दयानंद पांडेय
No Copy
Sunday, 26 July 2026
मोदी और भाजपा का कोर वोटर उन से बिदक गया है
कटी पतंग की कैफ़ियत
तो कल ही मोदी सरकार का इस्तीफ़ा हो गया होता
दयानंद पांडेय
Monday, 6 July 2026
शुक्लाइन चाची की कहानियों का स्वर और स्वाद
दयानंद पांडेय
जैसे कोई शिक्षक किसी छात्र की ग़लती पर पतली सी छड़ी सटाक से मार दे। माधुरी महाकाश की कहानियां ऐसे ही सटाक से छड़ी मारती चलती हैं। सटाक-सटाक ! ज़रा-ज़रा सी बात पर यही ध्वनि। लेकिन जैसे शिक्षक की वह छड़ी छात्र को अच्छे नंबर से पास करने की कड़ी और लड़ी बन कर अचानक उपस्थित हो जाए तो छात्र का बड़ा सा दुःख , अनिर्वचनीय सुख में बदल जाता है। ठीक वैसे ही माधुरी महाकाश की कहानियों में छाया अकुलाया उदासी का बीज अचानक सारे पत्थर तोड़ते हुए हरे पौधे के रूप में उपस्थित हो कर हर्ष के पुष्प और फल में तब्दील हो जाता है। गदराया हुआ। कहानियों का उदास और हताश विवरण जैसे सावन का बादल बन उमंग की बौछार बन कर बरसने लगता है। माधुरी की कहानियों की कुल तासीर यही है। कहानी का अंत सुखद पड़ाव की ओर सहसा मुड़ जाता है। माधुरी महाकाश के कहानी संग्रह शुक्लाइन चाची की लगभग सभी कहानियों का स्वर और स्वाद यही है। जैसे किसी लैंपपोस्ट की दिपदिपाती लाइट में बच्चे पढ़ रहे हों , माधुरी महाकाश की कहानियां अपने पात्रों के मन को पढ़ती मिलती हैं। पुरुष कथाकार ऐलानियां तौर पर स्त्री मन को पढ़ने की लालसा , अभिलाषा में दुबले होते रहते हैं। माधुरी महाकाश बिना किसी ऐलान के पुरुष मन को पढ़ती हैं। पुरुष मन और मनोविज्ञान को बांचती हैं और किसी विद्यार्थी की तरह इस इबारत को आहिस्ता से लिख देती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की बड़ी ताक़त है। ऐसे जैसे रात की नीरव शांति में कोई आकाश में चमकते तारे गिन रहा हो मन ही मन। और अचानक कोई तारा टूट कर गिर पड़े। यह तारे का टूट पड़ना ही , माधुरी की कहानी का हासिल है। जैसे कोई एक शेर किसी ग़ज़ल का हासिल हो।
कई बार लगता है कि माधुरी कहानी नहीं , इमला लिख रही हों। पात्र बोल रहे हों , वह सर झुका कर लिख रही हों। बिना कोई हस्तक्षेप किए। बिना कोई सवाल जवाब किए। माधुरी जिस बेबाकी और सहजता से इमला लिखती मिलती हैं अपनी कहानियों में वह आसान नहीं है। इमला मतलब कथा में लेखक का कोई हस्तक्षेप नहीं है। जैसा कि अमूमन कहानियों में कथाकार करते मिलते हैं। शायद इसी लिए माधुरी की कथाओं में विवरण बहुत हैं। कह सकते हैं कि माधुरी विवरण प्रिय कथाकार हैं। रेशे-रेशे का विवरण रखती हैं। कहानी लंबी होती जाती है तो हो जाए। अपनी बला से। माधुरी लेकिन विवरण बताने में कोई कंजूसी नहीं बरततीं। हर चीज़ बता देना चाहती हैं। कुछ भी मिस नहीं होने देतीं। राजमा चावल बनाया है तो खिलाए बिना नहीं छोड़ने वाली कहानी में। चाय पकौड़ी ठेले से आई है तो क्या। खानी है वह भी। शुक्लाइन चाची कुंभ के मेले में नहाने समय डुबकी मार कर हेरा गई हैं। लोग हैरान हैं। तो क्या आख़िर में चौबाइन की शॉल ढलका कर , क्रीम रंग की शॉल ओढ़ कर मंद-मंद मुस्कुराती खड़ी भी मिलती हैं। बालू लिपटे पेटीकोट और भीगे ब्लाऊज में पगलिया बन कर घूमने वाली चाची का त्रास और निराश भाव जैसे क्रीम कलर की शॉल में औचक सौंदर्य बन कर कहानी के विवरण में ऐसे उजास भरता है जैसे घने बादल बीच अचानक सूर्य उपस्थित हो जाए। घर , घर के भीतर की बतकही को कहानी में ढाल लेने की कला किसी को सीखनी हो तो माधुरी महाकाश से सीखे। कुछेक अपवाद छोड़ दें तो माधुरी की कहानियों की सीमा भी यही है। घर , देहरी ,आंगन नहीं छोड़तीं वह। शायद इसी लिए माधुरी की कहानियां किसी एजेंडे के फ्रेम से बहुत बाहर हैं। किसी विमर्श के फंदे में भी नहीं हैं। चौंकाती भी नहीं हैं। कछुआ चाल चलती हुई जाने कितने खरगोशों को पछाड़ कर कहानी की लय को साध लेती हैं। किसी साधक संगीतकार की तरह।
गजमुक्ता कहानी में प्रेम , दान और लालच का क्या ही कलेवर है। श्राद्ध की श्रद्धा कैसे एक लालची ब्राह्मण छीन लेता है। ख़ुद खाने का ठिकाना नहीं पर दान में दरवाज़े पर बंधी हाथी मांग लेता है। गजमुक्ता का अपने स्वामी के प्रति अथाह प्रेम का वर्णन भी माधुरी की वर्णन प्रियता में माधुर्य का अनिर्वचनीय पाठ उपस्थित करता है। कहानी में छोटे-छोटे वर्णन और प्रसंग भी कहानी को एक नया रंग देते हुए बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं। समाज के प्रति माधुरी का ऑब्जर्वेशन भी कहानी के संवादों में , वर्णन में स्पष्ट झलकता रहता है। ऐसे जैसे किसी झील के जल में वृक्ष की मनोहर छाया हो। जल के कल-कल में पक्षी का कलरव हो। जल की गहनता में स्त्री का सौंदर्य छलकता हो। मायके की मनुहार में पगी लीलावती कहानी में पति की ससुराल की चुस्की भर मुस्की के रंग के भी क्या कहने। छोटे-छोटे सुख और दुःख की देहरी कब पीपल का पात की तरह हिलती डुलती परात में पांव धोने की परंपरा से प्रीत का सुगंध का एक नया ही बिरवा रच जाती है। माधुरी की कहानियों में माटी की महक किसी इत्र से भी ज़्यादा रची-बसी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी की यह महक नोएडा , दिल्ली की सरहद छू कर भी अपनी माटी में किसी ज़िक्र की तरह लौट आती है। पुरवा हवा में लिपट कर लहक जाती है। आजी , मधुमालती , सखी भी ऐसी ही कहानियां हैं जिन में माटी की खनक भी है और लोच भी। माधुरी अपनी इन कहानियों में जैसे कोई संगीत रचती चलती हैं। खटका , मुरकी , आरोह , अवरोह अनायास माधुरी की कहानियों के सुर और साज़ में समाते जाते हैं। किसी स्त्री की पायल की तरह , कांच की चूड़ी की तरह खनकते सुर कहानी की कब कमानी बन जाते हैं , कब मेरुदंड , पाठक जान ही नहीं पाता। बस एक आलाप ले कर रह जाता है। अचानक। घर गृहस्ती की चक्की में उलझी स्त्री या पुरुष ही माधुरी की कहानी में नहीं है बोर्ड परीक्षा की ब्लैक ब्यूटी भी है। इस का अलग ही रंग है। पुरुष मन की थाह और उस के मनोविज्ञान की पड़ताल तो माधुरी की कहानियों का मुख्य स्वर है ही , बाक़ी समाज का भी थर्मामीटर है। स्त्री उस की सीढ़ी। इस सीढ़ी पर चढ़ कर ही वह बहुत आहिस्ता से शानदार कथाकार बन जाती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की पृथ्वी है। माधुरी की यह पृथ्वी घूमती रहती है। निरंतर घूमती हुई भाषा की चाशनी में कठोर से कठोर बात बड़ी मुलायमियत से कह जाती है। गजमुक्ता कहानी की इस एक पंक्ति पर गौर कीजिए :
आधी आबादी तो ऐसा ब्लाऊजपीस दान में देती है कि इमरजेंसी पड़ जाए और छन्नी ना मिले तो चाय भी छन जाए।
माधुरी महाकाश की कहानियां सचमुच आधी आबादी का वही दान वाली ब्लाऊजपीस हैं जो समाज को क़दम-कदम पर बिना कुछ अतिरिक्त कहे अनायास छानती रहती हैं। पुरुष मनोविज्ञान को अपनी कहानी की ही तरह बेसन में लपेट कर पकौड़ी की तरह छान कर परोस देती हैं। गरम-गरम। चुटीली भाषा में जादू और कसाव , संवादों में कांटों जैसा नुकीलापन और कथ्य में सुमन जैसी सुगंध ही माधुरी महाकाश की कहानियों का स्वर है और स्वाद भी। उन की कहानियों का माधुर्य भी यही है।
समीक्ष्य पुस्तक :
शुक्लाइन चाची
लेखक : माधुरी महाकाश
प्रकाशक : हिंद युग्म ब्लू
सी -31 , सेक्टर - 20 नोएडा - 201301
मूल्य : 249 रुपए
पृष्ठ संख्या : 211
संस्करण : 2026
Friday, 26 June 2026
हाई हेडेड स्त्रियों में ममत्व अनुपस्थित होता है : दयानंद पांडेय
दयानंद पांडेय से डाक्टर सुरभि सिंह की बातचीत
● बचपन से ही आपके निकटतम किस स्त्री के सान्निध्य और व्यवहार ने सबसे अधिक प्रभावित किया?
