Monday, 1 March 2021

मोहम्मद इक़बाल की राह पर अग्रसर असग़र वजाहत

दयानंद पांडेय 


आप हिंदी के महत्वपूर्ण लेखक हैं। आप की चिंता में देश , भारतीय समाज के बड़े फलक की जगह सिर्फ़ मुसलमान ही क्यों हैं। आख़िरी समय में जिन्ना ने भी यही किया था। जिन्ना भी कभी प्रगतिशील था। पर अल्टीमेटली वह लीगी बन गया। पाकिस्तान बनवा कर मनुष्यता का दुश्मन बन गया। कभी बहुत ध्यान से पाकिस्तान के मुसलमान और भारत के मुसलमान का तुलनात्मक अध्ययन कर लीजिए। मुस्लिम समाज , सिर्फ़ मुस्लिम समाज की चिंता करना शायद भूल जाएंगे। क्षमा कीजिएगा असग़र वजाहत जी , आप की इधर की तमाम टिप्पणियां डराती हैं। लीगी होने की ध्वनि आती है आप की टिप्पणियों में। आप बहुत तेज़ी से मोहम्मद इक़बाल होने की तरफ बढ़ते जा रहे हैं। बस अब आप को एक जिन्ना की तलाश है। यह बहुत ख़तरनाक़ रास्ता है। मनुष्यता के ख़िलाफ़ रास्ता है। एक बड़े लेखक का यह विचलन हैरत में डालता है। इक़बाल भी बड़े शायर थे। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा जैसा गीत लिखा था इकबाल ने। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि वह पाकिस्तान के संस्थापकों में शुमार हो गए। असग़र वजाहत भी क्या इक़बाल की राह पर तो नहीं हैं। सिर्फ़ और सिर्फ़ मुस्लिम वोट की चिंता में दुबले होते हुए। ख़ुदा करे ऐसा बिलकुल न हो। सेक्यूलर होने का चोंगा ओढ़े लोग आप के ईगो मसाज में भले दिन-रात खड़े हों पर यह देश के लिए शुभ नहीं है। भारतीय समाज के लिए शुभ नहीं है। मुस्लिम समाज के लिए तो हरगिज नहीं।

इस लिए भी कि पुरानी मिसाल है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। भाजपा और ओवैसी दोनों ही इस मिसाल को समझ कर अपनी-अपनी बिसात पर खेल रहे हैं। लेकिन धर्मनिरपेक्षता की आड़ में यही खेल कांग्रेस , कम्युनिस्ट और बाक़ी क्षेत्रीय दलों ने भी लंबा खेला है। मुस्लिम वोट बैंक बनाया किस ने। इन्हीं लोगों ने न ? और मुस्लिम मुख्य धारा में आने के बजाय , बराबरी का नागरिक बनने के बजाय मुस्लिम -मुस्लिम ही ओढ़ते-बिछाते रहे। 

पाकिस्तान बनने के बाद भी हिंदू-मुसलमान का खेल बंद नहीं हुआ। देश का माहौल पूरी तरह दूषित और सांप्रदायिक हो गया है। निश्चित रूप से मुस्लिम समाज इस के लिए ज़्यादा दोषी है। आख़िर पाकिस्तान बना ही धर्म की बुनियाद पर था। बड़ी ग़लती यही हुई। भाजपा के लोग मानते हैं कि अगर धर्म के नाम पर आप ने एक देश ले लिया। उसे दो देश बना लिया तो फिर अब काहे का मुस्लिम-मुस्लिम। समान नागरिक बन कर रहिए न। प्रिवलेज किस बात का भला। कब तक मुस्लिम विक्टिम कार्ड खेलते रहेंगे। पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी बड़ी मिसाल हैं इस की। तमाम देशों में राजनयिक रहने , दस बरस उप राष्ट्रपति रहने के बाद भी भारत में खुद को , मुसलमान को असुरक्षित पाते हैं। 

भले देर से सही , भाजपा ने मुस्लिम समाज के इस दोष की शिनाख्त कर ली है। इस शिनाख्त का ही लाभ भाजपा को मिल भी रहा है। भाजपा को यह लाभ दिलाने में कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज तीनों ही सहयोगी की भूमिका में हैं। बुनियाद वही है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। जिस दिन मुस्लिम समाज , मुस्लिम पहचान से अलग हो कर सामान नागरिक बन कर देश में रहने लगेंगे , भाजपा की दुकान उसी दिन बंद हो जाएगी। लेकिन आज जिस तरह घृणा और नफ़रत फैला कर कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज भाजपा से लड़ रहे हैं , ऐसे तो कतई नहीं। आप बड़े लेखक हैं , आप से ज़्यादा क्या कहना। जिन लाहौर नई देख्या जैसे मक़बूल नाटक के लेखक हैं आप। 

फिर भी एक बार फिर मूल बिंदु की याद दिलाता चलता हूं , अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं , भाजपा की एकमात्र ताक़त यही है। इस ताक़त को तोड़िए , ओवैसी अपने आप खत्म हो जाएगा। भाजपा इस से ज़्यादा। लेकिन कांग्रेस , कम्युनिस्ट और मुस्लिम समाज अपनी घृणा और नफ़रत की लड़ाई का जो हथियार बना चुके हैं , जो सांचा बना चुके हैं , उसे कौन बदलेगा। कौन तोड़ेगा यह सांचा। फ़िलहाल तो यह नामुमकिन दीखता है। 

