Friday, 26 June 2026

हाई हेडेड स्त्रियों में ममत्व अनुपस्थित होता है : दयानंद पांडेय

दयानंद पांडेय से डाक्टर सुरभि सिंह की बातचीत 


बचपन से ही आपके निकटतम किस स्त्री  के सान्निध्य और व्यवहार ने सबसे अधिक प्रभावित किया? 

- अम्मा से ज़्यादा आज तक कोई और प्रभावित नहीं कर पाया। अम्मा के दुःख , अम्मा के सुख जैसे मेरे ही दुःख और सुख थे। बचपन में भी , जवानी में भी और बाद के समय में भी। अम्मा अब नहीं हैं। फिर भी जब भी कभी कोई दुःख या सुख का क्षण होता है , सब से पहले अम्मा ही याद आती है। अम्मा और भगवान कई बार साथ उपस्थित मिलते हैं। लोग भगवान की पूजा कर वरदान मांगते हैं। मैं अम्मा को याद कर उन से आशीर्वाद मांगता हूं। संरक्षण और शुभकामना मांगता हूं। अम्मा को याद कर सुख को इंज्वाय कर लेता हूं , दुःख को बिसार देता हूं। आप यह जान कर शायद हंसेंगी कि अकसर पत्नी को भी मम्मी कह कर गुहराता हूं। शुरू में बच्चों के साथ-साथ , खेल-खेल में मम्मी कहता रहता था। बाद में आदतन कहने लगा। घर में रहते हुए अब हम दो ही हैं तब भी मम्मी कह कर बुलाता हूं। किसी ज़रूरत के समय तो पक्का। पत्नी के अनेक नाम रख रखे हैं। किसिम-किसिम के। अच्छे-अच्छे भी , ऐसे-वैसे भी। कुछ धार्मिक टाइप के , कुछ भदेस टाइप के भी। कुछ फ़िल्मी टाइप के। कुछ प्रेम के , कुछ तंज के। पत्नी में भी कई बार अम्मा के रंग दिखते रहते हैं। जब विवाह नहीं हुआ था तब गांव में अकसर दादी , चाची लोग अकसर बात-बेबात नौकी माई का ताना देती रहती थीं। नौकी माई मतलब पत्नी। तब का वह मजाक , वह तंज अब समझ में आता है। कि अम्मा के बाद अगर ज़िंदगी में सचमुच कोई सब से ज़्यादा ख़याल रखता है तो वह पत्नी ही हैं। कोई और नहीं। पत्नी में अम्मा , बहन , बेटी , सखी , सहचर सभी समाए हुए हैं। 

हमारी अम्मा की सखियों ने भी अपने स्नेह से निरंतर सिंचित किया है। शक्ति दी है। बुआ , मौसी , चाची , मामी लोग भी। कुछ महिला मित्रों ने भी मुझे बहुत प्रभावित किया है। कैसा भी दुःख हो , दुःख में देहरी और चौखट बन कर साथ दिया है। कभी-कभी सोचता हूं कि धरती पर , जीवन में स्त्रियां न होतीं तो हमारा यह जीवन रेगिस्तान की तरह तपता रहता। हम जीते और रहते भी कैसे इस निष्ठुर दुनिया में। सुंदर स्त्रियां भी मुझे बहुत मोहित करती हैं। मन में जीवन जीने का हुलास भरती हैं। सपने को सोने पर सुहागा बनाती रहती हैं। सुंदर स्त्रियां हैं तो जीवन बहुत सुंदर हैं। स्त्रियों का सान्निध्य पुरुष को मनुष्य बनाए रखने में बहुत सहायक है। मनुष्यता में स्त्रियों का योगदान बहुत है। तो इस लिए भी कि स्त्रियां जैसी भी हों , जो भी हों , उन में ममत्व होता है। बहुत होता है। प्रेम कर रही स्त्री में ममत्व ही तो मिलता है। ममत्व न हो तो प्रेम कहां और कैसा। यह ममत्व ही है जो स्त्रियों को देना सिखाता है। कुछ हाई हेडेड स्त्रियों में यह ममत्व अनुपस्थित होता है तो उन से भरसक कतरा जाता हूं। बच्चा बन कर उन्हें भुला देता हूं। अपनी ही एक कविता में इस बात को तफ़सील से कहना चाहता हूं : 

