Sunday, 26 July 2026

मोदी और भाजपा का कोर वोटर उन से बिदक गया है

 दयानंद पांडेय


जंतर मंतर का एक संदेश यह भी है कि यू जी सी से नाराज लोग धर्मेंद्र प्रधान के पक्ष में किसी सूरत खड़े नहीं हो सकते थे l सो एक चुप , हज़ार चुप l भले कमान नरेंद्र मोदी के हाथ में है पर विश्वनाथ प्रताप सिंह और अर्जुन सिंह के बाद सवर्ण छात्रों का सर्वाधिक नुक़सान धर्मेंद्र प्रधान ने किया है l सो जातीय नफ़रत का दुर्ग उन्हें सार्वजनिक रूप से ले डूबा l

दलित , ओ बी सी वोट के चक्कर में मोदी से लगायत लगभग समूची भाजपा चुप रही l सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से कुछ पानी पड़ा ज़रूर पर ग़ुस्सा नहीं गया l नहीं जाएगा l दलित मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलटना भी ग़ुस्से का सबब है l पर यू जी सी इस से बड़ा है l बच्चों का भविष्य कोई अभिभावक नहीं बर्बाद करना चाहता l आरक्षण वैसे ही गले की फांस बना हुआ है l कोई कितना और कब तक सहे l

काकरोच मूवमेंट इसी लिए भस्मासुर बन गया l जंतर मंतर पर मोदी को अभद्र और अश्लील गालियां देने वाली ज़्यादातर ओ बी सी , दलित और मुस्लिम स्त्रियां , लड़कियां इसी लिए बेलगाम हो गईं l कि उन्हें कोई अब काऊंटर नहीं कर सकता l ब्रेक नहीं लगा सकता l यू जी सी से सताए हुए लोग , अब भी चुप हैं l मोदी और भाजपा का कोर वोटर यही है l है अभी भी भाजपा और मोदी के साथ लेकिन उन के लिए युद्धरत नहीं है l नहीं रहेगा l टेकेन फार ग्रांटेड मान लिया गया है इन्हें l राहुल देव जैसे तमाम फ्रस्ट्रेटेड लोग इन गालियों के पक्ष में खुल कर खड़े हो गए हैं l जे एन यू कैंपस की गालियां वाया जंतर मंतर अब रील बन कर देश के कैनवस पर छा गई हैं l वाम ब्रिगेड के लेखकों और पत्रकारों ने इन गालियों पर खुल कर सहमति दे दी है l ऐसे जैसे हरी झंडी l अभी माहौल और बदलेगा , और बिगड़ेगा l संस्कृत के एक श्लोक से लवणेन भोज्यम का अनर्थ मोदी के मुँह में डाल कर परोसा जा रहा है l

ग़लत सही , सब कुछ जानते हुए भी सब लोग चुप हैं l चुप रहेंगे l कूटनीति और कुटिलता से वोट बैंक नहीं संभलता l कोर वोटर भी भागने लगता है l भाजपा और मोदी जब तक इस तथ्य से परिचित नहीं होते , मुश्किल थमने वाली नहीं l गणेश का सिर काटना आसान है , उस की जगह हाथी का सिर लगाने के लिए शिव बनना पड़ता है l शिव का वह चातुर्य भाजपा और मोदी के यहाँ फ़िलहाल अनुपस्थित है l आरक्षण के ख़िलाफ़ भी मूवमेंट की सुगबुगाहट है l पर सारी सरकार परिसीमन के खेल में न्यस्त और व्यस्त है l परिसीमन ज़रूरी है पर इन मुश्किलों से भी आँख मूँद लेना किसी भी सरकार के लिए शुभ नहीं है l अहिंसक और देश प्रेमी लोगों को मुसलसल उपेक्षित करते रहना भी देश के लिए अशुभ है l

कटी पतंग की कैफ़ियत

दयानंद पांडेय

मोदी सरकार की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि वह लोकतांत्रिक होने की बिना पर अपने विरोधियों को उछल कूद करने की पूरी छूट देती है l यहाँ तक कि हिंसा आदि की भी l भरपेट l उग्रता की हद तक l पुलिस पीटने के बजाय, पिटने लगती है l

