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Saturday, 18 May 2019

जब शराब के चक्कर में फ़िराक गोरखपुरी की गोरखपुर में ज़मानत ज़ब्त हो गई

दयानंद पांडेय 


बहुत कम लोग जानते हैं कि मशहूर शायर फ़िराक गोरखपुरी भी गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ कर अपनी ज़मानत ज़ब्त करवा चुके हैं। देश का पहला आम चुनाव था। फिराक गोरखपुरी पुराने कांग्रेसी थे और अखिल भारतीय कांग्रेस में अंडर सेक्रेटरी थे। पंडित जवाहरलाल नेहरु के विश्वसनीय थे। नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरु के साथ भी वह कांग्रेस में न सिर्फ़ काम करते थे बल्कि इलाहाबाद के आनंद भवन में नियमित बैठते थे। कहते तो यहां तक हैं कि नेहरु की बहन विजय लक्ष्मी पंडित पर फ़िराक बुरी तरह फ़िदा थे। यह विजय लक्ष्मी पंडित का सौंदर्य ही था कि वह अपनी पत्नी से विमुख रहने लगे। अली सरदार ज़ाफरी द्वारा फ़िराक पर बनाई गई फ़िल्म में भी यह तथ्य संकेतों में सही , दर्ज है। अलग बात है विजय लक्ष्मी पंडित पर कभी पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला भी आसक्त थे। निराला और विजय लक्ष्मी पंडित के बीच तो प्रेम पत्रों के आदान-प्रदान की ही बात आन रिकार्ड है। लोग जानते ही हैं कि फ़िराक गोरखपुरी होमो भी थे। तरह-तरह की चर्चा में अनौपचारिक रूप से यह बात भी सामने आती है कि फ़िराक ने नेहरु को भी नहीं छोड़ा था। एक समय नानवेज लतीफ़ों में भी फ़िराक और नेहरु पर लतीफ़े खूब चलते थे। एक समय फ़िराक बड़ी शान से कहा करते थे कि हिंदुस्तान में अंगरेजी सिर्फ़ ढाई लोग जानते हैं । एक खुद को मानते थे , दूसरे सी नीरद चौधरी और आधा जवाहरलाल नेहरु।  

बहरहाल जब 1952 में जब पहला आम लोकसभा चुनाव हुआ तो फ़िराक भी गोरखपुर से चुनाव लड़ना चाहते थे। लड़े भी लेकिन लेकिन आधा अंगरेजी वाले इसी नेहरु ने कांग्रेस से उन्हें टिकट नहीं दिया । 

इस में एक कारण यह भी था कि तब गोरखपुर उत्तरी से स्वतंत्रता सेनानी और स्वदेश के सुप्रसिद्ध संपादक पंडित दशरथ प्रसाद द्विवेदी को टिकट दिया जा चुका था। दक्षिणी गोरखपुर से फ़िराक ने टिकट मांगा लेकिन नहीं मिला तो वह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर चुनाव में कूद गए। प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और प्रखर समाजवादी नेता शिब्बनलाल सक्सेना ने फ़िराक को निर्दलीय चुनाव लड़ने की तजवीज इस बिना पर दी थी कि गोरखपुर की इस सीट पर कायस्थ वोटों का प्रभाव बहुत है। लेकिन फ़िराक के मुकाबिल कांग्रेस उम्मीदवार राम सिंहासन सिंह अपने भाषणों में फ़िराक को बड़ा शायर तो बताते थे लेकिन साथ ही यह भी जोड़ते थे कि यह आदमी बहुत बड़ा शराबी भी है। शराबी शब्द सुनते-सुनते फ़िराक आजिज आ गए थे। उत्तेजित हो कर एक दिन जब मंच पर भाषण देना था फ़िराक शराब की बोतल ले कर चढ़ गए और बोतल का ढक्कन खोल कर शराब पीते हुए बोले , हां , मैं हूं शराबी। फिर भोजपुरी में बोले , जा लोगन दे द राम सिंहासन सिंह के वोट ! फ़िराक की यह साफगोई उन पर भारी पड़ गई । जनता उन की इस साफगोई पर नाराज हो गई और फ़िराक साहब चुनाव में अपनी ज़मानत ज़ब्त करवा बैठे। चुनाव हारने के बाद फ़िराक साहब शिब्ब्नलाल सक्सेना को खोजते फिरे। लेकिन शिब्बनलाल सक्सेना छुपते फिरे। हालां कि शिब्बन लाल सक्सेना कांग्रेस के टिकट पर ख़ुद महराजगंज से चुनाव जीत चुके थे। कुछ लोगों ने उन से कहा कि फ़िराक साहब से आप इस तरह छुपते क्यों फिर रहे हैं। शिब्बनलाल सक्सेना ने कहा कि फ़िराक साहब से नहीं , फ़िराक साहब की गालियों से छुपता फिर रहा हूं।  खैर फ़िराक साहब वापस इलाहाबाद लौट गए। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अंगरेजी पढ़ाने लगे। 

