Wednesday, 14 September 2022

हम हिंदी की जय जयकार करने वाले कुछ थोड़े से बचे रह गए लोग

दयानंद पांडेय 

जैसे नदियां , नदियों से मिलती हैं तो बड़ी बनती हैं , भाषा भी ऐसे ही एक दूसरे से मिल कर बड़ी बनती है। सभी भाषाओँ को आपस में मिलते रहना चाहिए। संस्कृत , अरबी , हिंदी , उर्दू , फ़ारसी , अंगरेजी , तमिल , तेलगू , कन्नड़ , मराठी , बंगाली , रूसी , जापानी आदि-इत्यादि का विवाद बेमानी है। अंगरेजी ने साइंस की ज्यादातर बातें फ्रेंच से उठा लीं , रोमन में लिख कर उसे अंगरेजी का बना लिया। तो अंगरेजी इस से समृद्ध हुई और फ्रेंच भी विपन्न नहीं हुई। भाषा वही जीवित रहती है जो नदी की तरह निरंतर बहती हुई हर किसी से मिलती-जुलती रहती है। अब देखिए गंगा हर नदी से मिलती हुई चलती है और विशाल से विशालतर हुई जाती है। हिंदी ने भी इधर उड़ान इसी लिए भरी है कि अब वह सब से मिलने लगी है। भाषाई विवाद और छुआछूत भाषा ही को नहीं मनुष्यता को भी नष्ट करती है। भाषा और साहित्य मनुष्यता की सेतु है , इसे सेतु ही रहने दीजिए।

हम तो जानते और मानते थे कि हिंदी हमारी मां है , भारत की राज भाषा है। लेकिन कुछ साल पहले हिंदी दिवस पर माकपा महासचिव डी राजा ने एक नया ज्ञान दिया था कि हिंदी हिंदुत्व की भाषा है। उधर हैदराबाद से असदुद्दीन ओवैसी ने भी यही जहर उगला। ओवैसी ने कहा है कि भारत हिंदी , हिंदू और हिंदुत्व से बड़ा है। यह सब तो कुछ वैसे ही है जैसे अंगरेजी , अंगरेजों की भाषा है। उर्दू , मुसलामानों की भाषा है। संस्कृत पंडितों की भाषा है। इन जहरीलों को अब कौन बताए कि भाषा कोई भी हो , मनुष्यता की भाषा होती है। संस्कृत , हिंदी हो , अंगरेजी , उर्दू , फ़ारसी , अरबी , रूसी , फ्रेंच या कोई भी भाषा हो , सभी भाषाएं मनुष्यता की भाषाएं है। सभी भाषाएं आपस में बहने हैं , दुश्मन नहीं। पर यह भी है कि जैसे अंगरेजी दुनिया भर में संपर्क की सब से बड़ी भाषा है , ठीक वैसे ही भारत में हिंदी संपर्क की सब से बड़ी भाषा है। तुलसी दास की रामायण पूरी दुनिया में पढ़ी और गाई जाती है। लता मंगेशकर का गाना पूरी दुनिया में सुना जाता है।

तीन वर्ष पहले तमिलनाडु के शहर कोयम्बटूर गया था , वहां भी हिंदी बोलने वाले लोग मिले। शहर में हिंदी में लिखे बोर्ड भी मिले। ख़ास कर बैंकों के नाम। एयरपोर्ट पर तो बोर्डिंग वाली लड़की मेरी पत्नी को बड़ी आत्मीयता और आदर से मां कहती मिली। मंदिरों में हिंदी के भजन सुनने को मिले। मेरी बेटी का विवाह केरल में हुआ है। वहां हाई स्कूल तक हिंदी अनिवार्य विषय है। मेरी बेटी की चचिया सास इंडियन एयर लाइंस में हिंदी अधिकारी हैं। मेरे दामाद डाक्टर सवित प्रभु बैंक समेत हर कहीं हिंदी में ही दस्तखत करते हैं। मेरे पितामह और पड़ पितामह ब्राह्मण होते हुए भी उर्दू और फ़ारसी के अध्यापक थे। हेड मास्टर रहे। महाराष्ट्र , आंध्र प्रदेश के लोगों ने मेरे हिंदी उपन्यासों पर रिसर्च किए हैं। अभी भी कर रहे हैं। पंजाबी , मराठी , उर्दू और अंगरेजी में मेरी कविताओं और कहानियों के अनुवाद लोगों ने अपनी पसंद और दिलचस्पी से किए हैं। मराठी की प्रिया जलतारे जी [ Priya Jaltare ] तो जब-तब मेरी रचनाओं , कविता , कहानी , ग़ज़ल के मराठी में अनुवाद करती ही रहती हैं ।

मुंबई में भी लोगों को बेलाग हिंदी बोलते देखा है । नार्थ ईस्ट के गौहाटी , शिलांग , चेरापूंजी , दार्जिलिंग , गैंगटोक आदि कई शहरों में गया हूं , हर जगह हिंदी बोलने , समझने वाले लोग मिले हैं। कोलकाता में भी। श्रीलंका के कई शहरों में गया हूं। होटल समेत और भी जगहों पर लोग हिंदी बोलते , हिंदी फिल्मों के गाने गाते हुए लोग मिले। तमाम राष्ट्राध्यक्षों को नमस्ते ही सही , हिंदी बोलते देखा है। लेकिन भारत ही एक ऐसी जगह है जहां लोग हिंदी के नाम पर नफ़रत फैलाते हैं। महात्मा गांधी गुजराती थे लेकिन उन्हों ने हिंदी की ताकत को न सिर्फ़ समझा बल्कि आज़ादी की लड़ाई का प्रमुख स्वर हिंदी ही को बनाया। अंगरेजी वाले ब्रिटिशर्स को हिंदी बोल कर भगाया। गुजराती नरेंद्र मोदी भी दुनिया भर में अपने भाषण हिंदी में ही देते हैं। उन की हिंदी में ही दुनिया भर के लोग उन के मुरीद होते हैं। अभी जल्दी ही अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप ने चुटकी लेते हुए कहा भी कि नरेंद्र मोदी अंगरेजी अच्छी जानते हैं पर बोलते हिंदी में ही हैं। प्रधान मंत्री रहे नरसिंहा राव तेलुगु भाषी थे पर हिंदी में भाषण झूम कर देते थे।

जयललिता भले हिंदी विरोधी राजनीति करती थीं पर हिंदी फ़िल्मों की हिरोइन भी थीं। धर्मेंद्र उन के हीरो हुआ करते थे। जयललिता हिंदी अच्छी बोलती भी थीं। वैजयंती माला , वहीदा रहमान , हेमा मालिनी , रेखा , श्रीदेवी , विद्या बालन आदि तमाम हीरोइनें तमिल वाली ही हैं। बंगाली , मराठी , पंजाबी और तमिल लोगों का हिंदी फिल्मों में जो अवदान है वह अद्भुत है। निर्देशन , गीत , संगीत , अभिनय आदि हर कहीं। अटल बिहारी वाजपेयी ने बतौर विदेश मंत्री जब संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण दे कर हिंदी की वैश्विक पताका फहराई थी तो पूरा देश झूम गया था। सुषमा स्वराज ने बतौर विदेश मंत्री , संयुक्त राष्ट्र संघ में अटल जी द्वारा बोए हिंदी के बीज को वृक्ष के रूप में पोषित किया। यह अच्छा ही लगा कि आज एक और गुजराती अमित शाह ने हिंदी के पक्ष में बहुत ताकतवर और बढ़िया भाषण दिया है। अमित शाह के आज के भाषण से उम्मीद जगी है कि हिंदी जल्दी ही राष्ट्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होगी। शायद इसी लिए डी राजा समेत ओवैसी समेत कुछ लोग बौखला कर हिंदी को हिंदुत्व की भाषा बताने लग गए हैं। इन की बौखलाहट बताती है कि हिंदी भाषा का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।

राजनीतिक दलों के बगलबच्चा विभिन्न लेखक संगठनों ने राजनीतिक दलों का एजेंडा सेट करने के अलावा क्या कभी लेखकों की भी कोई लड़ाई लड़ी है ? लड़ाई तो छोड़िए अपने लिखे की मजदूरी यानी सो काल्ड रायल्टी तक की लड़ाई भी लड़ते किसी ने देखा है कभी ? तब जब कि कम से कम सरकारी ख़रीद में ही बाकायदा नियम है कि लेखक को रायल्टी दी गई है , इस की एन ओ सी देने पर ही प्रकाशक को भुगतान दिया जाए। सारे बेईमान प्रकाशक लेखकों के फर्जी दस्तखत से सरकारी भुगतान के लिए एन ओ सी दे कर भुगतान ले लेते हैं। करोड़ो रुपए का यह खेल है । और यह दुनिया भर की लड़ाई का स्वांग भरने वाले लेखक और लेखक संगठन अपनी ही लड़ाई लड़ने से सर्वदा भाग जाते हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर धंसा लेते हैं। कांग्रेस और वाम दलों के टुकड़ों पर खेलने , खाने वाले लेखक संगठनों की यह हिप्पोक्रेसी अब किसी से छुपी नहीं है। सोचिए कि जो लोग अपनी और अपने श्रम की मेहनत का दाम पाने के लिए टुच्चे और भ्रष्ट प्रकाशकों से नहीं लड़ सकते , वह लोग फासिस्ट ताकतों से , बाज़ार से , सांप्रदायिकता से और जाने किस , किस और इस , उस से लड़ने का दम भरते हैं। जैसे भारत का विपक्ष जनता जनार्दन से कट कर सारी लड़ाई सोशल मीडिया पर लड़ने की हुंकार भरता रहता है , हमारे लेखक और लेखक संगठन भी जनता जनार्दन से कट कर हवा में काठ की तलवार भांजते हैं। 

नकली कहानी , नकली कविता और एक दूसरे की पीठ खुजाती आलोचना के औजार से वह समाज को , व्यवस्था को एक झटके से बदल देने का सपना देखते हैं , लफ्फाजी झोंकते हैं और शराब पी कर सो जाते हैं। नहीं जानते कि अधिकांश जनता आखिर क्यों गेरुआ हुई जा रही , नहीं चाहते कि जनता का मिजाज बदले । चाहते तो लफ्फाजी और हिप्पोक्रेसी की अपनी यह चादर उतार कर जनता से मिलते , जनता को समझते , समझाते। समाज और व्यवस्था को बदलने की ज़मीनी बात करते। बात करना तो दूर इन हिप्पोक्रेट लेखकों , कवियों की सारी रचनात्मकता एक व्यक्ति और एक पार्टी की नफ़रत में खर्च हुई जाती दिखती है। कोई किसी पन्ने पर उल्टी कर रहा है , कोई किसी पन्ने पर पेशाब कर रहा है , कोई किसी पन्ने को कमोड बना कर आसीन है। लेकिन इस फासिज्म , इस सांप्रदायिकता , इस बाज़ार से लड़ती एक कारगर रचना नहीं कर पा रहा कोई। कालजयी रचना तो बहुत दूर की बात है। जो लोग खुद की सुविधा नहीं छोड़ सकते , खुद को नहीं बदल सकते , वह लोग व्यवस्था बदल देने का नित नया पाखंड भाख रहे हैं। नफरत और घृणा का प्राचीर रच रहे हैं। भूल गए हैं कि साहित्य समाज को तोड़ने का औजार नहीं , साहित्य समाज का सेतु होता है। धन्य , धन्य कवि और धन्य , धन्य कविता ! और क्या कहें , कैसे और कितना कहें !

हर भाषा का सम्मान करना सीखिए। हर भाषा स्वाभिमानी होती है । आन-बान-शान होती है । याद रखिए कि भाषा का भेद और भाषा का अपमान दुनिया का भूगोल बदल देता है। मनुष्यता चीखती है । अगर भारत के विभाजन का कारण धार्मिक था , इस्लामिक कट्टरपन था और पाकिस्तान बना । तो भाषाई भेद भाव ही था जो बांग्लादेश बना । बांग्ला भाषियों पर अगर जबरिया उर्दू न थोपी गई होती , फौजी बूटों तले बांग्ला न दबाई गई होती तो दुनिया का भूगोल नहीं बदलता , बांग्लादेश नहीं बनता । मनुष्यता अपमानित न हुई होती । लाखो-करोड़ो लोग अनाथ और बेघर न हुए होते । हिंदी दिवस पर हिंदी की जय ज़रुर कीजिए , ख़ूब जोर-शोर से कीजिए पर दुनिया भर की भाषाओँ का सम्मान करते हुए । किसी का अपमान करते हुए नहीं । भाषाई औरंगज़ेब बनने से हर कोशिश , हर संभव बचिए ।

पहले अ पर ए की मात्रा लगा कर एक लिखा जाता था। गांधी की पुरानी किताबें उठा कर देखिए। कुछ और ही वर्तनी है। गुजराती से मिलती-जुलती। भारतेंदु की , प्रेमचंद की पुरानी किताबें पलटिए वर्तनी की लीला ही कुछ और है। सौभाग्य से मैं ने तुलसी दास के श्री रामचरित मानस की पांडुलिपि भी देखी है। श्री रामचरित मानस के बहुत पुराने संस्करण भी। वर्तनी में बहुत भारी बदलाव है। वर्तनी कोई भी उपयोग कीजिए , बस एकरूपता बनी रहनी चाहिए। अब यह नहीं कि एक ही पैरे में सम्बन्ध भी लिखें और संबंध भी । आए भी और आये भी। गयी भी और गई भी। सभी सही हैं , कोई ग़लत नहीं। लेकिन कोशिश क्या पूरी बाध्यता होनी चाहिए कि जो भी लिखिए , एक ही लिखिए। एकरूपता बनी रहे। यह और ऐसी बातों का विस्तार बहुत है। भाषा विज्ञान विषय और भाषाविद का काम बहुत कठिन और श्रम साध्य है। लफ्फाजी नहीं है। पाणिनि होना , किशोरी प्रसाद वाजपेयी होना , भोलानाथ तिवारी होना , रौजेट होना , अरविंद कुमार होना , बरसों की तपस्या , मेहनत और साधना का सुफल होता है। व्याकरणाचार्य होना एक युग की तरह जीना होता है। वर्तनी और भाषा सिर्फ़ विद्वानों की कृपा पर ही नहीं है। छापाखानों का भी बहुत योगदान है। उन की सुविधा ने , कठिनाई ने भी बहुत से शब्द बदले हैं। चांद भले अब सपना न हो , पर चंद्र बिंदु अब कुछ समय में सपना हो जाएगा। हुआ यह कि हैंड कंपोजिंग के समय यह चंद्र बिंदु वाला चिन्ह का फांट छपाई में एक सीमा के बाद कमज़ोर होने के कारण टूट जाता था। तो कुछ पन्नों में चंद्र बिंदु होता था , कुछ में नहीं। तो रसाघात होता था। अंततः धीरे-धीरे इस से छुट्टी ली जाने लगी। बहस यहां तक हुई कि हंस और हंसने का फर्क भी कुछ होता है ? पर छापाखाने की दुविधा कहिए या सुविधा में यह बहस गुम होती गई। यही हाल , आधा न , आधा म के साथ भी होता रहा तो इन से भी छुट्टी ले ली गई। ऐसे और भी तमाम शब्द हैं । जब कंप्यूटर आया तो और बदलाव हुए। यूनीकोड आया तो और हुए। अभी और भी बहुत होंगे। तकनीक बदलेगी , बाज़ार और मन के भाव बदलेंगे तो भाषा , शब्द और वर्तनी भी ठहर कर नहीं रह सकेंगे। यह सब भी बदलते रहेंगे। भाषा नदी है , मोड़ पर मोड़ लेती रहेगी। कभी करवट , कभी बल खा कर , कभी सीधी , उतान बहेगी। बहने दीजिए। रोकिए मत। वीरेंद्र मिश्र लिख गए हैं , नदी का अंग कटेगा तो नदी रोएगी। भाषा और नदी कोई भी हो उसे रोने नहीं दीजिए , खिलखिलाने दीजिए।

हम हिंदी की जय जयकार करने वाले कुछ थोड़े से बचे रह गए लोगों में से हैं । हिंदी हमारी अस्मिता है । हमारा गुरुर , हमारा मान है । यह भी सच है कि सब कुछ के बावजूद आज की तारीख में हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है । पर एक निर्मम सच यह भी है कि आज की तारीख में हिंदी की जय जयकार वही लोग करते हैं जो अंगरेजी से विपन्न हैं । हम भी उन्हीं कुछ विपन्न लोगों में से हैं । जो लोग थोड़ी बहुत भी अंगरेजी जानते हैं , वह हिंदी को गुलामों की भाषा मानते हैं । अंगरेजी ? अरे मैं देखता हूं कि मुट्ठी भर उर्दू जानने वाले लोग भी हिंदी को गुलामों की ही भाषा न सिर्फ़ मानते हैं बल्कि बड़ी हिकारत से देखते हैं हिंदी को । बंगला , मराठी , गुजराती , तमिल , तेलगू आदि जानने वालों को भी इन उर्दू वालों की मानसिकता में शुमार कर सकते हैं । नई पीढ़ी तो अब फ़िल्में भी हालीवुड की देखती है , बालीवुड वाली हिंदी फ़िल्में नहीं । पढ़ी-लिखी नई पीढ़ी के लिए हिंदी अब दादी-दादा , नानी-नाना वाली भाषा है । वह हिंदी की गिनती भी नहीं जानती । सो जो दयनीय हालत कभी भोजपुरी , अवधी की थी , आज वही दयनीयता और दरिद्रता हिंदी की है । तो जानते हैं क्यों ? हिंदी को हम ने कभी तकनीकी भाषा के रुप में विकसित नहीं किया । विज्ञान , अर्थ , कानून , व्यापार कहीं भी हिंदी नहीं है । तो जो भाषा विज्ञान और तकनीक नहीं जानती , उसे अंतत: बोली जाने वाली भाषा बन कर ही रह जाना है , मर जाना है । दूसरे हिंदी साहित्य छापने वाले प्रकाशकों ने हिंदी को रिश्वत दे कर सरकारी ख़रीद की गुलाम बना कर मार दिया है । लेखक-पाठक का रिश्ता भी समाप्त कर दिया है । साहित्यकार खुद ही लिखता है , खुद ही पढ़ता है । हम हिंदी की लाख जय जयकार करते रहें , पितृपक्ष में हिंदी दिवस मनाते रहें , हिंदी अब सचमुच वेंटीलेटर पर है , बोलने वाली भाषा बन कर । ऐसे में भारतेंदु हरिश्चंद्र की यह कविता और ज़्यादा प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो जाती है :

मातृ-भाषा के प्रति / भारतेंदु हरिश्चंद्र


निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।


अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।

पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।


उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय।

निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।।


निज भाषा उन्नति बिना, कबहुँ न ह्यैहैं सोय।

लाख उपाय अनेक यों भले करो किन कोय।।


इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग।

तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।।


और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात।

निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।।


तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय।

यह गुन भाषा और महं, कबहूँ नाहीं होय।।


विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।

सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।।


भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात।

विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।।


सब मिल तासों छाँड़ि कै, दूजे और उपाय।

उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।।


Monday, 12 September 2022

अयोध्या में जय श्री राम के बाद अब बनारस में हर-हर महादेव !