इतनी कि भाजपा और मोदी समर्थक भी बौखला कर मोदी को गरियाने लगते हैं l मोदी की ऐसी-तैसी कर देते हैं l मोदी की इस उदारता और सदाशयता की बैंड बजा देते हैं l

फिर अचानक यही मोदी सरकार किसी अजगर की तरह सारे रंग बिरंगे सापों को बहुत आहिस्ता से क़ानूनी आलिंगन में अनायास लपेट लेती है l कस कर जकड़ लेती है l पागल बना देती है l इतना कि उन का सांस लेना दूभर हो जाता है l लाश बना कर छोड़ देती है l बधिया बना देती है l कश्मीर से लगायत दिल्ली , ग़ाज़ियाबाद और अयोध्या आदि तक का यही सिलसिला है l

ट्रंप, चीन , पाकिस्तान, बंग्लादेश , मीडिया आदि हर कहीं आप इस बधिया बनाओ नीति का अवलोकन कर सकते हैं l हमारे लखनऊ, गोरखपुर में इसे ढील दे कर पतंग काटने की बात कही जाती है l प्याज और जूते का नैरेटिव भी इस में चाहें तो जोड़ सकते हैं l राहुल गांधी की मनोदशा और उन की बयान बहादुरी की शेख़ी भी l

मोदी की यह निराली अदा है l

दिल्ली में काकरोच जनता पार्टी , सोनम वांगचुक और इस बहाने अनेक रंग बिरंगे साँप मोदी सरकार के हाथ लग गए हैं l अब कटी पतंगों को उड़ते और गिरते हुए देखने का लुत्फ उठाने का समय आ गया है l

तो कल ही मोदी सरकार का इस्तीफ़ा हो गया होता

दयानंद पांडेय


निरंतर झूठ बोलने के अभ्यस्त राहुल गांधी कल की प्रेस कांफ्रेंस में बहुत से झूठ के साथ एक बहुत ही शातिर सा झूठ भी बोल गए l हंसते हुए बोले कि पुलिस वाले मुझे घसीट कर भले ले गए , पंच मारा, पर कान में कह रहे थे कि आप इस सरकार को हटा दीजिए l एक नहीं कई पुलिस कर्मी l कोई हरियाणा का , कोई कहीं का l सचमुच अगर वह पुलिस कर्मी इस सरकार को हटाने के इच्छुक थे तो उन के लिए बहुत आसान था कि कल की खींचा तानी में राहुल गांधी को गोली मार देते l जैसे कभी इंदिरा गांधी को उन के घर में ही मार दिया था l जैसे श्रीलंका में राजीव गांधी को एक सैनिक ने बंदूक की बट से मारा था l कहा था कि झाड़ू भी हाथ में होता तो भी मार देता l बिना किसी इफ बट और बिना किसी देरी के मोदी सरकार का इस्तीफ़ा हो जाता l राहुल गांधी शहीद हो जाते l कांग्रेस के पक्ष में देश में तूफ़ान आ जाता l जनता मोदी को मारने के लिए दौड़ा लेती l बिल्कुल श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह l जैसी की राहुल गांधी की इच्छा भी है l मनोकामना भी l

बहरहाल, राहुल के इस शातिर झूठ की तस्दीक़ में किसी पुलिस वाले की राहुल के कान में कुछ बोलते हुए कोई वीडियो , फ़ोटो मैं ने तो नहीं देखी l किसी ने देखी हो तो बताए भी l

