Monday, 30 April 2012

न लिखने को भी पाप मानते थे जैनेंद्र जी

जैनेंद्र जी बोले थे, 'मुझ से पाप हो रहा है, मैं नहीं जानता।' मैं तब किशोर था और धर्मयुग में कन्हैयालाल नंदन जी द्वारा चलाई गई उत्तेजक बहस 'पत्नी के अलावा प्रेयसी की ज़रुरत' पर जैनेंद्र जी की स्थापना अभी बासी नहीं पडी थी। जैनेंद्र जी ने कहा था कि, 'लेखक के लिए पत्नी के अतिरिक्त एक प्रेयसी भी ज़रुरी है।'

तब मैं बी. ए.का इम्तहान दे चुका था और थोड़ा बहुत लिखने-छपने लगा था। एक अखबार में छोटी सी नौकरी भी हाथ में थी। प्रेमचंद जन्म शताब्दी पर कुछ सामग्री बटोर रहा था। अमृतलाल नागर जी का स्नेह-सहयोग मिला हुआ था। नागर जी ने ही सुझाया था कि जैनेंद्र जी से भी तुम्हें मिलना चाहिए। मैं ने संकोच जताया तो नागर जी ने फ़ौरन जैनेंद्र जी को एक चिट्ठी लिख दी। चिट्ठी ले कर दिल्ली पहुंचा। शाम के समय दरियागंज पहुंचा तो उस बेदिल दिल्ली में भी दरियागंज में नेता जी मार्ग पर जो उन के घर से एक फर्लाग से कुछ ज़्यादा ही दूर था, लोग उन का घर बताने को तैयार थे। खैर उन के घर पहुंचा तो वह मिल भी गए। नागर जी की चिट्ठी थमाई तो सिमटे-सिमटे से गुरु गंभीर रहने वाले जैनेंद्र जी मुसकुरा पड़े। पर बड़ी जल्दी ही फिर अपनी खोल में समा गए। सोच कर आया था कि पत्नी-प्रेयसी प्रसंग पर नए सिरे से छेड़ूंगा। पर उन का ठंडापन देख कर सवाल भी सर्द हो गया।

कुछ देर इसी तरह चुप्पी में बीता। फिर शब्दों को जैसे नापते-थामते वह बोले,'क्या..... जानना... चाहते हैं... प्रेमचंद जी के बारे में।.... पूछिए। मैं ने उन से एक लेख लिखने की बात की तो वह उसी तरह शब्द थाम कर बोले, 'इतना कुछ लिख चुका हूं...... और इतनी बार कि उन के बारे में कि कुछ और बचा ही नहीं लिखने को। क्या लिखूं?.....कुछ पुराना छपा ही ले कर काम चला लें। या फिर बातचीत ही कर लें। कुछ निकले इस से तो निकाल लें। फिर प्रेमचंद के बाबत चार-पांच बातें पूछीं। बिलकुल घिसे-पिटे पारंपरिक ढंग से। वह बताते तो गए बडे विस्तार से। पर मुझे लगा कि वह तोता रटंत सवालों से कुछ खीझ गए हैं। पर मेरा दोष भी क्या था तब? छात्र था और अतिरिक्त उत्साह में पहुंच गया था साहित्य के उस पुरोधा के पास। वह सहृदय हजारी प्रसाद द्विवेदी नहीं थे, न ही सहज सरल अमृतलाल नागर। वह तो जैनेंद्र कुमार थे। खैर वह खीझ उन से छुपाई नहीं गई। और मुझ से भी टाली नहीं गई। शायद वह ताड़ गए। मेरा मनोविज्ञान समझ गए। बात बदल दी। कुछ नरम पड़े। छत ताकी। गलहत्था लिया और बोले, 'आप क्या लिखते हैं?' मुझ से बताया नहीं गया कुछ । संकोच फिर सवार हो गया। वही बोले, 'सारिका में पढ़ा है दो एक बार। प्रेमचंद वाला रिपोर्ताज अच्छा बन पड़ा था। लिखते रहिए।' अब मैं चलना चाह रहा था। पर बात का सिरा समाप्त नहीं हो रहा था। नागर जी और जैनेंद्र जी में यही फ़र्क था। नागर जी अनायास ही सब को अपना आत्मीय बना लेते थे और खुद सहज बने बतियाते रहते थे। आप की इच्छाएं भी पढ़ और कबूल लेते थे नागर जी। पर मनोवैज्ञानिक कथा-भूमि की समझ से लैस जैनेंद्र जी इस मामले में गरिष्ठ हो लेते थे। नागर जी से आप एक बार मिल लें तो बार-बार उन से मिलते रह सकते थे। पर जैनेंद्र जी से मिलने के बाद दुबारा मिलने के लिए कई-कई बार सोचना पड़ता था।

मैं ने जब उन के लिखने-पढ़ने की बात चलाई तो वह बड़ी देर तक चुप रहे। फिर लंबी उसांस भरी। बोले, 'इधर तो वर्षों से कुछ नहीं लिखा। ६ वर्ष से अखबारी लेखन छोड़ कर कुछ नहीं लिखा है। लेकिन अनुभव कर रहा हूं कि यह पाप हो रहा है। पाप यानी अपनी आत्मा के साथ अन्याय। जो खुल कर कर-धर विशेष नहीं सकता। उस के पास अपने साथ न्याय करने का एक ही उपाय रह जाता है। अर्थात कृति की जगह शब्द।' अब तक वह थोड़ा सहज हो फिर अपनी खोल से बाहर आ गए थे। वह बोले, ' जानते हैं आप मेरा लिखना जीने का अवसर पाने के लिए है। निश्चय के साथ कह सकता हूं कि समय पर ये लिखना न फूट आता तो मैं अब तक जीता बचा नहीं रह सकता था।'

उन दिनों लेखन में प्रतिबद्धता की आंच बड़ी तेज़ हो चली थी। इस की बात चली तो वह बोले, 'लेखन मेरे लिए व्यवसाय या प्रतिबद्धता कुछ भी नहीं है। व्यवसाय की अपनी विवशता प्रतिबद्धता हो जाती है। इसी तरह दूसरी प्रतिबद्धता भी ओढ़ी हुई चीज़ है जिसे उतार दिया जा सकता है। जिन दिनों लिखना होता था, याद कर सकता हूं नितांत सहज भाव से हुआ करता था। अब तो जो है वर्षों से नहीं लिखा है तो लगता है जीवन की सहजता नष्ट हो गई है। और मैं मानी हुई जीवन की जटिलताओं में चकरा पड़ा हूं। जैसे आर्थिक-सामाजिक-राष्ट्रीय-पारिवारिक स्थितियां मेरे लिए वास्तव बन आए हैं। जिन्हों ने मेरे आत्मिक पहलू को मेरे ही निकट गौण बना लिया है। इस दुर्घटना के चक्र में मुझ से पाप हो रहा है, मैं नहीं कह सकता।' कहते-कहते वह ज़रा खिन्न हुए। और चुप हो गए।

कुछ देर बाद बोले, 'जिजीविषा ! यही मुझ से लिखवाती रही। मैं ने पाया कि मैं सर्वथा अकेला, अमान्य किसी लायक नहीं हूं। ये बोझ मुझे बेहद दबाए रखता था। संयोग ही कहिए कि आत्मघात से बच गया। नहीं तो वह अपनी व्यर्थता का बोध सर्वथा असह्य था। उसी अवस्था में जाने क्या नीचे से बेबसी ऊपर उठती आई कि मैं ने पीले कागज़ पर पेंसिल से कुछ लकीरें खींच डालीं कुछ कल्पना न थी कि लकीरों का क्या होगा। छपने का तो सपना तक न था। पर उन्हीं पंक्तियों ने छप कर मुझे लोगों के सामने ला दिया। सच कहता हूं - इस में मेरा दोष न था। छपने की कोशिश तक मैं नहीं कर सकता था। पर छपना हो गया और मैं जी गया। क्यों कि इस विधि अपने से बाहर अलक्ष्य में एक पाठक वर्ग से जुड सका।'

बात खत्म हो गई थी।


(जैनेन्द्र कुमार के नाम अमृतलाल नागर की चिट्ठी)

Saturday, 28 April 2012

भोजपुरी फ़िल्मों के साथ एक-दो दिक्कत होती तो चल जाता : राकेश पांडेय

राकेश पांडेय सत्तर के दशक में हिंदी फ़िल्मों मे जैसे धूमकेतु की तरह आए थे। मृगतृष्णा जैसी फ़िल्मों के नायक बन कर वह आए और राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़े गए। सारा आकाश से लगा कि जैसे अब हिंदी फ़िल्मों का आकाश अब उन्हीं का है। एक गांव की कहानी में भी उन की सफलता की कहानी सब के सामने थी। पर जाने क्या हुआ कि वह अचानक बिसरने लगे। माया नगरी उन्हें किनारे लगा ही रही थी कि वह अचानक बलम परदेसिया जैसी भोजपुरी फ़िल्म के नायक बन कर छा गए। गोरकी पतरकी रे गाना गली-गली, सड़क-सड़क पर, खेत-खलिहान, मेड़, गांव, गिराव हर कहीं गाने लगे लोग, बजाने लगे लोग। लेकिन जल्दी ही यह दौर भी निकल गया। दूरदर्शन पर धारावाहिकों का दौर आ गया। राकेश पांडेय धारावाहिकों में भी सक्रिय हुए। पर जल्दी ही वह निर्माता-निर्देशक बनने की राह पर आ गए। क्या बड़ा परदा, क्या छोटा परदा दोनों ही जगह उन के अभिनय की उपस्थिति पर जैसे विराम लग गया। अब जब फिर भोजपुरी फ़िल्मों धारावाहिकों का दौर चला तो वह निर्माता-निर्देशक के साथ ही चरित्र भूमिकाओं में भी आने लगे हैं। कभी कभार हिंदी फ़िल्मों में भी वह संक्षिप्त भूमिकाओं में दिख जाते हैं, और अपनी गहरी छाप छोड़ जाते हैं। १९९१ में वह लखनऊ आए थे, फ़ैज़ाबाद और अयोध्या भी गए थे। अमृतलाल नागर के उपन्यास मानस के हंस पर तब वह मोहित थे। और उसी पर धारावाहिक बनाने की गरज से वह लखनऊ आ जा रहे थे। मानस का हंस पर धारावहिक हालां कि बाद के दिनों में खटाई में पड़ गया। पर तब वह न सिर्फ़ सक्रिय थे बल्कि एक जुनून सा उन पर सवार था मानस का हंस को ले कर। नवभारत टाइम्स के लिए दयानंद पांडेय ने उन से बात की थी तब यह बातचीत।



कोई ५०-६० से अधिक फ़िल्मों के नायक राकेश पांडेय उत्तर प्रदेश और बिहार सरकारों के भोजपुरी फिल्मों के प्रति उदासीन रवैए से बहुत दुखी, क्षुब्ध और छटपटाए हुए थे तब। राकेश पांडेय इन दिनों मानस के हंस उपन्यास पर दूरदर्शन धारावाहिक बनाने के लिए लखनऊ में लोकेशन देखने आए हैं। अमृतलाल नागर के उपन्यास मानस के हंस को चूंकि वह प्रमाणिक ढंग से बनाना चाहते हैं, इस लिए वह शूटिंग से पहले की तैयारियों में व्यस्त हैं। वह कहते हैं कि नहीं, मैं ने दूरदर्शन पर महाभारत भी देखी है और उस महाभारत में जो गंगा दिखाई गई है उस से मैं बचना चाहता हूं। मैं बंबई में अयोध्या नहीं दिखाना चाहता। मैं सचमुच की अयोध्या दिखाना चाहता हूं। प्रामाणिक ढंग से। क्या विवादित इमारत भी दिखाएंगे? जवाब देते हैं, नहीं, यह मेरा विषय नहीं है। पर सरकार अगर इजाजत देगी तो कनक भवन, सरयू, यह सब चीज़ें दिखाऊंगा। फिर वह तुलसीदास का एक छंद सुनाते हैं। ‘मैं मांग के खइबो, मासित[मस्जिद] में सोइबो/ लेबो के एक न देबो के दो।’ वह कहते हैं कवितावली में उन का यह छंद आंखें खोलने वाला है। फिर वह बताते हैं कि अमृतलाल नागर जी का चौक स्थित मकान भी शूट करूंगा। फिर वह जैसे जगते हैं ‘राम मंदिर की भी शूटिंग करूंगा, अगर सरकार इज़ाज़त दे दे।’

‘और जो दूरदर्शन इस फेर में आप का सीरियल रद्द कर दे इस बिना पर तो?’

वह बोले, ‘मैं तो आशान्वित हूं कि मानस का हंस इतने बड़े लेखक की रचना दूरदर्शन रिजेक्ट नहीं करेगा। यह टोकने पर कि, ‘अगर रिजेक्ट फिर भी हो गया तो?’ उन का कहना था, ‘मैं ने यह मान कर भी आवेदन नहीं किया कि रिफ्यूज नहीं होगा।’


‘तो क्या बड़े लेखक का नाम भुनाना चाहते हैं आप?’

‘नहीं, ऐसी बात भी नहीं है। 1975 में एक गांव की कहानी की शूटिंग के दौरान सी एस दुबे ने मानस का हंस पढ़ने को दिया था। तब से यह उपन्यास मेरे दिमाग में था। मैं मानस का हंस पर फ़िल्म बनाना चाहता था, पर फ़िल्म चूंकि बड़ा ग्लैमर मांगता है और कठिन भी है तो मैं ने टी.वी. सीरियल की सोची।

राकेश पांडेय मूल रूप से बनारस के रामनगर के निवासी हैं, पर वह पले बढ़े और बी.ए. तक पढ़े शिमला में। अब वह बंबई में रहते हैं, पर उन की ढेर सारी रिश्तेदारियां उत्तर प्रदेश में ही है। जैसे कि उन की एक बहन यहीं लखनऊ में हेवलक रोड पर रहती हैं। ढेरों भोजपुरी और हिंदी फ़िल्मों में अभिनय कर चुके राकेश पांडेय की पहली फ़िल्म आंसू बन गए फूल थी। सारा आकाश, मृगतृष्णा, एक गांव की कहानी, बलम परदेशिया, भईया दूज आदि उन की महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं। इस के अलावा गुजराती और नेपाली फ़िल्मों में भी उन्हों ने काम किया है। बंसुरिया बाजे गंगा तीर तथा तुलसी सोहे हमार अंगना जैसी भोजपुरी फ़िल्मों का निर्देशन भी राकेश पांडेय ने किया है।

भोजपुरी फ़िल्मों की दरिद्रता की बात चली तो राकेश पांडेय बिलबिला गए। कहने लगे ‘भोजपुरी फ़िल्मों के साथ एक-दो दिक्कत होती तो चल जाता। यहां तो दिक्कतें ही दिक्कतें हैं। कोई थाह नहीं है इन की। भोजपुरी दर्शकों का अपनी भाषा के प्रति सम्मान नहीं है तो सरकारों को भी इस की परवाह नहीं है।’ कहते हुए वह जैसे छटपटाने लगते हैं, ‘हालत यह है कि भोजपुरी दर्शक पहले अमिताभ बच्चन की फ़िल्म देखता है फिर समय मिला तो खुली खिड़की टाइप दक्षिण की फ़िल्म देखेगा। अंग्रेजी फ़िल्में देखेगा, भोजपुरी फ़िल्में देखने को उस के पास समय नहीं है, जब कि बाकी क्षेत्रीय भाषाओं की फ़िल्मों के साथ ऐसा नहीं है। वह जोड़ते हैं, नहीं एम.जी. रामचंद्रन बतौर अभिनेता मुझे कभी अच्छे नहीं लगे, पर उन के दर्शक उन्हें पूजते हैं। वह दर्शक पहले रामचंद्रन की फ़िल्म देखेगा, फिर अमिताभ या किसी और की फ़िल्म।‘

राकेश पांडेय बताते हैं कि, ‘वहां की सरकारें भी उदार हैं। वह गुजराती और मराठी फ़िल्मों का ज़िक्र करते हैं कि ज़्यादातर उन फ़िल्मों पर मनोरंजन कर वहां माफ होता है। अगर लगता भी है तो वह पैसा उन के नाम पर जमा रहता है। दूसरी फ़िल्म बनाने खातिर उन्हें वह पैसा फिर मिल जाता है। इस तरह टिकट का पैसा कम रहने पर दर्शक और पैसा दोनों ही उन फ़िल्मों को मिल जाते हैं। यहां भोजपुरी फ़िल्मों के साथ ऐसा नहीं है। एक तो बिहार और उत्तर प्रदेश दोनों ही जगह गरीबी है। सिनेमा लोगों की जेब से दूर हो रहा है। समय नहीं है। टिकट महंगा है। सरकार अगर सिर्फ़ छह महीने ही भोजपुरी फ़िल्मों को मनोरंजन कर से मुक्ति दिला दे तो देखिए भोजपुरी फ़िल्मों का नक्शा बदल जाए। दुर्दशा से छुट्टी मिल जाए। पर इन दोनों सरकारों को भोजपुरी फ़िल्मों की चिंता नहीं है। तो भोजपुरी फ़िल्मों की दरिद्रता दूर करने का ठेका सिर्फ़ कलाकारों, निर्माता, निर्देशकों के ही जिम्मे क्यों डाल देना चाहते हैं आप?’ वह पूछते हैं।

राकेश कहते हैं, मैं तो गोदान पर फिल्म बनाना चाहता हूं, लेकिन डर है कि गोदान जैसी बड़ी कृति को लोग कहीं नकार न दें।’ वह बताते हैं कि, ‘भोजपुरी फ़िल्मों के साथ एक दिक्कत यह भी है कि कम पैसे में बनीं और चल गई तो लोगों को लगता है कि हम भी क्यों न भोजपुरी फिल्म बनाएं। सो, 50-60 फिल्में भोजपुरी में बनने लगती है। फिर सब पिट जाती हैं।’ वह बताते हैं कि, ‘बलम परदेसिया के बाद यही हुआ और बलम परदेसिया भी चल गई तो इस लिए कि काफी समय बाद कोई भोजपुरी फ़िल्म आई थी। विदेसिया के बाद सब से कामयाब हिट भोजपुरी फ़िल्मों में बलम परदेसिया ही है।’ वह जैसे जोड़ते हैं, ‘नहीं, बंसुरिया बाजे गंगा तीर मैं ने लीक से हट कर बनाई। गंगा को जितनी खूबसूरती से एक्सप्लायट कर सकता था, किया। पर फ़िल्म पिट गई। कैसे बनाऊं, अच्छी फ़िल्म? वह पूछते हैं।’

यह कहने पर कि, ‘बात यह नहीं। भोजपुरी फ़िल्मों के नकलीपन पर, भोजपुरी परिवेश से उन के दूर होते जाने, उस की संवेदना और शिल्प को न समझ, सतही चीज़ों को दरिद्र ढंग से फ़िल्माने की बात मैं कर रहा था कि आज के गांवों से कोसों दूर क्यों हैं भोजपुरी फ़िल्में? आज के भोजपुरी समाज की धड़कन क्यों नहीं धड़कती है हमारी भोजपुरी फिल्मों में। बिलकुल नकली और सच से इतर क्यों बनती हैं यह फ़िल्में? ’ जैसे सवालों को राकेश पांडेय फ़ार्मूला फ़िल्म और बाक्स आफ़िस की मजबूरियां बता कर टाल गए।

हिंदी फ़िल्मों में भी नौकरों की ही भाषा क्यों होती है भोजपुरी? जैसे सवालों को भी राकेश पांडेय ने इधर-उधर की बातों में सुलटा दिया। हिंदी फ़िल्मों में उन के काम की बात चली तो वह कहने लगे, ‘हिंदी फिल्मों से अलग हूं आजकल। भोजपुरी फ़िल्मों का ही इतना काम है कि हिंदी फ़िल्मों के लिए वक्त नहीं निकाल पाता। दूसरे हिंदी फ़िल्मों में अब बदलाव भी बहुत आ गया है। मैं वहां अपने को फिट नहीं पाता।

