Tuesday, 31 March 2020

मरने के लिए मस्जिद से बेहतर कोई जगह नहीं है तो फिर देश लड़ चुका कोरोना से , आप पहुंचिए मस्जिद


दुनिया लड़ रही है कोरोना से। इस्लाम लड़ रहा है मनुष्यता से। इस का श्रेष्ठ उदाहरण दिल्ली के निजामुद्दीन में मरकज में इकट्ठा हुए तबलीगी जमात के हज़ारों लोग , देश भर के 19 राज्यों में अब फ़ैल जाना है। तुर्रा यह कि एक मूर्ख मौलाना बड़ी हेकड़ी से बता रहा है कि निजामुद्दीन से कोरोना पॉजिटव इस लिए निकल रहे हैं कि यहां जांच हो रही है। जांच न हो , तो नहीं निकलेंगे। सोचिए कि इस मौलाना का दिमाग कितना ख़राब है। दिक्क्त यह भी एक बड़ी है कि अपने को सेक्यूलर बताने वाले कुछ कुत्ते लेखक और पत्रकार तबलीगी जमात के इन कमीनों की पैरवी में कुतर्क का जखीरा ले कर खुल कर खेलने लगे हैं। रैबीज से भी ज़्यादा खतरनाक बन गए हैं यह जहरीले लेखक और पत्रकार। मुस्लिम समाज के लोगों को आत्म हत्या के लिए उकसाने वाले सेक्यूलर जमात के यह लोग , तबलीगी जमात से भी ज़्यादा खतरनाक हैं। यह दोनों जमात मनुष्यता की अपराधी है। इन का कुतर्क यह है कि मज़दूरों की भीड़ से कोरोना नहीं फैला। राशन की दुकानों पर भीड़ से कोरोना नहीं फैला। वैष्णो देवी में जो लोग थे , वह फंसे थे लेकिन निजामुद्दीन में लोगों को छुपाया गया बताया जा रहा है। 

गज़ब कुतर्क है यह भी। सोचिए कि मक्का बंद हो गया , वेटिकन बंद हो गया। बड़े-बड़े मंदिर बंद हो गए। हिंदू बहुल इस देश के लोग नवरात्र में भी , भूल कर भी मंदिर का रुख नहीं कर रहे। लेकिन हमारे देश की मस्जिदों से ऐलान हो रहा है कि अगर कोरोना से मरना ही है तो मस्जिद से बेहतर जगह कोई और नहीं हो सकती। मोदी के आह्वान पर लॉक डाऊन को फेल करने का भूत सवार है इन के दिलो-दिमाग पर। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इस के विवरण एक चैनल पर परोसते हुए बताया है कि इस तबलीग का मुखिया के भाषण यू ट्यूब पर अस्सी हज़ार से ज़्यादा लोग सुन चुके हैं। वास्तविकता यह है कि भारत का मुस्लिम समाज भारी अंधविश्वास में फंस चुका है। मुस्लिम समाज के एक से एक पढ़े-लिखे , अपने को प्रगतिशील बताने की बीमारी में धुत्त लोग भी इस अंधविश्वास की कालिख में अपना दिल-दिमाग और चेहरा रंगे हुए हैं। सेक्यूलरिज्म का लबादा ओढ़े यह लोग अभी तक हिंदू-मुसलमान की कबड्डी खेल कर अपना कोढ़ छुपाने के लिए सारी तोहमत भाजपा और संघियों पर लगाते रहे हैं। फिर जिस तरह सी ए ए को ले कर जिस तरह शहर दर शहर शाहीन बाग़ खड़े किए , जामिया मिलिया की हिंसा को जस्टीफाई किया। दिल्ली दंगों को अंजाम दिया। वह हैरतंगेज था। वारिस पठान जैसा जहरीला व्यक्ति खुलेआम कहता फिरा कि 15 करोड़ लोग , 100 करोड़ पर भारी पड़ेंगे। लोगों ने तब इसे गंभीरता से नहीं लिया। लेकिन अब दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में तबलीग कांड को देख कर लगता है कि निःसंदेह , वारिस पठान ठीक ही कहा था। 

मजहब की आड़ में मनबढ़ तो यह लोग पहले से थे पर इस सब से इन का मनोबल इतना बढ़ गया कि अब कोरोना को ले कर निजामुद्दीन का कोढ़ हमारे सामने है। और यह निजामुद्दीन ही नहीं , जगह-जगह की मस्जिदों से ऐसी खबरें निरंतर मिल रही हैं। मुश्किल यह है कि इतना कुछ होने के बावजूद तमाम मौलाना , मौलवी और इस्लामिक स्कालर कहे जाने वाले लोग अभी भी इस्लाम की आड़ में अपनी गलती को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। बल्कि अभी भी किसी भी कार्रवाई को वह इस्लाम के खिलाफ कार्रवाई का रंग देने पर आमादा हैं। कोरोना से बचने का नहीं , इस्लाम पर हमला , इस्लाम को बचाने का कुतर्क ले कर आज भी खड़े हैं। सेक्यूलर लबादा ओढ़े कुछ कुत्ते इन की हिफाजत में पूरी मुस्तैदी से खड़े हैं। मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस , सपा , बसपा , ममता जैसे लोग ही नहीं , भाजपा इन से ज़्यादा बढ़-चढ़ कर कर रही है। कोरोना की विश्वव्यापी आफत को देखते हुए यह पूरी तरह मनुष्य विरोधी है। 

कोरोना जैसी महामारी से लड़ने की राह में जो भी सेक्यूलर , जो भी कम्यूनल , जिस भी धर्म , जिस भी जाति का खड़ा मिले उस के खिलाफ बिना रियायत कड़ी कार्रवाई करने का समय आ गया है। नहीं किया गया ऐसा तो कोरोना की महामारी की चपेट में आ कर देश अनगिन लाशों से पट जाएगा। रही बात सरकार की तो धृतराष्ट्र बने अमित शाह से दिल्ली त्राहिमाम कर गई है। इस लिए कि दिल्ली पुलिस उन की कमान में आ कर निकम्मी और लाचार हो गई है। पहले दिल्ली ने शाहीनबाग झेला। फिर सीलमपुर , जाफराबाद आदि। फिर भयानक दंगे। और अब कोरोना का निजामुद्दीन कांड। दिल्ली कराह रही है , गृह मंत्री अमित शाह के इस निजाम से। अमित शाह को अपनी विफलता को देखते हुए इस्तीफ़ा देने की गलती कर देनी चाहिए। उन की तमाम गलतियों से छोटी गलती होगी यह। 

तो कोरोना भी क्या किसी जेहाद का औजार बन गया है ?


तो कोरोना फैला कर देश को मुश्किल में डालना भी किसी जेहाद का हिस्सा है। आखिर बीच लॉक डाऊन दिल्ली के निजामुद्दीन में आयोजित मरकज का मकसद क्या था ? 15 देशों के कोई 500 से अधिक जेहादी इस मरकज में शामिल हुए थे। लॉक डाऊन में भी इन की मजलिस चालू रही। कोरोना ले कर आए विदेशी जेहादी भी इस में जी-जान से लगे रहे। शाहीन बाग़ के प्रणेता अरविंद केजरीवाल को तो इस तरफ से आंख मूंद कर रहना ही था पर निकम्मे गृह मंत्री अमित शाह और उन की दिल्ली पुलिस क्या कर रही थी भला ? अमित शाह की निकम्मई और लापरवाही अभी देश को जाने कितना मुश्किल में डालने वाली है। अब तो यह भी साबित हो गया है , निरंतर साबित होता जा रहा है कि भाजपा , कांग्रेस से कहीं ज़्यादा मुस्लिम तुष्टिकरण कर रही है। तमाम मामले इस के सुबूत हैं। जब कि भाजपा , कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण को ही मुद्दा बना कर लोकसभा के बीते दो चुनाव जीत चुकी है। 
यह भाजपा के मुस्लिम तुष्टिकरण का ही नतीजा है कि निजामुद्दीन मरकज से निकले सैकड़ो जेहादी कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश भर में फ़ैल गए हैं। मरकज में शामिल विभिन्न जगहों से दस जेहादी तो खुद आत्मघाती बम बन कर एक ही दिन में 72 हूरों की प्राप्ति के लिए कूच कर गए हैं। कुछ छुप गए हैं , कुछ क्वारंटीन कर दिए गए हैं। अभी जाने कितने , कितनों को संक्रमित कर चुके होंगे , कितनों को करेंगे। अकेले दिल्ली में मरकज के चक्कर में सैकड़ों लोग कोरोना की चपेट में आ कर अस्पताल में हैं। यह मोदी विरोध की बीमारी में लॉक डाऊन को फेल करने का जेहाद , लीगी मानसिकता , तिस पर सेक्यूलरिज्म का तड़का , कोरोना की फसल को फूलने , फलने में गजब किरदार निभा रहा है। कोढ़ में खाज यह कि इस बाबत एक मौलाना के खिलाफ हुई एफ आई आर को रद्द करने के लिए देशव्यापी मुहिम शुरू हो गई है। जेहाद चालू आहे ! देश जाए भाड़ में। मनुष्यता की ऐसी-तैसी। 
मौत के दूतों , लोग तंज में आप को , आप के समुदाय को शांति दूत कहने लगे हैं। इस से भी कुछ समझ में नहीं आता ? अपने मुंह का कालिख छुपाने के लिए संविधान का पहाड़ा पढ़ने वाले यह कुछ लोग , इस्लाम पहले , देश बाद में , की रट लगाने वाले लोगों को यह तो जान ही लेना चाहिए कि कोरोना मोदी नहीं , साक्षात यमराज है। कोरोना काफिर और जेहादी में फर्क नहीं करता। इस की रोकथाम की कोई दवा दुनिया में फ़िलहाल नहीं है। है तो सिर्फ लॉक डाऊन।  अकेले रहना। घर में रहना। किसी से न मिलना। मजलिस , नमाज , पूजा , अरदास आदि कोई भी कोरोना की काट नहीं है। जेहाद भी नहीं। अब से सही , मूर्खता से नहीं , बुद्धि और संयम से काम लें। कोरोना के विदा होने के बाद जेहाद कर लीजिएगा। मोदी को नेस्तनाबूद कर लीजिएगा। अभी तो अकेले रह कर कोरोना को पीटिए और भगाइए। जान है तो जहान है।