सच यह है कि राहुल गांधी का संसदीय राजनीति और संसदीय गरिमा से कोई परिचय नहीं है l हंगामा खड़ा करना ही उन का मक़सद है l संसद हो या संसद से बाहर l देश हो या परदेस l संसद चलती है तो वह टपोरियों की तरह संसद के बाहर चमचों के साथ सीढ़ियों पर बैठे चाय पीते रहते हैं l संसद में कभी जाते हैं तो लोगों को अराजकता के लिए उकसाते रहते हैं l नियम से विपरीत उल्टी सीधी बात करते हैं l अपना मज़ाक उड़वाते रहते हैं l जेन जी की हिंसा से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं l संसदीय चुनाव से नहीं l राहुल अपने सामंती आचरण में हर किसी को अपना ग़ुलाम मानते हैं l सत्ता पक्ष हो , विपक्ष हो , कोई संस्था हो , हर किसी को बंधुआ बना कर रखने की उन की ख़्वाहिश उन्हें कहां से कहां बहा ले गई है , उन्हें पता ही नहीं l कल उन्हें सड़क पर पुलिस ने घसीटा है , बहुत जल्दी संसद में उन्हें संसद का मार्शल घसीटेगा l सत्ता से दूर रख कर जनता घसीट ही रही है l

पप्पू से घसीटा राम होने में बहुत देरी नहीं है l अब तक के भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसा अपमानित और अराजक नेता प्रतिपक्ष कोई एक दूसरा नहीं देखा l ब्रिटिश राज में भी नहीं l कि पुलिस को घसीटना पड़े l पुलिस आई तो गांधी हों , नेहरू हों या कोई और सब ने अपनी गरिमा बनाए रखी l पुलिस के साथ शांति से चल पड़े l इमरजेंसी में भी सभी बड़े नेता गरिमा पूर्वक चल दिए l बाद में जनता राज में इंदिरा गांधी भी l रथ यात्रा में आडवाणी भी शांति से पुलिस के साथ चल दिए l बाद के दिनों में अराजक लालू भी बारंबार l अभी ही अपनी यादवी लंठई के लिए परिचित ऐ पुलिस ! बोलने वाले अखिलेश यादव भी बस में बैठ कर हंसते हुए पूछ रहे थे कि पुलिस भाई कहां ले जा रहे हो ! क़ायदे के अपराधी भी अब पुलिस से रगड़ा-रगड़ी नहीं करते l चुपचाप पुलिस के साथ चल देते हैं l

लेकिन अराजक और हिंसक राहुल गांधी ?

लगता है कभी कोई पंच नहीं खाया l खाया होता पुलिस का पंच तो उठ कर खड़े होने लायक़ नहीं रहते l झूठ पर झूठ बोलने लायक़ बिल्कुल नहीं l छीना झपटी में नाक रगड़ खा कर लाल हो गई तो चमचे नाक से बहता ख़ून दिखाने लगे l मुझे तो पट्ठे के मार्शल आर्ट पर भी संदेह होता है l

Monday, 6 July 2026

शुक्लाइन चाची की कहानियों का स्वर और स्वाद

 दयानंद पांडेय 

जैसे कोई शिक्षक किसी छात्र की ग़लती पर पतली सी छड़ी सटाक से मार दे। माधुरी महाकाश की कहानियां ऐसे ही सटाक से छड़ी मारती चलती हैं। सटाक-सटाक ! ज़रा-ज़रा सी बात पर यही ध्वनि। लेकिन जैसे शिक्षक की वह छड़ी छात्र को अच्छे नंबर से पास करने की कड़ी और लड़ी बन कर अचानक उपस्थित हो जाए तो छात्र का बड़ा सा दुःख , अनिर्वचनीय सुख में बदल जाता है। ठीक वैसे ही माधुरी महाकाश की कहानियों में छाया अकुलाया उदासी का बीज अचानक सारे पत्थर तोड़ते हुए हरे पौधे के रूप में उपस्थित हो कर हर्ष के पुष्प और फल में तब्दील हो जाता है। गदराया हुआ। कहानियों का उदास और हताश विवरण जैसे सावन का बादल बन उमंग की बौछार बन कर बरसने लगता है। माधुरी की कहानियों की कुल तासीर यही है। कहानी का अंत सुखद पड़ाव की ओर सहसा मुड़ जाता है। माधुरी महाकाश के कहानी संग्रह शुक्लाइन चाची की लगभग सभी कहानियों का स्वर और स्वाद यही है। जैसे किसी लैंपपोस्ट की दिपदिपाती लाइट में बच्चे पढ़ रहे हों , माधुरी महाकाश की कहानियां अपने पात्रों के मन को पढ़ती मिलती हैं। पुरुष कथाकार ऐलानियां तौर पर स्त्री मन को पढ़ने की लालसा , अभिलाषा में दुबले होते रहते हैं। माधुरी महाकाश बिना किसी ऐलान के पुरुष मन को पढ़ती हैं। पुरुष मन और मनोविज्ञान को बांचती हैं और किसी विद्यार्थी की तरह इस इबारत को आहिस्ता से लिख देती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की बड़ी ताक़त है। ऐसे जैसे रात की नीरव शांति में कोई आकाश में चमकते तारे गिन रहा हो मन ही मन। और अचानक कोई तारा टूट कर गिर पड़े। यह तारे का टूट पड़ना ही , माधुरी की कहानी का हासिल है। जैसे कोई एक शेर किसी ग़ज़ल का हासिल हो। 

