए-गए लेकिन कुलदीप नैय्यर ने जो ज़ोरदार और धारदार पारी खेली उस का कोई सानी नहीं। वह भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादकों में शुमार हैं। उन के श्वसुर पंजाब सरकार में मंत्री रहे थे। कुलदीप नैय्यर भी एक समय लालबहादुर शास्त्री के सूचना सलाहकार रहे थे। मिजाज से भरपूर कांग्रेसी रहे कुलदीप नैय्यर ने लेकिन बतौर इंडियन एक्सप्रेस संपादक इमरजेंसी में इंदिरा गांधी और उन की इमरजेंसी की ईंट से ईंट बजा दी थी। रामनाथ गोयनका के वह अर्जुन बन कर उभरे थे। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर। इमरजेंसी के खिलाफ जो धुआंधार लिखा उन्हों ने , सत्ता से जिस तरह वह सिर उठा कर टकराए , आज की तारीख़ में कोई पत्रकार सपने में भी नहीं सोच सकता। उन दिनों जब समूचे इंडियन प्रेस ने निरंकुश सत्ता के आगे घुटने टेक दिए थे तब सत्ता प्रतिष्ठान के ख़िलाफ़ कुलदीप नैय्यर के लेखों की आंधी चल रही थी। नतीज़तन उन्हें जेल की सैर करनी पड़ी। क़ानून की पढ़ाई करने के बाद नैय्यर ने अमरीका से पत्रकारिता की पढ़ाई की।  फिर फिलासफी में पी एच डी की थी। वह चाहते तो वकालत कर सकते थे , प्रोफेसर बन सकते थे लेकिन उन्हों ने पत्रकारिता को चुना। वैसे भी वह पत्रकारिता करते थे , सिर्फ़ नौकरी नहीं। इंडियन एक्सप्रेस का उन का संपादक रूप तो जब मशहूर था तब था , बाद के दिनों में बिटवीन द लाइंस वाला सिंडिकेट कालम भी खूब मशहूर हुआ। 

सब से बड़ी बात यह कि वह सच को सच , झूठ को झूठ कहने के तलबगार थे। शास्त्री जी का जब ताशकंद में निधन हुआ तब नैय्यर भी उस यात्रा में उन के साथ रहे थे। उन्हों ने स्टेट्समैन , द टाइम्स लंदन , इंडियन एक्सप्रेस जैसे अख़बारों के अलावा समाचार एजेंसी यू एन आई और प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो में भी काम किया था। लंदन में वह भारत के उच्चायुक्त भी रहे और राज्यसभा के सदस्य भी। मैं उन को उन की सरलता और सौम्यता के लिए भी जानता हूं। पंजाबियत भी उन में भरपूर थी। पाकिस्तान के सियालकोट में पैदा होने और वहां पढ़ने-लिखने के नाते पाकिस्तान से उन का खासा लगाव था। भारत-पाकिस्तान संबंधों को सहज बनाने की उन की कोशिश भले रंग नहीं लाई पर इस के लिए वह निरंतर सक्रिय रहे। अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बस में लाहौर कुलदीप नैय्यर भी गए थे। एक समय वह अकसर लखनऊ आते रहते थे। यह अस्सी-नब्बे का दशक था। तब उन से कई बार मिलना हुआ करता था। एक बार लखनऊ से अयोध्या की उन की यात्रा में मैं भी उन के साथ गया था। वह मंदिर आंदोलन के उबलते हुए दिन थे। राम मंदिर भी वह तब गए थे। पूजा-अर्चना भी की थी। मंदिर आंदोलन के संतों से भी वह मिले थे और बाबरी एक्शन कमेटी के लोगों से भी। तमाम स्थानीय लोगों से भी। 

उन की कोशिश थी कि कोई सर्वमान्य हल निकल जाए। लेकिन पाकिस्तान से सहज संबंधों की कोशिश की तरह वह यहां भी कामयाब नहीं हुए। पर निराश नहीं थे। अपनी सामर्थ्य भर उन्हों ने कोशिश पूरी की। लेकिन नफ़रत और विवाद की दीवार इतनी बड़ी हो चुकी थी कि कोई रास्ता शेष नहीं रह गया था। कुलदीप नैय्यर की आत्मकथा की भी एक समय चर्चा हुई लेकिन खुशवंत सिंह की आत्मकथा की तरह तहलका नहीं मचा सकी। कुलदीप नैय्यर ने पत्रकारिता के अलावा कई सारे सामाजिक कार्य भी किए हैं। मानवाधिकार के लिए भी वह लड़ते रहे हैं। लेकिन याद हम उन्हें उन की गौरवशाली और शानदार  पत्रकारिता के लिए ही करते हैं। ख़ास कर इमरजेंसी में , इमरजेंसी के विरोध वाली पत्रकारिता के लिए। तमाम सारे सम्मान पाने वाले , ढेर सारी किताबों , लेखों , टिप्पणियों को लिखने वाले कुलदीप नैय्यर को हम भारतीय पत्रकारिता के कुलदीप के नाते सर्वदा अपनी यादों में याद रखेंगे , मन में बसाए रखेंगे। विनम्र श्रद्धांजलि !

Tuesday, 21 August 2018

एक आवारा रात विमान में विचरते हुए

सुबह की लाली 

जाना था जापान , पहुंच गए चीन ! कल की रात मेरे साथ यही हो गया। बैंगलौर  से कल रात दस बजे की फ्लाइट  थी। लेकिन बैंगलौर के जालिम ट्रैफिक जाम और इंडिगो की मनमानी के चलते छूट गई। सवा नौ बजे रात एयरपोर्ट के लाउंज में दाखिल हो गया। लेकिन लंबी लगी लाइन के चलते रुकना पड़ा और अंतत: सब से निवेदन कर बोर्डिंग काउंटर तक पहुंचते -पहुंचते 9 - 30 हो गया।  काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने कहा कि अब आप लेट हो गए। फिर एक दूसरे  काउंटर पर भेजा। वहां बैठी लड़की ने कहा कि अब अगली फ्लाइट का टिकट लीजिए।  मैं ने प्रतिवाद किया कि अभी समय है। जाने दीजिए। लेकिन उस ने इंकार कर दिया।  पूछा कि  कोई सीनियर मैनेजर हो तो बताएं। बताया उस ने। मैं गया।  युवा मैनेजर ने कहा , आप पांच मिनट पहले भी आए होते तो कुछ करता। अब नामुमकिन है। कह कर उस ने हाथ जोड़ लिया। मेरी दुबारा रिक्वेस्ट पर ए टी सी वगैरह से बात का टोटका किया और फिर मना कर दिया। मैं ने बताया कि सवा नौ बजे से ही तो यहां-वहां टहल रहा हूं। वह बोला , पर आप मेरे पास अब आए हैं। मैं ने पूछा , फिर ? उस ने कहा , आप मेरे पिता जैसे हैं , सो आप की मदद करना चाहता हूं। दो ऑप्शन है। एक अभी 12 - 10 पर वाया पुणे एक फ्लाइट है जो सुबह 6 - 20 पर लखनऊ पहुंचा देगी। दूसरी सुबह दस बजे के आस-पास है। दोपहर में डाइरेक्ट लखनऊ पहुंचा देगी। दोनों ही विकल्प में एक हज़ार रुपए का अतिरिक्त भुगतान करना था। मैं ने रात एयरपोर्ट पर बैठ कर गुज़ारने के बजाय जहाज में उड़ते हुए बिताने का फैसला लिया। कहां रात 12 - 30 तक लखनऊ आ जाना था , घर का खाना नसीब होना था , अब एयरपोर्ट पर दो की जगह बीस खर्च कर बासी-तिबासी भोजन नसीब में आया। मन खिन्न था सो कुछ ज़्यादा खाने का मन भी नहीं था। वैसे भी एयरपोर्ट पर सारे दुकानदार डाकू की भूमिका में होते हैं। खाने-पीने की तो खैर बात ही क्या। इन के दाम सुन कर फाइव स्टार होटल शर्मा जाएं। खैर , मजबूरी थी खाया-पीया। 

थोड़ी देर में हवाई पट्टी पर पांव रखते ही खिन्नता भाग गई। सारा क्षोभ भस्म हो गया। यह मौसम का जादू था। सावन की झूमती हवा का कमाल था। वैसे भी बैंगलौर का ट्रैफिक जाम चाहे जितना बेहूदा हो , जितना जालिम हो लेकिन मौसम सुहाना और जादुई है। मस्ती भरी हवा , तिस पर सावन के गहराते बादर मौज से मिलवा ही देते हैं। अगस्त मास में ऐसा मस्त और दिलकश मौसम बैंगलौर की फिजा में ही चार दिन महसूस किया। लखनऊ , गोरखपुर , दिल्ली में तो सावन की फुहारों के बावजूद उमस का महीना है , अगस्त का महीना। लेकिन बैंगलोर में उमस नहीं , उमंग थी मौसम की। खनक थी सावन की। चहक और बहक में लिपटी हुई हवा थी। 17 अगस्त को दिन साढ़े दस बजे जब एयरपोर्ट पर उतरा था , तब ही से यह चहकी-बहकी हवा साथ हो चली थी। इस सनकी हवा का संग-साथ मन में सुरूर भरने के लिए बहुत था। लगातार निर्झर झरती और बहती रही यह हवा। अब यही मदमस्त हवा फ्लाइट छूटने के कारण मन के भीतर बसी तमाम खिन्नता और क्षोभ को भी धोती हुई अपने साथ बहाए लिए जा रही थी।  सीट पर सिट डाऊन होते ही ग़ालिब याद आ गए। जगजीत सिंह की गायकी याद आ गई। आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक की तासीर ने मन को मगन कर दिया। तिस पर विंडो सीट। जगजीत की आवाज़ में ग़ालिब को सुनते-सुनते ही पुणे पहुंच गया। रात 1 - 35 पर वहां लैंड करते ही सावन की फुहार मिली। फुहार में भीजते हुए लाऊंज में आया और फिर लाउंज से भी बाहर आ गया। फुहार बाहर भी मिली। सड़क किनारे खुले एक रेस्टोरेंट में किसी की मेज पर थाल में रखा लाल , कुरकुरा डोसा दिखा। मन ललच गया।  एक डोसा और काफी ले कर मैं भी बैठ गया। रात के दो बज रहे थे। कारें आ-जा रही थीं। एयरपोर्ट से बाहर के रेस्टोरेंटों पर चहल-पहल जारी थी। गोया कोई रेलवे स्टेशन हो। उस का कोई प्लेटफार्म हो। ऐसा माहौल किसी और एयरपोर्ट पर या उस के बाहर मैं ने कभी नहीं देखा है , जैसा पुणे के एयरपोर्ट पर देख रहा था। इसी रेस्टोरेंट में एक एयरलाइंस की कई सारी लड़कियां अपनी ड्रेस में बैठी अपने दो सीनियर से काम करने के टिप्स ले रही थीं। सीनियर लोग भी पूरे बासिज्म और आसक्ति के साथ लड़कियों के साथ मुखातिब थे। तभी बीस-बाईस बरस की एक लड़की खट-खट करती , मचलती उस खुले रेस्टोरेंट में बिलकुल खुली हुई आई। शार्ट हाफ पैंट में। घुटने से भी ऊपर आधी खुली जांघ। कोट-पैंट और टाई में उपस्थित आधा दर्जन लड़कियों को भी उस एक अकेली लड़की का यह लुक चौंका गया है । मेरी मेज के सामने ही एक कुर्सी पर आ कर वह धप्प से बैठ गई। चौंका मैं भी। फिर मुझे लगा कि यह पुणे है , क्या पता कोई फ़िल्म शूट हो रही हो। लेकिन बड़े ध्यान से इधर-उधर चेक किया। कहीं , कोई कैमरा , लाइट , डायरेक्टर नहीं था। अपने इस खुले लुक पर भटक रही , सब की निगाहों से बेख़बर वह लड़की काफी पीने लगी , सिगरेट का धुआं उड़ाती। उस के सिगरेट पीने की अदा देख कर मुझे भी सिगरेट पीने का मन हो आया। तलब लग गई। पर अफ़सोस कि सिगरेट आदि मैं कभी ख़रीद कर नहीं पीता। पीता नहीं हूं , पिलाई गई है वाली स्थिति होती है मेरे साथ सर्वदा। बहरहाल कुरकुरा डोसा और गरम काफी , बरसते सावन की इस फुहार में अब आलू के स्वाद में तब्दील हो रहा था। टाई , पैंट , कोट में उपस्थित लड़कियां भी इस एक लड़की को झुक-झुक कर , मुड़-मुड़ कर ऐसे देख रही थीं , गोया झूला झूल रही हों। इन लड़कियों के दोनों बॉस भी अब टिप्स देने के बजाय टिप्स ले रहे थे। आंखों-आंखों में। कम वस्त्र पहने एक लड़की इतना व्यस्त कर देती है एक साथ कई सारे लोगों को। अजब था यह देखना भी। लवकुश दीक्षित का एक गीत याद आ गया है :

रुपदंभा बड़ी कृपण हो तुम 
अल्पव्यसना कसे वसन हो तुम। 

बहरहाल बेसिन में हाथ धोते हुए मैं ने शीशे में भी उसे भरपूर लुक किया। ख़ूब ध्यान से। लेकिन उसे किसी की परवाह नहीं थी। रेस्टोरेंट से चलते हुए मैं सोच रहा था कि इस का मतलब है , पुणे में क़ानून व्यवस्था बहुत बढ़िया है। कि एक अकेली जवान लड़की रात दो बजे भी ऐसे ड्रेस में निश्चिंत रह सकती है। यह अच्छी बात है। वापस लाउंज में आ कर बेमतलब इस दुकान , उस दुकान घूमने लगा। कभी किसी चीज़ का दाम देखते-पूछते , कभी किसी चीज़ का। खरीदना मुझे कुछ नहीं था , यह तो मैं जानता था। लेकिन ऊंघते , अलसाते यह दुकानदार भी क्या नहीं जानते थे कि मुझे कुछ नहीं ख़रीदना। कितना तो धैर्य होता है इन में।  दाम भले दस गुना , बीस गुना हो हर चीज़ का लेकिन इन दुकानदारों का धैर्य तो सौ गुना होता है। फिर मैं ने सोचा कि आख़िर वह कौन लोग हैं जो सारा शहर , सारा बाज़ार छोड़ कर एयरपोर्ट पर इन डकैतों से लुटने खातिर खरीददारी करते हैं। लोग खरीदते तो हैं , तभी यह दुकानें हैं। हालां कि पुणे का एयरपोर्ट मुंबई एयरपोर्ट के आगे चूजा है। दिल्ली , लखनऊ , बैंगलौर , हैदराबाद आदि के आगे भी बौना है। बहुत ही छोटा। कुछ-कुछ गौहाटी जैसा। फिर भी रौनक है यहां। उदासी नहीं तारी है , गौहाटी या कोझिकोड [ कालीकट ] एयरपोर्ट की तरह। दुकानों के चक्कर मार कर एक कुर्सी पर बैठ गया हूं। बुद्धिनाथ मिश्र की कविताएं सुनते हुए। गीतों में माधुर्य , कंठ में मिठास मिल कर जैसे चंदन की खुशबू तिरती है बुद्धिनाथ जी के गीतों में। खेत की सरसो भेजती रोज पीली चिट्ठियां अनगिन जैसे बिंब और मनुहार , उस की पुलक और मादकता । एक बार और जाल फ़ेंक रे मछेरे जैसे आशावादी गीत। मन में जैसे पुकार भर देते हैं। उल्लास और मनुहार में नहला देते हैं।  नहला ही रही है सावन की बरखा पुणे की हवाई पट्टी को। बिलकुल झूम कर। इधर बुद्धिनाथ जी गा रहे हैं ; 

