दयानंद पांडेय
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Saturday, 23 May 2026
मेलोनी से आगे क़िस्सों की दुनिया और भी है
मोदी , मेलोनी के पहुनवा राघो की मेलोडी !
दयानंद पांडेय
हम आरक्षण की इसी बैसाखी को तोड़ देना चाहते हैं
दयानंद पांडेय
सामाजिक समता के नाम पर चल रहे पाखंड और कमीनेपन को, झूठी बातों को , कुतर्क को ग़लत साबित करने की मूर्खता आप कीजिए l मैं परीक्षार्थी नहीं हूं l आप को जिन बातों को ग़लत सही साबित करना हो कीजिए l
आरक्षण वाला वोट बैंक भी टूटेगा
दयानंद पांडेय
Wednesday, 20 May 2026
मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है
दयानंद पांडेय
अफ़सोस कि आप अपने को पढ़ा लिखा भी मानते हैं l नहीं जानते तो अब से जानिए कि पहले सिर्फ़ चार वर्ण थे l जाति नहीं l जाति बनाई मुग़लों ने l अपनी सेवा के लिए l फिर ब्रिटिशर्स ने इस जाति प्रथा को खाद पानी दे के बांटो और राज करो में तब्दील किया l फिर राजनीतिज्ञों ने आरक्षण दे कर जातियों को भस्मासुर बना दिया है l आप जैसे तमाम दलित बड़ा संविधान की माला रटते हैं आरक्षण की बैसाखी की रक्षा के लिए l जो लोग पढ़ना नहीं जानते , संविधान की माला फेरते मिलते हैं l संविधान में किसी भी अनुच्छेद में जाति का ज़िक्र नहीं है l पिछड़े और कमज़ोर का ज़िक्र है l कांग्रेस ने अपने स्वार्थ में जाति जाति करना शुरू किया l इंदिरा गांधी के समय में l मोदी और ज़्यादा कर रहा है जाति जाति l नेहरू ने तो आरक्षण का डट कर विरोध किया था l नेहरू को गांधी ने ठेल दिया l आज आरक्षण में देश प्रतिभाहीन हो गया है l नौबत माइनस चालीस वाले डाक्टर की आ गई है l गुड है l
मनुस्मृति की बात पर आते हैं l जहरीले और निकम्मे दलित मनुस्मृति बहुत जलाते हैं l आरक्षण की बैसाखी की और ज़ोर से पकड़ने के लिए l
मनु कौन थे ?
राजा थे l ब्राह्मण नहीं , क्षत्रिय थे l मनुस्मृति , मनु ने ही लिखी है। उन्हों ने एक व्यवस्था बनाई थी राज करने के लिए l मनुस्मृति पढ़े हुए लोग जानते हैं कि मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है l ब्राह्मण का काम सर्फ मुफ़्त में शिक्षा था और भिक्षा मांग कर भोजन करना था l कोई अन्य काम नहीं करना था l अगर ग़लती से भी कुछ धनार्जन किया तो बहुत सख़्त सज़ा थी l ब्राह्मणों के लिए इतने निषेध और सज़ा हैं मनुस्मृति में कि क्या ही कहा जाए l शरिया में भी ऐसी सजा नहीं दर्ज है।
लेकिन क्रिश्चियन मिशनरी ने ऐसा गुल खिलाया कि लालच में दलित लोग क्रिश्चियन बनने लगे l पूरा नार्थईस्ट क्रिश्चियन क्यों है ? कभी सोचा है ?
क्या ब्राह्मणों के कारण ?
यह अंबेडकर कौन है ?
अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है l क्यों लिखता था , अंबेडकर ?
ऐश से रहता था , अंबेडकर सरनेम लिख कर l ब्रिटिश एजेंट था l क्रिश्चियन मिशनरी के लिए काम करता था l पढ़िए अंबेडकर की जीवनी l बड़ा नेता बनने के लिए पहले मुसलमान बनना चाहता था l आंबेडकर की लिखी कभी वोटिंग फॉर वीजा पढ़िए। खास कर 1934 की उन की दौलताबाद यात्रा के विवरण पढ़िए। फिर सामने जिन्ना था l जिन्ना के आगे भला क्या चलती। फिर क्रिश्चियन बनना चाहता था l पर क्रिश्चियन बनने से मिशनरी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता था l हिंदुओं में फूट डालने का लक्ष्य l फिर अंबेडकर बौद्ध बन गया l हाला कि फिर भी वह कामयाबी नहीं मिली जो लक्ष्य था l
इस लिए भी कि बुद्ध आध्यात्मिक व्यक्ति थे l अंबेडकर राजनीतिक l बुद्ध और अंबेडकर में कोई मेल नहीं था l बुद्ध कर्मकांड के ख़िलाफ़ थे l अंबेडकर पूरी तरह कर्मकांडी l अपना ब्राह्मण सरनेम तक नहीं बदल सका l
आरक्षण क्या अंबेडकर की देन है ?
जी नहीं l संविधान सभा के 319 सदस्यों की देन है l जिस संविधान सभा के अध्यक्ष थे राजेंद्र प्रसाद और सलाहकार वी एन राव l गांधी का परामर्श था l वह भी देश के पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के लिए l जाति विशेष के लिए नहीं l
लेकिन इंदिरा गांधी से लगायत मोदी तक ने दलितों का वोट हथियाने का टूल बना लिया अंबेडकर को l अंबेडकर सिर्फ़ ड्राफ्ट कमेटी का मामूली सा अध्यक्ष था l
अंबेडकर की माला जपते हुए आरक्षण की बैसाखी थामने वाले दलित किसी क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचे हों तो सूचित कीजिएगा l पता कीजिएगा कि कितने प्रतिभावान लोग हर साल देश छोड़ रहे हैं l फिर इस में दलित कितने हैं l
आरक्षण का इतना बैंड बजने के बावजूद कितने विशेषज्ञ दलित डाक्टर हुए हैं ? कितने बड़े वकील हैं ? कितने वैज्ञानिक ? क्रिकेटर , उद्योगपति, अभिनेता या प्रोफेशनल?
हाँ, माइनस चालीस की बदबू वाले डाक्टर हींगे l पाँच साल का एम बी बी एस पंद्रह साल , बीस साल में कर ही रहे हैं l गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कालेज से एक खबर छपी थी पिछले दिनों। एम बी बी एस के पहले ही साल में एक दलित ने ग्यारह साल लगा दिए पर पास नहीं हुआ। मेडिकल कालेज छोड़ने को भी तैयार नहीं। फीस देनी नहीं। हॉस्टल , भोजन सब मुफ्त। और क्या चाहिए।
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में कुछ छात्रों ने धरना प्रदर्शन किया। उन्हीं दिनों मनमोहन सरकार बनी थी। पी एल पुनिया बाराबंकी से सांसद थे। अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए थे। कैबिनेट मंत्री का दर्जा। पहुंचे एक दिन मेडिकल कालेज उक्त धरना स्थल पर। मेडिकल कालेज के तब के प्रिंसिपल पुनिया से मिलने धरना स्थल पहुंचे। धरना पर बैठे छात्रों ने पुनिया से शिकायत की कि अभी तक यह कभी हम से बात करने नहीं आए। आज आए हैं। पुनिया ने प्रिंसिपल को तरेरते हुए पूछा , अभी तक क्यों नहीं आए ? प्रिंसिपल ने कहा , आज भी नहीं आता अगर आप नहीं आए होते। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा आप रिटायर्ड आई ए एस हैं। पढ़े लिखे आदमी हैं। सिस्टम समझते हैं। इस लिए आ गया। प्रिंसिपल ने कहा कि इन दलित छात्रों की शिकायत है कि दस-दस , पंद्रह-पंद्रह साल से इन्हें फेल कर दिया जा रहा है। पास नहीं होने दिया जा रहा है। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा कि सर आप सक्षम हैं। ऐसा कीजिए कि देश में जो भी दलित प्रोफ़ेसर मौजूद हैं , उन से ही इन का पेपर बनवा दीजिए। दलित प्रोफेसरों से ही इन सभी की कापियां जंचवा दीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं। पूरा सहयोग रहेगा हमारा। इतना सुनते ही पूनिया निरुत्तर हो गए। धीरे से उठ कर चले गए। फिर कभी नहीं लौटे। धरना खत्म हो गया था। ऐसे अनेक किस्से हैं। एक डाक्टर यादव थे उन दिनों। सर्जन थे लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में। लेकिन देखता था कि शाम को अक्सर वह कभी दूरदर्शन , कभी आकाशवाणी पर समाचार पढ़ते मिलते थे। बलरामपुर में एक डाक्टर मित्र से एक दिन पूछ लिया कि इन को इतना टाइम कैसे मिल जाता है। कि महीने में पंद्रह दिन आकाशवाणी , पंद्रह दिन दूरदर्शन पर रहते हैं। डाक्टर मित्र बोले , डाक्टर यादव के पास टाइम ही टाइम है। दो साल का एम एस पंद्रह साल में किया है। आरक्षण में नौकरी मिल गई है। मरीज लेकिन आरक्षण में नहीं मिलते। कोई इन से आपरेशन करवाना ही नहीं चाहता। कोई सर्जन इन को अपना असिस्टेंट भी नहीं बनाना चाहता। कौन मरीज के स्वास्थ्य का रिस्क ले ? सो टाइम ही टाइम है इन के पास। डाक्टर यादव की लेकिन एक बड़ी खासियत थी कि यादव होने के बावजूद मृदु भाषी थे। बहुत ही मिलनसार। बाद में हमारे मित्र भी बन गए।
सारी बड़ी नौकरियां अब प्राइवेट सेक्टर में हैं l कितने दलित सी ई ओ हैं ? प्रेसिडेंट , वाइस प्रेसिडेंट हैं ?