बहुत बाद के समय में एक बार इंदिरा गांधी ने फ़िराक साहब को दिल्ली बुलवाया। उन से मिलीं और कहा कि आप को मैं राज्यसभा में देखना चाहती हूं। फ़िराक साहब ने तुरंत मना कर दिया। इंदिरा जी ने फ़िराक साहब से पूछा कि आख़िर दिक्कत क्या है ? फिराक साहब ने कहा कि दिक्कत यह है कि फिर राज्य सभा को इलाहाबाद शिफ्ट करना पड़ेगा। क्यों कि मैं इलाहाबाद नहीं छोडूंगा। इंदिरा जी ने कहा कि जब मन होगा , तब आते रहिएगा , न मन करे , न आइएगा। फ़िराक ने कहा , यह न हो पाएगा। और वापस इंदिरा गांधी से विदा ले कर वापस इलाहाबाद चले गए। एक बार वह गंभीर रूप से बीमार पड़े। इलाज के लिए पैसे नहीं थे। इंदिरा गांधी को चिट्ठी लिखी। इंदिरा गांधी ने न सिर्फ़ उन के इलाज का प्रबंध किया बल्कि फ़िराक साहब के लिए सरकार की तरफ से दो हज़ार रुपए महीने की स्पेशल पेंशन का आजीवन प्रबंध किया। तब के समय किसी सीनियर आई ए एस का वेतन भी दो हज़ार रुपए नहीं होता था। फ़िराक साहब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से रिटायर होने के बाद भी यूनिवर्सिटी का घर नहीं छोड़ा। कुछ लोगों ने शिकायत भी की पर किसी भी वाइस चांसलर ने फ़िराक साहब से मकान ख़ाली करवाने की हिम्मत नहीं की। कई साल बीत गए। एक बार एक वाइस चांसलर आए और कहा कि होंगे बहुत बड़े शायर , मकान तो ख़ाली करना पड़ेगा। और नोटिस पर नोटिस देते रहे। किसी भी नोटिस का जवाब नहीं दिया फ़िराक साहब ने । वाइस चांसलर ने मुकदमा दायर कर दिया। अदालती नोटिस आई तो वह तारीख के दिन कचहरी पहुंचे। अचानक एक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने उन्हें पहचान लिया। उन के पास आया , पांव छुआ और पूछा यहां कैसे ? उन्हों ने नोटिस दिखाते हुए कहा कि पता नहीं किस बेवकूफ ने यह नोटिस भेज दी है। मजिस्ट्रेट ने नोटिस देखी। उसी के कोर्ट की नोटिस थी। फ़िराक साहब से कहा कि आप निश्चिंत हो कर घर जाइए। कुछ नहीं होगा। और उस ने मुकदमा खारिज कर दिया। 

फ़िराक साहब को जब 1970 में ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला तो एक पत्रकार ने उन से कहा कि पिछले साल सुमित्रानंदन पंत को यही पुरस्कार मिला तो उन्हों ने इस 51 हज़ार रुपए में से एक कार ख़रीद ली थी। आप इस पैसे का क्या करेंगे ? फ़िराक साहब बोले , शराब का कुछ कर्जा था निपटा दिया और जो पैसा बचा , उस की शराब ख़रीद कर घर में भर ली है। फ़िराक साहब के शराब की हालत तो यह थी कि वह अपने पालतू खरगोश को भी शराब चखाते रहते थे। नतीज़ा यह हुआ कि कुछ समय बाद शराब पीने के समय ख़रगोश शराब पीने की जगह पहले ही से जा कर बैठ जाता था। फ़िराक साहब भले थोड़ी देर लेट हो जाएं पर वह लेट नहीं होता था। फ़िराक साहब उसे खरगोश साहब कह कर संबोधित करते थे। एक दिन क्या हुआ कि खरगोश साहब ने इतनी पी ली कि दूसरी सुबह फिर उठ नहीं पाए। हमेशा के लिए सो गए।   

अंतिम समय फ़िराक साहब दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती थे । यह 1982 की बात है । सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के साथ मैं भी गया था उन्हें देखने। बात ही बात में सर्वेश्वर जी ने उन्हें जोश मलीहाबादी के निधन की ख़बर दी । फ़िराक साहब यह ख़बर सुनते ही ज़ोर से चीख़ पड़े। थोड़ी देर बाद फ़िराक सहा ने सर्वेश्वर जी का हाथ पकड़ कर कहा देखना , मेरे मरने के बाद मुझे कोई दफना न दे। मैं हिंदू हूं , मुझे जलाना । सर्वेश्वर जी ने उन्हीं भरोसा दिया और कहा कि सब लोग जानते हैं कि आप हिंदू हैं। जलाए ही जाएंगे। कुछ ही दिन में फ़िराक साहब का निधन हो गया। उन का पार्थिव शरीर दिल्ली से इलाहाबाद ले जाया जाने वाला था। बाई ट्रेन । फ़िराक साहब को अंतिम विदा देने प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ख़ुद स्टेशन आई थीं। यह सब देख कर तब उन की टीनएज नातिन अपनी रोती हुई मां से पूछ रही थी , मम्मी नाना , इतने ग्रेट थे ?

बहुत कम लेखक हैं हिंदी में कम से कम जिन्हों ने आम चुनाव में शिरकत की है । राज्य सभा में तो मैथिलीशरण गुप्त , रामधारी सिंह दिनकर , बेकल उत्साही आदि कई लेखकों के नाम शुमार हैं। पर लोकसभा चुनाव फ़िराक के बाद नामवर सिंह ने भाकपा के टिकट पर चंदौली से लड़ा था और फ़िराक की तरह ज़मानत ज़ब्त करवा बैठे थे । मुद्राराक्षस ने भी जनता दल के टिकट पर और निर्दलीय भी लखनऊ से दो बार चुनाव लड़ा और हर बार ज़मानत ज़ब्त करवा बैठे ।   

                         

Friday, 19 April 2019

जब अंबानी बंधु मुलायम को प्रधान मंत्री बनाने के लिए दिल्ली आए और सोनिया के साथ चाय पीने लगे

