Wednesday, 7 October 2015

अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर के सिर्फ़ और सिर्फ़ नौटंकी की है




अशोक वाजपेयी मेरे प्रिय कवि हैं। हिंदी के दुर्लभ विद्वान और अद्भुत वक्ता हैं अशोक वाजपेयी । दुनिया के साहित्य की भी उन्हें अच्छी जानकारी है । आज उन्हों ने दादरी घटना के विरोध में साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा देने की घोषणा की है। एक लेखक की चिंता सर्वकालिक और संवेदनशील होती है । अशोक वाजपेयी की भी है । ऐसे में यह पुरस्कार लौटा देने का काम कर उन्हों ने पहली नज़र में साहस का काम किया है । पर क्या सचमुच ही ? ज़रा ठहर कर सोचता हूं तो मुझे लगता है कि अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा कर के सिर्फ़ और सिर्फ़ नौटंकी की है । अंगुली कटवा कर अपना नाम शहीदों में लिखवा लेने की एक नाकाम कोशिश की है । अशोक वाजपेयी की साहित्य अकादमी लौटाने की घोषणा ठीक वैसे ही है जैसे उत्तर प्रदेश सरकार में ताकतवर मंत्री होते हुए भी आज़म खान का संयुक्त राष्ट्र संघ को चिट्ठी लिखना । इन दोनों में कोई फ़र्क नहीं है । वैसे माफ़ कीजिए , अशोक वाजपेयी आप इस कातर दुःख की घड़ी में भी यह नौटंकी कर जाएंगे , कम से कम मुझ जैसे आप के प्रशंसक को बिलकुल उम्मीद नहीं थी । अभी बीते दिनों कलबुर्गी  की हत्या के विरोध में उदय प्रकाश ने भी साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की थी । मैं ने उदय प्रकाश को इस साहसिक फैसले खातिर फेसबुक पर उन की वाल पर लिख कर बड़का वाला सैल्यूट लिखा और दिया था । हां , उदय प्रकाश से तो मैं ने नहीं पूछा , शायद किसी भी ने नहीं पूछा कि पुरस्कार लौटाने की घोषणा मात्र से ही पुरस्कार क्या वापस हो जाता है । हां , लेकिन उदय प्रकाश ने प्रतिनिधि भेज कर चेक के मार्फ़त पुरस्कार लौटने की एक क़वायद ज़रूर की थी । जिस की साहित्य अकादमी ने नोटिस भी नहीं ली । 

वैसे भी साहित्य में पुरस्कार और सम्मान अब अपमान की अनकही कहानी बन कर रह गए हैं। सरकारी हों , निजी हों या संस्थागत। सब की कहानी एक जैसी है। पुरस्कार और सम्मान वापसी भी अब एक नौटंकी के सिवाय कुछ नहीं है। जो लेखक प्रकाशकों से अपनी रायल्टी लेने का दम नहीं रखते वह समाज बदलने और व्यवस्था को चुनौती देने का दम भरते हैं। हुंकार भरते हैं। डींग मारते हैं । चींटी मारने की हैसियत नहीं , शेर मारने की रणनीति बनाते हैं। क्या तो शिकार करेंगे। समाज बदलेंगे। सवाल है कि आप को पढ़ता भी कौन है , समझता भी कौन है ? किसे बदलना चाहते हैं आप ? पहले ख़ुद को तो बदलिए।

लेकिन अशोक वाजपेयी आप चूंकि पूर्व प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं । इस लिए भी और आप को अपना प्रिय कवि मानते हुए भी आप से कुछ अप्रिय सवाल बहुत आदर के साथ पूछ लेना चाहता हूं । कृपया मुझे पूछने दीजिए कि आप ने सरकार से नाराज हो कर साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटने की घोषणा तो कर दी है , स्वागत है इस का  पर आप को साहित्य अकादमी ने जब पुरस्कार दिया था तो स्पष्ट है कि धनराशि ड्राफ्ट में दिया होगा । तो उस धनराशि की वापसी मय व्याज के ड्राफ्ट रूप में कब लौटा रहे हैं ? कि उदय प्रकाश की तरह आप भी चेक का झुनझुना भेजेंगे ? मध्य प्रदेश में ज़िलाधिकारी , भारत भवन के कर्ता धर्ता , मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह के सचिव सहित भारत सरकार के संस्कृति सचिव , अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति जैसी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां आप संभाल चुके हैं आप। फिर भी यह नौटंकी ?  