कई बार लगता है कि माधुरी कहानी नहीं , इमला लिख रही हों। पात्र बोल रहे हों , वह सर झुका कर लिख रही हों। बिना कोई हस्तक्षेप किए। बिना कोई सवाल जवाब किए। माधुरी जिस बेबाकी और सहजता से इमला लिखती मिलती हैं अपनी कहानियों में वह आसान नहीं है। इमला मतलब कथा में लेखक का कोई हस्तक्षेप नहीं है। जैसा कि अमूमन कहानियों में कथाकार करते मिलते हैं। शायद इसी लिए माधुरी की कथाओं में विवरण बहुत हैं। कह सकते हैं कि माधुरी विवरण प्रिय कथाकार हैं। रेशे-रेशे का विवरण रखती हैं। कहानी लंबी होती जाती है तो हो जाए। अपनी बला से। माधुरी लेकिन विवरण बताने में कोई कंजूसी नहीं बरततीं। हर चीज़ बता देना चाहती हैं। कुछ भी मिस नहीं होने देतीं। राजमा चावल बनाया है तो खिलाए बिना नहीं छोड़ने वाली कहानी में। चाय पकौड़ी ठेले से आई है तो क्या। खानी है वह भी। शुक्लाइन चाची कुंभ के मेले में नहाने समय डुबकी मार कर हेरा गई हैं। लोग हैरान हैं। तो क्या आख़िर में चौबाइन की शॉल ढलका कर , क्रीम रंग की शॉल ओढ़ कर मंद-मंद मुस्कुराती खड़ी भी मिलती हैं। बालू लिपटे पेटीकोट और भीगे ब्लाऊज में पगलिया बन कर घूमने वाली चाची का त्रास और निराश भाव जैसे क्रीम कलर की शॉल में औचक सौंदर्य बन कर कहानी के विवरण में ऐसे उजास भरता है जैसे घने बादल बीच अचानक सूर्य उपस्थित हो जाए। घर , घर के भीतर की बतकही को कहानी में ढाल लेने की कला किसी को सीखनी हो तो माधुरी महाकाश से सीखे। कुछेक अपवाद छोड़ दें तो माधुरी की कहानियों की सीमा भी यही है। घर , देहरी ,आंगन नहीं छोड़तीं वह। शायद इसी लिए माधुरी की कहानियां किसी एजेंडे के फ्रेम से बहुत बाहर हैं। किसी विमर्श के फंदे में भी नहीं हैं। चौंकाती भी नहीं हैं। कछुआ चाल चलती हुई जाने कितने खरगोशों को पछाड़ कर कहानी की लय को साध लेती हैं। किसी साधक संगीतकार की तरह। 


