Sunday, 5 January 2020

हमारे सक्सेना चचा नहीं रहे


जी हां , हमारे सक्सेना चचा नहीं रहे। चचा करुणा शंकर सक्सेना जिन्हें लोग के एस सक्सेना नाम से जानते थे। कोई नब्बे बरस की उम्र में कानपुर में कल उन्हों ने अंतिम सांस ली। वह थे क़ानून के विद्यार्थी। लखनऊ यूनिवर्सिटी से एल एल एम किया था। लेकिन जीवन भर वह पत्रकारिता के लिए ही समर्पित रहे। नेशनल हेराल्ड से होते हुए वह दि पायनियर में आए। स्पेशल करस्पांडेंट के पद से रिटायर हुए। लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में लंबे समय तक वह विजिटिंग प्रोफेसर रहे। क़ानून और पत्रकारिता पर के एस सक्सेना की कोई दो दर्जन पुस्तकें अंगरेजी और हिंदी में प्रकाशित हैं। जब वह पायनियर में थे तब जनसत्ता , दिल्ली होते हुए 1985 में मैं स्वतंत्र भारत में रिपोर्टर हो कर लखनऊ आया था। एक ही संस्थान में काम करते हुए उन के साथ बहुत सारे खट्टे-मीठे अनुभव हैं। धुआंधार सिगरेट पीते हुए जब कभी वह खूब तेज़ स्कूटर चलाते दीखते , अपने सफ़ेद बड़े बाल लटकते , झटकते जब वह फुल स्पीड से ख़बरें टाइप करते होते तो उन्हें देख कर रश्क होता। बहुत से लोग उन्हें शायर भी समझ लेते। पर वह शायर नहीं , शायरी के मुरीद थे।

वैसे थे तो वह हमारे पिता की उम्र के लेकिन बातचीत में , संबंधों में बिलकुल दोस्ताना होते थे। हमारी बीट भी कई बार एक ही होती। तो हम खबरें तो साझा करते ही , हंसी मजाक भी खूब करते। यारबास और रंगबाज दोनों ही थे हमारे चचा। वह कई बार उम्र की सरहद लांघ कर युवा बन जाते। उन के पास यादों और खबरों का खासा खजाना था। बातचीत में लखनवी नफासत और कायस्थीय कमनीयता के बावजूद वह मुंहफट भी खासे थे। रूटीन खबरों के मास्टर थे। साफ़ बोलने की बीमारी थी जैसे उन्हें। जाने क्या था मैं उन्हें शुरू ही से चचा कहने लगा था। शुरू , शुरू में तो वह खफा हुए मेरे चचा कहने से। एक बार रस रंजन के दौरान बोले , जानते हो चचा कह कर तुम मेरी उम्र बढ़ा देते हो। जब कि मैं हूं लौंडा ही ! कहते हुए वह जोर से हंसे। और सिगरेट का एक लंबा कश ले कर सिगरेट के धुएं में जैसे खो से गए। धुएं से जैसे वह बाहर निकले तो मेरे सिर के बाल स्नेह में सहलाते हुए बोले , हूं तो मैं तुम्हारा चचा ही और तुम हमारे प्यारे भतीजे। लेकिन डर है , सब साले चचा कहने लगेंगे। लड़कियां भी। तो मेरा क्या होगा ? कह कर वह अचनाक खिलखिला कर हंसे और उठ खड़े हुए। फिर चल दिए। वह अकसर ऐसा ही करते। अचानक। और यह लीजिए , सचमुच देखते-देखते वह बहुतेरे रिपोर्टरों के चचा हो गए। एक दिन सिगरेट के कश में डूबे हुए कहने लगे , देखा बेटा , तुम ने मुझे फंसा दिया। शहर भर का चचा बना दिया।

सहसा इंजीनियर बेटे के गुज़र जाने से वह टूट से गए थे। हरदम सागर की तरह उछलते रहने वाले चचा जैसे झील का ठहरा हुआ जल बन गए। इस जल में कोई कंकड़ भी फेकता तो उन में हलचल नहीं होती। जीवन जैसे बुझा-बुझा रहने लगा उन का। जीवन की रवानी जैसे ठहर सी गई। पान दरीबा में उन के घर की सीढ़ियों से जैसे धड़कन चली गई। घर के दरवाज़े की खट-खट चली गई। लेकिन खुद टूटी हुई हमारी चची ने उन्हें बहुत संभाला। उन की डाक्टर बेटी राजश्री मोहन ने माता-पिता दोनों को किसी पुत्र की तरह थाम लिया। मैं स्वतंत्र भारत छोड़ चुका था। नवभारत टाइम्स आ गया था। चचा भी रिटायर हो कर लखनऊ यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग जाने लगे थे। चची उषा सक्सेना महिला डिग्री कालेज में हिंदी की आचार्य थीं। वह भी रिटायर हो कर लखनऊ यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग में पढ़ाने लगीं। ज़िंदगी का पहिया जैसे फिर से चलने लगा।