Sunday, 29 March 2020

श्रमिकों के हाथ फिर काट लिए गए हैं , तब आगरा का शाहजहां था , अब दिल्ली का केजरीवाल है


एक तो मज़दूर दिल्ली से निरंतर पलायन पर आमादा हैं। दूसरे एक दिल्ली के मुख्य मंत्री हैं अरविंद केजरीवाल जो निरंतर अपना विज्ञापन प्रसारित करवा रहे हैं। अपने खोखले दावों का पुलिंदा परोस रहे हैं , जिन की पोल खुल चुकी है । एक विज्ञापन में केजरीवाल खुद अवतरित हो रहे हैं अपने पाखंडी सुभाषित उच्चारते हुए। दूसरे विज्ञापन में कोई डाक्टर लगातार हाथ धोने आदि पर ज्ञान दे रहा है। विज्ञापन का यही पैसा अगर केजरीवाल सरकार ने गरीब मज़दूरों पर ईमानदारी से खर्च किया होता तो यह पलायन रुक सकता था। बिहार , उत्तर प्रदेश कोरोना की संभावित आग में झुलसने से बच जाता। दूसरा कोई और एक भी मुख्य मंत्री इस तरह दिन में दस बार चैनलों पर विज्ञापन दे कर जनता का धन खर्च कर रहा हो तो कृपया बताएं। स्पष्ट है कि नहीं है। तो क्यों न मान लिया जाए कि अरविंद केजरीवाल न्यूज़ चैनलों को यह विज्ञापन बतौर रिश्वत दे रहे हैं। ताकि मज़दूरों के पलायन खातिर बनाए गए उन के  लाक्षागृह का पर्दाफाश कोई न करे। उन का यह राजनीतिक कमीनापन विज्ञापन की लाल कालीन के नीचे छुपा रहे। 

कायदे से ऐसा विज्ञापन तो उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ को देना चाहिए। जो निरंतर इन लाखों मज़दूरों के लिए बस।  शेल्टर होम , डाक्टर , भोजन , बस आदि की व्यवस्था में दिन-रात लगे हैं। गांव-गांव सफाई , सब्जी , कौन आया की शिनाख्त और एकांत की व्यवस्था करवा रहे हैं। हर जगह शहर हो या गांव , लोगों के लिए फल , सब्जी , अनाज के ट्रक ले कर पुलिस पहुंच रही है। पर काम करने वाले को विज्ञापन की ज़रूरत कहां पड़ती है भला। विज्ञापन की ज़रूरत तो पाखंडी राजनीतिज्ञों को ही पड़ती है। जो नेता विज्ञापन दे कर बात करे समझ लीजिए , वह कमीना है। एक नंबर का झूठा है। 

बल्कि इस समय जिस मुश्किल में बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार और बिहार है , कोई नहीं है। प्रवासी बिहारी मज़दूरों का सैलाब है , बिहार में और संसाधन शून्य। नीतीश कुमार कैसे जूझ रहे हैं वही जान रहे हैं। नीतीश कुमार का एक पुराना सहयोगी प्रशांत किशोर। जो इस समय अरविंद केजरीवाल का ख़ास बना हुआ है , कहा जा रहा है कि बिहारी मज़दूरों के दिल्ली से पलायन का ब्ल्यू प्रिंट इसी कमीने प्रशांत किशोर का बनाया हुआ है , जिसे दूसरा कमीना केजरीवाल कंप्लायंस कर रहा है। ताकि बिहार चौपट हो जाए। खुदा जाने लोग कोरोना से कैसे निपटेंगे , ऐसे कमीनों के रहते हुए। 

दूसरी तरफ कम्युनिस्ट लोग हैं जो इस बरबादी की आग में हाथ ताप रहे हैं। मोदी विरोध के एजेंडे में पागल कम्युनिस्ट एक तरफ नक्सल हिंसा में सुरक्षाबलों के जवानों को मार रहे हैं दूसरी तरफ करोना में लोगों के मरने का वर्णन और विवरण ऐसे पेश कर रहे हैं गोया क्या पा गए हैं। मोदी को तुगलक बताते हुए हर उस इंतज़ाम में सक्रिय हैं जिस से लॉक डाऊन फेल कर जाए। कोरोना का जनक चीन है लेकिन यह लोग चीन का नाम नहीं ले पा रहे। केरल कोरोना की चपेट में दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर महाराष्ट्र है। केरल से रोज ही किसी कोरोना पीड़ित की मृत्यु की खबर आ रही है। लेकिन यह कामरेड लोग बता रहे हैं कि केरल की हालत बहुत बढ़िया है। 

अब इस का भी क्या करें कि हर विपदा की आग तापने के लिए लालायित प्रियंका गांधी और राहुल गांधी एक बार भी दिल्ली से पलायन कर रहे मज़दूरों का दुःख , दर्द जानने दिल्ली में रहते हुए किसी बस अड्डे पर नहीं गए। न उन से यहीं रुक जाने की कोई अपील की। हां , कांग्रेसी भक्त यह सूचना ज़रूर परोस रहे हैं कि प्रियंका गांधी ने मोबाइल आपरेटरों को चिट्ठी लिख कर मोबाइल सेवा मुफ्त करने की अपील की है। अजीब मोड़ पर खड़ा हो गया है देश। कभी हम नारा लगाते थे , कमाने वाला खाएगा ! यानी श्रमिक का श्रम ही सर्वोच्च है। क्या पता था कि श्रमिकों की किस्मत में इस तरह का दिन भी आएगा , कुछ कमीने राजनीतिज्ञों के चलते। क्या दिल्ली के विकास में इन श्रमिकों का कुछ भी अवदान नहीं ? शाहजहां की याद आती है। जिस ने ताजमहल बनवाने के बाद ताजमहल बनाने वाले हज़ारों कारीगरों और मज़दूरों के हाथ कटवा दिए थे। तब आगरा का शाहजहां था , अब दिल्ली का केजरीवाल  है। श्रमिकों के हाथ फिर काट लिए गए हैं। पलायन का लाक्षागृह बना कर। पलायन का लाक्षागृह बना कर। 

Saturday, 28 March 2020

केजरीवाल , अराजक भीड़ और अमित शाह की नाकामी के बीच योगी

जाने कितना सच है , कितना झूठ। पर दिल्ली से मज़दूरों के पलायन और भगदड़ को ले कर सोशल मीडिया पर अरविंद केजरीवाल को कमीना बता कर सारा दोष उन के मत्थे मढ़ दिया गया है। क्या बिहार और उत्तर प्रदेश के मज़दूर सिर्फ दिल्ली में ही रहते हैं ? मुंबई , कोलकाता आदि में नहीं ? बाकी शहरों में यह भगदड़ क्यों नहीं मची है। सवाल तो केजरीवाल के सिर पर पत्थर की तरह मारा ही जाएगा। लाखों लोग दिल्ली की सड़कों पर लॉक डाऊन को धता बता कर फ़ैल गए हैं। इन मज़दूरों के श्रम का दिल्ली के विकास में कोई योगदान नहीं है ? कि बिजली , पानी की मुफ्तखोरी में आ कर इन मज़दूरों ने  आम आदमी पार्टी को वोट नहीं दिया था। वह कौन साढ़े चार लाख लोग हैं जिन्हें दिल्ली की प्रदेश सरकार रोज भोजन करवाने का ढिढोरा पीट रही है। यह लोग तो वह नहीं हैं।   

फिर इतना कुछ गुज़र जाने के बाद भी गुरु घंटाल अमित शाह कहां हैं ? कर क्या रहे हैं ? दिल्ली पुलिस की यह बहुत बड़ी नाकामी है गृह मंत्री महोदय। दिल्ली दंगे आप की नाक के नीचे हो जाते हैं। शाहीनबाग आप की निकम्मई का कुतुबमीनार बन कर खड़ा हो जाता है। आप कुछ कर नहीं पाते। दिल्ली की एक सड़क खाली नहीं करवा पाते। फिर मज़दूरों से सड़क भर जाती है। क्या यह लोग भारतीय नहीं हैं , भारत के गृह मंत्री जी ? लेकिन आप असहाय दीखते हैं। काहे के गृह मंत्री हैं आप। सिर्फ 370 और तीन तलाक खत्म करने के लिए।  केजरीवाल तो घोषित कमीने हैं पर आप को अब असफल और निकम्मा गृह मंत्री घोषित करने में भी अब देरी की भी क्यों जाए। मोदी के सारे यश को कब तक घोंट-घोंट कर पीते रहेंगे भांग की तरह। इस्तीफ़ा काहे नहीं दे देते। 

आप से बेहतर तो उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ साबित हुए हैं जिन्हों ने इन मज़दूरों को संभाल लिया है। गाज़ियाबाद में सैकड़ों बस भेज कर , डाक्टर भेज कर शेल्टर होम बना कर। कुछ करिए मान्यवर आप भी। यह कोरोना है। संसद की जोड़-तोड़ और गुणा भाग नहीं। महामारी अगर पसर गई देश में तो देश में आग लग जाएगी। गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा हो गया है देश आप की दिल्ली पुलिस की लापरवाही के कारण। उत्तर प्रदेश , बिहार के गांव-गांव में झगड़े , गाली-गलौज शुरू हो गया है , इन प्रवासियों के पहुंचने पर। हर कोई अपनी जान की फ़िक्र में है। बस इस अराजक भीड़ को फ़िक्र नहीं है अपनी जान की , न दूसरे की जान की। होती तो उपवास कर के सही रह लेती। सड़क पर नहीं उतरती इस तरह। भीड़ को क्यों सड़क पर फैलने दिया दिल्ली पुलिस ने ? किस की शह और किस की रणनीति , किस की साज़िश का ग्रास बन गई दिल्ली पुलिस। क्या आप इस बात को भी सिर्फ संसद में ही बताएंगे ? कि कोई निर्णायक कार्रवाई भी करेंगे। 

Friday, 27 March 2020

तो जिन के घर कोई जा नहीं सकता , वह कह रहे हैं कि अपने दरवाज़े पर फ्री फ़ूड लिख दें