दयानंद पांडेय 


अयोध्या में जय श्री राम के बाद आज बनारस में हर-हर महादेव हो गया। मैं क़ानून का विद्यार्थी नहीं हूं लेकिन अनुभव के आधार पर इतना तो जानता ही हूं कि अदालत में अगर कोई याचिका एडमिट हो जाती है तो मुकदमा जीतना मात्र औपचारिकता ही होती है। थोड़ा नहीं , पूरा समय लगता है लेकिन देर-सवेर विजय मिलती ही है। इसी लिए हार रहा पक्ष अमूमन मेनटेनेबिलिटी का नगाड़ा बजता फिरता रहता है। अगर जज पट जाता है तो कई बार रिट मेनटेनेबिल होते हुए भी एडमिट नहीं होती। पर काशी में जज न तो पटा पाए लोग , न जज सेक्यूलरिज्म की रतौंधी का शिकार हुआ। कांग्रेस का वर्शिप ऐक्ट धूल चाट गया।

अब चाहे जितनी और जैसी यात्राएं कर ले कांग्रेस , इस सदी में उसे सत्ता नहीं मिलने वाली। सत्ता की शहद का स्वाद उसे नहीं मिलने वाला। क्यों कि काशी भी अयोध्या की राह चल पड़ी है। मामला स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट तक जाएगा। समय लगेगा। पर न्याय की गंगा हिमालय से चल पड़ी है। फिर हम सब जानते ही हैं कि नदी जब चल पड़ती है तो किसी के रोके नहीं रुकती है। जिस भी तरफ चल पड़ती है , रास्ता बन जाता है। मंथरा का यह संवाद कोई नृप होई हमें का हानि ! की कुटिलता आज फिर ध्वस्त हो गई। नृप से बहुत फ़र्क पड़ता है। 

भारतीय संस्कृति और हिंदू देवी देवताओं को अपमानित और लांछित करने की प्रवृत्ति अगर नहीं होती एक समुदाय द्वारा तो शायद यह दिन आज देखने को नहीं मिलता। शिव लिंग को वजू खाने में अभी भी उपस्थित रख कर रोज उस पर थूकने और हाथ-पांव धो कर अपमानित करने की प्रवृत्ति ने शिवलिंग को प्रमाण बना दिया और बात बहुत आगे बढ़ गई। कबीर कह ही गए हैं :

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप। 

अब से सही एक समुदाय अपनी पूर्व की गलतियों को स्वीकार कर चीज़ों को ठीक कर ले। सोच-विचार कर आक्रमणकारी प्रवृत्ति , ज़िद और सनक से छुट्टी ले  ले।  ताकि समाज में आपसी सद्भाव बना रहे। सत्यम , शिवम , सुंदरम की परिकल्पना ही भारतीयता की पहचान है। लोक कल्याण ही अभीष्ट है।

 श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेवा,

पितु मात स्वामी सखा हमारे, हे नाथ नारायण वासुदेवा।

Saturday, 3 September 2022

स्वयं को मिटा कर औरों के लिए होना ही है , पहले आप ! और यह लखनऊ सिखाता है

दयानंद पांडेय 

फ़ोटो : रवि कपूर 

अपनी नफ़ासत , नज़ाकत और लताफ़त के लिए जाने जाने वाले लखनऊ का नाम भर लीजिए और आप के अधर जैसे शहद में डूब जाते हैं। जुबान पर मिठास घुल जाती है। मन में मिसरी सी फूट जाती है। लखनऊ का  दशहरी आम और उस की मिठास की चर्चा दुनिया भर में होती है। लखनऊ की मोहब्बत के क्या कहने। मोहब्बत के फूल खिलते हैं यहां। सर्वदा। किसी शहर में शायद ही लव लेन हो। लखनऊ के हज़रतगंज में है। लखनऊ एक शहर नहीं , बांसुरी की मीठी तान है। किसी संतूर के मीठी धुन सी मिठास है लखनऊ में। शक़ील बदायूनी जैसे मशहूर शायर लखनऊ का दूसरा नाम ज़न्नत भी बताते रहे हैं अपने गीतों में। इस लिए भी कि लखनऊ पहले आप , पहले आप ! की तहज़ीब का शहर है। पहले आप का अर्थ है दूसरों के लिए सोचना। उन का खयाल रखना। पहले आप का एक यह अर्थ यह भी है कि अपने आप को मिटा देना। अपने आप को विसर्जित कर देना। स्वयं को मिटा कर औरों के लिए होना। औरों के लिए जीना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। पहले आप , पहले आप कहते हुए नवाबों की ट्रेन छूट जाने के किस्से और गाने भी खूब लिखे गए हैं। लखनऊ में नवाबों की नज़ाकत का आलम तो कभी यह था कि एक बार किसी ट्रेन से दो नवाब लखनऊ स्टेशन पर उतरे। दोनों के पास कोई सामान नहीं था। एक नवाब बुजुर्ग थे सो उन के पास छड़ी थी। उन्हों ने एक कुली बुलाया। कुली को छड़ी दिया और कहा कि छड़ी ले चलो ! दूसरे नवाब नौजवान थे। सो उन के पास छड़ी भी नहीं थी। फिर भी उन्हों ने कुली बुलाया और उसे टिकट देते हुए कहा कि , टिकट ले चलो ! सुबहे बनारस , शामे अवध की कहावत में लखनऊ का ही ज़िक्र है। क्यों कि लखनऊ की शाम बड़ी रंगीन होती है। लखनऊ के हुस्न का आलम यह है कि कभी नवाब वाज़िद अली शाह ने कुल्लियाते अख्तर में लिखा था :

लखनऊ हम पर फ़िदा है हम फ़िदा-ए-लखनऊ 

आसमां की क्या हकीकत जो छुड़ाए लखनऊ। 

जैसे इटली के रोम शहर के बारे में कहा जाता है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ वैसे ही लखनऊ का निर्माण भी कोई एक-दो दिन में नहीं हुआ। किसी भी शहर का नहीं होता। कहते हैं कि अयोध्या के राजा राम के छोटे भाई लक्ष्मण ने इस नगर को बसाया। इस नगर को लक्ष्मणपुरी से लक्ष्मणावती और लखनावती होते हुए लखनऊ बनने में काफी समय लगा। गो कि पुराने लखनऊ में कुछ लोग इसे आज भी नखलऊ कहते हुए मिलते हैं। प्रागैतिहासिक काल के बाद यह क्षेत्र मौर्य,शुंग, कुषाण, गुप्त वंशों और फिर कन्नौज नरेश हर्ष के बाद गुर्जर प्रतिहारों, गहरवालों, भारशिवों तथा रजपसियों के अधीन रहा है। इन सभी युगों की सामग्री जनपद में अनेक स्थानों से प्राप्त हुई है। लक्ष्मण टीले, गोमती नगर के पास रामआसरे पुरवा, मोहनलालगंज के निकट हुलासखेडा़ एवं कल्ली पश्चिम से प्राप्त अवशेषों ने लखनऊ के इतिहास को ईसा पूर्व लगभग दो हज़ार वर्ष पूर्व तक पीछे बढ़ा दिया है। ग्यारहवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच यहां मुसलमानों का आगमन हुआ। इस प्रकार यहां के पूर्व निवासी भर, पासी, कायस्थ तथा ब्राह्मणों के साथ मुसलमानों की भी आबादी हो गई। फ़्रांसीसियों ने कभी लखनऊ में घोड़ों और नील का व्यापार भी किया था। 

लखनऊ गजेटियर में लक्ष्मण टीला के महत्व का वर्णन विस्तार से है। कहते हैं कि वर्तमान में दो सौ मीटर लंबे चौड़े लक्ष्मण टीला का विस्तार इस से कई गुना ज़्यादा था। मान्यता है कि अयोध्या के राजा राम के अनुज लक्ष्मण ने इसे बसाया। लखनऊ का शेष तीर्थ अर्थात लक्ष्मण टीला लखनऊ के सांस्कृतिक इतिहाहास का मूल केंद्र बिंदु है। इसी कारण लखनऊ का मूल नाम लक्ष्मणपुरी के पुरातात्विक सपदा की धरोहर है यह लक्ष्मण टीला। कुछ लोग इस लक्ष्मणपुरी को लखनपुरी भी कहते रहे हैं। टाल्वायज व्हीलर ने लक्ष्मण टीला को आर्यों की दस प्राचीनतम गढ़ियों में से एक बताया है। जब कि पुरातत्वविद डाक्टर सांकलिया के मुताबिक़ प्राचीनतम अवशेषों का अपार संग्रहालय है यह लक्ष्मण टीला। डाक्टर सांकलिया के मुताबिक़ ईसा पूर्व कई सदी से ले कर शुंग , कुषाण और गुप्तकालीन सभ्यता के तमाम प्रामाणिक अवशेष यहां से मिलते रहे हैं। जो भी हो अब लक्ष्मण टीला ही टीले वाली मस्जिद के रूप में लखनऊ में परिचित है। लक्ष्मण टीला की अराजी पर आसफी इमामबाड़ा , मच्छी भवन आदि बनाए गए। मच्छी भवन ही अब मेडिकल कालेज का विशाल परिसर है।  

लखनऊ के स्वाभाविक आचरण के अनुरुप यहां राजपूत तथा मुगल वास्तु-कला शैली के मिले-जुले स्थापत्य वाले भवन बड़ी संख्या में मिलते हैं। भवन निर्माण कला के उसी इंडोसिरेनिक स्टाइल में कुछ कमनीय प्रयोगों द्वारा अवध वास्तुकला का उदय हुआ था। लखौरी ईंटों और चूने की इमारतें जो इंडोसिरेनिक अदा में मुसकरा रही हैं, यहां की सिग्नेचर बिल्डिंग बनी हुई हैं। इन मध्यकालीन इमारतों में गुप्तकालीन हिंदू सभ्यता के नगीने जड़े मिलेंगे। दिल्ली में गुलाम वंश की स्थापना काल से मुगलों की दिल्ली उजड़ने तक शेखों का लखनऊ रहा। इन छ: सदियों में सरज़मींने अवध में आफ़तों की वो आंधियां आईं कि हज़ारों बरस पहले वाली सभ्यता पर झाड़ू फिर गई। नतीज़ा यह हुआ कि वो चकनाचूर हिंदू सभ्यता या तो तत्कालीन मुस्लिम इमारतों में तकसीम हो गई या फिर लक्ष्मण टीला, किला मौहम्मदी नगर और दादूपुर की टेकरी में समाधिस्थ हो कर रह गई और यही कारण है कि लखनऊ तथा उस के आस-पास मंदिरों में खंडित मूर्तियों के ढेर लगे हैं।

छोटी सी छोटी चीज़ को भी बड़े औकात का दर्जा देना लखनऊ का मिजाज है। यहां लखौरियों से महल बन जाता है। कच्चे सूत का कमाल है, चिकन ! है किसी शहर में यह लियाकत? जादू सरसो पे पढ़े जाते हैं, तरबूज पर नहीं। लखनऊ वही सरसो है। लखनऊ वही जादू है। आप दुनिया के किसी शहर में चले जाइए, कुछ दिन रह जाइए या ज़िंदगी बिता दीजिए पर वहां के हो नहीं पाएंगे। पर लखनऊ में आ कर कुछ समय ही रह लीजिए आप यहां के हो कर रह जाएंगे। आप लखनऊवा हो जाएंगे। यह अनायास नहीं है कि दुनिया भर से आए लोग लखनऊ के हो कर रह गए। कुछ तो ऐसे भी लोग हैं जो लखनऊ से लौटे तो अपने-अपने देशों में जा कर लखनऊ नाम से नया शहर ही बसा बैठे। बहुत कम लोग जानते हैं कि कम से कम दुनिया के पांच और देशों में भी लखनऊ नाम के शहर हैं। जैसे अमरीका के हैरिसबर्ग में। कनाडा , सूरीनाम , त्रिनिदाद और गोयना में। लोग आए और लौट कर लखनऊ की मोहब्बत में नए-नए लखनऊ बसाए अपने-अपने देश में। इस लिए भी कि लखनऊ बेस्ट कंपोज़िशन सिटी आफ़ द वर्ड है। लखनऊ का दुनिया में कोई जोड़ नहीं है। बेजोड़ है लखनऊ। ईस्ट इंडिया कंपनी के दौर में जाने आलम वाजिद अली शाह ने कलकत्ते में अपनी नज़रबंदी के दौरान कहा था कि, ' कलकत्ता मुल्क का बादशाह हो सकता है लेकिन रुह का बादशाह लखनऊ ही रहेगा क्यों कि इंसानी तहज़ीब का सब से आला मरकज़ वही है।' आला मरकज़ मतलब महान केंद्र। लखनऊ के लिए वाज़िद अली शाह के ही एक शेर में जो कहें कि :

 दर-ओ-दीवार पे हसरत से नज़र करते हैं

ख़ुश रहो अहल-ए-वतन हम तो सफ़र करते हैं

कभी नवाबी रंग में डूबे लखनऊ की मिट्टी से एक तूफ़ान उठा जिस ने नई नवेली विदेशी सत्ता की एक बार जड़ें हिला दीं। इस तूफ़ान का नाम गदर था। बेगम हज़रतमहल ने जी-जान से सन सत्तावन की इस आग को भड़काया था। लखनऊ ने हंस के शमाएं वतन के परवानों को इस आग में जलते देखा है। राजा जिया लाल सिंह को फांसी पर चढ़ते देखा है और मौलवी अहमदुल्ला उर्फ़ नक्कारा शाह की जांबाज़ी के नमूने देखे हैं, मगर मुद्दतों से मराज और मोहताज़ हिंदुस्तानी एक अरसे के लिए गोरों की गिरफ़्त में आ गए। अंगरेजों द्वारा कैसरबाग लूट लिया गया। करोड़ों की संपदा कौड़ी के मोल बिक रही थी। जिन के पांवों की मेंहदी देखने को दुनिया तरसती थी, वह बेगमात अवध नंगे सिर बिन चादर के महल से निकल रही थीं। जो नवाबज़ादे घोड़ी पर चढ़ कर हवाखोरी करते थे वे फ़िटन हांकने लगे थे। 

कभी तवायफ़ रहीं बेग़म हज़रतमहल ने अपने पति और लखनऊ के नवाब वाजिदअली शाह को छुड़ाने के लिए लखनऊ में ही तलवार निकाली थी। लड़ते-लड़ते वह कोलकोता तक पहुंची थीं। जहां वाजिदअली शाह नज़रबंद थे। कहते हैं कि बड़ा इमामबाड़ा में जब ब्रिटिश सेना ने हमला किया तो सब लोग भाग गए। नवाब वाजिदअली शाह इस लिए नहीं भाग पाए क्यों कि उन को जूता पहनाने वाला कोई नहीं था। यह उन का नवाबी ठाट था। अंगरेज जब उन्हें गिरफ़्तार कर ले जाने लगे और उन के सिर से उन का ताज उतार लिया तो वह बहुत रोए। रोते हुए ही उन्हों ने बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाए जैसा मार्मिक गीत लिखा। जिसे कालांतर में मशहूर गायक कुंदन लाल सहगल ने गाया। यह गीत इतना मशहूर हुआ कि कुंदन लाल सहगल का सिग्नेचर गीत बन गया। कुंदन लाल सहगल इस गीत को फिल्म में गाने के लिए इसे सीखने मुंबई से लखनऊ आए थे। भातखण्डे संगीत विद्यालय में रह कर इसे गाना सीखा। वाजिदअली शाह नृत्य और संगीत के बेहद जानकार थे। सौ से अधिक पुस्तकें हैं उन की इस विषय पर। 

1857 की जंगे-आज़ादी में लखनऊ की जो भूमिका रही है वो किसी की नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी के 4 दुर्दांत सेना नायकों में से सिर्फ़ एक कालिन कैंपबेल ही यहां से सही सलामत लौट पाया था। लखनऊ का कातिल हेनरी लारेंस, कानपुर का ज़ालिम जनरल नील, दिल्ली का धूर्त नृशंस मेजर हडसन तीनों लखनऊ में यहां के क्रांतिकारियों द्वारा मार गिराए गए। और लखनऊ का मूसाबाग, सिकंदरबाग, आलमबाग, दिलकुशा, कैसरबाग, रेज़ीडेंसी के भवन हमारे पूर्वजों की वीरता के गवाह हैं। साइमन कमीशन का जैसा विरोध लखनऊ ने किया , किसी ने नहीं। जहां साइमन कमीशन की बैठक चल रही थी , वहां पूरी किलेबंदी थी। ऐसी कि हवा भी न जा सके। पर लखनऊ के लोगों ने पतंग पर अपना विरोध दर्ज कर पतंग उड़ाते हुए उस बैठक में पतंग गिरा कर अपना विरोध दर्ज करवाया था। काकोरी कांड को लोग कैसे भूल सकते हैं भला। काकोरी की ऐतिहासिक घटना ने भारतीय क्रांतिकारियों के साहस और देशप्रेम की कथा को आज भी लोग याद कर के पुलकित हो जाते हैं। चलती ट्रेन से अंगरेजों का खजाना लूटने वाले रामप्रसाद बिस्मिल , अशफाकुल्ला खां , राजेंद्र लाहिड़ी , रोशन सिंह , चंद्रशेखर आज़ाद जैसे क्रांतिकारियों की कीर्तिगाथा आज भी मन में ताज़ा है। बीते कारगिल युद्ध में भी लखनऊ के परमवीर चक्र विजेता मनोज पांडेय , महावीर चक्र विजेता सुनील जंग , युद्धवीर केवलानंद द्विवेदी तथा कीर्तिवीर ऋतेश शर्मा ने अपने प्राणो की आहुति दे कर लखनऊ का मस्तक ऊंचा किया। 

लखनऊ का कथक घराना विश्वविख्यात है। महाराज बिंदादीन और कालकादीन के कथक नृत्य कौशल की कथाएं लोक  में ही नहीं तमाम पुस्तकों में भी दर्ज हैं। कुदऊ सिंह ने पखावज वादन में और अहमदजान थिरकुआ ने तबला वादन में प्रसिद्धि पाई थी। नृत्य के क्षेत्र में ननहुआ , बचुआ और बड़ी जद्दन , छोटी जद्दन ने भी खूब ख्याति बटोरी थी। अल्लारक्खी का मुजरा सुनने तो निराला जी भी जाया करते थे। बेगम अख्तर की ग़ज़ल गायकी लखनऊ में ही परवान चढ़ी थी। 

