Thursday, 24 September 2020

सब अपनी-अपनी हथेली जला के बैठ गए

 


नीतीश कुमार का हनुमान बन कर बिहार पुलिस के पूर्व डी जी पी गुप्तेश्वर पांडेय ने बिना मुंबई गए , पुलिसिया बुद्धि से मुंबई के सिने संसार रूपी लंका में आग लगा कर जिस तरह उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे को ड्रग के दुर्ग में घेरा है , इस व्यूह के आगे महाभारत का चक्रव्यूह भी फेल है। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गीत , कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना / जीने दो ज़ालिम, बनाओ ना दीवाना ! भी फेल है। इतना कि ठाकरे परिवार मराठी मानुष के नाम पर गुंडई और हिंदुत्व के नाम पर छत्रपति शिवा जी महाराज के नाम का दुरूपयोग भी भूल गया है। वह कहते हैं न कि छठी का दूध याद दिला दिया है पांडेय जी ने। इतना कि लोग कोरोना का दुःख और यह महामारी भूल गए हैं।

पांडेय जी की महिमा देखिए कि ठाकरे परिवार और शिवसेना को पानी पी-पी कर गरियाने वाले सेक्यूलरजन , वामपंथी और मुस्लिम समाज के एक से एक जहरीले और कठमुल्ले लोग ठाकरे परिवार और शिवसेना की पैरवी में लामबंद हो गए हैं। गुप्तेश्वर पांडेय तो वी आर एस ले कर राजनीति का रंग खेलने की तैयारी में हैं , एक साथ दशहरा , दीवाली और होली मनाने की तैयारी में हैं। पर उन का गुप्तेश्वर ऐसा गुप्त हमला कर गया है , महाराष्ट्र सरकार पर कि चाणक्य भी चना चबा गए हैं।

तफ़तीश हो रही थी सुशांत सिंह राजपूत की हत्या की , तफ़तीश शुरू हो गई ड्रग के दुर्ग की। कमाल कर दिया है पांडेय जी आप ने। इतना कमाल तो भाईजान वाले दबंग चुलबुल पांडेय भी किसी फ़िल्म में नहीं कर पाए। और तो और चुलबुल पांडेय की भूमिका करने वाले सलमान खान तक इस कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना की आंच पहुंचती दिख रही है।

और तो और एक ही घर में रहते हुए भी महानायक की उपेक्षिता पत्नी जया बच्चन भी राज्य सभा में भाषण तो अंगरेजी में दे रही थीं पर एक मुहावरा हिंदी में बोल बैठीं , जिस थाली में खाते हैं , उसी में छेद करते हैं , उन्हीं पर चस्पा हो गया। उन्हीं पर भारी पड़ गया। इतना कि गांजा सेवन के लिए मशहूर अभिनेता और सांसद रवि किशन ही उन पर राशन पानी ले कर चढ़ बैठे। जया बच्चन की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी हो गई। उलटे लोग इतना नाराज हो गए उन से कि उन की बेटी की आपत्तिजनक फोटुएं , नातिन की आपत्तिजनक वीडियो अलग वायरल हो गईं। जया बच्चन ने अभी तक किसी बात पर कोई प्रतिवाद नहीं किया है किसी भी बात का। दुष्यंत कुमार याद आ गए हैं :


जले जो रेत में तलवे तो हमने ये देखा

बहुत से लोग वहीं छटपटा के बैठ गए ।


खड़े हुए थे अलावों की आंच लेने को

सब अपनी अपनी हथेली जला के बैठ गए ।


दुकानदार तो मेले में लुट गए यारों

तमाशबीन दुकानें लगा के बैठ गए ।


लहू लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो

शरीफ लोग उठे दूर जा के बैठ गए ।

Tuesday, 22 September 2020

नारकोटिक्स वाले राहुल या ठाकरे की चैट भी खंगाल लें कुछ मनोरंजन बढ़ जाएगा

 

बाकी तो सब ठीक है लेकिन क्या नारकोटिक्स ब्यूरो वाले दिल्ली में राहुल गांधी , मुंबई में आदित्य ठाकरे की चैट भी खंगाल कर देश का कुछ मनोरंजन करेंगे या कि सिर्फ अभिनेत्रियों की ही पोल खोलते रहेंगे। किसी बड़े हीरो का नाम भी नहीं ले रहे। कम से कम करन जौहर का ही चैट खोल देते। 

फ़िल्मी दुनिया के तमाम रौशन चिरागों का वीडियो भी वायरल हो रहा है , कि पुलिस ने छापा डाला है और लोग अपने-अपने नौजवान बेटों , बेटियों को छुड़ा-छुड़ा कर ले जा रहे हैं। बड़े-बड़े लोग दिख रहे हैं। इन रौशन चिरागों की भी कुछ खबर , कुछ चैट नारकोटिक्स ब्यूरो को परोसना चाहिए। या कि तय कर लिया गया है कि ड्रग वाले मामलों में हीरोइन लोग रहेंगी और मी टू मामले में अनुराग कश्यप टाइप लोग। यह तो गुड बात नहीं हैं। नाइंसाफी तो है ही , मनोरंजन में कटौती भी। 

अच्छा इन सब में भी एक और बड़ा सवाल कि न्यूज़ चैनलों का , अखबारों का भी कुछ अपना ब्रेकिंग न्यूज़ टाइप कुछ नहीं आ रहा। कब तक आखिर कभी सी बी आई , कभी ई डी , कभी नारकोटिक्स ब्यूरो की परोसी जूठन परोसते रहेंगे यह लोग ? तहलका टाइप के स्टिंग , फर्जी ही सही , वह भी नहीं लुक हो रहे। न वो वाले सर्वे कि ड्रग में फला का नाम आ जाने से , फला के जेल जाने से , फला से पूछताछ के बाद देश क्या सोचता है ? यह मीडिया वाले अपनी तरफ से कुछ एक्स्ट्रा ऐड ही नहीं कर रहे। तो मनोरंजन में मजा नहीं आ रहा। 

वह भी क्या दिन थे जब इंडिया टुडे टाइप पत्रिकाएं पूछती थीं लड़कियों से कि आप किस के साथ सोना पसंद करेंगी ? नरसिंहा राव कि हर्षद मेहता या और ऐसे ही नाम। और यह देखिए लड़कियां भी तब पहले नंबर पर हर्षद मेहता और दूसरे नंबर पर नरसिंहा राव को रखती थीं। नरसिंहा राव तब प्रधान मंत्री होते थे। उन को ऐसे सर्वे पर कभी ऐतराज नहीं हुआ। हर्षद मेहता घोटालेबाज था। जेल में था। और जब प्रधान मंत्री को कोई ऐतराज नहीं था , तो वह भी क्यों ऐतराज करता। फिर यह सर्वे भी देखा हम ने इसी इंडिया टुडे का कि स्त्रियों को संभोग में कौन सा आसन पसंद है। आगे से , पीछे से , बगल से , ऊपर से आदि-इत्यादि। नरसिंहा राव के आर्थिक उदारीकरण का यह समय था। मीडिया भी उदार हो रही थी। तब चैनल नहीं थे। 