- अम्मा से ज़्यादा आज तक कोई और प्रभावित नहीं कर पाया। अम्मा के दुःख , अम्मा के सुख जैसे मेरे ही दुःख और सुख थे। बचपन में भी , जवानी में भी और बाद के समय में भी। अम्मा अब नहीं हैं। फिर भी जब भी कभी कोई दुःख या सुख का क्षण होता है , सब से पहले अम्मा ही याद आती है। अम्मा और भगवान कई बार साथ उपस्थित मिलते हैं। लोग भगवान की पूजा कर वरदान मांगते हैं। मैं अम्मा को याद कर उन से आशीर्वाद मांगता हूं। संरक्षण और शुभकामना मांगता हूं। अम्मा को याद कर सुख को इंज्वाय कर लेता हूं , दुःख को बिसार देता हूं। आप यह जान कर शायद हंसेंगी कि अकसर पत्नी को भी मम्मी कह कर गुहराता हूं। शुरू में बच्चों के साथ-साथ , खेल-खेल में मम्मी कहता रहता था। बाद में आदतन कहने लगा। घर में रहते हुए अब हम दो ही हैं तब भी मम्मी कह कर बुलाता हूं। किसी ज़रूरत के समय तो पक्का। पत्नी के अनेक नाम रख रखे हैं। किसिम-किसिम के। अच्छे-अच्छे भी , ऐसे-वैसे भी। कुछ धार्मिक टाइप के , कुछ भदेस टाइप के भी। कुछ फ़िल्मी टाइप के। कुछ प्रेम के , कुछ तंज के। पत्नी में भी कई बार अम्मा के रंग दिखते रहते हैं। जब विवाह नहीं हुआ था तब गांव में अकसर दादी , चाची लोग अकसर बात-बेबात नौकी माई का ताना देती रहती थीं। नौकी माई मतलब पत्नी। तब का वह मजाक , वह तंज अब समझ में आता है। कि अम्मा के बाद अगर ज़िंदगी में सचमुच कोई सब से ज़्यादा ख़याल रखता है तो वह पत्नी ही हैं। कोई और नहीं। पत्नी में अम्मा , बहन , बेटी , सखी , सहचर सभी समाए हुए हैं।
हमारी अम्मा की सखियों ने भी अपने स्नेह से निरंतर सिंचित किया है। शक्ति दी है। बुआ , मौसी , चाची , मामी लोग भी। कुछ महिला मित्रों ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया है। कैसा भी दुःख हो , दुःख में देहरी और चौखट बन कर साथ दिया है। कभी-कभी सोचता हूं कि धरती पर , जीवन में स्त्रियां न होतीं तो हमारा यह जीवन रेगिस्तान की तरह तपता रहता। हम जीते और रहते भी कैसे इस निष्ठुर दुनिया में। सुंदर स्त्रियां भी मुझे बहुत मोहित करती हैं। मन में जीवन जीने का हुलास भरती हैं। सपने को सोने पर सुहागा बनाती रहती हैं। सुंदर स्त्रियां हैं तो जीवन बहुत सुंदर हैं। स्त्रियों का सान्निध्य पुरुष को मनुष्य बनाए रखने में बहुत सहायक है। मनुष्यता में स्त्रियों का योगदान बहुत है। तो इस लिए भी कि स्त्रियां जैसी भी हों , जो भी हों , उन में ममत्व होता है। बहुत होता है। प्रेम कर रही स्त्री में ममत्व ही तो मिलता है। ममत्व न हो तो प्रेम कहां और कैसा। यह ममत्व ही है जो स्त्रियों को देना सिखाता है। कुछ हाई हेडेड स्त्रियों में यह ममत्व अनुपस्थित होता है तो उन से भरसक कतरा जाता हूं। बच्चा बन कर उन्हें भुला देता हूं। अपनी ही एक कविता में इस बात को तफ़सील से कहना चाहता हूं :
तो मैं बच्चा बन जाता हूं
जब कोई बेशऊर औरत बदसुलूकी करती है
● आपके मन में स्त्री संवेदना का विकास कैसे हुआ?
- संवेदना ?
