Tuesday, 27 October 2020

लव जेहाद ही नहीं , , किसी भी जेहाद से मुक्ति पाने के लिए फ़्रांस मॉडल पूरी दुनिया के लिए अब एक मॉडल है


लव तो एक बहुत ही पवित्र शब्द है लेकिन लव जेहाद बहुत बड़ा कोढ़ है भारतीय समाज के लिए। इस लव जेहाद और ऐसी तमाम अन्य मुश्किलों से निजात पाने के लिए फ़्रांस और अमरीका की तरह सख्त होना पड़ेगा। ख़ास कर फ़्रांस मॉडल पूरी दुनिया के लिए अब एक मॉडल है। लव जेहाद ही नहीं , , किसी भी जेहाद से मुक्ति पाने के लिए फ़्रांस मॉडल पूरी दुनिया के लिए अब एक मॉडल है। और इस फ्रांस मॉडल के लिए सरकार का मुंह देखना नपुंसकता होगी। भारतीय समाज को खुद जागरूक होना होगा। नहीं हरियाणा ही नहीं समूचे देश में निकिता जैसी बेटियों की हत्या होती रहेगी। लव जेहाद चलता रहेगा। आप सिर्फ निंदा , कड़ी निंदा करते रहेंगे। 

फ़्रांस एक पढ़ा-लिखा देश है। ज्ञान-विज्ञान का देश है। अव्वल है। लेकिन जेहाद का घाव लगातार झेल रहा है। इंग्लैण्ड जैसा देश जेहादियों के भंवर में फंस कर तबाही के भंवर में फंस गया है। आज ही एक वीडियो देखा है जिस में एक गोरे दंपति को कुछ स्त्री पुरुष जेहादी एक पेट्रोल पंप पर बुरी तरह मार रहे हैं। अंगरेज बुरी तरह पिट रहे हैं जेहादियों द्वारा और उन्हें बचाने वाला कोई नहीं है। हां , वीडियो बनाने वाले हैं। इस वीडियो में दो जेहादी स्त्रियां भी उछल-उछल कर अंगरेज को पीट रही हैं , पुरुष जेहादी तो पीट ही रहे हैं । अंगरेज औरत भी लाचार हो कर पिटती जा रही है , वीडियो बनाती जा रही है। 

हरियाणा के वल्ल्भगढ़ में भी निकिता के अपहरण में नाकाम लव जेहादियों ने जब अंकिता को कनपटी पर सटा कर आज गोली मारी तो उसे बचाने कोई नहीं गया। बस लोग वीडियो बनाते रहे। इस के पहले पुलिस ने इन जेहादियों से निकिता के परिवार का सुलहनामा करवा दिया था। बी काम की छात्रा निकिता जैसी तमाम असंख्य बेटियां लव जेहाद का शिकार बन चुकी हैं। अभी लखनऊ में तो लव जेहाद की शिकार एक स्त्री ने विधान भवन के सामने आग लगा लिया और अस्पताल पहुंच कर मर गई। दो दिन पहले एक वीडियो में लड़की के साथ पकड़ा गया एक लव जेहादी बता रहा था कि अब तक वह 7 लड़कियों के साथ लव जेहाद कर चुका है। प्रति लड़की उसे दो लाख रुपए मिलता है। एक मस्जिद के मौलाना का नाम भी वह बताता है कि वही पैसे देता है। 

लव जेहाद की शिकार लड़कियां कई लोगों के नीचे लेटने के बाद बेच दी जाती हैं। तो यह और ऐसे अन्य जेहाद से बचने के लिए सरकार से कोई उम्मीद किए बिना समूचे भारतीय समाज को जागरूक होना पड़ेगा। नहीं सेक्यूलर होने की कीमत जैसे इंग्लैण्ड चुका रहा है , भारत भी चुकाएगा। और कब कहां कौन पिट जाएगा , किस का गला कब काट दिया जाएगा , कब कोई निकिता मार दी जाएगी , कोई नहीं जानता। अरब देशों की फंडिंग इन के बहुत काम आती है। ज़्यादातर लड़कियां अरब देशों में ही बिकती हैं। 

इस लिए भी कि भारत बहुत तेज़ी से इंग्लैण्ड की राह पर बढ़ रहा है। इंग्लैण्ड अब जेहादियों का लैंड बन चुका है। कभी जिस के राज में सूरज नहीं डूबता था ,  दुनिया पर उस का राज था , उसी इंग्लैण्ड में अब जेहादियों की लहर है। अंगरेज इन से हार चुके हैं। आबादी की बुनियाद पर। जगह-जगह अंगरेज इंग्लैण्ड में पिट रहे हैं। इंग्लैण्ड की राह रोकने के लिए फ्रांस की राह चलना बहुत ज़रूरी है। अमरीका की राह चलना बहुत ज़रूरी है। चीन की राह भी। 

सेक्यूलरिज्म की नकाब उतार कर फेंक दीजिए। अपना स्वाभिमान , अपनी जान , अपनी बेटियों को बचाइए। जैसे सती प्रथा से मुक्ति पाई थी , भारतीय समाज ने , जैसे विधवा विवाह होने लगे हैं। जैसे तमाम और कुरीतियों से भारतीय समाज ने मुक्ति पाई है ने। जेहादियों से जैसे कश्मीर तक को मुक्त करवाया है , इस जेहाद , लव जेहाद से भी एकजुट हो कर मुक्त होना होगा। नहीं कुछ समय बाद पूरे देश को कश्मीरी पंडित बनने को तैयार हो जाना चाहिए। 

विकास की तुलना लालू के अधिक बच्चों से करना ज़रूर ही अति है , पतन है नीतीश कुमार का

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तो तमाम ओपिनियन पोल में जीत की अटकलों के बीच क्या नीतीश कुमार बिहार में  हार के भय से सचमुच बौखला गए हैं। जिस तरह लालू यादव और तेजस्वी यादव को ले कर वह निरंतर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं , उस से लगता तो यही है। कोई 15 बरस मुख्य मंत्री रह कर , सुशासन बाबू बन कर रहने वाला व्यक्ति अगर अपने विकास की तुलना में लालू यादव के अधिक बच्चा करने से , सन कांप्लेक्स से करने पर आमादा हो जाए तो यह राजनीतिक नीचता की पराकाष्ठा है । राजनीति तो हरगिज नहीं है यह। लालू परिवार की बड़ी बहू पर हुए अत्याचार की बात तक तो बात ठीक थी।  तेजस्वी का चरित्रहनन करते हुए कि दिल्ली में यह कहां रहता है तक भी ठीक था। पर यह विकास की तुलना अधिक बच्चों से करना ज़रूर ही अति है , पतन है नीतीश कुमार का। 

लंपट ही सही , नौवीं फेलियर ही सही पर तेजस्वी यादव ने जिस शालीनता से नीतीश कुमार की इस बात का प्रतिवाद किया है और कहा है कि यह मेरी मां का अपमान है , एक स्त्री का अपमान है। बिलकुल ठीक कहा है। नीतीश कुमार ने शालीनता और शुचिता की हद पार कर दी है। इस बिंदु पर नीतीश कुमार को क्षमा मांग लेनी चाहिए। बाक़ी नेताओं को भी नीतीश की इस बात की कड़ी निंदा करनी चाहिए। वैसे भी नीतीश कुमार एक समय लालू यादव के बहुत करीब रहे हैं। पारिवारिक मित्र भी रहे हैं। लालू के निकट सलाहकार रहे हैं। ऐसे आरोप सच होते हुए भी , चुनावी मुद्दा नहीं हो सकते। ऐसे व्यक्तिगत हमलों से नीतीश कुमार को ही नहीं , हर किसी को बचना चाहिए। 

नीतीश कुमार की भाषा भी इन दिनों निरंतर तू-तकार वाली हो गई है। जिस तरह रैलियों में वह तेजस्वी को तू-तकार से संबोधित करते दिख रहे हैं , भीड़ पर तुम-तुम कह कर भड़क रहे हैं , बिलकुल ही ठीक नहीं है। सुशासन बाबू को , उन की छवि को खंडित करती है उन की यह तू-तकार। हम इस नीतीश कुमार को पहले नहीं जानते थे , अब जान रहे हैं। भारतीय राजनीति में अहंकार और सामंतवाद के लिए , बदजुबानी के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। 

सख्त से सख्त बात भी शालीनता और शुचिता की मर्यादा की हद में ही होनी चाहिए। याद रहे कि बिहार में लालू यादव का पतन सिर्फ भ्रष्टाचार , जंगलराज और जातिवाद के कारण ही नहीं हुआ। लालू यादव का अहंकार और उन का सामंतवाद , उन की बदजुबानी भी बड़ा कारण रहा है। चारा कांड उन पर चढ़ बैठा यह अलग बात है। नीतीश कुमार को जान लेना चाहिए कि सुशासन के साथ शालीनता ही शोभा देती है। अहंकार , सामंतवाद और बदजुबानी कतई नहीं। आप अमृत भी अपमान के साथ सोने के थाल में  परोस दें , कोई भला मानुष स्वीकार कोई नहीं करता।

Friday, 23 October 2020

यह एफ आई आर नहीं , उद्धव ठाकरे का हल्ला बोल है


किसी मीडिया हाऊस के एक हज़ार कर्मियों पर एक साथ एफ आई आर उद्धव ठाकरे सरकार की बौखलाहट का थर्मामीटर है। भले कोई अदालत इस एफ आई आर रद्द कर दे या स्टे दे दे। पर इतना हमलावर तो कभी अपने निंदक रामनाथ गोयनका और उन के इंडियन एक्सप्रेस पर अपने समय की तानाशाह इंदिरा गांधी भी नहीं हुई थीं। इमरजेंसी में भी नहीं। रिपब्लिक भारत  के अर्णब गोस्वामी भले इलेक्ट्रानिक मीडिया के आदमी हैं पर उन्हों ने ने अकबर इलाहाबादी के एक शेर की याद दिलवा दी है :

खींचो न कमानों को न तलवार निकालो

जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो।

मीडिया के एजेंडाधारी लेकिन दगे हुए कारतूसों यथा रवीश कुमार सरीखों को भी अर्णब गोस्वामी से यह लड़ाकूपन सीखना चाहिए। अरे जब आप एजेंडे पर काम कर ही रहे हैं तो बौद्धिक विलास और भैंस की तरह जुगाली करना छोड़ मोदी विरोध कारगर ढंग से कीजिए। मुट्ठी भी तनी रहे और कांख भी छुपी रहे का अभ्यास छोड़ कर मोदी की ईंट से ईंट बजा दीजिए। ताकि मोदी सरकार भी बौखला जाए और दो , चार , दस हज़ार मीडियाजनों पर एफ आई आर दर्ज करा दे। पर कहां यहां तो समय बीतते ही जैसे कांग्रेस राफेल भूल जाती है , एजेंडाधारी पत्रकार भी भूल जाते हैं। 

मोदी सरकार के खिलाफ तमाम और मामले भी उठाए जा सकते हैं पर कांग्रेस या वामपंथियों का भोंपू बन कर नहीं। पत्रकार बन कर। अफ़सोस कि  पत्रकारिता के नाम पर अब कांग्रेस , भाजपा या अन्य राजनीतिक पार्टियों के चाकर और दलाल लोग ही रह गए हैं। अकबर इलाहाबादी के शेर की वह तुर्शी , वह तेवर तो छोड़िए , इस शेर से भी मीडियाजन न परिचित हैं , न परिचित होना चाहते हैं।

जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे तब अगर किसी अखबार या पत्रकार से नाराज होते थे तब एफ आई आर वगैरह के झमेले में नहीं पड़ते थे। सीधे हल्ला बोल देते थे। शहर-दर-शहर। अखबार के दफ्तर , पत्रकार यहां तक कि हॉकरों तक पर। बिचारे गरीब हॉकर सुबह-सुबह अखबार बांटने निकलते थे और पिट-पिटा कर घर पहुंचते थे। अखबार फेंक कर सपाई गुंडों से जान बचाते थे। जब तक अगला सरेंडर न कर दे तब तक यह हल्ला बोल चालू रहता था। 

बाद के दिनों में अखबार मालिक पूरी तरह शरणागत हो गए। अखबार मालिकों , चैनल मालिकों से उन की गहरी दोस्ती हो गई। कभी-कभार कोई नवधा पत्रकार अप्रिय सवाल पूछ लेता गलती से तो वह डपट कर पूछते किस अखबार से हो , किस चैनल से हो ? दूसरे ही दिन उस की नौकरी चली जाती थी। मायावती ने तो बिना किसी पूछताछ या डांट डपट के ही इसी तरह कई पत्रकारों की नौकरी खाई। एक अघोषित आतंक था मायावती और मुलायम का तब और आज भी वह बदस्तूर जारी है। इसी लिए इन के खिलाफ न कभी कोई खबर चलती है , न छपती है। मीडिया मालिकों को लगता है कि जाने कब इन लोगों की सत्ता में वापसी हो जाए तो मुश्किलें बढ़ जाएं। सो खामोश ! 

