Monday, 20 September 2021

नुस्खा यह है कि काशी और मथुरा को अगर पूरी ईमानदारी से विपक्ष उठा ले तो भाजपा चारो खाने चित्त हो जाएगी !


दयानंद पांडेय 


इन दिनों कांग्रेस , सपा , बसपा , आप समेत सभी पार्टियां अयोध्या में बन रहे राम मंदिर के गुण-गान में व्यस्त हैं। क्यों कि इन्हें मुस्लिम वोटर की आंख में धूल झोंकने के बाद अब हिंदू वोटर की आंख में धूल झोंकने की सूझी है। इसी लिए जो लोग गर्भ गृह पर शौचालय बनाने की बात करते थे , मिले मुलायम कांशीराम , हवा में उड़ गए जय श्री राम ! या तिलक , तराजू और तलवार , इन को मारो जूते चार का उद्घोष करते थे। ठीक यही लोग अब राम मंदिर बनाने की बढ़-चढ़ कर बात कर रहे। ब्राह्मणों को लुभाने के लिए प्रबुद्ध सम्मेलन पर सम्मेलन कर रहे। परशुराम की भव्य मूर्ति की रेस आयोजित कर रहे हैं। जो लोग कार सेवकों पर गोली चलवाने  का अभिमान करते थे , मंदिर के लिए पत्थर अयोध्या न पहुंच पाए , इस का इंतज़ाम करते थे। वह लोग भी आज प्रभु राम के गुण-गान में व्यस्त हैं। परशुराम-परशुराम का जाप कर रहे हैं। विद्यालय बनाने की तजवीज देने वाले भी शीश झुका चुके हैं। गरज यह कि अपनी-अपनी हिप्पोक्रेसी में धूल चाट चुके हैं। या यूं कहिए कि थूक-थूक कर चाट चुके हैं। सभी के सभी। 

और तो और जो लोग प्रभु राम के अस्तित्व पर ही प्रश्न उठाते रहे , बेशर्मी की हद तक उतर कर पूछते रहे थे कि मंदिर वहीं बनाएंगे पर तारीख़ नहीं बताएंगे। अब यह लोग भी अब राम के चरणों में लेट गए हैं। फिर भी इन लोगों को चुनाव में लाभ मिलता नहीं दिख रहा , हिंदू वोटों का। इन सभी लोगों को हिंदू वोटों का लाभ मिलने का एक नुस्खा मेरे पास है। और मुफ़्त का है। जानता हूं कि मुफ़्त की राय लोग नहीं मानते चुनावी जीत की तलब वाले लोग। करोड़ो की फीस दे कर प्रशांत किशोर जैसों की राय की कद्र करते हैं लोग। लेकिन फिर भी नुस्खा बता रहा हूं , और मुफ्त में बता रहा हूं। अगर यह चौकड़ी मान जाए तो यक़ीन मानिए , पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो जाएगी। 

नुस्खा यह है कि काशी और मथुरा को अगर पूरी ईमानदारी से विपक्ष उठा ले तो भाजपा चारो खाने चित्त हो जाएगी। गरज यह  कि इन लोगों को अयोध्या में राम मंदिर की स्तुति गान छोड़ कर मथुरा में कृष्ण मंदिर और काशी में बाबा विश्वनाथ मंदिर परिसर से ज्ञानवापी मस्जिद हटा कर बाबा विश्वनाथ मंदिर के निर्माण का शंखनाद कर देना चाहिए। पूरी ईमानदारी से। ईंट से ईंट बजा देनी चाहिए शिव और कृष्ण मंदिर निर्माण तक। ठीक वैसे ही जैसे नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के हटने तक उन की ईंट से ईंट बजा दी थी। बजाते रहे थे। वैसे भी राम ही नहीं , शिव और कृष्ण भी हिंदू वोटर के हृदय में वास करते हैं। राम मनोहर लोहिया ने बहुत साफ़ लिखा है : 

राम, कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। सबके रास्ते अलग-अलग हैं। राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है, कृष्ण की उन्मुक्त या संपूर्ण व्यक्तित्व में और शिव की असीमित व्यक्तित्व में लेकिन हरेक पूर्ण है। किसी एक का एक या दूसरे से अधिक या कम पूर्ण होने का कोई सवाल नहीं उठता। पूर्णता में विभेद कैसे हो सकता है? पूर्णता में केवल गुण और किस्म का विभेद होता है।

यक़ीन मानिए अगर विपक्ष के लोग मथुरा और काशी में कृष्ण और शिव का मंदिर बनाने की ठान लें जैसे भाजपा और आर एस एस के लोगों ने राम मंदिर बनाने की ठान ली थी , बना कर ही माने। तो भाजपा की योगी सरकार ही नहीं , मोदी सरकार भी यह लोग उखाड़ फेकेंगे। मोदी , योगी दुनिया में मुंह दिखाने लायक़ नहीं रहेंगे। सेक्यूलरिज्म की जीत हो जाएगी सो अलग। आप लोगों ने तमाम फ़ोटो देखी होंगी। जैसे रामलीला के समय में कोई बुरका पहने स्त्री अपने बच्चे को राम या लक्ष्मण बना कर रामलीला के लिए ले जाती हुई। कोई बुरकाधारी स्त्री अपने बच्चे को हनुमान बना देती है। कभी शिव या दुर्गा भी। कितना तो सेक्यूलरिज्म का प्रचार हो जाता है। लोगों के दिल भर आते हैं। 

कभी किसी फ़ोटो में कोई मौलाना और संन्यासी एक साथ ताश खेलते दिख जाते हैं , एक बाइक या स्कूटर पर बैठे दिख जाते हैं तो कितना तो पॉजिटिव संदेश मिल जाता है। सेक्यूलरिज्म की बांछे खिल-खिल जाती हैं। ठीक इसी तरह जब कांग्रेस , सपा , बसपा , आप समेत सब लोग जब मथुरा और काशी में कृष्ण और शिव मंदिर बना कर इन को सम्मान देने की बात करेंगे तो देश में गंगा-जमुनी सभ्यता की लहरें उछाल मारेंगी।  भाईचारे की भव्यता निखार पा जाएगी। भाजपा समाप्त हो जाएगी। आर एस एस की बुनियाद हिल जाएगी। मोदी , योगी जैसे फासिस्टों का अंत हो जाएगा। इंटरनेशनल मीडिया में , भारत में सेक्यूलरिज्म के क़सीदे पढ़े जाएंगे। बी बी सी से लगायत , फॉक्स , टाइम , न्यूज़वीक सब भारत की प्रशस्ति में बिछ-बिछ जाएंगे। कांग्रेस , सपा , बसपा , आप आदि सभी की बल्ले-बल्ले हो जाएगी ! इरफ़ान हबीब जैसे लोग भारत में अमन-चैन के इतिहास की नई इबारत लिखेंगे। 

अब मुफ़्त का यह नुस्खा भले है पर है बहुत काम का। बात बस हिप्पोक्रेसी त्याग कर आज़मा लेने की है। अगर मोदी , योगी को हटाने का ज़ज़्बा है तो। हिंदू वोट की सचमुच तलब है तो। बाक़ी सिर्फ़ नौटंकी है तो यह नौटंकी मुसलसल जारी रखिए। हाल-फ़िलहाल के चुनाव में तो जनता आप को कतई कोई घास नहीं डालने वाली। इस लिए भी कि जनता-जनार्दन आप की नौटंकी के तार-बेतार सब जान चुकी है। किसान आंदोलन आदि के स्वांग भी अब स्वर्गीय हो चुके हैं। जीवित रहने का अब बस यही एक नुस्खा शेष रह गया है। गंगा-जमुनी तहज़ीब की नई इबारत लिखने का। ऐतिहासिक ग़लतियों को सुधार कर नया इतिहास रचने का। कभी जाइए आप काशी। काशी के विश्वनाथ मंदिर परिसर में ज्ञानवापी को निहारिए। 

पूरा शिल्प , पूरा वास्तु मंदिर का है। बस भीतर मूर्तियां नहीं हैं। इसी तरह जाइए कभी मथुरा। कृष्ण का जन्म-स्थान देखिए। क्या कंस की जेल इतनी छोटी , इतनी कमज़ोर रही होगी। फिर मंदिर और मस्ज़िद की दीवार एक कैसे हो गई। मंदिर इतना छोटा , इतना कमज़ोर और मस्जिद इतनी बुलंद और शानदार। यह कैसे मुमकिन है भला। स्पष्ट है कि यह आक्रांताओं की क्रूरता का नतीज़ा है। आक्रमणकारी मनोविज्ञान है। तोड़-फोड़ है। तर्क और तथ्य तो यही है। सो इस ऐतिहासिक चूक को सही मायने में दुरुस्त करने का समय है यह। नहीं देश सांप्रदायिकता की आग में बरसो-बरस झुलसता ही रहेगा। यह कांग्रेस , यह वामपंथी , बसपा , सपा आदि-इत्यादि सब के सब इस आग में अपना हाथ सेंकते रहेंगे। हिंदू-मुसलमान करते रहेंगे। 

उलटे चोर कोतवाल को डांटे की तर्ज पर भाजपा और आर एस एस पर तोहमत लगाते हुए देश में नफ़रत और जहर की खेती करते रहेंगे। मनुष्यता को कलंकित करते हुए मुस्लिम वोट बैंक , हिंदू वोट बैंक की बिरयानी खाते रहेंगे। ज़रुरत इस बिरयानी की सप्लाई को बंद करने की है। देश को तालिबान में तब्दील होने से रोकने की ज़रुरत है। क्यों कि कोई बात कभी भी एकतरफा और कुतर्क पर सर्वदा नहीं चल सकती। चलती होती तो आज इरफ़ान हबीब जैसे नाज़ायज़ और झूठे इतिहासकार सवालों के घेरे में न होते। इतना कि वह आज की तारीख़ में समुचित जवाब देने की हैसियत में भी नहीं रह गए हैं। सवाल-दर-सवाल खड़े हैं और वह अपने ही झूठ के मलबे में दबे हुए चुप-चुप से हैं।

Sunday, 19 September 2021

क्यों कि पंजाब अब एक नया अफ़ग़ानिस्तान है कांग्रेस के लिए

दयानंद पांडेय 

अगर आप को लगता है कि पंजाब में जो भी कुछ हो रहा है वह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह की जंग है तो आप बहुत मासूम और निर्दोष लोग हैं। आप मानिए , न मानिए पर पंजाब अब कांग्रेस का एक नया अफ़ग़ानिस्तान है कांग्रेस के लिए। असल में यह जंग कैप्टन अमरिंदर सिंह और राहुल गांधी की जंग है। सुविधा के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह को अमरीका मान लीजिए और राहुल गांधी को तालिबान। नवजोत सिंह सिद्धू तो जमूरा है। एक मामूली सा टूल है। कैप्टन खुल कर कह ले रहे हैं कि अब वह अपना अपमान और नहीं बर्दाश्त कर पा रहे थे इस लिए इस्तीफ़ा दे दिया। लेकिन राहुल गांधी न कह पाए , न कह पा रहे , न कह पाएंगे। कि वह अपमानित हैं। अपमानित होना ही अब उन का नसीब है। कि कांग्रेस के बहादुरशाह ज़फ़र हैं वह अब। 

सच तो यह है कि बीते नौ , साढ़े नौ साल से कैप्टन अमरिंदर सिंह निरंतर राहुल गांधी को अपमानित कर रहे थे। राहुल गांधी की परिक्रमा न कर के। राजीव गांधी के बग़ावती विवाह के बाद हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन के दिल्ली के घर से निकल कर राजीव गांधी और सोनिया गांधी कैप्टन अमरिंदर सिंह के पटियाला के राज महल में काफी समय रहे थे। राजीव गांधी , अमरिंदर सिंह के स्कूली दिनों के दोस्त रहे हैं। बल्कि अमरिंदर सिंह से एक साल जूनियर थे स्कूल में राजीव गांधी। तो राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को अपना बच्चा मानते थे कैप्टन। जब कि सोनिया गांधी से भी वह बराबरी से बात करते थे। परिक्रमा कैसे करते भला। 

लेकिन राहुल गांधी और सोनिया गांधी खुद को कांग्रेस का , भारत का खुदा मानते हैं। यह उन की खुदाई का अहंकार ही है जो किसी को बराबरी से उन से मिलने नहीं देता। कभी किसी वीडियो में सोनिया गांधी के साथ प्रधान मंत्री के रुप में मनमोहन सिंह को देख लीजिए। मनमोहन सिंह की दुर्दशा और अपमान देख कर आप को उन पर निरंतर तरस आता रहेगा। सोचेंगे कि यह आदमी प्रधान मंत्री है या सोनिया गांधी का ज़रख़रीद ग़ुलाम ! अमिताभ बच्चन की याद कीजिए। वह भी राजीव गांधी के बाल सखा थे। सो बराबरी से मिलते थे। आंख से आंख मिला कर। 

यह अमिताभ बच्चन ही थे जो राजीव गांधी के साथ सोनिया गांधी के पहली बार भारत आने पर दिल्ली एयरपोर्ट पर अकेले रिसीव करने पहुंचे थे। और राजीव , सोनिया को ले कर अपने पिता हरिवंश राय बच्चन के गुलमोहर पार्क वाले घर पर ले आए थे। क्यों कि राजीव गांधी की मां इंदिरा गांधी जो तब भारत की ताक़तवर प्रधान मंत्री थीं , राजीव गांधी और सोनिया गांधी की दोस्ती और होने वाली शादी के ज़बरदस्त ख़िलाफ़ थीं। ख़ैर बाद में हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन ने ही सोनिया गांधी का कन्यादान किया। उन के घर पर ही शादी भी हुई। 

कुल जमा यह कि राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन बहुत आत्मीय मित्र थे। बचपन में साथ खेले थे। इलाहाबाद से लगायत दिल्ली तक। इतना ही नहीं कालांतर में राहुल और प्रियंका भी इन्ही तेजी बच्चन और हरिवंश राय बच्चन के साथ अपने बचपन के अधिकांश दिन बिताए हैं। इन्हीं के अभिभावकत्व में रहे हैं। एक बार प्रियंका गांधी से पूछा गया था कि आप की हिंदी इतनी अच्छी कैसे है। प्रियंका गांधी ने बेसाख्ता कहा था , तेजी बच्चन की वज़ह से। बचपन में उन्हीं के साथ रही हूं। उन्हों ने ही सिखाया है। 

मतलब पारिवारिक प्रगाढ़ता भी थी अमिताभ बच्चन और गांधी परिवार में। इतना कि कुली फ़िल्म की शूटिंग में घायल हुए अमिताभ बच्चन को देखने बतौर प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी उन्हें अस्पताल देखने भी गई थीं। अमिताभ बच्चन के बचपन की बहुत सी फ़ोटो भी मैं ने इंदिरा गांधी , राजीव गांधी , संजय गांधी और अमिताभ बच्चन की एक साथ देखी हैं। एक फ़ोटो तो दारा सिंह के साथ की है। जिस में इंदिरा गांधी , दारा सिंह , राजीव गांधी , अमिताभ बच्चन और संजय गांधी हैं। इस फ़ोटो में इंदिरा गांधी , राजीव , अमिताभ , संजय सभी दारा सिंह के साथ खड़े हो कर खुश हैं। बहुत खुश। अमिताभ और राजीव गांधी दोनों तब टीनएज हैं। 

इतना ही नहीं , इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अमिताभ बच्चन फ़िल्म और ग्लैमर छोड़ कर राजीव गांधी का साथ और भरोसा देने के लिए निजी तौर पर लगातार साथ देखे गए। इलाहाबाद से चुनाव भी लड़े राजीव गांधी के कहने पर और हेमवतीनंदन बहुगुणा जैसे महारथी को हरा दिया था अमिताभ बच्चन ने। बाद में राजीव के चक्कर में बोफ़ोर्स का दाग़ भी लगा अमिताभ बच्चन पर। किसी तरह चंद्रशेखर राज में अमर सिंह ने अमिताभ बच्चन के नाम से बोफ़ोर्स का दाग़ मिटवा दिया। पर राजीव गांधी के विदा हो जाने के बाद सोनिया गांधी की इसी खुदाई अहंकार से टूट कर बर्बाद हुए थे एक समय यही अमिताभ बच्चन। सड़क पर आ गए थे। दिवालिया हो गए थे। मुंबई के दोनों घर केनरा बैंक द्वारा नीलामी पर आ गए। 

पी चिदंबरम उन दिनों वित्त मंत्री थे। लगता था कि जैसे अमिताभ बच्चन को बरबाद करने के लिए ही वह वित्त मंत्री बनाए गए हैं। एक सूत्रीय कार्यक्रम था उन का जैसे अमिताभ बच्चन को बरबाद करना। वह तो किस्मत के धनी थे अमिताभ बच्चन। कि उन्हें अमर सिंह और सुब्रत रॉय सहारा जैसे लोग मिले। तिकड़म से ही सही अमिताभ बच्चन का दोनों घर नीलामी से बच गया। फिर कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम मिला। अमिताभ बच्चन ने अपने को फिर से खड़ा कर लिया। अब वह सदी के महानायक का रुतबा हासिल कर बैठे हैं। 

नहीं तब के दिनों जब कोई सोनिया परिवार से उन के संबंधों और क़रीबी की बात करता तो अमिताभ तब अपने बरबादी के दिनों में कुढ़ कर सोनिया को राजा , खुद को रंक कहते हुए कहते हुए कहते थे , हमारी उन की क्या तुलना , क्या संबंध ! राजा और रंक का क्या संबंध ! अलग बात है अमिताभ बच्चन को सहारा देने के चक्कर में सुब्रत रॉय खुद बेसहारा हो गए। बरबाद हो गए। क्यों कि जब सोनिया गांधी को पता चला कि अमिताभ बच्चन का घर नीलाम होने से बचाने में सुब्रत रॉय सहारा का हाथ है है तो उन्हों ने वित्त मंत्रालय में तैनात चिदंबरम नाम की तोप सहारा की तरफ मोड़ दी। कुछ चिदंबरम नाम की तोप , कुछ सुब्रत रॉय का अपना अहंकार , कुछ उन के कारोबार की कमज़ोर नस ने सहारा को तहस-नहस कर दिया। ऐसे अनेक क़िस्से हैं। 

