Tuesday, 15 December 2015

मेरे कथा संसार के विलक्षण पाठक जनार्दन यादव


मेरे साथ जनार्दन यादव

जनार्दन यादव से मिलिए ।  मेरी रचनाओं के अनन्य पाठक । अनूठे अध्येता । मेरे कथा संसार के विलक्षण पाठक । लोक कवि अब गाते नहीं पढ़ कर यह मेरे दीवाने हुए । इतना कि मुझे भी अपना दीवाना बना लिया । जनार्दन यादव बी एस  एफ़  में सब इंस्पेक्टर रहे हैं । इसी वर्ष वी आर एस  लिया है । देश की विभिन्न सरहदों पर तैनात हो कर देश की उत्कृष्ट सेवा की है जनार्दन यादव ने । लेकिन जितने कर्मठ वह बार्डर पर रहे हैं , उतने ही संवेदनशील वह साहित्य के पाठक  भी हैं । उन दिनों भड़ास 4 मीडिया पर लोक कवि अब गाते नहीं धारावाहिक चल रहा था । जनार्दन यादव अपनी कठिन ड्यूटी में से भी उसे नियमित पढ़ रहे थे । मुझ से कोई परिचय नहीं था , कोई बात नहीं थी । लेकिन अपनी टिप्पणी वह दर्ज करते रहे , किसी उत्साही पाठक की तरह । एक दिन अचानक फ़ोन आया और बिलकुल हड़बड़ाए हुए बोले , ' मैं जनार्दन यादव बोल रहा हूं । आप को पढ़ रहा हूं । आप का उपन्यास पढ़ रहा हूं । ' फिर भूरि-भूरि प्रशंसा करते रहे वह बड़ी देर तक । फिर जब-तब फ़ोन आते रहे जनार्दन यादव के । कभी-कभी एक ही दिन में तीन बार , चार बार । हरदम हड़बड़ी में बोलते । अपनी भावना से परिचित करवाते । फ़ोन रख देते । वह एक किस्त पूरी करते और चार बार फ़ोन करते । अलग-अलग जिज्ञासा होती । चाव और चुनाव होता प्रश्न दर प्रश्न होते । पर उन की ललक ख़त्म नहीं होती । एकाधिक बार वह एक ही प्रश्न पर लटक जाते । मैं अब बोर हो जाता । लेकिन जनार्दन यादव की ललक ख़त्म नहीं होती । अतिशय विनम्रता के भाव में उन के फ़ोन अब नियमित हो गए । लोक कवि अब गाते नहीं को जैसे आकंठ जी रहे थे वह उन दिनों । यह बात बताते हुए वह अघाते नहीं थे । 

बाद के दिनों में जनार्दन यादव ने एक-एक कर मेरी सारी कथा रचनाएं पढ़ डालीं । प्रिंट निकाल-निकाल कर । हर रचना के बीच में उन की प्रश्नाकुलता आ खड़ी होती बरास्ता फ़ोन । सवाल भी आसान नहीं , उलझाने वाले । पूछते भी ऐसे जैसे मैं उन का कोई क़र्ज़ खाए हुए होऊं । जैसे किसी चरित्र का ज़िक्र करते हुए वह कहते कि,   ' यह आदमी तो बड़ा कमीना है , इस को तो आप को मार देना चाहिए था । ' या फिर , ' अच्छा सर , आप ने तो बड़ा मज़ा लिया होगा !'  या , ' यह तो बहुत ग़लत हो गया सर उस के साथ !' यह और ऐसी तमाम प्रतिक्रियाओं और सवालों से मुझे जब-तब लाद देते जनार्दन यादव । एकाध बार मैं उन के ऐसे बेवकूफी भरे सवालों से आजिज आ कर बिगड़ा भी । पर जनार्दन यादव तो फिर जनार्दन यादव । तिस पर उन की भावुकता भरी विनम्रता । मुझे मोह लिया जनार्दन यादव ने । फ़ोन पर बतियाते-बतियाते जल्दी ही वह लखनऊ आ गए मुझ से मिलने । अद्भुत भावुकता और अतिशय विनम्रता में लिपटे जनार्दन यादव । प्रचुर ऊर्जा से भरपूर । अतिशय सरल और सहृदय । अंग-अंग से कृतज्ञता ज्ञापित करते जनार्दन यादव । अकसर मिलने आ जाते हैं वह लखनऊ । फ़ोन पर प्रणाम से शुरू होती उन की बात हरदम प्रणाम पर ही ख़त्म होती है । उन्हें प्रांजल हिंदी बोलते हुए, सुनना भी एक अनुभव है । बातचीत में भी वह सादर शब्द बड़ी भाव प्रवणता से करते हैं । तो कई बार सुमित्रा नंदन पंत की कविता याद आ जाती है । बरबस । बी एस एफ़ में भी वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी दिलचस्पी लेते रहे हैं । ख़ास कर अखिल भारतीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में । वह अकसर चहक कर फ़ोन पर बताते रहते कि , ' सर आज आप के कारण , मैं प्रथम आ गया । ' मैं चकित हो कर पूछता , ' वह कैसे ?' जनार्दन यादव का जवाब होता , ' आप को पढ़-पढ़ कर । आप के फला लेख की लाईनें रट ली थीं न !' कह कर वह हंसने लगते । भोजपुरी में कहते  , ' आप जवन धारा प्रवाह लिखी ले न , वोहीं से न चोरा लेईं ले ना ! एकदम परछाईं नियर । और रट के बोलि देई ले !' कह कर वह हंसने लगते । 


