Saturday, 12 June 2021

कार्टून बनाने के लिए चार्ली हेब्दो जैसा साहस चाहिए होता है , नौकरी चली गई का विलाप या गान से यह साहस नहीं आता


दयानंद पांडेय 


पुण्य प्रसून वाजपेयी आज तक की नौकरी से निकाले गए थे रामदेव के कारण। लेकिन एजेंडा मीडिया ने बताया कि नरेंद्र मोदी ने निकलवा दिया। सब को मालूम है कि रामदेव आज की तारीख में सब से बड़े विज्ञापनदाता हैं। रामदेव से एक असुविधाजनक पूछ लिया था , पुण्य प्रसून ने । पुण्य प्रसून सहारा से क्यों निकाले गए थे , यह भी तो कोई पूछे। पर नहीं पूछता। चलिए , हम बताए देते हैं कि लालू यादव के कारण निकाले गए थे। पर यह कोई नहीं पूछता। लेकिन रामदेव का भारतीय मीडिया पर विज्ञापन का ख़ूब रौब है। इतना कि एजेंडा मीडिया का एक बड़ा स्तंभ एन डी टी वी भी कभी कोई खबर रामदेव के खिलाफ फ़िलहाल नहीं चला सकता। न इस के स्वयंभू एंकर रवीश कुमार एन डी टी वी पर या अपने ब्लॉग या किसी मीडियम पर रामदेव के खिलाफ एक शब्द लिख या बोल सकते हैं। रामदेव के विज्ञापनजाल का ही कमाल है कि फिर किसी मीडिया हाऊस ने पुण्य प्रसून वाजपेयी को नौकरी नहीं दी। तब जब कि वह बेस्ट एंकर हैं। जब तक यह रामदेव का विज्ञापनजाल है पुण्य प्रसून को कभी कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। अभी रामदेव का विज्ञापनजाल टूट जाए , पुण्य प्रसून वाजपेयी को कल नौकरी मिल जाएगी। 

इन दिनों कार्टूनिस्ट मंजुल बहुत चर्चा में हैं। कहा जा रहा है कि मंजुल को मोदी ने निकलवा दिया। यह भी नाखून कटवा कर शहीद बनने की कसरत है। अरे , मंजुल मुकेश अंबानी की नौकरी में थे। और यह एजेंडाधारी लोग बहुत साफ़ कहते हैं कि मोदी भी अंबानी की ही नौकरी में है। पेशबंदी में अंबानी की बीवी नीता अंबानी के आगे हाथ जोड़े झुके नरेंद्र मोदी की एक फ़ोटो शाप वाली फ़ोटो भी पेश करते हैं। इस फ़ोटो को एक आई ए एस अफ़सर ने भी अभी पोस्ट किया था। जिसे उस ने जाने क्यों बाद में मिटा दिया। 

एजेंडा में पगलाए यह लोग मंजुल को निकाले जाने वाली चिट्ठी क्यों नहीं सोशल मीडिया में जारी कर देते भला। ताकि साबित तो हो सके कि आखिर मोदी ने क्यों निकलवाया। कुछ तो बर्खास्तगी में कारण बताया गया होगा। आखिर मुंबई में अघाड़ी सरकार है जो मोदी से नहीं डरती। उस के पास कुछ क़ानून वानून होगा। अंबानी के खिलाफ कार्रवाई करे कि क्यों गलत ढंग से निकाल दिया। कुछ मदद करे मंजुल की। कहीं ऐसा तो नहीं कि मंजुल का कांट्रैक्ट खत्म हो गया हो। और इसे निकालना बताया जा रहा हो। क्यों कि आज कल मीडिया की नौकरी कांट्रैक्ट पर ही चल रही है। और यह कांट्रैक्ट कभी भी खत्म किया जा सकता है , कांट्रैक्ट में यह भी साफ़ लिखा रहता है। सब जानते हैं। पर इस बिंदु पर अभी सभी चुप हैं। अच्छा विनोद दुआ की नौकरी प्रणव रॉय ने क्यों ले ली थी अचानक। कभी चर्चा हुई क्या ? क्या नरेंद्र मोदी ने ली थी ? विनोद दुआ की नौकरी , वायर से क्यों गई ? अच्छा एम जे अकबर का मी टू , मी टू था और विनोद दुआ का मी टू गीता का ज्ञान था ? वेरी गुड। तहलका वाला तरुण तेजपाल खुद बलात्कार में अपने को दोषी मान कर उस लड़की से लिखित माफ़ी मांग चुका था। सोशल मीडिया पर भी माफ़ी मांगी थी तरुण तेजपाल ने। फिर भी अदालत ने बरी कर दिया। कैसे भला। इस पर कोई चर्चा क्यों नहीं हुई। इस लिए कि तरुण तेजपाल और विनोद दुआ इन एजेंडा प्रिय लोगों के भगवान हैं। इस लिए नो चर्चा। जैसे मोहम्मद साहब हों। कि चर्चा की इन पर तो कत्ल कर दिए जाएंगे। सो सब के सब चुप। 

