Tuesday, 14 April 2026

आग

दयानंद पांडेय 


एक समय ज़िंदगी उस की बहुत ख़ूबसूरत थी। बचपन और जवानी थोड़े संघर्ष में बीती। पर उम्र के मध्य में उस की ज़िंदगी पटरी पर आ गई। ख़ूबसूरत हो गई। दिन सोने के , रात चांदी की हो गई। सफलता उस के क़दम चूमती। नौकरियां वह ऐसे बदलता जैसे कपड़े बदल रहा हो। शुरू में आदर्श , विचारधारा , नैतिकता , शुचिता की भी बात करता था। पर धीरे - धीरे सब तिरोहित होती गई। सफलता की नदी में सब मछली की तरह कूदती-फांदती , बहती किसी मछुआरे के जाल में फंसती गईं। लेकिन यह सब तब न उसे दिखा न किसी ने दिखाया। तब तो पैसा था। महल जैसा घर था। सुख-सुविधाओं की झड़ी थी। पैसा था , शराब था , औरतें थीं। दूसरों के दुःख या सुख की चिंता से वह बहुत दूर था। 

सफलता की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते वह एक दिन रिटायर हो गया। वृद्ध हो गया। 

उम्र के मध्य में जैसे वह सुख की नदी में नहाता था , उम्र के आख़िरी पड़ाव में वह दुःख की नदी में नहाने लगा। दुःख की नदी में डूबने-उतराने लगा। परिवार संभाले नहीं संभल रहा था। पत्नी बीमार रहने लगी। ऐसे जैसे बीमारियों का भंडार बन गई थी। ऐसी कौन सी बीमारी थी जो उसे न हो। बच्चों को अच्छे स्कूल और कालेज में पढ़ाया था। पर बेटा घनघोर शराबी निकल गया। सिगरेट फूंकता , मसाला खाता , शराब पीता। यही उस की ज़िंदगी थी। रही-सही कसर बेटी ने निकाल दी। जाने किस के साथ घर छोड़ कर भाग गई। उस का सारा सामाजिक और आर्थिक साम्राज्य एक क्षण में किसी मिट्टी की दीवार की तरह भहरा कर गया। वह लोगों से अकसर कहता रहता था कि असल कमाई तो बच्चे ही होते हैं। बच्चे अच्छे निकल जाएं तो वही सब से बड़ी कमाई हैं। नालायक़ निकल जाएं तो सारी कमाई व्यर्थ। कोई मतलब नहीं। 

उस का कहा , अब उस के ही गले में किसी सांप की तरह डस रहा था। पर वह करता भी तो क्या करता। 

सब से बड़ा सवाल उठा कि बीमार पत्नी की सेवा कैसे हो। बीमारियों से उसे घबराहट होती है। सेवा भाव उस में नहीं है। वह ख़ुद तो चाहता है कि कोई उस की सेवा करे। पर दूसरों की सेवा करना उस के स्वभाव में नहीं। शुरू में पत्नी की सेवा के लिए उस ने नर्स रखी। पर काम वाली और नर्स के झगड़े बढ़ते जाते। वह कभी काम वाली बदलता। कभी नर्स बदलता। परेशान हो गया। फिर उसे पता चला कि शहर में एक ऐसा अस्पताल है जहां वृद्ध लोगों को ही रखा जाता है। उन की बीमारी , भोजन , देखरेख , सफाई , नहलाना , धुलाना सब होता है। इस के लिए सत्तर हज़ार महीने का पैकेज था। दवा और विशेषज्ञ डाक्टर का खर्च अलग। उस ने पत्नी को उसी अस्पताल में भर्ती करवा दिया। पैसे खर्च होते थे पर सेवा से छुट्टी थी। पत्नी से मिलने जाता रहता था। पत्नी ख़ुश नहीं थी इस अस्पताल में आ कर। लेकिन दुःखी भी नहीं थी। क्यों कि उस का रूटीन जीवन आसान हो गया था। 