आरक्षण देश ही नहीं आरक्षणधारियों को भी नष्ट कर चुका है l
चेत जाइए l यह ब्राह्मण विरोध की कुंठा आप को खा जाएगी l ब्राह्मण का कुछ नहीं बिगड़ेगा l वह तो मांग के खाईबो , मसीत में सोने वाला जीव है l मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद है l तिलक और गोखले है l बहुत लंबी सूची है ऐसे ब्राह्मणों की।
कितने दलित आज़ादी के लिए कुर्बान हुए ?
एक नहीं l कभी नहीं l अंबेडकर भी नहीं। अंबेडकर फ्रीडम फाइटर नहीं , अंग्रेजों का दल्ला था।
ठीक ?
[ अपनी ही एक पोस्ट पर एक मित्र के कमेंट पर यह मेरा जवाब। ]
सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार है अब आरक्षण
दयानंद पांडेय
इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं
दयानंद पांडेय
आप का क्या है , अलहदादपुर को अल्लाहदादपुर बता देते हैं l कान इधर से पकड़िए या उधर से पकड़ना कान ही है l इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं l आप की सारी उदारता दिखावटी है l ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान बनाने के लिए सब से ज़्यादा सक्रिय उत्तर प्रदेश और बिहार के मुस्लिम लोग थे l पर जब पाकिस्तान जाने की बात हुई तो यहीं से लोग नहीं गए l जो मुट्ठी भर लोग गए भी पाकिस्तान से लात खा कर लौट आए l पर जीते एक और पाकिस्तान बनाने के लिए ही हैं l काफ़िर का कांसेप्ट है कि जाता ही नहीं l पूरी दुनिया को इस्लाम में कंवर्ट करने का ज़ज़्बा बड़ी नफ़ासत से क़ायम है l सिर तन से जुदा करने की तमन्ना है कि जाती ही नहीं l क्या पढ़े लिखे , क्या अनपढ़ l सब की एक गति है l
शेर को आरक्षण क्यों चाहिए ?
दयानंद पांडेय
कृष्ण में यादव लिखा है ? कि दशरथ, लक्ष्मण , भरत आदि में सिंह ? बुद्ध भी क्षत्रिय थे l लिखते थे क्या सिंह ? हीनता और कुंठा वश दलित लोग सीना तान कर सिंह लिखते हैं l तो क्या सिंह बन जाते हैं ?
हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी
दयानंद पांडेय
हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी l मुक़दमा करने वाले लोग भुगत कर गए l फिर लौटे नहीं l नोटिस भी बहुत मिलती हैं l पाँच करोड़ से कम की मानहानि की कोई धमकी नहीं देता l ऐसी फ़ालतू नोटिस का जवाब भी नहीं देता l आप के पास प्रमाण है , बात में दम है तो कोई पंगा नहीं लेता अमूमन l
भारत में ग़लत , पाकिस्तान में ठीक
दयानंद पांडेय
पाकिस्तान में कुछ जगहों के नाम बदलने पर हमारे कुछ सेक्युलर टाइप के हिप्पोक्रेट दोस्त फ़िदा हो गए हैं l यह गिरे हुए दोगले लोग दो एक हिंदी नाम पर लहालोट हो गए हैं l यही काम कभी कभार भारत में होता है तो इन के पृष्ठ भाग में दर्द बहुत होता है l फिर यह कमज़र्फ़ अपनी दोगलई में भूल जा रहे है कि पाकिस्तान में हिंदू आबादी साफ़ हो गई है l सफ़ाचट l बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर यही लोग लब सिले हुए थे l सांस नहीं ले रहे थे l
एक समाजवादी लेकिन अब कांग्रेसी मित्र की ऐसी ही एक पोस्ट पर उन की इस मानसिकता को नंगा करते एक कमेंट लिखा और उन्हें बताया कि लोहिया की आत्मा कलप रही होगी l मित्र को जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन याद दिलाया था l बताया था कि खुशवंत सिंह का ए ट्रेन टू पाकिस्तान पढ़िए l यह भी कि खुशवंत सिंह , संघी या भाजपाई नहीं थे l भीष्म साहनी कम्युनिस्ट थे l भीष्म साहनी का तमस पढ़ने की सलाह दी थी l मित्र को जवाब देते नहीं बना l वैसे भी कभी जवाब नहीं दे पाते l क्यों कि तर्क और तथ्य से सर्वदा च्युत रहते हैं l
लेकिन आज अभी थोड़ी देर पहले का वह कमेंट , मित्र बर्दाश्त नहीं कर पाए , मिटा दिया l ग़ज़ब समाजवादी चरित्र है l क्या कांग्रेस में जाते ही आदमी राहुल गांधी की तरह फ़ासिस्ट हो जाता है ? एकतरफ़ा बात करने की बीमारी घेर लेती है ? सच को स्वीकार करने की क्षमता नष्ट हो जाती है ?
जो भी हो बंगाल का ग़म दूर करने के लिए मरियम का यह मरहम भी बहुत है l बाक़ी योगी का काढ़ा भी आ गया है l जिस को जो लेना हो सहर्ष ले !
लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है
दयानंद पांडेय
लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है l सिर्फ़ अपनी पसंद और सुविधा ही में आप की आस्था शेष रह गई है l बाई द वे जो आप कह रहे हैं तो इस हिसाब से तमिलनाडु और केरल में भी भाजपा की सरकार होनी चाहिए थी l ममता और वाम दलों की हिंसा आप को कितनी तो प्यारी है l
कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप
दयानंद पांडेय
कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप l तमिलनाडु में विजय जोसेफ़ के लिए कितना तो दुख है आप को l राज्यपाल के लिए कितनी घृणा l
Thursday, 14 May 2026
अटल वाली कटहल की खेती और ममता
दयानंद पांडेय
कल का चुनाव परिणाम चाहे जो हो l पर अटल बिहारी वाजपेयी बहुत याद आएंगे l भाजपा में तो वह मुख्य मंत्री और मंत्री बनाते बिगाड़ते रहे थे l जैसे नरेंद्र मोदी को भी गुजरात में मुख्य मंत्री अटल जी ने ही बनाया था l लेकिन अटल जी भाजपा को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा से इतर भी लोगों को मुख्य मंत्री या मंत्री बनाते रहे l क़ुर्बानी दे कर भी l दबी ज़ुबान भाजपा में तब हर बार अटल जी का विरोध भी ख़ूब हुआ l पर अटल जी अपनी दूर दृष्टि से डिगे नहीं l
तीन लोग ऐसे थे जो भाजपा में नहीं थे पर बारी-बारी उन्हें भाजपा के सहयोग से मुख्य मंत्री बनाया l और वह तीनों भाजपा के लिए खाद बन कर काम आए l भाजपा को फूलने फलने में अनायास मदद कर बैठे l हाला कि तब के समय विधान सभाओं में संख्या बल में भाजपा बड़ी थी बावजूद इस के l जैसे मायावती और नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनवाया l ममता बनर्जी को पहले केंद्र में मंत्री बनाया l कांग्रेस को कमजोर किया l फिर पश्चिम बंगाल का मुख्य मंत्री बनवाया l वाया नंदीग्राम और सिंगूर l
पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का काँटा भाजपा कभी सीधे नहीं निकाल सकती थी l वामपंथियों की सशस्त्र क्रांति और गोली बंदूक का जवाब भाजपा कभी नहीं दे सकती थी l भाजपा के लोग संघ में सीखी लाठियां भांजने से अधिक कुछ कर नहीं सकते थे l तो वामपंथियों की बेहूदगी और गुंडई का काँटा निकालने के लिए अटल जी ने ममता बनर्जी नाम का कांटा तैयार किया l परिणाम देखिए कि वामपंथी पश्चिम बंगाल में अब गूलर के फूल बन चुके हैं l अलग बात है कि ममता बनर्जी ख़ुद आहिस्ता आहिस्ता भस्मासुर बन गईं l
लेकिन अब ?