हिंदी की पहली कहानी रानी केतकी की कहानी यहीं लखनऊ के लाल बारादरी भवन के दरबार हाल में सैय्यद इंशा अल्ला खां इंशा द्वारा लिखी गई। उर्दू का विश्वविख्यात उपन्यास उमराव जान अदा यहां मौलवीगंज में सैय्यद इशा अल्ला खां इंशा द्वारा लिखा गया। हिदुस्तान का पहला ओपेरा इंदर-सभा यहां गोलागंज में मिर्ज़ा अमानत द्वारा लिखा गया। मामूली से मामूली को बडा़ से बडा़ रुतबा देना लखनऊ का मिजाज है। दूर-दूर के लोगों तक को अपना बना लेने का हुनर लखनऊ के पास है। उर्दू शायरी का लखनऊ स्कूल आज भी दुनिया में लाजवाब है। मीर तकी मीर , मजाज लखनवी जैसे शायर , नौशाद , मदनमोहन जैसे संगीतकार , तलत महमूद , अनूप जलोटा जैसे गायक लखनऊ की ही देन हैं। मुंशी नवलकिशोर प्रेस द्वारा प्रकाशित उर्दू , अरबी ,फ़ारसी , आदि भाषाओँ की पुस्तकें दुनिया भर में मशहूर हुईं। तमाम फ़िल्मों की कथाओं और लोकेशन में लखनऊ खूब शुमार है। उमराव जान जैसी नायाब फिल्म के निर्देशक मुज़्ज़फ़्फ़र अली लखनऊ में ही रहते हैं। यशपाल , भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर जैसे उपन्यासकारों की त्रिवेणी लखनऊ में ही रहती थी। अमृतलाल नागर चौक में रहते थे और अपने को चौक यूनिवर्सिटी का वाइस चांसलर कहते थे। इस लिए भी कि अपनी कहानियों , उपन्यासों में वह लखनऊ उस में भी चौक की कथा ही कहते थे। प्रेमचंद , निराला और पंत जैसे लेखकों और कवियों ने लखनऊ में अपनी रचनाधर्मिता के कई पाठ लिखे हैं। सरस्वती के संपादक रहे पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी लखनऊ के खुर्शीदबाग़ में ही रहे। प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी की कर्मभूमि रही है लखनऊ। अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी पत्रकारिता , कविता और राजनीति का लंबा समय लखनऊ में जिया। यहीं से चुनाव लड़ कर , जीत कर वह तीन बार प्रधान मंत्री बने। 

गोमती नदी के किनारे बसा लखनऊ अब गोमती नदी के दोनों तरफ इस तरह बसा दीखता है गोया आजू-बाजू दो भुजाएं हों उस की। गरज यह कि गोमती नदी अब लखनऊ के बीच से बहती है। लखनऊ कभी बागों का शहर था। चारबाग़ , आलमबाग़ , मूसाबाग़ , कैसरबाग़ , विलायतीबाग़ , ऐशबाग़ , ख़ुर्शीदबाग़ , सिकंदरबाग़ , बनारसीबाग़ , डालीबाग़ जैसी जगहें अभी भी इस की गवाही देती हैं। अपने नवाबी अंदाज़ , सलीक़े , मुग़लिया खाना , किसिम-किसिम के कबाब  , चिकन के कपड़ों , जरदोजी के काम के लिए जाने जाना वाला यह लक्ष्मणपुरी से लखनऊ बनने वाला लखनऊ अब नवाबों की नगरी से आगे अब आई. टी. हब बनने की ओर बड़ी तेज़ी से अग्रसर है। बड़े-बड़े कारपोरेट हाऊस हैं यहां । आधुनिक शिक्षा का बड़ा केंद्र भी है अब लखनऊ । दर्जनों विश्वविद्यालय , मेडिकल कालेज , इंजीनियरिंग कालेज हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी होने के कारण राजनीति का बड़ा केंद्र है लखनऊ । बड़ी-बड़ी आलीशान हवेलियों के लिए जाने जाने वाले इस लखनऊ में भी अब गगनचुंबी इमारतों की इफरात है। मेट्रो की रफ़्तार है। योगेश प्रवीन लखनऊ के बारे में लिखते हैं :

लखनऊ है तो महज़, गुंबदो मीनार नहीं

सिर्फ़ एक शहर नहीं, कूच और बाज़ार नहीं

इस के आंचल में मुहब्बत के फूल खिलते हैं

इस की गलियों में फ़रिश्तों के पते मिलते हैं


कृपया इस लेख को भी पढ़ें 


1 - लखनऊ का रंग और रुआब 

Friday, 2 September 2022

लखनऊ का रंग और रुआब

दयानंद पांडेय 

फ़ोटो : रवि कपूर 

इंडिया में एक प्रदेश उत्तर प्रदेश की राजधानी है लखनऊ। राजा राम के प्राचीन कोसल राज्य का यह हिस्सा था कभी। राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को इसे सौंप दिया था। पहले इस का नाम लक्ष्मणपुरी था। बदलते-बदलते लखनपुरी  हुआ फिर लखनपुर और अब लखनऊ। लखनऊ बहुत शानदार शहर है। यहां का लजीज खाना और नवाबी नज़ाकत की कहानियां बहुत हैं। लखनऊ की ऐतिहासिक इमारतों की अपनी ही शान है। लखनऊ का चिकन का कपड़ा भी दुनिया भर में मशहूर है। जैसे दिल्ली में लाल क़िला है , पुराना क़िला है , कुतुबमीनार है। वैसे ही लखनऊ में लक्ष्मण टीला है। बड़ा इमामबाड़ा है। हुसैनाबाद इमामबाड़ा है जिसे छोटा इमामबाड़ा भी कहते हैं। रूमी दरवाज़ा है। घंटाघर है। रेजीडेंसी है। बनारसी बाग़ है। दिलकुशा है। और भी बहुत कुछ। 

बड़ा इमामबाड़ा में एक भूलभुलैया भी है। अगर आप लखनऊ आए और भूलभलैया नहीं देखा तो क्या देखा। 1784 में अवध के नवाब आसफउद्दौला ने इस भूलभुलैया को बनवाया था। एक जैसे घुमावदार रास्ते ही इस की खासियत है। लोग कहते हैं दीवार के कान नहीं होते। पर भूलभुलैया की दीवारों के कान भी हैं। कहीं भी कुछ भी कोई बोले , कितना भी धीरे से बोले , फुसफुसा कर बोले , सब को , सब तरफ सुनाई देता है। कहीं कोई दियासलाई भी जलाए तो सभी को पता चल जाए। भूलभुलैया के दीवारों की नक्काशी और कलाकारी भी खूब है। भूलभुलैया की दीवारें सीमेंट , सरिया से नहीं बनाई गई हैं। इन दीवारों को उड़द व चने की दाल , सिंघाड़े का आटा , चूना , गन्ने का रस , गोंद , अंडे की जर्दी , सुर्खी यानी लाल मिट्टी , चाश्नी , शहद , जौ का आटा और लखौरी ईंटों से बनाया गया है। भूलभुलैया के बीचोबीच बने पर्शियन हाल की लंबाई 165 फ़ीट है। बिना किसी अतिरिक्त पिलर के। आसफउद्दौला ने इस भूलभुलैया को असल में सुरक्षा कारणों से बनवाया था। यहां सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे। भूलभुलैया का एक हिस्सा जलमहल भी है। इसी जलमहल में खजाना  रखा जाता था। भूलभुलैया में खड़े हो कर सीधे गोमती नदी के उस पार दूर-दूर तक देखा जा सकता था कि कोई आक्रमणकारी तो नहीं आ रहा। भूलभुलैया से कई सुरंगें भी कई शहरों को जाती थीं , ऐसा कहते हैं। अब सभी सुरंगें बंद हैं। और जलमहल भी। कहा जाता है कि भयानक अकाल से परेशान जनता की मदद के लिए आसफउद्दौला ने इस भूलभुलैया को बनवाया था। यह वही इमामबाड़ा है जहां नवाब वाजिदअली शाह को अंगरेजों ने गिरफ्तार किया था और उन्हें कोलकाता ले गए। वाजिदअली शाह ने यहीं मशहूर गीत बाबुल मोरा नइहर छूटो ही जाए तभी लिखा था। 

बड़ा इमामबाड़ा से थोड़ी ही दूर पर हुसैनाबाद इमामबाड़ा है जिसे छोटा इमामबाड़ा भी कहते हैं। यह आज भी सजा-संवरा दीखता है। इसे अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह ने बनवाया था। 1837 और 1842 के बीच मुहम्मद अली शाह ने अवध में शासन किया। इसी बीच उन्हों ने इसे बनाया। छोटे इमामबाड़े का सबसे बड़ा आकर्षण है, इस भवन में सजे हुए बेल्जियम कांच की कीमती झाड़ फानूस, कंदीलें, दीवारगीरियां और शमादान। इमामबाड़े पर कमरखीदार सुनहरा गुम्बद है, जिसके बुर्जों की खूबसूरती देखते बनती है। रूस के एक टूरिस्ट ने इसे क्रेमलिन ऑफ इंडिया भी कहा था। 

जैसे दिल्ली में इंडिया गेट है। मुंबई में गेट वे आफ इंडिया है। वैसे ही लखनऊ में रूमी दरवाज़ा है। लखनऊ का प्रवेश द्वार। इसे तुर्कीश द्वार के नाम से भी जाना जाता है, जो 13 वीं शताब्‍दी के महान सूफी फकीर, जलाल-अद-दीन मुहम्‍मद रूमी के नाम पर पड़ा था। सन् 1784 में 60 फुट ऊंचे रूमी दरवाज़ा का निर्माण भी कहते हैं अकाल के दौरान ही लोगों की मदद के लिए आसफउद्दौला ने बनवाया था। आसफउद्दौला के इस तरह लोक कल्याणकारी कामों के कारण ही एक उक्ति बहुत मशहूर है। जिसे न दे मौला , उसे दे आसफउद्दौला ! न्‍यूयार्क टाइम्‍स के संवाददाता रसेल ने कभी लिखा था कि रूमी दरवाजा से छत्‍तर मंजिल तक का रास्‍ता सब से खूबसूरत और शानदार है जो लंदन, रोम, पेरिस और कांस्‍टेंटिनोपल से भी बेहतर दिखता है। 

वैसे तो भारत के तमाम शहरों में घंटाघर है। दिल्ली में भी। लेकिन लखनऊ का घंटाघर भारत का सब से ऊंचा घंटाघर बताया जाता है। 1887 में 221 फीट ऊंचे इस घंटाघर का निर्माण नवाब नसीरूद्दीन हैदर ने सर जार्ज कूपर के आगमन पर करवाया था। वे संयुक्त अवध प्रांत के प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। इसे ब्रिटिश वास्तुकला के सब से बेहतरीन नमूनों में माना जाता है। गोमती नदी के किनारे रेज़ीडेंसी का निर्माण भी 1775 में अंग्रेजों को रहने के लिए आसफुद्दौला ने शुरू करवाया था जिसे नवाब सादत अली खान द्वारा पूरा किया गया। 33 एकड़ में फैले रेजीडेंसी में अंग्रेजों ने अपना मुख्यालय बनाया था। रेजीडेंसी में कई सारी ऐतिहासिक इमारतें हैं। रेजीडेंसी का इतिहास बताने के लिए यहां आज भी एक म्यूजियम है। लगभग खंडहर में तब्दील होती रेजीडेंसी पर्यटकों की फिर भी प्रिय जगह है। रेजीडेंसी में अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर अत्याचार की हज़ारों कहानियां दफ़न हैं। तमाम तहखानों वाले इस रेजीडेंसी में अंगरेजों का तोपखाना , ट्रेजरी भी था। फांसी घर भी। यहां भयानक लड़ाई हुई थी अंगरेजों और स्वतंत्रता सेनानियों के बीच। 

नवाब वाज़िदअली शाह की बेग़म हजरतमहल ने अंगरेजों के खिलाफ बड़ी निर्णायक लड़ाई लड़ी थी और कोलकाता तक लड़ने गई थीं। उन की याद में बेगम हज़रत महल पार्क रेजीडेंसी से थोड़ी दूर पर ही बनाया गया है। दिलकुशा भी लखनऊ की महत्वपूर्ण जगह है। 1800 में इसे नवाब के दोस्त ब्रिटिश मेजर गोर आस्ले ने बनवाया था। इस भव्य कोठी की खासियत है कि इस में कोई एक आंगन नहीं है। तब जब कि उन दिनों आंगन का खूब चलन था। इंग्लैण्ड के नार्थम्बरलैंड के सिटान डेलवाल हॉल के पैटर्न पर बनाई गई दिलकुशा कोठी गोमती नगर के किनारे है। नवाबों के शिकार लॉज के रूप में इस का खूब इस्तेमाल हुआ। अब दिलकुशा भले खंडहर में तब्दील है पर खंडहर बताते हैं कि इमारत कभी बुलंद थी। 

हिंदी और उर्दू के तमाम मशहूर लेखकों के लिए जाने जाने वाला लखनऊ बागों का भी शहर है। चारबाग , कैंसरबाग़ , आलमबाग , खुर्शीदबाग , डालीबाग , ऐशबाग , सिकंदरबाग , बनारसीबाग़ जैसे तमाम नाम हैं। पर अब यह सारे बाग़ मुहल्लों में बदल गए हैं और लोग यहां रहते हैं। बनारसीबाग़ में ही अब चिड़ियाघर है। जब कि सिकंदरबाग़ में नेशनल बॉटोनिकल गार्डेन का मुख्यालय है। हां , अब कुछ नए पार्क बने हैं। बहुत आलिशान और भव्य पार्क। अंबेडकर पार्क , लोहिया पार्क , जनेश्वर मिश्र पार्क , कांशीराम पार्क और रमाबाई पार्क। जनेश्वर मिश्र पार्क एशिया के सब से बड़े पार्क में शुमार है। जब कि रमाबाई पार्क दुनिया का सब से बड़ा पार्क है , जहां एक साथ पांच लाख लोग एक साथ इकट्ठा हो सकते हैं। दुनिया में अभी ऐसी कोई दूसरी जगह नहीं है जहां एक साथ पांच लाख लोग इकट्ठा हो सकें। लखनऊ की बात हो और यहां के दशहरी आम का ज़िक्र न हो , यह हो ही नहीं सकता। मलीहाबाद के दशहरी आम की मिठास और खुशबू दुनिया भर में मशहूर है। लखनऊ की रेवड़ी , गजक जैसी मिठाइयां भी बहुत मशहूर हैं। कुल्फी फालूदा भी। पान मलाई के तो कहने ही क्या। लखनऊ के टुंडे के कबाब और सींक कबाब भी बहुत मशहूर हैं। लखनऊ में अब मेट्रो भी है , गगनचुंबी इमारतें भी। लखनऊ अब आई टी हब बनने की तरफ बहुत तेज़ी से अग्रसर है। दिल्ली में अगर चांदनी चौक है तो लखनऊ में उसी की तरह अमीनाबाद है। दिल्ली में अगर कनॉट प्लेस है तो लखनऊ में हज़रतगंज है। दिल्ली में नई दिल्ली है तो यहां  भी नया लखनऊ है। शानदार एयरपोर्ट है। कई सारे रेलवे स्टेशन और अंतरराज्यीय बस अड्डे हैं। एक से एक शानदार और रुआबदार मॉल और वेब हैं। 

लखनऊ जब बसा था तो गोमती नदी के किनारे बसा था। पर अब लखनऊ को देख कर लगता है कि लखनऊ गोमती नदी के किनारे नहीं , गोमती नदी अब लखनऊ के बीच से बहती है। जैसे लंदन में टेम्स नदी। लखनऊ का वैभव अब लंदन से कम भी नहीं। रहते थे कभी यहां नवाब , और अंगरेज भी। पर अब यहां अंगरेजी जानने वाले अंगरेजियत में तर-बतर लोग भी बेशुमार मिलते हैं। नवाब और उन की नवाबी तो बस अब क़िस्से कहानियों में दफ़न हैं। लखनऊ अब राजनीति का गढ़ है। दिल्ली और देश की राजनीति की दशा और दिशा भी अकसर यहीं से तय होती है। 


कृपया इस लेख को भी पढ़ें 


1 - स्वयं को मिटा कर औरों के लिए होना ही है , पहले आप ! और यह लखनऊ सिखाता है 

Monday, 29 August 2022

नोएडा के बिल्डर अफ़सरों को ही नहीं मुख्यमंत्रियों को भी अपनी ज़ेब में रखते हैं , सुप्रीम कोर्ट जान ले और योगी भी अपने को जांच लें !

दयानंद पांडेय 



कहते हैं कि मनी में बहुत पावर होता है। इसी लिए इस मनी के दम पर बिल्डर अफ़सरों को ही नहीं मुख्यमंत्रियों को भी अपनी ज़ेब में रखते हैं। मायावती तब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं। नोएडा एक्सटेंशन जो अब ग्रेटर नोएडा वेस्ट नाम से प्रचलित है का काम बड़ी तेज़ी से चल रहा था। मथुरा का एक बिल्डर राम अग्रवाल भी मायावती से मिला। मायावती तब प्रति एकड़ दो करोड़ रुपए की रिश्वत खुलेआम का रेट खोले हुई थीं। अथॉरिटी को निर्धारित पैसा अलग था। इस बिल्डर राम अग्रवाल ने मायावती को पचास एकड़ के लिए सौ करोड़ रुपए एडवांस रिश्वत के मद में दे दिया। पर जब ज़मीन आवंटित हुई तो सैतालिस एकड़ ही हुई। बिल्डर राम अग्रवाल भागा-भागा मायावती के पास लखनऊ आया। बताया कि पैसे तो पचास एकड़ के लिए दिए थे। तीन एकड़ कम मिला है। सुन कर मायावती मुस्कुराईं। बोलीं , ' अब तो जो होना था , हो गया। ' बिल्डर राम अग्रवाल गिड़गिड़ाया , ' बहुत नुकसान हो जाएगा ! ' मायावती फिर मुस्कुराईं। पूछा , ' कितने मंज़िल का नक्शा है तेरा ? ' बिल्डर राम अग्रवाल बोला , ' 15 मंज़िल का। ' मायावती ने कहा , ' चल 19 मंज़िल बना ले ! ' वह बोलीं , ' तेरा नुकसान बराबर हो जाएगा। ' बिल्डर ख़ुशी-ख़ुशी लखनऊ से लौट गया। 19 मंज़िल के 20-22 अपार्टमेंट बना लिए इस 47 एकड़ की ज़मीन पर। प्लाट नंबर है जी एच - 05 , सेक्टर 16 बी , ग्रेटर नोएडा वेस्ट - 201310 उत्तर प्रदेश। कंपनी का नाम है एम / एस एस जे पी इंफ्राकन लिमिटेड। सोसाइटी का नाम है श्री राधा स्काई गार्डन। 