अच्छा ऐसा तो है नहीं कि मंजुल कोई आज अचानक ही मोदी के खिलाफ कार्टून बनाने लगे हों। मुझे मालूम है कि मंजुल तमाम एजेंडाधारियों की तरह पैदायशी मोदी विरोधी हैं। मोदी वार्ड के सीरियस मरीज हैं। बहुत समय से वह मोदी के खिलाफ जहर उगलने वालों में शुमार हैं। वह लोग जो मोदी का विरोध नहीं करते अपितु मोदी को शत्रु समझते हैं। हद से अधिक नफ़रत करते हैं मोदी से। इन लोगों का वश चले तो मोदी को सीधे गोली मार दें। तो अभी तक ऐसा क्यों था कि मोदी मंजुल को बर्दाश्त कर रहे थे और अब नौकरी से निकलवा दिया। इतना कि टेलीग्राफ जैसे अख़बार को हेडलाइन बनानी पड़ी। अच्छा मंजुल इकलौते तो हैं नहीं कि सिर्फ़ वही मोदी के खिलाफ कार्टून बना रहे हैं। बल्कि मैं तो मानता हूं कि इरफ़ान कहीं ज़्यादा मोदी पर कार्टून बनाते हैं। हां , इरफ़ान लेकिन कार्टून बनाते हैं , कैम्पेन नहीं चलाते। ऐसे और भी कई काटूनिस्ट , व्यंग्यकार और लेखक कवि हैं जो मोदी पर नित नया प्रहार करते रहते हैं। हमारे लखनऊ में सूर्य कुमार पांडेय हैं। पांडेय जी मोदी और योगी के खिलाफ अकसर एक से एक धारदार व्यंग्य लिखते रहते हैं। आए दिन लिखते रहते हैं। अख़बारों में भी छपता रहता है। सोशल मीडिया पर भी। तो मोदी इन सब की नोटिस क्यों नहीं लेते ? आप सुनिए कभी कवि सम्मेलनी कवि संपत सरल को। हंसते-हंसाते जो सीधा प्रहार करते हैं , इतना मारक प्रहार करते हैं मोदी पर संपत सरल और हर कविता में करते हैं कि पूछिए मत। यू ट्यूब पर मोदी विरोधी जितना संपत सरल को सुनते हैं , शायद किसी को नहीं। जो मार मोदी पर संपत सरल करते हैं , रवीश कुमार , संपत सरल का नाखून भी नहीं छू पाते। संपत सरल की भी मोदी विरोध में सारी कविताएं यू ट्यूब पर ही हैं। क्या मोदी या मोदी के लोगों ने संपत सरल पर कभी हमला बोला या यू ट्यूब से शिकायत की क्या कि यह कविताएं हटा दो। राहत इंदौरी मोदी के खिलाफ क्या-क्या जहरीली और नफ़रती बातें करते रहते थे। मुनव्वर राना अब भी करते रहते हैं। अवार्ड वापसी गैंग के कितने लोगों के ख़िलाफ़ मोदी ने कोई कार्रवाई करवाई। करवा तो सकता ही है। मोदी आख़िर आप की राय में तानाशाह भी है और ताक़तवर भी। फ़ासिस्ट आदि भी। हिटलर से आगे की चीज़। 

