Friday, 22 June 2018

नफ़रत के बीज बोते लोग दिखें तो उन्हें संगीत की संगत में बुला लीजिए वह प्यार की भाषा बोलने लगेंगे

एक गीत और संगीत ही ऐसा तत्व है जो किसी को कभी तोड़ता नहीं , सिर्फ़ और सिर्फ़ जोड़ता है। तो इस लिए कि संगीत में सिर्फ़ एक ही विचार होता है । जोड़ने का विचार । भारतीय वांग्मय में माना जाता है कि शिव और सरस्वती की आराधना से ही संगीत की शुरुआत हुई है । यह दोनों ही जोड़ना जानते हैं , घटाना नहीं । कहा ही गया है , सत्य ही शिव है , शिव ही सुंदर है । सत्यम , शिवम , सुंदरम । यही तो है संगीत । सरगम यही तो है । कालिदास, तानसेन, अमीर खुसरो आदि ने इसे नया रंग दिया। पंडित रवि शंकर, भीमसेन गुरूराज जोशी, पंडित जसराज, प्रभा अत्रे, सुल्तान खान ने इसे नई शान दी । बहुत मशहूर है एक गीत , का करूं सजनी आए न बालम ! सुनिए इसे कभी एक साथ बड़े गुलाम अली खां की आवाज़ और बिस्मिल्ला खां की शहनाई में इसे । भूल जाएंगे सारे रंजो गम । गा कर पढ़िए न गीत गोविंदम , भूल जाएंगे सारे भटकाव । जाइए न कभी काशी के संकटमोचन मंदिर में आयोजित संगीत सभा में , हिंदू - मुसलमान का भेद भूल जाएंगे । रविशंकर के सितार , बिस्मिल्ला की शहनाई , हरिप्रसाद चौरसिया की बांसुरी , शिव कुमार शर्मा का संतूर , किशन महराज का तबला , गिरिजा देवी का गायन , छन्नू लाल मिश्र की स्वर-लहरी , गुलाम अली की तान आप को अपने सुख की गोद में सुला लेगी ।

शकील बदायूनी और साहिर लुधियानवी ने हिंदी फिल्मों के लिए अधिकतर भजन लिखे हैं , नौशाद ने इन भजनों को संगीत दिया है , मुहम्मद रफ़ी ने गाया और दिलीप कुमार , मीना कुमारी पर फिल्माया गया है। इस की कोई और मिसाल नहीं है । अमीर खुसरो और कबीर ने जितने निर्गुण लिखे हैं उन का कोई सानी नहीं है । आज भी भक्ति संगीत के यह सिरमौर हैं । आप सुनिए न कभी दमा दम मस्त कलंदर, सखी शाबाज़ कलंदर । भूल जाएंगे कौन गा रहा है , किस ने लिखा है । मन्ना डे जब कौव्वाली गाते थे तो कोई उन को हिंदू या बंगाली कह कर ख़ारिज नहीं करता।

लता मंगेशकर कोकड़ी भाषा की हैं , उन की मातृभाषा कोकड़ी ही है लेकिन जब वह किसी भी भारतीय भाषा में गाती हैं तो कौन उन्हें अपनी भाषा का नहीं मानता । मराठी और हिंदी फ़िल्मों में गायन के लिए तो दुनिया भर में वह जानी जाती हैं । हिंदी भाषा की सब से बड़ी और अनकही अम्बेसडर हैं । पूरे भारत में एक सुर से सुनी जाती हैं । बिना किसी विरोध और मतभेद के । हमारी मातृभाषा भोजपुरी में भी कुछ गीत गाए हैं लता मंगेशकर ने । क्या खूब गाया है । लागे वाली बतिया न बोले मोरे राजा हो करेजा छुए ला ! सुन कर lलगता ही नहीं कि वह भोजपुरी की नहीं हैं । लता ही क्यों आशा भोसले , हेमलता और अलका याज्ञनिक ने भी भोजपुरी में कुछ गाने गाए हैं और इतना डूब कर गाए हैं कि कलेजा काढ़ लेती हैं ।

भोजपुरी लोकगीत गायकी के शिखर पर विराजमान इस समय चार स्त्रियां हैं , शारदा सिनहा , मालिनी अवस्थी , कल्पना और विजया भारती । लेकिन इन चारो ही की मातृभाषा भोजपुरी नहीं है । लेकिन इन की भोजपुरी गायकी लोगों के दिलों को जोड़ती हैं । माइकल जैक्सन अब नहीं हैं । लेकिन क्या डूब कर गाते थे । मुझे अंगरेजी बहुत समझ में नहीं आती । लेकिन माइकल जैक्सन का गाया समझ में आता है । इस लिए कि उन का संगीत भी दिल जोड़ता है । एक कोल्ड ड्रिंक के विज्ञापन में माइकल जैक्सन ऐसे गाते थे गोया संस्कृत के श्लोक पढ़ रहे हों , वेद की कोई ऋचा पढ़ रहे हों । मेरा तो स्पष्ट मानना है कि जब भी , जहां कहीं भी नफ़रत के बीज बोते लोग दिखें उन्हें संगीत की संगत में बुला लेना चाहिए । वह प्यार की भाषा बोलने लगेंगे । एक बार आज़मा कर तो देखिए । एक बार आंख खोल कर देखिए तो सही , देखेंगे तो पाएंगे कि दुनिया के सारे लोग कोई और भाषा समझें , नहीं समझें लेकिन संगीत ही एक भाषा है जिसे सारी दुनिया चुपचाप समझती है । दिल से समझती है , समझ कर संतोष और सुकून के दरिया में गहरे डूब जाती है । तो इस लिए भी कि गीत-संगीत तपस्या है , राजनीतिक या वैचारिक लफ्फाजी नहीं ,, बड़ी मुश्किल से नसीब होती है ।