प्यास हरे, कोई घन बरसे
तुम बरसो या सावन बरसे

सावन ही नहीं बरस रहा , बादर ही नहीं बरस रहे , बुद्धिनाथ जी के गीत भी बरस रहे हैं , मेरे मन में। बहुत भीतर तक। मैं भी बरस रहा हूं किसी की याद में डूब कर। ब्रह्म वेला में इस बरखा की बहार में बुद्धिनाथ जी का गीत जैसे पावस को पावन करते हुए मुझ अकिंचन को अपनी मादकता में महका और बहका रहा है। चंदन के लेप की तरह। यह बरखा भी जैसे कितनों की प्यास हर लेना चाहती है। कितनों में प्यास बो देना चाहती है। बरखा ऐसी ही होती है। बुद्धिनाथ जी को संदेश भेज कर बता दिया है कि इस ब्रह्म वेला में आप को सुन रहा हूं। विमान उड़ने वाला है। आकाश भर आप का साथ। खैर , भीजने से बचने की आड़ में एक जोड़ा आपस में लिपटा जा रहा है। गोया दोनों , एक-दूसरे का छाता हों। जवानी ऐसी ही होती है। कभी छाता बन जाती है , कभी छाता उड़ा देती है।  हमारे पास फ़िलहाल कोई छाता नहीं है। सो भीजते-भाजते हम भी सिट डाऊन हो गए हैं। विंडो से बरखा को निहारते हुए। यह सोचते हुए कि  पुणे कभी फिर बुलाना ऐसे ही अचानक , औचक। जैसे बरखा को बुला लिया है। रमानाथ अवस्थी ने लिखा ही है :  

जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

टेक ऑफ़ हो गया है। जहाज जब किसी शहर से उड़ता है तो उड़ते ही उस शहर का वैभव , उस का सौंदर्य , उस की सामर्थ्य बता देता है। उतरते समय भी। ख़ास कर रात में। शहर की रौशनी , शहर का खाया-पीया-जीया बता देती है। समंदर , पर्वत सब। दिन हो तो उस की हरियाली , उस की गगनचुंबी इमारतें। अब अलग बात है कि आज तक कोई विमान तो गगन चूम नहीं पाया , बादल छू कर ही लौट आता है। तो इन मल्टी स्टोरी बिल्डिंग को गगनचुंबी आख़िर कहते क्यों हैं। बुद्धिनाथ जी का काव्यपाठ जारी है बीच आकाश में। कोंपलों सी नर्म बांहों में गुलमोहर के दिन के लिए भटकते हुए। जैसे ग़ालिब को जगजीत सिंह गा रहे थे बैंगलौर से पुणे के बीच। तब बैंगलौर की मदमाती हवा का संग-साथ था , अब पुणे की बरखा की बहक और महक है। वह मोंगरा था , यह चंदन है। सुगंध दोनों तरफ है। बस सुमन नहीं है। आंख मूंदे सुनते-सुनते नींद का एक मीठा झोंका आ गया है । वैसे भी मैं सुतक्कड़ बहुत बड़ा हूं। लेकिन कई बार रात में जागना अच्छा लगता है। जैसे आज की रात।  बहुत सारी रातें लिखते हुए जगाती-जागती हैं तो कुछ रातें कुछ सुनते-देखते हुए। पर आज की रात तो हवा में , हवा से बतियाते हुए गुज़र रही है। कई बार रात में भी हवाई यात्राएं हुई हैं पर ऐसी आवारा रात हवा में नहीं मिली। ऐसी आवारगी नहीं मिली। आकाश में नहीं मिली। मदमाती हवा और बऊराई बरखा का ऐसा संग साथ हो और एक साथ , एक रात में तीन-तीन प्रदेश और तीन-तीन शहर की सरहद और उस की धरती को प्रणाम करने का यह दुर्लभ संयोग , यह आकाशीय आवारगी पहली बार नसीब हुई है। सड़कों पर पैदल , स्कूटर और कार से तो बहुतेरी बार आवारगी की है सूनी रातों में। अकारथ। पर किसी पूरी रात में ऐसी आकाशीय आवारगी तो बस अब की ही मिली । ग़ालिब , बुद्धिनाथ मिश्र , माहेश्वर तिवारी और रमानाथ अवस्थी का काव्य सुनते हुए ऐसी सुहानी यात्रा की सनक सर्वदा मिलती रहे। फ्लाइट ऐसे ही न छूटती रहे पर ऐसी यात्रा , ऐसी आवारगी तो मिलती रहे। यह लीजिए जैसे नींद का झोंका अचानक टूट गया था , उसी झोंके के साथ नींद अचानक खुल गई है। विंडो से देख पा रहा हूं कि बादलों के झुंड पर सूर्य की लाली पूरे सौंदर्य के साथ उपस्थित हो रही है। गोया कोई लाल नदी हो। कोई पर्वत हो। कोई लाल पठार हो। उगते हुए सूर्य को हाथ जोड़ कर , सिर झुका कर प्रणाम करता हूं। पंडित रमानाथ अवस्थी काव्यपाठ कर रहे हैं :

आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।

जिसको जो होना है वही होगा,
जो भी होगा वही सही होगा।
किस लिये होते हो उदास यहाँ,
जो नहीं होना है नहीं होगा।।

आपने चाहा हम चले आये,
आप कह देंगे हम लौट जायेंगे।
एक दिन होगा हम नहीं होंगे,
आप चाहेंगे हम न आयेंगे॥

लखनऊ आ गया है। लखनऊ की धरती , लखनऊ की इस सुबह को प्रणाम !

Wednesday, 8 August 2018

प्रसून जी , मीडिया का बाज़ार नैतिकता से , नफ़रत से और एजेंडे से नहीं मुनाफ़े से चलता है

 पुण्य प्रसून वाजपेयी

दि वायर में पुण्य प्रसून वाजपेयी का विधवा विलाप पढ़ कर पता लगा कि वह मोदी-मोदी भले बोल रहे हैं , फर्जी शहादत पाने के लिए लेकिन उन नौकरी के असली दुश्मन रामदेव ही हैं । आज तक और ए बी पी दोनों जगह से रामदेव और पतंजलि का विज्ञापन ही उन की विदाई का मुख्य कारण बना है । कम से कम उन के लेख की ध्वनि यही है । रामदेव आज की तारीख़ में सब से बड़े विज्ञापनदाता हैं । विज्ञापनदाता मीडिया का माई-बाप है । किसी मीडिया की हैसियत विज्ञापनदाता से पंगा लेने की नहीं है । वैसे भी पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे व्यक्ति को यह तो मालूम है ही कि वह बाज़ार में हैं और बाज़ार नैतिकता से , नफ़रत से और एजेंडे से नहीं मुनाफ़े से चलता है । सिर्फ़ और सिर्फ़ मुनाफ़े से । आप की उस बढ़ती रेटिंग से चैनल को क्या फ़ायदा जब चैनल का विज्ञापन और उस का मुनाफ़ा डूब रहा हो । आप की राजनीतिक नफ़रत की क़ीमत कोई चैनल अपना मुनाफ़ा गंवा कर नहीं चुका सकता । पुण्य प्रसून का यह लेख यह भी बता देता है कि नरेंद्र मोदी से नफ़रत का एजेंडा ए बी पी न्यूज़ चैनल का नहीं , प्रसून जी का ख़ुद का है । फिर जो चैनल पर मास्टर स्ट्रोक का एयर से जाने का ड्रामा था , वह मालिकों का था , किसी नरेंद्र मोदी , किसी रामदेव का नहीं । ट्रांसपोंडर का सारा खेल है । जो मालिकों के हाथ में होता है । ट्रांसपोंडर में स्पेस देने वाले के हाथ में होता है । किसी नरेंद्र मोदी और उस की मशीनरी के हाथ में नहीं । प्रसून जी लेकिन मास्टर स्ट्रोक के चक्कर में यह सब भूल गए हैं । यह आंख में धूल झोंकने , झांसा देने का कौन सा स्ट्रोक है पार्टनर ?

मुझे याद है रामनाथ गोयनका का सत्ता से टकराना । बारंबार टकराना ।रामनाथ गोयनका इमरजेंसी से टकराए थे , तभी कुलदीप नैय्यर भी टकराए थे । सत्ता से विरोध में जीने-मरने की ज़िद गोयनका की अपनी थी । क्यों कि तब पत्रकारिता गोयनका के लिए मुनाफ़े का धंधा नहीं थी । वह तो छाती ठोंक कर कहते थे , न दे कोई इंडियन एक्सप्रेस को विज्ञापन , मैं तो एक्सप्रेस बिल्डिंग के किराए से भी अखबार निकाल लूंगा । निकालते ही थे । यह गोयनका की ही मर्दानगी थी कि कुलदीप नैय्यर , प्रभाष जोशी जैसे तमाम धाकड़ संपादक निकले । सत्ता से , सिस्टम से सर्वदा टकराते हुए । एम वी देसाई और बी जी वर्गीज जैसे शानदार संपादक । अरुण शौरी जैसे संपादक । लेकिन यह सब लोग बाज़ार में नहीं पत्रकारिता में थे । लेकिन आप तो बाज़ार में तन-मन-धन से न्यौछावर थे । खुल्लमखुल्ला । बाज़ार के मुनाफ़े में साझीदार भी । बतौर मोहरा ही सही ।

तो आप का करोड़ो का पैकेज और राजनीतिक नफ़रत का एजेंडा इस मुनाफ़े की भेंट चढ़ा है । नरेंद्र मोदी या रामदेव अगर आप से ज़्यादा मुनाफ़ा देते हैं तो चैनल मालिक आप को दूध की मक्खी बना कर फेंक देगा यह बाज़ार के दूधमुंहे भी जानते हैं । लेकिन मास्टर स्ट्रोक और दस्तक देने के बावजूद पुण्य प्रसून वाजपेयी नहीं जान पाते । तो उन की इस अबोधता पर मुझे कुछ नहीं कहना । किसी भी अभिनेता , किसी भी खिलाड़ी की क़ीमत मुनाफ़े पर ही मुन:सर होती है । बहुत बड़े अभिनेता थे संजीव कुमार लेकिन फारुख शेख से भी कम पैसा पाते थे । लेकिन प्राण जैसे अभिनेता राज कपूर , दिलीप कुमार , अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता से भी ज़्यादा पैसा लेते थे । सोचिए कि डान फिल्म में अमिताभ बच्चन को पचत्तर हज़ार रुपए मिले थे लेकिन प्राण को पांच लाख रुपए । यही प्राण राज कपूर की बाबी में एक रुपए लिए थे । सिर्फ़ शगुन के । भारत भूषण जैसे स्टार हीरो बाद में पांच सौ रुपए दिहाड़ी पर काम करने लगे थे । ऐसे ही इन्हीं न्यूज़ चैनलों के तमाम स्टार रहे लोग इन दिनों गुमनामी भुगत रहे हैं । कुछ तो घर , गाड़ी बेच कर बरबाद हो चुके हैं । किन-किन का नाम लूं ।

संजय लीला भंसाली जैसी बाजीगरी सब को नहीं आती कि पिट कर भी पैसा पीट ले जाए । अपनी पिटाई भी बेच ले । पुण्य प्रसून वाजपेयी आप ने कभी अपने उन साथियों के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठाई जो इन्हीं चैनलों में दस पांच , तीन हज़ार की नौकरी कर रहे हैं और आप करोड़ों का पैकेज । आप तो नफ़रत और एजेंडे की लड़ाई लड़ रहे हैं , रोटी-दाल की नहीं । पत्रकारिता की नहीं । पत्रकारिता नहीं एजेंडा चला रहे हैं । नरेंद्र मोदी से नफ़रत का एजेंडा । पत्रकारिता पक्षकार बन कर नहीं होती । इसे एक किस्म की दलाली कहते हैं । दलाली सिर्फ़ सत्ता की ही नहीं होती , प्रतिपक्ष की भी होती है । यह बाज़ार है । कल तक सोनिया गांधी का बाज़ार था , आज नरेंद्र मोदी का बाज़ार है । बाज़ार किसी भी का हो , बाज़ार के मुनाफ़े में जब तक आप फिट हैं , आप बाज़ार के हैं । नहीं कौन किस का है । भोजपुरी के गायक बालेश्वर एक गाना गाते थे , बनले क सार बहनोइया , दुनिया में कोई नहीं अपना । फ़िराक ने भी लिखा है :

किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी 
ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी।

फिर यह तो बाज़ार है । बाज़ार में कोई किसी का कभी नहीं होता । प्रसून जी , आप बाज़ार के एक मोहरा भर हैं , मालिक नहीं । नियंता नहीं । इस बेरहम और दोगले बाज़ार को गढ़ने में लेकिन आप भी भागीदार हैं । फिर कौन सा दोगला और हिप्पोक्रेट मीडिया बनाया है , इस की पड़ताल भी तो कीजिए कभी । कारपोरेट की आवारा पूंजी से बना यह हरामखोर मीडिया जनता की बात भी करता है कभी ? दि वायर जहां आप ने यह विधवा विलाप परोसा है , उस का तो एकमात्र मकसद ही है नरेंद्र मोदी से नफ़रत का एकमात्र जहरीला एजेंडा । और कुछ भी नहीं । यह दलाली ही नहीं , गैंगबाजी भी है । पत्रकारिता तो हरगिज नहीं । आप लोग पत्रकारिता के मुथुवेल करूणानिधि हैं ।

मुथुवेल करुणानिधि के जाने से एक जहरीली , जातिवादी और भ्रष्ट राजनीति का अंत हुआ है

मुथुवेल करुणानिधि

मुथुवेल करुणानिधि के जाने से एक जहरीली , जातिवादी और भ्रष्ट राजनीति का अंत हुआ है । महायोद्धा नहीं , नायक नहीं , कायर और खलनायक थे मुथुवेल करुणानिधि । भारतीय राजनीति में जातीय और भाषाई राजनीति के जहर को फ़ैलाने के लिए हम जानते हैं मुथुवेल करुणानिधि को । ब्लैकमेलिंग , हिंसा , नफ़रत और लालच की राजनीति करने के लिए भी । कभी मुफ्त का भोजन , कभी रंगीन टी वी , कभी मंगल सूत्र , कभी यह , कभी वह का लालच और झांसा दे कर वोट के लिए रिश्वत देने का पाप मुथुवेल करुणानिधि ने ही शुरु किया। इतना कि भारतीय राजनीति को राजनीति नहीं , फ़िल्मी पटकथा बना दिया । हिप्पोक्रेट बना दिया । इसी प्रतिस्पर्धा में जयललिता भी कूद पड़ीं । दक्षिण में हिंदी विरोध का जहर भी ख़ूब फैलाया । जयललिता हिंदी फिल्मों में भी हिरोइन रही हैं , अच्छी हिंदी जानती थीं । लेकिन करूणानिधि के भाषाई जहर में डूब कर हिंदी नहीं बोलती थीं । करूणानिधि ने लिट्टे को शह दे कर भारत ही नहीं श्रीलंका में भी अस्थिरता पैदा की । लिट्टे की राजनीति की ब्लैकमेलिंग में अंततः राजीव गांधी की बलि चढ़ गई ।

