Sunday, 31 May 2020

जवाहरलाल नेहरू की दो गलतियों को नरेंद्र मोदी ने दुरुस्त तो कर दिया है




भले कुछ मुट्ठी भर लोग इस बात को स्वीकार करने में कमीनापन करें लेकिन यह तो सत्य और तथ्य है कि जवाहरलाल नेहरू ने देश के जिन दो बड़े मामले को ले कर देश को गंभीर संकट में डाला था नरेंद्र मोदी ने उन दोनों संकट से देश को निकाल लिया है। कश्मीर से 370 और 35 ए हटा कर एक कैंसर खत्म कर दिया। दूसरे चीन को पूरी तरह औक़ात में ला दिया है।

भारत जो चीन से 1962 में हार कर निरंतर घुटने टेके रहता था चीन के सामने , घुटने टेकना बंद कर उस की औक़ात बता दी है। गौरतलब है कि नेहरू , चीन से हार के सदमे ही में ज़िंदगी से कूच कर गए थे। अब उसी भारत ने चीन को दांव पार दांव दे कर उस का गुरुर चकनाचूर कर दिया है। चीनी सरहद से आने वाली तमाम खबरें इस बात की पुष्टि करती हैं। न सिर्फ इतना कूटनीतिक और व्यापारिक स्तर पर भी भारत ने चीन को चीनी-चीनी कर दिया है , निरंतर। और साफ़ बता दिया है कि बतर्ज नेहरू हिंदी-चीनी भाई-भाई नहीं हैं। इन दिनों चीन से निकलते अरबों रुपए का इनवेस्टमेंट , भारत जाते देख , चीन ने अपने बाहुबली होने का प्रदर्शन करते हुए सरहद पर तनाव बढ़ाने का कुचक्र रचा।

भारत में उपस्थित कम्युनिस्टों के मार्फत देश भर के मज़दूरों को भड़काने का काम किया और गांव-गांव कोरोना गिफ्ट करवा दिया। मज़दूरों के मार्फत बग़ावत और जनविद्रोह का कुचक्र रच कर गृहयुद्ध के हालात निर्मित किए। फिर मज़दूरों का पलायन और उन की भूख को मोदी सरकार ने भी ठीक से हैंडिल नहीं किया। यह बहुत बड़ा पाप और अपराध किया है मोदी सरकार ने। निश्चित रूप से मोदी सरकार मज़दूरों के मोर्चे पर पूरी तरह ध्वस्त रही है , जिस की कीमत वह देर-सवेर भुगतेगी भी। जैसे मुफ्तखोरी का फ़ास्ट फ़ूड खिला कर चुनाव जीतने वाली अरविंद केजरीवाल सरकार आज भुगत रही है।

इतना कि चीख़-चीख़ कर कह रही है कि कर्मचारियों को वेतन देने के लिए पैसा नहीं रह गया है। कोरोना काल में भी रोज करोड़ों का विज्ञापन देने वाली दिल्ली की केजरीवाल सरकार के अभी और दुर्दिन आने वाले हैं। जिन लोगों ने मुफ्त बिजली , पानी और बस के चक्कर में वोट दिया है , उन से जब यह मुफ्तखोरी छिनेगी तो यह लोग क्या करेंगे , सब लोग जानते हैं। तब्लीगियों और शाहीनबाग का पाप भी अभी केजरीवाल सरकार के सिर फूट ही रहा है। खैर , बात मोदी सरकार द्वारा चीन को औक़ात में लाने की हो रही थी।

तो इस कोरोना काल में मज़दूरों के पलायन और उन की भूख को न संभाल पाने वाली मोदी सरकार ने नेहरू के ज़माने का हिंदी-चीनी भाई-भाई का मुग़ालता और कश्मीर का कैंसर समाप्त कर दिया है। यह बात तो स्वीकार करनी ही होगी। अभी ऐसे ही कुछ मुग़ालते तथा कैंसर , मोदी सरकार को और खत्म करने हैं। समय रहते देश में उपस्थित चीन के कमीने पैरोकारों को दुरुस्त करना भी एक ज़रूरी काम है। ये पैरोकार भी वैसे ही हैं जैसे देश में उपस्थित पाकिस्तान के पैरोकार। रहते हैं भारत में ,खाते हैं भारत का पर गाते पाकिस्तान का हैं। ठीक वैसे ही यह कमीने भी रहते भारत में हैं , खाते भारत का हैं पर गाते चीन का हैं।

Thursday, 28 May 2020

चीन , लतीफा गांधी और उन के तख्तनशीन होने का इल्हाम



चीन मसले पर नरेंद्र मोदी का कोई बयान अभी तक तो नहीं आया है। लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना बन कर कूद गए हैं। दो बिल्लियों के बीच बंदर होने की उन की अदा है कि जाती ही नहीं। पाकिस्तान मसले पर भी उन की यह अदा हम देख चुके हैं। बहरहाल भारत ने इस पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। पता नहीं क्यों ?

हां , नेपाल की कम्युनिस्ट सरकार ने थूक कर चाट लिया है। पर इस सब मुझे कुछ लेना-देना नहीं। मुझे तो इंतज़ार है कि अपने लतीफा गांधी कब किसी जवाब का सवाल पूछते हुए कूदते हैं। लगता है कामरेड लोगों ने कोई स्क्रिप्ट अभी उन्हें मुहैया नहीं करवाई है। या फिर मज़दूरों से मिलने और फिर प्रेस कांफ्रेंस की थकान मिटा रहे हैं वह। दिक्क्त यह भी है कि लॉक डाऊन के चलते थाईलैंड वगैरह की व्यक्तिगत मसाज यात्रा भी नहीं कर पा रहे वह ताकि फ्रेश हो सकें। फिर भी मुझे इंतज़ार है। भले वह चीन के राजदूत के साथ एक ताज़ा फोटो सेशन ही परोस दें।

अब यह अलग बात है कि चीन अपने कमीनेपन में अभी कामयाब होने के बजाय अपनी गीदड़ भभकी में मात खा गया है तात्कालिक रूप से। तो क्या लतीफा गांधी और उन की टीम , , चीन भारत के ताज़ा हालात में भारत पक्ष में कोई छिद्र आदि तलाश रहे हैं इस लिए खामोश हैं ? फिर भी बोलना तो है है देर-सवेर। देखिए और कि देखना दिलचस्प ही होगा कि किस जवाब का वह सवाल पूछते हैं। बल्कि किस-किस जवाब का कौन-कौन सा सवाल।

आखिर उन के सिपहसालारों को उन को यह एहसास भी दिलाते रहना है कि हुजूर अभी भी आप ही इस देश के असली हुक्मरान हैं। शायद उन को खुद भी इस बात का निरंतर इल्हाम होता ही रहता है कि शासक तो वह ही हैं। शासन और शासक होने की खुमारी है कि जाती है नहीं इस परिवार और इस के सिपहसालारों के दिल से।

होता है अकसर होता है। हनारे लखनऊ के तमाम पंचर जोड़ने वाले लोग भी अभी तक अपने को नवाब से नीचे नहीं मानते। तमाम मैकेनिक भी अपने को मुगलिया सल्तनत का खून बताते नहीं थकते। तिस पर राहत इंदौरी जैसे शायर ऐसे-वैसे शेर कह कर कि :

कब्रों की ज़मीनें दे कर हम मत बहलाइए
राजधानी दी थी , राजधानी चाहिए ।

इन का मन और बढ़ा देते हैं। तो मुगलिया सल्तनत दफ़न हुए ज़माना बीत गए फिर भी यह कनवर्टेड लोग अपने को सुलतान ही मानते हैं। बाबर , औरंगज़ेब भी वही हैं , शाहजहां और अकबर आदि-इत्यादि भी। फिर अपने लतीफा गांधी को तो अभी जुम्मा-जुम्मा आठ दिन भी नहीं हुए। सो तख्तनशीन वह अब भी अपने ही को मानते हैं। मानते रहेंगे। भारत को अपनी जागीर मान कर ही वह जब भी कुछ बोलते हैं तो बोलते हैं। तो इंतज़ार है हुजूर लतीफा गांधी द्वारा हर जवाब का सवाल पूछने की सनक का। चीन के तअल्लुक़ से।


आप को नहीं है क्या ?

तो इस विकल , विरल समय और संयोग को प्रणाम कीजिए कि नरेंद्र मोदी जैसा डिप्लोमेट प्रधान मंत्री है



आप मत मानिए लेकिन मेरा स्पष्ट मानना है कि तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो चुका है। चीन ने बिस्मिल्ला कर दिया है। कोरोना इस तीसरे विश्वयुद्ध की पूर्व पीठिका है। भारत में पहले तबलीगियों और मज़दूरों के मार्फत अस्थिरता का माहौल बनाने में वह पूरी तरह कामयाब रहा है। भाजपाई पाकिस्तान , मुसलमान करते रह गए। लेकिन कम्युनिस्टों के मार्फत चीन ने यह अस्थिरता बिलकुल ब्रिटिशर्स की तरह बड़ी संजीदगी से की है। बिना किसी शोर शराबे के। नेपाल को वह टूल बना ही चुका है जिस का ऐलान भारत के कम्युनिस्ट बड़ी शान से कर भी रहे हैं। कांग्रेस इस पूरे दृश्य में अब कठपुतली सरीखी है। ट्रेन-ट्रेन , बस-बस खेलने लायक। हमारे मज़दूर , तुम्हारे मज़दूर का लूडो खेलने लायक। मुख्य मीडिया में खबरें खामोश हैं लेकिन चीनी सीमा पर फ़ौज दोनों तरफ से मुस्तैद हो रही हैं। लेकिन युद्ध सिर्फ फ़ौज के बूते तो नहीं जीते जाते। हवा , पानी , केमिकल , जैविक , आदि-इत्यादि तमाम फैक्टर आ चुके हैं। परमाणु वगैरह का बाहुबल अलग है।

लेकिन जनता भी लड़ती है। जनता को साथ लिए बिना कोई सरकार , कोई देश , कोई फ़ौज कोई युद्ध नहीं जीत सकती। आप सीमा पर युद्ध भी लड़ें और भीतर गृह युद्ध भी फेस करें। तो कोई भी युद्ध हो , आप को हारना ही हारना है। और इस समय जनता भारत में बेतरह बंटी हुई है। हिंदू , मुसलमान तो बड़ा पेंच है ही। मुसलमान और कम्युनिस्ट तो खुल्ल्मखुल्ला मोदी विरोध और नफ़रत की बिना पर देश को अपना दुश्मन मान बैठे हैं। उन को लगता है , देश को मार कर ही मोदी से मुक्ति पा सकते हैं। सेना को वह बलात्कारी बताते ही हैं। भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्ला , इंशा अल्ला ! नारा लगाते ही हैं। और अब तो मज़दूर और किसान भी कोरोना के नाम पर कई-कई टुकड़ों में हो चुके हैं। उन्हें अब देश नहीं , भूख और असुरक्षा दिख रही है। मज़दूरों के सवाल पर प्रदेश सरकारें भी आपस में गुत्थमगुत्था हैं। देश की इतनी भयानक दशा तो विभाजन के समय में भी नहीं देखी गई थी।
अमरीका और चीन आमने-सामने हैं। मूल में कोरोना ही है लेकिन लक्ष्य पर व्यवसाय है। दोनों ही व्यवसायी हैं। लेकिन अमरीका के साथ यह है कि वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है लेकिन अपने नागरिकों और सैनिकों की मौत नहीं। किसी कीमत नहीं। अमरीका लगभग मान बैठा है कि कोरोना , चीन ने अमरीका को तबाह करने के लिए ही तैयार किया है। बाकी दुनिया तो गेहूं में घुन की तरह पिस रही है। सो अमरीका , चीन को जैसे भी हो सबक सिखाने पर आमादा है। सबक सिखाने के लिए वह चीन से सीधे लड़ने के बजाय भारत के कंधे पर बंदूक रख कर लड़ने की मनोवैज्ञानिक कसरत पर अभी लगा हुआ है। लेकिन ट्रंप के शब्दों में हो जो कहें तो नरेंद्र मोदी जैसे टफ़ निगोशिएटर से उस का पाला पड़ा है। आप ध्यान दीजिए कि तमाम मुश्किलों और तबाही के बावजूद मोदी ने भूल कर भी चीन के खिलाफ एक भी लफ्ज नहीं कहा है। मोदी अमरीका के साथ भी हैं और चीन के साथ दुश्मन हो कर भी दुश्मन नहीं बन रहे।

