दयानंद
पांडेय
जो ज़िंदगी बन के जीवन में
उपस्थित रहा हो , आहिस्ता-आहिस्ता रास्ता बना
कर ज़िंदगी से पूरी तरह बाहर हो जाए तो ? लगता है जैसे कोई दर्पण हो , जिस में आप ख़ुद को देखते रहे हों , वह दर्पण ही झन्न से टूट कर चकनाचूर हो गया हो। अब देखूं तो कैसे देखूं भला
ख़ुद को। समझ नहीं आता। तुम थी ज़िंदगी में तो जैसे लगता था कि ऐसी ख़ूबसूरत ज़िंदगी
कैसे मिल गई मुझे। उस समय के दर्पण में तुम थी , मैं था। किसी हवा की तरह ज़िंदगी में दाख़िल हो कर किसी बेची गई ज़मीन की
मानिंद इस तरह दाख़िल खारिज हो जाओगी , कहां जानता था भला। अब जब तुम ज़िंदगी से दाख़िल खारिज हो कर निकल गई हो तो
बारंबार ख़ुद से पूछता रहता हूं कि तुम ज़िंदगी थी कि कोई सपना। टूट जाने वाला सपना।
किरिच-किरिच टूट कर बिखरती
रहती हो। रिस-रिस कर कर चूती रहती हो यादों में। गोया कोई खपरैल की छत जगह-जगह से
चू रही हो। किसी भारी बारिश में। इतना कि घर में कहीं खड़े होने की जगह भी नहीं
मिले। भीगना लाजमी हो जाता है इस चूते हुए पानी में। याद है , तुम्हें बारिश कितनी पसंद थी। बारिश में मेरे
साथ चिपके रहना कितना पसंद था। बारिश होती थी और बारिश में भीगता हुआ आंगन में वह
दशहरी आम का पेड़ हम देखते रहते और भीगते रहते प्रेम की बारिश में। तुम जानती हो कि
मुझे दशहरी आम बहुत पसंद है। दशहरी आम का चूसना और उस की मिठास में डूब कर ही
स्त्री के प्रेम की मिठास में डूबा जा सकता है। इस स्वाद के क्या कहने। इतना कि
तुम्हारे वक्ष को भी मैं दशहरी कहने लगा था। दशहरी कहते ही तुम पुलक जाती थी और
मुझे भरपूर प्रेम करने लगती थी।
तुम्हारी दशहरी को चूसना , उस की मिठास का भास, एहसास और दशहरी की नशीली खुशबू में तर वह मादक
साथ तुम्हारा आज भी सोचता हूं तो भर जाता हूं , तुम्हारे प्यार से। ऐसे जैसे कोई स्त्री पनघट से गगरी भर कर चल रही हो , वैसे ही हुमक-हुमक कर , ठुमक-ठुमक कर चलने लगता हूं। लगता है जैसे
मदमस्त हो कर नदी के पुल पर , पूर्णमासी
की रात पूरा चांद देखती हुई मेरा हाथ पकड़े तुम अभी भी खड़ी हो। और मैं तुम्हें देख
रहा हूं। कभी नदी , कभी चांद , कभी नदी में चांद को , कभी तुम को। आते-जाते लोग , आस-पास खड़े लोग हमें देख रहे हों। जब यह मंज़र याद
आता है तो यही सोचता हुआ नदी के पुल पर जा कर खड़ा हो जाता हूं। अकेले। पूर्णमासी
हो , न हो। तुम्हारी याद हर रात
पूर्णमासी की रात हो जाती है। तुम्हारा दर्पण , तुम्हारे प्यार का दर्पण टूट गया है पर नदी के जल का दर्पण ? नदी से पूछता हूं। नदी कोई उत्तर नहीं देती।
तुम भी अब उत्तर कहां देती
हो। यू डोंट का ताला लगा दिया है , सो अलग। और मैं तुम्हें दिए वायदे के ताले में बंद हूं। कि यस मी डोंट। सो
नो फ़ोन , नो मेसेज। नो मुलाक़ात। मैं
बहुत डिफरेंट क़िस्म का प्रेमी हूं। दिया हुआ वादा कभी तोड़ता नहीं। घर की शांति को
तोड़ता नहीं। सन्नाटा बुन लेता हूं। कोई आवाज़ नहीं देता। लेकिन पल-प्रतिपल आती
तुम्हारी याद का क्या करुं भला। शुक्र है कि इस पर तो यू डोंट का ताला नहीं लगाया
है तुम ने। तुम्हारी याद क्या आती है , विरह की चिता पर किसी सती की तरह बैठ जाता हूं। धू-धू कर जलने लगता हूं।
विरह की इस चिता से सिर्फ़ तुम ही मुझे निकाल सकती हो। लेकिन नहीं निकालोगी , यह बात भी अच्छी तरह जान गया हूं। पर तुम्हारी
याद ?
आह , यह तुम्हारी याद और विरह की यह चिता।
याद है तुम्हें जब भी कभी तुम
मिलती थी तो बरखा बन कर। और मैं भी बारिश बन कर बरसने लगता था तुम्हारे भीतर।
तुम्हारे भीतर जैसे कोई संगीत बजने लगता था। मद्धम-मद्धम। और मैं किसी जलतरंग की
तरह तुम्हारी देह में उतरता था। धीरे-धीरे। तुम्हारे देह सरोवर में। तुम्हारे देह
सरोवर में मन की देहरी पुलक-पुलक जाती थी। प्रेम की इस बरखा में भीज कर तुम जैसे
वसुंधरा हो जाती थी। भरी-पुरी वसुंधरा। प्रकृति हमें दुलराने लगती थी। सावन की
बरखा की तरह। प्रेम की इस बरखा में नहाई हुई धुत्त तुम्हारी निर्वस्त्र देह जैसे
कोई अलसाई हुई निढाल सांझ बन जाती थी। ऐसे जैसे पूर्ण चंद्रमा , नदी में उतर आता था। डुबकियां मारता हुआ। कभी
डूबता , कभी उतराता। लहरों के बीच
खो-खो जाता है जैसे चांद। तुम कहती थी कभी-कभी कि लहरों पर कभी भरोसा मत करना। मैं
पूछता था क्यों ? तो तुम कहती थी कि लहरें
यहां-वहां छोड़ देती हैं। लहरों का स्वभाव ही है छोड़ देना। लहरों को बस यही आता है।
तो क्या तुम भी कोई लहर ही थी। जो मुझे छोड़ कर चली गई। अनायास। नदियां अपने
किनारों से मिलती रहती हैं। कभी तो नदी बन जाओ और अपने इस किनारे से मिल जाओ। भले
लहर की तरह फिर छोड़ कर चली जाना।
तुम्हारी यादों का एक पूरा
लश्कर है।
याद है तुम जब भी मिलती थी
बाहों में मिलती थी। कभी अवकाश
ही नहीं देती थी तुम कि कभी तो अपने आप से भी मिलूं। महकती मीठी यादों में अब भी मिलती हो। बाहों
में। काश कि महकती मीठी यादों
में समा जाओ हरसिंगार सा
अनगिन रंग और उमंग लिए। आ जाओ। तुम कहां हो। हरी घास पर बिछ गए गुलमोहर के
नरम फूलों पर बैठ कर बतियाना याद आता है। तुम्हारे गुलमोहर से दहकते होठ याद आते हैं। गुलमोहर के शहद में फिर से डूब जाने को मन करता है। तुम्हारे विशाल और सुडौल उरोज , मृदंग जैसे तुम्हारे नितंब , गरदन के पीछे से झांकती तुम्हारी पीठ याद आती है। यू डोंट के तुम्हें दिए गए वादे में बंध
तो गया हूं लेकिन लेकिन लगता
है कुछ छूट गया है वहां तुम्हारे पास। ऐसे कि जैसे ख़ुद ही छूट गया हूं। वहीं तुम्हारे पास ही। जाने
क्या-क्या छोड़ आया हूं।वह धूप, वह बादल , वह बारिश। वह आंखें, वह सपने , वह साज़िश भी। तुम्हें पाने के लिए जिन्हें हज़ार बार तोड़ता रहा। जोड़ता रहा अपने नेह से तुम्हारे भीतर बसे मेह
से। यह नेह , वह मेह और उस की शीतल फुहार। तुम्हारे वक्ष पर कपोल रख कर वह मदमाती मनुहार। यह सब भी तो तुम्हारे पास ही छोड़ आया हूं। तुम देखना मेरी अंगुलियां।वहीं कहीं तो नहीं रह
गईं। तुम्हें
हेरती , तुम्हें सहेजती। तुम्हें थपकी देती। मेरी हथेलियां भी शायद वहीं रह गई हैं। दशहरी को
टटोलती। वह मेरे अधर जिन पर तुम ख़ुद बांसुरी बनती नहीं अघा रही थी। और कहती थी तुम कि ऐसे ही
मद्धम-मद्धम बजना चाहती हूं तुम्हारे भीतर। कि जैसे मालकोश। क्यों कि इस
में ऋषभ और पंचम स्वर नहीं लगते। इसमें गंधार
धैवत और निषाद कोमल लगते हैं। रात्रि के
तीसरे प्रहर राग भैरवी थाट से निकले। इस मालकोश में तुम हरदम निबद्ध होना चाहती थी। मद्धम-मद्धम। हो सके तो इन सब को सहेज , संभाल कर रखना।किसी सुई-धागे की तरह। क्यों कि बहुत कुछ छूट गया है तुम्हारे पास। बेहिसाब इस मालकोश को भी उस के भैरवी
थाट में ही शेष रखना। क्यों कि मैं फिर-फिर आऊंगा। किसी रात्रि के तीसरे प्रहर। तुम्हारे भीतर मद्धम-मद्धम उतरने। उतर कर तुम्हें निबद्ध करने।
देखो फिर से। कुछ छूट गया है। कि कुछ टूट गया है। वहीं तुम्हारे पास ही। कि
टूट गया हूं मैं ही। तुम्हारे पास छूट कर। देखो , मुझे बचा कर रखना। ज़रा देखना तो। कि और क्या-क्या छूटा है वहां। क्यों कि
तुम्हें देखने और तुम से बिछड़ने के द्वंद्व में। कुछ ला नहीं पाया अपने साथ। लाता
भी भला कैसे कुछ। ख़ुद को तोड़ कर छोड़ आया हूं तुम्हारे पास। तुम्हें याद है जब
सर्दियों की धूप में मिलती थी तुम तो तुम्हारे नर्म और गर्म हाथ मेरे हाथ में आ कर