श्री राधा स्काई गार्डन में अब 15 की जगह 19 मंज़िल के 20 -22 अपार्टमेंट बन कर खड़े हैं। 25-30 परसेंट लोग रहने भी आ गए हैं। ज़्यादातर लोग जो नहीं आए हैं , वह इनवेस्टर लोग हैं। या कब्ज़ा नहीं मिला है। ज़्यादातर काला धन को सफ़ेद करने वाले इनवेस्टर। मतलब नौकरशाह आदि लोग हैं। इन लोगों ने भी  अपने दूर या नज़दीक़ के परिजनों के नाम पर फ़्लैट बुक कर छोड़ दिए हैं। बड़े-बड़े नौकरशाहों का काला धन राम अग्रवाल की कंपनी में लगा हुआ है। काला धन सफ़ेद करने की फैक्ट्री है यह बिल्डर राम अग्रवाल। मैंने भी इस श्री राधा स्काई गार्डन में एक फ़्लैट ले रखा है। पहले यह फ़्लैट एक इनकम टैक्स कमिश्नर का था। पर उस ने अपने नाम से नहीं बुक किया था। अपने पिता और सास के नाम से ज्वाइंट बुक कर रखा था। फ़्लैट ख़रीदने के पहले बिल्डर से लाख कहा कि एक बार जिस का फ़्लैट है , उस से मिलवा दीजिए। पर बिल्डर ने कहा कि , ' सर आप को जानते हैं। मिलना नहीं चाहते। ' मैं ने पूछा , ' क्यों ? दिक़्क़त क्या है ? ' बिल्डर बोला , ' उन्हें डर है कि आप उन से पैसे कम करने का दबाव बनाएंगे। और वह आप की बात टाल नहीं पाएंगे। फिर आप के सामने वह पड़ना भी नहीं चाहते। ' बिल्डर ने उस इनकम टैक्स के पिता का एकाउंट नंबर दिया। मैं ने आर टी जी एस के मार्फ़त उस अकाउंट में पैसा जमा कर दिया। बिल्डर ने रजिस्ट्री करवा दी। वह ख़ुश था कि नंबर एक में पैसा मिल गया। मेरे फ़्लैट की रजिस्ट्री तो ख़ैर पैसा देने के पंद्रह दिन बाद ही हो गई। पर ऐसे बहुत से लोग हैं , जिन का पूरा पैसा जमा है। पर बिल्डर रजिस्ट्री नहीं कर रहा। यहां तक तो न ठीक होते हुए भी सब ठीक था। पर अब जो थोड़े-बहुत लोग रहने लगे हैं , उन की भी कोई सुनने वाला नहीं है। न कोई रेरा , न कोई अथॉरिटी। न कोई मंत्री , न मुख्यमंत्री। तब जब कि श्री राधा स्काई गार्डेन के रेजीडेंट्स में कुछ सेलिब्रेटीज टाइप लोग भी हैं। कुछ मीडिया पर्सन भी। बड़े मीडिया घरानों में मशहूर लोग। अथॉरिटी के सी ई ओ हों या रेरा के बॉस लोग या एन पी सी एल के बाप लोग। सब के सब बिल्डर की ज़ेब में बैठ कर ऐश कर रहे हैं। 

बिल्डर ने 19 मंज़िल के तमाम अपर्टमेंट बना दिए। पर बीते पांच साल से बेसमेंट को गटर बना रखा है। सीवर का सारा पानी लीक हो कर यहीं हिंडन नदी बना रहता है। नतीज़तन समूची बिल्डिंग कमज़ोर हो रही है। कब धसक कर ट्विन टावर की तरह बैठ जाए , कोई नहीं जानता। लोगों की जान और बिल्डिंग ख़तरे में है तो रहे। बिल्डर की बला से। दूसरे , बेसमेंट में पार्किंग की जगह लोग इस्तेमाल नहीं कर पाते। क्यों कि यहां सीवर के जल की पार्किंग है। चहुं ओर बदबू ही बदबू। तब जब कि रजिस्ट्री के समय प्रति पार्किंग तीन लाख रुपए अलग से ले कर रजिस्ट्री की है बिल्डर ने। लेकिन लोग बाहर पार्किंग के लिए विवश हैं। बिल्डर ने क्लब , जिम , स्वीमिंग पुल आदि की सुविधा भी अभी तक नहीं दी है। यह सुविधाएं तो छोड़िए जब मन तब सिक्योरिटी गार्ड सारे गेट खुला छोड़ कर हड़ताल पर चले जाते हैं। क्यों कि उन्हें कभी समय से वेतन नहीं मिलता। हड़ताल करते हैं तो कुछ पैसा मिल जाता है। 

हर अपार्टमेंट में दो लिफ्ट हैं। एक लिफ्ट हरदम बंद रहती है। दूसरी लिफ्ट भी जब-तब विश्राम ले लेती है। लोग 19 मंज़िल की सीढ़ी चढ़ते-उतरते हैं। कैसे उतरते हैं , वह ही जानते हैं। कब कौन ऊपर लटक जाए , कौन नीचे फंस जाए , हरदम की यातना है यह। बिजली जब-तब हर हफ़्ते कट जाती है। यह तब है जब बिजली बिल की प्री पेड व्यवस्था है। लेकिन बिल्डर पर लाखों रुपए का बिजली बिल काफी समय से बकाया है। टोकन पेमेंट पर बिजली जुड़ती है। फिर कट जाती है। जेनरेटर भी किराए का है। डीजल हरदम समाप्त रहता है। तब जब कि जनरेटर वाली बिजली 22 रुपए प्रति यूनिट है। बाक़ी 7 रुपए यूनिट। लोड का शुल्क अलग से। लगभग रोज का 50 रुपए। भले अपने फ़्लैट में आप ताला बंद रखिए। यह बिल देना ही है। अजब डकैती है। सफाई स्टाफ , कूड़ा उठाने वाला स्टाफ भी कब हड़ताल पर चले जाएं , वह भी नहीं जानते। टोकन पेमेंट पर काम करते हैं बिचारे। वह भी समय से नहीं मिलता। ऐसे ही अनेक समस्याएं मुंह बाए रोज खड़ी रहती हैं। यह सब तब है जब लोगों ने दो साल का मेंटेनेंस चार्ज दो साल का एडवांस दे रखा है। अब बिल्डर बिना कोई सुविधा दिए मेंटेनेंस चार्ज एक्स्ट्रा वसूलने का दबाव बनाए हुए है। 

अब लोगों ने बिल्डर को अपनी तकलीफ़ बतानी शुरु की। एकल भी। समूह में भी। मथुरा जा-जा कर। लिखित भी , मौखिक भी। मीडिया में भी कहानियां आने लगीं। ख़बरों पर ख़बरें। प्रिंट में भी , इलेक्ट्रानिक में भी। पर जब आश्वासन का झुनझुना टूटता ही गया तो लोगों ने नोएडा अथॉरिटी की राह पकड़ी। शिकायतें दर्ज होने लगीं। तीन-चार साल से अथॉरिटी भी मीटिंग करती है , सो जाती है। तमाम लोग रेरा में भी याचिका दायर कर चुके हैं। पर रेरा और अथॉरिटी ने भी श्री राधा स्काई गार्डेन के निवासियों को प्रकारांतर से बता दिया है कि आप लोग आदमी नहीं , झुनझुना हैं। हम जब-तब बजाते रहेंगे। आप बजते रहिए। बता दिया कि हम बिल्डर की जेब में हैं , सो लाचार हैं। दो साल पहले लोग एन पी सी एल गए। कि कम से कम बिजली के मामले में तो बिल्डर से मुक्त हो जाएं। पर दुनिया भर के सर्वे और फ़ार्म वगैरह भरवाने की क़वायद के बाद एन सी पी एल ने भी बता दिया लोगों को कि तुम लोग आदमी नहीं , झुनझुने हो। किसी को कोई कनेक्शन नहीं मिला बिजली का। एन पी सी एल ने भी बता दिया कि हम बिल्डर की जेब में हैं , सो लाचार हैं। 

श्री राधा स्काई गार्डेन के लोगों को बहुत उम्मीद थी की योगी राज में उन की ज़रुर सुनवाई होगी। क्षेत्रीय विधायक  भी आए और झुनझुना बजा कर चले गए। सारी फ़रियाद श्री राधा स्काई गार्डेन के बेसमेंट के गटर में सड़ गई। बाद में लोगों को समझ आया कि मथुरा का श्रीकांत शर्मा जो तब ऊर्जा मंत्री था , बिल्डर राम अग्रवाल ने उसे ख़रीद लिया था । श्रीकांत शर्मा कहीं कुछ होने ही नहीं देता था। पर योगी राज - दो में भी सब कुछ ढाक के तीन पात है। संयोग देखिए कि आवास मंत्रालय का विभाग मुख्यमंत्री योगी के ही पास है। तो इतना कोहराम मचने के बाद योगी के कान पर जूं क्यों नहीं रेंग रही ? क्या राम अग्रवाल ने योगी को भी मैनेज कर लिया है ? ऊर्जा मंत्री अरविंद शर्मा क्या कर रहे हैं ? कि श्रीकांत शर्मा की तरह अरविंद शर्मा भी बिक गए हैं ?

दिलचस्प यह कि श्रीराधा स्काई गार्डन की यह कथा सिर्फ़ श्री राधा स्काई गार्डेन की ही नहीं है। सेक्टर 16 -बी ग्रेटर नोएडा वेस्ट की सभी सोसाइटियों की है। हर कहीं बस एक ही समस्या , एक ही शोर। पर सभी बिल्डरों ने नोएडा अथॉरिटी , रेरा और एन पी सी एल को बेभाव ख़रीद रखा है। सभी का महीना बंधा हुआ है। योगी राज में भ्रष्टाचार की खुली किताब है , नोएडा अथॉरिटी , रेरा और एन पी सी एल। ग्रेटर नोएडा वेस्ट की सारी सोसाइटियांइस की गवाह हैं। 

आज एक चैनल पर ट्विन टावर वाले सुपर टेक का एक निदेशक आर के अरोड़ा ने इंटरव्यू में जिस ठसक के साथ बार-बार नोएडा अथॉरिटी का ज़िक्र किया और बताया कि उस ने जो भी किया था , अथॉरिटी की स्वीकृति के बाद ही किया था। एंकर पूछती रही कि नोएडा अथॉरिटी को कैसे आप ने मैनेज किया ? इस सवाल को मुसलसल टालता रहा आर के अरोड़ा। गौरतलब है की सुप्रीमकोर्ट ने साफ़ कहा है कि नोएडा अथारिटी नोएडा एक भ्रष्ट निकाय है इसकी आंख, नाक, कान और यहां तक कि चेहरे तक से भ्रष्टाचार टपकता है। योगी जी , आंख, नाक, कान और यहां तक कि चेहरे इस टपकते भ्रष्टाचार पर बुलडोजर कब चलेगा। ग्रेटर नोएडा वेस्ट के लाखो नागरिक इस बुलडोजर की प्रतीक्षा में हैं। इन भ्रष्ट अफसरों और राम अग्रवाल जैसे बिल्डरों को जेल भेजिए। इन की काली कमाई को ज़ब्त कीजिए। याद कीजिए यह वही नोएडा अथॉरिटी है , जिस की सी ई ओ रही नीरा यादव महाभ्रष्ट कहलाईं और अदालत में भ्रष्टाचार सिद्ध होने पर सज़ायाफ़्ता हुईं। जेल गईं। 

Sunday, 28 August 2022

यश:प्रार्थी लोग ही विजयी लोग हैं

दयानंद पांडेय

यश:प्रार्थी एक युवा कवि आज घर पर मिलने आए । अभी-अभी लखनऊ में एक कविता पुस्तक विमोचन का कार्यक्रम देख कर अभिभूत थे और अपनी कविता पुस्तक के लिए खर्चा भी जोड़ रहे थे । खुद ही बता रहे थे कि मान लीजिए पचास हज़ार रुपए पुस्तक प्रकाशित करवाने में लग जाएंगे । पचास हज़ार रुपए का बजट वह पुस्तक विमोचन के आयोजन पर भी बता रहे थे । कह रहे थे ख़ूब धूम-धाम से करेंगे । फिर कुछ बड़े कवियों , आलोचकों को बाहर से बुलाने और उन के रहने , खाने-पीने , शराब आदि के लिए भी वह पचास हज़ार रुपए का बजट बताने लगे । कहने लगे कुछ बढ़ा भी देंगे । पचास से पचहत्तर भी हो सकता है । स्थानीय पत्रकारों के शराब और डिनर की चर्चा भी की । मैं ने उन से पूछा कि आप यह सब मुझे क्यों बता रहे हैं ? वह कहने लगे कि बस आप की राय जानना चाहता हूं । मैं ने कहा कि मेरी राय तो यह है कि एक तो पैसा खर्च कर कविता-संग्रह छपवाने की कोई ज़रूरत नहीं है । दूसरे , अपना पैसा खर्च कर अपनी झूठी तारीफ करवाने के लिए पुस्तक विमोचन कार्यक्रम आयोजित कर इतना पैसा पानी में मत बहाइए । न ही झूठी तारीफ करने के लिए बाहर से कवियों , आलोचकों को भाड़े पर बुलाइए । न यह ड्रामा कीजिए । वह किंचित दुखी होते हुए बोले , आप तो सर , मेरे इरादे पर ही पानी डाल दे रहे हैं । मैं ने कहा कि आप ने राय मांगी तो सही राय दे दी । आप मत मानिए । किसी डाक्टर ने थोड़े कहा है कि आप मेरी राय मानिए ही मानिए । मैं ने उन्हें स्पष्ट बताया कि मैं ने पैसा दे कर कभी कोई किताब नहीं छपवाई । न ही किसी किताब का कभी कोई विमोचन आदि करवाया है । अब तो समीक्षा के लिए भी कहीं किताब नहीं भेजता । क्यों कि यह सारी चीज़ें , लेखक को अपमानित करने वाली हो चुकी हैं । सो हो सके तो आप भी इस सब से बचिए । क्यों कि दिल्ली , लखनऊ से लगायत पूरे देश में हिंदी जगत का यही वर्तमान परिदृश्य है । खास कर अगर वक्ता अध्यापक है तो वह पुस्तक पर न बोलते हुए भी , दाएं-बाएं बोलते हुए भी अपने अध्यापन के बूते लंबा बोलते हुए लेखक का इगो मसाज अच्छा कर लेता है । इस विमोचन में भी यही सब हुआ । अध्यापक वक्ताओं की बहार थी । बल्कि एक लेखक ने तो संचालिका से चुहुल करते हुए कहा भी कि आप ख़राब कविताएं भी बहुत अच्छा पढ़ती हैं । वह नाराज होने के बजाय हंस पड़ीं ।  

लेकिन उन युवा कवि पर पुस्तक छपवाने और विमोचन का जैसे भूत सवार था । मैं ने आजिज आ कर उन से पूछा कि क्या कविताएं भी पैसा खर्च कर लिखवा रहे हैं ?  वह भड़क गए । बोले , लिखना मुझे आता है । मैं ने उन से कहा कि चलिए आप के पास पैसा है , आप यह सब कर भी लेंगे । लेकिन कोई क़ायदे का कवि या आलोचक आप की कविता की तारीफ करने आएगा भी क्यों ? आप संपादक हैं क्या कि सब को बटोर लेंगे ? कि आप पुलिस अफ़सर हैं कि आई ए एस अफ़सर ? कि कोई सुंदर स्त्री ? कि किसी लेखक संघ के धंधेबाज पदाधिकारी हैं , सदस्य हैं , कि कोई गिरोहबाज लेखक हैं कि लोग अपना मान-सम्मान भूल कर भागे-भागे आ जाएंगे ? वह एक विद्रूप हंसी हंसे । कहने लगे एक एयर टिकट , या रेल का ए सी टिकट , होटल में रहने , शराब की बात पर हर कोई आ जाता है । बड़े से बड़ा भी । कविता कैसी भी हो तारीफ़ के पुल बांध कर जाता है । मैं ने कहा कि तारीफ़ के पुल बांधने वाले दिग्गजों ने बीते विमोचन कार्यक्रम में कितनी बात उस कवि की कविता पर की और कितनी बात कवि के बारे में की । और कितनी बात इधर-उधर की , की आप को याद है ? वह बरबस हंस पड़े । बोले यह तो ठीक है पर एक समां तो बंध ही गया न ! 

मैं ने उन से कहा कि कमज़ोर कविताओं पर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले दिग्गजों से पूछिएगा कभी कि आप उन कविताओं पर क्या इतना हर-भरा लिख कर कहीं छपवा भी सकते हैं ? देखिएगा सभी के सभी तो नहीं पर ज्यादातर कतरा जाएंगे । नामवर जैसे लोग भी बोलते बहुत थे कभी विमोचन कार्यक्रमों में लेकिन उन किताबों पर लिखते नहीं थे कभी । और कई बार तो बहुत दबाव में आ कर वह कार्यक्रम में आ तो जाते थे पर अप्रिय भी बोल जाते थे । जैसे गोरखपुर में किसी कार्यक्रम में एक ग़ज़ल संग्रह का विमोचन करते हुए बोल गए कि फ़िराक के शहर में कुत्ते भी शेर में भौंकते हैं । दूरदर्शन के पुस्तक समीक्षा कार्यक्रम में लंदन के एक लेखक के कहानी संग्रह पर वह अपमानजनक ही बोल गए । अशोक वाजपेयी के भी पुस्तक विमोचन , पत्रिका विमोचन के ऐसे अनेक किस्से हैं । कहूं कि तमाम स्थापित लेखकों के अनगिन किस्से । लखनऊ में नरेश सक्सेना भी विमोचन कार्यक्रमों में अटपटा और अपमानजनक बोल कर फज़ीहत उठाने के आदी हो चले हैं । विमोचित किताब पर अमूमन वह नहीं ही बोलते । इधर-उधर की बोलते हैं । अध्यापक हैं नहीं , सो जलेबी भी नहीं छान पाते ।लेकिन नरेश सक्सेना  को उस दिन सुन कर लगा कि वह मौक़ा और पात्र देख कर ही अटपटा और अपमानजनक बोलते हैं , हर जगह नहीं । वह जानते हैं कि कहां क्या बोलना है , और कहां क्या नहीं बोलना है । कम से कम उस दिन यही लगा । आदतन वह एक बार फिसले तो पर अचानक फिसलते-फिसलते भी बच लिए । फिसल कर हर-हर गंगे कहने से बच गए । बल्कि बचा ले गए अपने आप को । मेरा मानना है कि नरेश जी को पुस्तक विमोचन कार्यक्रमों में जाने से भरसक बचना चाहिए । इस लिए भी कि पुस्तक चाहे जितनी भी बकवास हो , उस का लेखक उस समय उस समारोह का दूल्हा या दुलहन होता है । और दुलहन या दूल्हा काना हो , अंधा हो , लंगड़ा हो , गंजा हो , बुड्ढा हो , जैसा भी हो उस की तारीफ ही की जाती है । अवगुण नहीं देखा जाता । नरेश जी अवगुण देखने लगते हैं । या फिर पुस्तक पर बात ही नहीं करते । चाय , समोसा की लोगों की तलब पर बात बताने लगते हैं । अपने बारे में बताने लगते हैं । दुनिया भर की कविताओं आदि की बात करते हैं पर विमोचित पुस्तक की बात नहीं करते । गरज यह कि दूल्हे की भरपूर उपेक्षा ही उन का मकसद दीखता है । यह उन की चिर-परिचित अदा है अब । नतीजतन पुस्तक का लेखक और उस के संगी-साथी कुढ़ते बहुत हैं । बाकी लोग मजा लेते हैं ।

यश:प्रार्थी युवा कवि अब सहज हो रहे थे । और किचकिचा कर कहने लगे कि इन को तो मैं बुलाऊंगा ही नहीं । फिर जब मैं ने उन्हें बताया कि पैसा खर्च कर समीक्षाएं आदि भी लिखवाई और छपवाई जाती हैं अब तो ।