‘फ़िल्म में आप नहीं होते तो क्या होते?’ पूछने पर वह बोले, ‘सोचा ही नहीं, कभी कि क्या होते।’

Thursday, 26 April 2012

ज़रा सी लोकप्रियता और पैसे के लिए मैं कैसे अपनी थाती गवां दूं : शारदा सिनहा

‘हम त मंगली, आजन-बाजन, सिंहा काहें लवले रे/ खींचब तोर दाढी, बंदूक काहें लवले रे ! ’ जैसे सदाबहार गीतों से आज भी डंका बजाने वाली शारदा सिनहा अब भोजपुरी गायकी का मान और सम्मान हैं। पर इतनी आसानी से उन्हों ने यह सब अर्जित नहीं किया है। इस के पीछे उन का अनथक संघर्ष तो है ही, कभी गायिका में न झुकने का गर्व भी है। बात-बात में आज के कलाकार ऐसे झुक जाते हैं, इतने समझौते कर जाते हैं कि कई बार लगता है कि क्या वह भोजपुरी ही गा रहे हैं? या कुछ और? ऐसे-ऐसे वीभत्स गाने भोजपुरी के नाम पर अब चस्पा हैं। जिसे एक से एक स्वनामधन्य गायक गा रहे हैं। रीढ तो यह सारे गायक गंवा ही चुके हैं, लगता है बोनलेस भी हो चुके हैं। पैसे की भूख और कैसेट तथा सी डी कंपनियों की लालच ने भोजपुरी गायकी को जैसे बर्बाद कर दिया है। पर शारदा सिनहा इन सब में न सिर्फ़ अलग हैं, बल्कि भोजपुरी गायकी के साथ कभी समझौते नहीं किए। अपनी और गायकी दोनों की रीढ बचा कर रखी। वह कहती ही हैं कि बताइए ज़रा सी लोकप्रियता और पैसे के लिए मैं कैसे अपनी थाती गवां दूं ? हमने जो कमाया है उसे कैसे लात मार दूं ?
एक समय जब भोजपुरी पर पॉप मुजिक सवार था तब शारदा सिनहा से मैं ने पूछा था भोजपुरी में पॉप म्युजिक के बाबत। तो वह बोलीं, ‘भोजपुरी एतना मीठ भाषा बा ऊ पॉप में कहां समाई?’
‘मैंने प्यार किया’ के एक गाने से प्रसिद्धि का शिखर छूने वाली लोक गायिका शारदा सिनहा भोजपुरी गानों को पॉप में इस्तेमाल करने से खासी दुखी हैं। वह भोजपुरी को पॉप में नहीं देखना चाहतीं। शारदा सिनहा बोलीं, ‘भोजपुरी एतना मीठ भाषा बा, ऊ पॉप में कहां समाई? सोहर, कजरी, विदागीत या शोकगीत कैसे पॉप कर देंगे आप?’
शारदा सिनहा का गाया एक गाना प्रकाश झा की फिल्म ‘मृत्युदंड’ में आया था। ‘मृत्युदंड’ में शारदा सिनहा का गाया गीत, ‘गुप चुप सोचेली दुल्हनिया’, गीत शबाना आजमी पर फिल्माया गया है जिसमें वह माधुरी दीक्षित को बतौर बहु ‘रिसीव’ करती हैं। यह गीत योगेश ने लिखा है। शारदा सिनहा हिंदी, भोजपुरी के अलावा मगही, वज्जिका और मैथिली भाषाओं में भी गाती हैं। मैथिली उनकी मातृभाषा है। फिर भी भोजपुरी गाने उन्हों न सबसे ज्यादा गाए हैं। भोजपुरी के सी डी, कैसेट भी उन के सर्वाधिक हैं।
शारदा सिनहा बचपन से ही गाती आ रहीं हैं पर बकायदा वह 1971 से गाने लगीं। जब वह अंगरेजी से एम ए कर रही थीं तब तक उन के गानों के रिकार्ड बाजार में आ कर बजने लगे थे। अभी वह वीमेंस कॉलेज समस्तीपुर में संगीत की प्रोफेसर हैं। अब रिटायर होने वाली हैं। बात ही बात में वह बताने लगीं कि पति से झगड़ा इस बात पर नहीं होता कि मैं गाती बजाती क्यों हूँ। बल्कि इस बात पर होता है कि ‘क्या दाल नमक में पड़ी हो चलो रियाज करो।’ फिर वह ससुराल के बीते दिन याद करती हैं और कहती हैं कि कैसे सास ने मेरे गाने पर आपत्ति की थी। कहा था कि बहू कैसे गाएगी? तो ससुर ने सास को यह कह कर मनाया था कि भगवान ने उस को आवाज़ दी है, कला दी है, गाने के लिए रोटी बेलने के लिए नहीं। और जैसे तैसे सास मान गईं थीं। वह फिर बीते दिनों को याद करती हैं कि कैसे वह आकाशवाणी दरभंगा की कलाकार बनी थीं और फिर ‘जगदंबा दियना बार अइली हे’, पर 1979 में एच.एम.वी ने वर्ष का सर्वोतम पुरस्कार दिया।
फिर ‘ए ट्रिब्युट टू मैथिल कोकिल विद्यापति’ एच एम वी ने निकाला। शारदा सिनहा को विदेशो तक पहुंचाया। इस में पंडित नरेंद्र शर्मा की लिखी कमेंट्री है।
शारदा सिनहा बताती हैं कि, इस के बाद ‘केकरा से कहां मिले जाला’ , 1985 में सुपर कैसेट्स ने रिलीज किया तो हर कोई हमसे ‘केकरा से’ की ही या इसी तरह का कुछ मांगने सुनने लगा। फिर ‘कोयल बिन बगिया ना सोहे राजा’ और ‘पनिया के जहाज से पलटनिया बनी अइह पिया, लेले अइह हो पिया सेनुरा बंगाल के।’ गानों ने भी धूम मचाई। यह 1988 की बात है मॉरीशस गईं तो लोग ये गाने सुन-सुन झूम उठे। फिर ‘पटना से बैदा बोलाई द, नजरा गइली गोइयां’ गीत भी ‘माई’ फ़िल्म का खूब मशहूर हुआ। भिखारी ठाकुर के गीतों की बात चली तो वह कहने लगीं, ‘मैं तो सब गाना चाहती हूं, कुछ गा भी रही हूं। पर जिन लोगों के पास भिखारी ठाकुर के गीत या और भोजपुरी के पारंपरिक गीत हैं वह दो दो लाख गीत के मांगने लगते हैं। तो हम कहां से देंगे इतना पैसा?’ ‘का देके शिव के मनाई हो शिव मानत नाहीं’ जैसे गीत गाने वाली और लत की हद तक हरदम पान चबाने वाली शारदा सिनहा का प्रिय वाद्य बांसुरी है। वह कहती हैं, ‘रियाज से ज्यादा सुनती हूँ।’ पद्म श्री, मिथिला विभूति, अंतरराष्ट्रीय भिखारी ठाकुर सम्मान जैसे ढेरों सम्मान और पुरस्कारों से पुरस्कृत शारदा सिनहा अब भोजपुरी गायकी का वह प्रतिमान हैं जिसे अब कोई दूसरा शायद ही रच पाए। आने वाले दिनों में दूरदर्शन के कार्यक्रमों संगीत सितारे, मिर्च मसाला और बॉलिवुड रिपोर्टर में भी दिखेंगी। १९९६ में शारदा सिनहा अवध फिल्म्स द्वारा बनाए जा रहे भोजपुरी के पहले धारावाहिक हमरी सांची पिरितिया के गानों की रेकार्डिंग खातिर तब लखनऊ आईं थीं, जब यह बातचीत दयानंद पांडेय ने राष्ट्रीय सहारा के लिए की , पेश है बातचीत:


दलेर मेहंदी जैसे आज के मशहूर गायक भोजपुरी को भी पॉप में ढाल कर अंतरराष्ट्रीय मान्यता दिलाने की बात कर रहे हैं। आप की क्या राय है?

भोजपुरी को आप पॉप में कैसे ढाल देंगे? कम से कम मैं भोजपुरी को पॉप में नहीं देखना चाहती। भोजपुरी एतना मीठ भाषा बा, ऊ पॉप में कहां समाई। सोहर, कजरी, विदा गीत या शोक गीत को कइसे पॉप कर देंगे आप? यह दलेर मेहंदी से पूछिए आप।

क्या आप को पॉप का ऑफर नहीं मिला?

-खूब मिला है। मेरा कहना है कि दो लाइन है। रास्ता अलग अलग है। हमसे तो बहुत लोग कहते हैं कि मुंबई में रह जाइए। पर नहीं रहते।

क्यों?

- सपरिवार रहने की व्यवस्था नहीं कर सकती। बच्चे पढ़ रहे हैं। नौकरी है। फिर वहां जा कर मैं परिवार की नहीं रह पाऊंगी। फिर अपनी निजता, अपनी ओरिजनलटी भूल जाएंगे तो क्या फायदा? मैं तो लोकभाषा के प्रचार प्रसार को समर्पित हूँ। इसे अक्षुण्ण करने में एक यूनिट बन सकूं तो ज़िंदगी सार्थक समझूंगी।

बात पॉप के ऑफर की पूछी थी। आप ने बताया नहीं?

- कहा तो कि खूब ऑफर मिले। आज भी मिलते हैं। हम को बहुत लोग कहते हैं कि आप की आवाज़ गज़ब की है। मिठास बहुत है बस थोड़ा सा ‘ट्रेंड’ बदल दीजिए तो क्या से क्या कर दें। यह सब सुन कर डर जाती हूँ। लोग कहते हैं कि आप ज़रा सा इशारा कर दीजिए तो क्या से क्या बना दें। पर बताइए ज़रा सी लोकप्रियता और पैसे के लिए मैं कैसे अपनी थाती गवां दूं ? हमने जो कमाया है उसे कैसे लात मार दूं ? एक ही काम आदमी करे अच्छा करे वही ठीक है। लोक गीतों के प्रति मैं समर्पित हूं। जो काम कर रही हूं तो चाहती हूं कि काम भी पहुंचे और नाम भी पहुंचे, हम भी क्षितिज पर रहें।

‘मैंने प्यार किया’ के एक गाने से सफलता की, प्रसिद्धि का जो शिखर आप ने छुआ, उसे फिर दुहरा नहीं पाई आप?

- ऐसे लोग कम होते हैं कि एक किया, दूसरा किया। ऐसा तो राजश्री वाले करते नहीं। हम भी नहीं करते। और फिर हम इस को व्यक्तिगत रूप से असफलता नहीं मानते कि गाया और अंबार लग गया। ऐसा नहीं हुआ मेरे साथ यह भी सही है। शायद इस लिए भी कि नौकरी छोड़ कर मुंबई जा कर नहीं रह पाती। मुंबई में होते तो यह बात नहीं होती। अब तो यह है कि किसी को कोई खास चीज़ चाहिए तो बुलाता है, चली जाती हूँ। रूटीन में नहीं हूं मैं मुंबई में।

राजश्री की ही फ़िल्म ‘हम आप के हैं कौन’ में भी आप ने एक गीत गाया है पर ‘मैंने प्यार किया’ जैसा पता नहीं देता वह गीत। क्यों?

- ‘मैंने प्यार किया’ का गीत ‘मैं तोहरी सजनिया’ असद भोपाली ने लिखा ज़रूर है पर मूलत: यह भोजपुरी लोकगीत है। वह गाना भी मशहूर है और संयोग से उसे भी बहुत पहले मैं ने ही गाया था। गाने के बोल हैं ‘कछुवो न बोलब चाहे कौनो सजा द, कइली का कसूर तनी एतना बता द।’ खइली बड़ा धोखा कैसेट में यह गाना है। राजश्री प्रोडक्शन को यह गाना पसंद आया तो उन्हों ने उसी धुन पर असद भोपाली से गाना लिखवाया और मुझ से ही गवाया।

आप की इस मोटी आवाज़ में जो खनक और गमक है वह अनायास ही है या सायास? या आप रियाज से साधती हैं, इसे?

नहीं अनायास ही है। यह तो प्राकृतिक है और बचपन से है। यही मेरा प्लस प्वाइंट है। यह मेरी पहचान है। रियाज तो मैं चार घंटे रोज ही करती हूँ। पर व्यस्तता में काम काज में कभी छूट भी जाता है।

भोजपुरी लोकगायक ‘आखिर सजनियां’, ‘गोइयां’ से आगे की बात क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? तब जब कि भोजपुरी में पारंपरिक गीतों का भारी भंडार है।

इस लिए कि लोग त्वरित पैसा बनाने में लगे हैं। मुंबई के लोगों से भोजपुरी गवाया जाएगा तो वह भोजपुरी ‘टच’ कहां से दे पाएंगे, सस्ते गाने जल्दी बिना मेहनत के आनन फानन रिकार्ड हो जाते हैं, वहीं मुंबई में तो क्या होगा। भोजपुरी गाने वाले बिहार में हैं, उत्तर प्रदेश में हैं। इन्हें कोई पूछता ही नहीं। कौन ढूंढे और कौन बुलाए? और बुलाएंगे भी तो एक एक लाइन इधर उधर की जोड़ कर भोजपुरी फोक को पॉप म्यूजिक में गाने के लिए।

आप की गायिकी की रेंज बहुत छोटी है और आप के गाए ढेर सारे गीत लगभग एक ही स्टाइल में क्यों हैं?

- ऐसा तो नहीं है।( फिर वह इसे सिद्ध करने के लिए अपने गाए कुछ गीत बारी बारी सुनाती हैं।)

आप युगल गीत क्यों नहीं गातीं?

- क्योंकि मेरी पहचान में वह शुमार नहीं है। कभी कभार की बात और है। पर मुझे लगता है कि मैं एकल ही के लिए बनी हूं। हां, मेरी बेटी वंदना अब कभी कभी मेरे साथ गाने लगी है। वैसे ‘बोल बम’ डाक्यूमेंट्री में एक गीत सुरेश वाडेकर के साथ गाया था। फिर वह जैसे याद करती हैं - बहुत पहले पति के साथ गाती थी। बच्चन जी के ‘सोनमछरी’ गीत की वह याद करती हैं और बताती हैं, मेरे पति बड़ा तन्मय हो कर गाते थे। अब तो वह मुंगेर में जिला शिक्षा अधीक्षक से रिटायर हैं।

आप अध्यपिका हैं। अध्यापन और कार्यक्रम दोनों एक साथ निभाने में नुकसान ज़्यादा किस का होता है?

- अध्यापन और कार्यक्रम दोनों ही मेरे लिए श्रृंगार हैं। और व्यस्तता में दोनों ही सफर करते हैं।

छूट्टी मिल जाती है, स्कूल से कार्यक्रमों के लिए?

- बिहार के लिए चूंकि मैं अकेली हूं। इस लिए ज़्यादा असुविधा नहीं होती कालेज से छुट्टी मिलने में।

Sunday, 22 April 2012

सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल

भारत भूमि जिन्हें बार-बार पुकारती है

स्वीडन की रॉयल अकादमी ने जब साहित्य का नॉबेल पुरस्कार सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल को देने की घोषणा की, तो भारतीयों को यह सुखद लगा था। इस लिए भी की श्री नायपाल भारतीय मूल के दूसरे ऐसे लेखक हैं जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। इस के पहले 1913 में गीतांजलि के लिए रवींद्र नाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार दिया गया था। श्री नायपाल को 10 लाख डॉलर पुरस्कार राशि के तौर पर मिला।

भारतीय मूल के श्री नायपाल अंगरेजी में अपने अनूठे गद्य के लिए विख्यात हैं। जैसे किसी को फटे हुए कुर्ते को बार-बार सिलना पड़ता है शायद ठीक वैसी ही विवशता जीते हुए नायपाल भारत भूमि पर लौटते हैं अपनी रचनाओं में। शायद अपनी पुरखों को हेरने, अपनी विरासत को टटोलने। यहां की तकलीफ यहां का अंधेरा, यहां की यातना उन्हें तोड़ती है, उन की पैतृक विरासत यहां से उन्हें जोड़ती है तो वह लिखते हैं ‘ऐन एरिया ऑफ डार्कनेस!’ वह और आगे बढ़ते हैं तो ‘इंडिया: ए वुंडेड सिविलाइजेशन’ लिखते हैं।

‘ए हाउस फॉर मिस्टर विश्वास’ में वह पहले ही अपने पत्रकार लेखक पिता की यातना लिख कर औपन्यासिक दुनिया में अपना प्रताप दिखा चुके थे। ‘इंडिया: ए मिलियन म्युटिनीज नाऊ’ में भी वह भारत-भूमि में अपने पितामह की तकलीफों का तार छूते दीखते हैं। ‘हाफ ए लाइफ’ में भी वह अपने पुरखों-पुजारियों की त्रासदी और उन का तनाव तंबू तानते हैं। तो शायद इस लिए कि उन के पुरखे मंदिर के पुजारी थे और अब वह कलम के पुजारी। दरअसल सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल उन विरले लेखकों में हैं जो अपनी जड़ों को भूल कर भी नहीं भूलते, न सिर्फ नहीं भूलते बल्कि बार-बार अपनी रचनाओं में उन जड़ों को जोड़ते हैं। वह रचनाओं में ही नहीं वास्तव में भी भारत आते रहते हैं। भले ही रचनाओं की तरह हरदम नहीं, कभी कभार ही सही पर आते तो हैं। और गोरखपुर के अपने उस गांव भी जाते हैं जहां से उन के बाबा त्रिनिदाद गए थे। फिर वहीं बस गए। विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल अपने नाम के आगे जो नायपाल लिखते हैं, यह नायपाल कोई जाति नहीं है, कोई उपनाम भी नहीं है। जाति से तो वह ब्राह्मणों में दुबे हैं।(हालां कि खुशवंत सिंह ने तो अपनी कलम से उन्हें पांडेय लिखा है।) और यह नायपाल तो त्रिनिदाद की उस सड़क का नाम है जहां नायपाल कभी अपने पिता के साथ रहते थे। बाद में तो वह यायावर हो गए लेकिन नायपाल रोड वह नहीं भूले। नाम के साथ जोड़े रहे। और अपने नाम के पहले जो सर लिखते हैं यह उपाधि 1990 में उन्हें ब्रिटेन ने उन्हें दी। वह ब्रिटेन जिस के लिए वह कहते हैं कि, ‘ब्रिटेन दोयम दर्जे के नागरिकों का देश है।’ अब तो वह यायावरी लगभग बिसार कर अपनी पाकिस्तानी पत्नी नादिरा के साथ इंगलैंड के पश्चिम में बसे विल्टशायर में रहते हैं। और अंगरेजी में बेहतरीन गद्य लिखने का सिलसिला यायावरी से ले कर उपन्यास तक चलाए हुए हैं।