तो कैप्टन अमरिंदर सिंह भी अब मां-बेटे की तोप के सामने हैं। ग़नीमत है कि केंद्र में मोदी की सरकार है। अगर मां-बेटे की सरकार होती तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कब के अपने राजमहल से बेघर हो गए होते। मुख्य मंत्री पद क्या चीज़ है भला। जो भी हो कैप्टन ने चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्य मंत्री बनने की बधाई दे ज़रुर दी है पर सरकार कितने दिन चलने देंगे , यह देखना दिलचस्प होगा। अभी हाल ही जालियांवाला बाग़ के बाबत जब राहुल गांधी ने विपरीत टिप्पणी की थी तब कैप्टन अमरिंदर सिंह खुल कर राहुल गांधी की उस टिप्पणी से अपनी असहमति दर्ज करवा बैठे थे। कैप्टन अमरिंदर सिंह की विदाई का प्रस्थान बिंदु उसी दिन तय हो गया था। 

अब तो ख़ैर , आने वाला समय ही बताएगा कि पंजाब चुनाव चरणजीत सिंह चन्नी के मुख्य मंत्री रहते होगा कि राष्ट्रपति शासन के तहत। क्यों कि कैप्टन वह सैनिक हैं जो थक कर , हार मान कर बैठ जाने के लिए नहीं जाने जाते। जब कि राहुल गांधी अपनी कुंडली में शिकस्त ही शिकस्त का लंबा सिलसिला लिखवा कर पैदा हुए हैं। तिस पर उन का अहंकार और फिर डिस्ट्रक्टिव और तुग़लकी दिमाग। पंजाब को जाने किस करवट और किस बिसात पर बैठा दे , यह तो नरेंद्र मोदी भी नहीं जानते। क्यों कि पंजाब अब एक नया अफ़ग़ानिस्तान है कांग्रेस के लिए। अभी बहुत सी मिसाइलें हैं कैप्टन अमरिंदर सिंह के पास। जब कि राहुल गांधी और नवजोत सिंह सिद्धू दोनों ही भटकी हुई मिसाइल हैं। कब किस पर नाजिल हो जाएं , यह दोनों ख़ुद भी नहीं जानते। 

हां , पंजाब के इस कांग्रेसी घमासान में अगर किसी की पांचों उंगलियां घी में हैं तो वह आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल की हैं। केजरीवाल आज उत्तराखंड के हल्द्वानी में चुनावी घोषणाओं की बरसात भले कर रहे थे पर उन के चेहरे पर मुस्कान और उल्लास पंजाब फतेह कर लेने की थी। पंजाब का अगला मुख्य मंत्री बनने का उन का सपना पुराना है। लोग कह रहे हैं कि बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने वाला है। जो भी हो आप लोग फ़िलहाल पंजाब में बने कांग्रेस के नए अफ़ग़ानिस्तान का आनंद लीजिए। और सुखजिंदर रंधावा से मिठाई और बधाई का दिन दहाड़े हुए मुख्य मंत्री पद के गर्भपात का हाल पूछिए। 

अंबिका सोनी से पूछिए कि बीमारी के बहाने से आगे की थाली कैप्टन के लिहाज़ में छोड़ी या राहुल गांधी और सिद्धू नामक भटकी हुई मिसाइलों के खौफ से। चरणजीत सिंह चन्नी को बधाई दीजिए कि उन की लाटरी खुल गई ! उन का दलित कितना फलित होगा यह तो 2022 का चुनाव परिणाम बताएगा। पर उस आई ए एस महिला से मी टू का दर्द कौन पूछेगा जिस का लांछन चरणजीत सिंह चन्नी पर अभी भी चस्पा है। एक बात और। वह यह कि हमारे आदरणीय मित्र और लेखक भगवान सिंह की राय है कि पाकिस्तान , तालिबान और चीन की घुसपैठ करवाने , आतंकियों को मज़बूत करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाया है ताकि देश में अस्थिरता फैलाई जा सके। देश को कमज़ोर किया जा सके।

Tuesday, 14 September 2021

मोदी का असली मक़सद जिन्नावादी राजनीति पर अलीगढ़ी ताला लगाना ही है , किसान आंदोलन की हवा निकालने की क़वायद भर नहीं है यह

दयानंद पांडेय 

पपीते की खेती और कटहल की खेती का फ़र्क़ समझते हैं आप ? नहीं समझते तो बताए देता हूं। पपीता का पौधा लगाइए तो छ महीने में ही फल देने लगता है। पर फिर छ महीने बाद दिखाई भी नहीं देता है। लेकिन कटहल का पौधा लगाइए तो सात-आठ साल तक फल नहीं देता। कई बार सोलह साल तक भी फल नहीं देता। पर जब फल देना शुरु करता है तो सालों साल पीढ़ियों तक फल देता है। देता ही रहता है। तो नरेंद्र मोदी को पपीते की नहीं , कटहल की खेती करने का अभ्यास है। यक़ीन न हो तो कश्मीर में 370 की याद कर लीजिए। बालाकोट ,उरी सर्जिकल स्ट्राइक आदि भी। अच्छा सी ए ए , तीन तलाक़ आदि-इत्यादि भी आप जोड़ना चाहते हैं तो जोड़ लीजिए।  

अलीगढ़ में आज राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय का शिलान्यास कर नरेंद्र मोदी ने फिर वही कटहल का एक पौधा लगाया है। बकौल मुख्य मीडिया के गुलामों के सिर्फ़ जाटों में पैठ की राह बनाने और किसान आंदोलन की हवा निकालने की क़वायद भर नहीं है यह राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय का शिलान्यास। इस शिलान्यास के मार्फ़त मोदी का असली मक़सद जिन्नावादी राजनीति पर अलीगढ़ी ताला लगाना ही है। सिर्फ़ अलीगढ़ में ही नहीं , समूचे देश में। अब मोदी इस मक़सद में कितना कामयाब होंगे यह आने वाला समय ही बताएगा। ग़ौरतलब है कि पाकिस्तान बनाने में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और लखनऊ के मुसलामानों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। आज भी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में जिन्ना की फ़ोटो शान से लगी हुई है तो इस लिए भी कि यहां से पाकिस्तानपरस्ती की बदबू अभी तक नहीं गई है। जब भी कभी जिन्ना की फ़ोटो अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से हटाने की बात उठती है , आग लग जाती है। यहां के पाकिस्तानपरस्त बड़ी ऐंठ से कहते हैं , पहले फला-फला जगह से जिन्ना की फ़ोटो हटाओ। तब देखेंगे। ईंट से ईंट बजाने पर उतर आते हैं। 

ग़ौरतलब है कि जब मदन मोहन मालवीय ने बनारस में बनारस हिंदू विश्विद्यालय बनाया तो उस के संस्थापक सदस्यों में एक सर सैयद अहमद ख़ान भी थे। मालवीय जी से प्रेरणा ले कर वह अलीगढ़ आए और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनवाई। बनारस के राजा ने बनारस हिंदू विश्विद्यालय के लिए कई सारे गांव की ज़मीन दान में दी थी। उसी तर्ज पर सर सैयद अहमद ख़ान ने भी राजा महेंद्र प्रताप सिंह से ज़मीन मांगी और महेंद्र प्रताप सिंह सहर्ष दे भी दी। अब अलग बात है कि जो सम्मान महेंद्र प्रताप सिंह को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी वालों को देना चाहिए था , कभी नहीं दिया। बल्कि भूल गए महेंद्र प्रताप सिंह को। अपमान की हद तक भूल गए। जिन्ना को सम्मान देने वाले लोग महेंद्र प्रताप सिंह को सम्मान दे भी कैसे सकते थे भला। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तो आज तक हिंदुत्व का गढ़ कभी नहीं बना। बनेगा भी नहीं। उस की बुनियाद आख़िर मदन मोहन मालवीय जैसे तपस्वी ने रखी है। 

लेकिन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बहुत जल्दी ही मुस्लिम लीग की गिरफ़्त में आ गया। न सिर्फ़ मुस्लिम लीग की गिरफ्त में आया बल्कि मुस्लिम लीग का गढ़ भी बन गया। फिर पाकिस्तान बनाने का केंद्र भी बन गया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी केंद्रीय यूनिवर्सिटी होने के बावजूद आज भी मुस्लिम लीग की भयानक गिरफ्त में है। एक समय तो यह आतंकियों का अड्डा भी बन कर इतना बदनाम हुआ कि यहां से पढ़ कर निकले छात्रों को कहीं नौकरी भी मिलना मुहाल हो गया था। नतीज़तन फैकल्टी की फैकल्टी ख़ाली होने लगीं। फिर किसी तरह स्थिति संभली। अभी भी मोदी के सात साल के शासन में तमाम कोशिशों के बावजूद अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पर चढ़ा मुस्लिम लीग का रंग का फीका नहीं हुआ। नफ़रत का नश्तर और तेज़ हुआ है। हां , यह ज़रूर हुआ है कि मुस्लिम लीग की बदबू से बचने के लिए यहां कुछ लोगों ने कम्युनिस्ट होने का कपड़ा पहन लिया। पर सोच वही मुस्लिम लीग वाली रही। अपने को इतिहासकार बताने वाले इरफ़ान हबीब जैसे जहरीले लोग , ऐसे ही लोगों में शुमार हैं। जो हैं तो कट्टर लीगी लेकिन कपड़ा कम्युनिस्ट का पहनते हैं। और आर एस एस का कृत्रिम भय दिखा-दिखा कर अपना लीगी एजेंडा कायम रखते हैं। 

एक वाकया है। जब पकिस्तान बन गया और मुस्लिम लीग के तमाम लोग भारत में ही रह गए तो अपना चेहरा छुपाने के लिए फ़ौरन कम्युनिस्ट पार्टी में दाख़िल हो गए। उन दिनों देश के शिक्षा मंत्री थे मौलाना आज़ाद। उन्हों ने मुस्लिम लीग पर एक टिप्पणी करते हुए तब कहा था कि एक सैलाब आया था , चला गया। पर कुछ गड्ढों में सैलाब का पानी रह गया है और बदबू मार रहा है। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में कम्युनिस्ट पार्टी का कपड़ा पहने मुस्लिम लीग के लोग मौलाना आज़ाद की इस बात पर बहुत खफा हुए। इस हद तक खफा हुए कि एक बार इन लीगी कम्युनिस्टों को पता चला कि मौलाना आज़ाद किसी ट्रेन से अलीगढ़ से गुज़रने वाले हैं। यह लोग अलीगढ़ रेलवे स्टेशन आए। रेल पटरियों पर बिखरे मानव मल को प्लास्टिक के थैलों में बटोरा। और जब ट्रेन आई तो मौलाना आज़ाद के डब्बे में चढ़ गए और वह मानव मल मौलाना आज़ाद की दाढ़ी में मल-मल कर लगा दिया। और डब्बे से उतर कर भाग गए। 

मौलाना आज़ाद जब तक कुछ समझें तब तक ट्रेन चल चुकी थी। तो क्या मौलाना आज़ाद आर एस एस के थे ? फिर सोचिए कि आर एस एस के लोगों के साथ भी यह लोग क्या सुलूक़ करते होंगे भला ? सांप्रदायिक सोच और रंग में डूबे मुस्लिम लीग के लोगों का आज तक कोई सरकार कुछ नहीं कर पाई है। नरेंद्र मोदी सरकार भी नहीं। क्यों कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का कवच-कुण्डल इन के पास है। अब इसी कवच-कुण्डल को बेअसर करने की क़वायद है महाराजा महेंद्र प्रताप सिंह यूनिवसिटी। आप सोचिए कि जय भीम , जय मीम का नैरेटिव बनाने वाले मुस्लिम लीग ऊर्फ कम्युनिस्ट पार्टी के लोग इस अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में दलितों को आरक्षण की सुविधा से वंचित रखते हैं। यहां जय भीम , जय मीम का नैरेटिव वह भूल जाते हैं। और देश भर में इसी जय भीम , जय मीम के तहत जब-तब आग लगा देते हैं। 

तो मोदी , योगी ने एक तीर से कई निशाने साध लिए हैं। रही बात टिकैत के किसान आंदोलन की तो इस की मियाद उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव तक की है। उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव खत्म , किसान आंदोलन खत्म। इसी लिए सरकार इन की कोई मांग मानने वाली नहीं है। इन की साज़िश में फंसने वाली नहीं है। शाहीन बाग़ से भी बुरा हश्र होगा इस किसान आंदोलन का। अव्वल तो तक-हार कर , कोई नतीज़ा न पा कर कांग्रेस किसान आंदोलन को फंडिंग बंद कर देगी। दूसरे , तब तक कम्युनिस्टों का जोश और रोजगार भी खत्म हो जाएगा। 2022 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव का परिणाम समय की दीवार पर अभी से लिखा दिख रहा है। अगर किसी को मोतियाबिंद है और वह समय की दीवार पर लिखी चुनाव परिणाम की इस इबारत को नहीं पढ़ पा रहा है तो बात और है। आप तो अभी बस राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय का आगाज़ देखिए। मोदी ने अगर आज कल्याण सिंह की याद करते हुए उन का आशीर्वाद भी इस अवसर पर सहेज लिया है तो उस का निहितार्थ भी देखिए। मोदी के पहले दिए गए योगी के भाषण की धार और आत्म विश्वास देखिए। मोदी के सामने योगी का ऐसा मुखर भाषण पहले कभी सुना हो तो मुझे ज़रा याद दिला दीजिए। टोटी यादव की लंतरानी और टिकैत की हेकड़ी में उस के बाद फ़र्क़ न दिखा हो तो बताइए। 

फिर सौ बात की एक बात राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय रुपी पौधे के फल देने की प्रतीक्षा कीजिए। हां , आज बहुत तलाश किया कि कम्युनिस्ट का कपड़ा पहने लीगी इतिहासकार इरफ़ान हबीब की कोई जहरीली प्रतिक्रिया कहीं दिख जाए इस राजा महेंद्र प्रताप सिंह नाम से विश्वविद्यालय के बाबत पर नहीं दिखी। किसी ने देखी हो तो कृपया बताए भी। क्यों कि यह मोहतरम इरफ़ान हबीब रहते तो इसी अलीगढ़ में हैं। इतिहास के नाम पर तमाम फ़रेबी और झूठ में सनी इबारतें इसी अलीगढ़ में बैठ कर लिखी हैं। 

पिछली बार जब मोदी ने वर्चुवली एड्रेस किया था , अलीगढ़ यूनिसिटी को तो इन मोहतरम इरफ़ान हबीब ने अजब-गज़ब जहर उगले थे। एक बार तो यह जनाब केरल चले गए थे। अपना बुढ़ापा भूल कर वहां के राज्यपाल आरिफ़ मोहम्मद ख़ान से मंच पर दो-दो हाथ करने। उन के ए डी सी ने रोका तो ए डी सी के कपड़े फाड़ दिए। ए डी सी के बिल्ले , बैज फाड़ दिए। आप जानते ही होंगे कि किसी भी राज्यपाल का ए डी सी सेना का सम्मानित अफसर होता है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ही पढ़े आरिफ़ मोहम्मद ख़ान की भलमानसहत थी कि कोई विधिक कार्रवाई नहीं की जनाब के ख़िलाफ़। नहीं सरकारी सेवक के साथ हिंसा करने के जुर्म में अच्छी सेवा हो सकती थी। मुझे पूरी आशंका थी कि जनाब मोदी की सभा में भी कुछ हिंसात्मक कार्रवाई कर कोई इतिहास रच सकते हैं , यह इतिहासकार महोदय। पर जाने क्यों आज जनाब ने दिल तोड़ दिया। मुमकिन है कहीं बैठे अपने इतिहास का पपीता नोश फ़रमाने में व्यस्त हो गए हों मोहतरम इरफ़ान हबीब। 




Thursday, 9 September 2021

तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

 दयानंद पांडेय 

अफगानिस्तान की यह परदेदारी वाली तस्वीर फ़ेसबुक पर घूम रही है। सोचा कि मैं भी घुमा दूं। पर यह बताते हुए कि यह स्थिति अफगानिस्तान में तालिबान की  है ज़रुर पर भारत में भी ऐसी तस्वीरें और मंज़र आम रहे हैं। अली सरदार ज़ाफ़री ने कुछ शायरों के जीवन पर लघु फ़िल्में बनाई हैं। फ़िराक़ , जिगर , मजाज़ , जोश आदि पर। मजाज़ लखनवी की फ़िल्म में एक दृश्य है कि वह अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में कुछ छात्राओं को अपना कलाम सुना रहे हैं। और सामने उन के छात्राएं नहीं , बल्कि ब्लैक बोर्ड है। ब्लैक बोर्ड के पीछे दूसरी क्लास है जिस में छात्राएं बैठी हैं और मजाज़ का कलाम बड़ी तल्लीनता से सुन रही हैं। ग़ौरतलब है कि मजाज़ लखनवी भी तब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिर्सिटी के छात्र हैं और छात्राओं की बहुत फरमाइश पर उन्हें अपना कलाम सुना रहे हैं। तब यह सब है। 

अलग बात है कि मजाज़ भले ब्लैक बोर्ड को अपना कलाम सुना रहे हैं पर लाख परदेदारी के उन का कलाम सुन रही एक छात्रा न सिर्फ़ उन की फैन बन जाती है बल्कि बाद में दिल्ली में एक डाक्टर से विवाहित होने के बावजूद उन की असल ज़िंदगी में आहिस्ता से दाख़िल हो जाती है। न सिर्फ़ दाख़िल हो जाती है , मजाज़ को दीवाना बना देती है। मजाज़ की ज़िंदगी बन जाती है। पैसे वाली औरत है। रईसाना ठाट-बाट से रहती है। दिल्ली के अपने घर बुलाने लगती है। उन के साथ मुंबई के होटल में भी रह जाती है। बाद में मजाज़ की बर्बादी का सबब भी बन जाती है। मजाज़ घनघोर शराबी बन जाते हैं। कुछ शराब , कुछ उस औरत का ग़म मजाज़ को मौत की राह पार खड़ा कर देती है। और लखनऊ में सर्दियों की एक रात खुली छत पर मयकशी के बाद सो जाते हैं। फिर अगली सुबह उन की मृत देह मिलती है। 