उद्धव ठाकरे और उन की शिवसेना भी कमोवेश हल्ला बोल वाली कार्यशैली के हामीदार हैं। पर एक तो अर्णब गोस्वामी को वाई श्रेणी की सुरक्षा मिली हुई है दूसरे , केंद्र सरकार से ठाकरे सरकार के रिश्ते बेहद ख़राब हैं। तो यह लगाम लगी हुई है। हल्ला बोल की जगह चोर-सिपाही की तरह , एफ आई आर , एफ आई आर खेल रही है। तो यह एफ आई आर नहीं , उद्धव ठाकरे का हल्ला बोल है। 

Wednesday, 21 October 2020

अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार दोनों ही एजेंडाधारी हैं और अपने-अपने राजा का बाजा बजा रहे हैं

वैसे तो मुख्य धारा की मीडिया में वर्तमान में लगभग सभी पत्रकार एजेंडाधारी ही हैं। एजेंडा ही उन की खुराक है। एजेंडा ही उन की सांस है। वह चाहे अर्णब गोस्वामी हों या रवीश कुमार। या अन्य आदि-इत्यादि। अर्णब की चीख-पुकार मुझे बिलकुल पसंद नहीं है। न ही उन का एजेंडा। अपने डिवेट में वह अपने आगे किसी और को बोलने ही नहीं देते। टाइम्स नाऊ से ही उन की यह चीख-पुकार की हुंकार लोग सुन रहे हैं। बहुत कम लोग अर्णब की लगाम संभाल कर उन को काबू कर पाते हैं। जैसे कि एक बार नरेंद्र मोदी को देखा। एक बार वेद प्रताप वैदिक को देखा।  नरेंद्र मोदी तब प्रधान मंत्री नहीं थे। गुजरात के मुख्य मंत्री थे। पर अर्णब को डपटते हुए वह बोले , आप एडिटर हैं , मालिक हैं , मेरे जाने के बाद आप अपना भाषण , घंटे , आधे घंटे जो भी हो दे लीजिएगा। अभी मुझे सुन लीजिए। और अर्णब चुप हो गए थे। वेद प्रताप वैदिक ने भी उन को एक बार तगड़ी खुराक दे दी थी। और वह थोड़ी देर के लिए चुप हो गए थे। 

और अब रिपब्लिक पर तो खैर अर्णब गोस्वामी ने अपनी चीख-पुकार और बदतमीजी की सारी हदें पार कर दी हैं। वह अचानक किसी से कह देंगे , आप खड़े हो जाइए और यह देखिए वह खड़ा भी हो जाता है। बैठ जाइए कह देते हैं तो वह बैठ जाता है। मनमुताबिक बोल रहा हो तो बोलने देंगे नहीं बोलने ही नहीं देंगे। उलटे कह देंगे , तुम चोर हो। तुम देशद्रोही हो। तुम गद्दार हो। चमचे हो। सोनिया सेना के हो। आदि-इत्यादि। बस मां , बहन की गाली भर नहीं देते। बाक़ी सब। समझ नहीं आता कि इस कदर बेइज्जत होने के लिए अर्णब गोस्वामी के शो पर लोग जाते ही क्यों हैं। 


ठीक यही काम एक समय रवीश कुमार भी भाजपा और संघ से जुड़े लोगों के साथ करते थे। बस चोर , गद्दार जैसे शब्दों का वाचन नहीं करते थे पर अर्थ वही होता था। फिर रवीश भी इन लोगों को बोलने नहीं देते थे। या समय बहुत कम देते थे। पर अपराधियों की तरह कटघरे में खड़ा ज़रूर कर देते हैं। डिवेट की सारी शालीनता रवीश भी अपने से असहमत लोगों के साथ पार कर जाते हैं। अपने प्रिय और सहमत लोगों का पलड़ा सर्वदा भारी रखते हैं । निरंतर अपमानित होते हुए भाजपाइयों और संघियों ने अंतत : रवीश कुमार के शो में जाना पूरी तरह बंद कर दिया। फिर एन डी टी वी से ही यह लोग गायब हो गए। रवीश कुमार अब कहते नहीं अघाते कि मेरे शो में भाजपा के लोग नहीं आते। लेकिन यह नहीं बताते कि  अपने एजेंडा के तहत पत्रकारिता की सारी मान्यताएं ध्वस्त कर मैं उन्हें कितना अपमानित और जलील करता था। 

चीख-पुकार रवीश भी करते हैं और अर्णब गोस्वामी भी। रवीश खीझते और झल्लाते भी बहुत हैं। पर रवीश अपने एजेंडे में नमक मिर्च बहुत तेज़ नहीं रखते। एक परदेदारी रखते हैं। जब कि अर्णब का एजेंडा खुली किताब की तरह सामने रहता है। कह सकते हैं कि वह सारे कपडे उतार कर खड़े रहते हैं। बतर्ज हमाम में सभी नंगे हैं। अर्णब सारे कार्ड खोल कर खेलते हैं। याद रखिए कि अर्णब गोस्वामी भी एन डी टी वी के ही प्रोडक्ट हैं। और रवीश कुमार अभी भी एन डी टी वी में हैं। 

अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार दोनों ही एजेंडाधारी हैं। लेकिन इन दोनों में एक बड़ा फर्क यह है कि अर्णब गोस्वामी सत्ता की आंख से काजल इस दबंगई से निकाल कर उस के चेहरे पर पोत देते हैं कि सत्ता का चेहरा काला पड़ जाता है। कहिए कि अर्णब गोस्वामी सत्ता के मुंह पर कालिख पोत देते हैं , उसी की आंख से काजल निकाल कर। आप मानिए न मानिए अर्णब गोस्वामी ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार की नींद उड़ा दी है। एक पर एक मामला उठा कर उद्धव ठाकरे सरकार का जीना हराम कर दिया है। तमाम लेखक पत्रकार कहते नहीं अघाते कि मीडिया को विपक्ष की भूमिका में रहना चाहिए। यह लोग बताएंगे कि रवीश कुमार या एन डी टी वी विपक्ष की भूमिका में , अगर हैं तो केंद्र या कितनी प्रदेश सरकारों ने उन पर पुलिस में रिपोर्ट या मुकदमे दर्ज किए हैं ? अर्णब गोस्वामी और रिपब्लिक भारत पर तो महाराष्ट्र सरकार ने पुलिस रिपोर्ट और मुकदमों की बरसात कर दी है। तो क्या मुफ्त में ? कि शौकिया ? 

इस बीच अर्णब गोस्वामी ने कुछ स्टिंग भी दिखाए हैं जिन में महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मिनिस्टर और एन सी पी के नेता नवाब मलिक तो कह रहे हैं कि अर्णब गोस्वामी को इतना परेशान कर दिया जाएगा कि वह आत्महत्या कर लेगा। एक कांग्रेस नेता कह रहे हैं कि इतने मामलों में अर्णब को फंसा दिया जाएगा कि वह जेल से निकल नहीं पाएगा। यह सब क्या है ? टी आर पी के खेल में कौन चैनल नहीं शामिल है। फिर क्या रिपब्लिक भारत सिर्फ मुंबई में ही देखा जाता है। बाकी देश में नहीं ? तो मुकदमा तो पूरे देश में लिखा जाना चाहिए। फिर क्या बाकी चैनल दूध के धोए हुए हैं ?

असल में पालघर , सुशांत सिंह राजपूत और कंगना रानावत जैसे मामलों में अर्णब ने जिस तरह उद्धव ठाकरे के खिलाफ आक्रमण कर , छीछालेदर की है , और टी आर पी में बढ़त ली है , उस से उद्धव ठाकरे सरकार पूरी नंगी हो कर बौखला गई है। ठीक है कि अर्णब गोस्वामी ने यह सब अपने एजेंडे के तहत किया है। कोई दो राय नहीं। मैं पूरी तरह इस बात से सहमत हूं। पर सवाल यह है कि एन डी टी वी और रवीश कुमार का एजेंडा भी नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ खुल्ल्मखुल्ला है। बीमारी की हद तक। मोदी वार्ड के सारे मरीज इसी लिए एन डी टी वी और रवीश कुमार पर फ़िदा हैं। पर यह मुट्ठी भर लोग एन डी टी वी की टी आर पी को उछाल नहीं दे पाते। अच्छा रवीश कुमार के तमाम शीर्षासन के बावजूद कितने मुकदमे किए हैं मोदी सरकार ने रवीश कुमार पर ? कितने हमले करवाए हैं ? सोशल मीडिया पर गाली खाने का रोना रवीश जब-तब ज़रूर रोते हुए दीखते हैं। इस का दो ही मतलब है कि या तो सरकार पर आप हमला करने में कामयाब नहीं हैं। सरकार पर चोट नहीं ठीक से कर पा रहे। सिर्फ लफ्फाजी की ढोल बजा रहे हैं। या सरकार आप के प्रति फिर भी सहिष्णुता अख्तियार किए हुए है। 

एक बात यह भी है कि रवीश के पास समाचार की जगह विचार ज़्यादा होते हैं। जिसे लफ्फाजी की जुगाली में परोस कर वह मोदी विरोधियों की मिजाजपुर्सी करते हैं। ईगो मसाज करते हैं , अपना भी और प्रणव रॉय का भी। सीधे-सीध हमला हमला कभी नहीं करते मोदी सरकार पर अर्णब की तरह। सेफर साइड बहुत चलते हैं। कुछ इस तरह कि मुट्ठी भी तनी रहे और कांख भी छुपी रहे। खैर , जो भी हो अर्णब गोस्वामी और रवीश कुमार दोनों ही एजेंडाधारी हैं। पर अर्णब टी आर पी में टॉप पर हैं और रवीश टी आर पी में बॉटम पर। लेकिन मुझे दोनों ही का एजेंडा बिलकुल नहीं भाता। दोनों एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। कोई किसी का लाऊडस्पीकर है , कोई किसी का। स्वाधीन कोई नहीं। कई बार तो दोनों ही को देख कर लगता है कि अगर यह अभिनेता नहीं हैं , अभिनय नहीं कर रहे हैं तो ज़रूर इन दोनों को किसी योग्य मानसिक चिकित्सक की सख्त ज़रूरत है।  

नहीं इन्हीं अर्णब गोस्वामी को एक समय मोदी की निंदा करते और योगी को बहुत बड़ा खतरा , डेंजर बताते हुए भी अर्णब गोस्वामी को देखा है। पर कभी किसी बिंदु पर कांग्रेस या राहुल गांधी की आलोचना करते हुए किसी ने रवीश कुमार या एन डी टी वी को देखा हो तो बताए भी। कभी किसी ममता बनर्जी , किसी अखिलेश यादव , किसी तेजस्वी यादव की आलोचना करते रवीश को किसी ने देखा हो तो बताए। दरअसल पत्रकारिता दोनों ही नहीं कर रहे। अपने-अपने राजा का बाजा बजा रहे हैं। अर्णब गोस्वामी भी , रवीश कुमार भी। राजा बदलते इन को देर नहीं लगती। राजा ही इन का एजेंडा तय करते हैं यह लोग नहीं। यह पत्रकार नहीं। पत्रकारिता के नाम पर दलाल लोग हैं। राजा की चाकरी करने वाले लोग। गोरख पांडेय याद आते हैं :