बहरहाल , इस पूरे प्रसंग में सब से बुरी बात यह हुई है कि मंजुल के कार्टून को शंकर या लक्ष्मण के बराबर खड़ा कर दिया गया है। कभी ठहर कर शंकर या लक्ष्मण के कार्टून देखिए। देख कर मन में गुदगुदी भी होती है , गुस्सा भी आता है। शालीनता भी दिखती है और शऊर भी। शंकर या लक्ष्मण जैसे कार्टूनिस्ट व्यवस्था विरोध में कार्टून बनाते थे। एजेंडाधारी नहीं थे। नेहरू से नफ़रत नहीं करते थे। नेहरू उन के शत्रु नहीं थे। मंजुल जैसे लोगों के पास सच कहिए कार्टून हैं ही नहीं। एजेंडा है। कैंपेन है। नफ़रत है। आप कभी काक के कार्टून देखिए। काक अपने स्केच में बिना कैप्शन के भी क्या से क्या कह देते हैं। मन मुदित हो जाता है , काक के कार्टून देख कर। तो क्या काक व्यवस्था विरोध के कार्टून नहीं बनाते ? अरे कार्टून होते ही हैं व्यवस्था विरोध के लिए। सुधीर तैलंग के कार्टून देखिए। तेल नहीं लगाते सुधीर तैलंग भी। परखच्चे उड़ा देते थे। इरफ़ान के कार्टून तो अर्जुन के तीर की तरह काम करते हैं। राम के वाण की तरह रावण की नाभि में मारते हैं। काम तमाम हो जाता है। इरफ़ान भी मोदी के समर्थक नहीं हैं , विरोधी ही हैं। पर इरफ़ान के कार्टून शत्रुता में सने हुए नहीं हैं। एजेंडा के रक्त में सने हुए नहीं हैं। लेकिन मंजुल के कमोवेश सारे कार्टून एजेंडा और शत्रुता के रक्त में सने हुए , बहुत बीमार हैं। 

मंजुल की बात उन का स्केच नहीं कह पाता। कैप्शन कहता है। बड़ा-बड़ा कैप्शन। वह भी बहुत लाऊड हो कर। कार्टून और फ़ोटो के कैप्शन अगर बहुत लाऊड हो कर कुछ कहते हैं तो कार्टूनिस्ट और फोटोग्राफर की मंशा पर सवाल तो खड़ा होता ही है। उस की कमज़ोरी भी दिखती है। यह उस की रचनात्मकता का ह्रास है। याद कीजिए रघु राय की फोटो। तमाम फोटो। पांच फोटुओं का यहां ज़िक्र करता हूं। एक फ़ोटो है : सेनाध्यक्ष रिटायर हो रहे हैं। परेड की अंतिम सलामी ले रहे हैं। सभी अखबारों में फ़ोटो छपती है पहले पेज पर। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में छपी रघु राय की फ़ोटो पर सब की नज़र टिक जाती है। सेनाध्यक्ष सलामी ले रहे हैं और आंख से आंसू भी बह रहे हैं। यह रघु राय के कैमरे ने ही क्यों देखा। बाक़ी कैमरे क्यों नहीं देख पाए। इस लिए कि वह सब रूटीन फोटो खींच रहे थे। रघु राय लेकिन फ़ोटो खींच रहे थे। एक दूसरी फ़ोटो है पुलिस लाठियां ले कर जयप्रकाश नारायण पर टूट पड़ी है। जयप्रकाश नारायण अपने बचाव में सड़क पर गिर गए हैं। लेकिन पुलिस की लाठियां फिर भी चल रही हैं तो इन लाठियों को रोकने के लिए नाना जी देशमुख जयप्रकाश नारायण के ऊपर हाथ और पैर टेक कर लगभग छाता बन कर उन पर लेट गए हैं। ऐसे कि उन पर , उन का बोझ भी न पड़े। फिर सारी लाठियां नाना जी देशमुख के सीने पर हैं। तीसरी फ़ोटो है : दिल्ली की जामा मस्जिद में ईद की नमाज हो रही है। हज़ारों की भीड़ सजदे में है। पर दो तीन नन्हे बच्चे नए कपड़े पहने मस्जिद की दीवार पर खेल रहे हैं। चौथी फ़ोटो है  ; इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति बी बी गिरी खड़े-खड़े बात कर रहे हैं। राष्ट्रपति बी बी गिरी , प्रधान मंत्री इंदिरा के इतने प्रभाव में हैं कि अपनी गांधी टोपी उतार कर दोनों हाथ पीछे ले जा कर खड़े हो गए हैं। टोपी जैसे उन के हिप को संभाल रही हो। और पांचवी फ़ोटो ; 1977 का चुनाव खत्म हो चुका है। मोरार जी देसाई की जनता पार्टी की सरकार बन चुकी है। एक स्वछ्कार सड़क पर झाड़ू लगा रहा है। इंदिरा गांधी का पोस्टर झाड़ू पर है। इंदिरा गांधी , कूड़ेदान में जा रही हैं। 