उन्हीं दिनों सुबोध श्रीवास्तव ने हिंदी और उर्दू में एक फीचर एजेंसी राष्ट्रीय फीचर्स नेटवर्क शुरू करने की योजना बनाई। हमारे चचा मैनेजिंग एडिटर बने। और सुबोध जी को सलाह दी की मुझे संपादक बना दिया जाए। सुबोध जी ने बुलाया मुझे। एक ही सीटिंग में बात फाइनल हो गई। उर्दू के संपादक इशरत अली सिद्दीकी बने। हिंदी का संपादक मैं। अब हम फिर से साथ-साथ क्या अगल-बगल बैठने लगे। चची भी। सुबोध जी ने मुझे फ्री हैण्ड काम करने की आज़ादी दी। मैं ने भी दिन को दिन और रात को रात नहीं समझा। प्राण-प्रण से लग गया। तत्कालीन राज्यपाल मोतीलाल वोरा ने इस का उदघाटन किया। दखते ही देखते राष्ट्रीय समाचार फीचर्स नेटवर्क देश की सब से बड़ी फीचर एजेंसी बन कर सामने थी। देश के बड़े-बड़े लेखक और पत्रकार राष्ट्रीय फीचर्स नेटवर्क में लिखने लगे थे और छोटे बड़े सारे अख़बार राष्ट्रीय फीचर्स नेटवर्क के लेख छापने लगे , सदस्य बनने लगे। हमारी ज़िंदगी और करियर का एक बड़ा पड़ाव बना राष्ट्रीय फीचर्स नेटवर्क। साथ ही हम चचा भतीजे के संबंध भी प्रगाढ़ हुए। लड़ते-झगड़ते हम और करीब हुए। चची का स्नेह हमारी नई ताक़त हो गई। अपनी कहानियों की तरह ही वह मुझे भी ममत्व में भिगोने लगीं। कैसी भी कठिन घड़ी हो , वह सब को अपने स्नेह के आंचल में जैसे संभाल लेतीं । चची की उपस्थिति ही माहौल में एक गरिमा का रंग दे देती थी। आज चची का अभी फोन आया तो वह बिलखती हुई जब बोलीं कि दयानंद जी , आप के चचा नहीं रहे ! तो बात करते-करते मैं भी बिलख पड़ा यह कहते हुए कि अब मैं चचा किस को भला कहूंगा। चची ने बहुत जल्दी ही फोन रख दिया। सुबकता हुआ बैठा हूं। चचा की यादों में घिरा गोया उन के सगरेट की कश का धुआं हो। यादों की धुंध में घिरा बदहवास मैं। यह यादों की धुंध और धुआं तो छंट जाएगा पर चचा की खनकती हुई वह आवाज़ ?

अब कभी नहीं सुनाई देगी।

खूब भाउक , खूब गुस्सैल का कंट्रास्ट जीने वाले , दिल के साफ और लखनऊ को ओढ़ने बिछाने वाले चचा , चची बीते तीन , चार सालों से लखनऊ छोड़ कानपुर में डाक्टर बेटी के साथ रहने लगे थे। यहां सीढ़ियां चढ़ना-उतरना मुश्किल तो था ही , देख-रेख करने वाला भी कोई नहीं था। जब कुछ दिक्क्त होता तो बेटी दामाद भाग कर आते। ले जाते। बार-बार जब ऐसा होने लगा तो बेटी ले ही गई दोनों को। यहां ताला लग गया घर पर । और कल शाम उन की ज़िंदगी पर भी ताला लग गया। याद आता है जब उन्हें सिगरेट फूंकते हुए खूब तेज़ स्कूटर चलाते जब-तब देखता तो दहल जाता। अकसर उन्हें टोकता। वह अनसुना कर देते। चची से भी कई बार कहा। तो वह कहतीं , यह किसी की सुनते कहां हैं ? मेरी भी नहीं सुनते। तब जब कि चची भी स्कूटर पर बैठी होतीं साथ में पीछे। जब यह मेरा टोकना बहुत हो गया तो एक दिन मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए , चचा मुझ से बहुत सर्द ढंग से बोले , ' मत टोका करो मुझे इस तरह। मेरे बाप मत बनो। भतीजे ही बने रहो। ' मैं सन्नाटे में आ गया यह सुन कर। अचानक उन्हों ने एक सिगरेट सुलगाई और एक मेरी तरफ बढ़ाई और धीरे से बोले , ' जानते हो क्यों इतनी तेज़ स्कूटर चलाता हूं ? ' जैसे उन्हों ने जोड़ा , ' चाहता हूं कि किसी ट्रक के नीचे आ कर या कैसे भी किसी एक्सीडेंट में मर जाऊं। हम दोनों मर जाएं। ' माथा सहलाते , कश लेते हुए वह बोले , ' अब कभी मत टोकना। ' कह कर वह उठ खड़े हुए। अब वही चचा जब सचमुच चले गए हैं ह्रदय गति रुकने के चलते तो यकीन ही नहीं होता। कैसे यकीन करुं भला।

