Friday, 16 April 2021

थैंक यू योगी जी कि आप ने सामान्य नागरिकों की तकलीफ को समझा और उस का निवारण भी किया

दयानंद पांडेय 


बहुत आभार योगी जी। बहुत थैंक यू योगी जी कि आप ने सामान्य नागरिकों की तकलीफ को समझा और उस का निवारण भी किया। सच यही है कि अगर गुहार लगाने वाला और गुहार सुनने वाला दोनों ही ईमानदार हों तो फर्क तो पड़ता है। जैसे कि आज पड़ा। आप मित्रों को याद ही होगा कि बीती देर रात कोरोना के इलाज में लखनऊ के लोगों को हो रही परेशानी पर एक पोस्ट लिखी थी। फेसबुक पर , अपने ब्लॉग सरोकारनामा पर वाट्सअप पर भी। खूब वायरल हुई यह पोस्ट। घूम-घूम कर मुझ तक भी पचासियों बार आई। मुख्य मंत्री योगी जी ने सिर्फ़ इस पोस्ट का संज्ञान लिया बल्कि फौरन कार्रवाई भी की। 

तब जब कि योगी जी खुद भी कोरोना पीड़ित हैं इस समय। पर उन्हों ने नागरिकों की पीड़ा को समझा और लोगों की सुविधा खातिर सीधे अस्पतालों में लोगों को नामित कर संबंधित लोगों की सूची जारी कर दी है। 

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यह लिस्ट आज शाम जारी हुई है । सरकार की तरफ से ।

लखनऊ के निजी अस्पतालों में कोरोना मरीजो के इलाज का प्रबंध योगी सरकार ने किया है. लखनऊ जिला प्रशासन की तरफ से हर अस्पताल के नोडल अफसर का नाम औऱ नंबर भी जारी कर दिया गया है ताकि मरीजों को किसी भी प्रकार की कोई समस्या न आए. 

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एंडवांस न्यूरो एंड जनरल हॉस्पिटल - डॉ. विनोद कुमार- 9415022002

एवन हॉस्पिटल-खुर्रम अतीक रहमानी- 9450374007

अपोलो मेडिक्स.- प्रमित मिश्रा- 8429029801

कैरियर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस एंड हॉस्पिटल- कर्नल डॉ. मोहम्मद एजाम-8318527150

फेहमिना हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर ब्लड बैंक-सलमान खालिद- 9935672929

ग्रीन सिटी हॉस्पिटल-डॉ. विनीत वर्मा- 8400000784

जेपी हॉस्पिटल- आरवी सिंह- 9554936222

किंग मेडिकल सेंटर-डॉ. अभय सिंह- 9415328915

मां चंद्रिका देवी हॉस्पिटल- गायत्री सिंह- 9415020266

पूजा हॉस्पिटल एंड मल्टीस्पेशियिलिटी सेंटर-आशुतोष पांडेय-9670588871

राजधानी हॉस्पिटल- चंद्र प्रकाश दुबे-9415162686

संजीवनी मेडिकल सेंटर- सुनील कुमार सोनी- 8840466030

श्री साईं लाइफ हॉस्पिटल-योगेश शुक्ला- 9450407843

वागा हॉस्पिटल- संदीप दीक्षित- 9839165078

विनायक मेडिकेयर हॉस्पिटल- डॉ मनीष चंद्र सिंह- 9984735111

विनायक ट्रामा सेंटर एंड हॉस्पिटल- अमित नंदन मिश्रा- 9919604383

लखनऊ के जिलाधिकारी ने भी दोपहर ही इस बाबत एक नया आदेश जारी किया था। इसी लिए मैं योगी सरकार का प्रशंसक हूं। ज़रा सोचिए और एक बार सोच कर देख ही लीजिए कि अगर इस समय योगी जी की जगह मायावती या अखिलेश यादव की सरकार होती तो यह सब लिखने के बाद मेरे साथ क्या सुलूक़ करती। हल्ला बोल देती मुझ पर। जाने क्या-क्या कर गुज़रती। यहीं देखिए न कि फेसबुक पर ही कभी किसी पोस्ट पर अगर इन लोगों की असलियत बता देता हूं तो असहमति की जगह कैसे तो पूरी यादव ब्रिगेड , दलित ब्रिगेड मुझ पर अभद्र टिप्पणियों , गाली-गलौज के साथ टूट पड़ती है। अंतत: आजिज आ कर ऐसे लोगों से विदा लेना पड़ता है। 

तुलसी दास का एक क़िस्सा याद आता है। 

हम सब जानते ही हैं कि तुलसीदास अकबर के समय में हुए। बल्कि यह कहना ज़्यादा ठीक होगा कि तुलसीदास के समय में अकबर हुए। खैर आप जैसे चाहें इस बात को समझ लें। पर हुआ यह कि अकबर ने तुलसी दास को संदेश भिजवाया कि आ कर मिलें। संदेश एक से दो बार, तीन बार होते जब कई बार हो गया और तुलसी दास नहीं गए तो अकबर ने उन्हें कैद कर के बुलवाया। तुलसी दरबार में पेश किए गए। अकबर ने पूछा कि, ' इतनी बार आप को संदेश भेजा आप आए क्यों नहीं?' तुलसी दास ने बताया कि, 'मन नहीं हुआ आने को। इस लिए नहीं आया।' अकबर ज़रा नाराज़ हुआ और बोला कि, 'आप को क्यों बार-बार बुलाया आप को मालूम है?' तुलसी दास ने कहा कि, 'हां मालूम है।' अकबर और रुष्ट हुआ और बोला, 'आप को खाक मालूम है !' उस ने जोड़ा कि, 'मैं तो आप को अपना नवरत्न बनाना चाहता हूं, आप को मालूम है?' तुलसी दास ने फिर उसी विनम्रता से जवाब दिया, 'हां, मालूम है।' अब अकबर संशय में पड़ गया। धीरे से बोला, 'लोग यहां नवरत्न बनने के लिए क्या नहीं कर रहे, नाक तक रगड़ रहे हैं और आप हैं कि नवरत्न बनने के लिए इच्छुक ही नहीं दिख रहे? आखिर बात क्या है?'

तुलसी दास ने अकबर से दो टूक कहा कि, 'आप ही बताइए कि जिस ने नारायण की मनसबदारी कर ली हो, वह किसी नर की मनसबदारी कैसे कर सकता है भला?'

हम चाकर रघुवीर के पटौ लिख्यौ दरबार

अब तुलसी का होहिंगे, नर के मनसबदार। 

- तुलसी दास 

अकबर निरुत्तर हो गया। और तुलसी दास से कहा कि, 'आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं। अब आप जा सकते हैं।' तुलसी दास चले गए। और यह नवरत्न बनाने का अकबर का यह प्रस्ताव उन्हों ने तब ठुकराया था जब वह अपने भरण-पोषण के लिए भिक्षा पर आश्रित थे। घर-घर घूम-घूम कर दाना-दाना भिक्षा मांगते थे फिर कहीं भोजन करते थे। शायद वह अगर अकबर के दरबारी बन गए होते तो रामचरित मानस जैसी अनमोल और अविरल रचना दुनिया को नहीं दे पाते। सो उन्हों ने दरबारी दासता स्वीकारने के बजाय रचना का आकाश चुना। आज की तारीख में तुलसी को गाली देने वाले, उन की प्रशंसा करने वाले बहुतेरे मिल जाएंगे पर तुलसी का यह साहस किसी एक में नहीं मिलेगा। शायद इसी लिए तुलसी से बड़ा रचनाकार अभी तक दुनिया में कोई एक दूसरा नहीं हुआ। खैर , गनीमत थी कि तुलसी दास अकबर के समय में हुए और यह इंकार उन्हों ने अकबर से किया पर खुदा न खास्ता जो कहीं तुलसी दास औरंगज़ेब के समय में वह हुए होते और यही इंकार औरंगज़ेब से किया होता , जो अकबर से किया, अकबर ने तो उन्हें जाने दिया, लेकिन औरंगज़ेब होता तो? 'निश्चित ही सिर कलम कर देता तुलसी दास का!'

सच यही है। पिता मुलायम ने भले पुकारने का नाम अखिलेश यादव का टीपू रखा है पर अखिलेश को उन के शासन काल में ही उन्हें औरंगज़ेब के रूप में जाना गया। मुलायम की पीठ में औरंगज़ेब की तरह ही अखिलेश ने छुरा घोंपा। पूरी पार्टी उन से छीन ली।  टोटी-टाइल चोर के रूप में कुख्यात अखिलेश ने 2015 में वाराणसी में गंगा में गणेश प्रतिमा का विसर्जन नहीं करने दिया था। शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद के शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद को पुलिस से पिटवाया था। अब यही अखिलेश यादव घूम-घूम कर इन संतों के चरणों में सिर रख कर माफी मांग रहे हैं। पर साथ ही संतों की पिटाई का वीडियो भी वायरल हो गया है। कहने का कुल मतलब है कि अगर शासक ईमानदार है तो उस से सही बात कहने में किसी को डरना चाहिए। और मैं तो बेईमान शासकों से भी सच कहने में कभी नहीं डरा। बेधड़क लिखता रहा हूं। मुश्किलें भी झेलता रहा हूं। पर सरकार कोई भी रही हो कभी सच कहने या लिखने से डिगा नहीं। कृष्ण बिहारी नूर ने लिखा ही है :

सच घटे या बढ़े तो सच न रहे

झूट की कोई इंतिहा ही नहीं।

एक बार पुन: बहुत आभार योगी जी। बहुत थैंक यू योगी जी कि आप ने सामान्य नागरिकों की तकलीफ को समझा और उस का निवारण भी किया। शुक्र है यह भी कि हम औरंगज़ेब के शासनकाल में नहीं हैं। और हां , हम तुलसी दास भी नहीं हैं। तुलसी दास बहुत बड़े रचनाकार हैं। बहुत बड़े आदमी हैं। मैं बहुत सामान्य आदमी हूं । सामान्य आदमी की आवाज़ हूं लेकिन। 



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Thursday, 15 April 2021

योगी जी , बेहतर होगा कि कोविड पॉजिटिव की रिपोर्ट आते ही आदमी को फांसी के तख्ते पर चढ़वा देने की व्यवस्था कर दीजिए !

दयानंद पांडेय 

योगी जी , बीते चार सालों में आप उत्तर प्रदेश में ही नहीं , पूरे देश में सच बोलने और सख्त कार्रवाई करने के लिए लोगों के लिए परिचित हुए हैं। दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह झूठ बोलने और धूर्तई के लिए लोग आप को नहीं जानते। लोग आप को मोदी के बाद प्रधान मंत्री के रूप में भी देखने लगे हैं। पर अफ़सोस कि आप की ऐन नाक के नीचे , बीच कोरोना में भगवान कहे जाने वाले डाक्टरों ने , अफसरों ने जो अपना यमराज रुप दिखाना शुरू किया है , आप इस से भी परिचित हो लीजिए। ठीक है कि आप खुद भी कोविड पॉजिटिव हो गए हैं। आप का उपचार भी चल रहा है। आप सक्षम मुख्य मंत्री हैं। योगी भी हैं। कोरोना आप का कुछ भी न कर पाएगा। 

पर क्या करे वह सामान्य आदमी। जिस की कहीं , कोई पूछ नहीं है। सामान्य आदमी अरे कोई चलता-पुर्जा आदमी भी लाचार हो गया है। क्यों कि आप ने ऐसा नाकारा सिस्टम बना दिया है कि क्या सरकारी अस्पताल , क्या प्राइवेट अस्पताल , बिना सी एम ओ की सिफारिश , संस्तुति , आदेश के बिना किसी कोरोना मरीज को हाथ नहीं लगाएगा। अस्पताल में भर्ती नहीं करेगा। या तो इस नियम को बदल दीजिए। या इस बाबत सिस्टम से जुड़े लोगों को फौरन बर्खास्त कर दीजिए। प्रशासन ने पब्लिक डोमेन में जिन के भी , जो नंबर दिए हैं। इन में से कोई एक नंबर आप खुद मिला कर देखिए एक बार। कोई एक नंबर भी उठ जाए तो मुझे जेल भेज दीजिए। माना कि बेड की कमी है , इलाज नहीं कर सकते।  परेशान और बीमार लोगों का सम्मान तो कर ही सकते हैं। फ़ोन उठा कर सांत्वना तो दे ही सकते हैं कि बेड उपलब्ध होते ही आप की व्यवस्था करते हैं। आदमी की आधी बीमारी तो सांत्वना में ही ठीक हो जाती है। 

पर सांत्वना तो दूर , इन संबंधित लोगों ने अपने नंबरों पर वाट्सअप की सुविधा भी हटा दी है। कि कोई वाट्सअप पर भी संदेश लिख कर मदद न मांग सके। एक मंचीय और लोकप्रिय कवि हैं कुमार विश्वास। कुमार विश्वास ने प्रसिद्ध गीतकार कुंवर बेचैन के लिए भी गाज़ियाबाद में सब से गुहार लगाई। किसी ने नहीं सुना। दिल्ली में आनंद विहार के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया। कुंवर बेचैन का आक्सीजन लेविल सत्तर पर आ गया है। उन्हें वेंटिलेटर की ज़रूरत है। नहीं मिल रहा। कोई तीस घंटे हो गए हैं मैं खुद अपने एक मित्र की कोरोना पीड़ित बेटी को किसी अस्पताल में भर्ती करने के लिए व्याकुल भारत बन गया हूं। लेकिन ख़ाली हाथ हूं। बेटी की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही है। परिचित डाक्टरों ने भी सी एम ओ की संस्तुति के बिना हाथ जोड़ लिया है। 

आप जानते ही होंगे कि पूरे उत्तर प्रदेश में सी एम ओ मतलब प्राइवेट अस्पतालों , दवाखानों का दलाल। सी एम ओ मतलब रिश्वत और हरामखोरी का जीता-जागता स्मारक। ऐसे भ्रष्ट सी एम ओ लोग ज़िले-ज़िले में इस कोरोना को करुणा में तब्दील करने में लगे हुए हैं। मायावती के कार्यकाल में हुए एन आर एच एम घोटाले में इन्हीं सी एम ओ लोगों ने करोड़ो के वारे-न्यारे कर दिए थे। कितनी तो हत्याएं हुई थीं। अच्छा सी एम ओ होता क्या है ? एक सामान्य एम बी बी एस। तो एक सामान्य एम बी बी एस कुर्सी पर बैठते ही बड़े-बड़े विशेषज्ञ डाक्टरों को हांकना शुरू कर देता है। और यह विशेषज्ञ डाक्टर , एम डी , डी एम और अन्य बड़ी डिग्रियों वाले डाक्टर इन सी एम ओ को गधे से अधिक कुछ नहीं मानते। 

तो ऐसे गधे डाक्टरों के हाथ में आप ने कोरोना से निपटने की कमान थमा दी है। यह कौन सा सिस्टम है भला। तिस पर कोढ़ में खाज यह कि इस सूची में प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर लखनऊ विकास प्राधिकरण के कनिष्ठ अधिकारियों को तैनात कर दिया है। लखनऊ विकास प्राधिकरण नाम की पूरी संस्था अपने भ्रष्टाचार के लिए जितनी कुख्यात है , कौन नहीं जानता। थोड़ा सा अवसर मिल जाए तो यह लखनऊ विकास प्राधिकरण के लोग इतने कुशल हैं कि आप के सरकारी आवास 5 कालिदास मार्ग की रजिस्ट्री करवा कर वहां किसी बहुमंज़िले भवन का नक्शा भी पास करवा दें। तो योगी जी अगर आप सी एम ओ की टीम और लखनऊ विकास प्राधिकरण के लोगों के भरोसे लखनऊ के कोरोना रोगियों का उपचार करवाने की सोच बैठे हैं तो बेहतर होगा कि कोविड पॉजिटिव की रिपोर्ट आते ही आदमी को फांसी के तख्ते पर चढ़वा देने की व्यवस्था कर दीजिए। काहे को अस्पताल , दवा आदि की परिक्रमा करने का नाटक। 

