Saturday, 24 July 2021

तो लखनऊ में लगी तमाम मूर्तियों में कोई मूर्ति तिलक , तराजू या तलवार का भी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं करती

 दयानंद पांडेय 

कांशीराम कभी अयोध्या में राम मंदिर की जगह शौचालय बनवाना चाहते थे। जो लोग कभी अयोध्या में राम मंदिर की जगह शौचालय , अस्पताल और विद्यालय बनाने की बात करते थे , वही लोग अब अयोध्या में मंदिर बनाने की बात बहुत ज़ोर-शोर से अयोध्या में जा कर करने लगे हैं। क्या तो वह साल-दो साल में राम मंदिर बना कर आप की हथेली पर रख देंगे। गोया मंदिर नहीं , मंदिर का नक्शा बनाना चाहते हों। एक कायदे का घर तो साल भर में बन नहीं पाता पर यह लोग भव्य राम मंदिर साल भर में बनाने की शेखी बघार रहे हैं। तिलक , तराजू और तलवार / इन को मारो जूते चार का नारा लगाने वाले यही लोग अब ब्राह्मणों को सिर पर बिठाने की बात फिर से करने लगे हैं। मनुवाद के नाम पर ब्राह्मणों के खिलाफ विष-वमन करने वाली फैक्ट्री पर जैसे ताला लग गया है। हाथी नहीं गणेश है , ब्रह्मा , विष्णु , महेश हैं का नारा धो-पोछ कर फिर बाहर निकाला गया है। पर इस पाखंडी , बिल्डर और मायावती की जूतियां साफ़ करने वाले सतीश मिश्रा से कोई पूछे तो बहुजन के नाम पर लखनऊ में लगी तमाम मूर्तियों में कोई मूर्ति तिलक , तराजू या तलवार का भी प्रतिनिधित्व क्यों नहीं करती। किसी ओ बी सी की भी कोई मूर्ति क्यों नहीं है। ब्रह्मा , विष्णु , महेश या गणेश भी क्यों नहीं दीखते इन मूर्तियों में कहीं। सिर्फ दलितों और बसपा के चुनाव चिन्ह हाथी की ही बहार क्यों है। एक बार मायावती के मुख्य मंत्री रहते मैं ने एक इंटरव्यू में उन से यही सवाल पूछ लिया था। मेरी नौकरी जाते-जाते बमुश्किल बची थी। वह इंटरव्यू भी नहीं छपा। 

जीते जी अपनी मूर्तियां लगवा लेने वाली मायावती गांधी को शैतान की औलाद कहती हैं । यह कह कर अराजकता फैलाती हैं । नफ़रत के तीर चलाती हैं । इन के आका कांशीराम की राजनीतिक पहचान ही इसी अराजकता के चलते हुई जब वह गांधी को शैतान की औलाद कहते हुए दिल्ली में गांधी समाधि पर जूते पहन कर भीड़ ले कर वहां पहुंचे । वहां तोड़-फोड़ की। गांधी समाधि की पवित्रता को नष्ट किया । उस गांधी समाधि पर जहां दुनिया भर के लोग आ कर शीश नवाते हैं । श्रद्धा के फूल चढ़ाते हैं ।

लोग यह क्यों भूल जाते हैं ? यह कौन मौकापरस्त लोग हैं ? ऐसे हिप्पोक्रेटों की शिनाख्त कर इन की सख्त आलोचना क्या नहीं की जानी चाहिए ?