यह लालू , यह मुलायम , यह मायावती , यह अखिलेश तो बहुत बाद में जातीय और जहरीली राजनीति की खेती में लगे । पिछड़ी और दलित राजनीति के नाम पर पिछड़ों को और पिछड़ा, दलितों को और दलित बना दिया। पांच बार मुख्यमंत्री रहे मुथुवेल करुणानिधि का विधानसभा क्षेत्र आज भी देश के सब से पिछड़े इलाकों में शुमार है। धर्म परिवर्तन कर ईसाई बन चुके मुथुवेल करुणानिधि जैसे जहरीले और जातिवादी नेताओं ने भारतीय वोटर को सम्मान के साथ , रीढ़ के साथ कभी खड़ा नहीं होने दिया। वोटर को लालची और जातीय बना कर ख़ुद भगवान बन गए यह लोग । भारतीय लोकतंत्र को खोखला और मरणासन्न बना दिया ख़ुद को भगवान बनाने के लिए । मुथुवेल करुणानिधि ने सत्ता भोगने के लिए न सत्य देखा , न शुचिता। सिर्फ जातीय जहर और पाखंड के नायक हैं मुथुवेल करुणानिधि और इन के जैसे लोग । आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए लोग । कई सारी औरतें रखने और ए राजा , दयानिधि मारन जैसे भ्रष्ट लोग पूरी बेशर्मी से पैदा किए । बेटी कनिमोझी तक को नष्ट , भ्रष्ट और बेटे स्टालिन तक को अराजक और भ्रष्ट बना दिया मुथुवेल करुणानिधि ने । ख़ुद भी भ्रष्ट , अराजक और औरतबाज थे मुथुवेल करुणानिधि । ईसाई बन चुके मुथुवेल करुणानिधि लेकिन टोटकेबाजी से बाज नहीं आते थे । आप उन की कोई फ़ोटो देखिए एक पीला अंगोछा या चादर उन के कंधे पर सर्वदा मिलेगा । ऐसा वह किसी ज्योतिष की सलाह पर करते थे । कभी पेरियार के शिष्य रहे मुथुवेल करुणानिधि राम के बेहिसाब निंदक थे ।

लेकिन बहुत साफ़-सुथरे पत्रकार नहीं रहे कभी अरुण शौरी

अरुण शौरी

अरुण शौरी को लोग बहुत बड़ा पत्रकार मानते हैं । वर्ल्ड बैंक की नौकरी छोड़ कर इंडियन एक्सप्रेस में संपादक के रुप में एक समय उन की तूती बोलती थी । अरुण शौरी को मैं ब्रिलिएंट व्यक्ति मानता हूं लेकिन बहुत साफ़-सुथरे पत्रकार वह नहीं रहे कभी । बहुत सी प्रायोजित खबरें अरुण शौरी के खाते में दर्ज हैं । रविवार में एक इंटरव्यू में अरुण शौरी ने डींग हांकते हुए कहा कि मैं ख़बरों के लिए कहीं नहीं जाता था । ख़बरें मेरी मेज पर ख़ुद आ जाती थीं । रिपोर्टरों से उस की कोयरी करवा लेता था । रविवार के उसी अंक में रामनाथ गोयनका का भी एक इंटरव्यू छपा था । अरुण शौरी की इस बात को कोट कर गोयनका से सवाल पूछा गया तो गोयनका ने कहा था कि , वह ठीक बोल रहा है । क्यों कि उस की मेज़ पर सारी ख़बरें तो मैं ही भेजता था । इंडिया टुडे हिंदी के प्रवेशांक में एक लेख लिखा था सुरेंद्र प्रताप सिंह ने । उस लेख में हिंदी और भाषाई पत्रकारिता की पैरवी करते हुए अंगरेजी पत्रकारिता की हवा निकालते हुए उन तमाम खबरों का ब्यौरा दिया गया था जिन के लिए अंगरेजी पत्रकारिता तब अपना सीना फुलाती घूमती थी ।

जैसे भागलपुर आंखफोड़ कांड , अंतुले सीमेंट घोटाला कांड आदि का ज़िक्र करते हुए बताया था कि यह अंगरेजी अख़बारों की मूल ख़बरें नहीं थीं । भागलपुर आंख फोड़ कांड सब से पहले बिहार के एक मैथिल अख़बार में छपी थी जहां से अंगरेजी अख़बार ने उठा लिया और बिना उसे क्रेडिट दिए अपनी ख़बर बना लिया । इसी तरह अंतुले सीमेंट घोटाला कांड सब से पहले मुंबई के एक मराठी अख़बार में छपा था जहां से अंगरेजी अख़बार ने उठा कर अपनी ख़बर बना ली । ऐसी और भी तमाम खबरों का व्यौरा था । कहना न होगा कि यह सारी खबरें उठाने वाले अरुण शौरी और इंडियन एक्सप्रेस ही थे । और जो गोयनका ने कहा कि वह ख़बरें अरुण शौरी तक भेजते थे , वह बोफ़ोर्स जैसी प्रायोजित खबरें थीं । जो नुस्ली वाडिया और हिंदुजा के झगड़े में वी पी सिंह को ताकत देने और राजीव गांधी की सत्ता को उखाड़ने की मुहिम में थी । आंबेडकर की किताब उन की बहुत चर्चित हुई लेकिन उस पर भी जब विवाद बहुत बढ़ा तो वह अबाउट टर्न कर गए ।

बतौर इनवेस्टमेंट मिनिस्टर भी अरुण शौरी पर दाग़ बहुत हैं । अटल सरकार से शौरी के फैसलों को ले कर बहुत सवाल किए गए । आरोप लगा कि तमाम पब्लिक सेक्टर कंपनियों को कौड़ियों के दाम बेच दिया गया । तो भी हम अरुण शौरी को एक तेज़-तर्रार पत्रकार के रूप में ही जानते हैं , दल्ला पत्रकार के रूप में नहीं। अलग बात है इंडियन एक्सप्रेस में एक समय में वह इतने ताकतवर थे कि मारे घमंड के वह यूनियन के लोगों से मेज ठोंक कर कहते थे , आई क्रश योर यूनियन ! अलग बात है कि इंडियन एक्सप्रेस की यूनियन तब बहुत ताकतवर थी और उस ने अरुण शौरी को क्रश कर दिया था । बाद में गोयनका भी शौरी से बहुत नाराज हो गए । दो इनिंग इंडियन एक्सप्रेस में बिता कर मज़बूरी में उन्हें टाइम्स आफ़ इंडिया जाना पड़ा । लेकिन जो शान और रफ़्तार शौरी ने इंडियन एक्सप्रेस में देखी , भोगी और पाई थी , टाइम्स आफ इंडिया में वह नहीं नसीब हुई और जल्दी ही यहां से भी विदा हो गए । कुछ समय बाद अटल जी उन पर मेहरबान हुए और उन्हें राज्यसभा में ले गए । फिर मंत्री बना दिया । पद्मभूषण और मैग्सेसे से सम्मानित तमाम फेलोशिप और तमाम सरकारी , गैर सरकारी नौकरियां कर चुके अर्थशास्त्री और पत्रकार अरुण शौरी के पिता हरिदेव शौरी एक बड़े सरकारी अधिकारी थे । लेकिन शौरी के जो एक बेटा है जो मंद बुद्धि है । जो एक बड़ी यातना है उन की । ज़्यादातर समय अब उन का बेटे की देख-रेख और सेवा में बीत जाता है । बेटे से बहुत प्यार करते हैं वह । इस सब से जो समय बचता है , वह नरेंद्र मोदी से नफ़रत भरे बयान देने में बीतता है । भाजपा के भीतर मोदी के विरोधी तो बहुत हैं पर यशवंत सिनहा , शत्रुघन सिनहा और अरुण शौरी की तिकड़ी बहुत मशहूर और मुखर है । अरुण शौरी मोदी को ले कर अकसर हबीब जालिब का एक शेर सुनाते मिलते हैं :

तुझ से पहले जो इक शख़्स यहां तख़त नशीन था 
उसको भी अपने ख़ुदा होने का इतना ही यक़ीन था ।

अरुण शौरी ठीक ही कहते हैं । क्यों की नरेंद्र मोदी ही क्या हर तख़त नशीन को अपने को ख़ुदा मानने का गुमान रहता है । चाहे वह जिस भी फील्ड का तख़त नशीन हो । अरुण शौरी ख़ुद भी जब कभी भी पावर में रहे , ख़ुदा बन कर ही रहे ।

Monday, 6 August 2018

दूधनाथ सिंह ने विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के मुंह पर कालिख पुतवाने और जूता मरवाने की कोशिश की थी

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 

क्या लेखक अपनी राजनीति में इतने दोगले हो सकते हैं , इतने नीच और इतने निकृष्ट हो सकते हैं कि किसी प्रतिष्ठित लेखक के मुंह पर कालिख भी पुतवा सकते हैं , जूता मरवा सकते हैं ।  जी हां ।  दूधनाथ सिंह अब नहीं हैं लेकिन एक बार इलाहाबाद में उन्हों ने ऐसी कोशिश करवाई थी। गौरतलब है कि दूधनाथ सिंह तब जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे।  और वह तब के साहित्य अकादमी के अध्यक्ष रहे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी के मुंह पर कालिख पुतवाना चाहते थे।  जूता मरवाना चाहते थे । लेखकीय नीचता , निकृष्टता और पतन की यह पराकाष्ठा है । इस बात का खुलासा किसी और ने नहीं , ख़ुद विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने दस्तावेज़ के ताज़ा अंक के संपादकीय में लिख कर किया है।  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने लिखा है कि 25  नवंबर , 2015 को इलाहाबाद में मीरा स्मृति सम्मान एवं पुरस्कार समारोह था जिस की अध्यक्षता मैं कर रहा था। पुरस्कार वापसी विवाद के कारण प्रलेस , जलेस और जसम तीनों लेखक संगठनों के नेताओं ने इस का बहिष्कार किया। जनवादी लेखक संघ के नेता दूधनाथ सिंह ने इस समारोह के आयोजक और साहित्य भंडार के प्रकाशन के मालिक श्री सतीश चंद्र अग्रवाल से यह कहा कि हो सकता है उन के संगठन का कोई व्यक्ति मेरे मुख पर कालिख पोत दे या जूता चला दे। इस संदर्भ में जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष डाक्टर राजेंद्र कुमार ने दूधनाथ सिंह को चेतावनी दी कि यदि संगठन के सदस्य ऐसा करेंगे , तो वह [ राजेंद्र कुमार जी ] अख़बारों को बयान दे कर मंच से त्यागपत्र दे देंगे। यह बात मुझे आयोजकों ने ही बताई। मुझे लगभग पचीस वर्ष पूर्व का लिखा और छपा अपना ही यह वाक्य याद आ रहा था - ' हिंदी के लेखक संघ दुनिया को बदलने में तो कामयाब नहीं हुए , मगर हर शहर में उन्हों ने लेखकों के आपसी संबंध ज़रुर बदल दिए। ' ज़िक्र ज़रूरी है कि विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने साहित्य अकादमी के अध्यक्ष का अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह खुलासा बहुत दुःख और बड़ी विनम्रता से किया है । खुलासे और भी बहुतेरे हैं ।

दूधनाथ सिंह 
साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष , कवि , आलोचक और संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने असहिष्णुता की आंधी और पुरस्कार वापसी की अंतर्कथा शीर्षक से अपने संपादकीय में बाकायदा सब के नाम ले-ले कर जम कर प्रहार किए हैं।  10 पृष्ठ की इस संपादकीय में तिवारी जी ने अशोक वाजपेयी  मुख्य खलनायक बताया है। यह भी कि उन से व्यक्तिगत रंजिश में ऐसा अशोक वाजपेयी ने किया। तिवारी जी ने लिखा है कि पुरस्कार लौटाने या इस्तीफ़ा देने वाले लेखकों के भी तीन वर्ग थे - एक , वे जो मोदी सरकार और अकादेमी के व्यक्तिगत विरोध के चलते आंदोलन के अगुआ और मुख्य किरदार थे।  इन की संख्या 5 से अधिक नहीं थी। इन में वाजपेयी और वामदलों के लेखक शामिल हैं।  दूसरे , वे जो इन मुख्य किरदारों के घनिष्ठ या मित्र थे जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह या व्यक्तिगत दबाव और पैरवी में ऐसा किया।  इन की संख्या लगभग 25 थी।  तीसरे , वे जो लेखकों की सहज क्रांतिकारी या यशलिप्सा प्रवृत्ति वश इस महोत्सव में अपना नाम चमकाने और लोकप्रियता हासिल करने के लिए [ जैसा कि हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा है ] शामिल हो गए। इन की संख्या लगभग 15 है। इस प्रकार विश्लेषक महसूस करते हैं कि कुल पांच लेखकों ने अपनी पूर्व प्रतिबद्धता , व्यक्तिगत विरोध और राजनीतिक कारणों से असहिष्णुता का इतना बड़ा मुद्दा खड़ा किया।

विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने बिहार में लालू यादव की जीत पर लखनऊ में काशीनाथ सिंह , अखिलेश , वीरेंद्र यादव द्वारा मिठाई बांटने का ज़िक्र भी अपनी इस संपादकीय में किया है । नयनतारा सहगल , कृष्णा सोबती , विष्णु खरे आदि तमाम लेखकों का यत्र-तत्र ज़िक्र करते हुए प्याज के छिलके की तरह परत दर परत उघाड़ते हुए पुरस्कार वापसी के प्रायोजित होने की साज़िश का ज़ोरदार खुलासा किया है । पेश है दस्तावेज़ अंक 157 में प्रकाशित विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की वह बहस-तलब संपादकीय । आप पढ़िए और तब की साज़िश भरी कथा का सच जानिए ।


असहिष्णुता की आंधी और पुरस्कार वापसी की अंतर्कथा


अजीब आंधी थी वह। धूल और बवंडर के साथ कुछ वृक्षों को धराशायी करती हुई। किस दिशा से आई है, केंद्र क्या है, इस पर अलग-अलग कयास लगाये जा रहे थे। भारत का संपूर्ण शिक्षित समुदाय जो अखबार पढ़ता और टी.वी. देखता है, इस विवाद में शामिल हो गया था। पुरस्कार वापसी पर पक्ष और विपक्ष - दो वर्ग बन गए थे। पक्ष हल्का, विपक्ष भारी। मेरे पास लगातार देश-भर के अखबारों (हिंदू, हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आॅफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, ट्रिव्यून, टेलीग्राफ, इकनामिक टाइम्स, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, जनसत्ता, राजस्थान पत्रिका, मातृभूमि, जागरण, सहारा, अमर उजाला, दैनिक भास्कर आदि) तथा ‘भाषा’, ‘वार्ता’, बी.बी.सी. आदि से फोन आते रहे। प्रारंभ में तो मैंने कुछ अखबारों को अति संक्षिप्त बयान दिए पर जब देखा कि वे अपने अनुसार तोड़-मरोड़ कर छाप रहे हैं तो मैंने अखबारों के फोन उठाने बंद कर दिए। टी.वी. चैनलों से भी ऐसा ही सलूक जरूरी लगा। फिर भी बहुत से लेखकों, मित्रों और परिचित-अपरिचित बुद्धिजीवियों के ई-मेल फोन, पत्र आदि लगातार मिलते रहे, जिनमें अधिकांश या कहूं लगभग सभी पुरस्कार वापस करने वालों के विरुद्ध थे।