क्यों कि अगर खुल्ल्मखुल्ला युद्ध की बिसात बिछ ही गई तो पाकिस्तान खुल्ल्मखुल्ला पहले ही से चीन की जेब में है। बल्कि पाकिस्तान की हैसियत चीन की रखैल सरीखी हो चली है। नेपाल ब्लैकमेलर की स्थिति में है। चीन और भारत दोनों को दूहता रहता है। राजीव गांधी के एक गलत फैसले के कारण चीन की तरफ उस का झुकाव भी जगजाहिर है। कम्युनिस्टों की नेपाल में उपस्थिति भारत की सामरिक स्थिति को और कमजोर करती है। नेपाल को भारत से स्वाभाविक सहयोग न लेना हो तो वह भारत से बात भी नहीं करे। लेकिन भारत से नेपाल का गर्भनाल का संबंध है भौगोलिक स्थितियां भी भारत के पक्ष में हैं। तो भी अगर नेपाल भारत से गद्दारी पर आमादा ही है तो तिब्बत का हश्र भी उसे नहीं दीखता। भूटान भी एक कमज़ोर कड़ी है भारत के लिए। इफ़-बट में जीने वाले भूटान की शह के बिना तो डोकलाम होता नहीं। आए दिन , कुछ न कुछ होता ही रहता है। फिर छोड़िए नेपाल , भूटान।
आप की दिल्ली में ही जब गद्दार बैठे पड़े हैं और खुल्ल्मखुल्ला विज्ञापन दे कर दिल्ली की प्रदेश सरकार सिक्किम को भारत से बाहर बता देती है तो कुछ कर लेंगे आप ? कायदे से इतने पर तो दिल्ली की प्रदेश सरकार बर्खास्त कर दी जानी चाहिए थी। लेकिन दिल्ली सरकार के खिलाफ कोई कुछ बोला क्या ? अच्छा दिल्ली सरकार ने भी संबंधित कर्मचारी को जेल भेजा क्या ? सिर्फ निलंबन ही इस की सज़ा होती है क्या ? नहीं जानते तो जान लीजिए कि कानून की राय में निलंबन कोई सजा नहीं होती। तो मुश्किलें एक नहीं , अनेक हैं। दुनिया कोरोना की गोद में ही नहीं , सचमुच विश्व युद्ध के मुहाने पर बैठी है। यक़ीन मानिए कि भारत देश में अगर इस समय लालबहादुर शास्त्री जैसा कोई ईमानदार लेकिन कमज़ोर दिल वाला , अनुभवहीन और नान डिप्लोमेट प्राइम मिनिस्टर होता तो अमरीका अब तक भारत के कंधे पर अपनी बंदूक़ रख कर चीन की तरफ चला चुका होता। और भारत तीसरे विश्व युद्ध का कुरुक्षेत्र बन चुका होता। कहिए कि देश का सौभाग्य है मोदी जैसा कठोर हृदय वाला , एक परम घाघ किस्म का प्राइम मिनिस्टर है जो न सिर्फ बतर्ज ट्रंप , टफ़ निगोशिएटर है बल्कि सामरिक और आर्थिक रूप से दोनों से ही कमज़ोर होने के बावजूद एक ही तराजू पर ट्रंप और शी जिनपिंग को बड़ी शालीनता से नाप-तौल रहा है। और यह बात ट्रंप और शी जिनपिंग दोनों ही को मालूम है। पर डिप्लोमेसी के तराजू पर दोनों को नाप-तौल कर , इस तरह सीधे-सीध तीसरे विश्व युद्ध में भारत को औजार और ज़मीन बनने से बचाए हुए है। भारत का कंधा अमरीकी बंदूक चलाने के लिए नहीं पेश कर रहा है। तो दूसरी तरफ देश में कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज के औरंगजेबी गठबंधन को तार-तार करता हुआ देश को गृह युद्ध में झोंकने की साज़िश से भी बचाए हुए है।

मोदी की डिप्लोमेसी को आप चाहे जैसे देखें , आप का अपना विवेक है। पर हम तो ऐसे ही देखते हैं जैसे किसी ऊंची पर्वतमाला पर तन कर खड़ा हुआ देवदार वृक्ष। देवदार वृक्ष की तरह पर्वत पर तन कर खड़ा रहना नहीं जानते नरेंद्र मोदी और उन की डिप्लोमेसी तो कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज के नापाक औरंगजेबी गठबंधन की साज़िशों से भले वह बारंबार बच कर निकल आते पर अमरीका और चीन जैसी महाशक्तियों के हाथ अब तक साफ़ ज़रूर हो गए होते। तो इस विकल , विरल समय और संयोग को एक साथ प्रणाम कीजिए कि गृह युद्ध और विश्व युद्ध की दुरभि संधियों की पर्वतमाला में देवदार की तरह तन कर खड़े भारत को नरेंद्र मोदी जैसा प्रधान मंत्री बना कर उपस्थित किया है। जिसे डिप्लोमेसी का न सिर्फ डंक मारना आता है बल्कि बड़े-बड़ों को नाथ कर उन को अपनी लगाम में बांधना भी आता है। उन का जहर उतारना भी आता है। कालिया नाग को जिस तरह श्रीकृष्ण ने अपने बाल्य-काल में भी काबू किया था और उस का जहर उतारा था। ठीक उसी तरह। सिर्फ देश के मज़दूर और लोग ही नहीं , देश भी सचमुच बहुत कठिन दौर में है। कोरोना से भी बड़ी कठिनाइयों में घिरा हुआ है देश। इस बात को भी समझने की बहुत ज़रूरत है। इस कठिन दौर से निकलने में समूचे देश को साथ एकजुट हो कर चलना होगा। लेकिन लोग इस बात को समझना कहां चाहते हैं भला। अभी कुछ छिटपुट गिरफ्तारियां इस कोरोना काल में भी शुरू हुई हैं। तो अनायास नहीं समझिए इसे। समझिए कि किसी तैयारी को तार-तार करने के लिए हुई हैं। अभी और हो सकती हैं।


Thursday, 21 May 2020

बेटी की कामयाबी के लिए इतना दीवाना पिता मैं ने दूसरा नहीं देखा



प्रमथ नाथ अवस्थी यानी डाक्टर पी एन अवस्थी नहीं रहे। अभी-अभी यह खबर मिली तो सन्न रह गया। गोरखपुर में पढ़ता था , तब ही से वह मुझे बहुत-बहुत प्यार करते थे। पहले-पहल उन से बतौर डाक्टर ही मिलना हुआ था। पेट में दर्द था , दिखाने गया था। तब वह गोरखपुर सदर अस्पताल के सुपरिटेंडेंट थे। आते-जाते कब उन्हों ने अपना बेटा बना लिया , दोस्त बना लिया , पता ही नहीं चला। फिर तो बिना दर्द के भी अकसर उन से मिलना होता था। तब पत्रकार भी नहीं था। टीन-एज था। कविताएं लिखता था। पर यह बात भी मैं खुद ही जानता था। कोई और नहीं। जल्दी ही जब आकाशवाणी पर कविता पाठ करने लगा , अखबारों , पत्रिकाओं में छपने लगा तब लोगों ने जाना। लेकिन डाक्टर साहब ने इस से भी पहले। बाद के समय दिल्ली चला गया। दिल्ली जनसत्ता से जब लखनऊ स्वतंत्र भारत में रिपोर्टर हो कर आया तो पाया कि डाक्टर साहब , गोरखपुर से तबादला पा कर , लखनऊ के प्रतिष्ठित बलरामपुर अस्पताल में सीनियर सुपरिटेंडेंट थे। अकसर भेंट होने लगी।

उन की बेटी मालिनी अवस्थी गोरखपुर में भी गाती थीं , गोरखपुर में भी उन्हें गाते हुए सुनता था। तब मल्लिका और मालिनी दोनों बहने साथ-साथ गाती थीं। पर लखनऊ में उन दिनों मालिनी  भातखण्डे में गायन की विधिवत शिक्षा ले रही थीं। डाक्टर साहब तब बलरामपुर अस्पताल के कैम्पस में ही रहते थे। डाक्टर साहब के कहने पर मालिनी अवस्थी के जीवन का पहला इंटरव्यू मैं ने ही लिया था। तब के स्वतंत्र भारत अखबार में पूरे एक पेज पर मालिनी की बड़ी सी फोटो के साथ वह इंटरव्यू छपा था। मालिनी दिन-ब-दिन मेहनत करती हुई आगे बढ़ती गईं। मालिनी की मां उन के साथ निरंतर लगी रहतीं। कई बार लगता कि मालिनी से ज़्यादा मेहनत तो उन की मां निर्मला आंटी कर रही हैं। लेकिन मैं देख रहा था कि मालिनी को गढ़ने में डाक्टर साहब पिता की ही भूमिका में नहीं एक कुम्हार की भूमिका में भी चुपचाप लगे रहे थे। मालिनी गायकी में कैसे नए-नए मुकाम पर पहुंचें , डाक्टर साहब इसी उधेड़बुन में रहते कि कैसे तो वह मालिनी को गायिकी में एकदम पहले पायदान पर पहुंचा दें। मालिनी के लिए नए-नए अवसर वह खोजते-फिरते थे। उन की यह तड़प जी टी वी के जूनून कार्यक्रम में खुल कर सामने आ गई।

जुनून में भीतर शिरकत कर रही थीं मालिनी पर बाहर डाक्टर साहब का जूनून मैं देख रहा था। एक बेटी की कामयाबी के लिए एक पिता का ज़ज़्बा और जूनून तो हर किसी पिता में होता है। लेकिन डाक्टर साहब में इस से भी बहुत ज़्यादा मैं देख रहा था। वह लगभग पागलों की तरह हर किसी से मिलते ही मालिनी को वोट देने के लिए इसरार करते। बड़े उत्साह से हर किसी से बेटी की कामयाबी का राग गाते। बेटी की कामयाबी के लिए इतना दीवाना पिता मैं ने दूसरा नहीं देखा। हालां कि तब तक मालिनी का विवाह अवनीश जी से हो चुका था। और अब अवनीश , मालिनी के नए कुम्हार थे। डाकटर साहब जैसे मालिनी को गायिकी के पहले पायदान पर देखना चाहते थे , अवनीश भी मालिनी को गायिकी के सर्वोच्च मुकाम पर देखने के लिए सर्वदा बेताब दिखे। गायन के लिए अवसर और आज़ादी , अवनीश अवस्थी ने , डाक्टर साहब से भी ज़्यादा , बहुत-बहुत ज़्यादा दिए। मालिनी जैसी भाग्यशाली स्त्रियां बहुत कम होती हैं जिन्हें एक ही जीवन में एक साथ ऐसा जुनून वाला पिता और पति दोनों मिलता है। आज मालिनी दुनिया भर में अपनी गायिकी का जो धनका बजा रही हैं , उस में निश्चित रूप से मालिनी की प्रतिभा , मेहनत और किस्मत है। लेकिन पिता प्रमथ नाथ अवस्थी की बेटी को सर्वोच्च पायदान पर देखने की लगन और परिश्रम भी बहुत है। बल्कि मां निर्मला जी और पिता प्रमथ नाथ अवस्थी दोनों ही की।