राजा बोला रात है

रानी बोली रात है

मंत्री बोला रात है

संतरी बोला रात है

सब ने बोला रात है


यह सुबह सुबह की बात है


Monday, 19 October 2020

कांग्रेस और वामपंथियों का कंधा आप को सिर्फ़ अमानुष और वोट बैंक बनाता है


भारत में अगर हिंदू-मुस्लिम भाई चारा जो सचमुच होता , गंगा-जमुनी तहज़ीब का जो अस्तित्व होता तो अयोध्या में राम जन्म-भूमि , काशी में विश्वनाथ मंदिर , मथुरा में कृष्ण जन्म-भूमि जैसे विवाद चुटकी बजाते ही खत्म हो जाते। पर यह भाई-चारा , गंगा-जमुनी तहज़ीब जैसे शब्द हिप्पोक्रेसी के हिमालय हैं , एकतरफा हैं। इस लिए यह समस्याएं न सिर्फ विवाद के भंवर में पड़ती हैं बल्कि देश के अमन-चैन में ख़ासा खलल डालती हैं। अयोध्या में तो पुराना अब कुछ रहा नहीं पर जब था , तब मैं गया हूं कई बार । पूरा ढांचा मंदिर ही की तरह था। चारो तरफ मंदिर ही मंदिर। सीता रसोई , कनक भवन , हनुमान गढ़ी वगैरह। तमाम सारे साक्ष्य चीख-चीख कर बताते थे कि यह मस्जिद नहीं , मंदिर है। वजू करने के लिए वहां कोई कुआं भी नहीं था , जो अमूमन मस्जिद के बगल में हुआ करता था। पुरातत्व की खुदाई में भी तमाम तथ्य सिद्ध हुए , मंदिर के पक्ष में। बहरहाल वह विवाद सुप्रीम कोर्ट की रौशनी में अब समाप्त है। 

खैर , आप अब भी जब कभी मथुरा जाइए और कृष्ण जन्म-भूमि पर जाइए तो पाएंगे कि मंदिर और मस्जिद की दीवार एक है। पूरा मंदिर एक छोटा सा दड़बा है। जिस में एक बेड भी नहीं रख सकते। और बगल में विशाल मस्जिद। दिल्ली के जामा मस्जिद के मानिंद। तो क्या कंस की जेल इतनी छोटी थी ? जो भी हो , तथ्य चीख-चीख कर बताते हैं कि मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनाई गई है। जो भी हो अब यह मामला भी अदालत में है। सारे साक्ष्य मंदिर के पक्ष में हैं। फ़ैसला जब आएगा , तब फिर यह दिखेगा ही। 

आप जाइए न काशी में कभी विश्वनाथ मंदिर। वहां तो मंदिर से सटे ज्ञानवापी मस्जिद के गुंबद भी मंदिर वाले दीखते हैं। भीतर भी सब कुछ मंदिर सरीखा ही है। पूरी मस्जिद चीख-चीख कर कहती है , मैं मंदिर हूं , मैं मंदिर हूं। लेकिन भाईचारा और गंगा-जमुनी तहज़ीब के अलंबरदार और इस की हिप्पोक्रेसी के सरताज लोगों को कुछ नहीं दीखता। दीखता है तो संघ , हिंदुत्व और भाजपा की साज़िश। 

तो क्या कश्मीर में लाखों कश्मीरी पंडितों को बेघर करने , उन की स्त्रियों के साथ बलात्कार , हत्या , लूटपाट और तमाम मंदिरों को तोड़ कर नदियों में बहा देने में भी क्या यही हिंदुत्ववादी , भाजपाई और संघी थे ? लेकिन सवाल यहां यह भी ज़रूर मौजू है कि फ़्रांस में कौन सा संघ , हिंदुत्व और भाजपा है। जहां एक टीचर की हत्या उस का एक विद्यार्थी कर देता है। असहिष्णुता एक कार्टून पर बौखला जाती है। फ़्रांस ही क्यों , पूरे यूरोप , अमरीका , चीन , आदि-इत्यादि समेत इस्लामिक देशों में भी हर जगह यह सिलसिला जारी है। मतलब है कोई ज़रूर जो न सिर्फ भारत में बल्कि समूची दुनिया में भाई-चारा और गंगा-जमुनी तहज़ीब को निरंतर न सिर्फ तार-तार कर रहा है बल्कि दुनिया में अमन-चैन के लिए मुसलसल खतरा बना हुआ है। 

अब से सही इस समाज को अपनी कट्टरता , जहालत और हिंसा से छुट्टी ले कर पूरी दुनिया की मुख्य धारा में शामिल हो जाना चाहिए। हिंसा और कट्टरता पूरी तरह दुनिया के लिए ठीक नहीं है। इस बात को जितनी जल्दी हो सके समझ लेना चाहिए और मनुष्यता में यकीन करना सीख लेना चाहिए। किसी न किसी बहाने पूरी दुनिया को हिंसा के अंगार पर झुलसाए रखना गुड बात नहीं है। मनुष्यता को गाय की तरह काटना और खाना बंद भी कीजिए। अपनी आस्था के साथ-साथ दूसरों की आस्था और मनुष्यता का सम्मान करना भी सीखिए। बहुत हो गया कबीलाई संस्कृति में जीना , मारना और काटना। तालिबानी होना मनुष्यता का दुश्मन होना है। सो अपनी गलतियों के लिए शर्मिंदा होना भी सीखिए और गलतियों को सुधारना भी।  इस लिए भी कि आप की पहचान में अब हिंसा और कट्टरता ही शुमार है। 

कांग्रेस और वामपंथियों के चढ़ाने पर हरगिज मत चढ़िए। क्यों कि उन का कंधा आप को सिर्फ़ अमानुष और वोट बैंक बनाता है। कुछ और नहीं। वोट बैंक और अमानुष होने से फुर्सत लीजिए। सच को सच की तरह स्वीकार करना सीखिए। इस लिए भी कि कट्टरता और हिंसा मनुष्यता के दुश्मन हैं। जितनी जल्दी संभव बने इस तथ्य को स्वीकार कर लें। दुनिया और भारत की मुख्य धारा में शामिल होइए। सिर्फ़ वोट बैंक नहीं हैं आप। हाड़ और मांस का लोथड़ा भर नहीं हैं आप। मनुष्य हैं आप। मनुष्य की तरह जीना सीखिए। जानवर की तरह नहीं। तुलसीदास लिख ही गए हैं :

बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सद् ग्रन्थन्हि गावा।।

साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाई न जेहिं परलोक सँवारा।।

गरज यह कि मनुष्य जीवन बहुत भाग्य से मिला है। यह देवताओं को भी दुर्लभ है, इस लिए वो भी मानव शरीर प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं। यह मोक्ष का द्वार है क्यों कि हम साधना कर के मुक्ति तक की यात्रा मानव योनि में ही कर सकते हैं। अगर ऐसा दुर्लभ मानव जन्म पा कर भी जीव अपना परलोक नहीं सुधारता है तो उस का ये दिव्य जन्म व्यर्थ हो जाएगा।


Saturday, 10 October 2020

पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में अगर भाजपा को रोकना है तो


पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में अगर भाजपा को रोकना है तो आपसी अहंकार त्याग कर तृणमूल , वामपंथी और कांग्रेस को एक साथ तालमेल कर चुनाव लड़ना होगा। भाजपा विरोधी वोट बंटने से बचेगा। तो भाजपा रुकेगी। बाकी संविधान खत्म हो जाएगा आदि-इत्यादि बातें सब ख्याली पुलाव है। सोने का मृग है। इन बातों से जनता में कोई असर नहीं पड़ता। इस टोटके और तरकीब से भाजपा भी कहीं नहीं रूकती। चुनावी राजनीति में संविधान वगैरह वैसे भी हाथी के दांत हैं। तो संविधान खतरे में वैसे भी नहीं आता-जाता। 

इमरजेंसी लगी थी तब ज़रूर खतरे में था , संविधान । पर अब संविधान को खतरे में बताने वाले लोग तब चुप थे। तो जनता हकीकत समझ चुकी है। फिर चुनाव में सवाल संविधान का नहीं सत्ता का है। सत्ता पाने की ही बात करनी चाहिए। संविधान आदि का भजन किसी काम नहीं आने वाला। तथ्य यह है कि एकपक्षीय सेक्यूलरिज्म ने भाजपा को पश्चिम बंगाल में बड़ी ताकत दे दी है। इस बात को भाजपा विरोधी ताकतें जितनी जल्दी समझ लेंगी , उन के लिए बेहतर होगा। नहीं भाजपा-भाजपा करते रहने , सिर्फ भाजपा का डर दिखाने से , भाजपा आती है। रुकती नहीं। सोशल मीडिया पर क्रांति की जुगाली से तो कतई नहीं। 

यह छोटी सी बात जाने क्यों भाजपा विरोधी शक्तियां समझना नहीं चाहतीं। ध्यान यह भी देने की बात है कि ममता सरकार के खिलाफ इंकम्बेंसी भी ज़बरदस्त है। वामपंथी दल हांफ रहे हैं। और कांग्रेस की तो खैर बात ही क्या करनी। राहुल , प्रियंका , सोनिया से आगे कांग्रेसियों को कांग्रेस कहां दिखती है भला। फिर राहुल गांधी में जो लोग देश का भविष्य देखते हैं , उन पर मुझे तरस आता है। ख़ास कर वामपंथी बुद्धिजीवियों पर। मेरा स्पष्ट मानना है कि ऐसे लोगों को भारत की राजनीति की बिलकुल समझ नहीं है। और कि ऐसे लोगों को राजनीति पर बात करने से परहेज़ करना चाहिए। राहुल गांधी जैसे व्यक्ति के कसीदे पढ़ कर यह लोग अपनी सारी पढ़ाई-लिखाई , वैचारिकी , प्रतिबद्धता वगैरह चुटकी बजाते ही पानी में मिला देते हैं। ज़मीनी सचाई यह है कि राहुल कांग्रेस का ही भविष्य नहीं रह गए हैं। देश का भला क्या होंगे कभी। 

खैर , मुस्लिम तुष्टिकरण के चूल्हे पर , एकपक्षीय सेक्यूलरिज्म की आंच में भाजपा पश्चिम बंगाल में ही नहीं ,पूरे देश में मज़बूत  हुई है। इस तथ्य की अनदेखी करना ही बड़ी भूल है। फिर सच देखने , कहने वालों को संघी , भक्त करार देना और बड़ी भूल है। सुर में सुर मिला कर अपने से असहमत होने वालों को बहुत ज़ोर-ज़ोर से संघी , भक्त कह देने भर से भाजपा की चुनौती समाप्त नहीं होने वाली। चुनी हुई चुप्पियां , चुने हुए विरोध का खोल भी उतार ही देनी चाहिए। वोट देने वाली सामान्य जनता , कहीं की भी हो , पश्चिम बंगाल की भी , व्यवहार समझती है , सिद्धांत नहीं। सामान्य जनता बुद्धिजीवी नहीं होती। रोटी-दाल , सुविधा , मंहगाई , रोजगार , आत्म-सम्मान और क़ानून व्यवस्था आदि मोटे-मोटे तौर पर समझती है। और हां , धर्म और जाति भी। बहुत कस के।

तथ्य यह भी दिलचस्प है कि ;अगर 2014 में पश्चिम बंगाल से भाजपा के 2 सांसद थे तो 2019 में कुल 42 में से 18 सांसद कैसे हो गए भला भाजपा के ? स्पष्ट है , भाजपा बढ़ रही है। मेरा मानना है कि विधान सभा चुनाव में भी भाजपा तगड़ी बढ़त ले रही है। रही बात हिंसा की तो चार दशक से अधिक समय से हम पश्चिम बंगाल को हिंसा में निरंतर झुलसते देख रहे हैं। वह पश्चिम बंगाल जहां टैगोर की मूर्तियां तोड़ दी जाती हैं। नंदीग्राम और सिंगूर में यह हिंसा पराकाष्ठा पर दिखी। इसी चक्कर में वामपंथियों के हाथ से सत्ता छिन गई। अब ममता बनर्जी की तृणमूल ने हिंसा में वामपंथियों को भी पीछे छोड़ दिया है। और जो हालत दिख रही है उस के मुताबिक़ भाजपा , तृणमूल को हिंसा में पीछे छोड़ने वाली है। लोहा , लोहा काटता है की चाल चलते हुए। बिहार चुनाव से तो हिंसा की विदाई हो चुकी है। पश्चिम बंगाल से जाने कब चुनावी हिंसा विदा होगी , यह देखना होगा।


