Thursday, 29 September 2022

सफ़र में फ्रांसीसी

पेंटिंग : अवधेश मिश्र 


दयानंद पांडेय

बनारस में गंगा घाट की सीढ़ियां उसे छोड़ नहीं रही थीं। लेकिन रिजर्वेशन था और ट्रेन का समय हो चला था सो वह भरी दोपहर गंगा का मोह छोड़ कर स्टेशन के लिए रवाना हो गया। रांड़ , सांड़ , संन्यासी की छवि वाला यह शहर अपने मोह के धागे में उसे शुरू ही से बांधता रहा है। बनारस की गलियां , यहां की फक्क्ड़ई और लोगों का लगाव यहां के जाम जैसा ही है। कभी छोड़ता नहीं। यह जाम ही है जो उसे स्टेशन से एक किलोमीटर पहले ऑटो छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा है। बार-बार यह पूछने पर कि , ' और कितना समय लगेगा ? '

' समय से पहुंचना मुश्किल जान पड़ रहा है। जैसा जाम दिख रहा है , लगता है , मेरे साथ तो आप की ट्रेन पक्का छूट जाएगी। ' ऑटो वाले ने स्पष्ट बता दिया है।

' फिर ? '

' आप उतर कर पैदल चले जाइए। ' ऑटो वाले ने कहा , ' तब शायद ट्रेन मिल जाएगी। '

वह सामान समेत ऑटो से उतर कर पैदल चल पड़ा स्टेशन के लिए। तेज़-तेज़ चलता हुआ। ट्रैफिक में रास्ता बनाता हुआ। जगह-जगह उपस्थित गाय और सांड़ को प्रणाम करता हुआ। रास्ता बनाता हुआ हांफते-डांफते किसी तरह स्टेशन पहुंचा। पता चला कि प्लेटफार्म भी आख़िरी वाला है। किसी तरह भागता हुआ प्लेटफार्म पर पहुंचा। अपनी कोच खोजता हुआ प्लेटफार्म पर चल ही रहा था कि ट्रेन सरकने लगी। सामने दिख रहे डब्बे में घुस गया। लेकिन उस के घुसते ही ट्रेन अचानक रुक गई। शायद किसी ने चेन पुलिंग कर दी है। खैर वह तमाम डब्बे लांघता हुआ अपनी कोच और बर्थ तक पहुंच गया। ट्रेन अभी भी रुकी हुई है। अभी अपनी बर्थ पर अपने को वह व्यवस्थित कर ही रहा था कि एक गेरुआधारी कमंडल लिए प्रसाद बांटते , काशी और गंगा जल का माहात्म्य बताते ,  दक्षिणा मांगते उपस्थित हैं। उन से हाथ जोड़ लेता हूं। लेकिन सामने की बर्थ पर दो फॉरेनर दिख जाते हैं। उन के माथे पर विश्वनाथ मंदिर का चंदन पहले ही से लगा हुआ है। गेरुआधारी उन्हें अपने जाल में लपेटना शुरू कर देते हैं। लेकिन वह दोनों भी उस की ही तरह मुस्कुराते हुए हाथ जोड़ लेते हैं। यह देख कर उसे बरबस हंसी आ गई। गेरुआधारी उस पर भुनभुनाते हुए आगे बढ़ जाते हैं।  ट्रेन फिर सरकने लगी है।

एक फॉरेनर के हाथ में कोई एक किताब है। वह उस किताब का नाम पढ़ने की कोशिश करता है। पर बहुत कोशिश के बावजूद पढ़ नहीं पाता। पहले उसे लगा था कि यह अंगरेजी की कोई किताब होगी। पर वह अंगरेजी की किताब नहीं थी। मजबूरन उसे पूछना पढ़ा , ' यू फ्राम  ? '

' फ़्रांस !'