बीते नवंबर में जब मालिनी की बेटी की शादी थी तो अवनीश जी ने मुदित होते हुए पूछा , इंतजाम कैसा लगा ? मैं ने छूटते ही कहा , बहुत बढ़िया ! फिर जब उन्हें बताया कि मैं तो आप की शादी में भी उपस्थित था। आप की शादी में भी इंतजाम बढ़िया था। और देखिए कि आप की बेटी की शादी में भी उपस्थित हूं। इस में इंतजाम और बढ़िया है। एक डाक्टर , एक आई ए एस के इंतजाम में जो फर्क होना था , वह तो था ही। लेकिन एक बात दोनों में जो एक थी , समान थी , वह थी दोनों का जनक भाव। डाक्टर साहब भी जनक भाव में मुदित थे और अवनीश जी भी। दोनों ही बेटी के हाथ पीले कर भावुक और सुखी थे। यह डाक्टर साहब का आशीर्वाद ही था।

और डाक्टर साहब एक मालिनी ही के लिए क्यों , हर किसी आगे बढ़ने वाले के साथ सर्वदा खड़े मिलते थे। डाक्टर साहब मेरे लिए भी हमेश प्रेरक बन कर ही हमारे जीवन में उपस्थित थे। डाकटर साहब बहुत खुली तबीयत के आदमी थे। एकदम सदाबहार। बिलकुल अशोक कुमार की तरह। आंटी के जाने के बाद वह थोड़े बुझे-बुझे से रहते थे। पर मालिनी के लखनऊ में आयोजित हर कार्यक्रम में वह पूरे उत्साह के साथ उपस्थित रहते। उम्र के चलते तबीयत कितनी भी ढीली हो , डाक्टर साहब मालिनी का गायन सुनने के लिए सर्वदा उपस्थित मिलते। अपनी पूरी ठसक के साथ। पूरी रौनक के साथ। बेटी को आशीर्वाद देने के लिए वह समय से पहले ही कार्यक्रम में आ कर पहली पंक्ति में बैठ जाते थे। रहते तो अवनीश भी हैं मालिनी के कार्यक्रम में। लेकिन कई बार वह चुपचाप धीरे से पीछे जा कर बैठ जाते हैं। ताकि लोगों का और मालिनी का भी ध्यान उन पर नहीं , मालिनी की गायिकी पर टिका रहे। फिर जब एक गायिका को गढ़ने वाले दोनों कुम्हार कार्यक्रम में उपस्थित हों तो मालिनी का कार्यक्रम अपने आप ऊंचाई पा जाता था। लखनऊ के अब आगे के कार्यक्रमों में मालिनी को अपने एक कुम्हार की अनुपस्थिति सर्वदा खलेगी। अपने जनक को वह कैसे भूल पाएंगी , यह सोच कर मैं उदास हूं। क्यों कि डाक्टर साहब की अनुपस्थिति तो मुझे भी खलेगी। अब कौन देखते ही लपक कर कहेगा , आओ पांडेय , कैसे हो ? कह कर गले लगा लेगा।

जब वह अचानक बीते दिनों घर में ही गिर गए थे तो ठीक होने के बाद मालिनी के एक कार्यक्रम में मिले। थोड़े थके-थके दिखे तो मैं ने पास जा कर नमस्ते किया। पूछा , डाक्टर साहब पहचान तो रहे हैं न ! लपक कर गले लगाते हुए बोले , क्या बात करते हो , तुम को नहीं पहचानूंगा ? तुम्हें तो एक हो , उन पुराने लोगों में जो मिलते रहते हो। असल में गोरखपुर भले बरसों पहले उन्हों ने छोड़ दिया था पर मुझे बराबर लगता था कि जैसे गोरखपुर सर्वदा उन में गश्त करता रहता था। गोरखपुर उन के भीतर से कभी गया ही नहीं। हालां कि याद वह गोरखपुर से पहले मिर्जापुर को भी करते रहते थे। जहां वह अपनी बड़ी बेटी मल्लिका को संगीत की शिक्षा दिलवा रहे थे। उस्ताद आते थे मल्लिका को सिखाने। लेकिन मालिनी भी आ कर बैठ जाती थीं कि मैं भी सीखूंगी। डाक्टर साहब कहते कि बहुत हटाते थे शालू को कि हटो , दीदी को सीखने दो। पर शालू मानती ही नहीं थी। शालू , मालिनी के घर का नाम है। मेरी बेटी की शादी में डाक्टर साहब , मालिनी को ले कर आए थे। बेटे पुष्कर अवस्थी भी थे। मैं ने पूछा , स्वास्थ्य कैसा है ? तो सुनते ही पुलक गए। कहने लगे , तुम से अच्छा है और गले लगा लिया। क्या कहूं , जिस प्यार से आप जब-तब गले लगा लेते थे , सर्वदा आशीष देते रहते थे। पिता की उम्र के थे पर दोस्ती में हाथ भी मिलाते और पीठ पर धौल जमा कर आशीष भी देते। अब कौन वह आशीष देगा। लॉक डाऊन है और मैं नोएडा में हूं। आप को अंतिम प्रणाम करने से वंचित हूं डाक्टर साहब। हर बार की तरह क्षमा कीजिएगा। आप से बहुत सी कहानियां सुननी थीं। कुछ आप ने सुनाई थीं , कुछ रह गई थीं। मेरा आलस था। आप तो सर्वदा बुलाते ही रहते थे। आप चाहते थे कि उन्हें विस्तार से लिखूं। अब विस्तार कहां से लाऊंगा भला ? उन राजनीतिज्ञों , अफसरों और डाक्टरों के किस्से। जो एक से एक रहस्य और विवाद लिए हुए थे।


हुआ यह कि एक बार गोरखपुर में कुछ पाखंडियों ने गोरखपुर के टाऊनहाल में एक भूमि-समाधि का कार्यक्रम आयोजित किया। कोई एक खड़ेश्वरी बाबा नाम का आदमी खड़ा किया। कहा कि यह चौबीस घंटे की खड़े-खड़े भूमि-समाधि लेंगे। समाधि के नाम पर भव्य आयोजन किया। खूब चंदा , खूब प्रचार , खूब तामझाम । तमाम प्रशासनिक अधिकारियों का जमावड़ा हुआ। सब पूजारत थे। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री लोकपति त्रिपाठी भी आए उसे समाधि दिलाने के लिए। और तो किसी से नहीं देखा मैं ने पर पाया कि स्वास्थ्य मंत्री लोकपति त्रिपाठी से डाक्टर साहब सार्वजनिक रूप से भिड़ गए। साफ़ बता दिया कि यह सब रोकिए। यह आदमी कोई तपस्वी वगैरह नहीं है। है तो भी चौबीस घंटे भूमि-समाधि लेने के बाद जीवित बाहर नहीं आएगा। यह इस आदमी की हत्या का आयोजन है। रोकिए इसे। लेकिन जनता का इतना जमावड़ा था , इतना हल्ला था खड़ेश्वरी बाबा की भूमि-समाधि का कि लोकपति त्रिपाठी क्या , किसी ने भी डाक्टर साहब की बात नहीं सुनी। प्रेस , प्रशासन हर कोई खड़ेश्वरी बाबा के गुणगान में आतुर था। पर चौबीस घंटे बाद खड़ेश्वरी बाबा नहीं निकले समाधि से। समय और बढ़ा दिया गया। तीन दिन बाद निकला खड़ेश्वरी बाबा का क्षत-विक्षत शव। दुकान तब तक उजड़ चुकी थी। आयोजक चंदा बटोर कर चंपत हो चुके थे। पता चला कि खड़ेश्वरी बाबा कोई नहीं था। कोई गूंगा , गरीब आदमी था , जिसे आयोजकों ने पैसा कमाने के लिए खड़ा कर दिया था। डाक्टर साहब यह सब लेकिन बेधड़क कह रहे थे। स्वास्थ्य मंत्री के सामने कोई सरकारी डाक्टर इस तरह बेधड़क अपनी बात सार्वजनिक रूप से कहे , न यह तब आसान था , न अब। लेकिन डाक्टर साहब तो ऐसे बेधड़क , बेतकल्लुफ और दिल के साफ़ थे। कभी भी , कहीं भी , साफ़-साफ़ कुछ भी कह सकते थे। इस लिए ताज्जुब नहीं था मेरे लिए कि कुछ लोग डाक्टर साहब के निंदक भी थे। परम निंदक। फिर ऐसे आदमी के निंदक न हों , यह तो हो भी नहीं सकता था। हर किसी के निंदक होते ही हैं। लेकिन डाक्टर साहब ने कभी इस सब की परवाह नहीं की। डाक्टर साहब की एक बड़ी बात जो मैं याद कर पाता हूं , वह यह कि स्त्रियों की आज़ादी के वह प्रबल पक्षधर थे। कन्नौज के ब्राह्मण थे। पक्के कन्नौजी भी। वह पर कन्नौज के बंद दायरे में कभी नहीं रहे। कन्नौजी उन की मातृभाषा पर देखिए कि उन की बिटिया मालिनी भोजपुरी और अवधी गाने वाली लोक गायिका।

मालिनी कभी झूम कर ग़ज़ल गाती थीं। पटियाला घराने के राहत अली से उन्हों ने ग़ज़ल गायिकी सीखी थी। जगजीत सिंह उन के आदर्श थे। भातखण्डे में शास्त्रीय गायन सीखा। बाद में मालिनी ने गिरिजा देवी से भी शास्त्रीय गायन सीखा। गिरिजा देवी की ही प्रेरणा से वह लोक गायन में आईं। और देखिए कि गाती ही जा रही हैं। बहती नदी की तरह। बहती ही जा रही हैं। मालिनी को यह बहती नदी , डाक्टर साहब ने ही बनाया है। मालिनी की गायिकी की गमक में , उन के आरोह , अवरोह , लोच और मुरकी में डाक्टर साहब का पसीना भी है। उन का शुभाशीष भी है। यह डाक्टर साहब ही थे जिन्हों ने , मालिनी को क्या किसी भी को कुएं में बंद होने की तजवीज नहीं दी। वहु खुद भी बहती हवा थे , बहती नदी थे। डाक्टर तो वह थे ही , सेवा भाव भी बहुत था उन में। निर्मला आंटी जब कैंसर से जूझ रही थीं , डाक्टर साहब को उन की अनथक सेवा करते भी देखा है। बहुत कम पतियों को , पत्नी की ऐसी समर्पित सेवा करते देखा है। डाक्टर साहब के पास कहने बताने के लिए बहुत सी बातें थीं। वह बतियाते थे तो रुकते नहीं थे जल्दी। मेरे पास भी डाक्टर साहब की बहुत सी बातें हैं कहने के लिए। 45 -46  बरसों का आत्मीय सिलसिला है। दोस्ती है। नाता है। एक भाग्यशाली पिता और एक भाग्यशाली पुत्री की अनकही दास्तान के अनेक सिलसिले हैं। पर क्या कहें साक़िब लखनवी का वह एक शेर है न :

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था
हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते। 

प्रमथ का एक पौराणिक अर्थ शिव भी होता है। तो डाक्टर साहब में शिवत्व भी बहुत था। भगवान उन की आत्मा को शांति दें। बाकी वह गीता का एक अमर श्लोक है है। उन के चरणों में वही समर्पित है। डाक्टर साहब बहुत-बहुत प्रणाम ! 

  नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः  ।

      न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः । ।


[ यह आत्मा न तो कभी किसी शस्त्र द्वारा खण्ड-खण्ड किया जा सकता है, न अग्नि द्वारा 
जलाया जा सकता है, न जल द्वारा भिगोया या वायु द्वारा सुखाया जा सकता है  । ]






Wednesday, 20 May 2020

अब मज़दूरों की घर वापसी जन-विद्रोह में तब्दील है , इन की व्यवस्था सेना के सिपुर्द हो


सी ए ए को ले कर मुस्लिम समाज को भड़काने और कोरोना को ले कर मज़दूरों को भड़काने में जो योगदान कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों ने दिया है , इतिहास और समय ने इसे दर्ज कर लिया है। सरकार से अपनी नफरत में , सरकार को निपटाने के लिए यह चालबाजियां , यह अफवाहें देश को जिस बर्बादी और तबाही के समंदर में डुबो चुकी हैं , वह लाजवाब हैं। मोदी सरकार की अक्षमता और लापरवाह रवैया भी इस में बहुत बड़ा कारक है। लेकिन कोरोना जो अब गांव-गांव पहुंच कर ज्वालामुखी के जिस ढेर पर देश को बिठा चुका है , मोदी सरकार के संभालने का वश का नहीं है। नरेंद्र मोदी बस चुनावी राजनीति , कूटनीति में ही सफल हैं। कुशल इवेंट मैनेजर ही साबित हुए हैं। सी ए ए पर जिस तरह लगाम उन के हाथ से छूटी , देश भर में मिनी दंगे हुए , मोदी की अक्षमता बारंबार साबित हुई। लेकिन कोरोना को संभालने में मोदी की विफलता ने देश को जिस संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है , वह देश को आत्महत्या की राह पर ले जा चुके है।  

कोरोना के मद्देनज़र एक भी बार मोदी ने सर्वदलीय बैठक कर विपक्षी दलों का ईगो मसाज कर उन्हें साथ लेने की कोशिश क्यों नहीं की , समझ से परे है। सिर्फ मुख्यमंत्रियों के साथ प्रशासनिक बैठक करना समाज को साथ ले कर चलना नहीं होता। कोरोना को काबू करने के लिए जिस सख्ती की दरकार थी मोदी ने वह सख्ती क्यों नहीं किया , यह भी समझ से परे है। असल दिक्क्त यह हुई कि मोदी ने कोरोना को भी गुजरात का भूकंप समझ लिया। भूकंप के बाद का निर्माण समझ लिया। गुजरात का दंगा समझ लिया। कांग्रेस को भी सिर्फ राहुल गांधी समझ लिया। भूल गए कि नहीं-नहीं करते हुए भी पाकिस्तान बनवाने का रिकार्ड है कांग्रेस का। भूल गए कि कम्युनिस्ट पार्टियों में पाकिस्तान बनवाने वाले मुस्लिम लोग के ही लोग ज़्यादा हैं। दो कदम आगे , चार कदम पीछे चलने वाले लोग हैं। जैसे सी ए ए में शाहीन बाग़ को मोदी सरकार ने अंडर इस्टीमेट किया और देश को दंगों के चौराहे पर खड़ा कर दिया। ठीक वैसे ही तबलीगी जमात को अंदर इस्टीमेट किया। और मज़दूरों को भड़काने का ट्रायल हो गया। अब मज़दूरों की घर वापसी जन-विद्रोह में तब्दील है। इस बात को , समय की दीवार पर लिखी इस इबारत को अगर नरेंद्र मोदी सरकार नहीं पढ़ सकती तो अपने तमाम मुगालते भुला कर उसे इस बात को आंख और चश्मा साफ़ कर फिर से सही ठीक से पढ़ लेना चाहिए। मज़दूरों और गरीबों की आह से बड़े-बड़े चक्रवर्ती राजा भय खाते रहे हैं और एक से एक लोकतांत्रिक शासक भी। 

लोकतंत्र का अर्थ भारत में अब भले बदल गया हो पर दुनिया में लोकतंत्र की नींव ही लोक है। लोक कल्याणकारी राज्य है। लोक नहीं है जिस तंत्र में तो वह काहे का लोकतंत्र ? इस कोरोना काल में दिया जलाने , थाली बजाने , फूल बरसाने आदि-इत्यादि के अलावा , देश की रीढ़ मज़दूरों , मज़दूरों के पेट और सम्मान की बात किस मद में भूल गई मोदी सरकार भला। किसी भी आपदा में , किसी भी दंगे फसाद में गरीब मज़दूर ही पहला शिकार बनता है , यह बात मोदी क्या नहीं जानते। मोदी चांदी का चम्मच मुंह में ले कर तो पैदा हुए नहीं हैं। फिर यह कैसे भूल गई मोदी सरकार। कि मज़दूरों को टेकेन ग्रांटेड ले लिया ? आखिर मज़दूरों को मैनेज करना कैसे और क्यों भूल गई मोदी सरकार ? मोदी सरकार तो राम राज्य की हामीदार मानती है। तो कैसे भूल गई कि लोक के सम्मान में एक धोबी के दिए गए ताने को भी राम ने अपने राजा के कर्तव्य में शुमार कर सीता को वनवास दिया था। 

तो क्या मोदी की अनुभवहीनता ने मज़दूरों को इस जन-विद्रोह के लिए उकसा दिया। शहरों से मज़दूरों के निरंतर पलायन को अभी भी मोदी सरकार क्यों नहीं थाम पाई। या फिर उन के घर जाने का सम्मानजनक प्रबंध क्यों नहीं कर पाई है अभी तक मोदी सरकार ?

पाकिस्तान विभाजन के बाद देश में हुए भयानक दंगों की याद आती है। तमाम कोशिशों के बावजूद जब नेहरू सरकार देशव्यापी दंगों को रोकने में पूरी तरह नाकाम हो गई।  नेहरू और पटेल नेता तो बहुत बड़े थे पर प्रशासनिक अनुभव में शून्य थे। तो हार मान कर एक रात नेहरू और पटेल माउंबेटन के पास पहुंचे। माउंटबेटन से हाथ जोड़ कर कहा , रोज-रोज इतने लोगों को मरते हुए अब हम नहीं देख सकते। आप अपना राज पाट वापस ले लीजिए। लेकिन जनता को रोज दंगों में मरने से प्लीज़ बचा लीजिए। माउंटबेटन ने नेहरू और पटेल से कहा कि ऐसा भी मत कीजिए राज-पाट मुझे वापस कर दीजिए। ऐसा करने पर भारत की जनता आप को कभी माफ़ नहीं करेगी। न मुझ को माफ़ करेगी। तो करें क्या , लोगों को ऐसे ही मरने दें ? नेहरू ने माउंटबेटन से कहा।  माउंटबेटन ने कहा , बिलकुल नहीं। दंगे हम ही रोकेंगे। लेकिन राज-पाट ले कर नहीं। माउंटबेटन ने नेहरू और पटेल से कहा कि आप लोग एक कमेटी बना दीजिए। उस कमेटी में जिस-जिस को कहता हूं , उसे-उसे मेंबर बना दीजिए। फिर उस कमेटी का चीफ मुझे बना दीजिए। इस तरह बिना किसी उल्ट-पुलट के देश का प्रशासन मेरे हाथ में आ जाएगा और मैं सब ठीक कर दूंगा। नेहरू और पटेल ने ठीक ऐसा ही किया। और बिना किसी चिल-पो के माउंटबेटन ने सब कुछ सामान्य कर दिया। देश में दंगे समाप्त हो गए। 

मोदी के पास लेकिन कोई माउंटबेटन नहीं है। माउंटबेटन भले नहीं है पर माउंटबेटन की मिसाल तो है। अब से सही , विराट बहुमत की सरकार का मद त्याग कर नरेंद्र मोदी को एक सर्वदलीय कमेटी बना कर। देश के सभी वर्ग को साथ ले कर , सब की सलाह से कोरोना से लड़ने के लिए नए सिरे से रणनीति बना कर चलना चाहिए। यह बस और रेल की पॉलिटिक्स बहुत हो चुकी। यह देश सब का है और देश के सभी मज़दूर सम्मानित नागरिक हैं। इन मज़दूरों को संभालने के लिए , इन को घर पहुंचाने के लिए पूरे देश की वर्तमान पुलिस और प्रशासन व्यवस्था पूरी तरह फेल कर चुकी है। समय आ गया है कि मज़दूरों के खाने-पीने से लगायत घर जाने तक की सारी व्यवस्था सेना के हाथ सौंप दी जानी चाहिए। अब सेना ही एक रास्ता है , इस जन-विद्रोह को थामने का। मज़दूरों के घाव पर मरहम लगाने का। सेना ही सम्मान पूर्वक उन का ख्याल रख सकती है। आखिर देश में जब कभी बाढ़ , दंगा , भूकंप , बादल फटने या तमाम अन्य विपदा में सेना ने बिना भेद-भाव के सर्वदा ही देश की सर्वोत्कृष्ट सेवा की मिसाल पेश की है। 

मोदी सरकार को अब बिना कोई देरी किए मज़दूरों की सेवा के लिए सेना उतार देनी चाहिए। यह कोरोना अभी लंबे समय तक दुनिया को तमाम करता रहेगा। तो न सिर्फ देश को  बल्कि समूची दुनिया को तमाम-तमाम मतभेद भुला कर कदम से कदम मिला कर इस कोरोना से लड़ना चाहिए। आखिर राम ने रावण को परास्त करने के लिए भालू , वानर , रीछ , गिलहरी , नल-नील , जटायु , जामवंत , सुग्रीव , अंगद , विभीषण आदि हर किसी को साथ ले कर लड़ाई लड़ी थी। सिर्फ लक्ष्मण और हनुमान ही को नहीं हर किसी को साथ लिया था। तो सोनिया , मोनिया , राहुल , माहुल , प्रियंका , वनिका , समाजवादी , साम्यवादी , औलाना , मौलाना , आदरी , पादरी , पंडित , वंडित , दलित, फलित , अमीर , गरीब हर किसी को हाथ जोड़ कर , हर किसी को साथ ले कर यह कोरोना की लड़ाई जीती जा सकती है। कोई इधर अफवाह फैलाए , कोई उधर भड़काए , यह सब बहुत हो चुका। कोरोना अब अपने रौद्र रूप में आने को बस तैयार हो चुका है। लोग बाग़ अपनी-अपनी जयचंदी , अपनी-अपनी बस , अपनी-अपनी ट्रेन ले कर बहुत गुल खिला चुके। अब और खिलाएंगे तो खुद भी कोरोना की भेंट चढ़ने को तैयार हो जाएं। 









Tuesday, 19 May 2020

कांग्रेस की बस , सपा-बसपा की जहाज और कम्युनिस्टों का राकेट प्लान


आप देख लीजिएगा जल्दी ही सपा और बसपा भी हज़ार , दो हज़ार जहाज उड़वाने का प्रस्ताव रखेंगी। कांग्रेस को आखिर अकेले माइलेज कैसे लेने देंगी। योगी सरकार को पटकनी देने में कोई पीछे क्यों रहे भला। सुना है सपा , बसपा की ऐसी तैयारी सुन कर वामपंथी साथियों ने राकेट लांचिंग का मन बना लिया है। 

बस अनुमति मांगने की एक सैद्धांतिक समस्या आन पड़ी है। वह यह कि फासिस्ट सरकार से अनुमति मांगने के लिए आखिर चिट्ठी कैसे लिखी जाए। किस को लिखी जाए। बल्कि लिखी भी क्यों जाए। बाकी रही बात राकेट के इंतज़ाम की तो उन्हें पूरा भरोसा है कि मोदी और योगी सरकारों की चूलें हिलाने के लिए चीन तुरंत रजामंद हो जाएगा। अब दिक्कत बस यही है कि कांग्रेस से उत्तर प्रदेश के अलावा , बिहार , मध्य प्रदेश , बंगाल आदि-इत्यादि जगहों के मज़दूर लोग भी बसें भेजने की फरमाइश न कर दें। 