क्या कह रहे हैं आप ? पूछते हुए युवा कवि उछल पड़े । मैं ने उन्हें कई सारे दृष्टांत दिए । वह बहुत चकित हुए तो मैं ने उन्हें बताया कि हंस में एक लेखिका की किताब पर एक नामी आलोचक की लिखी समीक्षा राजेंद्र यादव ने बतौर विज्ञापन छाप दी थी और पूरी प्रमुखता से । प्रकाशक ही पैसा ले कर किताब नहीं छापते , संपादक भी पैसा और देह भोग कर सब कुछ छापते हैं । पैसा और देह भोग कर लोग पुरस्कार भी दे रहे हैं । ऐसे पुरस्कृत और उपकृत कुछ नायक , नायिकाओं के नाम भी बताए । लेकिन वह यश:प्रार्थी युवा कवि भी घाघ निकले । बोले , इस दिशा में भी सोचता हूं सर ! मैं ने उन से कहा कि यह सब मैं ने आजमाने के लिए आप को नहीं बताया । इस लिए बताया कि इन सब चीज़ों से आप दूर रहिए । सिर्फ़ और सिर्फ़ रचनारत रहिए । अपनी रचना पर यकीन कीजिए । किसी नौटंकी आदि-इत्यादि में नहीं । क्यों कि रचा ही बचा रहता है । तिकड़मबाजी और शार्टकट आदि नहीं । सिर्फ़ बदनामी मिलती है इन सब चीज़ों से । वह मुझे शर्मिंदा करते हुए बोले , जब हमारे सीनियर लोग रास्ता बता और बना गए हैं तो इसे आजमाने में कोई हर्ज नहीं है । मेरे पांव छू कर आशीर्वाद लिए और ख़ुश हो कर वह बोले , बड़ी फलदायी रही आप से यह मुलाकात । और विजयी भाव लिए चले गए । वैसे भी आज की तारीख में यही और ऐसे ही लोग विजयी लोग हैं । इन मीडियाकर्स के घोड़े खुले हुए हैं , इन का अश्वमेघ यज्ञ जारी है । अनवरत ।


Saturday, 27 August 2022

यू ट्यूब पर एंकरिंग करना मतलब हस्त मैथुन करना है

दयानंद पांडेय 

ग़ालिब छुटी शराब के लेखक रवींद्र कालिया ने इसी किताब में लिखा है कि अकेले शराब पीना हस्त मैथुन करने जैसा है। मेरा मानना है कि यू ट्यूब पर एंकरिंग करना मतलब हस्त मैथुन करना है। ख़ुद ही पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर सारी भूमिका निभानी होती है। फिर कितने लोग देखते हैं , इन यू ट्यूबर को ? इन से हजारगुना ज़्यादा तो लोग लोकल गायकों , गायिकाओं को देख लेते हैं। यक़ीन न हो तो पुण्य प्रसून वाजपेयी , आशुतोष , अजीत अंजुम , दीपक शर्मा आदि तमाम जूनियर-सीनियर ऐंकरों का नर्क देख लीजिए। हाथ मलते देखते रहिए। अंदाज़ा लग जाएगा। कारवां गुज़र चुका है , बस गुबार बाक़ी है। तिस पर हिमालयी अहंकार अलग से। वह तो कहिए बीच-बीच में चुनाव आ जाता है। अखिलेश यादव जैसे थैलीशाह मिल जाते हैं। आलोक रंजन जैसे पूर्व नौकरशाह के मार्फ़त सैकड़ो करोड़ रुपए बंटवा देते हैं। जो जीत की नकली हवा बना देते हैं। तो हस्तमैथुन से थोड़ी फुर्सत मिल जाती है। बिस्तरबाज़ी हो जाती है। अरविंद केजरीवाल को भगत सिंह बनाने की लंतरानी याद आ जाती है। केजरीवाल भी जब-तब इन हस्त वीरों की व्यवस्था संभालते रहते हैं। 

कांग्रेस भी आगे-आगे ही रहती है इन हस्त वीरों को हाथ देने में। कुछ फाउंडेशन , कुछ एन जी ओ वगैरह भी हाथ दे देते हैं। देते ही रहते हैं। यू ट्यूब भी कुछ थमा देता है। रोटी-दाल चल जाती है। लेकिन जैसे हस्त मैथुन में दूसरों के भरोसे बहुत दूर तक नहीं चल सकते। यू ट्यूब के भरोसे भी बहुत दूर तक ऐश के साथ नहीं चल सकते। नहीं रह सकते। काले धन की गोद में बैठे किसी नामचीन बैनर के बिना ग्लैमर और ऐश की ज़िंदगी छूट जाती है। क्रांति-व्रांति की सारी सिलाई उखड़ जाती है। सारी खीर जल जाती है। समझ आ जाता है कि वह सब तो भ्रांति थी। सारा एजेंडा , सारी दलाली दिन में ही तारे दिखाने लगती है। गगन बिहारी बनने के बाद ज़मीन साफ़ दिखाई नहीं देती। 

यही सब छूटता देख रवीश कुमार ने कहा है कि वह बाथरुम में जैसे दरवाज़ा बंद कर गाना गा लेते हैं , वैसे ही बाथरुम से एंकरिंग भी कर लेंगे। कहीं बैठ कर , किसी चौराहे से भी एंकरिंग कर लेंगे। फ़ासिज्म यानी मोदी विरोध का नगाड़ा बजा लेंगे। गुड है यह भी। 

यह तो सभी जानते हैं कि हस्त मैथुन बिना बेडरुम के भी मुमकिन है। कहीं भी , कैसे भी। जैसे लोग लाल सिंह चड्ढा गर्ल फ्रेंड के साथ देखने गए और ख़ाली हाल पा कर जाने क्या-क्या कर के लौटे। ऐसे बहुत से वीडियो अब वायरल हैं। यह बिचारे नादान लोग नहीं जानते कि अब सारे मॉल वाले सिनेमा घरों में सुरक्षा के नाम पर सी सी टी वी भी लगे रहते हैं। सिनेमा हाल के भीतर घट रही हर घटना वाच होती है। रिकार्ड भी। तो अजब-ग़ज़ब मंज़र पेश आ रहे हैं। जो काम लोग पार्क में , कार में बैठ कर , एकांत देख कर करते हैं , लाल सिंह चड्ढा देखते हुए भी एकांत पा कर अंजाम दे गए हैं। हाल में बैठ कर भी फ़िल्म नहीं देखी , कुछ और-और किया। आप भी कीजिए। हाऊ कैन यू रोक ?

टी वी पर एंकरिंग करते हुए भी रवीश कुमार जब-तब कहते रहे हैं कि आप टी वी मत देखिए। लेकिन यह नहीं कभी कह सके कि आप टी वी मत देखिए , मैं भी टी वी छोड़ देता हूं। एंकरिंग छोड़ दे रहा हूं। गोदी मीडिया का प्रपंच चलाने वाला एन डी टी वी बहुत सी गोद में बैठा रहा है। यथा सोनिया गांधी , यथा पोंटी चड्ढा। यथा वामपंथी , यथा केजरीवाल। एजेंडा सेट करने और उसे हिट करने में एन डी टी वी अग्रणी रहा है ,सर्वदा। अच्छा कोई रवीश जैसे एजेण्डाबाज़ों से कभी क्यों नहीं पूछता कि , पूजनीय आप की इतनी मेहनत , इतनी नफ़रत और इतनी हाहाकारी लड़ाई , इतने ज़बरदस्त प्रतिरोध , इतनी फैन फॉलोइंग और जहरबाद के बावजूद फासिस्ट नरेंद्र मोदी के कितने बाल , कितने रोएं टूटे। फैसलाकुन क्यों नहीं हो पाए। जनमत क्यों नहीं बदल पाए। 

ई डी के हवाले से जेल भुगत रहे संजय राउत के शब्दों में जो पूछूं कि क्या-क्या उखाड़ लिया। याद कीजिए मुंबई के पाली हिल पर बने कंगना रानौत का घर तोड़ कर संजय राउत ने शिव सेना के अख़बार सामना में बैनर हैडिंग लगा कर छापा था , उखाड़ दिया ! तो जनाबे आली , 2014 से आप का फ़ासिस्ट दुश्मन निरंतर फूलता-फलता जा रहा है , उस का क्या-क्या उखाड़ लिया ? दिन-रात इसी एजेंडे के तहत अपनी ज़िंदगी नर्क बना ली है। मैग्सेसे की उपलब्धि के बावजूद चेहरा झुलस क्यों गया है। तमाम लोकप्रियता और शोहरत के बावजूद समय से पहले ही चेहरा वृद्ध दिखने लगा। यह कौन सा डिप्रेशन है। साथ में कुछ नशेड़ी बना लिए अपने। आप की तो यही दुकानदारी है। आप की दुकान तो चली। ख़ूब चली। पर जो दवा बेची , इस दुकान से वह दवा कारगर क्यों नहीं हुई इन आठ सालों में। भगत सिंह को याद करने के साथ ही पत्रकारिता में महामना मदनमोहन मालवीय और गणेश शंकर विद्यार्थी को भी याद कर लेने में नुकसान नहीं होता। सर्वदा नफ़रत के तीर चलाना , एकतरफा बात करना पत्रकारिता नहीं , कुछ और है।

तो ब्लैक मनी से चलने वाला एन डी टी वी अगर किसी और धन पिशाच के पास चला जा रहा है तो आप को पेचिश क्यों हो रही है हुजुरेआला ! यह पैसे की दुनिया है , बाज़ार है। ऐसे ही छल और कपट से चलती है। व्यवसाय में एजेंडा , नफ़रत और मनबढ़ई नहीं चलती। ट्रिक चलती है। सोनिया के सत्ता में आने का सपना दुर्योधन बन कर कभी पूरा नहीं हो सकता। लाक्षागृह बना कर सफलता अर्जित नहीं होती। द्रौपदी की साड़ी किसी दुशासन से नहीं उतरवाई जा सकती।  जुआ खेलेंगे तो भले ही धर्मराज युधिष्ठिर ही क्यों न हों , फ़ज़ीहत तो होगी ही। आप के एजेंडे की , आप  के नफ़रत की द्रौपदी की लाज तो लुटेगी। सीता का अपहरण कर आप सीता को नहीं पा सकते। सीता को पाने के लिए राम होना पड़ता है। राम का आचरण भी करना पड़ता है। राम की खिल्ली उड़ा कर रामराज की बात नहीं हो सकती। यक़ीन न हो तो एक बार आमिर ख़ान से पूछ लीजिए। इत्मीनान से पूछ लीजिए। हाथी के दांत बन गए हैं। सारी परफेक्टनेस जाने किस पॉकेट में चली गई है। खोजे नहीं मिल रही। आप की भी आप के पॉकेट में चली जाएगी। किसी भी की जा सकती है। इसी लिए एक समय बाद लोग ऐसे लोगों को भूल जाते हैं। देखिए कि राहुल गांधी से ज़्यादा मीम इन दिनों रवीश कुमार के बन रहे हैं। कहां तो रवीश को जन पत्रकारिता का प्रतीक बनना था। अफ़सोस कि इन दिनों वह लतीफ़ा और नफ़रत के प्रतीक बन कर उपस्थित हैं। 

जान लेना चाहिए कि कृत्रिम हवा चला कर , नकली हवा बना कर , सोनिया गांधी की गोदी में बैठ कर एक जोकर और लतीफ़ा को महानायक बना कर , राहुल गांधी के चरण चूम कर हवा महल तो बनाया जा सकता है , ख़याली पुलाव भी पकाया जा सकता है। गोदी मीडिया की गाली भी गढ़ी जा सकती है। हर असहमत को भक्त की गाली भी दी जा सकती है। बकौल समाजवादी नेता मुलायम परिवार के रौशन चिराग , पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव हाऊ कैन यू रोक ? पर स्वस्थ मीडिया और लोकतांत्रिक देश की मज़बूत बुनियाद तो नहीं ही बनाई जा सकती। नफ़रत के दाने बिछा कर कोई बहेलिया कुछ मानसिक रोगियों को फंसा तो सकता है , अपने बहेलिएपन पर नाज़ कर सकता है। पर किसी को कोई राह नहीं दे सकता। सिवाय कुछ घड़ी के अवसाद के। कोई माकूल प्राचीर नहीं बना सकता। ऐसे लोग अंतत : बुझ जाते हैं। वसीम बरेलवी याद आते हैं :

चराग़ घर का हो महफ़िल का हो कि मंदिर का 

हवा के पास कोई मस्लहत नहीं होती।

Monday, 15 August 2022

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे

दयानंद पांडेय 

लगभग सभी विधाओं में निरंतर लिखते रहने वाले रामदरश मिश्र आज 99 वर्ष के हुए। अगले वर्ष वह 100 बरस के हो जाएंगे। दिलचस्प यह है कि इस उम्र में भी न सिर्फ़ देह और मन से पूरी तरह स्वस्थ हैं बल्कि रचनाशील भी हैं। पत्नी का साथ भी भगवान ने बनाए रखा है। वह भी पूरी तरह स्वस्थ हैं। रामदरश मिश्र की इस वर्ष भी कुछ किताबें प्रकाशित हुई हैं। उन की याददाश्त के भी क्या कहने। नया-पुराना सब कुछ उन्हें याद है। जस का तस। अभी जब उन से फ़ोन पर बात हुई और उन्हें बधाई दी तो वह गदगद हो गए। वह किसी शिशु की तरह चहक उठे। भाव-विभोर हो गए। उन की आत्मीयता में मैं भीग गया। कहने लगे आप की याद हमेशा आती रहती है। चर्चा होती रहती है। कथा-गोरखपुर और कथा-लखनऊ के बारे में भी उन्हों ने चर्चा की। पूछा कि किताब कब आ रही है ? बताया कि अक्टूबर , नवंबर तक उम्मीद है। तो बहुत ख़ुश हो गए। कहने लगे इंतज़ार है किताब का। 


जब कथा-गोरखपुर की तैयारी कर रहा था तब उन्हों ने अपनी कहानी तो न सिर्फ़ एक बार के कहे पर ही भेज दी बल्कि गोरखपुर के कई पुराने कथाकारों का नाम और कहानी का विवरण भी लिख कर वाट्सअप पर भेजा। वह कोरोना की पीड़ा के दिन थे। पर वह सक्रिय थे। चार वर्ष पहले दिसंबर , 2018 में वह लखनऊ आए थे। उन के चर्चित उपन्यास जल टूटता हुआ पर आधारित भोजपुरी में बन रही फिल्म कुंजू बिरजू का मुहूर्त था। उस कार्यक्रम में रामदरश जी ने बड़े मान और स्नेह से मुझे न सिर्फ़ बुलाया बल्कि उस का मुहूर्त भी मुझ से करवाया। रामदरश जी को जब उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का शीर्ष सम्मान भारत भारती मिला तो मुझे भी लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास पर प्रेमचंद सम्मान मिला था। वह बहुत प्रसन्न थे। मंच पर खड़े-खड़े ही कहने लगे अपने माटी के दू-दू जने के एक साथ सम्मान मिलल बा। यह उन का बड़प्पन था। संयोग ही है कि रामदरश मिश्र के बड़े भाई रामनवल मिश्र के साथ भी मुझे कविता पाठ का अवसर बार-बार मिला है , गोरखपुर में। 

गोरखपुर में उन का गांव डुमरी हमारे गांव बैदौली से थोड़ी ही दूर पर है। इस नाते भी उन का स्नेह मुझे और ज़्यादा मिलता है। उन की आत्मकथा में , उन की  रचनाओं में उन का गांव और जवार सर्वदा उपस्थित मिलता रहता है। कोई चालीस साल से अधिक समय से उन के स्नेह का भागीदार हूं। साहित्य अकादमी उन्हें वर्ष 2015 में मिला। सरस्वती सम्मान इसी वर्ष मिला है। उम्र के इस मोड़ पर यह सम्मान मिलना मुश्किल में डालता है। यह सारे सम्मान रामदरश मिश्र को बहुत पहले मिल जाने चाहिए थे। असल बात यह है कि हिंदी की फ़ासिस्ट और तानाशाह आलोचना ने जाने कितने रामदरश मिश्र मारे हैं । लेकिन रचना और रचनाकार नहीं मरते हैं। मर जाती है फ़ासिस्ट आलोचना। मर जाते हैं फ़ासिस्ट लेखक। बच जाते हैं रामदरश मिश्र। रचा ही बचा रह जाता है। रामदरश मिश्र ने यह ख़ूब साबित किया है। बार-बार किया है। 

सोचिए कि रामदरश मिश्र और नामवर सिंह हमउम्र हैं। न सिर्फ़ हमउम्र बल्कि रामदरश मिश्र और नामवर सहपाठी भी हैं और सहकर्मी भी। दोनों ही आचार्य हजारी प्रसाद के शिष्य हैं। बी एच यू में साथ पढ़े और साथ पढ़ाए भी। एक ही साथ दोनों की नियुक्ति हुई। रामदरश मिश्र कथा और कविता में एक साथ सक्रिय रहे हैं। पर नामवर ने अपनी आलोचना में कभी रामदरश मिश्र का नाम भी नहीं मिला। जब कि अपनी आत्मकथा अपने लोग में रामदरश मिश्र ने बड़ी आत्मीयता से नामवर को याद किया है। नामवर सिंह की आलोचना की अध्यापन की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। बहुत सी नई बातें नामवर की बताई हैं। सर्वदा  साफ और सत्य बोलने वाले रामदरश मिश्र को उन की ही एक ग़ज़ल के साथ जन्म-दिन की कोटिश: बधाई !

बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,

खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।


किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,

कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।


जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,

वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।


पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,

उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।


न हँस कर न रोकर किसी में उडे़ला,

पिया खुद ही अपना ज़हर धीरे-धीरे।


गिरा मैं कहीं तो अकेले में रोया,

गया दर्द से घाव भर धीरे-धीरे।


ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था,

उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।


मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी,

मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।




Tuesday, 9 August 2022

मोहर्रम की बधाई देने और मर्सिया पर ताली बजाने वाले सेक्यूलर लोग

 दयानंद पांडेय 

आज मोहर्रम है। ग़म का दिन है। त्यौहार नहीं है मोहर्रम। लेकिन लालू यादव के कुख्यात पुत्र तेजप्रताप यादव आज नीतीश कुमार को अपने पाले में आया देख कर मोहर्रम की बधाई भी देने लगे। कुछ न्यूज़ चैनलों के एंकर भी मोहर्रम को त्यौहार बता गए। कुछ समय पहले तो नवभारत टाइम्स जैसे अख़बार ने बाक़ायदा संपादकीय लिख कर मोहर्रम को त्यौहार बता कर बधाई दी थी। सेक्यूलरिज्म की यह पराकाष्ठा है। तेज प्रताप सत्ता के जश्न में थे। मोहर्रम को भी जश्न बना बैठे थे। पर यह मीडिया के साक्षर लोग ? 