रंज दोस्तों को बहुत है मगर आराम के साथ


इन दिनों अजब-अजब लोग , गज़ब-गज़ब मशवरा दिए जा रहे हैं। नकली आह्वान और फर्जी कविताएं , दिखावटी आंसू परोसे जा रहे हैं। टी वी पर , फेसबुक , ट्वीटर या वाट्स अप पर कोई विवरण देखा , चांप दी दू ठो कविता। निकाल दिए आंसू , घर बैठे-बैठे। कर दिया आह्वान। चला दिया फर्जी विमर्श। अब कि जैसे एक नामी एंकर जो अपनी निगेटिविटी के लिए खूब कुख्यात हैं , ने लिख दिया है कि आप अपने दरवाजे पर फ्री फ़ूड लिख दें। और लोगों को फ्री फ़ूड दें। गुड है। पढ़ने में भी बहुत गुड लगता है। लेकिन यह एंकर महोदय क्या तमाम लोग अब ऐसी जगह पर रहते हैं , जहां सामान्य दिनों में भी कोई परिचित , कोई मित्र भी आसानी से बेधड़क , बेरोक-टोक नहीं जा सकता। गार्ड गेट पर ही रोक लेता है और आप से पूछ कर ही , अगले को परिसर में प्रवेश लेने देता है। तो जिन के घर कोई जा नहीं सकता , वह कह रहे हैं कि अपने दरवाज़े पर फ्री फ़ूड लिख दें। 

और इन दिनों तो आलम यह है कि इन सोसाइटियों में घोषित रूप से किसी भी बाहरी के आने पर पाबंदी है। साफ़ कह दिया गया है कि कोई मेहमान भी अब एलाऊ नहीं है। यहां तक कि काम वाली बाई भी एलाऊ नहीं है । बस जो यहां रहता है , स्थाई रूप से वही बाहर-भीतर हो सकता है , एक निश्चित समय सीमा के तहत। तो इस फ्री फ़ूड को कहां लिखने को कह रहे हो पार्टनर ? काहे नाखून कटवा कर शहीद बनने को आतुर हो महराज ! किस की आंख में धूल झोंक रहे हो प्रभु ! फिर बिचारे गरीब प्रवर , किसी अभागे मज़दूर के लिए ही तो फ्री फ़ूड लिख रहे हैं श्रीमान ! वह समझ पाएगा कि इस का मतलब क्या है ? मैं ने तो पाया है कि इसी दिल्ली , इसी एन सी आर में लोग टू-लेट लिखा देख कर को ट्वायलेट समझ लिया है और फारिग होने पहुंच गए हैं। और आप फ्री फ़ूड लिख कर अपनी कांस्टीच्वेंसी एड्रेस कर रहे हैं। उन स्कॉच पीने वालों की कांस्टीच्वेंसी में वाह-वाह बटोर रहे हैं , जो लोग जब देश के अधिकांश लोग राशन , पानी बटोर रहे थे कि महीना भर तो चल जाए , और यह लोग कैरेट की कैरेट स्कॉच , ह्विस्की , रम , काजू, बादाम , पनीर ,चिकेन , मटन आदि-इत्यादि स्टोर कर रहे थे कि आने वाले दिनों में कोटा कम न पड़े। और जो लोग इस में किसी कारण चूक गए। स्टोर नहीं कर पाए , आज खुल्ल्मखुल्ला आह, आह कर रहे हैं। इसी सोशल मीडिया पर। वह लोग जो रोज-ब-रोज मेहनतकशों की पैरवी में , सेक्यूलरिज्म की पिछाड़ी धोने के लिए सरकार की ईंट से ईंट बजाने की फर्जी हुंकार भरते रहते हैं। अकबर इलाहाबादी का वह शेर है न :

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ 
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ 

तो कहूं कि रंज दोस्तों को बहुत है मगर आराम के साथ। 

फिर एक जमात हरामखोर कवियों की है। फर्जी संवेदना में भीगी कविताओं का सैलाब आ गया है। मज़दूरों की पैदल जाती भीड़ इन कवियों से देखी नहीं जा रही। कविताओं की खेप की खेप खड़ी हो रही है। जहालत के मारे इन नाशपीटों से यह एक लाइन लिखते नहीं बन रही है कि यह गलत है , तुम्हारा जाना। जहां भी जाओगे , वहां के लोगों को सांसत में डालोगे। यह समय सारा दुःख , सारी भूख समेट कर जहां हो वहीँ रहने का है। कोरोना को फ़ैलाने की चेन मत बनो। संकट मत बनो , अपने परिजनों , अपने गांव , अपने मुहल्ले के लिए। अपने लिए। तमाम उदारवादी लोग यह भी नहीं लिख पा रहे कि मस्जिदों में नमाज इस समय नाजायज है। मौलानाओं , मनुष्यता और देश को संकट में मत डालो। यह समय मस्जिद या कहीं भी मजलिस करने का नहीं। अकेले रहने का समय है यह। घर में दरवाज़ा बंद कर रहने का समय है यह। लेकिन भीड़ की भीड़ पुलिस पीटती हुई निकाल रही है मस्जिदों से। तिस पर तमाम चीनी मौलाना जाने कहां से आ गए हैं इन मस्जिदों में शरण लेने। यत्र-तत्र। अरे , आप सड़क पर , पार्क में , रेलवे स्टेशनों पर , ट्रेन में नमाज पढ़ते रहे हैं। अब ज़रा घर में भी पढ़ लीजिए। घर में भी सबाब मिल जाएगा। अल्ला तो कण-कण में उपस्थित है। यह कैसी ज़िद है कि मस्जिद की नमाज में ही सबाब मिलेगा। अरे ज़िंदगी रहेगी तभी , सबाब भी मिलेगा। एक साथ कितनों की ज़िंदगी जहन्नुम बनाने का इरादा क्यों है भला। 

जब जत्थे के जत्थे लोग सडकों पर पैदल जाते दिखने लगे , इस के पहले ही  दिल्ली की सरकार को ऐलान कर देना था कि किसी को कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है। जो भी कहीं जाएगा , उस के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।  और कि हर किसी के रहने , भोजन की ज़िम्मेदारी सरकार ही की होगी। भारत की बेलगाम पढ़ और अनपढ़ जनता कोई बात कड़ाई और लाठी से जल्दी समझती है। तो यह कोरोना की चेन , देश भर में फैलती चेन , गांव-गांव फैलती चेन आसानी से रोकी जा सकती थी। यही काम सभी प्रदेश सरकारों को सख्ती से करना चाहिए था। पर अफ़सोस कि अब बहुत देर हो चुकी है। जनता-जनार्दन जगह-जगह फ़ैल चुकी है। गरीब मज़दूरों के इस निरंतर प्रस्थान का जाने क्या नतीजा मिलेगा , मैं नहीं जानता। पर खतरा तो सौ गुना बढ़ ही गया है। गांव-गांव इन पहुंचने वालों का विरोध भी शुरू हो चुका है। कहीं यह विरोध लोगों की मार-पीट में न बदल जाए। गाली-गलौज पर तो आ ही चुका है। 

लाखो , करोड़ो डकारने वाले तमाम एन जी ओ हैं देश में। देख रहा हूं कि सोशल मीडिया पर आ कर यह एन जी ओ वाले लोग भीख ही मांगने में अभी संलग्न हैं। मदद जाने कब करेंगे।

दिल्ली में न्यूज़ चैनलों की खबरों पर अगर यक़ीन कर लिया जाए तो मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल निरंतर प्रशंसनीय काम कर रहे हैं। गरीबों को भोजन के बाबत। बाकी प्रदेश सरकारों को भी केजरीवाल का अनुसरण करना चाहिए। क्यों कि पेट की भूख आदमी की पहली प्राथमिकता होती है। फिर गरीब आदमी के पास एक भूख ही तो है। जिस के लिए वह जीता और मरता है। सारा जीवन भूख से संघर्ष में ही बीत जाता है। तो गरीबों , मज़दूरों की भूख और रहने की पहली प्राथमिकता मान कर सरकारों और सामाजिक संगठनों को काम करना चाहिए। लेकिन इस से भी ऊपर है कोरोना का कैरियर बनने से लोगों को रोकना। भले पुलिस की लाठियों से ही रुके। कोरोना रुकेगा , तभी जीवन शेष रहेगा। सिर्फ कुछ लोगों की मुश्किल और भूख रोकने के लिए समूचे देश को कोरोना की सूली पर चढ़ाना गुड बात नहीं होगी। देवेंद्र कुमार की मशहूर कविता है ; बहस ज़रूरी है। वह लिखते हैं :

समन्वय, समझौता, कुल मिला कर
अक्षमता का दुष्परिणाम है
जौहर का किस्सा सुना होगा
काश! महारानी पद्मिनी, चिता में जलने के बजाए
सोलह हजार रानियों के साथ लैस हो कर
चित्तौड़ के किले की रक्षा करते हुए
मरी नहीं, मारी गई होती
तब शायद तुम्हारा और तुम्हारे देश का भविष्य
कुछ और होता!
यही आज का तकाजा है
वरना कौन प्रजा, कौन राजा है?

शराबी , औरत की पिटाई , डाक्टर और गरारा करने की तजवीज

इन दिनों दिन-रात साथ-साथ रहने से कुछ परिवारों में दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। ऐसा रोज सुनने में आ रहा है। बात कोरोना से भी गंभीर होती जा रही हैं। सो बात समझिए , लतीफा समझिए लेकिन सुनिए और अमल में लीजिए देवियों। घर में , घर आसान लगेगा।

क्या हुआ कि एक औरत किसी डाक्टर के पास गई और अपने शराबी पति की समस्याएं बताते हुए बताया कि रोज पी कर आता है और मुझे पीटता है। बहुत पीटता है। क्या करुं। कैसे छुड़ाऊं उस की शराब कि वह पीना और पीटना बंद कर दे। ऐसी कोई दवा दे दीजिए। कोई और डाक्टर होता तो आलतू, फालतू दवा दे कर उस बिचारी को लूटता रहता। लेकिन वह थोड़ा शरीफ था। सो डाक्टर ने कहा कि दवा तो नहीं है इस की कोई लेकिन तुम्हें पिटने से बचाने का एक मुफ्त की देसी दवाई है मेरे पास। इसे ही दवा मान लो और शुरू करो। औरत मान गई।