आखिर कांग्रेस अखिल भारतीय पार्टी है। देश भर में उस के लोग हैं। सपा , बसपा की तरह उत्तर प्रदेश ही बेस नहीं न है , कांग्रेस का। वामपंथी साथियों की भी यही दुविधा है। कांग्रेस अगर राष्ट्रीय पार्टी है तो वह अंतरराष्ट्रीय। दुनिया भर का गम उन के हिस्से है। मुश्किल यह भी कि ज़्यादातर जगहों पर क्या दुनिया में 99 फीसदी फासीवादी सरकारें ही हैं। वह करें तो क्या करें भला। कहीँ ट्रंप , कहीं मोदी। ऐसे ही पूंजीवादी और फांसीवादी शासकों से दुनिया भरी पड़ी है। ऐसे में अब फासीवादी और सांप्रदायिक तत्वों से वह संवाद भी नहीं कर सकते। फिर चीन भी उन को राकेट अगर उपलब्ध करवा देता है तो मोदी और योगी की फांस का वह क्या करें। 

यह दुविधा देखते हुए एक कामरेड ने पोलित व्यूरो को सलाह दी है कि क्यों न जैसे हम कांग्रेस के लिए तमाम किसिम की आऊट सोर्सिंग करते रहते हैं तो कांग्रेस भी हमारे लिए इस काम के लिए चिट्ठी लिखने की आऊट सोर्सिंग कर दे। लेकिन पोलित व्यूरो में चर्चा की यह खबर जाने कैसे लीक हो कर सोनिया गांधी तक पहुंच गई। सो सोनिया ने संकेतों में सही , दो टूक बता दिया है कि पहले हमें कांग्रेस की ज़मीन ठीक करनी है। कांग्रेस ठीक हो जाएगी तो कम्युनिस्टों को काम खुद-ब-खुद मिल जाएगा। सो अभी हमें दूसरे , तीसरे राउंड की बसें चलाने का प्लान करना है। योगी, मोदी को जड़ से उखाड़ फेकना है। यह नायब मौक़ा है। इस को हम किसी सूरत गंवा नहीं सकते। आप लोगों की तरह हवा-हवाई राकेट नहीं प्लान करना है। हमें मज़दूरों का दिल जीत लेने दीजिए। फिर आप नारा लगा लीजिएगा , कमाने वाला खाएगा ! फिर आप को तो हम खिलाते ही रहते हैं। आगे भी खिलाते रहेंगे। सो अभी खामोश रहिए। 

सुना यह भी गया है कि सोनिया ने राजीव शुक्ला से कह दिया है कि अगर फिर भी कामरेड लोग नहीं मानते हैं तो शत्रुघन सिनहा की ड्यूटी लगा दें। ताकि वह खामोश ! खामोश !! खामोश !!! कह-कह कर इन को खामोश ही रखें। क्यों कि बड़ी मुश्किल से यह बस चलाने का पासा सही पड़ गया है , इसे हम किसी कीमत , किसी सूरत जाया न होने देंगे।  बताते हैं कि राजीव शुक्ला ने आहिस्ता से पूछ लिया है कि अगर सपा , बसपा ने जहाज चलवा दिया तो ? सोनिया ने अहमद पटेल से उन्हें शट-अप ! कहला कर खामोश करवा दिया। 

सोनिया के घर से बाहर निकल कर लेकिन राजीव शुक्ला ने मुलायम को फोन मिला ही दिया। मुलायम ने राजीव शुक्ल से साफ़ कह दिया कि यह सब बात अब अकलेश देखता है , उसी से बात करो तो बेहतर ! अखिलेश को भी राजीव शुक्ला ने फोन किया। लेकिन अखिलेश ने राजीव शुक्ला का फोन रिसीव नहीं किया तो नहीं किया। सूत्र बताते हैं कि अखिलेश ने वेट एंड वाच की तजवीज पर ध्यान दिया है। वह पहले कांग्रेस की बस की हवा देखेंगे। टोटी , टाइल और खदानों की फ़ाइल की रफ्तार देखेंगे। फिर कोई रफ़्तार लेंगे। चचा आज़म खान या रिश्तेदार लालू यादव की राह पर चलना उन्हें किसी सूरत गवारा नहीं। पिता मुलायम की राह को ही ठीक समझा है। कि कांख भी ढंकी रहे और मुट्ठी भी तनी रहे। 

बताया जाता है कि मायावती भी जहाज उड़वाने के पहले कांग्रेस के बस का सफर और उस में आने वाली सांसत की थाह देख लेने के बाद , स्याह-सफ़ेद जान लेने के बाद ही कुछ फैसला ले सकती हैं। हालां कि वह इंतज़ार कर रही हैं कि राजीव शुक्ला उन को भी फोन करेगा। लेकिन राजीव शुक्ला ने मन बना लिया है कि वह मायावती को फोन नहीं करेंगे। तो भी मायावती ने सतीश मिश्रा को लगा दिया है कि जैसे भी हो राजीव शुक्ला का फोन उन के पास आने का बंदोबस्त करें। आखिर उत्तर प्रदेश उन की भी जागीर है और दलित उन के वोटर। यह दलित वोटर एकमुश्त कांग्रेस की तरफ जाने कैसे दे सकते हैं हम। 


Tuesday, 5 May 2020

जिन्ना का डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया का खेल बदस्तूर जारी है , डायरेक्ट ऐक्शन की घोषणा ही शेष


भारत में ऐसे हिंदुओं की , हिंदुत्ववादियों की कमी नहीं है जो अभी भी पाकिस्तान बनाने के लिए गांधी को सब से बड़ा दोषी मानते हैं। मानते रहेंगे। बहुत से हिंदू और हिंदुत्ववादी गांधी को मुस्लिम परस्त भी मानते हैं। इसी कारण नाथूराम गोडसे ने गांधी की हत्या भी की। लेकिन दूसरी तरफ , मुसलमान और इस्लाम के अनुयायी लोग भी गांधी को हिंदूवादी मानते हैं। मानते रहेंगे। बस भाजपा और संघ के विरोध के लिए मुसलमान गांधी को सेक्यूलरिज्म की ढाल बना कर अपनी सांप्रदायिकता पर एक परदा डालने की नाकाम कोशिश ज़रूर करते हैं। पर यकीनी तौर पर वह सच से कोसो दूर है। यकीन न हो तो गांधी की हत्या पर जिन्ना के शोक संदेश पर गौर करें। 

हिंदुओं के लिए यह बेहद अफसोसनाक खबर है कि उस के रहनुमा का इन्तेकाल हो गया।

- मोहम्मद अली जिन्ना , गांधी की हत्या पर

गो कि गांधी बड़ी मुश्किल में हैं। इधर भी और उधर भी। खैर , गांधी कहते थे कि दो लोगों को मैं कभी समझा नहीं सका। एक अपने काठियावाड़ी दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और दूसरे अपने बेटे हरिलाल को। जिन्ना ने गांधी को धमकी देते हुए कहा था कि आप आज़ाद पाकिस्तान और आजाद हिंदुस्तान चाहते हैं या गृह युद्ध। डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया का हामीदार जिन्ना तैमूर , अलाऊदीन खिलजी , औरंगजेब आदि का मिला-जुला कॉकटेल था। याद कीजिए जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन प्लान। इतिहास का सब से बड़ा नरसंहार का दिन था वह। कहते हैं कि उस एक दिन में अकेले कोलकाता में दस हज़ार से अधिक हिंदू चुन-चुन कर मारे गए थे। जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन का मतलब ही था कि हिंदुओं को देखते ही मारो। दुर्भाग्य से जिन्ना के ब्लैकमेलिंग के चलते पाकिस्तान तो बन गया लेकिन गृह युद्ध फिर भी जारी है। जाने कब तक जारी रहेगा।

अच्छा , जिन्ना आइडियालोजी को फॉलो करने वाले कितने मुसलमान इस बात को जानते हैं कि जिन्ना इस्लाम को नहीं मानता था । न तो वह नमाज पढ़ता था , न रोजा रखता था। उस ने इस्लाम से बगावत कर के एक पारसी लड़की से शादी की थी । जो उस से उम्र में बहुत छोटी थी। कोई 24 साल। शराब , शबाब , सूअर और सिगार के शौक़ीन जिन्ना ने जब देखा कि हिंदुस्तान में प्रधानमंत्री नहीं बन सकता तो मूर्ख कठमुल्लों का इस्तेमाल कर अंगरेजों से दुरभि संधि कर भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान बना कर कायदे आज़म बन गया ।

14 अगस्त , 1947 को जिस दिन पाकिस्तान बना तब रमज़ान का महीना चल रहा था । जिन्ना ने कहा कि ग्रैंड लंच होना चाहिए । लोगों ने उन्हें बताया कि ये रमज़ान का महीना है कैसे लंच का आयोजन करेंगे । जिन्ना तो ऐसा आदमी था । जिन्ना कुछ भी छुप कर नहीं करता था । वो शराब पीता था , सूअर खाता था , सिगार पीता था। ये बातें पूरी तरह से सार्वजनिक थीं ।

खैर , जिन्ना के पाकिस्तान में जो भी मुसलमान भारत से गए , वहां मुहाजिर का दर्जा मिला उन्हें । मुहाजिर मतलब दूसरे दर्जे का नागरिक। आज भी वह वहां मुहाजिर हैं । और जो अपनी कायरतावश वहां नहीं गए , मुहाजिर बनने से बच गए वही अपनी पीठ ठोंकते हुए कहते हैं , इंडियन बाई च्वायस । यह इंडियन बाई च्वायस नहीं हैं , मौकापरस्त लोग हैं । कि जब देखा , उधर मज़ा नहीं है तो यहीं रुक गए । आप ने कभी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या ए पी जे अब्दुल कलाम जैसे लोगों को कहते सुना है कि वह इंडियन बाई च्वायस हैं । नहीं सुना । क्यों कि यह लोग सच्चे भारतीय थे । बाई च्वायस नहीं थे । इंडियन बाई च्वायस वही लोग कहते हैं जो जिन्ना प्रेमी होते हैं । अलगाववादी होते हैं । श्रीनगर में यह खुल कर अलगाववाद की भाषा बोलते हें , अलीगढ़ और अन्य जगहों में बाई च्वायस बोलते हैं । इस लिए भी कि माता , पिता और देश बाई च्वायस कभी नहीं हो सकते । लेकिन ऐसा कहने वाले लोग अपने को हरामी क्यों बताना चाहते हैं , मैं आज तक नहीं समझ पाया ।

कभी-कभी सोचता हूं तो पाता हूं कि इस्लाम को न मानने वाला जिन्ना कितना तो जानता था इस्लाम जानने वालों को । इतना कि इस्लाम की अफीम चटा कर , नफ़रत के बीज बो कर लाखो हिंदू , मुसलमान की हत्या करवा कर , बेघर करवा कर , पाकिस्तान बना कर कायदे आज़म बन गया । इस बिंदु पर आ कर लगता है कि कार्ल मार्क्स ठीक ही कहते थे कि धर्म अफीम है । यह धर्म की अफीम न होती तो जिन्ना पाकिस्तान की जलेबी कैसे खाता भला । और देखिए कि भारत में अभी भी ऐसे मूर्खों और धूर्तों के अवशेष छोड़ गया है , जो जिन्ना की फ़ोटो ले कर जिन्ना के नारे , डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया को पूरी ताकत से अंजाम दे रहे हैं । और हमारे वामपंथी दोस्त जो दिलोजान से मानते हैं कि धर्म अफीम है लेकिन धर्म के नाम पर देश को बांटने वाले जिन्ना के साथ , जिन्ना प्रेमियों के साथ पूरे दमखम के साथ खड़े हैं । वह जिन्ना जिस ने कभी इस्लाम को नहीं माना लेकिन भारत में इस्लाम मानने वालों को अपने अलगाववादी नज़रिए के लिए आज भी पागल बनाए हुए है । जिन्ना इस्लाम को नहीं मानता था , मुसलमान होने के बावजूद क्यों कि शुरू में वह तरक्कीपसन्द था । इसी लिए इस्लाम के बाबत उस के कोई विचार नहीं मिलते । हां , अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उस की फ़ोटो ज़रूर मिलती है । जिस फ़ोटो की हिफाज़त के लिए लोग खून बहाने पर जब-तब आमादा रहते हैं । जिन्ना के डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया के मकसद को पूरा करने के लिए ।