दयानंद पांडेय 

अभी तक लोग राजनीति में रामविलास पासवान को मौसम विज्ञानी बताते थे। बेधड़क। लेकिन व्यापारियों को संबोधित करते दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में नरेंद्र मोदी ने कहा कि व्यापारी बहुत बड़े मौसम विज्ञानी होते हैं । मोदी ने हालां कि यह बात व्यापरियों के व्यापार के बाबत कही। लेकिन मेरा आकलन है कि व्यापारी राजनीति का मौसम विज्ञान भी ख़ूब जानते हैं।

2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान लगभग स्पष्ट हो गया था कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का कंटीन्यू करना मुश्किल है और कि हंग पार्लियामेंट होगी। पहले के समय लालू और वी पी सिंह का दोहरा दांव खा कर , चित्त हो जाने और प्रधान मंत्री न बन पाने की कसक मुलायम के मन में बहुत गहरे बैठ गई थी । देवगौड़ा और गुजराल बारी-बारी प्रधान मंत्री बन गए और मुलायम वामपंथी हरकिशन सिंह सुरजीत की तमाम पैरोकारी के खड़े-खड़े देखते रह गए थे । बतर्ज़ कारवां गुज़र गया , गुबार देखते रहे। हरकिशन सिंह सुरजीत उन दिनों मुलायम के लगभग दलाल बन गए थे , सेक्यूलर राजनीति के नाम पर। खैर , 2004 में वामपंथ का कंधा छोड़ कर मुलायम ने कारपोरेट सेक्टर का कंधा पकड़ा। बतौर मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश , अंबानी परिवार की उन्हों ने खूब सेवा की थी। सुरजीत मुलायम के लिए भले राजनीतिक दलाली करते थे पर उन दिनों मुलायम अंबानी , अमिताभ बच्चन , अमर सिंह और सहारा के लिए जाने जाते थे और इन के लिए ही जीते-मरते थे। अमर सिंह इन के सेतु थे। तब के दिनों मुलायम को बिगाड़ने और उन को अय्याश बनाने में अमर सिंह ने धरती-आसमान एक कर दिया था। सो अमर सिंह के नेतृत्व में मुलायम ने अंबानी परिवार को साधा और मकसद बताया कि प्रधान मंत्री बनना है । मदद करो । मदद मतलब सांसदों की ख़रीद-फरोख्त के लिए अपनी तिजोरी खोल दो। तब के दिनों अंबानी बंधु एक साथ थे , अलग नहीं हुए थे। उत्तर प्रदेश में सरकारी संसाधनों की लूट में मुलायम की कुर्बानियां और सुविधाएं उन्हें याद थीं। उम्मीद थी कि प्रधान मंत्री बनने के बाद भी उन्हें वह लूट की छूट देते रहेंगे।

सो चुनाव परिणाम आने के एक दिन पहले ही अंबानी बंधु दिल्ली में डेरा डाल दिए। मय तिजोरी के। मकसद था मुलायम सिंह यादव को प्रधान मंत्री बनवाना। तैयारी में कोई कमी नहीं थी। दलाल पत्रकारों सहित किसिम-किसिम के लायजनर तैनात थे। दूसरे दिन सुबह आठ बजे से चुनाव परिणाम आने शुरु हो गए। साढ़े आठ बजते-बजते अंबानी बंधु समझ गए कि मुलायम सिंह यादव का खेल खत्म हो गया है। और मुकेश अंबानी ने 10 जनपथ पर सोनिया गांधी को फ़ोन किया कि आप के साथ चाय पीना चाहते हैं। और सुबह नौ बजे अंबानी बंधु सोनिया गांधी के साथ चाय पी रहे थे। उस के बाद का सारा खेल सब को मालूम है। सोनिया के घर बिना बुलाए सुरजीत के साथ पहुंचे अमर सिंह की बेइज्जती सहित। सोचिए कि मकसद था , तब मुलायम को प्रधान मंत्री बनाना और अंबानी बंधु मूल मकसद पानी में डाल कर अपने व्यावसायिक मकसद साधने निकल गए। सुबह साढ़े आठ बजे तक बहुत मामूली रुझान आते हैं , बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी तब तक नहीं कुछ समझ पाते । लेकिन अंबानी बंधु समझ गए थे कि क्या होने जा रहा है।

फ़रवरी , 1985 में जब मैं लखनऊ स्वतंत्र भारत में आया था तब उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव हो रहे थे। तब के सिचाई मंत्री वीर बहादुर सिंह गोरखपुर के पनियारा से चुनाव लड़ रहे थे । मुझे कवरेज के लिए जाने के लिए कहा गया । गोरखपुर जाने के पहले अख़बार मालिक शिशिर जयपुरिया ने मुझे बुलाया और कहा कि सुना है आप गोरखपुर जा रहे हैं ? मैं ने हामी भरी तो जयपुरिया ने कहा कि आप जनसत्ता से आए हैं तो जनसत्ता वाली टेढ़ी रिपोर्टिंग मत कीजिएगा। वीर बहादुर सिंह होने वाले मुख्य मंत्री हैं , ज़रा ख़याल रख लीजिएगा। सुन कर मुझे बहुत ख़राब लगा। संपादक वीरेंद्र सिंह से मिल कर मैं ने जयपुरिया की बात बताई और गोरखपुर जाने से स्पष्ट मना कर दिया। गोरखपुर मेरा गृह नगर भी है , यह वह जानते थे । खैर , वीरेंद्र सिंह ने कहा , आप जाइए और जैसा लगे वैसे ही लिखिए। संपादक मैं हूं , जयपुरिया नहीं। गया गोरखपुर। पनियरा गया तो देखा कि पनियरा में वीर बहादुर सिंह ने गज़ब का काम किया था। सड़क , बिजली , परिवहन सब दुरुस्त । जहां पुलिया चाहिए थी , वहां पुल था। उस धुर पिछड़े और तराई क्षेत्र से लखनऊ और दिल्ली की सीधी बस थी। सिनेमा घर थे । उन के सामने जो चुनाव लड़ रहे थे , किसी का क्षेत्र में नामलेवा भी नहीं था। न कोई प्रचार । चहु ओर वीर बहादुर ही वीर बहादुर थे। रिपोर्ट अपने आप वीर बहादुर के पक्ष में गई। तुरंत तो नहीं पर दिलचस्प यह कि साल भर बाद वीर बहादुर सिंह मुख्य मंत्री बन गए। जयपुरिया की बात सच हो गई।

