दयानंद पांडेय
अफ़सोस कि आप अपने को पढ़ा लिखा भी मानते हैं l नहीं जानते तो अब से जानिए कि पहले सिर्फ़ चार वर्ण थे l जाति नहीं l जाति बनाई मुग़लों ने l अपनी सेवा के लिए l फिर ब्रिटिशर्स ने इस जाति प्रथा को खाद पानी दे के बांटो और राज करो में तब्दील किया l फिर राजनीतिज्ञों ने आरक्षण दे कर जातियों को भस्मासुर बना दिया है l आप जैसे तमाम दलित बड़ा संविधान की माला रटते हैं आरक्षण की बैसाखी की रक्षा के लिए l जो लोग पढ़ना नहीं जानते , संविधान की माला फेरते मिलते हैं l संविधान में किसी भी अनुच्छेद में जाति का ज़िक्र नहीं है l पिछड़े और कमज़ोर का ज़िक्र है l कांग्रेस ने अपने स्वार्थ में जाति जाति करना शुरू किया l इंदिरा गांधी के समय में l मोदी और ज़्यादा कर रहा है जाति जाति l नेहरू ने तो आरक्षण का डट कर विरोध किया था l नेहरू को गांधी ने ठेल दिया l आज आरक्षण में देश प्रतिभाहीन हो गया है l नौबत माइनस चालीस वाले डाक्टर की आ गई है l गुड है l
मनुस्मृति की बात पर आते हैं l जहरीले और निकम्मे दलित मनुस्मृति बहुत जलाते हैं l आरक्षण की बैसाखी की और ज़ोर से पकड़ने के लिए l
मनु कौन थे ?
राजा थे l ब्राह्मण नहीं , क्षत्रिय थे l मनुस्मृति , मनु ने ही लिखी है। उन्हों ने एक व्यवस्था बनाई थी राज करने के लिए l मनुस्मृति पढ़े हुए लोग जानते हैं कि मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है l ब्राह्मण का काम सर्फ मुफ़्त में शिक्षा था और भिक्षा मांग कर भोजन करना था l कोई अन्य काम नहीं करना था l अगर ग़लती से भी कुछ धनार्जन किया तो बहुत सख़्त सज़ा थी l ब्राह्मणों के लिए इतने निषेध और सज़ा हैं मनुस्मृति में कि क्या ही कहा जाए l शरिया में भी ऐसी सजा नहीं दर्ज है।
लेकिन क्रिश्चियन मिशनरी ने ऐसा गुल खिलाया कि लालच में दलित लोग क्रिश्चियन बनने लगे l पूरा नार्थईस्ट क्रिश्चियन क्यों है ? कभी सोचा है ?
क्या ब्राह्मणों के कारण ?
यह अंबेडकर कौन है ?
अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है l क्यों लिखता था , अंबेडकर ?
ऐश से रहता था , अंबेडकर सरनेम लिख कर l ब्रिटिश एजेंट था l क्रिश्चियन मिशनरी के लिए काम करता था l पढ़िए अंबेडकर की जीवनी l बड़ा नेता बनने के लिए पहले मुसलमान बनना चाहता था l आंबेडकर की लिखी कभी वोटिंग फॉर वीजा पढ़िए। खास कर 1934 की उन की दौलताबाद यात्रा के विवरण पढ़िए। फिर सामने जिन्ना था l जिन्ना के आगे भला क्या चलती। फिर क्रिश्चियन बनना चाहता था l पर क्रिश्चियन बनने से मिशनरी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता था l हिंदुओं में फूट डालने का लक्ष्य l फिर अंबेडकर बौद्ध बन गया l हाला कि फिर भी वह कामयाबी नहीं मिली जो लक्ष्य था l
इस लिए भी कि बुद्ध आध्यात्मिक व्यक्ति थे l अंबेडकर राजनीतिक l बुद्ध और अंबेडकर में कोई मेल नहीं था l बुद्ध कर्मकांड के ख़िलाफ़ थे l अंबेडकर पूरी तरह कर्मकांडी l अपना ब्राह्मण सरनेम तक नहीं बदल सका l
आरक्षण क्या अंबेडकर की देन है ?
जी नहीं l संविधान सभा के 319 सदस्यों की देन है l जिस संविधान सभा के अध्यक्ष थे राजेंद्र प्रसाद और सलाहकार वी एन राव l गांधी का परामर्श था l वह भी देश के पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के लिए l जाति विशेष के लिए नहीं l
लेकिन इंदिरा गांधी से लगायत मोदी तक ने दलितों का वोट हथियाने का टूल बना लिया अंबेडकर को l अंबेडकर सिर्फ़ ड्राफ्ट कमेटी का मामूली सा अध्यक्ष था l
अंबेडकर की माला जपते हुए आरक्षण की बैसाखी थामने वाले दलित किसी क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचे हों तो सूचित कीजिएगा l पता कीजिएगा कि कितने प्रतिभावान लोग हर साल देश छोड़ रहे हैं l फिर इस में दलित कितने हैं l
आरक्षण का इतना बैंड बजने के बावजूद कितने विशेषज्ञ दलित डाक्टर हुए हैं ? कितने बड़े वकील हैं ? कितने वैज्ञानिक ? क्रिकेटर , उद्योगपति, अभिनेता या प्रोफेशनल?