योगी जी , अगर सचमुच कोरोना पीड़ित लोगों की मुश्किल आप दूर करना चाहते हैं , और हम जानते हैं कि आप ऐसा चाहते हैं। तो सब से पहले हर ज़िले की कोरोना प्रशासन की कमान कम से कम कमिश्नर स्तर के ईमानदार अधिकारी के जिम्मे करें। और उस अधिकारी को अपनी मर्जी से अपनी टीम बनाने की स्वतंत्रता भी ज़रूर दें। क्यों कि कोरोना अब अपने जिस विस्फोटक स्वरूप में उत्तर प्रदेश में उपस्थित है , भ्रष्ट जिलाधिकारियों , सी एम ओ या भ्रष्ट विकास प्राधिकरण के अफसरों के वश का हरगिज नहीं है। यह लोग हर बात में सिर्फ़ और सिर्फ पैसा सूंघने के आदी हैं। लोक कल्याण नहीं। 

जब कि ज़रूरत है इस महामारी में लोक कल्याण सोचने वाली मशीनरी की। हो सके तो कोआर्डिनेशन के लिए सेना की सेवाएं लें। जैसे भी हो ईमानदार , जवाबदेह और समर्पित लोगों की टीम की ज़रूरत है। नाकारा और भ्रष्टाचार के अभ्यस्त लोगों की नहीं। कि एक फ़ोन भी न उठा सकें। भैसा कुंड स्थित बैकुंठ धाम पर फैंसिंग करवा कर जलती लाशों की फोटोग्राफी या वीडियोग्राफ़ी रोकने के उपाय पर आप के अफसरों को शर्म आनी चाहिए। ऐसे अफसरों को बिना किसी देरी के बर्खास्त कर देना चाहिए। अरे , अगर मुझे या सिस्टम को कोढ़ हो गया है तो उस पर कपड़ा रख कर छुपाने से तो ठीक नहीं होगा। ठीक होगा इलाज से। तो योगी जी पहले इस नाकारा , भ्रष्ट सिस्टम को बदल दीजिए। नहीं , लखनऊ समेत समूचा उत्तर प्रदेश शमसान घाट बन जाएगा। क्यों कि अगर ऐसा ही रहा तो चिताएं तो जलती रहेंगी। चाहे जितनी फेंसिंग करवा लीजिए।  बाक़ी कोई पांच दशक पहले धूमिल लिख गए हैं :

भाषा में भदेस हूं 

इतना कायर हूं कि 

उत्तर प्रदेश हूं 

आप उत्तर प्रदेश को सचमुच बहुत आगे ले आए हैं योगी जी। बड़े-बड़े माफिया आप के नाम से कांपते हैं। लेकिन भ्रष्ट प्रशासन और यमराज बने सरकारी डाक्टरों को अभी कांपना शेष है। नहीं हम , फिर से पचास साल पीछे जाने के लिए अभिशप्त होंगे। चिता में भस्म होने से बचाइए उत्तर प्रदेश को , लखनऊ को। भ्रष्ट अफसरों की आंख मूंद कर मत मानिए योगी जी। इन अफसरों के लिए अदम गोंडवी लिख गए हैं :

तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है

मगर ये आंकडे झूठे हैं ये दावा किताबी है। 


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कोविड 19 मरीजों के लिए लखनऊ में इमरजेंसी नम्बर 

The Lucknow Municipal Corporation has issued three helpline numbers


6389300137, 0522-4523000 & 0522-2610145 for providing help like admitting Covid patients, isolating them and providing medication.

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  in covid-19 cases, following numbers may be contacted for hospitalization of patient in event of emergency in Lucknow:


1. Dr Ravi Pandey, CMO control room 7007111277, 7376019029,


2. Dr Abhay Yadav DM covid control room 8787253357


3. Dr A K Chodhry CMO office 9411478966


4. Dr Rahul Arya CMO office 9506790398


5. Dr K K Saxena CMO office 9415109308


6. ADM Transport 9415005005.


E-mail: cmolko@gmail.com






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1 - थैंक यू योगी जी कि आप ने सामान्य नागरिकों की तकलीफ को समझा और उस का निवारण भी किया

Wednesday, 7 April 2021

मायावती ने मुलायम से उठक-बैठक करवाई तो सपाई गुंडे मायावती की हत्या पर आमादा हो गए

दयानंद पांडेय 


तथ्य यह भी दिलचस्प है कि अपने को सेक्यूलर चैंपियन बताने वाले मुलायम सिंह यादव पहली बार 1977 में जब मंत्री बने तो जनता पार्टी सरकार में बने जिस में जनसंघ धड़ा भी शामिल था। मुलायम सहकारिता मंत्री थे , कल्याण सिंह स्वास्थ्य मंत्री , रामनरेश यादव मुख्य मंत्री। फिर सेक्यूलर मुलायम सिंह यादव पहली बार भाजपा के समर्थन से ही मुख्य मंत्री बने थे। लेकिन बिहार में आडवाणी की रथ यात्रा रोकने और गिरफ़्तारी के बाद भाजपा ने केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई थी। 

तथ्य यह भी महत्वपूर्ण है कि सेक्यूलर फ़ोर्स के ठेकेदार वामपंथी और भाजपा दोनों एक साथ थे विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को समर्थन देने में। यह जनता दल की सरकार थी। मुलायम सिंह भी जनता दल सरकार के मुख्य मंत्री थे। तो जब भाजपा ने विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो जनता दल टूट गया और कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने। जब कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस लिया तो कांग्रेस ने मुलायम को समर्थन दे कर मुलायम सरकार को गिरने से बचा लिया था। अयोध्या में कार सेवकों पर मुलायम सरकार द्वारा गोली चलवाने का परिणाम यह हुआ कि अगले चुनाव में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बन गई। बाबरी ढांचा गिरने के बाद कल्याण सरकार बर्खास्त हो गई। फिर अगले चुनाव में भाजपा को हराने के लिए सपा-बसपा ने मिल कर चुनाव लड़ा फिर मिल कर सरकार भी बनाई। 265 सीट पर सपा लड़ी और 164 सीट पर बसपा। 109 सीट सपा ने जीती , 67 सीट पर बसपा। मुलायम दूसरी बार मुख्य मंत्री बने। तिलक , तराजू और तलवार , इन को मारो जूते चार के वह दिन थे।  मिले मुलायम , कांशीराम , हवा में उड़ गए जय श्री राम जैसे नारों के वह दिन थे। 

लेकिन तब बतौर मुख्य मंत्री मुलायम की हालत आज के महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री उद्धव ठाकरे से भी गई गुज़री थी। कांशीराम और मायावती ने मुलायम सरकार को लगभग बंधक बना कर रखा। न सिर्फ़ बंधक बना कर रखा , ब्लैकमेल भी करते रहे। हर महीने वसूली का टारगेट भी था। मायावती हर महीने आतीं। मुलायम को हड़कातीं और करोड़ो रुपए वसूल कर ले जातीं। मुलायम लगभग मुर्गा बने रहते कांशीराम और मायावती के आगे। मुलायम ने हार कर मायावती को उप मुख्य मंत्री बनाने का प्रस्ताव भी रखा। लेकिन मायावती को यह मंज़ूर नहीं था। वह मुख्य मंत्री बनना चाहती थीं। मुलायम इस पर राजी नहीं थे। सरकार किसी तरह चल रही थी। 

उन दिनों कांशीराम और मायावती लखनऊ आते तो स्टेट गेस्ट हाऊस में ठहरते थे। जिस कमरे में वह चुने हुए लोगों से मिलते थे , उस कमरे में सिर्फ एक मेज और दो कुर्सी होती थी। जिस पर क्रमशः कांशीराम और मायावती बैठते थे। फिर जो भी आता वह खड़े-खड़े ही बात करता। बात क्या करता था , सिर्फ़ बात सुनता था और चला जाता था। तब के मुख्य मंत्री मुलायम सिंह यादव के लिए भी यही व्यवस्था थी। वह भी खड़े-खड़े ही बात सुनते थे। बैठने को कुर्सी मुलायम को भी नहीं मिलती। मुलायम इस बात पर खासे आहत रहते। पर मायावती की यह सामंती ठसक बनी रही। सुनते हैं मुलायम ने एक बार अपने बैठने के लिए कुर्सी की बात की तो मायावती ने कहा कि मुख्य मंत्री की कुर्सी क्या कम पड़ रही है , बैठने के लिए। मुलायम चुप रह गए थे। बाद में मायावती के वसूली अभियान में मुलयम ने कुछ ब्रेक लगाई और कहा कि हर महीने इतना मुमकिन नहीं है। तो मायावती ने सरकार से समर्थन वापसी की धमकी दे डाली। मुलायम ने फिर मांग पूरी करनी शुरू कर दी। 

लेकिन तब के दिनों जब भी मायावती और कांशीराम लखनऊ आते तो मुलयम सरकार बचेगी कि जाएगी , की चर्चा सत्ता गलियारों और प्रेस में आम हो जाती। सरकार में हर काम के हिसाब-किताब के लिए कांशीराम ने आज के कांग्रेस नेता तब के आई ए एस पी एल पुनिया को मुलायम का सचिव बनवा रखा था। अपनी पार्टी के मंत्रियों को मलाईदार विभाग दिलवा रखे थे। तो मुलायम की नाकेबंदी पूरी थी। ऐसी ही किसी यात्रा में मायावती और कांशीराम लखनऊ आए। सर्वदा की तरह मुलायम को तलब किया गेस्ट हाऊस में। मुलायम खड़े-खड़े बात सुनते रहे। डांट-डपट हुई। जाने किस बात पर मुलायम को कान पकड़-कर उठक-बैठक भी करनी पड़ी। मायावती ने मुलायम के इस उठक-बैठक की चुपके से फोटो भी खिंचवा ली और दैनिक जागरण में यह फ़ोटो छपवा दी। फ़ोटो ऐसी थी कि कुर्सी पर कांशीराम और मायावती बैठे हुए है और मेज के सामने मुलायम कान पकड़े झुके हुए हैं। अख़बार में यह फ़ोटो छपते ही हंगामा हो गया। होना ही था। 

मुलायम सरकार से समर्थन वापसी की चर्चा पहले से गरम थी। इस चक्कर में ज़ी न्यूज़ की टीम संयोग से स्टेट गेस्ट हाऊस में पहले ही से उपस्थित थी। लेकिन सपाई गुंडों को टी वी कैमरा या प्रेस की परवाह कतई नहीं थी। उन्हें अपने टारगेट की परवाह थी। टारगेट था मायावती के साथ बलात्कार और फिर उन की हत्या की। लेकिन भाजपा विधायक ब्रह्मदत्त द्विवेदी भी संयोग से गेस्ट हाऊस में उपस्थित थे। वह पहलवान भी थे। मायावती की रक्षा में खड़े हो गए। सपाई गुंडों को एकतरफ धकेल कर मायावती को गेस्ट हाऊस के एक कमरे में बंद कर सुरक्षित कर दिया। यह 2 जून , 1995 की सुबह थी। सपाई गुंडों ने कमरे का दरवाज़ा तोड़ने का बहुत उपक्रम किया। लखनऊ पुलिस सपाई गुंडों के समर्थन में थी। लेकिन मायावती ने भी भीतर से युक्ति की। कमरे के दरवाज़े पर सोफा , मेज वगैरह खींच कर लगा दिया था। गैस के सिलिंडर में आग लगा कर मायावती को जलाने की भी कोशिश की गई। मायावती के कमरे के फोन के तार भी काट दिए सपाई गुंडों ने। उन दिनों मोबाइल नहीं था पर पेजर आ गया था। मायावती ने पेजर के जरिए बाहर की दुनिया से संपर्क बनाए रखा। 

उसी दिन संसद में यह मामला उठा कर अटल बिहारी वाजपेयी ने मायावती को सुरक्षा दिलवा दी। लेकिन मायावती उस दिन कमरे से बाहर नहीं निकलीं। रात में भी उन को गाली-वाली दी जाती रही। बहरहाल मायावती जब दो दिन बाद निकलीं तो मुलायम सरकार से समर्थन वापसी के ऐलान के साथ ही। अटल बिहारी वाजपेयी ने भाजपा का समर्थन दे कर मायावती को मुख्य मंत्री बनवा दिया। किस्से इस बाबत और भी बहुतेरे हैं। फिर कभी।


Tuesday, 6 April 2021

मुख़्तार अंसारी , बस आत्महत्या मत करना , अपनी फांसी की प्रतीक्षा करना

दयानंद पांडेय 

यह कौन सा धागा है , जिस से ऐसी चादर बुन ली मुख़्तार अंसारी कि दुनिया को डराते-डराते तुम ख़ुद डरने लगे। पत्ते की तरह कांपने लगे हाई वे पर। आखिर कैसे जुलाहे हो। कैसे बुनकर हो। कि अपने ही लिए फांसी का फंदा बुन लिया। ख़ैर , अब बांदा जेल में भी क्या मछली का तालाब खुदेगा कि नहीं ? लखनऊ या गाज़ीपुर की जेलों की तरह। डी एम , एस पी तुम्हारे साथ बैडमिंटन खेलने बांदा जेल में भी आएंगे क्या ? मुलायम , मायावती , आज़म खान कुछ मदद करेंगे भी ? लेकिन मुलायम तो अपने बेटे औरंगज़ेब की क़ैद में हैं। आय से अधिक संपत्ति के मामले के जांच की क़ैद अलग है। मायावती भी इसी आय से अधिक संपत्ति के मामले के जांच की क़ैद के साये में हैं। और वह जहरीली ज़ुबान के मालिक , भारत माता को डायन बताने वाले आज़म खान ?  

तुम पंजाब की जेल में ऐश करने क्या गए मुख्तार अंसारी कि वह आज़म ख़ान बीवी , बेटे समेत सीतापुर की जेल में एंट्री ले बैठे। अब दंगे-वंगे भी करवाने की हैसियत में तुम नहीं रहे मुख़्तार अंसारी। कानपुर के विकास दुबे की तरह मुठभेड़ भी नहीं नसीब होने वाली , न ही मुन्ना बजरंगी की तरह मारे जाओगे। मरोगे लेकिन तिल-तिल कर जेल में वी आई पी रुतबा पाने के लिए। जो दुर्गति कभी मायावती ने राजा भैया की करवाई थी कानपुर जेल में , उस से भी ज़्यादा दुर्गति तुम्हारी बांदा जेल में होगी मुख़्तार अंसारी। राजा भैया तो एक कूलर की ठंडी हवा खातिर तरस गया था। कूलर ख़राब हुआ तो ख़राब ही रहा , ठीक नहीं हुआ। हो सकता है बांदा जेल में तुम्हारा पंखा भी खराब हो जाए। ठीक ही न हो। फिर बांदा की गर्मी के क्या कहने ! ऐसे ही मरोगे तिल-तिल अपनी जान बचाते। बैरक की भीड़ में लाइन लगा कर खाना खाते , शौच के लिए बाथरूम की चौखट पर मूछ ऐंठते। अपनी बारी जोहते। कैमरे की नज़र में रहोगे। कोई जेल कर्मी पैसे ले कर भी तुम्हारी मदद नहीं कर पाएगा। 

तुम रास्ते में हो पर योगी ने अभी से तुम्हारी पल-पल की रिपोर्ट लेनी शुरू कर दी है। बस एक काम करना , मुख़्तार अंसारी  कि तुम आत्महत्या मत करना। ऐसी कोई ख़बर मत देना। अब देखो न , आज़म खान ने आत्महत्या की क्या ? नहीं न ! तुम भी मत करना। तब तक , जब तक कृष्णानंद राय समेत तमाम मामलों में तुम्हें फांसी की सज़ा न हो जाए। निश्चिंत रहो , मैं पूरे दावे के साथ कह रहा हूं कि अगर तुम ने आत्महत्या नहीं की तो तुम्हें फांसी की ही सज़ा मिलेगी और फांसी ही होगी। चाहे तो तुम्हारा कोई समर्थक मेरे इस लिखे को सेव कर के रख ले। ताकि सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए। कि तुम्हें फांसी होगी , हर हाल होगी। कोर्ट में अब तारीखें नहीं मिलेंगी। खटाखट सुनवाई और फ़ैसला होगा। फांसी के तख्ते पर यही क़ानून तुम्हें ले जाएगा , जिस की बिसात पर तुम ने बचने के तमाम बंदोबस्त किए अब तक। इस लिए भी कि अब निजाम बदल गया है। तुम्हारी मिजाजपुर्सी वाला निजाम अब टाइल और टोटी चोरी में व्यस्त है। 