आज के दिन लखनऊ में जहां मुख्यमंत्री का आफिस बना हुआ है , लोक भवन। यहीं कांग्रेस नेता मोहसिना किदवई का बंगला हुआ करता था कभी। एक बार मोहसिना किदवई पर कुछ आरोप लगे तो उसी बंगले में मोहसिना किदवई ने प्रेस कांफ्रेंस कर आरोपों के बाबत अपना पक्ष रखा। बाद में लंच के समय अचानक वह बोलीं , मैं तो खुली किताब हूं। तो बिना समय गंवाए चचा उन की तरफ झुक कर बोले कि , ' तब मुझे भी पढ़ने का मौका दीजिए न ! ' मोहसिना किदवई किसी षोडसी की तरह लजा गईं। अलग बात है चचा सचमुच खुली किताब थे। जब नारायण दत्त तिवारी ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया और अनुमान चल पड़ा कि वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री होंगे। वीरबहादुर सिंह कुछ पत्रकारों से घिरे विधान भवन के अपने सिचाई विभाग वाले कमरे में बैठे थे कि अचानक चचा भी आ गए। वीरबहादुर से हाथ मिलाते हुए उन्हें बधाई दी। बहुत देर तक वह वीरबहादुर का हाथ अपने हाथों में लिए रहे। आजिज आ कर वीरबहादुर बोले पर सक्सेना जी , मेरा हाथ तो छोड़िए। चचा हंसते हुए बोले , मैं तो नहीं छोड़ने वाला क्यों कि यह होने वाले मुख्यमंत्री का हाथ है। पर वीरबहादुर पूरी विनम्रता से न , न ! करते रहे। कभी वीरबहादुर का हाथ जल्दी नहीं छोड़ने वाले चचा अब हम सब का हाथ और साथ छोड़ कर अनंत यात्रा पर निकल गए हैं।

भगवान उन की आत्मा को शांति दे और चची को धैर्य ! अपनी कहानियों , नाटकों , उपन्यासों और लेखों में अपने को वह और डुबो लें और कुछ अप्रतिम रचें। चचा की यादों को ही सही लिखें। इस लिए भी कि चचा और चची का सहजीवन अनूठा और अनिर्वचनीय था। चची किसी बच्चे की तरह चचा को सर्वदा संभालती ही रहती थीं। अंतिम समय में भी चची ने जिस तरह उन की सेवा जिस मनोयोग से की , वह अद्भुत है। जैसे वह उन की ही सांस को जीती थीं। इस बीच लिखना-पढ़ना सब कुछ भूल गई थीं चचा के चक्कर में। चचा भी चची के लिखने-पढ़ने में सर्वदा सहयोगी भाव रखते। चची की लेखिका पर उन्हें बहुत गुमान भी था। इलाहबाद यूनिवर्सिटी की पढ़ी हुई चची भी अपने रचना संसार और अपने ममत्व से सब को सराबोर रखती हैं। चचा भी सब के साथ चची के इसी रंग में भीगे रहते थे। सर्वदा। चचा आप सचमुच बहुत याद आएंगे। हमेशा-हमेशा याद आएंगे। आप जैसे मुंहफट और भले दिल वाले पत्रकार अब बिसरते जा रहे हैं। साथ छोड़ते जा रहे हैं। समय की यह बहुत बड़ी मार है।