स्त्री न हो तो संवेदना अरे मनुष्यता भी धरती में समा जाए। स्त्री , शिशु और प्रकृति ने मिल कर मेरी संवेदना की शिराओं को सिंचित किया है। स्पष्ट है कि संवेदना की गंगोत्री अम्मा से ही प्रस्फुटित होती है। ऐसे जैसे चंदन की सुगंध में घुली मिसरी। संवेदना का कोई निश्चित छंद , मीटर या पैमाना नहीं होता। कब और कहां उपस्थित हो जाए , नहीं जानता। कई बार अनुपस्थित भी हो जाती है। आप को बताऊं कि मैं रोता भी बहुत हूं। बात - बेबात रो पड़ता हूं। अपने दुःख में तो कभी नहीं रोता पर दूसरों के दुःख देख अनायास रो पड़ता हूं। कोई सिनेमा देख कर , कुछ पढ़ कर सुबुक-सुबुक कर रोने लगता हूं। कई बार तो अपनी ही कहानी या उपन्यास लिखते हुए पात्रों की स्थिति पर रोने लगता हूं । अपनी ही कहानी , उपन्यास पढ़ कर भी रोने लगता हूं। प्रूफ़ पढ़ रहा हूं , रोता जा रहा हूं। रोना अपने हाथ में नहीं होता। आप फिर हंसेंगी यह सुन कर कि विवाह के बाद पत्नी को विदा कराते समय पत्नी को रोते देख कर मुझे भी रोना आ गया था। रोने लगा था। छुप कर। मुंह पर हाथ लगा कर। यह देख कर कुछ लोग हंसने लगे। इतना ही नहीं भाइयों की बहुओं की विदाई करते समय , बहुओं को रोते देख मेरे भी आंसू निकल आए। हर बार। पहले गांव से जब गोरखपुर शहर पढ़ने गया तो जब भी छुट्टियों में घर आता तो वापसी में अम्मा से लिपट कर बहुत रोता था। चुपचाप। इस तरह कि कोई देख न ले। अम्मा भो रोती , मैं भी। बचपन से आख़िर तक का यह सिलसिला है। शहर आ कर भी अम्मा के लिए अकेले में रोता रहता था। यहां तक कि जब नौकरी के लिए दिल्ली चला गया तब भी यह रोना नहीं गया। बाद में जब विवाह हो गया और कुछ दिनों तक पत्नी भी गांव में रहीं तो चलते समय पहले पत्नी से मिल कर रोता फिर अम्मा से मिल कर रोता। अजब सिलसिला था यह। पत्नी जब कभी दिल्ली से गोरखपुर जातीं या लखनऊ से भी तब भी यह रोना चलता रहता था। हंसता भी बहुत हूं। बल्कि रोने से ज़्यादा हंसता हूं। पर हंसना तो लोग देख लेते हैं , रोना नहीं। रोना छुप-छुप होता है। वह एक गाना है न छुप-छुप मीरा रोए , दर्द न जाने कोए। स्थिति यही होती है। यह रोना क्या है ? संवेदना ही तो है। फिर स्त्री से ज़्यादा दुःख दुनिया में किस के साथ है ? एक कथाकार होने के कारण स्त्री संवेदना को मैं नहीं जानूंगा तो क्या आप जानेंगी ? स्त्री संवेदना जाने बिना कोई कवि या कथाकार कैसे हो सकता है ? आप मेरे उपन्यास या कहानियां पढ़िए। कविताएं पढ़िए। बिना स्त्री की उपस्थिति के कोई रचना नहीं मिलेगी। स्त्री है तो संवेदना होगी ही। स्त्री और संवेदना दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। जैसे देह में मांस और ख़ून।
● इस संग्रह में किस कहानी और उसके नारी पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया?
- ऐसा नहीं कह सकता कि इस एक कहानी या किसी एक नारी पात्र ने सर्वाधिक प्रभावित किया। सभी कहानी , सभी पात्र प्रभावित करते हैं तभी किसी कथा में समाते हैं। कहूं कि अपने आप आ जाते हैं। अनायास आ जाते हैं। किसी पात्र को बुलाना नहीं पड़ता कि आओ , तुम आओ इस कथा में। वह तो ख़ुद ब ख़ुद आ जाते हैं। कंधे पर , सिर पर चढ़ कर आते हैं। दिल में क़लम में समा जाते हैं। वही हमें बुलाते रहते हैं। अपने पीछे-पीछे नचाते रहते हैं। कथा शुरू करना भले हमारे हाथ में हो पर शुरू करने के बाद पात्र ही मुझे संचालित करते हैं। ऐसे जैसे वह कोई गाड़ीवान हों। और मुझे हांक रहे हों। हम चरित्रों के हाथ में होते हैं। चरित्र हमारे हाथ में नहीं होते। जिधर वह चाहते हैं , हांक ले जाते हैं। नारी चरित्र या कोई भी चरित्र प्रभावित नहीं करेंगे तो वह कथा में आएंगे ही क्यों ? किसी तरह गिरते-लड़खड़ाते आ भी गए तो आ कर करेंगे भी क्या ? गूंगे बन कर बैठे रहेंगे। उन्हें कोई पढ़ेगा भी क्यों ? उस से भी पहले मैं उन्हें लिखूंगा भी क्यों। काट कर फेक दूंगा।
● "तुम्हारे बिना" कहानी की पृष्ठभूमि क्या है ? इसे शीर्षक कहानी चुनने के पीछे क्या कारण रहा।
- पृष्ठभूमि प्रेम ही है। किसी भी कथा में , कविता में प्रेम तभी ताक़तवर बन कर उपस्थित होता है जब वह विछोह को प्राप्त होता है। पंत जी ने लिखा ही है :
वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान।
निकल कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।
शीर्षक कहानी तो मैं लेकिन रखना चाहता था। पर प्रकाशक की राय थी कि शीर्षक कैची होना चाहिए। लेकिन शब्द में प्रकाशक को कैच नहीं मिल रहा था। तो तुम्हारे बिना ही उपयुक्त लगा। प्रेम और स्त्री विमर्श की सशक्त कहानी है तुम्हारे बिना। प्रेम कहानियां और प्रेम के कथ्य वाले उपन्यास बहुत हैं हमारे पास। पर ऐसी काव्यात्मक भाषा में बहुत कम कहानियां लिखी हैं मैं ने। विपश्यना में प्रेम उपन्यास में भी यही काव्यात्मक भाषा है। कथा में काव्यात्मक भाषा , कथा को तरल , सरस और प्रवाहमान बना देती है। हर बात के अनेक अर्थ उपस्थित करती है। प्रेम को गहनता और परिपूर्णता देती है। काव्य अपने आप में प्रेम है। फिर कथा में काव्यात्मक भाषा उसे संगीतमय बना देती है। सातो सुर अनायास बजने लगते हैं। ऐसे जैसे राग खमाज। काव्यात्मक भाषा कथा के लोच और लचक को अर्थवान बना देती है। पठनीयता में मिसरी सी मिठास और चंदन सी सुगंध का भास देती है। सुगंध और सुमन की तरह एक हो जाती है कथा।
● क्या "लेकिन" कहानी के सरोकार या संदर्भ आज के समय में उपस्थित हैं ?
- लेकिन इसी आज की कथा है। हर शहर , हर गांव की कथा है। सुलगती और दहकती हुई , जलती हुई कथा है। कोई प्राचीन कथा नहीं। स्त्रियां ही नहीं , पुरुष भी पीड़ित होते हैं। आज के समाज की ज्वलंत समस्या है यह। अनेक घटनाएं समाज में घट रही हैं। बेटियों से प्रताड़ित और अपमानित पिताओं की कहानियों को लोग जानने तो लगे हैं पर लिखने से कतराने में भलाई सोचते हैं। ऑनर किलिंग की ख़बरें बहुत छपती हैं , अख़बारों में। बेटियों से , पत्नियों से प्रताड़ित पुरुषों की ख़बरें लोकलाज में दब जाती हैं। अपने आसपास निगाह दौड़ाइए। पाइएगा कि जाने कितने मृत्युंजय मिश्रा गुमनाम हो गए। लोकलाज के नाम पर ऑनर किलिंग नहीं की , आत्महत्या नहीं की। ख़ुद को जैसे मार कर गुमनाम जीवन जीने को अभिशप्त हो गए। वह मृत्युंजय मिश्रा जो अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे , कैरियर बनाने के लिए बेटी को पूरी स्वतंत्रता दी। पूरा विश्वास किया। सारी सुविधा दी। पर बेटी ने न सिर्फ़ पिता से छल किया , पीठ में छुरा घोंपा। मुंह पर कालिख लगा कर परिवार और समाज में लांछित कर दिया। सम्मानित और प्रतिष्ठित मृत्युंजय मिश्रा के पास गुमनाम ज़िंदगी के सिवाय कोई और रास्ता शेष नहीं रहा। नैतिकता , शुचिता और सामाजिकता की जो ध्वनि और मर्यादा उपस्थित है लेकिन में , शायद मेरी किसी और रचना में नहीं। स्त्री विमर्श का यह नया पड़ाव है लेकिन। नया संदर्भ और नया उन्वान है लेकिन।
● "शिकस्त" कहानी लिखते समय बिना लाग-लपेट के आपने अपनी कह दी ।इस निर्भीकता का आधार क्या रहा ?
