Wednesday, 22 April 2020

रिपब्लिक भारत के खूंखार एंकर अर्णब गोस्वामी की बात तो कहीं से नाजायज नहीं है



दुर्योधन अगर कहता था कि मेरा बाप अंधा है तो इस में मेरा क्या कसूर है। दुर्योधन की मांग भी कहीं से नाजायज नहीं थी। लेकिन अपनी मांग को पूरी करने के लिए दुर्योधन के तरीक़े ज़रूर नाजायज थे। जुआ , लाक्षागृह आदि ने उस की जायज मांग को भी नाजायज साबित कर दिया। ठीक उसी तरह आज रिपब्लिक भारत के खूंखार एंकर अर्णब गोस्वामी की बात कहीं से नाजायज नहीं है। उन के कहने के तरीके ने उन की सही बात को भी विध्वंसक साबित करने का उन के विरोधियों के हाथ में हथियार थमा दिया है। रिपब्लिक भारत जब शुरू हुआ था तब कोई दस-बारह दिन देखने के बाद फिर मेरी हिम्मत जवाब दे गई थी और रिपब्लिक भारत देखना बंद कर दिया। 

आज जब अर्णब की चौतरफा धुलाई होती देखी तो एक मित्र से उस हिस्से के वीडियो का लिंक मांग कर देखा। अर्णब का तरीका बहुत ही अशोभनीय दिखा। बिलकुल दुर्योधन की तरह। लाक्षागृह की तरह। लेकिन अर्णब के सवाल तो महत्वपूर्ण हैं। ज़रूरी हैं अर्णब के सवाल। सच तो यही है कि सोनिया, राहुल और प्रियंका आदि-इत्यादि किसी ने भी पालघर में दो संन्यासियों की हत्या की निंदा तो छोड़िए , भूल कर ज़िक्र भी नहीं किया कहीं। कांग्रेसियों , वामपंथियों समेत समूची सेक्यूलर जमात इस मॉब लिंचिंग पर सिरे से खामोश रही है। 

किसी सूरत आज लब खुले हैं तो अर्णब गोस्वामी के बेसुरे अंदाज़ पर। आज सोनिया का कवच बन कर उपस्थित हुए कौन लोग हैं , ध्यान से देख लीजिए। बाकी अर्णब गोस्वामी हों या रवीश कुमार दोनों एंकर एक ही काम कर रहे हैं। दोनों ही नफरत की दुकानदारी में न्यस्त , व्यस्त और मस्त हैं। बस बाप दोनों के अलग-अलग हैं। लेकिन नफरत और घृणा का कारोबार दोनों ही बखूबी संभाल रहे हैं। एकपक्षीय होना , एजेंडा परोसना दोनों ही की प्रतिबद्धता है। क्या रवीश कुमार नहीं चीखते , चिल्लाते हैं। 

हां , सुर उन का अर्णब सा नहीं होता। अर्णब पंचम में होते हैं तो रवीश मद्धम में। पर खीझना , खिसियाना आदि-इत्यादि सब उन के यहां भी है।  जो न्यूज़ का हिस्सा नहीं होता। एजेंडा होता है। दिलचस्प यह कि दोनों ही एन डी टी वी के प्रोडक्ट हैं। रवीश अभी एन डी टी वी की ताबेदारी में हैं , अर्णब अपनी निजी दुकान खोल बैठे हैं। फर्क यह है कि भाजपाई अर्णब गोस्वामी के साथ खड़े हैं या यह कहिए कि अर्णब भाजपाइयों के साथ खड़े हैं। ठीक वैसे ही रवीश कुमार के साथ कांग्रेस और वामपंथी खड़े हैं या यह कह लीजिए कि रवीश कुमार कांग्रेस और वामपंथियों के साथ खड़े हैं। 

मतलब पूरा महाभारत है। अब आप के पास अपनी सुविधा यह है कि अपनी पसंद के हिसाब से किसी एक को पांडव , किसी दूसरे को कौरव की संज्ञा , विशेषण से नवाज कर अपना काम चला सकते हैं। पर एक दिक्कत यह भी है कि वामपंथियों को रामायण , महाभारत जैसी चीज़ों पर यकीन ही नहीं है। कांग्रेस भी अदालत में दबी जुबान राम के अस्तित्व से इंकार करती है पर हर साल दिल्ली की रामलीला में रावण भी जलाती है। तो इस अंतर्विरोध को मारिए गोली। और जानिए कि इन की चुनी हुई चुप्पियां और चुने हुए विरोध कुछ और हैं तो उन के कुछ और। लेकिन चुनी हुई चुप्पियां और चुने हुए विरोध की दुकान दोनों के पास है। फर्क बस इतना है कि चुनाव जीतने में कांग्रेस और वामपंथी भले नाकामयाब हों पर प्रोपगैंडा फ़ैलाने और माहौल बनाने में वह अपने प्रतिदवंद्वी से हज़ारो किलोमीटर आगे हैं। 

याद कीजिए अख़लाक़ , पहलू खान , तबरेज अंसारी आदि-इत्यादि के मामले। पूरे देश में आग लग गई थी। अख़लाक़ मारा गया उत्तर प्रदेश में लेकिन तत्कालीन मुख्य मंत्री अखिलेश यादव को भूल कर , क़ानून व्यवस्था राज्य सरकार के जिम्मे है , नज़रअंदाज़ कर सारा ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ते हुए साहित्य अकादमी को हथियार बनाया गया। तब जब कि साहित्य अकादमी स्वायत्तशासी संस्था है। सिवाय बजट देने के केंद्र सरकार का एक पैसे का दखल नहीं है। अवार्ड वापसी गैंग इस बात को बखूबी जानता था। लेकिन साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए अशोक वाजपेयी ने वामपंथियों का बखूबी इस्तेमाल कर लिया। रंग भी चोखा हो गया। पर अख़लाक़ , पहलू , तबरेज के दुकानदार पाल घर में संन्यासियों की मॉब लिंचिंग पर खामोश दूरी बनाए हुए हैं। लेकिन अर्णब गोस्वामी द्वारा सोनिया गांधी पर निशाना साधने पर यही दुकानदार बौखला गए हैं। पत्रकारिता के शिष्टाचार तक पर यह सभी दुकानदार आ गए हैं। 

गोया देश में अभी पत्रकारिता शेष हो। जो सचमुच देश में पत्रकारिता शेष होती तो यह दुकानदार जाने क्या-क्या कहते। हां , यह ज़रूर है कि पालघर में संन्यासियों की हत्या पर भाजपाइयों , संघियों की ज़बरदस्त हार हुई है। एक तो लॉक डाऊन दूसरे , प्रोपगैंडा में , माहौल बनाने में नाकामयाब हुए हैं , भाजपाई और संघी। असल में इन के पास प्रोपगैंडा के लिए , माहौल बनाने के लिए वामपंथियों जैसी कुशल टीम नहीं है , जो कि कांग्रेस के पास है। भाजपाइयों के पास है भी तो अर्णब गोस्वामी। जो खेल बनाता कम , खेल बिगाड़ता ज़्यादा है। अर्णब का बम-बम स्टाइल में सोनिया पर हमलावर होना , कांग्रेसियों और वामपंथियों के गैंग को रास आ गया है। देखिए न कुछ घंटे में ही बात संन्यासियों की हत्या से हट कर , अर्णब गोस्वामी की पत्रकारिता पर आ गई है। एफ आई आर आदि हो गई। एडीटर्स गिल्ड-विल्ड हो गया। 

नैरेटिव एकदम से बदल गया है। वामपंथियों को यह कला बखूबी आती है। भाजपाई और संघी इस खेल में वामपंथियों से पिटने के लिए ही पैदा हुए हैं। सर्वदा पिटते रहेंगे। वामपंथियों की दिक्कत बस यही है और कि मलाल भी आखिर कब तक उन्हें सेक्यूलरिज्म की बिसात पर कांग्रेस के लिए बैटिंग करती रहनी पड़ेगी। कब तक मॉब लिंचिंग से लगायत शाहीनबाग तक वह कांग्रेस के लिए बैटिंग करते रहेंगे। कब तक राहुल गांधी में भविष्य झांकते फिरेंगे। कन्हैया कुमार जैसे लोग कब तक कांग्रेस के लिए खाद ही बनते रहेंगे। कब तक केरल में ही लाल सलाम करते रहेंगे। आगे की धरती आखिर कब देख पाएंगे। लाल किले पर लाल सलाम का सपना कब रंग लाएगा। बस इन को कोई यह बताने वाला नहीं है कि बैंड बजाने वाले , बैंड ही बजाते रहते हैं।  चाहे जितना अच्छा बैंड बजा लें , दूल्हा नहीं बनते। 


क्या पता डिसकवरी आफ़ इंडिया की तरह कभी कोई डिसकवरी आफ़ लतीफ़ा गांधी भी लिखे


पंडित जवाहरलाल नेहरु ने क्या शानदार किताब लिखी है डिसकवरी आफ़ इंडिया। जिस ने नहीं पढ़ी , उसे खोज कर पढ़ना चाहिए। श्याम बेनेगल ने भारत एक खोज नाम से शानदार सीरियल भी बनाया है , इस किताब के आधार पर। पंडित नेहरु अमीर बाप के बेटे भले थे पर ज़मीन से जुड़े व्यक्ति थे। उन के पितामह चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे ब्रिटिश गवर्नमेंट में। कोई कहता है चपरासी थे , कोई चौकीदार बताता है । लोहिया चपरासी बताते थे । कहते थे , भारत में एक चपरासी का पोता भी प्रधान मंत्री बन सकता है। एक बार किसी ने लोहिया को टोका कि क्यों आप इस तरह नेहरु को बेइज्जत करते रहते हैं। लोहिया बोले , मैं किसी की बेइज्जती नहीं करता यह कह कर। मैं तो भारत के लोकतंत्र की ताकत और खासियत का बखान करता हूं यह कह कर कि एक चपरासी का पोता भी यहां प्रधान मंत्री बन सकता है। 

नेहरु के साथ बतौर निजी सचिव रह कर इंदिरा गांधी ने भी ज़मीनी सचाई सीखी और जानी । राजनीति और प्रशासन के गुण सीखे । और नेहरु से भी ज़्यादा ताकतवर और प्रभावी बन कर राजनीति में जानी गईं। वैसे तो बहुतेरी घटनाएं है पर इंदिरा गांधी के साथ की दो घटनाएं यहां गौर तलब हैं । एक बार एक फिल्म समारोह में ख्वाज़ा अहमद अब्बास आए तो नेहरु ने उस समारोह में उन से शाम को अपने घर पर चाय पर बुलाया। अब्बास ने कहा कि मैं अपनी टीम के साथ आया हूं सो अपनी टीम के साथ आना चाहूंगा। नेहरु ने उन से कहा कि ठीक है फिर इंदिरा से बात कर लीजिएगा । इंदिरा उन दिनों नेहरु की निजी सचिव भी थीं। अब्बास उसी समारोह में इंदिरा से मिले और नेहरु द्वारा शाम को चाय पर नेहरु द्वारा बुलाने और खुद टीम के साथ आने की बात बताई। इंदिरा गांधी ने अब्बास से कहा कि अगर आप अकेले चाय पर आ सकते हों तो ज़रूर आएं , पर टीम के साथ नहीं। अब्बास ने कारण जानना चाहा तो इंदिरा गांधी ने उन्हें बताया कि असल में हम घर का खर्च पापा को मिलने वाले रायल्टी से चलाते हैं , सरकारी खर्च पर नहीं। सो सात-आठ लोगों को चाय पिलाने का खर्च नहीं उठा सकते। अब्बास नेहरु के घर चाय पर नहीं गए।

दूसरी घटना 1977 की है। जनता पार्टी जीतने और सरकार बनाने के बाद दिल्ली के रामलीला मैदान में विजय दिवस मना रही थी। मोरार जी देसाई के नेतृत्व में । जयप्रकाश नारायण को भी उस विजय दिवस में बुलाया गया था । लेकिन जयप्रकाश नारायण विजय दिवस की रैली में जाने के बजाय ठीक उसी समय इंदिरा गांधी से मिलने उन के घर गए। बेटी इंदिरा गांधी का हाल-चाल लेने। वह चिंतित थे और इंदिरा से पूछ रहे थे कि अब तुम्हारा कामकाज कैसे चलेगा ? घर का खर्च कैसे चलेगा ? इंदिरा ने बताया कि घर खर्च की चिंता नहीं है , पापू की किताबों की रायल्टी इतनी आ जाती है कि घर खर्च तो आराम से चल जाएगा। चिंता मेरी यह है कि अब मैं करुंगी क्या। टाइम कैसे बीतेगा । जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा से कहा कि तुम फिर से जनता के बीच जाओ। लोगों से मिलो जुलो और मेहनत करो। इंदिरा ने जयप्रकाश नारायण की बात मान ली , वह जयप्रकाश नारायण , जिस ने इंदिरा की सत्ता को उखाड़ फेंका था। और इंदिरा ने जयप्रकाश नारायण की सलाह पर , फिर से जनता के बीच जाना शुरु किया । छ महीने बाद ही आज़मगढ़ का उपचुनाव जीत लिया कांग्रेस की मोहसिना किदवई ने। और ढाई साल में ही इंदिरा गांधी आम चुनाव जीत कर फिर प्रधान मंत्री बन गईं।

लेकिन इंदिरा गांधी ने अपने बच्चों को ज़मीन से जुड़ने पर ध्यान नहीं दिया। मुंह में चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुए राजीव गांधी और संजय गांधी गगन विहारी बन गए। राजीव तो शुरू में पायलट बन कर खुश थे। राजनीति में उन की दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन संजय गांधी की राजनीति में न सिर्फ़ दिलचस्पी थी बल्कि एक समय वह सुपर प्राइम मिनिस्टर बन कर उपस्थित थे। मनमानी , बदमिजाजी और अय्याशी के उन के बहुतेरे किस्से हैं। कुछ झूठे , कुछ सच्चे। इंदिरा गांधी को थप्पड़ मारने तक के। यह इमरजेंसी के दिनों की बात है। इमरजेंसी के बीस सूत्रीय कार्यक्रमों के साथ ही संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रमों की बहार के दिन थे। नसबंदी की ज्यादतियों के साथ ही संजय गांधी द्वारा गुड़ बोओ , गन्ना बोओ , पेड़ बोओ के दिन थे । उन के जीवन में अंबिका सोनी , रुखसाना सुल्ताना और मेनका गांधी के दिन थे। 1977 के चुनाव में हार के बाद भी वह नहीं सुधरे । दुबारा सत्ता में लौटने के बाद तो संजय गांधी करेला और नीम चढ़ा बन चले थे। लेकिन एक हवाई दुर्घटना में उन का दुर्भाग्यपूर्ण निधन हो गया। उन की ज़िद , उन की सनक , बदमिजाजी और अय्यासियों की कहानी लेकिन अभी भी शेष है।