डाक्टर ने बताया कि उस का पति जब भी घर में घुसे वह गरारा करने लगे। कोई 15 दिन तक ऐसा करो। और जो फायदा न हो तो आ कर बताओ। औरत ने ऐसा ही किया और 15 दिन बाद डाक्टर के पास पहुंची। डाक्टर ने पूछा कि दवा ने काम किया ? औरत खुश हो कर बोली , पूरा फायदा हुआ। शत-प्रतिशत। पर अब ? डाक्टर ने कहा , 15 दिन और यही दवा आजमाओ और गरारे करती रहो। औरत 15 दिन बाद फिर पहुंची खुश-खुश। और बोली कि मेरा पिटना तो पूरी तरह खत्म हो गया। पर उस का पीना नहीं छूट रहा। डाक्टर ने कहा कि पिटना खत्म हुआ तो शराब भी छूटेगी। थोड़ा समय लगेगा। फिर कहा कि महीने बाद मिलो। और हां , पति के घर आते ही , यह गरारे करती रहो। बिना नागा। एक भी दिन मिस मत करना। लेकिन औरत अगले ही हफ्ते डाक्टर के पास आ गई। डाक्टर देखते ही घबराया। बोला , गरारा छोड़ दिया क्या ? औरत बोली , नहीं।

फिर ? डाक्टर ने पूछा। औरत अपने साथ एक औरत ले कर गई थी सो बोली , यह मेरी पड़ोसन है। इस का पति भी पी कर आता है और इसे रोज पीटता है। डाक्टर मुस्कुराया और उस दूसरी औरत को भी पति के घर आते ही गरारे करने की तजवीज दी। फिर तीसरी औरत आई। चौथी औरत भी आई। डाक्टर ने सभी को गरारे करने की तजवीज दी। अब पहली औरत एक दिन डाक्टर के पास आई और बोली कि यह क्या आप तो सब को एक ही दवा बता रहे हैं गरारा करना।

डाक्टर ने हंसते हुए पूछा , इस गरारे के बाद तुम कभी पिटी ? नहीं न ? औरत बोली , नहीं। डाक्टर ने पूछा , पति के शराब में कुछ कमी आई ? कभी नागा किया पीने में ? औरत ने हां में सिर हिलाया। तब डाक्टर ने कहा कि अभी तक तुम इतनी सी बात नहीं समझ पाई कि पति से बेमतलब उलझना , टोका-टाकी ही तुम्हारी पिटाई का कारण है। पति के आते ही तुम गरारा करने लगती हो , टोका-टाकी नहीं करती , उलझती नहीं , सो पिटती नहीं। अगर इतनी सी बात समझ आ गई हो तो आज से गरारा बंद कर दो। चुप रहना सीख लो। मौका देख कर अपनी बात करो। शराब पिए हुए व्यक्ति से मत उलझो। जब सामान्य स्थिति में हो तब अपनी बात करो। नहीं चिढ़ती और चिढ़ाती रहोगी तो कोई डाक्टर कुछ नहीं कर पाएगा। औरत डाक्टर की बात समझ गई और हां में सिर हिला कर चुपचाप चली गई।

फिर डाक्टर की यह बात स्त्री और पुरुष दोनों ही पक्ष के लिए लागू होती है। अब हो सकता है कुछ लोग इस टिप्पणी को पुरुषवादी और स्त्री विरोधी होने का हवाला भी दे सकते हैं। वह इस के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन हर घर में शांति और सुख बहुत ज़रूरी है। ऐसा मैं मानता हूं। चाहे कोई कुछ भी सोचे। कुछ मैं उठता हूं , कुछ तू झुक जा ! से ही परिवार और समाज चलता है। किसी फर्जी विमर्श से नहीं।

Saturday, 21 March 2020

कोरोना वायरस , मोदी वायरस और गिलहरी प्रयास


दुनिया भर के लोग इस समय एक ही वायरस से लड़ रहें है , वह है , कोरोना वायरस। लेकिन भारत में स्थिति थोड़ी बदली हुई है। भारत में लोग दो वायरस से लड़ रहे हैं। इन में अधिकांश क्या लगभग 90-95 प्रतिशत लोग कोरोना वायरस से ही लड़ रहे हैं। उस को नेस्तनाबूद करने के लिए कमर कस चुके हैं। पर हैं कुछ मुट्ठी भर लोग जो कोरोना वायरस से नहीं , मोदी वायरस से लड़ रहे हैं। अनंत काल तक मोदी वायरस से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध यह लोग कोरोना से खतरनाक मोदी को मानते हैं। मानते ही रहेंगे। इन की इस बीमारी का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है। खैर , देर-सवेर कोरोना वायरस का वैक्सीन मनुष्यता खोज लेगी। वैज्ञानिक खोज लेंगे। लेकिन यह लोग तो मोदी वायरस का वैक्सीन 2014 से ही बनाए बैठे हैं। नफरत , घृणा और नित्य जहर उगलने की वैक्सीन लगातार इस्तेमाल में है लेकिन जाने क्यों कारगर नहीं हो रही है। देखना दिलचस्प होगा कि कब कामयाब होती है उन की यह वैक्सीन। फिलहाल तो यह मोदी वायरस से लड़ने वाले लोग कल जनता कर्फ्यू को विफल करने के असंभव प्रयास में संलग्न हैं। 

जनता कर्फ्यू से विरोध इन का मात्र इतना ही है कि इस का आह्वान मोदी नाम के निकृष्ट व्यक्ति ने क्यों किया है। सो विफल करना ही करना है इसे। कोरोना भले इन्हें अपनी गिरफ्त में ले ले , लेकिन यह लड़ेंगे आख़िरी सांस तक मोदी वायरस से ही। कभी एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या सीखी थी। अब ठीक उसी तरह मोदी वायरस की मूर्ति बना कर इस मूर्ति से लड़ने वालों ने घृणा , नफरत और जहर की मिलीजुली वैक्सीन बना कर , असहिष्णुता तथा सेक्यूलरिज्म के पैकिंग में जो प्रोडक्ट उतारा है , 2014 से उस को लगातार आजमा रहे हैं। कल भी आजमाएंगे। नित्य-प्रति आजमाएंगे। देखना दिलचस्प ही होगा कि जनता कर्फ्यू को विफल करने में उन की यह मोदी वायरस वाली वैक्सीन कितना दम दिखाती है। 

मोदी वायरस की मूर्ति टूटती है या नहीं , यह तो हम नहीं जानते। लेकिन यह ज़रूर जानते हैं कि कोरोना वायरस से लड़ने में हम ज़रूर कुछ न कुछ कामयाब होंगे। क्यों कि देश भर के डाक्टर , सिस्टम , एहतियात , दवाई , सावधानी , आदि-इत्यादि तो सहयात्री हैं ही इस राह और इस लड़ाई में पर कल इस जनता कर्फ्यू के मार्फ़त कोरोना वायरस से लड़ने में मैं भी राम की उस गिलहरी की तरह शामिल हूं। अपने गिलहरी प्रयास में कोई कमी , कोई कसर नहीं छोडूंगा। देश के करोड़ो-करोड़ लोग शामिल होंगे , ऐसा विश्वास है। 

अब आप पूछेंगे कि यह गिलहरी प्रयास क्या बला है।  तो लीजिए यह कथा भी बांच देता हूं। 

हुआ यह कि जब लंका पर आक्रमण के लिए समुद्र पर पुल बन रहा था तो नल-नील , भालू , वानर आदि-इत्यादि समेत हर कोई पुल बनाने में अपनी ताकत भर लगा पड़ा था। एक गिलहरी ने जब यह सब देखा तो वह भी उत्सुक हुई कि कुछ कार्य करे। पर अपनी देह संरचना से लाचार हो गई। पर जल्दी ही उसे एक उपाय सूझ गया। वह समुद्र की रेत पर लोट-पोट करती और पुल बनने की जगह जा कर अपनी देह झाड़ देती। ऐसा वह बार-बार करती रही। यह दृश्य जब राम ने देखा तो गिलहरी के इस प्रयास पर मुग्ध हो गए। फिर राम ने सोचा कि जब गिलहरी अपनी क्षमता भर रेत इकट्ठा कर रही है पुल बनाने के लिए तो मैं ही क्यों ख़ाली बैठूं। उन्हों ने देखा कि लोग पत्थर पर राम-राम लिख कर समुद्र में डाल रहे हैं। तो राम ने भी एक पत्थर उठाया। फिर सोचा कि इस पत्थर पर अपना ही नाम क्या लिखना भला। सो पत्थर पानी में डाल दिया। लेकिन पत्थर डूब गया। एक पत्थर डूबा , दो पत्थर डूबा , तीन पत्थर डूबा। पत्थर डूबते ही जा रहे थे। राम घबरा गए। पीछे मुड़ कर देखा कि कहीं कोई देख तो नहीं रहा। देखा तो पाया कि यह सब कुछ हनुमान देख रहे थे। सो बुलाया हनुमान को और पूछा कि कुछ देखा तो नहीं ? हनुमान ने कहा कि प्रभु , सब कुछ देखा। तो राम ने कहा , चलो जो देखा सो देखा पर किसी को यह बताना नहीं। नहीं बड़ी बदनामी होगी। हनुमान ने कहा कि न प्रभु , मैं तो सभी को बताऊंगा। बताऊंगा कि राम-नाम के बिना प्रभु राम का भी कल्याण नहीं है। खैर यह राम नाम बिना राम का कल्याण वाली कथा और भी हैं। और इस के मोड़ और परिणाम भी बहुत। फिलहाल तो गिलहरी प्रयास की बात। 

तो मित्रों , कोरोना वायरस से लड़ने के लिए कल जनता कर्फ्यू के मार्फत अपना गिलहरी प्रयास मैं भी जारी रखूंगा। आप क्या करेंगे , यह आप जानें। चाहें तो मोदी वायरस से लड़ें , चाहे कोरोना वायरस से। यह आप का अपना विवेक है। 



Thursday, 12 March 2020

सोनिया अहंकार के बुलडोजर ने लोगों के आत्म-सम्मान को कुचल कर अपना ईगो मसाज किया है


गांधी परिवार से अपमानित हो कर दोस्तों का विदा होना अब एक परंपरा में तब्दील है। अभी-अभी तो राहुल गांधी के कालेज के समय के मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया विदा हुए हैं। राहुल गांधी ने आज किसी तरह इस प्रसंग पर सिला मुंह खोला तो है और सारा ठीकरा आर एस एस पर ही फोड़ा है। लेकिन राहुल मंडली के बाकी सदस्य तो खामोश हैं। यथा आर पी एन सिंह। लेकिन एक समय था कि राजीव गांधी के तो कई सारे दोस्त विदा हुए। बतर्ज बिछड़े सभी बारी-बारी। और लगभग सभी के विदा होने का मुख्य कारण सोनिया गांधी ही मानी गईं। खास कर सोनिया गांधी का अहंकार। सोनिया के अहंकार के बुलडोजर ने बहुतेरे लोगों के आत्म-सम्मान को कुचल कर अपना ईगो मसाज किया है। 

