Friday, 16 October 2026

अपने-अपने युद्ध का बाइसवां संस्करण





पचीस साल में अगर किसी उपन्यास का 22 संस्करण छप जाए तो आप क्या कहेंगे ? 

हर्ष की बात है कि अपने-अपने युद्ध उपन्यास को यह परम सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वर्ष 2001 में जनवाणी प्रकाशन , दिल्ली ने अपने-अपने युद्ध का पहला संस्करण छापा था। बताता चलूं कि ज़िंदगी जीने के लिए अपने-अपने युद्ध लिखना बहुत ज़रूरी था। नहीं लिखता तो मर गया होता। आत्महत्या कर लिया होता। लेकिन प्रेशर कुकर में जैसे सीटी होती है , अपने-अपने युद्ध ने इसी सीटी का काम किया। जी गया। मस्ती के साथ जी रहा हूं। बेरोजगारी के दिनों में दिन-रात एक कर के ढाई महीने में यह अपने-अपने युद्ध उपन्यास लिख लिया था। पर छपने में ढाई साल से भी अधिक का समय लग गया। छपना तो इसे वर्ष 1998 में ही था। पर इसी वर्ष 1998 की 18 फ़रवरी को एक भीषण दुर्घटना में घायल होने के कारण ऐसा हो नहीं सका। छ महीने बेड पर रहा। अंबेसडर कार में था। ट्रक से आमने-सामने की टक्कर हो गई। हमारे बगल में बैठे हमारे एक पत्रकार साथी और अग्रज जय प्रकाश शाही और ड्राइवर की एट स्पॉट मृत्यु हो गई थी। आंखें तक उन की बाहर आ गई थीं। मैं भी बुरी तरह घायल था। जबड़ा , पसली , हाथ यानी कमर के ऊपर पूरी देह फ्रैक्चर। लोग कहते हैं कि मुझे दूसरा जीवन मिला। ख़ैर स्वस्थ होते ही बोल कर लिखवाया। आंख और हाथ दोनों ही हाथ जोड़े हुए थे। 

लेकिन मन नहीं। 

मन के पास फ्रैक्चर नहीं , लिखने की व्यग्रता थी। जैसे कोई बांध था। नदी इस बांध को तोड़ कर सिस्टम को तहस-नहस करने के लिए कसमसा रही थी। व्यग्रता थी। व्यग्रता टूट रही थी। आकुल और व्याकुल हो कर टूट रही थी।  ऐसे जैसे कोई सन्नाटा टूटे। आकाश में सुराख़ करने की छटपटाहट। अजब टूट थी यह। लेकिन अपने-अपने युद्ध की टूट फिर भी इस से ज़्यादा थी। उपन्यास का अंतिम हिस्सा लिखना शेष था। 

पत्रकार और व्यंग्यकार , अनुज अशोक मिश्र रोज घर आते और पूरे समर्पण के साथ लिखते। मैं बोलता रहता। वह लिखते रहते। उपन्यास पूरा हुआ तो छपने में भी बड़े लाले पड़े। प्रकाशकों को यह उपन्यास हजम नहीं हो रहा था। कोई कुछ काटने को कहता , कोई कुछ। मैं ने कहा कि उपन्यास छपे , चाहे न छपे , कुछ काटना , जोड़ना , घटाना तो दूर , एक कामा , एक फुल स्टाप यानी पूर्ण विराम तक नहीं छूने दूंगा किसी को। आहिस्ता-आहिस्ता छपना मुल्तवी होता रहा। लेकिन मैं ने समझौता नहीं किया। कुछ स्थानीय लेखक भी जो लेखन में माफ़िया ही हैं , साज़िश कर प्रकाशकों को भड़काते रहे। बहरहाल वर्ष 2000 में छपने की बात तय हुई। जनवाणी प्रकाशन के अरुण शर्मा ने ज़रा इफ-बट किया पर बाद में समझने पर पूरी बहादुरी के साथ अपने-अपने युद्ध को जस का तस प्रकाशन के लिए राजी हो गए। जनवाणी प्रकाशन के संपादक राम आनंद ने भी थोड़ी हिच दिखाई। पर समझाने पर मान गए। प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस में जब वह थे , तब के दिनों के वह हमारे दोस्त थे। उपन्यास कंपोज हो कर प्रूफ आदि पढ़ने के बाद फाइनल हो गया। फिर छपने के पहले ऐन वक्त पर जनवाणी प्रकाशन के उस कंप्यूटर की हार्ड डिस्क टूट गई। जिस पर अपने-अपने युद्ध कंपोज हुआ था। डी टी पी आपरेटर ने बैकअप भी नहीं लिया था। ख़ैर , फिर से कंपोज हो कर 2001 में अंतत : यह उपन्यास छप गया। ज़िक्र ज़रुरी है कि वर्ष 2000 में जनवाणी प्रकाशन ने मेरा कहानी संग्रह बड़की दी का यक्ष प्रश्न भी प्रकाशित किया था। अपने-अपने युद्ध और बड़की दी का यक्ष प्रश्न दोनों एक ही साथ प्रकाशित करने की योजना थी। 