तो क्या इस प्रसंग को भोपाल में हुए विश्व हिंदी सम्मलेन में हुई आप की उपेक्षा से भी जोड़ कर भी नहीं देखा जाना चाहिए ? या कि साहित्य अकादमी के वर्तमान अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से चल रहे आप के मनमुटाव से भी इस प्रसंग को देखा जाना चाहिए ? इतना कि आप लिख ही चुके हैं कि साहित्य अकादमी के इस रिजिम में आप साहित्य अकादमी के परिसर में जाएंगे भी नहीं । या कि इस प्रसंग को आप द्वारा आयोजित विश्व कविता सम्मेलन को साहित्य अकादमी द्वारा वित्त पोषित न किए जाने के विवाद के दर्पण में देखा जाए । या आप भूल चले हैं कि अब प्रशासनिक सेवा से ही नहीं , अपने शेष प्रभा मंडल से भी अवकाश पा चुके हैं । या कि अरबों रुपए वाले रज़ा फाउन्डेशन की हुक्मरानी रास नहीं आ रही अब । कि आप की आलोचकीय तानाशाही के दिन विदा हो गए हैं । आप को याद ही होगा कि एक समय परमानंद श्रीवास्तव ने आप को तानाशाह आलोचक करार दिया था । तो अब राजनीतिक प्रभा मंडल का नया औरा तलाशा जा रहा है ? ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप की नई डायरी और नया व्याकरण लिखा जा सके । या फिर अर्जुन सिंह के ज़माने का सिक्का याद आ गया । और साहित्य अकादमी नाम की एक गाय खोज ली । और नयनतारा सहगल के पीछे भेड़ की तरह लग लिए । कि सजनी हमहूं राजकुमार !

अच्छा अशोक वाजपेयी आप यह तो बता ही दीजिए कि जब आप को वर्ष 1994 में साहित्य अकादमी मिला था तो क्या केंद्र सरकार के निर्देश पर मिला था ? कि तब के प्रधान मंत्री नरसिंहा राव के हस्तक्षेप से मिला था साहित्य अकादमी ? 