जब से मैं भारतीय इतिहास का साक्षी हूं, असहिष्णुता पर इतनी लंबी बहस कभी नहीं हुई थी। 30 अगस्त, 2015 को कर्नाटक के कन्नड़़ लेखक एम.एम. कलबुर्गी की गोली मार कर हत्या कर दी गई। इसी समय संयोग से हिंसा की एक-दो और घटनाएं घटीं। इसके विरोध में एक के बाद एक लगभग 40 लेखकों ने अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटा दिए तथा सात-आठ ने अकादेमी की समितियों की सदस्यता से इस्तीफे दे दिए। यह प्रकरण लगभग तीन-चार महीने चलता रहा। देश-भर के अखबार, रेडियो और टी.वी. चैनल इसे प्रमुखता से छापते और प्रसारित करते रहे। फेसबुक और सोशल मीडिया पर निरंतर मत-मतांतर लिखे और पढ़े जाते रहे। इतना ही नहीं, संभवतः पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों के संपर्क से ‘न्यूयार्क टाइम्स’ (अमेरिका), ‘टेलीग्राफ (लंदन) और ‘डान’ (करांची) ने तथा लेखकों की अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘पेन’ ने भी इस मुद्दे को उठाया। आश्चर्य यह कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को लेखकों की ओर से एक पत्रक देकर मांग की गई कि वे मोदी की ब्रिटेन यात्रा (जो उसी समय हो रही थी) में उनसे इस मुद्दे पर बात करें। मुद्दा था कि भारत में असहिष्णुता बढ़ रही है। बाद में इस मुद्दे के पक्ष-विपक्ष में कुछ इतिहासकार, वैज्ञानिक और फिल्म कलाकार भी जुड़ गए। कुछ लेखकों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजे। पत्र-पत्रिकाओं ने संपादकीय लिखे, परिचर्चाएं कराईं। देश के प्रमुख राजनेता भी इसमें शामिल हो गए - सोनिया गांधी, राहुल गांधी, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह (कांग्रेस), अमित शाह, अरुण जेटली, बेंकैया नायडू, रविशंकर प्रसाद, महेश शर्मा (भाजपा), करुणानिधि (डी.एम.के.), मुलायम सिंह यादव(सपा.), नितीश कुमार (जे.डी.यू.), लालू प्रसाद यादव (रा.ज.द.), गोपाल गांधी (आप) आदि। सबके अपने-अपने पक्षधर बयान थे। राष्ट्रपति और सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश ने भी अपने बयानों में इसकी चर्चा की। यहां तक कि संसद में इस विषय पर बहस हुई।

जब सारे देश के अखबार, टी.वी. चैनल, सोशल मीडिया और शिक्षित समुदाय किसी एक ही विषय पर लगातार तीन-चार महीनों तक विमर्श और परस्पर जिरह करता रहे तो सत्य का छिपा रहना मुमकिन नहीं है। कितने समाचार-विचार छपे, कितने विमर्श और तर्क-वितर्क हुए इसका विवरण एक मोटी पुस्तक की शक्ल ले लेगा। सारांश रूप में कहा जा सकता है कि मीडिया द्वारा पूछे सवालों के माकूल जवाब पुरस्कार लौटाने वाले लेखक और उनके समर्थक दे नहीं पाए। सत्य की यही विशेषता होती है कि आरंभ में असत्य द्वारा चाहे जितना आच्छादित होता रहे, अंत में वह प्रकट हो जाता है। तो इस समूचे प्रकरण में शिक्षित समुदाय जिस निष्कर्ष पर पहुंचा वह यह था कि पुरस्कार लौटाने वालों का मुख्य प्रयोजन राजनीतिक था। असहिष्णुता का मुद्दा मात्र एक पैसे और 99 पैसे राजनीति। बल्कि कहें उनके मन में छिपी राजनीतिक गांठ को दो-तीन असहिष्णु घटनाओं ने खोल कर फैला दिया। यदि ये घटनाएं न भी घटतीं तो कोई अन्य घटना इनकी अभिव्यक्ति के लिए मिल ही जाती। या यों भी कह सकते हैं कि यदि ये घटनाएं दूसरी शासन सत्ता में हुई होती तो कुछ लेखक इतने उत्तेजित न होते। इस निष्कर्ष पर पहुंचने वाले शिक्षित समुदाय के पास कुछ अकाट्य प्रमाण हैं। एक पुष्ट प्रमाण यह कि आम चुनाव (2014) के आखिरी दिनों में मीडिया के शोर से जब यह स्पष्ट होने लगा कि मोदी के नाम पर भाजपा सत्ता में आ रही है तो कन्नड़ लेखक यू.आर. अनंतमूर्ति ने यह बयान दिया था -‘‘यदि नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्राी होंगे तो मैं देश छोड़ कर चला जाऊंगा।’’ यह बयान जो भारत के किसी विपक्षी नेता, यहां तक कि लालू प्रसाद यादव ने भी नहीं दिया, एक लेखक द्वारा दिया गया। क्रोध और घृणा युक्त यह बयान कोई तानाशाही प्रवृत्ति का व्यक्तिवादी और अलोकतांत्रिक व्यक्ति ही दे सकता है, स्वस्थ चित्त लेखक नहीं। अनंतमूर्ति के मित्र श्री अशोक वाजपेयी जिन्हें अकादेमी पुरस्कार अनंतमूर्ति के साहित्य अकादेमी अध्यक्ष काल में मिला था, मोदी विरोधी अभियान के एक स्तंभ थे जो आम चुनाव के ठीक पहले कुछ लेखकों द्वारा चलाया जा रहा था। 9 अप्रैल, 2014 के दैनिक ‘जनसत्ता’ (दिल्ली) के माध्यम से इन लेखकों (लगभग 40) ने वोटरों से भाजपा को वोट न देने की अपील की थी। इनमें अशोक वाजपेयी के साथ राजेश जोशी और मंगलेश डबराल के नाम शामिल हैं जिन्होंने साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाए।

यहां यह कहना उपयुक्त लगता है कि पुरस्कार लौटाने या इस्तीफा देने वाले लेखकों के भी तीन वर्ग थे - एक, वे जो मोदी सरकार और अकादेमी के व्यक्तिगत विरोध के चलते आंदोलन के अगुआ और मुख्य किरदार थे। इनकी संख्या 5 से अधिक नहीं थी। इनमें वाजपेयी और वामदलों के लेखक शामिल हैं। दूसरे, वे जो इन मुख्य किरदारों के घनिष्ठ या मित्रा थे जिन्होंने मित्रा धर्म के निर्वाह या व्यक्तिगत दबाव और पैरवी में ऐसा किया। इनकी संख्या लगभग 25 थी। तीसरे, वे जो लेखकों की सहज क्रांतिकारी या यशलिप्सु प्रवृत्ति वश इस महोत्सव में अपना नाम चमकाने और लोकप्रियता हासिल करने के लिए (जैसा कि हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा है) शामिल हो गए। इनकी संख्या लगभग 15 है। इस प्रकार विश्लेषक महसूस करते हैं कि कुल पांच लेखकों ने अपनी पूर्व प्रतिबद्धता, व्यक्तिगत विरोध और राजनीतिक कारणों से असहिष्णुता का इतना बड़ा मुद्दा खड़ा किया। मुझे प्रामाणिक सूत्रों से खबर मिली और अनेक लेखकों ने व्यक्तिगत बातचीत में बताया भी कि उनसे पुरस्कार लौटाने के लिए संपर्क किए गए। इनमें नामवर सिंह, कुँवरनारायण और केदारनाथ सिंह जैसे नाम भी हैं। लीलाधर जगूड़ी और अरुण कमल उन दिनों सिक्किम यात्रा पर थे जब एक पत्रकार ने कई बार उन्हें पुरस्कार लौटाने के लिए प्रेरित किया। जगूड़ी पर तो कई लोगों ने फोन करके दबाव बनाया। जैसा कि उन्होंने मुझे बताया। सतीश कुमार वर्मा, राजेंद्र प्रसाद मिश्र, गोविंद मिश्र आदि ने भी ऐसा ही बताया। रामशंकर द्विवेदी ने 30 अक्टूबर को फोन पर बताया कि उन्हें साहित्य अकादेमी के एक अवकाश प्राप्त लेखक ने फोन पर पुरस्कार लौटाने के विषय में पूछा। वे पांच लेखक जो इस आंदोलन के संचालक थे अपने निकट के लेखकों द्वारा उनके परिचित लेखकों को बार-बार फोन कराकर पूछते रहते थे - ‘‘आप कब लौटा रहे हैं? या ‘‘क्या आप नहीं लौटा रहे हैं?’’ आदि। यह पुरस्कार लौटाने के लिए अप्रत्यक्ष अनुरोध था। इस बात के पक्के प्रमाण हैं कि असहिष्णुता विरोधी आंदोलन स्वतःस्फूर्त नहीं था, बल्कि इसके लिए कुछ लेखकों ने देश व्यापी नेटवर्किंग और अभियान चलाया था। 12 अक्टूबर को मुझे भारत में अंग्रेजी के वरिष्ठतम लेखक (93 वर्षीय) शिव के. कुमार का ई-मेल मिला जो इस प्रकार है -

My Dear Tiwari Ji,

Over the past few days, the media has been flashing news about several people resigning from the General Council and surrendering their Sahitya Akademi’s Award. A couple of these ‘rebels’ have even advised me to return the Sahitya Akademi award and even surrender my Padma Bhushan. But I have sternly refused to do so. It is all political gimmickry because they just want publicity in the newspapers. The fact is that the Sahitya Akademi is neither anti- secular nor as if muzzled freedom of expression. They just want to gain publicity in the media. I hope you are not perturbed over this exercise to taint the image of the Sahitya Akademi. My advice to you is to let these detractors keep howling. They don’t realize that the present President of the Sahitya Akademi is himself a distinguished Hindi poet dedicated to creative writing.

I understand that you are returning to Delhi on the 18th and you should be able to sort out all problems.

I am waiting to receive a copy of your collection of poems. Keep writing and ignore everything else.

God bless you.

Yours affectionately,

Shiv. K. Kumar


18 अक्टूबर को ए.वी.पी. चैनल ने असहिष्णुता पर एक व्यापक बहस आयोजित की थी जिसमें सभी लेखकों के आने-जाने, रहने तथा उनके लिए गाड़ियों की व्यवस्था की थी। गोविंद मिश्र, गिरिराज किशोर, गणेश देवी, मंगलेश डबराल, मुनव्वर राणा आदि उसमें उपस्थित थे। बहस के बीच में ही राणा ने अपने झोले से अकादेमी का प्रतीक चिन्ह और चोंगे की जेब से चेक बुक निकाल कर मेज पर रख दिया और कहा कि इसे अकादेमी कार्यालय तक पहुंचा दें। क्या यह स्वतःस्फूर्त था? क्या राणा घर से योजनापूर्वक इसे लौटाने की नीयत से साथ नहीं ले गए थे? राणा ने अकादेमी पुरस्कार के लिए कुछ ऐसी अपमानजनक बातें कहीं जिस पर अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखकों को उनकी भर्त्सना करनी चाहिए थी। राणा ने कहा कि प्रतीक चिन्ह कहीं उनके घर के कोने में पड़ा था जिसे उन्होंने ढूँढ़कर निकलवाया। वे इसे अपने ड्राइंगरूम में रखने लायक नहीं समझते। वे इसे गोमती में बहा देना चाहते हैं। आदि। यह तब है जब राणा को अकादेमी पुरस्कार दिए जाने के बाद एक विवाद छिड़ा था कि वे मंच के कवि हैं, उन्हें यह पुरस्कार मिलना ही नहीं चाहिए था। राणा ने यह भी कहा कि यदि मोदी जी कह दें तो वे पुरस्कार नहीं लौटाएंगे। कुछ लोगों ने बताया कि उन्होंने यह भी बयान दिया है कि वे तो मोदी जी के जूते तक उठाने को तैयार हैं। लेकिन यह बयान मैंने स्वयं नहीं पढ़ा है। ए.वी.पी. चैनल का उपर्युक्त दृश्य मैंने स्वयं देखा था। उस समय तो मैं हक्का-बक्का रह गया जब किसी ने पुरस्कार वापस करने वाले गुजराती लेखक श्री गणेश देवी पर यह आरोप लगाया कि उनके एन.जी.ओ. को फोर्ड फाउंडेशन से 12 करोड़ रुपए का अनुदान प्राप्त होता है जिसे मोदी ने रोक दिया और इसीलिए उन्होंने पुरस्कार लौटाया है। गणेश देवी का चेहरा काला पड़ गया और वे कोई जवाब नहीं दे पाए। बाप रे, बारह करोड़ प्रतिवर्ष! मुझे तो अब भी विश्वास नहीं होता।

पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों ने पुरस्कार लौटाने के दो कारण बताए - 1. देश में असहिष्णुता और हिंसा का वातावरण है तथा लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले हो रहे हैं। प्रधानमंतत्री मोदी जी इस पर मौन हैं। 2. प्रो. कलबुर्गी की हत्या पर साहित्य अकादेमी ने दिल्ली में शोकसभा करके निंदा नहीं की।

असहिष्णुता के विरुद्ध तथा लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता के पक्ष में आवाज उठाना लेखकों का वक्तव्य  है। साहित्य अकादेमी ने दिल्ली में शोकसभा नहीं की, यदि यह विरोध सहज, स्वाभाविक ढंग से सामने आया होता, सरकार और अकादेमी को उसकी चूक के प्रति सावधान और सचेत करते, जैसे कोई मित्र या शुभचिंतक करता है, तो निश्चय ही वातावरण दूसरा बनता। पर वास्तव में विरोध करने वालों में वह अपनत्व भाव था ही नहीं। उनका प्रच्छन्न एजेंडा सरकार और साहित्य अकादेमी पर प्रहार करना था। उन्हें सुधारना नहीं, उनसे बदला लेना था। यह लेखकों का लेखकीय नहीं, उनका राजनीतिक आचरण था। इसीलिए उन्होंने इसे प्रायोजित ढंग से एक आंदोलन का रूप दिया और इसे देशव्यापी तथा विश्वव्यापी बनाने की कोशिश की। यह भीतर से सद्भाव प्रेरित नहीं, दुर्भाव प्रेरित था। भाव का अंतर होने से कर्म का स्वरूप और उसका प्रभाव बदल जाता है। बिल्ली अपने तेज नुकीले दाँतों से अपने नवजात बच्चों को उठाती है और उनकी मुलायम त्वचा पर कोई खरोंच तक नहीं लगती, लेकिन उन्हीं दाँतों से वह अपने शिकार को लहूलुहान कर देती है। यह भाव का अंतर है। इसी अंतर के कारण असहिष्णुता आंदोलन वृहत्तर बुद्धिजीवी समाज द्वारा अंततः निंदित हो कर रह गया। मीडिया ने अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिए इसे और हवा दी तथा पक्ष-विपक्ष में बहसें आयोजित करने लगी। विपक्षी वक्ताओं ने जब आंदोलन का बवंडर उठाने वालों से सवाल करने शुरू किए तो वह या तो हकलाने लगे या बगले झांकते नजर आए। माकूल उत्तर न उनके पास था, न वे दे सके। विपक्ष के वे प्रश्न क्या थे?