याद कीजिए अमिताभ बच्चन। राजीव गांधी और अमिताभ बचपन के गाढ़े मित्र थे। नेहरू , इंदिरा के समय से ही पारिवारिक मित्रता थी। सोनिया को ले कर जब पहली बार राजीव गांधी भारत आए तो इंदिरा गांधी समेत समूचा परिवार सोनिया के खिलाफ था। तो दिल्ली एयरपोर्ट पर राजीव और सोनिया को रिसीव करने एकमात्र अमिताभ बच्चन ही पहुंचे थे। और कि सोनिया गांधी को दिल्ली स्थित अपने पिता हरिवंश राय बच्चन के घर गुलमोहर एंक्लेव ले कर पहुंचे थे। जब तक इंदिरा गांधी ने सोनिया पर अपनी सहमति नहीं दी , राजीव से विवाह के लिए तब तक सोनिया अमिताभ के घर ही रहीं। यहां तक को सोनिया को भारतीय रीति-रिवाज , साड़ी पहनना आदि भी अमिताभ की मां तेजी बच्चन ने ही सिखाया। 

यहां तक कि बाद में सोनिया के बच्चे राहुल और प्रियंका भी बचपन में ज़्यादातर समय तेजी बच्चन के साथ ही रहे। प्रियंका आज भी स्वीकार करती हैं कि उन की हिंदी अच्छी इस लिए है कि उन्हें तेजी जी ने हिंदी सिखाई। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव की मदद के लिए वह राजनीती में भी आए। लेकिन बाद के समय में सोनिया गांधी ने अमिताभ बच्चन के साथ क्या-क्या नहीं किया। अमिताभ बच्चन को बरबाद करने के लिए सोनिया ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। चाहा कि घर दुआर सब बिक जाए। अमिताभ सड़क पर आ जाएं। वह तो अमर सिंह सामने आए। अपनी दलाली के दम पर अमिताभ को सड़क पर तब आने से बचा लिया। अब जिस ने अमिताभ का घर नीलाम होने से बचाया , सोनिया गांधी ने उसे भी बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

याद कीजिए अरुण नेहरू को। वह न सिर्फ राजीव गांधी के मित्र थे , परिवारीजन भी थे। राजीव के परम सलाहकार। लेकिन वह भी बहुत अपमानित हो कर गांधी परिवार से बाहर किए गए। याद कीजिए अरुण सिंह को। वह भी राजीव गांधी के दून स्कूल के सहपाठी थे। अभिन्न मित्र। वह भले राजीव मंत्रिमंडल में रक्षा राज्य मंत्री रहे थे पर राजीव ने प्रधानमंत्री निवास से सटे बंगले में ही अरुण सिंह को रखा। बीच की दीवार तोड़ कर भीतर से ही रास्ता बना लिया। जाने क्या-क्या बातें चलीं दोनों की इस दोस्ती को ले कर। लेकिन एक समय यह भी आया कि अरुण सिंह न सिर्फ राजनीति छोड़ दिए बल्कि दिल्ली छोड़ कर अल्मोड़ा के बिनसर में ऐसी पहाड़ी पर रहने चले गए जहां कोई सवारी नहीं जाती। बिजली नहीं है। अखबार भी तीन दिन बाद पहुंचता है। लगभग संन्यास। बाद में पता चला कि अरुण सिंह भी सोनिया गांधी के ही मारे हुए हैं। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया के अभी कांग्रेस से जाने में भी सोनिया गांधी ही मुख्य कारण बनी हैं। किस्से और भी बहुतेरे हैं। मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा एक गीत है ; ज़माने ने मारे हैं जवां कैसे-कैसे ! तो सोनिया ने भी कैसे-कैसे लोगों को मारा है। फेहरिस्त बहुत लंबी नहीं तो छोटी भी नहीं है। हां , नरसिंहा राव , सीताराम केसरी जैसों को अगर जोड़ लीजिएगा तो यह फेहरिस्त कुछ लंबी ज़रूर हो सकती है। 

Wednesday, 11 March 2020

जब माधवराव सिंधिया ने अपनी दोनों बहनों को संजय गांधी को सौंप दिया था

ज्योतिरादित्य सिंधिया 

ज्योतिरादित्य सिंधिया के कल कांग्रेस से इस्तीफ़ा देते ही कुछ अधजल गगरी वाले छलकने लगे। आज भाजपा ज्वाइन करते ही और छलकने लगे। बिन पानी छलकने लगे। कांग्रेसी तो कांग्रेसी सेक्यूलरिज्म के नाम पर कांग्रेस और कम्युनिस्टों की भड़ैती करने वाले , एन जी ओ फंडिंग की हड्डियां चूस कर कोर्निश बजाने वाले लेखक , कवि  , पत्रकार आदि सिंधिया को धुआंधार गद्दार का खिताब देने लगे। जयचंद आदि नाम से नवाजने लगे। कांग्रेस का खाया गाने और बजाने लगे। गोया ज्योतिरादित्य ने कल ही कांग्रेस छोड़ी , आज भाजपा ज्वाइन की , कल ही उन के पुरखों ने गद्दारी की। कंपनी बहादुर को कल ही सिंधिया के पूर्वजों ने कोर्निश बजाई और रानी झांसी लक्ष्मीबाई को फंसा दिया। मणिकर्णिका को मरवा दिया। और सुभद्रा कुमारी चौहान ने कल ही खूब लड़ी मर्दानी कविता लिख कर सिंधिया का पर्दाफाश कर दिया। 

कांग्रेस के सारे टुकड़खोर यह बताना भूल गए कि सारे राजा , महाराजा तब ऐसे ही थे। अलग बात है आज भी वैसे ही हैं। आगे भी ऐसे ही रहेंगे। जैसे सेक्यूलरिज्म के नाम पर यह कवि , लेखक , पत्रकार कांग्रेस और कम्युनिस्टों की टुकड़खोरी करते मिलते हैं। तब ब्रिटिश पीरियड में यह राजे , महाराजे ब्रिटिशर्स के तलवे चाटते फिरते थे। इन सब का गुणगान कभी पढ़ना हो तो जिस सावरकर को पानी पी-पी कर यह टुकड़खोर गरियाते रहते हैं , एक लतीफा पप्पू गांधी अपनी जहालत में चीखता हुआ कहता है मैं राहुल सावरकर नहीं हूं , पहले उस सावरकर के लिखे को पढ़ें। सावरकर के जीवन , त्याग और बलिदान को पढ़ें। सावरकर को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि ब्रिटिश पीरियड में अपना राजपाट बचाने के लिए इन हिंदू राजाओं ने क्या-क्या धतकरम नहीं किए थे। जिस सतारा से सिंधिया की वंश बेल जुड़ी हुई है , उसी सतारा की रानी  ने जब अंग्रेजों के आगे समर्पण कर दिया तो सावरकर बहुत क्रुद्ध हुए। लिखा कि कीड़े पड़ें सतारा की रानी को। ऐसे ही तमाम हिंदू राजाओं को अपनी घृणा का पात्र बनाते हैं सावरकर। दुत्कारते हैं। सिंधिया घराने को भी वह नहीं बख्शते। दूसरी तरफ हिंदुत्व के लिए गाली खाने वाले सावरकर , मुस्लिम राजाओं की तारीफ़ करते मिलते हैं। क्यों कि अपना मुस्लिम राज पाने ही के लिए सही मुस्लिम राजा जगह-जगह अंग्रेजों से लड़ते दीखते हैं। 

इस लिए भी कि सावरकर अंग्रेजों से लड़ने वाले योद्धा थे। अंग्रेज अगर किसी से सचमुच डरते थे तो सावरकर ही से डरते थे। इंदिरा गांधी कोई मूर्ख नहीं थीं , जिन्हों ने सावरकर पर डाक टिकट जारी किया था। सावरकर अकेले भारतीय हैं जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत दो-दो बार आजीवन कारावास की सजा देती है। वह भी काला पानी की सजा। ब्रिटेन में गिरफ्तार करती है तो पानी के जहाज से समुद्र में कूद कर वह भाग लेते हैं। एक प्रसंग आता है कि गांधी लंदन से भारत आने की तैयारी में हैं। लेकिन गांधी के राजनीतिक गुरु गोखले फ़्रांस से उन को चिट्ठी लिखते हैं कि बिना मुझ से मिले भारत न जाएं। गोखले फ़्रांस में अपना इलाज करवा रहे हैं। गांधी रुक जाते हैं। दुर्भाग्य से तभी विश्वयुद्ध छिड़ जाता है। तमाम रास्ते बंद हो जाते हैं। फ़्रांस और लंदन का रास्ता भी बंद हो जाता है। हालां कि लंदन और भारत का रास्ता खुला हुआ है। फिर भी गांधी भारत नहीं आते। लंदन में ही अपने गुरु गोखले की प्रतीक्षा करते हैं। कोई छ महीने बाद गोखले लंदन आते हैं। गांधी उन से मिलते हैं। वह गांधी को बहुत सी बातें बताते हैं और कहते हैं कि भारत में एक त्रिमूर्ति है। कुछ भी करने , शुरू करने से पहले इन तीनों से पहले ज़रूर मिलें। गांधी भारत आते हैं और इस त्रिमूर्ति से मिलते हैं। यह त्रिमूर्ति हैं रवींद्रनाथ टैगोर , सावरकर और  मुंशीराम। मुंशीराम को बाद में श्रद्धानंद नाम से जाना गया।

लेकिन आज की तारीख में लोग पढ़ते कहां हैं ? पढ़ने के नाम पर फेसबुक , वाट्सअप , ट्यूटर आदि ही पढ़ते हैं। बाकी बचा समय इधर-उधर की टुकड़खोरी और जहर उगलने में खर्च करते हैं। सच सुनना ही नहीं पसंद करते लोग। अगर अपनी पसंद की बात करने वाला न हो तो वह दुश्मन। उस से अलग। बहुत दूर। दूसरों को फासिस्ट कहने वाले लोग खुद बड़े फासिस्ट बन गए हैं। अरे मजा तो तब है जब आप सब की बात सुनें और समझें। फिर उस में से सत्य चुन लें। तथ्य चुन लें। अपनी बात कहें। लेकिन अब लोग अपना एजेंडा चुनते हैं। और कांग्रेस की तरह शोर मचाते हुए बेवजह बहिर्गमन कर जाते हैं।  