लेकिन अब इंडिया टुडे भी कोई सर्वे नहीं कर रहा। न कोई चैनल बता रहा है कि फला हीरोइन जिस का नाम डी से है , आर से है , एन से है , पी से है , वह लेट कर हशीश लेती है या किसी की बाहों में आ कर या मित्र की गोद में बैठ कर। सुबह लेती है कि रात में। कुर्सी पर बैठ कर या बिस्तर पर। ऐसी तमाम कल्पनाओं वाले किस्से या सर्वे तो यह लोग परोस ही नहीं रहे। अजब है यह भी। या यह सारी कल्पनाएं , सर्वे सब आर्थिक मंदी की भेंट चढ़ गए हैं। जी डी पी की तरह गोता मार गए हैं कि कृषि बिल के भार में दब से गए हैं। क्या पता। 

नहीं हमारा मीडिया इतना बदचलन तो हो ही चला है कि कम से कम अनुराग कश्यप के मी टू का नाट्य रूपांतरण कर के तो दिखा ही सकता था कि अनुराग ने मैडम ए को इस तरह बाहों में भरा। मैडम सी तो खुद ही उस के बिस्तर में घुस गईं और अब लांछन लगा रही हैं। इसी तरह राहुल गांधी के ड्रग सेवन , नित बदलती गर्ल फ्रेंड का नाट्य रूपांतरण। आदित्य ठाकरे को बेबी पेंग्विन कह के ही सही सारे किस्से परोस सकते हैं। पर अपने दर्शकों , पाठकों का कुछ ख्याल ही नहीं रहा मीडिया को। यह बहुत चिंतनीय स्थिति है। 

आखिर कब तक जांच एजेंसियों द्वारा फेंका गया जूठन , यह देखिए , वह देखिए कह कर हम अंधे दर्शकों को दिखाते रहेंगे। यह तो गुड बात नहीं है। बिलकुल नहीं है। कुछ तड़का तो ज़रूरी है। नहीं अर्णब गोस्वामी की एक पुरानी क्लिपिंग याद आ रही है। जिस में वह मोदी से मुखातिब हैं। और अपनी आदत और रवायत के मुताबिक नरेंद्र मोदी को बोलने ही नहीं दे रहे। आजिज आ कर नरेंद्र मोदी किसी तरह अर्णब की स्पेस में जबरिया घुसते हुए कहते हैं कि आप एडिटर हैं , मालिक हैं चैनल के। मेरे जाने के बाद आप अपना भाषण बोल दीजिएगा। एक घंटा बोल लीजिएगा। अभी मुझे बोलने दीजिए। तो दर्शक भी अब एजेंसियों के जूठन से आजिज आ गए हैं। तो कहीं कोई दूसरा विकल्प न खोज लें अपने मनोरंजन का। बाकी मालूम तो अब सब को है कि न सुशांत सिंह राजपूत की हत्या में कुछ निकलने वाला है , न ई डी में , न ड्रग में। कोरोना काल में बस चैट-चैट खेलना ही शेष रह गया है। यह ड्रामा अब अझेल हो रहा है। इति सिद्धम !

तानाशाह सिर्फ सरकार नहीं होती , सेक्यूलर भक्त भी होते हैं




सेक्यूलर भक्त बहुत ढीठ और बहुत बेशर्म होते हैं। तानाशाह सिर्फ सरकार नहीं होती , सेक्यूलर भक्त भी होते हैं।सेक्यूलर भक्त फासिस्ट भी होते हैं। चुनी हुई चुप्पियों , चुने हुए विरोध के कायल होते हैं। हर हाल अपने राजा का बाजा बजाने में माहिर होते हैं। ताज़ा वाकया राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश का है। हरिवंश जब तक चंद्रशेखर के साथ थे बहुत भले थे। प्रभात खबर में संपादक थे तब भी भले थे। विद्वान संपादक कहे जाते रहे। नीतीश कुमार के साथ थे तब भी भले थे। राज्य सभा में अशोक वाजपेयी की दावेदारी को कुचलते हुए हरिवंश को नीतीश कुमार ने राज्य सभा भेज दिया। तब भी सब कुछ ठीक था। कुछ लोग तब भी बिदके थे। लेकिन उन की नोटिस नहीं ली गई। हरिवंश सदाशयता की मूर्ति बने रहे। 

लेकिन ज्यों नीतीश कुमार ने महाजातिवादी , महाभ्रष्ट और अराजक लालू प्रसाद से पिंड छुड़ाया , नीतीश कुमार , इन भक्त सेक्यूलर की नज़र से गिर गए। महापापी , महाअधम हो गए नीतीश कुमार। और यह देखिए कि नीतीश से जुड़े हरिवंश ज्यों ही राज्य सभा के उप सभापति बने तो इन सेक्यूलर भक्तों की नज़र में तुरंत सांप्रदायिक घोषित हो गए। राजपूत घोषित हो गए। अवसरवादी घोषित हो गए। अब जब उन को दूसरा कार्यकाल मिल गया तो इन सेक्यूलर भक्तों की जैसे जान निकल गई। फिर वही सारे आरोप दुहराए गए। अदभुत है यह भी। हरिवंश फिर भी मुस्कुराते हुए निकल गए। लेकिन अभी जब कृषि बिल पास हुआ तो इन सेक्यूलर भक्तों ने सारा ठीकरा एक बार फिर से हरिवंश पर फोड़ दिया है। गुड है। हरिवंश की यह सदाशयता ही है कि कल जिन सांसदों ने उन के साथ अभद्रता की , उन के लिए धरना स्थल पर अपने घर से चाय ले कर गए। पर इन सांसदों को उन का यह शिष्टाचार नहीं भाया और चाय नहीं पी। हरिवंश खुद उपवास पर बैठ गए। इस से भी सेक्यूलर भक्त लोग बिदक गए। उन्हें किसान विरोधी बताने के लिए गाल बजाने लगे हैं। 

इन सेक्यूलर्स भक्तों का दावा है कि भाजपा के पास राज्य सभा में बहुमत नहीं था , फिर भी हरिवंश ने ध्वनि मत से कृषि बिल पास करवा दिया। बिलकुल ठीक बात है। लेकिन हुजूरे आला अगर बहुमत नहीं था भाजपा के पास तो यह सिद्ध करने के लिए आप सब को अपनी-अपनी सीट पर बैठ कर वोटिंग करनी थी , बिल अपने आप गिर जाता। पर नहीं पहले तो आप सेक्यूलर भक्तों ने इस बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की बात की। अमूमन विपक्ष द्वारा यह सेलेक्ट कमेटी में किसी बिल को भेजने की मांग वैसे ही होती है जैसे किसी अदालत में हारने वाला पक्ष येन-केन-प्रकारेण तारीख पर तारीख ले कर मामला लटकाता रहता है। याद कीजिए राम मंदिर वाला मुकदमा। तो जब सेलेक्ट कमेटी को मामला नहीं गया तो आप वोट देने के बजाय हंगामा करने पर , उप सभापति का माइक तोड़ने पर , रूल बुक फाड़ने पर आ गए। काहे भाई , काहे ? तब जब , आप के मुताबिक़ राज्य सभा में बहुमत आप के पास था। 