गजमुक्ता कहानी में प्रेम , दान और लालच का क्या ही कलेवर है। श्राद्ध की श्रद्धा कैसे एक लालची ब्राह्मण छीन लेता है। ख़ुद खाने का ठिकाना नहीं पर दान में दरवाज़े पर बंधी हाथी मांग लेता है। गजमुक्ता का अपने स्वामी के प्रति अथाह प्रेम का वर्णन भी माधुरी की वर्णन प्रियता में माधुर्य का अनिर्वचनीय पाठ उपस्थित करता है। कहानी में छोटे-छोटे वर्णन और प्रसंग भी कहानी को एक नया रंग देते हुए बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं। समाज के प्रति माधुरी का ऑब्जर्वेशन भी कहानी के संवादों में , वर्णन में स्पष्ट झलकता रहता है। ऐसे जैसे किसी झील के जल में वृक्ष की मनोहर छाया हो। जल के कल-कल में पक्षी का कलरव हो। जल की गहनता में स्त्री का सौंदर्य छलकता हो। मायके की मनुहार में पगी लीलावती कहानी में पति की ससुराल की चुस्की भर मुस्की के रंग के भी क्या कहने। छोटे-छोटे सुख और दुःख की देहरी कब पीपल का पात की तरह हिलती डुलती परात में पांव धोने की परंपरा से प्रीत का सुगंध का एक नया ही बिरवा रच जाती है। माधुरी की कहानियों में माटी की महक किसी इत्र से भी ज़्यादा रची-बसी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश की माटी की यह महक नोएडा , दिल्ली की सरहद छू कर भी अपनी माटी में किसी ज़िक्र की तरह लौट आती है। पुरवा हवा में लिपट कर लहक जाती है। आजी , मधुमालती , सखी भी ऐसी ही कहानियां हैं जिन में माटी की खनक भी है और लोच भी। माधुरी अपनी इन कहानियों में जैसे कोई संगीत रचती चलती हैं। खटका , मुरकी , आरोह , अवरोह अनायास माधुरी की कहानियों के सुर और साज़ में समाते जाते हैं। किसी स्त्री की पायल की तरह , कांच की चूड़ी की तरह खनकते सुर कहानी की कब कमानी बन जाते हैं , कब मेरुदंड , पाठक जान ही नहीं पाता। बस एक आलाप ले कर रह जाता है। अचानक। घर गृहस्ती की चक्की में उलझी स्त्री या पुरुष ही माधुरी की कहानी में नहीं है बोर्ड परीक्षा की ब्लैक ब्यूटी भी है। इस का अलग ही रंग है। पुरुष मन की थाह और उस के मनोविज्ञान की पड़ताल तो माधुरी की कहानियों का मुख्य स्वर है ही , बाक़ी समाज का भी थर्मामीटर है। स्त्री उस की सीढ़ी। इस सीढ़ी पर चढ़ कर ही वह बहुत आहिस्ता से शानदार कथाकार बन जाती हैं। यह आहिस्ता ही माधुरी महाकाश की कहानियों की पृथ्वी है। माधुरी की यह पृथ्वी घूमती रहती है। निरंतर घूमती हुई भाषा की चाशनी में कठोर से कठोर बात बड़ी मुलायमियत से कह जाती है। गजमुक्ता कहानी की इस एक पंक्ति पर गौर कीजिए : 

आधी आबादी तो ऐसा ब्लाऊजपीस दान में देती है कि इमरजेंसी पड़ जाए और छन्नी ना मिले तो चाय भी छन जाए। 

माधुरी महाकाश की कहानियां सचमुच आधी आबादी का वही दान वाली ब्लाऊजपीस हैं जो समाज को क़दम-कदम पर बिना कुछ अतिरिक्त कहे अनायास छानती रहती हैं। पुरुष मनोविज्ञान को अपनी कहानी की ही तरह बेसन में लपेट कर पकौड़ी की तरह छान कर परोस देती हैं। गरम-गरम। चुटीली भाषा में जादू और कसाव , संवादों में कांटों जैसा नुकीलापन और कथ्य में सुमन जैसी सुगंध ही माधुरी महाकाश की कहानियों का स्वर है और स्वाद भी। उन की कहानियों का माधुर्य भी यही है। 








समीक्ष्य पुस्तक :

शुक्लाइन चाची 

लेखक : माधुरी महाकाश 

प्रकाशक : हिंद युग्म ब्लू 

सी -31 , सेक्टर - 20 नोएडा - 201301 

मूल्य : 249 रुपए 

पृष्ठ संख्या  : 211

संस्करण : 2026