खैर , आप को कभी आज की तारीख में भी बिना इतिहास पढ़े अंग्रेजों , राजाओं और नवाबों की जुगलबंदी के बारे में जानना हो तो आज की दिल्ली को देखिए। सिंधिया हाऊस , बड़ौदा हाऊस , हैदराबाद हाऊस , कपूरथला आदि-इत्यादि देखिए। ऐसे बहुत सारे हैं। मालूम है यह सब कैसे बने ? अंग्रेज बहुत होशियार थे। जब नई दिल्ली बसानी थी तब , देश के अंग्रेजपरस्त राजाओं और नवाबों से कहा कि आप दिल्ली आइए। ज़मीन आप को हम देते हैं। जितनी चाहिए लीजिए। और अपना-अपना महल खड़ा कीजिए। दिल्ली में अपना प्रतिनिधित्व कीजिए। अंग्रेजों ने इन राजाओं और नवाबों के खर्च पर नई दिल्ली बसा दी। लुटियंस की दिल्ली कहलाई यह। जब राजा और नवाब आए तो उन का सिस्टम भी आया दिल्ली। उन के सेठ , साहूकार और कारिंदे भी। लग्गू-भग्गू भी। हां , जो कुछ राजा अंग्रेजों से लड़ रहे थे , वह झांकने भी नहीं आए लुटियंस की दिल्ली। बहुत थोड़े से। 

तो राजाओं की निष्ठा सर्वदा से अपने राजपाट के प्रति ही रही। मुगल रहे तो मुगलों के प्रति , अंग्रेज रहे तो अंग्रेजों के प्रति उन की निष्ठा रही। कांग्रेस आई तो उन की निष्ठां कांग्रेस के प्रति हो गई। अब भाजपा है तो उन की निष्ठा भाजपा और मोदी के साथ हो गई है। जैसे कोई उद्योगपति , कोई मीडिया घराना , कोई अफसर तमाम ठेकेदार आदि-इत्यादि सरकार के प्रति निष्ठावान रहते हैं। देश के प्रति गद्दारी से भी यह नहीं चूकते। गद्दारी में जैसे सिंधिया परिवार का इतिहास है , वैसे ही हैदराबाद के निजाम का भी भरा-पुरा इतिहास है। ऐसे तमाम किस्से हैं। 

गद्दारी और गलाजत की इंतिहा यहीं तक नहीं है। आप को मालूम है कि ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का अपने एकमात्र पुत्र माधवराव सिंधिया से बाद के समय में दशकों तक कोई संवाद नहीं रहा। बहुत लंबा विवाद भी रहा। मामला अदालत तक गया। 

जानते हैं क्यों ?

कारण बहुत से हैं। पर मुख्य कारण है इमरजेंसी। विजयाराजे सिंधिया भूमिगत थीं जनसंघी होने के कारण। उन के खिलाफ वारंट घूम रहा था। संजय गांधी को खुश करने और अपना राजपाट बचाने की गरज से माधवराव सिंधिया ने अपनी मां पर ही दांव चल दिया। मां को संदेश भेजा कि आप को नेपाल भिजवाने की व्यवस्था हो गई है। आप महल पर आ जाइए। विजयाराजे सिंधिया ने बेटे माधवराव सिंधिया पर विश्वास कर लिया। नेपाल माधवराव की ससुराल भी है। सो वह महल आ गईं। पुलिस तैयार खड़ी थी। विजयाराजे सिंधिया गिरफ्तार हो गईं। वह बेटे की इस करतूत से हतप्रभ रह गईं। दूसरा किस्सा भी इमरजेंसी में माधवराव सिंधिया द्वारा संजय गांधी को खुश करने का ही है। इस नीच ने दिल्ली के एक होटल में महाऔरतबाज संजय गांधी को बुला कर अपनी दोनों बहनों वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया को सौंप दिया। वह तो दोनों बहनें बातों ही बातों में संजय गांधी की मंशा समझ गईं और किसी तरह संजय गांधी को धता बता कर वहां से निकल भागीं। 

इन घटनाओं से सिंधिया परिवार में फूट पड़ गई। आप को बताता चलूं कि इन घटनाओं का ज़िक्र राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने अपनी आत्मकथा राजपथ से लोकपथ पर में बहुत विस्तार से किया है। सो इन्हें कपोल-कल्पित न मानें। और कि जानें कि लोग आवरण चाहे जो धारण करें , अपना राजपाट , अपनी राजनीति , अपनी सत्ता सहेजने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। कितना भी गिर सकते हैं। लेकिन लोग तात्कालिकता में आ कर बहने लगते हैं। लेकिन सचमुच अगर किसी को आज की तारीख में आप को गद्दार कहने का जी कर ही रहा हो तो सोनिया गांधी को गद्दार कह कर अपनी अभिलाषा पूर्ण कीजिए। अपनी सत्ता पिपासा में , पुत्र मोह में इस महिला ने समूची कांग्रेस जैसी शानदार पार्टी को समाप्त कर दिया है और अब देश को जलाने में संलग्न है।  कल से यह एक लतीफा चला है। इसी से बात का अंदाजा लगा लीजिए। कि दिल्ली की यमुना में पानी कितना बह गया है। 

राहुल: तमसो मा ज्योतिर्गमय.....
सोनिया: मतलब?
राहुल: तुम सोती रहीं मां , ज्योतिरादित्य गया....

तो जैसे सिंधिया के पुरखे अंग्रेजों के पिट्ठू बन कर अपना महल , अपना राजपाट बचा रहे थे , माधवराव सिंधिया अपनी मां को गिरफ्तार करवा कर , अपनी बहनों को संजय गांधी को सौंप कर अपनी राजनीति , अपना राजपाट , अपनी सत्ता संभाल रहे थे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया भी खुद को भाजपा को सौंप कर अपनी राजनीतिक अस्मिता सहेजने के ही काम में संलग्न हैं तो चौंकिए नहीं। आत्मसम्मान , जनता की सेवा आदि को शाब्दिक कवच मान लें। आखिर कांग्रेस से वफ़ादारी के नाम पर कब तक अपनी ही दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया के कभी सेवक रहे दिग्विजय सिंह के राजनीतिक जूते खाते कांग्रेस में पड़े रहते और उस सिख दंगे के अपराधी और लुच्चे कमलनाथ से अपमानित होते रहते। ठीक है कि कभी राहुल गांधी से आंख मारने वाली दोस्ती भी थी। संसद में अगल-बगल बैठते भी थे। शाम की महफ़िल के राजदार भी थे। लेकिन एक बात यह भी लिख कर रख लीजिए कि राहुल गांधी की हैसियत अब कांग्रेस में बहादुरशाह ज़फ़र सरीखी हो चली है। बल्कि उस से भी गई गुज़री। बहादुरशाह ज़फर की तो फिर भी कोई हैसियत थी। राहुल गांधी मतलब कांग्रेस में शून्य ! इसी लिए राहुल गांधी अब बाहर से ज़्यादा कांग्रेस में लतीफा बन चले हैं। अपने नशे , विदेशों में रंगरेलियों और अनाप-शनाप बयान देने भर की भूमिका ही शेष रह गई है राहुल गांधी की। कोई सीधे-सीध भले नहीं कहता पर राहुल गांधी कहां हैं ? या विदेश गए क्या कि जाने वाले हैं ? जैसे सवालों का यही अर्थ होता है। सो कांग्रेस अब पुत्र मोह की मारी , बीमार सोनिया गांधी के ठप्पे के साथ अहमद पटेल , दिग्विजय सिंह , कपिल सिब्बल , सलमान खुर्शीद जैसे तमाम लोग चला रहे हैं। सो अभी कांग्रेस की कालिख पोछते हुए और कई सारे ज्योतिरादित्य सिंधिया आहिस्ता-आहिस्ता सामने आने वाले हैं । प्रतीक्षा कीजिए। 

Sunday, 8 March 2020

कुतर्की और नफरत के शिलालेख लिखने वाले जहरीले लोगों के विमर्श में फंसने से कृपया बचें


प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्हीं। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्हीं॥
ढोल, गंवार, शुद्र, पशु , नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी॥

तुलसीदास कृत रामचरित मानस में सुंदर कांड की इस चौपाई के मद्देनज़र कुछ कुपढ़ , कुतर्की और नफरत के शिलालेख लिखने वाले जहरीले लोग न सिर्फ तुलसीदास को निशाने पर लेते रहने के अभ्यस्त हो चले हैं बल्कि समाज में घृणा फैलाने में अव्वल बन चुके हैं। दुर्भाग्य से बहुतेरे लोग इस फर्जी नारी विमर्श , पाखंडी दलित विमर्श के इस जहरबाद में उलझ कर इन नफरती लोगों के झांसे में आ भी जाते हैं। पर ध्यान रखिए कि अव्वल तो तुलसीदास मनुष्यता और सद्भावना के दुनिया के सब से बड़े और लोकप्रिय कवि हैं। मर्यादा ही उन की पहली प्राथमिकता है। स्त्री की मर्यादा सर्वोच्च है तुलसी के यहां। स्त्री अस्मिता का अविस्मरणीय महाकाव्य है रामचरित मानस। राम और सीता की कथा। 

आप ध्यान दीजिए कि तुलसी सुरसा सरीखी स्त्री को भी माता से संबोधित करते हैं। हनुमान सुरसा को माता ही कहते रहते हैं। इतना ही नहीं मंदोदरी और त्रिजटा के लिए भी कहीं कोई अपमानित करने वाला शब्द इस्तेमाल नहीं करते तुलसी कभी। तुलसी तो स्त्री को देवी कहते नहीं अघाते। वह लिखते ही हैं :

एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बच क्रम पतिहितकारी।

स्त्री पुरुष दोनों को बराबरी में बिठाते मिलते हैं तुलसीदास रामचरित मानस में। आप को पूछना ही चाहिए , पूछते ही हैं लोग फिर ढोल, गंवार, शुद्र, पशु , नारी । सकल ताड़ना के अधिकारी॥ लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी तुलसीदास को। जानते हैं आप को यह क्यों पूछना और पूछते हुए भी नाराज क्यों होना होता है ?