चंद्रशेखर एक समय पद यात्रा कर रहे थे। जयपुरिया ने मुझे बुलाया। कहा कि चंद्रशेखर जी को मैं मिल कर चंदा देना चाहता हूं। मैं ने कहा कि दे दीजिए , इस में मैं क्या कर सकता हूं । उन का सारा कार्यक्रम पब्लिक डोमेन में है। चंद्रशेखर से मेरा ठीक ठाक परिचय था । कई बार उन का इंटरव्यू कर चुका था । इसी आधार पर जयपुरिया ने मुझ से चंद्रशेखर से मिलवाने से कहा। कहा कि यह आदमी होने वाला प्रधान मंत्री है । सुन कर मुझे हंसी आ गई। जयपुरिया ने मुझ से हंसी का कारण पूछा। बता दिया मैं ने कि नेता बहुत अच्छे हैं , समझदार हैं , पर चुनाव जीतने के तो उन के लाले रहते हैं , पार्टी उन की वैसे ही कमज़ोर है। सपने में भी प्रधान मंत्री नहीं बन सकते । लेकिन जयपुरिया अपनी बात पर अड़े रहे। और कहा कि बस आप मिलवा दीजिए। चंद्रशेखर के एक शिष्य थे गौरी भैया । बलिया के थे । जनता दल विधान मंडल के सचेतक थे । मेरे अच्छे मित्र थे । उन से मिल कर जयपुरिया की बात बताई। बात सुनते ही वह उछल गए। बोले , चंदा तो हम लोग खोज ही रहे हैं। चंद्रशेखर को उन दिनों अध्यक्ष जी कहते थे लोग। गौरी भैया बोले , ' अध्यक्ष जी ने टारगेट भी दिया है। कूपन बेच कर वह चंदा ले रहे थे। सो गौरी भैया ने तुरंत कूपन बुक निकाल लिया। मैं ने बताया कि वह अध्यक्ष जी से मिल कर ही चंदा देना चाहते हैं। गौरी भैया यह सुन कर बिदके । बोले , दस-पांच हज़ार का चंदा तो अध्यक्ष जी लेंगे नहीं। मोटी रकम देनी पड़ेगी।

जैसे ? 

लाख , पचास हज़ार से कम का लेंगे। मैं ने गौरी भैया से कहा कि आप मुझे इस चक्कर में मत डालिए।जयपुरिया से सीधे बतिया लीजिए मेरा रिफरेंस दे कर। कल फ़ोन पर। गौरी भैया ने दूसरे दिन जयपुरिया से बात की। उन की बात जम गई। जल्दी ही गौरी भैया ने जयपुरिया से चंद्रशेखर की मुलाकात करवा दी । बात आई-गई हो गई। कि कुछ समय बाद बोफ़ोर्स आ गया। चुनाव में राजीव गांधी जय हिंद हो गए। प्रधान मंत्री पद के दावेदार बने चंद्रशेखर भी लेकिन वी पी सिंह ने देवीलाल को आगे कर चंद्रशेखर को रेत दिया। चंद्रशेखर रह गए। तो मैं ने जयपुरिया को एक बार याद दिलाया। कहा कि अब कहां ! जयपुरिया ने सब्र लेकिन नहीं खोया। कहा कि देखते रहिए। संयोग देखिए कि कुछ महीने बाद सही चंद्रशेखर प्रधान मंत्री बन भी गए। अचानक। अफ़सोस कि जयपुरिया तब तक अख़बार बेच चुके थे। हुआ यह कि इस के पहले पायनियर की 125 वीं जयंती मनाने के लिए तब के प्रधान मंत्री राजीव गांधी को जयपुरिया ने समारोहपूर्वक बुलाया। दिल्ली के विज्ञान भवन में समारोह हुआ। फिर तो राजीव गांधी से केमिकल फैक्ट्री लगाने के चार-पांच लाइसेंस जयपुरिया ने झटक लिए। पूंजी थी नहीं। लोन लेने के लिए मार्जिन मनी भी नहीं थी। अंततः पायनियर और स्वतंत्र भारत अख़बार और उस की बिल्डिंग थापर ग्रुप को जयपुरिया बेच बैठे थे । अख़बार का यह बिकना अख़बार कर्मचारियों के लिए तो बुरा साबित हुआ ही , जयपुरिया के लिए भी घातक साबित हुआ। यह एक अलग कथा है ।

जो भी हो , व्यापारियों के राजनीतिक विज्ञान की ऐसी बहुत सी कहानियां हैं मेरे पास । जो फिर कभी। इस बार भी अगर राजनीतिक परिणाम की जानकारी लेनी हो तो किसी मीडिया , किसी पार्टी , किसी सर्वे के बजाय किसी ठेठ व्यवसाई से पता कीजिए।  