बेहतरीन अंगरेजी गद्य के लिए जाने जाने और भव्य एकांत का लेखक माने जाने वाले सर विद्याधर सूरज प्रसाद नायपाल अपनी जड़ों से कितना गहरे जुड़े हुए हैं, गोरखपुर का वह गांव उन में अभी तक कैसे जीवित है उस की थाह आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वह अंगरेजी के बाद सीधे भोजपुरी ही बोलते हैं, हिंदी वह जानते ही नहीं। कई बार लोग कहते हैं कि नायपाल के यहां भारत के प्रति हिकारत है। खास कर नायपाल की पहली दो किताबों में। पर नायपाल कहते हैं, ‘वह हिकारत नहीं थी। एक निजी वेदना थी।’ आलोचकों की राय में ‘एन एरिया ऑफ डार्कनेस’ तथा ‘इंडिया: ए वुंडेड सिविलाइजेशन’ में भारत के प्रति बड़ी हिकारत है। हां, ‘इंडिया: ए मिलियन म्युनिटीज नाऊ’ में भारत के प्रति नायपाल का नकारात्मक स्वर कुछ नरम पड़ता है। 1998 में जब नायपाल भारत आए थे तब हिंदी फ़िल्मों के सुपरिचित निर्देशक श्याम बेनेगल, पत्रकार राहुल सिंह तथा संबीत बाल ने उन से एक लंबी बातचीत की थी। इस बातचीत में नायपाल से उन की पहले की दोनों किताबों में भारत के प्रति उन की हिकारत पर भी सवाल पूछा गया था। तब नायपाल बोले थे, ‘वह हिकारत नहीं थी। एक निजी वेदना थी।’ यह वेदना ही शायद उन्हें अभी तक दुनिया भर में ‘आउटसाइडर’ बनाए हुई है। वह मानते हैं कि उन का कोई देश नहीं है। नायपाल का अपनी जड़ों से उखड़ना ही अंशत: उन के जीनियस होने का श्रोत है। ऐसा श्याम बेनेगल कहते हैं।

लेकिन फिर भी विस्थापित होने का दंश और इस की कैफ़ियत अगर किसी को जाननी हो तो वह नायपाल से पूछे। वह दुनिया भर घूमे हैं, घर तलाशा है, पर घर उन्हें नहीं मिला है। वह ‘आउटसाइडर’ ही बने रहे हैं। उन के उपन्यास ‘हाफ ए लाइफ’ पर गौर करें तो उन की इस तकलीफ के बीज पसरे मिलते हैं, ‘मुझे ज़रूर लौटना चाहिए, हम पुजारियों के वंश से हैं, हम एक खास मंदिर से जुड़े हुए थे, मैं नहीं जानता कि उस मंदिर का निर्माण कब हुआ, उसे किस राजा ने बनवाया या कब से हम इस से जुड़े हुए हैं, हम लोगों को इन सब के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। हम मंदिर के पुजारी थे और हमारा परिवार इतना बड़ा हो गया था जितना एक समुदाय का आकार होता है। एक समय, मुझे ऐसा लगता है, हमारा समुदाय काफी धनी और समृद्ध था। लोग कई तरह से हमारी सेवा करते थे। लेकिन जब मुसलमान जीत गए तो हम गरीब बन गए। जिन लोगों की हमने सेवा की वे अब हमें सहारा नहीं दे सकते थे। अंगरेजों के आने के बाद स्थितियां और बदतर हो गईं। तब कानून का राज तो था मगर जनसंख्या बढ़ गई। मंदिर के हमारे समुदाय में हम भी अनेक लोग थे। यही मेरे दादा ने मुझे बताया था। समुदाय के सारे पेचीदा नियम तो कायम थे पर खाने को बहुत कम था। लोग दुबले, कमज़ोर और बीमार पड़ने लगे। हमारे पुजारियों के समुदाय के लोगों की कैसी नियति थी! मैं 1890 के दौर के बारे में अपने दादा की इन कहानियों को सुनना पसंद नहीं करता था।’

और शायद इसी लिए अभी अपने विस्थापित होने का कारण वह भूल नहीं पाते और इस विस्थापित होने की नींव भारत पर मुगलों के आक्रमण और मंदिरों को लूटने, मूर्तियों को तोड़ने में वह देखते हैं, वह इतिहास उन्हें सालता है। वह इस्लाम के नाम पर हुए ज़ुल्म को बेपर्दा करते हैं। इस ज़ुल्म को बेपर्दा करने में वह विवादित हो इस्लाम विरोधी होने का फतवा भुगतने को विवश हो जाते हैं। तो भी नायपाल लिखते हैं, ‘भारत में कला और इतिहास की किताबें लिखने वालों ने इस्लामी आक्रमण के इतिहास को सही नहीं लिखा है।’ वह लिखते हैं, ‘भारत में कला और इतिहास लिखने वालों का मानना है कि मुसलमान पर्यटकों की तरह भारत आए और लौट गए। इस बारे में मुसलमानों के अपने विचार सच के ज्यादा करीब हैं। मुसलमान मानते हैं कि मुस्लिम आक्रमण के दौरान मुसलमानों ने अपनी आस्था का प्रचार किया, मूर्तियां और मंदिर तोड़े, लूटपाट की और स्थानीय लोगों को दास बना कर रखा।’

एक इंटरवयू में नायपाल कहते हैं, ‘मेरे विचार से भारतीय मुसलमानों को भी इतिहास की जानकारी होनी चाहिए और वास्तव में सीमा पार के लोग इतिहास खूब समझते हैं। वे इस पर बड़ी बातें भी करते हैं। फिर क्यों वे ऐसा जताते हैं कि भारतवर्ष या उस से जुड़े इतिहास का कोई अस्तित्व ही नहीं है। यह कैसा विरोधाभास है। उन के यहां छोटी कक्षाओं में पढ़ाया जाता है कि हमने हमले किए, लूटमार की और तबाही मचाई। हमने मूर्तियां तोड़ीं और ढेरों मंदिर गिराए। यकीनन ये ज़मीन हमारी है। पाकिस्तान का आज भी यह सपना है कि किसी दिन इस्लामी प्रभुत्व स्थापित होगा और दिल्ली की जामा मस्जिद में जो अजान होगी वह पाकिस्तान तक सुनाई देगी।’ पर दिक्कत यह है कि वह सच की नस पकड़ते हैं तो विवादित हो इस्लाम विरोधी कह दिए जाते हैं। हालां कि भारत पर ईसाइयत के हमले को भी वह नुकसानदेह मानते हैं लेकिन वह कहते हैं, ‘ईसाइयत के हमले ने भारत को जितना नुकसान पहुंचाया है उस से कहीं ज़्यादा नुकसान इस्लाम ने पहुंचाया है।’

खैर अभी तो वह एक साथ दो उपन्यासों की योजना बनाए हुए हैं जिस में एक आत्मकथात्मक है और दूसरा इंगलैंड पर आधारित है। उन से एक इंटरव्यू में पूछा गया कि, ‘आत्मकथात्मक उपन्यास पर लोगों से कैसी प्रतिक्रिया की अपेक्षा रखते हैं?’ जानते हैं वह क्या बोले? वह बोले, ‘यह बिलकुल निजी उपन्यास है, जिस पर किसी दूसरे की प्रतिक्रिया मेरे लिए बेमानी है।’ यह बेलौस और बेबाक बात नायपाल ही कह सकते हैं।

Friday, 20 April 2012

गीत-1

-1-

गीत
बंसवाड़ी में बांस नहीं है
चेहरे पर अब मांस नहीं है
कैसे दिन की दूरी नापें
पांवों पर विश्वास नहीं है।


इन की उन की अंगुली चाटी
दोपहरी की कतरन काटी
उमड़-घुमड़ सपने बौराए
जैसे कोड़ें बंजर माटी
ज़ज़्बाती मसलों पर अब तो
कतरा भर विश्वास नहीं है।


शाम गुज़ारी तनहाई में
पूंछ डुलाई बेगारी में
सपनों बीच तिलस्म संजोए
पहुंचे अपनी फुलवारी में
फीके-फीके सारे झुरमुट
अंगुल भर उल्लास नहीं है।

[नया प्रतीक, मई, १९७८ में प्रकाशित]

Wednesday, 18 April 2012

देवदास होना कोई हंसी खेल नहीं : दिलीप कुमार

दिलीप कुमार से मिलना और बतियाना दोनों ही बहुत रोमांचकारी नहीं ही होता। होता तकलीफ़देह ही है। वह बहुत मुश्किल से मिलते हैं और बात भी बेरुखी से करते हैं। तिस पर कलफ़ लगी उर्दू या अंगरेजी में। और दोस्ताना या मिलनसार रवैया तो उन का हरगिज़ नहीं होता। जाने कैसे डाइरेक्टर लोग उन से फ़िल्मों मे काम लिए होंगे। हां अभिनेता वह बहुत बडे हैं। अमिताभ बच्चन या शाहरुख खान जैसे लोग उन के अभिनय के आगे न सिर्फ़ पानी भरते हैं बल्कि जब-तब, जाने-अनजाने उन की नकल भी करते ही रहते हैं। दिलीप कुमार अपने आप में अभिनय का एक पूरा स्कूल हैं। उन्हों ने बरसों पहले एक फ़िल्म भी डाइरेक्ट की कलिंगा। पर आज तक उस ने रिलीज का मुंह नहीं देखा तो नहीं देखा। तमाम-तमाम विवाद उस पर सवार रहे। खैर दिलीप कुमार एक बार मिल गए उत्तर प्रदेश के हरदोई ज़िले की एक तहसील शाहाबाद में। वही शाहाबाद जहां के आमीर खान मूल निवासी हैं और कि अभी भी उन का घर दुआर वहां है। दिलीप कुमार तब शाहाबाद आए थे एक डिग्री कालेज के शिलान्यास और भोजपुरी में बनने वाले पहले धारावाहिक सांची पिरितिया का मुहूर्त शाट देने। तब १९९६ की सर्दियों के दिन थे। तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी भी तब उन के साथ थे और मंच साझा किया था। खैर तभी दयानंद पांडेय ने दिलीप कुमार से राष्ट्रीय सहारा के लिए बात की थी। बात सियासत से फ़िल्म तक हुई थी, जो आज भी मौजू है।


डाक बंगले में वह ठहरे थे। जब उन से मैं ने इंटरव्यू की बात कही, अपना परिचय दिया और अपने पुराने संपादक जो कभी माधुरी के संपादक रहे थे, अरविंद कुमार का हवाला दिया तो ‘अच्छा-अच्छा।’ कहते हुए उन्हों ने माथे पर बल डाला। बोले, ‘बैठिए!’ मैं उन के बगल वाले सोफे पर जिस का मुंह उनकी ओर था उस पर धप्प से बैठ गया। मेरे वहां बैठते ही दिलीप कुमार ने मुझे फिर तरेरा और थोड़ा तल्ख़ हो कर उंगली दिखाते हुए बोले, ‘यहां से उठ जाइए।’ उन्हों ने जोड़ा, ‘यहां जॉनी वाकर साहब बैठेंगे।’ वह बोले, ‘इधर तशरीफ लाइए!’

‘सॉरी!’ कह कर मैं चुपचाप उन की बताई जगह बैठ गया। अभी कुछ बोलता पूछता कि वह ख़ुद शुरू हो गए, ‘देखिए जनाब इंटरव्यू वगैरह के लिए तो मेरे पास वक्त नहीं है। मैं बहुत थका हुआ हूं।’ वह बोलते जा रहे थे, ‘मौसम ख़राब होने से बंबई दिल्ली की फ्लाइट बहुत लेट आई। सुबह से निकला हुआ हूं। एयरपोर्ट पर बैठे-बैठे बोर हो गया। फिर रही सही कसर दिल्ली से यहां तक हेलीकाप्टर ने निकाल दी। ढाई घंटे लग गए। फिर अभी वापिस भी जाना है तो जनाब मुमकिन है नहीं इंटरव्यू जैसा कि ‘डेप्थ’ में आप चाहते हैं। और फिर अभी मुहूर्त भी करना है। यहां दो चार लोगों से मिलना भी है।’ वह बोले, ‘दो चार मामूली सवाल अभी पूछना चाहिए तो पूछिए। या फिर इधर-उधर टुकड़ों-टुकड़ों में कुछ सवाल कर लीजिएगा।’ उन्होंने जोड़ा, ‘पर डेप्थ वाले नहीं और फिर सवाल न तो फिल्मों के बारे में सुनूंगा और न ही पालिटिक्स के! क्यों कि इन मामलों में आप लोगों के सवाल एक जैसे ही सुनते-सुनते मैं थक गया हूं।’

‘तो?’

‘अब आप जानिए!’ वह आंखों में आंख डालते हुए बोले, ‘समाजी हालत पर पूछिए। तमाम और सब्जेक्ट हैं।’ वह रुके बगैर बोले, ‘इतना भी इस लिए कह रहा हूं कि आप के वो पुराने एडीटर साहब मेरे जेहन में हैं और आप का परचा (अख़बार) भी मेरे जेहन में है।’

तो भी आज के राजनीतिक हालात पर जब उन से बात चली तो वह बोले, 'आज की सियासी हालात? मेक ए गेस !' दिलीप कुमार बोले, 'आप उस का अंदाज़ा लगाइए। कहने की ज़रुरत नहीं है। हालात वैसे ही हैं जैसे कूचे में समंदर बंद हो।' दिलीप कुमार से जब फ़िल्मों के बारे में बात चली तो वह बोले, 'माफ़ करें अब फ़िल्मों के बारे में बात नहीं करना चाहता आज।' फिर भी बोकाडिया की बरसों से लटकी फ़िल्म कलिंगा की जब बात चली तो वह बोले, 'कलिंगा पूरी हो गई है। कुछ कानूनी अड़चनें रह गई हैं। पर जल्दी ही रिलीज़ हो जाएगी।' ज़िक्र ज़रूरी है कि दिलीप कुमार कलिंगा के निर्देशक हैं और बोकाडिया से विवादों के चलते फ़िल्म बार-बार लटकी। यह पूछने पर कि आप आज भोजपुरी धारावाहिक 'सांची पिरितिया' का मुहुर्त शाट देने आए हैं, तो 'गंगा-जमुना' फ़िल्म में आप का जो चरित्र है, जो आप की संवाद अदायगी है उसे आप भोजपुरी के खाने में मानते हैं कि अवधी के खाने में?

दिलीप कुमार बोले, 'यह मैं नहीं जानता। डाइरेक्टर ने जैसा कहा, वैसा किया। पर वह जो बोली थी, तलफ़्फ़ुज़ [उच्चारण] का जो लहज़ा था, वह मैं ने अपने तब के माली से सीखा था। वह वैसे ही बोलता था।' पर बाद की भी कई फ़िल्मों में जैसे बैराग, सगीना महतो जैसी कई फ़िल्मों मे भी संवाद अदायगी का वह फन आप का बरकरार रहा है। कहने पर वह बोले, ' हां यह तो है। पर सब कुछ अनायास ही।'

दिलीप कुमार ने अपने संघर्ष के दिनों का ज़िक्र किया और कहा कि, 'फ़िल्मों में मेरी एंट्री अचानक नहीं हुई। अपने उस्ताद के साथ स्टूडियो घूमने गया। वहां तब के समय की प्रसिद्ध हीरोइन देविका रानी ने मुझ से पूछा कि एक्टिंग के बारे में क्या जानते हो? तो मैं ने कहा कि कुछ नहीं जानता हूं।' वह आगे बोले, 'यह तो अच्छा हुआ कि मैं काम मांगने नहीं गया था। वरना मुझे क्या पता क्या जवाब मिलता। तब जब कि उस वक्त मेरी माली हालत खराब थी। मां-बाप नहीं थे। बहनें थीं, भाई था। घर बड़ा था और मसला भी बड़ा था - कमाई का। मैं उस वक्त एक आर्मी कैंप में स्टाल लगा कर लेमन वगैरह बेचता था। १३० रुपए महीने तनख्वाह थी पर चालीस-पचास रुपए अलग से भी कमा लेता था। लेकिन जब फ़िल्म स्टूडियो घूमने गया तो देविका रानी ने १२५० रुपए महीने की नौकरी दी और कहा कि ढाई सौ रुपए हर साल इंक्रीमेंट लगेगा। तीन साल के कांट्रेक्ट पर रखा।'

दिलीप कुमार बताने लगे कि, 'संघर्षों के जद्दोजहद से मैं ने बहुत कुछ सीखा है।' उन्हों ने अपने एक उस्ताद लकब शाहजहांपुरी की भी याद की। जिन से उन्हों ने उर्दू-फारसी सीखा। उठने-बैठने का सलीका सीखा। शायरी के मायने सीखे। मुंबई की फ़्लाइट लेट होने और हेलीकाप्टर के शोर से वह काफी थके हुए थे। उम्र जैसे उन की सारी फ़ुर्ती खींचे ले रही थी। फिर भी सांची पिरितिया के मुहुर्त के समय बटुर आई भीड़ को उन्हों ने दौड़-दौड़ कर किनारे होने को कहा। और किया।

खैर, हम लोग फिर बैठे बतियाने। दिलीप कुमार भी उस वक्त थके हुए और उदास से थे। मैं ने अचानक उन से पूछ लिया कि, 'आप के देवदास का मिथ अभी तक तो नहीं टूटा।' तो वह बोले, ' देवदास कोई फिर हो भी कैसे सकता है। देवदास होना कोई हंसी-खेल तो है नहीं।' अब अलग बात है कि संजय लीला भंसाली ने अभी कुछ समय पहले देवदास को कुछ हंसी-खेल सा बना ज़रुर दिया शाहरुख खान को देवदास की भूमिका दे कर। खैर, तब मैं ने उन से एक और सवाल किया, ‘अच्छा, आप को मालूम है कि लता मंगेकर ने अपनी जिंदगी का एक सपना आपके साथ जोड़ा है?’

‘क्या कह रहे हैं आप! वह मेरी छोटी बहन की तरह हैं?’ वह तल्ख़ हुए।

‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं।’ मैं ने सफाई दी।

‘फिर?’

‘लता जी आप के लिए प्ले बैक देना अपनी हसरत बताती हैं।’

‘ओह लता!’ कह कर वह जैसे कहीं डूब गए।

अपने पसंदीदा संगीतकार नौशाद की भी उन्हों ने चर्चा की और वहीदा रहमान, वैजयंतीमाला, मधुबाला, मीना कुमारी जैसी अभिनेत्रियों की चर्चा भी 'हूं', 'हां' में की। चुहूल करने के लिए उन के साथ प्रसिद्ध हास्य अभिनेता जानी वाकर भी थे।

बात फिर सामाजिक हालातों से होते हुए जल्दी ही उनकी असमां से दूसरी शादी, उन की हिरोइनों के बाबत बात करते-करते फिल्मों पर भी आख़िर आ ही गई। बात बेबात उखड़ जाने वाले दिलीप कुमार बड़ी देर तक संजीदा हो कर बतियाते रहे। इस बीच चाय भी आ गई थी और जॉनी वाकर भी। चाय आ जाने से दिलीप कुमार को आसानी यह हुई थी कि वह कुछ अप्रिय या अनचाहे सवाल भी चाय के साथ ही पी जाते थे। और जॉनी वाकर के आ जाने से मुझ को आसानी यह हुई थी कि मेरे सवालों के बहाने जॉनी वाकर दिलीप कुमार से चुहुल करने लगते और दिलीप कुमार खुल जाते। ख़ास कर हीरोइनों के मसले पर जॉनी वाकर की चुहुल बड़े काम आई । जैसे बात वहीदा रहमान की आई तो वह बहुत गमगीन हो गए। बोले, ‘वहीदा जी ने मेरे साथ काम तो किया है। पर हीरोइन वह देवानंद की हैं। ट्यून उन्हीं के साथ उन की बनी। गुरुदत्त के साथ भी।’ कई और उन की ख़ास हीरोइनों पर भी चर्चा चली। पर बात जब सचमुच ही ज्यादा फैल क्या गई, बिलकुल ‘पर्सनल’ होने की हद तक आ गई जो जाहिर है कि मेरे सवालों से नहीं जॉनी वाकर की चुहुलबाजी से आ गई तो आदत के मुताबिक दिलीप कुमार सख़्त हो गए। जॉनी वाकर से बहुत संक्षिप्त सा बोले, ‘इंटरव्यू आप का हो रहा है?’

जॉनी वाकर और हम दोनों ही चुप लगा गए। उन की सर्द सख़्त आवाज का संकेत भी यही था। फिर ज़रा देर बाद ही मैं ने पूछ लिया है कि, ‘विमल रॉय जैसा निर्देशक और शरत बाबू का देवदास जैसा चरित्र आप को न मिला होता तो आप क्या होते भला?’