अलीगढ़ हो या श्रीनगर जिन्ना प्रेमी तत्व दोनों ही जगह उपस्थित है । यह बात कुछ लोग क्यों नहीं समझना चाहते ? दोनों ही लोग एक ही हैं । कोई श्रीनगर में बंदूक उठा लेता है , कोई पत्थर उठा लेता है तो कोई अलीगढ़ में जिन्ना की फ़ोटो । अलगाववादी दोनों ही हैं । जिन्ना कहता ही था , खुल कर कहता था , डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया । जिन्ना का जहर न होता तो कश्मीरी पंडित बेघर न हुए होते । खालिस्तान की आग न लगी होती । याद दिलाता चलूं कि पाकिस्तान का बीज अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में ही बोया गया । जिन्ना जिस का वृक्ष बना और पाकिस्तान का फल उगा । आज तक यह जिन्ना प्रेम , पाकिस्तान प्रेम खत्म नहीं हुआ । बेशर्म लोग जिन्ना की फ़ोटो लगाने के लिए कटने मरने को तैयार क्यों हो जाते हैं ? यह कौन लोग हैं ? वही लोग , और वही प्रवृत्ति जिन्हों ने कश्मीरी पंडितों को विस्थापित किया । स्वर्ग जैसे कश्मीर को जहन्नुम बना दिया । वही लोग जिन्हों ने बंटवारे के समय लाखों हिंदू , मुसलमानों का कत्ल किया । जिन्ना की फ़ोटो उठाए वही लोग घूम रहे हैं । और उप राष्ट्रपति का पद भोगने के बाद भी बता गए हैं कि भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं । होगा आप की नज़र में यह जिन्ना की फ़ोटो , गौण मुद्दा । लेकिन मेरी नज़र में यह महत्वपूर्ण मुद्दा है । इस लिए कि डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया का जिन्ना का संदेश अभी भी लोग जाने-अनजाने अमल में लिए हुए हैं । डिवाइड इंडिया , डिस्ट्राय इंडिया का खेल अभी भी जारी है ।

आखिर यह कौन लोग हैं जो कभी मनुष्यता प्रेमी और उदारमना अब्दुल कलाम के लिए नहीं , अत्याचारी औरंगजेब के लिए लड़ते हैं । गांधी को भूल , जिन्ना की फ़ोटो पर मातम और कोहराम रचते हैं । पहचानिए इन जहरीले लोगों को और इन का पूरी ताकत से विरोध कीजिए । इन में सिर्फ़ मुस्लिम ही नहीं हैं , बाकी हिप्पोक्रेट्स भी हैं , इन का इगो मसाज करने के लिए । अच्छा यह मालूम करना भी दिलचस्प होगा कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में महात्मा गांधी की भी कोई फ़ोटो क्यों नहीं है ।  सोचिए कि यह कैसे लोग हैं जो लाखो लोगों की लाश पर पाकिस्तान बनाने वाले जिन्ना की फ़ोटो लगाने के लिए धरती आसमान एक किए रहते हैं । लेकिन उसी अलीगढ़ यूनिवर्सिटी को बनाने के लिए जिस राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने ज़मीन दान में दी उन की एक मूर्ति लगाने का भी विरोध करते हैं । मूर्ति आज तक नहीं लगाने दी है । अच्छा  फ़ोटो यानी बुत इस्लाम विरोधी है। तो कैसे क़ुबूल करते हैं। फिर एक जिन्ना प्रेम ही नहीं है। हमारे मुस्लिम दोस्तों को और भी बेशुमार दिक्कत होती है । जैसे कि इस्लाम और भारत में कोई एक विकल्प चुनने को कहा जाए तो वह कतरा जाएंगे ।

स्पष्ट है कि देश को भी वह चाहते हैं लेकिन इस्लाम की कीमत पर नहीं । इस्लाम उन के लिए पहले नंबर पर है , देश नहीं । कश्मीर का आज कोर इशू ही यही है । कि लोग वहां इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान के साथ खड़े हो गए । बच्चे किताब फेंक कर हाथ में पत्थर ले कर खड़े हो गए। यह इस्लाम का दुरूपयोग है । मुसलमान दोस्तों को इस संकट से निकलना चाहिए । अगर देश में , कश्मीर में , दुनिया में अमन-चैन से रहना है तो देश और मनुष्यता से प्यार करना होगा । देश ही पहला और आख़िरी धर्म है । देश है तो इस्लाम भी है , नहीं सब बेकार और व्यर्थ है । यह समझना बहुत ज़रुरी है ।

कश्मीर की चर्चा वह लोग अमूमन नहीं करते । जब कभी भी करते हैं , सेना की निंदा करने के लिए पत्थरबाजों की पैरवी में । लेकिन आज अभी वह सभी सांस खींचे खामोश हैं । असल में उन कुछ लोगों को लगता है कि औरंगजेब और जिन्ना जैसे लोगों की पैरवी कर के वह भाजपा और संघ को पटकनी देते हैं । इस लिए इस काम में पूरे जोशो-खरोश से लगे रहते हैं । बस मौका चाहिए । जैसे कि बहुत पहले एक बार एक टी वी चैनल पर शबनम लोन की जुबान पर कुतर्क और पाकिस्तानपरस्ती तो सर्वदा की तरह थी पर आंखों में दहशत भी । लेकिन एक बात उन की सुन कर हंसी आ गई थी। वह कह रही थीं पत्थरबाजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोध के लिए हो रही है। मुस्लिम गोलबंदी और मुस्लिम प्रिवलेज की एक नाकाम कोशिश । शबनम लोन अब बहुत हो गया । इन कुटिलताओं और चालाकियों से छुट्टी लीजिए , आतंकवादियों की पैरवी से भी । सेना अब अपना मिशन पूरा कर के दम लेगी । छापा अब किसी रोज आप के घर में पड़ सकता है । दिल्ली में बैठ कर कश्मीर के सेव में आइसक्रीम लपेट कर खाने के दिन अब विदा हुए ।

उत्तरी कश्मीर के हंदवाड़ा में आज कुछ आतंकवादियों ने हाइवे से गुजर रहे सी आर पी एफ़ जवानों के एक गश्ती दल पर अचानक से हमला बोल दिया। इस हमले में तीन जवान शहीद व 7 जवान घायल हुए हैं। हमले को अंजाम दे कर आतंकी नजदीकी रिहायशी इलाके में छिप गए हैं। उन की तलाश के लिए सर्च ऑपरेशन चलाया हुआ है।कश्मीर को बरबाद कर देने के बाद ही , थोड़ी देर से ही सही सैनिक कार्रवाई शुरु हुई , यह शुभ है । यह कांबिंग , गांव-गांव , गली-गली , शहर-दर-शहर , चप्पे-चप्पे पर चलनी चाहिए । एक दिन के लिए भी नहीं रुकनी चाहिए । नतीज़े अच्छे निकलेंगे । क्यों कि इन अलगाववादियों का इलाज अब , होम्योपैथी या एलोपैथी से नहीं आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा से ही संभव है । समूल जड़ से समाप्त करने के लिए । बिना किसी राजनीतिक दखलंदाज़ी के सेना जैसे चाहे , जो करे , करने देना चाहिए । कोई मुस्लिम प्रिवलेज नहीं ।

इस्लाम फिस्लाम को ताक पर रख कर सिर्फ़ देश और देश की आन-बान-शान सामने हो । इस के बरक्स जो भी कोई चिल्ल-पो करे उसे वहीँ मौके पर ही शांत कर दिया जाना चाहिए । वह कोई भी हो । महबूबा हो , फारूख हो , गिलानी , पिलानी , लोन , पोन , मलिक , पलिक जो भी हो । हर किसी के साथ एक सुलूक हो । बिना भेद-भाव के । भले बहत्तर हूरों से मुलाकात के लिए भेजना पड़े , भेज दिया जाना चाहिए । इन के जेहाद का मकसद भी तो यही है । देश का मकसद शांति और अमन चैन है । उसे हर हाल हासिल करना चाहिए ।

अच्छा इंडियन बाई च्वायस कहने वाले ऐसे कितने मुस्लिम लोग हैं जो पाकिस्तान से चल कर भारत में बसने आए हैं । किसी के पास कोई आंकड़ा , कोई तथ्य हो तो ज़रूर बताए । बहुत दिलचस्प होगा । फिर यह लोग अगर ऐसा कहते हैं तो फिर तो उन्हें सलाम है । लेकिन मेरी जानकारी में ऐसे लोग नहीं हैं । हां , पर जो यहीं बैठ कर अलगाववादी बन कर चूहों की तरह देश को कुतर रहे हैं , उन का इंडियन बाई च्वायस कहना , अपने को हरामी कहना हुआ ।

यह कौन लोग हैं जो कभी मनुष्यता प्रेमी और उदारमना अब्दुल कलाम के लिए नहीं , अत्याचारी औरंगजेब के लिए लड़ते हैं । गांधी को भूल , जिन्ना की फ़ोटो पर मातम और कोहराम रचते हैं । पहचानिए इन जहरीले लोगों को और इन का पूरी ताकत से विरोध कीजिए । इन में सिर्फ़ मुस्लिम ही नहीं हैं , बाकी हिप्पोक्रेट्स भी हैं , इन का इगो मसाज करने के लिए । मुझे तो लगता है कि जिन्ना अगर आज की तारीख में जीवित होता तो यह जिन्ना प्रेमी लोग अपनी बेटी का विवाह भी कूद कर उस के साथ कर देते । उस की उम्र की परवाह किए बगैर , बेटी की मर्जी जाने बगैर । इंडियन बाई च्वायस वाला फार्मूला लगा कर ।

Sunday, 3 May 2020

जब मज़हब भारी हो जाता है तो एक जिन्ना खड़ा हो जाता है और पाकिस्तान पैदा हो जाता है


मुल्क और मज़हब में जब मज़हब भारी हो जाता है तो एक जिन्ना खड़ा हो जाता है और पाकिस्तान पैदा हो जाता है। दुर्भाग्य से अब कई सारे जिन्ना खड़े हो गए हैं। इस बात से किसी को असहमति हो तो ज़रूर बताए । असहमति भी क़ुबूल है। बताइए कि कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर मुंह खोलने में जिन विद्वानों की घिघ्घी बंध जाती है , जिन्ना की पैरोकारी में उन का खून उबाल खाने लगता है । वह खून बहाने में सब से आगे दीखते हैं । जाने किस कुमाता की कोख से जन्मे हैं यह हिजड़े कि सोच कर भी घिन आती है । जिन्ना परंपरा में मौलाना वहीदुद्दीन खान के बेटे और दिल्ली अल्प संख्यक आयोग के अध्यक्ष डॉ. जफरुल इस्लाम खान अब नया नाम है। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. शहाबुद्दीन याकूब कुरैशी , पूर्व  मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला जैसे लोग भी। ऐसे , जैसे हलाल ब्रांड। 