मुझे याद है। बहुत अच्छी तरह याद है कि विधान सभा में जब सपाई गुंडे विधायकों ने मायावती को जान से मारने के लिए यत्न किए , हिंसा शुरू की तब मायावती के एक इशारे पर कैसे तो कवच-कुण्डल बन कर मायावती की सुरक्षा में तुम खड़े हो गए थे। सपा विधायकों की सारी गुंडई , सारी प्लानिंग को तुम ने अकेले दम पर ख़ामोश रह कर  फेल भी कर दिया था। और मायावती किसी शिशु की तरह बकैया-बकैया भागी थीं , विधान सभा से। और तुम पीछे-पीछे उन्हें किसी कमांडो की तरह कवर करते रहे थे , मुख़्तार अंसारी। यह सब जब मैं ने साक्षात विधान सभा की प्रेस गैलरी से देखा था तुम्हारी उस दिलेरी पर दिल आ गया था। पर जब आज ख़बरों में पाया कि आगरा से लखनऊ एक्सप्रेस वे पर तुम पत्तों की तरह कांप रहे थे तो सहसा यक़ीन नहीं हुआ। 

वह सपाई जो गेस्ट हाऊस में मायावती को नहीं मार पाए थे , उस दिन विधान सभा में घेर कर मारना चाहते थे। कल्याण सिंह सरकार को बहुमत मिले , न मिले इस पर सपा के गुंडे विधायकों को कुछ लेना-देना नहीं था। विधान सभा में उन की हिंसा का मक़सद सिर्फ़ मायावती की हत्या का था। वह अपने नेता मुलायम के अपमान का बदला लेना था उस मायावती से , जिस ने तत्कालीन मुख्य मंत्री , उत्तर प्रदेश मुलायम को कान पकड़ कर उठक-बैठक करवाया। इस उठक-बैठक की चुपके से फ़ोटो खिंचवाई और एक अख़बार में छपवा दिया।  

इसी बात का बदला वह गेस्ट हाऊस में मायावती की हत्या कर लेना चाहते थे। तब मौके पर सुबह-सुबह भाजपा विधायक ब्रह्मदत्त ने मायावती की जान बचाई थी। उसी दिन संसद में मामला उठा कर अटल बिहारी वाजपेयी ने भी मायावती को सुरक्षा दिलवाई थी। फिर समूची प्रदेश इकाई के खिलाफ होने के बावजूद मायावती को अटल जी ने मुख्य मंत्री बनवा दिया था। लेकिन जब अटल जी को अपना प्रधान मंत्री पद बचाने के लिए मायावती के समर्थन की ज़रूरत पड़ी तो समर्थन देने का वायदा कर के भी मायावती पलट गई थीं। उस मायावती को मुख़्तार अंसारी तुम ने उस दिन विधान सभा में जीवन दिया था।  

वह दृश्य मेरी आंखों में आज भी जस का तस बसा हुआ है। वह मायावती और उस का पिट्ठू वकील सतीश मिश्रा क्या तुम्हारे बचाव में खड़े होंगे भला ? हरगिज नहीं। तुम्हारी अरबों की संपत्ति ध्वस्त हो चुकी है। सेक्यूलर फोर्सेज का गिनती-पहाड़ा भी ध्वस्त हो चुका है। अब कुछ भी शेष नहीं रहा। शेष है तो बस तुम्हारी फांसी। इस तुम्हारी फांसी की प्रतीक्षा मुझे बड़ी बेसब्री से है। क्यों कि मैं मानता हूं कि तुम्हारे जैसे दुर्दांत अपराधी को जीने का कोई हक़ नहीं। राजनीति ही नहीं समाज में भी तुम्हें रहने का हक़ नहीं है। मनुष्यता के दुश्मन हो तुम और तुम्हारे जैसे लोग।


मुख़्तार अंसारी की पैरोकारी कर रहे , अजब कमीने लोग हैं यह


मुख़्तार अंसारी पंजाब की जेल से उत्तर प्रदेश की बांदा जेल क्या ले आया गया है , क़यामत  आ गई है। गोया वह पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की कैबिनेट में था और यहां उत्तर प्रदेश ला कर उसे जेल में ठूंस दिया गया। मुख़्तार की पारिवारिक  पृष्ठभूमि के सुनहरे पन्ने खंगाले जा रहे हैं कि दादा यह थे , नाना वह थे। अरे भाई राहुल गांधी के पिता , दादा , दादी भी क्या कम थे। 

तो क्या राहुल गांधी को भी प्रधान मंत्री की कुर्सी सौंप देनी चाहिए इस बिना पर। पारिवारिक पृष्ठभूमि खंगालने के साथ मुख़्तार अंसारी का अपहरण उद्योग , मुख़्तार अंसारी द्वारा की गई हत्याएं , मुख़्तार द्वारा बटोरी गई अरबों की संपत्ति भी खंगालनी चाहिए। पर यह तथ्य लोग भूल गए हैं। बस इतना जानते हैं कि पंजाब में वह ऐश कर रहा था , उत्तर प्रदेश में उस से पत्थर तुड़वाया जाएगा। 

फ़र्क़ तो खैर आया ही है कि पंजाब की जेल की बैरक से मुख़्तार अंसारी ह्वील चेयर से एम्बुलेंस तक आया। बांदा जेल की बैरक में पैदल गया बैरक में। 900 किलोमीटर के पूरे रास्ते के लिए पैसा खर्च कर दर्जनों मीडिया चैनल को हायर किया। ताकि कैमरे तने रहें और वह सुरक्षित रहे। फ़र्क़ तो आया है। 

बाक़ी मुख़्तार अंसारी मुसलमान है सो योगी सरकार उस के साथ अन्याय करेगी ही यह सेक्यूलर एजेंडा सेट है ही। गोया मुन्ना बजरंगी , विकास दूबे भी मुसलमान थे। बस नाम हिंदू थे सो रगड़ दिए गए। तौबा , तौबा ! मुसलमान होने की प्रिवलेज पर पाकिस्तान बना लिया। अब मुसलमान होने की प्रिवलेज पर हत्यारे मुख़्तार अंसारी को दारा शिकोह बना देना चाहते हैं लोग। सूफी बना देना चाहते हैं। मुख़्तार अंसारी की पैरोकारी कर रहे , अजब कमीने लोग हैं यह।


Wednesday, 10 March 2021

ममता बनर्जी की चोट के बहाने इंदिरा गांधी की नाक पर चोट की याद आ गई

 दयानंद पांडेय 


शिव पूजा , चंडी पाठ , नामांकन और पैर में चोट। एक ही दिन में ममता बनर्जी के साथ यह सब घट गया। रात हो गई है। हेलीकाप्टर उड़ नहीं सकता। नंदीग्राम से कोलकाता की सड़क बेहद ख़राब है। क़ायदे का अस्पताल भी नहीं है नंदीग्राम में। एयरपोर्ट है नहीं। विकास की जगह मुसलमान-मुसलमान करने वाली ममता बनर्जी के सामने उन का दस साल का कुशासन है। ग्रीन कारीडोर बना कर कोलकाता ले जाया जा रहा है। भगवान करें ममता बनर्जी जल्दी स्वस्थ हो जाएं।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इसे ममता बनर्जी का नाटक बताया है सहानुभूति पाने के लिए। और कहा है कि ममता को तुरंत सी बी आई जांच करवा लेनी चाहिए। ममता बनर्जी का कहना है कि साज़िशन उन के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी गई है। हालां कि मेरा मानना है कि ममता बनर्जी को सर्वदा गुस्से में नहीं रहना चाहिए। पैर में चोट गुस्से में भी आ सकती है। ममता असल में चुनाव आयोग से भी मुसलसल नाराज़ हैं। कई चरण में चुनाव करवाने से वह नाराज थीं हीं , अभी एक दिन पहले उन के चहेते पुलिस अफ़सर को डी जी पी पद से चुनाव आयोग ने हटा दिया। ममता का गुस्सा अपनी पुलिस पर भी गुस्सा हैं। बता रही हैं कि उस समय एस पी भी नहीं था। तो क्या उन की ही कार उन के ऊपर चढ़ गई ? जैसा कि वह कह रही हैं। 

पैर पर कार चढ़ने के बाद कोई बात करने लायक़ तो नहीं ही होता। न कुछ याद करने लायक़। मैं भीषण दुर्घटना से गुज़र चुका हूं। सो भुक्तभोगी हूं। 23 बरस बीत जाने के बाद भी आज तक मुझे अपनी दुर्घटना की याद नहीं है। जो लोगों ने बताया , टुकड़ों-टुकड़ों में वही जानता हूं। हां , अपना दुःख कभी नहीं भूला। ट्रक से एक्सीडेंट हुआ था। हमारी अंबेसडर पर ट्रक चढ़ गया था , सामने से। ड्राइवर और हमारे एक मित्र एट स्पॉट गुज़र गए थे। तमाम इलाज के बाद कैसे और कितना दुःख भोग कर अभी उपस्थित हूं , मैं ही जानता हूं। संयोग से तब मैं भी चुनाव कवरेज की ही यात्रा में था। लखनऊ से संभल जा रहा था। 18 फ़रवरी , 1998 की बात है। सीतापुर के पहले ख़ैराबाद में हमारी अंबेसडर और ट्रक की आमने-सामने की टक्कर थी। 

जो भी हो ,इस बहाने इंदिरा गांधी की याद आ गई है। एक बार उन के ऊपर भी चुनावी यात्रा में पत्थर चलाया गया था। उन की नाक पर चोट लगी थी। बाद में पता चला वह सब प्रायोजित था। कमलेश्वर ने  इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित उपन्यास काली आंधी में इस पत्थर प्रसंग का बहुत दिलचस्प वर्णन किया है। बाद में गुलज़ार ने काली आंधी की कथा पर आधारित एक फ़िल्म बनाई आंधी नाम से। फ़िल्म खूब चर्चा में आई। पर तभी इमरजेंसी लग गई। संजय गांधी की नज़र में यह आंधी फ़िल्म चढ़ गई। देश भर के सिनेमाघरों से आंधी फ़िल्म रातोरात उतार दी गई। संजय गांधी इतना कुपित हुए इस फ़िल्म से कि फ़िल्म के सारे प्रिंट भी जलवा दिए। वह तो ग़नीमत थी कि कहीं कोई एक प्रिंट किसी तरह बच गया था। सो इमरजेंसी के बाद उसी एक प्रिंट से फिर कई प्रिंट बनाए गए और फ़िल्म फिर से रिलीज हुई। 

अलग बात है कि इस आंधी फ़िल्म के चलते साल भर पुराना उन का दांपत्य भी टूट गया। हुआ यह कि आंधी फ़िल्म जब बनने की बात हुई तो गुलज़ार की पत्नी राखी ने नायिका की भूमिका करने की इच्छा गुलज़ार से बताई। लेकिन गुलज़ार ने राखी की इच्छा का सम्मान नहीं किया। पति पर उन का निर्देशक भारी पड़ गया। गुलज़ार ने आंधी की नायिका बंगला फ़िल्मों की मशहूर अभिनेत्री सुचित्रा सेन को चुना। सुचित्रा सेन ने इस भूमिका में प्राण फूंक दिया। निश्चित है कि आंधी में जो अभिनय सुचित्रा सेन ने किया है , राखी के वश का वह नहीं था। राखी भी हालां कि बहुत अच्छी अभिनेत्री हैं। लेकिन सभी भूमिका , सभी के लिए नहीं होती। राखी उस समय गर्भवती थीं। मेघना उन के पेट में थीं। लेकिन वह गुलज़ार से चुपचाप अलग हो गईं। 

ममता बनर्जी को इस पैर में चोट की सहानुभूति मिलती है इस चुनाव में कि नहीं , देखना दिलचस्प होगा। उस से भी ज़्यादा दिलचस्प यह देखना होगा कि मुस्लिम वोट बैंक की ठेकेदार ममता बनर्जी को हिंदू बनने का भी कितना लाभ मिलता है। क्यों कि बीते चुनावों में राहुल गांधी को मंदिर-मंदिर जाने का कोई लाभ नहीं मिला। यहां तक राहुल , ब्राह्मण बन कर अपना गोत्र दत्तात्रेय बताने लगे। लोगों ने उन का मजाक बनाया पर वोट नहीं दिया। ममता बनर्जी तो ब्राह्मण हैं ही , राहुल गांधी की तरह पारसी नहीं। पर जय श्री राम सुनते ही भड़कने वाली ममता बनर्जी को हिंदू होने की परीक्षा पास करना निश्चित ही कठिन लगा होगा सो आज पैर में चोट लगना स्वाभाविक था। जाने यह चोट स्वाभाविक है या ग़लत चंडी पाठ करने का कुपरिणाम। कौन जाने। पर सवाल तो है। पर इधर से सही या उधर से सही , खेला तो हो गया है। ममता बनर्जी इधर लगातार खेला होगा , का उद्घोष कर रही थीं। जो भी हो चुनाव आयोग ने इस बाबत रिपोर्ट तलब कर ली है।

Monday, 8 March 2021

आख़िर मिथुन चक्रवर्ती भी आईने के सामने खड़े हो कर आज लेफ्ट से राइट बन गए

 दयानंद पांडेय 


कोलकाता की रैली में आज मंच पर सरेआम नरेंद्र मोदी का चरण स्पर्श करने वाले मिथुन चक्रवर्ती भी आख़िर भाजपा की वाशिंग मशीन में आ गए। मिथुन चक्रवर्ती कभी लेफ्ट में लेफ्ट राइट करते थे। वामपंथी फ़िल्मकार और निर्देशक मृणाल सेन के अभिनेता हैं मिथुन चक्रवर्ती। मृगया मिथुन की पहली फ़िल्म है। इस फ़िल्म में अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला मिथुन को। पर मिथुन को इस की जानकारी तीन-चार दिन बाद मिली। 

वह तब मुंबई से कहीं बाहर थे। लौटे मुंबई तो लोगों ने उन्हें बधाई दी। बधाई उन्हें अच्छी नहीं लगी। लोगों को कुछ असामन्य लगा तो पूछा , बात क्या है ? तो मिथुन ने बताया तीन दिनों से कुछ खाया नहीं है। पहले कुछ खिलाओ तो बात समझ आए। मिथुन बहुत ग़रीबी का जीवन जीते हुए फिल्मों में आए। वामपंथियों की संगत में थे। आज अपनी ग़रीबी का मोदी की रैली में ज़िक्र भी किया मिथुन ने। सिर्फ़ एक गुरु फ़िल्म में ही मिथुन का अभिनय मुझे ठीक लगा है। बाक़ी फ़िल्मों में उन का अभिनय मुझे बकवास लगता है। मिथुन किसी भी कोण से बतौर अभिनेता मुझे पसंद नहीं हैं। 

लेकिन कभी ग़रीबी जीने वाले मिथुन चक्रवर्ती की क़िस्मत में पैसा और सफलता अपरंपार लिखी थी। वह स्टार बन गए। पैसा आ गया तो औरतबाज़ भी बन गए। बहुत सारी स्त्रियां उन की ज़िंदगी में हैं। उन की फिल्मोग्राफी इतनी बुलंद नहीं है , जितनी उन की ज़िंदगी में औरतें और क़िस्मत। श्रीदेवी सरीखी अभिनेत्रियां तक मिथुन चक्रवर्ती के स्कोर बोर्ड में शुमार रहीं। बड़बोले मिथुन चक्रवर्ती ने आज कोलकाता की रैली में अपना लेफ्ट का रंग भी दिखाया और बताया कि वह कोबरा हैं , पानी वाले सांप नहीं हैं। मतलब उपमा भी मिली तो सांप की ही मिली। 