कहने का सबब यह कि औरतों के शबाब के जिस क़यामत से बचने के लिए यह परदेदारी का पहरा लगाया जाता है , बिना हिजाब के औरत को कटा हुआ तरबूज बताया जाता है , शरिया की तलवार के दम पर , उस का आख़िर हासिल क्या है ? मजाज़ की दर्दनाक मौत ? एक मजाज़  लखनवी ही क्यों , जाने कितने मजाज़ ऐसी दर्दनाक मौत बसर कर चुके हैं। बताता चलूं कि मजाज़ लखनवी न सिर्फ आला दर्जे के शायर हैं बल्कि उन के पिता तब के समय तहसीलदार रहे थे सो बड़े नाज़ से पालन-पोषण हुआ था। शानो-शौकत से रहते थे। आकाशवाणी में शानदार नौकरी भी मिली थी मजाज़ को। इतना ही नहीं , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी का तराना भी मजाज़ लखनवी का ही लिखा है। इन दिनों तालिबान और संघ की तुलना पर विवाद में घिरे जावेद अख़्तर इन्हीं मजाज़ लखनवी के भांजे हैं। लेकिन जावेद अख़्तर जिस गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं , मजाज़ लखनवी ऐसे न थे। मजाज़ लखनवी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में पढ़ने के बावजूद लीगी नहीं थे। मर्द आदमी थे। हिजाब , वुजाब की ऐसी तैसी करते हुए लिखते भी थे :


तिरे माथे पे ये आंचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन 

तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था। 


मजाज़ का पूरा नाम था - असरार-उल-हक़ मजाज़।

Wednesday, 8 September 2021

गृहस्थी में ऐसी उलझी कि प्यार का सारा आदाब भूल गई

पेंटिंग : मदनलाल नागर 


ग़ज़ल / दयानंद पांडेय 

प्रेम ही प्रेम था जीवन में पर प्रेम का हिसाब किताब भूल गई 
गृहस्थी में ऐसी उलझी कि प्यार का सारा आदाब भूल गई 

नशा ही नशा था उस के प्यार और प्यार के उस मेयार में 
नशा उतरा भी नहीं था कि प्यार की सारी शराब भूल गई 

वक़्त कैसे और क्या से क्या कर देता है जीवन में अब जाना 
लोग क्या कहेंगे के पाखंड में ऐसा झूली सारा इंक़लाब भूल गई 

पूर्णमासी का चांद देख कर होती थी न्यौछावर उस के साथ 
प्रेम की वह जुगलबंदी , वह बंदिश और सारा शादाब भूल गई 

ज़िम्मेदारी की दुनिया में कब एक जंगल दूर-दूर तक फ़ैल गया 
जिस पेड़ को पानी बन कर सींचा उस पानी की किताब डूब गई 

ज़िंदगी में प्रेम की इबारत पढ़नी सीखी थी धीरे-धीरे , निहुरे-निहुरे 
गोमती में इक डूबता चांद क्या देखा ज़िंदगी के सारे सुरख़ाब भूल गई 



[ 8 सितंबर , 2021 ]

Tuesday, 7 September 2021

भारत अब कृषि प्रधान देश नहीं , कारपोरेट प्रधान देश है , किसान आंदोलन के खिदमतगारों को जान लेना चाहिए

 

दयानंद पांडेय 


जिन विद्वानों को लगता है , राकेश टिकैत विधान सभा चुनाव में भाजपा के लिए सिर दर्द है , उन्हें जान लेना चाहिए कि 26 जनवरी को लालक़िला समेत पूरी दिल्ली में उपद्रव और मुज़फ्फर नगर में अल्ला हो अकबर ने राकेश टिकैत का ही मामला ख़राब कर दिया है। टिकैत के रोने में राजनीतिज्ञ डर सकता है , प्रशासन डर सकता है। हो सकता है यह सत्ता पक्ष की कोई चाल और रणनीति भी हो। पर घड़ियाली आंसुओं में वोटर नहीं डरता। नहीं  बहकता। कांग्रेस के पैसे और मस्जिदों के चंदे से किसान आंदोलन क्या कोई आंदोलन नहीं चलता। शहर-दर -शहर शाहीनबाग भी नहीं। 

हां , इस किसान आंदोलन में अगर कोई सब से ज़्यादा फ़ायदे में है तो वह वामपंथी साथी हैं। उन्हें रोजगार भी मिल गया है और मोदी को गरियाने का गोल्डन अवसर भी। मज़दूरों से हड़ताल करवा-करवा कर मुंबई , कोलकाता और कानपुर जैसे तमाम शहरों को उद्योगविहीन करवा कर बिल्डरों का शहर बनवा दिया। बिल्डरों से अकूत पैसा बटोरा। अपने बच्चों को यू के , यू एस में सेटल्ड करवा दिया। अब स्कॉच पीते हुए , किसानों की सेवा में लग गए हैं। लेकिन भारत के किसान , फैक्ट्रियों के मज़दूर नहीं हैं। 

क्यों कि भारत अब भी कृषि प्रधान देश है , इस पर मुझे शक़ है। भारत अब कारपोरेट प्रधान देश है। यह तथ्य किसान आंदोलन के खिदमतगारों को जान लेना चाहिए। इस सचाई को हमारे वामपंथी साथियों समेत तमाम आंदोलनकारियों को समय रहते जान-समझ लेना चाहिए। आवारा पूंजी ही अब देश संचालित कर रही है। आंदोलन वगैरह अब सिर्फ़ आत्ममुग्धता की बातें हैं। इंक़लाब ज़िंदाबाद नहीं सुनाई देता अब आंदोलनों में। अल्ला हो अकबर , हर-हर महादेव सुनाई देता है। पता नहीं , हमारे वामपंथी इस नारे को सुन पा रहे हैं कि नहीं। भाजपाई , संघी और सावरकर के नैरेटिव में ही जाने कब तक फंसे रहेंगे। कांग्रेसियों और वामपंथियों को इस छल भरे नैरेटिव से निकल कर ज़मीनी बातों पर ध्यान देना चाहिए। 

राकेश टिकैत द्वारा कुछ रटे-रटाए वामपंथी जुमलों के बोल देने भर से यह किसान आंदोलन तो कम से कम नहीं चलने वाला। टिकैत की हेकड़ी भरी जुबान और लंठई आचरण से भी नहीं। यह किसान आंदोलन वैसे भी अब कुछ मुट्ठी भर जाटों , कुछ मुसलमानों और थोड़े से सिख साहबान का आंदोलन बन कर रह गया है। कांग्रेस की फंडिंग और वामपंथियों के मार्गदर्शन में चलने वाला यह किसान आंदोलन अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। अराजकता और अभद्रता से कोई नवजोत सिंह सिद्धू तो बन सकता है , पर सुनील गावसकर नहीं। नहीं बुलाया तो इमरान खान ने गावसकर को भी था। क्यों नहीं गए , गावसकर पाकिस्तान। और कैप्टन अमरिंदर सिंह के लाख मना करने के बाद भी सिद्धू क्यों गए ? और क्या-क्या कर के लौटे ?

आज तक की एंकर चित्रा त्रिपाठी को रैली से गोदी मीडिया का तमगा देते हुए , अभद्रता और अपमान पूर्वक भगा देने और एक सिख द्वाराअजितअंजुम के माथे का पसीना पोछ देने के नैरेटिव से भी किसी आंदोलन को ज़मीन नहीं मिलती। लोकतंत्र को ठेंस ज़रुर लगती है। किसी आंदोलन को ज़मीन मिलती है , ईमानदार नेतृत्व से। ज़मीन मिलती है , ज़मीनी लोगों की भागीदारी से। इस किसान आंदोलन की हक़ीक़त का अंदाज़ा इसी एक बात से लगा लीजिए कि अपने संगठन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ही नेता हैं। फिर किसान आंदोलन की बीती रैली में कौन सी बात किसानों के लिए की गई ? किसी को याद हो तो बताए भी। हम ने तो देखा कि इस रैली में आए लोग कह रहे थे कि सी ए ए , एन आर सी और तीन तलाक़ जैसे काले क़ानून हटवाने के लिए वह लोग आए हैं। जो भी हो इस पूरे किसान आंदोलन का मक़सद अगर मोदी , योगी को हराना ही है तो जानिए कि चुनावी बिसात पर अब एक नहीं , भाजपा के ढाई स्टार प्रचारक हो गए हैं। 

फ़िराक़ गोरखपुरी एक समय कहा करते थे कि भारत में सिर्फ़ ढाई लोग ही अंगरेजी जानते हैं। एक सी नीरद चौधरी , दूसरे , ख़ुद फ़िराक़ और आधा जवाहरलाल नेहरु। नेहरु ने फ़िराक़ की इस बात पर कभी प्रतिवाद भी नहीं किया। यह नेहरु का बड़प्पन था। पर कुछ-कुछ उसी तर्ज पर आज आप को एक बात बताऊं धीरे से। कान इधर ले आइए। भाजपा के पास अब एक नहीं ढाई स्टार प्रचारक हैं। पहले सिर्फ़ एक ही था , राहुल गांधी। अब डेढ़ और आ गए हैं। एक राकेश टिकैत और आधा असुदुद्दीन ओवैसी। अल्ला हो अकबर !

Monday, 6 September 2021

तो पूरा भारत ही अब तक इस्लामी राष्ट्र होता , हम सभी मुसलमान होते , तालिबान होते !


दयानंद पांडेय 


कृपया एक बात कहने की मुझे अनुमति दीजिए। वह यह कि अगर अंगरेज भारत में न आए होते और कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ न होता तो किसी को पाकिस्तान आदि बनाने की ज़रुरत ही नहीं पड़ती। नौबत ही नहीं आती। पूरा भारत ही अब तक इस्लामी राष्ट्र होता। हम सभी मुसलमान होते। तालिबान होते। अफगानिस्तान , पाकिस्तान और सीरिया से भी बुरी हालत होती हमारी। स्त्रियों की स्थिति जाने क्या होती। क्यों कि इस्लाम की किताब कुरआन में साफ़ लिखा है कि स्त्रियां , पुरुषों की खेती हैं। 

अत्याचार ब्रिटिश राज ने भी बहुत किया। धर्म परिवर्तन भी खूब करवाए। लेकिन इस्लाम के अनुयायियों ने जो और जिस तरह किया भारत में , कभी किसी और आक्रमणकारी ने नहीं किया। अब अंगरेजों को तो कुछ कह नहीं पाते लोग। क्यों कि भाई-चारा निभाने के लिए वह यहां अब उस तरह उपस्थित नहीं हैं , जैसे इस्लाम के आक्रमणकारी। जावेद अख्तर जैसे सफ़ेदपोश कठमुल्ले इसी लिए जब-तब आर एस एस के प्रति अपनी घृणा और नफरत का इज़हार करते रहते हैं। यह सब तब है जब कि अब आर एस एस वाले बार-बार इस्लाम के अनुयायियों को भी अपना बंधु बताते हुए कहते हैं कि हम सब का डी एन ए एक है। भाजपा की सरकार सब का साथ , सब का विकास , सब का विशवास और सब का प्रयास कहती ही रहती है। पर जावेद अख्तर जैसे लीगियों को तो छोड़िए तमाम सो काल्ड सेक्यूलर चैंपियंस भी इन दिनों जब कभी विवशता में तालिबान का दबी जुबान ज़िक्र करते हैं तो बैलेंस करने के लिए आर एस एस पर खुल कर हमला करते हैं। दुनिया जानती है , हिंसा इस्लाम का अभिन्न हिस्सा है। नालंदा जैसी विश्वस्तरीय लाइब्रेरी जलाने की लिए इस्लाम को दुनिया जानती है। महीनों जलती रही थी नालंदा लाइब्रेरी। 

पूरी दुनिया में हिंसा और आतंक की खेती इन दिनों इस्लाम की ही जानिब हो रहा है। अमरीका , योरोप , कनाडा , फ़्रांस , चीन हर जगह इस्लाम हमलावर है। हमारे भारत में भी। लेकिन हमारे भारत में सेक्यूलर चैंपियंस इस्लाम की हिंसा को आर एस एस से बैलेंस करने की कुटिलता पर कायम हैं। आग को अगर पानी बुझाता है तो यह लोग पानी को भी उतना ही कुसूरवार मान लेने की महारत रखते हैं। कुतर्क यह कि अगर पानी न होता तो आग लगती ही नहीं। पानी ने ही आग को उकसाया कि आग लगाओ। इस मासूमियत पर भला कौन न मर जाए। सोचिए न कि पाकिस्तान और भारत में उपस्थित सेक्यूलर चैंपियंस दोनों ही बहुत ज़ोर-ज़ोर से आर एस एस-आर एस एस चिल्लाते हैं। सावरकर का स्वतंत्रता संग्राम , उन की वीरता और विद्वता भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि सावरकर इकलौते हैं जिन्हें ब्रिटिश राज में दो बार आजीवन कारावास की सज़ा मिली वह भी काला पानी की। 

क्यों मिली ? क्या मुफ्त में ? 

जिस ने धर्म के नाम पर पाकिस्तान बनाया , उस जिन्ना का नाम लेते हुए इन की जुबान को लकवा मार जाता है। पाकिस्तान बनाने के लिए डायरेक्ट एक्शन करवाया जिन्ना ने । डायरेक्ट एक्शन मतलब हिंदुओं को देखते ही मार दो। इस का भी ज़िक्र नहीं करते। लेकिन इस्लाम के अत्याचार से बचने के लिए सावरकर के द्विराष्ट्र सिद्धांत की बात चीख-चीख कर करते हैं। एक राहुल गांधी नाम का नालायक़ है जो देश और कांग्रेस की राजनीति पर बोझ बना हुआ है। यह राहुल गांधी चिल्लाता है , मैं राहुल सावरकर नहीं हूं , राहुल गांधी हूं ! यह मूर्ख यह नहीं जानता कि संसद भवन में सावरकर की बड़ी सी फ़ोटो उस की दादी इंदिरा गांधी ने लगवाई है। और कि सावरकर के नाम से डाक टिकट भी जारी किया है इंदिरा गांधी ने। तो क्या इंदिरा गांधी भी आर एस एस से थीं। हर व्यक्ति और हर संस्था में कुछ खूबी , कुछ खामी होती है। आर एस एस में भी खामी हो सकती है। खामी सावरकर में भी हो सकती है। पर सावरकर को हम सिर्फ ब्रिटिश राज से माफी मांगने के लिए ही क्यों जानना चाहते हैं। यह क्यों नहीं जानना चाहते कि सावरकर को माफी क्यों मांगनी पड़ी। दो-दो बार काला पानी का आजीवन कारावास क्यों मिलता है सावरकर को। इसी तरह आर एस एस की तुलना आप तालिबान से किस बिना पर करने की ज़ुर्रत कर पाते हैं ? क्या काबुल के घोड़ों की लीद खाते हैं आप , यह कहने के लिए ? आख़िर यह और ऐसा ज़ज़्बा लाते कहां से हैं यह लोग ? 

बातें बहुतेरी हैं। फिर कभी। पर यह सेक्यूलर एजेण्डेबाज अब ख़ुद वैचारिक रुप से तालिबान बन गए हैं। एकतरफा बात करने और कुतर्क करने के अफीम की लत लग गई है इन्हें।

Saturday, 4 September 2021

जस्टिस , आई ए एस आदि जब तक कंपनियों में कुत्ता बने रहेंगे तब तक ऐसा ही होता रहेगा

दयानंद पांडेय 

सच बताऊं नोएडा में सुपरटेक वाले बिल्डर आर के अरोड़ा , पत्नी संगीता और पुत्र मोहित अरोड़ा के साथ लंदन भाग जाने की खबर की अफवाह एक वेबसाइट पर चली तो इस खबर ने मुझे बिलकुल नहीं चौंकाया। बल्कि हंसी आ रही थी । और दुःख भी हो रहा था। सुप्रीम कोर्ट से लगायत उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी तक पर तरस आ रहा था । योगी का सारा फोकस छोटे-छोटे दोषी अधिकारियों को खोजने में लग गया है। सुप्रीम कोर्ट आदेश जारी कर सो गया है । सच इन में क्या किसी को भी अंदाजा नहीं है कि असल दोषी बिल्डर भाग भी सकता है। उस का पासपोर्ट भी क्या ज़ब्त नहीं कर लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का आदेश जारी होते ही क्या बिल्डर के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कर तुरंत जेल भी नहीं भेजना चाहिए ? लेकिन कहां , चोरी और फिर सीनाजोरी पर भी उतर आया है , अरोड़ा। कह रहा है कि सब कुछ प्राधिकरण की स्वीकृति से हुआ है और कि वह सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर रहा है। 

अब जो भी हो माल्या , नीरव मोदी , मेहुल चौकसी आदि भगोड़ों की तरह चालीस मंज़िल की अवैध बिल्डिंगें बना कर यह आर के अरोड़ा भी अब अरबों रुपए ले कर फरार हो जाएगा तो माथा फोड़ते रहेंगे घर का सपना पालने वाले मध्यवर्गीय परिवारों के लोग। कितने शहरों में कितने बिल्डर जनता का खरबो रुपया पी कर इंज्वाय कर रहे हैं , यह तथ्य भी किसी से छुपा है क्या ? कितनी चिट फंड कंपनियां गरीबों का सारा संसार उजाड़ गई हैं। किसी बिल्डर का , किसी चिट फंड कंपनी का अब तक कुछ अहित हुआ क्या ? यह सिस्टम तो बिल्डरों और चिट फंड कंपनियों के मालिकानों के साथ रामदेव का योग कर रहा है। अपनी सेहत बना रहा है। आप लड़ते रहिए , इस शहर से उस शहर तक। सड़क से अदालत तक। कभी कुछ नहीं मिलने वाला। 

बिल्डरों में एक ग्रुप है जे पी ग्रुप। मुलायम , मायावती सभी का दुलारा रहा है। अब दीवालिया हो चुका है। पर ज़माने के लिए। सिस्टम के लिए। असल में तो वह अपने बेटे के नाम दूसरी कंपनियां बना कर इसी नोएडा में गौर सिटी बसा कर ग्रेटर नोएडा वेस्ट का सिंगापुर बनाने का सपना दिखा रहा है। सफल भी इतना है कि ग्रेटर नोएडा वेस्ट में गौर सिटी के आगे जे पी ग्रुप क्या सारे ग्रुप फीके पड़ गए हैं। सिस्टम आंख मूंद कर आनंद ले रहा है। सुप्रीम कोर्ट हो या कोई सरकार , धन पशुओं के आगे सभी नतमस्तक हैं। माल्या , नीरव मोदी , मेहुल चौकसी , आर के अरोड़ा आदि के आगे कंहार बन कर सभी पानी भर रहे हैं। 