इंदिरा गांधी को संभालने और सहारा देने के लिए अब राजीव गांधी पायलट की नौकरी छोड़ कर राजनीति में आ गए। अभी वह राजनीति का ककहरा सीख ही रहे थे कि इंदिरा गांधी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हो गई। राजीव गांधी बड़ा पेड़ गिरने के बाद धरती हिलाते हुए प्रधान मंत्री बने। हिंदू-सिख दंगे उन्हें उन के धरती हिलाऊ बयान के परिणाम में सौगात में मिले। राजीव गांधी अपने छोटे भाई संजय की तरह बदमिजाज तो नहीं थे पर उन की अय्याशियों और भ्रष्टाचार के बेशुमार किस्से हैं। इतने कि उन दिनों राजीव गांधी के नाम पर उन दिनों नानवेज लतीफ़े भी ख़ूब बने और चले। अरुण सिंह से उन की ख़ास किसिम की दोस्ती और राजीव शुक्ला पर उन की ख़ास मेहरबानियों और राजीव शुक्ला की छप्पर फाड़ सफलता के किस्से तो आज भी सामने हैं। बोफ़ोर्स का दाग़ उन पर बहुत गहरा है। हां , संजय गांधी का गुड़ बोओ , गन्ना बोओ , पेड़ बोओ की विरासत भी राजीव गांधी ने संभाली। किस्से बहुत हैं पर यहां अभी दो ही का ज़िक्र कर रहा हूं।

1989 का चुनाव प्रचार राजीव गांधी ने अयोध्या से शुरू किया। कहा कि यहां एक नैमिषारण जी भी हुए , बहुत बड़े ऋषि थे। अब उन को कोई यह बताने वाला नहीं था कि नैमिषारण सीतापुर में एक जगह है , कोई ऋषि नहीं।

राजीव गांधी की एक अदा थी कि वह आफ़ बीट बहुत होते थे। एक बार राजस्थान दौरे पर थे। सुरक्षा का तामझाम छोड़ कर वह अचानक एक गांव के खलिहान में पहुंच गए। खलिहान में पहुंच कर वह किसानों से बतियाने लगे। खलिहान में दो तरह की मिर्च रखी हुई थी। एक तरफ हरी , दूसरी तरफ लाल। राजीव गांधी ने किसानों से पूछा कि लाल मिर्च के ज़्यादा पैसे मिलते हैं कि हरी मिर्च के ? किसानों ने बताया कि लाल मिर्च के। छूटते ही राजीव गांधी ने पूछा फिर आप लोग हरी मिर्च बोते ही क्यों हो ? लाल मिर्च ही बोया करो। किसान उन्हें समझाते ही रहे कि हरी मिर्च ही बाद में सूख कर लाल मिर्च बनती है। लेकिन राजीव गांधी उन किसानों की कुछ सुनने को तैयार ही नहीं थे। बस यही रट लगाए रहे कि लाल मिर्च ही बोओ , हरी नहीं। क्यों कि हम चाहते हैं कि आप को ज़्यादा से ज़्यादा लाभ मिले।

राजीव गांधी और संजय गांधी तो मुंह में चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुए थे। लेकिन राहुल गांधी मुंह में सोने का चम्मच ले कर पैदा हुए। वह सोने का चम्मच अभी उन के मुंह से निकला नहीं है। बाक़ी सोनिया गांधी के पुत्र मोह ने उन्हें बुरी तरह बिगाड़ दिया। राहुल न सिर्फ़ बदमिजाज , सनकी , बड़बोले बन गए बल्कि नशेड़ी भी बन गए। अमरीका में एक बार स्पेनिश महिला मित्र के साथ हेरोइन के एक पैकेट और एक लाख साठ हज़ार डालर के साथ बोस्टन में लोगन एयरपोर्ट पर पकड़े गए। सोनिया के हाथ-पैर जोड़ने पर उदारमना अटल बिहारी वाजपेयी ने बिना किसी शोर शराबे के किसी तरह राहुल गांधी को अमरीका की एफ बी आई से छुड़वाया। राहुल की ऐसी अय्याशियों की अनगिन कहानियां हैं। उन की विदेश यात्राओं का ज़िक्र कीजिए , लोग समझ जाते हैं कि अय्याशी यात्रा। इस फेर में राहुल गांधी ने अपना जीवन तो नष्ट किया ही , एक शानदार पार्टी कांग्रेस को भी नष्ट कर बैठे। पूरी तरह तबाह कर बैठे कांग्रेस को। आलू की फैक्ट्री लगाने , ट्रक और ट्रैक्टर में पेट्रोल डालने जैसी मूर्खता भरे बयान , चौकीदार चोर है जैसा फर्जी नारा लगा कर कांग्रेस की कब्र खोद बैठे हैं। सर्जिकल स्ट्राइक , एयर स्ट्राइक पर सुबूत मांग-मांग कर कांग्रेस को ताबूत में लिटा चुके हैं। अपने नित नए मूर्खता भरे बयान और अंदाज़ से लतीफ़ा बन कर देश में उपस्थित हैं राहुल गांधी। भारतीय राजनीति में ऐसा विदूषक कोई और नहीं मिल सकता।

एक समय भारतीय राजनीति में राजनारायण भी अपनी बातों से बहुत हंसाते थे । लालू यादव भी अपने हंसाने की बातों के लिए जाने जाते हैं । अटल जी भी कई बार अपनी गंभीर बातों से हंसा-हंसा देते थे। लेकिन राहुल गांधी तो स्वयं लतीफ़ा बन कर उपस्थित हैं। राहुल गांधी का नाम लेने मात्र से लोग हंस पड़ते हैं। ऐसे बुद्धिहीन , निकम्मे और नशेड़ी नेता भारत में राहुल गांधी इकलौते हैं। संसद में सोने वाले , बदजुबानी करने वाले , झूठ बोलने वाले बहुतेरे नेता हैं। लेकिन सोने , भूकंप लाने की बात करने और ज़बरदस्ती गले लिपट कर आंख मारने वाले राहुल गांधी इकलौते हैं। अभी आज चौकीदार चोर है पर राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में भले अपनी गलती मांग कर माफ़ी मांग ली है लेकिन यह नारा लगाना नहीं छोड़ा है। आज की चुनावी सभाओं में माफ़ी मांगने के बावजूद लगा रहे हैं। चुनावी ज़रूरत और लत दोनों ही की विवशता है उन की यह। वैसे भी अभी उन को अपने लतीफ़ा गांधी होने के प्रमाण के कई और किस्से भारतीय राजनीति को उपलब्ध करवाने हैं। पप्पू गांधी अब शायद बीती हुई बात है। उन की नागरिकता , डिग्री आदि की बातें उन के इस लतीफा गांधी की छवि के आगे पता नहीं लगतीं। लोग भूल जाते हैं। जनेऊ पहन कर दत्तात्रेय गोत्र बता कर इस पारसी व्यक्ति का मंदिर-मंदिर घूमना भी अब लोग लतीफ़े के रुप में ही याद करते हैं। अलग बात है कि मीडिया वाले इसे उन का साफ्ट हिंदुत्व बताते हैं।

संसद में एक और हंसोड़ नेता थे पीलू मोदी। 1950 में उत्तर प्रदेश के गवर्नर रहे होमी मोदी के पुत्र पीलू मोदी भी पारसी थे । मुंबई से थे। इंदिरा गांधी को बातों बातों में लाइन मारने से बाज नहीं आते थे। कहते थे तुम टेम्परेरी पी एम लेकिन मैं परमानेंट पी एम। संसद में एक बार इंदिरा को अख़बार में छपी पहेली सुलझाते हुए उन्हें सार्वजनिक रूप से टोक दिया। स्पीकर से पूछा , क्या पीएम संसद में अखबारी पहेली हल कर सकता है? नीलम संजीव रेड्डी स्पीकर थे और इंदिरा को ऐसा करने से रोक दिया। इंदिरा ने उन्हें स्लिप भेजी , तुम को कैसे पता चला ? - पी एम । पीलू ने उन्हें स्लिप भेजी , मेरे जासूस हर तरफ हैं - पी एम । प्रेस गैलरी में बैठे एक पत्रकार ने उन्हें इशारे से यह बताया था। पीलू मोदी राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी से गोधरा से सांसद थे। बाद में चौधरी चरण सिंह की पार्टी में आ गए। इमरजेंसी में जेल भी गए। जनता पार्टी का उन को अध्यक्ष बनाने की बात भी हुई थी। पर उन की शराब बीच में आ गई और चंद्रशेखर अध्यक्ष बने। अलग बात है चंद्रशेखर भी शराब पीते थे पर पीलू बदनाम थे। 1978 में राज्यसभा में आए ।

खैर , पीलू मोदी से नाराज हो कर एक बार इंदिरा गांधी ने उन पर सी आई एजेंट होने का आरोप लगा दिया । इंदिरा गांधी की उन दिनों आदत थी कि अपने हर फेल्योर पर वह विदेशी हाथ खोजते हुए सी आई ए तक पहुंच जाती थीं । कहती थीं , सी आई ए का हाथ है । तो पीलू मोदी इंदिरा गांधी के आरोप से आहत हो कर अपने गले में , आई एम सी आई ए एजेंट , की तख्ती गले में लटका कर संसद के सेट्रल हाल में पहुंच गए । इंदिरा गांधी का मुंह अपने आप बंद हो गया। लेकिन इंदिरा गांधी को क्या पता था कि एक समय उन का ही अपना पोता राहुल गांधी भरी संसद में कहेगा कि हां , मैं पप्पू हूं ! अगर ख़ुदा न खास्ता राहुल गांधी इस बार लोकसभा फिर पहुंच गए , [ पूरी उम्मीद है पहुंचने की ] तो तय मानिए अभी तो एक आंख मारी थी , अगली बार दोनों आंख मार कर बताएंगे कि हां , मैं लतीफ़ा गांधी हूं !

और लोग हंसेंगे। लेकिन राहुल गांधी के चमचों की फ़ौज , इस बात पर ताली बजा कर झूम-झूम जाएगी ।

क्या पता जैसे कभी नेहरु ने डिसकवरी आफ़ इंडिया लिखी थी वैसे ही कभी कोई डिसकवरी आफ़ लतीफ़ा गांधी भी लिखे। कौन जाने राहुल गांधी ख़ुद लिखें। अपने परनाना नेहरु की पुस्तक लेखन की विरासत संभालते हुए। अगर ईमानदारी से लिखेंगे तो डिसकवरी आफ़ इंडिया की तरह बेस्ट सेलर भी बनेगी उन की यह किताब ।फ़िलहाल तो चुनाव के चक्कर में ही सही , अपने परनाना का गोत्र दत्तात्रेय संभाले हुए हैं। 

Sunday, 19 April 2020

अरुंधती राय अब पूरी तरह देशद्रोही की भूमिका में उपस्थित हैं


कृपया मुझे यह कहने की अनुमति दीजिए कि माओवादियों को गांधीवादी और गांधी को कारपोरेट एजेंट यानी दलाल बताने वाली बुकर विनर अरुंधती राय अब पूरी तरह देशद्रोही की भूमिका में उपस्थित हैं। अरुंधती राय का ताजा देशद्रोही बयान है : कोरोना संकट की आड़ में भारत सरकार हिंदू-मुस्लिम के बीच तनाव बढ़ा रही है। हालात जातीय या सामूहिक संहार की ओर बढ़ रहे हैं। एक तरफ सरकार और समाज कोरोना से लड़ने में युद्धरत है लेकिन अरुंधती राय देश से लड़ने में व्यस्त और न्यस्त हैं। क्या सचमुच बकौल अरुंधती राय कोरोना के बहाने जातीय या सामूहिक संहार कर रही है सरकार ?   

दरअसल अरुंधती राय की पूरी दुकानदारी भारत विरोध और हिंदू , मुसलमान के बीच जहर की नागफनी उगाने की ही है। कश्मीर को वह भारत का अंग नहीं मानतीं। अफजल की फांसी को भारतीय लोकतंत्र पर दाग बताती हैं। पाकिस्तान और मुसलमानों के काले कारनामों पर सर्वदा परदा डालना , जहर बोना ही अरुंधती राय की खेती है। भारतीय सेना को बलात्कारी बताने वाली अरुंधती आदिवासियों को भी जब-तब हथियार बनाती रहती हैं। यह वही अरुंधती राय हैं जो कहती रही हैं कि यदि एन.पी.आर के लिए सर्वे करने के लिए सरकारी कर्मचारी आपके घर जाएं तो आप उन्हें अपना गलत नाम और पता बता दीजिए। 

गरज यह कि जैसे भी बने उन्हें भारत विरोध ही करना है। अरुंधती राय ही नहीं सारे वामपंथी बुद्धिजीवियों की ही यही खेती है। अरुंधती राय तो बस किसी गड़रिए की तरह वामपंथी भेड़ों को चलने के लिए एक रास्ता सुझाती हैं और सारी भेड़ें आंख मूंद कर तुरंत चल देती हैं। तो अरुंधती राय ने अगर कोरोना में भी हिंदू , मुसलमान कर के एक बार फिर अपनी देशद्रोही दुकानदारी को एड्रेस किया है तो कोई नई बात नहीं की है।

सरकार कायर है जो अरुंधती राय जैसी देशद्रोहियों को लोकतांत्रिक अधिकार के नाम पर , अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर देशद्रोही गतिविधियों को अंजाम देने देती है। अरुंधती राय जैसों का दिमाग इसी लिए ख़राब रहता है। सो दोष अरुंधती राय या इन जैसों का नहीं , कायर सरकार का है। अगर किसी एक को भी मेरी इस बात पर ऐतराज है कि अरुंधती राय देशद्रोही हैं तो अरुंधती राय का कोई एक ऐसा बयान या गतिविधि बता दे कि उन्हों ने यह बात देश के समर्थन या देश को जोड़ने के लिए भी की है। एक नहीं मिलेगी। मेरा स्पष्ट मानना है कि अरुंधती राय का हर बयान , हर गतिविधि देश को तोड़ने के लिए ही दिखी है। इसी लिए वह देशद्रोही हैं।

Thursday, 16 April 2020

लेकिन भारत में बहुत सारे और भी अल्पसंख्यक समाज के लोग हैं , सिर्फ मुस्लिम ही नहीं

अब कोरोना को देश भर में फ़ैलाने , डाक्टरों , पुलिस आदि पर थूकने और पथराव के चलते अगर कोई सब से बड़ा खलनायक बन कर उपस्थित हुआ है तो मुस्लिम समाज। तो क्या सिर्फ इस लिए कि उन के खिलाफ कोई साज़िश हुई है ? कि वह अल्पसंख्यक हैं। सिर्फ इस लिए। फिर सलमान खान क्या इस लिए वीडियो जारी कर चेतावनी दे रहे हैं कि संभल जाओ नहीं सेना आ जाएगी , क्यों कि उन की मां हिंदू हैं। दुर्भाग्य से यह नैरेटिव भी दबी जुबान आ गया है। 

भारत में बहुत सारे और भी अल्पसंख्यक समाज के लोग हैं। सिख , ईसाई , जैन , पारसी , बौद्ध , पारसी आदि। लेकिन न सिर्फ़ चुनाव में , बल्कि बाक़ी मामलों में विवादित मुस्लिम ही क्यों होते हैं। और अब इस कोरोना मामले में भी। गंगा जमुनी तहजीब की बात भी मुसलमानों की मिजाजपुरसी में ही होती है। लेकिन यह गंगा जमुनी तहजीब कभी प्रगाढ़ क्यों नहीं हो पाती , यह एक बड़ा सवाल है। अब सभी धर्मों , जातियों के बीच शादी-विवाह सामान्य बात हो चली है । लेकिन ऐसा क्यों है कि अगर हिंदू-मुसलमान के बीच शादी होती है तो विवाद का विषय बन जाती है।