Thursday, 11 April 2019

जब राजीव गांधी ने अमेठी में बंपर बूथ कैप्चरिंग करवाई और पत्रकारों को पिटवाया

दयानंद पांडेय 

राजीव गांधी 

कांग्रेस का गढ़ रही अमेठी संसदीय क्षेत्र की भी अजब कहानी है। 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के तब के युवराज संजय गांधी ने जब चुनाव लड़ने के लिए मन बनाया तो कांग्रेस शासित सभी राज्यों के मुख्य मंत्री संजय गांधी को अपने-अपने राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए बुलाने लगे। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने भी संजय गांधी को अमेठी से लड़ने के लिए बुलाया। आए अमेठी संजय गांधी , हेलीकाप्टर से नारायण दत्त तिवारी को साथ ले कर। अमेठी की खासियत यह है कि रायबरेली से सटा हुआ है। जो तब इंदिरा गांधी का संसदीय क्षेत्र था। आज सोनिया गांधी का है। सो जब गुड़ बोओ , गन्ना  बोओ  की सीख देने वाले संजय गांधी ने हेलीकाप्टर से अमेठी भ्रमण करते हुए जब नीचे खासी हरियाली देखी तो तिवारी जी से पूछा कि यह कौन सी फसल है ? तो तिवारी जी ने लपक कर जवाब दिया कि यहां की सारी फसलें हरी-भरी हैं। असल में तिवारी जी को खुद नहीं मालूम था कि यह कौन सी फसल थी सो हड़बड़ा कर हरी-भरी बता दिया था। तब , जब कि अमेठी का इलाका , ऊसर इलाका है। वह जो हरा-भरा दिख रहा था , वह कोई फसल नहीं , सरपत थी। जिसे जानवर भी नहीं खाते। बहरहाल संजय गांधी को वह हरा-भरा इलाक़ा पसंद आ गया। वह चुनाव लड़ गए। लेकिन जनता लहर में हार गए। लेकिन जनता सरकार के गिरने के बाद 1980 के चुनाव में संजय गांधी जीत गए। जीत कर पता चला कि यह  तो ऊसर है। सो अमेठी को इण्डस्ट्रियल हब बनाना चाहते थे वह।  लेकिन संजय गांधी का हवाई जहाज दुर्घटना में निधन हो गया। सो उन का यह सपना भी तभी टूट गया। बाद के दिनों में  इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984  में राजीव गांधी कांग्रेस से चुनाव लड़े। राजीव गांधी के खिलाफ मेनका गांधी ने चुनाव लड़ा। लेकिन जैसे जनता लहर में संजय गांधी चुनाव हार गए थे , वैसे ही इंदिरा लहर में मेनका गांधी भी चुनाव हार गईं । इस के पहले 1981 में हुआ उपचुनाव भी राजीव गांधी ने जीता था। 

लेकिन 1984 में राजीव गांधी को चुनाव जिताने के लिए अमेठी में जिस तरह भारी पैमाने पर बूथ कैप्चरिंग हुई वह अदभुत थी । अमेठी के इस चुनाव को कवर करने के लिए लखनऊ से दो पत्रकार गए थे और एक फ़ोटोग्राफ़र। दैनिक जागरण से वीरेंद्र सक्सेना , आज से अजय कुमार । फ़ोटोग्राफ़र थे दैनिक जागरण से बी डी गर्ग । जम कर हो रही बूथ कैप्चरिंग का प्रमाण सिर्फ फ़ोटो से ही साबित किया जा सकता था । तब के दिनों चैनल वगैरह तो थे नहीं । सो बी डी गर्ग ने धुआंधार फ़ोटो खींची इस बूथ कैप्चरिंग की। जगह-जगह बी डी गर्ग और बाकी पत्रकारों से कांग्रेसी गुंडों से लगातार झड़प होती रही। बूथ कैप्चरिंग को ले कर। इन कांगेसी गुंडों की कमान दिल्ली में बैठे अरुण नेहरु के हाथ थी। बी डी गर्ग होशियार और अनुभवी फ़ोटोग्राफ़र थे । वह समझ गए कि देर-सवेर कांग्रेसी गुंडे उन के कैमरे पर भी मेहरबान हो सकते हैं । सो वह फ़ोटो खींचते जाते थे और रील निकाल-निकाल कर झाड़ियों में फेंकते जाते । अंततः तीनों पत्रकारों समेत फ़ोटोग्राफ़र बी डी गर्ग भी कांग्रेसी गुंडों से पिट गए । बल्कि बुरी तरह पिट गए । बी डी गर्ग के कैमरे पर भी हमला हुआ । रील निकाल ली गई । लुटे-पिटे पत्रकार अमेठी से लखनऊ लौटे। पिट भले गए थे यह पत्रकार पर इन्हें संतोष था इस बात का कि प्रधान मंत्री राजीव गांधी के चुनाव क्षेत्र से बूथ कैप्चरिंग की बड़ी ख़बर ले कर वह लौट रहे हैं । लेकिन यह रिपोर्टर जब लखनऊ लौट कर अपने-अपने अख़बार के दफ़्तरों में पहुंचे तब और मुश्किल हो गई। क्यों कि इन रिपोर्टरों के दफ़्तर पहुंचने से पहले अरुण नेहरु का फ़ोन इन अख़बार दफ़्तरों में आ चुका था । रिपोर्टरों को दफ़्तर में ख़ूब डांटा गया। जलील किया गया। कहा गया कि आप लोग अमेठी रिपोर्टिंग करने गए थे कि क्रांति करने। वहां मार-पीट करने गए थे ? रिपोर्टरों ने प्रतिवाद किया और बताया कि अमेठी में भारी बूथ कैप्चरिंग होते देख कर आए हैं और वहां कांग्रेसी गुंडों ने उन की पिटाई की है। लेकिन किसी भी अख़बार में रिपोर्टरों की एक नहीं सुनी गई। उलटे उन्हें और जलील किया गया। कहा गया कि बूथ कैप्चरिंग की जगह प्लेन सी , रुटीन ख़बर लिखें। यही हुआ। दूसरे दिन रुटीन ख़बर ही सारे अख़बारों में छपी। प्रचंड इंदिरा लहर में कांग्रेस पूरे देश में जीत का झंडा लहरा कर बंपर बहुमत लाई थी। राजीव गांधी ने प्रधान मंत्री पद की शपथ ले ली। बात आई-गई हो गई। 