बड़बोले मिथुन चक्रवर्ती तृणमूल कांग्रेस से राज्य सभा में भी रहे हैं। चिटफंड घोटाले में भी उन का नाम कभी चर्चा में रहा है। जो भी हो , मिथुन चक्रवर्ती अब आज से भाजपा में हैं। वह एक पुरानी मिसाल है कि कोई कितना भी बड़ा लेफ्ट हो , उसे आईने के सामने खड़ा कर दिया जाए तो वह फौरन राइट हो जाता है। मिथुन चक्रवर्ती आज उसी आईने के सामने खड़े हो गए। और फौरन लेफ्ट से राइट हो गए। अब पश्चिम बंगाल के चुनाव में भाजपा के लिए मिथुन चक्रवर्ती कितने लाभदायक साबित होंगे , यह आने वाला समय बताएगा। यह भी कि क्या मिथुन चक्रवर्ती पश्चिम बंगाल के अगले मुख्य मंत्री होंगे ? अलग बात है इस समय पश्चिम बंगाल में बहुतेरे लेफ्ट आईने के सामने खड़े हो कर राइट हो गए हैं। भाजपा का भगवा ध्वज थामे लेफ्ट के कई नाम हैं। मिथुन चक्रवर्ती अब आईने में खड़े हो कर क्या गुल खिलाते हैं , क्या रंग दिखाते हैं। देखना दिलचस्प होगा।

कुतर्की और नफरत के शिलालेख लिखने वाले जहरीले लोगों के विमर्श में फंसने से कृपया बचें

दयानंद पांडेय 


प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥

ढोल, गंवार, शुद्र, पशु , नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी॥

तुलसीदास कृत रामचरित मानस में सुंदर कांड की इस चौपाई के मद्देनज़र कुछ कुपढ़ , कुतर्की और नफरत के शिलालेख लिखने वाले जहरीले लोग न सिर्फ तुलसीदास को निशाने पर लेते रहने के अभ्यस्त हो चले हैं बल्कि समाज में घृणा फैलाने में अव्वल बन चुके हैं। दुर्भाग्य से बहुतेरे लोग इस फर्जी नारी विमर्श , पाखंडी दलित विमर्श के इस जहरबाद में उलझ कर इन नफरती लोगों के झांसे में आ भी जाते हैं। पर ध्यान रखिए कि अव्वल तो तुलसीदास मनुष्यता और सद्भावना के दुनिया के सब से बड़े और लोकप्रिय कवि हैं। मर्यादा ही उन की पहली प्राथमिकता है। स्त्री की मर्यादा सर्वोच्च है तुलसी के यहां। स्त्री अस्मिता का अविस्मरणीय महाकाव्य है रामचरित मानस। राम और सीता की कथा। 

आप ध्यान दीजिए कि तुलसी सुरसा सरीखी स्त्री को भी माता से संबोधित करते हैं। हनुमान सुरसा को माता ही कहते रहते हैं। इतना ही नहीं मंदोदरी और त्रिजटा के लिए भी कहीं कोई अपमानित करने वाला शब्द इस्तेमाल नहीं करते तुलसी कभी। तुलसी तो स्त्री को देवी कहते नहीं अघाते। वह लिखते ही हैं :

एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बच क्रम पतिहितकारी।

स्त्री पुरुष दोनों को बराबरी में बिठाते मिलते हैं तुलसीदास रामचरित मानस में। आप को पूछना ही चाहिए , पूछते ही हैं लोग फिर ढोल, गंवार, शुद्र, पशु , नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी॥ लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी तुलसीदास को। जानते हैं आप को यह क्यों पूछना और पूछते हुए भी नाराज क्यों होना होता है ?

दो कारणों से। एक कारण यह कि आप जहरीले लोगों के उकसावे में आ जाते हैं। कौआ कान ले गया में फंस जाते हैं।  दूसरा और महत्वपूर्ण कारण यह है कि आप इस उकसावे में यह भी भूल जाते हैं कि तुलसीदास ने रामचरित मानस हिंदी में नहीं अवधी में लिखी है। अवधी जुबान है रामचरित मानस की। और कि किसी भी अवधी वाले से , अवधी जानने वाले से पूछ लीजिए कि अवधी में ताड़न शब्द का अर्थ क्या है ? वह फौरन बताएगा , ख्याल करना , केयर करना। सहेज कर रखना। ताड़ना मतलब देख-रेख करना। मार पीट करना नहीं। ढोल को आप केयरफुली नहीं बजाएंगे , ध्यान से नहीं रखेंगे तो निश्चित ही वह फट जाएगी। ढोल जब फट जाएगी तो आप फिर बजाएंगे कैसे भला।  तो तुलसी कहते हैं , ढोल को संभाल कर रखिए और बजाइए। 

गंवार अगर कोई है तो आप उस के हाथ परमाणु कार्यक्रम तो छोड़िए , घर के किसी सामान्य कार्य की भी शायद ही कोई ज़िम्मेदारी दें। अगर मैं जहाज चलाने के लिए गंवार हूं यानी अनभिज्ञ हूं और जो गलती से कॉकपिट में बैठ जाता हूं तो जहाज चलाने के जानकार लोग , पायलट लोग मेरा ध्यान नहीं रखेंगे तो जहाज और जहाज में बैठे लोगों का क्या हाल होगा , यह भी क्या बताने की ज़रूरत है ? शूद्र यानी सेवक का ख्याल कौन नहीं रखता ? बहुत पीछे मत जाइए , घर में अपनी बेगमों को देखिए कि काम वालियों से कितना मृदु व्यवहार रखती हैं। कितना ख्याल रखती हैं , कितना मान और सम्मान करती हैं उन का। और पहले के समय में तो लोग अपने सेवकों को राजपाट तक थमा देते थे। इतना ख्याल रखते थे। एक नहीं , अनेक किस्से हैं इस बाबत। पशु चाहे कोई भी हो , शेर , गाय , बकरी या कुत्ता , बिल्ली , हाथी , घोड़ा , हर किसी का ध्यान आप नहीं रखते ? 

घर में हमारी अम्मा , बुआ , दीदी , पत्नी , बेटी कितना तो ख्याल रखती हैं हम सब का। लेकिन घर से बाहर होते ही इन्हीं अम्मा , बुआ , पत्नी , बेटी , दीदी को आप कोई काम करने भी देते हैं क्या ? ज़रा भी इन के प्रति लापरवाह होते हैं क्या ? क्यों लगातार ताड़ते रहते हैं कि इन पर कोई बुरी नज़र न पड़े , कोई विपत्ति न पड़े। कोई परेशान न करे। जहाज हो , ट्रेन हो , बस हो , कार हो , रिक्शा , ऑटो कुछ भी हो , हर जगह ताड़े रहते हैं। घर में एक गिलास पानी भी ले कर न पीने वाले हम जैसे लोग भी बाहर होते ही हर चीज़ इन के लिए दौड़-दौड़ कर लाने लगते हैं। चाहे वह कितने भी बड़े लाट गवर्नर ही क्यों न हों , घर परिवार की स्त्रियों को निरंतर ताड़ते रहते हैं। 

दिक्क्त यह है कि अगर आप अवधी नहीं जानते , अवधी को हिंदी के ज्ञान से बांचेंगे , जहरीले लोगों के भाष्य में फंस कर , उन की जहरीली परिभाषा में फंस कर रामचरित मानस और तुलसीदास का मूल्यांकन करेंगे तो यह अनर्थ तो होगा ही। हर भाषा की अपनी पहचान , अपना मिजाज और अपनी व्याख्या होती है। सो पहले उस भाषा , उस की तबीयत और उस का मिजाज ज़रूर जान लीजिए। फिर कोई फैसला करिए या सुनिए। भारत में ऐसी बहुत सी भाषाएं हैं जिन के शब्द एक हैं ज़रूर पर अर्थ अलहदा हैं। यह उर्दू के साथ भी है , मराठी , तमिल , कन्नड़ , तेलगू , आसामी , बंगाली के साथ भी है। उर्दू में तो एक नुक्ता हटते ही उसी शब्द का अर्थ फौरन बदल जाता है। अवधी ही नहीं , हमारी भोजपुरी में ही एक ही शब्द भोजपुरी के अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग ध्वनि और अर्थ में उपस्थित हैं। अब हिंदी में अकसर लोग कहते हैं , अरे यह तो हमारा धर्म था , हमारा कर्तव्य था। अब इसी को अंगरेजी में कहेंगे , दिस इज माई ड्यूटी ! भारत में तो कोई इस का बुरा नहीं मानेगा। पर यही दिस इज माई ड्यूटी ! लंदन में किसी से कह कर देखिए ! वह गुस्सा हो जाएगा।  मारने को दौड़ा लेगा। क्यों कि वहां यह निगेटिव माना जाता है , दिस इज माई ड्यूटी ! लगता है उस के साथ ज़्यादती हो गई। जबरिया हो गया। तो मित्रों , दलित और स्त्री विमर्श के इन जहरीले विमर्शवादियों से ज़रा नहीं , पूरा संभल कर। इन की नफरत में न फंसिए। अवधी , रामचरित मानस और तुलसीदास को प्रणाम कीजिए। अपनी स्त्री शक्ति को प्रणाम कीजिए। महिला दिवस पर इन्हें और सशक्त कीजिए। साथ ही रामायण का एक प्रसंग देखिए अभी-अभी याद आ गया है , उसे भी सुनते जाइए। 

क्या हुआ कि अशोक वाटिका में कैदी सीता से रावण ने एक बार बहुत मनुहार किया कि एक बार ही सही सीता , रावण को कम से कम एक नज़र देख तो लें। सीता किसी तरह तैयार हुईं और रावण को देखा। लेकिन तिनके की आड़ से देखा। यह प्रसंग जब मंदोदरी को पता चला तो मंदोदरी ने रावण को बहुत चिढ़ाया। तंज किया। कहा कि इतने बड़े बाहुबली को भी सीता ने देखना ठीक नहीं समझा। देखा भी तो तिनके की आड़ ले कर। फिर मंदोदरी ने रावण को सलाह दी कि इतना छल-कपट , तीन-तिकड़म और माया जानते हो , मायावी हो , मारीच को हिरन बना कर भेज सकते हो तो क्यों नहीं एक बार खुद राम बन कर सीता के पास चले जाते और सीता को संपूर्ण पा लेते। रावण यह सुन कर उदास हो गया। और बोला , किया , यह उपाय भी किया। लेकिन दिक्क्त यह है कि राम का रूप धरते ही सारी स्त्रियां मां के रूप में दिखने लगती हैं। मैं करूं भी तो क्या करूं ?

तो जिस तुलसी का रावण भी राम का रूप धरते ही सीता समेत सभी स्त्रियों को मां के रूप में देखने लगता है , वह तुलसी इसी रामायण में भला कैसे स्त्री को पिटाई का अधिकारी बता सकते हैं। सोचने , समझने की बात है। बाकी आप का अपना विवेक है , अपनी समझ और अपनी दृष्टि है। आप किसी भी परिभाषा और दृष्टि को मानने को पूरी तरह स्वतंत्र है। कोई बाध्यता थोड़ी ही है , कि आप मुझ से , मेरी बात से सहमत ही हों। 

महिला दिवस की अशेष मंगलकामनाएं !



Saturday, 6 March 2021

हिंदी आलोचना और लेखन में भी एक से एक राहुल गांधी

दयानंद पांडेय 

अपनी हिंदी आलोचना और लेखन में भी एक से एक राहुल गांधी उपस्थित हैं। बस उन्हें एक एक्सपोजर भर की ज़रूरत होती है। जैसे कि बिलकुल अभी सुल्तानपुर के एक गांव कुरंग में रेणु पर आयोजित एक कार्यक्रम में लखनऊ से गए आलोचक वीरेंद्र यादव ने बेल के पेड़ पर फले बेल को देख कर प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा कि बहुत सुंदर आम आए हैं। फेसबुक लाइव पर यह प्रसारित हो गया। ग़नीमत कि शिवमूर्ति के घर के बगल के खेतों में गेहूं , चना या अरहर के पेड़ पर नहीं चढ़ गए। जो चढ़ गए होते तो सोचिए कि क्या ग़ज़ब होता। असल में जो प्रकृति और वनस्पति का अर्थ नहीं समझते , वह बौर के समय में , फागुन में भी बड़ा-बड़ा आम देख लेते हैं। गोया दक्षिण भारत में हों। श्रीलंका में हों। तो यह लोग आलोचना में किसी रचना को कैसे और किस तरह देखते होंगे। किस बेईमानी और किस तराजू से देखते होंगे। अच्छी से अच्छी रचना आ जाए , आंख मूंद लेंगे। रद्दी से रद्दी रचना छप कर आई भी नहीं होती है या आते ही इन की आलोचना आ जाती है। अहा-अहा करते हुए। तो इसी कार्यक्रम में रेणु पर संजीव द्वारा रेणु पर लगाए गए आपत्तिजनक आरोपों के साथ ही वीरेंद्र यादव के बेल की भी चर्चा हो रही है। यह सब अचानक नहीं हो रहा। असल में ये लोग रचना , रचना की प्रवृत्ति और वनस्पति भी नहीं जानते। 

सिर्फ़ और सिर्फ़ एजेंडा जानते हैं। इस एजेंडे के तहत नफ़रत की नागफनी , जहर और जहर बोना जानते हैं। सारी आग और तमाम प्रतिरोध के गान के बावजूद यह लोग इसी लिए फुस्स हैं। क्यों कि साहित्य समाज का सेतु है। समाज में तोड़-फोड़ और नफ़रत बोने का हथियार नहीं। रेणु भी इसी एजेंडे के तहत इन्हें रचनाकार नहीं लंपट नज़र आते हैं। ये लोग उस रूसी तानाशाह जोसेफ विस्सारवियानोविच स्टालिन के अनुयायी हैं जिस ने अपने कार्यकाल में अपनी तानाशाही और हिंसा में डेढ़ करोड़ लोगों को मौत के घाट उतार दिया। अस्सी लाख सैनिकों को मरवा दिया। बीते 5 मार्च को स्टालिन की 68 वीं पुण्य-तिथि थी। स्टालिन की राह पर चलते हुए ये लोग साहित्य में भी वही हिंसा , वही तानाशाही का बिगुल बजाए हुए हैं। वीरेंद्र यादव कैंप कहिए या गिरोह कहिए , इस गिरोह के लेखक भी इसी तरह का दुर्निवार लेखन करने के लिए जाने जाते हैं। अखिलेश इस गैंग के इन दिनों मुखिया माने जाते हैं। खुद अखिलेश अपने उपन्यास निर्वासन में इसी तरह की विद्वता झाड़ते उपस्थित मिलते हैं। 

प्रसंग कई हैं। पर एक प्रसंग का जायजा लीजिए। एक चरित्र कलक्ट्रेट से गुज़रते हुए इतनी तेज़ हवा खारिज करता है कि कलक्ट्रेट के भीतर ट्रेजरी में हड़कंप मच जाता है। क्या तो कहीं बम फट गया है। जानने वाले जानते हैं कि बम फटने और हवा खारिज करने की ध्वनि और उस की गूंज कितनी और क्या होती है। फिर अव्वल सवाल यह कि क्या किसी कलक्ट्रेट की ट्रेजरी सड़क किनारे होती है क्या भला। लेकिन सवाल है कि जिस गैंग के लोग पेड़ पर बेल फला है कि आम , नहीं समझ पाते उस गैंग के लोग कुछ भी लिख और बता सकते हैं। एजेंडा लेखन की महिमा की इति और अति है यह। 

इसी गैंग के एक और लेखक हैं रवींद्र वर्मा। उन्हों ने भी अपने एक उपन्यास में महुआ तोड़ कर खाने का विवरण दिया है। अब उन्हें कौन समझाए कि महुआ कभी तोड़ा नहीं जा सकता। पर गैंग है , सेक्यूलरिज्म के छौंक की आड़ है , लाल सलाम की गरमी भी। सो आप कुछ भी लिखें , कुछ भी पढ़ें। सब गुड है। सब प्रशंसनीय है। मनोहर श्याम जोशी का एक उपन्यास है कुरु कुरु स्वाहा। उस में एक प्रसंग आता है कि एक कपड़े की दुकान पर सेठ जी जब भी कभी हवा खारिज करते हैं तो दुकान पर काम करने वालों से चिल्ला कर पूछते हैं , कौन थान फाड़ रहा है। तो यह आलोचक , यह लेखक , यही सेठ जी लोग हैं। हवा खारिज करने को थान फाड़ने की व्यंजना में गुम कर देते हैं। 