ठीक है आप गांधी से असहमत हो सकते हैं , पूरी तरह रहिए , कोई हर्ज़ नहीं है । लेकिन किसी पूजनीय महापुरुष को आप शैतान की औलाद क़रार दें और उस की समाधि पर जूते पहन कर भारी भीड़ ले कर जाएं और वहां तोड़-फोड़ करें , पवित्र समाधि को अपमानित करें , अपवित्र करें । और आप चाहते हैं कि लोग आप के इस कुकृत्य को भूल भी जाएं ? इस लिए कि आप दलित हैं ? मुश्किल यह है कि हमारे तमाम हिप्पोक्रेट मित्र इस अराजक घटनाक्रम को याद नहीं करना चाहते । यह सब याद दिलाते ही उन्हें बुखार हो जाता है । वह दवा खा कर चादर ओढ़ कर सो जाते हैं । यह वही राजनीतिक संस्कृति है जो तिलक तराजू और तलवार , इन को मारो जूते चार बकती हुई कालांतर में किसी मूर्ख के अपशब्द के प्रतिवाद में उस की बेटी बहन को पेश करने की खुले आम नारेबाजी में तब्दील हो जाती है । क्यों कि लोग दलित एक्ट और दलित फोबिया के बूटों तले दबे हुए हैं । और हिप्पोक्रेट्स चादर ओढ़ कर , कान में तेल डाल कर सो जाना अपने लिए सुविधाजनक पाते हैं । ज़रुरत इसी मानसिकता और हिप्पोक्रेटों को कंडम करने की है । अभी से । क्यों कि गांधी को शैतान की औलाद कहना भी अपराध ही है । आप दलित हैं तो आप को किसी को कुछ भी कहने का अधिकार किस संविधान ने दे दिया ? गांधी को शैतान की औलाद कहना , किसी की बेटी बहन को पेश करने का नारा लगाना अपराध है । गोडसे हत्यारा है गांधी का लेकिन मायावती भी गांधी की चरित्र हत्या की दोषी हैं । राजनीति में गाली गलौज की दोषी हैं । मायावती और उन की बसपा को यह तथ्य भी ज़रुर जान लेना चाहिए कि भारत सिर्फ़ दलितों का देश नहीं है । दलित होने के नाम पर वह देश को ब्लैकमेल करना बंद करें । बहुत हो गया ।

Saturday, 17 July 2021

आप के रोल माडल आखिर बिन लादेन , बगदादी , बुरहान वानी या ज़ाकिर नाईक जैसे हरामखोर आतंकवादी ही क्यों हो गए हैं ?

दयानंद पांडेय 


हमारे कुछ मुस्लिम दोस्त हैं जो कुतर्क के ढेर सारे अमरुद बेहिसाब खाते जा रहे हैं । उन को गुमान बहुत है कि मुसलमानों ने इस देश को बहुत कुछ दिया है । और इस अंदाज़ में कह रहे हैं गोया वह अभी भी अरब में रह रहे हों , भारत में नहीं । जैसे मुगलों ने भारत को भाई चारा नहीं , कोई बख्शीश दी हो । आदि-आदि । गोया मुगल न आए होते तो भारत यतीम ही बना रहता । मुगलों ने भारत आ कर भारत को सोने की चिड़िया बना दिया वगैरह कुतर्क और तथ्यों से विपरीत बातें उन की जुबान में भरी पड़ी हैं । 

उन से कहना चाहता हूं कि पहले तो अपने को भारतीय समझ लीजिए । फिर इतिहास को ज़रा पलट लीजिए । पलटेंगे तो जानेंगे कि भारत सोने की चिड़िया मुगलों के आने के पहले था । ब्रिटिशर्स यहां व्यापारी बन कर आए थे लेकिन मुगल तो सीधे-सीध आक्रमणकारी बन कर आए थे । सोने की चिड़िया को लूट लिया । जाने कितने मंदिर लूटे और तोड़े बारंबार । समृद्धि , सुख-चैन लूट लिया । उन का आक्रमणकारी और लुटेरा रुप अभी भी उन से विदा नहीं हुआ है। मुसलमान अभी भी अपने को यहां का नागरिक नहीं समझते । भले किसी गैराज में कार धोते हों , मैकेनिक हों , किसी ट्रक पर खलासी हों , कहीं चाय बेचते हों । कहीं अफसर हों , इंजीनियर हों , अध्यापक हों या कुछ और सही पर समझते हैं अपने को रुलर ही । राहत इंदौरी जैसे शायर इसी गुमान में लिखते थे  , कब्रों की जमीनें दे कर हमें मत बहलायिये / राजधानी दी थी राजधानी चाहिए । ' हां रहन सहन भी , खान पान में भी योगदान ज़रूर है । रोटियां कई तरह की ले आए। मसाला आदि लाए , साथ में गाय का मांस खाने की ज़िद भी लाए । औरतों को खेती समझने की समझ , तीन तलाक का कुतर्क आदि ले आए। मज़हबी झगड़ा ले आए । जबरिया धर्म परिवर्तन का फसाद ले आए। भाई को मार कर , पिता को कैद कर राज करने की तरकीब ले आए।