Thursday, 8 October 2020

हम काफिर हैं ज़रूर पर आप के शिकार होने वाले काफिर नहीं


लीगी और जेहादी मानसिकता के जहर में डूबे हुए लोगों , सी ए ए के दंगाइयों के पोस्टर आज भी चौराहों पर लगे हुए हैं। आंख खोल कर देख लीजिए। सी ए ए के समय के दंगाइयों ने हाथरस में भी जातीय दंगा कराने की कोशिश की। पर नाकाम रहे। जस्टिस फॉर हाथरस की वेबसाइट बना कर फंड भी बटोर रहे थे और लोगों को भड़का भी रहे थे। यह पी एफ आई के लोग थे। कल इस बाबत एफ आई आर दर्ज होते ही वेबसाइट बंद कर पी एफ आई के लोग चंपत हो गए हैं। योगी सरकार ने आप जैसे जहरीले लोगों पर लगाम कस दी है। इंतज़ार कीजिए जल्दी ही इन दंगाइयों की गिरफ्तारी होगी। जय भीम , जय मीम का नारा लगा कर समाज में जहर घोलना भूल जाएंगे आप जैसे लोग। 

अंबेडकर को कभी पढ़ा है ? नहीं पढ़ा है तो अब से पढ़ लीजिए। अंबेडकर ने बहुत साफ़ लिखा है कि इस्लाम एक अभिशाप है। यह बात अंबेडकर ने पाकिस्तान बनने पर लिखी। और लिखा कि अच्छा हुआ कि पाकिस्तान के बहाने भारत से इस्लाम नाम का अभिशाप गया। इस बाबत अंबेडकर ने पूरी एक किताब लिखी है। अब अलग बात है कि उन को यह नहीं मालूम था कि इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान बनाने वाले जहरीले लोग भी यहीं रह जाएंगे। 

हां , सरकार संविधान से ही चलती है। और अगर लीगी , जेहादी मानसिकता में अंधे हो गए हों तो अपना अंधापन दूर कीजिए। और जितनी जल्दी जान लीजिए , उतना बेहतर कि 2014 के बाद कई संविधान संशोधन हो चुके हैं। प्रमुख संविधान संशोधन हैं तीन तलाक का खात्मा , कश्मीर से 370 की विदाई और सी ए ए। जनसंख्या नियंत्रण क़ानून बस बनने ही वाला है। तो सारी पिंगलबाजी और संविधान की आड़ में संविधान से खेलना छूट जाएगा। सारा जेहाद , सारा लीगी जहर आप जैसे लोग भूल जाएंगे। भूसी छूट जाएगी। समय रहते ही संविधान , इस्लाम की हिप्पोक्रेसी से फुर्सत ले लीजिए। आराम मिलेगा। अभी बलरामपुर और आजमगढ़ के बलात्कारियों के खिलाफ कार्रवाई को बर्दाश्त करने के लिए , हिम्मत जुटा कर रखिए। गुड रहेगा। क्यों कि दिल्ली के दंगाई ताहिर हुसैन से भी बुरी दुर्गति होने वाली है इन सब की। फिर और ज़ोर से संविधान-संविधान बोलने की ज़रूरत पड़ेगी। ठीक ?

आप का सारा विरोध ही इस्लामीकरण और जेहाद की बुनियाद पर टिका हुआ है। आप को नहीं मालूम ? कोर्ट को जूते पर तो आप इस्लाम के हिमायती लोग मानते हैं। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही ले लीजिए। कितने मुसलमानों ने इसे सहज ढंग से स्वीकार किया है ? आप ही अपने दिल पर हाथ रख कर बता दीजिए। गनीमत है कि मोदी , योगी की जोड़ी है नहीं , पूरे देश में अब तक आग लग गई होती। कौन नहीं जानता कि सी ए ए की आड़ में राम मंदिर के खिलाफ जहर निकालने के लिए दंगे हुए। 

अच्छा कुख्यात आतंकियों याकूब मेनन और अफजल के मामले को ही ले लीजिए। कोर्ट को जूते पर किन लोगों ने रखा। अफजल की फांसी को ज्यूडिशियल किलिंग किन लोगों ने कहा ? हर घर से अफजल निकलेगा , तुम कितने अफजल मारोगे , नारा किन लोगों ने लगाया ? बुरहान वानी को शहीद हम तो नहीं कहते। ओसामा बिन लादेन की इज्जत अफजाई हम तो नहीं करते। अजमल कसाब की फांसी पर हम तो नहीं कसमसाते। भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्ला , इंशा अल्ला के नारे भी हम नहीं लगाते। रोहिंगिया और बांगलादेसी घुसपैठियों के लिए हमारी छाती में दूध भी नहीं उतरता। किन की छाती में दूध उतरता है , यह आप नहीं जानते ? 

हां , लाखो कश्मीरी पंडितों के बेघर होने पर हमारी छाती में दूध उतरता है। पर आप और आप जैसे लोग खामोश रहते हैं। आतंकियों के समर्थन में खड़े ज़रूर हो जाते हैं। कहिए कि देश के सौभाग्य से मोदी शासन आ गया। जगह-जगह होने वाले आतंकी विस्फोट से फुर्सत मिली है। नहीं इस्लाम के हिमायतियों ने पूरे भारत को सीरिया में तब्दील करने का मंसूबा बना लिया था। याद रखिए इस्लाम ने भारत में ही नहीं पूरी दुनिया को अपने आतंकवाद  के जहर से जहन्नुम बना रखा है। 

भारत में आप को अपना इस्लामिक जहर छुपाने के लिए संघ , हिंदुत्व और भाजपा का बहाना मिल जाता है। फ़्रांस , यूरोप , अमरीका आदि में भी क्या संघ , हिंदुत्व और भाजपा के लोगों के कारण ही इस्लामिक आतंकवाद फूल फल रहा है ? मैं कोई सच कहूं तो सवर्ण मानसिकता , ब्राह्मण मानसिकता। गुड है। लेकिन आप इस्लामिक जेहाद में डूब कर बात करें तो कोई कुसूर नहीं। क्यों कि हम काफिर हैं और आप इस्लामिक आतंक के पर्याय। आप को काफिरों को मारने की छूट है। आप का अधिकार है। है न ? तो भूल जाइए यह सब। 

हम काफिर हैं ज़रूर। पर आप के शिकार होने वाले काफिर नहीं। सेक्यूलरवाद की हिप्पोक्रेसी का चोंगा नहीं पहनते हम। साफ़ मन से , साफ़ बात करते हैं। इस्लामिक आतंकवाद और जेहाद के खिलाफ हैं हम। उसे नष्ट करना चाहते हैं। आप चाहे सवर्ण कहिए , चाहे ब्राह्मण। इस बेवकूफी के झांसे में नहीं आने वाले हम। क्यों कि हम ब्राह्मण भी हैं और सवर्ण भी। इस में शर्म किस बात की भला ? आप को ज़रूर अपने इस्लाम पर शर्म आनी चाहिए कि भारत समेत समूची दुनिया को जहन्नुम बना रखा है , अपने जेहाद और आतंकवाद के दम पर। मैं आप की जगह होता तो इस बिना पर इस्लाम छोड़ देता। पर आप में यह दम कहां ? आप को तो अभी जय भीम , जय मीम कह कर समाज में जहर घोलना है। समाज को तोड़ना है। आप अपना काम कीजिए। मुझे अपना काम करने दीजिए। जिगर मुरादाबादी कह ही गए हैं :

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहाँ तक पहुँचे।


नरेंद्र मोदी के खिलाफ कार्रवाई और सत्ता से च्युत करने के लिए बिन मांगी सलाह


आप देश के एक ज़िम्मेदार नागरिक हैं।  आप को लगता है कि नरेंद्र मोदी और स्मृति ईरानी की डिग्री फर्जी है तो आप को फौरन एक एफ आई आर दर्ज करवानी चाहिए। चुनाव आयोग को शिकायत करनी चाहिए। इन दोनों के चुनाव इस फर्जी डिग्री के बिना पर रद्द हो सकते हैं। फिर मोदी की प्रधानमंत्री की कुर्सी , स्मृति ईरानी का मंत्री पद चुटकी बजाते ही चला जाएगा। कोई माई का लाल नहीं रोक पाएगा। आप की तकलीफ का निवारण हो जाएगा। देश का कल्याण हो जाएगा। कि एक फर्जी डिग्री वाला आदमी प्रधान मंत्री पद से हटा दिया जाएगा। आप जानते ही हैं कि चुनाव में नामांकन के समय शपथ पूर्वक सारी सूचनाएं देनी होती हैं। एक भी सूचना गलत होने पर चुनाव रद्द हो जाता है। पद चला जाता है। जेल हो जाती है। 

इंदिरा गांधी की याद कीजिए कि चुनाव अवैध घोषित होते ही अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्हें लोकतंत्र को दफ़न कर , इमरजेंसी जैसी काली चीज़ पूरे देश पर तामील करनी पड़ी थी। इस दाग से वह मरने के बाद भी छुट्टी नहीं पा सकीं। आज़म खान के साहबजादे का हश्र भी आप के सामने है। और भी ऐसे कई मामले हैं। फिर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े भी आप के लिए खुले हुए हैं। कृपया तुरंत अमल कीजिए। देश का ज़िम्मेदार नागरिक होने का फर्ज अदा कीजिए। फेसबुक पर मुझ जैसे गरीब आदमी से यह सवाल पूछने से बेहतर है , इस कारगर तरीके पर अमल कीजिए। कसम खुदा की बहुत राहत मिलेगी आप को। 

देश में उपस्थित मोदी वार्ड के तमाम मरीज भी बिना किसी उपचार के स्वस्थ हो जाएंगे। और सब से बड़ी बात मोदी के हटते ही राहुल गांधी की ताजपोशी हो जाएगी। वैसे भी राहुल गांधी का अध्ययन बहुत ही उच्चकोटि का है। आखिर मोदी से अकूत नफरत और तमाम सवालों का जवाब और जद्दोजहद राहुल गांधी जैसे उच्चकोटि के विद्वान को प्रधान मंत्री पद पर बिठाने की ही तो है। फिर राहुल गांधी के प्रधान मंत्री बनते ही देश एक फासिस्ट और दंगाई सरकार से छुट्टी पा जाएगा। चारो तरफ दूध की नदियां बहने लगेंगी। चीन , पाकिस्तान , मंहगाई , बेरोजगारी , जी डी पी , जी एस टी , कोरोना जैसी बेशुमार समस्याएं फौरन फुर्र हो जाएंगी। 

राम मंदिर बनना बंद हो जाएगा। बाबरी मस्जिद उसी जगह बनने लगेगी। सी ए ए रद्द हो जाएगा। तीन तलाक और कश्मीर में 370 फिर से बहाल हो जाएगा। राफेल फ्रांस को वापस कर पूरा सौदा रद्द हो जाएगा। चीन और पाकिस्तान से दोस्ती परवान चढ़ेगी। मुस्लिम , दलित जिन पर अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी है , नरेंद्र मोदी ने , चुटकी बजाते ही उस से भी मुक्ति मिल जाएगी। राम राज आ जाएगा। जो मोदी नहीं ला पाया , उच्च कोटि के विद्वान् राहुल गांधी ला देंगे। तमाम समस्याओं का एकमात्र हल , एकमात्र इलाज नरेंद्र मोदी हटाओ , राहुल गांधी लाओ ही तो है। मेरी बात पर यकीन न हो तो वामपंथी बुद्धिजीवियों से इस बाबत परामर्श ले लीजिए। वह भी यही मशविरा देंगे। यही तजवीज करेंगे। बल्कि वेबसाइट वगैरह बना कर फंडिंग , अपील , आंदोलन जैसे काम भी युद्धस्तर पर करवा देंगे। 