क्या है कि राजनीति में राहुल गांधी बेवजह बात-बेबात बदनाम कर दिए जाते हैं। पर जानने वाले जानते हैं कि उन के परिवार में यह उलटबासियां परंपरा में हैं। राजीव गांधी के लिए भी तमाम ऐसे किस्से हैं। पर तब के दिनों सोशल मीडिया नहीं था सो तमाम बातें दब-ढंक जाती थीं। पर एक क़िस्सा सुनिए। राजीव गांधी राजस्थान के किसी गांव में अचानक पहुंचे और खलिहान में गए। वहां उन्हों ने देखा कि खलिहान में एक तरफ लाल मिर्च रखी थी , दूसरी तरफ हरी मिर्च। राजीव गांधी ने किसानों से पूछा कि लाल मिर्च के ज़्यादा पैसे मिलते हैं कि हरी मिर्च के। किसानों ने बताया कि लाल मिर्च के। तो राजीव गांधी ने किसानों से कहा कि जब लाल मिर्च के ज़्यादा पैसे मिलते हैं तो सिर्फ़ लाल मिर्च बोओ। हरी मिर्च क्यों बोते हो।  किसानों ने अपना माथा ठोंक लिया। पर प्रधान मंत्री थे , सो चुप रहे।  इसी तरह एक चुनाव में मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप को धोने और सॉफ्ट हिंदुत्व को दिखाने के लिए अयोध्या से चुनाव प्रचार शुरू किया। जनसभा में बोलते-बोलते राजीव गांधी बोले , इसी क्षेत्र में एक नैमिषारण्य जी भी हुए हैं। बहुत बड़े ऋषि थे वह। अब उन्हें यह बताने वाला कोई नहीं था कि नैमिषारण्य किसी ऋषि का नाम नहीं , जगह का नाम है। पर जड़ों से कटे लोग ऐसे ही बात करते हैं। 

संजय गांधी अपने भाषणों में कहते ही रहते थे कि पेड़ बोओ , गुड़ बोओ। एक बार जब संजय गांधी की चुनाव लड़ने की इच्छा हुई तो देश भर में कांग्रेस शासित प्रदेशों के मुख्य मंत्रियों ने संजय गांधी को अपने-अपने प्रदेश से प्रत्याशी बनाने के लिए प्रस्ताव दर प्रस्ताव की मुहिम चला दी। उस समय उत्तर प्रदेश में नारायणदत्त तिवारी मुख्य मंत्री थे। तिवारी जी ने संजय गांधी को रायबरेली के बगल में अमेठी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा। हेलीकाप्टर से अमेठी का दौरा करवाया। सर्दियों के दिन थे। नीचे खासी हरियाली दिखी तो संजय गांधी ने हेलीकाप्टर में बैठे-बैठे तिवारी जी से पूछा , यह कौन सी फसल है। तिवारी जी को भी उस फसल के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। पर छूटते ही तिवारी जी ने संजय गांधी को बताया कि यहां की सारी फसलें हरी-भरी हैं। यह सुनते ही संजय गांधी ने अमेठी से चुनाव लड़ना फाइनल कर दिया और बोले , डन ! वह तो चुनाव जीतने के बाद संजय गांधी को बताया गया कि वह हरी-भरी फसल , कोई फसल नहीं , सरपत थी। सरपत ऊसर में पैदा होता है। ऊसर में कोई फसल नहीं होती। संजय गांधी का माथा ठनका। फिर अमेठी में उद्योग की बात वह करने लगे। अलग बात है , असमय ही संजय गांधी का निधन हो गया। 

ठीक ऐसे ही बेल को आम समझने वाले आलोचकों की आलोचना भी असमय अवसान पर है। महुआ तोड़ कर खाने वाले प्रसंग लिखने वाले और हवा खारिज कर बम विस्फोट से ट्रेजरी हिला देने वाले लेखकों के लेखन की पाठक क्या गति बनाते हैं , किसी से छुपा नहीं है। लेकिन चूंकि एक व्यवस्थित गैंग है इन लेखकों के पास सो एक दूसरे की पीठ खुजाते हुए राहुल गांधी की तरह आलू से सोना बनाने की तरकीब में लगे हुए हैं। अब अगर किसी लेखक-आलोचक  के पास आम और बेल की शिनाख्त की समझ नहीं है ,समझ नहीं है कि रेणु जैसे लेखक की जन्म-शताब्दी पर आयोजित कार्यक्रम में क्या बोलना है और क्या नहीं , सिर्फ अपना उग्र और कुंठित एजेंडा ही कायम रखना है तो तौबा , तौबा ! ख़ुदा खैर करे !  रूपा सिंह ने संजीव की आपत्तिजनक आपत्तियों का प्रतिवाद करते हुए उचित ही लिखा है :

यह कोई विवाद का विषय है कि 

‘रेणु की आठ प्रेमिकाएँ थीं ...?’

अस्सी हों भाई ! वे अस्सी जानेंगी, आप क्यूँ परेशान ?

सोबती से किसी ने पूछा कभी, सुना था आपका एक प्रेम प्रसंग था ? तो जवाब मिला- सुनिये मेरी इतनी बुरी हालत कभी नहीं थी, जहाँ सिर्फ़ एक ही प्रेम - प्रसंग होता।

कहाँ है वह ताक़त साहित्य की तुम्हारे  .. पैदा करो न भीष्म साहनी, श्री लाल शुक्ल , रेणु या और एक अमरकान्त ..?

जिनके प्रेम में हम तड़प जाएँ होने को गिरफ़्तार

महुआ तोड़ कर खाने और हवा खारिज कर बम फोड़ कर ट्रेजरी में हड़कंप मचाने की आज़ादी  इन्हें बख्श दीजिए ! बाक़ी ले के रहेंगे आज़ादी का उग्र नारा भी इन के पास पहले से है ही। ये लोग इसे मांगें , उस से पहले ही उन्हें दे दीजिए। आप अपनी पाठकीय दुनिया में ख़ुश रहिए , वह अपनी लेखकीय दुनिया में ख़ुश रहें। आख़िर इन की सभी रचनाएं और आलोचना हरी-भरी है तो आप को क्या किसी डाक्टर ने कहा है यह बताने को कि यह रचना नहीं , आलोचना नहीं , सरपत है। खर-पतवार है। इन्हें उखाड़ने या फेकने की कोई ज़रूरत नहीं है। यह अभिशप्त हैं खुद-ब-खुद सूख जाने के लिए। खुद-ब-खुद सूखने दीजिए। इस लिए भी कि रचना और आलोचना की भी अपनी प्रकृति होती है। अपनी प्रवृत्ति होती है। वनस्पति और सुगंध होती है। सच आनंद बहुत आता है। निर्मल आनंद। जब पूंजीवाद का डट कर विरोध करते हुए फ़ेसबुक पर ये लोग अपनी किसी किताब के अमेज़न पर होने का लिंक परोसते हैं। गरज यह कि यह हिप्पोक्रेसी भी निहुरे-निहुरे। हालां कि इन के पास किताब है भी कितनी। 



Monday, 1 March 2021

मोहम्मद इक़बाल की राह पर अग्रसर असग़र वजाहत

दयानंद पांडेय 


आप हिंदी के महत्वपूर्ण लेखक हैं। आप की चिंता में देश , भारतीय समाज के बड़े फलक की जगह सिर्फ़ मुसलमान ही क्यों हैं। आख़िरी समय में जिन्ना ने भी यही किया था। जिन्ना भी कभी प्रगतिशील था। पर अल्टीमेटली वह लीगी बन गया। पाकिस्तान बनवा कर मनुष्यता का दुश्मन बन गया। कभी बहुत ध्यान से पाकिस्तान के मुसलमान और भारत के मुसलमान का तुलनात्मक अध्ययन कर लीजिए। मुस्लिम समाज , सिर्फ़ मुस्लिम समाज की चिंता करना शायद भूल जाएंगे। क्षमा कीजिएगा असग़र वजाहत जी , आप की इधर की तमाम टिप्पणियां डराती हैं। लीगी होने की ध्वनि आती है आप की टिप्पणियों में। आप बहुत तेज़ी से मोहम्मद इक़बाल होने की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। बस अब आप को एक जिन्ना की तलाश है। यह बहुत ख़तरनाक़ रास्ता है। मनुष्यता के ख़िलाफ़ रास्ता है। एक बड़े लेखक का यह विचलन हैरत में डालता है। इक़बाल भी बड़े शायर थे। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा जैसा गीत लिखा था इकबाल ने। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि वह पाकिस्तान के संस्थापकों में शुमार हो गए। असग़र वजाहत भी क्या इक़बाल की राह पर तो नहीं हैं। सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिम वोट की चिंता में दुबले होते हुए। ख़ुदा करे ऐसा बिलकुल न हो। सेक्यूलर होने का चोंगा ओढ़े लोग आप के ईगो मसाज में भले दिन-रात खड़े हों पर यह देश के लिए शुभ नहीं है। भारतीय समाज के लिए शुभ नहीं है। मुस्लिम समाज के लिए तो हरगिज नहीं।

इस लिए भी कि पुरानी मिसाल है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। भाजपा और ओवैसी दोनों ही इस मिसाल को समझ कर अपनी-अपनी बिसात पर खेल रहे हैं। लेकिन धर्मनिरपेक्षता की आड़ में यही खेल कांग्रेस , कम्युनिस्ट और बाक़ी क्षेत्रीय दलों ने भी लंबा खेला है। मुस्लिम वोट बैंक बनाया किस ने। इन्हीं लोगों ने न ? और मुस्लिम मुख्य धारा में आने के बजाय , बराबरी का नागरिक बनने के बजाय मुस्लिम -मुस्लिम ही ओढ़ते-बिछाते रहे। 

पाकिस्तान बनने के बाद भी हिंदू-मुसलमान का खेल बंद नहीं हुआ। देश का माहौल पूरी तरह दूषित और सांप्रदायिक हो गया है। निश्चित रूप से मुस्लिम समाज इस के लिए ज़्यादा दोषी है। आख़िर पाकिस्तान बना ही धर्म की बुनियाद पर था। बड़ी ग़लती यही हुई। भाजपा के लोग मानते हैं कि अगर धर्म के नाम पर आप ने एक देश ले लिया। उसे दो देश बना लिया तो फिर अब काहे का मुस्लिम-मुस्लिम। समान नागरिक बन कर रहिए न। प्रिवलेज किस बात का भला। कब तक मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेलते रहेंगे। पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी बड़ी मिसाल हैं इस की। तमाम देशों में राजनयिक रहने , दस बरस उप राष्ट्रपति रहने के बाद भी भारत में खुद को , मुसलमान को असुरक्षित पाते हैं। 

भले देर से सही , भाजपा ने मुस्लिम समाज के इस दोष की शिनाख्त कर ली है। इस शिनाख्त का ही लाभ भाजपा को मिल भी रहा है। भाजपा को यह लाभ दिलाने में कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज तीनों ही सहयोगी की भूमिका में हैं। बुनियाद वही है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। जिस दिन मुस्लिम समाज , मुस्लिम पहचान से अलग हो कर सामान नागरिक बन कर देश में रहने लगेंगे , भाजपा की दुकान उसी दिन बंद हो जाएगी। लेकिन आज जिस तरह घृणा और नफ़रत फैला कर कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज भाजपा से लड़ रहे हैं , ऐसे तो कतई नहीं। आप बड़े लेखक हैं , आप से ज़्यादा क्या कहना। जिन लाहौर नई देख्या जैसे मक़बूल नाटक के लेखक हैं आप। 

फिर भी एक बार फिर मूल बिंदु की याद दिलाता चलता हूं , अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं , भाजपा की एकमात्र ताक़त यही है। इस ताक़त को तोड़िए , ओवैसी अपने आप खत्म हो जाएगा। भाजपा इस से ज़्यादा। लेकिन कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज अपनी घृणा और नफ़रत की लड़ाई का जो हथियार बना चुके हैं , जो सांचा बना चुके हैं , उसे कौन बदलेगा। कौन तोड़ेगा यह सांचा। फ़िलहाल तो यह नामुमकिन दीखता है। 

मेरी बात अगर आप को ग़लत लगती है तो इस का परिक्षण अभी पश्चिम बंगाल के चुनाव में एक बार फिर देख लीजिएगा। बहुत हद तक केरल में भी। क्यों कि कांग्रेस , कम्युनिस्ट , क्षेत्रीय दल और मुस्लिम समाज अभी तक एकपक्षीय सांप्रदायिकता , इकहरी धर्मनिरपेक्षता के रेगिस्तान में रहने की अभ्यस्त हैं। लेकिन इस एकपक्षीय सांप्रदायिकता , इकहरी धर्मनिरपेक्षता की मलाई अब खत्म हो चुकी है। यह तथ्य भी समय रहते जान लेने में नुक़सान नहीं है। कांग्रेस के नाराज लोग भी अब कश्मीर में जा कर भगवा पगड़ी बांधे दिख रहे हैं। 

बहुसंख्यक हिंदुओं को हिंदू-हिंदू कह कर चिढ़ाने की ग़लती शायद उन्हें समझ आ गई है। नरेंद्र मोदी से सीखने की बात ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे लोग कश्मीर में जा कर कह रहे हैं। ज़रा सा किसी एक से असहमत होते ही उसे संघी , भाजपाई की गाली देने की अदा ने , इस निगेटिव प्रवृत्ति ने कितना अकेला कर दिया इकहरी धर्मनिरपेक्षता का स्वांग रचने वालों को। देख लीजिए। यह कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे पाकिस्तान , भारत से लड़ाई लड़े। एटम बम की खोखली धमकी दे। 

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ की एक बात याद आती है। जब बालाकोट एयर स्ट्राइक हुई और पाकिस्तान के इमरान और बाजवा एटम बम-एटम बम बोलने लगे थे , सर्वदा की तरह। तब मुशर्रफ ने कहा था पाकिस्तानी हुक्मरानों से कि ग़लती से भी एटम बम मत चलाना। अगर एक एटम बम चलाओगे तो इंडिया इतने एटम बम चला देगा कि पाकिस्तान दुनिया के नक्शे से खत्म हो जाएगा। और फिर पाकिस्तान के पास एटम बम हैं कितने। 

यह बात भारत की इकहरी धर्म निरपेक्षता की बात करने वाली पार्टियों के लोगों और मुस्लिम समाज के लिए भी विचारणीय है। देश में अल्पसंख्यक सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं हैं। ईसाई , पारसी , बौद्ध , जैन , सिख आदि भी हैं। एक मुस्लिम समाज को ही इतनी समस्या क्यों है। एक मुस्लिम समाज से ही बहुसंख्यक समाज क्यों भयाक्रांत रहता है। क़ानून व्यवस्था के सामने मुस्लिम समाज ही चुनौती बन कर क्यों उपस्थित रहता है। वह चाहे कांग्रेस राज रहा हो , मिली-जुली सरकारों का रहा हो या भाजपा के नेतृत्व वाली एन डी ए की सरकार का। इन बिंदुओं पर मुस्लिम समाज को चिंतन करना चाहिए। बात फिर वहीँ आ कर टिक जाती है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। 

सिद्धांत पुराना है , क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया। भाजपा को कम्युनिस्ट लोग शायद इसी लिए प्रतिक्रियावादी कहते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां अपने इसी अंतर्विरोध के कारण भारत की संसदीय राजनीति से खारिज हो गईं। घृणा और नफ़रत फैलाते-फैलाते जनता-जनार्दन के बीच खुद घृणित बन गईं। पश्चिम बंगाल , त्रिपुरा में लाल क़िला खत्म होने के बाद अब केरल में भी वह मुश्किल में आते दिख रहे हैं।

[ हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत की एक पोस्ट पर मेरी यह टिप्पणी : ]


हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत की ताज़ा दो पोस्ट यह हैं  :

यदि भारत के सभी मुसलमान ओवैसी को वोट दे दें तब भी पार्लियामेंट में उनकी 50- 60 से अधिक सीटें नहीं हो सकतीं और उसकी प्रतिक्रिया में बीजेपी की 400 से अधिक सीटें  होंगी।

क्या ऐसी सूरत में ओवैसी मुसलमानों का कोई भला कर पाएंगे?