      1.     आपात्काल (1975-76) में जब अभिव्यक्ति की आजादी पर वास्तव में प्रतिबंध था और देश में असली फासीवाद था तब तो वामदलों और कांग्रेस के लेखकों ने उस आपात्काल का समर्थन किया था। कश्मीरी उर्दू लेखक गुलाम नवी खयाल जिन्होंने पुरस्कार लौटाया है, ने तो ठीक 1976 में ही साहित्य अकादेमी पुरस्कार लिया था। तब क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी?

      2.    जब कश्मीरी पंडितों को घाटी से आतंकित करके भगा दिया गया, उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार हुआ, उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया गया, जब देश-भर में सिखों का कत्लेआम हुआ, असम में नरसंहार हुआ, हिंदी बोलने वाले मजदूरों की हत्याएं हुईं, पंजाब में खालिस्तानी आतंकवादियों ने कवि पाश की हत्या की, अनेक पत्रकारों की हत्याएं हुईं, उत्तर प्रदेश में मानबहादुर सिंह नामक कवि की हत्या हुई, महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश - बिहार के हिंदीभाषियों को रेल स्टेशनों पर दौड़ा-दौड़ा कर शिवसेना कार्यकर्ताओं ने पिटाई की, 1989 में भागलपुर दंगे में 1200 लोग, 1990 में हैदराबाद दंगे में 365 लोग मारे गए और 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस हुआ तब लेखकों ने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए?

      3.    दिल्ली में निर्भया कांड हुआ, अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ, तब तो सारा देश संड़क पर उतर गया था। फिर लेखक क्यों नहीं सामने आए?

      4.    मकबूल फिदा हुसैन जब देश छोड़कर गए, सलमान रश्दी की पुस्तक पर जब रोक लगी, लेखकों ने पुरस्कार क्यों नहीं लौटाए?

      5.    तस्लीमा नसरीन को मुस्लिम कट्टरपंथियों ने बंगाल से निष्कासित कराया, हैदराबाद में अपमानित किया। उन्होंने स्वयं बयान देकर लेखकों के वर्तमान विरोध को selective अर्थात् चुनाव करके विरोध करना बताया है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि भारत के जो बुद्धिजीवी अपने को सेक्युलर कहते हैं वे केवल हिंदू कट्टरवाद का विरोध करते हैं। मुस्लिम कट्टरवाद पर वे मौन रहते हैं।

      6.    मोदी जी को वोट न देने की अपील करने वाले तथा वामदलों के लेखक ही क्यों इस अभियान में शामिल हैं? क्या यह अपनी विरोधी विचारधारा के प्रति असहिष्णुता नहीं? यह सहिष्णुता और असहिष्णुता की टक्कर है या दो असहिष्णुताओं की?

      7.    जिन राज्यों में हत्या की घटनाएं (कर्नाटक, उत्तर प्रदेश) हुई हैं उनसे प्राप्त पुरस्कार लेखकों ने क्यों नहीं लौटाए? कानून-व्यवस्था तो राज्य सरकारों का ही क्षेत्र है।

      8.    आज लेखक अखबारों में और मीडिया पर मोदी के विरुद्ध खुलकर बोल रहे हैं, न उनके लिखने पर प्रतिबंध है, न छपने पर, न बोलने पर, तो यह आरोप क्यों लगा रहे हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्राता नहीं है?

उपर्युक्त प्रश्नों पर मीडिया के सामने कुछ लेखकों ने जो उत्तर दिए वे दर्शकों और श्रोताओं को हास्यास्पद लगे। मृदुला गर्ग, जिन्होंने पुरस्कार नहीं लौटाया था, न उस आंदोलन में शरीक थीं, ने इस प्रश्न पर कि लेखकों ने वर्तमान सरकार के पहले घटी ऐसी घटनाओं पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं की, कहा कि यह लेखक की इच्छा पर निर्भर है कि वह कब प्रतिक्रिया करेगा और कब उसमें किन घटनाओं के विरुद्ध ऐसी संवेदना पैदा होगी। यह उत्तर तो यह प्रकट करता है कि लेखक selective घटनाओं और समयों पर विरोध करेगा। इससे क्या तस्लीमा नसरीन का आरोप प्रमाणित नहीं हो जाता और विपक्ष का यह आरोप भी कि लेखकों का यह विरोध मोदी सरकार से है?

इस प्रश्न पर कि काशीनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का पुरस्कार क्यों नहीं लौटाया जबकि वह पूर्णरूपेण सरकारी पुरस्कार है और अखलाक हत्या की घटना उत्तर प्रदेश (दादरी) में ही घटित हुई थी, काशीनाथ सिंह ने कहा, ‘‘क्योंकि उत्तर प्रदेश में अभिव्यक्ति की आजादी है।’’ फिर प्रश्न होगा कि उत्तर प्रदेश में सहिष्णुता है तो अखलाक की हत्या क्यों हुई? दूसरा प्रश्न कि क्या उत्तर प्रदेश भारत के बाहर है? भारत में आजादी नहीं और उत्तर प्रदेश में है, यह कौन-सा तर्क है? काशीनाथ जी का यह तर्क मैंने स्वयं नहीं सुना था, इसे गोविंद मिश्र ने मुझे बताया था। लेकिन प्रसंगवश यह उल्लेख जरूरी है कि काशीनाथ जी ने स्वयं फोन पर मुझसे कहा था कि वे पुरस्कार नहीं लौटाएंगे, जबकि इसके तीन दिन बाद ही उन्होंने मीडिया के सामने फोटो खिंचवाकर पुरस्कार वापसी की घोषणा कर दी थी। क्या इस बीच उन पर कोई दबाव पड़ गया और उन्होंने मित्र धर्म का निर्वाह कर दिया? ज्ञातव्य यह भी है कि काशीनाथ जी ने भी मोदी के चुनाव में उनका विरोध किया था।

एक टी.वी. चैनल पर जब अशोक वाजपेयी से ऐंकर ने पूछा कि मकबूल फिदा हुसेन जिस समय देश छोड़कर गए या सलमान रस्दी की पुस्तक प्रतिबंधित हुई, कांग्रेस की सरकार थी। तब उन्होंने विरोध नहीं किया। इस पर वाजपेयी जी का चेहरा उतर गया। ऐसे ही किसी प्रश्न पर केकी एन. दारूवाला मौन हो गए। उन्होंने 1984 (सिखों की हत्या के वर्ष) में पुरस्कार लिया था। वाजपेयी जी ने 1994 में पुरस्कार लिया था जिसके दो वर्ष पहले (1992) बाबरी मस्जिद का ध्वंस हुआ था।

अपने नामचीन लेखकों को सवालों पर चुप हो जाते या हकलाते देख प्रबुद्ध श्रोता और दर्शक सोच रहे थे कि इस देश में गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, महँगाई, किसानों की आत्महत्या आदि जमीनी मुद्दे हैं जिन पर कोई लेखक नहीं बोल रहा। दाल 170 रुपए किलो, प्याज 50 रुपए किलो, पेट्रोल-डीजल सब महंगे हो रहे हैं और ये लेखक असहिष्णुता पर चिल्ला रहे हैं। क्या सचमुच यह मुद्दा मैन्यूफैक्चर्ड है? उन्हीं दिनों ‘टाइम्स आॅफ इंडिया’ ने एक बड़ा-सा कार्टून छापा था जिसमें एक ओर फंदे से लटकते किसानों का चित्र था जिस पर लिखा था -‘‘भारत में पांच किसान रोज आत्महत्याएं करते हैं।’’ दूसरी ओर मुंह पर पट्टी बांधे लेखकों का चित्र था। अर्थात् इतनी दारुण घटना पर भी लेखक चुप। उन दिनों यह सब कुछ मेरे लिए बेहद तकलीफदेह था। ‘बेहद’ इसलिए कि शिक्षित और प्रबुद्ध भारतीय जन का लेखकों से मोहभंग हो रहा था। उन्हें लगता था कि राजनीतिक नेताओं की तरह ये लेखक भी अपने निहित स्वार्थों के कारण जनता को गुमराह कर रहे हैं। लेखक आग्नेय के अनुसार, ‘‘ये सारे लेखक खाते-पीते, भरे पेट डकार लेते संपन्न लोग हैं, जिन्होंने अपने सारे जीवन में अभी तक कुछ नहीं खोया है, सब पाया-ही-पाया है। जहां तक मेरी जानकारी है ये लोग कभी सर्वहारा के संघर्ष से नहीं जुड़े हैं और न कभी भारत के किसानों की किसी लड़ाई में शामिल हुए हैं। इन लेखकों को न तो कभी किसी नौकरी से निकाला गया है और न कभी उन्होंने स्वयं किसी मुद्दे पर अपनी नौकरी छोड़ी। अधिकांश सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन ले रहे हैं या पेंशन लेंगे।’’ (लहक, अक्टूबर-नवंबर 2015)

पुरस्कार वापसी लहर के थम जाने के बाद का समय था। 12 जनवरी, 2016 को रात में 8-9 बजे मैं कोई हिंदी न्यूज चैनल देख रहा था। मालदा (पं. बंगाल) या पूर्णिया (बिहार) में थाना फूंकने की घटना। एक लाख की भीड़। ‘कमलेश तिवारी को फांसी दो’ के नारे। वहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं। टी.वी. पर नीचे बार-बार कैप्सन आ रहा था -‘‘कहां हैं असहिष्णुता पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकार? इतिहासकार, फिल्मकार, वैज्ञानिक कहां हैं? अब चुप क्यों हैं?’’ भविष्य में गूंजने वाले ऐसे प्रश्नों का उत्तर कौन देगा?

जिन लेखकों ने अकादेमी पुरस्कार लौटाए उनमें से लगभग सभी ने अकादेमी पर एक ही आरोप लगाया कि उसने प्रो. कलबुर्गी की शोकसभा दिल्ली में करके निंदा नहीं की। मगर इसमें मेरी या अकादेमी की नीयत पर संदेह नहीं होना चाहिए। वस्तुतः अकादेमी की पूर्व परंपरा ऐसी ही रही है। उसने कभी ऐसी घटनाओं पर कोई कदम नहीं उठाया। पूर्व में कभी किसी लेखक ने, जिन गंभीर घटनाओं के उल्लेख ऊपर हुए हैं, उन पर अकादेमी से आगे आने की ऐसी मांग भी नहीं की है जैसी इस बार कर रहे हैं। इस संदर्भ में मैं नयनतारा सहगल की प्रशंसा करता हूं जिन्होंने आपातकाल में अकादेमी को पत्र लिखकर एक्जीक्यूटिव बोर्ड की बैठक बुलाने तथा आपात्काल की निंदा करने को कहा था। लेकिन तब भी निंदा करने की कौन कहे, अकादेमी ने एक्जीक्यूटिव बोर्ड की बैठक तक नहीं बुलाई। फिर सवाल है कि उसी अकादेमी से नयनतारा जी ने पुरस्कार क्यों लिया, जबकि उनके पुरस्कार लेने (1986) के दो वर्ष पहले देश में सिखों का कत्लेआम भी हुआ था। बहरहाल, मैंने तो वर्तमान घटनाक्रम के दो वर्ष पहले (2014) प्रकाशित अपनी आत्मकथा (अस्ति और भवति, नेशनल बुक ट्रस्ट, पृ. 379) में न केवल नयनतारा जी के आपातकाल के पत्र का उल्लेख किया है वरन् उसे न स्वीकार करने को ‘अकादेमी के माथे का सबसे बड़ा धब्बा- भी कहा है। इससे लेखक की स्वतंत्रता के प्रति मेरा भाव समझा जा सकता है। जहां तक इस बार की बात है, अकादेमी का पूर्व इतिहास देखते हुए मैं इस घटना की गंभीरता की कल्पना नहीं कर सका। पुरस्कार वापस करने वाले लेखकों की सहिष्णुता यह रही कि उन्होंने मुझे या अकादेमी को बिना कोई चेतावनी दिए सीधे पुरस्कार ही लौटा दिए और उनके पुरस्कार लौटाने की सूचना अकादेमी को सीधे अखबार से ही मिली। प्रो. नामवर सिंह ने भी इसे लेखकों का दोष माना है - ‘‘इन लोगों को साहित्य अकादेमी से कहना चाहिए था कि आप अपना विचार बताइए अन्यथा हम अपना पुरस्कार लौटाएंगे। अगर साहित्य अकादेमी कहती कि आप लोगों को जो करना है करिए, तब इन लोगों ने पुरस्कार लौटाए होते तो मैं इसे सही मानता। लेकिन जिस तरह साहित्यकारों ने अकादेमी को बिना मौका दिए पुरस्कार लौटाया, बिना चेतावनी दिए पुरस्कार लौटाया, यह गैर-जिम्मेदाराना बर्ताव है। इसे वाजिब नहीं कहा जा सकता।’’ (अगासदिया: अक्टूबर-दिसंबर 2015)। हां, केकी दारूवाला ने जरूर मुझसे फोन पर बात की। तब तक एक्जीक्यूटिव की बैठक की तिथि तय हो चुकी थी और मैंने उनको इसकी सूचना दे दी। लेकिन उन्होंने इसकी प्रतीक्षा नहीं की। संभवतः उन पर किसी का दबाव रहा हो। हालांकि बहुत से लेखकों ने एक्जीक्यूटिव की बैठक की प्रतीक्षा करना उचित समझा और बाद में उसके प्रस्ताव से सहमत भी रहे। इस गंभीर और राजनीतिक रूप ले चुके मसले पर मैं अकेले कोई बयान नहीं देना चाहता था। मैं चाहता था कि संस्था द्वारा आधिकारिक और सामूहिक बयान ज्यादा प्रभावकारी होगा। यहां बताना प्रासंगिक होगा कि एक्जीक्यूटिव का वह बयान जिसकी व्यापक प्रशंसा और स्वीकृति हुई, मूल रूप से मेरा ही लिखा हुआ था। मैं व्यक्तिगत बयान इसलिए भी नहीं देना चाहता था, क्योंकि आरंभ में दिए गए मेरे बयानों को पक्ष-विपक्ष बन चुके अखबारों ने तोड़-मरोड़कर छापा था। मैंने अपने आरंभिक बयानों में यही कहा था ‘‘कि साहित्य अकादेमी लेखकों की स्वाधीनता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करती है। वह लेखकों के साथ है। मगर पुरस्कार लौटाने का औचित्य नहीं है, क्योंकि पुरस्कार गुणवत्ता के आधार पर लेखकों द्वारा ही दिया जाता है। इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। पुरस्कृत पुस्तकों के विभिन्न भाषाओं में अनुवाद होते हैं। पुरस्कार लौटाने से जटिलताएं बढ़ेंगी, उनके अनुवाद आदि प्रभावित होंगे और कोई व्यक्ति उनकी रायल्टी आदि पर भी सवाल खड़े कर सकता है। अतः लेखकों को विरोध के अन्य तरीके अपनाने चाहिए और इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए।’’ मेरे इसी बयान को अखबारों ने अपने-अपने ढंग से प्रकाशित किए जिसे एक-दो लेखकों ने सही संदर्भ में नहीं ग्रहण किया, जिनमें नयनतारा जी भी हैं। (हालांकि बाद में मेरी आशंका सही साबित हुई। इस मामले ने राजनीतिक रूप भी ले लिया और दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दाखिल हो गई जिसमें रायल्टी आदि के मामले उठाए गए।)

16 सितंबर, 2015 को मैं एक ही दिन के लिए दिल्ली में था। उसी दिन श्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह और विश्वनाथ त्रिपाठी के साथ तीन-चार लेखक मेरे कार्यालय में मिले। वे लोग कलबुर्गी जी की हत्या पर अकादेमी में शोकसभा करने के लिए कह रहे थे। उन्होंने एक पत्रक भी दिया जिस पर जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच के कुछ लेखकों के हस्ताक्षर थे। तब तक उदय प्रकाश द्वारा इसी घटना पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने की सूचना (5 सितंबर, 2015) आ चुकी थी और फेसबुक पर बहुत कुछ लिखा जाने लगा था। इस घटना ने राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया था। मैंने उन लोगों से कहा कि अकादेमी के उपाध्यक्ष कर्नाटक के ही हैं और स्व. कलबुर्गी के मित्र भी हैं। उन लोगों ने बेंगलुरु में ही शोकसभा का निश्चय किया है। सेक्रेट्री ने बताया है कि उसकी तिथि भी निश्चित हो चुकी है। अतः यहां दिल्ली में दुबारा करना उपयुक्त नहीं लगता। वे लोग दिल्ली में और अकादेमी में ही शोकसभा क्यों करना चाहते थे, इस संबंध में वे स्वयं आत्मपरीक्षण कर सकते हैं। क्या इस घटना को राजनीतिक रंग देना चाहते थे?