अभी भी पूरी दुनिया को जहन्नुम के एटम बम पर बिठा दिया है , मनुष्यता को सलीब पर टांग दिया है । फिर भी कुतर्क भरा गुमान है कि भारत को बहुत कुछ दिया है तो आप की इस खुशफहमी का मैं तो क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता । यह गुमान आप को मुबारक । लेकिन आप यह तय ज़रूर कर लीजिए कि आप की यह चिढ़ सिर्फ़ संघियों , भाजपाईयों और गांधी के हत्यारों से ही है या समूची मनुष्यता से है ? आप के रोल माडल आखिर बिन लादेन , बगदादी , बुरहान वानी या ज़ाकिर नाईक जैसे हरामखोर आतंकवादी ही क्यों हो गए हैं ? उन के लिए आप छाती क्यों पीट रहे हैं भला ? सीमांत गांधी , ज़ाकिर हुसेन , ए पी जे अबुल कलाम या वीर हामिद जैसे नायक लोग कहां बिला गए आप की जिंदगी से । क्यों बिला गए ? और कि आप के भीतर से कोई बड़ा राजनीतिक क्यों नहीं निकल पाया ? आख़िर कभी कांग्रेस , कभी मुलायम , कभी लालू आदि के अर्दली और मिरासी बन कर ही मुस्लिम राजनीति संभव क्यों बन पा रही है ? अभी भी चेत जाईए , इंसान बन लीजिए पहले फिर मुसलमान भी बन लीजिएगा । शांति कायम रहेगी तभी हम आप इस तरह विमर्श कर सकेंगे । सहमति या असहमति जता सकेंगे एक दूसरे से । बम फोड़ कर , पत्थर फोड़ कर , किसी का गला रेत कर नहीं , किसी मासूम पर ट्रक चढ़ा कर नहीं ।

अगर मैं यह कहता हूं कि देश के मुसलमान सिर्फ़ मुसलमान नहीं देश के समझदार नागरिक बन कर रहना सीखें तो इस में नासमझी कहां से आ गई भला ? ग़लत क्या है भाई ? आख़िर देश में और भी अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं । सिख हैं , ईसाई हैं , बौद्ध हैं , जैन हैं , पारसी हैं । आख़िर इन लोगों को कोई मुश्किल क्यों नहीं होती ? इस लिए कि यह लोग देश में समझदार नागरिक की तरह मुख्य धारा में रहते हैं। न इन को किसी से तकलीफ होती है , न इन से किसी को तकलीफ होती है । हमारे मुस्लिम दोस्तों को भी मुख्य धारा में रहना , जीना सीख लेना चाहिए ।

हमारे कुछ मित्रों के पास जब तथ्य नहीं होते , तर्क नहीं होते , विवेक जवाब दे जाता है तब वह अमरीका , ट्रंप , मोदी , भाजपा , भक्त आदि का पहाड़ा पढ़ते हुए इस की ढाल ले कर कुतर्क की चाशनी में डूब कर सांप और सीढ़ी का खेल खेलने लगते हैं । बात आम की हो रही होती है , वह बबूल ले कर खड़े हो जाते हैं । गोया पूरी दुनिया पर अमरीका और मोदी का ही राज हो । ईराक , फ़्रांस , टर्की , सऊदी अरब , बांग्लादेश आदि हर कहीं यही ज़िम्मेदार हों। अजीब लाइलाज बीमारी है यह । कैंसर और एड्स से भी ज़्यादा खतरनाक । इन से कोई विमर्श करना या इन की विषय से भटकी बात पर इन्हें टोकना दीवार में सिर मारना होता है । इन का अजब माईंड सेट है । इन से सिर्फ़ पत्थर ही टकरा सकते हैं । या ऐसे कहें कि इन लोगों से सिर्फ़ अराजक लोग ही बात कर सकते हैं । क्यों कि पंचों की राय चाहे जो हो इन का खूंटा तो वहीं रहेगा । आप कुछ भी कहिए यह अपनी ढपली बजाते रहेंगे । या यूं कहिए कि भैंस की तरह पगुराते रहेंगे । 