सारे सामाजिक संगठन भी बस दिखावटी ही हैं। है कोई संस्था जो बस इतना ही सा एक आंकड़ा निकाल कर दुनिया के सामने रख दे कि कितने जस्टिस , कितने आई ए एस , आई पी एस रिटायर होने के बाद कारपोरेट सेक्टर , बिल्डर या अन्य व्यावसायिक संस्थाओं को किस लिए ज्वाइन कर चुके हैं। किस लिए ज्वाइन करते हैं यह लोग ? इन कंपनियों के डायरेक्टर बोर्ड में किस खुशी में बैठ जाते हैं। कितने और किस-किस पार्टी के राजनीतिज्ञ हैं जो इन व्यवसाईयों के यहां कसाई बन कर सब का हक़ मारने में इन की मदद करते हैं। 

लखनऊ में एक बार मोहन मीकिंस की शराब फैक्ट्री द्वारा जहरीला कचरा फेंकने से गोमती नदी के पानी से आक्सीजन खत्म हो गया था। सो गोमती नदी में दूर-दूर तक की सारी मछलियां मर गईं। मैं ने एक बड़ी सी खबर लिखी। पहले पन्ने पर लीड बन कर छपी थी , तब के स्वतंत्र भारत में। इस बाबत लगातार खबर लिखता रहा। यह अस्सी के दशक के आखिरी सालों की बात है। केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार की पर्यावरण और प्रदूषण की सारी नियामक संस्थाएं कान में तेल डाल कर सोई रही थीं। सभी को नियमित पैसा जो मिलता है। खैर तब किसी तरह अंतत: मोहन मीकिंस के खिलाफ एफ आई आर दर्ज हुई। उस मामले की सुनवाई के दौरान देखा एक दिन अभिनेता दिलीप कुमार भी कोर्ट में पेश हुए। क्या तो वह भी मोहन मीकिंस में एक डायरेक्टर थे। गज़ब था यह भी। 

पता किया तो पता चला कि हर कंपनी में राजनीतिज्ञ , जस्टिस , रिटायर्ड आई ए एस , आई पी एस , अभिनेता , खिलाड़ी आदि डायरेक्टर बोर्ड में होते हैं और लाखों रुपए इन्हें हर महीने मिलते हैं। खैर,  मोहन मीकिंस के उस मामले में किसी का बाल बांका नहीं हुआ। कोर्ट में मामला शुरुआती दिनों में ही खत्म हो गया। कोई अपील वगैरह भी कहीं नहीं हुई किसी के तरफ से। न सरकार की तरफ से। मोहन मीकिंस बदस्तूर जहरीला कचरा फेंकता रहा। अब आलम यह है कि लखनऊ में गोमती नदी के किनारे निरंतर सैर करने वालों को कैंसर हो जाता है। लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी मीडिया में कोई खबर नहीं आती। लोगों ने गोमती किनारे टहलना ज़रूर बंद कर दिया है अब। 

एक कंपनी के विज्ञापन के एक फ़ोटो में तो मैं ने देखा कि कंपनी के मालिक , पत्नी आदि आगे कुर्सियों पर बैठे थे। जब कि सुप्रीम कोर्ट यानी भारत के पूर्व चीफ जस्टिस , इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस समेत , सेना के एक परमवीर चक्र विजेता , टी एन शेषन जैसे धाकड़ आई ए एस अफसर , अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता , कपिलदेव जैसे क्रिकेटर आदि कई लोग उस कंपनी का ड्रेस और टाई पहने लाइन से कुर्सी पर बैठे इन कंपनी मालिक के पीछे खड़े दिख रहे थे। इतनी अश्लील फ़ोटो मैं ने ज़िंदगी में अभी तक कोई और नहीं देखी है। यह फ़ोटो आप में से भी तमाम लोगों ने अवश्य देखी होगी। क्यों कि यह फोटो अनेक बार देश के तमाम अखबारों में बतौर विज्ञापन छपती रही है। 

उत्तर प्रदेश के एक पूर्व मुख्य सचिव वी के सक्सेना तो रिटायर होते ही खुल्ल्मखुल्ला चीनी मिल मालिकों के फेडरेशन में सलाहकार बन गए थे। चीनी मिल मालिकों के साथ प्रेस कांफ्रेंस में उपस्थित रहते थे। कुल जोड़-तोड़ यह रहती थी कि गन्ना किसानों का पैसा कैसे मार लिया जाए। बरसों तक किसानों का भुगतान लटका रहे और गन्ने का भाव न बढ़े। क्या तो गन्ना मिलें घाटे में हैं। अजब नौटंकी थी। गज़ब कुतर्क था। जो एक पूर्व मुख्य सचिव कर रहे थे। तो शासन में बैठ कर क्या-क्या किया होगा , समझा जा सकता है। तमाम कंपनियों में तो सेना के रिटायर्ड जनरल भी नौकरी पर हैं। तो आप क्या समझते हैं यह लोग विभिन्न कंपनियों में पूजा-पाठ के लिए रखे जाते हैं ? सिर्फ़ शो पीस बन कर ही रहते हैं ? बिलकुल नहीं। इन में से एकाध तो सिर्फ डेकोरम पूरा करते हैं। कुछ नियम सा है कि सामाजिक क्षेत्र के लोगों को डायरेक्टर बोर्ड में रखना होता है। 

बस इसी की आड़ में यह कंपनियां इन जजों और अफसरों आदि को अपनी कंपनी में डायरेक्टर कम दलाल बना कर रखती हैं। साफ़ कहूं कि कुत्ता बना कर रखती हैं। फिर यह कुत्ते इन कंपनियों के मालिकों के सारे अनियमित कार्य पर पर्दा डालने का , इन के कुकर्मों पर पानी डालने का काम करते रहते हैं। विभिन्न तरीक़े बता कर नियम , क़ानून से इन की रखवाली करते हैं। नियम , क़ानून के दुरूपयोग के तरीक़े बताते हैं। किस को कैसे ख़रीदा जाए , जुगत बताते हैं। जज हैं तो जजों से काम करवाएंगे। अफ़सर हैं तो अफसरों से भी काम करवाएंगे। सिर्फ़ सिफारिश ही नहीं , संबंधित अफ़सर , जज , पुलिस को रिश्वत देने की चेन भी बनेंगे। सिर्फ़ सिफारिश से तो काम अब कहीं होता नहीं। साम , दाम , दंड , भेद सुना है न ? तो डायरेक्टर बोर्ड में बैठे यह विभिन्न कुत्ते साम , दाम , दंड भेद के हरकारे बनते हैं। चूंकि सिस्टम में रहे होते हैं तो सारा छेद और सारी प्रक्रिया जानते हैं। सब को साधना भी। फिर एक कहावत है कि कुत्ता , कुत्ते का मांस नहीं खाता। तो कोई किसी का अहित नहीं करता। कुछ भी हो जाए , सब एकजुट रहते हैं। सुपरटेक वाले मामले में भी देखिएगा कि कोई सीनियर आई ए एस अफ़सर भी शायद ही कार्रवाई की जद में आए। मसला वही है कि कुत्ता , कुत्ते का मांस नहीं खाता। और जांच टीम का मुखिया भी तो आई ए एस ही है। 

सोचिए कि अमर सिंह जैसे लोग स्टेट बैंक के डायरेक्टर बोर्ड में रहे थे। अमर सिंह को किस ने रखवाया होगा और अमर सिंह ने क्या-क्या करवाया होगा ? हर्षद मेहता जैसे काण्ड क्या मुफ्त में होते हैं ? अभी नीरव मोदी , विजय माल्या , मेहुल चौकसी , जैसे भगोड़े बैंक लूट कर वैसे तो नहीं भाग गए। अमर सिंह जैसे डायरेक्टर लोग ही तो काम आते हैं। फिर कपिल सिब्बल , सलमान ख़ुर्शीद , रवि शंकर जैसे वकीलों का काकस अलग से इन का कवच कुण्डल बना रहता है। यही लोग इन चोरों के वकील होते हैं। क्रिकेटर मनोज प्रभाकर की याद तो होगी ही। एक चिट फंड कंपनी ने उन का नाम और फ़ोटो लगा कर ही तो लूटा था जनता को। क्या हुआ मनोज प्रभाकर का ? कुछ हुआ क्या ? तो जब तक कारपोरेट सेक्टर या अन्य कंपनियों में डायरेक्टर बोर्ड में यह नौकरशाह , ज्यूडिशियरी आदि से रिटायर्ड कुत्ते रखे जाते रहेंगे , अरोड़ा , माल्या , मोदी , मेहुल चौकसी जनता और जनता का धन लूट कर भागते रहेंगे। और हम आप नीरज का लिखा गीत सुनते रहने को अभिशप्त रहेंगे :

स्वप्न झरे फूल से,

मीत चुभे शूल से,

लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,

और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।

कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे !

Friday, 3 September 2021

बाइडेन , राहुल गांधी , तालिबान , भाईजान लोग और मौलवी का इश्क़

दयानंद पांडेय 

न जाने क्यों वामपंथी भाई जान लोग बाइडेन और राहुल गांधी की बीमारी की चर्चा मात्र से डरते रहते हैं। शायद यह भी एक बीमारी है। फिर इस बीमारी के लपेट में वामपंथी ही क्यों सारे सेक्यूलर हिप्पोक्रेट्स दीखते हैं। फ़ैसला भले बराक ओबामा का था पर जिस तरह अफगानिस्तान बाइडेन ने खाली किया है और बेआबरु हुए हैं , विश्व की दर्दनाक घटना है। पर गाय तक पर ज्ञान बघारने वाले यह लोग अफगानिस्तान के इंसानों पर हो रहे जुल्मो-गारत पर गॉगल्स लगा कर खामोश हैं। 

याद कीजिए कि कुछ समय पहले इसी अमरीका का राष्ट्रपति रहा ट्रंप जब कभी हवा भी खारिज करता था तो यही लोग तुरंत सूंघ कर उस की बदबू कैसी है से फौरन दुनिया को परिचित करवाते थे। जब कि बाइडेन भी अमरीका का ही राष्ट्रपति है जिस ने अपनी कायरता , अनुभवहीनता और छुद्रता में तालिबान से डर कर समूचे अफगानिस्तान में मल ही मल फैला दिया है। पर यही वामपंथी , यह सारे सेक्यूलर हिप्पोक्रेट्स बाइडेन के इस मल की खुशबू में तरबतर हैं। गोया कितनी पॉजिटिव बात हो गई हो। 

ब्रेख्त , पाब्लो नेरुदा के सारे गीत , सारी कविताएं जैसे मंगल ग्रह चले गए हैं। स्त्रियों , बच्चों की यातनाएं , भूख , लाचारी और बलात्कार जैसे तरक़्क़ी वाली बातें हो गई हैं इन सो काल्ड तरक़्क़ी पसंद लोगों के लिए। अजब मंज़र है। आज दुनिया ने पहली बार अफगानिस्तान में तालिबान की परेड में आत्मघाती दस्ते की परेड भी देखी। कार बम की परेड देखी। पहली ही बार देखा गया कि अमरीकी सैनिक साजो सामान को अपना बता कर परेड में तालिबानियों ने इस तरह दिखाया कि देखो हमारे कितने बाप हैं। माता एक , पिता दस बारह वाली अभद्र कहावत याद आ गई है। पर सभी भाईजान की जुबान और क़लम को जैसे लकवा मार गया है। 

इधर राहुल गांधी ने भी पूरी कांग्रेस को ट्रैक्टर से निरंतर जोत-जोत कर मुकम्मल अफगानिस्तान बना दिया है। इस पर भी कोई सांस नहीं लेते यह भाईजान लोग। गाय नहीं , भैंस ज़्यादा दुधारु है बताने वाले लोग राहुल गांधी को भी क्या दुधारु भैंस मानते हैं कि भैंस से भी ज़्यादा उपयोगी और दुधारु मानते हैं। कि राहुल गांधी की उलटबासियां नहीं दिखतीं , सुनाई देतीं। राहुल गांधी के उकसाने पर सिद्धू ने पंजाब कांग्रेस को परमाणु बम पर बैठा दिया है। पर मजाल है कि कोई बोल निकले। कांग्रेस तिल-तिल कर सोनिया के पुत्र मोह में मर रही है। उधर उत्तर प्रदेश में मुलायम के पुत्र मोह में सपा सन्निपात में है। पर भाईजान लोग ऐसी राजनीतिक मुश्किलों से आंख मूंद कर इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जस्टिस यादव द्वारा गाय को बचाने के लिए राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सलाह पर स्वाहा हुए जा रहे हैं। 

बता रहे हैं कि जस्टिस यादव तो जस्टिस गोगोई से भी ज़्यादा कुछ चाहने लगे हैं। गोया जस्टिस के नाम पर गोगोई पहली बार उपकृत हुए हों। जस्टिस हिदायतुल्लाह वगैरह तो खैर नमाज पढ़ कर ही उपकृत हुए थे। उन को काहे को याद रखना। याद किया तो क़यामत न आ जाएगी। फ़िलहाल तो आत्मघाती दस्ते और कार बम की परेड पर कुछ बोलना सांप्रदायिक हो जाना हो जाता है। भाजपाई और संघी हो जाना होता है। गाय के ख़िलाफ़ बोलना , गाय का मांस खाने की दलील देना ही सेक्यूलर होना मान लिया है इन हिप्पोक्रेट्स ने। बाइडेन और राहुल गांधी इन के आदर्श पुरुष हैं। इन के आइकॉन हैं। इन के देवता हैं। बावजूद इस के कि धर्म अफीम है पर आस्था जलेबी। 

इन की आस्था , बाइडेन , राहुल गांधी और तालिबान में है। सो इन के खिलाफ कुछ बोलेंगे तो क़यामत आ जाएगी। हां , इन की इन में आस्था है। सो आस्था की जलेबी खाने दीजिए इन्हें। ख़ामोश कि तालिबान अफगानिस्तान में हैं और यह तालिबान पर भारत सरकार का रुख जानना चाहते हैं बीते पंद्रह अगस्त से। अक़ल जैसे राहुल गांधी की तरह घुटनों में ले कर पैदा हुए हैं तो करें भी क्या। तालिबान सरकार अभी बनी भी नहीं। पर यह आकुल व्याकुल लोग फ़ौरन जान लेना चाहते हैं कि भारत सरकार तालिबान को मान्यता दे रही है कि नहीं ? तालिबान आतंकी हैं कि नहीं , भारत सरकार की नज़र में यह रणबांकुरे फौरन जान लेना चाहते हैं। नहीं जानना चाहते कि अफगानिस्तान में तालिबान के जबड़े में कुछ भारतीय फंसे हैं , उन्हें सुरक्षित निकालना प्राथमिकता है। तालिबान का पक्ष या विपक्ष जानना नहीं। 

पर क्या करें बिचारे कोरोना के क़हर के बावजूद विदेशी मुद्रा भंडार अभी तक के सब से ऊंचाई का रिकार्ड छू गया है। कोई 6 सौ अरब डालर है विदेशी मुद्रा भंडार। जी एस टी रिकार्ड कलेक्शन का ग्राफ छू चुका है। शेयर मार्केट बंपर रिकार्ड उछाल पर है। जी डी पी का भी सुधार अप्रत्याशित ऊंचाई पर है। तो बिचारे पूछें भी क्या ? गाय को माता नहीं , राष्ट्रीय पशु बनाने की सलाह पर ही उन की सुई सुलग रही है। रस्सी जल गई है , पर बल नहीं गए हैं। 

एक लतीफ़ा याद आ गया है। एक बार एक लड़की किसी मौलवी को मुस्कुराती हुई मिली और बोली , मौलवी साहब , मौलवी साहब , मुझे इश्क़ हो गया है ! मौलवी छूटते ही बोले , कमबख़्त , बेग़ैरत तुझे शरम नहीं आती मुझ से ऐसी बात करते हुए ? लड़की बोली , शरम आती तो है पर क्या करुं मौलवी साहब , पर मुझे सच्ची-मुच्ची इश्क़ हो गया है ! मौलवी बोले , लाहौल बिला कूवत , चल भाग यहां से ! लड़की फिर आहिस्ता से बोली , पर मौलवी साहब क्या करुं , बेबस हूं , भाग नहीं सकती , क्यों कि मुझे आप से ही इश्क़ हो गया है ! मौलवी साहब , ' अचानक बदल गए और मुलायम होते हुए बोले , चल्ल  ........ झूठी कहीं की ! मौलवी को अब यह इश्क़ लेकिन बेग़ैरत और शरम आने वाला लगना बंद हो गया था। झूठ लग रहा था। ऐसे ही चोंचले भरे इश्क़ में हमारे यह भाईजान लोग फंस गए हैं। बिचारे करें भी तो क्या करें ! न करते बन रहा है , न , न करते।

Thursday, 26 August 2021

सुरेंद्र वर्मा ने किसी शोधार्थी से इंटरव्यू के लिए पैसा मांग लिया तो हर्ज क्या है

दयानंद पांडेय 

सुरेंद्र वर्मा मेरे पसंदीदा लेखक नहीं हैं। लेकिन अगर किसी शोधार्थी से इंटरव्यू देने के लिए पैसा मांग लिया तो क्या बुरा कर दिया ? बहुत से विदेशी लेखक इंटरव्यू देने के लिए पैसे लेते हैं। लखनऊ में एक बार अमर उजाला अखबार के रिपोर्टर ने श्रीलाल शुक्ल का इंटरव्यू लिया। श्रीलाल शुक्ल का अमर उजाला में छपा वह इंटरव्यू श्रीलाल शुक्ल की किताब मेरे साक्षात्कार में भी संकलित है। खैर , अमर उजाला में इंटरव्यू छपने के बाद श्रीलाल शुक्ल ने अमर उजाला अखबार को पैसे के लिए लीगल नोटिस दे दी। अमर उजाला ने श्रीलाल शुक्ल को पैसा तो नहीं दिया , उलटे रिपोर्टर को ज़िम्मेदारी दी कि श्रीलाल शुक्ल का इंटरव्यू उन्हों ने लिया है तो उन्हें पैसा न लेने के लिए मनाएं भी। 

रिपोर्टर ने किसी तरह उन्हें मना लिया। बाद में एक मदिरा महफ़िल में मैं ने श्रीलाल जी से इस बाबत ज़िक्र किया तो वह बोले हिंदुस्तान के अखबार चोर और बेईमान हैं। यूरोप के देशों में अखबारों के लिए इंटरव्यू देने के लिए लेखक को पैसा देने की परंपरा है। बहुत से और देशों में। भारत में भी फूलन देवी को इंटरव्यू देने के लिए विदेशी पत्रकारों ने पैसे दिए थे। ऐसे कई प्रसंग हैं। अभिनेता दिलीप कुमार से मैं ने इंटरव्यू लिया तो इंटरव्यू के बाद वह बहुत गंभीर हो कर बोले , मेरी फीस कहां है ? मैं ने छूटते ही उन से विनयवत कहा कि आप की फीस मैं आप को दे सकूं , ऐसी मेरी हैसियत नहीं है ! दिलीप कुमार हंसते हुए बोले , जाइए , जीते रहिए ! 

