दयानंद पांडेय
कर्ण द्वापर में ही नहीं , कलयुग में भी होते हैं। कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम सिंह यादव के हिस्से। द्वापर में भी कर्ण की स्वीकार्यता नहीं थी , कलयुग में भी नहीं है। शायद कभी नहीं होगी। कर्ण सर्वदा से शापित है रहेगा। परशुराम से लगायत धरती तक के शाप हैं। प्रतीक यादव की यातना इतनी भर नहीं है। प्रतीक की स्वीकार्यता तो प्रेम विवाह के बावजूद पत्नी के पास भी स्वभावतः नहीं थी। जो भी कुछ था बस मुलायम की नंबर दो की संपत्ति का सहारा था। चाहे 5 करोड़ की फरारी कार हो , करोड़ो का जिम , अरबों के फ़ार्म हाऊस और रियल स्टेट व्यवसाय के भरोसे भी जीना आसान नहीं था। यह कर्ण होने की तोहमत ही थी कि प्रतीक कभी राजनीति में आने की सोच नहीं पाए। राजनीति में आते तो इतने प्रश्न पूछे जाते कि उन का जवाब मुलायम भी तब नहीं दे पाते। कर्ण तो फिर भी जानता था और लोग भी कि वह सूर्य पुत्र है।
पर प्रतीक ?
प्रतीक मिस्टर गुप्ता के बेटे थे कि मुलायम के , पब्लिक डोमेन में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है। राजनीति में आते तो यह सवाल विपक्ष पूछता या नहीं पूछता , अखिलेश यादव के लोग दाएं , बाएं से पूछते ज़रूर। जैसे कि आज ही अखिलेश यादव ने जिस शातिरपने से प्रतीक के बाबत प्रेस से बात की वह चौकाने वाला हरगिज नहीं था। अखिलेश ने कहा कि क़ानून और परिवार जो कहेगा वह करेंगे। यह कह कर अखिलेश कहना क्या चाहते थे ? सब को समझ आ गया। बाक़ी रहा सहा सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने प्रतीक की मृत्यु को संकेतों में हत्या और जांच करवाने की मांग कर सब कुछ कह दिया। ग़नीमत बस यही थी कि अपर्णा आसाम में थीं। लखनऊ में नहीं। अपर्णा अगर लखनऊ में होतीं तो सपा के लोग उन को फंसाने के लिए , लांछन लगाने के लिए कुछ भी कर गुज़र गए होते।
क्यों कि राजनीति का कीचड़ सिर्फ़ कमल ही नहीं खिलाता , और भी कई गुल खिला देता है। नारायणदत्त तिवारी , उज्ज्वला , राहुल प्रसंग हम देख चुके हैं। सारा खेल और व्यूह नरसिंहा राव ने तिवारी को मात देने के लिए रचा था। फिर राहुल का क्या हुआ , उज्ज्वला किस दुर्गति को प्राप्त हुई और कि नारायणदत्त तिवारी किस तरह अंतिम समय में अपमान को प्राप्त हुए किसी से छुपा हुआ नहीं है। हर कोई अटल बिहारी वाजपेयी जैसी किस्मत ले कर नहीं पैदा होता कि दागदार ज़िंदगी जी कर भी बेदाग़ निकल जाए राजनीति की इस काजल कोठरी से। सब को अटल जी जैसी गरिमा नहीं मिलती। छीछालेदर मिलती है। मुझे याद है जब राजीव गांधी राजनीति में आए तो कालाकाकर के राजा दिनेश सिंह से , जो तब सांसद भी थे , लोग उन के डी एन ए टेस्ट की बात करने लगे थे। इंदिरा गांधी तब प्रधान मंत्री थीं। ऐसी अनेक बातें हैं। अनेक क़िस्से हैं।
शायद इसी लिए प्रतीक हरगिज नहीं चाहते थे कि अपर्णा विष्ट भी राजनीति में आएं। लेकिन भातखंडे से संगीत की शिक्षा लिए अपर्णा पति के मन का यह संगीत नहीं सुन सकीं। अपर्णा की अपनी महत्वाकांक्षा थी l राजनीति में उन की महत्वाकांक्षा की पतंग नहीं उड़ सकी है अभी तक यह अलग बात है। प्रतीक और अपर्णा का संबंध , विवाह से पहले भी चर्चा में रहा था। अपर्णा के पिता पत्रकार हैं। हमारे कुलीग रहे हैं।