भस्मासुर अब भस्म होने को तैयार बैठी है l नीतीश कुमार , अब ख़बर से भी बाहर हैं l मायावती राजनीति के हाशिए से भी बाहर हैं l भाजपा का सूर्योदय अगर आज भाजपाइयों को उत्तर प्रदेश , बिहार में दिख रहा हो तो भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l जातिवादी बिहार में भाजपा का मुख्य मंत्री आसान तो नहीं था l ऐसे ही कल की सुबह अगर पश्चिम बंगाल में भी भाजपा का सूर्योदय होता दिखे तो एक बार फिर भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l अटल जी ने ममता के कांटे से वाम का लाल क़िला तोड़ दिया था l अब ममता की खाद , भाजपा की फसल को लहलहाने वाली है l देखते जाइए l मोदी का धैर्य भी बहुत महत्वपूर्ण है l ममता नाम की भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखवा कर नचाना आसान तो नहीं था l
बहुतेरे लोग अकसर कहा करते थे कि पश्चिम बंगाल में बिना राष्ट्रपति शासन लगाए निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते l लेकिन नरेंद्र मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन की बदनामी सिर लिए , पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव करवा कर दिखा दिया है l वह कहते हैं न कि आप अपनी माँ को माँ कहिए या पिता की पत्नी बात एक ही है l ग़लत कुछ भी नहीं l तथ्य है यह l
पर कहने सुनने में माँ कहना ही अच्छा लगता है l पिता की पत्नी , गाली और अपमानजनक लगता है l सो मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन लगाए पश्चिम बंगाल में वह सब कर दिया है जो राष्ट्रपति शासन लगा कर भी नहीं किया जा सकता था l बदनामी का दाग अलग लगता l केंद्रीय सुरक्षा बलों के मार्फ़त ममता बनर्जी की गुंडई को जिस ख़ूबी से काबू किया है मोदी ने कि ममता भी लाजवाब हो गई हैं l उन की सारी उछल कूद मंकी एफ़र्ट में तब्दील हो गई है l
अब 4 मई के परिणाम की प्रतीक्षा कीजिए l अटल जी की राजनीतिक खेती करने की विधि का आनंद लीजिए l और जानिए कि राजनीति कटहल की खेती है l पपीता छ महीने में फल देने लगता है पर छ महीने बाद ख़त्म हो जाता है l देखिए न मायावती को l पपीता बन कर रह गई हैं l पर कटहल बहुत साल बाद फल देता है l देता है तो बरसो बरस देता है l पीढ़ियां खाती हैं l
राजनीति की खेती में भी खाद पानी की बहुत ज़रूरत होती है l समय से खाद पानी देते रहिए तो अटल बिहारी जैसे कटहल लगाने वाले युगों तक याद आते रहते हैं l इस की तपिश में झुलस कर राहुल गांधी जैसे लोग झुनझुना बन जाते हैं l जो चाहता है झुनझुना बजा कर चल देता है l यही वह तपिश है जो घुंघरू बांध कर आदमी को अरविंद केजरीवाल बना देती है l
Wednesday, 13 May 2026
कर्ण द्वापर में ही नहीं कलयुग में भी होते हैं कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम के हिस्से
दयानंद पांडेय
कर्ण द्वापर में ही नहीं , कलयुग में भी होते हैं। कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम सिंह यादव के हिस्से। द्वापर में भी कर्ण की स्वीकार्यता नहीं थी , कलयुग में भी नहीं है। शायद कभी नहीं होगी। कर्ण सर्वदा से शापित है रहेगा। परशुराम से लगायत धरती तक के शाप हैं। प्रतीक यादव की यातना इतनी भर नहीं है। प्रतीक की स्वीकार्यता तो प्रेम विवाह के बावजूद पत्नी के पास भी स्वभावतः नहीं थी। जो भी कुछ था बस मुलायम की नंबर दो की संपत्ति का सहारा था। चाहे 5 करोड़ की फरारी कार हो , करोड़ो का जिम , अरबों के फ़ार्म हाऊस और रियल स्टेट व्यवसाय के भरोसे भी जीना आसान नहीं था। यह कर्ण होने की तोहमत ही थी कि प्रतीक कभी राजनीति में आने की सोच नहीं पाए। राजनीति में आते तो इतने प्रश्न पूछे जाते कि उन का जवाब मुलायम भी तब नहीं दे पाते। कर्ण तो फिर भी जानता था और लोग भी कि वह सूर्य पुत्र है।
पर प्रतीक ?
प्रतीक मिस्टर गुप्ता के बेटे थे कि मुलायम के , पब्लिक डोमेन में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है। राजनीति में आते तो यह सवाल विपक्ष पूछता या नहीं पूछता , अखिलेश यादव के लोग दाएं , बाएं से पूछते ज़रूर। जैसे कि आज ही अखिलेश यादव ने जिस शातिरपने से प्रतीक के बाबत प्रेस से बात की वह चौकाने वाला हरगिज नहीं था। अखिलेश ने कहा कि क़ानून और परिवार जो कहेगा वह करेंगे। यह कह कर अखिलेश कहना क्या चाहते थे ? सब को समझ आ गया। बाक़ी रहा सहा सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने प्रतीक की मृत्यु को संकेतों में हत्या और जांच करवाने की मांग कर सब कुछ कह दिया। ग़नीमत बस यही थी कि अपर्णा आसाम में थीं। लखनऊ में नहीं। अपर्णा अगर लखनऊ में होतीं तो सपा के लोग उन को फंसाने के लिए , लांछन लगाने के लिए कुछ भी कर गुज़र गए होते।
क्यों कि राजनीति का कीचड़ सिर्फ़ कमल ही नहीं खिलाता , और भी कई गुल खिला देता है। नारायणदत्त तिवारी , उज्ज्वला , राहुल प्रसंग हम देख चुके हैं। सारा खेल और व्यूह नरसिंहा राव ने तिवारी को मात देने के लिए रचा था। फिर राहुल का क्या हुआ , उज्ज्वला किस दुर्गति को प्राप्त हुई और कि नारायणदत्त तिवारी किस तरह अंतिम समय में अपमान को प्राप्त हुए किसी से छुपा हुआ नहीं है। हर कोई अटल बिहारी वाजपेयी जैसी किस्मत ले कर नहीं पैदा होता कि दागदार ज़िंदगी जी कर भी बेदाग़ निकल जाए राजनीति की इस काजल कोठरी से। सब को अटल जी जैसी गरिमा नहीं मिलती। छीछालेदर मिलती है। मुझे याद है जब राजीव गांधी राजनीति में आए तो कालाकाकर के राजा दिनेश सिंह से , जो तब सांसद भी थे , लोग उन के डी एन ए टेस्ट की बात करने लगे थे। इंदिरा गांधी तब प्रधान मंत्री थीं। ऐसी अनेक बातें हैं। अनेक क़िस्से हैं।
शायद इसी लिए प्रतीक हरगिज नहीं चाहते थे कि अपर्णा विष्ट भी राजनीति में आएं। लेकिन भातखंडे से संगीत की शिक्षा लिए अपर्णा पति के मन का यह संगीत नहीं सुन सकीं। अपर्णा की अपनी महत्वाकांक्षा थी l राजनीति में उन की महत्वाकांक्षा की पतंग नहीं उड़ सकी है अभी तक यह अलग बात है। प्रतीक और अपर्णा का संबंध , विवाह से पहले भी चर्चा में रहा था। अपर्णा के पिता पत्रकार हैं। हमारे कुलीग रहे हैं।
बचपन से ही प्रतीक सिर्फ़ संपत्ति की दुनिया में जीते रहे। सामाजिक , पारिवारिक और राजनीतिक जीवन उन्हें नहीं मिला। माँ के पूर्व पति गुप्ता परिवार में कभी पूछ नहीं हुई। मुलायम के सैफ़ई में यादव परिवार ने कभी साधना को ही स्वीकार नहीं किया तो प्रतीक को भी कौन स्वीकार करता। प्रतीक-अपर्णा की शादी भले सैफई में हुई पर सैफई ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। प्रतीक ने कोशिश भी नहीं की कि सैफई परिवार उन्हें अपना मान ले। न ही साधना गुप्ता ने। अभी जल्दी ही मुलायम की मृत्यु से ख़ाली हुई सीट पर उपचुनाव में डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाने की चर्चा में प्रेस से बातचीत में अपर्णा की बात चली तो रामगोपाल यादव ने प्रेस से स्पष्ट कहा कि वह हमारे परिवार की नहीं हैं। और बड़ी तल्खी से यह बात कही रामगोपाल यादव ने। गौरतलब है कि रामगोपाल यादव मुलायम के चचेरे भाई नहीं हैं जैसा कि लोग समझते हैं। सैफई के ही हैं पर मौसेरे भाई हैं रामगोपाल , मुलायम के। जिन के लिए मुलायम ने नाराज हो कर कहा था कि रामगोपाल ने अखिलेश का राजनीतिक कैरियर खा लिया। अखिलेश को कहीं का नहीं छोड़ा। लोग रामगोपाल को प्रोफ़ेसर रामगोपाल क्यों कहते हैं , समझ नहीं आता। रामगोपाल यादव कभी कहीं प्रोफ़ेसर नहीं रहे। यह भी जान लीजिए।