अलग बात है कि साहित्यिक हलकों में आप को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलने पर एक अंतर्कथा यह चली थी कि राजा राम मोहन राय ट्रस्ट की केंद्रीय ख़रीद समिति के तब के अध्यक्ष रहे एक मशहूर आलोचक को धांधली के आरोप में जेल जाने से बचाने में आप ने शासन में होने के नाते बड़ी भूमिका निभा कर आप ने उन की मदद की थी । इस  उपकार में उक्त आलोचक ने आप को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाने का सुनियोजित उपक्रम किया था । तब जब कि इस के पहले आप दोनों एक दूसरे को निरंतर ख़ारिज करने के युद्ध में परिचित थे । यह बात तो अशोक वाजपेयी आप भी जानते हैं कि साहित्य अकादमी के पुरस्कार कोई पद्म पुरस्कार नहीं हैं , जिन्हें सरकारें तय करती हों । सब लोग जानते हैं कि साहित्य अकादमी शुद्ध रूप से एक स्वायत्तशासी संस्था है और साहित्य अकादमी का संचालन और पुरस्कार भी शुद्ध रूप से लेखक ही आपस में लड़ -झगड़ कर या सहमति-असहमति , लाबिंग-वाबिंग के बीच ही तय करते हैं । यह बात सब लोग जानते हैं । हालां कि , मैं नहीं मानता इस बात को तो भी एक बार मान लेते हैं अशोक वाजपेयी इस बात को आप की सुविधा के लिए ही सही । कि जो आप या और जो कुछ लोग भी इस बात को मानते हैं कि साहित्य अकादमी के पुरस्कार में केंद्र सरकार की या कोई राजनीतिक दखल होती है । सो आप से सीधे पूछ ही लेते हैं । पंकज विष्ट द्वारा संपादित समयांतर में छपा था कि उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर के महंत आदित्य नाथ के निर्देश पर दिया गया था । जिस की ज्यूरी में आप , मैनेजर पांडेय और चित्रा मुदगल थे । क्या यह सच है ? सच है कि आप ने उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर के महंत आदित्यनाथ के निर्देश पर दिए थे ? मैं जानता हूं कि आप पूरी सख्ती से कहेंगे कि बिलकुल नहीं । और कि मेरी राय में , मेरी जानकारी में आप यह सच ही कहेंगे । क्यों कि सचमुच आप ने किसी महंत आदित्यनाथ के निर्देश पर नहीं , अपनी पसंद पर उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की अनुशंसा की थी । तब जब कि उदय प्रकाश की वह रचना मोहनदास उपन्यास नहीं है , कहानी है जो बतौर लंबी कहानी ही हंस में छपी थी , उपन्यास कह कर आप ने साहित्य अकादमी दे दिया । मैनेजर पांडेय के तमाम विरोध के बावजूद । मोहनदास जब कि ज्यूरी के सामने विचार के लिए प्रस्तावित भी नहीं था । पर यह आप का अपना विवेक था । जिस को चुनौती देना मूर्खता ही है । आप ने सही किया , गलत किया यह आप जानिए । हम तो बस यह जानते हैं कि आप ने उदय प्रकाश को यह साहित्य अकादमी अपनी पसंद से दिया जिस में कोई राजनीतिक या सरकारी हस्तक्षेप नहीं था । जो कि कभी होता भी नहीं है । तो अशोक वाजपेयी आप साहित्य अकादमी की सीमाओं को , उस की स्वतंत्रता को किसी और से ज्यादा बेहतर जानते हैं । फिर भी एक राजनीतिक विरोध दर्ज करने के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार को लौटाने का ड्रामा क्यों करते हैं ? साहित्य अकादमी का किसी सरकार या किसी राजनीतिक पार्टी से क्या वास्ता है ? अभी तक तो कभी रहा नहीं । साहित्य अकादमी लेखक ही चलाते हैं । लेखक ही साहित्य अकादमी की कार्यकारिणी ,  बोर्ड , संयोजक , उपाध्यक्ष और अध्यक्ष आदि चुनते हैं । सरकार बजट देने के सिवाय साहित्य अकादमी में एक पैसे का भी हस्तक्षेप नहीं करती। यह बात अशोक वाजपेयी आप भी भली भांति जानते हैं । फिर भी आप यह नौटंकी क्यों कर जाते हैं ,समझ से परे है । 