- सत्ता के गलियारों में ऐसे अनेक गलीज लोग धंसे पड़े हैं। मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं। एक समय था कि हम लोग राजनैतिक शब्द लिखते थे। पर राजनीति में नैतिकता का इतना क्षरण हुआ , होता ही गया क्रमशः कि राजनैतिक को राजनीतिक लिखने लगे। पर अब यह राजनीतिक शब्द भी शर्म से गड़ गया है। पहले सत्ता कारपोरेट और इंडस्ट्री का भविष्य और वर्तमान तय करती थी। अब कारपोरेट , इंडस्ट्री सत्ता किस की होगी , कैसे होगी , यह तय करने लगे हैं। पावर ब्रोकर ने बहुत मज़बूत स्थिति बना ली है अपनी। सत्ता में भी , कारपोरेट में भी। नैतिकता , शुचिता अब गुम हो चुकी गौरैया है , राजनीति और सिस्टम में। पावर ही महत्वपूर्ण है। कुछ और नहीं। मनी पावर और औरत की कॉकटेल है सत्ता। शिकस्त की कथा यही तो है। कि एक पावरफुल मंत्री शिकस्त पर शिकस्त खाते हुए भी पावर ब्रोकर बन कर उपस्थित हो जाता है। उस का कैरियर अचानक राजनीति से पावर ब्रोकर में शिफ़्ट हो जाता है। जब तक वह यह जान पाता है , तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
● रचनाकर्म में में आधी आबादी की भूमिका क्या मानते हैं ?
- आधी आबादी ही तो रचना का मेरुदंड है। आधार स्तंभ है। दुनिया की ज़्यादातर रचनाएं आधी आबादी की दुनिया में ही न्यस्त और व्यस्त हैं। किसी भी रचना में अगर आधी आबादी की अनुपस्थिति है तो रचना शुष्क हो जाती है। नीरस और बांझ हो जाती है।
● महिला रचनाकारों में किसका लेखन सर्वाधिक प्रभावित करता है?
- मैं लेखन को स्त्री और पुरुष रचनाकार में बांट कर देखने का अभ्यस्त नहीं हूं। फिर भी महादेवी वर्मा अभी तक मानक हैं। महादेवी की रचनात्मक सरहद और व्यक्तित्व को अभी तक कोई स्त्री रचनाकार लांघ नहीं सकी है।
● स्त्रियों की समस्या का चित्रण इतनी वास्तविकता से कैसे कर पाते हैं ?
- इस लिए कि स्त्रियां मुझे प्रिय हैं। मेरे हृदय के क़रीब हैं। स्त्रियों के बिना अपने को अधूरा ही नहीं , अनुपस्थित पाता हूं।
● स्त्री विमर्श स्वयं स्त्रियों के द्वारा ही उपेक्षित है क्या आप सहमत हैं ?
- स्त्री विमर्श , दलित विमर्श , यह विमर्श , वह विमर्श साहित्यिक राजनीति के दांव-पेंच हैं। कुछ और नहीं। स्त्रियों को कालिदास कम समझते हैं कि तुलसीदास ? आप को मालूम है कि वाल्मीकि ने जो रामायण लिखी है , सीता की बताई कथा , विवरण और यातना से गुज़र कर लिखी है। वनवास के समय सीता वाल्मीकि के आश्रम में रही थीं। इसी वाल्मीकि रामायण को आधार बना कर दुनिया भर की भाषाओं में रामायण लिखी गई। वेदव्यास ने जो महाभारत लिखी उस में गांधारी , कुंती , द्रौपदी या किसी भी स्त्री पात्र के साथ अन्याय किया है क्या ? तुलसी तो श्री राम चरित मानस में राक्षस स्त्रियों को भी माता कह कर मिलते दीखते हैं। मीरा ने क्या कृष्ण को किसी पुरुष कवि से कम समझा है ? मुझे लगता है कि मीरा ने जितना कृष्ण को समझा और गाया है किसी और ने नहीं। रचनाकार को निष्कलुष होना चाहिए , तभी वह सच्ची रचना लिख सकता है। स्त्री , पुरुष , जाति , धर्म , समुदाय में विभक्त हो कर लिखने वाला रचनाकार टुच्चा होता है। लोक उसे स्वीकार नहीं करता। रचनाकार धरती की तरह होता है। रचना बीज की तरह। रचना में ताक़त होती है तो पत्थर फोड़ कर भी अंकुरित हो जाती है। रचना बड़ी होती है तो आलोचक भी बड़ा हो जाता है , उस रचना के बारे में लिख कर। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जायसी , तुलसी , प्रेमचंद की रचनाओं पर लिखा तो वह बड़े आलोचक हो गए। क्यों कि वह बड़ी रचनाओं के बारे में लिख रहे थे। रामचंद्र शुक्ल के पहले तो लोग तुलसीदास को भक्त मानते थे , कवि नहीं। रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास को ऐसे परिभाषित किया कि वह दुनिया के सब से बड़े कवि मान लिए गए हैं। जो कि वह सर्वदा से हैं। निराला को तो कुछ लोगों ने साज़िशन चोर घोषित कर दिया था। पर एक आलोचक हुए राम विलास शर्मा। राम विलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना तीन खंड में लिख कर बताया कि निराला विश्वस्तरीय कवि हैं। किट्स और शैली से बड़े कवि। दुनिया को यह स्वीकार करना पड़ा।
एक बार निराला ने गांधी को घेर लिया। गांधी ने कहा था कि हिंदी में कोई एक रवींद्रनाथ टैगोर क्यों नहीं है ? निराला ने गांधी की आंख में आंख डाल कर पूछा था कि आप ने हिंदी में किसी को पढ़ा भी है ? गांधी निरुत्तर थे। महादेवी वर्मा इस किस्से को बहुत तन्मय हो कर सुनाती थीं। ऐसे ही एक बार नेहरू काशी में कुछ लेखकों से मिले। जिन में जयशंकर प्रसाद , रामचंद्र शुक्ल , प्रेमचंद आदि उपस्थित थे। नेहरू ने भी इन लेखकों की उपस्थिति में कहा था कि हिंदी में दरबारी कविता लिखी जाती है। हिंदी में कोई एक रवींद्रनाथ टैगोर नहीं है। यह ख़बर और फ़ोटो अख़बारों में छपी। बाद में निराला ने नेहरू को भी टोका। नेहरू से कहा कि जो लेखक काशी में आप के साथ बैठे थे वह रवींद्रनाथ टैगोर से बड़े नहीं तो कम भी नहीं हैं। उन का बड़प्पन था के आप के लिहाज में उन्हों ने आप से कुछ कहा नहीं। नेहरू निराला के आगे चुप हो गए।
● आज नारी विमर्श के चित्रण की आवश्यकता क्यों है ?
- नारी विमर्श कब नहीं था। किस भाषा के साहित्य में नहीं था। कि अब हो गया है। भारत में रामायण और महाभारत दोनों ही नारी विमर्श की रचनाएं हैं। रामायण के केंद्र में सीता हैं तो महाभारत के केंद्र में द्रौपदी। सीता अनुपस्थित हो जाएं तो रामायण में क्या शेष रहेगा ? महाभारत से द्रौपदी को अनुपस्थित कर दीजिए , महाभारत कौन लिखेगा और कौन पढ़ेगा ?
● आप की कहानियों के स्त्री पात्र बेहद निर्भीक होते हैं। उन्हें उन्मुक्त कहना उनके साथ अन्याय करना होगा,वे निरीह नहीं हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आपने अपने अपने स्त्री पात्रों को बुलंद और बेबाक दिखाया है चाहे वह किसी भी रूप में हो इसका क्या कारण है?