मेरी बात अगर आप को ग़लत लगती है तो इस का परिक्षण अभी पश्चिम बंगाल के चुनाव में एक बार फिर देख लीजिएगा। बहुत हद तक केरल में भी। क्यों कि कांग्रेस , कम्युनिस्ट , क्षेत्रीय दल और मुस्लिम समाज अभी तक एकपक्षीय सांप्रदायिकता , इकहरी धर्मनिरपेक्षता के रेगिस्तान में रहने की अभ्यस्त हैं। लेकिन इस एकपक्षीय सांप्रदायिकता , इकहरी धर्मनिरपेक्षता की मलाई अब खत्म हो चुकी है। यह तथ्य भी समय रहते जान लेने में नुक़सान नहीं है। कांग्रेस के नाराज लोग भी अब कश्मीर में जा कर भगवा पगड़ी बांधे दिख रहे हैं। 

बहुसंख्यक हिंदुओं को हिंदू-हिंदू कह कर चिढ़ाने की ग़लती शायद उन्हें समझ आ गई है। नरेंद्र मोदी से सीखने की बात ग़ुलाम नबी आज़ाद जैसे लोग कश्मीर में जा कर कह रहे हैं। ज़रा सा किसी एक से असहमत होते ही उसे संघी , भाजपाई की गाली देने की अदा ने , इस निगेटिव प्रवृत्ति ने कितना अकेला कर दिया इकहरी धर्मनिरपेक्षता का स्वांग रचने वालों को। देख लीजिए। यह कुछ-कुछ वैसे ही है जैसे पाकिस्तान , भारत से लड़ाई लड़े। एटम बम की खोखली धमकी दे। 

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मुशर्रफ की एक बात याद आती है। जब बालाकोट एयर स्ट्राइक हुई और पाकिस्तान के इमरान और बाजवा एटम बम-एटम बम बोलने लगे थे , सर्वदा की तरह। तब मुशर्रफ ने कहा था पाकिस्तानी हुक्मरानों से कि ग़लती से भी एटम बम मत चलाना। अगर एक एटम बम चलाओगे तो इंडिया इतने एटम बम चला देगा कि पाकिस्तान दुनिया के नक्शे से खत्म हो जाएगा। और फिर पाकिस्तान के पास एटम बम हैं कितने। 

यह बात भारत की इकहरी धर्म निरपेक्षता की बात करने वाली पार्टियों के लोगों और मुस्लिम समाज के लिए भी विचारणीय है। देश में अल्पसंख्यक सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं हैं। ईसाई , पारसी , बौद्ध , जैन , सिख आदि भी हैं। एक मुस्लिम समाज को ही इतनी समस्या क्यों है। एक मुस्लिम समाज से ही बहुसंख्यक समाज क्यों भयाक्रांत रहता है। क़ानून व्यवस्था के सामने मुस्लिम समाज ही चुनौती बन कर क्यों उपस्थित रहता है। वह चाहे कांग्रेस राज रहा हो , मिली-जुली सरकारों का रहा हो या भाजपा के नेतृत्व वाली एन डी ए की सरकार का। इन बिंदुओं पर मुस्लिम समाज को चिंतन करना चाहिए। बात फिर वहीँ आ कर टिक जाती है कि अगर आप मुस्लिम हैं तो हम भी हिंदू हैं। 

सिद्धांत पुराना है , क्रिया के बराबर विपरीत प्रतिक्रिया। भाजपा को कम्युनिस्ट लोग शायद इसी लिए प्रतिक्रियावादी कहते रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टियां अपने इसी अंतर्विरोध के कारण भारत की संसदीय राजनीति से खारिज हो गईं। घृणा और नफ़रत फैलाते-फैलाते जनता-जनार्दन के बीच खुद घृणित बन गईं। पश्चिम बंगाल , त्रिपुरा में लाल क़िला खत्म होने के बाद अब केरल में भी वह मुश्किल में आते दिख रहे हैं।

[ हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत की एक पोस्ट पर मेरी यह टिप्पणी : ]


हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक असग़र वजाहत की ताज़ा दो पोस्ट यह हैं  :

यदि भारत के सभी मुसलमान ओवैसी को वोट दे दें तब भी पार्लियामेंट में उनकी 50- 60 से अधिक सीटें नहीं हो सकतीं और उसकी प्रतिक्रिया में बीजेपी की 400 से अधिक सीटें  होंगी।

क्या ऐसी सूरत में ओवैसी मुसलमानों का कोई भला कर पाएंगे?

देश के गरीब, साधारण लोगों के हित में जो नीतियां बनाई जाएंगी उससे मुसलमानों को भी  फायदा होगा। बेरोजगारी,गरीबी, महंगाई देश के आम लोगों की बुनियादी समस्याएं हैं। यही मुस्लिम समाज की भी बुनियादी समस्याएं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का बाजारीकरण, बिजली पानी की बढ़ती हुई दरें, पर्यावरण पर मंडराता खतरा, सांप्रदायिकता, जातिवाद, अपराध और हिंसा जिस तरह गरीब देशवासियों की समस्याएं हैं उसी तरह मुसलमानों की भी है।

इसलिए देश के गरीब, सामान्य लोगों के हितों की रक्षा करने वाले राजनीतिक दल ही मुसलमानों को फायदा पहुंचा सकते हैं। अलगाववादी मुस्लिम राजनीतिक दल मुसलमानों का भावनात्मक शोषण तो कर सकते हैं, उन्हें कोई फायदा नहीं पहुंचा सकते।