श्री के. सच्चिदानंदन ने सचिव, साहित्य अकादेमी के माध्यम से एक ई-मेल मुझे किया था जो मुझे पढ़ने को नहीं मिला। मैं स्वयं कंप्यूटर चलाना नहीं जानता, किसी को बुलाकर ई-मेल आदि देखता हूं जिसमें विलंब हो जाता है। संभव है सचिव ने वह मेल मुझे फारवर्ड किया हो, जिसे मैं देख नहीं पाया। अतः उसका जवाब उन्हें न दे सका। इसे मेरा ‘अहंकार तथा निरंकुशता’ (उन्हीं के शब्द) समझकर उन्होंने अकादेमी की सदस्यता से त्याग पत्र दे दिया और बाद में ऐसा पत्र लिखा जिसे पढ़कर मुझे बेहद तकलीफ हुई। बल्कि कहूं कि पुरस्कार वापसी के पूरे प्रकरण में यदि मुझे सबसे अधिक क्लेश हुआ तो सच्चिदानंदन जी के पत्र से। उन्होंने अखबारों में तोड़-मरोड़कर छापे गए मेरे बयानों और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर मुझे ऐसा विशेषण दिया जो 75 वर्षों के जीवन से मुझे किसी ने नहीं दिया था। अर्थात् ‘अहंकारी’ और ‘निरंकुश’। सच्चिदानंदन जी से मैं जब भी जरूरत होती तुरंत फोन मिलाकर बात करता था, उनसे व्यक्तिगत काम के लिए भी कहता था और वे करते भी थे। मैं समझ नहीं पाता कि उन्होंने मुझे फोन न करके सचिव के माध्यम से पत्र क्यों लिखा? फोन, जो सबसे सहज और विश्वसनीय माध्यम है, से तुरंत बात हो गई होती और मुझे उनके सुझाव से खुशी होती। मैंने हमेशा उन्हें इतना आदर दिया जितना शायद ही उन्हें किसी पूर्व अध्यक्ष से मिला हो। वे भी मेरे प्रति मधुर व्यवहार करते थे। अपने बारे में इतना तो कह सकता हूं कि मुझमें और चाहे जो भी दुर्गुण हों, अहंकार और निरंकुशता तो नहीं है। मेरे लिए अब भी यह रहस्य है कि मेरे किस व्यवहार ने या किसी के किस दबाव ने सच्चिदानंदन जी को यह लिखने के लिए विवश किया कि वे मेरे जैसे व्यक्ति के साथ काम नहीं कर सकते। वे कई वर्षों तक अकादेमी के सचिव रह चुके हैं, इस बीच देश में असहिष्णुता की अनेक घटनाएं घटी होंगी, उस समय के अध्यक्षों ने क्या स्टैंड लिये, सच्चिदानंदन जी के साथ उनके कैसे व्यवहार रहे, इन सब बातों की स्मृति तो उन्हें होगी ही। मैं उनका विवरण नहीं देना चाहता।

साहित्य अकादेमी की महत्तर सदस्य कृष्णा सोबती ने पुरस्कार तो नहीं लौटाया मगर 16 अक्टूबर, 2015 को मुझे पत्रा लिखकर सीधे मुझसे इस्तीफे की मांग की। उन्होंने ‘लेखक की बौद्धिक अस्मिता और रचनात्मक सम्मान’ की हो रही अवहेलना और तौहीन को देखते हुए मुझे अध्यक्ष पद त्याग देने को कहा। उनका पत्र सुझाव देने के लहजे में नहीं बल्कि आदेशात्मक था। उन्होंने पत्र में यू.आर. अनंतमूर्ति के उस वक्तव्य को उद्धृत किया था जो उन्होंने 1993 में अकादेमी अध्यक्ष पद ग्रहण करते हुए कहा था कि वे ‘‘संस्था के बहुलतावाद और स्वायत्तता’’ की रक्षा करेंगे। पत्र के अंत में उन्होंने गोपीचंद नारंग का यह वाक्य उद्धृत किया था - ‘‘लेखन एक सामाजिक क्रिया है और विरोध करना रचनात्मकता का ही एक अंग है।’’ कृष्णा सोबती जी से न मेरी कभी मुलाकात हुई है, न कोई खतोखिताबत रही है। हां ‘दस्तावेज’ पत्रिका के अंक मैं उन्हें भिजवाता रहा हूं। पता नहीं वह उन्हें मिलती रही है या नहीं। अपने बारे में कहना ठीक नहीं मगर इस प्रसंग में निवेदन करना होगा कि लेखकीय स्वाधीनता, स्वायत्तता और सम्मान के बारे में मैं जीवन-भर लिखता रहा हूं। मेरी आलोचना पुस्तक ‘रचना के सरोकार’ की मूल थीम यही है। मेरी एक और आलोचना पुस्तक ‘आलोचना के हाशिए पर’ (2008) का पहला ही वाक्य यह है - ‘‘राज्य, समाज, धर्म और विचारधारा - ये चारों जब कट्टर होते हैं और अपने सच को अंतिम मानने लगते हैं तो रचनाकार के शत्रु  बन जाते हैं। राज्य का सर्वसत्तावादी तानाशाही रूप, समाज का संकीर्ण रूढ़िवादी रूप, धर्म का कर्मकांडी सांप्रदायिक रूप और विचारधारा का पार्टी पिछलग्गू रूप - ये चारों रचनाकार के शत्रु हैं।’’ ‘दस्तावेज’ के अनेक संपादकीयों में मैंने राजनीति के बड़े-बड़े नेताओं के नाम लेकर विरोध प्रकट किए हैं। शायद ही किसी साहित्यिक पत्रिका में ऐसे कड़े संपादकीय प्रकाशित हुए हों। किसानों की आत्महत्या और भूमि अधिग्रहण के बारे में मैंने तब सम्पादकीय टिप्पणियां लिखी थीं जब आदरणीय अन्ना हजारे जी दिल्ली के रंगमंच पर नहीं आए थे। किसी लेखक गुट या मीडिया द्वारा न उछाले जाने के कारण कृष्णा जी को मेरा उपर्युक्त लेखन पढ़ने को न मिला होगा। लेकिन यदि मेरे इस्तीफे से देश में लेखक की अस्मिता और सम्मान कायम रहे तो मैं तुरंत अकादेमी छोड़ने को तैयार हूं। मैं तो अकादेमी से कोई सुविधा भी नहीं लेता हूं जिसे अकादेमी का हर कर्मचारी जानता है। मुझे लगता है कृष्णा जी को मेरे बारे में उनके किसी प्रिय पात्र ने झूठी सूचना और गलत प्रेरणा दी।

पुरस्कार लौटाने वाले लेखकों में सबसे अधिक सवाल अशोक वाजपेयी से किए गए। वास्तव में वे ही इस आंदोलन के सूत्र संचालक भी थे। उनसे पूछे गए प्रश्नों, जो उनके पूर्व के कार्य-कलापों के बारे में थे, के कोई उत्तर उन्होंने नहीं दिए, फिर भी सारा हिंदी जगत उसे जानता है, क्योंकि वे हमेशा मीडिया और विवादों में रहे हैं। मैं यहां पूछे गए उन सवालों को बिना दुहराए, अपने कार्यकाल में अकादेमी के साथ उनके रिश्ते के बारे में दो उल्लेख करना चाहता हूं। असहिष्णुता आंदोलन के डेढ़ वर्ष पहले 16 मार्च, 2014 को उन्होंने ‘जनसत्ता’ में एक टिप्पणी लिखी - ‘‘विश्व कविता द्वैवार्षिकी: एक अंतर्कथा’’। इस टिप्पणी की अंतिम पंक्तियां इस प्रकार हैं - ‘‘जब तक साहित्य अकादेमी का वर्तमान निजाम पदासीन है तब तक मैं एक लेखक के रूप में अपने को साहित्य अकादेमी से अलग रखूंगा। साहित्य अकादेमी के एक और निजाम के दौरान पहले भी मैंने अपने को उससे अलग रखा था। मेरे न होने से अकादेमी को कोई फर्क नहीं पड़ता और मुझे अकादेमी के होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। एक सार्वजनिक और राष्ट्रीय संस्थान के अनैतिक आचरण में सहभागिता करना लेखकीय अंतःकरण की अवमानना होगी।’’ इस टिप्पणी की अंतर्कथा अति संक्षेप में यह है कि वाजपेयी जी विश्व कविता के आयोजन में अपने रजा फाउंडेशन को अकादेमी के साथ जोड़ना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कांग्रेस शासन काल में प्रशासन के बड़े अधिकारियों से काफी दबाव डलवाया। यह मामला कई महीनों चला और अंत में साहित्य अकादेमी ने जब रजा फाउंडेशन को साथ न लेने का निर्णय लिया तो वाजपेयी जी ने क्रुद्ध होकर उपर्युक्त टिप्पणी लिखी। इस टिप्पणी से अकादेमी और मेरे विरुद्ध उनका गुस्सा जाहिर है। दूसरी टिप्पणी उन्होंने वर्तमान घटनाक्रम के चार महीने पहले लिखी, 31 मई, 2015 को ‘जनसत्ता’ में ही, जो इस प्रकार है - ‘‘साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष एक हिंदी साहित्यकार हैं, जो विनयशील और उदार दृष्टि रखते हैं पर उनका मिडियाक्रिटी के प्रति आकर्षण इतना प्रबल है और साहित्य अकादेमी की बाबूगिरी ने उनको इस कदर आतंकित किए रखा है कि साहित्य अकादेमी मीडियाक्रिटी का भीड़ भरा परिसर बनकर रह गई है। नई सरकार के प्रति वफादारी का, जिसकी जरूरत यों अकादेमी को नहीं होनी चाहिए, क्योंकि वह स्वायत्त है, आलम यह है कि उसने स्वच्छता अभियान की पुष्टि में एक साहित्यिक आयोजन करना जरूरी समझा। समय आ गया है कि अब स्वयं लेखकों-कलाकारों को अपने साधनों से स्वायत्त राष्ट्रीय संस्थाएं बनाने की सोचना चाहिए, जो सहज खुले संवाद और द्वंद्व के मंच हों और उनके व्यावसायिक हितों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने में सन्नद्ध हों।’’ इस टिप्पणी में भी साहित्य अकादेमी और व्यक्तिगत रूप से मेरे विरुद्ध उनकी शिकायत है। यदि इन पंक्तियों में व्यक्त ध्वनि सुनी जाए तो वह है कि साहित्य अकादेमी की उपेक्षा कर प्रतिभावान लेखकों-कलाकारों का एक अलग मंच बने।

असहिष्णुता आंदोलन के लगभग समापन काल में 22 नवंबर, 2015 को अशोक वाजपेयी ने फिर लिखा, जनसत्ता में ही - ‘‘एक लेखक की दिन दहाड़े हत्या के बाद साहित्य अकादेमी ने शोकसभा तक नहीं की।’’ इसके एक महीने पहले (23 अक्टूबर, 2015) उन्हें अकादेमी की कार्यकारिणी का प्रस्ताव मिल चुका था जिसमें शोकसभा का पूरा ब्यौरा है तथा अखबारों में और अकादेमी के वेबसाइट पर भी यह सूचना उपलब्ध थी कि अकादेमी ने बेंगलुरु में बाकायदा निमंत्रण-पत्र छापकर एक बड़ी शोकसभा आयोजित की थी। फिर तथ्य को छिपाकर इस प्रकार का बयान क्यों? स्पष्ट है कि उनके विरोध का प्रच्छन्न एजेंडा था -

      1.     मोदी विरोध, जिसका ऐलान उन्होंने आम चुनाव के पहले ही कर दिया था।

      2.    साहित्य अकादेमी विरोध, जिसकी घोषणा कलबुर्गी जी की हत्या के डेढ़ वर्ष पूर्व ही कर चुके थे।

राजनीतिक बुद्धिजीवी अपने निजी विरोध को वैचारिक जामा पहनाकर जनता के सामने लाता है। यदि वह अपना भीतरी मंतव्य सीधे-सीधे प्रकट कर दें तो फिर प्रतिभावान कैसे माना जाएगा?