पर दिलीप कुमार चुप ही रहे। कुछ बोले नहीं। बस जानी वाकर को घूर कर रह गए हैं।

शाहाबाद में टाऊन एरिया के चेयरमैन के घर खाना खाने गए। दिलीप कुमार ने डट कर चिकन खाया। मुगलई कटोरों में। और टोटी वाले लोटों से पानी पिया। बहरहाल, खाना खाने और नींबू पानी से हाथ धोने, पोंछने के बाद दिलीप कुमार को जनानखाने में भी ले जाया गया। जहां बच्ची, बूढ़ी, जवान, खड़ी थीं। कुछ नीचे, कुछ छत पर, कुछ आंगन में तो कुछ दीवार पर। दिलीप कुमार के आंगन में पहुंचते ही उन औरतों का रुन-झुन शोर यकबयक थम कर ख़ामोशी में तब्दील हो गया। सभी आंखें ख़ामोश लेकिन जैसे बहुत कुछ बोलती हुईं। बुरके से टुकुर-टुकुर ताकती हुईं। एक ख़ुशी भरी ख़ामोशी जैसे पूरे जनानखाने में तारी हो गई। अजब यह था कि इस ख़ामोशी में पैंट की जेब में एक हाथ डाले खडे़ दिलीप कुमार भी जरा देर ख़ामोश रहे। ऐसे गोया झील की बल खाती लहरें उड़ते हुए हंस के पंखों को थाम लें। हंस को उड़ने न दें! ढेर सारी औरतों-बच्चों ने जैसे उन्हें घेर लिया और अपलक निहारने लगे। बिलकुल खामोश। अंतत: दिलीप कुमार ही बोले, 'अरे भाई सलाम-दुआ कुछ नहीं?' वह ज़रा रुके और ठहर कर देखने लगे। और बोले,‘आदाब!’

अचानक ख़ामोशी तोड़ती हुई दिलीप कुमार की हाथ उठाती आवाज़ क्या गूंजी एक साथ कांच की सैकड़ों चूड़ियां और पचासों पायलें बाज गईं। ऐसे, जैसे पंडित शिवकुमार शर्मा का संतूर बज गया हो, ऐसे जैसे कोई जल तरंग सोए-सोए जाग गया हो। आंखों के संकोच में सने दर्जनों हाथ उठे और जबान बोली, ‘आदाब!!’ मिठास ऐसी जैसे मिसरी फूट कर किसी नदी में बह चली हो! लगा जैसे कमाल अमरोही की किसी फिल्म का शॉट चल रहा हो। बिना कैमरा, बिना लाइट, बिना साउंड-म्यूजिक और बिना डायरेक्टर के। गुरुदत्त की किसी फिल्म के किसी भावुक दृश्य की तरह। हालां कि ‘आदाब’ के पहले भी बिन बोले ही उन औरतों और दिलीप कुमार के बीच एक अव्यक्त सा संवाद उपस्थित था जिसे ठिठका हुआ समय दर्ज भी कर रहा था। पर दिलीप कुमार बिना निर्देशन के इस दृश्य की संवेदनशीलता, कोमलता और इसके औचक सौंदर्य को शायद समझ नहीं पाए या वापस जाने की हड़बड़ी में अकुलाए उन्हें जाने क्या सूझा कि वह घबरा कर ‘आदाब!’ बोल बैठे। जैसे किसी ठहरे हुए पानी में कोई कंकड़ फेंक दे। यही किया दिलीप कुमार ने।

लेकिन कांच की चूड़ियों की खन-खन और पायलों की रुन-झुन में भीग कर जो ‘आदाब’ जवाब में उधर से आया लगा कि दिलीप कुमार उस में भींज कर भहरा गए हैं। मैं ने देखा वह सचमुच मुंह बा कर, माथे पर बालों की लटों को थामे क्षण भर तो खड़े रह गए। पर आगे ख़ामोशी की फिर एक सुरंग थी। लंबी सुरंग!

इस सुरंग को भी फिर छोटा किया दिलीप कुमार ने, ‘कुछ तो बोलिए आप लोग! आप लोगों से ही मिलने आया हूं।’ यह बात दिलीप कुमार ने बिलकुल परसियन थिएटर की तर्ज में थोड़ा जोर से कही। और जेब में डाला हुआ हाथ बाहर निकाल लिया।

‘कोई गाना सुनाइए!’ घाघरा पहने, दुपट्टा मुंह में खोंसती हुई एक लड़की दबी जबान बोली। जिसे दिलीप कुमार ने सुन कर भी अनसुना किया। ज़रा जोर दे कर बोले, ‘क्या कहा आप ने?’

‘गाना सुनाइए!’ वह झटके से दिलीप कुमार के सुर में बोल कर चुप हो गई।

‘आप लोग तो जानती हैं मैं सिंगर नहीं हूं।’ वह बोले, ‘फिल्मों में तो मेरे होंठ हिलते हैं। गाने वाले दूसरे लोग होते हैं।’ वह बात में थोड़ा ठसक भर कर बोले।

‘तो कोई डायलाग सुनाइए!’ एक दूसरी लड़की बोली।

‘मुगले-आज़म का!’ यह एक तीसरी लड़की बोली।

‘कुछ और बात कीजिए!’ दिलीप कुमार इस फरमाइश को भी ख़ारिज करते हुए बोले, ‘डायलाग का यह समय माकूल नहीं है।’ फिर वह कलफ लगी उर्दू पर उतर आए। इतनी कि बोर हो चली औरतों में ख़ामोशी की जगह खुसफुसाहट ने ले ली। दिलीप कुमार को भी राह मिली। चलने लगे। बोले, ‘अस्सलाम वालेकुम!’ उधर से भी एक साथ कई कर्कश आवाजें आईं, ‘वाले कुम अस्सलाम!’

लगा कि जैसे आसमान बदल गया है। कमाल अमरोही के आसमान पर आई.एस. जौहर का बादल छा गया हो और महमूदी बौछार आने लगे।

बहरहाल दिलीप कुमार बड़े झटके से मुड़े और हाथ हिलाते, जबरिया मुसकुराते हुए जनानखाने से बाहर आ गए। पीछे-पीछे जॉनी वाकर और मैं भी।

हां, मैं घटिया औरतों के लिए गाती हूं: ऊषा उत्थुप

कोई २३ साल पहले ऊषा उत्थुप से यह बात चीत स्वतंत्र भारत के लिए दयानंद पांडेय ने की थी। वर्ष १९८९ की गरमियों में। और सुखद यह कि यह ऊषा उत्थुप आज भी स्टेज पर उसी तरह सक्रिय हैं। बदस्तूर। जैसे तब थीं। और यह इंटरव्यू इसी अर्थ में प्रासंगिक भी है। और सारी बातें भी। बस कुछ संख्या वाले विवरण को छोड कर। लेकिन वह भी यहां देने का फिर भी मोह है तो इस लिए कि वह अभी भी दिलचस्प है और कि पढ़ने का स्वाद भी देता ही देता है।


उलाहने बहुत हैं, ऊषा उत्थुप के पास और बहाने भी उतने ही। दिलकश, दमदार और दयनीय।

बंबई में बचपन और जवानी बिताने के बाद अब कलकत्ते में बसेरा बना चुकी ऊषा उत्थुप से अगर आप पूछें कि शुरू-शुरू में अपनी गायकी का जो नशा अपने दीवानों में घोला था, ‘दम मारो दम’, ‘हरे कृष्णा, रहे राम’ या ‘हरि ओम हरि’ के साथ जो जादू चलाया था, उस ग्राफ को बरकरार क्यों नहीं रख पाईं? तो पहले तो वह इस सवाल को समझेंगी नहीं। आप अगर फिर भी समझा ले गए तो वह बोलेंगी, ‘हूं तो आप के सामने। अगर वह नशा बरकरार नहीं है तो बतौर गायिका मैं ज़िंदा कैसे हूं अभी तक?’ वह पलट कर पूछेंगी। वह यह भी पूछेंगी कि, ‘आप यह सवाल आखिर उन से कर ही क्यों रहे हैं?’ आप फिर भी कुछ पूछेंगे तो वह चौंकेंगी। चौंक-चौंक जाएंगी और बार-बार चिहुंकेंगी। और जो आप कुछ ज़्यादा तफ़सील में जाने की ठान ही लेंगे तो वह फिर सचमुच तफ़सील में आ जाएंगी और बड़े तरकीब से बताएंगी कि, ‘दरअसल मैं प्ले बैक सिंगर (पार्श्व गायिका) नहीं हूं। मैं तो बेसिकली स्टेज आर्टिस्ट। आई एम स्टेज आर्टिस्ट। ठीक वैसे ही जैसे पीनाज मसानी कहती हैं, ‘बेसिकली आई एम ए गजल सिंगर।’

‘पर ऊषा यह तुलना, यह ब्यौरा इस लिए देती हैं कि आप ने पूछ लिया है कि यह चौबीस बरस की गायकी जीने के बाद भी आप के पास दो दर्जन फ़िल्मों का भी स्कोर क्यों नहीं है?’ अब इस सवाल के बाद उन का मुखौटा उतर ही जाना है और बार-बार चौंक-चौंक जाने के अभिनय का असर भी। ऐसे में वह यह बताना नहीं भूलतीं कि स्टेज आर्टिस्ट होने के कारण ही गायकी का लंबा पठार देखने के बावजूद वह ज़िंदा हैं। वह ज़िंदा इस लिए हैं कि वह सिर्फ़ पार्श्व गायिका भर नहीं हैं। वह कहती हैं, ‘नहीं, देखिए न, कहां गईं शारदा, कहां गईं कमल बरोट। सब कहीं न कहीं गुम हो गईं।’ इस लिए कि वह सिर्फ़ पार्श्व गायिका भर थीं।’ हालां कि वह यह भी बता रही हैं कि, हिंदुस्तान में अगर फ़िल्में नहीं होतीं तो शायद गायकी की सदाबहार दुनिया भी नहीं होती।

पर पॉप म्यूजिक हिंदी में आ कर मर क्यों जाता है? यह पूछने पर पॉप क्वीन ऊषा उत्थुप उलाहने के अंदाज़ में कहती हैं, ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है।’ पर लता मंगेशकर तो कहती हैं कि हिंदी में आ कर पॉप म्यूजिक मर जाता है। तब ऊषा उत्थुप हथियार डाल देती हैं। ‘लता जी कहती हैं तो ज़रूर कोई बात होगी।’ और वह आहत हो जाती हैं। पर दूसरे ही क्षण वह लता मंगेशकर द्वारा गाए कुछ पॉप गानों का ज़िक्र चला देती हैं।

वह फिर चौंक गई हैं, क्यों कि आप ने पूछ लिया है कि क्या पॉप म्यूजिक इस लिए पापुलर हो रहा है कि पॉप में डबल मीनिंग वाले गानों की खपत कहिए या गुंजाइश ज़्यादा है। वह सिरे से इंकार कर देती हैं। फिर हिलती हैं और जोर दे कर कहती हैं, ‘ऐसा नहीं है।’

पर अगर आपने पार्वती खान द्वारा गाए गीत ‘खुल्ला ताला छोड़ आई नींद के मारे’ और इस जैसे गीतों की याद उन्हें दिला दी है तो वह बिना कुछ कहे हथियार डाल देती हैं। पर दूसरे ही क्षण किसी दूसरे सवाल के जवाब में वह दहाड़ रही हैं, ‘हां, मैं घटिया औरतों के लिए गीत गाती हूं तो इसमें बुरा क्या है? मुझे तो अच्छा लगता है।’ घटिया औरत मतलब? उन का इशारा हेलेन, कल्पना अय्यर जैसी खल चरित्र नायिकाओं द्वारा अभिनीत भूमिकाओं की ओर है। वह कहती हैं ‘मुझे तो अच्छा लगता है, इन के लिए गा कर। घटिया औरत के लिए गा कर।’ वह निरुत्तर हैं, क्यों कि उन से पूछ लिया गया है कि, ‘आप के हिंदी वाले कैसेट ज़्यादा बिकते हैं या अंग्रेजी के?’ वह छूटते ही बता देती हैं, हिंदी के। फिर आप का परिचय अंग्रेजी ही में पहले क्यों बनता है और कि आप अंग्रेजी ही में हरदम क्यों बोलते रहना चाहती हैं? आप ने पूछ लिया है और वह निरुत्तर हैं। बहुत बाद में बमुश्किल और लगभग सकुचाई हुई सी वह पूछ लेती हैं कि ‘आखिर अंग्रेजी में बुराई क्या है? हर्ज क्या है?’ इस लिए कि आप के हिंदी के कैसेट ज़्यादा बिकते हैं और आप उस की की रोटी खाती हैं। आप ने कह दिया है तो वह निरुत्तर हैं। तब जब कि वह ‘जाने वो कैसे लोग थे, जिन के प्यार को प्यार मिला’ गा लेती हैं और न सिर्फ़ हेमंत कुमार, एस.डी. वर्मन, किशोर कुमार, गीता दत्त आदि के गाए गीतों को वह अपने ‘रेंज’ में ले कर गाती हैं, बल्कि उन में अपने होने का अर्थ भी भरती हैं।



ऊषा उत्थुप का कंट्रास्ट

कंट्रास्ट की कली चटकनी देखनी हो तो पॉप गायिका ऊषा उत्थुप के साथ हो लीजिए। अब कि जैसे गाती वह पॉप हैं, पहनती साड़ी हैं। वह हैं तो महिला पर आवाज उन की मर्दों की सी मोटी है। शायद यही कारण है कि फ़िल्म ‘रोटी की कीमत’ में वह मिथुन चक्रवर्ती के लिए गाती मिलेंगी, पर नाकाबंदी में वह श्रीदेवी के लिए ‘आ का मा का ना का’ भी गाती हैं।

ऊषा उत्थुप की निजी ज़िंदगी में भी कम कंट्रास्ट नहीं हैं। वह खुद गायिका हैं तो उन के पिता वैद्यनाथ सोमेश्वर बंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर हैं। जबकि पति जानी उत्थुप कलकत्ते के चाय व्यापारी हैं। दो टीन एजर्स बच्चे 17 वर्षीया बेटी अंजलि और 16 साल के बेटे सनी की मां ऊषा उत्थुप जीवन के चौथे दशक से गुज़र रही हैं। उन की गायकी का यह 24 वां बरस है पर कंट्रास्ट के बजाय एक तिहरा साम्य भी देखिए कि 13 भारतीय भाषाओं में गाने वाली ऊषा उत्थुप 13 देशों में अपनी गायकी गुंजा आई हैं। ठीक वैसे ही जैसे उन्हों ने अभी तक कुल जमा 13 हिंदी फ़िल्मों में गीत गाए हैं। यह तो हुआ 13 का तिहरा साम्य। एक साम्य सात का भी है उन के साथ। उन के सात कैसेट हैं और सात एलपी रिकार्ड। गायकों में उन्हें येसुदास पसंद हैं और संगीतकारों में बप्पी लाहिड़ी तथा दक्षिण के इले राजा। ऊषा उत्थुप खुद अपना रिकार्डिंग स्टूडियो पिछले आठ-दस बरस से चला रही हैं, पर उन का सपना संगीतकार बनने का भी है। वह भी माडर्न। मतलब पॉप म्युजिशियन बनने का। ऊषा उत्थुप के कंट्रास्ट में कई कष्ट भी समाए पड़े हैं। जैसे वह अति सुंदर नहीं हैं। इस का एहसास उन्हें है और आप बात करें उस के पहले ही वह इस बात को साफ कर देती हैं वह कि ‘देखिए सुंदरता का तो कोई फिक्सड पैमाना नहीं है। डिफरेंस मूड्स की डिफरेंस स्केल है।’ वह बताएंगी और बार-बार। जैसे कि वह महिला हैं, पर आवाज़ मोटी है। इस मोटी मर्द आवाज़ को वह अपना प्लस प्वाइंट भी मानती हैं और मानती हैं कि यह मोटी आवाज़ का ही बूता है कि उन की गायकी ढेरों गरमी बरसात झेल गई पर ढही नहीं।

पर हकीकत यही है कि उन का नारी मनोविज्ञान उन्हें कहीं मथता भी है। अपनी मर्द आवाज़ की मनहूसियत को समझता भी है और यह उन्हें कहीं काटता, खाता भी है। इस की चुगली उन से ब्यौरेवार बातचीत में नहीं मिलती, बल्कि विस्तार में जाने से और अनजाने ही मिलती है कि नारी सुलभ आवाज़ के लिए वह तरसती भी हैं। मुझे लगता है कि यही उन के कंट्रास्ट का कष्ट है, जिस के लिए वह अभिशप्त हैं और शायद अभिभूत भी।

विद्रोह की दस्तक

- जितेन ठाकुर

कथाकार दयानंद पांडेय का उपन्यास हारमोनियम के हज़ार टुकड़े एक ऐसा दस्तावेज है, जो पत्रकारिता के ग्लैमर के पीछे छिपे क्रूर सत्य को उद्घाटित करता है। वास्तव में यह उपन्यास पत्रकारिता के नाम पर फैले निहायत घिनौने परिवेश के प्रति विद्रोह की दस्तक है। इस उपन्यास में हालां कि एक विशिष्ट कालखंड को रेखांकित किया गया है, पर यह पत्रकारिता के मूल्यों में निरंतर हो रहे ह्रास की कथा है। यह अखबार के ‘प्रोडक्ट’ बन जाने और पत्रकारिता से जुड़े लोगों की बेचारगी की कहानी है। दरअसल यह आज की पत्रकारिता पर की गई एक महत्वपूर्ण टिप्पणी है।

प्रबंधन के तलवे चाटने और उन के लिए सौदा पटाने वाले संपादकों की नियुक्तियों ने पद की गरिमा और दायित्वबोध दोनों को कैसे समाप्त किया, कैसे यूनियनें प्रबंधन की पिट्ठू बन गई, समाचार पत्रों में महिलाओं की नियुक्तियां उन के गुणों पर नहीं ‘फीगर’ के आधार पर होने लगी, प्रबंधन द्वारा नियम कानून ताक पर रख कर ईमानदार पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा और हक की मांग करने वाले पत्रकारों को सरेआम पिटवाया जाने लगा। यानी पत्रकारिता से जुड़ी सारी मान्यताएं ध्वस्त होने लगीं। ‘पत्रकारिता बदल रही थी, लोग बदल रहे थे, राजनीति बदल रही थी, मैनेजमेंट और उस की एप्रोच बदल रही थी, सो यूनियन का मिजाज भी बदला और मालिकान की मर्जी भी... अब जनरल मैनेजर संपादक से खबरों के बारे में टोका-टोकी करने लगा।’ ये पंक्तियां पत्रकारिता में शुरू हो रहे एक काले अध्याय की बानगी भर है। यह उस त्रासद सत्य की परछाई है, जिसे पत्रकारिता की दुनिया से जुड़ा पाठक या तो जानता नहीं या फिर जान कर भी कुछ करने की स्थिति में कभी नहीं होता। संपादक की सारी प्रतिबद्धता, विधान परिषद या राज्य सभा में मनोनीत होने से शुरू हो कर, पद्म श्री पाने तक समाप्त हो जाती है। इसी कोशिश में वह राजनेताओं से गठजोड़ कर के पत्रकारिता की सब से पहली शर्त, स्वतंत्रता और निष्पक्षता की हत्या कर देता है।

‘दोनों ही (संपादक) दुम हिलाने में एक्सपर्ट। फर्क बस इतना था कि एक हिंदी में हिलाता था तो दूसरा अंग्रेजी में।...हिंदी वाले ज़रा जल्दी एक्सपोज हो जाते हैं, अंग्रेजी वाले देर से।’