उन दिनों उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का राज था। अम्मार रिज़वी कैबिनेट मिनिस्टर थे। सचिवालय में उन के कमरे से कुछ पत्रकार एक साथ बाहर निकल रहे थे कि अचानक एक सेक्यूलर पत्रकार उधर से गुज़रे। पूछा कि कोई ख़ास बात है क्या ? पत्रकारों में से एक चुहुल पर उतर आया। बोला , ' अरे कुछ ख़ास नहीं। बस अम्मार भाई को मोहर्रम की बधाई देने चले गए थे। ' सेक्यूलर पत्रकार ने आव देखा , न ताव अम्मार रिज़वी के कमरे में धड़धड़ा कर घुस गए। और हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाते हुए बोले , ' अम्मार भाई , मोहर्रम की बहुत बधाई ! '

अम्मार रिज़वी सकते में आ गए। अम्मार रिज़वी ख़ुद शिया थे। लेकिन करते तो क्या करते। पत्रकार की मूर्खता पर चेहरा बिगाड़ कर रह गए। 

एशिया में दो ही जगह ऐसी हैं जहां सब से ज़्यादा शिया-सुन्नी दंगे होते रहे हैं। एक लखनऊ में , दूसरे कराची में। इस लिए कि सब से ज़्यादा शिया लखनऊ और कराची में ही रहते हैं। अस्सी के दशक में भी लखनऊ में  मैं  ने शिया-सुन्नी के भयानक दंगे देखे हैं। दंगे बहुत देखे हैं और उन्हें कवर किया है। जैसे दिल्ली में हिंदू-सिख दंगा। तमाम हिंदू-मुस्लिम दंगे भी कवर किए हैं। 

पर 1996 में तो चौक के सिरकटा नाले के पास शिया-सुन्नी दंगा कवर करते हुए मेरी हत्या होते-होते बची थी। किसी तरह जान बची थी। कुछ दंगाइयों ने मेरे लिए छुरा और तलवार निकाल लिया था। क्यों कि मैं हिंदू था। ब्राह्मण था। मुझ पर वह दंगाई हमलावर होते-होते कि हमारे सहयोगी एक मुस्लिम पत्रकार शबाहत हुसैन विजेता बढ़ कर अचानक अपनी जान पर खेल कर , छटक कर मेरे आगे आ कर खड़े हो गए। बोले , ' मैं तो मुसलमान हूं। पर पहले मुझे मारो ! ' दंगाई कुछ समझते-समझते कि और स्थानीय लोगों ने मुझे पीछे से पकड़ कर , मेरी कालर पकड़ कर खींचने लगे। खींचते-खींचते जाने किस-किस गली में ले गए। मुझे भी और विजेता को भी। 

अचानक एक घर में ले जा कर हम लोगों को धकेल दिया। दरवाज़ा बंद कर लोग बोले , ' अब आप लोग सुरक्षित हैं ! ' तो जैसे सांस में सांस आई। यह लोग भी मुसलमान ही थे। अनजान थे। यह शिया लोग थे कि सुन्नी। आज भी नहीं जानता। पर बोले , ' आप की रिपोर्ट हम लोग रोज पढ़ रहे हैं। आप ठीक-ठीक लिख रहे हैं। असलियत लिख रहे हैं। अगर आप के साथ यह दंगाई कुछ गड़बड़ कर देते तो हम लोग कल क्या कहते। कैसे मुंह दिखाते किसी को ?'  थोड़ी देर बाद जब माहौल ठीक हुआ तो हम लोग फिर से बाहर आए। हमारे साथ एक और मुस्लिम पत्रकार हमारे सहयोग के लिए थे। पर वह मुझ पर हमला होते ही न सिर्फ़ अचानक ग़ायब हो गए बल्कि उस शाम दफ़्तर भी नहीं पहुंचे। दो दिन बाद दफ़्तर आए तो मैं ने पूछा , ' कहां ग़ायब हो गए थे ? ' वह बोले , ' सर मैं बहुत डर गया था। ' 

अब इस के बाद क्या कहता भला। 

लखनऊ में तो ऐसे-ऐसे सेक्यूलर रहते हैं कि मत पूछिए। वामपंथियों की सभा में मर्सिया सुन कर भी लोगों को तालियां बजाते देखता हूं। यह लोग नहीं जानते कि मर्सिया शोक गीत है। वैसे ही जैसे आज तेजप्रताप यादव एक न्यूज़ चैनल से बात करते हुए हर्षित हो कर मोहर्रम की बधाई सुबह-सुबह दे रहे थे। मोहर्रम ग़म का दिन है। इराक स्थित कर्बला में हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे हजरत हुसैन को शहीद कर दिया गया। शिया मुसलमान इसी लिए इमामबाड़ों में जा कर मातम मनाते हैं। ताजिया निकालते हैं। लखनऊ इस मातम का विशेष केंद्र है। सुन्नी इस का विरोध करते हैं। दंगा हो जाता है। अब तो ख़ैर योगी राज है। सो दंगों की गुंजाइश समाप्त है।

Monday, 1 August 2022

प्रेमचंद के साहित्य और जीवन दोनों ही में खूबियां , खामियां दोनों हैं

दयानंद पांडेय 



प्रेमचंद के जीवन में दो पत्नियों के अलावा और भी कई सारी स्त्रियां थीं। यहां तक कि उन की सौतेली मां भी। शिवरानी देवी लिखित प्रेमचंद घर में यह बात उभर कर सामने आई है। निर्मला उपन्यास उन की ही कहानी है। अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के शैलेश ज़ैदी ने तो अपनी किताब में प्रेमचंद को औरतबाज बताया है। वेश्या गमन के तथ्य भी रखे हैं और बताया है कि प्रेमचंद निर्धन कतई नहीं थे। कभी नहीं थे। प्रेमचंद के समय में फ़ोटो खिंचवाना बहुत बड़ी अमीरी थी। इस बात को सर्वदा ध्यान रखिए।

मेरी इस टिप्पणी को ले कर मिश्रित प्रतिक्रियाएं मिली हैं। कुछ निरापद हैं तो कुछ संतुलित तो कुछ प्रतिशोध से भरी हुई। कुछ छुद्र जनों को मुझे निपटा देने और अपमानित करने का एक मार्ग मिल गया है बरास्ता इस टिप्पणी। इन मानसिक विकलांगों को क्या ही कुछ कहूं। 

सभी मित्रों से निवेदन है कि प्रेमचंद बड़े लेखक हैं , इस में कोई दो राय नहीं है। लेकिन अगर उन की पत्नी शिवरानी देवी उन के बारे में अपनी पुस्तक , प्रेमचंद घर में पुस्तक में कोई तथ्य लिखती हैं तो उन की चर्चा करना अपराध नहीं है। शैलेश ज़ैदी ने भी अगर अपनी पुस्तक में कुछ ऐसा , वैसा लिखा है तो तार्किक और तथ्यात्मक ढंग से लिखा है। प्रामाणिक ढंग से लिखा है। कुछ भी अनर्गल नहीं लिखा है। आप सभी मित्रों को यह बात ज़रूर जान लेनी चाहिए कि प्रेमचंद के पिता भी गोरखपुर में पोस्ट मास्टर थे। पोस्ट मास्टर तब के दिनों में भी , अब के दिनों में भी निर्धन नहीं होता। फिर पढ़ाई के बाद प्रेमचंद भी एस डी आई थे , वह भी निर्धन नहीं होता। आज की तारीख़ में वह पी सी एस एलायड कहलाता है। बनारस जैसी जगह में  प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाला भी निर्धन नहीं होता। फिर पत्रिकाएं छापने वाला या मुम्बई में फ़िल्में लिखने वाला भी निर्धन नहीं होता। मैं प्रेमचंद के गांव लमही भी गया हूं। ठीक-ठाक खेती बारी और घर दुआर भी था उन का। कच्चे मकान की जगह अपना पक्का मकान बनवा कर वह दिवंगत हुए थे ।   

फिर आप लोगों ने खुद पढ़ा होगा , छात्र जीवन में भी प्रेमचंद रामलीला की आरती में भी बीस आना दे देते हैं। तब के समय एक सरकारी अध्यापक का एक महीने का वेतन हुआ करता था , बीस आना। ऐसे तमाम किस्से हैं । लेकिन मैं ब्राह्मण हूं , इस लिए उन के खिलाफ लिख रहा हूं , ऐसा कहना आप लोगों की मूर्खता ही है। प्रेमचंद को हिंदी में छापा किस ने मालूम है ? पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती में। हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठित किया आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने। तब जब कि उन के तमाम खल पात्र ब्राह्मण ही हैं।   प्रेमचंद की एक प्रसिद्ध कहानी है , पंच परमेश्वर। प्रेमचंद ने सरस्वती में इसे छपने भेजा था और शीर्षक दिया था , पंचों के भगवान। सरस्वती के तब के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी ने न सिर्फ़ इस कहानी को रिराईट किया बल्कि इस का शीर्षक पंच परमेश्वर कर दिया। पंचों के भगवान और पंच परमेश्वर में क्या फर्क और क्या ध्वनि है , आप मित्रों में अगर समझ हो तो ज़रूर समझ सकते हैं। समझ से दरिद्र और पैदल हैं तो मुझे कुछ नहीं कहना। 

रही बात चीनी के लिए तरसने की तो , बचपन में चीनी के लिए मैं भी तरसा हूं। घर में चीनी चुरा कर मैं ने भी खाई है । मध्यवर्गीय परिवार की दिक्कत है यह। फिर तब के दिनों में चीनी , नहीं गुड़ का चलन ज़्यादा था। बाक़ी प्रेमचंद के जीवन में कुछ स्त्रियों की बातें , शिवरानी देवी ने ही लिखी हैं। प्रेमचंद के वार्तालाप के सौजन्य से । मैं ने तो सिर्फ़ हल्का सा ज़िक्र भर किया है इस का । तमाम लेखकों और पुरुषों के जीवन में स्त्रियां रहती हैं , यह अपराध नहीं है । तो कायस्थ कुलोदभव लोगों से कहना चाहता हूं कि प्रेमचंद को कायस्थ लेखक बना कर उन्हें कायस्थ समुदाय तक सीमित कर अपने जहर का बुखार मत उतारिए। प्रेमचंद जैसे भी हैं , अपनी तमाम खामियों और खूबियों के साथ विश्वस्तरीय लेखक हैं , सभी समुदाय के लेखक हैं। उन्हें कायस्थीय कुएं में कैद करने से बचिए। 

दिलचस्प यह भी देखिए कि जातीय जहर के मारे महाबीमार दिलीप मंडल [ Dilip C Mandal ] भी इस पोस्ट पर ,' दयानंद पांडे की मानसिक अवस्था ठीक नहीं है। कथा सम्राट प्रेमचंद पर ऐसे आरोप लगाने से पहले उनकी ज़ुबान को लकवा क्यों न मार गया? '  बताने के लिए उपस्थित हो गए। गुड है , यह भी। 

मित्रों जान लीजिए कि प्रेमचंद भगवान नहीं थे। जान लीजिए कि प्रेमचंद के साहित्य और जीवन दोनों ही में खूबियां , खामियां दोनों हैं। सभी के साथ होता है । प्रेमचंद के जीवन में ही नहीं , साहित्य में भी बहुत सी कमज़ोर कड़ियां हैं। प्रेमचंद पर साहित्यिक चोरी तक के आरोप , अवध उपाध्याय जैसे आलोचकों ने लगाए हैं। कई कमज़ोर और अंतर्विरोधी रचनाएं भी हैं प्रेमचंद के पास। नमक का दारोगा जैसी अंतर्विरोध में सनी कहानियां भी हैं प्रेमचंद के पास। सारी की सारी रचनाएं किसी भी लेखक की महान नहीं होतीं। प्रेमचंद की भी नहीं हैं। कोई तीन सौ से अधिक कहानियां प्रेमचंद ने लिखी हैं। लेकिन  दो दर्जन कहानियों की ही चर्चा घूम फिर कर होती है। प्रेमचंद के कहानियों के अंतर्विरोध पर मुद्राराक्षस जैसे लेखकों ने बहुत गंभीरता से लिखा है। दलित विरोधी तक बताया है प्रेमचंद को। और भी लोगों ने। कई बार तो मुझे लगता है कि प्रेमचंद के लिखे संपादकीय और तमाम लेख , उन के साहित्य से ज़्यादा मारक और प्रासंगिक हैं। बावजूद इस सब के प्रेमचंद हिंदी , उर्दू ही नहीं , विश्व के महान लेखक हैं और रहेंगे। मेरी जानकारी में दुनिया में दो ही लेखक ऐसे हैं जो प्राइमरी से लगायत एम ए तक पढ़ाए जाते हैं। एक शेक्सपीयर , दूसरे प्रेमचंद। इस लिए आप लोग इस बहाने अपनी-अपनी बीमारियां यहां न ही बताएं तो बेहतर। प्रेमचंद के बारे में कुछ बोलने के पहले उन्हें और उन के बारे में पढ़ना सीखें। पढ़ लेंगे तो , अनर्गल बोलना भूल जाएंगे।


Thursday, 28 July 2022

गांधारी बनी सोनिया गांधी और दुर्योधन की कथा दुहराते अधीर रंजन चौधरी नहीं जानते कि राष्ट्रपति शब्द कैसे बना

  दयानंद पांडेय 

राष्ट्रपति पद को , राष्ट्रपति शब्द को , इस की गरिमा को कभी राष्ट्रपत्नी की गाली में तब्दील होते हुए हम देखेंगे , कभी सोचा नहीं था। लेकिन कांग्रेस की सत्ता पिपासा का विष हमें इस राह तक ले आया है। अंगरेजी में प्रेसिडेंट आफ़ इंडिया को जब हिंदी में लिखने की बात आई थी तब देश में इस पर बहुत लंबी बहस , विचार-विमर्श हुआ था। लेकिन सत्ता में बैठे लोग जब इस पर एक राय नहीं हो सके तब देश के लोगों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करते हुए इस प्रेसिडेंट आफ़ इंडिया शब्द के लिए हिंदी में कोई उपयुक्त शब्द देने का सुझाव मांगा गया। क्यों कि अध्यक्ष , सभापति आदि अनुवादिक शब्द वह प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे थे , जो छोड़ना चाहिए था। फिर जनता ने , अख़बारों ने , सामाजिक संगठनों आदि ने विभिन्न नाम के सुझाव दिए। बात बन नहीं रही थी। कि तभी बनारस से प्रकाशित होने वाले दैनिक आज ने एक संपादकीय लिख कर भारत सरकार को प्रेसिडेंट आफ़ इंडिया के लिए हिंदी में राष्ट्रपति शब्द सुझाया। 

और यह देखिए सभी ने सर्वसम्मति से इस शब्द को स्वीकार कर लिया। आज अख़बार पहले भी बहुत महत्वपूर्ण अख़बार रहा था पर राष्ट्रपति शब्द देने के बाद इस की प्रतिष्ठा में चार चांद लग गए। आप जाइए कभी दिल्ली में सफदरजंग में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री निवास में जहां इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी। वह अब स्मारक बना दिया गया है। इंदिरा गांधी की हत्या संबंधी ख़बरों की कई कटिंग वहां लगी है। जिस में आज अख़बार की कटिंग बड़ी प्रमुखता से वहां चस्पा है। आज अख़बार की और भी कुछ समाचारों की कटिंग है वहां। आख़िर आज के संपादक रहे बाबूराव विष्णु पराड़कर का नाम भारतीय पत्रकारिता में वैसे ही तो नहीं बहुत आदर से लिया जाता है। पंडित कमलापति त्रिपाठी जैसे विद्वान भी आज के संपादक रहे हैं। पराड़कर जी भले मराठी थे पर हिंदी पत्रकारिता को जो उत्कर्ष उन्हों ने दिया वह अतुलनीय है। क्रांतिकारी पत्रकार पराड़कर ने पत्रकारिता की शुरुआत कोलकाता से की और हिंदी में ही की। बाद में वह जन्म-भूमि बनारस लौटे। 

बहरहाल उसी बंगभूमि के एक अराजक नेता अधीर रंजन चौधरी ने आज राष्ट्रपति को राष्ट्रपत्नी कह कर अपनी सत्ता पिपासा के विष और अहंकार में डूब कर जो अपमान किया है , वह अक्षम्य है। अधीर रंजन चौधरी ने तमाम वाद-विवाद के बावजूद राष्ट्रपत्नी कहे जाने पर अपनी ग़लती तो स्वीकार कर ली है। बता दिया है कि हिमालयी ग़लती हुई है उन से। पर इस के लिए क्षमा मांगने से इंकार कर दिया है। क्यों कि भाजपा माफ़ी मांगने को कह रही है। ज़िक्र ज़रुरी है कि कांग्रेस में आने के पहले अधीर रंजन चौधरी नक्सली रहे हैं। तो एक तो नक्सली अराजकता दूसरे , कांग्रेसी अकड़। कलफ़ लगी अकड़। फिर अगर कांग्रेस और कम्युनिस्ट को मिला कर देखिए तो जो इस का केमिकल रिजल्ट आता है , वह रावण या कंस पैदा करता है। वही अहंकार , वही अराजकता और वही गुरुर अधीर रंजन चौधरी में बार-बार देखने को मिलता है। आज यह कुछ ज़्यादा दिख गया। लेकिन अधीर रंजन चौधरी से भी ज़्यादा अहंकार आज सोनिया गांधी में देखने को मिला। जब मीडिया ने संसद परिसर में सोनिया से इस बाबत माफ़ी मांगने के बाबत सवाल पूछा तो जिस अहंकार में चूर हो कर सोनिया ने जवाब दिया कि अधीर रंजन ने माफ़ी मांग तो ली है ! 