बचपन से ही प्रतीक सिर्फ़ संपत्ति की दुनिया में जीते रहे। सामाजिक , पारिवारिक और राजनीतिक जीवन उन्हें नहीं मिला। माँ के पूर्व पति गुप्ता परिवार में कभी पूछ नहीं हुई। मुलायम के सैफ़ई में यादव परिवार ने कभी साधना को ही स्वीकार नहीं किया तो प्रतीक को भी कौन स्वीकार करता। प्रतीक-अपर्णा की शादी भले सैफई में हुई पर सैफई ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। प्रतीक ने कोशिश भी नहीं की कि सैफई परिवार उन्हें अपना मान ले। न ही साधना गुप्ता ने। अभी जल्दी ही मुलायम की मृत्यु से ख़ाली हुई सीट पर उपचुनाव में डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाने की चर्चा में प्रेस से बातचीत में अपर्णा की बात चली तो रामगोपाल यादव ने प्रेस से स्पष्ट कहा कि वह हमारे परिवार की नहीं हैं। और बड़ी तल्खी से यह बात कही रामगोपाल यादव ने। गौरतलब है कि रामगोपाल यादव मुलायम के चचेरे भाई नहीं हैं जैसा कि लोग समझते हैं। सैफई के ही हैं पर मौसेरे भाई हैं रामगोपाल , मुलायम के। जिन के लिए मुलायम ने नाराज हो कर कहा था कि रामगोपाल ने अखिलेश का राजनीतिक कैरियर खा लिया। अखिलेश को कहीं का नहीं छोड़ा। लोग रामगोपाल को प्रोफ़ेसर रामगोपाल क्यों कहते हैं , समझ नहीं आता। रामगोपाल यादव कभी कहीं प्रोफ़ेसर नहीं रहे। यह भी जान लीजिए।
बहरहाल , बचपन प्रतीक का लखनऊ के इंदिरा नगर की राज्य संपत्ति विभाग के सरकारी कालोनी के एक घर में बीता। जहां साधना गुप्ता को बतौर पत्रकार कार्नर का एक बढ़िया घर आवंटित था l गो कि साधना गुप्ता कभी पत्रकार नहीं रहीं। उस सरकारी कालोनी में भी वह कटी-कटी सी रहती थीं l एक बार कीर्तन में पड़ोस की स्त्रियों को साधना ने बुला लिया। मुलायम ने इस का बहुत बुरा मान लिया। स्पष्ट बता दिया कि वहां लोगों में मिक्स अप नहीं होना है। तो जब साधना पर इतनी पाबंदी थी तो प्रतीक पर भी रही होगी। मुलायम ने साधना को रखैल होने की सीमा बता दी थी।
बाद के समय में अमर सिंह मुलायम के जीवन में आए। फिर जब सैफ़ई में अखिलेश यादव की माँ मालती यादव का निधन हो गया तो अमर सिंह ने साधना गुप्ता से मुलायम का गंधर्व विवाह करवा दिया। वह अब साधना यादव हो गईं। अखिलेश छोटे थे पर इतने भी नहीं कि मुलायम की इस हरकत का विरोध न कर सकें। किया। लेकिन मुलायम के दूसरे कार्यकाल में साधना गुप्ता बतौर पत्नी मुख्य मंत्री निवास में पूजा में शामिल हुईं और रहने लगीं l अखिलेश के डिफ्रेंसेज बने रहे l बल्कि बाद के समय में अखिलेश मुख्य मंत्री बने ही साधना गुप्ता के कारण। अखिलेश यादव के निरंतर ब्लैकमेलिंग से परेशान सौतेली मां साधना ने ही मुलायम को सलाह दी कि अखिलेश को मुख्य मंत्री बना दीजिए। रोज रोज की चिक चिक से फुर्सत मिले।
मुलायम बिलकुल नहीं चाहते थे अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री बनाना। पर जैसे कैकेयी के आगे दशरथ झुक गए थे , मुलायम साधना के आगे झुक गए। मुलायम की यह बहुत बड़ी राजनीतिक ग़लती थी। फिर तो मुख्य मंत्री बन कर अखिलेश जल्दी ही औरंगज़ेब बन गए और मुलायम को शाहजहां बना दिया। टाइम्स आफ इंडिया ने इस बात को जब छापा तो अखिलेश ने टाइम्स आफ इंडिया के संपादक को मुख्य मंत्री निवास में बुलाया। मारे गुस्से में संपादक की गरदन पर तलवार रख दी। बाद के समय में मुलायम को किस तरह पार्टी अध्यक्ष पद से हटा कर ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अखिलेश यादव , अब यह एक इतिहास है। मुलायम ख़ून के आंसू पी कर रह गए। मुलायम की ज़िंदगी में मालती और साधना के अलावा भी कई स्त्रियां आईं गईं। यथा आई ए एस अफसर रही अनीता सिंह आदि। कुछ राजनीतिक स्त्रियां भी। कई फ़िल्मी हीरोइने भी। सहारा शहर उन की ऐशगाह थी ही। पर सब कुछ के बावजूद उन का गुलमोहर साधना ही रहीं। वह दुष्यंत कुमार का एक शेर है न :