देश के गरीब, साधारण लोगों के हित में जो नीतियां बनाई जाएंगी उससे मुसलमानों को भी  फायदा होगा। बेरोजगारी,गरीबी, महंगाई देश के आम लोगों की बुनियादी समस्याएं हैं। यही मुस्लिम समाज की भी बुनियादी समस्याएं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बाजारीकरण, बिजली पानी की बढ़ती हुई दरें, पर्यावरण पर मंडराता खतरा, सांप्रदायिकता, जातिवाद, अपराध और हिंसा जिस तरह गरीब देशवासियों की समस्याएं हैं उसी तरह मुसलमानों की भी है।

इसलिए देश के गरीब, सामान्य लोगों के हितों की रक्षा करने वाले राजनीतिक दल ही मुसलमानों को फायदा पहुंचा सकते हैं। अलगाववादी मुस्लिम राजनीतिक दल मुसलमानों का भावनात्मक शोषण तो कर सकते हैं, उन्हें कोई फायदा नहीं पहुंचा सकते।

Sunday, 28 February 2021

मिसाल पुरानी है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं

दयानंद पांडेय 

पुरानी मिसाल है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। भाजपा और ओवैसी दोनों ही इस मिसाल को समझ कर अपनी-अपनी बिसात पर खेल रहे हैं। लेकिन धर्मनिरपेक्षता की आड़ में यही खेल कांग्रेस , कम्युनिस्ट और बाक़ी क्षेत्रीय दलों ने भी लंबा खेला है। मुस्लिम वोट बैंक बनाया किस ने। इन्हीं लोगों ने न ? और मुस्लिम मुख्य धारा में आने के बजाय , बराबरी का नागरिक बनने के बजाय मुस्लिम -मुस्लिम ही ओढ़ते-बिछाते रहे। 

पाकिस्तान बनने के बाद भी हिंदू-मुसलमान का खेल बंद नहीं हुआ। देश का माहौल पूरी तरह दूषित और सांप्रदायिक हो गया है। निश्चित रूप से मुस्लिम समाज इस के लिए ज़्यादा दोषी है। आख़िर पाकिस्तान बना ही धर्म की बुनियाद पर था। बड़ी ग़लती यही हुई। भाजपा के लोग मानते हैं कि अगर धर्म के नाम पर आप ने एक देश ले लिया। उसे दो देश बना लिया तो फिर अब काहे का मुस्लिम-मुस्लिम। समान नागरिक बन कर रहिए न। प्रिवलेज किस बात का भला। कब तक मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेलते रहेंगे। पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी बड़ी मिसाल हैं इस की। तमाम देशों में राजनयिक रहने , दस बरस उप राष्ट्रपति रहने के बाद भी भारत में खुद को , मुसलमान को असुरक्षित पाते हैं। 

भले देर से सही , भाजपा ने मुस्लिम समाज के इस दोष की शिनाख्त कर ली है। इस शिनाख्त का ही लाभ भाजपा को मिल भी रहा है। भाजपा को यह लाभ दिलाने में कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज तीनों ही सहयोगी की भूमिका में हैं। बुनियाद वही है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। जिस दिन मुस्लिम समाज , मुस्लिम पहचान से अलग हो कर सामान नागरिक बन कर देश में रहने लगेंगे , भाजपा की दुकान उसी दिन बंद हो जाएगी। लेकिन आज जिस तरह घृणा और नफ़रत फैला कर कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज भाजपा से लड़ रहे हैं , ऐसे तो कतई नहीं। आप बड़े लेखक हैं , आप से ज़्यादा क्या कहना। जिन लाहौर नई देख्या जैसे मक़बूल नाटक के लेखक हैं आप। 

फिर भी एक बार फिर मूल बिंदु की याद दिलाता चलता हूं , अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं , भाजपा की एकमात्र ताक़त यही है। इस ताक़त को तोड़िए , ओवैसी अपने आप खत्म हो जाएगा। भाजपा इस से ज़्यादा। लेकिन कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज अपनी घृणा और नफ़रत की लड़ाई का जो हथियार बना चुके हैं , जो सांचा बना चुके हैं , उसे कौन बदलेगा। कौन तोड़ेगा यह सांचा। फ़िलहाल तो यह नामुमकिन दीखता है। 

मेरी बात अगर आप को ग़लत लगती है तो इस का परिक्षण अभी पश्चिम बंगाल के चुनाव में एक बार फिर देख लीजिएगा। बहुत हद तक केरल में भी। क्यों कि कांग्रेस , कम्युनिस्ट , क्षेत्रीय दल और मुस्लिम समाज अभी तक एकपक्षीय सांप्रदायिकता , इकहरी धर्मनिरपेक्षता के रेगिस्तान में रहने की अभ्यस्त हैं। लेकिन इस एकपक्षीय सांप्रदायिकता , इकहरी धर्मनिरपेक्षता की मलाई अब खत्म हो चुकी है। यह तथ्य भी समय रहते जान लेने में नुक़सान नहीं है। कांग्रेस के नाराज लोग भी अब कश्मीर में जा कर भगवा पगड़ी बांधे दिख रहे हैं। 

बहुसंख्यक हिंदुओं को हिंदू-हिंदू कह कर चिढ़ाने की ग़लती शायद उन्हें समझ आ गई है। नरेंद्र मोदी से सीखने की बात ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे लोग कश्मीर में जा कर कह रहे हैं। ज़रा सा किसी एक से असहमत होते ही उसे संघी , भाजपाई की गाली देने की अदा ने , इस निगेटिव प्रवृत्ति ने कितना अकेला कर दिया इकहरी धर्मनिरपेक्षता का स्वांग रचने वालों को। देख लीजिए। यह कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे पाकिस्तान , भारत से लड़ाई लड़े। एटम बम की खोखली धमकी दे। 

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ की एक बात याद आती है। जब बालाकोट एयर स्ट्राइक हुई और पाकिस्तान के इमरान और बाजवा एटम बम-एटम बम बोलने लगे थे , सर्वदा की तरह। तब मुशर्रफ ने कहा था पाकिस्तानी हुक्मरानों से कि ग़लती से भी एटम बम मत चलाना। अगर एक एटम बम चलाओगे तो इंडिया इतने एटम बम चला देगा कि पाकिस्तान दुनिया के नक्शे से खत्म हो जाएगा। और फिर पाकिस्तान के पास एटम बम हैं कितने। 

यह बात भारत की इकहरी धर्म निरपेक्षता की बात करने वाली पार्टियों के लोगों और मुस्लिम समाज के लिए भी विचारणीय है। देश में अल्पसंख्यक सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं हैं। ईसाई , पारसी , बौद्ध , जैन , सिख आदि भी हैं। एक मुस्लिम समाज को ही इतनी समस्या क्यों है। एक मुस्लिम समाज से ही बहुसंख्यक समाज क्यों भयाक्रांत रहता है। क़ानून व्यवस्था के सामने मुस्लिम समाज ही चुनौती बन कर क्यों उपस्थित रहता है। वह चाहे कांग्रेस राज रहा हो , मिली-जुली सरकारों का रहा हो या भाजपा के नेतृत्व वाली एन डी ए की सरकार का। इन बिंदुओं पर मुस्लिम समाज को चिंतन करना चाहिए। बात फिर वहीँ आ कर टिक जाती है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। 

सिद्धांत पुराना है , क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया। भाजपा को कम्युनिस्ट लोग शायद इसी लिए प्रतिक्रियावादी कहते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां अपने इसी अंतर्विरोध के कारण भारत की संसदीय राजनीति से खारिज हो गईं। घृणा और नफ़रत फैलाते-फैलाते जनता-जनार्दन के बीच खुद घृणित बन गईं। पश्चिम बंगाल , त्रिपुरा में लाल क़िला खत्म होने के बाद अब केरल में भी वह मुश्किल में आते दिख रहे हैं।

[ हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत की एक पोस्ट पर मेरी यह टिप्पणी : ]


- हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत की पोस्ट यह है :


यदि भारत के सभी मुसलमान ओवैसी को वोट दे दें तब भी पार्लियामेंट में उनकी 50- 60 से अधिक सीटें नहीं हो सकतीं और उसकी प्रतिक्रिया में बीजेपी की 400 से अधिक सीटें  होंगी।

क्या ऐसी सूरत में ओवैसी मुसलमानों का कोई भला कर पाएंगे?

Wednesday, 24 February 2021

अस्सी कोस अपना गांव छोड़ दिया , तुम ने कैसे मेरा उल्लू नाम जान लिया

 दयानंद पांडेय 


अमेठी से ज़्यादा बेहतर और सुलझे हुए वोटर वायनाड के हैं , इस बहाने उत्तर-दक्षिण का विवाद बेकार है। राहुल गांधी के इस वक्तव्य की बड़ी चर्चा रही आज। मेरा मानना है कि इस विषय पर राहुल गांधी की निंदा करना भी गुड बात नहीं है। राहुल गांधी वास्तव में राजनीतिक व्यक्ति हैं ही नहीं। उल्लू और गधे टाइप के आदमी हैं। पूरमपुर लतीफ़ा हैं। उन्हें किसी गुरु ने यह भी नहीं बताया होगा कि आदमी को क्या बोलना है यह तो जानना ही चाहिए , यह भी ज़रूर जानना चाहिए कि क्या नहीं बोलना चाहिए। खैर , जब पढ़ाए हुए पाठ यथा नोटबंदी , जी एस टी , किसान आंदोलन आदि-इत्यादि विषयों से इतर जब भी कुछ राहुल गांधी बोलते हैं तो अपने उल्लूपने , गधेपन में कुछ भी बोल जाते हैं। 

संसद हो या सड़क हर कहीं वह अपना यह परिचय अनायास देते रहते हैं। याद कीजिए अभी , बिलकुल अभी ही संसद में बजट पर उन्हें बोलना था पर वह किसान आंदोलन पर बेफिक्र बोलते रहे। स्पीकर ने कई बार टोका भी कि बजट पर बोलिए। पर वह बोले , बजट पर भी बोलूंगा। अभी फाउंडेशन बना रहा हूं। और बजट पर बिना कुछ बोले ही वह चले गए। कारण यह था कि उन को पाठ याद करवाने वालों ने बजट पर कुछ याद नहीं करवाया था , या यह याद नहीं कर पाए थे बजट पर पाठ। जो भी हो। विषय कोई भी हो , जगह कोई भी हो , राहुल गांधी लगभग एक ही रिकार्ड बजाते रहते हैं। हर कहीं। यह राहुल गांधी के उल्लूपने की प्रतिभा ही थी जो अभी पुडुचेरी में पूर्व मुख्यमंत्री नारायणसामी ने जाते-जाते उन्हें उल्लू बना दिया था। और यह लतीफ़ा समझ भी नहीं पाया था। 

गांव में बचपन में सुनी एक बहुत छोटी सी कथा याद आती है। किसी गांव में कोई उल्लू रहता था। उल्लू था सो उसे हर कोई उल्लू ही कहता था। लेकिन उल्लू को , उल्लू कहलाना अच्छा नहीं लगता था। सो वह गांव छोड़ कर वह कोई अस्सी कोस दूर चला गया। लेकिन उस ने पाया कि वहां भी लोग उसे उल्लू कह रहे थे। वह परेशान हो गया। अंतत: उस ने एक व्यक्ति से अपना दुखड़ा रोया , अस्सी कोस छोड़लीं आपन गांव , तूं कइसे जनला उल्लू नाव । मतलब अस्सी कोस अपना गांव छोड़ दिया , तुम ने कैसे मेरा उल्लू नाम जान लिया। तो राहुल गांधी अभी उत्तर प्रदेश का अमेठी छोड़ , केरल के वायनाड गए हैं। और जो चुनावी स्थितियां बन रही हैं केरल में , बहुत मुमकिन है कि 2024 के चुनाव में वायनाड भी छोड़ कर कहीं और खिसक लें। 

क्यों कि अमेठी के लोगों को राहुल गांधी का उल्लूपना और मूर्खता जानने में भले 15 बरस लग गए , वायनाड के लोगों को यह तथ्य जानने में 15 साल थोड़े ही लगेंगे। बकौल राहुल गांधी वायनाड के लोग बात बहुत जल्दी समझ लेते हैं। सो 5 बरस बहुत है , वायनाड के लोगों को राहुल गांधी का उल्लूपना समझने के लिए। बहुत मुमकिन है वह अभी ही समझ गए हों। पर वह भी बिचारे क्या करें चुनाव 2024 में है। वह अभी बताएं भी तो भला कैसे। लिख कर रख लीजिए राहुल गांधी 2024 का चुनाव वायनाड से नहीं लड़ेंगे। बहुत मुमकिन है , कहीं से भी न लड़ें और संसद का बोझ कुछ कम कर दें। संसद के बजाय बाहर ही आंख मारते रहें। वैसे आज त्रिवेंद्रम में जब राहुल गांधी कह रहे थे कि यहां के लोग मुद्दे की राजनीति समझते हैं। तब विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद आ गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी एक समय मुद्दे की राजनीति की बात कह-कह कर राजीव गांधी की राजनीति पर लगाम लगा कर उन्हें सत्ता से बाहर कर , खुद सत्ता पर काबिज हो गए थे। 

Saturday, 20 February 2021

अच्छा अगर भारत के पास आज की तारीख़ में राफेल न होता तब ?

 दयानंद पांडेय 

अच्छा अगर भारत के पास आज की तारीख़ में राफेल न होता तब ? क्या चीन इसी तरह खुद अपने बंकर तोड़ कर अपने टैंक और सेनाएं वापस ले जाता ? बल्कि पहला सवाल यह कि कांग्रेस एण्ड कम्युनिस्ट कंपनी राफेल की डील किसी तरह रद्द करवा ले गई होती या वाया सुप्रीमकोर्ट , मीडिया के दल्लों यथा एन राम आदि के मार्फत लटका कर रखे होती तब ? 

1971 के भारत-पकिस्तान युद्ध में जब जनरल नियाजी ने पूर्वी पाकिस्तान में 90 हज़ार से अधिक सैनिकों के साथ आत्म समर्पण किया तो भारत के जनरल अरोड़ा ने उन के हथियार वगैरह की फेहरिस्त बनवाते वक्त पाया कि पाकिस्तानी सेना के पास पर्याप्त सैनिक तो मौजूद थे ही , पर्याप्त खाद्य रसद और पर्याप्त हथियार , गोला बारूद भी था। यह सब देखने के बाद चकित हो कर जनरल अरोड़ा ने जनरल नियाजी से पूछा कि इतना सब होने के बावजूद आप ने सरेंडर क्यों किया ? जनरल अरोड़ा के साथ उस समय भारतीय एयर फ़ोर्स के वरिष्ठ अफसर भी थे। जनरल नियाजी ने एयर फ़ोर्स के अफसर की वर्दी पर लगे भारतीय एयर फ़ोर्स की चिन्ह को इंगित करते हुए कहा कि इन के कारण। सच भी यही था। पाकिस्तानी सेना हमारी वायु सेना के हमले नहीं झेल पाई थी। पाकिस्तान ने अमरीका से बीच लड़ाई में लड़ाकू जहाज मांगे। अमरीका ने समुद्र के रास्ते सातवां बेड़ा भेजा भी। लड़ाकू जहाजों का। पर इंदिरा गांधी ने तुरंत सोवियत संघ से बात की। 

सोवियत संघ ने भी अमरीका के सातवें बेड़े के पीछे अपना बेड़ा लगा दिया। विश्व युद्ध की स्थिति उतपन्न हो गई। अमरीका ने समझदारी दिखाई। विश्व युद्ध से बचने के लिए। अपना सातवां बेड़ा आनन-फानन वापस ले लिया। और पाकिस्तान को भारतीय हवाई हमले से आजिज आ कर सेना को सरेंडर करवाना पड़ा। नहीं सभी मारे जाते। हारना तो था ही। फिर इस बार चीन के खिलाफ तो भारत के साथ रूस और अमरीका भी भारत के साथ खड़े थे। अगर युद्ध की स्थिति आती तो चीन का क्या होता। अमरीका और रूस या बाक़ी देश तो बाद में भारत के साथ आते। पहले भारत की तरफ से राफेल जो चीन पर कहर बन कर टूट पड़ते तो चीन का क्या होता भला !