- - इस लिए कि स्त्रियां निर्भीक हैं। सर्वदा से निर्भीक हैं। हम ने उन्हें निर्भीक नहीं बनाया है। निरीह और निर्भीक स्त्री भी होती है , पुरुष भी। पुरुष हो या स्त्री , निर्भीक और निरीह स्थितियां उसे बनाती बिगाड़ती रहती हैं। कोई लेखक नहीं।
[ डॉ सुरभि सिंह द्वारा लिखित पुस्तक दयानंद पांडेय की कहानियों में नारी विमर्श का नया वितान से साभार ]
Sunday, 21 June 2026
पढ़ाकू नहीं हूं , बहुत आलसी हूं , पढ़ने के मामले में अतिशय आलसी : दयानंद पांडेय
दयानंद पांडेय से उमाशंकर तिवारी की बातचीत
● आप एक सफल पत्रकार और हिन्दी साहित्य में हर विधा पर लेखन के लिए विख्यात हैं l इसका श्रेय किस को देते हैं ॽ
- अपने आदरणीय पाठकों को।
● सर आप के पत्रकार के कार्यकाल में आप के ऊपर अनेकों बार जानलेवा हमला हुआ l फिर भी आप साहस और आत्म विश्वास से आगे यानी लक्ष्य की ओर बढ़ते रहे l इसके लिए प्रेरक किस को मानते हैं ॽ
- हां , लखनऊ में एक बार शिया सुन्नी दंगे में प्राणघातक हमला हुआ था चौक इलाक़े में। किसी तरह बच गया। दिल्ली के सिख दंगे में भी लोगों को बचाने में लोगों के गुस्से और हमले का शिकार बना l किसी तरह बचा l प्राण घातक दुर्घटनाएं भी कई हुई l रोड एक्सीडेंट l हर बार काल के गाल से बच कर निकल आया l ख़बरों को ले कर निरंतर धमकी , कुछ मुक़दमे , कंटेंप्ट ऑफ़ कोर्ट और विधान परिषद में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव भी पेश हुए। लेकिन सभी भंवर से हर बार बेदाग निकल आया l
● आदारणीय आप पत्रकारिता क्षेत्र में रहते हुए अनेक महान हस्तियों का इंटरव्यू किया l सब से अच्छा अनुभव किस का रहा ?
- लगभग सब से ही अच्छा अनुभव रहा। जिन कुछ लोगों के साथ अनुभव ठीक नहीं रहा , उन के इंटरव्यू लिखे ही नहीं। कुछ इंटरव्यू बहुत ख़राब रहे तो उन को भी नहीं लिखा। कुछ लोग बड़े नामी थे पर उन के पास बताने को कुछ नहीं था। उन का इंटरव्यू भी नहीं लिखा। अटल से मायावती तक , दिलीप कुमार से अमिताभ बच्चन तक , श्रीदेवी से पूजा भट्ट तक, लता मंगेशकर से कुमार शानू तक , नामवर सिंह से निर्मल वर्मा तक , ब व कारंत से उषा गांगुली तक तमाम शिखर पुरुषों, स्त्रियों से इंटरव्यू किया है l अन्य अनेक लोग हैं l इंटरव्यू की एक पूरी किताब ही है l
● आप अपने प्रारंभिक जीवन अम्मा जी बाबू जी,, प्रारंभिक शिक्षा के विषय में बताइए जिस से हमारे पाठक प्रेरणा ले सकें l
- अम्मा , पिता जी सर्वदा अनुकरणीय रहे। हां , पिता जी से कई बार छत्तीस का आंकड़ा रहा। इतना कि कई बार बातचीत बंद हो गई।
● आप के पसंदीदा लेखक , मन पसंद पुस्तकें जिससे आप प्रभावित होकर लोक प्रिय लेखक बने ॽ
- बहुत सी किताबें हैं। बहुत से लेखक हैं। पर हजारी प्रसाद द्विवेदी , अज्ञेय , मोहन राकेश , खुशवंत सिंह , चतुरसेन शास्त्री , मनोहरश्याम जोशी , चंद्रकिरण सोनरिक्सा पसंदीदा हैं। जान लीजिए कि बहुत कम पढ़ा है। पढ़ाकू नहीं हूं। बहुत आलसी हूं। पढ़ने के मामले में अतिशय आलसी।
● आप अन्य क्षेत्र में जा सकते थे l फिर आपने पत्रकारिता और सफल हिंदी जगत में कालजयी सफल , कालजयी विश्वविख्यात साहित्यकारों में आप ने अपने को स्थापित कर लिया l इस सफलता का रहस्य किया है ?
- किसी और क्षेत्र में जाने लायक़ कभी नहीं रहा। जीवन में सफलता जैसी कोई चीज़ भी नहीं है। इस लिए कोई रहस्य भी नहीं है।
● आप एक दबंग , बेबाक लिखने वाले , एक अच्छे संपादक भी हैं l आप की 80 से अधिक पुस्तकें सम्मानित प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित हैं इसका श्रेय किसको दिजिएगा ॽ
- सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने आदरणीय पाठकों को।
● पाण्डेय जी नये लेखकों का समय समय पर मार्ग दर्शन देते रहे हैं l यही नहीं आप एक अच्छे वक्ता समीक्षक हैं l फिर आप के विरोधी हैं l इस संदर्भ में क्या संदेश देना चाहेंगे ॽ
- मार्गदर्शन जैसा कुछ नहीं है। बहुत सामान्य आदमी हूं। वक्ता भी बहुत सामान्य हूं। बस बोल बतिया लेता हूं। हां , सच-सच लिखने और बोलने के कारण विरोधी बहुत हैं हमारे। ठकुरसुहाती नहीं आती।
● आप का जन्म स्थान गोरखपुर है l आप अपने जन्मस्थान गांव-जवार के कुछ अनुभवों का साझा किजिए l आप के अनुभवों का लाभ हमारे पाठक भी उठा सकें ॽ
- जन्म स्थान सभी को बहुत प्रिय होता है। मुझे भी है। गांव जवार के खट्टे मीठे अनुभव बहुत हैं। बताएंगे तो पूरी किताब लिख जाएगी।
● आप को आप के साहित्य की साधना को देखते हुए आप की पुस्तकों पर अनेक सम्मान मिले हैं l उत्तरप्रदेश हिंन्दी संस्थान अन्य प्रदेशों ने पुरस्कृत किया है l आप को लोहिया साहित्य सम्मान , साहित्य भूषण, हिंदी गौरव ,अन्य विभिन्न पुरस्कार सम्मान मिलने के बाद भी साहित्य सेवा में सक्रिय और विनम्र सरल स्वभाव कैसे बना रखा है l आप क्या कहना चाहेंगे ॽ
- बहुत सामान्य आदमी हूं। सामान्य जीवन जीता हूं। कोई चकाचौंध नहीं है। सम्मान वग़ैरह मिलने से सभी को ख़ुशी मिलती है। मुझे भी ख़ुशी होती है। अच्छा लगता है।
● आप ने अपने जीवन में अनेकों बार परमात्मा की कृपा से आप के प्राण की रक्षा की इस परम सत्ता को आप इस अध्यात्म शक्ति के विषय में कुछ प्रकाश डालिए l
-हां , कुछ दुर्घटनाओं का शिकार हुआ। कई बार। हर बार मृत्यु के जबड़े से लौट कर आया। यह मेरा सौभाग्य है। आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं हूं। मोह-माया , लोभ में फंसा हुआ सामान्य व्यक्ति हूं।
●लखनऊ के साहित्यकार जैसे नागर , भगवती चरण वर्मा, यशपाल जैसे कवि, उपन्यासकार, कहानीकार,,,,, पत्रकार, संपादक, रंगमंच, कलाकारों से आप प्रभावित हुए l कुछ संस्मरण साझा किजिए l
- मेरा सौभाग्य है कि इन लेखकों का मुझ पर बहुत स्नेह रहा। ख़ास कर नागर जी का तो बहुत।
● आप की पुस्तकें लखनऊ में ही नहीं विदेशों में भी पढ़ी जातीं हैं l जब कि आपकी पुस्तकें सुप्रसिद्ध प्रकाशक प्रकाशित करते हैं और लोकार्पण भी नहीं कराते हैं l आप का इस संदर्भ में मार्गदर्शन दीजिए l .