कैसे तो पिघलने लगते थे। हमारी सारी सीमाएं टूट जाती थीं। शुरुआती दिनों में हम जब
किसी रेस्टोरेंट में चोरी-चोरी मिलते थे तो मैं बहुत परेशान हो जाता था। अच्छा जब
एक बार मेट्रो में एकांत पा कर तुम्हें अचानक चूम लिया था , तुम्हें याद है कि तुम सिहर उठी थी। भीड़ के सागर
में चलते-चलते जब कभी तुम्हें छूता था तो तुम चिहुंक जाती थी। चिहुंक कर नितांत
अपरिचित बन जाती थी। बहुत बाद में तुम ने बताया था कि कई बार तुम्हारा भी मन हुआ
मुझे चूम लेने का। लेकिन मारे लाज के स्त्री सुलभ संकोच के कारण सारी इच्छाओं को
दबा लेती थी। और हां उस कोहरे भरी दोपहर में हम जब नदी किनारे हाथ में हाथ लिए
बैठे थे तभी जल में एक मछली निकल कर छपाक से नदी में फिर कूद गई थी और तुम ज़ोर से
चिल्लाई थी , अरे ! और मेरी गोद में गिर गई
थी। ऐसे जैसे कोई दीवार गिर जाए।
बड़ी देर तक मैं तुम्हारी पीठ को थपकी देता रहा।
हाथ जब अनायास पीठ से होते हुए , पहले नितंब
पर थपकी देने लगे और सहसा , अनायास वक्ष की तरफ बढ़ गए तो तुम चिहुंक कर उठ बैठी थी।
और बहुत सख्ती से बोली थी , नो ! थोड़ी देर बाद अपनी शॉल
मुझ से शेयर करती हुई तुम ने धीरे से पूछा था , कोहरे में ठंड नहीं होती क्या। मैं ने धीरे से ही बताया भी था कि नहीं होती। तो तुम बुदबुदाई थी कि हां , जानती हूं कि जब मैं साथ होती हूं तो तुम्हें
ठंड नहीं लगती। फिर पलट कर पूछा था , लेकिन भूख ? क्या भूख भी
नहीं लगती ? जवाब में मैं ने कहा था कि इस
मस्त कोहरे में तुम्हें ठंड और भूख की याद भी कैसे आ गई भला। इस के बाद तुम्हारे मादक स्पर्श
ने मुझे रोमांचित कर दिया था। हम वापस कार में आ गए थे। और बेतहाशा चुंबन की बौछार
कर दी थी मैं ने। तुम ने भी संयम तोड़ दिया था। और हम कार में ही प्यार की
पराकाष्ठा तक पहुंच गए। बाद में अकसर हम लोग कार का इस्तेमाल करने लगे। जिसे बाद
में तुम अकसर कार सेवा कहने लगी। खुल कर कहने लगी , आज कार सेवा के लिए समय निकालते हैं। याद है तुम को मुझ पर घुड़सवारी भी
बहुत पसंद थी तुम को। अकसर तुम फ़ोन करती और कहती कि आज घुड़सवारी का बहुत मन हो रहा
है। आज समय निकाल कर आइए। पहला तो नहीं पर समापन सत्र तुम्हारी घुड़सवारी से ही
होता। संभोग का जैसे स्वाद ही बदल दिया था तुम ने। एक देर शाम जब कोहरा घना हो गया
था और चांदनी नर्म। कोहरा ऐसे
घेर रहा था मुझे जैसे मेरी बांहें तुम्हें घेर लेती हैं और तुम रीझ गई थी। हमारे
भीतर प्रेम की एक नदी बहने लगी और एक दूसरे से जोड़ गई। लगा जैसे तुम को ही नहीं , मैं ख़ुद को भी पा गया हूं। तुम्हें याद है वह ओस
में भीगी हुई सुबह। जब मैं तुम्हारे प्यार की नर्म ओस में भीग गया था। वह ओस आज भी
टटकी है। मेरे मन में। याद है तुम्हें तुम्हारी आंखों और होठों का कोलाज जब तुम्हारे कपोलों पर रच रहा था तभी ओस
की एक बूंद गिरी और मैं नहा गया तुम्हारे प्यार में। यह ओस की बूंद थी कि तुम्हारा
नेह था जो ओस बन कर टपकी थी।
मालूम है तुम्हें जब तुम मिलती थी तो मन जैसे
अमृत से भर जाता था लबालब। अमृत-अमृत
हो जाता था मेरा मन और तुम्हारी देह नदी बन जाती थी। नदी में प्रेम की मछली कुलांचे मारती रहती। तुम मिलती थी तो मन पृथ्वी बन जाता था। इच्छाओं
के पल-छिन में अनगिन फूल खिल उठते थे। एक आग सी सुलग जाती थी हमारी प्रेम की झोपड़ी
में। तुम मिलती थी तो मन नील गगन बन जाता था। प्यार पक्षी। सांझ जल्दी
हो जाती थी। उड़ती हुई
चिड़िया ठहर जाती थी। झुंड की झुंड चिड़िया किसी तार पर बैठी दिखतीं तो तुम चल देती थी अचानक। प्रेम की इस बेला में घड़ी
की सुई जैसे ठहर जाती थी। नदी जैसे
विकल हो जाती थी। तापमान शून्य हो जाता था। तापमान का यह शून्य तोड़ देता था मेरे मन को। प्रेम की बहती नदी बर्फ़ बन
जाती थी। बिछोह बन
जाता था ग्लेशियर का टुकड़ा। ठिठुर कर सुन्न हो जाता था हमारे प्रेम का गीत। तुम फिर कब मिलोगी। पूछता था आहिस्ता से। तुम
कुछ बोलती नहीं थी। बर्फ़ के पिघलने की प्रतीक्षा में प्रेम जैसे अवकाश ले लेता।
फूल की तरह फिर खिलने की प्रतीक्षा में। प्रतीक्षारत हो जाता हमारा प्रेम। प्रेम जो अमृत हो जाना चाहता था।
यही वह दिन थे जब है अपना दिल तो आवारा , न जाने किस पे आएगा। हर ग़म फिसल जाए , जब तुम साथ हो। मौसम ये रूठने मनाने का है। अपने
दामन की ख़ुशबू बना ले मुझे। अलग-अलग समय के यह तीनों फ़िल्मी गाने एक साथ गाने लगा
था। सुनने लगा था। यह कौन सा
मनोविज्ञान था भला। न जाने क्यों , न जाने क्यों। गाने बहुत
हैं हमारे जीवन में। लेकिन तुम से बड़ा गाना कभी नहीं मिला जीवन में। गाता रहता हूं
अब भी तुम्हें। देखता रहता हूं। तुम्हारी
यादों में जीता रहता हूं। ऐसे जैसे कोई एबस्ट्रेक्ट पेंटिंग देख रहा होऊं। अभी हवा में ढूंढ रहा था तुन्हें। तो
बादल मिल गया तो उसी से
तुम्हारा पता पूछ लिया। बादल बोला , पता तो मुझे मालूम है। पर बहुत जल्दी में हूं सो पता बता पाना मुश्किल है।
बरस सकते हो तो बरसो मेरे साथ। पता ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जाएगा। पहुंच जाओगे उस के पास
अनायास। जिस का पता पूछ रहे हो। सो अब बादल नहीं , मैं बरस रहा हूं। तुम तक पहुंचने के लिए।
बारिश का मौसम है इन दिनों शहर में। जब बारिश
में शहर झील बन जाता है तो इस विपदा में भी तुम्हारी आंखें याद आती हैं। आते जाते
देखता हूं तो तुम्हारी आंखें झील सी नज़र आती हैं। सॉरी , शहर की सारी झील तुम्हारी आंखें बन जाती हैं। तो क्या मैं बारिश बन जाता हूं। तो क्या मेरी
यादों की बारिश से तुम्हारी आंखें झील बन जाती हैं।बारिश जब ज़्यादा हो जाती है तो
शहर में बाढ़ आ जाती है। आबादी बाढ़ में डूब जाती है तो क्या मैं ज़्यादा बरसने लगा
हूं। तुम डूब गई हो। प्यार की बाढ़ में। शहरों का तो बिगड़ गया है। प्यार में भी पर्यावरण संतुलन बिगड़ता है क्या।
बिगड़ता है तो और बिगड़ जाने दो। जैसे गिरती है धरती पर ओस। तुम मेरी गोद में गिरो।
जैसे अंधेरे में दिखती है कोई रोशनी। तुम मेरी आंख में दिखो। किसी कौतुहल की तरह।
जैसे चांदनी में बहती है कोई नदी। चलती है उस में नांव। जलता है कोई दीप। नदी के
किसी द्वीप पर किसी नाविक के उम्मीद की तरह। ऐसे ही मेरे मन में बहो। चलो नाव की
तरह मंथर-मंथर। और जलो दीप बन कर। किसी उम्मीद की तरह। मैं नदी का वही नाविक हूं।
मुझे राह दो प्यार की। दुलार की वह सांझ दो। मनुहार का वह मान भी। जो देती है धरती
, सूर्य की पहली किरन को। मैं
मिट्टी हूं , मुझे गढ़ो। किसी मूर्तिकार की
तरह। अपने प्यार के पानी में सान कर। किसी कुम्हार की तरह मुझे रुंधो। तरसो नहीं , बरसो। मुझे प्यार के पानी से भरो। किसी तालाब की
तरह। सिंघाड़े की लतर की तरह फैल जाओ मेरे सर्वस्व पर। मैं ऐसा ही चाहता हूं। याद
है तुम्हें कि कभी यही तुम्हारी आंखें मेरा नगर हुआ करती थीं। इस नगर की नदी में
नहा कर गंगा नहा लेता था। तुम्हारी सी बी आई जैसी आंखों में कभी कुछ छुप नहीं पाता
था। मुझ को सब कुछ बता देती थीं। तुम्हारी
समुद्र सी गहरी आंखों की सिलवट देख कर पूर्णिमा की चांदनी मन में उतर जाती थी।
कहीं बहुत गहरे।
पर अब कहां ? तुम तो अब मिलती ही नहीं। बतियाती तक नहीं। भूल गई हो कि तुम्हारी आंख के
नगर का एक निवासी मैं भी हूं। निवासी हूं कि प्रवासी। कि तुम्हारी आंखों की नदी ने
संन्यास ले लिया है ?