यहां तक कि मुसलमान और सिख के बीच भी शादी अमूमन विवाद का विषय बन जाती है। लेकिन बाक़ी अल्पसंख्यकों के साथ शादी सहित कोई और विवाद कभी नहीं होता। एक समय खालिस्तान के चक्कर में , हिंदू , सिख दंगों के चक्कर में बहुत गहरी खाई खुद गई थी , हिंदू-सिख के बीच । पर समय रहते सिखों ने खुद को संभाल लिया और देश की मुख्य धारा में शामिल हो चुके हैं। लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद मुसलमान आज भी अपने को देश की मुख्य धारा का हिस्सा नहीं बना पाया है । उस की पहली और आख़िरी पहचान मुसलमान की ही रह गई है। ग़रीब , मजलूम , आतंकी और वोट बैंक की ही रह गई है। पाकिस्तान जाने के ताने सुनने की रह गई है।

सिख भी एक समय आतंकी की पहचान लिए हुए थे पर वह तो अपनी इस पहचान को धो-पोंछ बैठे । अपने काम , अपने व्यवहार से । मुसलमान ऐसा क्यों नहीं कर पा रहे। आर एस एस और भाजपा उन की यह राह रोक रही है , या वह खुद इस के बड़े कारण हैं। मुस्लिम समाज को इस बात पर बहुत गहराई से सोचना , समझना चाहिए। और खुद को बदल कर देश की मुख्य धारा में खुद को समाहित करना चाहिए। अपने गले से अल्पसंख्यक होने , वोट बैंक होने के पट्टा उठा कर बंगाल की खाड़ी में फेंक देना चाहिए।

मुसलमानों को सोचना चाहिए कि नवजोत सिंह सिद्धू जैसे लोग कभी पंजाब में बिहार के कटिहार जैसा भाषण देते हुए सिखों से यह अपील क्यों नहीं करते मिलते कि तुम यहां मेजारिटी में हो मोदी को सुलटा दो। कटिहार में मुसलमानों से ही क्यों कहते हैं सिद्धू जैसे लोग । देवबंद में ही मायावती क्यों कहती हैं कि मुसलमानों का वोट बंटना नहीं चाहिए। मुसलमान आखिर क्यों गरीब की लुगाई बन गया है कि जिसे देखो , वही उसे अपना फ़रमान सुना कर यूज एंड थ्रो करता जा रहा है । मुसलमान कब तक पोलिटिकली कमोडिटी बने रहेंगे , कब तक फ़ुटबाल बना कर खेले जाते रहेंगे , यह फ़ैसला तो मुस्लिम समाज को ही लेना और सोचना है ।

कुम्भकर्णी नींद से जागो न्याय मूर्तियों , जागो !

आतंकियों के लिए , बलात्कारियों के लिए , आधी रात भी खुल जाने वाली , दंगाइयों के पोस्टर पर स्वत: संज्ञान लेने वाली , अदालतें प्रवासी मज़दूरों की भूख नहीं देख रहीं , उन की छटपटाहट नहीं देख रहीं। कि तबलीगी जमात की नंगई नहीं देख रहीं , कि विभिन्न सरकारों की हिप्पोक्रेसी नहीं देख रहीं , शहर-दर-शहर बसे मिनी पाकिस्तान में पत्थरबाजी से घायल , अस्पतालों में पिटते डाक्टरों को नहीं देख रहीं। कि डाक्टरों पर थूकते हुए इन देशद्रोहियों को नहीं देख रहीं , नर्सों के आगे नंगे नाचते हुए की खबर भी नहीं देख रहीं। कि जगह-जगह पुलिस को पिटते नहीं देख रहीं , पत्थरबाजों से। क्यों नहीं देख रहीं ? 

तो क्या मान लिया जाए कि बाकी सब देखने के लिए , आधी रात जागने के लिए , स्वत: संज्ञान के लिए , कुछ अतिरिक्त मिलता है , तब यह अदालतें देखती हैं। और जब कुछ अतिरिक्त नहीं मिलता तो नहीं देखतीं। आंखें मूंद  लेती हैं। आखिर किस रात , किस दिन जागेंगी हमारी सर्वोच्च अदालतों की न्याय मूर्तियां जब आज के हमारे भगवान कहे जाने वाले , डाक्टरों की यह कमीने लाशें बिछा देंगे। भूख से बिलबिलाते मज़दूर घर जाने की आस में दम तोड़ने लगेंगे। बेशर्म मुख्य मंत्रियों से क्यों नहीं पूछतीं यह न्याय मूर्तियां कि कैसे लोक कल्याणकारी राज्य के मुख्य मंत्री हो कि तुम्हारे अन्न भंडार भरे पड़े हैं और आख़िरी कतार का व्यक्ति भूखों मर रहा है। तुम्हारे विशाल हरामखोरी के दावों में दम क्यों नहीं है। 

क्यों नहीं पूछ पातीं प्रधान मंत्री से भी कि देश के हर एक नागरिक के भूख , प्यास और सम्मान की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है। और कि कोरोना फ़ैलाने के अपराधी तबलीग जमात के लोगों को फौरन से फौरन देशद्रोह के आरोप में जेल क्यों नहीं भेजते। क्यों उन्हें दामाद बना कर उन की ज़्यादतियां देश के निर्दोष लोगों पर थोप कर , मौत के मुंह में ढकेल रहे हो। क्यों मुस्लिम तुष्टिकरण का रिकार्ड बना कर नोबल प्राइज पाने की लालच में , वैश्विक छवि चमकाने के मोह में , देश के लोगों की ज़िंदगी दांव पर लगाए बैठे हो। मीठी-मीठी होमियोपैथी की गोलियां देश को देना बंद करो। नहीं संभलता देश तो सेना के हवाले करो। 

सेना युद्ध ही नहीं , लोक कल्याण भी जानती है। बखूबी जानती है। कई बार साबित किया है। फिर साबित करेगी। कुछ करो न्याय मूर्तियों , कुछ करो। मत जागो आधी रात , दिन में ही जागो। देश ज्वालामुखी के ढेर पर बैठ गया है। कुम्भकर्णी नींद से जागो न्याय मूर्तियों , जागो ! अपनी मृत आत्मा को जगाओ न्याय मूर्तियों जगाओ। देश को अमरीका , इटली , स्पेन बनने से बचाओ। हरामखोरी बंद करो न्याय मूर्तियों। बहुत हो गया। बर्दाश्त भी अब पनाह मांग गई है। कमीनी सरकारों को एक बार तबीयत से लतियाओ। लतियाओ कि रास्ते पर आएं। जागो कि जनता बगावत पर न आ जाए !

Wednesday, 15 April 2020

जी हां , हम हिंदू , मुसलमान करते हैं

मनो मुंबई से ट्रेन चलाने की मांग तो हम ने की है , किसी ठाकरे ने नहीं। हिंदू , मुसलमान कर के पाकिस्तान तो हम ने ही बनवाया। हिंदू , मुसलमान कर के भारत में तमाम मिनी पाकिस्तान भी हम ने ही बनाया। कश्मीर को हम ने ही दहकाया। हिंदू , मुसलमान कर के हम ने ही कहा कि पोलियो ड्राप मत पीना। हिंदू , मुसलमान कर के हम ने ही कहा कि आतंकी अफजल को सुप्रीम कोर्ट से फांसी , ज्यूडिशियल किलिंग है और कि नारा लगाया था , तुम कितने अफजल मारोगे , हर घर से अफजल निकलेगा। हिंदू , मुसलमान कर भारत तेरे टुकड़े होंगे , इंशा अल्ला , इंशा अल्ला ! सी ए ए की खिलाफत में देश भर में उपद्रव , दंगे हम ने ही तो करवाया देश भर में। हिंदू , मुसलमान कर , कर के मुंबई ब्लास्ट करवाया 1993 में हम ने ही। 

हम ने ही हिंदू , मुसलमान कर मुबई में 26 /11 करवाया 2008 में। लाल किला पर हमला करवाया , संसद पर हमला करवाया , हिंदू मुसलमान कर के हम ने ही। गोधरा में ट्रेन के डब्बे बंद कर लोगों को हम ने ही तो हिंदू , मुसलमान कर के जलाए। फिर गुजरात दंगे भी हम ने ही तो करवाए। देश भर में आतंकी घटनाएं हम ने ही तो हिंदू , मुसलमान कर के करवाए। हमारी हिम्मत और हौसला तो देखिए कि हम ने ही हिंदू , मुसलमान कर के पूरी दुनिया में आतंक फैलाया। कभी अमरीका में टावर गिराया , कभी लंदन तो कभी फ़्रांस में लोगों को मारा। लगातार मारा। मारता ही रहा दुनिया भर के लोगों को हिंदू , मुसलमान कर , कर के। हम तो हैं ही घिनौने। कभी मलियाना , हाशिमपुरा तो कभी मुरादाबाद करते हैं। कभी-कभी लखनऊ में शिया , सुन्नी का रियाज़ भी करते हैं।

क्यों कि हम ने ही समूची दुनिया में आतंक फैलाया , हिंदू मुसलमान कर के। हम ने ही कहा कि था कि शहर-शहर 100 दिन शाहीनबाग भले कर लेना लेकिन 21 दिन का लाकडाऊन मत झेलना। दिल्ली के ताजातरीन दंगे भी हम ने ही करवाए। हम ही हैं वह जिस ने हिंदू मुसलमान कर , निजामुद्दीन , दिल्ली के मरकज में हजारों लोगों को इकट्ठा कर के बताया कि मरने के लिए मस्जिद ही सब से बेहतर जगह है। हम ने ही हिंदू मुसलमान कर के देश भर में तबलीग जमात के लोगों को देश भर की मस्जिदों में छुपा कर कोरोना का कैरियर बनाया। लोगों के बीच भेज कर कोरोना फ़ैलाने का पुनीत काम किया। करते ही जा रहे हैं। हम ही हैं जो हिंदू , मुसलमान कर भगवान समझे जाने वाले डाक्टरों पर थूकने का , नर्सों के सामने नंगे नाचने का ट्रेंड विकसित किया। हम ही हैं जो हिंदू , मुसलमान कर दिया जलाने का विरोध करते हैं। ताली बजाने , घंटी बजाने का भी विरोध करते हैं। मजाक उड़ाते हैं। तंज करते हैं। क्यों कि कोरोना वारियर्स को वारियर्स नहीं गाय मानते हैं। कश्मीर मानते हैं। जन्नत को जहन्नुम बनाते हैं। 

तभी तो निर्भीक हो कर डाक्टरों पर थूकते हैं। शहर-शहर पत्थर मारते हैं। महिला डाक्टरों पर , नर्सों पर बेहूदा और अश्लील कमेंट करते हैं। क्यों कि हम जानते हैं कि औरतें खेती हैं पुरुषों की। यह ज्ञान हम को कुरआन से मिला है। सो दिल्ली जैसी जगहों पर भी डाक्टरों को अस्पताल के कमरों में दरवाजा बंद कर के छुपना पड़ता है। और कोरोना मरीजों की भीड़ उन पर टूट पड़ती है। कौन हैं यह लोग ? जेहाद का यह कौन सा काल है। मनुष्यता का यह कौन सा खंड है। निश्चित रूप से हिंदू , मुसलमान करने का ही खंड है। यही काल है। वह हम ही हैं। हम जो हिंदू , मुसलमान करते हैं। हम ही हैं जो हिंदू , मुसलमान कर के कभी दिल्ली , कभी मुंबई , कभी गुजरात के मज़दूरों को सड़क पर उतार देते हैं कि आओ घर चलने की बांसुरी बजाओ और कोरोना की गोद में सो कर अंतिम नींद सो जाओ। हिंदू , मुसलमान के इस खंड में जो लोग पढ़ना भी नहीं जानते , वह सोशल मीडिया समझते हैं। उद्धव ठाकरे की घात समझते हैं लेकिन शरद पवार का प्रतिघात नहीं समझते हैं। कि हम हिंदू , मुसलमान करते हैं और सिर्फ़ और सिर्फ यही समझते हैं। क्यों कि हिंदू , मुसलमान करने के इतिहास में हम इसी तरह खड़े हैं। सारी जहालत , सारा अपराध हमारा फिर भी हम मासूम और निर्दोष बन कर नमाज में खड़े हैं। 

नियम है कि रेडक्रास के लोगों पर यानी स्वास्थ्यकर्मियों पर कोई देश कभी हमला नहीं करेगा। कोई देश कभी करता भी नहीं है। विश्वयुद्ध ही नहीं , बाकी युद्ध में भी। समूची दुनिया में यह नियम लागू है। पालन भी होता है। सिर्फ भारत में ही , भारत के ही मुसलमान एम्बुलेंस समेत , डाक्टर , नर्स सभी पर हमलावर हैं। इस लिए कि हम हिंदू , मुसलमान करते हैं। 

लॉक डाऊन में भी , कोरोना के कहर में भी मिनी पाकिस्तान के यह लोग इतना सारा ईंट ,पत्थर कहां से बटोर लाते हैं। गली से लौंडे , छतों से औरतें , निर्बाध पत्थरबाजी करते दीखते हैं। घायल होते डाक्टर , पुलिस , एम्बुलेंस और उन की गाड़ियां ध्वस्त हो जाती हैं। घायल डाक्टर हॉस्पिटलाइज हो जाते हैं। जिस शहर की देखिए , उसी शहर में। आप गौर से देखिए हर शहर में बसे , मिनी पाकिस्तान से ही पत्थरबाजी हो रही हैं , कहीं और से नहीं। इसी लिए हम हिंदू , मुसलमान करते हैं। 

लोग हमें इतना प्यार करते हैं , हमारा इतना एहतराम करते हैं कि हमें शांति दूत कहते हैं और बड़े-बड़ों को हम से रश्क होता है। शांति दूत हैं हम। एम्बुलेंस हो , पुलिस की गाड़ी हो , हम सब का काम तमाम करते हैं। हिंदू , मुसलमान कर के ही हम अपने लक्ष्य में कामयाब हो सकते हैं। हम अकेले नहीं हैं। इस लक्ष्य को पाने के लिए कम्युनिस्ट हमारे साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ रहे हैं। कांग्रेस भी हमारे साथ है। मणिशंकर अय्यर पाकिस्तान से जब-तब हमारे लिए फरमान ले कर आते रहते हैं। दलितों को भी हम अपने साथ ले कर जय भीम , जय मीम करते ही रहते हैं। हम शांति दूत हैं। हिंदू , मुसलमान करना बड़े काम की चीज़ है। किसी की हिम्मत नहीं कि हम पर कोई सर्जिकल स्ट्राइक तो छोड़िए , कानूनी कार्रवाई करने पर भी पसीना आ जाता है।  बड़ी-बड़ी अदालतें हमारी खातिर ही रात-रात भर जागती हैं , नहीं जानते आप। इसी लिए तो हम हिंदू , मुसलमान करते हैं। जी हां , हम हिंदू , मुसलमान करते हैं। यही तो हमारा सब से बड़ा कवच है। उल्टा चोर कोतवाल को डांटे , आप ने सुना ही होगा , हम वही करते हैं। हां , हम डंके की चोट पर हिंदू , मुसलमान करते हैं। कुछ कर सकते हैं आप हमारा ?