- मेरा काम सिर्फ़ लिखना है। और कुछ नहीं आता। लोकार्पण वग़ैरह का इवेंट मेरे वश का नहीं है। बाक़ी किताब बेचना प्रकाशक का काम है। कहां बेचता है , प्रकाशक ही जाने।
● क्या आप ज्योतिष, अध्यात्म ,पर आस्था रखते हैं ?
- आस्था है। पर मुझे ज्योतिष नहीं आती। आध्यात्मिक भी नहीं हूं।
● आप के साहित्य सृजन में आप की धर्मपत्नी, सुपुत्र, सुपुत्री का योगदान है ?
- सभी का योगदान है। पत्नी का बहुत। पत्नी अगर घर में शांति , सुख और सुविधा न दें तो कुछ लिखने का सोचना भी कठिन होता। बहुत कठिन।
● नये लेखकों को कैसा साहित्य सृजन की आवश्यकता हैॽ
- नए लेखक बहुत होशियार , बहुत जानकर लोग हैं। उन के आगे हमारे जैसे लोग कुछ नहीं हैं।
● आप ने पत्रकारिता और साहित्य सेवा ही क्यों अपनाया? आप आइ ए एस, पी सी एस, और आई पी एस भी बन सकते थे l भगवान की कृपा से आप का रोबीला चेहरा ज्ञान गुण प्राप्त है l फिर देश के लिए समाज के लिए साहित्य जगत में फिर भी विश्व विख्यात हैं l ऐसा क्यों ?
- शायद पत्रकारिता और लेखन के लिए भगवान ने तय किया था। आई ए एस , पी सी एस के लायक़ नहीं था। न पढ़ाई में तेज़ था। न मेहनती। कभी इस बारे में सोचा भी नहीं। आलसी भी बहुत हूं। एक नंबर का निकम्मा।
● पाण्डेय जी , आप की सर्वप्रथम कहानी ,उपन्यास कब प्रकाशित हुआ ॽ
- विद्यार्थी जीवन में ही रचनाएं छपने लगी थीं। पारिश्रमिक मिलने लगा था। तब के समय अख़बार , पत्रिकाएं , आकाशवाणी सभी पारिश्रमिक देते थे। मेरा पहला उपन्यास पचीस बरस की उम्र में छप गया था। कहानी संग्रह बाद में छपा। कई बार एक ही साथ दो तीन किताब एक साथ छप कर मिलीं।
● आप की कालजयी पुस्तक कुछ बातें , कुछ मुलाकातें से हमें बहुत कुछ सीखने का अवसर प्राप्त हुआ l बहुत अच्छे कालजयी लोकगीत गायक,फिल्मी कलाकार, शारदा सिन्हा,जी, लोकगीत और लोकगायक बालेश्वर जी जैसे अनेकों कालजयी महान विभूतियों का साक्षात्कार लिया है इस कालजयी पुस्तक प्रस्तुत करने की प्रेरणा किस से मिली ॽ
- अख़बार में रिपोर्टर था। तो इंटरव्यू लेना भी हमारे काम का हिस्सा था। होता गया।
● आदारणीय पाण्डेय जी आप ने अपने व्यस्तताओं में से बात करने के लिए वार्तालाप के लिए बहुत-बहुत आभार !
Saturday, 23 May 2026
मेलोनी से आगे क़िस्सों की दुनिया और भी है
दयानंद पांडेय
मोदी , मेलोनी के पहुनवा राघो की मेलोडी !
दयानंद पांडेय
हम आरक्षण की इसी बैसाखी को तोड़ देना चाहते हैं
दयानंद पांडेय
सामाजिक समता के नाम पर चल रहे पाखंड और कमीनेपन को, झूठी बातों को , कुतर्क को ग़लत साबित करने की मूर्खता आप कीजिए l मैं परीक्षार्थी नहीं हूं l आप को जिन बातों को ग़लत सही साबित करना हो कीजिए l
आरक्षण वाला वोट बैंक भी टूटेगा
दयानंद पांडेय
Wednesday, 20 May 2026
मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है
दयानंद पांडेय
अफ़सोस कि आप अपने को पढ़ा लिखा भी मानते हैं l नहीं जानते तो अब से जानिए कि पहले सिर्फ़ चार वर्ण थे l जाति नहीं l जाति बनाई मुग़लों ने l अपनी सेवा के लिए l फिर ब्रिटिशर्स ने इस जाति प्रथा को खाद पानी दे के बांटो और राज करो में तब्दील किया l फिर राजनीतिज्ञों ने आरक्षण दे कर जातियों को भस्मासुर बना दिया है l आप जैसे तमाम दलित बड़ा संविधान की माला रटते हैं आरक्षण की बैसाखी की रक्षा के लिए l जो लोग पढ़ना नहीं जानते , संविधान की माला फेरते मिलते हैं l संविधान में किसी भी अनुच्छेद में जाति का ज़िक्र नहीं है l पिछड़े और कमज़ोर का ज़िक्र है l कांग्रेस ने अपने स्वार्थ में जाति जाति करना शुरू किया l इंदिरा गांधी के समय में l मोदी और ज़्यादा कर रहा है जाति जाति l नेहरू ने तो आरक्षण का डट कर विरोध किया था l नेहरू को गांधी ने ठेल दिया l आज आरक्षण में देश प्रतिभाहीन हो गया है l नौबत माइनस चालीस वाले डाक्टर की आ गई है l गुड है l
मनुस्मृति की बात पर आते हैं l जहरीले और निकम्मे दलित मनुस्मृति बहुत जलाते हैं l आरक्षण की बैसाखी की और ज़ोर से पकड़ने के लिए l
मनु कौन थे ?
राजा थे l ब्राह्मण नहीं , क्षत्रिय थे l मनुस्मृति , मनु ने ही लिखी है। उन्हों ने एक व्यवस्था बनाई थी राज करने के लिए l मनुस्मृति पढ़े हुए लोग जानते हैं कि मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है l ब्राह्मण का काम सर्फ मुफ़्त में शिक्षा था और भिक्षा मांग कर भोजन करना था l कोई अन्य काम नहीं करना था l अगर ग़लती से भी कुछ धनार्जन किया तो बहुत सख़्त सज़ा थी l ब्राह्मणों के लिए इतने निषेध और सज़ा हैं मनुस्मृति में कि क्या ही कहा जाए l शरिया में भी ऐसी सजा नहीं दर्ज है।
लेकिन क्रिश्चियन मिशनरी ने ऐसा गुल खिलाया कि लालच में दलित लोग क्रिश्चियन बनने लगे l पूरा नार्थईस्ट क्रिश्चियन क्यों है ? कभी सोचा है ?
क्या ब्राह्मणों के कारण ?
यह अंबेडकर कौन है ?
अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है l क्यों लिखता था , अंबेडकर ?
ऐश से रहता था , अंबेडकर सरनेम लिख कर l ब्रिटिश एजेंट था l क्रिश्चियन मिशनरी के लिए काम करता था l पढ़िए अंबेडकर की जीवनी l बड़ा नेता बनने के लिए पहले मुसलमान बनना चाहता था l आंबेडकर की लिखी कभी वोटिंग फॉर वीजा पढ़िए। खास कर 1934 की उन की दौलताबाद यात्रा के विवरण पढ़िए। फिर सामने जिन्ना था l जिन्ना के आगे भला क्या चलती। फिर क्रिश्चियन बनना चाहता था l पर क्रिश्चियन बनने से मिशनरी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता था l हिंदुओं में फूट डालने का लक्ष्य l फिर अंबेडकर बौद्ध बन गया l हाला कि फिर भी वह कामयाबी नहीं मिली जो लक्ष्य था l
इस लिए भी कि बुद्ध आध्यात्मिक व्यक्ति थे l अंबेडकर राजनीतिक l बुद्ध और अंबेडकर में कोई मेल नहीं था l बुद्ध कर्मकांड के ख़िलाफ़ थे l अंबेडकर पूरी तरह कर्मकांडी l अपना ब्राह्मण सरनेम तक नहीं बदल सका l
आरक्षण क्या अंबेडकर की देन है ?