याद आता है जब भारत में परमाणु बम का परिक्षण अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने सारे रिस्क , सारे प्रतिबंध ठेंगे पर रख कर दिया था तब अमरीका को बहुत बुरा लगा था। अनाप-शनाप प्रतिबंध अमरीका ने लगाए और लगवाए। तब के समय अमरीका , पाकिस्तान का आक़ा बना फिरता था। तो पाकिस्तान को हैपी करने के लिए अमरीका ने भारत के साथ बहुत अतियां कीं। संयोग था कि सोवियत संघ टूटने के बाद अमरीका और चीन में तब तक गहरी दरार बन चुकी थी। अटल बिहारी वाजपेयी तब अमरीका को यह समझाने में कामयाब हो गए कि परमाणु बम भारत ने पिद्दी से पाकिस्तान के लिए नहीं , तानाशाह , धूर्त और हिंसक चीन से भारत की रक्षा के लिए बनाए हैं। अमरीका ने यह बात समझते ही सारे प्रतिबंध देखते ही देखते हटा दिए। याद कीजिए बालाकोट। 

बालाकोट के बाद कांग्रेस और राहुल गांधी भले कहते रहे कि बालाकोट में सिर्फ़ पेड़ गिराए गए हैं। पर पाकिस्तान बौखलाया हुआ था। सर्वदा की तरह परमाणु बम की धमकी देने लगा। कहने लगा कि हम परमाणु बम से भारत को तबाह कर देंगे। एक समय अपने को परमाणु पावर बताने की ऐंठ में चूर रहने वाले जनरल मुशर्रफ अचानक परदे पर उपस्थित होते हुए अपने पाकिस्तान को सतर्क करते हुए बोले कि ख़बरदार परमाणु बम का इस्तेमाल जो भूल कर भी किया। हम एक परमाणु बम मारेंगे तो हिंदुस्तान का कुछ नहीं बिगड़ेगा। क्यों कि हमारे पास परमाणु बम हैं ही कितने ? पर हिंदुस्तान ने जवाबी परमाणु बम चलाया तो दुनिया के नक्शे से पाकिस्तान ही गायब हो जाएगा। इमरान खान को हक़ीक़त तुरंत समझ आ गई। 

तभी अभिनंदन की घटना हो गई। इमरान भारतीय मिसाइलों से इतना ख़ौफ़ज़दा हो गए कि भारत के गुस्से को शांत करने के लिए पाकिस्तानी संसद में अभिनंदन को छोड़ने का ऐलान कर बैठे। अभिनंदन की जो शेर की तरह शानदार वापसी हुई उसे पूरी दुनिया ने देखा। पर भारत में बैठे कुछ गद्दारों और दिलजलों को यह गुड नहीं लगा। सर्जिकल स्ट्राइक पर सुबूत मांगने वाले पुलवामा के लिए कहते रहे कि चुनाव जीतने के लिए इतने सैनिकों को मरवा दिया। बालाकोट हुआ तो पेड़ गिनने लगे। और जब अभिनंदन की शेर की तरह शानदार वापसी हुई तो इमरान खान को शांति दूत बताने में छाती चौड़ी करने लगे। वह तो जब ट्रंप ने खुलासा किया कि उन्हों ने इमरान खान से कहा कि जल्दी से जल्दी अभिनंदन को रिहा करो नहीं , पाकिस्तान के सभी शहरों को नेस्तनाबूद करने के लिए भारतीय मिसाइलें और एयर फ़ोर्स तैनात हो गई है। इमरान खान और बाजवा के पसीने छूट गए। पाकिस्तान की संसद में ही इस बात का खुलासा हो चुका है कि जनरल बाजवा उस दिन किस तरह कांप रहे थे। 

अभिनंदन की रिहाई को भी इन विघ्नसंतोषियों ने चुनाव से जोड़ कर देखा। कहा कि पुलवामा , अभिनंदन सब कुछ चुनाव के लिए। राफेल सौदा रोकने के लिए भी एड़ी-चोटी एक कर दिया था। तत्कालीन सी बी आई डायरेक्टर को उकसाया। हिंदू , वायर , क्विंट , कारवां सब के घोड़े खोल दिए। खबरों पर खबरें प्लांट होने लगीं। सुप्रीम कोर्ट के कंधे पर बंदूक रख कर चलाने की नाकाम कोशिश की गई। सुप्रीम कोर्ट ने जब बंदूक अपने कंधे पर नहीं रखने दी तो कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट भाजपाई हो गई है। अब जब राफेल आ गया। तो चीन के नथुने तो फूले ही उस से ज़्यादा कांग्रेस और कम्युनिस्टों के। 

अब जब लद्दाख की सरहद पर पैंगांग झील पर चीन ने सैनिक गतिविधि बढ़ाई तो कांग्रेस और कम्युनिस्टों की बांछें फिर खिल गईं। उसी बीच कोरोना के चक्कर में लाकडाऊन हुआ और चीन के इशारे पर कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने मज़दूरों को पलायन के लिए भड़काना शुरू किया। तबलीगी जमात के लोगों की अभद्रता की पैरवी में यह लोग पहले ही कोहराम मचा चुके थे। अंतत : मज़दूर जब सड़क पर आ ही गए तो खेल इस बात पर आ कर टिक गया कि मज़दूरों के कंधे पर बंदूक रख कर कैसे गृह युद्ध शुरू कर दिया जाए। वह गृह युद्ध जो सी ए ए के बहाने अधूरा रह गया था। मज़दूरों ने भी अपने कंधे पर बंदूक रखने से झटक दिया और गृहयुद्ध में नहीं कूदे। 

तो इन को अपना सिर उचकाने के लिए चीन मिल गया। अब भारत सरकार को चीन से ज़्यादा जवाब कांग्रेस को देना था। कम्युनिस्टों को देना था। अलग बात है कि सरकार ने जवाब सिर्फ चीन को दिया।  माकूल जवाब दिया। धैर्य और संयम का परिचय देते हुए सेना का मनोबल निरंतर मज़बूत किया। सेना की कारगर मौजूदगी , राफेल की ताक़त और सरकार की विश्व स्तर पर कूटनीतिक चालों ने चीन को बेदम कर दिया। अब चीन की सांस जब उखड़ गई है तो कांग्रेसी , कम्युनिस्ट सभी कांखते , खांसते खामोश हो गए हैं चीन के बिंदु पर। 

अब इन के पास किसान आंदोलन की राख रह गई है। वह किसान आंदोलन जो बीते 26 जनवरी की दिल्ली में हुई हिंसा में बेदम हो कर हांफ रहा है। किसानों के बहाने कांग्रेस और कम्युनिस्टों की दिल्ली को जालियावाला बाग़ बनाने की मंशा चकनाचूर हो गई। बताइए कि तीन तलाक पर यह लोग देश में आग नहीं लगा पाए। कश्मीर में 370 पर आग नहीं लगा पाए। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद आग नहीं लगा पाए। हां , सी ए ए पर ज़रूर आंशिक लगाई। ख़ास कर दिल्ली में। सोनिया गांधी को कहना पड़ा था , इस के लिए कि सड़क पर उतर जाओ। पर कोरोना काल में विस्थापित मज़दूरों को भड़का कर देश में आग नहीं लगा पाए। किसान आंदोलन की भट्ठी सुलगाई ज़रूर पर यहां भी पार नहीं पाए। देश को निरंतर गृह युद्ध में झोंकने के लिए प्रयासरत विभिन्न तत्वों को यह तथ्य भली भांति जान और समझ लेना चाहिए कि नरेंद्र मोदी नामक व्यक्ति अभी अभिमन्यु नहीं , अर्जुन की भूमिका में है। कितने भी चक्रव्यूह रच लें , अर्जुन सारे चक्रव्यूह तोड़ डालेगा पर देश को गृह युद्ध में नहीं झुलसने देगा। अभिमन्यु की तरह मारा नहीं जाएगा। 

चीन पर भी उन के आंसू अब देखने लायक हैं। जो आंसू राफेल के सौदे को अड़ंगा लगाने पर नहीं दिखे थे , अब दिख रहे हैं। राफेल प्रसंग में तो चौकीदार चोर कहने की चौधराहट में सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी ने लिखित माफ़ी मांगी थी। क्या बाक़ी बिंदुओं पर भी कभी माफ़ी मांगने की सोचेंगे ? अलग बात है हर चुनाव में जनता मुर्गा बना दे रही है पर मुंहजोरी और सीनाजोरी से फुर्सत फिर भी नहीं है। राम पर तो कांग्रेस और कम्युनिस्टों को यक़ीन नहीं है , यह सर्वविदित है पर पता नहीं उन्हें महाभारत की कथा पर भी यक़ीन है कि नहीं , राम जाने। पर अब से सही कांग्रेस और कम्युनिस्टों को एक साथ जान-समझ लेना चाहिए कि सत्ता जुआ में द्रौपदी जीत कर उस का चीर हरण करने या लाक्षागृह बनाने से कभी नहीं मिलती। यह सब बैकडोर वाले रास्ते हैं। कुटिलता , कुचक्र , साज़िश का सौदागर बन कर तब राजतंत्र में भी सत्ता नहीं हासिल होती थी। फिर यह तो लोकतंत्र है। 

कम्युनिस्टों का तो खैर लोकतंत्र में यक़ीन ही नहीं। उन्हें तानाशाही और हिंसा में ही यक़ीन है। यही उन का जीवन-दर्शन है। यही उन का सिद्धांत है। इसी लिए उन्हें संसदीय राजनीति से निरंतर खारिज होते जाने का कोई ग़म नहीं है। सी ए ए हो या किसान आंदोलन , इस बहाने देश में उपजी हिंसा , उपद्रव में कम्युनिस्टों का खुल्ल्मखुल्ला सहयोग अकारण नहीं है। जय भीम , जय मीम को अब वह और आगे ले जाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। जय जवान , जय किसान के नारे को लांछित करने की उन की पहली कोशिश नाकाम भले हुई है पर वह हारे नहीं हैं। हम होंगे कामयाब के गीत को अभी भी वह रवां कर रहे हैं। 

पर कांग्रेस ?

आधे-अधूरे मन से ही सही कांग्रेस तो घोषित रूप से अहिंसा पर यक़ीन करने वाली पार्टी कही जाती है। गांधी की कांग्रेस , अगर अभी भी है तो उसे संसदीय राजनीति में यक़ीन कर जनता के बीच अहिंसक जनांदोलन करने चाहिए। जनता का दिल जीत कर चुनाव में विजय पा कर सत्ता का स्वाद लेना चाहिए। नाम में सिर्फ़ गांधी लिख देने से कोई गांधी नहीं हो जाता , गांधी के रास्ते पर चलना भी पड़ता है। साज़िश का सौदागर बन कर , लाक्षागृह बना कर , देश में गृह युद्ध की स्थितियां बना कर कभी किसी को सत्ता नहीं मिलती। मुग़ल काल और मुग़ल साम्राज्य एक अपवाद है। 

तो सिर्फ एक मुसलामानों के वोट खातिर कांग्रेस को सत्ता खातिर मुग़लिया साज़िशों से अवश्य बचना चाहिए। जहां सत्ता खातिर बेटा , बाप को क़ैद कर भाई को मार डालता है। समूची मुग़लिया सल्तनत खून खराबे और साज़िशों के रक्त में डूबी हुई है। कांग्रेस को अब से सही , इन सब साज़िशों से बचना चाहिए। देश की पीठ में छुरा भोंकने से बेहतर है आमने-सामने लड़ाई लड़ी जाए , लोकतांत्रिक तरीके से। जनता के बीच मेहनत कर लोकतांत्रिक तरीक़े से कभी दो सीट वाली भाजपा 303 पर आ सकती है तो कोई कांग्रेस क्यों नहीं। 1984 में राजीव गांधी के समय तो कांग्रेस 401 सीट पा कर देश की सत्ता पर काबिज हुई थी। पर अब लोकसभा में कांग्रेस की संख्या 52 में अब क्यों सिमट गई है ? नक्कारखाने में तूती की आवाज़ क्यों बन कर रह गई है कांग्रेस। इस लिए कि वह कायर हो गई है। आलसी और भ्रष्ट हो गई है। कम्युनिस्टों की सोहबत में साज़िश और हिंसा की डगर पर निरंतर अग्रसर होती गई है। 

ऐसे ही चलता रहा तो तय मानिए कि जैसे ब्रिटिशर्स के राज में कभी सूरज नहीं डूबता था पर निरंतर अतियों के कारण आखिर सूरज डूब गया , वैसे ही कांग्रेस भी डूब जाएगी। कोई नामलेवा नहीं रह जाएगा। भारतीय राजनीति में कम्युनिस्टों से भी बदतर हालत हो जाएगी , कांग्रेस की। नरेंद्र मोदी नाम की राफ़ेल से कांग्रेस को कुछ सीख लेनी चाहिए। नहीं नेस्तनाबूद होने से किसी को कोई रोक सका है क्या ? इमरान खान पाकिस्तान को बचाने के लिए बिना शर्त अभिनंदन को छोड़ सकता है तो क्या कांग्रेस खुद को बचाने के लिए कुछ भी नहीं कर सकती ? यह समय ही बताएगा। क्यों कि कांग्रेस और कांग्रेस के लोग किसी की नहीं सुनते। प्रियंका गांधी नरेंद्र मोदी को पुराने राजाओं की तरह अहंकारी बताती ज़रूर हैं पर गांधी परिवार तो रावण से भी ज़्यादा अहंकारी है। रावण ने भी मंदोदरी , विभीषण समेत किसी भी की सलाह नहीं मानी थी। सोने की लंका जलवा ली। एक विभीषण छोड़ समूचा खानदान समाप्त कर लिया एक सीता के अपहरण को ले कर। कांग्रेस भी सत्ता रूपी सीता का अपहरण करने में मशगूल है। बचना चाहिए उसे इस तरह के अपहरण और देश में निरंतर गृह युद्ध की साज़िशों से। कांग्रेस का भला जो होगा , सो होगा ही। देश का बहुत भला होगा। देशवासी निरंतर गृहयुद्ध की दस्तक और आहट से मुक्त होंगे। नहीं कबीर लिख ही गए हैं :

संसारी से प्रीतड़ी, सरै न एको काम 

दुविधा में दोनों गये, माया मिली न राम। 

Wednesday, 17 February 2021

राहुल गांधी को मूर्ख अंगरेज बना देख कर मुझे अपना बचपन याद आ गया

 दयानंद पांडेय 


राहुल गांधी को आज पुडुचेरी में मूर्ख अंगरेज बना देख कर मुझे अपना बचपन याद आ गया। तब के दिनों की नौटंकी और विदेसिया की याद आ गई। हम बचपन में गांव में नाच , नौटंकी बहुत देखते थे। विदेसिया भी। लगभग हर नौटंकी , विदेसिया भोजपुरी में होती थी। कमोवेश सभी नौटंकी , विदेसिया में दो-एक दृश्य ऐसे ज़रूर होते थे , जिस में सिर पर हैट लगाए , पैंट , टाई में कोई एक हिंदी बोलता हुआ अंगरेज बना आर्टिस्ट उपस्थित होता था। उस हिंदी को ही अंगरेजी मान लिया जाता था। ज़्यादातर वह हिंदी रुपी अंगरेजी में जोकर से बात करता था। 

नाटक में जनता उस अंगरेज अफसर की ऐसी-तैसी करती थी भोजपुरी में। तो वह अंगरेज दुभाषिया बने जोकर से पूछता था , यह क्या बोलता है ? भले अगला उस अंगरेज अफसर को गाली दे रहा होता पर वह उस अंगरेज से कहता , यह आप की बहुत तारीफ़ कर रहा है। अंगरेज अगर सामान्य व्यक्ति को भला-बुरा कहता तो जनता को जोकर बताता , साहब तुम से बहुत खुश है। जोकर खुद भी अंगरेज को भोजपुरी में भला-बुरा कहते हुए गालियां भी देता। अंगरेज जोकर से पूछता , क्या बोला ? वह बोलता , साहब आप बहुत बढ़िया आदमी है। बहुत तारीफ़ करता आप की। अंगरेज अफ़सर खुश हो जाता। उसे इनाम भी देता। लोग हंसते-हंसते लोट-पोट हो जाते। जोकर पीछे से अंगरेज को टीप भी मार देता और वह समझ नहीं पाता। लोग हंसते रहते। 