इन फ़ोटुओं को कैप्शन की कोई ज़रूरत है क्या ? ऐसे ही कार्टून को भी किसी कैप्शन की बहुत ज़रूरत नहीं होती। फ़ोटो और कैप्शन अपने आप बोलते हैं। देखिए काक का एक कार्टून याद आ गया है। मेनका गांधी ने तब की प्रधान मंत्री और अपनी सास इंदिरा गांधी से बग़ावत कर संजय गांधी मंच बनाया था। एक उपचुनाव में लखनऊ के मलिहाबाद विधानसभा से मेनका की पार्टी ने कांग्रेस को हरा दिया था। काक ने बस यह किया था कि मेनका को आम चूसते हुए इंदिरा गांधी को ठेंगा दिखा दिया था। फिर काक की लाइनिंग के कहने ही क्या। एक-एक बिंदु बोलता है। ऐसे जैसे देह का रोया-रोया बोले। कार्टून इसे कहते हैं। विष उगलने को कार्टून नहीं , एजेंडा कहते हैं। मंजुल बरसों से कार्टून नहीं बना रहे , विष-वमन कर रहे हैं। एजेंडा चला रहे हैं। बीमारी की हद तक। ऐसी मुट्ठी भर लोगों की टोली उन की वाह-वाह करती रहती है। लोग गमले में बोनसाई उगाते रहते हैं। 

फिर जिस तरह यह बात कही जा रही है कि मोदी ने मंजुल को नौकरी से निकलवा दिया , सुन कर ही हंसी आती है। अरे मोदी के पास मंजुल जैसों को जानने का समय भी है भला कि उन की नौकरी खा जाएं। मुझे नहीं लगता कि मंजुल का कोई कार्टून भी देखा होगा मोदी ने। इतना अवकाश नहीं होता मोदी जैसे लोगों के पास और उन के आकाश में । अरे , अगर सोशल मीडिया न होता तो मंजुल जैसों को कोई जानता भी नहीं। न मंजुल के कार्टून को । मैं फिर दुहरा रहा हूं कि मंजुल की बर्खास्तगी वाली चिट्ठी भी सोशल मीडिया पर आनी चाहिए। लेकिन जानता हूं कि कोई नहीं डालेगा उसे सोशल मीडिया पर। मंजुल भी नहीं। क्यों कि चिट्ठी आने पर चिमनी से सारा धुआं निकल जाएगा। नौकरी अलग चीज़ है। सोशल मीडिया अलग चीज़। सोशल मीडिया पर मैक्सिमम बकैती होती है। नौकरी में नहीं। अरे , आप इतने ही बड़े क्रांतिकारी थे तो अंबानी की नौकरी आखिर कर भी कैसे रहे थे भला। सहारा की भी कर ही चुके थे। अंबानी , मोदी का आदमी या कह लीजिए कि मोदी अंबानी का आदमी। और मोदी आप का शत्रु। मोदी से आप को नफ़रत। फिर उस के खेत में आप मज़दूरी कर ही क्यों रहे थे। यह भी तो बता दीजिए। यह तो कुछ-कुछ वैसे ही हुआ कि आप टाटा ,अंबानी , अडानी , बिरला आदि-इत्यादि का पृष्ठ भाग धोएं , उन की चाकरी करें या आप के बच्चे चाकरी करें फिर आप यह भी कहें कि आप कम्युनिस्ट भी हैं। कांख भी छुपी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे। यह तो कोई बात नहीं हुई। सब जानते हैं कि ऐसी खुशफहमियों या गलतफहमियों या ख़बरों का कभी कोई प्रधान मंत्री या उस का कार्यालय खंडन आदि नहीं करता तो आप हवा में गैस के गुब्बारे चाहे जितने उड़ा लें , उड़ाते रहिए। 

फिर भी ग़नीमत है और शुक्र मनाइए कि आप कांग्रेस राज में नहीं हैं।  मुलायम , लालू , मायावती या अखिलेश राज में नहीं हैं।  जितने मन उतने गुब्बारे उड़ा लीजिए। नहीं इन लोगों के राज में होते तो शायद आप की नौकरी ! अरे आप भी ढूंढें नहीं मिलते। अनेक क़िस्से हैं। रामनाथ गोयनका जैसों ने बड़ी क़ीमत चुकाई है इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के शासनकाल में। तब उन का साथ देने के लिए सोशल मीडिया भी नहीं था। हिंदू अख़बार ने भी बोफोर्स घोटाले के समय में क्या-क्या नहीं सहा। कितने पत्रकारों के शव परिवारीजनों को नहीं मिले। मायावती और मुलायम राज में कितने पत्रकार मार डाले गए , ज़िंदा जला दिए गए , बेघर हो गए। उन के परिवारीजन की सिसकियां अभी भी थमी नहीं हैं। और नौकरी ? अभी भी मुलायम और मायावती के ख़िलाफ़ लखनऊ के अखबारों में कोई खबर नहीं छपतीं। दर्जनों पत्रकारों की नौकरी जाती हुई हम लोग देखते रहते हैं। हल्ला बोल अलग हो जाता है। 