यह एक पंक्ति कहने में सोनिया की बॉडी लैंग्वेज में जो घमंड झलक रहा था , जो अहंकार और हिकारत छलक रही थी , उस की तुलना किसी रावण जैसे खल चरित्र से ही मुमकिन है। दिख रहा था कि रस्सी जल गई है , पर बल नहीं गया है। ऐंठ जस की तस है। सत्ता में बैठने का गुरुर है कि जाता नहीं है। साम्राज्ञी होने का दंभ अभी भी बरक़रार है। गोया नरेंद्र मोदी नहीं , अभी भी मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हों। ख़ुदा यह दंभ बरक़रार रखें। सर्वदा-सर्वदा बरक़रार रखें। देह भले टूट जाए , जैसे सत्ता टूट गई है। पर दंभ और अहंकार न टूटे। ई डी वग़ैरह चाहे जो कर लें। जानती तो गांधारी का प्रतिरुप सोनिया गांधी भी हैं कि नरेंद्र मोदी राज में वह कभी भी जेल नहीं जाएंगी। न उन का कुपुत्र राहुल गांधी या दामाद रावर्ट वाड्रा जेल जाएगा। जानती हैं सोनिया गांधी , अच्छी तरह जानती हैं कि नरेंद्र मोदी , मोरार जी देसाई सरकार की ग़लतियां नहीं दुहराने वाला। बस ई डी , वी डी की आइसपाइस का खेल चलता रहेगा। नरेंद्र मोदी जानता है कि जेल भेजने से भारत की दयालु जनता द्रवित हो कर सोनिया , राहुल की सत्ता वापसी करवा सकती है। सो जेल के दरवाज़े पर तो खड़ा रखेगा नरेंद्र मोदी , सोनिया , राहुल , वाड्रा को पर जेल भेजेगा नहीं। सोनिया के अग्गुओं , लग्गुओं , भग्गुओं की जेल यात्रा ज़रुर जारी रहेगी। यह बात भी दंभी सोनिया गांधी को मालूम है।  

हां , मुझे मालूम है कि नरेंद्र मोदी के जीवित रहते कोई और पार्टी भारत की सत्ता पर सवार नहीं हो सकती। कोई कुछ भी कर ले। कितना भी हाथ-पांव या सिर मार ले। 

खैर , बात राष्ट्रपति शब्द की हो रही थी। तो जैसे राष्ट्रपति शब्द आज अख़बार ने दिया देश को वैसे राष्ट्रपिता शब्द भी महात्मा गांधी को नेता जी सुभाषचंद्र बोस ने दिया था। जब कि रवींद्रनाथ टैगोर ने इस के पहले ही गांधी को महात्मा की उपाधि दी थी। ख़ैर , गांधी को राष्ट्रपिता कहने पर भी दो धुर विरोधी लोगों को सख़्त ऐतराज रहा है। एक संघ के लोगों को। दूसरे , वामपंथियों को। गांधी और संघ के मतभेद किसी से छुपे नहीं हैं। और वामपंथी न गांधी को पसंद करते हैं न नेता जी सुभाषचंद्र बोस को। गांधी अहिंसा के पुजारी थे। और वामपंथी हिंसा के पुजारी। तीसरे , वामपंथी नेता जी सुभाषचंद्र बोस को हिटलर का कुत्ता कहने के आदी हैं। जब कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने और मोदी द्वारा बार-बार गांधी स्तुति से संघियों का यह ऐतराज थोड़ा डायलूट हुआ है। लेकिन वामपंथियों का नहीं। 

ख़ैर , इसी तरह लालक़िला पर पंद्रह अगस्त को राष्ट्र ध्वज फहराने को ले कर भी बहुत लोगों को दर्द होता है। उन लोगों को जान लेना चाहिए कि लालक़िला पर राष्ट्र ध्वज यानी तिरंगा फहराने का सपना नेता जी सुभाषचंद्र बोस का ही था। नेता जी के सपने को ही पूरा करने का फ़ैसला देश आज तक निभा रहा है। आगे भी निभाएगा। लाख अधीर रंजन चौधरी आते-जाते और पगलाते रहेंगे और विष वमन करते रहेंगे। पर राष्ट्रपति , राष्ट्रपिता और तिरंगे की शान में देश कभी किसी को बट्टा नहीं लगाने देगा। 

अधीर रंजन चौधरी द्वारा राष्ट्रपत्नी शब्द पर कुछ मतिमंद एक कुतर्क यह दे रहे हैं कि बंगाली होने के कारण , हिंदी कम जानने के कारण ऐसा हो गया। मेरे एक आई ए एस मित्र हैं। इन दिनों अमरीका में अपने बच्चों के पास रहते हैं। हरियाणा से हैं। लखनऊ काफी समय रहे हैं। उत्तराखंड जब बना तो उत्तराखंड चले गए। मेरे बहुत अच्छे मित्र हैं। लेकिन जब सेवा में थे तो मैं ने कई बार देखा कि अपने अधीनस्थों से बेहद बदतमीजी से पेश आते थे। मैं ने उन्हें बाद में कई बार इस बात पर टोका तो वह अपने हरियाणवी होने की आड़ वह हर बार ले लेते। कहते क्या करें , हमारी बोली ही ऐसी है। लेकिन कुछ मौकों पर देखा कि अपने सीनियर्स से बातचीत में वह लगभग दंडवत हो जाते थे। ख़ास कर एक बार एक मुख्यमंत्री के साथ जब उन्हें राइट सर ! राइट सर ! करते देखा तो बाद में उन से पूछा कि मुख्यमंत्री के सामने तो आप का हरियाणवी बर्फ़ की तरह पिघल कर बह गया ! तो वह झेंप कर मुस्कुराने लगे। 

तो रही बात अधीर रंजन चौधरी की तो वह तो हिंदी में श्रीमती राजीव गांधी भी सोनिया गांधी को कहने का साहस नहीं रखते। अधीर रंजन चौधरी भूल जाते हैं कि प्रणव मुखर्जी भी बंगाली थे। प्रणव मुखर्जी ने कभी किसी हिंदी शब्द का उपयोग किसी को अपमानित करने के लिए भ्रष्ट नहीं किया। बताता चलूं कि ठीक से हिंदी न जानने के कारण ही इच्छुक होते हुए भी प्रणव मुखर्जी प्रधानमंत्री नहीं बन सके थे। पर जब पहली बार सांसद बन कर दिल्ली आए , बंगाल से तो राष्ट्रपति भवन के पास ही उन्हें रहने के लिए सरकारी घर मिला। राष्ट्रपति भवन की शानो-शौक़त देख कर उन्हों ने अपनी बड़ी बहन से कहा था कि मैं चाहता हूं कि अगले जन्म में घोड़ा बन कर राष्ट्रपति भवन में रहूं। प्रणव मुखर्जी ब्राह्मण थे पर राष्ट्रपति भवन में रहने के लिए अगले जन्म में घोड़ा बनने के लिए सपना देख रहे थे। पर उन का सौभाग्य था कि वह इसी जन्म में राष्ट्रपति भी बन गए और राष्ट्रपति भवन का सारा सुख लूट कर दिवंगत हुए। 

अधीर रंजन चौधरी ने लेकिन सोनिया गांधी जैसी दंभी स्त्री को ख़ुश करने के लिए राष्ट्रपति को राष्ट्रपत्नी कह कर सिर्फ़ द्रौपदी मुर्मू को ही नहीं , राष्टपति पद को ही नहीं , समूचे देश और देश को अपमानित किया है। ठीक वैसे ही जैसे कभी दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीर हरण कर कर समूची स्त्री समाज का , समस्त मनुष्य जगत का अपमान किया था। गांधारी ने बहुत बिगाड़ दिया था दुर्योधन को। दुर्योधन को जीते जी उस चीर हरण का दंड मिल गया था। निश्चिंत रहिए , अधीर रंजन चौधरी , उन की आका गांधारी सोनिया और कांग्रेस को भी देश की जनता समय रहते दंड देगी। अधीर रंजन चौधरी देर-सवेर माफ़ी मांगेंगे , जैसे राहुल गांधी ने लिखित माफ़ी सुप्रीम कोर्ट में मांगी थी और दंड भी भोगेंगे। प्याज और जूता दोनों खाने का मुहावरा चरितार्थ करेंगे अधीर रंजन चौधरी ! और कि गांधारी , सोनिया भी। मैं तो सोच रहा हूं कि अधीर के अधर और जिह्वा कट क्यों नहीं गए राष्ट्रपत्नी कहते हुए !


Sunday, 24 July 2022

जब मुलायम ने पुलिस भर्ती में लंबाई को सीने में , सीने को लंबाई में एडजस्ट कर भर्ती करने को कह दिया

दयानंद पांडेय 

इधर कुछ बरस से जब भी बच्चों के परीक्षा परिणाम आते हैं तो कुछ विघ्न संतोषी अपना ज़माना ले कर बैठ जाते हैं। यह सैडिस्ट लोग हैं। बच्चों की प्रतिभा से जलते हैं। भूल जाते हैं कि कभी पहले राष्ट्रपति रहे राजेंद्र प्रसाद की परीक्षा  कॉपी पर एक अंगरेज शिक्षक ने लिखा था , इक्जामिन इज बेटर दैन इक्ज़ामिनर। ठीक है कि वह ज़माना और था। नंबर कम मिलते थे। इस लिए भी कि तब हम कम जानते थे। बहुत-बहुत कम जानते थे। आज के बच्चों जैसा हमारा आई क्यू नहीं था। हमारे पास सुविधाएं भी नहीं थीं। ज्ञान के इतने ऑप्शन नहीं थे। किताब , कॉपी , कलम तक की कमी थी। शिक्षा और चिकित्सा में घनघोर विपन्नता थी। परिवार स्तर पर भी , समाज स्तर पर भी और सरकार स्तर पर भी। चौतरफा विपन्नता और कृपणता। हमारी गोरखपुर यूनिवर्सिटी में तो मैं ने पाया कि अंगरेजी जैसे विषय में थर्ड डिवीजन में पास लोग ही सालो-साल टॉपर रहे हैं। मतलब गोल्ड मेडलिस्ट। और भी विषयों का यही हाल था। तब अध्यापक लोग नंबर देने में भी बहुत कृपण थे। 

संयोग से मैं भी परीक्षक हूं। कभी-कभार पढ़ाता भी हूं। विभिन्न विश्वविद्यालयों में। बताते हुए ख़ुशी होती है कि विद्यार्थियों को नंबर देने के मामले में पूरी उदारता बरतता हूं। एक पैसे की भी कृपणता नहीं बरतता। कभी भी नहीं। यहां तक कि दो-चार नंबर से फेल हो रहे छात्र को भी खींच-खांच कर पास कर देता हूं। जो छात्र पचास-पचपन प्रतिशत तक जाता होता है , उसे भी खींच-खांच कर साठ प्रतिशत पार करवा देता हूं। साठ प्रतिशत वाले को सत्तर प्रतिशत तक पहुंचाने में मुझे दिली खुशी होती है। हां , अभी तक ऐसा कोई छात्र मुझे सौ प्रतिशत वाला नहीं मिला। पर पचासी-नब्बे प्रतिशत तक वाले विद्यार्थी तो मिले हैं। इन पर बहुत खींच-खांच नहीं करता। परीक्षा की कापियां जांचने , पेपर बनाने के अनेक अनुभव हैं। एक से एक बढ़ कर। अजब-ग़ज़ब के विद्यार्थी भी। 

एक बार बी एच यू का अनुभव नहीं भूलता। संयोग से हिंदी और अंगरेजी दोनों ही परीक्षक लखनऊ से ही गए थे। स्पष्ट है कि मैं हिंदी माध्यम की कापियां जांचता , पढ़ाता हूं। बी एच यू में पत्रकारिता विभाग में तब यह था कि परीक्षा के दिन ही पेपर बनता था , परीक्षा होती थी और उसी दिन तुरंत कॉपी भी जांच दी जाती थीं। तो हम दोनों एक ही कमरे में अगल-बगल बैठ कर कॉपी जांच रहे थे। अंगरेजी की कॉपी जांचने वाली भी पत्रकार ही थीं। बंगाली थीं। हमारे एक रिपोर्टर मित्र की पत्नी भी। हम दोनों दो संस्थान में साथ काम भी कर चुके थे। वह पायनियर में थीं , उन के पति भी पायनियर में ही थे। तब मैं स्वतंत्र भारत में था। घर आना-जाना भी था। फिर जब मैं नवभारत टाइम्स में था तब वह टाइम्स आफ इंडिया में थीं। तो कोई अजनबीपन नहीं था। 

अचानक अंगरेजी की कॉपी जांचते-जांचते वह गधा , उल्लू का पट्ठा जैसे शब्द बोलने लगीं। कापियां पलटतीं और किचकिचा कर कलम से कुछ काटने-पीटने लगतीं। थोड़ी देर में मुझ से मुखातिब हुईं। पूछने लगीं , ' आप की हिंदी में क्या है ? कैसे हैं यह लोग ? हमारे यहां तो एक से एक गधे , उल्लू के पट्ठे मिल रहे हैं ! '

' अच्छा यह बताएं कि आप के साथ जो लोग काम करते हैं , वह लोग कैसे हैं ? क्या हंड्रेड परसेंट परफेक्ट लोग हैं ? ' मैं ने हंस कर पूछा। 

' कहां भला ! ' वह अब कुर्सी से पीठ सटाते हुए रिलैक्स होते हुए कलम मेज़ पर रखती हुई बोलीं , ' एक से एक बड़े गधे वहां भी बैठे हैं। ' वह भड़कती हुई बोलीं , ' काम लेना मुश्किल हो जाता है। ' उन दिनों वह लखनऊ में एक अख़बार की इंचार्ज थीं। 

' तो जब दस-दस , पंद्रह साल के अनुभवी लोग ठीक से काम नहीं कर पाते। आप के मुताबिक़ काम नहीं कर पाते।  तो यह बिचारे तो स्टूडेंट हैं। इन से इस तरह परफेक्ट होने की उम्मीद क्यों करती हैं। '

' हां , यह तो है ! ' कंधे उचकाते हुए वह बोलीं। 

 ' बच्चों ने पहले मेडिकल , इंजीनियरिंग ट्राई किया होगा। नहीं हुआ होगा। तो कुछ और भी ट्राई किया होगा। एम बी ए वगैरह भी ट्राई किया होगा। फिर थक-हार कर पत्रकारिता की तरफ रुख़ किया होगा। '  मैं ने कहा , ' फिर इन्हें हम भी यहां पीछे धकेल देंगे तो बिचारे क्या करेंगे ? '

' तो क्या करें ? इन्हें बॉल की तरह उछाल कर इन की बल्ले-बल्ले कर दें ? ' वह खीझती हुई बोलीं। 

' बिलकुल ! ' मैं ने कहा , ' ' सोचिए कि कंप्टीशन कितना बढ़ गया है। मासकम्युनिकेशन करने के बाद अगर यह नेट का फ़ार्म भी भरेंगे तब भी मिनिमम साठ प्रतिशत नंबर पा कर ही भरेंगे। ऐसे ही तमाम जगह पर्सेंटेज की बैरियर बनी हुई है। तो हम इन के इस बैरियर को तोड़ कर इन की मदद तो कर ही सकते हैं। बाक़ी इन की मेहनत , इन की योग्यता , इन का भाग्य ! ' 

' अरे , इस तरह तो मैं ने सोचा ही नहीं ! ' कह कर वह ख़ुद पर झल्ला पड़ीं। लेकिन यह सुनने के बाद वह ख़ुश हो गईं। कहने लगीं , ' यह भी हमारे बच्चे ही ठहरे ! '

' फिर आज की पत्रकारिता भी निरंतर बदल रही है। इन में से हर कोई तो मशहूर एंकर , एडीटर तो हो नहीं जाएगा। जैसा कि यह सोच रहे होंगे। ' मैं ने कहा , ' इस दलाली वाली पत्रकारिता में अब कौन सर्वाइव कर पाएगा , कहना मुश्किल है। तो इन के बाक़ी की नौकरियों के ऑप्शन हम क्यों बंद कर दें , नंबर देने में कंजूसी कर के। ' मैं ने उन से साफ़ कहा। 

वह सहमत हो गईं। बाक़ी आगे उन्हों ने क्या किया , वह ही जानें। पर जब रिजल्ट आया तो हिंदी मीडियम का छात्र टॉपर निकला। 

तो बताऊं कि मैं अपने छात्रों को बिलकुल निराश नहीं करता। न अपने पाठकों को। जानता हूं कि अगर अपठनीय , कुतर्क या झूठ लिखूंगा तो मुझे कोई भला क्यों पढ़ेगा। फिर अगर कोई विद्यार्थी भी अपने कैरियर में तरक्की करता है तो मेरा दिल बल्लियों उछल जाता है। जैसे कि बी एच यू में ही एक छात्र मुझे मिला। बिहार से था। उस के घर में , रिश्ते में हर कोई आगे था। कोई आई ए एस , आई पी एस , डाक्टर आदि। बस वह ही एक पिछड़ता जा रहा था। ओवर एज होने के मुहाने पर खड़ा , फ्रस्ट्रेशन की घंटी बजा रहा था। हार कर मॉस कम्युनिकेशन करने आ गया। मैं ने उसे भरपूर समझाया। बाद में फ़ोन पर भी। बराबर। फिर मॉस कम्युनिकेशन की एक सफलता ने उस की ज़िंदगी में रंग भर दिया। कुछ समय बाद वह बिहार की प्रशासनिक सेवा में चुन लिया गया। उस के हर्ष का कोई ठिकाना नहीं था। मैं भी चकित था। 

मुलायम सिंह यादव जब पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री बने तो उन का ध्यान सरकारी नौकरियों में , ख़ास कर पुलिस फ़ोर्स में अपने लोगों को भर्ती करने पर बहुत था। अपने लोगों , मतलब यादव लोगों को। एक बार पुलिस भर्ती में एक यादव डी आई जी को उन्हों ने सिपाही भर्ती के लिए तैनात किया। उस डी आई जी को सिपाही में भर्ती के लिए एक लंबी सूची भी भेज दी। एक दिन उस डी आई जी से फ़ोन पर भर्ती के बारे में पड़ताल की। तो डी आई जी ने उन्हें संकोच में पड़ते हुए , सहमते हुए बताया कि , ' एक बड़ी दिक़्क़त आ गई है सो आप की भेजी सूची में सभी की भर्ती नहीं हो पाएगी। '

मुलायम ने पूछा कि , ' क्या दिक़्क़त है ? ' कौन अड़ंगा लगा रहा है , उस का नाम बताओ। अभी हटाता हूं उसे। ' तो उक्त डी आई जी ने बताया कि , ' कोई अड़ंगा नहीं लगा रहा। ' 

मुलायम ने पूछा , ' फिर ? '

' किसी की लंबाई कम पड़ रही है। किसी का सीना कम पड़ रहा है। ' उक्त डी आई जी ने अपनी मुश्किल बताई। 

' बस इतनी सी बात ? ' मुलायम ने कहा , ' ऐसा करो कि जिस की लंबाई कम है , उस का सीना उस में एडजस्ट कर दो। जिस का सीना कम पड़ रहा हो , उस की लंबाई उस में एडजस्ट कर दो। सब को भर्ती कर दो ! '

तो मैं नंबर देते समय उदारता तो बहुत बरतता हूं। लेकिन कभी भूल कर भी मुलायम फ़ार्मूला अख़्तियार नहीं करता। न लंबाई , सीने में एडजस्ट करता हूं न सीना , लंबाई में। बहुत से बच्चों को फेल भी करने का दुर्भाग्य झेलता रहता हूं। भारी मन से।  


Friday, 22 July 2022

कहां प्रेमचंद , कहां संजीव !