खैर सेक्यूलर भक्तों यह बताइए कि जब तीन तलाक , 370 और सी ए ए का मामला आया तो क्या तब भाजपा के पास राज्य सभा में बहुमत था ? जाहिर है कि नहीं था। तब फिर कैसे पास हो गया यह सब ? आप के बीच बैठे गद्दारों ने ही तो पास करवाया। यह भी नहीं जानते दोगलों ? नहीं जानते तो आसान शब्दों में बताता हूं। लोक सभा , राज्य सभा या किसी भी सभा में दो तरह का बहुमत होता है। एक संख्या बल का बहुमत दूसरे , जुगाड़ का बहुमत। भारतीय लोकतंत्र को यह जुगाड़ का बहुमत सिखाया है कांग्रेस ने। सब जानते हैं कि नरसिंहा राव सरकार के पास कभी पूर्ण बहुमत नहीं था। लेकिन बड़े ठाट से उन्हों ने पूरे पांच बरस सरकार चलाई। तब इन सेक्यूलर भक्तों ने एक बार भी मुंह नहीं खोला। जैसे मुंह में दही जमी हुई थी। तो खुला खेल है कि इस कृषि बिल पर भी भाजपा के पास यही जुगाड़ वाला बहुमत था। जैसे तीन तलाक , 370 और सी ए ए के समय था। इस लिए विपक्ष बौखला कर राज्य सभा में हिंसा पर उतर आया। मार्शल का गला तक दबा दिया। सोचिए कि वही मार्शल पलट कर इस गुंडे संजय सिंह को दबोच लिए होता तब ? अरविंद केजरीवाल के कच्छे धोते हुए राज्य सभा में दाखिल होने वाला यह संजय सिंह क्या करता ?

अच्छा नीतीश कुमार और हरिवंश , मोदी और भाजपा के साथ खड़े हो गए तो बहुत बड़े अपराधी और पापी हो गए। गुड बात है। मान लिया। लेकिन जब सोनिया कांग्रेस कभी मुस्लिम लीग से हाथ मिलाती है केरल में , तब ? महाराष्ट्र में शिव सेना का बगल बच्चा बन कर सरकार में साझेदार बन जाती है तब ? यह सेक्यूलर भक्त फौरन गांधी के बंदर बन जाते हैं। न कुछ देखते हैं , न सुनते हैं , न बोलते हैं। यह क्या है ? अच्छा सत्ता की साझेदारी का सवाल है। चलिए माना। यह भी गुड है। 

पर जब सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु का विवाद सामने आता है तब भी यह सेक्यूलर भक्त खामोश रहते हैं। गुड है यह भी। कंगना रानावत का मामला आता है तब भी गांधी के बंदर बन जाते हैं यह सेक्यूलर भक्त । यह क्या है सेक्यूलर भक्तों ? एम जे अकबर का मी टू , मी टू है पर विनोद दुआ का मी टू , माई टू कैसे बन जाता हैं सेक्यूलर भक्तों ? और अनुराग कश्यप का मी टू तो जैसे सेक्यूलर भक्तों को लकवाग्रस्त कर देता है। पायल घोष पर यह सेक्यूलर ब्रिगेड कब हमलावर होती है , देखना है। कम से कम स्वरा भास्कर जैसों को तो सामने आना चाहिए। रिया चक्रवर्ती से पैसा ले कर राजदीप सरदेसाई जैसा सेक्यूलर उस का इंटरव्यू लेता है , उस के बचाव में। बचा नहीं पाता , यह अलग बात है। उलटे आज तक की टी आर पी गोता मार जाती है। इस एक रिया चक्रवर्ती के इंटरव्यू से। आज तक अभी भी इस डूबती टी आर पी को संभाल नहीं पाया है। तमाम कोशिशों के बावजूद।   

अब दीपिका पादुकोण ड्रग में फंसी है। जाएगा कोई सेक्यूलर भक्त दीपिका का भी इंटरव्यू लेने ? बताएगी दीपिका कि उसे भी रात में सपना आया , इस लिए बोल रही है। आखिर यह वही दीपिका पादुकोण है जो सी ए ए के विरोध में दिल्ली दंगों के दौरान जे एन यू जा कर चुपचाप खड़ी हो कर दंगाइयों के समर्थन में खड़ी हो कर ही , अपनी छपाक जैसी अच्छी फिल्म का भी व्यावसायिक सत्यानाश कर लेती है। अब कितने जे एन यू वाले सेक्यूलर भक्त दीपिका पादुकोण के साथ खड़े होते हैं , यह देखना दिलचस्प होगा। अब तो कुछ सेक्यूलर भक्त कह रहे हैं कि दीपिका चूंकि जे एन यू गई थी , इस लिए उसे फंसाया जा रहा है। गोया वाट्स अप चैट भी दीपिका का सरकार में बैठे लोगों ने दीपिका से करवाया। दिया मिर्जा , नम्रता शिरोडकर , करिश्मा जैसों का चैट भी मैनेज किया सरकार ने ?

जो भी हो सेक्यूलर भक्तों की महिमा अपरंपार है। इन लोगों ने भाजपाइयों और संघियों को भक्त कह-कह कर घृणा और नफ़रत की ऐसी जहरीली खेती की कि जनता के बीच पूरी तरह नंगे हो गए हैं। आप यह तथ्य खुद देखिए कि यह सेक्यूलर भक्त अपने ही जहर की खेती में भस्म हो कर , हर किसी असहमत को संघी , भाजपाई बताते रहे। और देश की जनता ने सभी सर्वोच्च पदों पर इन्हीं संघियों और भाजपाइयों को बैठा दिया है। राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , लोकसभा अध्यक्ष जैसे शीर्ष पदों पर तो यह संघी हैं ही। इस के अलावा 18 मुख्य मंत्री , 29 राज्यपाल हैं। ऐसे जाने कितने विवरण हैं। तो क्या सारा देश संघी हो गया है ? सेक्यूलर भक्तों , अभी समय है कि लोकतंत्र में यक़ीन करना सीखिए। अपनी चुनी हुई चुप्पियों , चुने हुए विरोध से बाहर निकल कर नफरत और जहर की खेती बंद कर देश की मुख्य धारा में लौटिए। सेक्यूलरिज्म का जहर बांटना बंद कीजिए। बात-बेबात आज़ादी मांगने वाले इन सेक्यूलर भक्तों को अब अपनी इस हिप्पोक्रेसी से आज़ादी मांग लेनी चाहिए। 