तो मैं बच्चा बन जाता हूं 

जब कोई बेशऊर औरत बदसुलूकी करती है

बेवज़ह अपमानित करती मिलती है
बदमिजाजी का अंधेरा फैलाने लगती है
तो इस सब से बचने के लिए , इस से उबरने के लिए
मैं पुरुष नहीं रह जाता , बच्चा बन जाता हूं
इस लिए कि बच्चे बुरी बात बहुत जल्दी भूल जाते हैं
बच्चे हर औरत में अपनी मां पाते हैं

किसी औरत को इज़्ज़त देने का
यह सब से महफूज़ तरीक़ा है
कि हम बच्चे बन जाएं
औरत सलामत है तो बच्चे सलामत हैं

औरत और बच्चे मिल कर एक खूबसूरत दुनिया बनाते हैं
किसी फूल के बागीचे सी महकती और चहकती दुनिया
बच्चा बन कर औरत से जो मांगो दे देती है
ममत्व के पाग में सान कर अपनी जान भी

बात-बेबात खून बहाने वाले क्या जानें 
कि अपने दूध के रूप में अपना खून ही तो पिलाती है औरत
और मां बन जाती है
सिर्फ़ बच्चा पैदा करने से औरत मां नहीं बनती
मुकम्मल मां बनती है अपने दूध का क़र्ज़ दे कर
यह क़र्ज़ अभी तक दुनिया में कोई भी उतार नहीं पाया

इसी लिए
जब कोई बेशऊर औरत बदसुलूकी करती है
बेवज़ह अपमानित करती मिलती है
बदमिजाजी का अंधेरा फैलाने लगती है
तो मैं बच्चा बन जाता हूं

●  आपके मन में स्त्री संवेदना का विकास कैसे हुआ? 

- संवेदना ? 

स्त्री न हो तो संवेदना अरे मनुष्यता भी धरती में समा जाए। स्त्री , शिशु और प्रकृति ने मिल कर मेरी संवेदना की शिराओं को सिंचित किया है। स्पष्ट है कि संवेदना की गंगोत्री अम्मा से ही प्रस्फुटित होती है। ऐसे जैसे चंदन की सुगंध में घुली मिसरी। संवेदना का कोई निश्चित छंद , मीटर या पैमाना नहीं होता। कब और कहां उपस्थित हो जाए , नहीं जानता। कई बार अनुपस्थित भी हो जाती है। आप को बताऊं कि मैं रोता भी बहुत हूं। बात - बेबात रो पड़ता हूं। अपने दुःख में तो कभी नहीं रोता पर दूसरों के दुःख देख अनायास रो पड़ता हूं। कोई सिनेमा देख कर , कुछ पढ़ कर सुबुक-सुबुक कर रोने लगता हूं। कई बार तो अपनी ही कहानी या उपन्यास लिखते हुए पात्रों की स्थिति पर रोने लगता हूं । अपनी ही कहानी , उपन्यास पढ़ कर भी रोने लगता हूं। प्रूफ़ पढ़ रहा हूं , रोता जा रहा हूं। रोना अपने हाथ में नहीं होता। आप फिर हंसेंगी यह सुन कर कि विवाह के बाद पत्नी को विदा कराते समय पत्नी को रोते देख कर मुझे भी रोना आ गया था। रोने लगा था। छुप कर। मुंह पर हाथ लगा कर। यह देख कर कुछ लोग हंसने लगे। इतना ही नहीं भाइयों की बहुओं की विदाई करते समय , बहुओं को रोते देख मेरे भी आंसू निकल आए। हर बार। पहले गांव से जब गोरखपुर शहर पढ़ने गया तो जब भी छुट्टियों में घर आता तो वापसी में अम्मा से लिपट कर बहुत रोता था। चुपचाप। इस तरह कि कोई देख न ले। अम्मा भो रोती , मैं भी। बचपन से आख़िर तक का यह सिलसिला है। शहर आ कर भी अम्मा के लिए अकेले में रोता रहता था। यहां तक कि जब नौकरी के लिए दिल्ली चला गया तब भी यह रोना नहीं गया। बाद में जब विवाह हो गया और कुछ दिनों तक पत्नी भी गांव में रहीं तो चलते समय पहले पत्नी से मिल कर रोता फिर अम्मा से मिल कर रोता। अजब सिलसिला था यह। पत्नी जब कभी दिल्ली से गोरखपुर जातीं या लखनऊ से भी तब भी यह रोना चलता रहता था। हंसता भी बहुत हूं। बल्कि रोने से ज़्यादा हंसता हूं। पर हंसना तो लोग देख लेते हैं , रोना नहीं। रोना छुप-छुप होता है। वह एक गाना है न छुप-छुप मीरा रोए , दर्द न जाने कोए। स्थिति यही होती है। यह रोना क्या है ? संवेदना ही तो है। फिर स्त्री से ज़्यादा दुःख दुनिया में किस के साथ है ? एक कथाकार होने के कारण स्त्री संवेदना को मैं नहीं जानूंगा तो क्या आप जानेंगी ? स्त्री संवेदना जाने बिना कोई कवि या कथाकार कैसे हो सकता है ? आप मेरे उपन्यास या कहानियां पढ़िए। कविताएं पढ़िए। बिना स्त्री की उपस्थिति के कोई रचना नहीं मिलेगी। स्त्री है तो संवेदना होगी ही। स्त्री और संवेदना दोनों एक सिक्के के दो पहलू हैं। जैसे देह में मांस और ख़ून। 