जनार्दन यादव
मेरे कथा साहित्य के वैसे तो दुनिया भर में अनगिन पाठक हैं । पर जनार्दन यादव तो अपने क़िस्म के इकलौते हैं । बहुत दावे के साथ कह रहा हूं कि ऐसा पाठक मित्र तो न भूतो , न भवष्यति ! जनार्दन यादव जैसा भक्त वत्सल पाठक मिलना मेरा सौभाग्य है । आप बात मेरी किसी कहानी , किसी उपन्यास की उन से कर लीजिए । वह एक-एक दृश्य , एक-एक पात्र , एक-एक संवाद पर अक्षरश: बात करेंगे । एक बार मैं भूल सकता हूं , लेकिन जनार्दन यादव नहीं । वह मुझे ही याद दिला देंगे । कहेंगे , 'नहीं सर , ऐसे नहीं , वह प्रसंग इस तरह है । ' या फिर , ' यह फला पात्र का संवाद है , फला उपन्यास में ।'  एक नहीं , अनेक बार जनार्दन यादव की इस याददाश्त , इस जुड़ाव और इस संपृक्तता से मैं चकित हुआ हूं । बहुत से लोग बैठे हैं , किसिम-किसिम के , महफ़िल जमी हुई है , कोई बात चल रही है , लोग रस-रंजन में हैं । वहां भी किसी प्रसंग पर जनार्दन यादव अचानक मेरी किसी कथा रचना से , कोई वाकया उठा कर रख देंगे , कि वहां भी तो ऐसे ही हुआ है सर ! '

मैं हतप्रभ एकटक उन्हें देखता रहता हूं । 

जनार्दन यादव बलिया  के रहने वाले हैं ,अब दिल्ली में रहते हैं । बेटी उन की एम बी बी एस कर रही है । वह अकसर कहते रहे हैं कि दिल्ली आइए तो बताइए ज़रूर । मेरे घर आइए ज़रूर । दिल्ली जाना वैसे भी बहुत कम होता है । तिस पर व्यस्तता में हर बार चूक होती रही । उन का उलाहना आता रहा । लेकिन बीते बरस साहित्य अकादमी के साठ साल पूरे होने पर कहानी पाठ कार्यक्रम की सूचना उन्हें दी । जनार्दन यादव साहित्य अकादमी पहुंच आए । जब तक रहा साये की तरह मंडराते रहे । फ़ोटो-सोटो खींचते रहे ।  अपनी भावुकता से हमें भावुक करते रहे । अपने आदर भाव से हमे भाव संपन्न करते रहे । होटल भी आए । उन की वह लहक आज तक मन में चहक बन कर उपस्थित है । ऐसे जैसे एक पांव पर खड़े मेरी सेवा में कोई तपस्या कर रहे हों । पर पूरी चहक और महक के साथ । लखनऊ भी आते हैं वह तो इस चहक को और-और चटक बना कर लौटते हैं । मैं तो मानता हूं और पूरे मन से मानता हूं , पूरी श्रद्धा से मानता हूं कि पूर्व जन्म में ज़रूर कोई पुण्य किया था जो जनार्दन यादव जैसा निश्छल , भावुक , विनम्र और सजग पाठक मित्र मेरे जीवन में उपस्थित है । मेरे अनुपम प्रिय की तरह । 

बी एस एफ़ के महानिदेशक देवेंद्र कुमार पाठक द्वारा सम्मान प्राप्त करते हुए  जनार्दन यादव


इस लिंक को भी पढ़ें :


1 . अगर निरुपमा पांडेय की चले तो वह मुझे लेखक नहीं , लेखक का कारखाना बना दें


No comments:

Post a Comment