कभी तुम कितने अफजल मारोगे , हर घर से अफजल निकलेगा , जैसे नारे , हिंदू , मुसलमान करना , जब मन तब सुप्रीम कोर्ट को निशाने पर ले लेना , सेना को बलात्कारी बता देना , कभी चुनाव आयोग को भाजपा आयोग बताना , कभी सी बी आई पर हमला , राफेल का वितंडा खड़ा करना , कश्मीर मसले पर पाकिस्तान के साथ खड़े हो जाना , कोरोना काल में भी मज़दूरों को भड़काना , अपनी ही मां को रंडी बताना और अब लोक सभा , राज्य सभा को भी अपनी नफरत और जहर की लपट में ले लेना। ऐसे कुकर्मों से बचिए सेक्यूलर भक्तों। यह गुड बात नहीं। सेक्यूलर भक्त इसी लिए अब देश की जनता के निशाने पर हैं। लेकिन सेक्यूलर भक्तों की आंख और दिमाग पर नफरत और जहर की पट्टी बंधी हुई है। कुछ दीखता ही नहीं , उन्हें अपने अहंकार के सामने। यह जहरीली पट्टी आंख और दिमाग से जब तक सेक्यूलर भक्त नहीं उतारेंगे तब तक न खुद चैन से रहेंगे , न देश को चैन से रहने देंगे। 

इन सेक्यूलर भक्तों को अच्छी तरह जान लेना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र में हर विचारधारा , हर वर्ग , हर समाज और संगठन को बराबरी से जीने और रहने का अधिकार है। क़ानून का राज है। संविधान का राज है। और कि लोक सभा और राज्य सभा को नाली , खड़ंजा और हैंडपंप लगाने के लिए नहीं , क़ानून बनाने के लिए ही बनाया गया है। उस क़ानून को दंगे , हिंसा करवा कर डराना बंद करो सेक्यूलर भक्तों। कानून के राज में रहने की आदत जितनी जल्दी हो डाल लेनी चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , असहिष्णुता आदि-इत्यादि एक पक्षीय शब्द नहीं हैं। बहुपक्षीय हैं। असहमत होना आप का अधिकार है लेकिन अपमानित करना , हिंसा करना किसी का भी अधिकार कभी नहीं हो सकता। इसी लिए कहता हूं कि तानाशाह सिर्फ सरकार नहीं होती , सेक्यूलर भक्त भी होते हैं। सो हर मुमकिन अपनी तानाशाही से बाज आना चाहिए सेक्यूलर भक्तों को।  हिटलर शाही और फासिज्म से बचना चाहिए सेक्यूलर भक्तों को। चुनी हुई चुप्पियों , चुने हुए विरोध का खेल बहुत हो चुका। जनता इस खेल को बहुत बढ़िया से समझ चुकी है। इस तथ्य को आप भी समझिए। बात-बेबात आज़ादी मांगने वाले इन सेक्यूलर भक्तों को अब अपनी इस हिप्पोक्रेसी से आज़ादी मांग लेनी चाहिए। यह बात दुहराए दे रहा हूं। 


Monday, 21 September 2020

तो आप मशालची बन कर क्यों उपस्थित हैं

 

मैं भी किसान हूं। हां , जमींदार नहीं हूं। राजनीतिक गुलामी वाला किसान नहीं हूं। छोटी जोत का किसान हूं। इतना कि ट्रैक्टर , कंबाइन और कोई अधिया लेने वाला न हो तो खेत परती रह जाएं। खेती करना बहुत कठिन काम है। अनाज बेचना तो और कठिन काम। हमारे घर में तो कभी अनाज बेचा नहीं गया।

पिता जी अनाज बेचने को जैसे अधर्म समझते थे। किसी ज़रूरतमंद को भले दे दें , बेचने नहीं दिए। हां , बहुत से जान-पहचान और रिश्तेदारों को अनाज बेचने के लिए हद से अधिक परेशान देखा है। लोग मुझे फोन करते हैं। एस डी एम से नीचे किसी से बात करने पर काम ही नहीं चलता। खाद के लिए भी पहले जो मारा-मारी होती थी , पूछिए मत। मोदी राज आने के बाद अब किसी से खाद के लिए कुछ नहीं कहना पड़ता। नए कृषि बिल के बाद उम्मीद करता हूं कि अब अनाज बेचने के लिए भी लोगों को परेशान नहीं होना पड़ेगा। और कि लोगों को अपनी उपज का दाम भी अच्छा मिलेगा। घर बैठे मिलेगा।

अगर लुधियाना का बना कपड़ा , देश भर में बिक सकता है , सूरत की साड़ी देश भर में बिक सकता है तो किसी किसान का अनाज देश भर में क्यों नहीं बिक सकता। किसान का मन , जहां चाहे , जिस दाम पर चाहे बेचे। तेली का तेल जल रहा है , उसे कोई तकलीफ नहीं तो आप मशालची बन कर क्यों उपस्थित हैं। तमाम रूढ़ियां टूटी हैं , परंपराएं टूटी हैं , तकनीक बदली है , लोग बदले हैं , अनाज बेचने का तरीका भी बदलता है तो क्या बुरा है। खेती करने का तरीका भी बदलता है तो क्या बुरा है। सड़क , पुल और मकान बनाने का तरीका भी बदला है। खेती का तरीका और व्यापार भी बदलने दीजिए। मशालची बनने की भूमिका से बाज भी आइए।

तय मानिए कि विपक्ष निरंतर मशालची बन कर अपनी कब्र खोद रहा है। इस कृषि बिल ने किसानों के ठेकेदार यथा शरद पवार , और बादल परिवार की अथाह कमाई पर भी ब्रेक लगा दिया है। अरे , अंबानी , टाटा जैसे लोग हर कारोबार में आगे हैं , साफ़-सुथरा अनाज भी बेच ही रहे हैं तो अगर उन्नत खेती के लिए भी अगर आगे आते हैं तो स्वागत है उन का। खेती को भी लाभदाई बनाना बहुत ज़रूरी है। नहीं कर्जों में दबे किसान कब तक आत्महत्या करते रहेंगे। तमाम सेक्टर जैसे कंप्यूटर , मोबाइल , इंटरनेट , रियल स्टेट , कपड़ा , तेल , साबुन , पब्लिक ट्रांसपोर्ट , कारखाने आदि-इत्यादि में निजीकरण के बिना कुछ हो सकता है क्या ?