बहरहाल , बचपन प्रतीक का लखनऊ के इंदिरा नगर की राज्य संपत्ति विभाग के सरकारी कालोनी के एक घर में बीता। जहां साधना गुप्ता को बतौर पत्रकार कार्नर का एक बढ़िया घर आवंटित था l गो कि साधना गुप्ता कभी पत्रकार नहीं रहीं। उस सरकारी कालोनी में भी वह कटी-कटी सी रहती थीं l एक बार कीर्तन में पड़ोस की स्त्रियों को साधना ने बुला लिया। मुलायम ने इस का बहुत बुरा मान लिया। स्पष्ट बता दिया कि वहां लोगों में मिक्स अप नहीं होना है। तो जब साधना पर इतनी पाबंदी थी तो प्रतीक पर भी रही होगी। मुलायम ने साधना को रखैल होने की सीमा बता दी थी।
बाद के समय में अमर सिंह मुलायम के जीवन में आए। फिर जब सैफ़ई में अखिलेश यादव की माँ मालती यादव का निधन हो गया तो अमर सिंह ने साधना गुप्ता से मुलायम का गंधर्व विवाह करवा दिया। वह अब साधना यादव हो गईं। अखिलेश छोटे थे पर इतने भी नहीं कि मुलायम की इस हरकत का विरोध न कर सकें। किया। लेकिन मुलायम के दूसरे कार्यकाल में साधना गुप्ता बतौर पत्नी मुख्य मंत्री निवास में पूजा में शामिल हुईं और रहने लगीं l अखिलेश के डिफ्रेंसेज बने रहे l बल्कि बाद के समय में अखिलेश मुख्य मंत्री बने ही साधना गुप्ता के कारण। अखिलेश यादव के निरंतर ब्लैकमेलिंग से परेशान सौतेली मां साधना ने ही मुलायम को सलाह दी कि अखिलेश को मुख्य मंत्री बना दीजिए। रोज रोज की चिक चिक से फुर्सत मिले।
मुलायम बिलकुल नहीं चाहते थे अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री बनाना। पर जैसे कैकेयी के आगे दशरथ झुक गए थे , मुलायम साधना के आगे झुक गए। मुलायम की यह बहुत बड़ी राजनीतिक ग़लती थी। फिर तो मुख्य मंत्री बन कर अखिलेश जल्दी ही औरंगज़ेब बन गए और मुलायम को शाहजहां बना दिया। टाइम्स आफ इंडिया ने इस बात को जब छापा तो अखिलेश ने टाइम्स आफ इंडिया के संपादक को मुख्य मंत्री निवास में बुलाया। मारे गुस्से में संपादक की गरदन पर तलवार रख दी। बाद के समय में मुलायम को किस तरह पार्टी अध्यक्ष पद से हटा कर ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अखिलेश यादव , अब यह एक इतिहास है। मुलायम ख़ून के आंसू पी कर रह गए। मुलायम की ज़िंदगी में मालती और साधना के अलावा भी कई स्त्रियां आईं गईं। यथा आई ए एस अफसर रही अनीता सिंह आदि। कुछ राजनीतिक स्त्रियां भी। कई फ़िल्मी हीरोइने भी। सहारा शहर उन की ऐशगाह थी ही। पर सब कुछ के बावजूद उन का गुलमोहर साधना ही रहीं। वह दुष्यंत कुमार का एक शेर है न :
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
अच्छा हुआ कि साधना मुलायम के रहते ही चली गईं। नहीं प्रतीक से ज़्यादा मुश्किल उन्हें होती। अखिलेश यादव उन्हें रखैल डिक्लेयर करवा कर अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो अपने पिता की इज्जत नहीं कर सका , सौतेली मां , जिस ने उन की मां मालती यादव का जीते जी हक़ छीन लिया था , उस की इज्जत क्या ख़ाक करता ? सौतेले भाई ने खुद एक लक्ष्मण रेखा खींच ली थी। कोई दावेदारी नहीं की। न राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए , न आर्थिक उत्तराधिकार के लिए। मुलायम प्रतीक को इटावा के सैफई में भले प्रतीक को कुछ नहीं दे पाए पारिवारिक विरोध के चलते पर लखनऊ में भी विक्रमादित्य मार्ग पर जो सैफई बसाया और इक्का दुक्का सरकारी बंगलों को छोड़ कर , अपने मुख्य मंत्री काल में विक्रमादित्य मार्ग के सारे बंगले अपने परिवारीजनों के नाम पर ज़ोर ज़बर से रजिस्ट्री करवा लिया। नया-नया निर्माण करवा लिया। विक्रमादित्य मार्ग के इस सैफई में प्रतीक यादव को भी एक बड़ा सा बंगला दे दिया। बी आर चोपड़ा निर्मित धारावाहिक महाभारत की याद आती है। इस महाभारत की पटकथा और संवाद राही मासूम रज़ा ने लिखा था। सभी जानते हैं कि सिर्फ कर्ण ही नहीं सभी पांडव पुत्र पांडु से नहीं थे। सूर्य पुत्र , इंद्र पुत्र आदि की गाथा है। पर राही मासूम रज़ा ने इंद्र पुत्र , यह पुत्र , वह पुत्र आदि कहने की बजाय सभी को सिर्फ़ कुंती पुत्र लिखा। मुलायम ने भी यही कोशिश की।
महाभारत का एक क़िस्सा है जो सभी जानते हैं कि कृष्ण के पास अर्जुन और दुर्योधन एक ही दिन युद्ध में सहयोग मांगने गए थे। दुर्योधन पहले पहुंचा था। सो मारे अकड़ और मूर्खता के कृष्ण के सिरहाने बैठ गया। अर्जुन बाद में पहुंचा और पैताने बैठा। पहले अर्जुन को देख कर कृष्ण ने अर्जुन से बात की। यह कथा सभी जानते हैं। पर उसी बीच एक कथा और घटी थी। जब अर्जुन पहंचे तो दुर्योधन ने अर्जुन से तंज में पूछा , कहिए , इंद्र पुत्र कैसे आना हुआ। अर्जुन सिर झुका कर खून के घूंट पी कर चुप ही रहे। पर सोए हुए कृष्ण सचमुच सोए हुए नहीं थे। सब सुन रहे थे। तो जब अर्जुन से बात हो गई कृष्ण की तो वह दुर्योधन की तरफ मुखातिब हुए और बोले , कहिए व्यास नंदन , आप का कैसे आना हुआ ?
कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन से संबोधित कर बिना कुछ कहे बता दिया कि बेटा दुर्योधन , अर्जुन ही नहीं , तुम भी वही हो। मुलायम के यहां की महाभारत की कथा में भी ऐसे कई पेंच और कई मोड़ हैं। जो महाभारत से भी ज़्यादा रोमांचक और दिलचस्प हैं। कहने का कुल आशय यह कि प्रतीक की उम्र अभी ज़िंदगी जीने की थी। 38 वर्ष की उम्र जाने की नहीं होती। पर फरारी की सवारी गांठने वाले प्रतीक को अचानक जाना पड़ा तो इस में उन का कर्ण जैसा अभिशप्त जीवन भी एक बड़ा कारण है। बड़ा फैक्टर है। जिम का शौक़ , फिट रहने का नशा भी काम नहीं आया। इतनी सी उम्र में अरबपति खरबपति होने का दर्प भी नहीं बचा पाया। कर्ण हो या युधिष्ठिर हर किसी को इसी हिम में गल जाना है। बाक़ी सब मोह माया है। लोकलाज है। दिखावा है। दिखावटी आंसू हैं। दिखावटी ही शोकालाप है। सपा का हो , भाजपा का हो , किसी और का। रमानाथ अवस्थी लिख गए हैं : चाहे हवन का हो चाहे कफ़न का हो / धुएं का रंग एक है।
लेकिन कर्ण बहुत हैं। एक प्रतीक यादव ही नहीं।
Tuesday, 14 April 2026
आग
दयानंद पांडेय
एक समय ज़िंदगी उस की बहुत ख़ूबसूरत थी। बचपन और जवानी थोड़े संघर्ष में बीती। पर उम्र के मध्य में उस की ज़िंदगी पटरी पर आ गई। ख़ूबसूरत हो गई। दिन सोने के , रात चांदी की हो गई। सफलता उस के क़दम चूमती। नौकरियां वह ऐसे बदलता जैसे कपड़े बदल रहा हो। शुरू में आदर्श , विचारधारा , नैतिकता , शुचिता की भी बात करता था। पर धीरे - धीरे सब तिरोहित होती गई। सफलता की नदी में सब मछली की तरह कूदती-फांदती , बहती किसी मछुआरे के जाल में फंसती गईं। लेकिन यह सब तब न उसे दिखा न किसी ने दिखाया। तब तो पैसा था। महल जैसा घर था। सुख-सुविधाओं की झड़ी थी। पैसा था , शराब था , औरतें थीं। दूसरों के दुःख या सुख की चिंता से वह बहुत दूर था।
सफलता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वह एक दिन रिटायर हो गया। वृद्ध हो गया।
उम्र के मध्य में जैसे वह सुख की नदी में नहाता था , उम्र के आख़िरी पड़ाव में वह दुःख की नदी में नहाने लगा। दुःख की नदी में डूबने-उतराने लगा। परिवार संभाले नहीं संभल रहा था। पत्नी बीमार रहने लगी। ऐसे जैसे बीमारियों का भंडार बन गई थी। ऐसी कौन सी बीमारी थी जो उसे न हो। बच्चों को अच्छे स्कूल और कालेज में पढ़ाया था। पर बेटा घनघोर शराबी निकल गया। सिगरेट फूंकता , मसाला खाता , शराब पीता। यही उस की ज़िंदगी थी। रही-सही कसर बेटी ने निकाल दी। जाने किस के साथ घर छोड़ कर भाग गई। उस का सारा सामाजिक और आर्थिक साम्राज्य एक क्षण में किसी मिट्टी की दीवार की तरह भहरा कर गया। वह लोगों से अकसर कहता रहता था कि असल कमाई तो बच्चे ही होते हैं। बच्चे अच्छे निकल जाएं तो वही सब से बड़ी कमाई हैं। नालायक़ निकल जाएं तो सारी कमाई व्यर्थ। कोई मतलब नहीं।
उस का कहा , अब उस के ही गले में किसी सांप की तरह डस रहा था। पर वह करता भी तो क्या करता।