एक कविता पर गौर कीजिए। लेकिन इस दर्द की दवा तुष्टिकरण के हरकारों और डाक्टरों के पास नहीं है। क्यों नहीं है , इस पर इन कठमुल्लों की जुबान सिली हुई है। गोया दानिश और तालिबान का हत्यारा रिश्ता इन्हें सर्वदा खामोश रखेगा। 


हम मुसलमान औरतें


अस्पतालों में मिल जाएँगी 

कचहरियों में मिल जाएँगी 

चकलाघरों में मिल जाएँगी 

रस्तों गलियों में ढेर की ढेर मिल जाएँगी हम


हाँ मगर मस्जिद में नहीं मिलेंगी 

हाँ मगर स्कूलों में नहीं पाओगे आप हमें 

मदरसों में पोंछा मारती मिल जाएँगी 

हाँ मगर बैंक हमारे लिए 

जन्नत की हक़ीक़त है अभी


ईद से पहले इतर तुलवाती मिल जाएँगी बज़ार में 

ईद के बाद ज़हर मंगवाती मिल जाएँगी 

हम हर जगह टकरा जाएँगी तुमसे 

काले बुरक़े और ऊँची एड़ी की चप्पलों में


मगर क्या आपने कभी की हमसे बात 

कि ये जंचगी के बाद क़दम लंगड़े क्यों पड़ने लगे 

कि निकाह के बाद सूरज के विटामिन की कमी 

क्योंकर हुई


आपको हम सब जगह मिल जाएँगी 

मगर क़ब्रिस्तान में नहीं मिलेंगी ज़िंदा

जैसे घरों में नहीं मिलेंगी ज़िंदा 

जैसे अपने अब्बा, भाई, आशिक़ और शौहर के साथ नहीं 

मिलेंगी ज़िंदा


आपने कभी पूछने की कोशिश की क्या 

मौत टीबी से भी होती है मौत बच्चेदानी की गठान से भी 

होती है और मौत कैल्सीयम की कमी से भी होती है


दंगाई ही केवल नहीं मारते साहब 

भगवे ही केवल नहीं मारते हजूर 

गाय का मीट खाने से तो मरते ही लोग आजकल 

मगर भूखे पेट बहुत दिन काटने पर भी 

होती है मौत


आपको कितनी जगह कितनी सूरत में मिली हम 

क्या आपने हमसे कभी कोई बात की

आप तो मशगूल थे इतिहास पर राजनीति पर 

बहस करने में 

आप बता दूँ मौत इतिहास में ही नहीं होती थी 

अब भी होती है और बहुत होती है और मुसलमान औरतों की


सबसे ज़्यादा होती है मौत


अभी एक फोटोग्राफर दानिश सिद्दीकी की अफगानिस्तान में हत्या हुई है। हत्या किसी भी की हो , दुर्भाग्यपूर्ण है। पर अपनी फोटुओं के मार्फत जहर का एजेंडा परोसने वाला , भारत में फासिस्ट -फासिस्ट का सर्वदा पहाड़ा पढ़ने वाले जहरीले दानिश सिद्दीकी की हत्या पर तो इन्हें गिला है पर तालिबानों ने दानिश को मारा , यह कहने में इन की सेक्यूलर जुबान को लकवा मार जाता है। क्यों बोलें , कैसे बोलें भला ! असली फासिस्टों को फासिस्ट कहने में इन्हें तकलीफ बहुत होती है। फासिस्ट तो छोड़िए , दानिश को तालिबानों ने उंकड़ू बैठा कर मारा यह बताने में भी जुबान सिल जाती है। तालिबानों ने हत्या की दानिश की यह तथ्य भी इन की जुबान और कलम से फिसल जाता है। गोया अश्वत्थामा मरो , नरो वा कुंजरों का भ्रम रचना चाहते हैं। गनीमत है कि यह नहीं कह पा रहे , इतनी बेशर्मी नहीं कर पा रहे कि तालिबानियों ने नहीं , फासिस्ट मोदी या योगी ने मरवा दिया फोटोग्राफर दानिश सिद्दीकी को। क्या पता कुछ दिनों बाद ऐसा भी कहने लग जाएं। अभी तो श्रद्धांजलि ही मांग रहे हैं मोदी से। लांछन लगाते हुए पूछ रहे हैं कि मोदी क्यों नहीं श्रद्धांजलि दे रहे !