वह समझ गया है कि उस फॉरेनर के हाथ में जो किताब है , फ्रेंच में है। फ्रेंच जिस में साइंस और टेक्नॉलजी की सब से ज़्यादा किताबें हैं। लेकिन लोग समझते हैं ज्ञान विज्ञान की सारी किताबें अंगरेजी में हैं। जब कि ऐसा नहीं है। हां , अंगरेजी ने यह होशियारी ज़रूर की है कि फ्रेंच में लिखी साइंस की सारी किताबों को अंगरेजी में बिना अनुवाद किए जस का तस उठा लिया रोमन में। बता दिया कि यह अंगरेजी है। फ्रेंच पीछे रह गई , अंगरेजी आगे निकल गई। कोई भी व्यक्ति , कोई भी भाषा इसी होशियारी , इसी लचीलेपन और इसी उदारता से आगे बढ़ सकती है । जैसे अंगरेजी बढ़ गई। ठस हो कर अड़ियल हो कर नहीं बढ़ सकती थी अंगरेजी। हर अच्छी चीज़ को बिना किसी ना नुकुर के पूरी ईमानदारी से स्वीकार कर लेना ही तरक्की की बड़ी निशानी होती है।

दोनों फ्रांसीसियों से जब उस ने यह बात कही तो उन के चेहरों पर कड़वाहट भरी मुस्कान आ गई। अंगरेजी जैसे उस की टूटी फूटी और कामचलाऊ थी , वैसे ही इन दोनों फ्रांसीसियों की अंगरेजी भी टूटी फूटी और कामचलाऊ ही थी। लेकिन बतियाने के लिए काफी थी। मामूली सी केप्री और टी शर्ट पहने दोनों फ्रांसीसी पचास , पचपन के आस पास के थे। दोनों ही बचपन के दोस्त थे। उन का दोस्ताना अब तक अपनी बुलंदी पर था। उन्हें उम्मीद थी कि उन का दोस्ताना आजीवन चलेगा। पूछा कि , ' इंडिया कैसे आना हुआ ? कोई ख़ास काम ?'

' नो वर्क , वनली ट्रेवलिंग। '

पता चला दोनों गज़ब के घुमक्क्ड़ हैं। घुमक्क्ड़ी उन का नशा है , पैशन है। हर साल वह कहीं न कहीं घूमने के लिए निकल जाते हैं। हर साल कम से कम एक महीना दुनिया का कोई न कोई देश घूमते हैं। उस ने उन के मामूली कपड़ों पर नज़र डालते हुए पूछ लिया है , ' फिर तो आप लोग काफी पैसे वाले , रिच लोग हैं। '

' नो , नो ! नाट रिच। ' वह दोनों बताते हैं कि एक दोस्त छोटी सी नौकरी में है। जब कि दूसरे की एक छोटी सी दुकान है। लेकिन घूमना उन का जूनून है। विद्यार्थी जीवन से ही उन को घूमने का नशा है। पहले फ़्रांस के भीतर ही दोनों साथ-साथ घूमते थे , अब पूरी दुनिया घूम रहे हैं। सो हर महीने इस घूमने के लिए छोटी-छोटी बचत करते रहते हैं। जहां भी जाते हैं पूरी प्लानिंग कर के जाते हैं। गूगल आदि से हर जगह के बारे में जानकारी इकट्ठा करते हैं। दूरी , खर्चा सब का गुणा भाग करते हैं। अमूमन पेइंग गेस्ट का ऑप्शन लेते हैं। या फिर कोई सस्ता गेस्ट हाऊस। होटल तो कभी सोचते ही नहीं। सामान बहुत कम रखते हैं। इस बात पर उस ने चेक किया कि उन दोनों के पास एक-एक हैण्ड बैग ही है। जिन में चार , छह कपडे से ज़्यादा की जगह नहीं है। तब जब कि वह महीने भर से इंडिया घूम रहे हैं। दूसरी तरफ वह है जो सिर्फ़ चार दिन के लिए बनारस आया था लेकिन बड़ा सा सूटकेस ले कर। उसे अपनी बेटी की कही बात याद आ जाती है , ' पापा कहीं जाइए तो कम से कम सामान ले कर चला कीजिए। आराम रहता है। ज़्यादा सामान रहने से आदमी घूमता कम है , सामान ज़्यादा ढोता है। ' पर जाने क्यों वह दो दिन के लिए भी कहीं जाता है तो कम से कम चार , छह सेट कपड़ा रख कर चलता है कि पता नहीं क्या पहनने का मन कर जाए। और वह न रहने पर अफ़सोस हो। हां , जहाज की वजन सीमा ने ज़रूर ज़्यादा सामान ले कर चलने पर ब्रेक लगा दिया है। लेकिन इन फक्क्ड़ फ्रांसीसियों को देख कर लगता ही नहीं कि इतने कम कपड़ों में भी महीना भर घूमा जा सकता है। वह उन से पूछता भी है , ' इतने कम कपड़ों में कैसे काम चलता है ? '