●  इस संग्रह में किस कहानी और उसके नारी पात्र ने आपको सर्वाधिक प्रभावित किया? 

- ऐसा नहीं कह सकता कि इस एक कहानी या किसी एक नारी पात्र ने सर्वाधिक प्रभावित किया। सभी कहानी , सभी पात्र प्रभावित करते हैं तभी किसी कथा में समाते हैं। कहूं कि अपने आप आ जाते हैं। अनायास आ जाते हैं। किसी पात्र को बुलाना नहीं पड़ता कि आओ , तुम आओ इस कथा में। वह तो ख़ुद ब ख़ुद आ जाते हैं। कंधे पर , सिर पर चढ़ कर आते हैं। दिल में क़लम में समा जाते हैं। वही हमें बुलाते रहते हैं। अपने पीछे-पीछे नचाते रहते हैं। कथा शुरू करना भले हमारे हाथ में हो पर शुरू करने के बाद पात्र ही मुझे संचालित करते हैं। ऐसे जैसे वह कोई गाड़ीवान हों। और मुझे हांक रहे हों। हम चरित्रों के हाथ में होते हैं। चरित्र हमारे हाथ में नहीं होते। जिधर वह चाहते हैं , हांक ले जाते हैं। नारी चरित्र या कोई भी चरित्र प्रभावित नहीं करेंगे तो वह कथा में आएंगे ही क्यों ? किसी तरह गिरते-लड़खड़ाते आ भी गए तो आ कर करेंगे भी क्या ? गूंगे बन कर बैठे रहेंगे। उन्हें कोई पढ़ेगा भी क्यों ? उस से भी पहले मैं उन्हें लिखूंगा भी क्यों। काट कर फेक दूंगा। 

●  "तुम्हारे बिना" कहानी की पृष्ठभूमि क्या है ? इसे शीर्षक कहानी चुनने के पीछे क्या कारण रहा।

- पृष्ठभूमि प्रेम ही है। किसी भी कथा में , कविता में प्रेम तभी ताक़तवर बन कर उपस्थित होता है जब वह विछोह को प्राप्त होता है। पंत जी ने लिखा ही है : 

 वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान। 

निकल कर आंखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।

शीर्षक कहानी तो मैं लेकिन रखना चाहता था। पर प्रकाशक की राय थी कि शीर्षक कैची होना चाहिए। लेकिन शब्द में प्रकाशक को कैच नहीं मिल रहा था। तो तुम्हारे बिना ही उपयुक्त लगा। प्रेम और स्त्री विमर्श की सशक्त कहानी है तुम्हारे बिना। प्रेम कहानियां और प्रेम के कथ्य वाले उपन्यास बहुत हैं हमारे पास। पर ऐसी काव्यात्मक भाषा में बहुत कम कहानियां लिखी हैं मैं ने। विपश्यना में प्रेम उपन्यास में भी यही काव्यात्मक भाषा है। कथा में काव्यात्मक भाषा , कथा को तरल , सरस और प्रवाहमान बना देती है। हर बात के अनेक अर्थ उपस्थित करती है। प्रेम को गहनता और परिपूर्णता देती है। काव्य अपने आप में प्रेम है। फिर कथा में काव्यात्मक भाषा उसे संगीतमय बना देती है। सातो सुर अनायास बजने लगते हैं। ऐसे जैसे राग खमाज। काव्यात्मक भाषा कथा के लोच और लचक को अर्थवान बना देती है। पठनीयता में मिसरी सी मिठास और चंदन सी सुगंध का भास देती है। सुगंध और सुमन की तरह एक हो जाती है कथा। 

 ● क्या "लेकिन" कहानी के सरोकार या संदर्भ आज के समय में उपस्थित हैं ?

- लेकिन इसी आज की कथा है। हर शहर , हर गांव की कथा है। सुलगती और दहकती हुई , जलती हुई कथा है। कोई प्राचीन कथा नहीं। स्त्रियां ही नहीं , पुरुष भी पीड़ित होते हैं। आज के समाज की ज्वलंत समस्या है यह। अनेक घटनाएं समाज में घट रही हैं। बेटियों से प्रताड़ित और अपमानित पिताओं की कहानियों को लोग जानने तो लगे हैं पर लिखने से कतराने में भलाई सोचते हैं। ऑनर किलिंग की ख़बरें बहुत छपती हैं , अख़बारों में। बेटियों से , पत्नियों से प्रताड़ित पुरुषों की ख़बरें लोकलाज में दब जाती हैं। अपने आसपास निगाह दौड़ाइए। पाइएगा कि जाने कितने मृत्युंजय मिश्रा गुमनाम हो गए। लोकलाज के नाम पर ऑनर किलिंग नहीं की , आत्महत्या नहीं की। ख़ुद को जैसे मार कर गुमनाम जीवन जीने को अभिशप्त हो गए। वह मृत्युंजय मिश्रा जो अपनी बेटी को बहुत प्यार करते थे , कैरियर बनाने के लिए बेटी को पूरी स्वतंत्रता दी। पूरा विश्वास किया। सारी सुविधा दी। पर बेटी ने न सिर्फ़ पिता से छल किया , पीठ में छुरा घोंपा। मुंह पर कालिख लगा कर परिवार और समाज में लांछित कर दिया। सम्मानित और प्रतिष्ठित मृत्युंजय मिश्रा के पास गुमनाम ज़िंदगी के सिवाय कोई और रास्ता शेष नहीं रहा। नैतिकता , शुचिता और सामाजिकता की जो ध्वनि और मर्यादा उपस्थित है लेकिन में , शायद मेरी किसी और रचना में नहीं। स्त्री विमर्श का यह नया पड़ाव है लेकिन। नया संदर्भ और नया उन्वान है लेकिन। 

● "शिकस्त" कहानी लिखते समय बिना लाग-लपेट के आपने अपनी कह दी ।इस निर्भीकता का आधार क्या रहा ?