खुश रहिए कि मोदी राज है कि आप निरंतर आग मूतते हुए भी अपने मूतने को सेलीब्रेट कर रहे हैं और आप का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। दो दिन से नेहरू , नेहरू भी बहुत सुन रहा हूं। अरे , वह नेहरू ही हैं जो और देशों की तरह भारत के संविधान में प्रेस को चौथा खंभा नहीं बना पाए। पूंजीपतियों का खंभा बना दिया। सारा प्रेस , सारी अभिव्यक्ति की आज़ादी पूंजीपतियों की तिजोरी को सौंप दी। नतीज़तन मीडिया काले धन की गोद में बैठ गया है। यह एन डी टी वी , यह प्रणव रॉय की कंपनी में किस-किस का पैसा लगा है , मालूम भी है। पोंटी चड्ढा से लगायत तमाम बिल्डरों का। फेरा , हवाला आदि के कितने मुकदमे हैं प्रणव रॉय पर पता कर लीजिए। किसी एक मामले में भी किसी कोर्ट ने क्लीन चिट नहीं दी है। सारी फाइलें दबवा रखी हैं। यह वायर , यह क्विंट , यह कारवां इंदिरा गांधी होतीं तो कहां होते , क्या यह भी बताने की चीज़ है ? कोलकाता का यह टेलीग्राफ ममता बनर्जी का भोंपू है। अरे मीडिया का आलम तो यह है कि अरविंद केजरीवाल और रामदेव जैसे लोगों के विज्ञापन पा कर चौबीसों घंटे उन के पांव पखारता रहता है। सारे रणबांकुरे वहां नयन मूंद लेते हैं। लेकिन इतने ख़राब स्केच वाले कार्टूनिस्ट मंजुल के लिए ऐसा बिगुल बजा देते हैं गोया , बहुत बड़ा बम ब्लास्ट हो गया हो। 

यह ठीक है कि किसी की नौकरी ले लेना उसे फांसी देना ही होता है। मंजुल की भी नौकरी जाना दुखद है। मंजुल का भी परिवार है। बच्चे हैं। गुज़ारा चलना नौकरी में भी मुश्किल होता है। बिना नौकरी के बहुत ही मुश्किल। पर क्या मंजुल इकलौते हैं कि उन की नौकरी गई है। वह भी मोदी ने ले ली। यह तो कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे राहुल गांधी जैसे लोग कोविड को मोवीड कहते हैं। यह ठीक है कि 14 मई , 2014 के बाद बहुत सी कविताएं , लेख , कहानियां लिखे गए , कार्टून बनाए गए , मोदी विरोध में नहीं , मोदी से शत्रुता में। मोदी से नफ़रत में। आगे अभी और लिखे जाएंगे। लिखने में हर्ज भी नहीं है। 2024 के बाद भी लिखे जाएंगे। लेकिन नफ़रत और शत्रुता के गान में जनादेश का निरंतर अपमान भी ज़रूरी तो नहीं। जनादेश का सम्मान भी एक तत्व है। अनिवार्य तत्व। नेहरू याद आते हैं। लोहिया नेहरू के खिलाफ फूलपुर , इलाहाबाद से हर बार चुनाव लड़ते थे। हार-हार जाते थे। नेहरू ने एक दिन लोहिया से कहा , मैं आप को संसद में देखना चाहता हूं। और यह तभी संभव है जब आप मेरे खिलाफ चुनाव लड़ना छोड़ कर कहीं और से चुनाव लड़ें। फिर आप जीत कर संसद में आएं और संसद में मेरी धज्जियां उड़ा दें। अच्छा लगेगा। लोहिया ने नेहरू की बात मान ली। फूलपुर की बजाय अगला चुनाव लोहिया ने कन्नौज से लड़ा और जीत कर संसद पहुंचे। सचमुच संसद में लोहिया ने नेहरू की धज्जियां उड़ानी शुरू कर दीं। 