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
अच्छा हुआ कि साधना मुलायम के रहते ही चली गईं। नहीं प्रतीक से ज़्यादा मुश्किल उन्हें होती। अखिलेश यादव उन्हें रखैल डिक्लेयर करवा कर अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो अपने पिता की इज्जत नहीं कर सका , सौतेली मां , जिस ने उन की मां मालती यादव का जीते जी हक़ छीन लिया था , उस की इज्जत क्या ख़ाक करता ? सौतेले भाई ने खुद एक लक्ष्मण रेखा खींच ली थी। कोई दावेदारी नहीं की। न राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए , न आर्थिक उत्तराधिकार के लिए। मुलायम प्रतीक को इटावा के सैफई में भले प्रतीक को कुछ नहीं दे पाए पारिवारिक विरोध के चलते पर लखनऊ में भी विक्रमादित्य मार्ग पर जो सैफई बसाया और इक्का दुक्का सरकारी बंगलों को छोड़ कर , अपने मुख्य मंत्री काल में विक्रमादित्य मार्ग के सारे बंगले अपने परिवारीजनों के नाम पर ज़ोर ज़बर से रजिस्ट्री करवा लिया। नया-नया निर्माण करवा लिया। विक्रमादित्य मार्ग के इस सैफई में प्रतीक यादव को भी एक बड़ा सा बंगला दे दिया। बी आर चोपड़ा निर्मित धारावाहिक महाभारत की याद आती है। इस महाभारत की पटकथा और संवाद राही मासूम रज़ा ने लिखा था। सभी जानते हैं कि सिर्फ कर्ण ही नहीं सभी पांडव पुत्र पांडु से नहीं थे। सूर्य पुत्र , इंद्र पुत्र आदि की गाथा है। पर राही मासूम रज़ा ने इंद्र पुत्र , यह पुत्र , वह पुत्र आदि कहने की बजाय सभी को सिर्फ़ कुंती पुत्र लिखा। मुलायम ने भी यही कोशिश की।
महाभारत का एक क़िस्सा है जो सभी जानते हैं कि कृष्ण के पास अर्जुन और दुर्योधन एक ही दिन युद्ध में सहयोग मांगने गए थे। दुर्योधन पहले पहुंचा था। सो मारे अकड़ और मूर्खता के कृष्ण के सिरहाने बैठ गया। अर्जुन बाद में पहुंचा और पैताने बैठा। पहले अर्जुन को देख कर कृष्ण ने अर्जुन से बात की। यह कथा सभी जानते हैं। पर उसी बीच एक कथा और घटी थी। जब अर्जुन पहंचे तो दुर्योधन ने अर्जुन से तंज में पूछा , कहिए , इंद्र पुत्र कैसे आना हुआ। अर्जुन सिर झुका कर खून के घूंट पी कर चुप ही रहे। पर सोए हुए कृष्ण सचमुच सोए हुए नहीं थे। सब सुन रहे थे। तो जब अर्जुन से बात हो गई कृष्ण की तो वह दुर्योधन की तरफ मुखातिब हुए और बोले , कहिए व्यास नंदन , आप का कैसे आना हुआ ?
कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन से संबोधित कर बिना कुछ कहे बता दिया कि बेटा दुर्योधन , अर्जुन ही नहीं , तुम भी वही हो। मुलायम के यहां की महाभारत की कथा में भी ऐसे कई पेंच और कई मोड़ हैं। जो महाभारत से भी ज़्यादा रोमांचक और दिलचस्प हैं। कहने का कुल आशय यह कि प्रतीक की उम्र अभी ज़िंदगी जीने की थी। 38 वर्ष की उम्र जाने की नहीं होती। पर फरारी की सवारी गांठने वाले प्रतीक को अचानक जाना पड़ा तो इस में उन का कर्ण जैसा अभिशप्त जीवन भी एक बड़ा कारण है। बड़ा फैक्टर है। जिम का शौक़ , फिट रहने का नशा भी काम नहीं आया। इतनी सी उम्र में अरबपति खरबपति होने का दर्प भी नहीं बचा पाया। कर्ण हो या युधिष्ठिर हर किसी को इसी हिम में गल जाना है। बाक़ी सब मोह माया है। लोकलाज है। दिखावा है। दिखावटी आंसू हैं। दिखावटी ही शोकालाप है। सपा का हो , भाजपा का हो , किसी और का। रमानाथ अवस्थी लिख गए हैं : चाहे हवन का हो चाहे कफ़न का हो / धुएं का रंग एक है।
लेकिन कर्ण बहुत हैं। एक प्रतीक यादव ही नहीं।