दो कारणों से। एक कारण यह कि आप जहरीले लोगों के उकसावे में आ जाते हैं। कौआ कान ले गया में फंस जाते हैं।  दूसरा और महत्वपूर्ण कारण यह है कि आप इस उकसावे में यह भी भूल जाते हैं कि तुलसीदास ने रामचरित मानस हिंदी में नहीं अवधी में लिखी है। अवधी जुबान है रामचरित मानस की। और कि किसी भी अवधी वाले से , अवधी जानने वाले से पूछ लीजिए कि अवधी में ताड़न शब्द का अर्थ क्या है ? वह फौरन बताएगा , ख्याल करना , केयर करना। सहेज कर रखना। ताड़ना मतलब देख-रेख करना। मार पीट करना नहीं। ढोल को आप केयरफुली नहीं बजाएंगे , ध्यान से नहीं रखेंगे तो निश्चित ही वह फट जाएगी। ढोल जब फट जाएगी तो आप फिर बजाएंगे कैसे भला।  तो तुलसी कहते हैं , ढोल को संभाल कर रखिए और बजाइए। 

गंवार अगर कोई है तो आप उस के हाथ परमाणु कार्यक्रम तो छोड़िए , घर के किसी सामान्य कार्य की भी शायद ही कोई ज़िम्मेदारी दें। अगर मैं जहाज चलाने के लिए गंवार हूं यानी अनभिज्ञ हूं और जो गलती से कॉकपिट में बैठ जाता हूं तो जहाज चलाने के जानकार लोग , पायलट लोग मेरा ध्यान नहीं रखेंगे तो जहाज और जहाज में बैठे लोगों का क्या हाल होगा , यह भी क्या बताने की ज़रूरत है ? शूद्र यानी सेवक का ख्याल कौन नहीं रखता ? बहुत पीछे मत जाइए , घर में अपनी बेगमों को देखिए कि काम वालियों से कितना मृदु व्यवहार रखती हैं। कितना ख्याल रखती हैं , कितना मान और सम्मान करती हैं उन का। और पहले के समय में तो लोग अपने सेवकों को राजपाट तक थमा देते थे। इतना ख्याल रखते थे। एक नहीं , अनेक किस्से हैं इस बाबत। पशु चाहे कोई भी हो , शेर , गाय , बकरी या कुत्ता , बिल्ली , हाथी , घोड़ा , हर किसी का ध्यान आप नहीं रखते ? 

घर में हमारी अम्मा , बुआ , दीदी , पत्नी , बेटी कितना तो ख्याल रखती हैं हम सब का। लेकिन घर से बाहर होते ही इन्हीं अम्मा , बुआ , पत्नी , बेटी , दीदी को आप कोई काम करने भी देते हैं क्या ? ज़रा भी इन के प्रति लापरवाह होते हैं क्या ? क्यों लगातार ताड़ते रहते हैं कि इन पर कोई बुरी नज़र न पड़े , कोई विपत्ति न पड़े। कोई परेशान न करे। जहाज हो , ट्रेन हो , बस हो , कार हो , रिक्शा , ऑटो कुछ भी हो , हर जगह ताड़े रहते हैं। घर में एक गिलास पानी भी ले कर न पीने वाले हम जैसे लोग भी बाहर होते ही हर चीज़ इन के लिए दौड़-दौड़ कर लाने लगते हैं। चाहे वह कितने भी बड़े लाट गवर्नर ही क्यों न हों , घर परिवार की स्त्रियों को निरंतर ताड़ते रहते हैं। 

दिक्क्त यह है कि अगर आप अवधी नहीं जानते , अवधी को हिंदी के ज्ञान से बांचेंगे , जहरीले लोगों के भाष्य में फंस कर , उन की जहरीली परिभाषा में फंस कर रामचरित मानस और तुलसीदास का मूल्यांकन करेंगे तो यह अनर्थ तो होगा ही। हर भाषा की अपनी पहचान , अपना मिजाज और अपनी व्याख्या होती है। सो पहले उस भाषा , उस की तबीयत और उस का मिजाज ज़रूर जान लीजिए। फिर कोई फैसला करिए या सुनिए। भारत में ऐसी बहुत सी भाषाएं हैं जिन के शब्द एक हैं ज़रूर पर अर्थ अलहदा हैं। यह उर्दू के साथ भी है , मराठी , तमिल , कन्नड़ , तेलगू , आसामी , बंगाली के साथ भी है। उर्दू में तो एक नुक्ता हटते ही उसी शब्द का अर्थ फौरन बदल जाता है। अवधी ही नहीं , हमारी भोजपुरी में ही एक ही शब्द भोजपुरी के अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग ध्वनि और अर्थ में उपस्थित हैं। अब हिंदी में अकसर लोग कहते हैं , अरे यह तो हमारा धर्म था , हमारा कर्तव्य था। अब इसी को अंगरेजी में कहेंगे , दिस इज माई ड्यूटी ! भारत में तो कोई इस का बुरा नहीं मानेगा। पर यही दिस इज माई ड्यूटी ! लंदन में किसी से कह कर देखिए ! वह गुस्सा हो जाएगा।  मारने को दौड़ा लेगा। क्यों कि वहां यह निगेटिव माना जाता है , दिस इज माई ड्यूटी ! लगता है उस के साथ ज़्यादती हो गई। जबरिया हो गया। तो मित्रों , दलित और स्त्री विमर्श के इन जहरीले विमर्शवादियों से ज़रा नहीं , पूरा संभल कर। इन की नफरत में न फंसिए। अवधी , रामचरित मानस और तुलसीदास को प्रणाम कीजिए। अपनी स्त्री शक्ति को प्रणाम कीजिए। महिला दिवस पर इन्हें और सशक्त कीजिए। साथ ही रामायण का एक प्रसंग देखिए अभी-अभी याद आ गया है , उसे भी सुनते जाइए। 

क्या हुआ कि अशोक वाटिका में कैदी सीता से रावण ने एक बार बहुत मनुहार किया कि एक बार ही सही सीता , रावण को कम से कम एक नज़र देख तो लें। सीता किसी तरह तैयार हुईं और रावण को देखा। लेकिन तिनके की आड़ से देखा। यह प्रसंग जब मंदोदरी को पता चला तो मंदोदरी ने रावण को बहुत चिढ़ाया। तंज किया। कहा कि इतने बड़े बाहुबली को भी सीता ने देखना ठीक नहीं समझा। देखा भी तो तिनके की आड़ ले कर। फिर मंदोदरी ने रावण को सलाह दी कि इतना छल-कपट , तीन-तिकड़म और माया जानते हो , मायावी हो , मारीच को हिरन बना कर भेज सकते हो तो क्यों नहीं एक बार खुद राम बन कर सीता के पास चले जाते और सीता को संपूर्ण पा लेते। रावण यह सुन कर उदास हो गया। और बोला , किया , यह उपाय भी किया। लेकिन दिक्क्त यह है कि राम का रूप धरते ही सारी स्त्रियां मां के रूप में दिखने लगती हैं। मैं करूं भी तो क्या करूं ?

तो जिस तुलसी का रावण भी राम का रूप धरते ही सीता समेत सभी स्त्रियों को मां के रूप में देखने लगता है , वह तुलसी इसी रामायण में भला कैसे स्त्री को पिटाई का अधिकारी बता सकते हैं। सोचने , समझने की बात है। बाकी आप का अपना विवेक है , अपनी समझ और अपनी दृष्टि है। आप किसी भी परिभाषा और दृष्टि को मानने को पूरी तरह स्वतंत्र है। कोई बाध्यता थोड़ी ही है , कि आप मुझ से , मेरी बात से सहमत ही हों। 

महिला दिवस की अशेष मंगलकामनाएं !

Monday, 2 March 2020

नरेंद्र मोदी का हेलीकाप्टर शॉट है , सोशल मीडिया छोड़ने पर सोचने का ऐलान


लेकिन मैं न तो फेसबुक छोड़ने जा रहा हूं , न वाट्सअप। बोलने-बतियाने का बहुत बढ़िया और पावरफुल माध्यम है, सोशल मीडिया। यह भी छोड़ दूंगा तो कहां जाऊंगा भला। पेट्रोल बहुत महंगा हो चुका है , स्थानीय स्तर पर भी कहीं आना-जाना महंगा है। दूसरे शहर या दूसरे देश जाना तो बहुतै महंगा। यही एक सस्ता और सुलभ माध्यम है सब से संपर्क का। कम्यूनिकेशन का सोशल मीडिया सब से बड़ा माध्यम है। हां , यह ज़रूर है कि कुछ फर्जी , कुछ नफरती , कुछ एजेंडाधारी लोगों से मन दुखी होता है और माहौल भी ख़राब होता है पर यह सब तो असली ज़िंदगी में कहीं ज़्यादा है। फिर दिल्ली दंगा , महंगाई , बेरोजगारी , आर्थिक मोर्चे पर बढ़ती विफलता , पाकिस्तान से जीते पर मिनी पाकिस्तान से क्यों हारे , केंद्र में जीते पर प्रदेशों में निरंतर हार आदि पर मुझ से तो कोई सवाल पूछा नहीं जाना है। न जवाब देना है। फिर मैं क्यों छोडूं भला सोशल मीडिया। 

यह ज़रूर है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर समय बहुत ख़राब होता है। और कई बार आई टी सेल के कारिंदे तर्क और तथ्य की जगह दीवार बन कर , एजेंडा बन कर , नफरत बन कर उपस्थित होते हैं तो मन बहुत खराब होता है। लगता है उन से संवाद कर दीवार में सिर मार रहा हूं। हो सकता है नरेंद्र मोदी को लोग चीन की दीवार बन कर , नफरत का सागर बन कर मिल रहे हों तो वह ज़्यादा आहत हुए हों। जैसे राहुल गांधी जैसा लतीफा प्रतिक्रिया देते हुए कह रहा है कि सोशल मीडिया नहीं , नफ़रत छोड़िए। अजब है। इस लिए भी कि इन दिनों सोनिया , राहुल समेत समूची कांग्रेस भाई चारा के नाम पर जितनी नफ़रत समाज में घोल रही है , उस का कोई हिसाब नहीं है। कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने नफरत की खेती को अफीम की खेती में तब्दील कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी और सामान्य जनजीवन में भी। 