तो कर लीजिए। 

Friday, 10 April 2020

बदलते समाज का एक दस्तावेज है बांसगांव की मुनमुन


डॉ० कृपाशंकर पांडेय 

मध्यमवर्गीय परिवार की जद्दोजहद, पारिवारिक ईर्ष्या-द्वेष , मां-बाप का अपने बच्चों की खुशी के लिए तिल-तिल संघर्ष, एक हुस्न और नजाकत से भरी हुई लड़की की अल्हड़ता और फिर आगे चल कर ज़िंदगी के थपेड़ों के साथ संघर्ष के सामने उस का बिल्कुल ही दूसरा क्रांतिकारी रूप, निम्न मध्यवर्गीय परिवार की मुसीबतों ,विवशताओं और मिथ्या मान-सम्मान आदि के लिए हर स्तर तक जाने की सनक , नारी-संघर्ष की तपन , उच्च पदों पर पहुंचने के बाद लड़कों का माता-पिता के प्रति सर्वथा अमानुषिक व्यवहार आदि मर्मान्तक-मर्मस्पर्शी भाव प्रवाहों का एक साथ दिग्दर्शन करना हो तो आप को वरिष्ठ साहित्यकार , पत्रकार, कवि, राजनीतिक विश्लेषक, कहानीकार, उपन्यासकार और सब से बड़ी बात एक निर्भीक संवेदनशील व्यक्तित्व आदरणीय दयानंद पांडेय जी का उपन्यास बांसगांव की मुनमुन पढ़ना चाहिए। बहुत दिनों से मैं ने कोई पुस्तक नहीं पढ़ी थी । कल अचानक दयानन्द जी के फेसबुक वाल पर बांसगांव की मुनमुन पढ़ते हुए उन के ब्लॉग सरोकारनामा तक पहुँच गया और फिर जो पढ़ा तो पूरा पढ़ ही डाला । मेरी पढ़ने की गति अत्यल्प है सो मुझे लगभग सात घण्टे लग गए लेकिन उससे जो स्वाद आया उस का हिसाब लगाना जरा मुश्किल है। लेखक की धारदार लेखनी पाठक को अपने प्रवाह के साथ बहा ले जाने में समर्थ है और अपने संवेदनाओं के समुंदर में डुबा देने भी सर्वथा सक्षम । एक लेखक की सफलता भी इसी तथ्य पर निर्भर होती है कि वह अपने पाठक के मानस में  प्रवेश कर उसे कितना अपना बना लेता है। दरअसल वह पाठक के अंदर उतना ही प्रवेश कर पाता है जितना कि वह अपने आप में तपा होता है । आदरणीय दयानंद जी की लेखनी से लगा कि वे तपे-तपाये तो हैं ही साथ ही पाठक को भी तपाने की पूरी क्षमता रखते हैं।

मुनक्का राय की महत्वाकांक्षाओं की उछालों ने उन के लड़कोंं को उच्च पदों तक पहुँचाया साथ ही उन की मूर्खताओं को भी उनके परिवार ने बखूबी भोगा और सब से अधिक मुनमुन ने भोगा। रमेश की ज़िंदगी में जो शुरुआती संघर्ष दिखता है वह मुनक्का की बेवकूफी की वजह से ही था। अच्छे खासे प्रतिभावान लड़के पिता की तथाकथित पट्टीदारी की दुर्भावनाओं की भेंट चढ़ जाते हैं। परंतु "जब जागो तभी सवेरा" का भाव भी हमें इस उपन्यास में कई जगह देखने को मिलता है। बढ़ी हुई उम्र में रमेश का स्वाध्याय के बल पर जज की कुर्सी तक पहुंचना अपने आप में किसी के लिए भी प्रेरणादायक है। उपन्यास की जो  मुख्य पात्र मुनमुन है वह ज्वलंत नारी संघर्ष की अमर प्रेरणागाथा है। उस के जीवन के शुरुआती दिनों में यौवन-जनित अल्हड़ता है जो अमूमन सब में न्यूनाधिक मात्रा में रहती ही है। लेकिन बाद का उस का संघर्ष पाठक को अंदर  तक झकझोर कर रख देता है। वह समाज की विसंगतियों के विरुद्ध जो अकेले खड़ी हुई तो फिर बैठी नहीं और जब आगे बढ़ी तो रुकी नहीं। उस ने अपने आप को तपा कर मजबूत किया और तराश कर समाज के लिए रोलमॉडल भी बनी।दहेज का दानव किस तरह से मध्यवर्ग को प्रताड़ित करता है और लोग कितने छलछद्म से परिपूर्ण होते हैं यह घनश्याम राय का व्यकितत्व हमें बताता है।शराब की लत किस तरह से निजी जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर के रख देती है , आदमी को पागलपन के स्तर तक पहुंचा देती है,पत्नी से विच्छेद तक करा देती है यह सब राधेश्याम का व्यक्तित्व बड़ी ही संजीदगी से हमें बताता है। शिक्षा की जीवन में बड़ी अहमियत है। लेखक ने उपन्यास में इस की अलख जगाई है । मुनक्का राय अपने सारे बच्चों की शिक्षा में कोई कसर नहीं रखते हैंं और शायद इसी लिये मुनमुन अपने जीवन में संघर्ष कर पाई। अन्याय के विरुद्ध ताल ठोंक के खड़ी हो सकी। आतताइयों को पानी पिला सकी। समाज के लिए रोलमॉडल बन सकी। अन्यथा अपने परिवार की बेवकूफी का जिस तरह से वह शिकार बनी थी , वह भी संघर्ष के सामने , शराबी पति के सामने घुटने टेक ही देती, अपनी नियति ही मान लेती । परंतु शिक्षा के कारण ही उसके जीवन में स्वाभिमान आ सका और उस में अपने ही परिवार की नादानियों के खिलाफ, अपने पिता और स्वार्थी भाइयों के गलत निर्णय के खिलाफ उठ खड़े होने का साहस आ सका। बेटियों के प्रति लेखक की संवेदनशीलता अनुकरणीय है। ऐसा लगता है कि वह सारे संसार की बेटियों का पिता होना चाहता है। वह किसी भी स्थिति में बेटी मुनमुन की खुशियों से समझौता करने को तैयार नहीं है और शायद इसी लिए उस ने मुनमुन को  तपाया,ख़ूब तपाया है। अन्याय से लड़ना सिखाया है अपने पांव पर खड़ी होना सिखाया, तर्क करना सिखाया और स्वाभिमान से जीना सिखाया है। मुनमुन आजिज आ कर अपने शराबी और सनकी पति को जब लाठी से पीटना शुरु करती है तो फिर वह रुकने का नाम नहीं लेती और लगता है कि उसे आज वह  मार ही डालेगी। यह दिखाता है कि लेखक के अंदर कितना गुस्सा है बेटियों के उत्पीड़कों के खिलाफ..! मुनमुन अपने संघर्ष से अपना पथ विनिर्मित करती है और एक बार जब वह चलने की जिद करती है तो पीछे मुड़ कर नहीं देखती।

लेखक ने उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों के भ्रष्टाचार की भी पोल खोल के रख दी है। एमडीएम के नाम पर जो कमाई की जाती है तथा बीएसए की जो कारस्तानियां  होती हैंं, यह सब लेखक की नज़र में है। बेसिक शिक्षा अधिकारी के रौब-रुतबा आदि का बड़ा संजीदा वर्णन किया गया है। मेरे जाने शिक्षा मित्रों की मजबूरियों को रेखांकित कर के लेखक ने इस वर्ग पर बड़ा उपकार सा किया है क्यों कि कुछ वर्षों में शिक्षा मित्रों ने जितना भुगता है, भुगत रहे हैं वह बहुत मर्माहत कर जाता है। शिक्षा मित्र की नौकरी भी स्वाभिमानपूर्वक की जा सकती है, उस का भी अपना सम्मान होता है, लेखक ने कहीं न कहीं इसे प्रतिस्थापित किया है । ठीक-ठाक लड़के भी पद पा कर अपने परिवार के प्रति कैसे नालायक हो जाते हैं यह रमेश, धीरज और तरुण जैसे पात्रों को देख कर पता चलता है...और इधर मजबूरियों का नाम मुनक्का राय कहने का जी चाहता है। मां-बाप लड़कोंं के लिए क्या नहीं करते परंतु लड़के किस तरह से एक समय के बाद औपचारिक हो जाते हैं यह मर्माहत कर जाता है। मां बाप की इज्ज़त से अलग उन की इज्ज़त हो जाती है और वे उसी की सुरक्षा करते हैं। मां-बाप उन के लिए बेगाने हो जाते हैं । परंतु दीपक जैसे लड़के भी समाज में हैं जो अपनी ममेरी बहन की खुशी के लिए भी कितना कुछ करते हैं ऐसे लड़के समाज के लिए एक आशा की किरण छोड़ जाते हैं। जमीन जायदाद के लिए आदमी कितना गिर सकता है और अपने बनाए गड्ढे में गिर कर स्वयं ही तबाह होते हैं , रामकिशोर और गिरधारी राय जैसे पात्र इस बात की सूचना दे जाते हैं। पूरे उपन्यास को पढ़ कर लगता है कि लेखक का कचहरी से खूब मुकाबला पड़ा है। कानूनी दांव-पेंच और बारीकियों की जो चर्चा चलती है तो लगता है कि लेखक वकील भी है, नहीं तो वकील से कम भी नहीं है। 

कुल मिला कर इस उपन्यास ने हंसाया भी, रुलाया भी और सोचने पर मजबूर भी किया कि आज हमें अपनी लड़कियों को क्यों आगे बढ़ाना चाहिए , क्यों पढ़ाना चाहिए और क्यों उसे उस के पांव पर खड़े करना चाहिए। मुनमुन अपने संकल्प और स्वाध्याय के बल पर एसडीएम बन जाती है तो न जाने क्यों इतना अच्छा सा लगता है। लगता है कि कहीं अपनी ही बहन , अपनी ही बेटी का संघर्ष सफल हुआ है... । और शायद लेखक अपने पाठकों के अंदर यही जागृति लाना चाहता है जिस में कि वह पूरा सफल होता है। मुनमुन अपने संघर्षों से , अपने तप से, अपने स्वाध्याय से खिलती है , पूरा गुलाब बन कर खिलती है , महक उठती है और पूरे समाज को महका देती है। जो एक संतोष देता है , एक सकून देता है। उपन्यास का अंत बड़ा सुखद है, बहुत मीठा है।

इसे पढ़ कर कोई भी हो, विद्वान् लेखक की संवेदनशीलता और भावप्रवणता को नमस्कार किए बगैर नहीं रह सकता । मैं भी आदरणीय दयानंद पांडेय जी की लेखनी को नमस्कार करते हुए उन के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं ।

समीक्ष्य पुस्तक:

बांसगांव की मुनमुन

पृष्ठ सं.176

मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक - संस्कृति साहित्य

30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर

दिल्ली- 110032

प्रकाशन वर्ष-2012











Wednesday, 8 April 2020

संन्यासी , बिच्छू और कोरोना


एक सुबह एक संन्यासी नदी में नहा रहा था। पानी में एक बिच्छू डूबता मिला। संन्यासी ने उसे बचाने की गरज से निकाला और पानी के बाहर फेंक दिया। लेकिन बिच्छू ने जाते-जाते संन्यासी के हाथ में डंक मार दिया। अचानक बिच्छू फिर फिसल कर पानी में आ गिरा। संन्यासी ने फिर उसे पानी से निकाला। बिच्छू ने फिर डंक मारा। ऐसा जब तीन-चार बार हो गया तो नदी किनारे खड़े एक व्यक्ति ने संन्यासी से पूछा कि हर बार बिच्छू  आप को डंक मार रहा है फिर भी आप उसे लगातार बचा रहे हैं। ऐसा क्यों ? संन्यासी ने जवाब दिया कि मैं अपना काम कर रहा हूं , बिच्छू अपना काम कर रहा है। सब का अपना-अपना स्वभाव है। 

सचमुच नरेंद्र मोदी सरकार में धैर्य और बर्दाश्त बहुत है। देश भर में तबलीग जमात की आपराधिक हरकतों के मद्देनज़र यह किस्सा याद आ गया। तबलीग जमात ही क्यों पूरा मुस्लिम समाज जिस तरह कभी सी ए ए के बहाने , देश को जलाता रहा है , शहर-शहर आग लगाता रहा और अब देश के कोने-कोने में कोरोना जेहाद कर कोरोना फैला रहा है और सरकार जिस तरह उन से निरंतर मुलायमियत से पेश आ रही है , वह आसान नहीं है। सरकार लगातार सदाशयता और मनुष्यता दिखा रही है , यह आसान नहीं है। ऐसे हालात में बहुत आसान था मोदी के लिए , इंदिरा गांधी बन जाना। शी जिनपिंग बन जाना। मतलब तानाशाह बन जाना और इस्लाम की जहालत के समंदर में डूबे इन मनुष्यता विरोधी लोगों से कठोरता से पेश आना। सोवियत संघ की तरह एक साइबेरिया बना कर इन्हें उस में धकेल देना। चीन ने जिस  तरह 30 लाख उइगर मुसलामानों को नज़रबंद किया हुआ है , उसी तरह नज़रबंद कर देना। इंदिरा गांधी ने जिस तरह स्वर्ण मंदिर में सैनिक कार्रवाई की थी या फिर पाकिस्तान के जनरल मुशर्रफ ने लाल मस्जिद पर सैनिक कार्रवाई की थी , उसी तरह मनुष्यता के इन दुश्मनों के खिलाफ एक बड़ी सैनिक कार्रवाई कर देना। 

बहुत आसान था यह सब , इन हालात में। लेकिन सचमुच नरेंद्र मोदी सरकार ने इस कठिन घड़ी में भी निरंतर जिस धैर्य , जिस बर्दाश्त का परिचय दिया है , बहुत कठिन है किसी शासक के लिए। एक बार सोच कर देखिए कि नरेंद्र मोदी की जगह अगर योगी आदित्यनाथ प्रधान मंत्री होते तो आज की तारीख में क्या यह लोग अस्पताल के वार्ड में शौच करने की हिम्मत कर पाते ? थूक पाते डाक्टरों पर ? पत्थरबाजी कर पाते पुलिस पर ? निजामुद्दीन के मरकज में इस तरह इकट्ठा हो कर फिर यहां से देश भर में निकल कर कोरोना की आफत मचा सकने की सोच भी पाते। कह पाते कि इस्लाम पहले , मुल्क बाद में। या फिर यही नरेंद्र मोदी अगर गुजरात के मुख्य मंत्री वाले नरेंद्र मोदी होते तो ?