हाँ, माइनस चालीस की बदबू वाले डाक्टर हींगे l पाँच साल का एम बी बी एस पंद्रह साल , बीस साल में कर ही रहे हैं l गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कालेज से एक खबर छपी थी पिछले दिनों। एम बी बी एस के पहले ही साल में एक दलित ने ग्यारह साल लगा दिए पर पास नहीं हुआ। मेडिकल कालेज छोड़ने को भी तैयार नहीं। फीस देनी नहीं। हॉस्टल , भोजन सब मुफ्त। और क्या चाहिए।
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में कुछ छात्रों ने धरना प्रदर्शन किया। उन्हीं दिनों मनमोहन सरकार बनी थी। पी एल पुनिया बाराबंकी से सांसद थे। अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए थे। कैबिनेट मंत्री का दर्जा। पहुंचे एक दिन मेडिकल कालेज उक्त धरना स्थल पर। मेडिकल कालेज के तब के प्रिंसिपल पुनिया से मिलने धरना स्थल पहुंचे। धरना पर बैठे छात्रों ने पुनिया से शिकायत की कि अभी तक यह कभी हम से बात करने नहीं आए। आज आए हैं। पुनिया ने प्रिंसिपल को तरेरते हुए पूछा , अभी तक क्यों नहीं आए ? प्रिंसिपल ने कहा , आज भी नहीं आता अगर आप नहीं आए होते। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा आप रिटायर्ड आई ए एस हैं। पढ़े लिखे आदमी हैं। सिस्टम समझते हैं। इस लिए आ गया। प्रिंसिपल ने कहा कि इन दलित छात्रों की शिकायत है कि दस-दस , पंद्रह-पंद्रह साल से इन्हें फेल कर दिया जा रहा है। पास नहीं होने दिया जा रहा है। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा कि सर आप सक्षम हैं। ऐसा कीजिए कि देश में जो भी दलित प्रोफ़ेसर मौजूद हैं , उन से ही इन का पेपर बनवा दीजिए। दलित प्रोफेसरों से ही इन सभी की कापियां जंचवा दीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं। पूरा सहयोग रहेगा हमारा। इतना सुनते ही पूनिया निरुत्तर हो गए। धीरे से उठ कर चले गए। फिर कभी नहीं लौटे। धरना खत्म हो गया था। ऐसे अनेक किस्से हैं। एक डाक्टर यादव थे उन दिनों। सर्जन थे लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में। लेकिन देखता था कि शाम को अक्सर वह कभी दूरदर्शन , कभी आकाशवाणी पर समाचार पढ़ते मिलते थे। बलरामपुर में एक डाक्टर मित्र से एक दिन पूछ लिया कि इन को इतना टाइम कैसे मिल जाता है। कि महीने में पंद्रह दिन आकाशवाणी , पंद्रह दिन दूरदर्शन पर रहते हैं। डाक्टर मित्र बोले , डाक्टर यादव के पास टाइम ही टाइम है। दो साल का एम एस पंद्रह साल में किया है। आरक्षण में नौकरी मिल गई है। मरीज लेकिन आरक्षण में नहीं मिलते। कोई इन से आपरेशन करवाना ही नहीं चाहता। कोई सर्जन इन को अपना असिस्टेंट भी नहीं बनाना चाहता। कौन मरीज के स्वास्थ्य का रिस्क ले ? सो टाइम ही टाइम है इन के पास। डाक्टर यादव की लेकिन एक बड़ी खासियत थी कि यादव होने के बावजूद मृदु भाषी थे। बहुत ही मिलनसार। बाद में हमारे मित्र भी बन गए।
सारी बड़ी नौकरियां अब प्राइवेट सेक्टर में हैं l कितने दलित सी ई ओ हैं ? प्रेसिडेंट , वाइस प्रेसिडेंट हैं ?
आरक्षण देश ही नहीं आरक्षणधारियों को भी नष्ट कर चुका है l
चेत जाइए l यह ब्राह्मण विरोध की कुंठा आप को खा जाएगी l ब्राह्मण का कुछ नहीं बिगड़ेगा l वह तो मांग के खाईबो , मसीत में सोने वाला जीव है l मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद है l तिलक और गोखले है l बहुत लंबी सूची है ऐसे ब्राह्मणों की।
कितने दलित आज़ादी के लिए कुर्बान हुए ?
एक नहीं l कभी नहीं l अंबेडकर भी नहीं। अंबेडकर फ्रीडम फाइटर नहीं , अंग्रेजों का दल्ला था।
ठीक ?
[ अपनी ही एक पोस्ट पर एक मित्र के कमेंट पर यह मेरा जवाब। ]
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