इन चारित्रिक विशेषताओं के आधार पर नियुक्ति पाने वाले संपादक इस देश की पत्रकारिता को कैसा योगदान दे रहे हैं, इस उपन्यास की एक मारक पंक्ति वर्तमान पत्रकारिता के संपूर्ण अध्याय को उजागर कर देती है- ‘अखबारों में यह संपादक एक ऐसा सबेरा उगा रहा था जिस सबेरे में सूरज नहीं था।’

अखबारों को प्रोडक्ट की तरह बेचने की कोशिश ने कई विकृतियों को भी जन्म दिया। हॉकर स्ट्रेटजी तय करने के लिए दूसरी चीज़ों के साथ-साथ शराब भी बांटी जाने लगी। पाठकों को लुभाने के लिए सस्ते हथकंडे अपनाए गए। नियंत्रण के लिए दबंगों को संपादक बनाया गया और पत्रकारों के मान-सम्मान को दरकिनार करते हुए ‘स्ट्रिंगर’ नामक अनिश्चित भविष्य वाले पत्रकारों को अंगूठे के नीचे दबा दिया गया।

यह उपन्यास केवल पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाता, बल्कि न्यायपालिका और राजनीति को भी कठघरे में खड़ा करता है। सरलता से चीन्हे जा सकने वाले राजनेताओं और पत्रकारों के हवाले से लेखक ने कई ऐसे सत्य उद्घाटित किए हैं जो विचारवान पाठक के लिए एक बड़ा सदमा हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश के एक समाजवादी मुख्यमंत्री को बेनकाब करते हुए लेखक ने लिखा है - ‘मुख्यमंत्री बड़ी हेकड़ी से प्रेस क्लब में बैठ कर कहता प्रेस हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्यों कि हमारा वोटर अखबार नहीं पढ़ता। तो हमारा क्या बिगाड़ लोगे।’

यानी एक जातिवादी मुख्यमंत्री इस बात से प्रसन्न और संतुष्ट है कि उस का वोटर अनपढ़ है। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर हो रहे जज का ‘मैनेज’ हो कर एक उद्योगपति को ज़मानत देना, एक राजनेता का राममनोहर लोहिया के साथ दिखने के लिए फ़ोटो में ट्रिक से किसी व्यक्ति का सिर हटा कर अपना सिर रखवाना जैसे कई प्रसंग इस उपन्यास में मिलते हैं, जो लोकतंत्र की निपट निरीहता और विकलांगता को उजागर करते हैं। यह उपन्यास बहुत साफ तौर पर उन गड्ढों की ओर इशारा करता है, जिन में कभी लोकतंत्र के पाए होने का भ्रम इस देश ने पाला था। लेखक द्वारा किया गया एक सर्वकालिक सत्य का उद्घाटन देखिए।

‘और सचमुच मुख्यमंत्री की कल्पना से भी आगे जा कर मनमोहन कमल (संपादक) ने कुछ मनमोहक इंटरव्यू, कुछ बढिया लेख, तमाम, टिट-बिट्स, नई पुरानी फ़ोटो, मुख्यमंत्री की नई पुरानी आकांक्षाएं, इच्छाएं, उन का भोजन, व्यायाम, दिनचर्या, मित्र अहबाब, गांव, परिवार, पहलवानी, खांसी-जुकाम सब को गूंथ कर एक लाजवाब, सप्लीमेंट निकाल दिया...तमाम अखबार इस में अपने को पीछे पा कर हाथ मल कर, मन मसोस कर रह गए।’

दरअसल, यह उपन्यास एक ऐसा तमाचा है, जिस की गूंज बहरे कानों को भी परेशान करेगी। इस उपन्यास में रूपायित होता समय हमारी चेतना को बुरी तरह आहत करता है। विकृत व्यवस्था और विकलांग लोकतंत्र को परत-दर-परत खोलता यह उपन्यास इतना जीवंत है कि रचनाशीलता के तथाकथित सांचों को तोड़ कर अपने लिए एक नई जमीन पुख्ता करता है। इस उपन्यास में एक समर्पित पत्रकार का पतन, उस की कुंठा और पीड़ा का चित्रण है तो एक शातिर, ऐय्याश, और दलालनुमा संपादक को भी अत्यंत सजीवता के साथ चित्रित किया गया है। अखबारों से कई तरह का रिश्ता रखने वाले कर्मचारियों की हताशा, टूटन और अंधे भविष्य को इंगित किया गया है तो उद्योगपतियों के अखबार निकालने के कारणों की गहरी पड़ताल भी की गई है।

यह उपन्यास जहाँ एक ओर एकरसतावादी उपन्यासों की जड़ता को तोड़ता है, वहीं समय की उन बेचैनियों का भी वहन करता है, जिसे पहचानते हुए भी आकार देना बहुत सरल कभी नहीं रहा। इस उपन्यास में न तो भाषा की पच्चीकारी है और न ही मुहावरों को निभा ले जाने का आग्रह। यह उपन्यास विद्रोह पर उतारू एक आहत लेखक की ऐसी कृति है जो बैचैन भी करती है और क्रोधित भी। लेखक ने आस्था और विश्वास के उन टुकड़ों को भी सहेजने की चेष्टा की है, जिन्हें इस समय में बलिहारी मान कर उपेक्षित कर दिया गया है। लेखक की चिंता, समाज को वीभत्स बनाने और जुगुप्सा जगाने वाले उन कारणों की गहरी पड़ताल करती है, जहाँ लोकतंत्र साफ-साफ भीड़ तंत्र में परिवर्तित होता हुआ दिखाई देता है और लोकतंत्र का चौथा पाया भी लोकतंत्र का एक ताबूत नज़र आता है।

दरअसल यह एक ऐसी कहानी है जो हमारी दिनचर्या में शामिल है और चाह कर भी जिस से हम बच नहीं सकते, पर जिस की असलियत को समझ-बूझ लेने के बाद हम अखबारी पकड़ से मुक्त हो कर स्व-विवेक से अहम फ़ैसले करने की स्थिति में पहुंच ज़रूर सकते हैं।

[जनसत्ता से साभार]

समीक्ष्य पुस्तक :
हारमोनियम के हज़ार टुकडे
पृष्ठ सं.88
मूल्य-150 रुपए

प्रकाशक
जनवाणी प्रकाशन प्रा. लि.
30/35-36, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2011

Tuesday, 17 April 2012

उमराव जान में जो नवाब सुल्तान अली का सुर होना था, नहीं हो पाया मेरा : फ़ारूख शेख

फ़ारूख शेख के पास अब फ़िल्में लगभग नहीं हैं। शायद धारावाहिक भी नहीं। पर सत्तर और अस्सी के दशक में उन के पास फ़िल्में, शोहरत सब कुछ था। पर हां स्टारडम जिसे कहते हैं, उस की ऊंचाई वह नहीं छू पाए। मतलब मोतीलाल, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन नहीं बन पाए। इस का उन्हें मलाल भी बहुत है। अब उन के पास क्या बडा, क्या छोटा परदा शायद कहने भर का भी काम नहीं रह गया है। ज़ी टी. वी. पर जीना इसी का नाम भी अब गुम हो चुका है, जिस में वह अच्छी और ज़िंदादिल कमपेयरिंग करते दिखते थे। अब यह कार्यक्रम एक दूसरे नाम से, रवीना टंडन एन डी टी वी पर परोसने लगी हैं। तो भी फ़ारूख शेख के सामाजिक सरोकार उन से छूटे नहीं हैं। जब वह फ़िल्मों और थिएटर में सक्रिय थे तब भी सामाजिक सरोकारों से उन की गहरी संलग्नता थी, अब भी है। सामजिक सरोकारों को ले कर वह वैसे ही बेचैन रहते हैं जैसे गमन फ़िल्म में उन पर फ़िलमाया एक गाना है, ‘सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यों है/ इस शहर में हर शख्श परेशान सा क्यों है।‘ लखनऊ उन का आना जाना इस परेशानी के तहत अब भी होता है। और साल में दो-चार बार वह आ ही जाते हैं। यहां की एक संस्था से भी वह जुड़े हुए हैं। तुम्हारी अमृता नाटक के कई शो भी वह शबाना आज़मी के साथ यहां जब-तब करते ही रहते हैं। उमराव जान की शूटिंग भी वह इसी लखनऊ में रेखा के साथ कर चुके हैं। १९९१ की सर्दियों में फ़ारूख शेख किसी सामाजिक सरोकार से ही लखनऊ आए हुए थे तभी नवभारत टाइम्स के लिए दयानंद पांडेय ने उन से यह बातचीत की थी। बातचीत ज़रा क्या बहुत पुरानी भले ही हो पर मसले तो लगता है जैसे आज भी वही और वैसे ही हैं। पेश है बात चीत:

फ़ारुख शेख को शायद ज़िंदगी भर यह मलाल बना रहेगा कि वह स्टारडम की ऊँचाइयों को क्यों नहीं छू पाए। उन को इस का अफसोस भी बहुत है। वह कहते हैं कि “मेरी अभिनय क्षमता को कहीं ज्यादा सराहा गया। पर स्टार रेटिंग मेरी कम हुई।”

विचारों बातचीत और बर्ताव में प्रगतिशील रुझान वाले फ़ारुख शेख फ़िल्म इंडस्ट्री की गणित में उलझते ही ‘किस्मत’ जैसी बात पर आ जाते हैं। वह साफ तौर पर कहते हैं कि, “बुनियादी तौर पर फ़िल्म इंडस्ट्री में किस्मत की दखल 95 प्रतिशत है। मिलना, काम व्यवहार वगैरह तो सब 5 परसेंट में हैं।” फ़ारुख मानते हैं कि “मेरी किस्मत ने कुछ हद तक साथ दिया। पर मैं जिन कुछ चीज़ों में ज़्यादा चाहता था कम मिला। पर वहीं कुछ चीज़ों में ज़्यादा मिला।”

वह कहते हैं कि, “अगर आप का रेट ज़्यादा है तो फ़िल्में भी ज़्यादा मिलेंगी। और जब ज़्यादा फ़िल्में मिलेंगी तो सेलेक्शन की मारजिन भी ले सकता हूँ। अब अपनी मर्जी से 50 फ़िल्में ऑफर तो नहीं कर सकता। हकीकत यह है कि इस समय साल भर में औसतन चार फ़िल्में करता हूँ। पहले साल भर में 12-15 फ़िल्में मुझे आफर होती थी। अब साल में आफर होती हैं 5 या 6 तो उस में से दो या तीन हर हाल में सेलेक्ट करना है। टीवी सिरियल भी अब करने ही लगा हूँ। आप हालात समझ सकते हैं। तो क्या इस के लिए मेरा काम या व्यवहार जिम्मेवार है?” वह जैसे पूछते हैं और खुद ही जवाब भी दे लेते हैं , “जाहिर है कि नहीं।” और जोड़ते हैं, “सब किस्मत का खेल है।”

फिर जैसे वह किस्मत के खेल को साबित भी करना चाहते हैं। और बताते हैं कि, “अपने गए गुज़रे दिनों में भी जितेंद्र को संजीव कुमार से लगभग ड्योढ़ा पैसा मिलता था। और तो और यह बताते हुए भी अफ़सोस होता है कि संजीव कुमार के साथ मैं ने एक फ़िल्म की है और उस में भी उन्हें मुझ से भी कम पैसे दिए गए थे। तो जब संजीव कुमार जैसे विरले अभिनेता के साथ फ़िल्म इंडस्ट्री का ऐसा सुलुक था तो मेरी आप समझ सकते हैं।” वह जैसे बुदबुदाते हैं, “अभिनेता होना, और मजा हुआ अभिनेता होना किसी काम का नहीं होता। काम का होता है स्टार होना, स्टार रेटिंग ठीक होना।” वह कहते हैं कि, “यह स्टार रेटिंग का ही कमाल है कि अमिताभ बच्चन की पिटी हुई फ़िल्म भी किसी और फ़िल्म से ज़्यादा कमाती है।” वह कहते हैं, “सोचिए कि मैं अमिताभ हूँ। एक फ़िल्म का मैं एक करोड़ लेता हूँ। एक का चालीस लाख। तो पैसा फूंकने वाला क्यों फूंकेगा?” वह जोड़ते हैं, “फ़िल्म इतना खर्चीला माध्यम है कि कोई ‘रिस्क’ नहीं लेना चाहता।”

“परदे पर आप अमूमन मध्यवर्गीय चरित्र ही ज़्यादातर जीते हैं?” सवाल पर वह कहते हैं, “नहीं। ” बिल्कुल ऐसा ही नहीं है। इसी लखनऊ में उमराव जान शूट हुई थी। उस में नवाब की भूमिका है मेरी। पर आप की बात एक हद तक ज़्यादा सच है। दरअसल जिस किस्म की फ़िल्में हम करते हैं उस में मिडिल क्लास ही आ पाता है। और चूंकि शुरुआत भी मेरी फ़िल्मों में मध्यवर्गीय चरित्र से हुई है इस लिए ऐसे ही रोल ऑफर होते रहे और करता रहा।”

“आप को नहीं लगता कि आप मध्यवर्गीय भूमिकाओं में लगभग ‘टाइप्ड’ हो चले हैं?”

“इंडिया में कोई भी ऐसा आर्टिस्ट नहीं जो टाइप्ड न हो।” “पर जैसे धर्मेंद्र, जितेंद्र सरीखे लोग हर फ़िल्म में चाहे कोई भूमिका कर रहे हों रहेंगे वह धर्मेंद्र, जितेंद्र ही। ठीक उसी तर्ज पर आप भी कुछ क्या ज़्यादातर फ़िल्मों में जब ‘फ़ारुख शेख’ ही बने रह जाते हैं तो आप को अपने अभिनेता होने पर मलाल नहीं होता? तब जब आप खुद ही स्वीकारते हैं कि आप की अभिनय क्षमता को ज़्यादा सराहा गया है?”

यह सर्द सवाल उन्हें चिहुंका गया है और वह मुंबइया खोल से जैसे बाहर निकल आते हैं और पालथी मार कर बैठ जाते हैं। और बिल्कुल सहज हो कर कहते हैं, “ इस पर तो मैं ने अपने ...कभी सोचा ही नहीं। और जिस भी किसी चरित्र को जीते हुए मैं फ़ारुख शेख रह गया हूँ तो यह मेरी कमजोरी है। मेरी ही । यह फ़ारुख शेख की कमजोरी है। और डाइरेक्टर्स की भी।”

“अच्छा चलिए अपनी कुछ फ़िल्मों में अपनी की हुई कुछ गलतियों को बताइए।”

“ कोई फ़िल्म ऐसी नहीं बता सकता जिस में गलती न की हो। पर मुझे अपना सब से ज़्यादा खराब काम अगर किसी फ़िल्म में लगा तो उमराव जान में है। हालां कि उमराव जान फ़िल्म अच्छी लगी। इन टोटल। पर अपना रोल नहीं। मैं ने किया अच्छा किया। पर मुझे पता नहीं क्यों वह रोल नहीं जमा। हो सकता है आप की वह बात भी कहीं सच हो कि मैं मध्यवर्गीय भूमिकाओं के ही लिए बना हूँ। यह वजह भी कहीं जेहन में रही होगी। पर दरअसल कभी-कभी एक्टर का सुर गलत लग जाता है। तो उमराव जान में जो नवाब सुल्तान अली का सुर होना था, नहीं हो पाया मेरा। पर रेखा और नसीर का सुर अच्छा था।”

फिर वह अच्छा अभिनय करने का जैसे गुर बताने लग जाते हैं, “एक तो काम आता हो। काम ही नहीं आएगा तो वह करेगा क्या? दूसरे, तार से तार मिले सुर मिले। तीसरे सामने वाले से अच्छा कर लेने की खुंदक न हो।” बात ही बात में वह बताते हैं कि उत्सव में रेखा के साथ लीड रोल पहले मुझे ही ऑफर हुआ था। पर किसी वजह से नहीं कर पाया।

“मध्यवर्गीय भूमिकाएं आप फिल्मों में तो करते हैं पर जीवन स्तर पर आप अपने को निजी जीवन में किस वर्ग में शुमार करते हैं ?"

“मध्य वर्ग में ही। फ़िल्मों में आने से पहले भी मिडिल क्लास बिलांग करता था और आज फ़िल्मी दुनिया में होने के बावजूद भी मध्यवर्गीय दुनिया में ही जीता हूँ।” वह बताते हैं, “पिता मुंबई में ही वकालत करते थे। बी.ए. के बाद मैं ने भी एल. एल. बी. किया 1975 में। पर प्रैक्टिस की कभी सोची नहीं। जब एल.एल.बी. में पढ़ रहा था जब भी प्रैक्टिस के बारे में नहीं सोचा था”।

“क्यों?”

“ जैसा मैं सोचता हूँ, चाहता हूँ वैसी प्रैक्टिस आज के दौर में कर नहीं सकता। जैसे कि क्रिमिनल लॉ मेरा फ़ेवरिट है। पर मैं सिर्फ़ काला कोट पहन कर घूमना नहीं चाहता था। हां टीवी पर एक फ़िल्म आई थी, ‘दूसरा कानून’ उस में वकील की भूमिका ज़रूर कर ली।”

नफ़ासत के साथ अच्छी उर्दू में बतियाने वाले फ़ारुख शेख कहते हैं, “मेरे अगल बगल सात पुश्तों तक कोई फ़िल्मी नहीं है मेरे खानदान में।” यह पूछने पर कि, “आप मूल निवासी कहाँ के हैं?” वह बताते हैं, “पला, बढ़ा, पढ़ा लिखा सब मुंबई में पर खानदान गुजरात से आया। और मेरी भी पैदाइश गुजरात में बरोडा के पास अमरौला गांव में हुई। हालां कि माता पिता तब भी मुंबई में ही रहते थे। पर जब मेरी पैदाइश का वक्त आया माँ को गाँव भेज दिया गया। क्यों कि पिता चाहते थे कि मेरी पैदाइश खानदानी गाँव में हो।”

1975 में एल.एल.बी किए फ़ारुख की शादी 1974 में आयशा के साथ हुई। और अब उन की दो बेटियाँ हैं। शाइस्ता 12 बरस की और शाना 7 बरस की। कोई 19 बरस हो गए उन्हें फ़िल्मी दुनिया में आए। फ़िल्मों में आने से पहले फ़ारुख शेख भी नाटकों में काम करते थे। पर अब वह थियेटर नहीं करते। वह बताते हैं कि, “थियेटर के लिए वक्त नहीं मिल पाता।” वह जैसे सफाई देने लगते हैं, “असल में स्टेज मेरे खून में नहीं उतर पाया। और फिर घर वालों का समय काट कर मैं नाटक नहीं कर सकता क्यों कि अमूमन आठ साढ़े आठ बजे रात तक मैं अपने घर आ जाता हूँ।”

बात शबाना आज़मी के साथ उन के प्रेम प्रसंगों की चल पड़ी और वह फिर सफाई देने पर उतर आए, ‘शबाना के साथ शुरु में कुछ नाटक किए थे। हमारे खयालात मिलते हैं। कुछ फ़िल्में की हैं। पर प्रेम नहीं। शबाना दरअसल मेरी बीवी की क्लासमेट रही हैं। फिर वह फ़िल्मी प्रेस पर विफर पड़ते हैं, ‘फ़िल्मी पत्रकार फ़िल्म इंडस्ट्री को किसी सर्कस की तरह ट्रीट करते हैं। आर्टिस्टों को भी मदारी बना देते हैं। मैगजिन बेचने के लिए ढेरों झूठ लिख जाते हैं। लोगों का हमारे प्रति इंप्रेशन खराब हो जाता है।”

फ़िल्म इंडस्ट्री में औरतों के शोषण की बात चली तो वह बोले, ‘इसमें भी आधी गप होती है।“ फिर वह पुरुष मानसिकता पर आ गए, “जब हम सड़क पर चलते हैं तब औरतों को धक्का मारते चलते हैं। फिर फ़िल्म इंडस्ट्री तो फिर भी फ़िल्म इंडस्ट्री है”।

फ़िल्मी एक्स्ट्राओं की बात चली तो वह कहने लगे, “एक्स्ट्राओं की हालत अब पहले से बहुत बेहतर है”। बात फ़िल्मों में ‘फैंटेसी’ की चली तो वह बोले, ‘फैंटेसी’ तो सिनेमा की ज़रुरत है।

“आप अपनी सब से महत्वपूर्ण फ़िल्म का नाम लेंगे?”