हां , आप की सुविधा के लिए बता दूं कि हमारे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कार में तो खुल्लमखुला राजनीतिक हस्तक्षेप का चलन है । जब जिस की सत्ता तब तिस का पुरस्कार। दलित की सत्ता तो हिंदी  संसथान  के  पुरस्कारों  में दलितों का साफ उभार दीखता है । यादव की सरकार तो यादव उभार दीखता है। इन दिनों उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में यादववाद अपने चरम पर है । खैर इसी एक बात से अंदाज़ा लगा लीजिए कि नीरज जैसे कवि को भारत भारती पुरस्कार पाने के लिए मुलायम सिंह यादव के यहां लगभग धरना दे कर बैठना पड़ा था और उन से चिट्ठी लिखवा कर हिंदी संस्थान को ला कर देना पड़ा था । तब जा कर उन्हें भारत भारती दिया गया । ज़िक्र ज़रूरी है कि  मुलायम सिंह यादव मुख्य मंत्री नहीं हैं । हां , मुख्य मंत्री के पिता ज़रूर हैं । सो उन का आदेश हर जगह चलता है । तो भी उन को इस बाबत लिख कर आदेश देने का कोई अधिकार भी नहीं था । लेकिन हुआ यह था कि  नीरज ने पहले हिंदी  संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह से ही कहा कि इस बार का भारत भारती मुझे चाहिए । उदय प्रताप सिंह ने कहा कि नियमत: आप को नहीं मिल सकता । ज्ञातव्य है कि नीरज भाषा संस्थान के अध्यक्ष हैं । भाषा संस्थान और हिंदी संस्थान दोनों ही भाषा विभाग के अधीन है । और कि  नियम है कि भाषा विभाग से जुड़े किसी भी व्यक्ति को हिंदी संस्थान पुरस्कृत नहीं कर सकता । पर अब मुलायम सिंह यादव का आदेश इस नियम को धता बता गया । नीरज को भारत भारती  दे दिया गया । ऐसे ही हिंदी संस्थान के पुरस्कारों में राजनीतिक हस्तक्षेप की , प्रशासनिक हस्तक्षेप की अनगिन कहानियां हैं । इतनी कि उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के पुरस्कार अब प्रतिष्ठा की जगह पैसे की टोकरी बन कर रह गए हैं । अपमान की टोकरी भी कह सकते हैं । इस लिए भी कि जैसे छात्र स्कालरशिप पाने के लिए आवेदन देते हैं , लेखक भी हिंदी संस्थान से पुरस्कार पाने के लिए आवेदन देते हैं । घूम-घूम कर संस्तुतियां करवाते हैं । बिना आवेदन दिए , बिना संस्तुति करवाए किसी को पुरस्कार नहीं मिलता । वह चाहे कितना भी बड़ा लेखक हो । एक बड़ी दिक्क्त यह भी है कि उदय प्रताप सिंह अच्छे मंचीय कवि के साथ अच्छे व्यक्ति भी ज़रूर हैं पर यादव भी बहुत बड़े हैं । घनघोर यादववादी । इस फेर में हिंदी संस्थान में एक काकस उठ खड़ा हुआ है । यह काकस उन की इस कमज़ोर नस का फायदा उठाते हुए उन से जो चाहता है , जैसे चाहता है हाथ पकड़ कर करवा लेता है । और वह असहाय देखते रह जाते हैं ।
 
बहरहाल अशोक वाजपेयी आप को भी याद होगा कि आप ने एक समय उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का भारत भारती पुरस्कार लेने से ही इंकार कर दिया था । अशोक वाजपेयी आप को जाने याद हो भी या न हो पर हिंदी संस्थान का यह पुरस्कार ठुकरा देने की आप को पहली सलाह पुरस्कार घोषित होने की दूसरी सुबह फ़ोन कर के मैं ने ही दी थी । और भी लोगों ने दी होगी । पर लोगों की या मेरी सलाह अशोक वाजपेयी ने मानी पर बहुत देर से । मैं ने पहले उन्हें पुरस्कार पाने की बधाई  दी थी और कहा था कि लेकिन आप को यह पुरस्कार ठुकरा देना चाहिए । क्यों कि उत्तर प्रदेश सरकार ने तब 109 पुरस्कार में से तीन पुरस्कार छोड़ कर बाक़ी 106 पुरस्कार रद्द कर दिए थे । तब के दिनों मायावती मुख्य मंत्री थीं । मैं ने तब आप से कहा था कि ढाई लाख रुपए से [ तब के दिनों ढाई लाख रुपए ही इस पुरस्कार के लिए थे । अब पांच लाख रुपए है । ] और इस पुरस्कार के न लेने से आप को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा । लेकिन आप द्वारा यह पुरस्कार ठुकरा देने से संभव है सरकार को कोई फ़र्क़ पड़े और शायद बाक़ी पुरस्कार बहाल करने के लिए सरकार विवश हो जाए । अशोक वाजपेयी आप ने कहा कि मुझे इस बारे में अभी कुछ पता नहीं है । पता करता हूं , फिर देखता हूं । आख़िर अशोक वाजपेयी आप ने यह पुरस्कार ठुकराया तो पर ठुकराने में बहुत देर कर दी । ठुकराने के पहले चिट्ठी लिखी हिंदी संस्थान को । उत्तर -प्रति उत्तर में समय बहुत गंवा दिया अशोक वाजपेयी आप ने । तो जो प्रभाव पड़ना था पुरस्कार ठुकराने का , वह नहीं पड़ा । बल्कि मायावती सरकार के कान पर जूं भी नहीं रेंगी । 