लेकिन सचमुच बात आई-गई नहीं हुई।

अख़बारों में अमेठी के बूथ कैप्चरिंग की ख़बर और फ़ोटो भले नहीं छपी पर पत्रकारों के बीच बूथ कैप्चरिंग और पत्रकारों की पिटाई की ख़बर चर्चा का विषय बनी रही। लेकिन लखनऊ के किसी अख़बार में इस ख़बर को छापने की हिम्मत नहीं हुई। पर लखनऊ में तैनात जनसत्ता , दिल्ली के संवाददाता जयप्रकाश शाही को जब यह पता चला तो उन्हों ने इन पत्रकारों से बातचीत की। सभी ने बूथ कैप्चरिंग की पुष्टि करते हुए पूरी डिटेल बताई। शाही ने फ़ोटोग्राफ़र बी डी गर्ग से भी बात की । और कहा कि एक भी फ़ोटो मिल जाए तो ख़बर लिख दूंगा। बी डी गर्ग ने शाही से कहा कि अब क्या फ़ायदा , अब तो सरकार गठित हो गई । जयप्रकाश शाही ने कहा कि सरकार की ऐसी-तैसी। बस आप फ़ोटो दीजिए , सरकार गिर जाएगी। राजनारायण के मुकदमे पर जस्टिस जगमोहन सिनहा इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित करने का इतिहास दर्ज कर चुके थे । जयप्रकाश शाही भी धुन के पक्के रिपोर्टर थे । कई ख़बरें ब्रेक कर चुके थे । अंततः बी डी गर्ग को ले कर वह अमेठी गए । संयोग ही था कि झाड़ियों में फेंकी कुछ रीलें मिल गईं । बी डी गर्ग ने फ़ोटो डेवलप कर शाही को सौंप दी। शाही ने फ़ोटो समेत डिटेल रिपोर्ट जनसत्ता को भेज दी। जनसत्ता के अंदर के पन्ने पर खोज ख़बर के तहत यह अमेठी में बूथ कैप्चरिंग की खबर कोई आधे पन्ने की छपी। ख़बर छपते ही बवाल हो गया। उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री नारायण दत्त तिवारी को सीधे राजीव गांधी का फ़ोन आया। तिवारी जी ने बी डी गर्ग को बुलवाया और स्टेट प्लेन से ले कर उन्हें दिल्ली पहुंचे। राजीव गांधी से मिलवाया। सारी निगेटिव पी एम ओ में सौंप दी। शाम तक लखनऊ लौट कर बी डी गर्ग ने एक बयान जारी कर बताया कि मैं ने ऐसी कोई फ़ोटो नहीं खींची है , क्यों कि अमेठी में कोई बूथ कैप्चरिंग नहीं हुई थी। जनसत्ता में छपी सभी फ़ोटो फर्जी हैं । बाद में जनसत्ता में भी इस ख़बर का बाक़ायदा खंडन छपा। उन दिनों मैं जनसत्ता , दिल्ली में ही था। जयप्रकाश शाही अपने समय की रिपोर्टिंग के सूर्य थे । उन की ख़बरों का कोई शानी नहीं था। इस लिए इस खंडन पर मुझे यकीन नहीं हुआ।

बाद के दिनों में फ़रवरी , 1985 में जब मैं स्वतंत्र भारत , लखनऊ आ गया तो एक बार फुर्सत में जयप्रकाश शाही से इस अमेठी बूथ कैप्चरिंग वाली ख़बर और खंडन की चर्चा की और पूछा कि इस ख़बर पर कैसे चूक गए आप ? शाही बहुत आहत हो कर , लगभग घायल हो कर बोले , मैं नहीं चूका , यह साला फ़ोटोग्राफ़र बी डी गर्ग बिक गया और पलट गया। ख़बर तो सौ फीसदी सही थी ! और वह चुप हो गए । मायूस हो गए । ऐसे , जैसे कोई विजेता हार गया हो । शाही बोले , चूक हुई कि फ़ोटो तो ख़रीद लिया था , निगेटिव भी ख़रीद लिया होता तो यह अपमान न पीना पड़ता। कि मैं फर्जी ख़बर लिखता हूं।