- सत्ता के गलियारों में ऐसे अनेक गलीज लोग धंसे पड़े हैं। मंत्री और मुख्यमंत्री बन गए हैं। एक समय था कि हम लोग राजनैतिक शब्द लिखते थे। पर राजनीति में नैतिकता का इतना क्षरण हुआ , होता ही गया क्रमशः कि राजनैतिक को राजनीतिक लिखने लगे। पर अब यह राजनीतिक शब्द भी शर्म से गड़ गया है। पहले सत्ता कारपोरेट और इंडस्ट्री का भविष्य और वर्तमान तय करती थी। अब कारपोरेट , इंडस्ट्री सत्ता किस की होगी , कैसे होगी , यह तय करने लगे हैं। पावर ब्रोकर ने बहुत मज़बूत स्थिति बना ली है अपनी। सत्ता में भी , कारपोरेट में भी। नैतिकता , शुचिता अब गुम हो चुकी गौरैया है , राजनीति और सिस्टम में। पावर ही महत्वपूर्ण है। कुछ और नहीं। मनी पावर और औरत की कॉकटेल है सत्ता। शिकस्त की कथा यही तो है। कि एक पावरफुल मंत्री शिकस्त पर शिकस्त खाते हुए भी पावर ब्रोकर बन कर उपस्थित हो जाता है। उस का कैरियर अचानक राजनीति से पावर ब्रोकर में शिफ़्ट हो जाता है। जब तक वह यह जान पाता है , तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। 

रचनाकर्म में  में आधी आबादी की भूमिका क्या मानते हैं ?

- आधी आबादी ही तो रचना का मेरुदंड है। आधार स्तंभ है। दुनिया की ज़्यादातर रचनाएं आधी आबादी की दुनिया में ही न्यस्त और व्यस्त हैं। किसी भी रचना में अगर आधी आबादी की अनुपस्थिति है तो रचना शुष्क हो जाती है। नीरस और बांझ हो जाती है। 

 ● महिला रचनाकारों  में किसका लेखन सर्वाधिक प्रभावित करता है?

- मैं लेखन को स्त्री और पुरुष रचनाकार में बांट कर देखने का अभ्यस्त नहीं हूं। फिर भी महादेवी वर्मा अभी तक मानक हैं। महादेवी की रचनात्मक सरहद और व्यक्तित्व को अभी तक कोई स्त्री रचनाकार लांघ नहीं सकी है। 

●  स्त्रियों की समस्या का चित्रण इतनी वास्तविकता से कैसे कर पाते हैं ?

- इस लिए कि स्त्रियां मुझे प्रिय हैं। मेरे हृदय के क़रीब हैं। स्त्रियों के बिना अपने को अधूरा ही नहीं , अनुपस्थित पाता हूं। 

●  स्त्री विमर्श स्वयं स्त्रियों के द्वारा ही उपेक्षित है क्या आप सहमत हैं ?

- स्त्री विमर्श , दलित विमर्श , यह विमर्श , वह विमर्श साहित्यिक राजनीति के दांव-पेंच हैं। कुछ और नहीं। स्त्रियों को कालिदास कम समझते हैं कि तुलसीदास ? आप को मालूम है कि वाल्मीकि ने जो रामायण लिखी है , सीता की बताई कथा , विवरण और यातना से गुज़र कर लिखी है। वनवास के समय सीता वाल्मीकि के आश्रम में रही थीं। इसी वाल्मीकि रामायण को आधार बना कर दुनिया भर की भाषाओं में रामायण लिखी गई। वेदव्यास ने जो महाभारत लिखी उस में गांधारी , कुंती , द्रौपदी या किसी भी स्त्री पात्र के साथ अन्याय किया है क्या ? तुलसी तो श्री राम चरित मानस में राक्षस स्त्रियों को भी माता कह कर मिलते दीखते हैं। मीरा ने क्या कृष्ण को किसी पुरुष कवि से कम समझा है ? मुझे लगता है कि मीरा ने जितना कृष्ण को समझा और गाया है किसी और ने नहीं। रचनाकार को निष्कलुष होना चाहिए , तभी वह सच्ची रचना लिख सकता है। स्त्री , पुरुष , जाति , धर्म , समुदाय में विभक्त हो कर लिखने वाला रचनाकार टुच्चा होता है। लोक उसे स्वीकार नहीं करता। रचनाकार धरती की तरह होता है। रचना बीज की तरह। रचना में ताक़त होती है तो पत्थर फोड़ कर भी अंकुरित हो जाती है। रचना बड़ी होती है तो आलोचक भी बड़ा हो जाता है , उस रचना के बारे में लिख कर। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जायसी , तुलसी , प्रेमचंद की रचनाओं पर लिखा तो वह बड़े आलोचक हो गए। क्यों कि वह बड़ी रचनाओं के बारे में लिख रहे थे। रामचंद्र शुक्ल के पहले तो लोग तुलसीदास को भक्त मानते थे , कवि नहीं। रामचंद्र शुक्ल ने तुलसीदास को ऐसे परिभाषित किया कि वह दुनिया के सब से बड़े कवि मान लिए गए हैं। जो कि वह सर्वदा से हैं। निराला को तो कुछ लोगों ने साज़िशन चोर घोषित कर दिया था। पर एक आलोचक हुए राम विलास शर्मा। राम विलास शर्मा ने निराला की साहित्य साधना तीन खंड में लिख कर बताया कि निराला विश्वस्तरीय कवि हैं। किट्स और शैली से बड़े कवि। दुनिया को यह स्वीकार करना पड़ा। 