Friday, 9 July 2021

पुलिस इनकाउंटर से जान बचा कर मुलायम सिंह यादव इटावा से साइकिल से खेत-खेत दिल्ली भागे

दयानंद पांडेय 

बहुत कम लोग जानते हैं कि जब विश्वनाथ प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे तब मुलायम सिंह यादव को इनकाउंटर करने का निर्देश उत्तर प्रदेश पुलिस को दे दिया था। इटावा पुलिस के मार्फत मुलायम सिंह यादव को यह खबर लीक हो गई। मुलायम सिंह यादव ने इटावा छोड़ने में एक सेकेण्ड नहीं लगाया। एक साइकिल उठाई और चल दिए। मुलायम सिंह यादव उस समय विधायक थे। 1977 में राम नरेश यादव और फिर बनारसीदास की सरकार में कैबिनेट मंत्री रह चुके थे। सहकारिता मंत्री रहे थे , दोनों बार। लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह उन दिनों बतौर मुख्य मंत्री , उत्तर प्रदेश दस्यु उन्मूलन अभियान में लगे थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह के पास पुष्ट सूचना थी कि मुलायम सिंह यादव के दस्यु गिरोहों से न सिर्फ सक्रिय संबंध थे। बल्कि डकैती और हत्या में भी वह संलग्न थे। फूलन देवी सहित तमाम डकैतों को मुलायम सिंह न सिर्फ संरक्षण देते थे बल्कि उन से हिस्सा भी लेते थे। ऐसा विश्वनाथ प्रताप सिंह का मानना था। 

तब तो नहीं लेकिन कुछ समय बाद दिल्ली के इंडियन एक्सप्रेस में पहले पेज पर तीन कालम की एक खबर छपी थी जिस में मुलायम सिंह की हिस्ट्री शीट नंबर सहित , उन के खिलाफ हत्या और डकैती के कोई 32 मामलों की डिटेल भी दी गई थी। इंडियन एक्सप्रेस में खबर लखनऊ डेटलाइन से छपी थी , एस के त्रिपाठी की बाई लाइन के साथ। एस के त्रिपाठी भी इटावा के मूल निवासी थे। लखनऊ में रहते थे। इंडियन एक्सप्रेस में स्पेशल करस्पांडेंट थे। बेहद ईमानदार और बेहद शार्प रिपोर्टर। कभी किसी के दबाव में झुकते नहीं थे। न किसी से कभी डरते थे। अपने काम से काम रखने वाले निडर पत्रकार। कम बोलते थे लेकिन सार्थक बोलते थे। फॉलो अप स्टोरी में उन का कोई जवाब नहीं था। बहुतेरी खबरें ब्रेक करने के लिए हम उन्हें याद करते हैं। कई बार वह लखनऊ से खबर लिखते थे पर दिल्ली में मंत्रियों का इस्तीफ़ा हो जाता था। चारा घोटाला तो बहुत बाद में बिहार में लालू प्रसाद यादव ने किया और अब जेल भुगत रहे हैं। पर इस के पहले केंद्र में चारा मशीन घोटाला हुआ था। लखनऊ से उस खबर का एक फॉलो अप एस के त्रिपाठी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा तो तत्कालीन कृषि मंत्री बलराम जाखड़ को इस्तीफ़ा देना पड़ा था। तो मुलायम सिंह यादव की हिस्ट्रीशीट और हत्या , डकैती के 32 मामलों की खबर जब इंडियन एक्सप्रेस में एस के त्रिपाठी ने लिखी तो हंगामा हो गया। 