' कोई दिक्कत नहीं होती। ' वह बड़े ठाट से बताता है , ' घूमने आए हैं , कपड़ा पहनने नहीं। ' उस का दूसरा साथी  जैसे जोड़ता है , '  हियर नो फैशन परेड ! '

' अच्छा , जब कपड़े गंदे हो जाते हैं तब ? '

' जहां ठहरते हैं , वहीँ साबुन से धो कर सुखा लेते हैं। '

' लांड्री में नहीं देते ? ‘ वह पूछता है।

' नो !' वह बोलता है , ‘ यह तो खर्चा बढ़ाना हुआ। '

वह दंग है फ्रांसीसियों की इस सादगी पर। उन की इस कमखर्ची पर।

' अच्छा आप लोग सपरिवार क्यों नहीं घूमते। बिना परिवार के घूमने पर आप उन को मिस नहीं करते ? ' वह जोड़ता है , ‘ बिना परिवार के कहीं घूमना मुझे नहीं भाता । मिस करता रहता हूं , वाइफ को , बच्चों को । '

' मिस तो हम भी करते हैं। ' एक फ्रांसीसी बोला , ' लेकिन कभी-कभी विद फेमली भी घूमने निकले हैं। पर एक तो खर्च ज़्यादा हो जाता है। दूसरे , हर साल बीवियां घूमना नहीं चाहतीं। ' दूसरे  फ्रांसिसी ने बीच में जोड़ा , ' जूनून नहीं है  ट्रेवलिंग का उन लोगों में । शौक नहीं है। '

' ओ के। ' कह कर उस ने पूछ लिया है कि , ' बनारस कैसा लगा ? '

' शानदार ! गंगा और गंगा का किनारा। हटने का , छोड़ने मन नहीं करता। आरती , बोटिंग आल थिंग , वेरी व्यूटीफुल। ' तब तक दूसरा फ्रांसीसी , फ्रांसीसी लहजे में बोला , ' हर हर गंगे , हर हर महादेव ! ' फिर दोनों ही बनारसीपन के विवरण और उस के विस्तार में आ गए । बताने लगे कि शहर कोई भी हो , अमूमन वह शहर को भी ज़्यादातर पैदल चलते हुए देखते हैं। टैक्सी वगैरह से बचते हैं।

' क्या आप लोग स्प्रिचुवल हैं ? ' उस ने उन्हें कुरेदने की कोशिश की।

' नो , नो ! ' दोनों एक साथ बोले , ' वी आर वनली फनी !' एक ने जैसे जोड़ा , ' फनी ट्रेवलर !' वह बनारस और बनारसी लहजे को अख्तियार करने की कोशिश करते हैं। किसी भी टूरिस्ट की तरह बनारस उन्हें भा गया है। सारनाथ भी गए थे एक दिन। दोनों बताने लगे हैं कि वह तो चार दिन बनारस रह कर लौट रहे हैं। बनारस में और रहना चाहते थे। मंदिर , गंगा और घूमना चाहते थे। लेकिन फरदर प्लान और रिजर्वेशन के कारण वह जल्दी लौट रहे हैं। वह उन्हें बनारस और मोक्ष के विवरण में ले जाता है।  तो एक फ्रांसीसी बोला , ' यस यस आरती। हम ने आरती देखी है। गंगा आरती। व्यूटीफुल !'