ऐसे भी कई सारे प्रसंग मेरी जानकारी में हैं कि लोगों ने इंटरव्यू देने और छपवाने के लिए भी भारी भुगतान दिए हैं। देते ही रहते हैं। ख़ास कर उद्योगपति , व्यवसाई , फ़िल्मी लोग और खिलाड़ी। कुछ लेखक भी पैसा दे कर इंटरव्यू छपवाते हैं। किस-किस का नाम लूं  ?  ऐसे में किसी शोध करने वाले से कोई लेखक पैसा मांग लेता है तो मुझे यह बात कतई गलत नहीं लगती। हिंदी के लेखक को लोगों ने जाने क्या समझ रखा है कि उसे किसी काम के लिए , पैसा देना लोगों को बुरा लगता है। अब तो अख़बार और पत्रिकाएं भी लेखक को कोई भुगतान नहीं देते। तमाम वेबसाइटें भरपेट और भरपूर पैसा कमा रही हैं पर लेखक को एक पैसा नहीं देतीं। क्यों भाई , क्यों ? तमाम सेमीनार और अब वेबिनार में भी आयोजक खुद तो पैसा कमाते हैं लेकिन लेखक को पैसा नहीं देते। मार्ग व्यय भी नहीं। 

और तो और प्रकाशक काग़ज़ , छपाई , बाइंडर , प्रूफ रीडर , अनुवादक हर किसी को मुंह माँगा भुगतान देते हैं। कई बार एडवांस भी। लेकिन लेखक को पैसा देने में प्रकाशक के प्राण निकल जाते हैं। अब अलग बात है , बहुत सारे गिरे हुए लेखक प्रकाशक को पैसा दे कर , लेखिकाएं देह और पैसा दोनों दे कर किताब छपवाने में संलग्न हैं। ऐसे में अगर कोई लेखक इंटरव्यू देने के लिए पैसे मांग बैठे तो लोग चौंकेंगे ज़रूर। पर इस पूरे प्रसंग में देख रहा हूं कि तमाम फतवेबाज लेखक पैसे मांगने वाले लेखक सुरेंद्र वर्मा की हजामत बनाने में लग गए हैं। यह गुड बात नहीं है। अरे सीधी सी बात है कि लेखक अपने श्रम , अपने कार्य का पारिश्रमिक मांग रहा है तो उसे यह सहर्ष दिया जाना चाहिए। न मांगे तो भी देना चाहिए। आप पैसा कमाएं और आगे पैसा कमाने के लिए आप किसी का श्रम का मूल्य हड़प जाएं , यह कोई स्वस्थ बात तो हरगिज नहीं है। लेखक को हर बात के लिए , उस के श्रम के लिए सम्मानजनक पैसा देने की परंपरा अब से ही सही , शुरू हो जानी चाहिए। क्यों कि हिंदी का हर लेखक दिलीप कुमार नहीं है। 


Sunday, 22 August 2021

तो कल्याण सिंह इस बार के भारत-रत्न हैं कि पद्म-विभूषण ?

दयानंद पांडेय 

तो कल्याण सिंह इस बार के भारत-रत्न हैं कि पद्म-विभूषण ? दोनों में से कोई एक सम्मान कल्याण सिंह को मरणोपरांत मिलना सौ फ़ीसदी तय है। यह लिख कर रख लीजिए। ज़्यादा संभावना भारत-रत्न की ही है। मेरा पक्का आकलन यही है। अयोध्या विध्वंस के आरोप से न्यायालय उन्हें पहले ही बरी कर चुका है , सो कोई नैतिक या क़ानूनी बाध्यता भी नहीं रही है। कल्याण सिंह के निधन के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति ने भी नई करवट ली है। कभी किसी के जीवन-मरण में कभी कहीं नहीं दिखने , पहुंचने वाली मायावती भी कल्याण सिंह के घर श्रद्धांजलि देने आज सुबह-सुबह पहुंच गईं। इतना ही नहीं मीडिया को कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि की बाइट देते हुए मायावती बहुत भाउक भी हुईं। एक बार तो लगा जैसे रो पड़ेंगी वह। मायावती ने उन्हें पिछड़ों का नेता बताया। यह सब तब है , जब भाजपा में कल्याण सिंह मायावती के विरोधियों में शुमार रहे हैं। 

बल्कि अपने दूसरे कार्यकाल में मायावती के छल पर वार करते हुए मायावती की पार्टी के विधायकों को तोड़ कर उन्हें मंत्री बना कर मायावती को राजनीतिक पटकनी दे कर मायावती के राजनीतिक जीवन में सत्ता सुख पर ताला लगा दिया था। मायावती तिलमिला कर रह गई थीं। कल्याण सिंह राम मंदिर के अगुआ नेताओं में शुमार रहे हैं। जब कि मायावती के आका कांशीराम अयोध्या में राम मंदिर की जगह शौचालय बनाने की तजवीज देते रहे हैं। एक समय कांशीराम खुद नारा लगाते थे , मिले मुलायम-कांशीराम , हवा में उड़ गए जय श्री राम ! अब उन्हीं जय श्री राम के हनुमान कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने मायावती का पहुंचना उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक आकस्मिक घटना है। इस के दूरगामी संकेत हैं। 

उत्तर प्रदेश के एक मुख्य मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी रहे थे। जो बाद में बोफ़ोर्स का छल-कपट कर प्रधान मंत्री भी बने। प्रधान मंत्री बन कर भी लाल क़िला पर 15 अगस्त को अपने भाषण में मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें लागू कर देश में जातीय जहर का उन्माद घोल बैठे। जातीय आग लगा दी पूरे देश में। नतीजा यह हुआ कि विश्वनाथ प्रताप सिंह को सम्मानजनक मृत्यु भी नसीब नहीं हुई। लंबी बीमारी के बाद मरे तो कोई जान भी नहीं पाया। अखबारों में ख़बरों में पहले पेज पर भी जगह नहीं मिली। अंदर के पन्नों में चार लाइन की उपेक्षित सी ख़बर लगी। न्यूज़ चैनलों में एक लाइन की पट्टी वाली ख़बर। देश के अखबार और न्यूज़ चैनल उस दिन मुंबई में आतंकवादी हमले से भरे पड़े थे। इस आतंक को हवा भी वाया कश्मीर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बतौर प्रधान मंत्री दिया था। जब कश्मीर से कश्मीरी पंडित जलील हो कर अपने प्राण ले कर भागे , उन की किसी ने रक्षा नहीं की तो यही विश्वनाथ प्रताप सिंह तब देश के प्रधान मंत्री थे। कश्मीरी पंडितों की स्त्रियों के साथ परिवारीजनों के सामने बलात्कार , उन के सामने ही बलात्कार के बाद स्त्रियों को ज़िंदा आरा मशीन में आधा-आधा चीर देना वहां के मुसलामानों का शगल हो गया था। कश्मीरी पंडितों के घर , जायदाद और स्त्रियां छीन लेना , दुकानें लूट लेना इन का जैसे मुसलमानों का कारोबार बन गया था। सैकड़ों मंदिरों को तोड़ कर नदियों में बहा दिया। 

विश्वनाथ प्रताप सिंह का गृह मंत्री मुफ्ती इतना कमीना था कि आतंकवादियों को रिहा करने के लिए अपनी ही बेटी सईदा रुबिया का अपहरण करवा बैठा। यानी महबूबा मुफ्ती की बहन। आज जो हालत अफगानिस्तान में अफगानियों और शेष लोगों की है , इस से भी बुरी हालत तब कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की हुई थी। तालिबानियों से भी ज़्यादा खतरनाक और मनुष्य विरोधी कश्मीर के मुसलमान हैं। जिन्हें तब के हिप्पोक्रेट राजनीतिज्ञ मिलिटेंट कहते थे। मिलिटेंट मतलब उग्रवादी। आतंकी कहने से परहेज था इन हिप्पोक्रेट्स को। इन्हीं सब करतूतों से विश्वनाथ प्रताप सिंह को सम्मानजनक मौत नहीं मिली। यह वही विश्वनाथ प्रताप सिंह थे जिन्हों ने बतौर मुख्य मंत्री , उत्तरा प्रदेश फ़ाइल पर लिखा था कि अगर मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दी गईं तो आग लग जाएगी। लेकिन प्रधान मंत्री बनते ही देवीलाल को पटकनी देने की गरज से शरद यादव , लालू यादव जैसे जातीय जहर वालों की मंत्रणा पर मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू कर दीं। विश्वनाथ प्रताप सिंह को शरद यादव मंडली ने समझा दिया था कि मंडल लागू कर वह अंबेडकर से बड़े नेता बन जाएंगे। अंबेडकर से ज़्यादा मूर्तियां उन की लग जाएंगी। अंबेडकर जैसा तो दूर , विश्वनाथ प्रताप सिंह अंबेडकर का नाखून भी नहीं छू पाए। अलबत्ता मंडल के फेर में पूरे देश में आग लगवा दी। नौजवान ज़िंदा जलने लगे , जिन पर घोड़े दौड़ा दिए गए। देश की प्रतिभा पर ताला लगा दिया। मुस्लिम तुष्टीकरण में कश्मीर जलने लगा। कश्मीरी पंडित आज तक बेघर हैं। तो विश्वनाथ प्रताप सिंह अपमानजनक मृत्यु को प्राप्त हुए। अब तो कोई उन्हें याद भी नहीं करता। न कश्मीर के मुस्लिम आतंकी , न मंडल की मलाई चाटने वाले। 

लेकिन कल्याण सिंह को ? पूरा देश पूरे सम्मान से याद कर रहा है। उन के विरोधी भी। एक राम नाम ने कल्याण सिंह को यह सम्मान दिलाया है। राम के प्रति हनुमान जैसी निष्ठां ने उन्हें सर्वकालिक बना दिया है। अब आप इस के लिए उन की निंदा करें या तारीफ़ , यह आप जानें। 

हमारी भोजपुरी में एक कहावत है कि इहै मुंहवा पान खियावे ला , इहै मुंहवा पनही। पनही मतलब जूता। तो उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्य मंत्री रहे कल्याण सिंह को बहुत सम्मानजनक मृत्यु मिली है। अपने-अपने कर्म , व्यवहार और बोली की बात है। यही मिल कर नसीब बनाते हैं। आज प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी भी दिल्ली से चल कर लखनऊ पहुंचे कल्याण सिंह के घर। दिलचस्प यह कि कल्याण सिंह के आवास पर नरेंद्र मोदी का प्रथम अभिवादन और स्वागत करने वाली कुसुम राय थीं। जो थोड़ी देर नरेंद्र मोदी के साथ बगल में बराबरी में चलीं भी। राज्यपाल आनंदी बेन पटेल।  भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा  , मुख्य मंत्री योगी , दोनों उप मुख्य मंत्री आदि कुसुम राय के पीछे थे। बाद में योगी , पीछे से निकलते हुए , मोदी के बगल में आए। यह दृश्य भी अविस्मरणीय है। बहरहाल नरेंद्र मोदी का कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने आना , कल्याण सिंह के राजनीतिक क़द का तो एहसास कराता ही है , नरेंद्र मोदी के बड़प्पन और आदर भाव को भी दर्शाता है। 

मोदी ने कल्याण सिंह को नमन करने के बाद जो मीडिया से रुंधे गले से कहा , वह भी महत्वपूर्ण है। कहा कि कल्याण सिंह के माता-पिता ने जो उन का नाम कल्याण सिंह रखा तो कल्याण सिंह अपने नाम के अनुरूप कल्याण का ही काम करते रहे। कल्याण सिंह का नाम राम मंदिर के संदर्भ में लेते हुए उन्हों ने कल्याण सिंह को प्रभु राम से अपने चरणों में लेने की बात भी बड़े भाउक अंदाज़ में कही। कुल मिला कर राम मंदिर निर्माण में कल्याण सिंह के महत्व और उन के प्रस्थान बिंदु की महत्ता बारंबार दुहराते रहे। कल्याण सिंह की याद में भीगते रहे। भाजपा का हर कोई नेता कल्याण सिंह के इस काम को रेखांकित करता मिला। सच भी यही है। और तो और एक समय कल्याण सिंह के राजनीतिक जीवन में शकुनि सा डंक मारने वाले , कल्याण सिंह की चरित्र हत्या करने वाले आज के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कल्याण सिंह की यशगाथा गाते हुए उन्हें अपना नेता , अपना बड़ा भाई और मित्र तीनों बताया। भाजपा में कभी कल्याण सिंह के प्रबल विरोधी रहे राजनाथ सिंह आज कह रहे थे कि वह उन से कहते थे कि हम लोग तो भूतपूर्व मुख्य मंत्री हैं पर आप अभूतपूर्व मुख्य मंत्री हैं। 

नरेंद्र मोदी का कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि देने आने की बात पर देश के प्रथम राष्ट्रपति बाबू राजेंद्र प्रसाद और प्रथम केंद्रीय गृह मंत्री सरदार पटेल की भी याद आ गई। असमय ही सरदार पटेल का निधन हो गया था। सरदार पटेल की अंत्येष्टि मुंबई में होनी थी। दिल्ली में बाबू राजेंद्र प्रसाद ने सरदार पटेल की अंत्येष्टि में शामिल होने की मंशा जताई तो पंडित नेहरू ने उन्हें प्रोटोकॉल का पाठ पढ़ाते हुए कहा कि पटेल की अंत्येष्टि में आप को नहीं जाना चाहिए। बाबू राजेंद्र प्रसाद ने पंडित नेहरू के प्रोटोकॉल के पाठ को दरकिनार किया और कहा कि प्रोटोकॉल बाद में है , पटेल पहले हमारे मित्र हैं। राजेंद्र प्रसाद सरदार पटेल की अंत्येष्टि में शामिल होने मुंबई चले गए। कहते हैं कि राजेंद्र प्रसाद पटेल की अंत्येष्टि के समय फूट-फूट कर रोए भी। आज तो नरेंद्र मोदी , लखनऊ हो आए। राष्ट्रपति ने ट्वीट कर कल्याण सिंह को श्रद्धांजलि दे दी है। कल अलीगढ़ के अतरौली में कल्याण सिंह की अंत्येष्टि में क्या मंज़र होगा , देखना शेष है। क्यों कि दिल्ली में सुषमा स्वराज की अंत्येष्टि में रोते हुए उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू को हम ने देखा है जो अभी जल्दी ही की बात है। बातें और भी बहुतेरी हैं पर आहिस्ता-आहिस्ता।

Saturday, 21 August 2021

त्रेता युग के सब से बड़े राम भक्त अगर हनुमान हैं तो कलयुग के बड़े राम भक्त कल्याण सिंह

दयानंद पांडेय 


त्रेता युग के सब से बड़े राम भक्त अगर हनुमान हैं तो कलयुग के बड़े राम भक्त कल्याण सिंह हैं। हनुमान के बाद अगर कलयुग में राम का सब से बड़ा भक्त हुआ तो वह कल्याण सिंह ही हैं। राम की जो सेवा कल्याण सिंह ने की , वह किसी और ने नहीं। लगता है जैसे राम मंदिर निर्माण के लिए बुनियाद का काम करने के लिए , राम काज के लिए ही वह पैदा हुए थे। इसी लिए वह राजनीति में आए थे। मुख्य मंत्री बने थे। सुंदर काण्ड में तुलसीदास ने लिखा है :

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम, 

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहां विश्राम।

कल्याण सिंह ने हनुमान की तरह इस चौपाई को अंगीकार किया था। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में कल्याण सिंह का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। कल्याण सिंह न होते , उन की डिप्लोमेसी , उन की तिकड़म न होती , तो अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कभी नहीं होता। बाबरी ढांचा गिराना सही था कि ग़लत , इस पर बहस हमेशा होती रहेगी। पर बाबरी ढांचा तब नहीं गिरता तो कोई सुप्रीम कोर्ट भी वहां मंदिर बनाने का आदेश नहीं दे पाता। कोई संसद इस बाबत क़ानून नहीं बना पाती। राम मंदिर निर्माण का इतिहास जब भी , जो भी लिखेगा , कल्याण सिंह का नाम नहीं भूलेगा। राम मंदिर का समर्थक हो या विरोधी , कल्याण सिंह का नाम वह लेता ही है। हनुमान ने रावण की लंका में आग लगाई थी तो कल्याण सिंह ने हिप्पोक्रेट सेक्यूलरों की लंका में आग लगाई थी और राम मंदिर का सपना बुन लिया था। लोहिया ने लिखा है कि राम, कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। तो राम का स्वप्न पूरा किया कल्याण सिंह ने। 