और तुम्हारे अधर और तुम्हारी वह खिलखिलाती हंसी। एक बार तम्हारे होठ चूसते हुआ
कहा था तुम से कि यह अधर हैं
या बनारसी पान की गिलौरी। मन करता है गप्प से इन्हें खा जाऊं। किसी गोलगप्पे की
तरह। और कूंच -कूंच कर खाऊं पान की तरह। फिर तुम्हें बांसुरी की तरह बजाऊं।
तुम्हारे अधर की बांसुरी बजे। मैं तुम्हारे अधर के आकाश में खो जाऊं। यह सुन कर
किसी षोडशी की तरह तुम पुलक गई थी। पर करता भी क्या। तुम्हारे होठ किसी बांसुरी की
धुन से भी ज़्यादा मीठे हैं। किसी फूल से भी ज़्यादा मादक यह तुम्हारे रसीले होठ , ज़्यादा मोहक, ज़्यादा दिलकश और शहद से
भी ज़्यादा मिठास घोले तुम्हारे यह होठ मेरी सर्वदा कमज़ोरी रहे। इन होठों में जादू जगा कर जब तुम हंसती थी तो इन
होठों में कितने तो गुलाब , एक साथ खिल पड़ते थे। लगता था कि चंडीगढ़ का रोज गार्डेन हमारे भीतर
उतर आया है। इन की सुगंध में मैं डूब जाता था तब। इन होठों के दरमियां कितने कनेर , कितने कचनार खड़े हो जाते थे तब। याद है कुछ ? तब तो मन में बेला
उमग जाती थी। रातरानी खिल
जाती थी। हरसिंगार का फूल झरने लगता था। मन फागुन , वसंत हो जाता था। ऐसे गोया तुम्हारे नयन फागुन हों , अधर वसंत। इन अधरों के इंद्रधनुष में इतना मोहित रहता था कि सारा दुःख भूल जाता था।
हमारा संसार सुनहरा बन जाता था।
तुम्हें याद करता हूं तो तुम्हारे साथ बिताई
सर्दियां याद आ जाती हैं। थोड़ी लकड़ी , थोड़ी आग। बैठ कर तुम्हारे साथ ली गई कुछ सांस। तुम्हारी बांह में ली गई
उच्छवास याद आ जाती है। इस चांदनी रात में और क्या चाहिए। मन करता है कि तुम से कहूं कि यह मन नहीं , एक धरती है। तुम मेरे मन में पसर जाओ। जैसे
पसरती है धरती पर चांदनी। जैसे पसरता है कोहरा किसी झील पर। फैलती है ख़ुशबू किसी
मधुबन में आधी रात। यह रात नहीं है , रात का रंग है। तुम्हारे कंधे और गरदन के बीच रगड़ खाती मेरी नासिका में फैल
रही सुगंध है। यह तुम्हारा खिल-खिल मन और मौन है। तुम्हारी चूड़ियों की तरह
खिलखिलाता हुआ। समय का कैमरा दर्ज कर ले। इस चांदनी की ख़ुशबू को। इस चांदनी रात
में तुम्हें देखने को। इस चांदनी रात में तुम्हें चीन्ह कर। याद की गठरी में बांध
ले। चांदनी मचल ले ज़रा तुम्हारे रूप जाल में। तुम्हारे घने बाल में , रुको मेरी बांह में। इस सर्द रात में तुम्हारी
आग बहुत ज़रूरी है। जीने के लिए। तब तक रुको। पर कहां भला।
तुम्हें याद है कि कितना तो मन था कि कभी किसी
चांदनी रात को किसी छत पर तुम्हारे साथ रात गुजारुं। ठंडी सफ़ेद चादरों पे जागें
देर तक / तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए , वाला गाना
गुनगुनाते हुए। छत पर पड़े हुए , गाते हुए।
तुम से अकसर कहता रहता। पर पूर्णमासी का चांद तो तुम देखती-दिखाती रहती। कभी नदी
किनारे से। कभी किसी फ़्लैट की बालकनी से। लेकिन कभी कोई चांदनी रात मयस्सर नहीं
हुई किसी छत पर कि तुम्हारी गुदाज देह के साथ निरापद हो कर उस चांदनी में नहाता और
तुम्हें अपने प्यार में नहलाता। पर यह सपना अधूरा रह गया तो अधूरा ही रह गया।
सपनों में तो तुम आज भी मिलती हो। तुम मिलती हो
ऐसे जैसे नदी का जल और छू कर निकल जाती हो। मुझे भी क्यों नहीं साथ बहा ले चलती।
सपने में ही सही तुम्हारे मिलने के रूप भी अजब-गज़ब हैं। कभी किसी नदी में आई बाढ़
सी भरी-भरी हुई। कभी जमुना के पाट की तरह फैली और पसरी हुई। कभी सरयू की तरह घाघरा
को समेटे सीना ताने गीत गाती हुई। कभी तीस्ता की तरह चंचला तो कभी व्यास की तरह
बहकी हुई। कभी झेलम और पद्मा की तरह सरहदों में बंटती और जुड़ती हुई। नर्मदा और
साबरमती की तरह रूठती-मनाती हुई। कभी कुआनो की तरह कुम्हलाई हुई। कभी गोमती की तरह
बेबस। कभी वरुणा की तरह खोई और सोई हुई। कभी गंगा की तरह त्रिवेणी में समाई हुई।
हुगली की तरह मटियाई और घुटती हुई। रोज-रोज ज्वार-भाटा सहती हुई। कभी यह , कभी वह बन कर। छोटी-बड़ी सारी नदियों को अपना बना
कर। सारा दुःख और दर्द अपने में समोए हुई। सागर से मिलने जाती हुई। निरंतर बहती
रहती हो मेरे मन की धरती पर। इतनी हरहराती हो , इतना वेग में बहती हो कि मैं संभाल नहीं पाता , न तुम को , न खुद को। तुम्हारे भीतर उतरता हूं तो जल ही जल में घिरा पाता हूं। जल का
ऐसा घना जाल तुम्हारे भीतर की नदी में ही मिलता है। कभी कूदा
करता था नाव से बीच धार नदी में झम्म से। नदी का जल जैसे स्वप्न लोक में बांध लेता
था। भीतर जल में भी तब सब कुछ साफ दीखता था। बीच धार नदी के जल में धरती तक
पहुंचने का रोमांच ले कर कूदता था। पर कभी पहुंच नहीं पाया जल को चीरते हुए धरती
तक। आकुल जल ऊपर धकेल देता था कि मन अफना जाता था। कि अकेला हो जाता था उस विपुल
जल-राशि में। आज तक जान नहीं पाया। लेकिन पल भर में ही जल के जाल को चीरता हुआ
झटाक से बाहर सर आ जाता था। जल के स्वप्निल जाल से जैसे छूट जाता था। फिर नदी में
तैरता हुआ , धारा से लड़ता हुआ। इस या उस
किनारे आ जाता था। यह मेरा आए दिन का खेल था। कि हमारा और नदी का मेल था। लोग और
नाव का मल्लाह रोकते रह जाते, बरजते रह
जाते।लेकिन स्वप्निल जल जैसे बुला रहा होता मुझे। और मैं नाव से नदी में कूद जाता
था झम्म से , बीच धार। नदी की थाह नहीं
मिलती थी। कोई कहता
पचीस पोरसा पानी है , कोई बीस , कोई पंद्रह। एक पोरसा मतलब एक हाथी बराबर यानी सैकड़ो फीट गहरे पानी में उतरने का रोमांच
था वह। तुम्हारी भी थाह नहीं मिलती। तुम को पा कर भी कहां पा पाया। पर तुम से
जुड़ने का रोमांच तो विरह की इस चिता में जलते हुए भी महसूस करता रहता हूं।
बरसों पहले पहली बार जब हवाई जहाज में बैठा था
तो रोमांचित होते हुए एक सहयात्री ने बताया था कम से कम बीस-पचीस हज़ार फीट ऊंचाई
पर हम लोग हैं। आकाश इतना ऊंचा हो सकता है। और ज़्यादा ऊंचा हो सकता है होता ही है अनंत। पर नदी इतनी गहरी नहीं होती , न इतनी चौड़ी। ब्रह्मपुत्र नद भी नहीं , समुद्र भी नहीं। हेलीकाप्टर ज़रूर ज़्यादा ऊंचा नहीं उड़ता। धरती से जैसे क़दमताल करता उड़ता है।
दोस्ताना निभाता चलता है। सब कुछ साफ-साफ दीखता है। धरती भी , धरती के लोग भी। हरियाली तो जैसे लगता है
अभी-अभी गले लगा लेगी। जैसे तुम्हें देखते ही मैं सोचता हूं कि गले लगा लूं।
समुद्र की लहरों की तरह तुम्हें समेट लूं। लेकिन तुम तो समुद्र की विशालता देख कर
भी डर जाती हो। तुम्हें याद है समंदर के रास्ते में जब हम स्टीमर पर थे। सुबह होना
ही चाहती थी , पौ फट रही थी। तुम ने खिड़की
से बाहर झांक कर देखा था। और लोक-लाज छोड़ मुझ से चिपकते हुए सिहर गई थी। पूछा था
मैं ने मुसकुरा कर कि क्या हुआ। चारो तरफ सिर्फ़ पानी ही पानी है , दूर-दूर तक कहीं कुछ नहीं।
सहमती हुई , अफनाती हुई , आंख बंद करती हुई तुम बोली
थी। ऐसे जैसे तुम नन्ही बच्ची बन गई थी। जाने क्यों प्रेम हो या डर आदमी को बच्चा
बना ही देता है। लेकिन तुम्हारे भीतर उतरने का रोमांच। बार-बार उतरने का रोमांच सैकड़ो या हज़ारो फ़ीट गहरे उतरने का तो है नहीं।
अनंत की तरफ जाने का है जहां कोई माप नहीं। मन के भीतर उतरना होता है। और तुम हो
कि नदी के जल की तरह हौले से छू कर निकल जाती हो। कि इस एक स्पर्श से जैसे मुझे
सुख से भर जाती हो। लगता है कि जैसे मैं फिर से नदी में कूद गया हूं झम्म से।
प्रेम की नदी में। तुम मुझे छू रही हो और मैं डूब रहा हूं। जैसे उगते-डूबते सूरज
की परछाईं नदी में डूब रही है। तुम्हारे भीतर की धरती मुझे छू रही है।
लेकिन इतना सारा प्रेम का अमृत पीते हुए भी हम
जानते थे कि विवाहेतर प्रेमियों की कोई पहचान नहीं होती। इस तथ्य को हम दोनों ही
जानते थे। सो अपने प्रेम की सीमा भी जानते थे। सब के सामने अपरिचय की सुरंग में
छुपना भी जानते थे। परछाईं भी जैसे हम से हमारी आंख चुरा लेती थी। प्रेम का उफान
जैसे रुक जाता था। हमारा प्रेम जैसे डर जाता था। हमारा प्रेमी चोर बन जाता था।
दुःख-सुख में हम साथ होते हुए भी साथ नहीं दीखते थे। लोकलाज की चादर में लजाए रहते
थे। हम मर-मर जाते थे पर न हमारा मरना कोई देख पाता था , न कोई धुआं। तुम तरसती रहती थी। हमारे एक क्षणिक
स्पर्श के लिए सुलगती रहती थी। और एक स्पर्श पाते ही , प्यार भरे क्षणिक स्पर्श में तुम्हारी दुनिया