अशोक वाजपेयी आप द्वारा साहित्य अकादमी लौटा देने से इस एन डी ए सरकार और इस के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के कान पर भी जूं नहीं रेगेंगी । एक तो इस लिए कि दादरी पर चल रही राजनीति में भाजपा भी एक बड़ी खिलाड़ी है । इसी बिना पर बिहार चुनाव में आज के दिन वह चौकड़ी भर रही है । तो वह अपने ही को क्यों कटघरे में खड़ा करना चाहेगी ? दूसरे मान लिया गया है कि यह साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा कर आप कांग्रेस के डिक्टेशन पर चल रहे हैं । तीसरे , आप प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं , सिर्फ़ कवि और आलोचक भर नहीं हैं । इतना भी नहीं जानते कि चोट कहां करनी है , किस पर करनी है । कर्नाटक में जहां कुल्बर्गी की हत्या हुई वहां कांग्रेस की सरकार है और उस का ही मुख्य मंत्री है । और कि दादरी जहां अख़लाक़ की हत्या हुई उस उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार और उसी का मुख्य मंत्री है । यह दोनों हत्याएं कानून व्यवस्था का विषय हैं । और कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है । सो सही जगह , सही बात करने की आदत लेखकों को डालनी चाहिए । विरोध करना और नौटंकी करना दोनों दो बात है । अंगुली कटवा कर शहीद मत बनिए अशोक वाजपेयी । इसी तरह खेमेबाजी कर लेखकों , कवियों ने अपनी अस्मिता , अपना विवेक खो दिया है । इतना कि लेखकों की बात को अब लोग गंभीरता से नहीं लेते । क्यों कि राजनीति के आगे चलने वाली लेखकों की मशाल लेखकों ने ही बुझा दी है । पहले इस मशाल को जलाने का यत्न कीजिए। कांग्रेसी या किसी और दल की राजनीति बाद में कर लीजिएगा। अभी यह साहित्य अकादमी लौटने की नौटंकी प्रासंगिक नहीं है । पहले साहित्य को प्रासंगिक बनाईए। साहित्य अब समाज के हाशिए से भी बाहर क्यों हो गया है ? बोझिल क्यों हो गया है समाज पर ? यह भी ज़रूर सोचिए। हिंदी रोजगार से ही नहीं , पाठ्यक्रम से भी बाहर हो चुकी है । हिंदी माध्यम से पढ़े लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियां ले कर चपरासी की नौकरी में लाखों की संख्या में कतार में खड़े हैं । बी टेक , एम टेक कर और पी एच डी क्या चपरासी बनने के लिए लिए करते हैं हमारे नौजवान ? पर हमारी हिंदी से  , हमारे समाज से नौजवानों को यही हासिल है । अब हिंदी साहित्य भी हिंदी के साहित्यकार ही एक दूसरे की पीठ खुजाते हुए पढ़ते हैं । समाज के लोग नहीं । इस तथ्य से क्या आप परिचित नहीं हैं ? फिर भी आप जैसे मूर्धन्य साहित्यकार और साहित्य अकादमी लौटने की नौटंकी में अभिनयरत हैं । जिस राजनीतिक स्टंट का कोई हासिल नहीं । न समाज को , न साहित्य को । फिर आप अपनी नौटंकी ले कर एक सफल नौटंकीबाज़ प्रधान मंत्री के सामने उपस्थित हैं । जहां आप की इस नौटंकी को पिट जाना है । आज की तारीख में नौटंकी का बाक्स आफिस नरेंद्र मोदी नाम के प्रधान मंत्री के नाम दर्ज है , आप की नौटंकी देखने का अवकाश समाज में किसी के पास नहीं है । अफ़सोस इसी एक बात का है अशोक वाजपेयी । अब साहित्यकारों के बीच ही यह आलू-चना करते रहिए। अब आप की कलक्टरी के दिन हवा हुए अशोक वाजपेयी । कि आप जो भी कह देंगे , वही होगा । यह बात आप जितनी जल्दी जान लीजिए, बेहतर है । तो भी विरोध जारी रखिए , और चोट भी । पर सार्थक विरोध । लेखक होता ही है प्रतिरोध दर्ज करने के लिए । हालां कि अब के दिनों लेखकों को पद्म पुरस्कार लगभग नहीं मिल रहे हैं पर जो भी पद्म पुरस्कार से सम्मानित लेखक अभी जीवित हैं , वह लेखक लोग पद्म पुरस्कार वापस करना शुरू करें तो शायद विरोध का कोई हासिल हो । लेकिन यह लोग तो खामोश हैं फ़िलहाल । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से पुरस्कृत लेखक भी दादरी के विरोध में पुरस्कार वापसी का ऐलान कर सकते हैं । पर यहां भी लोग लंबी चुप्पी साधे पड़े हैं । कोई एक नहीं वापस करेगा । मुज़फ्फर नगर दंगे में भी नहीं किया था । बल्कि दंगे के घाव सूखे भी नहीं थे और गाजे-बाजे के साथ पुरस्कार ले लिया था । दादरी भी उन के लिए महज़ एक बयान विरोध से अधिक नहीं है । बहुत होगा तो मोदी का सर फोड़ते हुए नारे से गुंथा एक विरोध प्रदर्शन। बस । एक से एक घाघ बैठे हैं । धूमिल की कविता में जो कहें तो :