बहरहाल अपने-अपने युद्ध छपते ही हंगामा हो गया। जनवाणी प्रकाशन ने इस के अनेक संस्करण प्रकाशित किए। एक साल में दो-दो , तीन-तीन संस्करण। कभी कोई संस्करण पांच हज़ार से कम प्रतियों का नहीं छपा। एक बार तो अपने-अपने युद्ध का एक संस्करण दस हज़ार का भी छपा। तब के दिनों आन लाइन कुछ भी नहीं था। न कोई सोशल मीडिया। पर अपने-अपने युद्ध की तब धूम इतनी ज़्यादा थी कि लोग इसे वी पी से मंगवाते थे। वी पी मतलब प्रकाशक को एडवांस पैसे भेज कर किताब मंगवाना। ख़ास कर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के वकील और जस्टिस लोग। थिएटर के लोग। गो कि उपन्यास का मुख्य विषय पत्रकारिता का संघर्ष और पतन था। लेकिन कथानक में युद्ध हो और उस में अदालत न आए , कैसे हो सकता था। संयोग से यह अदालत का विषय ज़्यादा चटक और ज़्यादा चमक के साथ उपस्थित हो गया। पत्रकारिता से ज़्यादा पतन अदालतों का हुआ है , इस में कोई दो राय नहीं। थिएटर को रूपक की तरह रचा गया था। जनवाणी प्रकाशन के अरुण शर्मा उन दिनों तमाम प्रकाशकों की महफ़िल में सीना तान कर कहते कि किताबें तो हम ने बहुत छापी हैं पर हमारे यहां बिकते सिर्फ दो ही हैं। एक प्रेमचंद , दूसरे दयानंद पांडेय। यह सुन कर मैं शर्मा जाता। यह सोच कर कि कहां प्रेमचंद , कहां मैं। लेखन और लोकप्रियता में प्रेमचंद का नाख़ून भी नहीं छू सकता कभी। अरुण शर्मा जी से कहता , ऐसा मत कहा कीजिए। मुझे दिक्कत होती है। झेंप आती है। लेकिन वह मानते नहीं थे। गौरतलब है कि जनवाणी प्रकाशन ने प्रेमचंद रचनावली बीस खंड में प्रकाशित की है। रामविलास शर्मा जी ने इस प्रेमचंद रचनावली की लंबी भूमिका लिखी है। 

अरुण शर्मा अखिल भारतीय प्रकाशक संघ के महामंत्री थे। जगह-जगह आयोजित होने वाले प्रकाशक संघ के कई वार्षिक सम्मेलनों में मुझे बतौर अध्यक्ष बुलाते रहे। जो भी किताब उन को भेजता तुरंत छापते। नई किताब मांगते रहते। किसी और की भी किताब भेजता , बिना ना नुकुर किए सहर्ष छापते। मेरी अधिकतम पुस्तकें जनवाणी प्रकाशन ने ही छापी हैं। अरुण जी हर किताब की सौ प्रतियों की बिल्टी लखनऊ मेरे पास भेज देते। बाद में जब भी और किताब मांगता , बिना नखरा किए भेज देते। दे देते। अब के प्रकाशकों की तरह छल-कपट नहीं करते थे। हम से झूठ नहीं बोलते थे। टाल मटोल नहीं करते थे। मेरी तमाम किताबों , उपन्यासों और कहानियों को देश दुनिया की लाइब्रेरियों में पहुंचाया। अरुण जी उम्र में मुझ से दो-तीन बरस छोटे थे। मेरा बहुत सम्मान करते थे। मेरा दुर्भाग्य है कि कैंसर ने उन को हम से छीन लिया। जैसे मेरा एक बाजू टूट गया। अरुण जी के निधन के बाद उन के सुपुत्र सौरभ शर्मा ने अरुण जी के नाम वार्षिक सम्मान शुरू किया है। पहला अरुण शर्मा सम्मान मुझे ही दिल्ली में समारोहपूर्वक दिया। प्रकाशक संघ के सम्मेलन में। इस तरह निधन के बाद अरुण जी से मेरा आत्मिक लगाव खत्म नहीं हुआ। कभी नहीं होगा। उन के परिवार से , जनवाणी प्रकाशन से नेह की यह डोर सर्वदा बंधी रहेगी। 

बहरहाल अपने-अपने युद्ध छपने के बाद भी निंदा , विरोध और हमला करने वालों की अजब बाढ़ थी। अश्लीलता की आग और आंच भी लोगों ने लगाई। और तो और हाईकोर्ट में कंटेम्प्ट आफ कोर्ट भी हो गया। मुक़दमा चला। बहुत पापड़ बेले। ख़ूब चर्चा , ख़ूब बहस हुई। नेट पर भी ख़ूब विमर्श हुआ। मेरे ब्लॉग सरोकारनामा पर भी अपने-अपने ख़ूब पढ़ा जाता है। अमेज़न आदि ऑनलाइन भी ख़ूब बिकता है।यह सारी कहानी गुज़िश्ता अपने-अपने युद्ध संस्मरण में लिख चुका हूं। संस्मरण लंबा है। जो इस बाइसवें संस्करण में भी प्रस्तुत है। अब 2026 में यह बाइसवां संस्करण अमन प्रकाशन , कानपुर ने प्रकाशित किया है। कोई तीन साल पहले इक्कीसवां संस्करण भी अमन प्रकाशन ने ही प्रकाशित किया था। अमन प्रकाशन के अरविंद वाजपेयी का आभार कि उन्हों ने अपने-अपने युद्ध उपन्यास का बाइसवां संस्करण को छापने का अनिर्वचनीय और अलौकिक सुख दिया है। अरविंद वाजपेयी जी के सुपुत्र ऋषभ वाजपेयी की भी बहुत मेहनत है , इस में। और सब से ज़्यादा आभार तो आप आदरणीय पाठक मित्रों का है जो अपने-अपने युद्ध को बाइसवें संस्करण की सीढ़ी तक ले आए हैं। आप सभी आदरणीय पाठक मित्रों को प्रणाम ! जल्दी ही यह उपन्यास अपने-अपने युद्ध पचासवीं सीढ़ी मेरे जीवित रहते तक चढ़ जाए तो मेरा सौभाग्य ! सौ सीढ़ी भी कभी चढ़े ! और क्या कहूं ! 

हालां कि कहने को बहुत कुछ है।