तो मोदी विरोधियों को भी जनता के बीच जा कर काम करना चाहिए। मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया पर हवाई फायर झोंकने , नफरत के तीर चलाने और कुत्तों की तरह कांग्रेस का कौरा खा कर भौंकने के बजाय सकारात्मक काम करना चाहिए। फंडिंग की हड्डी मोदी के शत्रुओं को बीमार बना रही है। बहुत बीमार। कैंसर , कोरोना और एड्स से भी खतरनाक बीमारी है यह। फंडिंग ने कंडीशंड बना दिया है लेखकों , पत्रकारों , कवियों और कार्टूनिस्टों को। इतना कि वह सिर्फ़ मोदी जानते हैं। देश और जनादेश नहीं। मोदी को मारने के बजाय खुद को मार रहे हैं। मोदी के पतन के इंतज़ार की मृगतृष्णा में मरते हुए यह लोग वैसे ही हैं जैसे कोई शराबी। पहले आदमी शराब पीता है। धीरे-धीरे वह इस का आदी हो जाता है। शराब , आदमी को पीने लगती  है। जान यह भी लेना चाहिए कि बिल्ली सिर्फ़ खंभा नोच सकती है , बाघ से नहीं लड़ सकती। मंजुल जैसे मुट्ठी भर लोगों को यह मुगालता जितनी जल्दी हो तोड़ लेना चाहिए। जान लेना चाहिए कि मोदी जैसे लोगों से लड़ने के लिए अंबानी जैसे लोगों की नौकरी में रह कर किसी सूरत नहीं लड़ा जा सकता। अंबानी की नौकरी कर आप मोदी को मज़बूत कर रहे होते हैं। अब यह तो भला कैसे हो सकता है कि अंबानी के नौकर बन कर मोदी से लड़ेंगे। किस दुनिया में रहते हैं। फिर आप कार्टूनिस्ट हैं। कार्टून में सपना हो सकता है ज़रूर पर कार्टून सपने में नहीं बनते। कार्टून बनाने के लिए चार्ली हेब्दो जैसा साहस चाहिए होता है। नौकरी चली गई का विलाप या गान से यह साहस नहीं आता। पर जानता हूं चार्ली हेब्दो का नाम लेना भी आप जैसों के लिए कुफ्र है। मोदी-मोदी का विलाप लेकिन ज़न्नत देता है। क्यों कि यहां ख़तरा नहीं है। अमर हो जाने का एक ऐंद्रिक स्वप्नजाल है। फ़ैशन है। खुद ही हवा खारिज कर खुद ही हंसने का फैशन। मोदी विरोध यही तो है आखिर। ऐसे ही हवा में विरोध का पतंग और गुब्बारा उड़ाने का मौसम। उड़ाते रहिए और मुदित होते रहिए। 

मैं नहीं पूछना चाहता कि ममता , केजरीवाल , राहुल , उद्धव ठाकरे , मुलायम , अखिलेश , ममता आदि-इत्यादि की उलटबासियों को ले कर भी मंजुल जैसे कार्टूनिस्ट या कवि , लेखक , पत्रकार कभी कुछ सोच या कर पाते हैं क्या। फिर यह जुलाब की पुड़िया तो सब के ही पास होती है कि लेखक , पत्रकार , कवि , कार्टूनिस्ट को सत्ता के खिलाफ ही होना चाहिए। तो केरल में एक मुख्य मंत्री ने अपने दामाद को मंत्री बना दिया है। है कोई कविता या कार्टून ? चुनाव जीतते ही ममता का टूटा पैर ठीक हो जाता है। पंजाब , राजस्थान की विचित्र स्थितियां हैं। महाराष्ट्र में और। इन विद्रूपताओं पर कितनी कविता , कार्टून और  लेख हैं भला। कोई बता सके तो बताए भी।  पुडुचेरी में तत्कालीन मुख्य मंत्री ने जिस तरह राहुल गांधी की आंख में धूल झोंका या भरी सभा में लड़की के साथ पुश अप किया राहुल ने , इन सब पर किसी मंजुल ने कोई कार्टून बनाया क्या ? किसी कवि ने कविता , किसी पत्रकार ने लेख आदि लिखा क्या ? इतना सन्नाटा इसी लिए न कि यह सारे लोग और विषय एजेंडे में फिट नहीं होते। चार्ली हेब्दो जैसा साहस किसी एक एजेंडाधारी में क्यों नहीं है ? होगा भी कभी ? कृपया मुझे कहने दीजिए , कभी नहीं।