23 अक्टूबर, 2015 को अकादेमी ने पुरस्कार वापसी पर अपनी कार्यकारिणी समिति की आपात बैठक बुलाई थी। बैठक के पहले ही लेखक संगठन ने जुलूस निकालने और पत्रक देने की घोषणा कर रखी थी।

एक पत्रक जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच और वामदल लेखकों का था जिसमें देश में लगातार बढ़ रही हिंसक असहिष्णुता और फासीवादी प्रवृत्ति का विरोध करते हुए मांग की गई थी कि कार्यकारी मंडल अभिव्यक्ति की आजादी और असहमति के अधिकार की रक्षा करे। उसमें यह भी था कि वर्तमान अकादेमी अध्यक्ष यदि अपने शर्मनाक रवैये और अपमानजनक बयानों के लिए माफी न मांगे तो उनसे इस्तीफे की मांग की जाए। दूसरे पत्रक में कुछ रचनाकारों द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार के विरुद्ध कुत्सित अभियान को अस्वीकार करने तथा साहित्य अकादेमी को किसी प्रकार के दबाव में न आने के लिए कहा गया था। वामदलों ने पत्रक देते हुए यह भी कहा था कि उनका पत्रक बैठक में पढ़ दिया जाए। बैठक में कुल 27 सदस्यों में 25 सदस्य उपस्थित थे। उन्होंने खुलकर और गंभीरतापूर्वक विचार किया। लगभग सभी सदस्यों ने विचार-विमर्श में हिस्सा लिया। मैंने कार्यसमिति के सामने वामदलों का वह पत्रक पढ़कर सुनाया जिसमें मेरे इस्तीफे की मांग की गई थी। समिति ने उस पत्रक को खारिज कर दिया। जब मैंने यह कहा कि कलबुर्गी जी की शोकसभा दिल्ली में नहीं हुई, इसके लिए कुछ लेखक नाराज हैं, तो एक सदस्य ने अंग्रेजी में कहा- why in delhi , delhi is not india । एक-दूसरे सदस्य ने कहा, जब अकादेमी की बैठकें देश-भर में होती हैं और लेखकों की जन्म शताब्दियां उनके गृहनगर में आयोजित होती हैं तो शोकसभा उसके गृह प्रदेश में क्यों नहीं आयोजित हो? वामदलों का पत्रक सुनने के बाद कार्यकारिणी ने अपने प्रस्ताव के अंत में एक पंक्ति और बढ़ा दिया जो एक तरह से मुझमें उसका विश्वास मत था। सर्वसम्मति से पारित मूल प्रस्ताव इस प्रकार है -

प्रस्ताव

साहित्य अकादेमी

दिनांक: 23-10-2015

23 अक्टूबर, 2015 को संपन्न साहित्य अकादेमी की विशेष बैठक प्रो. एम.एम. कलबुर्गी की हत्या की कड़े शब्दों में निंदा करती है और प्रो. एम.एम. कलबुर्गी तथा अन्य बुद्धिजीवियों और विचारकों की दुःखद हत्या पर गहरा शोक प्रकट करती है। अपनी विविधताओं के साथ भारतीय भाषाओं के एकमात्र स्वायत्त संस्थान के रूप में, अकादेमी भारत की सभी भाषाओं के लेखकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का पूरी दृढ़ता से समर्थन करती है और देश के किसी भी हिस्से में, किसी भी लेखक के खिलाफ किसी भी तरह के अत्याचार या उनके प्रति क्रूरता की बेहद कठोर शब्दों में निंदा करती है। हम केंद्र सरकार और राज्य सरकारों से अपराधियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करने की मांग करते हैं और यह भी कि लेखकों की भविष्य में भी सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। भारतीय संस्कृति का बहुलतावाद बाकी दुनिया के लिए अनुकरणीय रहा है। इसलिए इसे पूरी तरह संरक्षित रखा जाना चाहिए। साहित्य अकादेमी मांग करती है कि केंद्र और सभी राज्य सरकारें हर समाज और समुदाय के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का माहौल बनाए रखें और समाज के विभिन्न समुदायों से भी विनम्र अनुरोध करती है कि जाति, धर्म, क्षेत्रा और विचारधाराओं के आधार पर मतभेदों को अलग रखकर एकता और समरसता को बनाए रखें।

साहित्य अकादेमी लेखकों के लिए लेखकों की संस्था है जो लेखकों द्वारा ही निर्देशित-संचालित होती है। पुरस्कारों सहित इसके सभी निर्णय लेखकों द्वारा ही लिये जाते हैं। इस संदर्भ में, जिन लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस किए हैं या जिन्होंने अकादेमी से अपने को अलग किया है, हम उनसे अनुरोध करते हैं कि वे अपने निर्णय पर पुनर्विचार करें।

अकादेमी के कार्यकारी मंडल को विश्वास है कि अकादेमी की स्वायत्तता, जिसने 61 वर्षों के इसके इतिहास में ऊंचाइयां प्राप्त की हैं, को लेखकों का सहयोग और मजबूत करेगा।

कार्यकारी मंडल अपनी बैठक में स्वीकार करता है कि प्रो. कलबुर्गी की हत्या के बाद साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष ने उपाध्यक्ष से फोन पर बात की कि वे प्रो. कलबुर्गी के परिवार से संपर्क करें और इस हत्या के खिलाफ अकादेमी की ओर से संवेदनाएं अर्पित करें।

उपाध्यक्ष, साहित्य अकादेमी तथा कन्नड़ भाषा के संयोजक, मंडल और कुछ प्रख्यात कन्नड़ रचनाकारों ने एक सार्वजनिक सभा में प्रो. कलबुर्गी की निर्मम हत्या की दृढ़ता के साथ निंदा की। उन्होंने प्रो. कलबुर्गी के परिवार से हत्या के कुछ ही दिनों के भीतर संपर्क किया। वे प्रो. कलबुर्गी के परिवार सहित मुख्यमंत्राी से परिवार की सुरक्षा और हत्या की जांच के संबंध में मिले। अकादेमी ने दिनांक 30 सितंबर, 2015 को बेंगलूरु में एक विशेष सार्वजनिक शोकसभा की जिसमें प्रो. एम.एम. कलबुर्गी के सम्मान में प्रसिद्ध लेखक भारी संख्या में सम्मिलित हुए और हत्या की निंदा की तथा उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

उसके बाद कई अन्य भाषाओं के संयोजकों ने साहित्य अकादेमी की ओर से सार्वजनिक प्रस्ताव जारी करके इस दुःखद घटना की निंदा की और न्याय की मांग की।

श्रीनगर में कश्मीरी के संयोजक मंडल और छह भाषाओं के संयोजकों ने सार्वजनिक रूप से हत्या की निंदा की। साहित्य अकादेमी के प्रतिनिधियों और हैदराबाद में, तेलुगु के लेखकों ने तेलुगु भाषा के संयोजक की ओर से एक सार्वजनिक प्रस्ताव जारी कर हत्या की घोर निंदा की।

कार्यकारी मंडल इस हत्या की पुनः निंदा करता है। पूर्व से भारतीय लेखकों की हुई हत्याओं और अत्याचारों को लेकर वह बेहद दुःखी है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जी रहे नागरिकों के खिलाफ हो रही हिंसा की भी वह कड़े-से-कड़े शब्दों में निंदा करता है।

कार्यकारी मंडल, अकादेमी के अध्यक्ष के सतर्क और कर्मठ नेतृत्व में साहित्य अकादेमी की गरिमा, परंपरा और विरासत को बरकरार रखने के लिए उनके प्रति सर्वसम्मति से अपना समर्थन व्यक्त करता है।

(चंद्रशेखर कंबार)                                  विश्वनाथ प्रसाद तिवारी)

उपाध्यक्ष, साहित्य अकादेमी                  अध्यक्ष, साहित्य अकादेमी

उपर्युक्त प्रस्ताव उसी दिन मीडिया और लेखकों को भेज दिया गया जिसका देश-भर में व्यापक स्वागत हुआ। साहित्य अकादेमी में अनेक वर्षों तक उपसचिव रहे हिंदी लेखक श्री विष्णु खरे जो अपनी निर्भीक और बेबाक अभिव्यक्तियों के लिए जाने जाते हैं, ने अपने ब्लाग पर लिखा - ‘‘मुझे उस प्रस्ताव ने चकित और अवाक् कर दिया जो अकादेमी के सर्वोच्च प्राधिकरण, उसके एक्जीक्यूटिव बोर्ड (कार्यकारिणी) ने कल 23 अक्टूबर को अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी तथा उपाध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार के नेतृत्व में दिल्ली के अपने मुख्यालय में सर्वसम्मति से पारित किया है। अकादेमी के इतिहास में उसकी शब्दावली अभूतपूर्व है...सर्व संशयवादी लेखक बुद्धिजीवी इसे भी पाखंडी और धूर्ततापूर्ण कहकर खारिज कर देंगे। लेकिन बहुत याद करने पर भी मुझे स्मरण नहीं आता कि वामपंथी संगठनों को छोड़कर स्वतंत्र भारत के इतिहास में किसी निजी, सरकारी या अर्ध-सरकारी संस्था ने इतना सुस्पष्ट, बेबाक, प्रतिबद्ध, रैडिकल और दुस्साहसी वक्तव्य कभी पारित और सार्वजनिक किया हो।’’

कार्यकारिणी के प्रस्ताव के साथ जब लेखकों से लौटाए गए पुरस्कार वापस लेने का अनुरोध किया गया तो उन्होंने प्रस्ताव की प्रशंसा की, मगर इसे विलंब से आया बताया। जब प्रस्ताव ठीक है और इसी से अकादेमी के स्टैंड का पता लग गया तो फिर पुरस्कार स्वीकार करने में एतराज क्यों? क्या लेखकों के मन में गांठ कुछ दूसरी है? उदाहरण भी देख लीजिए। 7-8 नवंबर को लखनऊ के ‘कथाक्रम’ में शामिल कुछ लेखकों ने बिहार में लालू प्रसाद यादव की जीत पर मिठाइयां बांटी। इनमें वीरेंद्र यादव, काशीनाथ सिंह और अखिलेश जी थे। यह असहिष्णुता विरोध है या मोदी विरोध? मोदी जी का विरोध करने को कोई भी लेखक स्वतंत्र है, मगर ‘लोकतंत्र’ का विरोध यदि कोई लेखक करता है तो उसके बारे में सोचना पड़ेगा। नामवर सिंह ने सही कहा है, ‘‘लोकतंत्र का तकाजा है कि भारत के संविधान के अनुसार, कोई भी मान्य दल अगर सरकार बनाता है, चाहे हमने उसे वोट न दिया हो या हमारी विचारधारा का न हो, तो भी वह हमारी ही सरकार है।’’

(अगासदिया, अक्टूबर-दिसंबर 2015)

13 अक्टूबर, 2015 को कथाकार तेजिंदर शर्मा ने लंदन से एक मेल भेजा, जिसमें लिखा था - ‘‘यह सच है कि जो लोग आज साहित्य अकादेमी के पुरस्कार वापस करके विश्वनाथ प्रसाद तिवारी पर यह दबाव बना रहे हैं उनका मुख्य उद्देश्य पहले हिंदी बेल्ट के अध्यक्ष को गद्दी से उतारना है, क्यों कि वह वामहस्त नहीं हैं। यह मार्क्सवादी  और कांग्रेसी समर्थक साहित्यकारों के नाटक से बढ़कर कुछ नहीं है।’’ इस प्रकार की अनेक टिप्पणियां फेसबुक पर आ रही थीं और चिट्ठियां भी मुझे प्राप्त हो रही थीं। मेरा विरोध क्यों है, उसे भी अधिकांश या लगभग सभी हिंदी लेखक जानते हैं। यह एक कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूं बल्कि मार्क्सवाद के विरोध में अनेक बार लिख चुका हूं। दूसरा यह, कि मैं किसी लेखक गुट या राजनीति दल से जुड़ा नहीं हूं न किसी प्रभावशाली लेखक के प्रभाव में हूं और तीसरा, मैं अंग्रेजीदाॅ नहीं हूं। हिंदी की अपसंस्कृति यह है कि जो मार्क्सवादी नहीं, उसे लेखक ही नहीं माना जाता। जो किसी गुट में नहीं, उसकी चर्चा नहीं की जाती और अंग्रेजीदां लोगों की दृष्टि में हिंदी महत्त्वहीन है।

इसी बीच मेरे प्रति घटी वामदलों की असहिष्णुता की एक उल्लेखनीय घटना। 25 नवंबर, 2015 को इलाहाबाद में मीरा स्मृति सम्मान एवम् पुरस्कार समारोह था जिसकी अध्यक्षता मैं कर रहा था। पुरस्कार वापसी विवाद के कारण प्रलेस, जलेस और जसम तीनों लेखक संगठनों के नेताओं ने इसका बहिष्कार किया। जनवादी लेखक संघ के नेता दूधनाथ सिंह ने इस समारोह के आयोजक और साहित्य भंडार प्रकाशन के मालिक श्री सतीश चंद्र अग्रवाल से यह कहा कि हो सकता है उनके संगठन का कोई व्यक्ति मेरे मुख पर कालिख पोत दे या जूता चला दे। इस संदर्भ में जन संस्कृति मंच के अध्यक्ष डाॅ. राजेंद्र कुमार ने दूधनाथ जी को चेतावनी दी कि यदि संगठन के सदस्य ऐसा करेंगे, तो वह (राजेंद्र कुमार जी) अखबारों को बयान देकर जन संस्कृति मंच से त्यागपत्र दे देंगे। यह बात मुझे आयोजकों ने ही बताई। मुझे लगभग 25 वर्ष पूर्व का लिखा और छपा अपना ही यह वाक्य याद आ रहा था - ‘‘हिंदी के लेखक संघ दुनिया को बदलने में तो कामयाब नहीं हुए, मगर हर शहर में उन्होंने लेखकों के आपसी संबंध जरूर बदल दिए।’’

पुनश्च

22 जुलाई, 2016 को ‘‘दैनिक जागरण’’ में यह खबर प्रकाशित हुई है - प्रधानमंत्राी नरेंद्र मोदी की नीतियों से नाराज होकर पुरस्कार लौटाने वाले साहित्यकार, लेखक, कलाकार, नीतीश के अभियान को साहित्यिक एवम् सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से जन-जन तक ले जाएंगे। नीतीश के संघ मुक्त भारत अभियान में ये सभी साथ देने को तैयार हैं।... दिल्ली में दो दिनों पूर्व जदयू के प्रधान राष्ट्रीय महासचिव के.सी. त्यागी के आवास पर इन साहित्यकारों एवम् लेखकों की बैठक हुई, जिसमें नीतीश कुमार शामिल हुए। प्रमुख चेहरों में अशोक वाजपेयी, ओम थानवी, विष्णु नागर, सीमा मुस्तफा, मंगलेश डबराल, प्रो. अपूर्वानंद, पुरुषोत्तम अग्रवाल आदि शामिल थे।’’

अब तो कुछ लोगों के इस कथन पर भी विश्वास किया जा सकता है कि पुरस्कार वापसी का नाटक बिहार चुनाव में जदयू के पक्ष में और भाजपा के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए था।

लोकतंत्र में लेखक को किसी पार्टी का पक्ष लेने और किसी का विरोध करने की स्वतंत्रता है और होनी चाहिए। लेकिन दूसरे लेखकों, बुद्धिजीवियों और देश की जनता को भ्रमित करने की कोशिश उसे नहीं करनी चाहिए। अन्य चीजों की तरह सहिष्णुता भी सापेक्षिक होती है। एक पक्ष यदि सहिष्णु नहीं है तो वह दूसरे को भी उसका उल्लंघन करने को प्रेरित करेगा। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब दूसरों की भावनाओं को चोट पहुंचाना नहीं है। स्वाधीनता हमारे समय की सबसे मूल्यवान चीज है, पर सबसे खतरनाक भी वही है।

[ विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से 09810139991 पर संपर्क किया जा सकता है । ]

Friday, 3 August 2018

यह तीसरा आदमी कौन है

इंडियन एक्सप्रेस के रामनाथ गोयनका जब प्रभाष जोशी को संपादक बनाने के लिए दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन से मिलने के लिए अचानक पहुंचे तो प्रभाष जी के पास गोयनका जी को बैठाने के लिए सही सलामत कुर्सी भी नहीं थी । एक ही कुर्सी थी जिस का एक पैर टूटा हुआ था । और उसे किसी तरह ईटा जोड़ कर टिका रखा था । जोशी जी ने सकुचाते हुए गोयनका जी को उसी पर बैठाया था । बाद के दिनों में जब जनसत्ता अपने उरुज पर था तब गोयनका जी जोशी जी का वेतन कुछ ज़्यादा ही बढ़ाना चाहते थे लेकिन जोशी जी ने एक शर्त रख दी कि अगर जनसत्ता के सभी सहयोगियों का वेतन बढ़ा दिया जाए उन के साथ तभी उन का वेतन बढ़ाया जाए । गोयनका जी चुप हो गए ।

बी जी वर्गीज को जब रामनाथ गोयनका ने इंडियन एक्सप्रेस का चीफ़ एडीटर बनाने का प्रस्ताव रखा साथ ही तब के समय में बीस हज़ार रुपए महीने वेतन का प्रस्ताव रखा । वर्गीज साहब ने गोयनका से कहा , यह तो बहुत ज़्यादा है । ज़्यादा से ज़्यादा दस हज़ार रुपए दे दीजिए । लेकिन गोयनका जी ने कहा कि हमारे यहां संपादकों का वेतन तो बीस हज़ार रुपए महीना ही है । उस समय तक वर्गीज साहब हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रह चुके थे । प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सूचना सलाहकार भी रह चुके थे ।