चौधरी चरण सिंह तब मुलायम सिंह यादव से बहुत नाराज हुए थे। और मुलायम का सांसद का टिकट काट दिया था। इन दिनों जद यू नेता के सी त्यागी भी तब लोकदल में थे। त्यागी ने इस खबर को ले कर बहुत हंगामा मचाया था। इन दिनों कांग्रेस में निर्वासन काट रहे हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह भी तब लोकदल में थे और मुलायम के आपराधिक इतिहास को ले कर बहुत हल्ला मचाते रहे थे। यह 1984 की बात है। उन दिनों मुलायम उत्तर प्रदेश लोकदल में महामंत्री भी थे। उन के साथ सत्यप्रकाश मालवीय भी महामंत्री थे। मुलायम चौधरी चरण सिंह का इतना आदर करते थे कि उन के सामने कुर्सी पर नहीं बैठते थे। चौधरी चरण सिंह के साथ चाहे वह तुग़लक रोड पर उन का घर हो या फ़िरोज़शाह रोड पर लोकदल का कार्यालय , मैं ने जब भी मुलायम को देखा उन के साथ वह , उन के पैरों के पास नीचे ही बैठते थे। जाने यह सिर्फ श्रद्धा ही थी कि चौधरी चरण सिंह द्वारा जान बचाने की कृतज्ञता भी थी। 

बहरहाल मुलायम सिंह यादव को इनकाउंटर में मारने का निर्देश विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1981-1982 में दिया था। मुलायम सिंह यादव ने ज्यों इटावा पुलिस में अपने सूत्र से यह सूचना पाई कि उन के इनकाउंटर की तैयारी है तो उन्हों ने इटावा छोड़ने में एक सेकेण्ड की भी देरी नहीं की। भागने के लिए कार , जीप , मोटर साइकिल का सहारा नहीं लिया। एक साइकिल उठाई और गांव-गांव , खेत-खेत होते हुए , किसी न किसी गांव में रात बिताते हुए , चुपचाप दिल्ली पहुंचे , चौधरी चरण सिंह के घर। चौधरी चरण सिंह के पैर पकड़ कर लेट गए। कहा कि मुझे बचा लीजिए। मेरी जान बचा लीजिए। वी पी सिंह ने मेरा इनकाउंटर करवाने के लिए आदेश दे दिया है। 

इधर उत्तर प्रदेश पुलिस मुलायम सिंह को रेलवे स्टेशन , बस स्टेशन और सड़कों पर तलाशी लेती खोज रही थी। खेत और मेड़ के रास्ते , गांव-गांव होते हुए मुलायम इटावा से भाग सकते हैं , किसी ने सोचा ही नहीं था। लेकिन मुलायम ने सोचा था अपने लिए। इस से सेफ पैसेज हो ही नहीं सकता था। अब जब मुलायम सिंह यादव , चौधरी चरण सिंह की शरण में थे तो चौधरी चरण सिंह ने पहला काम यह किया कि मुलायम सिंह यादव को अपनी पार्टी के उत्तर प्रदेश विधान मंडल दल का नेता घोषित कर दिया। 

विधान मंडल दल का नेता घोषित होते ही मुलायम सिंह यादव को जो उत्तर प्रदेश पुलिस इनकाउंटर के लिए खोज रही थी , वही पुलिस उन की सुरक्षा में लग गई। तो भी मुलायम सिंह यादव  उत्तर प्रदेश में अपने को सुरक्षित नहीं पाते थे। मारे डर के दिल्ली में चौधरी चरण सिंह के घर में ही रहते रहे। जब कभी उत्तर प्रदेश विधान सभा का सत्र होता तब ही वह अपने सुरक्षा कर्मियों के साथ महज हाजिरी देने और विश्वनाथ प्रताप सिंह को लगभग चिढ़ाने के लिए विधान सभा में उपस्थित होते थे। लखनऊ से इटावा नहीं , दिल्ली ही वापस जाते थे। संयोग था कि 28 जून , 1982 को फूलन देवी ने बेहमई गांव में एक साथ 22 क्षत्रिय लोगों की हत्या कर दी। दस्यु उन्मूलन अभियान में ज़ोर-शोर से लगे विश्वनाथ प्रताप सिंह को इस्तीफ़ा देना पड़ा। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गई तो मुलायम सिंह यादव की जान में जान आई। चैन की सांस ली मुलायम ने। लेकिन मुलायम और विश्वनाथ प्रताप सिंह की आपसी दुश्मनी खत्म नहीं हुई कभी। मुलायम ने बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह के डइया ट्रस्ट का मामला बड़े ज़ोर-शोर से उठाया। 