संवर जाती थी। किसी फूल से भी ज़्यादा खुशबू से भर जाती थी। शहद से भी ज़्यादा मिठास
से भर जाती थी तुम। ख़ूब-खूब ख़ुश हो जाती थी। तुम्हारी इस ख़ुशी की खुशबू में नहा कर
न्यौछावर हो जाता था मैं।
इसी मिठास में जीवन गुज़ार दिया है। जां निसार हूं। पूस के धूप में तुम्हारे रुप पर
न्यौछावर मैं था ही कि अचानक क्या हुआ कि तुम बदलने लगी। प्रेम की नदी का किनारा
और बल खाती लहरों और कूदती उछलती मछलियों की तरह जाने कैसे मुझ से खोने लगीं। लगता
कि बंद मुट्ठी में रेत की तरह मुझ से फिसलती जा रही हो। चैत की चांदनी सा सुख , रातरानी सी गमकती रातों जैसा प्रेम का पाग अब
बिसरता जा रहा है हमारे बीच से। जीवन के जंगल से सट कर बहती हमारे प्रेम की निर्मल
नदी , हमारे नसीब से छूट रही थी। कि
शायद जीवन की सड़क पर प्रेम के ट्रैफिक को हम संभाल नहीं पाए। आज तक नहीं जान पाए।
नहीं वह दिन भी थे कि मैं तुम्हें सुंदर कहता और तुम मगरूर हो जाती थी। तुम्हें
ज़िंदगी और ज़िंदगी का सब से बड़ा अरमान कहता और तुम अकड़ कर चूर हो जाती थी। तुम को
चांद कहता तो तुम चांदनी बन जाती। जान कहता तो तुम मदहोश हो जाती। ज़िंदगी कहता तो
चमक कर शमशीर हो जाती। तुम हमारा नशा बन गई। नदी की किसी धार की तरह , सागर में मिलती किसी नदी की तरह मेरी ज़िंदगी में
समाने लगी क्या समा गई। सुमन और सुगंध की तरह हम एक हो गए। लगा कि हमने प्यार कर
के जग जीत लिया है।
फिर क्या था जब तुम कभी आती झूमती-झामती हुई तो
लगता कि बरखा की पहली बूंद आ रही हो। मस्त हवा की तरह , फूल की खुशबू की तरह आती और किसी अबोध बच्चे की
तरह मेरे गले में दोनों हाथ डाल कर झूम जाती। मन में प्यार का मौसम मचल जाता। तमाम
दुःख मर जाते और मन में रातरानी खिल जाती। गहरी झील में किसी हंसिनी की तरह अपनी
ही छाया में उतरती जाती तुम। गौरैया की तरह फुदकती हुई , औचक सौंदर्य का इंद्रधनुष रचती हुई मुझ पर छा
जाती। प्रेम को पर्वत की तरह जीती हुई , देवदार की तरह सिर उठा कर जीती हुई , अपने देह-सरोवर में मुझे डुबोती हुई , प्रेम की चांदनी खिलाती हुई तुम क्या से क्या हो जाती थी , यह तुम क्या जानो भला। जैसे कोई औरत पकाती है
धीमी आंच पर खाना , वैसे ही तुम चाहती थी कि मैं
तुम से प्यार करुं। यही अंदाज़ प्रेम का मुझे पसंद था तुम्हारे साथ। प्रेम को सिर
उठा कर करना सीखा था तुम ने मेरे साथ। दासी की तरह नहीं। प्रेम में बराबरी बहुत
ज़रुरी है। दासी बना कर स्त्री के साथ न प्रेम हो सकता है , न सफल संभोग। प्रेम और सेक्स का सुख बराबरी में
ही मुमकिन होता है। यह बात कम पुरुष जानते हैं। एकतरफा सेक्स को ही प्रेम मानने की मूर्खता करना पुरुष की आम
प्रवृत्ति है। स्त्रियों को यह पसंद नहीं। लेकिन वह यह कह नहीं पातीं। तुम भी
लोकलाज में फंस कर कभी अपने पति से यह बात नहीं कह पाई। मुझ से लेकिन कहती रहती।
मुझ से यह सब कहने के लिए तुम किसी बंधन में नहीं थी। दासी नहीं , प्रेयसी हो तुम हमारी यह बात जब मुझ से तुम ने
सुनी तो भाव-विह्वल हो गई। लगा कि तुम क्या पाओ , क्या दे दो मुझे। तुम ने मुझे दिया भी। अपना अगाध प्रेम। अविरल और अलौकिक
प्रेम। तुम्हारे पास अगाध प्रेम था मेरे लिए , तुम ने मुझे दिया। तुम नहीं जानती , तुम आज भी भले न मिलो , न बात करो
पर तुम्हारा वह अगाध और निश्छल प्रेम तो है मेरे पास ही। प्रेम के बीज को वृक्ष
में विरूपित इसी भाव और विशवास में ही तो हम ने किया था।
मेरा बराबरी से मिलना तुम्हें भा जाता था।
स्त्री को मैं गुलाम नहीं समझता , यह तुम्हें अच्छा लगता। तुम कहती कि भले मैं ने
प्रेम विवाह किया है पर प्यार तो आप से ही मुझे मिला है। विवाह से मुझे सेक्स सुख
का तो पता चला पर प्रेम का सुख नहीं। बाद में यह सेक्स सुख भी सिर्फ़ पति के ही
हिस्से में रह गया। पति का आदेश , पति की
इच्छा ही सेक्स हो गया। मेरी ज़रुरत क्या है , मेरी भी कोई इच्छा है , पति को आज
तक नहीं पता। मैं औरत नहीं सेक्स का इंस्ट्रूमेंट हूं। सेक्स का खिलौना हूं , पति के लिए। बस। तुम्हारी यह यातना ही शायद
तुम्हें मुझ तक खींच कर ले आई। तुम ने प्यार किया और चली गई। जैसे प्रेम से
तुम्हारा पेट भर गया। लेकिन अपने प्रेम में मुझे क़ैद कर गई। इस प्रेम की क़ैद में
गिरफ़्तार तुम्हारे प्रेम की कचहरी में तुम्हारी पैरवी करता हुआ मैं एक वकील की तरह नहीं एक मुलजिम
की तरह पेश हूं।
बिजली जाती है , आ जाती है। नेटवर्क जाता है , आ जाता है। तुम क्यों नहीं आती।
काश कि इंश्योरेंस एजेंसियां
हेल्थ की तरह प्रेम का भी इंश्योरेंस करती होतीं। और हम कैशलेश क्लेम ले कर अपने
खोए प्रेम को पा जाते। कई बार सोचता हूं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसे हम लोग
मोहब्बत कहते हैं , वह महज़ एक ज़रुरत भर है। ज़रुरत
ख़त्म , मोहब्बत ख़त्म। सो सच-सच बताना
प्रिये कि मैं ज़रुरत था कि मोहब्बत। सच बताओगी तो बुरा नहीं लगेगा। क्यों कि जो
स्त्री प्रेम के लिए पिता और पिता का घर सर्वदा के लिए छोड़ सकती है , वह अगर प्रेम में है , तो पति का घर भी तो छोड़ ही सकती है। इतना साहस
तो कर ही सकती है। कि सारा साहस पिता के लिए ही था। तो क्या यह सचमुच मोहब्बत थी ? मोहब्बत थी कि ज़रुरत ? ज़रुरत को लोग मोहब्बत का नाम देते ही क्यों हैं , समझ नहीं आता। ज़रुरत ख़त्म , मोहब्बत ख़त्म। ज़िंदगी का यह अजीब सिलसिला है।
तुम को याद ही होगा कि प्रेम के लिए मुझे तुम ने ही चुना था। तलाश तुम्हीं ने किया
था। शायद संभोग का स्वाद बदलने के लिए। प्रेम की प्यास बुझाने के लिए। जो भी हो , तुम ही जानो। मैं तो बस तुम्हारे प्रेम की नदी
की धार में अनायास ही समा गया था। जैसे नदी कंकड़ , पत्थर , हीरा , मोती सभी कुछ साथ बहा ले जाती है। वैसे ही मैं
भी तुम्हारी प्रेम नदी की धारा में बहता रहा। अब तुम्हारी नदी की कोई लहर किसी
किनारे पर मुझे छोड़ कर आगे बढ़ गई है तो मेरा क्या दोष। प्रेम नदी के किनारे अभी भी
बहने की प्रत्याशा में प्रत्याशी की तरह उपस्थित हूं। मन ही मन बहता जा रहा हूं।
तुम नहीं जानती तो अब से जान
लो प्रेम मां की तरह
होता है। मां का
दुलार कभी खत्म नहीं होता। प्रेम किसी का भी
हो , प्रेम खत्म नहीं होता।
समय-समय पर तुम्हारे साथ मिले वह पक्षी , वह कोयल , वह वृक्ष , वह वनस्पतियां वह किसिम-किसिम के फूल , वह तुलसी का चौरा , वह बारिश , वह पुरवा , वह धूप , वह चांदनी , वह आम्र मंजरियां , वह पल्लव , बारिश में भीगता , आंगन का वह दशहरी का पेड़ , हरी घास पर
बिखरे वह गुलमोहर के फूल भी कभी तुम्हें नहीं भूलेंगे। नहीं भूलेगी वह मछली भी जो
हमें तुम्हें देखते हुए , नदी में छपाक से कूदी थी। वह कोहरा
, वह ओस की बूंद सब की यादों
में तुम ठहरी हुई हो। इन सभी की याद में भी तुम रहोगी। वह नदी भी तुम्हें कहां
भूलेगी भला जहां , जिस पर बने पुल पर खड़े हो कर
हम पूर्णमासी का चांद देखा करते थे। पूर्णमासी के चांद में हम तुम जैसे दर्ज हैं।
सर्वदा के लिए। हम ही नहीं , यह सभी तुम
से प्रेम करते हैं। और प्रेम किसी का भी हो , प्रेम खत्म नहीं होता। कभी नहीं होता।
मेरी मुश्किल देख कर लोगबाग़
पूछते रहते हैं , क्या हुआ ? लोगों को बताता रहता हूं कि एक औरत थी जो मुझे जवान बनाए रखती थी। वह मुझे
छोड़ कर चली गई। लोग
मुझ पर हंसते हुए निकल जाते हैं। याद है तुम्हें पाने की हड़बड़ाहट में कार की लाइट आफ करना भी कई बार भूल जाता था।
वापसी में बैटरी डाऊन हो जाने के कारण कार स्टार्ट नहीं होती तो तुम्हें अकेले
लौटना होता था। झल्लाती हुई लौटती थी तुम। प्यार का सारा हरसिंगार झर कर बिखर जाता
था। ऐसे ही बिखर गया हूं , तुम्हारे बिना। ज़िंदगी की
बैट्री डाऊन हो गई है। प्रेम की मछली तड़प रही है , तुम्हारे प्यार के पानी बिना।
तुम्हारे बिना
पृष्ठ - 144
मूल्य : 375 रुपए
प्रकाशक : अमन प्रकाशन
104 ए / 80 सी , रामबाग़ , कानपुर -208012
मोबाइल
9044344050
8960421760

तुम्हारे बिना कहानी का भोजपुरी अनुवाद
लेखक : दयानंद पांडेय
भोजपुरी अनुवाद : डाक्टर ओमप्रकाश सिंह