' आप को मालूम है कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक बनारस , जिस का एक नाम काशी भी है , भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी है। धरती पर नहीं। '

' ओह नो , डोंट नो। '

पर वह उन्हें राजा हरिश्चंद्र , उन के सत्य , दान और डोम की नौकरी का किस्सा अपनी टूटी-फूटी अंगरेजी में नैरेट करता है। दोनों यह किस्सा मुंह बा कर सुनते हैं। सुन कर बोलते हैं , हाऊ इट्स पॉसिबिल ! '

' बट इट वाज !' वह आहिस्ता से बताता है। 

वह दोनों कंधे उचका कर रह जाते हैं।  फिर वह बनारस का डिटेल बताने लगते हैं। डिटेल बताते-बताते एक जगह विस्मय से उन की आंखें फैल जाती हैं। उन का विस्मय है कि यह कैसे संभव है कि एक ही सड़क पर सांड़ , गाय और आदमी एक साथ चलते हैं। ख़ास कर बनारस की सड़कों पर जगह-जगह सांड़ का उपस्थित होना , उन का गोबर में लिथड़े होना , उन्हें कतई अच्छा नहीं लगा है। यह बताने पर कि काशी की एक पहचान में यह भी शुमार है। रांड़ , सांड़ , संन्यासी की अवधारणा भी बताता है वह । पर दोनों फ़्रांसिसी इसे ठीक नहीं मानते। मुंह बिचका कर रह जाते हैं।

उन्हें हर हर महादेव की याद दिलाते हुए बताता हूं कि सांड़ के ही प्रतिरुप बंसहा बैल यानि नंदी महादेव की सवारी कही जाती है। तो एक फ़्रांसिसी बोला , ' इट्स ओके , बट वेरी हारेबिल !'

कोई स्टेशन आ गया है। कोई ट्रेन में चढ़ रहा है , कोई उतर रहा है। गहमागहमी सी है। हमारे ऊपर की ख़ाली बर्थ पर एक फैशनेबिल महिला आ गई हैं। चाहती हैं कि मैं ऊपर चला जाऊं और वह नीचे की बर्थ ले लें। विनय पूर्वक मना करता हूं। बताता हूं कि हम लोग साथ हैं और हमारी बातचीत चल रही है। महिला दोनों फ्रांसीसियों को घूरती है और उस से पूछती है , ' आप इन के गाइड हो ? '

' नहीं , सहयात्री हूं !'

महिला मुंह बनाती हुई ऊपर के बर्थ पर चली गई है। ट्रेन चल पड़ी है। वह बाहर देख रहा है। किसी खेत में झुंड की झुंड महिलाएं पानी भरे खेत में धान रोप रही हैं। वह सोचता है कि शायद धान रोपती यह औरतें कोई लोकगीत भी ज़रुर गा रही होंगी। जैसे उस के गांव में गाती हैं। उधर ऊपर की बर्थ से महिला की नाक बजने लगी है दिनदहाड़े। इधर दोनों फ्रांसीसियों से उस की बातचीत जारी है। वह बता रहे हैं कि यह सफ़र उन का आगरा के लिए है। तीन दिन वह आगरा में रुकेंगे। ताजमहल देखेंगे। मथुरा और वृंदावन भी। फतेहपुर सीकरी भी। पेइंग गेस्ट के रूप में उन की जगह बुक है छह सौ रुपए प्रतिदिन के हिसाब से। बनारस में भी छह सौ रुपए प्रतिदिन के हिसाब से रुके थे। इंटरनेट ने सब कुछ बहुत आसान कर दिया है। वह बता रहे हैं कि फ़्रांस से भी वह पहले दिल्ली आए थे। आगरा से होते हुए दिल्ली लौटेंगे। वहां भी रुकने की जगह बुक है। दिल्ली से  फ़्रांस के लिए एयर टिकट बुक है। भारत घूम कर दोनों फ़्रांसिसी बहुत खुश हैं। यह पूछने पर कि , ' क्या वह फिर भारत घूमने आएंगे ? '

' श्योर । अभी साऊथ इंडिया हमारे प्लान में है। ' वह बोले , ' इस बार नार्थ इंडिया का ही प्लान था। '

' कभी नार्थ ईस्ट का भी प्लान कीजिए। '

' श्योर ! ' कहते हुए उन के हाथ में इंडिया का नक्शा आ गया है।

' और किन-किन देशों की यात्रा कर ली है उन्हों ने ? '

' पूरा यूरोप , पूरा अमरीका। ' एक फ़्रांसिसी बोला , ' अब इधर की बारी है। '

' चीन गए हैं कभी ? '

' यस। बट चीन इज वेरी चीटिंग कंट्री। कदम कदम पर चीटिंग है। ' कहते हुए दोनों फ्रांसीसियों के चेहरे का ज़ायका बिगड़ गया है। '