दयानंद पांडेय 


प्रेमचंद तो बेहद पठनीय लेखक हैं। बेहद लोकप्रिय भी। आप प्रेमचंद से बहुत जगह सहमत या असहमत हो सकते हैं पर उन की पठनीयता पर प्रश्न नहीं उठा सकते। वहीं संजीव बेहद अपठनीय लेखक हैं। घनघोर जातिवादी। लेकिन राजेंद्र यादव ने उन का प्रभा मंडल बना दिया। उस प्रभा मंडल का शव कुछ लोग लादे हुए अभी तक घूम रहे हैं। हां , संजीव की इच्छा ज़रुर प्रेमचंद को छूने की रही है। लेकिन प्रेमचंद का नाख़ून भी नहीं छू सके हैं। क्यों कि जातिवादी हो कर एक तो आप बड़े लेखक नहीं हो सकते। दूसरे लेखक का प्रभामंडल पाठक बनाते हैं। संपादक या आलोचक नहीं। संपादक या आलोचक किसी लेखक की शान में पटाखे तो फोड़ सकते हैं , लेखक की शान में बैंड तो बजा सकते हैं , लेखक को पठनीय नहीं बना सकते। लोकप्रिय नहीं बना सकते। जैसा कि प्रेमचंद को उन के पाठकों ने लोकप्रिय बनाया। अभी तक बनाए हुए हैं। इस लिए भी कि प्रेमचंद बेहद पठनीय लेखक हैं।  प्रेमचंद के तमाम खल-पात्र ब्राह्मण हैं। प्रेमचंद ब्रिटिश राज के लेखक हैं। ब्रिटिश राज में ब्राह्मण भी सामान्य प्रजा ही था। बल्कि भिखमंगा था। जब कि प्रेमचंद के समय में गांव में सब से बड़े खल-पात्र कायस्थ हुआ करते थे। कायस्थ मतलब पटवारी। लेखपाल। गांव की जर-ज़मीन के तमाम विवाद पटवारी की ही देन थे। आज भी हैं।  पर प्रेमचंद की कथा में कहीं भी किसी भी रचना में कोई पटवारी खल-पात्र उपस्थित नहीं है। लेकिन इस एक कारण से प्रेमचंद का लेखक छोटा नहीं पड़ता। कहीं भी। कभी भी। फिर यह लेखक का विवेक है कि किसे नायक बनाए , किसे खलनायक। लेकिन देखिए कि प्रेमचंद को स्थापित किस ने किया ? गढ़ा किस ने ?  महावीर प्रसाद द्विवेदी ने। रामचंद्र शुक्ल ने। इन लोगों ने कभी यह नहीं कहा या कहीं यह लिखा कि प्रेमचंद तो ब्राह्मण के ख़िलाफ़ लिखते हैं। रामचंद्र शुक्ल तुलसी के बाद अगर किसी की घनघोर प्रशंसा करते हैं तो प्रेमचंद की। स्थापित करते हैं प्रेमचंद को। स्थाई तौर पर। परमानंद श्रीवास्तव की तरह तुरंता तौर पर नहीं। अवध उपाध्याय जैसे निंदक आलोचक भी थे प्रेमचंद के। अवध उपाध्याय ने प्रेमचंद पर चोरी का आरोप भी लगाया। ख़ास कर रंगभूमि पर। पर आज अवध उपाध्याय को कितने लोग जानते हैं ? प्रेमचंद को लेकिन दुनिया जानती है। 

प्रेमचंद की शुरुआती कहानी है पंच परमेश्वर। प्रेमचंद ने जब सरस्वती में इसे छपने भेजा तो महावीर प्रसाद द्विवेदी संपादक थे सरस्वती के। प्रेमचंद ने कहानी का शीर्षक दिया था पंचों के भगवान। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने इस कहानी में न सिर्फ़ कई संशोधन किया , पुनर्लेखन किया बल्कि शीर्षक भी बदल कर पंचों के भगवान की जगह पंच परमेश्वर कर दिया। पंचों के भगवान और पंच परमेश्वर में कितनी दूरी है , कहने की ज़रुरत नहीं है। प्रेमचंद में जातीय अहंकार नहीं था। संजीव में बहुत है। जातीय जहर में डूब कर कोई बड़ा लेखक नहीं बन सकता। पठनीय भी कैसे बन सकता है भला। एक पत्रकार हैं दिलीप मंडल। बेहद प्रतिभावान। पर जातीय जहर में आकंठ डूब कर अपनी प्रतिभा को ख़ुद ही कुचल बैठे हैं। पर यह जातीय जहर उन की दुकानदारी है। ख़ूब पैसा पीट रहे हैं। लेकिन संजीव तो अपनी रचनाओं और टिप्पणियों में जहर बो कर भी पैसा नहीं पीट रहे। जैसे पठनीयता में विपन्नता ही उन की पूंजी है वैसे ही आर्थिक मामले में भी वह विपन्न ही हैं। दिलीप मंडल की तरह पैसे नहीं पीट रहे , जातीय जहर से। राजेंद्र यादव ने हंस में संजीव को कार्यकारी संपादक ज़रुर बनाया था पर ऐसे जैसे उन पर बड़ी कृपा कर रहे हों। सिर्फ़ दस हज़ार रुपए ही वेतन भी देते थे। इतने कम वेतन में दिल्ली में गुज़ारा मुश्किल ही नहीं , बहुत मुश्किल होता है। 

ख़ैर , वाल्मीकि , वेदव्यास , कालिदास , भवभूति , कबीर , तुलसी , मीरा , सूर , जायसी , रसखान , रहीम , मीर , ग़ालिब , से लगायत टैगोर , बंकिम , टालस्टाय , ब्रेख्त , नेरुदा , शेक्सपीयर , शरतचंद्र , प्रेमचंद , महाश्वेता देवी , आशापूर्णा देवी आदि किसी के यहां भी जातिवाद का जहर मिलता हो तो कृपया बताएं। जातीय जहर आदमी को आदमी नहीं रहने देता। तो रचना कैसे बड़ी होगी भला जातीय जहर का खाद पानी ले कर। लेखक तो अंतत: टुच्चा ही साबित होगा। जाति या धर्म का जहर रचना और लेखक दोनों को छोटा बना देती है। यह बात बारंबार सिद्ध हुई है। होती रहेगी। वामपंथी लेखन अचानक शोषक और शोषित के द्वंद्व से निकल कर कब जातीय जहर की खोह में समा गया , इस पर शोध होना चाहिए। 

ख़ैर , रही बात आलोचकों के नाम पर कुछ कुकुरमुत्तों की तो इन की इन दिनों पौ बारह है। आज के यह कुकुरमुत्ते आलोचक तारीफ़ करते समय दरबारी बन जाते हैं और आलोचना करते समय असभ्य। संजीव को ले कर नरेश सक्सेना की बात भी बहुत हो रही है। नरेश सक्सेना ने कुछ कविताएं बहुत अच्छी लिखी हैं पर मंच पर आते ही वह बिखर जाते हैं। बहक जाते हैं। फिसल-फिसल जाते हैं। कुछ का कुछ बोल जाते हैं। अपने कहे पर अटल भी नहीं रहते। तुरंत ही बदल जाते हैं। छीछालेदर की हद तक। फिर कहानी उन का विषय नहीं है। लेकिन अखिलेश की कहानी वह ट्रेन के ट्वायलेट के पास भी जा कर पढ़ने का अतिरेक बता जाते हैं। जब कि अखिलेश भी अपठनीय लेखकों में शुमार हैं। बेहद अपठनीय लेखक हैं अखिलेश। हां , तद्भव के संपादक वह भले हैं। तमाम विवाद के बावजूद तद्भव में पठनीयता है। रवि भूषण तो एक लीगल नोटिस से डर जाने वालों में से हैं। आलोचना क्या खा कर करेंगे भला। वीरेंद्र यादव प्रेमचंद तक ही अपने को सीमित रखें तो बेहतर। अखिलेश , महुआ माजी आदि की बात करते समय वह दरबारी बन जाते हैं। उन का अध्ययन , उन की विद्वता का विरवा इस फेर में झुलस जाता है। तब जब कि महुआ माजी पर रचना चोरी का आरोप सिद्ध हो चुका है। कम से कम दो उपन्यास उन के चोरी के हैं। अब वह झारखंड का मंत्री स्तर का सरकारी पद भोग रही हैं। नरेश जी की तरह वीरेंद्र यादव भी अकसर बिखर और बहक जाते हैं। संतुलित नहीं रह पाते वह। वैचारिकी के विचलन का बोझ भी बहुत है उन के ऊपर। नतीज़तन वीरेंद्र यादव आलोचक नहीं , एक्टिविस्ट आलोचक बन कर उपस्थित हैं। चुनी हुई चुप्पियां , चुने हुए विरोध का जाल बहुत बड़ा है उन का। वह भूल गए हैं कि पूर्वाग्रह आप को बड़ा नहीं , छोटा बना देता है। जीवन हो या रचना या आलोचना। हर कहीं। बाक़ी हमारे यहां शव पर भी फूल चढ़ा कर सम्मान देने की परंपरा है। आप चढ़ाते रहिए फूल। रोक भी कौन रहा है। एक पूर्व सांसद की अंगरेजी में जो कहूं , हाऊ कैन यू रोक !

अच्छा यह बताइए कि चतुरसेन शास्त्री , अज्ञेय , मोहन राकेश , धर्मवीर भारती , कमलेश्वर , शिवानी , मन्नू भंडारी , मनोहर श्याम जोशी , ममता कालिया आदि तमाम महत्वपूर्ण लेखकों की चर्चा नामवर सिंह या अन्य आलोचकों ने भी नहीं की तो क्या यह लेखक ख़त्म हो गए ? ख़त्म हो जाएंगे भला ? इन के पाठक इन्हें मर जाने देंगे ? ऐसे तमाम लेखक और कवि हैं जिन के पाठक उन्हें जीवित बनाए रखते हैं। बनाए रखेंगे। आलोचक या संपादक नहीं। 

सौ बात की एक बात जब रचना बड़ी होती है तो आलोचक भी बड़ा होता है। रचना ही आलोचक को बड़ा बनाती है। मतलब यह कि रचना बड़ी तो आलोचक बड़ा। उदाहरण दे कर कहूं तो रामचंद्र शुक्ल आलोचक बड़े बने तो तुलसीदास और प्रेमचंद की रचना के कारण बने। रामचंद्र शुक्ल ने तुलसी और प्रेमचंद को ऐसा स्थापित किया कि आज तक तमाम ज़ोर के बावजूद कोई हिला न पाया। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसी तरह कबीर को स्थापित किया। रामविलास शर्मा बड़े आलोचक बने तो इस लिए कि निराला की रचना बड़ी थी। रामचंद्र शुक्ल , हजारी प्रसाद द्विवेदी , राम विलास शर्मा कभी किसी का दरबारी बन कर या असभ्य बन कर कुछ नहीं लिखते दिखते। स्पष्ट है कि आलोचक न रचना को बड़ा बना सकता है , न लेखक को। छोटी रचना को बड़ा बताने के चक्कर में आलोचक ख़ुद भी बौना बन जाता है। संजीव प्रसंग में दुर्भाग्य से यही हो गया है। आलोचक तो साधू होता है। अध्ययन का साधू। किसी खूंटे से बंध कर नहीं रहता। रमता जोगी , बहता पानी की तरह नहीं है आलोचक तो फिर काहे का आलोचक। कबीर कहते ही हैं :

जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान ।

मोल करो तलवार को पड़ा रहन दो म्यान ॥

तो लेखक और आलोचक को भी कबीर की राह चलना चाहिए। जातीय जहर से भरसक बचना चाहिए। रचना में भी , जीवन में भी। गोरख के शबद में जो कहूं :

मरो वै जोगी मरौ, मरण है मीठा। 

मरणी मरौ जिस मरणी, गोरख मरि दीठा॥ 

गोरख यहां अहंकार को मारने की बात करते हैं। गोरख वैसे भी कवियों के कवि हैं। कबीर , मीरा , नानक , जायसी आदि गोरख की शाखाएं हैं। गोरख की एक लंबी परंपरा है। पर हमारे आज के कवि , लेखक , आलोचक जाने किस अहंकार में चूर हैं। यह सारे विवाद अहंकार से ही उपजे हुए हैं। रही सही कसर वैचारिकी का कब्ज़ या वैचारिकी की पेचिश निकाल देती है। कहते ही हैं कि अज्ञान आदमी को अहंकारी बना देता हैं। 

प्रेमचंद तो गांधीवादी हैं। बतौर व्यक्ति भी और लेखक भी। लेकिन लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्षता की बिना पर प्रेमचंद को वामपंथी बना दिया जाता है। यह बहुत ही हास्यास्पद है। लगे हाथ एक बात और। वामपंथ की खाल ओढ़े लेखकों और आलोचकों ने एक ग्रंथि और बना दी है कि अगर आप वामपंथी नहीं हैं तो लेखक नहीं हैं। कवि नहीं हैं। आलोचक नहीं हैं। आदमी ही नहीं हैं। ग़ज़ब है यह नैरेटिव भी। एक कथा याद आती है। आप भी सुनिए। 

एक पुराना क़िस्सा है। एक बार एक आदमी किसी महत्वपूर्ण आदमी के पास गया। और कहा कि आप के लिए एक दैवीय वस्त्र ले आया हूं। वह व्यक्ति बहुत ख़ुश हुआ। कि वह दैवीय वस्त्र धारण करेगा। पर तभी उसे याद आया कि राज्य के एक मंत्री से उसे काम था। फिर उस ने सोचा कि क्यों न वह यह दैवीय वस्त्र उस मंत्री को भेंट कर दे। मंत्री ख़ुश हो जाएगा और उस का काम बन जाएगा। सो उस ने उस व्यक्ति से अपनी मंशा बता दी कि वह यह दैवीय वस्त्र उसे दे दे ताकि वह मंत्री को दे सके। उस व्यक्ति ने बताया कि यह दैवीय वस्त्र वह ख़ुद ही पहना सकता है। कोई और नहीं पहना या पहन सकता है। सो वह व्यक्ति मंत्री के पास उस आदमी को ले कर गया। मंत्री भी बहुत ख़ुश हुआ कि उसे दैवीय वस्त्र पहनने को मिलेगा। फिर वह बोला कि राजा के सामने मैं दैवीय वस्त्र पहनूंगा तो यह अच्छा नहीं लगेगा। ऐसा करते हैं कि यह दैवीय वस्त्र राजा को भेंट कर देते हैं। 

अब मंत्री उस दैवीय वस्त्र वाले आदमी को ले कर राजा के पास पहुंचा। राजा को दैवीय वस्त्र के बारे में बताया। और कहा कि यह आप को भेंट देने के लिए आया। राजा बहुत ख़ुश हुआ। मंत्री से कहा कि आप लोग मेरा इतना ख़याल रखते हैं , ऐसा जान कर बहुत अच्छा लगा। राजा दैवीय वस्त्र पहनने के लिए राजी हो गया। उस आदमी ने कहा कि दैवीय वस्त्र पहनने के लिए स्नानादि कर लें। फिर मैं पहनाऊं, इसे। राजा नहा-धो कर आए तो उस आदमी ने सब से कहा कि राजा को छोड़ कर सभी लोग बाहर चले जाएं। लोग कक्ष से बाहर निकल गए। अब राजा से उस आदमी ने कहा कि जो भी वस्त्र देह पर हैं , सब उतार दें। राजा ने उतार दिया। आदमी ने कहा कच्छा भी उतारिए। राजा ने आपत्ति की कि यह कैसे हो सकता है। आदमी ने कहा , दैवीय वस्त्र पहनने के लिए निकालना तो पड़ेगा। राजा ने बड़ी हिचक के साथ कच्छा भी उतार दिया। अब उस आदमी ने अपने थैले से कुछ निकाला जिसे राजा देख नहीं सका। फिर उस आदमी ने कुछ मंत्र पढ़ते हुए प्रतीकात्मक ढंग से राजा को दैवीय वस्त्र पहना दिया। और राजा से कहा कि अब कक्ष से बाहर चलें महाराज ! 

राजा ने पूछा , इस तरह निर्वस्त्र ? वह आदमी बोला , क्या कह रहे हैं , राजन ? क्या आप को दैवीय वस्त्र नहीं दिख रहा ? राजा ने कहा , बिलकुल नहीं। आदमी ने कहा , राम-राम ! ऐसा फिर किसी से मत कहिएगा। राजा ने पूछा , क्यों ? आदमी ने बताया कि असल में जो अपने पिता का नहीं होता , उसे यह दैवीय वस्त्र कभी नहीं दिखता। राजा बोला , ऐसा ! आदमी ने कहा , जी ऐसा ! अब राजा ने फ़ौरन पैतरा बदल दिया। दैवीय वस्त्र की भूरि-भूरि प्रशंसा शुरु करने लगा। राजा निर्वस्त्र ही बाहर आया तो लोग चौंके। कि राजा इस तरह नंगा ! पर लोग कुछ बोलते , उस के पहले ही उस आदमी ने लोगों को बताया कि जो आदमी अपने बाप का नहीं होगा , उस को यह दैवीय वस्त्र नहीं दिखेगा। राजा ने फिर से वस्त्र की भूरि-भूरि प्रशंसा शुरु की। राजा की देखा-देखी मंत्री समेत सभी दरबारी लोग भी राजा के दैवीय वस्त्र की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। कि क्या तो वस्त्र है ! कैसी तो चमक है ! ऐसा बढ़िया वस्त्र कभी देखा नहीं आदि-इत्यादि। अब चूंकि राजा ने दैवीय वस्त्र पहना था तो तय हुआ कि इस ख़ुशी में नगर में राजा की एक शोभा यात्रा निकाली जाए। 

राजा की शोभा यात्रा निकली नगर में। पूरे नगर की जनता देख रही थी कि राजा नंगा है। पर शोभा यात्रा के आगे-आगे प्रहरी नगाड़ा बजाते हुए उद्घोष करते हुए चल रहे थे कि आज राजा ने दैवीय वस्त्र पहन रखा है। लेकिन जो अपने बाप का नहीं होगा , उसे वह यह वस्त्र नहीं दिखेगा। जो अपने बाप का होगा , उसे ही यह दैवीय वस्त्र दिखेगा। अब नगर की सारी जनता राजा के दैवीय वस्त्र का गुणगान कर रही थी। भूरि-भूरि प्रशंसा कर रही थी। राजा के दैवीय वस्त्र के बखान में पूरा नगर मगन था। राज्य के किसी गांव से एक व्यक्ति भी अपने छोटे बच्चे को कंधे पर बिठा कर नगर आया था। बच्चे ने अपने पिता से पूछा , बापू राजा नंगा क्यों है ? उस व्यक्ति ने अपने बच्चे को दो थप्पड़ लगाया और बोला , राजा इतना बढ़िया कपड़ा पहने हुए है और तुझे नंगा दिख रहा है ? बच्चा फिर बोला , लेकिन बापू , राजा नंगा ही है ! अब गांव घर पहुंच कर उस आदमी ने अपनी पत्नी की अनायास पिटाई कर दी। पत्नी ने पूछा , बात क्या हुई ? वह व्यक्ति बोला , बोल यह बच्चा किस का है ? पत्नी बोली , तुम्हारा ही है। इस में पूछने की क्या बात है भला ? उस आदमी ने कहा , फिर इसे राजा का दैवीय वस्त्र क्यों नहीं दिखा ? बच्चा बोला , पर बापू राजा नंगा ही था ! उस आदमी ने फिर से बच्चे और पत्नी की पिटाई कर दी !

वामपंथी बिरादरी ने लेखकों में यही भ्रम फैला रखा है कि अगर आप वामपंथी नहीं हैं तो अपने बाप के नहीं हैं। सो सब के सब घर में घंटी बजा कर आरती गाते हुए बाहर वामपंथी बने हुए हैं। रचना और आलोचना कौड़ी भर की नहीं है पर वामपंथी होने की खाल ओढ़ कर , भ्रम भूज कर आप बहुत बड़े लेखक और आलोचक बनने की सुविधा और प्राथमिकता पा लेते हैं। नंगा राजा बने घूम रहे हैं। गुड है , यह भी !