वह जो कहते हैं कि सरकार इक़बाल और धमक से चलती है। तो कल्याण सिंह उसी इक़बाल और धमक से सरकार चलाते थे। बड़े-बड़ों को ठिकाने लगाया। अपराधमुक्त उत्तर प्रदेश और गड्ढामुक्त सड़कें ही उन का जैसे स्लोगन था। बहुतेरे मुख्य मंत्रियों से मेरा वास्ता पड़ा है। बहुत करीब से देखा है। पर कल्याण सिंह जैसा दूसरा मुख्य मंत्री मैं ने उत्तर प्रदेश में दूसरा नहीं देखा। उन के साथ की बहुत सी बातें और यादें हैं। उन के साथ जाने कितनी यात्राएं याद आ रही हैं। हवाई यात्राओं में वह अपने साथ भुना चना और मखाना रखते थे। मुट्ठी भर-भर खाते-खिलाते थे। उन के कई इंटरव्यू याद आ रहे हैं। पूरी ईमानदारी और पूरी निष्ठा से उत्तर प्रदेश सरकार चलाई थी उन्हों ने। एक समय भाजपा में अटल , आडवाणी के बाद तीसरे नंबर पर कल्याण सिंह का नाम लिया जाने लगा था। बस राजनाथ सिंह की शकुनी चाल में फंस कर वह अटल बिहारी वाजपेयी से टकरा गए। और मुख्य मंत्री की कुर्सी गंवा कर राजनीति के नेपथ्य में चले गए। उन के साथ ही उत्तर प्रदेश में भाजपा भी नेपथ्य में चली गई। मुलायम सिंह के साथ एक अपमानजनक समझौता भी किया कल्याण सिंह ने कुछ समय के लिए। उत्तर प्रदेश में संगठित अपराध और भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए निर्णायक फैसलों के लिए भी हम कल्याण सिंह को जानते हैं। अयोध्या में राम मंदिर अभियान में सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दे कर भले बाबरी को बचाने का वादा किया था। पर सार्वजनिक रूप से वह लगातार कहते रहे थे कि अयोध्या में मैं गोली नहीं चलाऊंगा। यह ज़रूर है कि राम काज के लिए हनुमान को लंका में विभीषण मिले थे , कलयुग में कल्याण सिंह को नरसिंहा राव मिले। 

18 फ़रवरी , 1998 को मेरा एक भीषण एक्सीडेंट हुआ। मुलायम सिंह यादव संभल से चुनाव लड़ रहे थे। उन्हीं के कवरेज में लखनऊ से संभल जा रहा था। सीतापुर के पहले ख़ैराबाद  हमारी अंबेसडर की एक भैंस लदे ट्रक से आमने-सामने की टक्कर हो गई। हमारे साथ बग़ल में बैठे हिंदुस्तान अखबार के जय प्रकाश शाही और ड्राइवर मौक़े पर ही दम तोड़ गए। मैं और आज अखबार के गोपेश पांडेय किसी तरह बचे और लखनऊ लाए गए। मुझे देखने अटल बिहारी वाजपेयी जी भी आए। मुलायम सिंहं , कलराज मिश्र , राजनाथ सिंह समेत तमाम राजनीतिज्ञ आए। कल्याण सिंह भी। कल्याण सिंह तब मुख्य मंत्री थे। उन्हों ने मेरे इलाज के लिए बंदोबस्त करवाया। मेरे इलाज और देखरेख के लिए पूरा सरकारी अमला लगा दिया। सरकार की तरफ से आर्थिक मदद भी दी। और निरंतर हालचाल लेते रहे। मेरी जान बच गई। कहने का अर्थ यह कि कल्याण सिंह मददगार भी बहुत थे। 

पिछड़ी जातियों की राजनीति करने वाले कल्याण सिंह को एक समय उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने नाको चने चबवा दिए थे। लेकिन कल्याण सिंह ने उन्हें न सिर्फ पटकनी दे दी थी , भरी विधान सभा में रोमेश भंडारी से अभिभाषण में माफ़ी भी मंगवा दी थी। सामान्य भाषा में इसे थूक कर चाटना भी कहते हैं। जो रोमेश भंडारी ने किया। 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी थी तब राम नरेश यादव मुख्य मंत्री थे। कल्याण सिंह स्वास्थ्य मंत्री और मुलायम सिंह सहकारिता मंत्री। मुलायम सिंह जब मंत्री बने तब भी जनसंघ धड़े के समर्थन से और जब पहली बार 1989 में मुख्य मंत्री बने तब भी भाजपा के समर्थन से। बाक़ी सेक्यूलरिज्म का च्यवनप्राश भी सब से ज़्यादा मुलायम ही उत्तर प्रदेश में खाते रहे हैं। जाने किस मुंह से। लेकिन क्या कीजिएगा यह राजनीति है। कहते हैं कभी गाड़ी , नाव पर। कभी नाव गाड़ी पर। जो भी हो कल्याण सिंह जैसे भी थे खुली किताब थे। ईमानदार थे और निडर भी। भाजपा में लोग उन्हें बहुत आदर से बाबू जी कहते थे। कृपया मुझे कहने की अनुमति दीजिए कि राजनाथ सिंह की शकुनि चाल में अगर कल्याण सिंह न फंसे होते , अपने अहंकार को थोड़ा सा दबा ले गए होते तो वह केंद्र की राजनीति में होते। और कि राज्यपाल नहीं नियुक्त हुए होते। राज्यपाल नियुक्त कर रहे होते। हो सकता था कल्याण सिंह राजनाथ सिंह को ही कहीं राज्यपाल नियुक्त कर दिए होते। बहरहाल कल्याण सिंह भाजपा में इकलौते थे। जो कभी वार करना भी होता तो पीछे से नहीं , सामने से और खुल्ल्मखुल्ला करते थे। कल्याण सिंह जी , आप सर्वदा याद आएंगे। आप की कर्मठता भी। विनम्र श्रद्धांजलि !

इन आतंकियों के शरिया आदि का इलाज सिर्फ और सिर्फ फौजी बूट , टैंक , मिसाइल और बम वर्षक जहाज हैं , बातचीत नहीं

दयानंद पांडेय 

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि ये इस्लामी आतंकी , तालिबानी आदि-इत्यादि कभी किसी फ़ौज से क्यों नहीं सीधा मुक़ाबला करते। जब भी अपनी बहादुरी यह आजमाते हैं , सर्वदा निर्दोष और मासूम जनता से ही मुक़ाबला करते हैं और अपनी कायरता का परचम लहराते हैं। स्त्रियों और बच्चों को ही पहला निशाना बनाते हैं। अफगानों की बहादुरी के नकली किस्से अब की क़ाबुल हवाई अड्डे पर दिखे। घर-परिवार , बीवी-बच्चों को लावारिश छोड़ कर अमरीकी जहाज के आगे-पीछे दौड़ रहे थे। अभी अमरीकी या भारतीय सेना अफगानिस्तान पहुंच जाए तो सारे तालिबानी आतंकियों के पठानी सूट खराब हो जाएंगे। न इन के पास बहादुरी है , न शऊर , न सभ्यता , न मनुष्यता। 

कश्मीर से सीरिया तक , भारत , अमरीका , फ़्रांस और यूरोप तक इन की कायरता की एक ही कहानी है। इस्लाम का अपना आतंकी एजेंडा सिर्फ़ निर्दोषों पर आजमाते हैं। सेना के कैम्प में भी छुप कर दहशतगर्दी करते हैं। इस्लामी आतंक के बूते समूची दुनिया को जहन्नुम बनाए हुए हैं। भारत जैसे देश में सेक्यूलर हिप्पोक्रेट इन्हें अकसर कवरिंग फायर देते रहते हैं। जैसे अफगानिस्तान में तालिबान प्रेस कांफ्रेंस कर अपना नकली उदार चेहरा पेश कर रहे हैं , उसी तरह भारत में भी यह भाई-चारा की नक़ली सूरत पेश कर पीठ में छूरा भोंकते हैं। आमने-सामने की लड़ाई में इन्हें कभी यक़ीन नहीं रहा। क्यों कि यह कायर और बुजदिल लोग हैं। निहत्थों पर अपनी बहादुरी आज़माने के अभ्यस्त मनुष्यता विरोधी लोग हैं। लोगों की उदारता का दुरूपयोग करने में सिद्धहस्त। 

इन आतंकियों के शरिया आदि का इलाज सिर्फ और सिर्फ फौजी बूट , टैंक , मिसाइल और बम वर्षक जहाज हैं ,बातचीत नहीं । बातचीत का ड्रामा शरीफों के साथ होता है। आतंकियों के साथ नहीं। मनुष्यता और स्त्री विरोधियों के साथ नहीं। समूची दुनिया में इन्हें पूरी सख्ती और पूरी बेरहमी से कुचल कर मनुष्यता का राज कायम करने की सख्त ज़रूरत है। इन्हें सुधरने का कोई अवसर देना कोरी नादानी है। इन के सुधरने की उम्मीद करना मूर्खता और कायरता है। लोकतंत्र आदि को मुल्तवी कर कश्मीर में महबूबा जैसी जहरीली नेताओं को सीधे गोली मार देनी चाहिए। इस मामले में चीन को फॉलो करना चाहिए। फिर महबूबा ही क्यों , ऐसे हर किसी के साथ यही सुलूक़ होना चाहिए। बहुत हो चुका पाकिस्तान-पाकिस्तान , शरिया और इस्लाम आदि-इत्यादि। देश सर्वोच्च है , कोई मज़हब , फ़ज़हब नहीं। हिंदू हो , मुसलमान हो या कोई और। सब के साथ एक सुलूक़। नो रियायत। देश और मनुष्यता के साथ कोई समझौता नहीं। बहुत हो चुका। पंजाब में के पी एस गिल की तरह सुलूक़ करना होगा। नो अरेस्ट , नो सुनवाई , डायरेक्ट जजमेंट ! तभी इस आतंक से फुर्सत मिलेगी। महबूबा ? अरे महबूबा जैसों की बू भी नहीं मिलेगी कभी। पाकिस्तान , शरिया सब भूल जाएंगे यह लोग।

Thursday, 19 August 2021

इस्लाम की बंदूक़ ले कर राजा तालिबान आए हैं

 ग़ज़ल / दयानंद पांडेय 


मां की ग़ज़ल सुनाते मुनव्वर राना बेईमान आए हैं 
इस्लाम की बंदूक़ ले कर राजा तालिबान आए हैं 

बहुत ज़ोर था संविधान पर उन का शाहीन बाग़ में 
संविधान की आड़ में वह शरिया का शैतान लाए हैं 

दुशासन एक ही था द्रौपदी की चीर हरण के वास्ते 
अब लाज लूटने इस्लामी कल्चर के लाखों हैवान आए हैं 

चार सौ मर्द एक औरत को नंगा करते सरे बाज़ार 
इस नई सदी में हम एक ऐसा पाकिस्तान पाए हैं 

बतियाते-बतियाते रोती है औरत जार-जार बेजार 
गो पुराने ज़ख्मों को हरा करने अब नए कद्रदान आए हैं 

कि बेटी की , उस की लाज बचेगी कैसे पूछती है औरत 
रूस अमरीका के झगड़े में ऐसा अफगानिस्तान लाए हैं 

इस्लामी आतंक में लुटा है कश्मीर भी कभी ऐसे ही 
कश्मीरी पंडित यह किस्सा दबी जुबान लाए हैं 

सेक्यूलरों ने सर्वदा हैवानियत के शोलों को हवा दी है 
बचा कर इन की दोजख से अपनी जान लाए हैं 

क़िस्से बहुत हैं दुनिया में इन की हैवानियत के 
मनुष्यता बची रहे किसी तरह हम यह पैग़ाम लाए हैं 

Wednesday, 18 August 2021

भाजपा और आर एस एस वाले कभी नहीं सुधरेंगे !

दयानंद पांडेय 

भाजपा और आर एस एस वाले कभी नहीं सुधरेंगे। अब देखिए न उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को भेज दिया है। अभी तक हिंदू , मुसलमान करते थे। अब मुसलमान , मुसलमान करने लगे हैं। मुसलमानों में ही बंटवारा करवा दिया है। कत्लेआम शुरू करवा दिया है। औरतों पर ज़ुल्म तो ज़ुल्म , मुसलमानों को मुसलमानों से ही लड़वा दिया है। यहां तक कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान के मौलवी , मुल्ला को भी लड़वा दिया है। पाकिस्तान के मुल्ला , मौलवी अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की हरक़तों की मजम्मत कर रहे हैं और भारत के मौलवी , मुल्ला तालिबान की खुशामदीद में संलग्न नज़र आ रहे हैं। अजब मंज़र है। 

ये भाजपा , आर एस एस वाले जो न करवा दें , कम है। पंजाब में चुनाव जीतने के लिए पाकिस्तान में महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति भी कल तोड़वा दी। और सिद्धू से कह दिया , खबरदार जो इस पर कुछ बोला। सो सिद्धू समेत समूची सिख संगत ख़ामोश है। सिख संगत की देखा-देखी , सभी वामपंथी और कांग्रेसी आदि-इत्यादि भी डर कर ख़ामोश हो गए। और तो और अतिवादी राकेश टिकैत के जहरीले बोल भी बंद। ऐसे , गोया शत्रुघन सिनहा ने ख़ामोश ! बोल दिया हो। अभी देखिए और क्या-क्या करते हैं यह लोग ! 

सब का साथ , सब का विकास , सब का विश्वास शायद कम पड़ रहा था जो अब की 15 अगस्त को लाल क़िले से इस में सब का प्रयास भी जोड़ दिया। सब का प्रयास शब्द जोड़ते ही भाजपा वालों ने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को इशारा किया और तालिबान ने बिना किसी देरी के 15 अगस्त से ही प्रयास शुरू कर दिया। बताइए कि कमल खिलाने के लिए भाजपा वाले अब सरहद पार भी पहुंच गए। मैं तो कहता हूं कि अगर भाजपा , आर एस एस से सब लोग डरे हुए हैं , कुछ नहीं बोल पा रहे तो चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को इस का स्वत: संज्ञान ले लेना चाहिए। क्यों कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , सहिष्णुता आदि शब्द बौने हो कर विश्राम मोड में आ गए हैं। 

हम जाने किस मोड़ पर आ गए हैं।

Tuesday, 17 August 2021

तालिबान की ट्रेजडी के धागे अंतहीन नहीं हैं

दयानंद पांडेय 

अजब मंज़र है। पाकिस्तान में आज महाराजा रणजीत सिंह की मूर्ति तोड़ दी गई। पर भारत का सिख समाज खामोश रहा। वह पागल और अराजक सिद्धू भी नहीं भौंका। उधर अफगानिस्तान में तालिबान की दहशतगर्दी में फंसे सिख समाज के लोग खुद को बचाने के लिए अमरीका और कनाडा से गुहार लगा रहे हैं , भारत से नहीं। लेकिन कनाडा और अमरीका उन की मदद करने से रहे। इधर मोदी कह रहे हैं , अफगानिस्तान के हिंदू और सिख भाइयों को भारत शरण देगा। ई वीजा की भी बात कही  है। 

दिलचस्प यह कि पाकिस्तान में जश्न है , अफगानिस्तान में तालिबान की आमद पर। पर कोई अफगानी पाकिस्तान नहीं जाना चाहता। जो भी हो , अमरीका ने ठीक ही किया है अफगानिस्तान छोड़ कर। कब तक अफगानिस्तान का बोझ उठाता भला। आज नहीं , कल यह क़यामत अफगानिस्तान में आनी ही थी। आ गई। देर-सवेर पाकिस्तान में भी यह क़यामत आएगी ही आएगी। 

रही बात भारत की तो जब तक नरेंद्र मोदी नाम की चौकीदारी है , निश्चिंत रहिए। जब कभी अवसर आया तो इन हिंसक तालिबानियों के खून का तालाब बना देगा यह चौकीदार। सो फिकर नाट ! यक़ीन न हो तो 370 समेत , उरी , बालाकोट से लगायत अभिनंदन तक को याद कर लीजिए। इंटरनेशनल डिप्लोमेसी वाली उलटी-सीधी बातों पर बहुत परेशान न हों। बिलकुल न हों। सेक्यूलर चैंपियंस की हिप्पोक्रेसी पर भी कान न दें। इन की हैसियत हाथी के पीछे भौंकने से ज़्यादा की नहीं है। 

तालिबान की ट्रेजडी के धागे अंतहीन नहीं हैं। अंत भी होगा। कहावत बहुत पुरानी है कि लोहा , लोहा को काटता है। तो शरिया , शरिया को मज़ा दे रहा है। देने दीजिए। आप को दिक़्क़त क्या है। शरिया को शरिया से निपटने दीजिए। सुनते-सुनते कान पक गए हैं कि हमारे मज़हब में दखल मत दीजिए। जाने क्यों लोग मनुष्यता-मनुष्यता उच्चार कर दखल देना चाहते हैं। भारत में तो भाईजान लोग भी चुप हैं और वामपंथी भी , कांग्रेसी , ममता , सपा , बसपा इत्यादि सभी। फ़िल्मी जन भी , बुद्धिजीवी जन भी। जब सभी हिप्पोक्रेट्स शरिया के नाम पर ख़ामोश हैं तो शेष लोगों को भी चुप रहना चाहिए। शरिया में कोई दखल नहीं ! नो आह , नो वाह ! कहते ही हैं कि मूर्ख और मृतक राय नहीं बदलते। तो यह तालिबान मूर्ख भी हैं और मृत भी। पर जाने क्यों लोग इन में बदलाव भी चाहते हैं। अजब मासूमियत और अजब लाचारी है। 

है न !

Thursday, 12 August 2021

आरक्षण-आरक्षण खेलने का लाभ सरकार बनाने और समाज को प्रतिभाहीन बनाने में और ज़्यादा उपयोगी है

दयानंद पांडेय 

80 करोड़ निर्बल लोगों को मुफ्त राशन देना , उज्ज्वला के तहत मुफ़्त गैस , मुफ्त पक्का मकान , मुफ्त शौचालय देना है आप सालो-साल देते रहिए। डाक्टर , इंजीनियर आदि की पढ़ाई में भी इन की पूरी फीस माफ़ कर दीजिए। पर 90 परसेंट वाले बच्चों को धकिया कर 40 परसेंट वाले बच्चों को एडमिशन देने से तो बच ही सकते हैं। नौकरी देने से तो बच ही सकते हैं। ऐसी प्रतिभाहीन योजना से बाज आइए। सोचिए कि 90 परसेंट वाली प्रतिभा को धकिया कर 40 परसेंट वाले को सिर पर बिठा कर आप 75 बरसों से कौन सा समाज बना बैठे हैं। जातीय नफ़रत की नागफनी उगा बैठे हैं। सामाजिक समता के नाम पर उग रही इस नागफनी को रोकिए। ओ बी सी और दलितों द्वारा बात-बेबात आगज़नी और हिंसा से कब तक डरते रहेंगे ? वह नाराज हो कर धर्म परिवर्तन कर लेंगे , उन की इस ब्लैकमेलिंग से कब तक भयभीत रहेंगे ?