सब से बड़ा सवाल उठा कि बीमार पत्नी की सेवा कैसे हो। बीमारियों से उसे घबराहट होती है। सेवा भाव उस में नहीं है। वह ख़ुद तो चाहता है कि कोई उस की सेवा करे। पर दूसरों की सेवा करना उस के स्वभाव में नहीं। शुरू में पत्नी की सेवा के लिए उस ने नर्स रखी। पर काम वाली और नर्स के झगड़े बढ़ते जाते। वह कभी काम वाली बदलता। कभी नर्स बदलता। परेशान हो गया। फिर उसे पता चला कि शहर में एक ऐसा अस्पताल है जहां वृद्ध लोगों को ही रखा जाता है। उन की बीमारी , भोजन , देखरेख , सफाई , नहलाना , धुलाना सब होता है। इस के लिए सत्तर हज़ार महीने का पैकेज था। दवा और विशेषज्ञ डाक्टर का खर्च अलग। उस ने पत्नी को उसी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। पैसे खर्च होते थे पर सेवा से छुट्टी थी। पत्नी से मिलने जाता रहता था। पत्नी ख़ुश नहीं थी इस अस्पताल में आ कर। लेकिन दुःखी भी नहीं थी। क्यों कि उस का रूटीन जीवन आसान हो गया था।
एक रात को अस्पताल से फ़ोन आया कि पत्नी की तबीयत ज़्यादा बिगड़ गई है। आ जाइए। ड्राइविंग कब का छोड़ चुका था। ड्राइवर नहीं था। वह परेशान हो गया। रात के दो बजे थे। वह एक पड़ोसी के घर गया। काल बेल बजाता रहा। उस का कुत्ता भौंकता रहा पर दरवाज़ा नहीं खुला। घर लौट कर दो-तीन दोस्तों को फ़ोन किया। किसी का फ़ोन नहीं उठा। ओला , ऊबर बुक करना कभी सीखा ही नहीं। ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी। पलट कर उस ने अस्पताल को फ़ोन किया। अपनी दिक़्क़त बताई और कहा कि कोई एम्बुलेंस ही सही भेज दें ताकि वह आ सके। एम्बुलेंस का चार्ज दे देगा। थोड़ी देर में एम्बुलेंस आ गई। वह सुबह के चार बजे अस्पताल पहुंचा। पता चला कि पत्नी का देहांत दस मिनट पहले ही हो गया। आख़िरी समय न पत्नी उसे देख सकी , न वह उसे देख सका। न कोई बात हो पाई। कोई दुःख-सुख साझा नहीं कर सके दोनों। वह पत्नी का हाथ थामे बड़ी देर तक बैठा रहा। रो भी नहीं सका। आंखें जैसे पथरा गई थीं। सुबह होने का इंतज़ार करता रहा। फिर अस्पताल वालों से ही कहा कि वह अकेला है सो अंतिम क्रिया कर्म की व्यवस्था भी वही लोग करवा दें। अस्पताल वालों को इस का अभ्यास था। वह अकसर ऐसे अकेले लोगों की व्यवस्था करने के अभ्यस्त थे। अकेले पड़ गए , पैसों वालों का ही अस्पताल था भी यह।
सुबह होने पर उस ने कुछ दोस्तों , परिजनों और रिश्तेदारों को वाट्सअप कर के सूचना दे दी। अंत्येष्टि का समय और जगह भी बता दिया। तीन-चार दोस्त और एक रिश्तेदार अस्पताल आ गए। कुछ ने फ़ोन किया। कुछ ने वाट्सअप पर ही श्रद्धांजलि दे कर छुट्टी ले ली। सोसाइटी के लोगों को भी वाट्सअप ग्रुप पर सूचना दे दी। वाट्सअप ग्रुप पर श्रद्धांजलियों का तांता लग गया। पर श्मशान घाट पर आए सिर्फ़ दो लोग। कुछ परिवारीजन ज़रूर आ गए। विद्युत् शवदाह में पत्नी का दाह संस्कार कर घर आ गया। परिजनों के आ जाने से शोक आदि की ट्रेडिशनल चीज़ें भी हो गईं। लोगों ने सलाह दी कि बारह दिन वाला श्राद्ध वग़ैरह करने की जगह आर्य समाजी तरीक़ा ठीक रहेगा। किसी के पास रुकने के लिए समय नहीं था। उस ने सलाह मान ली। तीन दिन में सब कुछ हो गया। परिजन चले गए।
पत्नी भले अस्पताल में रहती थी। पर एक भरोसा था कि कोई साथ है। अब यह भरोसा भी टूट गया था। लोग कहते हैं बुढ़ापे में तीन ही चीज़ काम आती है। स्वास्थ्य , पैसा और पत्नी। पत्नी चली गई। पैसा भी अब बहुत नहीं रह गया था। प्राइवेट नौकरी के कारण पेंशन नहीं थी। बचत और इनवेस्टमेंट से काम चल रहा था। स्वास्थ्य भी लड़खड़ा चुका था। परिवार का कोई साथ नहीं था। वह अपनी ज़िंदगी से ऊब गया था। पूरी तरह ऊब गया था। अकेलापन उसे काटता था। उस ने अपनी डायरी में लिखा :
मन करता है , श्मशान घाट पर जा कर लेट जाऊं l कोई आग लगा दे l
[ अप्रैल , 2026 पाखी में प्रकाशित ]
Monday, 23 March 2026
इलाहाबाद में रवि की सुगंध खोजती फिरती ममता
दयानंद पांडेय
ममता कालिया को पढ़ना मन को वृंदावन करना है। इस लिए नहीं कि वह वृंदावन में पैदा हुई हैं। इस लिए कि उन की कहानियों में सुकून का सुरूर भी है। भाषा में अजब सा ठहराव और गहनता है। साधारण चरित्र और उस के साधारण विवरण से असाधारण कथा संसार रचने वाली ममता कालिया का कथा संसार जितना भरपूर है , संस्मरण संसार भी अपूर्व है। ममता कालिया जब ममता अग्रवाल थीं तब कविता लिखती थीं। क ख ग पत्रिका के मुख पृष्ठ पर छपी इस कविता से वह जैसे चर्चा में आ गई थीं :
प्यार शब्द घिसते - घिसते चपटा हो गया है
अब हमारी समझ में
सहवास आता है।
70 के दशक में इस तरह की भाषा और वह भी एक स्त्री की। लोगों का चौंकना सहज था। लेकिन रवींद्र कालिया ने एक जगह लिखा है कि चंडीगढ़ की एक गोष्ठी में उस से भेंट हुई तो मैं ने पाया कि वह कविताओं में ही बोल्ड है , जीवन में तो सूर्यास्त से पूर्व पापा के डर से घर पहुंच जाने वाली एक औसत लड़की है। तब के समय वह ममता अग्रवाल थीं। पहले अध्यापक फिर आकशवाणी के अफसर विद्याभूषण अग्रवाल की बेटी। लेकिन बाद के समय में ममता अग्रवाल ने अपनी रचनाओं में ही नहीं , जीवन में भी जो छलांग लगाई वह अप्रतिम थी। अपनी रचनाओं और जीवन में ममता कभी औसत नहीं रहीं। दिल्ली और मुंबई में रवींद्र कालिया से लंबी मित्रता के बाद वह ममता कालिया बन गईं। पिता के नक्शे क़दम पर चलते हुए ममता अग्रवाल भी दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज में अंग्रेजी पढ़ाने लगी थीं। फिर मुंबई में भी अंग्रेजी पढ़ाती रहीं। बाद के समय में प्रयाग के महिला सेवा सदन डिग्री कालेज में प्राचार्य हुईं। अंग्रेजी की अध्येता रहीं ममता कालिया पर अमरकांत की सादगी और उन के लेखन का गहरा प्रभाव दिखता है। रवींद्र कालिया पर भी अमरकांत का गहरा प्रभाव था। अमरकांत पर रवींद्र कालिया ने एक विशेषांक भी संपादित किया था जो बाद में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ।
लोग एक साथ दो उपन्यास नहीं पढ़ सकते। लेकिन ममता कालिया एक साथ दो उपन्यास लिखने की अभ्यस्त रही हैं। कालेज के समय में एक उपन्यास और घर के समय में दूसरा उपन्यास। कोई औसत लेखक तो ऐसा करने से रहा। औसत लेखक ? बड़े से बड़ा लेखक भी ऐसा शायद नहीं कर सकता। अपने ही उपन्यास का अंग्रेजी में रिक्रिएशन करना किसी को सीखना हो तो ममता कालिया से सीखे। अपने ही उपन्यास दौड़ का अंग्रेजी में रिक्रिएशन ममता कालिया ने खुद किया है। तीन लेखक दंपतियों की एक समय बड़ी चर्चा रही है। मोहन राकेश - अनीता राकेश , राजेंद्र यादव - मन्नू भंडारी , रवींद्र कालिया -ममता कालिया। इन में जो पहली जोड़ी मोहन राकेश और अनीता राकेश की है उस में निश्चय ही मोहन राकेश बड़े कथाकार हैं। अनीता राकेश खो जाती हैं। लेकिन कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि मन्नू भंडारी , राजेंद्र यादव से बड़ी कथाकार हैं। राजेंद्र यादव को हम कथाकार नहीं , हंस के संपादक के तौर पर याद करते हैं। अन्य अनेक निजी कारणों से भी। इसी तरह ममता कालिया , रवींद्र कालिया से बड़ी कथाकार हैं। रवींद्र कालिया को हम कथाकार से ज़्यादा संस्मरणकार और संपादक के लिए जानते हैं। संपादक तो ममता कालिया भी रही हैं। यह बहुत कम लोग जानते हैं। वर्धा हिंदी विश्विद्यालय की अंग्रेजी में निकलने वाली पत्रिका हिंदी की। पर परिचित हम ममता कालिया के विराट कथा संसार से ही हैं। अलग बात है कि अब की साहित्य अकादमी ममता कालिया को संस्मरण के लिए ही घोषित हुआ है। जीते जी इलाहाबाद के लिए। जीते जी इलाहाबाद के कवर पृष्ठ पर छपा है :
शहर -
पुड़िया में बांध कर
हम नहीं ला सकते
तो क्या !