तो अगर खेती भी उद्योगपतियों के हाथ जाती है तो बुरा क्या है। खेती को भी किसी उद्योग की तरह लाभदायी बनाना बहुत ज़रूरी है। किसानों को आखिर कब तक भिखारी बनाए रखना चाहते हैं हमारे विपक्षी दल ? राज्य सभा में आज जो मारपीट का मंज़र पेश किया है विपक्ष ने , पूरे देश ने देखा है। किसानों ने भी। नोटबंदी , जी एस टी , पर भी विपक्ष का ड्रामा जनता ने देखा था , विपक्ष को लतिया कर औकात में ला दिया। पर विपक्ष को जनता का जूता खाने की जैसे आदत पड़ गई है।

बात-बेबात तकलीफ है विपक्ष को। तीन तलाक , 370 हो या सी ए ए , हर कहीं मशालची की भूमिका में रहना किसी डाक्टर ने कहा है क्या। अभी जल्दी ही जनसंख्या नियंत्रण क़ानून भी आएगा। देखिएगा , विपक्ष फिर मशालची की भूमिका में मिलेगा। सी ए ए की तरह , जनसंख्या नियंत्रण पर भी दंगा , वंगा भी फिर करवा दे विपक्ष तो हैरत नहीं।

Tuesday, 15 September 2020

सर्वेश्वर जी जाते-जाते भी मशाल जला गए थे





गोरखपुर के बांसगांव में सर्वेश्वर जी की मां अध्यापिका थीं प्राइमरी स्कूल में। तो सर्वेश्वर जी की प्राथमिक शिक्षा बांसगांव में ही हुई। बचपन वहीँ बीता। बांसगांव शीर्षक उन की एक लंबी कविता भी है। बांसगांव बड़ी बेकली से बदकता है इस कविता में। बांसगांव की धूल भी बड़ी बेफिक्री से उड़ती है इस कविता में। लगता है जैसे अभी ही लिखी हो बांसगांव। बाक़ी है लाठियों में तेल मल के आ रहा चुनाव गीत भी बहुत मशहूर है। रमेश उपाध्याय ने अपने एक नाटक भारत भाग्य विधाता में इस गीत का बारे-बार उपयोग किया है। अस्सी के दशक में जब मैं दिल्ली में रहा तो उन का विशेष स्नेह रहा मुझ पर। दिनमान में तो उन से भेंट होती ही थी। बंगाली मार्केट स्थित उन के घर भी जाना होता था। फिराक साहब के अंतिम समय सर्वेश्वर जी एम्स में अकसर मिलने जाते थे। मुझे भी एक बार लिवा ले गए थे। उन दिनों जोश मलीहाबादी का निधन हो गया था। सर्वेश्वर जी ने फ़िराक साहब को जब यह खबर दी तो फिराक साहब बहुत जोर से चीखे थे , ' ओह जोश ! ' थोड़ी देर बाद जब वह थोड़ा स्थिर हुए तो सर्वेश्वर का हाथ , हाथ में लेते हुए बोले , ' सर्वेश्वर एक काम करना कि मेरे मरने के बाद देखनामुझे दफनाया नहीं जाए, जलानया जाए। क्यों कि मैं हिंदू हूं। ' सर्वेश्वर जी ने फ़िराक साहब का हाथ अपने दोनों हाथ में ले कर , बहुत भावुक हो कर बोले , ' जानते हैं फिराक साहब , सभी लोग जानते हैं कि आप हिंदू हैं। आप को जलाया ही जाएगा , दफनाया नहीं जाएगा। निश्चिंत रहिए। 

सर्वेश्वर जी दिल्ली में रहते हुए भी खांटी देसी आदमी थे। खांटी कायस्थ भी। कुआनो नदी तो उन में अपने शैवाल के साथ बहती ही थी। अज्ञेय जी भी उन की कुआनो नदी पर बहुत न्यौछावर दीखते हैं। लेकिन सर्वेश्वर जी के जीवन में कुआनो उस तरह नहीं बहती थी , कई बार ठहर-ठहर जाती थी। उन के कालम चर्चे और चरखे की ही तरह उन का जीवन भी अव्यवस्थित था। बचपन में पिता नहीं रहे तो अधेड़ होने पर पत्नी नहीं रहीं। दोनों बेटियों को अकेले ही पाला उन्हों ने। बातें बहुत सी हैं , सर्वेश्वर जी के बाबत। बहुत लोगों को देखा लेकिन बहुत कम लोगों को देखा जो फिराक से बराबरी से आंख में आंख डाल कर बात करते हों। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना उन्हीं में से एक थे। कई लोगों को तो देखा कि फिराक के सामने बोल ही नहीं पाते थे।

दिनमान के संपादक रहे रघुवीर सहाय का भी दफ्तर में बड़ा दबदबा रहता था। लेकिन सर्वेश्वर जी थोड़ा कम दबते थे। कन्हैयालाल नंदन जब दिनमान के संपादक बने तो मैं ने देखा कि नंदन जी खुद सर्वेश्वर जी की मेज पर चल कर आते थे। बुलवाते नहीं थे अपनी केबिन में। बाद में नंदन जी के प्रयास से ही सर्वेश्वर जी पराग का संपादन करने लगे थे। पराग के दिनों में ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा। और विदा हो गए। मैं ने देखा कि तब दिल्ली में उन के शोक में निगमबोध घाट पर पहुंचने वालों में लेखकों से ज़्यादा संस्कृतिकर्मी थे। रंगकर्मी , नर्तकी , गायक , वादक आदि। हरिवंशराय बच्चन भी आए थे। मनोहरश्याम जोशी भी। दिनमान के लोग तो थे ही। मैं ने पाया कि रघुवीर सहाय तब बहुत चिंतित थे कि सर्वेश्वर जी की जगह उन की बेटी को फौरन नौकरी मिल जाए। इस के लिए उन्हों ने बच्चन जी से विशेष निवेदन भी किया कि यहीं , निगमबोध घाट पर ही बेटी की नौकरी की बात फाइनल हो जाए। टाइम्स आफ इण्डिया के मालिक अशोक जैन भी चूंकि आए हुए थे इस लिए रघुवीर सहाय चाहते थे कि बच्चन जी यहीं अशोक जैन से इस बाबत बात कर लें। नहीं बात टल जाएगी तो लंबी टाल जाएगी। हरिवंशराय बच्चन की अपनी चमक तो थी ही तब लेकिन उन से ज़्यादा चमक उन पर पुत्र अमिताभ बच्चन की थी। खैर मौका मिलते ही बच्चन जी ने अशोक जैन को पकड़ा और सर्वेश्वर जी की बेटी की नौकरी की बात की। जिसे अशोक जैन ने फ़ौरन सहर्ष स्वीकार लिया और बोले , यह तो करना ही है। बेटी को बुला कर आश्वस्त भी किया , सिर पर हाथ रख कर। इसी के बाद सर्वेश्वर जी की बेटी ने रोते-बिलखते हुए बिजली वाली भट्ठी का स्वीच दबा दिया था। और सर्वेश्वर जी की पार्थिव देह आग की भट्ठी में चली गई थी। सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता याद आती है :

भेड़िया गुर्राता है
तुम मशाल जलाओ
उसमें और तुममें
यही बुनियादी फर्क है
भेड़िया मशाल नहीं जला सकता।