दलित और मुसलमान वैसे भी वामपंथी बुद्धिजीवियों को बहुत सूट करते हैं। जय भीम , जय मीम जैसे नारे की ईजाद उन्हों ने ही तो की है। मोदी के प्रधान मंत्री बनते ही यह नारा फलित भी बहुत हुआ है। यक़ीन न हो तो सी ए ए और फिर शहर-दर-शहर शाहीनबाग और फिर उपद्रव याद कर लीजिए। दिल्ली के दंगे और ताहिर हुसैन की छत पर युद्ध जैसी तैयारी और उस का अमल याद कर लीजिए। बातें बहुतेरी हैं जो फिर कभी। अभी तो मित्र आप फौरन से पेस्तर नरेंद्र मोदी की फर्जी डिग्री के खिलाफ कार्रवाई कीजिए। 

एफ आई आर , चुनाव आयोग , हाई कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट जैसे कुछ रास्ते आप को मैं ने बता ही दिए हैं। फिर इन दिनों इन सब काम के लिए दौड़ , धूप भी नहीं करनी पड़ती। सब कुछ घर बैठे ही आन लाइन ही मुमकिन हो गया है। नाकाबिल , निकम्मे और दंगाई नरेंद्र मोदी ने इतना तो कर ही दिया है कि आप घर बैठे ही मोदी की जड़ खोद कर उसे उखाड़ कर फेंक सकते हैं। फेसबुक पर , ट्वीटर , इंस्टाग्राम , वेबसाइट , ब्लॉग , यूट्यूब आदि-इत्यादि पर उस की ऐसी-तैसी कर सकते हैं। हाई कोर्ट , सुप्रीम कोर्ट , एफ आई आर , आंदोलन आदि घर बैठे ही , सब कुछ। आप लोग पत्रकार भी हैं , सब कुछ जानते ही होंगे। फिर भी मित्रवत बता दे रहा हूं। बिन मांगी राय दिए दे रहा हूं। अब राय मानना , न मानना आप के विवेक , आप की सुविधा पर है। कोई बाध्यता नहीं है। आप को जो सूट करे , वही कीजिए। पर जैसे भी हो हटाइए , इस सूट-बूट की सरकार को। बहुत हो गया। अब देखिए कि कितने तो आप्शन बता दिए हैं , मोदी को बरबाद करने के लिए। सो गाल बजाना छोड़ कर , कुछ कारगर कार्रवाई करें। हवाई फ़ायर कब तक करते रहेंगे ? हवाई फ़ायर से दुश्मन पर कभी विजय हासिल नहीं होती। और आप जैसे लोग बीते 6 बरस से निरंतर हवाई फ़ायर में व्यस्त दिख रहे हैं। यह गुड बात नहीं है।  अब से सही अपने-अपने ज्ञान चक्षु खोल लीजिए। 

आमीन !


Tuesday, 6 October 2020

जातीय राजनीति के नैरेटिव में फंसा हांफता , बदबू मारता विपक्ष


इन दिनों एक नया नैरेटिव रचा जा रहा है , खास कर कांग्रेस द्वारा कि योगी सरकार दलित विरोधी है। इसी हाथरस समेत तमाम जगह दलित स्त्रियों से बलात्कार की घटनाएं बढ़ गई हैं। यह हाल तब है जब दलित स्त्रियों के साथ सब से ज़्यादा बलात्कार कांग्रेस राज में ही हुए हैं। क्या मायावती राज में दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार नहीं हुए कि मुलायम और अखिलेश राज में नहीं हुए ? मुलायम राज में तो खुद मायावती के साथ क्या क्या नहीं हुआ। अगर अटल बिहारी वाजपेयी न होते तो मायावती की लाज और जान दोनों नहीं बची होती। सच यही है कि तब सपाई गुंडे मायावती की हत्या पर ही नहीं बलात्कार पर भी आमादा थे।  तो क्या यह लोग दलित विरोधी नहीं थे ?

याद कीजिए अभी दो महीने पहले जब कुख्यात हत्यारा विकास दुबे पुलिस इनकाउंटर में मारा गया तो कांग्रेस , सपा , बसपा कहने लगे कि योगी सरकार ब्राह्मण विरोधी है। चुन-चुन कर ब्राह्मणों को मरवा रही है। यही नहीं कभी तिलक , तराजू और तलवार की नारा लगाने वाली मनुवाद का नैरेटिव रच कर ब्राह्मणों को अपमानित करने वाली मायावती तो परशुराम की सब से बड़ी प्रतिमा लगाने की बात करने लगीं। अपने को बहुजन समाज का नेता बताने वाली , अपने चार बार के कार्यकाल में सिर्फ दलितों का ही स्मारक और पार्क बनवाने वाली मायावती ब्राह्मणों की सब से बड़ी हितैषी बन कर उपस्थित हो गईं। सतीश मिश्रा की चाणक्य और कानूनी बुद्धि से सत्ता सुख लूटने वाली , भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाने से निरंतर बची रहने वाली मायावती ने तब तो किसी ब्राह्मण तो छोड़िए , किसी पिछड़े की भी प्रतिमा या उस के नाम से पार्क बनवाने की ज़रूरत नहीं समझी। 

मायावती को छोड़िए मुलायम और अखिलेश की सरकार में ब्राह्मण निरंतर अपमानित रहे लेकिन अब अखिलेश भी परशुराम जयंती की छुट्टी सपा ने घोषित की , यह बताते हुए परशुराम की प्रतिमा बनाने की बात करने लगे।  सपा , बसपा , कांग्रेस का ज़मीनी राजनीति से निरंतर कटते जाने का नतीजा है। कौन ब्राह्मण , किसी अपराधी ब्राह्मण की इज्जत करता है ? रावण भी ब्राह्मण था , कौन ब्राह्मण उस की पूजा करता है भला।  परशुराम की भी ब्राह्मणों में कितनी स्वीकृति है , ब्राह्मण ही जानते हैं। विवादित व्यक्ति की स्वीकृति कोई समाज नहीं देता। 

यह ठीक है कि योगी में भी ठाकुरवाद का तत्व है। भरपूर है। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है। अच्छा चंद्रशेखर क्या ठाकुरवादी नहीं थे ? कि वीरबहादुर सिंह ठाकुरवादी नहीं थे ? राजनाथ सिंह ठाकुरवाद नहीं करते ? क्या नरेंद्र मोदी भी आहिस्ता से ही सही बैकवर्ड कार्ड नहीं खेलते ? और तो और रामप्रकाश गुप्ता की याद कीजिए। बेहद लाचार और डमी टाइप के मुख्य मंत्री थे। कल्याण सिंह को ठिकाने लगाने के लिए राजनाथ सिंह के लिए जगह बनाने के लिए वह डमी मुख्य मंत्री बनाए गए थे , कुछ समय के लिए। रामप्रकाश गुप्ता ठीक से कुछ सुन नहीं पाते थे , समझ नहीं पाते थे।  लेकिन गुप्तावाद ठीक से समझते थे। इतना कि उन दिनों खुल्ल्मखुल्ला कहा जाता था कि गुप्तकाल चल रहा है। 

अरविंद केजरीवाल को लीजिए। ज़बरदस्त बनियावादी हैं। आशुतोष को जब राज्य सभा नहीं मिली तो एक न्यूज़ा चैनल पर एनीमेशन सटायर वाले शो में आशुतोष की तरफ से अरविंद केजरीवाल से पूछा जाता था कि मेरे गुप्ता की स्पेलिंग में कौन सी कमी थी। तब जब कि आम आदमी पार्टी से जो लोग राज्य सभा भेजे गए , उन में दो लोग बनिया ही थे।  ऐसे ही बहुत कम राजनीतिज्ञ हुए हैं जो जाति-पाति से विरक्त थे। वह मदन मोहन मालवीय , महात्मा गांधी , सरदार पटेल , राजेंद्र प्रसाद , जवाहरलाल नेहरू , लालबहादुर शास्त्री , अटल बिहारी वाजपेयी और थे। वह गोविंद वल्लभ पंत , वह सुचेता कृपलानी , सम्पूर्णानंद , नारायणदत्त तिवारी और थे। जो जातियों के खाने में जीने से परहेज करते थे। एक समय कमलेश्वर जैसे लेखक ने कांग्रेस के लिए एक नारा लिखा था , न जाति पर न पाति पर , मोहर लगेगी हाथ पर। लेकिन कांग्रेस ने ही राजनीति में जाति-पाति का बिस्मिल्ला किया। बाद में सामाजिक न्याय के नाम पर जातियों का दुर्ग बनाया गया। सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातियों का ऐसा चक्रव्यूह रचा गया कि जातिवाद बदबू मारने लगा है। 

अच्छा मुलायम और अखिलेश में भरपेट यादववाद नहीं है। यादववाद की कितनी आग मूती है बाप , बेटे ने क्या यह भी किसी को बताने की ज़रूरत है ? हर थानेदार यादव , हर ठेकेदार यादव। हर प्राइज पोस्टिंग पर यादव। मायावती ने भी दलितवाद की पराकाष्ठा नहीं दिखाई क्या ? मायावती राज में तो आलम यह था कि सरकारी सेवाओं में सवर्ण और दलित किसी सेना की तरह आमने-सामने थे। लोग भूल गए हैं क्या ? 

पर यह लोग ब्राह्मण विरोधी नहीं हुए। योगी हो गए। अजब है यह नैरेटिव भी। हिंदू  , मुस्लिम दंगों से पेट नहीं भरा तो अब जातीय घृणा फैलाने का यह कुचक्र भी खूब है। सत्ता पाने की इस हवस का कोई समाज करे भी क्या। सच यह कि भारतीय राजनीति में धर्म और राजनीति एक कटु सत्य है। जिस का बीज कांग्रेस ने ही बोया। अब सब के सब यह फसल काट रहे हैं। कोई किसी से पीछे नहीं है। हां , भाजपा चूंकि हिंदुत्व के सपने में जीती और मरती है सो वह हिंदुओं के बीच जातीय संघर्ष नहीं चाहती। हरगिज नहीं चाहती। और अब तो केंद्र में सत्ताशीन होने के बाद मुस्लिम तुष्टिकरण के कांग्रेस के सारे रिकार्ड भी भाजपा ने तोड़ दिए हैं।

लेकिन मुस्लिम समाज के भीतर भाजपा और संघ के लिए इतनी नफरत और इतना जहर भरा है कि भाजपा का मुस्लिम तुष्टिकरण प्रभावी नहीं हो पा रहा। बस इतना ज़रूर है कि इस तुष्टिकरण से मुस्लिम समाज थोड़ा माइल्ड है। नहीं भाजपा विरोध की जो चिलम कांग्रेस ने मुसलमानों के बीच सुलगा रखी है , अब तक देश में कितनी बार आग लग चुकी होती। फिर हिंसा संभाले नहीं संभलती। आप तबलीगी जमात के मौलाना साद की ही याद कीजिए। तमाम हो हल्ले के बाद भी क्या हुआ इस का ? दिल्ली दंगों में भी तमाम पुख्ता सुबूत के बावजूद पुलिस बहुत संभल-संभल कर चल रही है। बेंगलोर याद कर लीजिए। क्या हुआ ? 