“किसी एक का नहीं चार पांच का ले सकता हूँ। कथा, बाज़ार, महानंदा, उमराव जान।"

“कथा में जो चरित्र आप ने किया था, कहते हैं बासु भट्टाचार्य को केंद्र में रख कर यह चरित्र सई परांजपे ने रचा था?”

“कहने को तो कोई कुछ भी कह सकता है।”

“तो क्या इस फ़िल्म को करने के पहले बासु भट्टाचार्य के चरित्र को आपने बहुत बारीकी से जांचा था?"

“नहीं। बिल्कुल नहीं। और मैं नहीं समझता कि बासु भट्टाचार्य को ध्यान में रख कर वह चरित्र रचा गया था। बासु ऐसे नहीं हैं।”

‘गर्म हवा’ से फ़िल्मी जीवन शुरु कर ‘गमन’ से अपनी पहचान बनाने वाले फ़ारुख शेख अब तक कोई 23 फिल्मों में बतौर नायक आ चुके हैं। यह पूछने पर कि, “फिल्मों में मिला हुआ पैसा कहाँ इंवेस्ट करते हैं?”

वह बोले, “पैसा बचता ही नहीं।”। इंवेस्ट क्या करुंगा?

“एक फ़िल्म का औसतन आप कितना पैसा लेते हैं”?

“सागर सरहदी की ‘बाज़ार’ जैसी फ़िल्म में मुफ़्त में भी काम किया है। कहीं कम ज़्यादा भी कर लेता हूँ। पर आप औसतन पूछ रहे हैं तो तकरीबन चार लाख रुपए लेते हैं एक फ़िल्म का”। फ़ारुख का सब से पसंदीदा काम फ़िल्म ही है पर वह भूकंप, मंदिर, मंडल जैसे मुद्दों पर भी खुल कर बोलते हैं। और मानते हैं कि, सारे हालातों के लिए ज़िम्मेदार राजनीतिज्ञ हैं। इन को ठीक करना सीख जाएं हम तो हमारा मुल्क दुनिया के नक्शे पर फिर से अव्वल हो जाए।” वह बात फिर दुहराते हैं, “75 प्रतिशत समस्याएं हमारे देश के राजनीतिज्ञों की देन हैं।” और कहते हैं, “पर अब स्लीपिंग पार्टनर की तरह देश नहीं चल सकता। इस तरह तो केले का ठेला भी नहीं चल सकता। कि साहब पूँजी लगा दी और सो गए। पर अफसोस कि हमारे देश का वोटर यही कर रहा है।”

शायद यह उन की सोच का ही प्रतिफल है कि फ़ारुख पहले फ़िल्मों की शूटिंग के सिलसिले में लखनऊ आते थे। पर अब उन का लखनऊ आना दूसरे कामों से भी होने लगा है। जैसे पिछले बरस जब वह लखनऊ आए थे तो यही मौसम था। लेकिन वह उत्तर काशी में आए भूकंप से तबाह लोगों को राहत सामग्री भिजवाने के इंतज़ाम के फेर में तब लखनऊ आए थे। और अब की लखनऊ धर्मनिरपेक्ष जन अभियान के सम्मेलन में शरीक होने वह आए थे। परेशान वह पिछली बार भी थे पर अब की वह तबाह थे। तो इस शिफ़त की कैफ़ियत सिर्फ़ यही भर नहीं हो सकती कि मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में उन के पास काम ज़्यादा नहीं है बल्कि सबब यह भी है कि सामाजिक सरोकारों के प्रति भी वह किंचित सचेत हैं।

Saturday, 14 April 2012

आज की स्त्री की जिजीविषा - अपने लिए अपनों के खिलाफ

- सुधा शुक्ला

'बांसगांव की मुनमुन' दयानंद पांडेय का नवीनतम उपन्यास है। बांसगांव पूरी बंसवारी की महक ले कर उपन्यास में उपस्थित हुआ है। जो बांस व्याह के मंडप में वंश वृद्धि के लिए गाड़ा जाता है, जो बांस परिवार के सिर पर छप्पर के रुप में उपस्थित रहता है, वही हाथ में आते ही 'लाठी' बन जाता है। बांस की समस्त उपयोगिताओं की भांति दयानंद का यह उपन्यास आरंभ से ही 'थ्री डाइमेंशन अप्रोच' ले कर चलता है। ग्रामीण समाज में शिक्षा और स्त्री शिक्षा को ले कर चलने वाला यह उपन्यास आज के ग्रामीण समाज के यथार्थ का आइना है। एक तरफ शिक्षा परिवार में प्रगति समृद्धि ले कर आती है वहीं कई ईर्ष्या-द्वेष का साधन भी बन जाती है। यह जानना ही काफी नहीं है जैसे। बांसगांव की मुनमुन का कथानक इसे पूरी तरह यथार्थ के धरातल पर ला कर पाठक के सम्मुख परोस देता है। स्त्री-शिक्षा के ग्रामीण परिवेश में कैसे आयाम उपस्थित हो रहे हैं, इस से अधिक समाज के दोमुंहेपन को लेखक ने उजागर किया है। जो शिक्षा लड़कों के लिए उन्नति-प्रगति और समृद्धि की राहें खोल देती है, वही शिक्षा लड़कियों के लिए 'कैसा और कितना स्पेस' समाज में बना पाती है? यह एक चुभता हुआ सवाल है। लेखक के इस प्रयास को वही पाठक पूर्णत: ग्रहण कर पाएगा जो स्वयं उस ग्रामीण परिवेश और उस के 'सामाजिक परपंच' से जुड़ा रहा हो या फिर उस का सामना हुआ हो। जब शिक्षा की डिग्री नायिका मुनमुन को शिक्षा मित्र की नौकरी दिलाती है, तब उस के अफ़सर भाइयों को कोई खास ऐतराज नहीं होता है। लेकिन जब वही शिक्षा मित्र की नौकरी उसे स्वावलंबन और 'अपनी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जीने की सोच दे देती है' तब सारे नाते-रिश्ते उस की सोच के खिलाफ आ खड़े होते हैं। सर झुका कर बिना जांचे परखे वर से ज़बरदस्ती की कर देते हैं जिस बहन की, इस बहन पर भाइयों का स्नेह उमड़ा पड़ता था। वही बहन जब ससुराल की नरक छोड़ हमेशा के लिए मायके में रहने का तय करती है तब वह पूरे परिवार की नाक कटवाने वाली दुशमन बन जाती है। यहां तक कि निराश्रित बहन के आसरे पर जीवन काटते माता-पिता भी उस बहन का साथ देने के कारण निकृष्ट हो जाते हैं। यह उपन्यास जहां एक तरफ शिक्षित लड़की की अस्मिता के संघर्ष को ले कर चलता है, वहीं छोटे शहर या ग्रामीण समाज की मानसिकता को भी उजागर करता चलता है। शहर में रहने वाले अफ़सर भाई हों या विदेश में रहने वाला, सब बहन की शादी में लाखों रुपए खर्च करने का जुगाड़ तो कर लेते हैं लेकिन बहन की इच्छा-अनिच्छा या फिर वर को देखने-समझने के लिए समय नहीं जुटा पाते हैं। लड़की की शादी कर गंगा स्नान करने वाली परंपरा की सोच अभी भी बची हुई है। चाहे वह गंगा कितनी भी प्रदूषित क्यों न हो गई हो।

दयानंद पांडेय के पूर्व उपन्यास राजनीति और मीडिया के अंतरंग जगत को उजागर करने वाले रहे हैं। पूर्व उपन्यासों के स्त्री पात्र पीड़ित, शोषित और भोग्या रुप में ही अधिकता से आते रहे हैं। स्त्री-संवेदना और आज की ग्रामीण लड़की का अपनी अस्मिता, अपने अस्तित्व का संघर्ष और विजयी होने वाली नायिका मु्नमुन का चरित्र उन के अन्य स्त्री पात्रों से बहुत अलग है। ग्रामीण परिवेश की हलचल, सामाजिक पारिवारिक ईर्ष्या-द्वेष, चालें-कुचालें और उस अंचल की विवशता में 'बझे' पात्रों का जितना अच्छा मनोवैग्यानिक विशलेषण दयानंद ने प्रस्तुत किया है, वह काफी समय की मांग करता है। लेकिन जिस तीव्र गति से वे हर साल लगभग दो किताबें प्रकाशित करवा रहे हैं वह प्रशंसनीय है।

उपन्यास भले ही मुनमुन के जीवन संघर्ष को साथ ले कर चलता है लेकिन उस के साथ ही गिरधारी राय, मुनक्का राय के जीवन, सोच और चालों की उठा-पटक को भी ले कर चलता है। उपन्यास के सभी पात्र 'ग्रे शेड' वाले हैं। न कोई पाशविक है, न कोई देवता। बल्कि उपन्यास पढ़ते समय उस के पात्रों से पाठक अपने आस-पास के पात्रों से जोड़ता चल सकता है। ग्रामीण परिवेश से निकल कर बड़े अफ़सर बने अनेक रमेश, धीरज हमारे समाज में आसानी से दिख जाते हैं। वहीं गिरधारी राय और मुनक्का राय जैसे चरित्र भी दुर्लभ नहीं हैं। गिरधारी राय भले ही ईर्ष्या-द्वेष के पुतले हों लेकिन मुनक्का राय भी उस से अछूते नहीं हैं। बड़े बेटे का करियर तबाह करा उनका वकालत करवाने का निर्णय हो, मुनमुन की शिक्षा मित्र की नौकरी हो या फिर गिरधारी राय की मृत्यु के समय श्मशान प्रसंग और अंत में मुनमुन के पी.सी.एस. में चयन के समय का स्वगत कथन हो। वहीं रमेश का चरित्र है जो पिता के एक आदेश पर अपना कैरियर खराब कर समाज-परिवार में उपेक्षित होता है। लेकिन जज बनते ही उसी माता पिता और बहन के लिए उस के पास न समय होता है, न धन। धीरज यानी 'निश्चित प्रसाद' 'अनिश्चित प्रसाद' जो शिक्षक की नौकरी में माता-पिता ही नहीं पूरे परिवार का पालन करता है। वह अंत में माता-पिता से फ़ोन पर भी बात तक नहीं करता, उन के पालन-पोषण, देख-भाल तो दूर की बात है। बैंकाक में रहने वाले भाई राहुल का चरित्र पूर्वांचल के भाइयों की मानसिकता का सही आकलन करता है। जो अच्छे दोस्त के साथ भी बहन के प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। बहन की जबरदस्ती की गई शादी में लाखों भर ही नहीं खर्चता बल्कि हंसी-मजाक कर शादी की रौनक में खोया रहता है। उसे अपनी बहन मुनमुन की ज़िंदगी और खुशी अपने थोथे सम्मान और खर्चे गए पैसे के मुकाबले कुछ नहीं लगती है। रमेश 'मेरे घर आई एक नन्हीं परी' गीत को सुन कर संवेदनशील तो होता है, यानी घर में नन्हीं परी तो अच्छी है लेकिन पंखों से उस का उड़ान भरना मना है। बैक ग्राउंड में रहने वाले चनाजोर गरम वाले तिवारी जी का चरित्र भारतीय समाज के उस पक्ष पर प्रकाश डालता है जो भले ही झंडा ले कर नहीं चलते लेकिन सच्चाई और अच्छाई का साथ देते हैं, देना चाहते हैं।

उपन्यास के अंत में आए नायिका के फुफेरे भाई दीपक के माध्यम से लेखक पूरे सामाजिक ताने-बाने के खोखलेपन को उधेड़ कर रख देता है। हर भाई जानता है कि उन की जल्दबाज़ी और गैर-ज़िम्मेदारी के कारण नायिका मुनमुन की शादी गलत घर में गलत व्यक्ति से हुई है, फिर भी हर कोई मुनमुन से उस पति और परिवार से 'एडजस्ट' करने की उम्मीद रखता है। जिस परिवार का मुखिया घनश्याम राय अपने लड़के राधेश्याम राय की नाकाबिलियत को मानते हुए भी मुनमुन की विदाई और नौकरी छुड़ाने की ज़िद पर अड़ा है। यहां तक कि बेटे के नाकारापन की जगह वह स्वयं 'भरने' को तैयार है और पूरी बेशर्मी से।

पूरे उपन्यास में दीपक के अलावा किसी को भी मुनमुन के जीवन की चिंता नहीं है। विशेष कर स्त्री पात्र, चाहे नायिका मुनमुन की बहनें हों या भाभियां। मुनमुन के पति के द्वारा बवाल काटने पर अड़ोस-पड़ोस की महिलाएं और चनाजोर गरम बेचने वाले तिवारी जी भले ही अपने गीतों से मुनमुन के साहस को संबल देते हैं, लेकिन परिवार की किसी भी महिला की संवेदना मुनमुन के पक्ष में नहीं है। नायिका मुनमुन की मां भी पशोपेश में रहती है। कभी बेटी की तरफ होती है, तो कभी बेटों की तरफ हो जाती है, तो कभी समधी को भला-बुरा कहती है, तो कभी मुनमुन से दूसरी शादी के लिए भी कहती है।

बांसगांव की मुनमुन उपन्यास का कहन इतना गठा हुआ है कि उपन्यास एक बैठक में पढ़ा जा सकता है। व्यंग्य का पैनापन शुरु से आखिर तक उपन्यास में बना रहा है। परित्यकता स्त्री के प्रति समाज के नज़रिए को उघारने में लेखक ने कोई संकोच नहीं किया है। मुनमुन की मां जब उस से एक जगह दूसरा विवाह कर लेने को कहती हैं तो मुनमुन मां से कहती है कि, 'साथ घूमने-सोने के लिए तो सभी तैयार रहते हैं हमेशा ! पर शादी के लिए कोई नहीं।' उस का यह संवाद उस की सारी दबंगई, उच्छृंखलता के खोल में छुपी स्त्री मानस की व्यथा को बखानता है। आशावादी अंत कहानी को पूर्णता दे कर स्त्री की अपनी शर्तों पर जीने की जिजीविषा को जगाए रखने में सफल रहता है। दरअसल अपने लिए अपनों के खिलाफ लड़ती हुई मुनमुन आज की भारतीय स्त्री का एक दारुण सच है।

समीक्ष्य पुस्तक:

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

Sunday, 8 April 2012

भदेस वीर बहादुर सिंह की देसी बातें

भदेस वीर बहादुर परदेस जा कर, पेरिस जा कर मरेंगे - यह भला कौन जानता था? ठीक वैसे ही जैसे गोरखपुर और उन के गाँव हरनही के लोग यह नहीं जानते थे कि उन के गाँव का उन के शहर ज़िले का यह गँवार सा दिखने समझने वाला नेता प्रदेश और देश की राजनीति का शिखर छुएगा। लेकिन वीर बहादुर ने इस शिखर को छुआ और अपनी माटी में मरने के नसीब से महरूम हो गए।

उन के निधन के दो ही बरस पहले की बात है। जून 88 में उन्हों ने अपने बड़े भाई की बेटी के हाथ पीले किए थे। शादी पहले ही से तय थी - शादी की तारीख भी। तब यह प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री थे - चाहते तो वह लखनऊ में ही शादी की जगह तय कर सकते थे। लेकिन नहीं, उन्हों ने गोरखपुर शहर में भी नहीं पैतृक गाँव हरनही में ही शादी करनी ठीक समझी। न सिर्फ़ इतना ही वरन् उन्हों ने अपने चुने हुए रिश्तेदारों और गिने हुए व्यक्तिगत मित्रों को ही इस शादी का न्यौता दिया था। इस शादी को ‘सार्वजनिक’ नहीं होने देने का उन्हों ने भरसक यत्न किया।

इत्तफ़ाक था कि शादी के चंद रोज पहले ही वह प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री से भारत सरकार के संचार मंत्री हो गए थे। शपथ लेने के दो रोज बाद ही वह गुपचुप गोरखपुर गए तो वहाँ अफवाह उड़ी कि वीर बहादुर के पाँव उखड़ गए। कि वीर बहादुर अब संन्यास ले लेंगे। कि अब वह गोरखपुर ही रहने आए हैं। आदि-आदि। किसी को यह खबर नहीं थी कि वह अपनी भतीजी के हाथ पीले करने आए हैं। यहाँ तक कि ज़िला प्रशासन के भी कई अधिकारियों, स्वनाम धन्य मठाधीशों और नेताओं को भी इस की भनक नहीं थी। इक्का-दुक्का गिने-चुनों को ही यह मालूम था कि उन की भतीजी की शादी है। तब भी दिलचस्प यह था कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और ज़िलाधिकारी आपस में मशविरा कर रहे थे कि मुख्यमंत्री जी का हवाई अड्डे से कैसे-कैसे उन के गाँव की ओर काफिला जाएगा। यह और कुछ अन्य पुलिस अधिकारी इस चिंता में भी दुबले हुए जा रहे थे कि ‘मुख्यमंत्री जी’ को यह एहसास तनिक भी न हो वह अब मुख्यमंत्री नहीं हैं तो उन के स्वागत में, इंतजाम में कोई ढील हो गई है। उन के व्यक्तिगत मित्र तो उन को यह एहसास भी होने नहीं देना चाहते थे कि उन के मुख्यमंत्री नहीं रहने से संबंधों की गरमाहट सर्द हो जाएगी। वह और भी गरम जोशी से मिल रहे थे। बीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद पहली बार गोरखपुर आए थे। उसी चिरपरिचित बेलौस सहज पर व्यस्त से व्यस्ततम अंदाज़ में। वह हरनहीं जाने लगे तो तैयारी से मालूम ही हो गया कि घर में शादी है। हल्ला हो गया कि वीर बहादुर सिंह की बेटी की शादी है आज। फिर क्या था लोग उमड़ पड़े। वीर बहादुर सिंह ने बड़ी सख्ती से लोगों और तमाम अधिकारियों को ताईद किया कि कोई हमारे घर नहीं आए। यह हमारा पारिपारिक मामला है। जिस को बुलाया है वही आए। बाकी के आने की ज़रूरत नहीं है। इतनी बेरूखी से और वह भी सार्वजनिक रूप से वीर बहादुर सिंह ही कह सकते थे, ‘मेरे घर मत आइए।’ उन के विरोधी कहने लगे, ‘‘खिसिया गया है। बेइज्जती से डरता है कि कम लोग आएंगे तो कद-कट जाएगा, आदि-आदि।

पर वीर बहादुर सिंह के बेइज्जती किए जाने की हद तक मना करने के बावजूद न सिर्फ़ उन के साथ भारी काफिला हरनही पहुँचा। बल्कि जिस भी किसी को मालूम पड़ा शाम तक वह भी शहर से कोई 30 किलोमीटर दूर उन के गाँव पहुँचता गया। शाम तक वहाँ का माहौल शादी का नहीं मेले का सा हो गया था।