आप को नहीं मालूम तो मालूम कीजिए कि देश ज्वालामुखी के ढेर पर बैठ चुका है। ओ बी सी , दलित और मुस्लिम की राजनीति सिर्फ़ राजनीति तक ही सीमित रखिए। नहीं कल को योग्य चिकित्सक , योग्य इंजीनियर , योग्य प्रशासनिक अधिकारी आप ढूंढते रह जाएंगे। बहुत बीमार समाज बना बैठे हैं , हम लोग। इतना कि हिप्पोक्रेट राजनीतिज्ञ ताल ठोंक कर जातीय जनगणना की दूरबीन से ही विकास खोजने की वकालत का पहाड़ा पढ़ने लगे हैं। अभी अयोग्य लोगों के राज्य सभा में पहुंच जाने से उन के जूतमपैजार पर आप माथा फोड़ रहे हैं। कल को यह जूतमपैजार गली-गली , सड़क-सड़क दिखने वाला है। हिंसा और अराजकता के दम पर योग्यता पर अयोग्यता की विजय का पथ प्रशस्त हो चुका है। 

भारतीय समाज को इस तरह हिंसक और तालिबान बनने से रोकना अब बहुत ज़रूरी हो गया है। आप को लगता है कि जनता ने बहुमत से चुन कर आप को संसद में भेजा है। तो क़ानून बनाने का , उस को लागू करने का आप का अधिकार है। पर मुट्ठी भर अराजक और हिंसक लोग आप को काम नहीं करने दे रहे। दुरुस्त बात है। लोकतंत्र के लिए यह सचमुच शुभ नहीं है। फिर इसी बिना पर यह भी कैसे शुभ है भला कि 90 परसेंट पाने वाला बच्चा कोने में खड़ा-खड़ा फ्रस्ट्रेट होता रहे और 40 परसेंट पाने वाला उस के कंधे पर पैर रख कर खड़ा हो जाए और सारी मलाई बिना मेहनत के लूट ले। 

जैसे संसद में विपक्ष अल्पमत में होते हुए भी सारे सिस्टम की नाक में दम किए हुए है , वैसे ही कम अंक पा कर भी आरक्षण वाला बच्चा ज़्यादा नंबर पाने वाले बच्चों की नाक में दम किए हुए है। कभी दलित , कभी मुस्लिम , कभी ओ बी सी का ट्रंप कार्ड खेलने से भी ज़्यादा घातक है , प्रतिभशाली बच्चों का गला काट कर प्रतिभाहीन बच्चों को निरंतर आगे बढ़ाते जाना। प्रतिभाहीन समाज बना कर आप की सरकार तो बन सकती है , आप का हिंदुत्व भी बच सकता है। पर जब प्रतिभा की ज़रूरत होगी तब क्या करेंगे भला। आक्सीजन और दवाई की तरह क्या प्रतिभा भी आयात करेंगे ? अभी तो आप की सारी प्रतिभाएं यू के , यू एस की प्रगति में अपना ख़ून-पसीना एक कर रहे हैं। 

ब्रेन-ड्रेन की मार बहुत बड़ी है। ब्रेन-ड्रेन पहले बीस-पचीस प्रतिशत ही था। अब यह 70 प्रतिशत से अधिक हो चुका है। पहले बच्चे पढ़ कर यू के , यू एस भागते थे। अब पढ़ने के लिए ही भाग जाते हैं। पढ़ कर वहीँ काम करने लगते हैं। फिर जब तक माता-पिता जीवित रहते हैं तब तक भारत याद रहता है। फिर वह भारत भी भूल जा रहे हैं। आंख उठा कर देखिए। देश प्रतिभाओं से रिक्त हुआ जा रहा है। आरक्षण-आरक्षण खेलने का लाभ सरकार बनाने में फिलहाल बहुत उपयोगी है पर भारतीय समाज को प्रतिभाहीन बनाने में और ज़्यादा उपयोगी साबित हो रहा है।  कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण और मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में अंतत: साफ हो गई है। सपा , बसपा जैसी जातिवादी पार्टियां भी सफाचट हो गईं इसी मुस्लिम वोट बैंक की बदबू में। अब भाजपा ओ बी सी और दलितों के तुष्टिकरण में नत हो कर बदबू मारने लगी है। भाजपा और आर एस एस को लुका-छुपी का खेल बंद कर सीधे-सीध 50 प्रतिशत का आरक्षण दलितों को 50 प्रतिशत आरक्षण ओ बी सी को दे कर फाइनली छुट्टी ले लेनी चाहिए। हिंदुत्व बचाने का अगर यही तरीक़ा शेष रह गया है तो यही सही। बाक़ी लोगों को मंगल ग्रह या चंद्रमा पर भेज देना चाहिए। लोग वहीं अपना-अपना आबोदाना खोज लें।

Saturday, 7 August 2021

नीरज चोपड़ा का गोल्ड मेडल पेगसस टीम से बर्दाश्त नहीं हो रहा है , इतना कि इन का पृष्ठ भाग जल कर ईंट का भट्ठा बन गया है

 दयानंद पांडेय 

पेगसस की कुंठा का पायजामा इतना फट गया है , फटता ही जा रहा है कि ओलंपिक में नीरज चोपड़ा का गोल्ड मेडल पेगसस टीम से बर्दाश्त नहीं हो रहा है। पेगसस के पूरे पायजामे में आग लग गई है। सो इन का पृष्ठ भाग जल कर ईंट का भट्ठा बन गया है। कुंठा विगलित हो कर बदक रही है इतना कि आखिर भारत को फेंकने में ही गोल्ड मिला , बताया जाने लगा है। तंज की तंगदिली का तावा बहुत गरम है। तब जब कि अभी ओलंपिक के कई दिन शेष हैं और 7 मैडल भारत के हिस्से में किसी ओलंपिक में पहली बार आ चुके हैं। स्पष्ट है कि अभी और आएंगे। 

क्रिकेट जैसा क्रीम खेल इन ओलंपिक मेडल की चमक में फीका पड़ गया है। इन दिनों क्रिकेट मैच भी हो रहे हैं पर बहार ओलंपिक की चल रही है। क्रिकेट जैसे नेपथ्य में चला गया है। लेकिन कुछ कुंठित लोगों के पृष्ठ भाग में इन ओलंपिक मेडल से आग लग गई है। वैसे भी देश की हर सफलता , हर उपलब्धि में इन के पृष्ठ भाग में आग लगना स्वाभाविक क्रिया बन गई है। वैक्सीन बन जाए तो पृष्ठ भाग में आग। चीन पर भारत भारी पड़ जाए तो पृष्ठ भाग में आग। अभिनंदन सिर उठा कर , सीना तान कर भारत वापस लौट आए तो पृष्ठ भाग सुलग जाए। सुप्रीम कोर्ट से राम मंदिर के पक्ष में फैसला आ जाए तो पृष्ठ भाग में आग। 370 पर भी और सी ए ए आ जाए तो भी। बात-बेबात इन का पेगसस का पायजामा जल जाता है और पृष्ठ भाग में आग लग जाती है। वंदे मातरम और भारत माता की जय से चिढ़ते-चिढ़ते इन का पृष्ठ भाग ज्वालामुखी का ख़ास केंद्र बन गया है। 

इन का पृष्ठ भाग तभी संतुष्ट होता है जब भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला , इंशा अल्ला सुनते हैं। तुम कितने अफजल मारोगे , हर घर से अफजल निकलेगा ! जैसे नारों से भी इन का पृष्ठ भाग संतुष्ट हो जाता है। दुर्भाग्य यह कि ऐसे लोगों का कोई चिकित्सकीय समाधान भी नहीं है। थोड़ा बहुत समाधान है ऐसे लोगों का तो योगी आदित्यनाथ के पास ही है। अगर आप को यकीन न हो तो राकेश टिकैत द्वारा लखनऊ घेराव के ऐलान के बाबत मेरी इस बात का परीक्षण कर लीजिएगा। लखनऊ की सरहद पर राकेश टिकैत का माकूल इलाज न हो जाए तो बताइएगा। 

तो पेगसस के जले और फ़टे पायजामा वालों का इलाज भी योगी आदित्यनाथ के पास ही है। मोदी और अमित शाह के पास नहीं। मोदी और अमित शाह के पास अगर इलाज होता तो रावर्ट वाड्रा , ज़मीन मामले में राहुल और सोनिया , नेशनल हेराल्ड मामले में अब तक जेल में होते। चिदंबरम जैसे लोग जेल से बाहर नहीं आ पाए होते। पर यह मोदी , अमित शाह जैसे लोग वेट एंड वाच में यक़ीन रखने वाले नरम दल के लोग हैं। लेकिन योगी इन का पायजामा फाड़ कर , उसी कपड़े में इन का कुरता भी सिलवा कर पहना देंगे। फिर आज़म खान और मुख्तार अंसारी , अतीक अहमद जैसों की तरह इन सब की आवाज़ भी नहीं निकलेगी। 

देखिए न कि अखिलेश यादव का भीतर-भीतर जाने क्या इलाज कर दिया है योगी ने कि उत्तर प्रदेश विधान सभा की 403 सीटों में से 400 सीट जीतने का ऐलान कर दिया है अखिलेश यादव ने। गोया विधान सभा चुनाव नहीं लड़ने निकले हैं , घर की टोटी और टाइल उखाड़ने निकले हैं। हर थाने पर यादव थानेदार तैनात करने निकले हैं। कुरता फाड़ कर घूमना इसे ही तो कहते हैं। एक मजनू ही नहीं था , अखिलेश यादव भी हैं। भरी जवानी में बूढ़े और चिड़चिड़े वैसे ही तो नहीं हो गए हैं अखिलेश यादव। बात-बेबात मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों की रट वैसे ही तो नहीं लगाए हुए हैं वह। नहीं रहे अमर सिंह नहीं अब तक वह अखिलेश यादव को उन का चंद्र खिलौना दे कर उन के घर में बैठा दिए होते। 

एक ओम प्रकाश राजभर हैं कि पांच साल में पांच मुख्य मंत्री और 20 उप मुख्य मंत्री की लतीफाई बात कर रहे हैं। बसपा वाले कभी अयोध्या में राम जन्म-भूमि पर शौचालय बनाने की बात करते थे। आज बढ़-चढ़ कर मंदिर बनाने की बात रहे हैं। सपा-बसपा सभी प्रभु राम और ब्राह्मणों की बात करने लगे हैं। योगी असल में आयुर्वेदिक और प्राकृतिक चिकित्सा में यकीन करते हैं , एलोपैथी में नहीं। इसी लिए कह रहा हूं कि पेगसस के पायजामे का जो नाड़ा निकल गया है , पृष्ठ भाग में जो आग लगी हुई है , उस का निवारण और शमन सिर्फ़ योगी ही कर सकते हैं। बरास्ता आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा। बताइए कि 13 सालों बाद एक खिलाड़ी ओलंपिक से गोल्ड मेडल जीतता है और यह विघ्न संतोषी इस पर भी तंज और शोक में डूब जाते हैं। हिंदू अखबार का एक बीमार सहायक संपादक तो नीरज अरोड़ा के साथ ही पाकिस्तानी खिलाड़ी को भी गोल्ड मेडल मिलने की कल्पना करता मिला आज। यह तब जब है कि पाकिस्तान के लोग भी नीरज चोपड़ा को बधाई दे रहे हैं। 

एक चीनी कहावत है कि इतने उदार भी मत बनिए कि अपनी बीवी भी किसी को गिफ्ट कर दीजिए। पर यह लोग तो बीवी , मां , बहन , बेटी ,आन-मान , स्वाभिमान सब कुछ सौंप देना चाहते हैं। पूरा देश गोल्ड मेडल में चहक और गमक रहा है पर इस पेगसस ऊर्फ टुकड़े-टुकड़े गैंग वालों का पृष्ठ भाग इतना सुलग गया है कि पाकिस्तान को गोल्ड मैडल की परिकल्पना के सुख में डूबा हुआ है। सुख और आनंद के क्षण में भी तंज और शोक में डूबा हुआ है। इन नितंब नरेशों का समुचित इलाज अब बहुत ज़रूरी हो गया है। राष्ट्रीय सुख और आनंद में भी शोक और तंज का तालाब खोद लेने वालों की खबर तो लेनी पड़ेगी। पेगसस की कुंठा का पायजामा पहने लोगों के पृष्ठ भाग में लगी आग को और दहकाना बहुत ज़रुरी हो गया है। ताकि यह अपनी ही आग में जय हिंद हो जाएं। 

Thursday, 5 August 2021

किसान आंदोलन में दम होता तो बासी पैगसस का कोहराम न होता

दयानंद पांडेय 

मुस्लिम वोट बैंक में दम होता तो मई , 2014 में नरेंद्र मोदी प्रधान मंत्री न बने होते। नफ़रत और घृणा से भरे मुट्ठी भर लेखकों , कवियों को मई , 2014 के बाद की कविता का विलाप न करना पड़ता। देश छोड़ने का ऐलान न करना पड़ता। राफेल में दम होता तो फिर 2019 में नरेंद्र मोदी दुबारा प्रधान मंत्री न बने होते। एन आर सी और सी ए ए के दंगों में दम होता तो किसान आंदोलन न होता। किसान आंदोलन में दम होता तो बासी पैगसस का कोहराम न होता। पैगसस का मामला 2019 का है। विपक्ष समेत नरेंद्र मोदी वार्ड के मरीजों को अब से सही समझ लेना चाहिए कि मंकी एफर्ट्स से देश की छवि से खेला तो जा सकता है , अपना इगो मसाज तो किया जा सकता है पर नरेंद्र मोदी जैसे ज़मीनी नेता को पछाड़ा या उखाड़ा नहीं जा सकता। आप पूछ सकते हैं कि मंकी एफर्ट क्या बला है। 

क्या हुआ कि एक जंगल में एक बंदर ने शेर के खिलाफ विष-वमन किया और जंगल में और जानवरों को शेर के खिलाफ ख़ूब भड़काया और बताया कि शेर के अत्याचार से सिर्फ़ मैं ही आप लोगों को बचा सकता हूं। सो मुझे जंगल का राजा बना दो। सारे जानवर मान गए। बंदर राजा बन गया। एक दिन अचानक शेर आ गया। लोग बंदर से बोले , मुझे अब शेर से बचाओ। बंदर पेड़ पर चढ़ गया। और इस डाल से उस डाल कूद-कूद कर शेर को हड़काता रहा। लेकिन शेर ने बंदर की एक न सुनी। एक-एक कर कई जानवरों को खाता रहा। जंगल के जानवरों ने बंदर से कहा कुछ करते क्यों नहीं ? हमें बचाते क्यों नहीं ? इस डाल से उस डाल उछल-कूद करते हुए बंदर बोला , ' कोशिश तो लगातार कर रहा हूं। मेरे एफर्ट में कोई कमी हो तो बताओ। ' और शेर एक-एक कर सभी जानवरों को खा गया। 

कुछ-कुछ इसी तरह भारत का विपक्ष निरंतर समाप्त होते हुए कांग्रेस और राहुल गांधी के मंकी एफर्ट को इंज्वाय कर रहे हैं। पैगसस भी इसी मंकी एफर्ट का एक सिलसिला है। सुप्रीम कोर्ट ने भी आज विपक्ष के इस मंकी एफर्ट की ऐसी-तैसी करते हुए पूछ लिया है कि सुबूत क्या है ? 2019 में यह मामला सामने आने पर भी अभी तक कहां थे ? कहीं शिकायत क्यों नहीं की ? सुनवाई मंगलवार यानी 10 अगस्त को फिर है। पर पैगसस पर पहले राउंड में राहुल गांधी के मंकी एफर्ट की हवा निकाल दिया है सुप्रीम कोर्ट ने। 

बाकी विपक्ष भी जब तक राहुल के मंकी एफर्ट के खेल से बाहर निकल कर जब तक जनता के बीच नहीं जाएगा। कोई ज़मीनी बात नहीं करेगा , गगन बिहारी बातें करता रहेगा तो 2024 में भी नरेंद्र का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। यह लिख कर रख लीजिए। बिना किसी भेदभाव के गरीबों के बीच पक्का मकान , शौचालय , गैस , जनधन , किसान को पैसा , मुफ्त राशन आदि ज़मीनी कार्यक्रमों की ताकत विपक्ष अभी तक समझ नहीं पाया है। कोरोना के बावजूद जी एस टी का रिकार्ड कलेक्शन , निर्यात का बढ़ता रिकार्ड देख कर भी विपक्ष फर्जी जी डी पी का गाना गाता रहता है। उलटी बात करने से जनता बहकती नहीं। ज़मीनी हक़ीक़त देखती है। नरेंद्र मोदी ने आज ओलंपिक की चर्चा करते हुए विपक्ष पर हमलावर होते हुए कहा भी है कि देश पद नहीं पदक से आगे बढ़ रहा है। 

देश ही नहीं , देश का खेल और देश की राजनीति भी अब आमूल-चूल बदल चुकी है। जनता ने अपनी प्राथमिकताएं भी बदल ली हैं। अपनी ज़रूरतें जनता जानती है और अपनी महत्वाकांक्षाएं भी। कोरोना की इतनी बड़ी महामारी में भूख से मरने का कोई आंकड़ा नहीं आ पाना भी बड़ी बात ही। रही बात स्वास्थ्य व्यवस्था की तो वह समूची दुनिया में लाचार दिखी है। भारत में भी ध्वस्त थी। इस से कोई कैसे इंकार कर सकता है। हां , विपक्ष ने ज़रूर इस कोरोना के बहाने भी देश को गृह युद्ध में झोंकने की पूरी कोशिश की। जनता और मज़दूरों ने इस बात को बहुत करीब से देखा और महसूस किया है। 

किसान आंदोलन के बहाने भी देश को गृह युद्ध में झोंकने और दिल्ली को जालियांवाला बाग़ बनाने के बेतरह कोशिश की विपक्ष ने। क्या जनता अंधी है ? या सिर्फ़ गोदी मीडिया कह कर घटनाओं पर पानी डाला जा सकता है। विपक्ष भारी हताशा में है। इस हताशा में अपने पैर पर निरंतर कुल्हाड़ी मारने में व्यस्त है। पैगसस भी एक ऐसी ही कुल्हाड़ी है। जैसे कभी राफेल था।  अयोध्या में राम मंदिर की सत्यता को स्वीकार न करने और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बावजूद राम मंदिर का विरोध करने से मुट्ठी भर मुस्लिम वोट तो मिल सकते हैं विपक्ष को पर देश को क्या मिलता है , यह बात विपक्ष नहीं समझना चाहता है। 