सच सर्वेश्वर जी जाते-जाते भी मशाल जला गए थे। 


और कई दिन तक मुनमुन मेरे दिल-दिमाग में चहलक़दमी करती रही

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दिव्या शुक्ला

आप लोग चाहते हैं कि मैं जियूं और अपने पंख काट लूं । ताकि अपने खाने के लिए उड़ कर दाने भी न ले सकूं। मैं पति छोड़ दूंगी पर नौकरी नहीं ! तल्खी भरे यह सख़्त वाक्य --अपने स्वार्थी भाइयों को दो टूक जवाब एक करार तमाचा सा था । मुनमुन के पास स्वाभिमान से जीने का यही तो एक हथियार था । और साथ ही गांव , कस्बों और शहरों में भी दोहरा जीवन जीती उन हज़ारों औरतों के लिए संदेश भी ---और फिर मां के टोकने पर - बेटी सुहाग के यह चिन्ह मत छोड़ो । चलो पहनो चूड़ी। सिंदूर लगाओ । बोल पड़ी मुनमुन मन का दबा ज्वार फूट पड़ा --जिस चूड़ी सिंदूर की न तो छत है न छांव , न सुरक्षा उसे लगा कर भी क्या करना --अगर यह सुहाग चिन्ह है तो जो पुरुष अपना न हो वो कैसा सुहाग ? उस के चिन्ह क्यों धारण करना -जो हमारे लायक़ नहीं उसे झटक फेंक देना ही उचित --क्यों ढोना उसे ? जिस चुटकी भर सिंदूर ने उस की दुनिया ही नर्क कर दी उसे तिलांजलि देना ही उचित ।

मुनमुन की पहचान पहले बांसगांव के नामी वकील की बेटी फिर उच्च पदों पर आसीन भाइयों की बहन के रूप में सम्मानित बहन बेटी की । फिर जल्दी ही लोगों की निगाहों में ललक भी झलकी परंतु शीघ्र ही वह एक सताई हुई औरत हो गई । लोगों की आंखों में दया करुणा या अकसर उपेक्षा झलकने लगी । पर समाज और परिवार की सताई औरतें मुनमुन में अपनी मुक्ति भी तलाशने लगी उस से सलाह लेती वह इन सब का आदर्श बन गई और अपना रास्ता अपनी मंजिल खुद तलाशी और अपना मुकाम हासिल किया। अपने संघर्ष के बारे वह यही कहती है कि सब कुछ बदलता है कुछ भी स्थाई नहीं न सुख न दुःख न समय। मुनमुन की यह कहानी समाज में संयुक्त परिवार के विघटन और उनमे पनपते स्वार्थो का उदाहरण है । बेटियां मां बाप का सुख दुःख अपने कलेजे में ले कर जीती हैं । वहीं अधिकांश बेटे सफल होते ही उपेक्षित कर देते है अपने माता पिता को ।

दयानंद पांडेय जी का यह उपन्यास गांव कस्बों की तसवीर आईने की तरह सामने लाता है बांसगांव की मुनमुन के रूप में। परिवारों में आगे निकलने की होड़ कितना पतित बना देती है --संयुक्त परिवार का विघटन , पैसा कमाने की होड़ में जहां आगे बढ़ते गए पीछे अपने रिश्तों को दफ़न करते गए । लाचार बेबस माता पिता भले ही दवा और दाने को तरसे परंतु बेटे के ऊंचे पद की चर्चा मात्र से आंखें गर्व से चमक जाती हैं । वहीं बुढ़ौती में पुत्रों पर आर्थिक रूप से निर्भर पिता कितना लाचार होता है। यह उपन्यास पढ़ते हुए मानो कितने मुनक्का राय हमारे इर्द-गिर्द नज़र आने लगते हैं । तो क्या सफलता स्वार्थ भी साथ ले कर आती है?

कभी-कभी अभाव खून का रंग सफ़ेद कर देता है । जिस बहन को बचपन में नन्ही परी चांदनी के रथ पर सवार/ गुनगुनाते हुए झुलाते थे उसे जीवन की उबड खाबड़ राहों में धकेल दिया। विवाह का बोझ उतार कर विदा किया और निशचिंत हुए।अपनी लड़ाई लड़ना, अपने घाव से टपकते रक्त को अपनी जिह्वा से चाटना कितना पीड़ादायक है यह वह स्त्री ही जानती है । तब जन्म लेती है एक दूसरी स्त्री जो अपने प्रति किए सारे अपराधों का दंड स्वयं तय करती है। यह उस की अपनी अदालत, अपना मुक़दमा और हाक़िम वही । कटघरे में है कुछ रक्त से जुड़े नाते तो कुछ समाज द्वारा तय किये गए जन्मांतर के नाते, जो कांटे की तरह चुभने लगे ! यह एक नया रूप था पति परमेश्वर की महिमामंडित छवि की खंडित करती नकारती नारी का, जिसे पुरुष समाज पचा नहीं पा रहा था। पर सफलता के आगे सदैव स्वार्थ झुकता है।

समाज ने अंतत स्वीकार किया । पर नायिका का तो प्रेम और रिश्ते नातों से विश्वास उठ गया । लेखक ने इसे बड़ी बखूबी से दर्शाया है । ऐसा लगता है पात्रों के मस्तिष्क में चल रही हलचल भी पाठकों तक पहुंच रही है । यही सफलता होती है एक अच्छे लेखक की। जातिवाद भी है। राजनीति के पहलुओं को भी छुआ है। कुल मिला कर गांव कस्बों के जीवन और एक स्त्री के संघर्ष पर आधारित यह पुस्तक पठनीय है । यह उपन्यास इतना रोचक है कि इसे मात्र तीन दिन में पढ़ा । और कई दिन तक मुनमुन मेरे दिल-दिमाग में चहलक़दमी करती रही।


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समीक्ष्य पुस्तक :

बांसगांव की मुनमुन

पृष्ठ सं.176

मूल्य-300 रुपए


प्रकाशक

संस्कृति साहित्य

30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर

दिल्ली- 110032

प्रकाशन वर्ष-2012


इस उपन्यास को पढ़ने के लिए इस लिंक को क्लिक कर सकते हैं 


बांसगांव का मुनमुन 

Wednesday, 9 September 2020

हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो

 


यह तो लगभग तय है कि अब कंगना रानावत भाजपा की अगली सांसद हैं। अब वह चुनाव हिमाचल के अपने गृह नगर से लड़ेंगी कि मुंबई से यह देखना शेष है। हो यह भी सकता है कि राज्यसभा में भी बैठ जाएं। क्यों कि 2024 अभी बहुत दूर है। इस लिए भी कि शिव सेना की गुंडई के खिलाफ कंगना सब कुछ दांव पर लगा कर , जिस ताकत और तेवर से रानी झांसी की तरह तन कर खड़ी हुई हैं , सारा रिस्क ले कर कि यह इनाम उन्हें मिलना ही है। कंगना ने जिस सख्ती से उद्धव ठाकरे और संजय राउत को उन की ही भाषा में चुनौती दी है , बीते दिनों में कोई खांटी भाजपाई भी नहीं दे पाया है। कंगना ने जिस नंगई से शिवसेना की ईंट से ईंट बजाई है कि शिवसेना की ज़मीन उखड़ गई है। पर इस पूरे तमाशे में जो इस से भी बढ़ कर भी दिलचस्प बात हुई है , वह यह कि तमाम वामपंथी बुद्धिजीवी भी सोशल मीडिया पर अब शिवसेना के साथ खुल कर लामबंद हो गए हैं। कांग्रेस तो शिवसेना की सत्ता में साझीदार है ही , अब वामपंथी भी आ गए हैं। और वामपंथी जिस के साथ आ जाएं , उन का क्या कहना ! कांग्रेस का हश्र लोग देख ही रहे हैं , शिवसेना का देखते चलिए। ग़ालिब शायद इन वामपंथी दोस्तों के लिए ही फरमा गए हैं:

ये फित्ना आदमी की खाना-विरानी को क्या कम है

हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो।

याद रखिए कि मुंबई में कम्युनिस्टों से निपटने के लिए एक समय इंदिरा गांधी ने बाल ठाकरे को खड़ा किया था। बाल ठाकरे इंदिरा गांधी की ही फसल थे। हिंदुत्व की खेती भी बाल ठाकरे ने कम्युनिस्टों को ठिकाने लगाने के लिए की थी। अलग बात है कि बाद में ठाकरे ने शिवसेना के मार्फत कांग्रेस को भी ठिकाने लगाया। समय का पहिया देखिए कि अब वही कम्युनिस्ट उद्धव ठाकरे के साथ लामबंद हो गए हैं। रिया चक्रवर्ती मसले पर भी वह शिवसेना के साथ थे। पर बुरका पहन कर। छुप-छुपा कर। लेकिन कंगना रानावत मसले पर वामपंथियों ने यह बुरका भी उतार फेंका है। खुल कर खड़े हो गए हैं , शिवसेना की गुंडई के साथ। फासीवाद , असहिष्णुता , अभिव्यक्ति की आज़ादी आदि-इत्यादि का सारा गिनती , पहाड़ा और तराना भूल-भाल कर वह लाल झंडे को लंगोट की तरह पहन कर कूद पड़े हैं। इसी लिए ग़ालिब का वह मिसरा ज़्यादा मौजू हो गया है : हुए तुम दोस्त जिसके, दुश्मन उसका आसमाँ क्यूँ हो।

कामरेड , कंगना रानावत , फासीवाद की शिकार है , असहिष्णुता की शिकार है कि सत्ता की गुंडई की ? या यहां भी चुनी हुई चुप्पी की रणनीति पर चादर ओढ़ कर सो जाना है।

सोशल कमिटमेंट वाले सारे फ़िल्मी सितारे कंगना रानावत मसले पर सो गए हैं। शबाना से स्वरा भास्कर तक। जे एन यू तक पहुंच जाने वाली दीपिका पादुकोण तक। अमिताभ बच्चन , शत्रुघ्न सिनहा , महेश भट्ट , जावेद अख्तर आदि-इत्यादि तक। आमिर खान , शाहरुख़ खान , नसीरुद्दीन शाह वगैरह तो ख़ुद ही डरे-डरे रहते हैं। पर एक से एक विशाल भारद्वाज , अनुराग कशयप का क्या करें। क्या करें अपने मोहतरम गुलज़ार साहब का भी। अनायास ही मुझे मार्टिन नीमोलर की वे पंक्तियां याद आने लगीं हैं जिन्हें शायद ब्रैख्त ने भी दुहराया है-

    जर्मनी में नाजी पहले-पहल

    कम्यूनिस्टों के लिए आए ....

    मैं चुप रहा/क्योंकि मैं कम्यूनिस्ट नहीं था

    फिर वे आए यहूदियों के लिए

    मैं फिर चुप रहा क्योंकि मैं यहूदी भी नहीं था

    फिर वे ट्रेड-यूनियनों के लिए आए

    मैं फिर कुछ नहीं बोला, क्योंकि मैं तो ट्रेड-यूनियनी भी नहीं था

    फिर वे कैथोलिको के लिए आए

    मैं चूंकि प्रोटेस्टेंट था इसलिए इस बार भी चुप रहा

    और अब जब वे मेरे लिए आए

    तो किसी के लिए भी बोलने वाला बचा ही कौन था ?

जो भी हो रिया चक्रवर्ती के पाप और अपराध के साथ कदमताल करते हुए उद्धव ठाकरे अब कंगना रानावत के घर में तोड़-फोड़ करवा कर अपनी सरकार पर तो आफत ले ही ली है , शिवसेना की कब्र भी खोद ली है। कंगना ने ठीक ही कहा है कि उद्धव ठाकरे ने आज मेरा घर तोड़ा है , कल उद्धव ठाकरे का घमंड भी टूटेगा। उद्धव की सारी ताकत मुंबई और महाराष्ट्र में ही सीमित है पर कंगना तो पूरे देश क्या पूरी दुनिया में फैन फॉलोविंग है।


Monday, 7 September 2020

जिस दिन 10 जनपथ कस्टडी में आया तो जी डी पी के बुखार में थर्मामीटर ही टूट जाएगा


ऐसा क्यों है कि आर्थिक मंदी और जी डी पी का बुखार कश्मीर से 370 हटते ही बीते बरस शुरू हुआ। और कि पी चिदंबरम के सी बी आई कस्टडी में जाते ही टाईफाईड में कनवर्ट हो गया यह बुखार। अब बीच कोरोना में भी यह जी डी पी का बुखार कांग्रेस और कांग्रेस की चाकरी करने वाले वामपंथियों का स्थाई राग बन गया है। क्या तो चीन और ताइवान में तो सब ठीक है बस मोदी राज के कारण भारत में सब गड़बड़ है।  

न , न मैं यह बिलकुल नहीं कह रहा कि आर्थिक मंदी नहीं है और कि जी डी पी सही सलामत है। बिलकुल गड़बड़ है। यह दोनों भरी गड्ढे में गोता मार रहे हैं। पर समंदर में नहीं। लेकिन क्या यह स्थिति सिर्फ भारत में ही है ? इस कोरोना काल में बाक़ी दुनिया इस आर्थिक मंदी और जी डी पी की गोतामारी से बाहर है क्या ? कोई बताए तो सही। तो क्या बाकी दुनिया में भी नोटबंदी और जी एस टी का मातम चल रहा है या सिर्फ भारत में ही। अच्छा चलिए यही बता दीजिए कि खाने , पीने की कौन सी चीज़ का दाम आसमान छू रहा है। दाल का , तेल का , सब्जी का , गेहूं , चावल या दूध का ? अच्छा यह बताइए कि तब कौन सी नोटबंदी और जी एस टी थी , जब मनमोहन सरकार के कृषि मंत्री रहे शरद पवार अचानक बोलते थे कि अब दाल मंहगी होगी , अब चीनी मंहगी होगी , अब दूध मंहगा होगा। दो सौ रुपए किलो अरहर की दाल और सौ रुपए किलो प्याज तो बीते छ सालों में नहीं हुए। हुआ हो तो कृपया आदरणीय लोग बताएं। तब जब कोरोना के चलते सारा कारोबार , व्यापार ठप्प है। फिर भी 130 करोड़ की आबादी में 80 करोड़ लोगों को बीते मार्च से मुफ्त राशन दिया जा रहा है। नवंबर तक दिए जाने का ऐलान है। जन-धन योजना के तहत गरीबों को धन , किसानों को धन उन के खाते में सीधे जा रहे हैं। कहीं से कोई एक शिकायत हो तो कोई बताए भी। लेकिन जी डी पी का बुखार है कि उतर ही नहीं रहा। लोगों का कोरोना ठीक हो जा रहा। कैंसर ठीक हो जा रहा। लेकिन कांग्रेसियों और कांग्रेस के चाकर वामपंथियों का जी डी पी बुखार है कि उतरता ही नहीं। चढ़ता ही जा रहा है। गुड है यह भी।  पर कोई बताए भी कि क्यों ? क्यों नहीं उतरता यह बुखार।  