थोड़ा और पीछे चलते हैं । पंडित मदन मोहन मालवीय को राजा साहब कालाकांकर ने भारत का संपादक बनाया । वेतन दिया दो सौ रुपया महीना । जो बहुत नहीं तो आज के दस लाख रुपए के बराबर समझ लीजिए । यह ब्रिटिश पीरियड की बात है । मालवीय जी ने राजा साहब से सिर्फ़ एक शर्त रखी और कहा कि आप जब कभी शराब पिए हुए हों तो मुझे भूल कर भी अपने पास नहीं बुलाएं , न मुझ से बात करें । जिस दिन आप ने यह शर्त तोड़ी , मैं अख़बार छोड़ दूंगा । राजा साहब ने सहर्ष यह शर्त स्वीकार ली । अखबार चल निकला । राजा साहब बहुत समय तक इस शर्त को निभाते रहे । एक रात उन्हों ने मालवीय जी को बुलाया । राजा साहब शराब पिए हुए थे । मालवीय जी उलटे पांव लौटे । और इस्तीफ़ा भेज दिया । समय बीतता रहा । बहुत समय बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हुई तो मालवीय जी ने राजा साहब से कहा कि मैं ने आप के अख़बार से संपादक का दायित्व तो कब का त्याग दिया लेकिन आप मुझे वेतन नियमित क्यों भेजते जा रहे हैं । राजा साहब ने हाथ जोड़ कर मालवीय जी से कहा , मैं तब भी आप को वेतन नहीं भेजता था , न अब भेज रहा हूं । आप को संपादक का दायित्व दिया था , कर्मचारी नहीं बनाया था । बाक़ी मेरी ख़ुशी है , इसे बने रहने दें । और मालवीय जी को दो सौ रुपए महीना पूर्ववत भेजते रहे ।

अरविंद कुमार सरिता , मुक्ता , कैरवा वाले दिल्ली प्रेस में सहायक संपादक थे । सभी पत्रिकाओं के प्रभारी संपादक । दिल्ली प्रेस के स्वामी , प्रकाशक विश्वनाथ जी अरविंद जी के रिश्तेदार भी थे । अरविंद जी विश्वनाथ जी को अपना गुरु भी मानते हैं । इस दिल्ली प्रेस में अरविंद कुमार ने बाल श्रमिक के तौर पर कम्पोजीटर से भी नीचे बतौर डिस्ट्रीव्यूटर काम शुरू किया था । और इस मुकाम तक पहुंचे थे । लेकिन एक बार किसी बात पर विश्वनाथ जी उन से नाराज हो गए । उन के कमरे से कुर्सी निकलवा कर स्टूल रखवा दिया । सहयोगियों को उन से मिलने पर पाबंदी लगा दी । तरह-तरह से उन्हें तंग किया गया । इसी बीच टाइम्स आफ़ इंडिया ग्रुप की मालकिन रमा जैन ने उन्हें बुलाया और हिंदी फ़िल्मी पत्रिका माधुरी का संपादक बनने का प्रस्ताव दे दिया । अरविंद कुमार ने ज्वाइन करने के लिए थोड़ा समय मांग लिया । और इस विपरीत हालात में भी दिल्ली प्रेस नियमित जाते रहे । अंततः विश्वनाथ जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्हों ने अरविंद जी से इस बात को स्वीकार करते हुए उन्हें उन का रुतबा वापस दे दिया । तब जा कर अरविंद जी ने अपना इस्तीफ़ा देते हुए उन से माधुरी जाने के लिए विदा मांगी । विश्वनाथ जी हतप्रभ रह गए यह जान कर कि टाइम्स आफ इंडिया के प्रस्ताव के बावजूद अरविंद जी विपरीत स्थितियों में भी दिल्ली प्रेस में बने रहे । खैर अरविंद जी मुम्बई गए और एक शानदार पत्रिका माधुरी निकाली। चौदह बरस बाद थिसारस पर काम करने के लिए माधुरी छोड़ दिया । पर यह प्रत्यक्ष कारण था । यह बात सब लोग जानते हैं । अरविंद जी ख़ुद भी यही बताते हैं । पर बहुत कम लोग जानते हैं कि अरविंद कुमार के माधुरी छोड़ने के पीछे एक अप्रत्यक्ष कारण भी था । यह कारण था कि तब के दिनों नवभारत टाइम्स से अक्षय कुमार जैन रिटायर होने वाले थे और प्रबंधन ने अरविंद कुमार को नवभारत टाइम्स का संपादक बनने का प्रस्ताव रखा था जिस पर अरविंद कुमार ने सहमति दे दी थी । लेकिन अक्षय जी रिटायर हुए तो अज्ञेय जी नवभारत टाइम्स के संपादक हो गए । अरविंद जी ने बिना कुछ इधर-उधर कहे-सुने माधुरी से चुपचाप इस्तीफ़ा दे कर थिसारस का काम शुरू कर दिया । यह एक पत्रकार , एक संपादक के स्वाभिमान का प्रश्न था । जिसे अरविंद कुमार ने ख़ामोशी से निभाया ।

किस्से और भी बहुतेरे हैं पत्रकारों , संपादकों और उन के स्वाभिमान के । उन की आन , बान और शान के ।

और आज के पत्रकारों के ?

आप ने देखा ही होगा कि आज लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता खड़गे ने ए बी पी न्यूज़ चैनल में मालिकाना हक बदलने के चलते चैनल से बाहर हुए दो एंकर सहित तीन लोगों का मामला बड़े जोर-शोर से उठाया । एन डी टी वी समेत तमाम चैनलों से , अख़बारों से हज़ारों लोग इधर निकाले गए हैं । कांग्रेस सहित किसी भी पार्टी ने यह मामला कभी संसद में क्यों नहीं उठाया । लाखो , करोड़ो के पैकेज पर काम कर रहे इन चैनलों के लोगों की आवाज़ संसद से सोशल मीडिया तक चौतरफा सुनाई दे गई । पर इन्हीं चैनलों और अख़बारों में बेचारे अल्प वेतन भोगी पत्रकारों की बात लोकसभा में कभी किसी ने उठाई क्या ? इन्हीं मीडिया संस्थानों में दिल्ली , मुम्बई , लखनऊ , पटना , भोपाल , चेन्नई , बेंगलूर आदि जगहों पर दिहाड़ी मजदूरों से भी कम पैसे तीन हज़ार , पांच हज़ार , दस हज़ार रुपए में हज़ारों लोग काम कर रहे हैं , किसी ने कोई सुधि क्यों नहीं ली । मजीठिया आयोग की सिफारिशें किसी मीडिया हाऊस ने क्यों नहीं अभी तक लागू किया । सुप्रीम कोर्ट में सैकड़ो लोग इस बाबत लड़ रहे हैं , लेबर कोर्टों में लड़ रहे है । क्या संसद के लोग नहीं जानते । नहीं जानते कि मीडिया हाऊसों ने सारे लेबर कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट तक खरीद लिए हैं । लेकिन इस गूंगी , बहरी संसद को तब पता ज़रूर चलता है जब करोड़ो रुपए के पैकेज पर उन की कुत्तागिरी करने वालों के हितों को चोट पहुंचती है । धूमिल ने ठीक ही लिखा है :

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।

Thursday, 2 August 2018

जब आप पक्षकार बन जाते हैं तब पत्रकार नहीं रह जाते , कुत्तागिरी कर रहे होते हैं

ए बी पी न्यूज़ और पुण्य प्रसून वाजपेयी पर जो गाज गिरी है , वह तो गिरनी ही थी । बकरी कब तक खैर मनाती भला । अफ़सोस है और गहरा दुःख है इस सब पर । बावजूद इस के मेरी राय में पुण्य प्रसून वाजपेयी भी सिर्फ़ एक प्रोडक्ट हैं । एक घटिया प्रोडक्ट । जिसे कारपोरेट ने अपने हितों के लिए तैयार किया है । रवीश कुमार भी घटिया कारपोरेट प्रोडक्ट ही हैं जैसे सुधीर चौधरी या रजत शर्मा । या ऐसे और लोग । बस खेमे अलग-अलग हैं । वास्तव में यह लोग पत्रकार नहीं , बाजीगर लोग हैं । जो चाहे लाखों , करोड़ो का पैकेज थमा कर , विज्ञापन थमा कर , इन्हें अपनी रस्सी तान कर उस पर नचा सकता है । इन सुधीर चौधरी , रजत शर्मा , रवीश कुमार या पुण्य प्रसून वाजपेयी आदि-इत्यादि को कोई यह बताने वाला नहीं है कि जब आप पक्षकार बन जाते हैं तब पत्रकार नहीं रह जाते । इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप सत्ता पक्ष के खेमे में हैं या , प्रतिपक्ष के खेमे में । हम तो बस इतना जानते हैं कि आप ख़बर के पक्ष में नहीं हैं । निष्पक्ष नहीं हैं । जनता के पक्ष में नहीं हैं । आप सिर्फ़ और सिर्फ़ इस या उस पक्ष की दलाली कर रहे हैं । उस की कुत्तागिरी कर रहे हैं ।

लोग भूल गए होंगे पर मैं नहीं भूला हूं कि जब जिंदल से ब्लैकमेलिंग के जुर्म में सुधीर चौधरी के खिलाफ एफ़ आई आर हुई और वह गिरफ्तार हुआ तब यही मास्टर स्ट्रोक के शहीद पुण्य प्रसून वाजपेयी तब ज़ी न्यूज़ पर हाथ मलते हुए छाती तान कर उदघोष कर रहे थे कि यह तो इमरजेंसी जैसा माहौल है । बताइए कि एक ब्लैकमेलर पकड़ा जाता है तो आप उस की तुलना इमरजेंसी से कर देते हैं । फिर तो जाने क्या-क्या स्याह-सफेद करते होंगे । अरविंद केजरीवाल को भगत सिंह बनाने की तरकीब देते पुण्य प्रसून वाजपेयी को लोग भूल गए हैं क्या । बहुतों के बहुत से ऐसे मास्टर स्ट्रोक हैं । जनता जब जानेगी सारा सच तो यह लोग कौन सा प्राइम टाइम करेंगे कि रेत में सिर घुसा लेंगे , यह कौन पूछेगा किसी से । रजत शर्मा , सुधीर चौधरी की बेशर्मी तो साफ़ दिखती है । लेकिन बग़ावत के बीज बो कर , क्रांति की ललकार के साथ रवीश कुमार की दलाली किसी को नहीं दिखती तो उस के मोतियाबिंद को ठीक करने की दवा किसी हकीम लुकमान के पास नहीं है ।

माफ़ कीजिए यह नौकरी की विवशता नहीं , चैनल चलाने की विवशता भी नहीं है । करोड़ो - अरबों रुपए कमा लेने की हवस है । सिर्फ़ हवस । बाक़ी मीडिया के नाम पर विधवा विलाप का अब कोई मतलब नहीं है । समूचा मीडिया अब सिर्फ़ कारपोरेट का कुत्ता है । अलसेसियन कुत्ता । कारपोरेट ने जब संसद और सर्वोच्च न्यायालय तक को प्रकारांतर से खरीद लिया है तो मीडिया के लिए इस विधवा विलाप करने का कोई अर्थ शेष नहीं रह गया है । मीडिया अगर रीढ़विहीन नहीं हुई होती तो संसद भी नहीं बिकी होती । सर्वोच्च न्यायालय भी नहीं । नौकरशाही तो मीडिया के पहले ही कारपोरेट का कुत्ता बन चुकी थी ।

खैर , मीडिया ने अपने महावत और उस के अंकुश को जिस दिन अपनी आत्मा के साथ बेच दिया था इन मुश्किल स्थितियों की नींव तभी पक्की हो गई थी । अब वह इमारत बुलंद हो गई है । उस के गुंबद अपनी पूरी चमक और शान के साथ दिखने लगे हैं । इस स्थिति के लिए कारपोरेट से ज़्यादा तमाम संपादक लोग ज़िम्मेदार हैं । बल्कि अपराधी हैं । प्रतिरोध और जन पक्षधर की पत्रकारिता का गला घोंट कर सिर्फ़ टी आर पी और लाखों का पैकेज पाने खातिर जिस तरह दलाल पत्रकारों को सिर पर बैठाया इन संपादक लोगों ने , ख़ुद भी दलाल बन कर कुत्ते , बिल्ली , अंध विश्वास और अपराध की खबरों की जो चीख चिल्लाहट भरी मीडिया तैयार किया है संपादक लोगों ने , जो माहौल बिगाड़ा है तो यह तो होना ही था ।

स्थितियां अभी और विद्रूप होनी हैं । मोदी मीडिया , गोदी मीडिया जैसे निरर्थक शब्दों को सुन कर अब सिर्फ़ हंसी आती है । इलेक्ट्रानिक मीडिया जैसे पावरफुल माध्यम के पावर का गर्भपात करने के लिए तमाम संपादक अपराधी हैं । फिर यह लोग संपादक भी कहां रह गए थे , यह लोग तो न्यूज़ डाइरेक्टर हो गए । जैसे कोई फ़िल्म डाइरेक्टर अच्छी बुरी फ़िल्म बनाता है तो उसे उस का उसी हिसाब से बाज़ार से रिस्पांस मिलता है । न्यूज़ डाइरेक्टरों को भी मिल रही है । तो काहे का रोना-धोना । नतीज़तन प्रजातंत्र अब मिला-जुला तमाशा है । तारादत्त निर्विरोध का एक शेर याद आता है :

दूर दूर बहुत दूर हो गए
हम से आप आप से हुजूर हो गए ।

संपादक जनता से सीधे मिलता था । सब का दुःख-सुख समझता था । न्यूज़ डाइरेक्टर लोग तो अपने स्टाफ़ से मिलने ही में अपनी तौहीन समझते हैं । अब काहे का रोना किसी पुण्य प्रसून वाजपेयी या किसी रवीश कुमार पांडेय के लिए । एक ब्रांड , एक प्रोडक्ट जाएगा , दूसरा आ जाएगा । वह भी बाऊंसर ले कर घूमेगा । खुद को मिलने वाली गाली को भी बेचेगा । जैसे कोई फ़िल्मी हिरोइन अपनी वाहियात फ़िल्म हिट करवाने के लिए अपनी कोई सेक्स वीडियो बाज़ार में लीक कर देती है । इसी तर्ज पर किसी एंकर प्रोडक्ट को , किसी न्यूज़ चैनल को टी आर पी मिल ही जाती है । मिल जाएगी कोई भी नौटंकी कर के । पर रीढ़ वाली पत्रकारिता तो अब कभी नहीं आने वाली । चाहे जितना शीर्षासन कर लीजिए , विधवा विलाप कर लीजिए । अब तो कोई भी क्रांति हो , क्रांति भी बिकाऊ है । हर क्रांति बिकाऊ । तो कुत्ता मीडिया के लिए किस बात का अफ़सोस भला । कम से कम मुझे तो बिलकुल नहीं है । हर किसी का नंगापन , कमीनापन और बिकाऊपन मेरे सामने है । धूमिल लिख ही गए हैं :

मैंने एक-एक को
परख लिया है।
मैंने हरेक को आवाज़ दी है
हरेक का दरवाजा खटखटाया है
मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ
उठायी है उसको मादा
पाया है।
वे सब के सब तिजोरियों के
दुभाषिये हैं।
वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।
अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक
हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।
यानी कि-
कानून की भाषा बोलता हुआ
अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।