सच केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में बहुत धैर्य और बहुत बर्दाश्त है। सच यह है कि तबलीग जमात और इन की पैरोकारी करने वालों पर अब एक बड़ी सैनिक कार्रवाई की ज़रूरत है। बिना सेना के यह लोग कुछ समझ और जान नहीं पाते। अपने ही देश में कश्मीर इस का सर्वोत्तम उदाहरण है। बिना सेना के कश्मीरी आतंकी मनुष्य नहीं जानवर बन जाते थे। सेना देखते ही इन का सारा इस्लाम , सारी हेकड़ी फुर्र हो जाती थी। इन को लोकशाही की नहीं सेना की सख्त ज़रूरत है। नहीं आप सोचिए कि एकाध कनिका कपूर आदि के अलावा समूचे देश में कोरोना किस खूबी से काबू में था। तबलीग के कोरोना जेहाद के बाद ही कोरोना विस्फोट हुआ। जो अब काबू से बाहर होता जा रहा है। सोचिए कि मरकज से निकलने के बाद तमिलनाडु के दर्जनों तबलीगी लखनऊ क्या करने गए थे , इस लॉक डाऊन में भी। मज़दूरों के लिए लगाई बस में बैठ कर तमाम जमाती उत्तर प्रदेश की मस्जिदों में जा कर किस लिए छुपे ? मकसद साफ़ है। गनीमत है कि योगी , मोदी के नियंत्रण में हैं और कि सेना उन के हाथ में नहीं है। खुल्ल्मखुल्ला एक हाथ में माला , एक हाथ में भाला ले कर चलने के आदी योगी को छूट मिल जाए तो उत्तर प्रदेश में दो घंटे में सभी जमातियों को राइट टाइम कर दें। गोरखपुर का उन का इतिहास मैं जानता हूं। इतना ही नहीं , आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ के गुरु दिग्विजयनाथ की गोरखपुर में कार्रवाइयों का इतिहास भी जानता हूं। जब वह सिर्फ सांसद थे। जानने वाले जानते हैं कि उन कार्रवाइयों की छाया गोरखपुर में आज भी उपस्थित है। निःसंदेह इस छाया में गोरखपुर आज भी काबू में रहता है। 

पर मोदी ने सचमुच बहुत सब्र का परिचय दिया है। इसी लिए संन्यासी और बिच्छू की कथा याद आई। नहीं देखिए कि इन दिनों सरकार ने जो जनधन खातों में पैसे डाले हैं , उन्हें निकालने के लिए बैंकों के आगे लगी लंबी-लंबी लाइनों में बुरके वाली स्त्रियां और दाढ़ी वाले लोग ही ज़्यादा हैं। इतना ही नहीं आप देश भर के आंकड़े उठा कर देख लीजिए तो पाएंगे कि मुफ्त गैस , मुफ्त आवास और मुफ्त शौचालय का लाभ पाने वालों की सूची में भी मुस्लिम समाज के लोग ही ज़्यादा हैं। एक हाथ में कुरआन , एक हाथ में कंप्यूटर का नारा भी नरेंद्र मोदी का है ही नहीं , बल्कि इसे उन्हों ने पूरा भी किया है। इतना कि मोदी पर आरोप लग गया है कि मुस्लिम तुष्टिकरण में मोदी कांग्रेस से कहीं आगे निकल गए हैं। मनमोहन सिंह तो सिर्फ कहते भर थे कि देश के सभी संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। लेकिन तमाम आंकड़े उठा कर देख लीजिए , मोदी सरकार ने सभी संसाधन मुसलमानों के हवाले कर दिए हैं इन छ बरसों में। ज़रा पता भी कीजिए कि मदरसों को कितना पैसा दिया है मोदी सरकार ने और संस्कृत के स्कूलों को क्या दिया है ? स्थिति तो यह है कि संस्कृत स्कूल भारत के नक्शे से समाप्ति की कगार पर हैं। खैर , यह भी पता कीजिए कि मदरसों में पढ़ने और पढ़ाने वालों ने देश को क्या दिया है ? मस्जिद , जेहाद , उपद्रव , पी एफ आई , दंगे , शहर-शहर शाहीन बाग़ , दंगे और तबलीग जमात। यानी देश को मुश्किल में डालने , देश को पीछे ले जाने में जो योगदान दिया है मुस्लिम समाज ने यह कहते हुए भी कि किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़े है , वह अदभुत है। सरकार के सब्र की पराकाष्ठा है। वह खुलेआम कहते फिरते हैं , मजहब हमारे लिए पहले है , देश क्या होता है। हम हुक्मरान हैं , गुलाम नहीं। फिर भी कुछ सेक्यूलर दुकानदार अकसर कहते फिरते हैं कि मोदी राज में मुसलमान बहुत डरा हुआ है।  हामिद अंसारी , आमिर खान , शाहरुख़ खान , नासिरुद्दीन शाह आदि-इत्यादि भी। तो क्या सचमुच ? जो भी कुछ बीते कुछ महीनों से देश नरक की हद तक भुगत रहा है , यह डरे हुओं का कारनामा है ?

सचमुच देखना दिलचस्प होगा संन्यासी कब तक बिच्छू को पानी में डूब कर मरने से फिर-फिर बचाता रहता है और बिच्छू संन्यासी को डंक मारता रहता है। क्यों कि कोरोना से बड़ा इम्तहान तो फिर कभी आने से रहा। पूरी दुनिया कोरोना के इम्तहान को पास करने के लिए जी जान से लगी पड़ी है। पर भारत एकमात्र ऐसी जगह है जहां कोरोना से ज़्यादा , लोग तबलीग जमात से निपटने में अपना श्रम , संसाधन , धैर्य और समय गंवा रहे हैं। मस्जिद-मस्जिद उन्हें मछली की तरह छान रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि चीन ने कोरोना के इस इम्तहान में ऐसे बहुत से सवालों को गोली मार दी है। ताकि न रहे बांस , न बजे बांसुरी। भारत के पास ऐसा साहस नहीं है। होना भी नहीं चाहिए। यहां तो बांस भी रहेगा और बांसुरी भी बजेगी। यह लोग डरे भी रहेंगे और डराते भी रहेंगे। 

कब तक ? 

राम जाने। 

Tuesday, 7 April 2020

अफजल की तर्ज पर हर घर से कोरोना निकलेगा , तुम कितने कोरोना मारोगे



जो लोग नहीं जानते वह अब से जान लें कि तबलीग का मतलब है प्रोपगैंडा। तो तबलीग जमात अपने नाम के अनुरूप प्रोपगैंडा में अभी तक तो बेहद कामयाब है। 1927 में इस्लाम का प्रोपगैंडा करने के लिए तबलीग जमात की स्थापना की गई थी। अगर कोई पूछ ले कि आज़ादी की लड़ाई में तबलीग जमात की क्या भूमिका थी तो वह सांप्रदायिक घोषित हो जाएगा। हां , पाकिस्तान निर्माण में इन की भूमिका क्या थी , यह तो पूछा ही जा सकता है। वैसे भी पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे मुहम्मद रफीक तरार , नवाज शरीफ के पिता मुहम्मद शरीफ, पाक आईएसआई के महानिदेशक जनरल जावेद नासिर जैसे भारत विरोधी लोग इस जमात के सदस्य रहे हैं। अभी भी पाकिस्तानी क्रिकेटर शाहिद आफरीदी , इंजमामुल हक तबलीग जमात के सदस्य हैं। गरज यह कि भारत विरोधियों की यह जमात है तबलीग जमात। इसी लिए इस्लाम के साथ-साथ घर-घर कोरोना को पहुंचाने में सक्रिय हैं। देश भर में कोरोना फ़ैलाने में इसी लिए सक्रिय हैं।

देश का ऐसा कोई कोना नहीं है जहां तबलीग जमात के लोग इस समय कोरोना फ़ैलाने के लिए न सक्रिय हों। और कि ये जहां भी हैं क़ानून और सामाजिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ा कर हर किसी को हलकान किए हुए हैं। डाक्टरों पर थूकने , सामूहिक नमाज आदि गलीज हरकतों से आगे बढ़ कर कहीं बेड के सामने वार्ड में शौच कर , किसी अस्पताल से भाग कर , बिरयानी के लिए हंगामा मचाने पर आ चुके हैं। शायद ही किसी शहर की कोई ऐसी मस्जिद हो जहां यह न ठहरे हों। कोरोना बढ़ाना ही इन का मकसद है। वह एक नारा था न कि तुम कितने अफजल मारोगे , हर घर से अफजल निकलेगा की तर्ज पर ये हर घर से कोरोना निकालने की फिराक में हैं। यह प्रोपगैंडा जमात अपने मकसद में अभी तक तो कामयाब दिखती है।

देश में 65 प्रतिशत कोरोना इस जमात ने अभी तक अकेले फैलाया है। और जो यही स्थिति रही तो जल्दी ही कोरोना फ़ैलाने की इन की भागीदारी सौ प्रतिशत पर आ जाएगी। क्यों कि अपने फोन बंद कर अभी भी हर जगह छुपे हुए हैं। विभिन्न प्रदेशों की पुलिस इन्हें खोजने में हलकान है। अच्छी बात है कि  केंद्र सरकार और सारी प्रदेश सरकारें एक दूसरे से कंधे से कंधा मिला कर कोरोना से लड़ने में लगी हैं। यह शुभ है। बस कुछ सेक्यूलर टुकड़खोर और तबलीग जमात ही अशुभ बने हुए हैं। इन से भी निपट लिया जाएगा। ऐसी उम्मीद है। क्यों कि मनुष्यता और उम्मीद से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती।

ऐतराज बहादुर लोग और ट्रंप की धमकी का जश्न

नरेंद्र मोदी और ट्रंप की केमेस्ट्री 


कुछ बीमार जीवधारियों को , एजेंडाधारियों को ट्रंप नाम की एक गेंद मिली है। जैसे कौआ कान ले कर उड़ता है , वैसे ही अपने मतलब भर के ट्रंप के अधूरे बयान को ले कर पिकनिक पर निकल पड़े हैं यह सारे रोगी। जैसे इन की बीमारी को पंख लग गया हो। क्या लेखक , क्या पत्रकार। सब के सब। 56 इंच सीने की नाप ले कर ट्रंप को निपटाने का आह्वान कर रहे हैं। ट्रंप की धमकी का खिलौना मिल गया है इन ऐतराज बहादुरों को। सो ट्रंप की धमकी का जश्न मनाने में जोर-शोर से मशगूल हो गए हैं यह लोग।

याद कीजिए कि ऐतराज तो इन्हें जनता कर्फ्यू और लाक डाऊन पर भी था। क्यों कि यह ऐतराज बहादुर लोग हैं। यह वही लोग हैं जो गाय के हत्यारों को उन के खाने-पीने की आज़ादी के नाम पर संरक्षण देते हैं। यह वही लोग हैं जो कश्मीर के पत्थरबाजों को भटका हुआ निर्दोष और मासूम बताते रहे हैं। यह वही लोग हैं जो एयर स्ट्राइक , सर्जिकल स्ट्राइक पर सुबूत मांगते रहे हैं। यह वही लोग हैं जो फुल बेशर्मी से कहते रहे हैं कि पुलवामा में साज़िश कर सरकार ने सुरक्षा बलों को मरवा दिया। यह वही लोग हैं जो तीन तलाक की हिमायत करते रहे हैं। यह वही लोग हैं जो 370 खत्म करने को अन्याय और संविधान पर खतरा बताते रहे हैं। यह वही लोग हैं जो सी ए ए के नाम पर मुस्लिम समाज को बरगला कर देश भर में उपद्रव और दंगा करवाते हैं। शहर-शहर शाहीन बाग़ सजाते हैं। यह वही लोग हैं जो तबलीग जमात द्वारा देश भर में अप्रत्याशित रूप से कोरोना फ़ैलाने के अपराध और उन की बदतमीजियों को अपने पृष्ठ भाग में बड़ी बेशर्मी से छुपाते हैं। यह वही लोग हैं जो देश के किसी भी विपत्ति को सोशल मीडिया पर बेचने और जोर-शोर से बढ़ाने के कारोबार में एड़ी चोटी का जोर लगाने में महारत रखते हैं। अभी तक  इन्हें ट्रंप से चिढ़ थी। पर कल से ट्रंप इन्हें इतना अच्छा लगने लगा है कि बस पूछिए मत। ठीक वैसे ही जैसे आडवाणी इन को अब बहुत अच्छे लगते हैं।

कोई सिरफिरा भी जानता है कि मदद धमकी दे कर नहीं , मनुहार से ही मांगी जाती है। इस बाबत ट्रंप का पूरा वीडियो सुनिए , बात साफ़ हो जाएगी। फिर अगर भारत तमाम देशों से आज भी मदद ले रहा है तो दे भी रहा है। सिर्फ अमरीका ही नहीं है इस लेन-देन में। फिर अगर ऐसे समय भारत अमरीका को दवाई दे भी रहा है तो बुरा क्या कर रहा है। अच्छा अगर भारत अभी दवा न भी दे तो इस समय अमरीका कर क्या लेगा भारत का। या किसी भी का। फिर कोई भीख में यह दवा नहीं दे रहा भारत , अमरीका को। धन ले कर दे रहा है। भारतीय फार्मा कंपनियों के लिये यूएसए बाजार में अनियंत्रित प्रवेश भी अमरीका ने फौरन दे ही दिया है। एस एफडीए द्वारा लगाये गये सभी प्रतिबंधों को अमरीका ने हटा लिया है। अमरीका ने मान लिया है कि एफडीए भविष्य में भारतीय फार्मा कंपनियों को परेशान नहीं करेगा। गरज यह कि कुछ भी एकतरफा नहीं हुआ है। तो क्या यह सब ट्रंप की धमकी के धमक में हुआ है या आपसी समझ और ज़रूरत के मद्देनज़र ? पर अपने एजेंडाधारी जीवधारी इन सारी बातों को अपनी जहरीली टिप्पणियों में पी गए हैं।

याद कीजिए डोकलाम। चीनी सेनाएं जब डोकलाम के पास आईं तो यह एजेंडाधारी कितना तो जश्न मनाते रहे थे। ठीक वही जश्न इस समय ट्रंप के नाम पर यह एजेंडाधारी जश्न में हैं। देश के हर दुःख में जश्न और हर सुख में शोक , अब इन का स्थाई भाव है। इन के एन जी ओ की फंडिंग लगभग बंद हो चुकी है। तमाम कमेटियों से बाहर हैं। विदेश यात्रा आदि तमाम सुविधाओं पर लगाम लग गई है। सो यह लोग विक्षिप्तता की लास्ट स्टेज में हैं। 2014 से यह लोग भारी अवसाद में हैं। सो यह लोग मौका देखते ही किसी बर्रइया की तरह टूट पड़ते हैं।

भवानी प्रसाद मिश्र लिखते हैं : देखे हैं मैंने बाढ़ों से पड़े पेड़ / एक साथ बहते पेड़ों पर सहारा लिए सांप और आदमी / और तब एकाएक चमका है यह सत्य / कि बेशक सांप और आदमी आफत में एक हैं / मौत की गोद में सब बच्चे हैं। तो इस समय क्या दोस्त , क्या दुश्मन सभी देश मिल कर कोरोना से लड़ रहे हैं। लेकिन भारत में अपने एजेंडाधारी जीवधारी अपने होशो-हवास खो कर नरेंद्र मोदी को नीचे दिखाने के सारे यत्न में संलग्न हैं। ज्यूडिशियल किलिंग वाले नारे की तरह। तुम कितने अफजल मारोगे , हर घर से अफजल निकलेगा की तर्ज पर यह हर घर से कोरोना निकालने की दिशा में कार्यरत हैं।

यह समय कोरोना से लड़ने का है। पूरी दुनिया लड़ रही है। लेकिन इन एजेंडाधारियों ने अपनी सारी ताकत भारत सरकार और नरेंद्र मोदी से लड़ने और उन्हें नीचा दिखाने में खर्च कर दी है। यह लोग नहीं जानते तो इन्हें जान लेना चाहिए कि ताली और थाली समूची दुनिया बजा रही है। तो कभी ताली , थाली बजाने का मजाक , कभी दिया जलाने का मजाक।  तो कभी ट्रंप के बहाने नीचा दिखाने का अंदाज़। गुड है। इन्हें इन के बेशर्मी भरे काम में निर्बाध लगे रहने दीजिए। यह स्वतंत्रचेता लोग नहीं हैं। बहुत बीमार लोग हैं। एकतरफा सोचने वाले एजेंडाधारी जीवधारी लोग हैं। देश और समाज में टूटन देख कर खुश होने वाले लोग हैं। मनुष्यता में इन्हें यक़ीन नहीं है। रामधारी सिंह दिनकर की रश्मिरथी में कृष्ण की चेतावनी प्रसंग याद आता है :

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।

सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।

हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशीष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।

जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-

‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।

अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।

दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।

शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि जिष्णु, जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।

जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।

सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!

मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।

सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।

याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।

दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।

आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।

केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!

तो यह धृतराष्ट्र लोग हैं। अपने सुख में मगन लोग हैं। इन्हें इन के हाल पर छोड़ , इन्हें कुचलते हुए आप कोरोना से लड़िए। ट्रंप और अमरीका भारत के गहरे दोस्त हैं इस समय। उन से मदद लीजिए , उन को मदद कीजिए। अमरीका को भारत यह दवा मुफ्त में नहीं दे रहा। इस बात को भी समझिए। फिर भी आप किसी के दुःख में , उस के साथ खड़े होते हैं तो वह हमेशा आप को याद रखता है। इस समय चीन से भी बहुत सा सामान भारत मंगवा रहा है तो क्या चीन को धमका कर मंगवा रहा है ? जी नहीं। धन दे कर मंगवा रहा है। शहर-शहर भिजवा रहा है। बिना किसी भेदभाव के। 

Monday, 6 April 2020

देश घायल है और तुम सेक्यूलरिज्म की घात करते हो

काबा शरीफ 

ग़ज़ल / दयानंद पांडेय 

हरदम उलटा चोर कोतवाल को डांटे वाली बात करते हो
देश घायल है और तुम सेक्यूलरिज्म की घात करते हो

काबा बंद , मक्का और मदीना बंद , है सारी दुनिया बंद
शर्म नहीं आती कोरोना के दौर में नमाज की बात करते हो

गाय नहीं है जो काट कर खा जाओगे कोरोना है मार डालेगा 
आदत बिगड़ी हुई है बहुत हरदम जहालत की बात करते हो 

दुनिया आजिज है तुम्हारे कबीलाई कल्चर और जेहाद से
शाहीन बाग़ समझ अस्पताल में बिरयानी की बात करते हो 

मीडिया को धमकी , पुलिस पर पत्थर , डाक्टर पर थूकना 
तुम्हारी सेवा में जो लगी हैं उन नर्सों से छेड़छाड़ करते हो

दुनिया थर्रा गई है इस महामारी और मुश्किल से लेकिन 
कोरोना का कैरियर बन देश जलाने की बात करते हो 

नदियां हो गईं निर्मल , आकाश नीला , हवा भी साफ़ 
ऐसा दिन भी कभी देखूं कि तुम सुधरने की बात करते हो 

[ 6 अप्रैल , 2020 ]







लोग इस कोरोना की महामारी में भी विरोध की बीमारी की लाश ढो रहे हैं

एक बार एक जंगल में आग लग गई। जंगल का राजा हाथी था। सभी जानवरों ने बैठ कर मंत्रणा की और तय पाया कि अपनी जान बचाने के लिए यह जंगल छोड़ कर किसी और जंगल में शरण ले ली जाए। सो हाथी के नेतृत्व में सारे जानवर किसी दूसरे जंगल की और प्रस्थान कर गए। आगे-आगे हाथी , पीछे-पीछे बाक़ी सभी। लेकिन हाथी के आगे भी एक चूहा था। यह चूहा हाथी का सूड़ पकड़ कर आगे-आगे चल रहा था। किसी ने मजा लेने के लिए चूहे से पूछ लिया कि यह क्या है , भाई ? तो चूहे ने सीना तान कर कहा कि हाथी राजा कहीं रास्ता न भूल जाएं। सो इन को रास्ता दिखाता चल रहा हूं। पूछने वाले ने चूहे से पूछा कि अगर गलती ही से सही हाथी राजा का एक पैर भी तुम्हारे ऊपर पड़ गया तो ? 

यही स्थिति कल रात 9 बजे दिया न जलाने वालों की हुई। चूहा बन कर वह बिजली के पावर का ग्रिड फेल होने से बचा रहे थे। कुछ रात से ही तो कुछ सुबह होते ही ग्रिड फेल होने से बचाने की अपनी चूहा होशियारी में अपनी पीठ ठोंकने और मोदी और दिया जलाने वालों के अंध विशवास की लानत-मलामत करने में बड़ी जोर-शोर से जुट गए। पर इन चूहों की संख्या इतनी कम है कि इन की उछल-कूद की तरफ कोई ध्यान ही नहीं दे रहा। तो यह दिया जलाने की बात को बेअसर करने के लिए पटाखे छोड़ने की बात करने पर आ गए हैं। ठीक है कि पटाखे छोड़ने की बात दुरुस्त नहीं है , ऐसे माहौल में। लेकिन इस लॉक डाऊन में भी लोगों को पटाखे दुकानों में तो मिले नहीं होंगे। घरों में भी कितने पटाखे और कितने लोग रखे रहे होंगे भला। लेकिन जाने पटाखों के शोर से यह लोग आहत हैं कि देश भर में जले जगर-मगर दीयों से आहत हैं कि कहना कुछ कठिन है। पर घायल बहुत हैं। 

काश कि यह लोग यही सख्ती , यही विरोध  तबलीग जमात द्वारा देश भर में कोरोना फ़ैलाने के कैरियर बनने में भी दिखाए होते। तबलीग जमात द्वारा डाक्टरों पर थूकने का विरोध करने में दिखाए होते। नर्सों के सामने तबलीग जमात के लोगों के नंगे हो कर नाचने की दबी जुबान ही सही , निंदा भी किए होते। लेकिन नहीं , उस समय तो इन कमीनों को नींद आ गई थी। जुबान और कलम को लकवा मार गया था। बीच लॉक डाऊन प्रवासी मज़दूरों की भीड़ सड़क पर देख कर ,  इन की बांछें खिल गई थीं कि चलो विरोध का एक अवसर तो मिला। मज़दूरों का दुःख बेचने की एक दुकान तो मिली। लेकिन तबलीग जमात का मनुष्य विरोधी रुख देखते ही इन की दुकान का शटर गिर गया। शटर खुला है , करोड़ो लोगों द्वारा अरबों दिया जलाने पर , देश की एकजुटता दिखने पर। जाने किस मिट्टी , किस हाड़ मांस के बने हैं , यह मनुष्य विरोधी लोग। विरोध का अवसर और तरीका भी नहीं जानते यह लोग। 

ग़ालिब का एक किस्सा याद आता है। ग़ालिब से भी उन के समय के लोग नाराज बहुत रहते थे। खूब गालियां भी देते थे। खत लिख-लिख कर गाली देते थे। एक दिन गालियों वाला खत पढ़ते हुए अपने मित्र से ग़ालिब बोले , बताओ इन लोगों को गालियां देने भी नहीं आतीं। गाली देने का शऊर नहीं मालूम। एक खत दिखाते हुए वह बोले , बताओ यह मुझे मां की गाली लिख रहा है। क्या मिलेगा इसे मेरी मां से ? अरे देनी ही है गाली तो बेटी की देता , बहन की देता ! ठीक यही स्थिति इस समय देश में विरोध की है। कि लोग इस कोरोना की महामारी में भी विरोध की बीमारी की लाश ढो रहे हैं। विरोध का शऊर भी नहीं जानते। मृत्यु और महामारी का समय विरोध का समय नहीं होता। कोई इन बीमार बंधुओं को समझा भी दे। खुदा खैर करे !

Sunday, 5 April 2020

ये दीपक जला है , जला ही रहेगा


आज कोरोना की खुशी में खुश , मोदी विरोधियों की आज की नई पीढ़ी को शायद नहीं मालूम , पुराने भी शायद भूल गए होंगे तो उन्हें बता दूं कि दिया जलाने का आह्वान कर के नरेंद्र मोदी ने उन के खिलाफ एक और साज़िश की है। साज़िश यह कि भाजपा का नाम पहले भारतीय जनसंघ था। और जनसंघ का चुनाव चिन्ह जलता हुआ दिया था। यानी दीपक। बल्कि उन्हीं दिनों मनोज कुमार निर्देशित और अभिनीत एक फिल्म आई थी पूरब और पश्चिम। यह 1970 की बात है। हम भी तब बच्चे ही थे। पर इस सुपर डुपर फिल्म में इंदीवर का लिखा , कल्याण जी आनंद के संगीत में सजा , मुकेश का गाया एक गीत बहुत मशहूर हुआ था , आज भी खूब बजता है :

कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब कोई छोड़ दे
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा

इसी गीत का अंतिम बंद था :

कोई शर्त होती नहीं प्यार में
मगर प्यार शर्तों पे तुमने किया
नज़र में सितारे जो चमके ज़रा
बुझाने लगीं आरती का दिया
जब अपनी नज़र में ही गिरने लगो
अंधेरों में अपने ही घिरने लगो
तब तुम मेरे पास आना प्रिये
ये दीपक जला है जला ही रहेगा 

तब भी मनोज कुमार पर आरोप लगा था कि , ये दीपक जला है जला ही रहेगा , जनसंघ ने अपने लिए उन की फिल्म में लिखवाया था। मनोज कुमार को तब भगवाधारी भी घोषित किया गया था। लेकिन इस गीत का दीपक तो आज भी जल रहा है। और देखिए कि नरेंद्र मोदी ने फिर से अपनी पुरानी पार्टी जनसंघ के प्रचार के बहाने भाजपा का प्रचार पूरे देश पर थोप दिया है। 

1961 में आई फिल्म भाभी की चूड़ियां में भी पंडित नरेंद्र शर्मा का लिखा सुधीर फड़के के संगीत में लता मंगेशकर द्वारा गए गीत ज्योति कलश छलके भी खूब लोकप्रिय हुआ था। लालकृष्ण आडवाणी ने बहुत कोशिश की कि यह गीत भी उन से जुड़ जाए , पर कामयाब नहीं हुए। लेकिन ये दीपक जला है जला ही रहेगा को अटल जी ने कामयाब बनवा दिया। अटल जी और इस गीत को ले कर , मुझे याद है तब के अख़बारों में स्केच और कार्टून भी छपे थे। और आज देखिए कि नरेंद्र मोदी ने जलता हुआ दीपक का देशव्यापी प्रचार कर भाजपा का प्रचार कर दिया है , इस मुश्किल घड़ी में भी। अटल बिहारी वाजपेयी की कविता आओ फिर से दिया जलाएं को ट्वीट कर वायरल कर दिया है सो अलग। 

कामरेडों की राय में , जमातियों आदि-इत्यादि की राय में यही तो सांप्रदायिकता है। यही तो फासीवाद है। लोगों को हिंदू बनाने और हिंदुत्व को फैलाने की साज़िश है। उन का यह भी कहना है कि फासीवाद और सांप्रदायिकता की इस साज़िश को नाकाम कर के रहेंगे। कभी बात-बेबात मोमबत्ती जलाने और इस का जुलूस निकालने वाले लोग अगर देश को एकजुट नहीं देखना चाहते तो परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। इन सभी को अंधेरा मयस्सर करवाइए , आप दिया जलाइए। अपनी एकजुटता दिखाइए। हमारे यहां पहले ही से कहा गया है :

असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

 यानी (हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

बाक़ी जानते तो हम भी हैं कि ताली , थाली बजाने और दिया जलाने से नहीं , लॉक डाऊन से ही कोरोना भागेगा। एकांत से भागेगा। पर दिया जला कर एकरसता टूटेगी , एकजुटता दिखेगी। यह बात भी तो हम जानते ही हैं। दिया जलाना शुभ भी होता है। यह बात भी जानते हैं। मनुष्यता शेष रहे , इस के लिए भी यह ज़रूरी है। मोदी विरोध के लिए तमाम और भी बहाने हैं। दीप जलाना , दीप-दान पुण्य का काम है। कहा गया है कि अखंड दीप जलाने से यम देवता के कोप से मुक्ति मिलती है। अकाल मृत्यु से बचा जा सकता है। हृषिकेश मुखर्जी निर्देशित फिल्म नमक हराम में आनंद बक्शी का लिखा राहुलदेव वर्मन के संगीत में यह गीत भी याद कर लीजिए। 

दिए जलते हैं, फूल खिलते हैं
दिए जलते हैं, फूल खिलते हैं
बड़ी मुश्किल से मगर
दुनिया में दोस्त मिलते हैं
दिए जलते हैं

तो बहुत से गीत हैं जलते दीयों के। कविताओं के। बहुत सी भाषाओँ में। बुझते दीप का कोई गीत कहीं , किसी भाषा में नहीं है। किसी संगीत में नहीं है। फिर भी मुट्ठी भर बीमार लोग अगर बुझते हुए दीयों का गीत गा कर बुझे रहना चाहते हैं तो यह उन का संवैधानिक अधिकार है। उन की इस भावना का भी सम्मान कीजिए। उन्हें संविधान बचाने दीजिए। आप तो इस दीप को जला कर फूल खिलाइए। 

वैसे भी बौद्ध दर्शन का एक सूत्र वाक्य भी है : अप्प दीपो भव। यानी अपना दिया खुद बनो। अपना प्रकाश स्वयं बनो। नीरज का लिखा यह गीत भी याद रखिए : 

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।


Friday, 3 April 2020

तो क्या देश गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा हो गया है


नरेंद्र मोदी सरकार , मुसलमानों से डरी हुई है। बुरी तरह डरी हुई है। इसी लिए वह निरंतर डरा रहे हैं। नहीं एक से एक महाबली , गुंडे , माफ़िया अस्पतालों में भर्ती होते रहते हैं। अभी तक किसी की हिम्मत नहीं हुई थी कि नर्सों के आगे नंगे हो कर नाचे। डाक्टरों पर थूके। अब नौबत यह आ गई कि इन कमीनों के इलाज के लिए सेना के डाक्टर तैनात किए गए हैं। इंडिया न्यूज़ की एक खबर के मुताबिक सेना ने इन डाक्टरों के साथ हथियारबंद प्रोटेक्शन टीम को भी भेजा है। शाहीनबाग़ और सी ए ए को ले कर हुए दिल्ली दंगे , देश भर में हुए उपद्रव पर  मोदी सरकार ने जिस तरह ढुलमुल रवैया अपनाया , वह बहुत ही घातक साबित हुआ है , देश के लिए। 

अस्सी के दशक में लगभग यही अराजकता खालिस्तानियों ने शुरू की थी। भिंडरावाले के नेतृत्व में खालिस्तान आंदोलन इतना हिंसक हो गया था कि सिखों को देखते ही लोग डर कर दूर हो जाते थे। फिर जो हिंसा का तांडव शुरू हुआ वह गृह युद्ध में तब्दील हो गया। गनीमत थी की इस की आंच दिल्ली , हरियाणा और पंजाब की सरहदों तक ही थी। इंदिरा गांधी जैसी लौह महिला प्रधान मंत्री थी। स्वर्ण मंदिर में सेना भेज कर किसी तरह इस गृह युद्ध को टाला था। बाद में उन्हें इस की कीमत अपनी कुर्बानी दे कर चुकानी पड़ी थी। देश उन की शहादत को भूला नहीं है। न उन के साहस को। लेकिन इस 2020 में स्थिति खालिस्तान आंदोलन से भी ज़्यादा खतरनाक और बदतर है। कोरोना जैसी विश्वव्यापी आपदा के समय भी अगर कोई कौम खुल कर देशव्यापी स्तर पर अपने आत्मघाती होने के निरंतर सुबूत दे रही हो तो आप इसे सिर्फ हिंदू-मुसलमान के खांचे में डाल कर सो जाना चाहते हैं तो यह आप की भूल है। आप का अपराध है। 