तब के वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह बैकफुट पर आ गए थे। जनता दल के समय विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधान मंत्री थे और मुलायम उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री। तलवारें दोनों की फिर भी खिंची रहीं। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने का विश्वनाथ प्रताप सिंह का लालकिले से ऐलान भी मुलायम को नहीं पिघला पाया , विश्वनाथ प्रताप सिंह खातिर। वैसे भी मंडल के पहले ही उत्तर प्रदेश में बतौर मुख्य मंत्री रामनरेश यादव ने यादवों को आरक्षण पहले ही दे दिया था। 1977-1978 में। तो यादवों का मंडल आयोग से कुछ लेना-देना नहीं था। पर यादव समाज तो जैसे इतने बड़े उपकार के लिए रामनरेश यादव को जानता ही नहीं। खैर , लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोकने का श्रेय मुलायम न ले लें , इस लिए लालू प्रसाद यादव को उकसा कर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने बिहार में ही आडवाणी को गिरफ्तार करवा कर रथ यात्रा रुकवा दी थी। 

ऐसे तमाम प्रसंग हैं जो विश्वनाथ प्रताप सिंह और मुलायम की अनबन को घना करते हैं। जैसे कि फूलन देवी को मुलायम ने न सिर्फ सांसद बनवा कर अपना संबंध निभाया बल्कि विश्वनाथ प्रताप सिंह को अपमानित करने और उन से बदला लेने का काम भी किया। लेकिन जैसे बेहमई काण्ड के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह को मुख्य मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था , वैसे ही विश्वनाथ प्रताप सिंह किडनी की बीमारी के चलते मृत्यु को प्राप्त हो गए। मुलायम के जीवन का बड़ा कांटा निकल गया। जिस कांटे ने उन्हें साइकिल से खेत-खेत की पगडंडी से दिल्ली पहुंचाया था , संयोग देखिए कि मुलायम की समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान बन गया। 

शायद यह वही भावनात्मक संबंध था कि बेटे अखिलेश से तमाम मतभेद और झगड़े के बावजूद चुनाव आयोग में अखिलेश के खिलाफ शपथ पत्र नहीं दिया। क्यों कि शपथ पत्र देते ही साइकिल चुनाव चिन्ह , चुनाव आयोग ज़ब्त कर लेता। मुलायम समझदार , शातिर और भावुक राजनीति एक साथ कर लेने में माहिर हैं। उतना ही जितना एक साथ लोहिया , चौधरी चरण सिंह और अपराधियों को गांठना जानते हैं। आप जानिए कि वामपंथियों ने लोहिया को कभी पसंद नहीं किया। लोहिया को फासिस्ट कहते नहीं अघाते वामपंथी। लेकिन लोहिया की माला जपने वाले मुलायम सिंह यादव ने वामपंथियों का भी जम कर इस्तेमाल किया। 

उत्तर प्रदेश में तो एक समय वामपंथी जैसे आज कांग्रेस के पेरोल पर हैं , तब के दिनों मुलायम के पेरोल पर थे। भाकपा महासचिव हरिकिशन सिंह सुरजीत तो जैसे मुलायम सिंह यादव के पालतू कुत्ता बन गए थे। जो मुलायम कहें , हरिकिशन सिंह सुरजीत वही दुहराएं। मुलायम को प्रधान मंत्री बनाने के लिए हरिकिशन सिंह सुरजीत ने क्या-क्या जतन नहीं किए थे। पर विश्वनाथ प्रताप सिंह , उन दिनों अस्पताल में होने के बावजूद मुलायम के खिलाफ रणनीति बनाई , और देवगौड़ा की ताजपोशी करवा दी। मुलायम हाथ मल कर रह गए। एक बार फिर मौका मिला , मुलायम को लेकिन फिर लालू ने घेर लिया। 