सच तो यही है। पर एक दूसरा निर्मम सच यह है कि ममता कालिया इलाहाबाद शहर को दिल में टांक कर अपने आंचल में बांध कर , घूमती हैं। जीते जी इलाहाबाद की इबारत ही नहीं उन के उपन्यासों और कहानियों की इबारत भी यही कहती है। हम सभी जानते हैं कि रवींद्र कालिया संस्मरणों के बादशाह थे। इस लिए भी कि वह यारबास थे। फिर ममता कालिया से उन की यारी इतनी प्रगाढ़ थी कि मोहन राकेश या राजेंद्र यादव की तरह उन का दांपत्य कभी खटाई में नहीं पड़ा। प्रगाढ़ होता गया। इतना सफल दांपत्य कम ही लोगों का होता है। तमाम खटपट के बावजूद। उपेंद्रनाथ अश्क के बावजूद। इस की अलग कथा है जिस की हलकी सी आंच रवींद्र कालिया ने ग़ालिब छुटी शराब में परोसी है। अश्क अपना ही नहीं , लोगों का भी दांपत्य तुड़वाने के आचार्य थे। बहरहाल जिन ममता कालिया को हम उन की कहानियों , उपन्यासों के लिए , संबंधों में उन के ममत्व के लिए जानते थे , अचानक उन के संस्मरणों से रूबरू होने लगे। शायद यह रवींद्र कालिया की संगत का प्रताप है। जीते जी इलाहाबाद से भी बेहतर संस्मरण अंदाज़-ए-बयां उर्फ रवि कथा को पाता हूं जो 2020 में प्रकाशित हुआ था। कथा रवि में रवींद्र कालिया की ऐसी भीगी यादें हैं कि पूछिए मत। साधारण से साधारण विवरण में बड़ी-बड़ी बात लिख जाती हैं ममता । ग़ालिब छुटी शराब अगर रवींद्र कालिया के जीवन का दरवाज़ा है तो रवि कथा उस घर की खिड़की है। जिस से झिर-झिर पुरवैया बहती रहती है। रवींद्र कालिया इलाहाबाद को उस के अमरुद की महक से याद करते थे। ममता कालिया इलाहाबाद में रवींद्र कालिया की सुगंध खोजती फिरती हैं।
इलाहाबाद को बहुतेरे लेखकों ने जिया और लिखा है। इलाहाबाद ने इतने लेखक , कवि और शायर दिए हैं , शायद कम शहर हैं , जो दे पाए हों। एक समय इंदिरा गांधी फ़िराक़ गोरखपुरी को राज्य सभा भेजना चाहती थीं। इलाहाबाद से फ़िराक़ को दिल्ली बुलवाया। और यह प्रस्ताव रखा। फ़िराक़ ने कहा फिर तो बिटिया तुम को राज्य सभा को इलाहाबाद भेजना पड़ेगा। इंदिरा गांधी ने कहा कि जब मन करे तब आइएगा। न मन करे तो मत आइएगा। लेकिन फ़िराक़ ने इलाहाबाद छोड़ कर राज्य सभा जाने से इंकार कर दिया। बहुत कम लोग जानते हैं कि महादेवी वर्मा 6 वर्ष लखनऊ रही हैं। पहली विधान परिषद की सदस्य नामित हो कर। पंडित कमलापति त्रिपाठी ने एक जगह लिखा है कि विधान परिषद में जब महादेवी बोलती थीं तब लोग उन्हें मंत्रमुग्ध हो कर सुनते थे। कई बार समय सीमा समाप्त हो जाती थी। पर कोई उन्हें टोकता नहीं था। सभापति भी नहीं। उन को सुनते रहते थे। बहरहाल महादेवी ही नहीं , इलाहाबाद जा कर लेखक लोग बसते रहे। पढ़ते रहे। नौकरियां करते रहे। इलाहाबाद छोड़ते रहे पर इलाहाबाद कभी नहीं भूले। पंत , निराला , अज्ञेय , शमशेर , बच्चन ,अमरकांत , भैरव प्रसाद गुप्त , धर्मवीर भारती , मार्कण्डेय , कमलेश्वर , दुष्यंत , कन्हैयालाल नंदन , सर्वेश्वर दयाल सक्सेना , ज्ञानरंजन , दूधनाथ सिंह आदि अनेक लोग। रवींद्र कालिया और ममता कालिया भर ने नहीं , उपेंद्रनाथ अश्क और उन के बेटे नीलाभ ने भी इलाहाबाद को ख़ूब लिखा है। लौट आओ धार में दूधनाथ सिंह ने भी इलाहाबाद को ग़ज़ब ढंग से लिखा है। ज्ञानरंजन भी इलाहाबाद को जब तब रटते और लिखते रहे हैं। लोकनाथ की मिठाई खाते-खिलाते रहते हैं। हिंदी में बहुत से संस्मरण लेखक हैं। मेरी भी पांच किताबें संस्मरण पर हैं। पर सब से बढ़िया संस्मरण लेखक कांति कुमार जैन को मानता हूं। कांति कुमार जैन ने अनेक संस्मरण लिखे हैं। जिन में एक संस्मरण अपने सहपाठी आचार्य रजनीश पर भी लिखा है। अद्भुत है रजनीश पर लिखा उन का संस्मरण। रजनीश यानी ओशो को समझने का एक नया और अलौकिक मार्ग।
बहरहाल जीते जी इलाहाबाद को लिखने वाली ममता कालिया अब साहित्य अकादमी से संस्मरण के लिए सुशोभित और प्रतिष्ठित हैं। कोई भी पुरस्कार किसी को सुख और दुश्मन दोनों एक साथ देता है। नालायकों , तिकड़मबाज़ों और बनावटी लेखकों की सेहत पर इस सब से कोई फर्क नहीं पड़ता। पर लिखने वाले को बहुत फ़र्क पड़ता है। ऐसे गोया स्वाभिमान का अपमान से समझौता हो गया हो। सारी रचनात्मकता और सारी मेहनत अपमानित हो जाती है इन जलनखोर जीवों की कुढ़न से। लेकिन सर्वदा से ही यह सब कुछ होता आया है। कोई नई बात नहीं है। ममता कालिया को भी इस साहित्य अकादमी ने कई दुश्मन परोस दिए हैं। ममता कालिया को साहित्य अकादमी मिलना बहुतों को खल गया है l बहुत से लोग सिरे से ख़ामोश हैं l कुछ सदमे में ख़ामोश हैं l तो कुछ लोग विरोध में भी खड़े हो गए हैं l यह सब लगभग सभी पुरस्कार में होता रहता है l पर ममता कालिया की कांग्रेस के साथ पक्षधरता की चर्चा भी इस बार चर्चा में है l फ़ेसबुक पर राहुल गांधी के पक्ष में उन की एक पोस्ट की बड़ी चर्चा है l जानना दिलचस्प है कि रवींद्र कालिया और ममता कालिया की कांग्रेस से प्रतिबद्धता और सरोकार, कोई छुपा विषय नहीं है l अशोक वाजपेयी से उन की रिश्तेदारी भी लोग जानते ही हैं l

फ़ोटोग्राफ़ : भरत तिवारी
उन की इस किताब जीते जी इलाहाबाद पर भी विवाद शुरू है l पर इस सब में सब से दिलचस्प यह है कि ममता कालिया कई सारे अपनों को काटती हुई इस बार यह पुरस्कार पा गई हैं l पिछले तीन-चार वर्ष से हर बार वह मुक़ाबले में उपस्थित रहती थीं l और कट जाती थीं l इस बार एक दर्जन लोगों को पछाड़ कर विजेता हैं l ममता कालिया जी को बधाई दीजिए l किन-किन को काट कर ममता कालिया विजेता बनी हैं , उन को इस सूची में देखिए l और जानिए कि निर्णायक मंडल यानी ज्यूरी में थे : अनामिका , अरुण कमल और अरविंदाक्षन l मतलब सभी का नाम अ से शुरू l ऐसे जैसे दुक्खम-सुक्खम का कोई अनिवार्य पाठ हो।
ममता कालिया का एक बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास है दौड़। बाज़ार और कैरियर के लिए तबाह होती नई पीढ़ी की अंधी दौड़ का विवरण पढ़ कर देह और मन में जैसे तमाम शीशों की किरिचें टूट कर चुभने लगती हैं। ठीक वही चुभन ले कर लोग उपस्थित हैं तो कोई क्या कर लेगा ? ममता कालिया के लेखन , उन की भाषा और संवेदना को तो नहीं न छीन लेगा। ममता कालिया शब्दों को जिस तरह ठहर कर लिखती हैं भीमसेन जोशी के आलाप का कोई ठाट याद आ जाता है। मन मुरकियां मारने लगता है। जाने यह ममता के वृंदावन में जन्म लेने की तासीर है या उन की भाषा और कथ्य का टटकापन कि राग खमाज अपने सातो सुर में बजने लगता है। ममता की कहानियों का ठाट यही है। उन की कहानियों की स्त्री अपने आप से बतियाती हुई , लड़ती हुई , अपने संघर्ष को तार-तार कर खल चरित्र के लोगों को उलार कर अपने पाठकों को दुलराने लगती है। ममता की कहानियों के ममत्व की छांव में विश्राम का एक यह पाठ भी है।
[ 23 मार्च , 2026 नवभारत टाइम्स , लखनऊ में प्रकाशित ]
Monday, 9 March 2026
हत्यारा
दयानंद पांडेय
तुम मुझे ऐसे मिली थी जैसे किसी मछुआरे को बिना जाल की मछली। मछुआरे के हाथ में आ कर भी तुम मरी नहीं थी। क्यों कि जैसे एक जल से निकल कर दूसरे जल में आ गई थी। तो मरती भी कैसे भला। तुम्हें शायद उस जल से निकल कर दूसरे जल की ज़रूरत थी। ऐसे जैसे किसी बहती नदी को दूसरी नदी से मिलने की। जल बदलना , मछली के जीवन को कैसे बदलता है यह तुम्हारे साथ जल बन कर जाना। तुम किसी पोखर के जल से निकल कर नदी के जल में आ मिली थी। उस पोखर का जल सड़ने लगा था और कि उस जल में तुम्हारा सांस लेना कठिन हो गया था। ऐसा तुम बताती थी। छटपटाती हुई इसी लिए मिली थी। जल बदलने की तुम्हारी यह छटपटाहट , यह अकुलाहट इतनी तीव्र थी कि मैं इसे प्यार समझने लगा। पुरुष अकसर ऐसे धोखे में आ जाते हैं। मैं भी तुम्हारे प्यार में आ गया। लेकिन स्त्रियां मछली बन कर मछुआरे को मझधार में छोड़ कर फिर किसी और जल में अपना जीवन खोज लेती हैं। मछली खुल कर मिलती है। हंस कर मिलती है। लोग धोखा खा जाते हैं। वह आहिस्ता से जल बदल लेती है।
लेकिन जल ?