अस्सी के दशक में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के प्रति सिख समुदाय की जो नफरत थी , उस से कहीं सौ गुना नफरत इस समय मुस्लिम समाज की नफरत नरेंद्र मोदी और भाजपा के प्रति दिख रही है। यह नफरत पाकिस्तान की सरहद तक जाती है। बांग्लादेश तक जाती है। सिर्फ दिल्ली , हरियाणा , पंजाब तक नहीं। इस बात को , इस तथ्य को अगर कोई सदाशयता में भी अनदेखा कर रहा है तो निश्चित रूप से वह अंधा है। मुश्किल यह कि सेक्यूलर हिप्पोक्रेटों ने इस नफरत को वैचारिक ज़मीन दी है। उबाल और नफरत तो 2014 ही से थी। याद कीजिए फारुख अब्दुल्ला जैसों के बयान जो मोदी को वोट देने वालों को समंदर में डुबो रहे थे। तमाम और गतिविधियों को याद कीजिए। यह भी याद कीजिए जब कुछ लोग मोदी के जीतने पर देश छोड़ने की धमकी दे रहे थे। अमर्त्य सेन जैसे लोगों की आर्थिक नौटंकी याद कीजिए। खैर , वह कांग्रेसी पैसे पर नाच रहे थे और अपने नोबल पुरस्कार को डुबो रहे थे। गाय वाय फिर शुरू हुआ। अवार्ड वापसी , जे एन यू में जहर की फसल वगैरह याद कर लीजिए। गोहत्यारों के बचाव में माब लॉन्चिंग का नैरेटिव आदि-इत्यादि। नोटबंदी , जी एस टी के कुचक्र के बहाने नफरत और नागफनी के तमाम पड़ाव पार कर जब 2019 का चुनाव भी जीत लिया मोदी ने तब ही इस गृहयुद्ध की बुनियाद रख दी गई। इस्लाम फर्स्ट , नेशन सेकंड की अवधारणा में जीने वाले , वंदे मातरम और भारत माता की जय का मजाक उड़ाने और तौहीन करने वाले लोग अब संविधान बचाने का राग ले कर उपस्थित हो गए। तीन तलाक , कश्मीर में 370 के खात्मे ने उन की बुनियाद में खाद का काम किया। लेकिन कोई राजनीतिक कंधा नहीं मिल रहा था। अब आया सी ए ए। कांग्रेस ने लाभ के लिए कंधा थमा दिया। कह दिया , सड़क पर उतरो। कांग्रेस के टट्टू कम्युनिस्टों ने शाहीन बाग़ सजा दिया। सोए जे एन यू को जगा दिया। जामिया मिलिया को जला दिया। आज तक जामिया हिंसा में एक नहीं मारा। लेकिन अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से लगायत जाधवपुर यूनिवर्सिटी तक जामिया के शहीदों की शहादत तापने के लिए एकजुट हो गए।

दिसंबर में हुए देशव्यापी उपद्रव में मोदी सरकार ठीक आकलन करने से चूक गई। जनसंख्या नियंत्रण क़ानून , कॉमन सिविल कोड , एन आर सी आदि की तैयारी में लगी रही। कि दिल्ली तीन दिन के दंगे में झुलस गई। तब मोदी सरकार की नींद टूटी। पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ! देश गृह युद्ध की नाव पर बैठ चुका था। वारिस पठान कहने लगा था 15 करोड़ 100 करोड़ पर भारी हैं। क्या कार्रवाई हुई वारिस पठान पर। नार्थ ईस्ट को देश से काटने के आह्वान के साथ शरजील इमाम खड़ा हो गया। अभी तो यह शेरनियां हैं। जैसी बातें होने लगीं। तो क्या यह सब लोग जनगणमन गा रहे थे ? शहर दर शहर शाहीन बाग़ खुल गए। मोदी सरकार ने क्या कर लिया इन का। नतीजा सामने है। गृह युद्ध के इन सिपहसालारों को कोई कोरोना , फोरोना का भय नहीं रह गया है। जो लोग मुसलामानों के अनपढ़ , जाहिल होने के तर्क दे रहे हैं , वह नादान लोग हैं। राहत इंदौरी तो चलिए पुराने कटटर हैं। लीगी हैं। लिखते ही रहे हैं किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़े ही है। लिखते ही रहे हैं कि कब्रों की ज़मीने दे कर मत बहलाइए / राजधानी दी थी राजधानी चाहिए। मुनव्वर राना भी एक मां के बहाने लोकप्रिय हो कर इस्लाम का ही तराना गाते रहे हैं। लेकिन जावेद अख्तर ? जावेद अख्तर तो राज्य सभा में भारत माता की जय बोलने वालों में से थे।  उन को अब क्या हो गया ? दस बरस तक उप राष्ट्रपति रहे हामिद अंसारी को क्या हुआ ? आमिर खान , शाहरुख़ खान , नसीरुद्दीन शाह सभी का डर जोड़ लीजिए। तमाम और डर जोड़ लीजिए। तो क्या 370 की आड़ में जो हिंसा हो रही थी , देशद्रोही कारनामे हो रहे थे , वह डरे हुए मुसलमानों का कारनामा था ? और अब जो मुसलसल छ महीने से हो रहा है , वह डरे हुए लोग कर रहे हैं ? कोरोना से भी नहीं डरने वाले लोग मोदी सरकार से डरे हुए हैं ? किस की आंख में धूल झोंक रहे हैं भला आप। आप की आंख पर पट्टी बंधी हुई है तो बांधे रहिए। 

पर आप मानिए न मानिए मुस्लिम समाज के अराजक तत्वों का मनोबल इतना बढ़ गया है कि वह कोरोना को गले लगा कर पुलिस पर सरेआम गोली तान सकते हैं। डाक्टरों पर थूक सकते हैं। जिन नर्सों का दुनिया भर में सम्मान हो , जिन्हें सिस्टर कहा जाता हो , उन के सामने नंगे नाच सकते हैं। अश्लील हरकतें कर सकते हैं। पुलिस पर पत्थरबाजी की प्रैक्टिस तो इन्हें मक्का और कश्मीर से ही है। लेकिन कोरोना की इस विपत्ति में निजामुद्दीन मरकज से निकल कर पूरे देश में फ़ैल कर तबलीग जमात के लोगों द्वारा कोरोना को बढ़ाने का यह हिंसक हौसला कुछ तो कहता ही है। फिर टिक टाक पर जो कोरोना फ़ैलाने के लिए परोसे गए बेशुमार वीडियो हैं , उन का क्या करें। उस में भी बच्चों का बेधड़क इस्तेमाल साफ़ बताता है कि मोदी सरकार का इकबाल और धमक मुस्लिम समाज में पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अब भी अगर मोदी सरकार नहीं चेती , इन अराजक और हिंसक लोगों पर कड़ी कार्रवाई नहीं करती तो तय मानिए भारत अब गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ा है। किसी एक गांव , किसी एक शहर की बात नहीं है। देश भर की मस्जिदों से निरंतर लोग निकाले जा रहे हैं। विदेशी लोग भी। मुस्लिम समाज द्वारा सी ए ए के बहाने लॉक डाऊन का देशव्यापी विरोध और कोरोना फ़ैलाने की सनक से भी सरकार की आंख नहीं खुलती तो फिर आने वाला समय बहुत संकट में डालने वाला है देश को। कम से कम गृह युद्ध को ऐसी स्थिति में बिना कड़ी कार्रवाई के आप नहीं टाल सकते। छिटपुट रासुका लगाने से यह संकट टलता नहीं दीखता। 

कोरोना से निपटने के बाद गृह युद्ध के जाल अगर समय रहते नहीं काटा गया तो फिर भगवान ही मालिक है। या फिर पाकिस्तान की तर्ज पर भारत को भी कब्रिस्तान और श्मसान घाटों की पर्याप्त व्यवस्था करनी शुरू कर देनी चाहिए। या फिर इंदिरा गांधी जितना साहस बटोर कर मोदी को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। मुस्लिम समाज से डरना बंद कीजिए मिस्टर मोदी। मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ जनता ने मोदी को चुना था। पर मोदी तो कांग्रेस से भी बड़े मुस्लिम तुष्टिकरण के दुकानदार साबित हो रहे हैं। एक हाथ में कंप्यूटर , दूसरे हाथ में कुरआन का नारा सुनने में अच्छा लगता जो यह सचमुच साकार हुआ होता। यह नारा तो जुमला साबित हो गया। न साबित हुआ होता जुमला तो यह डाक्टरों पर यह लोग थूकते नहीं। नर्सों के सामने नंगे हो कर नाचते नहीं। कोरोना फ़ैलाने का ऐलानिया कैरियर न बनते। ताली और थाली बजा कर , दिया जला कर इस कैंसर का इलाज नहीं हो सकता। गृह युद्ध को नहीं टाला जा सकता। यह लोग लॉक डाऊन नहीं तोड़ रहे , देश तोड़ रहे हैं। जागो , मोदी जागो ! देश को होमियोपैथी की मीठी गोली बहुत खिला लिया। सर्जिकल स्ट्राइक , एयर स्ट्राइक की तरह देश तोड़कों के खिलाफ भी एक स्ट्राइक बहुत ज़रूरी हो गई है। 

नर्स का मोजा और कामरेड का पुलिस से पिटना

उन दिनों हम विद्यार्थी थे। कविता बहुत थी जीवन में। कविता ही ओढ़ते-बिछाते थे। पर पत्रकारिता क्या अख़बारों में लिखने की पेंग भी मार रहे थे। उन दिनों लिखने के लिए सब से आसान था कुछ सवाल बना कर कुछ सेलिब्रेटी टाइप लोगों से बतिया कर परिचर्चा आयोजित करना। परिचर्चा फट से छप भी जाती थी बड़े-बड़े अखबारों और पत्रिकाओं में भी। गोरखपुर में साप्ताहिक अखबारों का भी तब खूब जोर था। उत्तरी हेराल्ड साप्ताहिक के संपादक थे जयप्रकाश शाही। हमारे गांव के पास के थे। कविताएं लिखते थे। हमारे संघतिया थे। हम लोग बेसबब साइकिल लिए , पैदल घूमते रहते थे। सिनेमा के पोस्टरों पर हीरोइनों को देखते और सड़क पर लड़कियों को। तब सड़कों पर लड़कियां भी कम होती थीं और सिनेमा के पोस्टर तो और भी कम। तो हम लोग इधर-उधर की बतियाते बहुत थे। शाही जी हम से उम्र में चार-पांच बरस बड़े थे लेकिन महसूस नहीं होने देते थे। आखिर तक हम लोगों का याराना रहा। फ़रवरी , 1998 की एक दुर्घटना में मैं मरते-मरते बचा और शाही जी मुझे छोड़ कर चले गए। हम लोग एम्बेस्डर कार में अगल-बगल ही बैठे थे। संभल जा रहे थे , मुलायम सिंह के चुनाव के कवरेज में। कि कार सामने से आ रहे एक ट्रक से टकरा गई। शाही जी और ड्राइवर एट स्पॉट चले गए थे। खैर , यह कहानी फिर कभी।

तो उन दिनों एक युवा , अब नाम क्या बताऊं भला उन का , हम लोगों से मिले। पत्रकार बनने के लिए परेशान थे। शाही जी ने उन्हें परिचर्चा की डोर पकड़ा दी। सवाल भी उन के पास होते नहीं थे। हम और शाही जी , उन्हें सवाल लिखवाते। उन का लिखा भी फिर से लिखना पड़ता था , शाही जी को। खैर , उन्हीं दिनों उन युवा को अस्पताल आते-जाते किसी नर्स की बीमारी लग गई। अब वह नए-नए बने नर्स हॉस्टल में जाने की जुगत बनाने में लगे थे। लेकिन सुरक्षा कर्मी काम पूछ कर रोक देते थे। अब वह परेशान। अंतत: उन्हें नर्सों की समस्या पर परिचर्चा करने की सूझी। सवाल लिखवाने भी वह हम लोगों के पास आए। शाही जी खिलंदण भी बहुत थे। सो छूटते ही पूछा , कहीं आंख मिल गई है का हो ! वह नहीं-नहीं करने लगे। खैर सवाल लिखवा दिए गए। सवालों में एक सवाल शाही जी ने बहुत गंभीर हो कर आख़िरी सवाल लिखवा दिया कि आप यह मोजा कहां तक पहनती हैं ? अब उन युवा पत्रकार को जाने क्या सूझी कि नर्स हॉस्टल में परिचर्चा के सवालों में इसे ही पहला सवाल बना बैठे कि मोजा कहां तक पहनती हैं। अब नर्सों ने जो उन की सामूहिक सेवा की , कि उसी नर्स के अस्पताल में इलाज के लिए जाना पड़ा। नर्स से टांका भी टूटा और धुलाई भी बेहतर हो गई थी। कुछ दिन बाद वह हम लोगों को सड़क पर टहलते हुए पकड़ लिए। और बरस पड़े। शाही जी ने मौके की नजाकत समझी। धीरे से बोले , सारी पत्रकारिता सड़क पर ही करेंगे ? वह बोले , फिर ? शाही जी ने कहा , आइए आफिस चलते हैं। बैठ कर बात करते हैं। आए हम लोग आफिस। तब तक उन का गुस्सा भी कुछ नरम हो गया था। फिर उन्हों ने अपनी व्यथा-कथा सुनाई। शाही जी ने पूरा मजा ले कर सुना। फिर धीरे से बोले , इस सवाल का जवाब तो समझ गया। लेकिन बाकी सवालों का जवाब कहां है ? लिख कर लाइए छापते हैं। वह भन्नाए , बाकी सवाल पूछ कहां पाए ?

फिर ?

पहला सवाल ही यही पूछा था।  शाही जी बोले , अरे मूर्ख हम ने तो इसे आखिरी सवाल के रूप में लिखवाया था। तो वह थोड़ा झिझके और बोले , मुझे लगा पहले ही देख लें कि कहां तक है , मोजा ! शाही जी को हंसी आ गई। पान थूक , हंसे। वह और नाराज हो गए। कहने लगे कि आप ने ऐसा सवाल लिखवाया ही क्यों कि पिटाई हो जाए ! शाही जी अब चुप थे। बहुत दिनों तक उन का यह सवाल जारी था कि ऐसा सवाल लिखवाया ही क्यों था ? जवाब दिया एक दूसरे पत्रकार ने दिया। बकलोल कहीं के जब बिच्छू का मंत्र नहीं पता है तो सांप के बिल में हाथ डालने गए ही क्यों थे। ऐसे तो ज़िंदगी भर पिटते रहोगे। फिर एक बार शाही जी ने पूछ लिया कि जिस के लिए पिटे , वह पटी भी कि मुफ्त में पिट गए। वह सुन कर मुस्कुराए , देखिए एक बार फिर से लगे तो हैं ! फिर पता नहीं क्या हुआ। पहले शाही जी ने फिर हम ने भी नौकरी के चक्कर में शहर से बाहर आ गए। 

यह किस्सा इस लिए याद आ गया कि मोदी विरोध में इधर एक युवा कामरेड बहुत ज़्यादा पिट गए। वह मोदी के फासीवादी लॉक डाऊन का विरोध करने न सिर्फ सड़क पर निकल गए बल्कि पुलिस ने उन्हें रोका तो वह नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद , योगी मुर्दाबाद , फासीवाद मुर्दाबाद ! के नारे भी जोर-जोर से लगाने लगे थे। पुलिस ने तबीयत भर तुड़ाई की। ख़ास कर पृष्ठ भाग पर। अभी तक उन से बैठने और पीठ के बल लेटने में दिक्क्त हो रही है। बाइक थाने में बंद कर दी। मुझे पता लगा तो फोन कर हालचाल लिया। तो पता चला कि उन के सीनियर कामरेड ने उन्हें ताईद की थी कि फासीवादी मोदी , योगी का विरोध हर कीमत पर , हर जगह जारी रहनी चाहिए। यह लॉक डाऊन फासीवादी है। इस का भी विरोध ज़रूरी है। मैं ने पूछा , सीनियर कामरेड खुद क्यों नहीं सड़क पर उतरे ? वह युवा रो पड़ा। बोला , यही तो ! यह जनता कर्फ्यू के एक दिन बाद का वाकया है। मैं ने इस युवा कामरेड को समझाया कि लेकिन यह तो कोरोना से लड़ने का समय है , फासीवाद से लड़ने का नहीं। वह बेचारा रोता रहा। उस की एक मुश्किल यह भी है कि हल्दी , दूध आदि की फासीवादी दवा पर उतरना पड़ा है। कहने लगा कि बस गोमूत्र छोड़ कर घर वाले सारे इलाज वही कर रहे हैं। मुझे भी शाही जी याद आ गए और पूछ लिया कि गाय उपलब्ध है , वहां। या गोमूत्र न मिल पाने की बाध्यता है ? वह भड़क कर बोला , यहां गाय कहां से आएगी ? गांव नहीं है यह। शहर है। गाय मिलती तो भी मैं नहीं पीता। किसी सूरत नहीं पीता। मैं समझ गया कि अब युवा कामरेड घर के फासीवाद और देसी इलाज दोनों से नाराज है। खैर उन्हें समझाया। और बताया कि सीनियर कामरेड लोग वगैरह कुएं में कूदने के लिए कहें तो सौ बार सोचें। या फिर उन से कहें कि आप के नेतृत्व में ही कूदेंगे। पहले आप !