जे जिनिगी बन के जीवन में आइल होखे, ऊ धीरे-धीरे आपन राह बनावत जिनिगी से एकदम बाहर निकल जाए त? अइसन लागेला जइसे कवनो दरपन होखे, जवना में रउरा अपना के देखत रहल होखीं, आ उहे दरपन झन्न से टूट के चकनाचूर हो गइल होखे। अब अपना के देखीं त कइसे देखीं? कुछ बुझाते नइखे। तूं जिनिगी में रहलू त लागे कि अतना सुन्नर जिनिगी हमरा कइसे मिल गइल! ओह समय के दरपन में तूं रहलू, हम रहनी। कवनो हवा नियर जिनिगी में दाखिल होके, बेचा गइल जमीन लेखा एह तरह दाखिल-खारिज हो जइबू, ई कहाँ जानत रहनी। अब जब तूं जिनिगी से दाखिल-खारिज होके निकल गइल बाड़ू त बेर-बेर अपना से पूछत रहत बानी कि तूं जिनिगी रहलू कि कवनो सपना—टूट जाए वाला सपना।
किरिच-किरिच टूट के बिखरत रहेलू। रिस-रिस के याद में चुअत रहेलू। जइसे भारी बरखा में कवनो खपरैल के छान्ह जगह-जगह से चुअत होखे। अतना चुए कि घर में कहीं ठाढ़ होखे के जगहो ना मिले। चुअत पानी में भींजल लाजिम हो जाए। याद बा, तोहरा बरखा कतना पसन्द रहे। बरखा में हमरा से सट के रहल तोहरा कतना नीमन लागे। बरखा होत रहे आ बरखा में भींजत अँगना के ऊ दशहरी आम के पेड़ हमनी देखत रहीं आ प्रेम के बरखा में भींजत रहीं। तूं जानेलू कि हमरा दशहरी आम बहुते पसन्द बा। दशहरी आम चूसल आ ओकर मिठास में डूबल होखला का बादे मेहरारू के प्रेम के मिठास में डूबल जा सकेला। एह सवाद के का कहल जाव! अतना कि तोहार छाती के हम दशहरी कहे लागल रहनी। दशहरी कहते तूं पुलक उठत रहलू आ हमरा के भरपूर प्रेम करे लागत रहलू।
तोहार दशहरी चूसल, ओकर मिठास के भास, एहसास आ दशहरी के नशीली गमक में तर तोहार ऊ मादक साथ—आजुओ सोचत बानी त तोहरा प्यार से भर जात बानी। अइसे जइसे कवनो मेहरारू पनघट से गगरी भर के चलत होखे, ओइसहीं हुमुक-हुमुक के, ठुमुक-ठुमुक के चले लागत बानी। लागेला जइसे मदमस्त होके नदी के पुल पर, पूरनमासी के रात पूरा चान देखत, हमार हाथ पकड़ले तूं आजुओ ठाढ़ बाड़ू। आ हम तोहरा के देखत बानी। कबो नदी, कबो चान, कबो नदी में चान आ कबो तोहरा के। आवत-जात लोग आ आसपास ठाढ़ लोग हमनी के देखत होखे। जब ई मंजर इयाद आवेला त इहे सोचत नदी के पुल पर जाके ठाढ़ हो जात बानी—अकेले। पूरनमासी होखे भा ना होखे, तोहार इयाद हर रात के पूरनमासी के रात बना देले। तोहार अरसी, तोहरा प्यार के दरपन टूट गइल बा; बाकिर नदी के पानी के अरसी?
नदी से पूछत बानी। नदी कवनो जवाब नइखे देत।
अब तूंहू कहाँ जवाब देलू। ‘यू डोंट’ के ताला लगा दिहलू, ऊ अलग। आ हम तोहरा के दिहल वचन के ताला में बन्द बानी—‘यस, मी डोंट।’ एहसे ना फोन, ना मेसेज, ना भेंट। हम बहुते अलग किसिम के प्रेमी बानी। दिहल वचन कबो ना तुड़ेनी। घर के शान्ति ना तुड़ेनी। सन्नाटा बुन लेनी। कवनो आवाज ना देनी। बाकिर पल-पल आवत तोहार इयाद के का करीं? नीमन बा कि एह पर तूं ‘यू डोंट’ के ताला नइखू लगवले। तोहार इयाद आवेला त विरह के चिता पर कवनो सती लेखा बइठ जात बानी। धू-धू जरत रहत बानी। विरह के एह चिता से खाली तुंही हमरा के निकाल सकेलू। बाकिर ना निकालबू, ई बात अब बढ़िया से जान गइल बानी। बाकिर तोहार इयाद? आह! ई तोहार इयाद आ विरह के ई चिता!
तोहरा इयाद बा, जबे तूं मिलत रहलू, बरखा बन के मिलत रहलू। आ हमहूँ बरखा बन के तोहरा भीतर बरसे लागत रहनी। तोहरा भीतर जइसे कवनो संगीत बाजे लागे—मद्धिम-मद्धिम। हम कवनो जलतरंग लेखा तोहरा देह में उतरत रहनी। धीरे-धीरे। तोहरा देह-सरोवर में। तोहरा देह-सरोवर में मन के डेहरी पुलक-पुलक जात रहे। प्रेम के एह बरखा में भींज के तूं जइसे वसुन्धरा हो जात रहलू—भरल-पूरल वसुन्धरा। प्रकृति हमनी के दुलरावे लागे, सावन के बरखा लेखा। प्रेम के एह बरखा में नहाइल, धुत्त, तोहार निरबसन देह जइसे कवनो अलसाइल, निढाल साँझ बन जात रहे। अइसे जइसे पूरा चान नदी में उतर आवत होखे—डुबकी मारत। कबो डूबत, कबो उतरात। जइसे लहरन का बीच चान हेरा-हेरा जाला। कबो-कबो तूं कहत रहलू कि लहरन पर कबो भरोसा मत करिहऽ। हम पूछत रहनी—काहे? त तूं कहत रहलू—लहर कहीं के कहीं छोड़ देली सँ। छोड़ दीहल लहरन के सुभाव ह। लहरन के बस इहे आवेला। त का तुहूँ कवनो लहरे रहलू, जे हमरा के छोड़ के चल गइलू—अनायास? नदी आपन किनारा से मिलत रहेली। कबो तूं नदी बन जा आ अपना एह किनारा से मिल जा। भले फेर लहर बन के छोड़ के चल जइहऽ। तोहरा इयादन के पूरा लश्कर बा।
तोहरा इयाद बा, जबे तूं मिलत रहलू, बाँहि में मिलत रहलू। तूं कबो एतनो फुरसत ना दिहलू कि हम कबो अपना से मिल सकीं। अबहियो महकत मीठ इयाद में मिलेलू—बाँहि में। काश, हरसिंगार लेखा अनगिन रंग आ उमंग लेके महकत मीठ इयाद में समा जइतू। आ जा! तूं कहाँ बाड़ू? हरियर घास पर बिछल गुलमोहर के नरम फूलन पर बइठ के बतियावल इयाद आवेला। गुलमोहर लेखा दहकत तोहार ओंठ इयाद आवेला। गुलमोहर के मधु में फेर डूबे के मन करेला। तोहार बिसाल आ सुडौल छाती, मृदंग लेखा तोहार नितम्ब आ गरदन का पीछे से झाँकत तोहार पीठ इयाद आवेला। तोहरा के दिहल ‘यू डोंट’ वाला वचन में बन्हा त गइल बानी, बाकिर लागेला कि उहाँ तोहरा लगे कुछ छूट गइल बा। अइसे जइसे हमहीं छूट गइल बानी—उहवें, तोहरा लगे। जाने का-का छोड़ आइल बानी—ऊ घाम, ऊ बादर, ऊ बरखा; ऊ आँख, ऊ सपना आ ऊ साजिशो, जेकरा के तोहरा के पावे खातिर हजार बेर तुड़त आ अपना नेह से जोड़त रहनी—तोहरा भीतर बसल मेह से। ई नेह, ऊ मेह आ ओकर शीतल फुहार। तोहरा छाती पर कपोल धके ऊ मदमाती मनुहार—ई सब तोहरा लगे छोड़ आइल बानी। हमार अँगुरी देखिहऽ। कहीं उहवें त नइखे रह गइल—तोहरा के हेरत, तोहरा के सहेजत, तोहरा के थपकी देत। हमार हथेलियो शायद उहवें रह गइल बाड़ी सँ—दशहरी के टोवत। हमार ऊ ओंठ, जवना पर तूं खुद बाँसुरी बनत ना अघात रहलू। आ कहत रहलू कि अइसहीं मद्धिम-मद्धिम तोहरा भीतर बाजत रहे के चाहत बानी—मालकौंस लेखा। काहे कि एहमें रिषभ आ पंचम सुर ना लागेला। एहमें गान्धार, धैवत आ निषाद कोमल लागेला। रात के तिसरका पहर भैरवी थाट से निकलल एह मालकौंस में तूं हरदम निबद्ध होखे के चाहत रहलू—मद्धिम-मद्धिम। हो सके त एह सब के सहेज-सम्हार के रखिहऽ—सुई-तागा लेखा। काहे कि तोहरा लगे बहुते कुछ छूट गइल बा। बेहिसाब। एह मालकौंसो के ओकर भैरवी थाट में बचा के रखिहऽ। काहे कि हम फेर-फेर आइब—कवनो रात के तिसरका पहर, तोहरा भीतर मद्धिम-मद्धिम उतरे। उतर के तोहरा के निबद्ध करे।
फेर से देखऽ। कुछ छूट गइल बा कि कुछ टूट गइल बा—उहवें तोहरा लगे। कि हमहीं टूट के तोहरा लगे छूट गइल बानी। देखऽ, हमरा के बचा के रखिहऽ। तनिका देखिहऽ त, उहाँ अउरी का-का छूट गइल बा। काहे कि तोहरा के देखे आ तोहरा से बिछुड़े के द्वन्द्व में हम अपना साथे कुछ ला ना पवनी। कुछ लइतीं त कइसे? अपना के तोड़ के तोहरा लगे छोड़ आइल बानी।
तोहरा इयाद बा, जाड़ा के घाम में जब तूं मिलत रहलू त तोहार नरम आ तात हाथ हमरा हाथ में आके कइसे पिघले लागत रहे। हमनी के सगरी सीमा टूट जात रहे। शुरुआती दिनन में जब हमनी कवनो रेस्तराँ में चोरी-चोरी मिलत रहीं त हम बहुते परेशान हो जात रहनी। आ ऊ बेर, जब मेट्रो में एकान्त पाके हम अचानक तोहरा के चूम लिहले रहनी—तोहरा इयाद बा कि तूं सिहर उठल रहलू। भीड़ के समुन्दर में चलत-चलत जब कबो तोहरा के छू दीं त तूं चिहुँक जात रहलू। चिहुँक के एकदम अनजान बन जात रहलू। बहुते बाद में तूं बतवले रहलू कि कई बेर तोहरो मन हमरा के चूम लेबे के भइल। बाकिर लाज आ मेहरारू-सुलभ संकोच का चलते आपन सगरी इच्छा दबा लेत रहलू। आ हँ, कोहरा से भरल ओह दुपहरिया में जब हमनी नदी किनारे हाथ में हाथ लिहले बइठल रहीं, तभिए पानी से एगो मछरी निकल के छपाक से फेर नदी में कूद गइल रहे। तूं जोर से चिल्लइलू—“अरे!”—आ हमार गोदी में गिर गइलू। अइसे जइसे कवनो देवाल गिर गइल होखे।
बहुत देर ले हम तोहार पीठ थपथपावत रहनी। हाथ अनायास पीठ से होत पहिले नितम्ब थपथपावे लागल आ अचानक, अनायास छाती दिस बढ़ गइल त तूं चिहुँक के उठ बइठल रहलू। आ बहुते कड़ाई से कहले रहलू—“नो!” तनिका देर बाद आपन शाल हमरा साथे ओढ़त धीरे से पूछले रहलू—“कोहरा में जाड़ ना लागेला का?” हमहूँ धीरे से बतवले रहनी—“ना लागे।” त तूं बुदबुदइले रहलू—“हँ, जानत बानी कि जब हम साथे रहेनी त रउरा के जाड़ ना लागे।” फेर पलट के पूछले रहलू—“बाकिर भूख? भूखो ना लागे?” जवाब में हम कहले रहनी—“एह मदमस्त कोहरा में तोहरा जाड़ आ भूख के इयाद कइसे आ गइल?”