जिस जल ने किसी मछली को अपना जीवन बना लिया हो , अपना संसार और और सर्वस्व बदल लिया हो उस के लिए बहना कठिन हो जाता है। जल की तलहटी भी उस की लहरों को बांध-बांध लेती है। आगे नहीं बढ़ने देती।
तुम मेरे जाल में भी इसी लिए नहीं थी। बहुत बाद में समझ आया था कि मछुआरा ही मछली के जाल में था। लेकिन यह जाल बहुत मज़बूत था। तो क्या तुम बहेलिया थी। प्रेम का दाना बिछा कर ऊपर जाल बिछा दिया था ? प्यार का जाल। कितने तो जाल थे तुम्हारे पास। मोह के , देह के , नेह के , आशा , उमंग और अभिलाषा के। जन्म - दिन तुम्हारा हो , हमारा हो हम साथ मनाते ही मनाते थे। सारी अड़चन , सारी जकड़न तोड़ कर मिलते थे। मिलना ही जन्म - दिन मनाना था। अवसर कोई भी हो प्रेम के पान हम खा ही लेते थे। यह जल और मछली का रिश्ता था कि मिलते ही हम बहने लगते थे। बहाने सारे जल में विगलित हो जाते। हमारा प्यार सयाना हो जाता। दुनिया जान भी नहीं पाती। मछली पालने वाले जानते हैं कि तालाब अगर किसी रेल पटरी के किनारे हो तो मछली जल्दी बड़ी हो जाती है। रेल गुज़रती रहती है , रेल की आवाज़ सुन कर मछली दिन-रात नहीं देखती , तैरती रहती है ,निरंतर तैरती रहती है। और बड़ी होती रहती है। हमारा प्यार भी जैसे किसी रेल पटरी के किनारे का तालाब था। बढ़ता रहा। इतना बढ़ा कि मछली बहुत बड़ी हो गई। अपने जल से निकल गई।
हम जब मिले तो लगा हमारी भाषा अलग - अलग है। इच्छाएं और कामनाएं अलग हैं। न तुम हमारी भाषा जानती थी , न हम तुम्हारी भाषा। बिलकुल अनजानी और अजनबी भाषा। फिर भी मिलते रहे। शौक़ और समझ भी अलहदा। हाथ में हाथ लिए एक दिन अचानक तुम बोली , ' आज नाव पर घूमते हैं। ' फिर भाड़े की नाव ली। दिन भर की पिकनिक मनी हमारी नाव पर। नाव वाले ने पैसा भरपूर लिया पर हमारा दिन बना दिया। कितने तो गाने गए थे तुम ने।
याद है ?
हम चाहते थे कि नाव वाला शहर की सरहद छोड़ कर कहीं दूर देहात की तरफ चले। पहले तो तुम चुप रही। अचानक बोली , ' आज नहीं। कभी और। ' तुम्हारी ख़ासियत थी , संक्षिप्त बोलना। कम बोलने वाली स्त्रियां बहुत अच्छी लगती हैं मुझे। तुम्हारी यह एक बात मुझे बहुत प्रिय थी कि तुम कभी किसी बात पर लड़ती नहीं थी। सिर्फ़ फ़ैसला देती थी। गोया कोई न्यायाधीश।
तुम इतनी रूपवती थी , इतनी गोरी , इतनी अबोध थी कि तुम्हें देखने में तो नहीं , पर छूने में तनिक डर लगता था। तुम्हारे रूप का इतना ज़ोर था कि तुम्हें देख कर आइना टूट जाए। चांद की अजोरिया में नदी की धार में तुम्हारी धवलता जैसे मुझे पुकार लेती कि आओ मुझ से लिपट जाओ। लिपट कर लगता कि कोई गुनाह तो नहीं कर दिया। हमारे प्यार की धार पर नदी की धार न्यौछावर हो जाती। हवा की तरह यह गुनाह भी लेकिन छुप जाता था। लेकिन प्यार का चिराग नहीं बुझता। जलता रहता। मद्धिम - मद्धिम।
इस सेल्फी युग में तुम ने हमारे साथ कभी कोई फ़ोटो अपने मोबाइल में नहीं रखी। फ़ोटो खींचती। देखती , मुझे दिखाती और चट मिटा देती। यह मुझे बहुत बुरा लगता। तुम इस बुरा लगने की परवाह नहीं करती। यह डर था कि एहतियात ? वाट्सअप चैट भी मिटा और मिटवा देती। कोई रिकार्ड नहीं रहने देना चाहती थी। अजब प्यार था यह। टूट कर मिलना और अचानक चल देना। कई बार शक़ होता कि स्रीजनोफेनिया की मरीज तो नहीं हो। नहीं थी। पर थी ऐसी ही।
मेरे जन्म - दिन पर एक बार तुम ने मंहगी सी कलाई घड़ी दी मुझे। कहा कि यह तोहफ़ा नहीं प्यार है। तुम्हें मेरे सिगरेट पर बहुत ऐतराज था पर जब तुम्हें पता चला कि पाइप पीने का हमारा मन करता है तो तुम ने एक नहीं , दो - दो पाइप मुझे प्यार के तौर भेंट किए। कहा कि जब-जब तुम इन्हें अपने होठ से लगाओगे , समझूंगी कि मेरे होठ , तुम्हारे होठों से मिल रहे हैं। और मैं तुम्हारे लिए सुलगने लगूंगी। तुम मेरे पास दौड़े चले आओगे। ग़ज़ब थी तुम्हारी यह तलब भी। अजब था तुम्हारा यह इसरार भी। पर मुझे क़ुबूल था तो था। तुम को अचानक लगा कि हमारी नौकरी छोटी है। तुम ने एक बड़ी कंपनी के चेयरमैन से कह कर मुझे बढ़िया नौकरी दिलवा दिया। बढ़िया सेलरी के साथ ही कंपनी की तरफ से मुझे कार वगैरह की सुविधा भी मिल गई। मुझ से ज़्यादा तुम ख़ुश हो गई। ऐसी ही अनेक छोटी - मोटी सुविधाओं से मुझे तुम लादती गई। कहने को मैं बहेलिया था , तुम चिड़िया। ऐसा तुम ही कहती फिरती। पर अब चिड़िया के जाल में बहेलिया था। किसी बहेलिये के जाल से चिड़िया फिर भी निकल सकती है। कोई निकाल सकता है। पर चिड़िया के जाल से निकलना ?