Thursday, 2 April 2020

भारत का यह अराजक पाकिस्तानीकरण है


कुछ लोग अटकल लगा रहे हैं कि कल के संदेश में नरेंद्र मोदी इमरजेंसी लगाने की घोषणा कर सकते हैं। पर मेरा कहना है कि इतनी हिम्मत ? और नरेंद्र मोदी ? तौबा-तौबा ! कायर हो चुके हैं अब श्रीमान नरेंद्र मोदी। नमाज की एक अजान सुन कर ही वह कांपने लगते हैं। और यह जो लोग पुलिस पर पत्थर मारते हैं न , पुलिस पर नहीं , नरेंद्र मोदी पर पत्थर मार रहे होते हैं। जो लोग इन दिनों जगह-जगह डाक्टरों पर थूक रहे हैं न , वह लोग डाक्टरों पर नहीं , नरेंद्र मोदी पर थूक रहे होते हैं। गाज़ियाबाद अस्पताल में अगर कोरोना पॉजिटिव पैंट उतर कर नंगे घूम रहे हैं। अश्लील गाने गए रहे हैं। नर्सों से अश्लील हरकतें कर रहे हैं। सी एम ओ , गाज़ियाबाद द्वारा इस बाबत डी एम , गाज़ियाबाद को लिखी चिट्ठी वायरल है। तो यह अश्लील हरकत यह लोग नरेंद्र मोदी के साथ कर रहे हैं।

आप मानिए , न मानिए। पर आज का क्रूरतम सच यही है। भारत और इंडिया की खाई फांद कर यह नया मुस्लिम भारत है।  भारत का यह अराजक पाकिस्तानीकरण है। तालिबानीकरण है। यह अनायास नहीं है कि लोग कसम खा कर खुल्ल्मखुल्ला कहते फिर रहे हैं कि हम तो पूरे मुल्क में कोरोना फैलाएंगे। तो यह आसान नहीं है। यह नरेंद्र मोदी का फेल्योर है। बहुत बड़ा फेल्योर। लोग लॉक डाऊन नहीं , नरेंद्र मोदी को फेल करने में लगे हैं , अपनी जान पर खेल कर। मुस्लिम भारत का यही नंगा सच है। निजामुद्दीन , मरकज का मौलाना मोहम्मद साद कंधलावी अकेला नहीं है। लाखो मौलाना उस के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हैं। 15 करोड़ , अब सवा सौ करोड़ पर भारी हैं। शाहीनबाग का प्रयोग अब पूरे देश में तारी है। कोरोना की महामारी में असग़र वजाहत जैसे लेखक अपना लीगी चश्मा पहन कर चुप हैं। अपने नाम की कथा लिख रहे हैं। इस खतरे पर नहीं। मुनव्वर राना जैसे लीगी शायर , जावेद अख्तर जैसे 786 के तलबगार भी मोहम्मद साद जैसों के कारनामों पर खामोश हैं।

हर शहर के मस्जिदों से विदेशी लोग कैसे और कितने निकल रहे हैं , यह भी देखने की बात है। कोरोना फैलाना ही इन का मकसद है। और डरपोक मोदी बस अपील दर अपील में संलग्न हैं। ज़रूरत इंदिरा गांधी जैसी किसी लौह महिला की है जो अपनी सख्ती के बुलडोजर तले इस कदर कुचल दे कि यह लोग थूकने लायक न रहें। थूकें भी तो इन्हें अपना थूक चटवाने का हुनर नहीं जानते नरेंद्र मोदी। तकलीफ इसी बात की है। कोरोना कर्मवीरों के लिए थाली , घंटी , शंख बजाने , बजवाने लोग डाक्टरों पर थूकना आखिर बर्दाश्त कर किस के डर से कर रहे हैं।

पहले चीन पर गुस्सा आता था कि 30 लाख उइगर मुसलामानों को नज़रबंद क्यों रखे हुए है। सारे कब्रिस्तान , सारे मजार और सारे मस्जिद क्यों तोड़ दिए हैं।  बुरका , दाढ़ी , और सार्वजनिक नमाज पर प्रतिबंध क्यों लगा रखा है पूरे चीन में। अब भारत में कोरोना को ले कर भारत में नमाजियों ने जो रुख अख्तियार किया है , उसे देख कर लगता है कि भारत सरकार को भी सारे खतरे मोल ले कर भी चीन सरकार को फॉलो कर लेना चाहिए। कोरोना , कोरोना है , पोलियो नहीं। सी ए ए नहीं। कोरोना परस्त यह नमाजी लोग चीन के उइगर मुसलमानों की तरह सख्त नज़रबंदी के तलबगार हैं। किसी रियायत के नहीं।

देश बड़ा कि धर्म ! वर्तमान परिदृश्य कहता है धर्म ! अगर आप मुस्लिम हैं तो आप देश के नागरिक नहीं , देश के दामाद हैं । इन की कोई भी बात नहीं मानी गई तो यह देश जला देंगे। इसी लिए विभिन्न सरकारें इन से डरती हैं। यह सुप्रीम कोर्ट , संसद और क़ानून सब से ऊपर हैं । मामले तमाम हैं। पर ताज़ा मामला कोरोना का देखा जा सकता है। यह लोग इलाज कर रहे डाक्टर पर थूक सकते हैं। डाक्टर को दौड़ा-दौड़ा कर पीट सकते हैं। पत्थरबाजी कर सकते हैं। मस्जिदों में विदेशियों को ठहरा सकते हैं। कोरोना फैलाने का लाइसेंस इन के पास है ही। यह कुछ भी कर सकते हैं। कोई सरकार , कोई पुलिस इन का कुछ नहीं कर सकती। कर सकती हो तो आप बताइए भी भला। देश के कायर बुद्धिजीवी , लेखक , पत्रकार आदि सर्वदा इन के साथ खड़े मिलेंगे । देश को बांटने और जलाने में इन के आनंद के क्या कहने । रही बात राजनीतिज्ञों की तो इन की तो यह धर्म ही खुराक हैं ।

अंगरेज भारत आए। भारत को गुलाम बनाया। जुल्म भी बहुत किए। उन को भगाया भी गया। लेकिन एक बार यह भी सोच कर देखिए कि अंगरेज अगर भारत न आए होते तो भारत का क्या हाल हुआ होता ? तय मानिए मुगलिया सल्तनत ने अपनी सनक में इंशा अल्ला , समूचे भारत को तालिबान में कनवर्ट कर दिया होता। सांस नहीं ले पाते आप। शुक्रिया अदा कीजिए अंगरेजों का एक बार कि जैसे भी , गुलाम बना कर ही सही , आप को तालिबानियों के जबड़े में जाने से बचा लिया। नहीं आप भी , जबरिया ही सही इस्लाम क़ुबूल कर अठारहवीं सदी में बिलख-बिलख कर जी रहे होते। जैसे कि अफगानिस्तान। आप भी अपनी सेवा करने वाले डाक्टरों पर थूक रहे होते। पुलिस पर पत्थर बरसा रहे होते। पूरे मुल्क में कोरोना फ़ैलाने की कसम खा रहे होते। शुक्र है कि आप इस सब से बच गए।

Wednesday, 1 April 2020

दो कामरेड मित्रों को अलग-अलग जवाब के पहलू

एक लेखक मित्र की पोस्ट पर एक कवि और 

कामरेड मित्र के कमेंट पर मेरा कमेंट 


इस तरह आप के भड़कने की विवशता समझ सकता हूं। कोई भभकी नहीं दे रहा मैं किसी को। लेकिन वैचारिक कटटरता भी आदमी को इतना मुश्किल में डाल सकती है , इतना बड़ा भक्त बना सकती है , वैचारिकी का गुलाम बना सकती है , आप की इस प्रतिक्रिया को पढ़ कर समझा जा सकता है। नहीं जानते अपनी वैचारिक कट्टरता के चलते आप तो अब से जान लीजिए कि जिन लोगों को विदेश से बुलाया गया , उन की बार-बार की पुकार पर , उन्हें राहत देने के लिए , वह सभी भारतीय नागरिक हैं। सरकार की ज़िम्मेदारी थी , उन्हें चीन , इटली , ईरान आदि से बुला लाना। सरकार ने वह किया। आप जैसे लोग मोदी सरकार पर हिंदूवादी होने की , हिंदू-मुसलमान करने की तोहमत लगाते ही रहते हैं , निरंतर। लेकिन यह जो लोग तमाम देशों से भारत लाए गए हैं , विशेष विमान से , उन में अधिकांश क्या 75 प्रतिशत मुस्लिम समाज से हैं। लेकिन लाए गए। एयरफोर्स के विमान से निरंतर लाए गए। क्यों कि वह भारतीय हैं। भारत सरकार की नैतिक ज़िम्मेदारी थी उन्हें वापस भारत लाना। 

रही बात शी जिनपिंग की तो हां , वह दुनिया के अपराधी हैं। मनुष्यता के अपराधी हैं। इन के खिलाफ मुकदमा अंतर्राष्ट्रीय अदालत में ही मुमकिन है। और वहां जाने की क्षमता नहीं है मेरी। न ही किसी स्थानीय अदालत में। सिर्फ़ यह लिखने की , यह कहने की औकात मेरी है। वह कर रहा हूं। आप कीजिए शी जिनपिंग की भक्ति। और भड़कते हुए करते रहिए शी जिनपिंग का गुणगान। वैचारिक गुलामी का तकाजा है यह। कोई बुरी बात नहीं। नहीं लिखने को तो आप ने यह भी लिखा है अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता की गुलामी में कि केरल बिलकुल ठीक-ठाक है। उस ने अपने को कोरोना से मुक्त कर लिया है। क्यों कि वहां कम्युनिस्टों का शासन है। 

पता नहीं कम्युनिस्ट भक्ति में आक्रांत लोग बाकी लोगों को इतना अंधा , इतना अपढ़ क्यों समझते हैं। स्थिति यह है कि कोरोना पीड़ित मामले में केरल दूसरे नंबर पर है। महाराष्ट्र , जहां आप प्रवासी हैं , पहले नंबर पर। इस कोरोना आपदा के समय भी हुई नक्सल हिंसा में मारे गए सुरक्षा बल के जवानों पर तो दूसरोँ की औकात की पड़ताल करने वाले आप जैसे लोग चुप ही रहना पसंद करते हैं। नक्सली हिंसा के खिलाफ किसी कामरेड की बोलने की हैसियत है नहीं पर दूसरों की औकात , बात-बेबात देखते , दिखाते रहते हैं। यह गुड बात नहीं है। मनुष्यता से बड़ी नहीं है , कामरेडशिप। और कामरेडों की हिप्पोक्रेसी से यह भारतीय समाज अब आजिज आ गया है। नहीं जानते तो अब से जान लीजिए। और कि मान लीजिए कि बहुत बड़े साम्राज्यवादी और व्यापारी कामरेड शी जिनपिंग कोरोना के बाबत समूची दुनिया और मनुष्यता के अपराधी हैं। मुख्य अपराधी। इस बाबत दुनिया भर में  तमाम रिपोर्टें आ गई हैं। अभी दुनिया कोरोना से लड़ रही है। कोरोना से निपटने के बाद दुनिया एकजुट हो कर शी जिनपिंग को भी राइट टाइम करेगी। लिख कर कहीं रख लीजिए। ताकि सनद रहे और वक्त ज़रूरत काम आए।


एक कामरेड दोस्त की पोस्ट पर मेरा यह एक कमेंट 


तुम्हारी यह पोस्ट देख कर जान पाया कि कम्युनिस्टों में भी कम भक्त नहीं है। अच्छा अवसर दिया है यह जानने का। अन्य कामरेड साथी भी इधर लगातार यह अवसर देते ही जा रहे हैं। तुम अकेले नहीं हो इस मुहिम में । चीन कोरोना का जनक लेकिन उस का कोई कम्युनिस्ट नाम ही नहीं लेता। केरल कोरोना पीड़ितों के मामले में दूसरे नंबर पर है। महाराष्ट्र नंबर एक पर। आबादी में कम होने , संसाधन में बहुत आगे रहने के बावजूद बहुत मुश्किल में है केरल। किसी न किसी की मृत्यु की खबर केरल रोज दे रहा है। लेकिन तुम को केरल ठीक-ठाक लग रहा है तो बहुत अच्छा। बधाई तुम्हें कि केरल को ऐसे ही सुंदर बनाए रखो। उत्तर प्रदेश , बिहार में तो वैसे भी सांप्रदायिक सरकारें हैं। निकम्मी हैं। एक केरल बढ़िया , दूसरे लाखों मज़दूरों को पलायन के लिए उकसाने वाली दिल्ली प्रदेश की केजरीवाल सरकार बढ़िया। जैसे सारे मज़दूर दिल्ली शहर में ही रहते हैं। कोलकोता , मुंबई , अहमदाबाद , सूरत , पंजाब आदि-इत्यादि में तो सिर्फ़ साहब लोग , व्यापारी लोग ही रहते हैं। इस लिए यहां से मज़दूर लोग पलायन नहीं कर रहे। वैसे भी लॉक डाऊन मोदी का तुगलकी फरमान है। उसे फेल करने की तरकीब लगाने , फेल होने का विवरण पेश करने का आनंद ही कुछ और है। क्यों कि यह देश तो सिर्फ मोदी और उस के बाप का है। सो पूरी भक्ति से लगे रहो। कोरोना को बढ़ाने के लिए लॉक डाऊन की ऐसी-तैसे करते रहो। कोरोना की आग में देश जितना जलेगा , लाल सलाम बोलने में उतनी ही ऊर्जा मिलेगी। नक्सल बेल्ट में सुरक्षा बलों को मारो , बाकी जगह कोरोना में लोग मरें। तभी तो जुगलबंदी बनेगी। लाल सलाम , लाल सलाम की लाली खूब चटक होगी। गुड है यह भी।