बताएं यह भी कि आटा के दाम भूसा , दाल के दाम आटा , काजू के दाम दाल और सोने के भाव काजू प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह सरकार के दौरान नहीं हुए तो कब हुए ? अच्छा आटोमोबील सेक्टर ? अनाप शनाप कास्ट कटिंग कर प्रोडक्ट की ऐसी-तैसी करना और पांच साल में कीमत दोगुनी , तीनगुनी से ज़्यादा करेंगे तो मंदी नहीं आएगी तो क्या बहार आएगी ? काला धन जब बाज़ार से गायब होगा तो क्षमा कीजिए अनाप-शनाप दाम दे कर बड़ी-बड़ी मंहगी कार और बाइक खरीदने वालों की बैटरी तो डाऊन होगी ही। 35-40 हज़ार की बाइक लाख , सवा लाख में कोई कैसे खरीदे भला । खैर , खरीदिए न बिना लोन के एक कार या एक घर। दूसरे ही दिन से इनकम टैक्स की चिट्ठी आप के पीछे लग जाएगी। जांच भी होगी । बताइए कि कहां से लाए यह पैसा। जो पहले कभी नहीं होती थी। तो रुदालियों , यह आर्थिक मंदी भर नहीं है , काला धन पर लगा ग्रहण भी है। अब यह ग्रहण लंबा खिंच गया है। अभी और लंबा खिंचेगा। मंदी की असल मार तो रियल स्टेट में देखिए। कि फ़्लैट या ज़मीन का जो दाम पांच साल पहले था , वही आज भी है। बेचने वाले ले दही , ले दही गुहराते हुए घूम रहे हैं । लेकिन खरीददार नदारद हैं। रियल स्टेट में इनवेस्ट कर राजा बनने का सपना बुनने वाले लोग सन्नाटा बुन रहे हैं। रियल स्टेट और अटोमोबिल सेक्टर दोनों ही काला धन के दम पर बल्ले-बल्ले करने के अभ्यस्त रहे हैं। आज की तारीख में दोनों ही डूब गए हैं। 

चिदंबरम पर गाज गिरी तो तब का चढ़ा बुखार अब तक उतरा नहीं है। राफेल , नोटबंदी , जी एस टी आदि-इत्यादि के खांसी-जुकाम भी जुदा नहीं हैं। सोचिए कि जिस दिन 10 जनपथ कस्टडी में आया  , तब के दिन की मंदी और जी डी पी के बुखार में तो थर्मामीटर ही टूट जाएगा। अभी तो एन जी ओ की फसल भी भरे भादो में सूख रही है । मुगले आज़म के लिए शकील बदायूनी का लिखा याद आ रहा है , ये दिल की लगी कम क्या होगी ये ईश्क भला कम क्या होगा / जब रात है ऐसी मतवाली फिर सुबह का आलम क्या होगा ! आर्थिक मंदी और जी डी पी का नगाड़ा जाहिर है तब और बुलंद होगा ! तब तक आप पारले जी का बिस्किट खा कर अपना लो शुगर मेनटेन रखिए।

प्रतीक्षा अपनी-अपनी !


न्यूज़ चैनलों को प्रतीक्षा है रिया चक्रवर्ती की गिरफ्तारी की। रोजाना ही वह गिरफ्तारी की अटकलें लगाते रहते हैं। सी बी आई , ई डी और नारकोटिक्स ब्यूरो को प्रतीक्षा है सुशांत सिंह राजपूत की हत्या या ड्रग्स कनेक्शन का तार और इस की आंच आदित्य ठाकरे तक पहुंचने की। भाजपा और शरद पवार को प्रतीक्षा है उद्धव ठाकरे सरकार के गिरने की। उद्धव ठाकरे के अलसेशियन संजय राउत को कंगना रानाउत के मुंबई आने की प्रतीक्षा है। 

बस एक सुशांत सिंह राजपूत के पिता , बहनों और वकीलों को सच जानने की प्रतीक्षा है। कि आत्महत्या है कि हत्या। रिया चक्रवर्ती और उन के परिवार को प्रतीक्षा है कि न्यूज़ चैनलों पर उन का मीडिया ट्रायल कब ख़त्म होगा। न्यूज़ चैनलों को प्रतीक्षा है कि रिया , सुशांत के बाद कोई नई घटना घटे तो वह उस खबर पर जाए। नए ढंग से , नए विषय पर चीखना , चिल्लाना शुरू करे। जनता और दर्शक ही नहीं , न्यूज़ चैनल भी इतने दिनों तक एक ही घटना पर , यह देखिए , वह देखिए , सब से पहले इसी चैनल पर , आदि-इत्यादि का नाटक करते पक गए हैं। इस लिए भी कि अभी तक जो भी , जितना कुछ भी सामने आया है , उस के मुताबिक़ तो अदालत में कुछ भी साबित हो कर किसी को सजा होने लायक कुछ दीखता नहीं। मुंबई पुलिस 66 दिनों में इतना कुछ लीपा पोती कर चुकी है कि सी बी आई क्या , सी बी आई के पिता जी भी कुछ साबित करने की स्थिति में नहीं हैं। 

हां , इस सब में यह ज़रूर हुआ है कि मुंबई पुलिस की पैंट पूरी तरह उतर गई है। उद्धव ठाकरे सरकार की पगड़ी उछल गई है। इस सब से यह भी साबित हुआ है कि उद्धव ठाकरे के पास बैल बुद्धि है। अगर सामान्य बुद्धि भी होती और आदित्य ठाकरे को इस आपराधिक जाल से बचाना ही था तो एफ आई आर लिख कर हत्या , आत्महत्या की जांच करने का नाटक करती , सुशांत के परिवार को भी भावनात्मक रूप से साथ रखती और फिर कोई लचर सी चार्जशीट लगा कर जो कोर्ट में टिकती नहीं , मामला उलट देती। 

फिर ऊपरी अदालत में अपील का ड्रामा करती। सब कुछ सामान्य हो जाता। सांप भी मर जाता , लाठी भी न टूटती। लेकिन संजय राउत जैसे अलशेसियन को जो हरदम मुंह में नागफनी चबा कर बोलता है , जब भी बोलता है , तिरछा ही बोलता है , जहर ही बोलता है , से अगर जल्दी ही मुक्ति नहीं ली उद्धव ठाकरे ने तो अभी बहुत से मामले बिगड़ेंगे।