इतना कुछ हो जाने पर भी पी एफ ए पर प्रतिबंध क्यों नहीं लग रहा। तो इस लिए कि मुसलमान ही नहीं मोदी से डरते , मोदी भी मुसलमानों से डरते हैं। उन की हिंसा से डरते हैं। आप कहते रहिए अहिंसा परमो धर्म : पर  दुनिया में दो समाज ऐसे हैं जो खुल्ल्मखुल्ला हिंसा की बात करते हैं। एक इस्लाम को मानने वाला मुस्लिम समाज दूसरे , वामपंथी समाज। आप अहिंसा परमो धर्म : कहते हैं , वह हिंसा परमो धर्म : कहते हैं। कहते ही नहीं करते भी रहते हैं। करते रहेंगे।  

अंबेडकर ने काठमांडू में अपने एक भाषण में कहा था कि दुनिया में दो लोग ऐसे हैं जो सामाजिक समता की बात करते हैं। एक बुद्ध , दूसरे कार्ल मार्क्स। लेकिन सामाजिक समता के लिए दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। बुद्ध सत्य और अहिंसा के रास्ते सामाजिक समता की बात करते हैं। जब कि कार्ल मार्क्स हिंसा और तानाशाही के रास्ते। क्या है कि महाभारत में दुर्योधन की मांग कहीं से नाजायज नहीं थी। अगर दुर्योधन कहता था कि मेरा बाप अंधा है तो इस में मेरा क्या कुसूर ? वह ठीक कहता था। पर दुर्योधन ने अपनी मांग मनवाने के लिए के जो छल-कपट किए , शकुनि , जुआ , द्रौपदी का चीर हरण , लाक्षागृह आदि के रास्ते अपनाए वह ठीक नहीं था। इसी लिए वह मारा गया और कि सभ्य समाज उसे आज भी दोषी मानता है। 

गांधी अनायास ही नहीं कहा करते थे कि साध्य ही नहीं , साधन भी पवित्र होने चाहिए। पर दुर्भाग्य कि आज कांग्रेस और अन्य विपक्ष सत्ता हासिल करने के लिए कभी हिंदू , मुसलमान कभी ब्राह्मण , ठाकुर , कभी ठाकुर , दलित का कुचक्र रच कर समाज को निरंतर बांटने के काम में लगे हुए हैं। हांफ रहे हैं सत्ता पाने के लिए पर नागफनी जैसी नफरत और जहर बोने में लगे हैं। गांधी का कहा भूल गए हैं , साध्य ही नहीं , साधन भी पवित्र होने चाहिए। दुर्योधन की राह चल कर नित नए लाक्षागृह बनाने में लगे हुए हैं। इतना कि राजनीति और अपराध के बीच की रेखा भूल गए हैं। यह गुड बात तो नहीं ही है। 

बताइए कि हाथरस में पीड़िता के परिजनों को सरकार से 50 लाख रुपए दिलवाने के लिए पी एफ आई को 100 करोड़ की विदेशी फंडिंग हुई। अकेले मारीशस से 50 करोड़ की फंडिंग। ई डी के हवाले से यह खबर आई है। किसी चंडूखाने से नहीं। जाहिर है यह फंडिंग हाथरस में जातीय दंगे करवाने के लिए ही हुई। पी एफ आई , भीम आर्मी की साज़िश भी सामने आ रही है। जिसे कांग्रेस जैसी पार्टी कवर कर रही थी। गज़ब है यह सत्ता पिपासा भी।  जातीय राजनीति की यह इंतिहा है। 


Sunday, 4 October 2020

क्षमा करें , हाथरस में प्रेमचंद की कहानी कफ़न के घीसू और माधव याद आ गए हैं

हाथरस की पीड़िता ने बयान दिया था कि संदीप ने उस का गला दबाया। अब कंफ्यूजन यह है कि कौन वाला संदीप। संदीप पीड़िता के भाई का भी नाम है और जेल में बंद आरोपी का भी नाम संदीप है। जिस तरह पीड़िता के गांव के कुछ लोगों के वीडियो और कुछ पत्रकारों के आडियो तथा पीड़िता के भाई संदीप , माता , पिता के आडियो वायरल हो रहे हैं , वह कुछ और कहानी कह रहे हैं। भाई संदीप पर संदेह गहरा रहा है। 

तिस पर कोढ़ में खाज यह कि विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के लोगों ने हाथरस को राजनीतिक तीर्थाटन का केंद्र बना लिया है , यह तीर्थाटन भी सवाल तो खड़ा करता है। अगर मुख्य मंत्री योगी पर हमला ही एक कारण होता तो यह राजनीतिक तीर्थयात्री बलरामपुर और आजमगढ़ की तरफ भी कूच कर गए होते। पर सिर्फ़ हाथरस में ही खूंटा गाड़ कर तंबू तान लेना बताता है कि मसला योगी पर हमला भर नहीं है। कुछ और ही है। 

पीड़िता के परिवारीजन की धन की लालसा ने इस में और इजाफा किया है। पीड़िता के भाई संदीप ने तो एक चैनल की रिपोर्टर से भी आन कैमरा , अपनी खुशी छलकाते हुए कहा कि आप भी कुछ दीजिएगा तो मैं ले लूंगा। रिपोर्टर ने असल में पूछ लिया था कि राहुल गांधी ने कितने का चेक दिया है ? तो संदीप धनराशि बताने से कतरा गया और बोला कि आप भी कुछ देंगी तो ले लूंगा। संदीप जिस बेतकल्लुफ अंदाज़ में यह बोल रहा था , रिपोर्टर से कि प्रेमचंद की कहानी कफ़न के घीसू और माधव याद आ गए। आप को याद ही होगा कि कफ़न के घीसू और माधव भी दलित हैं। घर की स्त्री के मर जाने पर कफ़न आदि का इंतज़ाम भी वह नहीं कर पाते। तो गांव के लोग कफ़न आदि के इंतज़ाम खातिर सहयोग करते हैं। और घीसू , माधव कफ़न के लिए मिले पैसों से शराब की दावत का इंतज़ाम कर बैठते हैं। 

इतना ही नहीं एक चैनल की रिपोर्टर से जिस ठाट से संदीप बहुत विस्तार से आगे की रणनीति डिसकस कर रहा है , वह आडियो भी हैरत में डालता है। लगता ही नहीं कि वह शोक में है। उस की बहन के साथ बलात्कार भी हुआ है। बहरहाल , रात में अफरा तफरी में चिता जलने के बाद मामला बिगड़ते देख उत्तर प्रदेश सरकार ने दूसरे ही दिन सहायता राशि दस लाख से बढ़ा कर पचीस लाख करते हुए , एक व्यक्ति को नौकरी और पक्का मकान का ऐलान कर ही दिया था। जिसे कुछ पत्रकार और राजनीतिक पचास लाख तक बढ़वाने का लालच दे कर परिवारीजन को बरगलाने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं। 

नतीज़तन मामला अब भड़क कर चिंगारी से शोला बन ही चुका है। सारे आरोपी जेल जा चुके हैं। एस आई टी की जांच चल ही रही है।  पुलिस के तमाम लोग निलंबित हो चुके हैं। सी बी आई इंक्वायरी की सिफारिश हो चुकी है। सभी पार्टियों के लोग राजनीतिक और आर्थिक मदद दे चुके हैं। फिर भी परिवारीजन जाने कौन सा इंसाफ अभी भी मांग रहे हैं। फिर समाज और सरकार को ब्लैकमेल करने की भी एक सीमा होती है। इस ब्लैकमेल की बिसात पर एक न्यायिक जांच की मांग उन की अभी शेष ज़रूर है। 

हो सकता है आर्थिक मदद के झोंक में झुलस कर वह हैदराबाद वाला न्याय नहीं मांग पा रहे हों। जो भी हो अब परिवारीजन को इंसाफ़ के लिए अब दो ही रास्ते शेष रह गए हैं। या तो आरोपियों के साथ हैदराबाद हो जाए , विकास दूबे हो जाए या फिर संसद में क़ानून बना कर बलात्कारियों के लिए इस्लामिक क़ानून तय कर दिए जाएं। सीधे चौराहे पर खड़ा कर गोली मार दी जाए , या फांसी दे दी जाए। नो कोर्ट , नो सुनवाई। या फिर जैसे इन दिनों सोशल मीडिया पर चीन में माओ द्वारा एक बलात्कारी को तीन घंटे के भीतर तलाश कर गोली मार देने की कहानी चल रही है। वह तानाशाही हो जाए। हां , फिर पीड़िता के परिवारीजन को आर्थिक मदद का तिलिस्म खत्म होने का खतरा हो तो हो। मानवाधिकार के कुत्ते भौंके तो भौंके। जो भी हो , पर यह हाथरस , बलरामपुर और आजमगढ़ के फर्क का कोढ़ तो मिट ही जाना चाहिए। बहुत हुआ। बहुत हुआ चुनी हुई चुप्पी , चुने हुए विरोध की आंच में समाज में आग लगाने की रवायत। इस रवायत में आग लगा कर बलात्कारियों को गोली मार दीजिए। जो भी संगठन और उस के लोग इस आग को सुलगाने में कुसूरवार पाए जाएं , उन्हें भी गोली मार देनी चाहिए। 

असल में योगी सरकार भी इस में बराबर की दोषी है। सी ए ए के दंगाइयों की फोटो वाले पोस्टर लगा कर योगी सरकार कोरोना की आड़ ले कर सो गई। अगर इन दंगाइयों से वसूली हो गई होती , इन्हें सज़ा मिल गई होती तो ऐसे अपराधियों के हाड़ कांप जाते। एक कड़ा संदेश चला गया होता। तो आए दिन यह और ऐसी वारदातें न देखने को न मिलतीं। शासन सिर्फ घोषणाओं और पोस्टरों से नहीं चलता। इकबाल और धमक से चलता है। इकबाल और धमक होता तो हाथरस पुलिस रात के अंधेरे में , परिवारीजनों की बिना सहमति के पीड़िता की चिता नहीं जलाती। इकबाल और धमक होता तो हाथरस प्रशासन इस बात से नहीं डरता कि सुबह तो पीड़िता की चिता पर रोटी सेकने वाले आ जाएंगे। आग लगाने वाले आ जाएंगे। तूफ़ान आ जाएगा। अरे जैसे आप अब हाथरस को सील कर रहे हैं , ऐसे ही सीमाएं सील कर , परिवारीजन की सहमति से दिन में चिता जलवाते। हो सकता है , कुछ बवाल होता , पर ऐसा तो नहीं ही होता। प्रशासन और सरकार की नाक बची रहती। हनक बनी रहती।

Saturday, 3 October 2020

धनंजय सिंह के गीतों की गंगाजली में यातना की इबारत बहुत है


हिंदी में बहुत कम गीतकार हैं जिन के गीत पढ़ने में भी गीत लगते हैं और सुनने में भी। उन में धनंजय सिंह एक हैं। नहीं बहुतेरे गीतकार हैं जो सिर्फ मंचीय हैं। उन के वही गीत पढ़ने बैठिए जिन को सुन कर आप उछल गए होते हैं , पढ़ते ही बैठ जाते हैं। यह सोचते हुए कि क्या यह वही गीत है ? इस से अच्छा तो इसे पढ़ा ही नहीं होता। इसी तरह बहुतेरे गीतकार ऐसे हैं जिन के गीत पढ़ने में बहुत आनंद देते है पर वही गीत उस गीतकार से सुनिए तो लगता है किसी और आदमी से तो नहीं भेंट हो गई। पर धनंजय सिंह के गीत चाहे पढ़िए , चाहे उन से सुनिए दोनों ही स्थिति में आनंद विभोर करते हैं। धनंजय सिंह के गीतों की गंगाजली में जैसे गीतों की आत्मा वास करती है। जैसे गंगा के जल में तमाम नदियों का जल आ-आ कर मिलता रहता है और गंगा विशाल होती जाती है। ठीक उसी तरह धनंजय सिंह के गीतों में भी कई-कई रंग मिलते हैं और उन के गीत विराट होते जाते हैं। वह गीत का पाठ ऐसे करते हैं गोया आप को अपने दिल में बिठा कर गीत सुना रहे हों। धनंजय गलेबाजी नहीं करते। गीत ही उन का गला बन जाते हैं। मद्धम सुर में। जैसे नदी का कल-कल। जैसे पायल की रुनझुन। जैसे मंदिर की लौ। जैसे मां की लोरी। जैसे रास्ते में कांटे की चुभन। ऐसे ही हैं धनंजय के गीत और उन का पाठ। धनंजय के गीतों की गंगाजली उन की गगरी से कभी छलकती नहीं। क्यों कि वह अधजल नहीं है। पूरी-पूरी भरी हुई है। तभी तो वह लिख पाते हैं :

क्या खोया 

क्या पाया वाला 

गणित नहीं आया 

जो अनुगूंज 

उठी मन में 

मैं ने उस को गाया 

मन के अनुगूंज को गाने वाले धनंजय सिंह के जीवन में समायी यह सरलता ही है जो उन के गीतों में बारंबार उतर-उतर आती है। बरखा की तरह नहलाती है। मन को। वनस्पतियों को। और पानी थरथरा जाता है। 

झाँकते हैं

फिर नदी में पेड़

पानी थरथराता है

जाने यह पेड़ के नदी में झांकने की अकुलाहट है या पानी के थरथराने की यातना और वह लौट-लौट आते हैं अपनी जड़ों की ओर। 

घर की देहरी पर छूट गए

संवाद याद यों आएँगे

यात्राएँ छोड़ बीच में ही

लौटना पड़ेगा फिर-फिर घर

ठीक वैसे ही जैसे वह एक गुनगुनाती हुई ख़ुशबू की तरह मीना कुमारी को याद करते हैं। ऐसे गोया खुशबू ठहर जाती है। 

रोज़ रात को तीन बजे

एक ट्रेन मेरे दिल पर से गुज़रती है

और एक शहर मेरे अन्दर जाग कर सो जाता है

कहीं दूर से एक आवाज़ आती है

एक चाँद छपाक से पानी में कूद कर अँधेरे में खो गया है

समुद्र का शोर

लहरें गिनने में असमर्थ हो गया है

दिन के टुकड़े और रात की धज्जियों को

गिनना असम्भव है मेरे लिए

सिर्फ एक ख़ुशबू गुनगुनाती फिर रही है अभी भी-

'सरे राह चलते-चलते'

ख़ुशबू ठहर गई है

और एक सूरज और एक शहर की आँखों में

समुन्दर उतर आए हैं !