वीर बहादुर सिंह को अंधेरा होते-होते एहसास हो गया था कि उन के लोगों का उन के प्रति प्यार और बढ़ गया था। अलग बात है कि वहां जा कर लोगों को पता लगा कि वीर बहादुर की बेटी की नहीं उन के अग्रज जो अब इस दुनिया में नहीं हैं उन की बेटी के हाथ पीले करने वह संचार मंत्री की शपथ लेने के दो ही दिन बाद गोरखपुर नहीं अपने गांव आए थे। इसी हफ़्ते तत्कालीन उप रेल मंत्री महावीर प्रसाद की बेटी की भी शादी थी। उन्हों ने सब को न्यौता भी दिया था पर उस के पासंग बराबर भी लोग महावीर प्रसाद के घर नहीं पहुंचे जितने हरनहीं में पहुंच कर रावा लगा गए थे। यह तो सिर्फ़ एक घटना है वीर बहादुर सिंह के गोरखपुर और हरनहीं से उन के और लोगों के उन से लगाव की। ऐसी जाने कितनी घटनाएं संदर्भ और स्थितियां और स्मृतियाँ मन में तैर-तैर जाती हैं जिन सब को समेट पाना यहाँ संभव नहीं है।

ऐसा भी नहीं है कि वीर बहादुर सिंह की छवि लोगों के मन में आदर्शवादी जुझारू और कर्मठ नेता के रूप में बसी हो। दरअसल वीर बहादुर सिंह तो द्वंद्व-फंद और फरेबी राजनीति के नाते ही लोगों के दिलोदिमाग पर छाए रहें। कई हास्यास्पद स्थितियों के नाते भी वह ज़्यादा जाने जाते रहे। सलीके से बोलने बतियाने तो उन्हे आता ही नहीं था। वह ठेठ गंवई अंदाज़ में ही बतियाते थे। पुचकारते और डांटते थे तो बहुतों का यह नहीं भाता था। तो उन्हें जाहिल और गँवार करार दे दिया गया। इस से उन्हें कभी कोफ्त भी नहीं हुई कि लोग उन्हें भदेस बताते हैं। उन्हें कभी यह शिकायत भी नहीं हुई कि लोगों की राय में उन्हें बोलने नहीं आता। भरी जनसभी में बिजली की शिकायत पर, ‘‘तार मेरी पिछाड़ी में खोंस दो’ कहने वाले राजनारायण कह गए कि वीर बहादुर सिह तो जब पढ़ते थे तब हास्टल के मेस से पिसान (आटा) चुराते थे तो भी वीर बहादुर कुछ नहीं बोले। गोरखपुर से ही विधायक हरिशंकर तिवारी तो लगातार उन पर भ्रष्टाचार के आरोप ही लगाते रहे। लेकिन वह नहीं बोले। बाद में वीर बहादुर के पाले पोसे विधायक रामलक्षन भी आरोपों का पुलिंदा ले कर आंदोलनरत हो गए तो भी वीर बहादुर नहीं बोले।

याद आता है कि जब जनमोर्चा में जाने से पहले संजय सिंह ने वीरबहादुर के खिलाफ एक तूफान ही खड़ा कर रखा था तब नकवी, सुरेंद्र सिंह के इस्तीफे हो चुके थे। संजय सिंह ने एक बड़ा ही उत्तेजक बयान जारी किया था। मै ने संजय सिंह से उसी शाम पूछा कि अगर वीर बहादुर आप से भी इस्तीफा मांग लें तो? संजय सिंह फैल कर बोले, ‘‘उस की इतनी हिम्मत नहीं है। मांग कर तो देखें। वह मुख्यमंत्री नहीं रह पाएगा।’’

वीर बहादुर सिंह उस दिन लखनऊ में नहीं थे। दिल्ली में ही डेरा जमाए आर-पार की लड़ाई लड़ रहे थे। उसी शाम उन के घर से मैं ने दिल्ली फ़ोन कर के संजय सिंह के बयान और उन के कहे को अक्षरशः बताया तो वह बोले, ‘कहे द उन्हें न। जवन चाहें तवन कहें।’ हमने बहुत कोशिश की कि वह कुछ कहें। प्रतिक्रिया शब्द सुन कर बिफर पड़े। बोले, 'कोई प्रतिक्रिया व्रतिक्रिया नहीं। इस बातचीत का ज़िक्र भी नहीं। समझे।’ कह कर वह बोले, ‘कहीं जाना है। पर न इसे छापना न किसी को बताना।’ मैं यह सोच कर हिल गया कि कहीं वीर बहादुर की कुर्सी तो नहीं जाने वाली? पर नतीज़ा सामने था। इसी हफ्ते संजय सिंह का इस्तीफा हो गया था। इस्तीफे की ही शाम वीर बहादुर लखनऊ आए और प्रेस कांफ्रेस की। इस कांफ़्रेंस में वह बोले और खूब बोले। क्या-क्या नहीं कहा संजय सिंह के बारे में। वीर बहादुर ‘बिलकुल हरियराये हुए थे। बोले दुनिया के जेतने ऐब हें संजय सिंह में हैं। बताइए। बताइए दिल्ली जाते हैं तो यू0 पी0 निवास या यू॰ पी॰ भवन में नहीं पांच सितारा होटलों में ठहरते हैं।

क्या करते हैं वहां ये? ऐबैं ऐब हैं। दूसरे रोज लखनऊ के सारे अखबारों ने वीर बहादुर उवाच में संजय सिंह के ऐब छांटे छापे। पर मानहानि की अदालती नोटिस तो दूर अखबारों को दो लाइन का खंडन भी संजय सिंह का नहीं आया कि यह सब गलत है। क्यों कि वीरबहादुर बोले थे।

संजय सिंह सैय्यद मोदी हत्याकांड के बाद पद-यात्रा कर रहे थे। उन्हीं दिनों राजीव गांधी का अमेठी दौरा भी पड़ा। दौरे की जनसभाओं में किसी भी ने मोदी हत्याकांड या संजय सिंह के बावत कुछ नहीं बोला। पर वीर बहादुर बोले। बोले, ‘देखिए क्या क्या कर के अब पद-यात्रा कर रहे हैं।’

एक बार गौरीगंज (सुल्तानपुर) की एक जनसभा में राजीव के तकनीकी सलाहकार सैम पित्रोदा ने डाक विभाग के डाक वितरण की ऐसी तैसी करते हुए बताया कि हमारी योजना है कि गांव-गांव टेलीफ़ोन लग जाएं ताकि लोग चिट्ठियों पर निर्भर न रहें। ऐसा ही कुछ बोले थे सैम पित्रोदा। सब ने तालियां बजाई। पर जब इस मसले पर वीर बहादुर बोले तो तालियों की गड़गड़ाहट गूंज गई। इन गूंजी तालियों में राजीव की भी तालियां शुमार थीं। वीर बहादुर बोले कि आप किस को फ़ोन देने जा रहे हैं? गांव वालों को। जिन को चिट्ठी भी लिखने नहीं आती। पेट में रोटी नहीं होती। फिर वह किस को फ़ोन करेंगे और कौन करेगा उन को फ़ोन? देना ही है तो हर गांव को चिट्ठी लिखने वाला और पोस्टकार्ड दिया जाए। तालियों की गड़गड़ाहट बरबस ही हो गई और राजीव गांधी भी मुसकुरा कर ताली बजा गए।

कहते हैं सैम पित्रोदा को यह सब रास नहीं आया और तभी से उन्हों ने वीर बहादुर को ‘फेल’ करने की ठानी। पत्नी चंपा देवी का संग साथ छूटने से वह टूटे तो थे ही सैम पित्रोदा की शेखी ने भी उन्हें कम नहीं तोड़ा था। अच्छे-अच्छे खुर्राट व्यूरोक्रेटों को उन्हों ने उन की औकात में कर दिया था। पर सैम पित्रोदा राजीव के तकनीकी सलाहकार का तमगा ताने हुए थे। वीर बहादुर पित्रोदा को उन की मांद में डाले बिना कूच कर गए तो इसका मलाल भी वह साथ ज़रुर ले गए होंगे।

याद आता है जब वह मुख्यमंत्री बने थे तब उन की गंवारू, बोली पहनावे की हर कोई जब तब नोटिस लेता रहता था। इत्तफाक से तब महावीर प्रसाद भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। उन के भी बोलने में भदेसपन बदकता था। संयोग से दोनों गोरखपुर के ही थे। सो गोरखपुर के लोगों को इन दोनों नेताओं की अनगढ़ छवि के चलते जाने-अनजाने खमियाजा भुगतना ही पड़ता था। फिकरा सुनना ही पड़ता था। तो भी फख होता था कि हम गोरखपुर के हैं। अपनी माटी का लाल राज कर रहा है।

मुख्यमंत्री बनने के बाद वीर बहादुर सिंह की देशज बोली तो फिर भी नहीं बदली। पर कुछ ही महीने बाद उन का पहनावा बदल गया। उन के कर्मचारियों की बड़ी कोशिश रही कि वह सुंदर और सलीकेदार दिखें। इसी क्रम में वह चूड़ीदार पायजामा पहनने लगे। शेरवानी भी उन की देह पर आई और गोल्डेन फ्रेम का चश्मा भी। उन के चेहरे को भी तरसवाया गया। और सचमुच वह ‘स्मार्ट’ दिखने लगे। उन के सूचनाधिकारी मेहता को एक दिन देखा कि गोल्डेन फ्रेम चश्में वाली तसवीर देख-देख गदगद हो रहे थे कि अब अपना मुख्यमंत्री ‘लुकेबिल’ लगने लगा है। लेकिन वीर बहादुर तो वीर बहादुर थे। कर्मचारियों द्वारा लाख चाक चौबंद करने के शाम की महफ़िल में वह फिर भदेस बन जाते थे। एनेक्सी के मुख्यमंत्री कार्यालय में बाहर के कमरे में बैठे वह टी. वी. न्यूज के बहाने भीतर वाले कमरे में सब को लिए-दिए घुस जाते थे। बैठे-बैठे बतियाते-बितियाते वह आराम की मुद्रा में टेक ले कर बैठ जाते थे और फिर वह टांग फैला कर लेट जाते थे। मैं ने देखा यह उन का नियमित क्रम था। चाहे दिन हो या रात। सिंचाई मंत्री रहे हों या मुख्यमंत्री। वह बतियाते-बतियाते ले्ट ज़रूर जाते थे। लेटते समय वह इस कांपलेक्स में भी नहीं पड़ते थे कि बगल में स्वरूप कुमारी बक्शी भी बैठी हैं कि दीपाकौल, कमला साहनी या सुमनलता दीक्षित सरीखी महिलाएं भी अपनी-अपनी भाव भंगिमा में बैठी हैं। या कि अन्य कैबिनेट मंत्री भी बैठे हैं, विधायक और अधिकारी व्यापारी भी बैठे हैं कोई दिक्कत नहीं होती थी उन्हें वह तो बस लेट जाते थे तो लेट जाते थे। कोई उन्हें थका जान कर चलने को होता तो कहते, ‘बैठो चाय पी कर जाओ। फिर चाय आ जाए तो भी, न आ जाए तो भी लोग बैठे रहते थे और वह लेटे । यह करना हर किसी के वश का नहीं होता। यह वीर बहादुर ही कर सकते थे।

कुछ ऐसा ही नजारा था उन के मुख्यमंत्री बनने के पहले दिन का। लखनऊ में बाढ़ की विपदा बंटाने राजीव गांधी आए थे। जाते समय अमौसी हवाई अड्डे पर जहाज में देर तक राजीव के साथ वीर बहादुर पड़े रहे और मुख्यमंत्री नारायणदत्त तिवारी जी थोड़े असहज हुए तो दूसरे रोज लखनऊ के अखबार इस घटना के ज़िक्र और वीर बहादुर के मुख्यमंत्री बनने की संभावना से पटे पड़े थे। फिर नारायण दत्त तिवारी का इस्तीफा भी हो गया और दिल्ली से आये पर्यवेक्षकों का नाटक भी। अफरा-तफरी मची हुई थी। पर वीर बहादुर विधान भवन के अपने सिंचाई मंत्री वाले कमरे में खामोश बैठे थे। विधायक/पत्रकारों से घिरे वीर बहादुर कोई संकेत नहीं दे रहे थे। जो भी आता हार्टिको जूस पी पी कर उन्हें मुख्यमंत्री होने की बधाई देता जाता। पर वह तो जस के तस थे। न उत्तेजना, न उदासी। कुछ भी उन के चेहरे पर नहीं था। न ही उन की जबान पर। हां, कुछ चमचे टाइप लोगों ने जब उन के कसीदे पढ़-पढ़ तिवारी जी को कोसना शुरू कर दिया तो वह चुप नहीं रह पाए। अपने अंदाज़ में ही बोले, ‘‘नहीं-नहीं तिवारी केंद्र में जा रहे हैं।’ पर दुबारा फिर वह चुप थे। फिर तो मुख्यमंत्री मनोनीत होने के बाद प्रशसंकों की जो धक्का-मुक्की उन्हें मिली - बिलकुल पराकाष्ठा थी, धक्का-मुक्की की जो शायद ही किसी और मनोनीत मुख्मत्री को नसीब हुई हो और हो।

तो वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री पद का शिखर छू लिया। और काफी दिन तक मालायें पहनते रहे, जश्न चलता रहा। बिलकुल गंवई स्तर और ज़िला स्तर के नेता उन की महफिल में डटे रहते। बहुत लोगों को यह सब नहीं भाता था। अब जैसे कि जार्ज फर्नाण्डीज एक शाम वीर बहादुर से मिलने गए तो उन्हें बड़ा बुरा लगा कि अभी तक जश्न चल रहा है और भीतर गए तो और भी सन्न रह गए। सन्न रहने की बात ही थी। इतने बड़े नेता होने के बावजूद जिस मुख्यमंत्री से यह समय ले कर मिलने गए थे उसी मुख्यमंत्री के बगल में पहले ही से उन की पार्टी का ज़िलाध्यक्ष घुटने तक धोती उठाए बैठा हुआ था। यह ज़िलाध्यक्ष कोई और नहीं गोरखपुर के रामकरन सिंह थे जो तब जनता पार्टी के् ज़िलाध्यक्ष थे जो बाद में विधान परिषद सदस्य भी हुए। जनता पार्टी से बगावत कर कें। यह और ऐसी जाने कितनी घटनाएं है। जो वीर बहादुर के मन और चरित्र को कभी चार चांद लगाती हैं तो कभी थू-थू करवाती है।

जनमोर्चा की अंगड़ाई के तब दिन थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह बोफ़ोर्स ले कर गरज रहे थे। ललकार वह भले राजीव गांधी को रहे थे पर ज़मीनी स्तर पर उत्तर प्रदेश में उथल-पुथल मची हुई थी। उन दिनों मैं दारुलशफ़ा के ए ब्लाक में ही रहता था। वीर बहादुर सिंह ने ही वह फ़्लैट मेरे लिए आवंटित किया था। दारुलशफ़ा में ही एक शाम गुपचुप कई कांग्रेसी विधायकों की बैठक की खबर मुझे मिली। मैं ने जब पता किया तो पता चला कि २२ कांग्रेसी हरिजन विधायकों ने जनमोर्चा ज्वाइन करने का प्रस्ताव गुपचुप पास किया था और विश्वनाथ प्रताप सिंह को चिट्ठी लिखी थी। खबर पक्की थी। तब कांग्रेस मेरी बीट नहीं थी। फिर भी मैं ने तब स्वतंत्र भारत के संपादक वीरेंद्र सिंह को यह खबर बताई। उन्हों ने कहा कि तुम खबर लिखो। दूसरे दिन यह खबर बैनर बन कर छपी स्वतंत्र भारत में। अब जैसे कोहराम मच गया। दिल्ली-लखनऊ एक हो गया। लेकिन शाम तक लगभग सभी विधायकों का खंडन आ गया। लेकिन मेरी खबर पक्की थी। मैं ने वीरेंद्र सिंह जी से कहा कि यह खंडन सिर्फ़ एक दिन के लिए रोक दीजिए। दूसरे दिन मेरे जवाब सहित इसे छापिए। एक दिन में कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा। वह बोले, 'पहाड़ तो अभी टूट रहा है। पर चलो देखते हैं।' खैर एक दिन बहुत मुश्किल से उन्हों ने यह खंडन रोक लिया। अब बाहर से ज़्यादा भीतर का दबाव बढ गया। एक तो स्वतंत्र भारत के तब के मालिक जयपुरिया का दूसरे एक विशेष प्रतिनिधि थे शिव सिंह सरोज का। कांग्रेस उन्हीं की बीट थी। वह तो मुझे इस्तीफ़ा देने की सलाह दे रहे थे, दूसरे प्रबंधन पर जोर दे रहे थे कि मुझे बर्खास्त कर दिया जाय। वीर बहादुर के कारिंदों के भी कान अलग भर रहे थे। खैर दूसरे दिन मुझे सभी विधायकों की दस्तखत वाले प्रस्ताव की फ़ोटोकापी मिल गई। अब स्वतंत्र भारत में एक साथ जब विधायकों का खंडन और उन के प्रस्ताव पत्र पर दस्तखत एक साथ जब छपा एक बार फिर से बैनर बन कर तो जैसे आग लग गई। रवायत के मुताबिक कुछ विधायकों ने मुझ पर ब्लैकमेल करने का भी आरोप लगाया। एक विधायक फूलचंद तो बाकायदा अखबार के दफ़्तर आ कर जनरल मैनेजर से मिले। एक बार पहले भी उन के खिलाफ़ एक खबर मैं लिख चुका था। सो वह और खिन्न थे। जनरल मैनेजर ने मुझे बुलवाया। उन से मिलवाया। और फिर उन से पूछा कि इन्हें जानते हैं? फूलचंद जी बोले, 'पहली बार इन से मिल रहा हूं।' जब कि इस के पहले वह शिकायत कर चुके थे कि मैं उन के घर जा कर उन्हें ब्लैकमेल कर चुका हूं। जनरल मैनेजर मुसकुराए और उन्हें बताया कि यह वही रिपोर्टर हैं, जिन की शिकायत आप ले कर आए हैं। वह भनभनाते हुए चले गए। पर माने नहीं। विधान परिषद में मेरे खिलाफ़ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश कर बैठे। और मुझे फ़ोन कर कहा कि जेल भिजवा कर ही दम लूंगा। बात फिर गरमा गई। लेकिन कांग्रेस के ही जगदंबिका पाल ने अप्रत्याशित रुप से इस पूरे मामले में मेरी मदद की। जब प्रस्ताव पर चर्चा शुरु हुई तो फूलचंद ने अपने वक्तव्य में एक जगह कह दिया कि इस समाचार को पढ कर मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। तो जगदंबिका पाल ने फ़ौरन उन की बात को पकड़ लिया और अध्यक्ष से कहा कि माननीय सदस्य का चूंकि मानसिक संतुलन बिगड़ गया है, सो इन को चिकित्सा की सुविधा दी जाए और फ़ौरन सदन से बाहर भेजा जाए नहीं हम लोगों को भी खतरा हो सकता है। लोग हंसने लगे। और मेरे खिलाफ़ विशेषाधिकार प्रस्ताव वहीं ध्वनिमत से गिर गया। बाद में पता चला कि राजीव गांधी के विशेष निर्देश थे कि यह प्रस्ताव पास नहीं होने दिया जाए। क्यों कि इस से लोगों में यह संदेश चला जाएगा कि दलित कांग्रेस से खिसक रहे हैं। हालं कि दलित तो सचमुच कांग्रेस से खिसक गए बाद के दिनों में। अब देखिए न राहुल गांधी घूम-घूम कर दलितों के घर रुक रहे हैं, खाना खा रहे हैं पर दलित कांग्रेस में नहीं लौट रहे हैं तो नहीं ही लौट रहे हैं। बहरहाल इस सब के बाद कई लोगों ने कई तरह से बताया कि वीर बहादुर सिंह इस सब से बहुत नाराज हैं। एक दिन वीर बहादुर सिंह से मुलाकात हुई तो मैं ने पूछा कि, 'सुना है आप बहुत नाराज हैं?'

'किस ने कहा?'