नामुमकिन।
कोई मान ही नहीं सकता कि चिड़िया भी जाल बिछा सकती है तो निकालेगा भी कैसे भला। निकालने की सोचेगा भी कैसे ? लेकिन तुम जाल थी। जल के नीचे भी , जल के ऊपर भी।
तुम्हारे अफ़सर पति के पास तुम्हारे लिए समय ही नहीं होता। बेटा कहीं बाहर पढ़ता था। तो तुम्हें किसी भद्र पुरुष के साथ समय बिताने की तलब लगी। मुझ मछुआरे से बढ़िया कौन मिलता तुम्हें। बेक़रारी में पहले इसरार करती थी। क़रार आने लगा तब आहिस्ता - आहिस्ता तुम आदेश देने लगी। यहां मिलो। वहां मिलो। तो कभी घर आ जाओ। मुझे भी अच्छा लगता यह तुम्हारा बुलाना। लगता था गोया तुम्हारे लिए ही पैदा हुआ हूं। तुम्हीं मेरा जीवन हो। तुम्हीं मेरा लक्ष्य। तुम्हीं मेरा सब कुछ। सर्वस्व तुम ही। नितांत निजी क्षणों में भी तुम मुझे ऐसे दुलारती जैसे मैं तुम्हारा शिशु। तुम हमारी मां। तुम्हारी गोद में लेटना , खेलना और तुम्हें पाना मेरा सौभाग्य बन गया था जैसे। मन ही मन भगवान से कृतज्ञता ज्ञापित करता। लाख - लाख शुक्रिया अदा करता रहता। तुम इतना खिलाती - पिलाती और प्यार करती कि मुझे ख़ुद अपने आप से रश्क़ होने लगा।
तुम शायद शहर में गिनती की सर्वाधिक सुंदर स्त्रियों में से एक थी। धनवान भी थी। सलीक़ेदार भी। इस से भी बड़ी बात कि मेरा सौभाग्य बन कर मेरे जीवन में उपस्थित थी। तुम्हारे जितना सुख मुझे किसी और स्त्री ने नहीं दिया था। कभी वह दिन था कि तुम्हें देख कर ही ख़ुश रहता था। तुम्हें छूने से डर लगता था। लेकिन वह कहते हैं न सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता। मेरा डर भी आहिस्ता - आहिस्ता सरकता गया। तुम को सहसा छू लिया एक दिन। ऐसे जैसे चांदनी को छू लिया हो। किसी बहती हुई वेगवती धारा को थाम लिया हो। समय को शिला बना लिया हो। समय जैसे रुक गया हो। मन में एक नई मिठास सी घुल गई। ऐसा स्वाद मिल गया जो कभी पहले नहीं मिला हो। सोने - चांदी जैसे दिन हो गए। लेकिन वह कहते हैं न कि इश्क़ और मुश्क छिपाए नहीं छिपते। फिर तुम्हारी सुंदरता की सुगंध वैसे भी किसी से नहीं छुपी थी। इश्क़ की सुगंध भी नहीं छुपी। इश्क़ था कि कुछ और था यह तब न तुम्हें पता था , न मुझे। पर लोगों को बहुत कुछ पता हो गया था।
हमारे तुम्हारे संबंध को ले कर बात तुम्हारे पति तक भी पहुंची। ऐसा तुम ने ही बताया एक बार। मुझे लगा कि अब शायद तुम मुझ से दूर हो जाओगी। दूर हो जाओगी , यह डर सताने लगा। लेकिन देखा कि अब तुम मुझे ले कर बहुत पजेसिव रहने लगी। इतना कि मैं परेशान रहने लगा। कई बार किसी ड्रोन कैमरे की तरह काम करती तुम। हमारी सारी गतिविधियां तुम्हारी जानकारी में रहतीं। जाने कितने जासूस थे तुम्हारे पास। ख़ास कर अगर शहर में किसी स्त्री से हमारी बात मुलाक़ात हो जाए तो तुम्हारी जासूसी देखते बनती थी। लगता जैसे कोई तुम्हारी द्वारिका लूट ले गई हो वह स्त्री । समझ नहीं आता कि इतनी पजेसिव क्यों थी तुम ?
क्या था मैं तुम्हारा ?
तुम्हारे प्यार के साम्राज्य का एक मामूली सा नागरिक ?
तुम्हारा प्यार मुझ में पुलक भरता था। पर यह तुम्हारा साम्रज्यवादी रवैया काट खाता था। तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा पजेसिव रहना मुझे बुरा लगने लगा। किसी अपहरणकर्ता जैसा व्यवहार हो गया तुम्हारा। खुल कर तो नहीं पर चुपचाप तुम्हारे हुक़्म की तामील करने से बचने लगा। नतीज़ा यह था कि आफिस में मुझे अकारण नोटिस मिलने लगी। अचानक इंक्वायरी शुरू हो गई। एक दोस्त से तुम ने कहलवाया कि कह दो मुझ से आ कर मिले। सब ठीक हो जाएगा। दोस्त ने यह सब मुझ से कहा और बताया कि , ' भाभी जी से जा कर मिल क्यों नहीं लेते ? शायद ठीक करवा दें। ' मैं ने उसे बताया कि , 'भाभी जी ही यह सब करवा रही हैं ? ' तो उस का माथा ठनका। बोला , ' क्या कह रहे हो ? ' हम ने कहा , ' ठीक कह रहा हूं। ' कह कर फ़ोन रख दिया। तुम्हें शहर में ज़्यादातर लोग तुम्हारे पति की प्रतिष्ठा और तुम्हारी सुंदरता को देखते हुए भाभी जी ही कहते थे। मैं भी तो निजी क्षणों के अलावा तुम्हें लोगों के सामने भाभी जी ही कहता था। पर कहते हैं न कि हुस्नो इश्क़ का संगम कब तक ? समझ आने लगा था कि अब हमारा सफ़र ख़त्म होने को है। इस लिए भी कि तुम भूल गई कि प्यार में ज़ुल्म और जब्र से काम नहीं चलता। तुम्हारा नहीं जानता पर मैं नया मुसाफ़िर था इस पथ का। चाहत की चोट से अब बचने की तरक़ीब तलाशने लगा। कुछ दूर साथ चल कर हम बिछड़ने के मोड़ पर खड़े हो गए थे। तुम्हारे एक वाट्सअप संदेश का जवाब भेज दिया : ' सारे भाव , सारी भावना , भंगिमा और सारी संभावना गोमती में विसर्जित कर तुम्हें मुक्त कर ख़ुद को भी मुक्त कर लिया है। बहुत जी लिया तुम्हें। ' तुम्हारा रिप्लाई आया , ' सब भूल जाओ। लव यू ! प्लीज मीट मी !'
लेकिन नहीं आया तुम से मिलने। तुम ने और भी कई लोगों से कहलाया। ख़ामोश रहा। तुम मुझे फ़ोन पर फ़ोन , वाट्सअप पर वाट्सअप संदेश भेजती रही। एक बार तो मिल लो। मेरे घर भी गई। मैं नहीं था तब घर पर। घर पहुंचने पर तुम्हारे आने कि ख़बर मिली और मिल लेने का संदेश भी। नहीं आया तुम से मिलने। कठोर हो गया था मैं। कह सकती हो निर्मोही। आख़िर मैं क्या था तुम्हारा ?
प्रेमी ? सेक्सटीशियन ? जिगोलो ?
तुम से , तुम्हारे प्यार से बग़ावत इतनी भारी पड़ जाएगी , नहीं जानता था। दूसरे दिन पता चला कि तुम ने अपने हाथ की नस काट ली है। अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने तुम्हें मृत घोषित कर दिया। तुम्हारे अफ़सर पति का रुआब भी कुछ काम नहीं आया। तुम ने अपनी हत्या के पहले एक नोट लिख कर बता दिया था कि मैं तुम से मिलने नहीं आया , नहीं आ रहा था इस लिए तुम दुनिया से जा रही हो। तुम्हारे पति ने फ़ोन कर मुझे यह बताया और डपटते हुए कहा , ' इतना बिजी थे कि आए नहीं ? ' उस ने जोड़ा , ' तुम मेरी पत्नी के हत्यारे हो ! '
मैं घर छोड़ कर नहीं गया कहीं। पुलिस के आने की प्रतीक्षा में रहा। पुलिस नहीं आई। वाट्सअप पर तुम्हारी अंत्येष्टि के समय का संदेश आया। गया। लोग मुझे घूरते रहे। पर मैं ने इस की परवाह नहीं की। तुम्हारे पति को बाहों में भर कर तसल्ली दी। फूट-फूट कर रोया। वह भी रोया। एक दूसरे को ढाढस बंधाया। तुम्हारे पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ा कर तुम्हें अंतिम प्रणाम किया। रखना चाहता था पुष्प से घिरे तुम्हारे कपोल पर अपना कपोल और रोना चाहता था तुम्हारे पार्थिव शरीर से लिपट कर। पर लोगों की आंखें धधक रही थीं। श्मशान घाट पर प्यार से बड़ा होता है लोकलाज। सो रुक गया। तुम्हारे चरणों पर माथा रख कर अपने आंसुओं का जल अर्पण किया। गोया सूर्य को अर्घ्य दिया हो। हां , तुम मेरे प्रेम का सूर्य ही तो थी। मुझे प्यार की चांदनी में नहलाती मेरा चंद्रमा भी थी। सहसा तुम्हारी धधकती चिता में ख़ुद को जलते पाया। तुम तो अग्नि और जल में विलीन हो गई। जल के साथ तुम्हारी अस्थियां बह गईं। किसी और जल में मिलने के लिए। क्या पता बहती - बहती सागर के जल में मिल जाओ। गंगा सागर में। जल बदलने का अभ्यास है तुम्हें। लेकिन तुम्हारे मन का यह मछुआरा अब कहां जाए। तुम्हारे प्रेम जाल से कैसे निकलूं ? कितना अभागा हूं , अपराधी हूं कि तुम्हारे प्यार , तुम्हारी चाहत की क़द्र नहीं कर पाया। ख़ुद को तुम्हें समर्पित नहीं कर पाया। तुम्हारे पति ने ठीक ही कहा कि मैं तुम्हारा हत्यारा हूं।
[ साहित्य अकादेमी , नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित समकालीन भारतीय साहित्य के जनवरी-फ़रवरी , 2026 अंक में प्रकाशित। ]












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