' और पाकिस्तान ? '

' नो , नो ! ' एक फ़्रांसिसी अपना चेहरा बिगाड़ते हुए बोला , ' सोच भी नहीं सकते। '

' क्यों ? '

' इट्स टेररिस्ट कंट्री। नाट सेफ फार टूरिस्ट। ' वह बोला , ' नेवर !' उस के चेहरे पर अजब सी दहशत थी। पेरिस में दिल दहला देने वाली आतंकवादी घटनाओं की तफसील में दोनों फ़्रांसिसी आ गए। बहुत देर तक वह उसी तफ़सील में उलझे रहे। बिस्किट खाते हुए , चाय पीते रहे और पेरिस को इस्लामिक आतंकवाद ने कैसे तहस नहस कर दिया था , देखते ही देखते कितने लोगों की जान चली गई थे के डिटेल में वह आ गए थे। भूल गए थे काशी की गंगा और उस का दिलकश नज़ारा। आरती और बोटिंग। सांड़ और उस की विद्रूपता। आगरा के ताजमहल की ख़ूबसूरती की चर्चा भी वह करना भूल गए। गनीमत थी कि लखनऊ आ गया था। मैं उतरने लगा तो डब्बे से उतर कर वह दोनों फ़्रांसिसी भी प्लेटफार्म पर आ गए। उसे सी आफ करने। दोनों उस से गले लगे और सेल्फी ली। लेकिन उन के चेहरे पर आतंक की इबारत जैसे तारी थी।

स्टेशन से वह घर आ गया है। नहा-धो कर बिस्तर पर मसनद लगा कर बैठ गया है। पर उस के कान में अभी भी गूंज रहा है , ' फनी ट्रैवलर ! ' साथ ही वह सोचता है , कभी अवसर मिला , पैसा इकट्ठा हुआ तो वह भी दुनिया घूमेगा। कम से कम फ्रांस तो घूमेगा ही। ऐसा सोचते ही उस ने नेट पर फ़्रांस के बारे में जानकारियां सर्च करनी शुरु कर दी है। उसे याद आ गया है कि उस के शहर की यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग के लेक्चरर जो कभी अंग्रेजीदां थे पर फ्रांस से रिसर्च कर जब लौटे थे तो कहते थे , ' यह तो फ्रांस जा कर ही समझ में आया , 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल !' भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध कविता निज भाषा का यह दोहा , वह जब तब सुनाते रहते थे। उस ने पाया कि वह दोनों फ्रांसीसी सह यात्री भी अंगरेजी के बजाय फ्रेंच की किताब पढ़ रहे थे। अंगरेजी उन की भी तंग थी , जैसे कि उस की है। वह पत्नी से चर्चा करते हुए बताता है कि , ' मालूम है सफ़र में आज दो परदेसी मिल गए थे। ' अचानक वह बात बदलता है कि , ' परदेसी नहीं , फ्रांसीसी मिले थे। दो फ्रांसीसी ! '

' परदेसी कहा पहले फिर फ्रांसीसी कह रहे हैं। फ़र्क़ क्या है ? थे तो विदेशी ही। ' पत्नी ने प्रतिवाद किया है। 

' विदेशी और फ़्रांसिसी में फ़र्क़ है। ' वह बोला , ' फिर वह फनी ट्रैवलर थे। अपनी भाषा से प्यार करने वाले। ' जल्दी ही वह पत्नी से फ्रांस यात्रा की कल्पना करते हुए बताता है , थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाते हैं। साल नहीं , तो दो-तीन साल में सही , फ़्रांस चलते हैं। 

' न नौ मन तेल होगा , न राधा नाचेगी ! ' कह कर पत्नी , कंबल ओढ़ कर लेट गई है। उस का मन हुआ है कि ए सी बंद कर दे। ताकि कोप भवन का कंबल हट जाए। और उठ कर उस ने ए सी बंद कर दिया है। नींद आ गई है। सपने में वह फ्रेंच सीखने लगा है। 

[ उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा प्रकाशित पत्रिका साहित्य भारती के 
जुलाई-सितंबर , 2022 अंक में प्रकाशित ]