पुडुचेरी के मुख्य मंत्री नारायणसामी ने आज उसी तरह दुभाषिया की भूमिका में उपस्थित हो कर राहुल गांधी को अंगरेज बना दिया। भरी सभा में आंख में धूल झोंक कर मूर्ख बना दिया। अपनी अज्ञानता और मूर्खता के चलते मछुआरों पर राहुल गांधी जो अंट-शंट बोल कर मजाक का विषय बने वह तो अपनी जगह है। पर आज एक सभा में एक औरत ने तमिल में बोलते हुए खूब गुस्से में आ कर भला-बुरा कहते हुए राहुल गांधी से बताया कि पिछले सुनामी में हम लोग बरबाद हो गए , पर सरकार से कोई मदद नहीं मिली। राहुल गांधी ने मुख्य मंत्री के नारायणसामी से पूछा कि यह औरत क्या कह रही है ? तो मुख्य मंत्री के नारायणसामी ने राहुल गांधी को अंगरेजी में बताया कि पिछली सुनामी के बाद मैं इस के पास गया था और इस की बहुत मदद की थी। वह यही कह रही है।  

राहुल गांधी इतने पर खुश हो कर संतुष्ट हो गए। सवाल यह है कि देश के लोग तो राहुल गांधी को लतीफ़ा मानते ही हैं पर कांग्रेसजन और उस के मुख्य मंत्री लोग भी उन्हें निरा मूर्ख क्यों समझते हैं ? और राहुल गांधी ? माना कि तमिल नहीं जानते। पर क्या किसी की बॉडी लैंग्वेज भी नहीं समझते कि अगला खुश हो कर बोल रहा है कि गुस्से में ? कांग्रेस का भगवान भला करे।


तो बतर्ज साहित्य अकादमी श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार और देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार की वापसी भी करेंगे

दयानंद पांडेय



सेक्यूलरिज्म की हिप्पोक्रेसी बघारने वाले लेखकों के लिए एक और मुश्किल पेश आ गई है। बल्कि कहिए कि उन्हें अपना नाम चमकाने और शहादत बघारने का एक सौभाग्य मिल गया है। गौरतलब है कि इफको हर साल एक लेखक को 11 लाख रुपए का श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार देता है। इफको के अध्यक्ष , निदेशक मंडल व प्रबंध निदेशक यू एस अवस्थी मतलब उदय शंकर अवस्थी सुप्रसिद्ध लेखक श्रीलाल शुक्ल के योग्य दामाद हैं और सुपरिचित आलोचक देवीशंकर अवस्थी के अनुज। यू एस अवस्थी ने ही श्रीलाल शुक्ल की याद में इफको की तरफ से यह पुरस्कार शुरू किया था। 

अब इन्हीं यू एस अवस्थी ने आज इफको की तरफ से 2 करोड़ 51 लाख रुपए का चेक राम मंदिर निर्माण के लिए विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार को सौंप दिया। न सिर्फ सौंप दिया , ट्वीटर पर इस की सूचना भी परोस दी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से घृणा की खेती करने वाले कितने लेखक श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार से भी कितनी घृणा और दूरी बनाए रखने में सफल होते हैं। हां , देवीशंकर अवस्थी की याद में भी प्रति वर्ष एक पुरस्कार दिया जाता है। इस पुरस्कार से भी कितने लोग दूरी बनाएंगे ? 

और सौ सवालों पर एक सवाल यह भी कि बतर्ज साहित्य अकादमी श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार और देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार पाए कितने लेखक इसे वापस भी करेंगे। आख़िर इस से बढ़िया अवसर कब मिलेगा घृणा और नफरत की खेती करने वाले लेखकों को। नाम चमकाने और नाखून कटवा कर शहीद बनने का एक बड़ा अवसर है यह। गंवाना तो नहीं ही चाहिए। अवार्ड वापसी गैंग के सुप्रीमो और रिटायर्ड आई ए एस अशोक वाजपेयी जी , सुन रहे हैं न ! एक बार फिर नेतृत्व संभाल लीजिए। सुनहरा अवसर है यह भी एक ! सुविधा यह भी है कि श्रीलाल शुक्ल पुरस्कार और देवीशंकर अवस्थी पुरस्कार वापसी में सचमुच की वापसी की संभावना है। 

साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी तो हवा-हवाई था। किसी एक लेखक ने सचमुच साहित्य अकादमी आज तक वापस नहीं किया। सिर्फ़ ऐलान किया। तथ्य यह भी महत्वपूर्ण है कि साहित्य अकादमी के संविधान के मुताबिक़ साहित्य अकादमी अवार्ड न साहित्य अकादमी वापस मांग सकती है , न कोई लेखक वापस कर सकता है। इस बाबत संबंधित लेखक से साहित्य अकादमी लिखित सहमति लेने के बाद ही साहित्य अकादमी अवार्ड देती है। पर नफ़रत और घृणा की खेती करने वाले लेखकों ने जनता की आंख में धूल झोंकने के लिए तब साहित्य अकादमी वापस करने का ऐलान कर सिर्फ़ और सिर्फ़ धूर्तई की थी।

Wednesday, 10 February 2021

नेहरू कभी भी किसी के सामने नहीं रोते तो क्या कोई और नहीं रो सकता

दयानंद पांडेय 


एक बहुत प्रसिद्ध जुमला है , नेहरू कभी भी किसी के सामने नहीं रोते। हुआ यह था कि जवाहरलाल नेहरू के चचेरे भाई बी के नेहरू ने एक अंगरेज औरत फोरी से किया था। 1935 में वो बी के नेहरू से शादी करने भारत आईं तो उन्हें जवाहरलाल नेहरू से मिलने के लिए कोलकाता ले जाया गया जहां वो अलीगंज जेल में बंद थे। जेल में जब मुलाकात का समय समाप्त हो गया और जेल का दरवाज़ा बंद होने लगा तो फोरी रोने लगीं। 

नेहरू ने फोरी का यह रोना देख लिया और फोरी को एक चिट्ठी लिख कर कहा ,  'अब जब तुम नेहरू परिवार का सदस्य बनने जा रही हो, तुम्हें परिवार के कायदे और क़ानून भी सीख लेने चाहिए। '' नेहरू ने लिखा था , ' सब से पहली चीज़ जिस पर तुम्हें ध्यान देना चाहिए वो ये है कि चाहे जितना बड़ा दुख हो, नेहरू कभी भी किसी के सामने नहीं रोते।'' लेकिन कहते हैं कि चीन युद्ध में भारी पराजय के बाद प्रदीप के लिखे और लता मंगेशकर के गाए गीत , ऐ मेरे वतन के लोगों , ज़रा आंख में भर लो पानी ! सुन कर नेहरू की आंख में पानी देखे गए थे। बस इस एक घटना के बाद या पहले किसी ने भी नेहरू को कभी रोते नहीं देखा। 

नेहरू तो नेहरू , इंदिरा गांधी को भी फ़िरोज़ गांधी , नेहरू और फिर संजय गांधी की मृत्यु के बाद भी किसी ने कभी रोते नहीं देखा। संजय गांधी को भी किसी ने कभी रोते नहीं देखा। राजीव गांधी , सोनिया गांधी , राहुल गांधी या प्रियंका गांधी को भी कभी किसी ने रोते नहीं देखा। 

लेकिन तमाम अंतरराष्ट्रीय नेताओं समेत कई सारे भारतीय राजनेताओं को बार-बार रोते लोगों ने देखा है। प्रधान मंत्री नरेंद्र तो इतनी बार रोते हुए देखे गए हैं कि उन के तमाम विरोधी उन्हें अभिनेता कहते रहते हैं। राहुल गांधी ने तो एक बार कह दिया था कि नरेंद्र मोदी , अमिताभ बच्चन से भी बड़े अभिनेता हैं। वामपंथी दोस्त तो नरेंद्र मोदी की हर अच्छी बात में भी निगेटिव खोज लेते हैं। हां , जाने क्यों अभी तक न वामपंथी , न कांग्रेस , न कोई और विरोधी नरेंद्र मोदी के रोने में अडानी , अंबानी कनेक्शन खोज पाए हैं। हो सकता है , रिसर्च चल रही हो और कि आगे कभी नरेंद्र मोदी के रोने में अंबानी , अडानी कनेक्शन भी स्थापित कर दें। 

लेकिन संवेदनशील लोग , बात-बेबात रो पड़ने वाले मुझ जैसे लोग जानते हैं कि नरेंद्र मोदी के रोने में अभिनय कभी नहीं होता , न दिखावा। स्वाभाविक रोना होता है। क्या एक राजनीतिज्ञ को रोने का अधिकार नहीं होता। भावुक होने का अधिकार नहीं होता। हां , साज़िश के सौदागरों को आंसू का मोल नहीं मालूम होता। यह बात मैं ज़रूर मानता हूं। और कल राज्यसभा में ग़ुलाम नबी आज़ाद के विदाई भाषण में नरेंद्र मोदी के घिग्घी बंध जाने , गला भर आने में , रोने में भी अगर किसी को अभिनय दिख गया हो तो उस की संवेदनशीलता पर मुझे कुछ नहीं कहना। आप खुद तय कर लीजिए। 

अमिताभ बच्चन के एक इंटरव्यू की याद आती है। मैं ने अमिताभ बच्चन से रोने के अभिनय के बारे में पूछा था तो वह बोले थे , ' मेरे रोने में सिर्फ़ अभिनय नहीं होता। कई बार मैं अपने जुड़ी कोई अप्रिय बात सोच लेता हूं और रो पड़ता हूं। सोचता हूं कई बार कि फ़िल्मों में इतनी बार रो चुका हूं कि कभी अपने माता-पिता की मृत्यु पर भी ठीक से रो पाऊंगा कि नहीं। क्यों कि सचमुच का रोना , अभिनय नहीं होता। '

गुजरातियों की कश्मीर में आतंकियों द्वारा हत्या पर ग़ुलाम नबी आज़ाद ने जो तब के गुजरात के मुख्य मंत्री का जो सहयोग किया था , जो संलग्नता दिखाई थी , उस के प्रति कृतज्ञता ही थी। उस कृतज्ञता में अगर गला भर आया , आवाज़ रुंध गई , रोना आ गया तो इस में बुरा क्या था। गुजरात की जनता के प्रति मोदी का समर्पण भाव था यह। अभिनय नहीं। सिर्फ़ रोना नहीं। संसद में पहले भी कई लोग रो चुके हैं। हां , लेकिन मोदी के खाते में रोना ज़्यादा दर्ज है। यह भी कि मोदी की तरह भी कभी कोई नहीं रोया अभी तक। फिर भी अगर आप इसे मोदी का अभिनय मानते हैं तो क्षमा कीजिए फिर आप अभिनय की इबारत भी नहीं जानते। संवेदना से तो आप का कोई रिश्ता ही नहीं है।


ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण उन की सारी इच्छाओं , सारे प्यार की उन की प्रयोगशाला भी मैं ही रहा हूं



बरस बीत गया आज पूजनीय पिता जी को विदा हुए। घर में उन से बड़े लोग उन्हें बाबू कहते थे। वह तार घर की नौकरी में रहे थे तो गांव के लोग तार बाबू कहते थे। गोरखपुर शहर के मुहल्ले में इलाहीबाग़ और फिर बेतियाहाता में लोग उन्हें पांडेय जी कहते थे। उन के आफिस में भी लोग पांडेय जी ही कहते थे। लेकिन हम सभी भाई उन्हें बबुआ कहते थे। बबुआ ही थे वह। बबुआ ही हैं वह। 

नीम के यह पत्ते जब झरेंगे पतझर में , तब झरेंगे। तब तो जब पूज्य पिता जी विदा हुए तो शोक में हमारी मूछ भी विदा हो गई। जब से मूछ आई थी , कभी ओझल नहीं हुई थी , अब शोक में अनुपस्थित हुई है। तो क्या किसी भी वृक्ष के पत्ते या नीम के पत्ते , किसी शोक में विदा होते हैं। पतझर में नहीं। और केदारनाथ सिंह लिखने लगते हैं :

झरने लगे नीम के पत्ते बढ़ने लगी उदासी मन की,

उड़ने लगी बुझे खेतों से

झुर-झुर सरसों की रंगीनी,

धूसर धूप हुई मन पर ज्यों —

सुधियों की चादर अनबीनी,

दिन के इस सुनसान पहर में रुक-सी गई प्रगति जीवन की ।

साँस रोक कर खड़े हो गए

लुटे-लुटे-से शीशम उन्मन,

चिलबिल की नंगी बाँहों में —

भरने लगा एक खोयापन,

बड़ी हो गई कटु कानों को 'चुर-मुर' ध्वनि बाँसों के वन की ।

थक कर ठहर गई दुपहरिया,

रुक कर सहम गई चौबाई,

आँखों के इस वीराने में —

और चमकने लगी रुखाई,

प्रान, आ गए दर्दीले दिन, बीत गईं रातें ठिठुरन की ।




पिता का होना , यानी मूंछों का होना। पिता नहीं तो मूछ नहीं। गांव के घर की छत पर तब की एक फ़ोटो।

उन की यादों को सहेजने की आज तक बहुतेरी कोशिश की है। बारंबार की है। करता ही रहता हूं। लेकिन जाने क्यों तमाम कोशिश के बबुआ की यादों को लिख पाना अभी तक मुमकिन नहीं हो पाया है। असल में वह मेरे जीवन में इतने गहरे धंसे हुए हैं , कि उन्हें थाह पाना , उन को सहेज पाना कठिन से कठिनतर हुआ जा रहा है। बबुआ का कैनवस मेरी ज़िंदगी पर इतना बड़ा है कि क्या कहूं।  


जब नौकरी में था तब चाहे जिस भी अखबार में रहा , किसी विशेष व्यक्ति का निधन होता तो लोग मुझे ही खोजते और कहते कि तुरंत लिखिए। मैं फौरन लिख भी देता था। जो दूसरे दिन अखबार में छपा दीखता था। यह आम बात थी। जीवन में और भी लोगों पर लिखा। कई बार तो रोते-रोते लिखा है। सुबकते-सुबकते लिखा है। लेकिन लिखा है। पर बबुआ तो कलम में समाते ही नहीं। उन से इतने झगड़े हैं , झगड़ों में मिठास है। बबुआ से ज़िंदगी में इतनी असहमतियां हैं कि लिखने की सहमति की सांकल नहीं खुल पा रही। बबुआ मेरे भीतर इतना ज़्यादा उपस्थित हैं , कि लगता ही नहीं है कि वह विदा हो गए हैं। मेरे भीतर वह इतना जीवित हैं , कि लगता ही नहीं कि वह चले गए हैं तो फिर लिखूं कैसे।  

मन में एक अजीब कश्मकश है। कि क्या लिखूं , कैसे लिखूं। मुश्किल क्षणों में भी वह चुपचाप आ कर कैसे खड़े हो जाते थे। सहारा दे कर कब अनुपस्थित हो जाते थे , पता ही नहीं चलता था। कलम उठाता हूं लिखने के लिए तो लगता है जैसे मेरी कलम में बबुआ सांस ले रहे हैं। लैपटॉप उठाता हूं लिखने के लिए तो लगता है जैसे की बोर्ड में भी वह सांस ले रहे हैं। हार-हार जाता हूं। कि सांस ले रहे व्यक्ति को कैसे विदा कर दूं। नहीं विदा हो पाते बबुआ। नहीं लिख पाता बबुआ पर स्मृति-लेख। स्मृतियां बादल की तरह गरज कर उड़ जाती हैं। बरस नहीं पातीं। विश्वास ही नहीं होता कि बबुआ अब नहीं हैं जीवन में। हर सुख-दुःख में लगता है जैसे वह चुपचाप आ कर खड़े हो गए हैं। 


ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण उन की सारी इच्छाओं , सारे प्रयोग , सारा अनुशासन , सारी कड़ाई , सारा गुस्सा और सारे प्यार की उन की प्रयोगशाला भी मैं ही रहा हूं। उन के नित नए प्रयोग , नित नई इच्छाएं ही हमारी छाया थी। उन की इच्छाओं को पूरा करना ही जैसे मकसद रहा। उन का कोई प्रयोग असफल न हो , कोशिश यही रही। शायद आज भी वह मुझे अपनी प्रयोगशाला में ही बिठाए हुए हैं। लिखने नहीं दे रहे , अपनी स्मृतियों के सागर में डूबने और उबरने नहीं दे रहे। प्रणाम ही कर सकता हूं। बारंबार प्रणाम बबुआ !