एक बार निराला ने गांधी को घेर लिया। गांधी ने कहा था कि हिंदी में कोई एक रवींद्रनाथ टैगोर क्यों नहीं है ? निराला ने गांधी की आंख में आंख डाल कर पूछा था कि आप ने हिंदी में किसी को पढ़ा भी है ? गांधी निरुत्तर थे। महादेवी वर्मा इस किस्से को बहुत तन्मय हो कर सुनाती थीं। ऐसे ही एक बार नेहरू काशी में कुछ लेखकों से मिले। जिन में जयशंकर प्रसाद , रामचंद्र शुक्ल , प्रेमचंद आदि उपस्थित थे। नेहरू ने भी इन लेखकों की उपस्थिति में कहा था कि हिंदी में दरबारी कविता लिखी जाती है। हिंदी में कोई एक रवींद्रनाथ टैगोर नहीं है। यह ख़बर और फ़ोटो अख़बारों में छपी। बाद में निराला ने नेहरू को भी टोका। नेहरू से कहा कि जो लेखक काशी में आप के साथ बैठे थे वह रवींद्रनाथ टैगोर से बड़े नहीं तो कम भी नहीं हैं। उन का बड़प्पन था के आप के लिहाज में उन्हों ने आप से कुछ कहा नहीं। नेहरू निराला के आगे चुप हो गए।

आज नारी विमर्श के  चित्रण की आवश्यकता क्यों है ?

- नारी विमर्श कब नहीं था। किस भाषा के साहित्य में नहीं था। कि अब हो गया है। भारत में रामायण और महाभारत दोनों ही नारी विमर्श की रचनाएं हैं। रामायण के केंद्र में सीता हैं तो महाभारत के केंद्र में द्रौपदी। सीता अनुपस्थित हो जाएं तो रामायण में क्या शेष रहेगा ? महाभारत से द्रौपदी को अनुपस्थित कर दीजिए , महाभारत कौन लिखेगा और कौन पढ़ेगा ? 

●  आप की कहानियों के स्त्री पात्र बेहद निर्भीक होते हैं। उन्हें उन्मुक्त कहना उनके साथ अन्याय करना होगा,वे निरीह नहीं हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो आपने अपने अपने स्त्री पात्रों को बुलंद और बेबाक दिखाया है चाहे वह किसी भी रूप में हो इसका क्या कारण है?

- - इस लिए कि स्त्रियां निर्भीक हैं। सर्वदा से निर्भीक हैं। हम ने उन्हें निर्भीक नहीं बनाया है। निरीह और निर्भीक स्त्री भी होती है , पुरुष भी। पुरुष हो या स्त्री , निर्भीक और निरीह स्थितियां उसे बनाती बिगाड़ती रहती हैं। कोई लेखक नहीं। 

[ डॉ सुरभि सिंह द्वारा लिखित पुस्तक दयानंद पांडेय की कहानियों में नारी विमर्श का नया वितान से साभार ]