मुझमें भी आग है-
मगर वह
भभककर बाहर नहीं आती
क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ
एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है
जो परिवर्तन तो चाहता है
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता
बनी रहे।
कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे
और विरोध में उठे हुये हाथ की
मुट्ठी भी तनी रहे…और यही है कि बात
फैलने की हद तक
आते-आते रुक जाती है
क्योंकि हर बार
चन्द सुविधाओं के लालच के सामने
अभियोग की भाषा चुक जाती है।

तो मुट्ठी भी तनी रहे और कांख भी ढंकी रहे के अभ्यस्त हैं यह सारे जन । तो भी इस बिना पर लेखक बिरादरी को चुप हरगिज नहीं रहना चाहिए । लेकिन नौटंकी की जगह प्रतिरोध की सार्थक दस्तक ज़रुरी है । क्यों कि चाहिए हमें एक सुंदर समाज और सुंदर दुनिया । क्यों कि शहर अब भी एक संभावना है अशोक वाजपेयी । आप की ही एक कविता याद आती है। इस कविता के साथ ही आमीन !


मुझे चाहिए


मुझे चाहिए पूरी पृथ्वी
अपनी वनस्पतियों, समुद्रों
और लोगों से घिरी हुई,
एक छोटा-सा घर काफ़ी नहीं है।

एक खिड़की से मेरा काम नहीं चलेगा,
मुझे चाहिए पूरा का पूरा आकाश
अपने असंख्य नक्षत्रों और ग्रहों से भरा हुआ।

इस ज़रा सी लालटेन से नहीं मिटेगा
मेरा अंधेरा,
मुझे चाहिए
एक धधकता हुआ ज्वलंत सूर्य।

थोड़े से शब्दों से नहीं बना सकता
मैं कविता,
मुझे चाहिए समूची भाषा –
सारी हरीतिमा पृथ्वी की
सारी नीलिमा आकाश की
सारी लालिमा सूर्योदय की।


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1 . पाश , मान बहादुर सिंह और सफ़दर हाशमी की हत्या पर कितने लेखकों ने साहित्य अकादमी लौटाया था ?





1 comment:

  1. बारीकी से सीवन उधेडी है तर्क की जमीन पर ...नमन है लेखनी को ..

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