दरअसल मोहम्मद अली जिन्ना नाम नहीं , प्रवृत्ति है । दुर्भाग्य से भारत में पाकिस्तान और जिन्ना के लिए खून बहाने वाले बहुतेरे हैं । हालां कि बहुत सारे मुस्लिम भी हैं , देश में , जो जिन्ना और पाकिस्तान को पसंद नहीं करते पर इन की संख्या दुर्भाग्य से अनुपात में कम है । दिलचस्प यह भी है कि जिन्ना की एक फ़ोटो के लिए कुर्बान होने वाले सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं हैं । अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी तो इस खेती की नर्सरी ही है । मोदी फोबिया वाले भी हैं जिन्ना और पाकिस्तान का झंडा उठाने वालों में । पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी को भी आप क्या समझते हैं ? जिन्ना प्रेम की तासीर उन में भी बहुत है । कूट-कूट कर भरी है ।

याद कीजिए उपराष्ट्रपति पद छोड़ते ही इस हामिद अंसारी को यह देश रहने लायक नहीं लगा था । इस मूर्ख और कृतघ्न आदमी ने कहा था , भारत में मुसलमान सुरक्षित नहीं हैं । तभी इस जिन्ना प्रेमी को माकूल जवाब नहीं दिया गया । तो नौबत यहां तक आ गई है । और फिर हामिद अंसारी के बहाने भी कई सारे लोगों ने आंख लाल-पीली कर रखी है । यह तो लोग जो हैं , सो हैं ही , देश और प्रदेश की सरकारें भी कायर हैं । इन सारे जिन्ना प्रेमियों के साथ कड़ाई से पेश क्यों नहीं आती सरकार ? कोई जनरल डायर जैसा पुलिस अफ़सर ही इन जिन्ना और पाकिस्तान प्रेमियों की दवा हो सकता है । इस बात को समाज समझता है पर सरकारें नहीं । एक सख्त कार्रवाई बहुत सारे मर्ज की दवा साबित हो सकती है । नहीं , अलीगढ़ यूनिवर्सिटी और श्रीनगर के आतंकवादियों की मानसिकता में कोई फर्क नहीं है । दोनों ही पाकिस्तान और जिन्ना में अपना सुकून ढूंढते हैं । इसी लिए कहता हूं , सरकार इन अतिवादियों से ज़्यादा कायर और ज़्यादा दोषी है ।

यह जो लोग बार-बार हम इंडियन बाई च्वाइस हैं , कह कर अपनी पीठ ठोंकते हैं , इन को भी कंडम किया जाना चाहिए । यह इंडियन बाई च्वाइस हैं , कहना भी अपने आप में कमीनगी है और कि अपने आप को हरामी घोषित करना है । देश , मां और पिता किसी के लिए बाई च्वाइस कैसे हो सकते हैं भला ।

हो सकता है बहुत से मेरे दोस्त इस बात को दिल पर ले लें लेकिन सच यही है कि मुस्लिम समस्या ठीक वैसे ही जैसे जो पाकिस्तान बनते समय थी । वह है मुस्लिम प्रिवलेज । [ जिसे राजनीतिक और चुनावी शब्दावली में मुस्लिम तुष्टिकरण कहा जाता है । ] अब धीरे धीरे यह प्रिवलेज फिर से पूरे देश में पांव पसार चुका है । आप क्या समझते हैं वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो भाजपा जीती थी , वह जीत क्या कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जीत थी ? हरगिज नहीं । वह जीत थी मुस्लिम प्रिवलेज के खिलाफ । अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ । अंध सेक्यूलरिज्म की बीमारी नाम के फैशन ने इस आग में और घी डाला । उत्तर प्रदेश के बीते विधान सभा चुनाव में भी यही हुआ ।

इस बात को अगर लोग अभी तक नहीं समझना चाहते तो उन के इस अंधेपन का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है । और अब आप इस बात को मानिए या मत मानिए लेकिन यह भी एक तल्ख सचाई है कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को जिस मुस्लिम प्रिवलेज के खिलाफ लोगों ने वोट दिया था , वह लोग निराश हुए हैं । उन का भरोसा टूटा है । किसी शीशे की तरह टूटा है। मुस्लिम प्रिवलेज और घना हुआ है । पाकिस्तान की सारी कामयाबी इसी मुस्लिम प्रिवलेज में छुपी हुई है । मुसलमान कभी भी खुल कर दिल से पाकिस्तानियत के खिलाफ खड़े नहीं होते । जैसे कि शरीयत आदि कुरीतियों के पक्ष में मुस्लिम अस्मिता के नाम पर तन कर खड़े हो जाते हैं । कश्मीर के मुसलमान चाह लें तो पाकिस्तान की घिघ्घी बंध जाए। पर नहीं वह तो पाकिस्तानी झंडा लहराते हैं । इंशा अल्ला पाकिस्तान के नारे लगाते हैं । देश के मुसलमान क्यों नहीं जत्था बना कर जाते कश्मीर ? कि कश्मीर में अमन चैन आए । क्या कश्मीर उन का नहीं या यह देश उन का नहीं । सिर्फ़ दाढ़ी , टोपी और शरीयत आदि के लिए जान देने के लिए वह पैदा हुए हैं । देश के लिए नहीं । पर नहीं जे एन यू तक में नारा लग जाता है कि भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्ला , इंशा अल्ला ! यह और ऐसी तफसील बहुतेरी हैं । आज़म खान जैसा बदमिजाज आदमी जौहर यूनिवर्सिटी को अपने बाप की जागीर मान कर उसे डायनामाइट से उड़ा देने की धमकी दे देता है । कहीं किसी के कान पर जूं नहीं रेंगती । तो यह मुस्लिम प्रिवलेज का ही नतीज़ा है ।

जब तक मोदी या कोई भी सरकार इस मुस्लिम प्रिवलेज की कमर नहीं तोड़ेगी , देश , दुनिया और समाज अशांत रहेगा , हिंसा की चपेट से इसे कोई निकाल नहीं सकता । माफ कीजिए , खुदा भी नहीं । इस मुस्लिम प्रिवलेज और मुस्लिम-मुस्लिम के कुतर्क ने कश्मीर को जन्नत से जहन्नुम बना दिया। हमारे सैनिक रोज वहां शहीद हो रहे हैं , पत्थरबाजों के हाथों अपमानित हो रहे हैं । तो यह क्या है ? सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिम प्रिवलेज । भाजपा की यह मोदी सरकार भी दुर्भाग्य से यह मुस्लिम प्रिवलेज कार्ड बहुत कायदे से खेल रही है , कांग्रेस की तरह । बड़ी ख़ामोशी से । सी ए ए पर मचे कोहराम , देश भर में उपद्रव , दिल्ली में शाहीन बाग़ , दंगे आदि पर सरकार का निरंतर घुटने टेकते जाना चकित कर गया था। तबलीग जमात का कमीनापन , समूचे देश में बर्दाश्त से बाहर इसी लिए हो गया। और सरकार हाथ में हाथ बांधे सब कुछ बर्दाश्त कर रही है।

मैं ने शुरु में ही कहा कि दरअसल मोहम्मद अली जिन्ना नाम नहीं , प्रवृत्ति है । क्यों कि बहुत कम लोग जानते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना सिर्फ नाम का मुसलमान था। सचमुच नहीं। जिन्ना ने पारसी औरत से शादी की। जिन्ना खुल्ल्मखुल्ला सूअर का मांस खाता था। नमाज वगैरह में उस की कभी कोई दिलचस्पी नहीं थी। इस सब को बेवकूफी बताता था। गांधी से मनमुटाव के चलते अचानक वह कांग्रेस से अलग हुआ। मुस्लिम लीग ने घेर लिया। पकिस्तान का पहाड़ा शुरू हो गया। लेकिन बाद के दिनों में जिन्ना पाकिस्तान का पहाड़ा पढ़ते-पढ़ते थक गया। और भारत छोड़ कर लंदन चला गया। लेकिन इकबाल जैसे लोग जिन्ना के लंदन जाने से निराश हो गए। क्यों कि वह पाकिस्तान तो दिल से चाहते थे। लेकिन इस मांग का नेतृत्व करने में खुद को अक्षम पाते थे। सो फिर से जिन्ना के पीछे पड़े। जिन्ना को लंदन चिट्ठी लिख-लिख कर भारत बुलाने लगे। जिन्ना लौटा और कभी सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा लिखने वाले इकबाल जैसों का पाकिस्तान बनाने का सपना पूरा हुआ।

जब 14 अगस्त , 1947 को पाकिस्तान बना तो जिन्ना इतना खुश हुआ कि बोला , अब तो एक ग्रैंड लंच होना चाहिए। तो किसी ने जिन्ना से धीरे से कहा कि लेकिन इन दिनों रमजान चल रहे हैं। लंच कैसे हो सकता है !  जो भी हो जिन्ना भले सच्चा और नमाजी मुसलमान नहीं था लेकिन नमाजी और कट्टर मुसलमानों को कितना तो जानता था। कि उन को उकसा कर पाकिस्तान बना लिया और कायदे आज़म बन गया। तो भारत में आज भी बहुत से जिन्ना हैं। असदुद्दीन ओवैसी , हामिद अंसारी , आजम खान , नसीरुद्दीन शाह , आमिर खान , शाहरुख खान से लगायत मोहम्मद साद , डॉ. जफरुल इस्लाम खान जैसे तमाम-तमाम जिन्ना आज भी सक्रिय हैं। इन में से हर किसी को अपना पाकिस्तान चाहिए। इसी लिए नमाजी और कट्टर मुसलमानों को अराजकता के लिए , हिंसा के लिए , उपद्रव के लिए बात-बेबात उकसाते रहते हैं। देश में जब-तब आग लगाते रहते हैं। जैसे तब मोहम्मद इकबाल जैसे बड़े शायर थे जिन्ना के साथ वैसे ही इन दिनों के जिन्ना लोगों के साथ राहत इंदौरी , मुनव्वर राना जैसे शायर हैं। इसी लिए मैं अपनी बात फिर दुहराता हूं कि मोहम्मद अली जिन्ना नाम नहीं , प्रवृत्ति है ! हलाल ब्रांड की बांडिंग यह जिन्ना प्रवृत्ति ही तो करती है। यह जिन्ना प्रवृत्ति समूचे देश में नागफनी की तरह , किसी सांप की तरह फन फैला कर चौतरफा खड़ी है। सो आज बड़ी ज़रूरत जिन्ना प्रवृत्ति को बेरहम बूटों से कुचल देने की है। इस जिन्ना प्रवृत्ति को समूल नष्ट कर देने की ज़रूरत है।  


Saturday, 2 May 2020

आप मानिए , न मानिए एक अघोषित गृह युद्ध में हमें ले जा चुका है मुस्लिम समाज


समझ नहीं आता कि इस्लाम के अनुयायियों में देश के प्रति इतनी नफरत क्यों हैं। कि हरदम पिनक में रहते हैं। कि हर किसी सीधी बात में भी बईठब तोरे गोद में उखारब तोर दाढ़ी ! की रवायत तलाशने की कसरत में लग ही जाते हैं। अब आरोग्य सेतु ऐप्प से उन का ऐतराज आ गया है। कि सरकार इस के जरिए लोगों का निजी डेटा हासिल कर लेगी। जाने क्या-क्या छुपाने को है इन के पास। एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि ''केंद्र सरकार कोरोना वायरस से ताली, थाली, बिजली और एक बहुत संदेहास्पद ऐप से लड़ रही है। अब दिल्ली के सुल्तान ने एक फरमान जारी किया है कि जिसमें लोगों के पास कोई विकल्प नहीं है। उन्हें अपना प्राइवेट डेटा सरकार (और जिसके साथ सरकार चाहे) के साथ जरूर शेयर करना है।'' और कि जैसे सारी भेड़ एक दूसरे के पीछे चल पड़ती हैं , अल्ला-अल्ला कह कर चल पड़े हैं लोग , ओवैसी को फॉलो करते हुए। हर बात पर इन्हें मुश्किल है। बात-बेबात। 

1947 से क्या पहले ही से सर्वदा रवैया आक्रमणकारियों सरीखा रहा है। सर्वदा रहेगा। यह रवैया कभी अब बदल भी सकेगा , संदेह है। तिस पर तुर्रा यह भी कि हिंदुस्तान किसी के बाप का थोड़े ही है ! 