फिर भी नरेंद्र मोदी को सोशल मीडिया से पलायन करने से भरसक बचना चाहिए। लेकिन आखिरी सच यही है कि सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों पर नफरत के एजेंडा का पलड़ा बहुत भारी है। वैसे यह जानना भी ख़ासा दिलचस्प है कि एक समय पाकिस्तान के लोगों ने मुशर्रफ को फेसबुक पर हज़ारों की संख्या में इस तरह वेलकम कर दिया कि बिना ज़मीनी सचाई जाने वह लंदन इस्लामाबाद लैंड कर गए और गिरफ्तार हो गए। फेसबुक पर मुशर्रफ का वेलकम करने वाले लोगों में से कोई एक भी उन के पक्ष में ज़मीन पर खड़ा नहीं दिखा। ऐसा भी निरंतर देख रहा हूं कि किसी के निधन पर सोशल मीडिया पर तो शोक संदेश का समंदर उमड़ पड़ता है लेकिन श्मशान घाट पर दस लोग भी नहीं पहुंचते। ऐसी ही तमाम नंगे सच हैं और बहुत बड़ा फासला है सोशल मीडिया , न्यूज चैनल और असल जीवन में। तो ज़रूरत इस फासले को पाटने की है। पलायन की नहीं। 

बाकी वह लतीफा भले पुराना हो पर प्रासंगिक तो आज भी है। वह यह कि एक आदमी ने अगले से अपनी हनक जमाते हुआ बोला , मेरे पास फेसबुक है , इंस्टाग्राम है , ट्वीटर है , वाट्सअप है , तुम्हारे पास क्या है ? अगला बोला , मेरे पास काम-धाम है। 

ऐसे और भी तमाम किस्से हैं। नान सोशल मीडिया के भी। जैसे कि एक बार किसी जहाज में दिलीप कुमार जा रहे थे। उन्हों ने देखा कि टाटा भी उसी जहाज में थे। पर उन के बहुत कोशिश के बावजूद टाटा ने उन की नोटिस नहीं ली। तो उन्हों ने अपने सहायक को टाटा के सहायक के पास भेजा और सूचना परोसी कि दिलीप कुमार भी हैं इस जहाज में। लेकिन टाटा ने फिर भी उन की कोई नोटिस नहीं ली। अंतत: दिलीप कुमार खुद टाटा से मिलने के लिए उन के पास पहुंच गए। उन के पी ए ने उन का परिचय करवाते हुए कहा कि फ़िल्मी दुनिया के बहुत बड़े स्टार हैं दिलीप कुमार। टाटा ने हाथ जोड़ कर कहा कि , ' लेकिन मैं तो फिल्म ही नहीं देखता कभी। समय ही नहीं मिलता किसी और काम के लिए। 

ऐसे ही दिल्ली में एक कार्यक्रम में एक बार जार्ज फर्नांडीज पहुंचे। तब वह मंत्री थे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में। राजेश खन्ना और राज बब्बर भी उस कार्यक्रम में उपस्थित थे। लेकिन जार्ज ने दोनों की कोई नोटिस नहीं ली। राजेश खन्ना परेशान हो गए। अंतत: आयोजक से उन्हों ने जार्ज से अपना परिचय करवाने के लिए कहा। आयोजक ने परिचय कराया कि यह राजेश खन्ना , हिंदी फिल्मों के सुपर स्टार। तो जार्ज मुस्कुराए और बोले , बंबई में रहा तो बहुत हूं पर कभी कोई पिक्चर देखने का समय ही नहीं मिला। 

राजकुमार तो फ़िल्मी दुनिया के ही मशहूर अभिनेता थे। पर एक बार किसी कार्यक्रम में वह राजकुमार के बगल में बैठे पर राजकुमार ने उन की बिलकुल नोटिस नहीं ली। तो अफना कर राजेश खन्ना ने अपना परिचय खुद ही देते हुए कहा , ' बाई द वे मुझे राजेश खन्ना कहते हैं। ' और यह बात जब राजेश खन्ना ने राजकुमार से तीन-चार बार दुहराई तो राजकुमार उन से मुखातिब होते हुए बोले , ' यह तो ठीक है बरखुरदार पर आप करते क्या हैं ?' राजेश खन्ना तब सुपर स्टार थे। तिलमिला कर रह गए। 

लेकिन होता है कई बार ऐसा भी। बहुत से लोग तमाम मशहूर वैज्ञानकों को नहीं जानते। मशहूर खिलाड़ियों को नहीं जानते। अर्थशास्त्रियों को नहीं जानते। बहुत से लोग बहुत सी बात नहीं जानते। मैं भी बहुत सारी बातें नहीं जानता। अधिकांश लोग आज भी नहीं जानते कि राष्ट्रपति , प्रधान मंत्री , मुख्य मंत्री क्या होता है या कि कौन है। अपने ज़िले के डी एम , एस पी को भी नहीं जानते लोग। ऐसे ही बहुत से लोग टी वी , सीरियल , न्यूज़ , फेसबुक आदि सोशल मीडिया भी बिलकुल नहीं जानते। संयोग से ऐसे लोगों की संख्या बेहिसाब है। सोशल मीडिया कम्यूनिकेशन का सब से बड़ा माध्यम भले हो पर भारत का अधिकांश जनगण मन सोशल मीडिया से अभी बहुत दूर है। लोग नहीं जानते कि आप फेसबुक पर हैं कि ट्यूटर पर। बने रहिए आप अपने आप में , अपनी नज़र में चैंपियन। 

हालां कि मेरा अनुमान है कि नरेंद्र मोदी सोशल मीडिया से दूर नहीं होंगे। अपनी ताकत का सब से बड़ा अस्त्र-शस्त्र भला कोई क्यों छोड़ेगा ? सोशल मीडिया वैसे भी एक नशा है। अकेलेपन का साथी है। अकेलेपन , अवसाद और तनाव के संत्रास को तार-तार करने का औजार भी है सोशल मीडिया। आप लड़-झगड़ पर भी एक रहते हैं यहां। तो सोशल मीडिया एक मोहब्बत है। एक अफीम है। जो एक बार आ गया यहां , गया काम से। यह फ़ेसबुक भी ग़ज़ब चौराहा है । कोई एक औरत अपना खांसी-जुकाम रख देती है और लार टपकाते पुरुषों की खेप की खेप डाक्टर और वैद्य बन कर प्रस्तुत हो जाती है । उस का सारा दुःख दर्द ले लेना चाहते हैं यह पुरुष । गुड है यह मौखिकी , यह कमिश्नरी और बेशर्मी भरी लाईनबाज़ी भी। और इन मोहतरमाओं को भी क्या कहें ? फ़ेसबुक पर जाने क्या-क्या ढूंढ लेती हैं , इलाज भी । इन का भी कोई इलाज नहीं , उन का भी कोई इलाज नहीं । तो यह सोशल मीडिया एक मस्ती है। इस की मस्ती के मस्ताने हज़ारों की इबारत और रवायत तोड़ कर भारत में ही करोड़ो में हैं। इस की ताकत हाथी से भी बहुत ज़्यादा है। कांग्रेस आज भी रोती है कि 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी और भाजपा की तरह  क्यों नहीं उस ने भी तब सोशल मीडिया का सहारा लिया था। 

तो तय मानिए कि सिर्फ और सिर्फ केंद्रीय मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए सोशल मीडिया के बहाने ठहरे हुए जल में एक कंकड़ फेंका है नरेंद्र मोदी ने। बस ! और देखिए न लगभग सारे न्यूज़ चैनलों ने इसी विषय पर आज का अपना प्राइम टाइम न्यौछावर कर दिया। भूल गए दिल्ली दंगा , संसद का हंगामा , पश्चिम बंगाल आदि-इत्यादि। ट्रेड सेटर ने अपना काम बखूबी कर दिया है। क्रिकेट की भाषा में इसे हेलीकाप्टर शॉट कहते हैं। अब आप कैच करिए या चूकिए , यह आप जानिए। लेकिन सोशल मीडिया छोड़ने पर सोचने का ऐलान है नरेंद्र मोदी का हेलीकाप्टर शॉट है। इस बात को तस्लीम कर लीजिए।

Sunday, 1 March 2020

ताहिर हुसैन के वर्क फ्राम होम का विकल्प


पाकिस्तान स्थित शांति दूत इमरान खान ने सवाल उठाया कि अगर पाकिस्तान आतंकवादी देश है तो पाकिस्तान में बम ब्लास्ट क्यों होते हैं ?

शांति दूतों से खासी चिढ़ के लिए मशहूर भारत स्थित सुब्रमण्यम स्वामी ने जवाब दिया कि कुछ आतंकवादी वर्क फ्राम होम का विकल्प चुन लेते हैं।

यमुना तट पर स्थित दिल्ली में आप के पार्षद ताहिर हुसैन को स्वामी की यह वर्क फ्राम होम वाली बात रास आ गई। और कहीं और जा कर दंगा संचालित करने की जगह उन्हों ने भी वर्क फ्राम होम का ही विकल्प चुन लिया।

वह तो बुरा हो उन के पड़ोसियों का कि उन्हों ने उन के वर्क फ्रॉम  होम का ठीक-ठाक वीडियो बना लिया। और सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया। बाकी काम पुलिस के ड्रोन ने कर दिया। फिर नाखून कटवा कर शहीद बनने के हैबिचुवल न्यूज़ चैनलों ने अपना कैमरा टिका-टिका कर छत पर बनाई बड़ी सी गुलेल , तेज़ाब , पेट्रोल और पत्थरों का जखीरा दिखा-दिखा कर ताहिर हुसैन के वर्क फ्राम होम की तारीफ़ शुरू कर दी।

इतनी कि एक महाकवि बेचैन हो कर पूछ रहे हैं कि पुलिस ने अब तक यह सब सीज़ क्यों नहीं कर दिया। इस की नुमाइश क्यों लगाए बैठी है। बकौल महाकवि यह ताहिर हुसैन को बदनाम करने की भाजपा और दिल्ली पुलिस की साज़िश है। बस महाकवि इतना भर नहीं बता रहे कि हाजी ताहिर हुसैन को फरार कराने में भी भाजपा और दिल्ली पुलिस का ही हाथ है।  जाने क्यों ?

लाहौल बिला कूवत !