सचमुच इस घटना के बाद बी डी गर्ग की माली हालत काफी सुधर गई थी। रातो-रात सरकारी घर मिल गया था। स्कूटर की जगह कार आ गई थी। देखते ही देखते वह लाखों में खेलने लगे थे। सरकार में जो काम हो , वह चुटकी बजाते ही करवा लेते थे। जब तक राजीव गांधी की सरकार थी लखनऊ से दिल्ली तक उन की जय-जय थी। अब बी डी गर्ग नहीं हैं , उन की कहानियां हैं। जयप्रकाश शाही भी नहीं हैं । उन की भी सिर्फ़ कहानियां शेष हैं। एक रोड एक्सीडेंट में हम शाही जी को खो बैठे। ऐसे ही चुनाव का मौसम था। 18 फ़रवरी , 1998 का दिन था। संभल से मुलायम सिंह यादव चुनाव लड़ रहे थे । हम लोग संभल कवरेज के लिए जा रहे थे। अम्बेसडर कार में पीछे की सीट पर जयप्रकाश शाही और हम अगल-बगल ही बैठे थे। जैसे कि लखनऊ में हमारे घर भी अगल-बगल हैं। गोरखपुर में हमारे गांव आस-पास हैं। पत्रकारिता में भी हम शाही जी के कहने से ही आए। नहीं हम तो कविताएं लिखते थे , कहानी लिखते थे । खैर दिन के तीन बजे थे , खैराबाद , सीतापुर में हमारी कार एक ट्रक से टकरा गई। आमने-सामने की टक्कर थी। शाही जी और ड्राइवर मौके पर ही नहीं रहे। शाही जी तब हिंदुस्तान अख़बार में थे। हम राष्ट्रीय सहारा में । हम और आज अख़बार के गोपेश पांडेय महीनों मौत से लड़ने के बाद किसी तरह जीवन में लौटे ।

बहरहाल उन्हीं दिनों 1985 में एक बार आज के अजय कुमार से अमेठी की उस बूथ कैप्चरिंग के बाबत बात चली। बात करते-करते अजय कुमार अचानक रो पड़े। गला भर आया उन का , आंख से आंसू। अजय कुमार  कहने लगे , पांडेय जी , अमेठी में उस दिन पिटने का बिलकुल मलाल नहीं था। बल्कि ख़ुशी थी कि पिटे भी तो क्या , हमारे पास बहुत बड़ी ख़बर है। एक बड़ी ख़बर ले कर लौट रहे हैं। मुश्किल तब हुई जब लखनऊ के दफ़्तर आ कर डांट खानी पड़ी। बनारस तक से फ़ोन पर डांट पड़ी। यह डांट , यह बेइज्जती अमेठी में पिटाई से ज़्यादा बड़ी थी। ज़्यादा यातनादाई थी कि उस ख़बर को लिखने से रोक दिया गया था , जिसे पिटने की कीमत पर भी हम बड़ी बहादुरी से ले आए थे। इस घटना के बाद अजय कुमार का दिल आज अख़बार से टूट गया। जल्दी ही वह आज छोड़ कर तब के समय की शानदार पत्रिका माया के ब्यूरो चीफ़ बन गए लखनऊ में। आज भी वह 75 पार कर शानदार और स्वस्थ जीवन बसर कर रहे हैं । निरंतर लिखते हुए सक्रिय पत्रकारिता करते हुए।

दिसंबर , 1984 के लोकसभा चुनाव में अमेठी की बूथ कैप्चरिंग तब और महत्वपूर्ण हो जाती है कि जब पूरे देश में इंदिरा गांधी की हत्या के नाते , इंदिरा लहर थी । प्रचंड लहर थी । तब किस बात का डर था तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी को कि वह भारी बूथ कैप्चरिंग करवाने पर आमादा थे। पत्रकारों की पिटाई करवानी पड़ गई । ख़बर रुकवानी पड़ गई। आश्वस्त क्यों नहीं थे राजीव गांधी अपनी जीत के प्रति। किस बात का डर था भला। यह सवाल तो आज भी शेष है । अलग बात है कि अब राजीव गांधी भी नहीं हैं , न ही तब के उन के कमांडर अरुण नेहरु। लेकिन किसी के रहने , न रहने से सवाल कहां समाप्त होते हैं भला । सवाल तो शेष ही रहते हैं उन स्मृति-शेष लोगों के साथ ही।               


Tuesday, 19 March 2019

चुनावी सभा में एक ही यात्रा के लिए हेलीकाप्टर और जहाज दोनों से चलने वाले नेता

हम जब रिपोर्टर थे तब चुनाव के समय बहुत सारी हवाई यात्राएं राजनीतिक पार्टियों के सौजन्य से कराई जाती थीं। अब भी करवाई जाती हैं। चुनावी सभाओं के कवरेज के लिए। खास कर मुख्य मंत्री लोग अपना समय बचाने के लिए , आराम के लिए एक ही यात्रा के लिए हेलीकाप्टर और जहाज दोनों इस्तेमाल करते थे। हेलीकाप्टर से पत्रकारों को पहले ही गंतव्य तक के एयरपोर्ट पर पहुंचा दिया जाता था । फिर एयरपोर्ट से जनसभा स्थल तक बाई कार ले जाया जाता था। हेलीकाप्टर एयरपोर्ट पर ही रोक दिया जाता था। बाद में उसी हेलीकाप्टर से मुख्य मंत्री जनसभा स्थल तक आते थे । वापसी में भी यही होता था। उन का समय बच जाता था । इस तरह एक दिन में तीन-चार जनसभाएं हो जाती थीं। इस बचे समय में कार्यकर्ताओं से भी मिल लेते थे , चुनावी रणनीति तय कर लेते थे । जहां कहीं एयरपोर्ट नहीं होता था , वहां फिर मुख्य मंत्री अपने साथ ही पत्रकारों को ले जाते थे। एक बार तो सैफई , इटावा होते हुए गाज़ियाबाद गए।