फिर कोरोना काल में मुस्लिम समाज ने जो जगह-जगह अतियां की हैं , अतियों का कोहराम मचा रखा है , उसे देखते हुए अब दो ही रास्ते दीखते हैं। या तो जैसे चीन ने तीस लाख उइगर मुसलमानों को नज़रबंद कर देशभक्ति का पाठ पढ़ाना शुरू किया है , वही किया जाए। या फिर म्यांमार में जिस तरह सेना ने मार-मार कर रोहिंग्या मुसलमानो को देश से बाहर खदेड़ दिया है , खदेड़ दिया जाए। या फिर इन की आबादी के हिसाब से जैसा कि यह चाहते हैं इन्हें एक और पाकिस्तान दे कर इन से एकदम से मुक्ति पा ली जाए। ताकि देश में लोग अमन-चैन से रह सकें। आए दिन कभी कश्मीर , कभी शहर-दर-शहर मिनी पाकिस्तान , कभी इन की जहालत , इन का आतंकवादी क्रिया कलाप , इन का दंगा फ़साद , इन का तबलीग , इन का वहाबी , इन का यह , इन का वह , इन की अशिक्षा , इन की मज़हब की ज़िद और सनक बहुत भारी पड़ रही है देश और समाज के लिए। अर्थव्यवस्था और समाज पर बहुत बड़ा बोझ और सिरदर्द रोज-रोज का झेलने से बेहतर है इन को , इन के मन का देश दे ही दिया जाए। बस पहले पाकिस्तान वाली गलती नहीं दुहराई जाए। कि जो चाहे , जाए। जो न चाहे , न जाए। बस जाए तो मुकम्मल जाए। जैसा कि अंबेडकर चाहते थे। कहते रहे थे कि पाकिस्तान बना , अच्छा हुआ। भारत से एक अभिशाप गया। अंबेडकर खुल्ल्मखुल्ला इस्लाम को अभिशाप मानते थे। दुनिया भर में इस्लाम के नाम पर जो कोहराम मचा रखा है , उसे देख कर लगता है कि अंबेडकर ठीक ही कहते थे। 

भले भारत की धरती का अपनी आबादी के अनुपात से एक बड़ा टुकड़ा भी ले ले मुस्लिम समाज। लेकिन जान छोड़े। जो भी हो , पर अगर समय रहते कोई बड़ा और कारगर फैसला न किया गया तो भारत को अब सीरिया बनने से रोकना बहुत मुश्किल हो जाएगा। आप मानिए , न मानिए एक अघोषित गृह युद्ध में हमें ले जा चुका है मुस्लिम समाज। और जो लोग आंख पर सेक्यूलरिज्म की पट्टी बांध कर इस तथ्य को अनदेखा कर रहे हैं , उन का भी कोई कुछ नहीं कर सकता। क्यों कि भारत में सेक्यूलरिज्म दो ही लोगों के हाथ में हैं। एक वह जो बेहिसाब विदेशी फंडिंग से सराबोर हैं , सुविधाएं भोग रहे हैं। या फिर जिन का माइंड सेट ऐसा अवरुद्ध हो चुका है , कंडीशंड हो चुका है , सनक और ज़िद की हद तक वह जा चुके हैं , ऐसे कट्टर लोगों के हाथ। इतना कि देश की 99 प्रतिशत गैर मुस्लिम आबादी इन सेक्यूलरिस्टों से आजिज आ चुकी है। त्राहिमाम कर चुकी है। मुक्ति चाहती है इन से। मुस्लिम समाज की अतियों का निरंतर कवच बनते रहने से सेक्यूलरिज्म अब गाली बन चुका है भारतीय समाज में। इन की सेलेक्टिव चुप्पी , सेलेक्टिव विरोध अब कोरोना से भी ज़्यादा घातक और मारक हो चुका है। रही बात मुस्लिम समाज की तो इन से संवाद करना , दीवार में सिर मारना है। 

यह कितना भी पढ़-लिख लें। कितना भी पैसा कमा लें। लेकिन मज़हब छोड़ कर यह कुछ सोच नहीं सकते। और इन का मज़हब इन्हें खुल्ल्मखुल्ला सिखाता है कि काफिरों को मारो। काफिर वह जो मुसलमान नहीं है। सीधा फंडा है इन का। नो इफ , नो बट। बाकी बातें आंख में धूल झोंकने के लिए है। भारत में तो इन के पास संघियों , भाजपाइयों की ओट है , अपनी बदतमीजियों , अपनी हिंसा को कवर करने के लिए। पर क्या समूची दुनिया में ही संघी और भाजपाई हैं ? अपनी हिंसा , अपनी अतियों और अपनी कट्टरता के चलते इस्लाम और कम्युनिस्ट पूरी दुनिया में बदबू मार रहे हैं। इन लोगों को अब अल्ला मिया भी कुछ नहीं समझा सकते। 

भारत में कम्युनिस्ट पार्टियां बेसबब ही नहीं खारिज हुईं। देश की संसद , विधान सभाओं से यह निरंतर समाप्त होती जा रही हैं तो अकारण ? कुछ बौद्धिक अवशेष कहिए , खण्डहर रह गए हैं भारत में। वह भी बस चंद रोज मिरि जान बस चंद रोज और। रही बात मुस्लिम समाज की तो आंख उठा कर देख लीजिए , अमरीका , यूरोप , चीन , जापान , फ़्रांस , म्यांमार समेत सभी जगह इन की क्या दुर्गति , क्या अपमानित ज़िंदगी है , इन के कर्मों के कारण। एक भारत में ही इन को सम्मान हासिल है। पर अपने इस सम्मान को किस तरह किसी चूहे की तरह लगातार कुतर-कुतर कर सब का जीवन कष्टमय बनाते जा रहे हैं। कैसे कबीलाई कल्चर में ही तर-बतर पूरे देश को कोरोना की आपदा में भी लगातार तबाह कर जगह-जगह हिंसा और उपद्रव मचाए हुए हैं। मनुष्यता से जैसे कुछ लेना-देना ही नहीं है। अदभुत ताना-बाना है इन का। 

कम से कम भारतीय संदर्भ में तो हम मुगलिया सल्तनत के इतिहास के 700 वर्ष को विध्वंस के इतिहास के रूप में जानते हैं । लोक कल्याण के नहीं । जो भी ऐतिहासिक इमारतें मुगल काल के आक्रमणकारी शासकों ने बनाई हैं अपने रहने और अपनी शानो-शौकत के लिए । लालकिला , ताजमहल , कुतुबमीनार या चारमीनार जैसी तमाम इमारतों का ऐतिहासिक महत्व तो है पर क्या यह जनता के भले के लिए बनाई गईं ? जनता के रहने के लिए बनाई गईं ? बाबरी मस्जिद के लिए जान लड़ाने वाले लोग कभी इस मुद्दे पर बात क्यों नहीं करते कि अयोध्या में राम जन्म-भूमि , मथुरा में कृष्ण जन्म-भूमि या काशी में काशी विश्वनाथ मंदिर से ही सट कर , दीवार से दीवार सटा कर ही मस्जिद बनाना इतना ज़रूरी क्यों था ? जजिया , खून खराबा तथा तलवार के बल पर जबरिया धर्म परिवर्तन के लिए इतिहास में मुगल काल को जाना जाता है । लूट-पाट और आक्रमणकारी छवि आज भी मिटी नहीं है , बावजूद तमाम ऐतिहासिक बेईमानियों और सो काल्ड सेक्यूलरिज्म के । यहां तक कि अकबर दुनिया का पहला सम्राज्यवादी शासक है । ब्रिटेन का साम्राज्यवाद तो बहुत बाद में आया । आज भी समूची दुनिया में मुसलमान अपने इस खून खराबे के इतिहास से बाहर निकलने को तैयार नहीं दीखते । ब्रिटिशर्स ने तो फिर भी बहुत से लोक कल्याणकारी कार्य किए जो आज भी अपनी पूरी बुलंदी के साथ दीखते हैं ।

आज इस सभ्य समाज में भी मुस्लिम समाज के लोग अपनी उन्नति मदरसों , मज़हबी अफीम और दारुल उलूम में ही देखते हैं । इस्लाम उन के लिए पहले है , मनुष्यता और देश भाड़ में जाए । एक से एक पढ़े-लिखे मुसलमान भी इस्लाम में ही पहली सांस ढूंढते हैं । एक मौलाना अंसार रज़ा बड़े फख्र से कहते हैं कि अगर मुसलमान होगा तो शरीयत का ही क़ानून मानेगा। ज्ञान-विज्ञान पढ़े मुस्लिम लोग भी अपनी पहचान मदरसों और दारुल उलूम में खोजते मिलते हैं तो यह देख कर बहुत हैरानी और तकलीफ होती है । सोचता हूं कि क्या यह पढ़े-लिखे लोग हैं ? आज भी आग पर चलना , देह पर छुरी मारना इन के लिए ज़रूरी है । यह अनायास नहीं है कि मुस्लिम समाज के स्वाभाविक नेता ओवैसी या आज़म खान जैसे जाहिल और जहरीले लोग हैं । यही रहेंगे । कांग्रेस , कम्युनिस्ट , सपा , बसपा , लालू , ममता  जैसे लोग इन को बिगाड़ कर पत्ते की तरह इन का वोट बटोरने के लिए हैं ही । सेक्यूलरिज्म का एक सो काल्ड कवच-कुंडल इन के पास है ही ।

ब्रिटिशर्स जिन को गांधी ने देश छोड़ने के लिए मज़बूर कर दिया , वह ब्रिटेन के संसद परिसर में गांधी की प्रतिमा बड़ी शान से लगाते हैं , रिचर्ड एटनबरो गांधी पर शानदार फ़िल्म बनाते हैं । अपने रुलर की छवि तोड़ कर , गुलाम बनाना भूल कर दोस्ताना व्यवहार बनाते हैं । और यहां हमारे मुस्लिम समाज के लोग आज भी एक आक्रमणकारी की निशानी बाबरी के लिए जान लड़ाने में अपना शौर्य समझते हैं । अपने आक्रमणकारी इतिहास में इन्हें इतना मजा आता है कि उस से निकलना अपनी तौहीन समझते हैं । वह आज भी अपने को वही खूखार रुलर समझने के नशे में चूर रहते हैं । गंगा-जमुनी तहज़ीब का नशीला फ़रेब अलग है । खैर , गंगा जमुनी तहज़ीब के बरक्स राहत इंदौरी का एक शेर मुलाहिजा कीजिए :

कब्रों की ज़मीनें दे कर हम मत बहलाइए
राजधानी दी थी , राजधानी चाहिए ।

भारत , चीन की तरह कोई तानाशाह देश तो है नहीं जो लोगों को नज़रबंद कर रखा जा सके। तो समय आ गया है कि इन को इन की एक राजधानी सहित एक नया देश दे दिया जाए या फिर म्यांमार की तरह सेना लगा कर , इन को खदेड़ कर , इन से मुक्ति पा ली जाए। ताकि यह भी अपने इस्लाम में सुकून से रह सकें और बाकी सभ्य लोग भी शांति से रह सकें। यह रोज-रोज के हिंदू , मुसलमान के जहर से किसी तरह छुट्टी मिले। क्यों कि जो लोग इस महामारी में भी मनुष्य होना नहीं , मुसलसल मुसलमान होना ही , मुसलमान होने के नाम पर अराजकता और हिंसा ही चाहते हैं , उन की किसी भी सभ्य समाज में ज़रूरत कैसे हो सकती है। कैसे खप सकते हैं ऐसे कट्टर लोग किसी मनुष्यता में , किसी सभ्यता में भला।