'कई लोगों ने।' मैं ने कहा।

'मैं ने कुछ कहा क्या?' वह बोले, 'चमचे पत्रकारों की मेरे पास कमी नहीं है। बहुत हैं। पर तुम आंख कान खोले रहो। इस खबर से लोग समझ रहे हैं कि मेरा नुकसान हुआ है। गलत सोच रहे हैं। अरे मैं तो इन बाइस में से कम से कम चार को तो मत्री बनाने जा रहा था और यह सब पीठ में छुरा घोंपने में लगे थे।' वह बोले, 'ओ तो दिल्ली से सिगनल का इंतज़ार था नहीं इन सबों के शपथ की तैयारी थी।' बाद में पता चला कि इस मंत्री सूची में फूलचंद का नाम सब से ऊपर था। हालां कि तब वीर बहादुर सिंह को कुछ लोगों ने सलाह दी कि संपादक को पटाना चाहिए। सो उन्हों ने तब के संपादक वीरेंद्र सिंह को पटाने की गरज से डिनर पर बुलवाया। पर सीधे न बुला कर, सूचना विभाग के अफ़सरों के मार्फ़त। वीरेंद्र सिंह को यह नागवार गुज़रा। पहले सूचनाधिकारी त्रिलोक सिंह मेहता आए और कहा वीरेंद्र सिंह से कि, 'माननीय मुख्यमंत्री जी, आज आप के साथ भोजन करना चाहते हैं।'

'अपने मुख्यमंत्री जी से कहिए कि पहले भोजन करवाने का सलीका सीखें। फिर भोजन पर बुलाएं।' वह बोले, 'मेहता जी अगर आप के साथ भोजन करना हो तो चलिए अभी चलता हूं। लेकिन इस तरह मुख्यमंत्री के साथ तो नहीं। और जो आप के मुख्यमंत्री को लगता है कि उन के साथ भोजन करने से खबरें नहीं छपेंगी तो कहिए कि यह गलतफ़हमी भी दूर कर लें।' मेहता घबरा कर भागे और यह बात सूचना निदेशक अशोक प्रियदर्शी को बताई। प्रियदर्शी जी आई.ए.एस. अफ़सर थे ज़रुर पर कायस्थीय कमनीयता भी भ्रपूरर थी उनमें। बेहद शिष्ट और बेहद मिलनसार। उन को लगा कि छोटा अफ़सर भेज देने से वीरेंद्र सिंह नाराज हो गए हैं। भाग कर खुद पहुंचे वीरेंद्र सिंह के पास। पर वीरेंद्र सिंह ने जो बात मेहता जी से कही थी, वही बात प्रियदर्शी जी से भी दुहरा दी। प्रियदर्शी भाग कर वीर बहादुर के पास गए। वीर बहादुर सिंह ने वीरेंद्र सिंह को खुद फ़ोन किया। पर वीरेंद्र सिंह ने उन से कहा कि, 'आज तो खाली नहीं हूं, फिर किसी दिन कहिएगा तो ज़रुर आ जाऊंगा।' वीर बहादुर ने उन से ठाकुरवाद का वास्ता भी दिया। पर वीरेंद्र सिंह नहीं माने। वीर बहादुर सिंह समझ गए कि किसी कुत्ता टाइप नहीं स्वाभिमानी टाइप संपादक से पाला पड़ा है। बाद में फिर से वीरेंद्र सिंह को भोजन पर बुलाया और सम्मान से तो वीरेंद्र सिंह गए भी। क्या आज भी किसी संपादक में इतना जिगरा है कि मुख्यमंत्री का न्यौता टाल दे? और कि किसी मुख्यमंत्री में इतनी बर्दाश्त या सहनशीलता है जो किसी संपादक का नहीं कहना बर्दाश्त कर ले? जाहिर है कि अब यह दोनों ही बातें संभव नहीं हैं। पर एक और घटना देखिए। तब वीर बहादुर जनमोर्चा नाम से बहुत भड़कते थे उन दिनों। फ़ैज़ाबाद के जनमोर्चा वाले शीतला सिंह को ठाकुरवाद के फेर में वह बहुत मानते थे। एक दिन वह विज्ञापन की बात करने लगे तो वीर बहादुर बोले,' पहले यह अपने अखबार का नाम बदलो। जनमोर्चा किसी सूरत में नहीं चलेगा!' अब उन को कोई यह समझाने वाला नहीं था कि बरसों पुराने किसी अखबार का नाम ऐसे ही नहीं बदल जाता। हालां कि आज के दौर में तो अब कुछ भी हो जा रहा है।

अमिताभ बच्चन उन्हीं दिनों जब आरोप पर आरोप भुगत रहे थे तो एक बार वह बोले कि आज लोग मेरी सफलता से मेरे पैसे से जल भुन रहे हैं जाने क्या-क्या कह रहे हैं। हिसाब मांग रहे हैं पर जब मैं ने बंबई के पार्कों की बेंचों पर भूखे पेट रातें गुज़ारीं उन रातों का हिसाब कोई नहीं मांगता। वीर बहादुर सिंह के साथ भी कमोवेश यही स्थिति है।

जनता सरकार के दिनों में अमेठी दौरे से गौरीगंज जाते हुए संजय गांधी सरे राह उन्हें बेइज्जत कर के उतार गए तो किसी ने अपनी गाड़ी में वीर बहादुर सिंह को नहीं बिठाया। इस अपमान और तिरस्कार के बावजूद वीर बहादुर गौरीगंज के डाक बंगले पहुंचे तो संजय गांधी उन पर फ़िदा हो गए। यह बात तो लोग याद करते हैं पर यह याद नहीं करते कि जनता सरकार के ही दिनों में इसी विधान भवन के सामने वह पुलिस की लाठियों से कूंचे गए थे। बहुत लोग नहीं जानते पर विधान भवन के सामने लगी गोविंद बल्लभ पंत की स्टैचू ने वीर बहादुर को थर-थर कांपते देखा है। जब लाठियों को झेलते तार की बाड़ फांदते वह पंत जी की स्टैचू की शरण में आए थे। तब रामनरेश यादव मुख्यमंत्री थे। हमें लगता है शायद इसी लिये यह रामनरेश यादव के कांग्रेस में आने को मन से स्वीकार नहीं कर पाए थे।

इसी लखनऊ से गोरखपुर जाने वाली रेलगाड़ियों में सेकंड क्लास के डब्बों में वह भी लैट्रीन के पास खड़े रात गुज़ारते हुए यात्रा करते हुए वीर बहादुर को कितने लोगों ने देखा है? तब जब कि वह राज्यमंत्री तक रह चुके थे। उन्हीं जनता सरकार के दिनों में गोरखपुर में गोलघर की बीच सड़क पर डिवाइडर पर खड़े ‘ए रेक्शा, रेक्शा। चिल्लाते हुए वीरबहादुर सिंह को भी मैं ने देखा है। तरैना नदी ने देखा है वीर बहादुर को तैर कर पढ़ने के लिए जाते हुए। वीरबहादुर के रिकार्ड मुख्यमंत्री बनने के बावजूद उस तरैना नदी पर तब मजबूत पुल वीरबहादुर भले नहीं बनावा पाए पर खजनी कस्बे को उन्होंने तहसील ज़रुर बना दिया, जहां कंबल बनाने का कारखाना खुलवाया।

यों तो गोरखपुर मंडल की राजनीति में पहले बाबा राघवदास (देवरिया) की जो छवि बनी न आज तक किसी की बनी न बन पाएगी। पूर्वांचल के गांधी कहे जाते थे बाबा राघवदास। फिर प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना तथा समाजवादी उग्रसेन (देवरिया) उभरे। बाद में महंथ दिग्विजय नाथ और पंडित सूरतिनारायण मणि त्रिपाठी की प्रतिद्वंद्विता गोरखपुर विश्वविद्यालय की राजनीति में उभरी तो कालांतर में खूनी खेल में खौल उठी। फिर यादवेन्द्र सिंह जो विधानसभा के उपसभापति भी रहे, रामायण राय (देवरिया) और बाद में मुख्यमंत्री टी. एन. सिंह को हरा कर रामकृष्ण द्विवेदी भी गोरखपुर मंडल की राजनीति में उभर कर सामने आये। तब तक वीरबहादुर सिंह भी राजनीति में आ तो गए थे, उपमंत्री भी बन गए थे पर जिसे उभर कर आना कहते हैं उस तरह नहीं आए थे। वैसे तो छोटी-मोटी गोटियां वीर बहादुर सिंह हमेशा से खेलते रहे थे। पर सब से बड़ी गोटी खेली उन्हों ने 1974 में विधान परिषद के एक चुनाव में। ग्राम सभापतियों को गोरखपुर मडल से एम. एल. सी. चुनना था और हरिशंकर तिवारी उम्मीदवार थे। तिवारी भी तब कांग्रेस में थे। पर कई कांग्रेसियों को यह ठीक नहीं लग रहा था पर विरोध की किसी में हिम्मत भी नहीं थी।

फिर यह बीड़ा उठाया वीर बहादुर सिंह ने। बाबू यादवेंद्र सिंह से संपर्क साधा और बड़ी खोज-बीन और ठोंक-पीट के बाद बस्ती के शिवहर्ष उपाध्याय को हरिशंकर तिवारी के खिलाफ मैदान में उतार दिया। शिवहर्ष उपाध्याय चुनाव जीत गए और हरिशंकर तिवारी मात्र ग्यारह वोटों से हार गए। इस के खिलाफ वह हाईकोर्ट भी गए। लेकिन शिवहर्ष उपाध्याय का टर्म खत्म हो गया पर मुकदमा नहीं। उसी समय विरोध स्वरूप तिवारी ने गोरखपुर बंद का आह्वान किया। इस बंद के दौरान गोरखपुर के तब के कोतवाल टाइगर योगेंद्र सिंह ने तिवारी को सरे बा्ज़ार बेइज्जत भी किया। बाद में इस पर बड़ा बवाल भी मचा। पर तिवारी वीर बहादुर का झगड़ा खुल कर सामने आ गया जो उन के मरते दम तक बरकरार रहा और कहीं अधिक घनत्व में। पर वीर बहादुर की यह पहली जीत थी। बाद में हरिशंकर तिवारी के मसले पर वीर बहादुर को अपने स्थानीय गुरू पंडित भृगुनाथ चतुर्वेदी ने फरवरी 1985 के विधानसभाई चुनाव में अपनी सीट न सिर्फ़ हरिशंकर तिवारी को सौंप दी बल्कि उन्हें जिताने के लिए जान लड़ा दी। तो जीतने के बाद हरिशंकर तिवारी ने भृगुनाथ चतुर्वेदी के निधन के बाद उन के नाम से अपने गांव टाड़ा में एक जूनियर हाईस्कूल खोला जो अब माध्यमिक स्कूल हो चुका है। जब कि चतुर्वेदी जी द्वारा ही बहलगंज में खोले गए नेशनल पी जी कालेज में उन की एक प्रतिमा भी स्थापित करवाई। इस तरह यह दुर्लभ संयोग है कि वीर बहादुर सिंह और हरिशंकर तिवारी जो दोनों दो ध्रुव रहे, एक ही गुरू भृगुनाथ चर्तुवेदी के शिष्य रहे। चतुर्वेदी जी अब नहीं हैं पर जब थे तो लोग कहा करते थे। गुरू गरूवै रहले, चेला चीनी हो गइलें।हालां कि चतुर्वेदी जी तपे तपाये स्वतंत्रता सेनानी थे और उन का बड़ा मान था।


अपने द्वंद्व-फंद के चलते गोरखपुर में वीर बहादुर बदनाम भी बहुत थे पर उन के द्वारा कराए गए विकास के कामों से उन्हें यश भी मिला है। खास कर उन के चुनाव क्षेत्र पनियरा की तो बस पूछिए मत। पनियरा खालिस तराई इलाका है। तराई मतलब घनघोर पिछड़ा इलाका का पर्याय। पर पनियरा जा कर यह भ्रम टूटता है। जहां पुलिया होनी चाहिए वहां पुल खड़ा है। हर गांव में नहर भी है। और ट्यूबवेल भी। अस्पताल भी कई। दो बड़ा अस्पताल। गोरखपुर में तराई होते हुए भी जितने विकास के पांव पनियरा में दौड़े हैं मैं समझता हूं गोरखपुर के किसी क्षेत्र में नहीं। पनियरा क्या है एक बहुत छोटा सा कस्बा है पर वहां से सुल्तानपुर, दिल्ली, लखनऊ, आदि अन्य कई जगहों के लिए सीधी रोडवेज बसें हैं। बीते तीस पैतीस सालों से। यह सब वीर बहादुर सिंह के किए का परिणाम है। इतना ही नहीं गोरखपुर क्षेत्र में खूनी खेल के खौलते लावे को ठंडा करने में भी वह बड़े कारण बने। माफिया ताकतों को न सिर्फ़ उन की मांद में बैठाए रखा उन के सारे ठेके पट्टे भी छिन्न-भिन्न कर दिए। यह हर किसी के वश की बात नहीं थी।

पर जहां वीर बहादुर ने गोरखपुर में विकास के पांवों को लंबा किया उन का जाल और सघन किया वहीं उन के नाम पर उन के परिजनों ने, उन के चहेते अधिकारियों मित्रों ने उन्हें बदनामी भी खूब दी। उन के नाम पर खूब मनमानी भी हुई। वह चाहे अनचाहे इसे रोक नहीं पाए। बदनामी से बचने के लिए अपने मुख्यमंत्रित्व के दो साल पूरे करने पर उन्हों ने एक शासनादंश भी जारी किया कि उन के परिवार या रिश्तेदारों की सिफारिशें न मानी जाएं। पर भला किस की हिम्मत थी जो न मानता। शासनादेश कागजी साबित हो कर रह गया। उन के कई राजनीतिक मित्रों, पत्रकारों ने भी उन्हें खूब चूना लगाया। लेकिन मैं ऐसे भी लोगों को जानता हूं जिन्हों ने उन का भरपूर दोहन किया और देखते ही देखते करोड़ पति हो गये। और ऐसे भी लोगों को जानता हूं जिन्हों ने उन से पैसे भर का भी काम नहीं करवाया जब कि वे उन के अभिन्न थे। जैसे कि गोरखपुर के एक पत्रकार है श्यामानंद श्रीवास्तव। वह उन के विद्यार्थी जीवन के समय से अभिन्न हैं। मै ने देखा वह अकसर आते - वीर बहादुर के पास आते। वीर बहादुर बड़ी देर तक उन्हें अपने पास बैठाए रखते। कोई काम वह बताते नहीं थे। कभी-कभी वीर बहादुर पूछ भी लेते, ‘का हो कौंनों कार बताव।’ श्यामानंद का जबाव होता, ‘बस तू मुख्यमंत्री बनल रह !’ कह कर वह गदगद हो जाते और चले जाते। अकसर ही उन दोनों के बीच कुछ ऐसा ही घटता। बात कहीं से भी शुरू हो खत्म यहीं होती थी कि, ‘तूं मुख्यमंत्री बनल रह बस।’ वीर बहादुर के पास ऐसे मित्रों की भी कमी नहीं थी।

बहुत से लोग कहते हैं वीर बहादुर सिंह योजनाकार नहीं तिकड़मी जीव थे। मुझे यह बात कहीं सच भी लगती हे। हालां कि इस के बावत कई राजनीतिक गैर राजनीतिक, कई जानी कई अनजानी घटनाएं याद आ रही है। पर यहां एक ही घटना का जिक्र करना चाहता हूं।

मार्च का महीना था और वीर बहादुर अपनी आदत के मुताबिक मुख्यमंत्री कार्यालय में लोगों से घिरे लेटे पड़े थे। एक वरिष्ठ आई. ए. एस. अधिकारी कुछ इंजीनियरों के साथ काफी देर से खड़े थे। वह कई बार आए गए भी पर वीर बहादुर ने उन पर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर बाद वह अधिकारी एक फाइल ले कर उन की ओर बढ़े और बोले कि, 'सेंटर ने फिर प्रस्ताव रिजेक्ट कर दिया है।' वीर बहादुर ने पूछा, ‘कौन सा प्रस्ताव?’ अधिकारी बाले, ‘वही पुल वाला सर। सर, तीन साल से प्रस्ताव भेजा जा रहा है और हर बार रिजेक्ट हो जाता है।’

'क्यों-क्यों?' पूछा तो अधिकारी ने कुछ तकनीकी तथा अन्य मुद्दे बता दिए। वीर बहादुर बोले, 'इस से क्या होता है। एक करोड़ से ऊपर के लिए केंद्र की मंजूरी चाहिए। तीन पुलों के लिए 90-90 लाख का प्रस्ताव बना कर हमें दो। हम मंजूर करेंगे।'

फिर वह अधिकारी खुशी-खुशी जाने लगा तो उसे फिर वापस बुलाया और कहा कि अगले दो हफ्ते में ही तारीख तय कर शिलान्यास करवा डालो फिर बैठे ही बैठे उन्हों ने न सिर्फ़ तारीख तय की वरन् अपने को उद्घाटनकर्ता भी तय कर दिया और कहा कि केंद्र से अध्यक्षता के लिए फला को बुला लो। वह अधिकारी और इंजीनियर सारे समय जी-जी करते रहे। फिर वह अधिकारी और इंजीनियर भाव विभोर हो जाने लगे तो वहीं बैठी एक विधायिका बोलीं ‘मुख्मयंत्री जी फला इंजीनियर का ट्रांसफर अभी नहीं हुआ। वहां बैठे सभी लोग मुस्करा पड़े। पर उन्हों ने तुरंत उस अधिकारी को लगभग चिल्लाते हुए बुलाया। वह सर सर कहते आया तो उसे डांटते हुए कहा, 'काहे बेइज्जती कराते हो भाई कल ही उस का ट्रांसफर करो।' वह अधिकारी 'जी-जी !' कहता रहा। वीर बहादुर बोले, 'जी-जी नहीं कर के बताओ।’ फिर उस ने, 'जी सर !' कहा।

ऐसे ही एक बार मिर्ज़ापुर के एक विधायक वीर बहादुर से सट कर दुबके हुए बठे थे। तब उन के सचिव वी. के. सक्सेना हुआ करते थे। विधायक महोदय दिन में किसी काम से आए हुए थे। पर किसी मीटिंग के चलते कर्मचारियों ने उन्हें भीतर घुसने नहीं दिया। तो विधायक ने कर्मचारियों की काफी देर तक मां-बहन सुनाई फिर शिकायत करने भी वह आ धमके थे। तभी सचिव वी. के. सक्सेना वहां किसी काम से आ गए। विधायक को देखते ही वह विधायक से मुखातिब हो गए। कहा कि आप को ऐसा नहीं करना चाहिए था। फिर विधायक महोदय सक्सेना पर भी बिगड़ गए। फिर कोई दो मिनट तक सक्सेना और उक्त विधायक अपनी-अपनी बात तू-तू मै स्टाइल में कहते रहे। पर वीर बहादुर इन दोनों से कुछ भी नहीं बोले। चुप-चाप इन दोनों को घूरते रहे। अंततः बिना किसी बीच बचाव के दोनों एक-दूसरे से माफी मांग चलते बने।

ऐसी जाने कितनी घटनाएं बरबस सामने आ जाती हैं जिनका कोई ओर छोर नहीं है। पर क्या कीजिएगा यही है वक्त की नियति कि योजनाबद्ध और समयबद्ध विकास की बात करने वाले हाथों हाथ लोगों कर अर्जियां निपटा देने वाले वीर बहादुर अपने परिवार को योजनाबद्ध-समयबद्ध नहीं कर सके। मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष से कितनों की बेटियों के हाथ पीले करने के लिए उन्हों ने खुले हाथ दिया। पर अपनी ही बेटियों के हाथ पीले किए बिना ही, बेटों को किसी घाट लगाए बिना ही दुनिया से कूच कर गए वह भी परदेसी माटी पर। पेरिस में।