एकरा बाद तोहार मादक छुअन हमरा के रोमांचित कर दिहले रहे। हमनी लवट के कार में आ गइल रहीं। हम तोहरा पर बेतहाशा चुम्मन के बरखा कर दिहनी। तुहूँ आपन संयम तुड़ दिहलू आ हमनी कारे में प्रेम के चरम सुख ले पहुँच गइल रहीं। बाद में हमनी अक्सर कार के इस्तेमाल करे लगनी। बाद में तूं एकरा के अक्सर ‘कार सेवा’ कहे लगलू। खुल के कहे लगलू—“आज कार सेवा खातिर समय निकालल जाव।” तोहरा इयाद बा, हमरा पर घुड़सवारी कइलो तोहरा बहुते पसन्द रहे। अक्सर फोन करके कहत रहलू—“आज घुड़सवारी करे के बहुते मन हो रहल बा। आज समय निकाल के आईं।” पहिलका ना, बाकिर समापन सत्र तोहरे घुड़सवारी से पूरा होत रहे। तूं जइसे सम्भोग के सवादे बदल दिहले रहलू। एगो देर साँझ, जब कोहरा घना हो गइल रहे आ चानी नरम, कोहरा हमरा के अइसे घेरत रहे जइसे हमार बाँहि तोहरा के घेर लेले आ तूं रीझ गइल रहलू। हमनी का भीतर प्रेम के एगो नदी बहे लागल आ दुनु जने के एक दोसरा से जोड़ दिहलस। लागल कि खाली तोहरे के ना, हम अपनो के पा गइल बानी। तोहरा इयाद बा ओस में भींजल ऊ बिहान, जब हम तोहरा प्यार के नरम ओस में भींज गइल रहनी। ऊ ओस आजुओ हमार मन में टटके बा।तोहरा इयाद बा, जब तोहार आँख आ ओंठ के कोलाज तोहरा कपोल पर रचात रहे, तभिए ओस के एगो बूँद गिरल आ हम तोहरा प्यार में नहा गइनी। ऊ ओस के बूँद रहे कि तोहार नेह, जे ओस बन के टपकल रहे?
तोहरा मालूम बा, जब तूं मिलत रहलू त मन अमृत से लबालब भर जात रहे। हमार मन अमृत-अमृत हो जात रहे आ तोहार देह नदी बन जात रहे। नदी में प्रेम के मछरी कुलाँच मारे लागत रहे। तूं मिलत रहलू त मन धरती बन जात रहे। इच्छा के पल-छिन में अनगिन फूल खिल उठत रहे। हमनी के प्रेम के झोपड़ी में एगो आग सुलगे लागत रहे। तूं मिलत रहलू त मन नील गगन बन जात रहे आ प्यार पंछी। साँझ जल्दी हो जात रहे। उड़त चिरई ठहर जात रहे। झुंड के झुंड चिरई कवनो तार पर बइठल लउके त तूं अचानक चल देत रहलू। प्रेम के एह बेला में घड़ी के सुई जइसे ठहर जात रहे। नदी जइसे बिकल हो जात रहे। तापमान सिफर हो जात रहे। तापमान के ई सिफर हमार मन तुड़ देत रहे। प्रेम के बहत नदी बरफ बन जात रहे। बिछोह ग्लेशियर के टुकड़ा बन जात रहे। हमनी के प्रेम के गीत ठिठुर के सुन्न हो जात रहे। “तूं फेर कब मिलबू?” हम धीरे से पूछत रहनी। तूं कुछ ना बोलत रहलू। बरफ पिघले के आसरा में प्रेम जइसे छुट्टी ले लेत रहे। फूल लेखा फेर खिले के आसरा में हमनी के प्रेम प्रतीक्षारत हो जात रहे—ऊ प्रेम, जे अमृत हो जाए के चाहत रहे।
इहे ऊ दिन रहे जब—‘है अपना दिल तो आवारा, न जाने किस पे आएगा’, ‘हर गम फिसल जाए, जब तुम साथ हो’ आ ‘मौसम ये रूठने-मनाने का है, अपने दामन की खुशबू बना ले मुझे’—अलग-अलग समय के ई तीनों फिलिमी गीत एके साथ गावे आ सुने लागल रहनी। ई कवन मनोविज्ञान रहे भला? जाने काहे, जाने काहे। हमनी के जीवन में गीत बहुते बाड़े सँ, बाकिर तोहरा से बड़ गीत जिनिगी में कबो ना मिलल। आजुओ तोहरा के गावत रहत बानी। देखत रहत बानी। तोहरा इयाद में जीयत रहत बानी। अइसे जइसे कवनो अमूर्त चित्र देखत होखीं। अबहीं हवा में तोहरा के खोजत रहनी। बादर मिल गइल त ओकरे से तोहार पता पूछ लिहनी। बादर कहलस—“पता त हमरा मालूम बा, बाकिर बहुते जल्दी में बानी, एहसे बता पावल कठिन बा। बरस सकत बाड़ऽ त हमरा साथे बरसऽ। पता अपने मिल जाई। अनायासे ओकरा लगे पहुँच जइबऽ, जेकर पता पूछत बाड़ऽ।” एहसे अब बादर ना, हम बरसत बानी—तोहरा ले पहुँचे खातिर।
आजकाल्हु शहर में बरखा के मौसम बा। बरखा में जब शहर झील बन जाला त एह विपदहूँ में तोहार आँख इयाद आवेली सँ। आवत-जात देखत बानी त तोहार आँख झील लेखा लउकेली सँ। सॉरी, शहर के सगरी झील तोहार आँख बन जाली सँ। त का हम बरखा बन जात बानी? का हमरा इयाद के बरखा से तोहार आँख झील बन जाली सँ? बरखा अधिका हो जाले त शहर में बाढ़ आ जाला। आबादी बाढ़ में डूब जाले। त का हम अधिका बरसे लागल बानी आ तूं प्यार के बाढ़ में डूब गइल बाड़ू? शहरन के पर्यावरण-सन्तुलन त बिगड़िए गइल बा। का प्यार में पर्यावरण-सन्तुलनो बिगड़ेला? बिगड़ेला त अउरी बिगड़े दऽ।
जइसे धरती पर ओस गिरत होखे, तूं हमार गोदी में गिरऽ। जइसे अन्हार में कवनो अँजोर लउकेला, तूं हमार आँख में लउकऽ—कवनो कुतूहल लेखा। जइसे चानी में कवनो नदी बहत होखे, ओकरा में नाव चलत होखे आ नदी के कवनो टापू पर नाविक के आस लेखा एगो दिअरी जरत होखे—ओइसहीं हमार मन में बहऽ। नाव लेखा मंथर-मंथर चलऽ आ कवनो आस लेखा दिअरी बन के जरऽ। हम नदी के उहे नाविक बानी। हमरा के प्यार के राह दऽ। दुलार के ऊ साँझ दऽ। मनुहार के ऊ मानो दऽ, जवन धरती सुरुज के पहिल किरिन के देले। हम माटी बानी। अपना प्यार के पानी में सान के कवनो मूरतकार लेखा हमरा के गढ़ऽ। कुम्हार लेखा हमरा के रउँदऽ। तरसऽ मत, बरसऽ। कवनो पोखरा लेखा हमरा के प्यार के पानी से भर दऽ। सिंघाड़ा के लत्तर लेखा हमार सरबस पर पसर जा। हम अइसने चाहत बानी। तोहरा इयाद बा कि कबो इहे तोहार आँख हमार नगर रहल करेली सँ। एह नगर के नदी में नहाके हम गंगा नहा लेत रहनी। तोहार सीबीआई लेखा आँख से कबो कुछ छिप ना पावत रहे। ऊ हमरा के सबकुछ बता देत रहली सँ। समुन्दर लेखा गहिर तोहरा आँख के सिलवट देख के पूरनमासी के चानी मन में उतर जात रहे—कहीं बहुते गहिराई में।
बाकिर अब कहाँ? अब त तूं मिलबो ना करेलू। बतियइबो ना करेलू। तूं भुला गइल बाड़ू कि तोहरा आँख के नगर के एगो बासिन्दा हमहूँ बानी। बासिन्दा बानी कि परदेसी? कि तोहरा आँख के नदी सन्यास ले लिहले बिया? आ तोहार ओंठ आ तोहार ऊ खिलखिलात हँसी! एक बेर तोहार ओंठ चूसत हम कहले रहनी—“ई ओंठ हवें कि बनारसी पान के गिलौरी? मन करेला गप्प से एकरा के कवनो गोलगप्पा लेखा खा जाईं। पान लेखा कूँच-कूँच के खाईं। फेर तोहरा के बाँसुरी लेखा बजाईं। तोहरा ओंठ के बाँसुरी बाजे आ हम तोहरा ओंठ के अकास में हेरा जाईं।” ई सुन के तूं सोरह बरिस के लइकी लेखा पुलक उठल रहलू। बाकिर हम करबो का करितीं? तोहार ओंठ कवनो बाँसुरी के धुन से अधिका मीठ बा। कवनो फूल से अधिका मादक, अधिका मोहक, अधिका दिलकश आ मध से अधिका मिठास घोले वाला तोहार ई रसगर ओंठ हमेशा से हमार कमजोरी रहल बा। एह ओंठन में जादू जगा के जब तूं हँसत रहलू त जइसे कतना गुलाब एके साथ खिल उठत रहे। लागे कि चंडीगढ़ के रोज गार्डेन हमनी का भीतर उतर आइल बा। ओकरा गमक में हम डूब जात रहनी। ओंठन का बीच कतना कनेर आ कतना कचनार ठाढ़ हो जात रहे।
कुछ इयाद बा? तब मन में बेला उमग उठत रहे। रातरानी खिल जात रहे। हरसिंगार के फूल झरे लागत रहे। मन फगुआ आ बसन्त हो जात रहे। अइसे जइसे तोहार नयन फगुआ होखसु आ ओंठ बसन्त। एह ओंठन के इन्द्रधनुष में अतना मोहित रहत रहनी कि सगरो दुख भुला जात रहनी। हमनी के संसार सुनहला हो जात रहे।
तोहरा के इयाद करत बानी त तोहरा साथे बितावल जाड़ा इयाद आ जाला। तनिका लकड़ी, तनिका आग। तोहरा साथे बइठ के लिहल कुछ साँस। तोहरा बाँहि में लिहल ऊ उसाँस इयाद आ जाला। एह चाँदनी रात में अउरी का चाहीं? मन करेला तोहरा से कहीं—ई मन ना ह, एगो धरती ह। तूं हमरा मन में अइसे पसर जा, जइसे धरती पर चानी पसरेले। जइसे कवनो झील पर कोहरा पसरेला। जइसे आधरतिया के कवनो मधुबन में गमक पसर जाले। ई रात ना ह, रात के रंग ह। तोहरा काँख आ गरदन के बीच रगड़ खात हमरा नाक में पसरत सुगन्ध ह। ई तोहार खिलखिलात मन आ मौन ह—तोहार चूड़ी लेखा खिलखिलात। समय के कैमरा एह चानी के गमक के दर्ज कर लेव। एह चानी रात में तोहरा के देख लेव। एह चानी रात में तोहरा के चीन्ह के इयाद के गठरी में बान्ह लेव। चानी तनिका तोहरा रूप के जाल में मचल लेव। तोहरा घन केस में उलझ लेव। तूं हमार बाँहि में रुक जा। एह जाड़ रात में तोहार आग बहुते जरूरी बा—जीए खातिर। तबले रुक जा। बाकिर कहाँ!