जी नहीं l संविधान सभा के 319 सदस्यों की देन है l जिस संविधान सभा के अध्यक्ष थे राजेंद्र प्रसाद और सलाहकार वी एन राव l गांधी का परामर्श था l वह भी देश के पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के लिए l जाति विशेष के लिए नहीं l
लेकिन इंदिरा गांधी से लगायत मोदी तक ने दलितों का वोट हथियाने का टूल बना लिया अंबेडकर को l अंबेडकर सिर्फ़ ड्राफ्ट कमेटी का मामूली सा अध्यक्ष था l
अंबेडकर की माला जपते हुए आरक्षण की बैसाखी थामने वाले दलित किसी क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचे हों तो सूचित कीजिएगा l पता कीजिएगा कि कितने प्रतिभावान लोग हर साल देश छोड़ रहे हैं l फिर इस में दलित कितने हैं l
आरक्षण का इतना बैंड बजने के बावजूद कितने विशेषज्ञ दलित डाक्टर हुए हैं ? कितने बड़े वकील हैं ? कितने वैज्ञानिक ? क्रिकेटर , उद्योगपति, अभिनेता या प्रोफेशनल?
हाँ, माइनस चालीस की बदबू वाले डाक्टर हींगे l पाँच साल का एम बी बी एस पंद्रह साल , बीस साल में कर ही रहे हैं l गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कालेज से एक खबर छपी थी पिछले दिनों। एम बी बी एस के पहले ही साल में एक दलित ने ग्यारह साल लगा दिए पर पास नहीं हुआ। मेडिकल कालेज छोड़ने को भी तैयार नहीं। फीस देनी नहीं। हॉस्टल , भोजन सब मुफ्त। और क्या चाहिए।
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में कुछ छात्रों ने धरना प्रदर्शन किया। उन्हीं दिनों मनमोहन सरकार बनी थी। पी एल पुनिया बाराबंकी से सांसद थे। अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए थे। कैबिनेट मंत्री का दर्जा। पहुंचे एक दिन मेडिकल कालेज उक्त धरना स्थल पर। मेडिकल कालेज के तब के प्रिंसिपल पुनिया से मिलने धरना स्थल पहुंचे। धरना पर बैठे छात्रों ने पुनिया से शिकायत की कि अभी तक यह कभी हम से बात करने नहीं आए। आज आए हैं। पुनिया ने प्रिंसिपल को तरेरते हुए पूछा , अभी तक क्यों नहीं आए ? प्रिंसिपल ने कहा , आज भी नहीं आता अगर आप नहीं आए होते। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा आप रिटायर्ड आई ए एस हैं। पढ़े लिखे आदमी हैं। सिस्टम समझते हैं। इस लिए आ गया। प्रिंसिपल ने कहा कि इन दलित छात्रों की शिकायत है कि दस-दस , पंद्रह-पंद्रह साल से इन्हें फेल कर दिया जा रहा है। पास नहीं होने दिया जा रहा है। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा कि सर आप सक्षम हैं। ऐसा कीजिए कि देश में जो भी दलित प्रोफ़ेसर मौजूद हैं , उन से ही इन का पेपर बनवा दीजिए। दलित प्रोफेसरों से ही इन सभी की कापियां जंचवा दीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं। पूरा सहयोग रहेगा हमारा। इतना सुनते ही पूनिया निरुत्तर हो गए। धीरे से उठ कर चले गए। फिर कभी नहीं लौटे। धरना खत्म हो गया था। ऐसे अनेक किस्से हैं। एक डाक्टर यादव थे उन दिनों। सर्जन थे लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में। लेकिन देखता था कि शाम को अक्सर वह कभी दूरदर्शन , कभी आकाशवाणी पर समाचार पढ़ते मिलते थे। बलरामपुर में एक डाक्टर मित्र से एक दिन पूछ लिया कि इन को इतना टाइम कैसे मिल जाता है। कि महीने में पंद्रह दिन आकाशवाणी , पंद्रह दिन दूरदर्शन पर रहते हैं। डाक्टर मित्र बोले , डाक्टर यादव के पास टाइम ही टाइम है। दो साल का एम एस पंद्रह साल में किया है। आरक्षण में नौकरी मिल गई है। मरीज लेकिन आरक्षण में नहीं मिलते। कोई इन से आपरेशन करवाना ही नहीं चाहता। कोई सर्जन इन को अपना असिस्टेंट भी नहीं बनाना चाहता। कौन मरीज के स्वास्थ्य का रिस्क ले ? सो टाइम ही टाइम है इन के पास। डाक्टर यादव की लेकिन एक बड़ी खासियत थी कि यादव होने के बावजूद मृदु भाषी थे। बहुत ही मिलनसार। बाद में हमारे मित्र भी बन गए।
सारी बड़ी नौकरियां अब प्राइवेट सेक्टर में हैं l कितने दलित सी ई ओ हैं ? प्रेसिडेंट , वाइस प्रेसिडेंट हैं ?
आरक्षण देश ही नहीं आरक्षणधारियों को भी नष्ट कर चुका है l
चेत जाइए l यह ब्राह्मण विरोध की कुंठा आप को खा जाएगी l ब्राह्मण का कुछ नहीं बिगड़ेगा l वह तो मांग के खाईबो , मसीत में सोने वाला जीव है l मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद है l तिलक और गोखले है l बहुत लंबी सूची है ऐसे ब्राह्मणों की।
कितने दलित आज़ादी के लिए कुर्बान हुए ?
एक नहीं l कभी नहीं l अंबेडकर भी नहीं। अंबेडकर फ्रीडम फाइटर नहीं , अंग्रेजों का दल्ला था।
ठीक ?
[ अपनी ही एक पोस्ट पर एक मित्र के कमेंट पर यह मेरा जवाब। ]
सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार है अब आरक्षण
दयानंद पांडेय
इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं
दयानंद पांडेय
आप का क्या है , अलहदादपुर को अल्लाहदादपुर बता देते हैं l कान इधर से पकड़िए या उधर से पकड़ना कान ही है l इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं l आप की सारी उदारता दिखावटी है l ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान बनाने के लिए सब से ज़्यादा सक्रिय उत्तर प्रदेश और बिहार के मुस्लिम लोग थे l पर जब पाकिस्तान जाने की बात हुई तो यहीं से लोग नहीं गए l जो मुट्ठी भर लोग गए भी पाकिस्तान से लात खा कर लौट आए l पर जीते एक और पाकिस्तान बनाने के लिए ही हैं l काफ़िर का कांसेप्ट है कि जाता ही नहीं l पूरी दुनिया को इस्लाम में कंवर्ट करने का ज़ज़्बा बड़ी नफ़ासत से क़ायम है l सिर तन से जुदा करने की तमन्ना है कि जाती ही नहीं l क्या पढ़े लिखे , क्या अनपढ़ l सब की एक गति है l
शेर को आरक्षण क्यों चाहिए ?
दयानंद पांडेय
कृष्ण में यादव लिखा है ? कि दशरथ, लक्ष्मण , भरत आदि में सिंह ? बुद्ध भी क्षत्रिय थे l लिखते थे क्या सिंह ? हीनता और कुंठा वश दलित लोग सीना तान कर सिंह लिखते हैं l तो क्या सिंह बन जाते हैं ?
हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी
दयानंद पांडेय
हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी l मुक़दमा करने वाले लोग भुगत कर गए l फिर लौटे नहीं l नोटिस भी बहुत मिलती हैं l पाँच करोड़ से कम की मानहानि की कोई धमकी नहीं देता l ऐसी फ़ालतू नोटिस का जवाब भी नहीं देता l आप के पास प्रमाण है , बात में दम है तो कोई पंगा नहीं लेता अमूमन l
भारत में ग़लत , पाकिस्तान में ठीक
दयानंद पांडेय
पाकिस्तान में कुछ जगहों के नाम बदलने पर हमारे कुछ सेक्युलर टाइप के हिप्पोक्रेट दोस्त फ़िदा हो गए हैं l यह गिरे हुए दोगले लोग दो एक हिंदी नाम पर लहालोट हो गए हैं l यही काम कभी कभार भारत में होता है तो इन के पृष्ठ भाग में दर्द बहुत होता है l फिर यह कमज़र्फ़ अपनी दोगलई में भूल जा रहे है कि पाकिस्तान में हिंदू आबादी साफ़ हो गई है l सफ़ाचट l बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर यही लोग लब सिले हुए थे l सांस नहीं ले रहे थे l
एक समाजवादी लेकिन अब कांग्रेसी मित्र की ऐसी ही एक पोस्ट पर उन की इस मानसिकता को नंगा करते एक कमेंट लिखा और उन्हें बताया कि लोहिया की आत्मा कलप रही होगी l मित्र को जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन याद दिलाया था l बताया था कि खुशवंत सिंह का ए ट्रेन टू पाकिस्तान पढ़िए l यह भी कि खुशवंत सिंह , संघी या भाजपाई नहीं थे l भीष्म साहनी कम्युनिस्ट थे l भीष्म साहनी का तमस पढ़ने की सलाह दी थी l मित्र को जवाब देते नहीं बना l वैसे भी कभी जवाब नहीं दे पाते l क्यों कि तर्क और तथ्य से सर्वदा च्युत रहते हैं l
लेकिन आज अभी थोड़ी देर पहले का वह कमेंट , मित्र बर्दाश्त नहीं कर पाए , मिटा दिया l ग़ज़ब समाजवादी चरित्र है l क्या कांग्रेस में जाते ही आदमी राहुल गांधी की तरह फ़ासिस्ट हो जाता है ? एकतरफ़ा बात करने की बीमारी घेर लेती है ? सच को स्वीकार करने की क्षमता नष्ट हो जाती है ?
जो भी हो बंगाल का ग़म दूर करने के लिए मरियम का यह मरहम भी बहुत है l बाक़ी योगी का काढ़ा भी आ गया है l जिस को जो लेना हो सहर्ष ले !
लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है
दयानंद पांडेय
लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है l सिर्फ़ अपनी पसंद और सुविधा ही में आप की आस्था शेष रह गई है l बाई द वे जो आप कह रहे हैं तो इस हिसाब से तमिलनाडु और केरल में भी भाजपा की सरकार होनी चाहिए थी l ममता और वाम दलों की हिंसा आप को कितनी तो प्यारी है l
कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप
दयानंद पांडेय
कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप l तमिलनाडु में विजय जोसेफ़ के लिए कितना तो दुख है आप को l राज्यपाल के लिए कितनी घृणा l
Thursday, 14 May 2026
अटल वाली कटहल की खेती और ममता
दयानंद पांडेय
कल का चुनाव परिणाम चाहे जो हो l पर अटल बिहारी वाजपेयी बहुत याद आएंगे l भाजपा में तो वह मुख्य मंत्री और मंत्री बनाते बिगाड़ते रहे थे l जैसे नरेंद्र मोदी को भी गुजरात में मुख्य मंत्री अटल जी ने ही बनाया था l लेकिन अटल जी भाजपा को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा से इतर भी लोगों को मुख्य मंत्री या मंत्री बनाते रहे l क़ुर्बानी दे कर भी l दबी ज़ुबान भाजपा में तब हर बार अटल जी का विरोध भी ख़ूब हुआ l पर अटल जी अपनी दूर दृष्टि से डिगे नहीं l
तीन लोग ऐसे थे जो भाजपा में नहीं थे पर बारी-बारी उन्हें भाजपा के सहयोग से मुख्य मंत्री बनाया l और वह तीनों भाजपा के लिए खाद बन कर काम आए l भाजपा को फूलने फलने में अनायास मदद कर बैठे l हाला कि तब के समय विधान सभाओं में संख्या बल में भाजपा बड़ी थी बावजूद इस के l जैसे मायावती और नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनवाया l ममता बनर्जी को पहले केंद्र में मंत्री बनाया l कांग्रेस को कमजोर किया l फिर पश्चिम बंगाल का मुख्य मंत्री बनवाया l वाया नंदीग्राम और सिंगूर l
पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का काँटा भाजपा कभी सीधे नहीं निकाल सकती थी l वामपंथियों की सशस्त्र क्रांति और गोली बंदूक का जवाब भाजपा कभी नहीं दे सकती थी l भाजपा के लोग संघ में सीखी लाठियां भांजने से अधिक कुछ कर नहीं सकते थे l तो वामपंथियों की बेहूदगी और गुंडई का काँटा निकालने के लिए अटल जी ने ममता बनर्जी नाम का कांटा तैयार किया l परिणाम देखिए कि वामपंथी पश्चिम बंगाल में अब गूलर के फूल बन चुके हैं l अलग बात है कि ममता बनर्जी ख़ुद आहिस्ता आहिस्ता भस्मासुर बन गईं l
लेकिन अब ?
भस्मासुर अब भस्म होने को तैयार बैठी है l नीतीश कुमार , अब ख़बर से भी बाहर हैं l मायावती राजनीति के हाशिए से भी बाहर हैं l भाजपा का सूर्योदय अगर आज भाजपाइयों को उत्तर प्रदेश , बिहार में दिख रहा हो तो भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l जातिवादी बिहार में भाजपा का मुख्य मंत्री आसान तो नहीं था l ऐसे ही कल की सुबह अगर पश्चिम बंगाल में भी भाजपा का सूर्योदय होता दिखे तो एक बार फिर भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l अटल जी ने ममता के कांटे से वाम का लाल क़िला तोड़ दिया था l अब ममता की खाद , भाजपा की फसल को लहलहाने वाली है l देखते जाइए l मोदी का धैर्य भी बहुत महत्वपूर्ण है l ममता नाम की भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखवा कर नचाना आसान तो नहीं था l
बहुतेरे लोग अकसर कहा करते थे कि पश्चिम बंगाल में बिना राष्ट्रपति शासन लगाए निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते l लेकिन नरेंद्र मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन की बदनामी सिर लिए , पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव करवा कर दिखा दिया है l वह कहते हैं न कि आप अपनी माँ को माँ कहिए या पिता की पत्नी बात एक ही है l ग़लत कुछ भी नहीं l तथ्य है यह l
पर कहने सुनने में माँ कहना ही अच्छा लगता है l पिता की पत्नी , गाली और अपमानजनक लगता है l सो मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन लगाए पश्चिम बंगाल में वह सब कर दिया है जो राष्ट्रपति शासन लगा कर भी नहीं किया जा सकता था l बदनामी का दाग अलग लगता l केंद्रीय सुरक्षा बलों के मार्फ़त ममता बनर्जी की गुंडई को जिस ख़ूबी से काबू किया है मोदी ने कि ममता भी लाजवाब हो गई हैं l उन की सारी उछल कूद मंकी एफ़र्ट में तब्दील हो गई है l
अब 4 मई के परिणाम की प्रतीक्षा कीजिए l अटल जी की राजनीतिक खेती करने की विधि का आनंद लीजिए l और जानिए कि राजनीति कटहल की खेती है l पपीता छ महीने में फल देने लगता है पर छ महीने बाद ख़त्म हो जाता है l देखिए न मायावती को l पपीता बन कर रह गई हैं l पर कटहल बहुत साल बाद फल देता है l देता है तो बरसो बरस देता है l पीढ़ियां खाती हैं l
राजनीति की खेती में भी खाद पानी की बहुत ज़रूरत होती है l समय से खाद पानी देते रहिए तो अटल बिहारी जैसे कटहल लगाने वाले युगों तक याद आते रहते हैं l इस की तपिश में झुलस कर राहुल गांधी जैसे लोग झुनझुना बन जाते हैं l जो चाहता है झुनझुना बजा कर चल देता है l यही वह तपिश है जो घुंघरू बांध कर आदमी को अरविंद केजरीवाल बना देती है l