अब भी रोज़ रात को

एक ट्रेन मेरे दिल से गुजरती है

और एक कला की देवी अपनी कला को

अमृत पिला जाती है ठीक उसी समय !

दरअसल धनंजय सिंह के गीतों की गंगाजली में यातना की इबारत बहुत मिलती है। ऐसे जैसे यातना ही उन के गीतों की धरती है। रोटी के दाम लुटने की यातना , इस यातना की दीवठ में जल कर ही लिखा जा सकता है :

हम ने तो 

अनुभव के हाथ 

बेच दिए हैं मीठे सपने 


सूरज के छिपने के बाद 

बहुत हुए मौलिक अनुवाद 


सुबह 

लिखे पृष्ठ लगे छपने !


स्वर्ण-कलश 

हाथ से छुटे 

रोटी के दाम हम लुटे 


ऊंचे-ऊंचे 

सार्थक मनोबल 

बैठ गए हैं माला जपने 

मन की गहरी घाटी में उतर कर ही वह बताते हैं ; सूरज रोज़ सुबह आता है शिखरों तक लेकिन / कभी तलहटी तक आ पाते नहीं सवेरे हैं। धनंजय के यहां कभी पानी थरथराता है तो कभी इमरजेंसी की यातना में ही सही नीली झील का हिलना भी बंद हो जाता है। 

बहुत दिनों से यहाँ कुछ भी नहीं हुआ –-

स्नान से लेकर वस्त्र हरण तक ।

हुआ है तो सिर्फ़ बन्द होना

नीली झील के पानी की थरथराहट का

या फिर

और भी नीले पड़ते जाना

झील के काईदार होंठों का ।


लिख-लिख गीत नए / दिन क्यों बीत गए / चौबारे पर दीपक धर कर / बैठ गई संध्या / एक-एक कर तारे डूबे / रात रही बंध्या जैसा बंद लिखने वाले धनंजय सिंह से जब कभी मिलिए तो वह चंदन वन की तरह महकते मिलेंगे। उन का कविता पाठ सुनेंगे तो आप लहकने लगेंगे। बहुत कम कवि देखे हैं मैं ने जो अपनी रचना के अलावा अन्य कवियों का रचना पाठ भी उसी तन्मयता से करते मिलें , ऐसे जैसी अपनी रचना। शिवमंगल सिंह सुमन निराला की राम की शक्तिपूजा का पाठ इतना विह्वल कर करते थे कि पूछिए मत। धनंजय सिंह भी भारत भूषण की राम की जल समाधि का पाठ इस तन्मयता से और सस्वर करते हैं कि राम की जलसमाधि जैसे आप के भीतर उतरती जाती है। सामने राम की जलसमाधि का जैसे सिनेमा चलने लगता है। दृश्य दर दृश्य :


आगे लहरें बाहर लहरें, आगे जल था, पीछे जल था,

केवल जल था, वक्षस्थल था, वक्षस्थल तक केवल जल था।

आप जैसे जल में डूब जाते हैं। बस समाधि भर नहीं लेते। मई , 1981 में जब कादम्बिनी , दिल्ली के दफ्तर में पहली बार धनंजय सिंह से मिला था तब उस पहली ही मुलाकात में उन्हों ने अपने स्नेह के जल में भिगो दिया था। उन के स्नेह का यह जल मुझे बार-बार उन से मिलवाता रहा। वह मेरे संघर्ष के दिन थे। उन संघर्ष के दिनों में धनंजय सिंह जैसे अपने स्नेह जल से मेरे संघर्ष को सोख-सोख लेते थे। वह जैसे मन ही मन अपने ही गीत में पूछ लिया करते थे ; दहके हुए पलाश वनों में / प्यासा कंठ लिए ओ हिरना / क्यों फिरता है ? लेकिन मैं निरुत्तर रहता। लेकिन जैसे वह खुद ही जैसे आश्वासन सा देते ; एक दीपक बन / स्वयं हम / स्नेह जीवन में भरेंगे / और जिन के मन / अंधेरों से घिरे हैं / आज अंतस ज्योति से उन के भरेंगे। ' और उन के इस स्नेह दीपक से मेरे मन का अँधियारा डर जाता। नंगे पांव सपनों के गांव जाने के गीत ऐसे ही तो फूटते हैं। जल्दी ही दिल्ली में मैं सर्वोत्तम रीडर्स डाइजेस्ट में नौकरी करने लगा। बाद में जनसत्ता जब निकला तो जनसत्ता में आ गया। फिर लखनऊ आ गया । पर हमारी मित्रता और संपर्क कभी टूटा नहीं । मेरी कई किताबों की समीक्षा भी कादम्बिनी में धनंजय जी ने छपवाई और सहर्ष । बिना किसी इफ बट, बिना किसी नाज़-नखरे के । अब वे कादम्बिनी से अवकाश ले चुके हैं लेकिन अपने गीतों और मित्रों से नहीं।  कुछ साल पहले जब वह एक कार्यक्रम में लखनऊ आए तो हमारे घर भी आए । तब  हम लोगों ने बहुत सारी नई पुरानी यादें ताज़ा कीं और आनंद से भर गए। चालीस साल पुरानी हमारी दोस्ती फिर से ताज़ा हुई । हमारे दुःख सुख के साथी धनंजय सिंह की बड़ी खासियत यह है कि वह बेजमीरी कभी नहीं जिए। सर्वदा ज़मीन से जुड़े रहे। जीवन में भी , गीतों में भी पत्रकारिता में भी। पत्रकारों पर उन की कुछ समय पहले लिखी एक टिप्पणी पढ़िए फिर समझिए धनंजय सिंह को :

पहले, जब पत्रकारों की औकात साइकिल रखने की नहीं थी, तब एक व्यक्ति ने खुश हो कर एक पत्रकार को साइकिल भेंट की। उस में कैरियर नहीं था। कुछ दिनों बाद पत्रकार कैरियर लगवाने शॉप पर गया। दुकानदार ने कैरियर तो लगा दिया, लेकिन साइकिल से स्टैंड हटा दिया। पत्रकार ने कारण पूछा, तो दुकानदार बोला, " कैरियर और स्टैंड दोनों एक साथ नहीं हो सकते। 'स्टैंड' लोगे, तो समझो 'कैरियर' गया और अगर 'कैरियर' बनाओगे तो 'स्टैंड' नहीं ले सकते!"

 

धनंजय सिंह का यह लिखा , उन की बात किस्सा या लतीफा भले लगे किसी को लेकिन वह ठीक ही कह रहे हैं कि पत्रकारिता में कैरियर और स्टैंड दोनों एक साथ नहीं चल सकते । लेकिन यह बात अब पुरानी हो चुकी है । अब तो आलम यह है धनंजय जी , कि पत्रकारिता में नौकरी और स्टैंड भी अब एक साथ नहीं चल सकते । पत्रकारिता अब बेजमीरी का दूसरा नाम है । बताता चलूं कि हिंदुस्तान टाइम्स ग्रुप की प्रतिष्ठित पत्रिका कादम्बिनी में बरसों-बरस रहे धनंजय सिंह ने सिर्फ एक इस बात से  इस्तीफ़ा दे दिया था कि उन्हें बायोमेट्रिक अटेंडेंस के लिए कहा गया था। तब जब कि उस वक्त कादम्बिनी के संपादक न सिर्फ़ कवि थे बल्कि धनंजय सिंह के पुराने मित्र थे। धनंजय सिंह तभी तो लिख पाए हैं :

पाठ कभी दुनियादारी का 

हमें नहीं आया 

हम ने केवल जिया वही 

जो अपने मन भाया 

शायद इसी लिए धनंजय सिंह के सुबह का सूरज गहन कुहासा चीर कर जीत जाता है। ऊपर के तल से कोई सेवार हटा कर गीत नया फूटता है। और वह लिखते हैं : हम तो / गीतों के सागर में / रोज नहाते हैं / भावों के / अछोर छोरों तक / आते-जाते हैं। और अब जब धनंजय सिंह अमृत महोत्सव मना रहे हैं तो हम उन्हें हार्दिक बधाई देते हुए यही कामना और यही प्रार्थना करते हैं कि गीतों के सागर में वह नित ऐसे ही नहाते रहें और उस के नेह में पूरी दुनिया को अपने इस गीत की तरह सर्वदा नहलाते रहें। मन को उलझाते रहें। धनंजय के गीतों की गंगाजली ऐसे ही भरी रहे। सर्वदा-सर्वदा। 

तुमने मेरे मन को ऐसे छू दिया

गानवती ज्यो कोई छू दे , सोये हुए सितार को

गूंगा मन जय-जयवंती गाने लगा ।


जाने क्या था

ढाई आखर नाम में

गति ने जन्म ले लिया

पूर्ण विराम में


रोम-रोम में सावन मुसकाने लगा ।


खुली हँसी के

ऐसे जटिल मुहावरे

कूट पद्य जिनके आगे

पानी भरे


प्रहेलिका-संकेतक भटकाने लगा ।


बिम्ब-प्रतीक न जिसका

चित्रण कर सकें

वर्ग-पहेली जिसे न हम

हल कर सकें


कोई मन को ऐसा उलझाने लगा ।




लेकिन रामसेवक जी का वह सूत्र मेरे पास अभी भी बहती नदी की तरह उपस्थित है


रामसेवक श्रीवास्तव की चर्चा गोरखपुर में कभी-कभी देवेंद्र कुमार करते थे। हरिहर सिंह और माधव मधुकर भी। यह लोग रेलवे में थे। और बड़े फख्र से बताते थे कि रामसेवक भी पहले रेलवे में थे। रामसेवक जी की पत्रिका रचना का भी ज़िक्र होता ही था। परमानंद श्रीवास्तव भी रामसेवक जी का ज़िक्र करते थे। अकसर यह लोग किसी की चर्चा में उस की शिकायत भी बतिया ही जाते थे। ख़ास कर हरिहर सिंह और माधव मधुकर। लेकिन रामसेवक जी की किसी ने कभी कोई शिकायत नहीं की। रामसेवक जी का गांव गगहा , मेरे गांव बैदौली से तीन-चार किलोमीटर पर एक ही सड़क पर है। लेकिन तब तक गांव से उन का नाता लगभग टूट चुका था। 1981 में जब दिल्ली पहुंचा था , तब दिनमान में पहले व्यक्ति रामसेवक श्रीवास्तव से ही मिला था , गोरखपुर का हवाला दे कर। पहली ही मुलाक़ात में रामसेवक जी ने मुझे अपना बना लिया। भोजपुरी में बतिया कर। उन्हीं दिनों वह प्रेस इंक्लेव के अपने फ़्लैट में शिफ्ट हुए थे। अपने घर भी ले गए। अकसर घर बुलाते रहते थे। मैं जाता भी था। अकसर इतवार को। खूब खुल कर मिलना और खिलाना , उन की जैसी आदत थी। उन के घर की लाइब्रेरी भी बड़ी समृद्ध थी। बहुत सी किताबें उन से ले कर पढ़ीं। रामसेवक जी ने उन्हीं दिनों सेकेण्ड हैंड फिएट भी खरीदी थी। लेकिन ज़्यादातर चलते वह स्कूटर से ही थे। पूछने पर बोले , दफ्तर से मिलने वाले कार अलाउंस के लिए फिएट भी खरीद ली है। लेकिन रोज-रोज एफोर्ड कर पाना कठिन है। रामसेवक जी की जीवन साथी नीलम सिंह जी भी बड़ी आत्मीयता से मिलती थीं। नीलम जी भी दिल्ली के माया व्यूरो में थीं। माया और मनोरमा दोनों का काम देखती थीं। नीलम जी ने ही माया के तब के व्यूरो चीफ भूपेंद्र कुमार स्नेही से मिलवाया था। स्नेही जी ने माया के लिए मुझ से लिखवाया भी। राम सेवक जी अमूमन नीलम जी को उन के कनाट प्लेस वाले दफ्तर छोड़ते हुए ही दिनमान जाते थे और लौटते समय भी नीलम जी को ले कर ही लौटते थे। एक बार उन से उन की कविता पर बात की तो बोले , ' पुरानी बात हो गई। ' जम्हाई लेते हुए बोले , ' पत्रकारिता खा गई कविता। '