तोहरा इयाद बा, कतना मन रहे कि कवनो चानी रात में तोहरा साथे कवनो छत पर पूरा रात बिताईं। ‘ठंडी सफेद चादरों पे जागें देर तक, तारों को देखते रहें छत पर पड़े हुए’ वाला गीत गुनगुनावत, छत पर पड़ल-पड़ल गावत रहीं। तोहरा से अक्सर ई बात कहत रहनी। बाकिर पूरनमासी के चान त तूं देखत आ देखावत रहलू—कबो नदी किनारे से, कबो कवनो फ्लैट के बालकनी से। बाकिर कवनो छत पर अइसन चानी रात कबो नसीब ना भइल कि तोहार गुदगुद नरम देह साथे बेफिकिर होके ओह चानी में नहइतीं आ तोहरा के अपना प्यार में नहवइतीं। बाकिर ई सपना अधूरा रह गइल त अधूरे रह गइल।
सपना में त तूं आजुओ मिलेलू। अइसे मिलेलू जइसे नदी के पानी—छू के निकल जालू। हमरा के अपना साथे बहा के काहे ना ले जालू? सपने में सही, तोहरा मिले के रूपो अजब-गजब होला। कबो कवनो नदी में आइल बाढ़ लेखा भरल-पूरल। कबो जमुना के पाट लेखा दूर ले फइलल-पसरल। कबो सरयू लेखा घाघरा के समेटले, छाती तान के गीत गावत। कबो तीस्ता लेखा चंचल त कबो ब्यास लेखा बहकल। कबो झेलम आ पद्मा लेखा सरहदन में बँटत आ जुड़त। नरमदा आ साबरमती लेखा रूठत-मनावत। कबो कुआनो लेखा कुम्हिलाइल। कबो गोमती लेखा बेबस। कबो वरुणा लेखा हेराइल-सुतल। कबो गंगा लेखा त्रिवेणी में समाइल। हुगली लेखा मटियाइल आ घुटत। रोज-रोज ज्वार-भाटा सहत। कबो ई, कबो ऊ बन के। छोट-बड़ सगरी नदी के आपन बना के। सगरो दुख-दरद अपना में समेटले, सागर से मिले जात। हमार मन के धरती पर तूं लगातार बहत रहेलू। अतना हरहरात आ अतना तेज बहेलू कि हम ना तोहरा के सम्हार पावेनी, ना अपना के। तोहरा भीतर उतरेनी त अपना के चारु ओर पानी से घेराइल पावेनी। पानी के अइसन घन जाल खाली तोहरा भीतर के नदिए में मिलेला। कबो नाव से नदी के बीच धार में झम्म से कूद जाइल हमार खेल रहे। नदी के पानी जइसे सपना के दुनिया में बान्ह लेत रहे। पानी का भीतर से ओह घरी सबकुछ साफ लउकत रहे। बीच धार नदी के पानी में धरती ले पहुँचे के रोमांच लेके कूदत रहनी, बाकिर पानी चीरत कबो धरती ले ना पहुँच पवनी। बेचैन पानी हमरा के ऊपर ठेल देत रहे। मन अफनाए लागे। ओह अथाह जलराशि में हम अकेला पड़ जाईं। आज ले ना जान पवनी कि अइसन काहे होत रहे। बाकिर पल भर में पानी के जाल चीरत झटाक से हमार माथ बाहर आ जात रहे। जइसे पानी के सपनइल जाल से छूट गइल होखीं। फेर नदी में तइरत आ धार से लड़त एह भा ओह किनारा पर आ जात रहनी। ई हमार लगभग रोजे के खेल रहे। हमार आ नदी के मेल रहे। लोग आ नाव के मल्लाह रोकत आ बरजत रह जात रहे। बाकिर सपनइल पानी जइसे हमरा के बोलावत रहे आ हम नाव से बीच धार में झम्म से कूद जात रहनी। नदी के थाह ना मिलत रहे। केहू कहे—पचीस पोरसा पानी बा; केहू बीस त केहू पन्द्रह। एक पोरसा के मतलब एगो हाथी बराबर। माने सैकड़न फुट गहिर पानी में उतरे के ऊ रोमांच रहे। तोहरो थाह ना मिले। तोहरा के पाके त कहाँ पा पवनी! बाकिर तोहरा से जुड़े के रोमांच विरह के एह चिता में जरतो घरी महसूस करत रहत बानी।
बरिसन पहिले, जब पहिला बेर हवाई जहाज में बइठल रहनी त रोमांचित होत एगो सहयात्री बतवले रहे कि हमनी कम से कम बीस-पचीस हजार फुट के ऊँचाई पर बानी जा। अकास अतना ऊँच हो सकेला। एकरो से अधिका ऊँच हो सकेला। होखबे करेला—अनन्त! बाकिर नदी ना अतना गहिर होखेले, ना अतना चाकर। ब्रह्मपुत्र नदो ना, समुन्दरो ना। हेलीकाप्टर जरूर अधिका ऊँच ना उड़े। ऊ जइसे धरती से डेग मिलावत उड़े आ दोस्ती निभावत चलेला। सबकुछ साफ-साफ लउकेला—धरतियो आ धरती के लोग। हरियाली देख के त अइसन लागेला जइसे अभी-अभी गले लगा ली। तोहरा के देखते हम सोचत बानी कि गले लगा लीं। समुन्दर के लहर लेखा तोहरा के अपना में समेट लीं। बाकिर तूं त समुन्दर के बिसालता देख के डेरा जालू। तोहरा इयाद बा, समुन्दर के रास्ता में जब हमनी स्टीमर पर रहीं। बिहान होखे वाला रहे। पौ फाटत रहे। तूं खिड़की से बाहर झाँकले रहलू आ लोक-लाज छोड़ के हमरा से सटत सिहर गइल रहलू। हम मुसुकात पूछले रहनी—“का भइल?” “चारु ओर खाली पानिए-पानी बा। दूर-दूर ले कहीं कुछ नइखे।” तूं सहमत, अफनात आ आँख मूनत कहले रहलू। अइसे जइसे नान्ह लइकी बन गइल रहलू। जाने काहे, प्रेम होखे भा डर, आदमी के लइका बनाइए देला। बाकिर तोहरा भीतर उतरे के रोमांच! बेर-बेर उतरे के रोमांच!