चंद मुस्लिम वोटों के लिए भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला , इंशा अल्ला ! या तुम कितने अफजल मारोगे , हर घर से अफजल निकलेगा की मानसिकता में डूबा विपक्ष पुलवामा में आतंकी कार्रवाई को भी मोदी की साज़िश मानता है। मोदी विरोध के उफान में चीन को अपना बाप मानता है। सर्जिकल स्ट्राइक के सुबूत मांगता है। बालकोट एयर स्ट्राइक को फर्जी बताता है। अभिनंदन की वापसी को भी तिकड़म मानता है। सेना पर विपक्ष को यकीन नहीं। चीन के साथ खड़े हो कर सरकार पर हमलावर दीखता है विपक्ष। चुनाव आयोग , सुप्रीम कोर्ट हर कोई उन्हें भाजपाई दीखता है। 

लेकिन जनता क्यों भाजपाई हो गई है , विपक्ष को , राहुल गांधी को यह तथ्य नहीं दीखता। लोग राहुल गांधी को भाजपा का स्टार प्रचारक ऐसे ही तो नहीं कहते। बात-बेबात विपक्ष कीचड़ फैलाता रहता है और कीचड़ में कमल ऐसे ही खिलता रहता है। विपक्ष को , मोदी वार्ड के मरीजों , घृणा और नफ़रत की वैचारिकी में डूबे लेखकों , कवियों को अपनी घृणा और नफ़रत से कभी अवकाश मिले तो अपने को अपने इस कीचड़ के दर्पण में देखना ज़रूर चाहिए। नहीं , ऐसे गगन बिहारी टोटकों से तो नरेंद्र मोदी को कभी न हटा पाएंगे। उलटे और मज़बूत करते जाएंगे। मज़बूत बनाते ही जा रहे हैं। 

Saturday, 24 July 2021

तो लखनऊ में लगी तमाम मूर्तियों में कोई मूर्ति तिलक , तराजू या तलवार का भी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं करती

 दयानंद पांडेय 

कांशीराम कभी अयोध्या में राम मंदिर की जगह शौचालय बनवाना चाहते थे। जो लोग कभी अयोध्या में राम मंदिर की जगह शौचालय , अस्पताल और विद्यालय बनाने की बात करते थे , वही लोग अब अयोध्या में मंदिर बनाने की बात बहुत ज़ोर-शोर से अयोध्या में जा कर करने लगे हैं। क्या तो वह साल-दो साल में राम मंदिर बना कर आप की हथेली पर रख देंगे। गोया मंदिर नहीं , मंदिर का नक्शा बनाना चाहते हों। एक कायदे का घर तो साल भर में बन नहीं पाता पर यह लोग भव्य राम मंदिर साल भर में बनाने की शेखी बघार रहे हैं। तिलक , तराजू और तलवार / इन को मारो जूते चार का नारा लगाने वाले यही लोग अब ब्राह्मणों को सिर पर बिठाने की बात फिर से करने लगे हैं। मनुवाद के नाम पर ब्राह्मणों के खिलाफ विष-वमन करने वाली फैक्ट्री पर जैसे ताला लग गया है। हाथी नहीं गणेश है , ब्रह्मा , विष्णु , महेश हैं का नारा धो-पोछ कर फिर बाहर निकाला गया है। पर इस पाखंडी , बिल्डर और मायावती की जूतियां साफ़ करने वाले सतीश मिश्रा से कोई पूछे तो बहुजन के नाम पर लखनऊ में लगी तमाम मूर्तियों में कोई मूर्ति तिलक , तराजू या तलवार का भी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं करती। किसी ओ बी सी की भी कोई मूर्ति क्यों नहीं है। ब्रह्मा , विष्णु , महेश या गणेश भी क्यों नहीं दीखते इन मूर्तियों में कहीं। सिर्फ दलितों और बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की ही बहार क्यों है। एक बार मायावती के मुख्य मंत्री रहते मैं ने एक इंटरव्यू में उन से यही सवाल पूछ लिया था। मेरी नौकरी जाते-जाते बमुश्किल बची थी। वह इंटरव्यू भी नहीं छपा। 

जीते जी अपनी मूर्तियां लगवा लेने वाली मायावती गांधी को शैतान की औलाद कहती हैं । यह कह कर अराजकता फैलाती हैं । नफ़रत के तीर चलाती हैं । इन के आका कांशीराम की राजनीतिक पहचान ही इसी अराजकता के चलते हुई जब वह गांधी को शैतान की औलाद कहते हुए दिल्ली में गांधी समाधि पर जूते पहन कर भीड़ ले कर वहां पहुंचे । वहां तोड़-फोड़ की। गांधी समाधि की पवित्रता को नष्ट किया । उस गांधी समाधि पर जहां दुनिया भर के लोग आ कर शीश नवाते हैं । श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं ।

लोग यह क्यों भूल जाते हैं ? यह कौन मौकापरस्त लोग हैं ? ऐसे हिप्पोक्रेटों की शिनाख्त कर इन की सख्त आलोचना क्या नहीं की जानी चाहिए ?

ठीक है आप गांधी से असहमत हो सकते हैं , पूरी तरह रहिए , कोई हर्ज़ नहीं है । लेकिन किसी पूजनीय महापुरुष को आप शैतान की औलाद क़रार दें और उस की समाधि पर जूते पहन कर भारी भीड़ ले कर जाएं और वहां तोड़-फोड़ करें , पवित्र समाधि को अपमानित करें , अपवित्र करें । और आप चाहते हैं कि लोग आप के इस कुकृत्य को भूल भी जाएं ? इस लिए कि आप दलित हैं ? मुश्किल यह है कि हमारे तमाम हिप्पोक्रेट मित्र इस अराजक घटनाक्रम को याद नहीं करना चाहते । यह सब याद दिलाते ही उन्हें बुखार हो जाता है । वह दवा खा कर चादर ओढ़ कर सो जाते हैं । यह वही राजनीतिक संस्कृति है जो तिलक तराजू और तलवार , इन को मारो जूते चार बकती हुई कालांतर में किसी मूर्ख के अपशब्द के प्रतिवाद में उस की बेटी बहन को पेश करने की खुले आम नारेबाजी में तब्दील हो जाती है । क्यों कि लोग दलित एक्ट और दलित फोबिया के बूटों तले दबे हुए हैं । और हिप्पोक्रेट्स चादर ओढ़ कर , कान में तेल डाल कर सो जाना अपने लिए सुविधाजनक पाते हैं । ज़रुरत इसी मानसिकता और हिप्पोक्रेटों को कंडम करने की है । अभी से । क्यों कि गांधी को शैतान की औलाद कहना भी अपराध ही है । आप दलित हैं तो आप को किसी को कुछ भी कहने का अधिकार किस संविधान ने दे दिया ? गांधी को शैतान की औलाद कहना , किसी की बेटी बहन को पेश करने का नारा लगाना अपराध है । गोडसे हत्यारा है गांधी का लेकिन मायावती भी गांधी की चरित्र हत्या की दोषी हैं । राजनीति में गाली गलौज की दोषी हैं । मायावती और उन की बसपा को यह तथ्य भी ज़रुर जान लेना चाहिए कि भारत सिर्फ़ दलितों का देश नहीं है । दलित होने के नाम पर वह देश को ब्लैकमेल करना बंद करें । बहुत हो गया ।

Saturday, 17 July 2021

आप के रोल माडल आखिर बिन लादेन , बगदादी , बुरहान वानी या ज़ाकिर नाईक जैसे हरामखोर आतंकवादी ही क्यों हो गए हैं ?

दयानंद पांडेय 


हमारे कुछ मुस्लिम दोस्त हैं जो कुतर्क के ढेर सारे अमरुद बेहिसाब खाते जा रहे हैं । उन को गुमान बहुत है कि मुसलमानों ने इस देश को बहुत कुछ दिया है । और इस अंदाज़ में कह रहे हैं गोया वह अभी भी अरब में रह रहे हों , भारत में नहीं । जैसे मुगलों ने भारत को भाई चारा नहीं , कोई बख्शीश दी हो । आदि-आदि । गोया मुगल न आए होते तो भारत यतीम ही बना रहता । मुगलों ने भारत आ कर भारत को सोने की चिड़िया बना दिया वगैरह कुतर्क और तथ्यों से विपरीत बातें उन की जुबान में भरी पड़ी हैं । 

उन से कहना चाहता हूं कि पहले तो अपने को भारतीय समझ लीजिए । फिर इतिहास को ज़रा पलट लीजिए । पलटेंगे तो जानेंगे कि भारत सोने की चिड़िया मुगलों के आने के पहले था । ब्रिटिशर्स यहां व्यापारी बन कर आए थे लेकिन मुगल तो सीधे-सीध आक्रमणकारी बन कर आए थे । सोने की चिड़िया को लूट लिया । जाने कितने मंदिर लूटे और तोड़े बारंबार । समृद्धि , सुख-चैन लूट लिया । उन का आक्रमणकारी और लुटेरा रुप अभी भी उन से विदा नहीं हुआ है। मुसलमान अभी भी अपने को यहां का नागरिक नहीं समझते । भले किसी गैराज में कार धोते हों , मैकेनिक हों , किसी ट्रक पर खलासी हों , कहीं चाय बेचते हों । कहीं अफसर हों , इंजीनियर हों , अध्यापक हों या कुछ और सही पर समझते हैं अपने को रुलर ही । राहत इंदौरी जैसे शायर इसी गुमान में लिखते थे  , कब्रों की जमीनें दे कर हमें मत बहलायिये / राजधानी दी थी राजधानी चाहिए । ' हां रहन सहन भी , खान पान में भी योगदान ज़रूर है । रोटियां कई तरह की ले आए। मसाला आदि लाए , साथ में गाय का मांस खाने की ज़िद भी लाए । औरतों को खेती समझने की समझ , तीन तलाक का कुतर्क आदि ले आए। मज़हबी झगड़ा ले आए । जबरिया धर्म परिवर्तन का फसाद ले आए। भाई को मार कर , पिता को कैद कर राज करने की तरकीब ले आए।

अभी भी पूरी दुनिया को जहन्नुम के एटम बम पर बिठा दिया है , मनुष्यता को सलीब पर टांग दिया है । फिर भी कुतर्क भरा गुमान है कि भारत को बहुत कुछ दिया है तो आप की इस खुशफहमी का मैं तो क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता । यह गुमान आप को मुबारक । लेकिन आप यह तय ज़रूर कर लीजिए कि आप की यह चिढ़ सिर्फ़ संघियों , भाजपाईयों और गांधी के हत्यारों से ही है या समूची मनुष्यता से है ? आप के रोल माडल आखिर बिन लादेन , बगदादी , बुरहान वानी या ज़ाकिर नाईक जैसे हरामखोर आतंकवादी ही क्यों हो गए हैं ? उन के लिए आप छाती क्यों पीट रहे हैं भला ? सीमांत गांधी , ज़ाकिर हुसेन , ए पी जे अबुल कलाम या वीर हामिद जैसे नायक लोग कहां बिला गए आप की जिंदगी से । क्यों बिला गए ? और कि आप के भीतर से कोई बड़ा राजनीतिक क्यों नहीं निकल पाया ? आख़िर कभी कांग्रेस , कभी मुलायम , कभी लालू आदि के अर्दली और मिरासी बन कर ही मुस्लिम राजनीति संभव क्यों बन पा रही है ? अभी भी चेत जाईए , इंसान बन लीजिए पहले फिर मुसलमान भी बन लीजिएगा । शांति कायम रहेगी तभी हम आप इस तरह विमर्श कर सकेंगे । सहमति या असहमति जता सकेंगे एक दूसरे से । बम फोड़ कर , पत्थर फोड़ कर , किसी का गला रेत कर नहीं , किसी मासूम पर ट्रक चढ़ा कर नहीं ।

अगर मैं यह कहता हूं कि देश के मुसलमान सिर्फ़ मुसलमान नहीं देश के समझदार नागरिक बन कर रहना सीखें तो इस में नासमझी कहां से आ गई भला ? ग़लत क्या है भाई ? आख़िर देश में और भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं । सिख हैं , ईसाई हैं , बौद्ध हैं , जैन हैं , पारसी हैं । आख़िर इन लोगों को कोई मुश्किल क्यों नहीं होती ? इस लिए कि यह लोग देश में समझदार नागरिक की तरह मुख्य धारा में रहते हैं। न इन को किसी से तकलीफ होती है , न इन से किसी को तकलीफ होती है । हमारे मुस्लिम दोस्तों को भी मुख्य धारा में रहना , जीना सीख लेना चाहिए ।

हमारे कुछ मित्रों के पास जब तथ्य नहीं होते , तर्क नहीं होते , विवेक जवाब दे जाता है तब वह अमरीका , ट्रंप , मोदी , भाजपा , भक्त आदि का पहाड़ा पढ़ते हुए इस की ढाल ले कर कुतर्क की चाशनी में डूब कर सांप और सीढ़ी का खेल खेलने लगते हैं । बात आम की हो रही होती है , वह बबूल ले कर खड़े हो जाते हैं । गोया पूरी दुनिया पर अमरीका और मोदी का ही राज हो । ईराक , फ़्रांस , टर्की , सऊदी अरब , बांग्लादेश आदि हर कहीं यही ज़िम्मेदार हों। अजीब लाइलाज बीमारी है यह । कैंसर और एड्स से भी ज़्यादा खतरनाक । इन से कोई विमर्श करना या इन की विषय से भटकी बात पर इन्हें टोकना दीवार में सिर मारना होता है । इन का अजब माईंड सेट है । इन से सिर्फ़ पत्थर ही टकरा सकते हैं । या ऐसे कहें कि इन लोगों से सिर्फ़ अराजक लोग ही बात कर सकते हैं । क्यों कि पंचों की राय चाहे जो हो इन का खूंटा तो वहीं रहेगा । आप कुछ भी कहिए यह अपनी ढपली बजाते रहेंगे । या यूं कहिए कि भैंस की तरह पगुराते रहेंगे । 

एक कविता पर गौर कीजिए। लेकिन इस दर्द की दवा तुष्टिकरण के हरकारों और डाक्टरों के पास नहीं है। क्यों नहीं है , इस पर इन कठमुल्लों की जुबान सिली हुई है। गोया दानिश और तालिबान का हत्यारा रिश्ता इन्हें सर्वदा खामोश रखेगा। 


हम मुसलमान औरतें


अस्पतालों में मिल जाएँगी 

कचहरियों में मिल जाएँगी 

चकलाघरों में मिल जाएँगी 

रस्तों गलियों में ढेर की ढेर मिल जाएँगी हम


हाँ मगर मस्जिद में नहीं मिलेंगी 

हाँ मगर स्कूलों में नहीं पाओगे आप हमें 

मदरसों में पोंछा मारती मिल जाएँगी 

हाँ मगर बैंक हमारे लिए 

जन्नत की हक़ीक़त है अभी


ईद से पहले इतर तुलवाती मिल जाएँगी बज़ार में 

ईद के बाद ज़हर मंगवाती मिल जाएँगी 

हम हर जगह टकरा जाएँगी तुमसे 

काले बुरक़े और ऊँची एड़ी की चप्पलों में


मगर क्या आपने कभी की हमसे बात 

कि ये जंचगी के बाद क़दम लंगड़े क्यों पड़ने लगे 

कि निकाह के बाद सूरज के विटामिन की कमी 

क्योंकर हुई


आपको हम सब जगह मिल जाएँगी 

मगर क़ब्रिस्तान में नहीं मिलेंगी ज़िंदा

जैसे घरों में नहीं मिलेंगी ज़िंदा 

जैसे अपने अब्बा, भाई, आशिक़ और शौहर के साथ नहीं 

मिलेंगी ज़िंदा


आपने कभी पूछने की कोशिश की क्या 

मौत टीबी से भी होती है मौत बच्चेदानी की गठान से भी 

होती है और मौत कैल्सीयम की कमी से भी होती है


दंगाई ही केवल नहीं मारते साहब 

भगवे ही केवल नहीं मारते हजूर 

गाय का मीट खाने से तो मरते ही लोग आजकल 

मगर भूखे पेट बहुत दिन काटने पर भी 

होती है मौत


आपको कितनी जगह कितनी सूरत में मिली हम 

क्या आपने हमसे कभी कोई बात की

आप तो मशगूल थे इतिहास पर राजनीति पर 

बहस करने में 

आप बता दूँ मौत इतिहास में ही नहीं होती थी 

अब भी होती है और बहुत होती है और मुसलमान औरतों की


सबसे ज़्यादा होती है मौत


अभी एक फोटोग्राफर दानिश सिद्दीकी की अफगानिस्तान में हत्या हुई है। हत्या किसी भी की हो , दुर्भाग्यपूर्ण है। पर अपनी फोटुओं के मार्फत जहर का एजेंडा परोसने वाला , भारत में फासिस्ट -फासिस्ट का सर्वदा पहाड़ा पढ़ने वाले जहरीले दानिश सिद्दीकी की हत्या पर तो इन्हें गिला है पर तालिबानों ने दानिश को मारा , यह कहने में इन की सेक्यूलर जुबान को लकवा मार जाता है। क्यों बोलें , कैसे बोलें भला ! असली फासिस्टों को फासिस्ट कहने में इन्हें तकलीफ बहुत होती है। फासिस्ट तो छोड़िए , दानिश को तालिबानों ने उंकड़ू बैठा कर मारा यह बताने में भी जुबान सिल जाती है। तालिबानों ने हत्या की दानिश की यह तथ्य भी इन की जुबान और कलम से फिसल जाता है। गोया अश्वत्थामा मरो , नरो वा कुंजरों का भ्रम रचना चाहते हैं। गनीमत है कि यह नहीं कह पा रहे , इतनी बेशर्मी नहीं कर पा रहे कि तालिबानियों ने नहीं , फासिस्ट मोदी या योगी ने मरवा दिया फोटोग्राफर दानिश सिद्दीकी को। क्या पता कुछ दिनों बाद ऐसा भी कहने लग जाएं। अभी तो श्रद्धांजलि ही मांग रहे हैं मोदी से। लांछन लगाते हुए पूछ रहे हैं कि मोदी क्यों नहीं श्रद्धांजलि दे रहे !