Monday, 6 July 2026

शुक्लाइन चाची की कहानियों का स्वर और स्वाद

 दयानंद पांडेय 

जैसे कोई शिक्षक किसी छात्र की ग़लती पर पतली सी छड़ी सटाक से मार दे। माधुरी महाकाश की कहानियां ऐसे ही सटाक से छड़ी मारती चलती हैं। सटाक-सटाक ! ज़रा-ज़रा सी बात पर यही ध्वनि। लेकिन जैसे शिक्षक की वह छड़ी छात्र को अच्छे नंबर से पास करने की कड़ी और लड़ी बन कर अचानक उपस्थित हो जाए तो छात्र का बड़ा सा दुःख , अनिर्वचनीय सुख में बदल जाता है। ठीक वैसे ही माधुरी महाकाश की कहानियों में छाया अकुलाया उदासी का बीज अचानक सारे पत्थर तोड़ते हुए हरे पौधे के रूप में उपस्थित हो कर हर्ष के पुष्प और फल में तब्दील हो जाता है। गदराया हुआ। कहानियों का उदास और हताश विवरण जैसे सावन का बादल बन उमंग की बौछार बन कर बरसने लगता है। माधुरी की कहानियों की कुल तासीर यही है। कहानी का अंत सुखद पड़ाव की ओर सहसा मुड़ जाता है। माधुरी महाकाश के कहानी संग्रह शुक्लाइन चाची की लगभग सभी कहानियों का स्वर और स्वाद यही है। जैसे किसी लैंपपोस्ट की दिपदिपाती लाइट में बच्चे पढ़ रहे हों , माधुरी महाकाश की कहानियां अपने पात्रों के मन को पढ़ती मिलती हैं। पुरुष कथाकार ऐलानियां तौर पर स्त्री मन को पढ़ने की लालसा , अभिलाषा में दुबले होते रहते हैं। माधुरी महाकाश बिना किसी ऐलान के पुरुष मन को पढ़ती हैं। पुरुष मन और मनोविज्ञान को बांचती हैं और किसी विद्यार्थी की तरह इस इबारत को आहिस्ता से लिख देती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की बड़ी ताक़त है। ऐसे जैसे रात की नीरव शांति में कोई आकाश में चमकते तारे गिन रहा हो मन ही मन। और अचानक कोई तारा टूट कर गिर पड़े। यह तारे का टूट पड़ना ही , माधुरी की कहानी का हासिल है। जैसे कोई एक शेर किसी ग़ज़ल का हासिल हो। 

कई बार लगता है कि माधुरी कहानी नहीं , इमला लिख रही हों। पात्र बोल रहे हों , वह सर झुका कर लिख रही हों। बिना कोई हस्तक्षेप किए। बिना कोई सवाल जवाब किए। माधुरी जिस बेबाकी और सहजता से इमला लिखती मिलती हैं अपनी कहानियों में वह आसान नहीं है। इमला मतलब कथा में लेखक का कोई हस्तक्षेप नहीं है। जैसा कि अमूमन कहानियों में कथाकार करते मिलते हैं। शायद इसी लिए माधुरी की कथाओं में विवरण बहुत हैं। कह सकते हैं कि माधुरी विवरण प्रिय कथाकार हैं। रेशे-रेशे का विवरण रखती हैं। कहानी लंबी होती जाती है तो हो जाए। अपनी बला से। माधुरी लेकिन विवरण बताने में कोई कंजूसी नहीं बरततीं। हर चीज़ बता देना चाहती हैं। कुछ भी मिस नहीं होने देतीं। राजमा चावल बनाया है तो खिलाए बिना नहीं छोड़ने वाली कहानी में। चाय पकौड़ी ठेले से आई है तो क्या। खानी है वह भी। शुक्लाइन चाची कुंभ के मेले में नहाने समय डुबकी मार कर हेरा गई हैं। लोग हैरान हैं। तो क्या आख़िर में चौबाइन की शॉल ढलका कर , क्रीम रंग की शॉल ओढ़ कर मंद-मंद मुस्कुराती खड़ी भी मिलती हैं। बालू लिपटे पेटीकोट और भीगे ब्लाऊज में पगलिया बन कर घूमने वाली चाची का त्रास और निराश भाव जैसे क्रीम कलर की शॉल में औचक सौंदर्य बन कर कहानी के विवरण में ऐसे उजास भरता है जैसे घने बादल बीच अचानक सूर्य उपस्थित हो जाए। घर , घर के भीतर की बतकही को कहानी में ढाल लेने की कला किसी को सीखनी हो तो माधुरी महाकाश से सीखे। कुछेक अपवाद छोड़ दें तो माधुरी की कहानियों की सीमा भी यही है। घर , देहरी ,आंगन नहीं छोड़तीं वह। शायद इसी लिए माधुरी की कहानियां किसी एजेंडे के फ्रेम से बहुत बाहर हैं। किसी विमर्श के फंदे में भी नहीं हैं। चौंकाती भी नहीं हैं। कछुआ चाल चलती हुई जाने कितने खरगोशों को पछाड़ कर कहानी की लय को साध लेती हैं। किसी साधक संगीतकार की तरह। 