एक रात को अस्पताल से फ़ोन आया कि पत्नी की तबीयत ज़्यादा बिगड़ गई है। आ जाइए। ड्राइविंग कब का छोड़ चुका था। ड्राइवर नहीं था। वह परेशान हो गया। रात के दो बजे थे। वह एक पड़ोसी के घर गया। काल बेल बजाता रहा। उस का कुत्ता भौंकता रहा पर दरवाज़ा नहीं खुला। घर लौट कर दो-तीन दोस्तों को फ़ोन किया। किसी का फ़ोन नहीं उठा। ओला , ऊबर बुक करना कभी सीखा ही नहीं। ज़रूरत ही नहीं पड़ी कभी। पलट कर उस ने अस्पताल को फ़ोन किया। अपनी दिक़्क़त बताई और कहा कि कोई एम्बुलेंस ही सही भेज दें ताकि वह आ सके। एम्बुलेंस का चार्ज दे देगा। थोड़ी देर में एम्बुलेंस आ गई। वह सुबह के चार बजे अस्पताल पहुंचा। पता चला कि पत्नी का देहांत दस मिनट पहले ही हो गया। आख़िरी समय न पत्नी उसे देख सकी , न वह उसे देख सका। न कोई बात हो पाई। कोई दुःख-सुख साझा नहीं कर सके दोनों। वह पत्नी का हाथ थामे बड़ी देर तक बैठा रहा। रो भी नहीं सका। आंखें जैसे पथरा गई थीं। सुबह होने का इंतज़ार करता रहा। फिर अस्पताल वालों से ही कहा कि वह अकेला है सो अंतिम क्रिया कर्म की व्यवस्था भी वही लोग करवा दें। अस्पताल वालों को इस का अभ्यास था। वह अकसर ऐसे अकेले लोगों की व्यवस्था करने के अभ्यस्त थे। अकेले पड़ गए , पैसों वालों का ही अस्पताल था भी यह। 

सुबह होने पर उस ने कुछ दोस्तों , परिजनों और रिश्तेदारों को वाट्सअप कर के सूचना दे दी। अंत्येष्टि का समय और जगह भी बता दिया। तीन-चार दोस्त और एक रिश्तेदार अस्पताल आ गए। कुछ ने फ़ोन किया। कुछ ने वाट्सअप पर ही श्रद्धांजलि दे कर छुट्टी ले ली। सोसाइटी के लोगों को भी वाट्सअप ग्रुप पर सूचना दे दी। वाट्सअप ग्रुप पर श्रद्धांजलियों का तांता लग गया। पर श्मशान घाट पर आए सिर्फ़ दो लोग। कुछ परिवारीजन ज़रूर आ गए। विद्युत् शवदाह में पत्नी का दाह संस्कार कर घर आ गया। परिजनों के आ जाने से शोक आदि की ट्रेडिशनल चीज़ें भी हो गईं। लोगों ने सलाह दी कि बारह दिन वाला श्राद्ध वग़ैरह करने की जगह आर्य समाजी तरीक़ा ठीक रहेगा। किसी के पास रुकने के लिए समय नहीं था। उस ने सलाह मान ली। तीन दिन में सब कुछ हो गया। परिजन चले गए।  

पत्नी भले अस्पताल में रहती थी। पर एक भरोसा था कि कोई साथ है। अब यह भरोसा भी टूट गया था। लोग कहते हैं बुढ़ापे में तीन ही चीज़ काम आती है। स्वास्थ्य , पैसा और पत्नी। पत्नी चली गई। पैसा भी अब बहुत नहीं रह गया था। प्राइवेट नौकरी के कारण पेंशन नहीं थी। बचत और इनवेस्टमेंट से काम चल रहा था। स्वास्थ्य भी लड़खड़ा चुका था। परिवार का कोई साथ नहीं था। वह अपनी ज़िंदगी से ऊब गया था। पूरी तरह ऊब गया था। अकेलापन उसे काटता था। उस ने अपनी डायरी में लिखा :

मन करता है , श्मशान घाट पर जा कर लेट जाऊं l कोई आग लगा दे l


[ अप्रैल , 2026 पाखी में प्रकाशित ]