ज्योति बसु की बात चली थी। लेकिन पोलित ब्यूरो ने लंगड़ी लगा दी। मुलायम की बात हरिकिशन सिंह ने फिर शुरू की। पर लालू के मुलायम विरोध के चलते इंद्र कुमार गुजराल प्रधान मंत्री बन गए। पर बाद में अपनी बेटी मीसा की शादी , अखिलेश यादव से करने के फेर में लालू , पत्नी और तब की बिहार मुख्य मंत्री राबड़ी देवी के साथ लखनऊ आए। ताज होटल में ठहरे। अमर सिंह बीच में पड़े थे । सब कुछ लगभग फाइनल हो गया था सो एक प्रेस कांफ्रेंस में लालू ने मुलायम का हाथ , अपने हाथ में उठा कर ऐलान किया कि अब मुलायम को प्रधान मंत्री बना कर ही दम लेना है। लालू उन दिनों चारा घोटाला फेस कर रहे थे। और बता रहे थे कि देवगौड़वा ने हम को फंसा दिया। खैर , विवाह भी भी मीसा और अखिलेश का फंस गया। अखिलेश ने बता दिया कि वह किसी और को पसंद करते हैं। यह 1998 की बात है। एक साल बाद 1999 में डिंपल से अखिलेश की शादी हुई। 

और इसी अखिलेश को 2012 में मुलायम ने मुख्य मंत्री बना कर पुत्र मोह में अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार ली। अखिलेश ने पिता की पीठ में न सिर्फ छुरा घोंपा बल्कि कभी कांग्रेस , कभी बसपा से हाथ मिला कर पिता की साइकिल को पंचर कर उसे अप्रासंगिक बना दिया। पिता की सारी राजनीतिक कमाई और अपनी राजनीति को चाचा रामगोपाल यादव के शकुनि चाल में गंवा दिया। एक चाचा शिवपाल को ठिकाने लगाते-लगाते समाजवादी पार्टी को ही ठिकाने लगा दिया। अब मुलायम साइकिल चला नहीं सकते , पराजित पिता की तरह अकेले में आंसू बहाते हैं। मुलायम ने भोजपुरी लोकगायक बालेश्वर को एक समय यश भारती से सम्मानित किया था। वही बालेश्वर एक गाना गाते थे , जे केहू से नाहीं हारल , ते हारि गइल अपने से ! 

मुलायम हार भले गए हैं , बेटे से पर साइकिल नहीं हारी है। हां , अखिलेश ने ज़रूर अपने लिए एक स्लोगन दर्ज कर लिया है कि जो अपने बाप का नहीं हो सकता , वह किसी का नहीं हो सकता । ऐसा औरंगज़ेब बेटा , भगवान किसी को न दे। क्या संयोग है कि शाहजहां को कैद कर , बड़े भाई दाराशिकोह की हत्या कर , औरंगज़ेब ने गद्दी हथिया ली थी और शाहजहां ने औरंगज़ेब से सिर्फ इतनी फ़रमाइश की थी कि ऐसी जगह मुझे रखो कि जहां से ताजमहल देख सकूं। औरंगज़ेब ने ऐसा कर भी दिया था। मुलायम भी चाहते तो अखिलेश की अकल ठिकाने लाने के लिए चुनाव आयोग में एक शपथ पत्र दे दिए होते। पर दे देते शपथ पत्र तो साइकिल चुनाव चिन्ह ज़ब्त हो जाता। न वह साइकिल फिर अखिलेश को मिलती , न मुलायम को। अपनी पार्टी , अपनी साइकिल बचाने के लिए शपथ पत्र नहीं दिया मुलायम ने । शाहजहां की तरह अब चुपचाप अपनी साइकिल देखने के लिए अभिशप्त हैं। वह साइकिल जिस पर बैठ कर वह कभी दिल्ली भागे थे , विश्वनाथ प्रताप सिंह की पुलिस के इनकाउंटर से बचने के लिए। विश्वनाथ प्रताप सिंह के इनकाउंटर से तो तब बच गए थे , मुलायम सिंह यादव लेकिन बेटे अखिलेश यादव के राजनीतिक इनकाउंटर में तमाम हो गए। अपनी पहलवानी का सारा धोबी पाट भूल गए। राजनीति का सारा छल-छंद भूल गए।