गजमुक्ता कहानी में प्रेम , दान और लालच का क्या ही कलेवर है। श्राद्ध की श्रद्धा कैसे एक लालची ब्राह्मण छीन लेता है। ख़ुद खाने का ठिकाना नहीं पर दान में दरवाज़े पर बंधी हाथी मांग लेता है। गजमुक्ता का अपने स्वामी के प्रति अथाह प्रेम का वर्णन भी माधुरी की वर्णन प्रियता में माधुर्य का अनिर्वचनीय पाठ उपस्थित करता है। कहानी में छोटे-छोटे वर्णन और प्रसंग भी कहानी को एक नया रंग देते हुए बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं। समाज के प्रति माधुरी का ऑब्जर्वेशन भी कहानी के संवादों में , वर्णन में स्पष्ट झलकता रहता है। ऐसे जैसे किसी झील के जल में वृक्ष की मनोहर छाया हो। जल के कल-कल में पक्षी का कलरव हो। जल की गहनता में स्त्री का सौंदर्य छलकता हो। मायके की मनुहार में पगी लीलावती कहानी में पति की ससुराल की चुस्की भर मुस्की के रंग के भी क्या कहने। छोटे-छोटे सुख और दुःख की देहरी कब पीपल का पात की तरह हिलती डुलती परात में पांव धोने की परंपरा से प्रीत का सुगंध का एक नया ही बिरवा रच जाती है। माधुरी की कहानियों में माटी की महक किसी इत्र से भी ज़्यादा रची-बसी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी की यह महक नोएडा , दिल्ली की सरहद छू कर भी अपनी माटी में किसी ज़िक्र की तरह लौट आती है। पुरवा हवा में लिपट कर लहक जाती है। आजी , मधुमालती , सखी भी ऐसी ही कहानियां हैं जिन में माटी की खनक भी है और लोच भी। माधुरी अपनी इन कहानियों में जैसे कोई संगीत रचती चलती हैं। खटका , मुरकी , आरोह , अवरोह अनायास माधुरी की कहानियों के सुर और साज़ में समाते जाते हैं। किसी स्त्री की पायल की तरह , कांच की चूड़ी की तरह खनकते सुर कहानी की कब कमानी बन जाते हैं , कब मेरुदंड , पाठक जान ही नहीं पाता। बस एक आलाप ले कर रह जाता है। अचानक। घर गृहस्ती की चक्की में उलझी स्त्री या पुरुष ही माधुरी की कहानी में नहीं है बोर्ड परीक्षा की ब्लैक ब्यूटी भी है। इस का अलग ही रंग है। पुरुष मन की थाह और उस के मनोविज्ञान की पड़ताल तो माधुरी की कहानियों का मुख्य स्वर है ही , बाक़ी समाज का भी थर्मामीटर है। स्त्री उस की सीढ़ी। इस सीढ़ी पर चढ़ कर ही वह बहुत आहिस्ता से शानदार कथाकार बन जाती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की पृथ्वी है। माधुरी की यह पृथ्वी घूमती रहती है। निरंतर घूमती हुई भाषा की चाशनी में कठोर से कठोर बात बड़ी मुलायमियत से कह जाती है। गजमुक्ता कहानी की इस एक पंक्ति पर गौर कीजिए : 

आधी आबादी तो ऐसा ब्लाऊजपीस दान में देती है कि इमरजेंसी पड़ जाए और छन्नी ना मिले तो चाय भी छन जाए। 

माधुरी महाकाश की कहानियां सचमुच आधी आबादी का वही दान वाली ब्लाऊजपीस हैं जो समाज को क़दम-कदम पर बिना कुछ अतिरिक्त कहे अनायास छानती रहती हैं। पुरुष मनोविज्ञान को अपनी कहानी की ही तरह बेसन में लपेट कर पकौड़ी की तरह छान कर परोस देती हैं। गरम-गरम। चुटीली भाषा में जादू और कसाव , संवादों में कांटों जैसा नुकीलापन और कथ्य में सुमन जैसी सुगंध ही माधुरी महाकाश की कहानियों का स्वर है और स्वाद भी। उन की कहानियों का माधुर्य भी यही है। 








समीक्ष्य पुस्तक :

शुक्लाइन चाची 

लेखक : माधुरी महाकाश 

प्रकाशक : हिंद युग्म ब्लू 

सी -31 , सेक्टर - 20 नोएडा - 201301 

मूल्य : 249 रुपए 

पृष्ठ संख्या  : 211

संस्करण : 2026