रामसेवक जी दिनमान में विशेष संवाददाता थे। इस के पहले दिनमान के विशेष संवाददाता श्रीकांत वर्मा थे। रामसेवक श्रीवास्तव ने श्रीकांत जी को रिप्लेस किया था। राजनीतिक ख़बरों की जैसी समझ रामसेवक श्रीवास्तव को थी , कम लोगों में मैं ने पाई है। रामसेवक जी के पास खबरों की न सिर्फ समझ अदभुत थी बल्कि सूचनाएं भी अप्रतिम। लेकिन वह यहां-वहां राजनीतिकों का कभी दरबार नहीं करते थे। जैसा कि तमाम राजनीतिक संवाददाता और संपादक करते थे। रामसेवक जी सिर्फ़ काम से काम रखते थे। चूंकि दिनमान उन दिनों बहुत ही प्रतिष्ठित पत्रिका थी तो हिंदी बेल्ट के राजनीतिज्ञों में बड़ा मान था उस का। तो इस बहाने रामसेवक जी का भी मान था। दिनमान की उस समय की प्रतिदवंद्वी पत्रिका थी रविवार। दिल्ली में तब रविवार के विशेष संवाददाता उदयन शर्मा थे। उदयन शर्मा , रामसेवक श्रीवास्तव से बिलकुल उलट थे। बिना दस राजनीतिज्ञों से मिले उन का दिन नहीं गुज़रता था। लेकिन रामसेवक जी ने कभी यह सब नहीं किया। रामसेवक जी असल में अज्ञेय की परंपरा के पत्रकार थे। कम बोलना , ज़्यादा लिखना ही रामसेवक जी का ध्येय था। एक बार मैं ने देखा कि कन्हैयालाल नंदन जी , जो तब नए-नए दिनमान के संपादक बने थे , उन की मेज के सामने खड़े थे , उन की कोई रिपोर्ट ले कर। और लगभग उन को उकसाते हुए कह रहे थे कि मुझे इस रिपोर्ट में रामसेवक श्रीवास्तव नहीं दिख रहे। मैं इस में रामसेवक श्रीवास्तव को देखना चाहता हूं। और जब घुमा-फिरा कर यही बात नंदन जी ने दो बार कही तो रामसेवक जी बड़ी विनम्रता से बोले , ' दुबारा भी लिखूंगा तो यही लिखूंगा ! बदल नहीं पाऊंगा। ' नंदन जी रिपोर्ट ले कर चुपचाप चले गए थे। दिनमान में अज्ञेय , रघुवीर सहाय , कन्हैयालाल नंदन के बाद घनश्याम पंकज के साथ भी उन्हों ने काम किया। रघुवीर सहाय और नंदन जी के समय मैं ने भी दिनमान में नियमित लिखा।

एक बार नंदन जी मुझ से , मेरे लिखे से खुश हो कर एक बहुत बड़ा एसाइनमेंट थमा दिए। एसाइनमेंट सुन कर मन मुदित हो गया। पर दूसरे ही क्षण घबराया। मैं उन से तो कुछ नहीं कह पाया। हामी भर कर उन की केबिन से निकल आया। लेकिन बाहर निकल कर मेरे हाथ-पांव फूल गए। मैं दिनमान दफ्तर में वैसे ही इधर-उधर भटक , बैठ रहा था। समझ नहीं आ रहा था क्या करुं , कैसे करुं। कि तभी रामसेवक जी ने इशारे से मुझे बुलाया। गया तो बैठते ही मुझे बधाई देते हुए बोले , ' सुना है आप बागपत जा रहे हैं ,चौधरी चरण सिंह को कवर करने। ' मैं ने धीरे से कहा , ' हां , जा तो रहा हूं। '

' तो इतना घबराए हुए क्यों हैं। ' रामसेवक जी ने मुस्कुराते हुए पूछा और कहा कि , ' यह तो आप के लिए बहुत बड़ा एचीवमेंट है। '

' एक पूर्व प्रधान मंत्री और इतने बड़े नेता को , बागपत को कवर करना थोड़ा कठिन लग रहा है। ' सकुचाते हुए मैं बोला। यह सुन कर रामसेवक जी किंचित गुस्सा हुए और बोले , 'आप तो गोरखपुर की नाक कटवा देंगे !' फिर उन्हों ने प्रोत्साहित करते हुए कहा , ' ऐसा डर उन को लगता है , जिन को लिखने नहीं आता। पर आप तो लिखना जानते हैं। एक से एक रिपोर्ट लिखी हैं आप ने। बिना किसी भय के जाइए। बिना कुछ सोचे जाइए। यह तय कर के बिलकुल न जाइए कि मुझे क्या लिखना है , क्या नहीं लिखना है। कोई आग्रह , पूर्वाग्रह नहीं। ' रामसेवक जी बोलते जा रहे थे , ' किसी नदी की तरह जाइए और नदी की तरह ही लौट कर आइए। जैसे नदी बहती है और अपने साथ जल , कंकड़-पत्थर , हीरा-मोती , कूड़ा-कचरा , सब कुछ साथ लेती हुई बहती आती है , वैसे ही आप भी जो भी कुछ देखिए , सुनिए , समझिए , कूड़ा-कचरा , हीरा-मोती सब कुछ लेते हुए आइए। लौट कर देखिए कि क्या आप के काम का है और क्या नहीं। फिर लिख डालिए। ' वह बोले , ' बहुत आसानजाने है। ' रामसेवक जी के इसी सूत्र को ले कर मैं बागपत गया। बागपत घूमा। चौधरी चरण सिंह का एक बढ़िया इंटरव्यू भी लिया। फिर लंबी रिपोर्ट भी लिखी। जो दिनमान में बड़ी प्रमुखता से नंदन जी ने छापा। यह 1984 का साल था। और मैं 25-26 साल का युवा। जब बागपत जाने की बात हुई तो उन दिनों धीरेंद्र अस्थाना ने धीरे से किसी से कहा कि , ' नंदन जी इतना भरोसा कर के भेज रहे हैं , लिख लेगा यह ? '

मैं ने तो नहीं पर रामसेवक जी ने यह बात सुन ली थी तब। लेकिन कुछ बोले नहीं। लेकिन जब रिपोर्ट और इंटरव्यू दिनमान में तान कर छपा तब धीरेंद्र अस्थाना दिनमान से पहले व्यक्ति थे , जिन्हों ने बढ़ कर गले लगाया और बधाई दी। कहा कि , ' बहुत बढ़िया लिखा। ' फिर उन्हों ने रविवार के विजय मिश्र का ज़िक्र किया और कहा कि उन से भी बढ़िया लिखा है। ' बाद में रामसेवक जी ने धीरेंद्र अस्थाना की पहले वाली बात भी बताई। खैर , रामसेवक जी का यह सूत्र मैं ने अपनी रिपोर्टिंग में निरंतर अपनाया और खूब इंज्वाय किया। तमाम चुनावी रिपोर्टिंग और कि चुनावी आकलन में भी बहती नदी की ही तरह बहता हूं नदी की तरह और समय की दीवार पर लिखा बांच देता हूं। अपनी इच्छा नहीं बांचता। न थोपता हूं। फिर रिपोर्टिंग ही क्यों , अपने कथा साहित्य में भी खूब आज़माता हूं इस सूत्र को। अदभुत सुख है इस सूत्र में। कई बार होता है कि कोई कहानी या उपन्यास लिखना शुरू करता हूं तो शुरू भले अपने मन से , अपने ढंग से करता हूं पर बाद में तो पात्र मुझे खींचते हुए जाने कहां-कहां लिए चले जाते हैं और मैं उन के साथ बहने लगता हूं। अपने आप में नहीं रहता। न ही पात्र हमारे हाथ में होते हैं। बल्कि मैं पात्रों के हाथ में चला जाता हूं। बहता ही रहता हूं उन के साथ । फिर पात्र ही और-और पात्रों से मिलाते लिए चलते हैं। पात्र जैसे नाव बन जाते हैं , कथा नदी और मैं मुसाफिर। कथा किसी स्वेटर की तरह अनायास बुनती जाती है। मैं उस में कोई दखल नहीं देता। कभी नहीं देता। इसी लिए आप को मेरी कथा के पात्र अपरिचित नहीं लगते। वह मेरे ही नहीं , आप के भी परिचित लगते हैं। होते जाते हैं। क्यों कि वह गढ़े हुए पात्र नहीं होते। गढ़ी हुई स्थितियां नहीं होतीं। वास्तविक स्थितियां होती हैं। वास्तविक पात्र होते हैं। कथा की नदी में बहते हुए मिलते हैं। कभी तेज़-तेज़ , कभी मंद-मंद।

1994 में मैं राष्ट्रीय फीचर्स नेटवर्क में जब संपादक हुआ तो तमाम लोगों को जोड़ा था उस से। दिनमान के तीन लोग भी जुड़े। जीतेंद्र गुप्त , रामसेवक श्रीवास्तव और माहेश्वर दयालु गंगवार। बाकी कमलेश्वर और अरविंद कुमार जैसे बहुत लोग भी जुड़े और नियमित लिखते रहे। इसी सिलसिले में रामसेवक जी से फोन पर नियमित संवाद बना रहा और चिट्ठी-पत्री भी। अंतिम समय तक उन में लिखने की ललक बनी रही और वह कुछ नया करने की सोचते रहे। उन्हीं दिनों घनश्याम पंकज स्वतंत्र भारत के प्रधान संपादक बने थे और दिल्ली से भी स्वतंत्र भारत को छापने की योजना बना रहे थे। रामसेवक जी बताते थे कि एसोसिएट एडीटर बनने का प्रस्ताव मुझे भी दिया है पंकज जी ने , देखिए क्या होता है। पर वह प्रस्ताव , प्रस्ताव ही रह गया। स्वतंत्र भारत लखनऊ में ही खटाई में पड़ गया और पंकज जी भी। बाद के दिनों में रामसेवक जी कविता ही नहीं , पत्रकारिता से भी बिसर गए। और सब की खबर लिखने वाले खुद खबर नहीं बन पाए। कब विदा हो गए , कोई जान ही नहीं पाया। लैंड लाइन बंद कर लोग मोबाईल की दुनिया में दाखिल हो गए। बहुत लोगों से अचानक संपर्क और संवाद भंग हो गया। चार साल पहले गगहा के ही एक व्यक्ति से सूचना मिली कि रामसेवक जी तो अब रहे नहीं। सुन कर दिल धक् से रह गया था। लेकिन रामसेवक जी का वह सूत्र मेरे पास अभी भी बहती नदी की तरह उपस्थित है। कभी विस्मित नहीं हुआ। किसी सॉफ्टवेयर की तरह मन में बस सा गया है।