ई रोमांच सैकड़न भा हजारन फुट गहिर उतरे के ना ह। ई अनन्त दिस जाए के रोमांच ह, जहाँ कवनो नाप नइखे। मन का भीतर उतरे के होला। आ तूं बाड़ू कि नदी के पानी लेखा हाली से छू के निकल जालू। अपना एह एक छुअन से जइसे हमरा के सुख से भर जालू। लागेला जइसे हम फेर नदी में झम्म से कूद गइल बानी—प्रेम के नदी में। तूं हमरा के छुअत बाड़ू आ हम डूबत बानी। जइसे उगत-डूबत सुरुज के परछाईं नदी में डूबत होखे। तोहरा भीतर के धरती हमरा के छुअत बिया।
बाकिर प्रेम के अतना सगरो अमृत पीयतो हमनी जानत रहीं कि बिआह से बाहर के प्रेमियन के कवनो पहचान ना होखे। एह साँच के हमनी दुनु जने जानत रहीं। एहसे अपना प्रेम के सीमा जानत रहीं। सभका सोझा अनचिन्हार बने के सुरंग में लुकाइलो जानत रहीं। परछाईं जइसे हमनी से आँख चोरा लेत रहे। प्रेम के उफान जइसे थम जात रहे। हमनी के प्रेम जइसे डेरा जात रहे। हमनी के प्रेमी चोर बन जात रहे। दुख-सुख में साथ रहतो हमनी साथ ना लउकत रहीं। लोकलाज के चद्दर में लजाइल रहत रहीं। हमनी मर-मर जात रहीं, बाकिर ना केहू हमनी के मरल देख पावत रहे, ना कवनो धुआँ। तूं तरसत रहत रहलू। हमार पल भर के छुअन खातिर सुलगत रहलू। आ ऊ छुअन मिलते, प्यार भरल ओह पल भर के छुअन से तोहार दुनिया सँवर जात रहे। तूं कवनो फूल से अधिका गमक आ मध से अधिका मिठास से भर जात रहलू। खूबे खुश हो जात रहलू। तोहरा खुशी के एह गमक में नहा के हम निछावर हो जात रहनी।
एही मिठास में जिनिगी गुजार दिहले बानी। जान निछावर बा। पूस के घाम में तोहरा रूप पर हम निछावर रहबे करीं। बाकिर अचानक का भइल कि तूं बदले लगलू? जाने कइसे प्रेम के नदी के किनारा, बल खात लहर आ कूदत-उछलत मछरी लेखा हमरा से हेराए लगलू। लागे कि बन्द मुट्ठी के बालू लेखा हमरा हाथ से फिसलत जात बाड़ू। चइत के चानी लेखा सुख आ रातरानी से गमकत रात लेखा प्रेम के पाग अब हमनी का बीच से बिसरात जात बा। जिनिगी के जंगल से सट के बहत हमनी के प्रेम के निर्मल नदी हमनी के नसीब से छूटत जात रहे। शायद जिनिगी के सड़क पर प्रेम के ट्रैफिक हमनी सम्हार ना पवनी। आज ले ना जान पवनी। ऊ दिनो रहे जब हम तोहरा के सुन्नर कहत रहनी आ तूं मगरूर हो जात रहलू। तोहरा के जिनिगी आ जिनिगी के सबसे बड़ अरमान कहत रहनी त तूं अकड़ के चूर हो जात रहलू। तोहरा के चान कहीं त चानी बन जात रहलू। जान कहीं त मदहोश हो जात रहलू। जिनिगी कहीं त चमक के समसेर बन जात रहलू। तूं हमार नशा बन गइलू। नदी के कवनो धार लेखा, सागर में मिले वाली कवनो नदी लेखा, हमार जिनिगी में समाए लगलू—बलुक समाइए गइलू। फूल आ गमक लेखा हमनी एक हो गइल रहीं। लागल कि प्रेम करके हमनी जग जीत लिहले बानी जा।
फेर का रहे! जब कबो तूं झूमत-झामत आवत रहलू त लागे कि बरखा के पहिल बूँद आवत बिया। मस्त हवा आ फूल के गमक लेखा आवत रहलू आ कवनो अबोध लइका लेखा हमार गरदन में दुनु बाँहि डाल के झूम जात रहलू। मन में प्यार के मौसम मचल उठत रहे। सगरो दुख मर जात रहे आ मन में रातरानी खिल जात रहे। गहिर झील में कवनो हंसिनी लेखा अपना परछाईं में उतरत चल जात रहलू। गउरइया लेखा फुदकत आ अचानक सुन्दरता के इन्द्रधनुष रचत हमरा पर छा जात रहलू। प्रेम के परबत लेखा जीयत, देवदार लेखा माथ उठा के जीयत, अपना देह-सरोवर में हमरा के डुबावत आ प्रेम के चानी खिलावत तूं का से का हो जात रहलू—ई तूं का जनबू भला! जइसे कवनो मेहरारू धीमा आँच पर खाना पकावेले, ओइसहीं तूं चाहत रहलू कि हम तोहरा से प्रेम करीं। तोहरा साथे प्रेम के इहे ढंग हमरा पसन्द रहे। हमरा साथे तूं माथ उठा के प्रेम कइल सीखले रहलू—दासी लेखा ना। प्रेम में बराबरी बहुते जरूरी बा। मेहरारू के दासी बना के ना ओकरा से प्रेम हो सकेला, ना सफल सम्भोग। प्रेम आ सम्भोग के सुख खाली बराबरी में सम्भव होला। ई बात बहुते कम मरद जानेले। एकतरफा सम्भोगे के प्रेम मान लेबे के मूर्खता मरदन के आम आदत ह। मेहरारुवन के ई पसन्द ना आवे, बाकिर ऊ लोग कह ना पावे। तुहूँ लोकलाज में फँस के अपना पति से कबो ई बात ना कह पवलू, बाकिर हमरा से कहत रहलू। हमरा से ई सब कहे में तूं कवनो बन्धन में ना रहलू। “दासी ना, तूं हमार प्रेमिका हउ”—हमरा से ई बात सुन के तूं भाव-बिह्वल हो गइल रहलू। लागल कि तूं का पा लऽ आ हमरा के का दे दऽ! दिहलूओ—आपन अथाह प्रेम। निरन्तर आ अलौकिक प्रेम। तोहरा लगे हमरा खातिर अथाह प्रेम रहे आ ऊ प्रेम तूं हमरा के दिहलू। तूं नइखू जानत—आज भले ना मिलेलू, ना बतियावेलू, बाकिर तोहार ऊ अथाह आ निष्कपट प्रेम हमरे लगे बा। एही भाव आ बिसवास से हमनी प्रेम के बीया के बिरिछ बनवले रहीं।
हमार बराबरी से मिलल तोहरा भावत रहे।
हम मेहरारू के गुलाम ना मानेनी, ई बात तोहरा नीमन लागे। तूं कहत रहलू—“भले हम प्रेम-बिआह कइले बानी, बाकिर प्यार हमरा रउरे से मिलल बा। बिआह से सम्भोग के सुख मालूम भइल, प्रेम के सुख ना। बाद में सम्भोग के ई सुखो खाली पतिए के हिस्सा में रह गइल। पति के आदेश आ पति के इच्छे सम्भोग बन गइल। हमार जरूरत का बा, हमरो कवनो इच्छा बा—ई पति के आज ले मालूम नइखे। हम मेहरारू ना, सम्भोग के एगो साधन बानी। पति खातिर सम्भोग के खिलौना बानी—बस।” तोहार इहे यातना शायद तोहरा के खींच के हमरा लगे ले आइल। तूं प्रेम कइलू आ चल गइलू। जइसे प्रेम से तोहार पेट भर गइल। बाकिर अपना प्रेम में हमरा के कैद कर गइलू। एह प्रेम के कैद में गिरफ्तार हम, तोहरा प्रेम के कचहरी में तोहार पैरवी करत, वकील लेखा ना बलुक मुलजिम लेखा पेश बानी।
बिजली जाले, आ जाले। नेटवर्क जाला, आ जाला। तूं काहे ना आवेलू?
काश, बीमा कम्पनी स्वास्थ्य लेखा प्रेमो के बीमा करत रहितीं आ हम कैशलेस क्लेम लेके आपन हेराइल प्रेम पा जइतीं! कई बेर सोचत बानी कि कहीं अइसन त नइखे कि जवना के हमनी मोहब्बत कहेनी जा, ऊ खाली एगो जरूरत भर ह? जरूरत पूरा, मोहब्बत पूरा। एहसे सच-सच बतइहऽ प्रिये—हम जरूरत रहनी कि मोहब्बत? सच बतइबू त बुरा ना लागी। काहे कि जे मेहरारू प्रेम खातिर अपना पिता आ पिता के घर हमेशा खातिर छोड़ सकेले, ऊ अगर प्रेम में बिया त पति के घरो छोड़ सकेले। अतना साहस त करिए सकेले। कि सगरो साहस खालिए पिता खातिर रहे? त का ई सचहूँ मोहब्बत रहे? मोहब्बत रहे कि जरूरत? लोग जरूरत के नाम मोहब्बत काहे रखेला, कुछ बुझात नइखे। जरूरत पूरा, मोहब्बत पूरा। जिनिगी के ई अजीब सिलसिला बा। तोहरा इयादे होई कि प्रेम खातिर हमार चुनाव तुंही कइले रहलू। खोजो तुंही कइले रहलू। शायद सम्भोग के सवाद बदले खातिर। प्रेम के पियास मेटावे खातिर। जवनो होखे, तुंही जानऽ। हम त बस तोहरा प्रेम के नदी के धार में अनायास समा गइल रहनी। जइसे नदी कंकड़, पाथर, हीरा आ मोती—सबकुछ अपना साथे बहा ले जाले, ओइसहीं हमहूँ तोहरा प्रेम-नदी के धार में बहत रहनी। अब तोहरा नदी के कवनो लहर हमरा के कवनो किनारा पर छोड़ के आगे बढ़ गइल बिया त एहमें हमार का दोष? प्रेम-नदी के किनारे आजुओ बहे के आस में एगो प्रत्याशी लेखा उपस्थित बानी। मन-ही-मन बहत जात बानी।
तूं नइखू जानत त अब जान लऽ—प्रेम महतारी लेखा होला। महतारी के दुलार कबो पूरा ना होला। प्रेम केहू के होखे, प्रेम कबो पूरा ना होला। समय-समय पर तोहरा साथे मिलल ऊ पंछी, ऊ कोइल, ऊ बिरिछ, ऊ बनस्पति, किसिम-किसिम के ऊ फूल, तुलसी के ऊ चउरा, ऊ बरखा, ऊ पुरवइया, ऊ घाम, ऊ चानी, आम के ऊ मोजर, ऊ पल्लव, बरखा में भींजत अँगना के ऊ दशहरी आम के पेड़ आ हरियर घास पर बिखरल गुलमोहर के ऊ फूलो तोहरा के कबो ना भुलइहें। ऊ मछरियो तोहरा के ना भुलाई, जे हमनी के एक दोसरा के देखत देख के नदी में छपाक से कूदल रहे। ऊ कोहरा, ऊ ओस के बूँद—सबका इयाद में तूं ठहरल बाड़ू। एह सबके इयाद में तूं बनल रहबू। ऊ नदियो भला तोहरा के कहाँ भुलाई, जवना पर बनल पुल पर ठाढ़ होके हमनी पूरनमासी के चान देखत रहीं। पूरनमासी के चान में जइसे हम आ तूं हमेशा खातिर दर्ज बानी जा। खाली हमहीं ना, ई सगरो तोहरा से प्रेम करेला। आ प्रेम केहू के होखे, प्रेम कबो पूरा ना होला। कबो ना।
हमार परेशानी देख के लोग-बाग पूछत रहेला—“का भइल?” हम लोगन के बतावत रहेनी कि एगो मेहरारू रहे, जे हमरा के जवान बनवले रखत रहे। ऊ हमरा के छोड़ के चल गइल। लोग हमरा पर हँसत निकल जाला। तोहरा इयाद बा, तोहरा के पावे के हड़बड़ी में कई बेर कार के लाइट बन्द कइलो भुला जात रहनी। लवटत घरी बैटरी डाउन हो गइला से कार स्टार्ट ना होखे त तोहरा के अकेले लवटे के पड़त रहे। तूं झुँझुआत लवटत रहलू। प्यार के सगरो हरसिंगार झर के बिखर जात रहे।
ओइसहीं हमहूँ बिखर गइल बानी—तोहरा बिना। जिनिगी के बैटरी डाउन हो गइल बिया। प्रेम के मछरी तड़पत बिया—तोहरा प्यार के पानी बिना।
(दयानंद पांडेय के लिखल हिंदी कहानी के भोजपुरी अनुवाद)
अंजोरिया डाट काम से साभार