वापसी में अंधेरा होने लगा तो हेलीकाप्टर के पायलट ने हेलीकाप्टर उड़ाने से इंकार कर दिया । डी एम ने ट्रेन से पत्रकारों की वापसी की व्यवस्था की। वहां ठहरने का भी विकल्प दिया कि सुबह हेलीकाप्टर से चले जाइए। लेकिन मुख्य मंत्री ने आते ही कहा कि सभी पत्रकार हमारे जहाज में साथ जाएंगे । क्यों कि आज ही यह ख़बर लिखी जानी है , कल नहीं। इस के लिए उन्हों ने अपने साथ गए अधिकारियों और नेताओं से कहा कि आप लोग सुबह हेलीकाप्टर से आएं। एक बार तो प्रतापगढ़ में पत्रकारों को हवाई जहाज से ले जाया गया और मुख्य मंत्री को हेलीकाप्टर से। बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रतापगढ़ के पृथ्वीगंज में एक हवाई पट्टी भी है । दूसरे विश्वयुद्ध के समय की। बहुत ही असुरक्षित हवाई पट्टी है । उस बार हम पत्रकार मरते-मरते बचे थे । जहाज उतरने में दुर्घटना होते-होते बची । एक बार तो हम लोग अमर सिंह के साथ हरदोई के संडीला गए। तब वह सपा में थे । पत्रकारों का हेलीकाप्टर पहले पहुंच गया। हेलीपैड पर कार्यकर्ताओं ने सारी मालाएं पत्रकारों के गले में लाद दी । बिना किसी को पहचाने । अब नेताओं के लिए उन के पास कुछ रहा ही नहीं । सकुचाते हुए मालाएं वापसी की बात की कार्यकर्ताओं ने। हंसते हुए हम लोगों ने वापस कर दी।

अब जब नेताओं का हेलीकाप्टर आया तो कार्यकर्ताओं को रस्सी बांध कर रोक दिया गया। हेलीपैड तक सिर्फ़ कुत्ते ही पहुंच सके। ऐसे ही एक बार अमर सिंह आजमगढ़ लिवा ले गए। आज़मगढ़ से बीस किलोमीटर पहले ही किसी कालेज में बने हैलीपैड पर हेलीकाप्टर उतरा। वहां से जुलूस ले कर शहर में वह घुसे। समय रखा था सुबह दस बजे का। ताकि सड़क भरी-भरी लगे। कलक्ट्रेट में उन्हें गिरफ्तारी देनी थी। कलक्ट्रेट के परिसर में पांच सौ लोगों के खड़े होने की भी जगह नहीं थी। बसपा की मायावती का राज था। लेकिन अमर सिंह ने प्रशासन से कहा कि आप हमें बीस हज़ार घोषित कीजिए , तभी जाएंगे। मजिस्ट्रेट ने मजबूर हो कर एक सांस में कहा , बीस हज़ार लोग गिरफ्तार किए गए , बीस हज़ार लोग रिहा किए जाते हैं। वापसी में कलक्ट्रेट के बगल में ही स्थित पुलिस लाईन में बने हेलीपैड पर हमारा हेलीकाप्टर खड़ा था। लखनऊ से गया एक नया-नया फ़ोटोग्राफ़र अमर सिंह पर लगभग सवार हो गया। कि जब हेलीपैड बगल में था , तो इतनी दूर क्यों उतारा था , सुबह ? पहले तो अमर सिंह मुस्कुराए पर जब बहुत हो गया तो हम से बोले , ज़रा संभालिए इन्हें पांडेय जी। मैं ने उसे समझाया कि तब जुलूस और भीड़ तुम्हारे फ़ोटो में नहीं दिखती। शहर के लोगों को पता न चलता इस घटना का। अब बारी फ़ोटोग्राफ़र के मुस्कुराने की थी। ऐसी तमाम चुनावी यात्राओं की ढेरों हवाई यादें हैं। नेताओं द्वारा चुनावी सभाओं में हेलीकाप्टर में जाने का एक बड़ा लाभ यह होता है कि देहाती क्षेत्रों , कस्बों या छोटे शहरों की ज्यादातर जनता हेलीकाप्टर ही देखने आती है । समय की बचत और ग्लैमर तो अपनी जगह है ही।

प्रियंका गांधी के आज प्रयागराज से स्टीमर यात्रा के दौरान कभी सड़क मार्ग , कभी जल मार्ग पर होने से इन यात्राओं का पाखंड याद आ गया।

Thursday, 24 January 2019

इंदिरा गांधी से राजनारायण के अभद्र व्यवहार के चलते तब मुख्य मंत्री टी एन सिंह उप चुनाव हार गए

रामकृष्ण द्विवेदी 

गोरखपुर में मानीराम विधानसभा उप चुनाव में रामकृष्ण द्विवेदी की जीत और तत्कालीन मुख्य मंत्री टी एन सिंह की हार में एक बड़ा फैक्टर राजनारायण की एक अभद्र हरकत थी । मानीराम में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी को फिएट कार की छत पर खड़े हो कर धोती खोल कर राजनारायण की अश्लील हरकत ने माहौल बदल दिया था । वरना संविद सरकार के तत्कालीन मुख्य मंत्री टी एन सिंह तो चुनाव जीत रहे थे । फिर तो रामकृष्ण द्विवेदी जीते , टी एन सिंह ने इस्तीफ़ा दिया और कमलापति त्रिपाठी मुख्य मंत्री बने। रामकृष्ण द्विवेदी भी डिप्टी मिनिस्टर होम बने ।

लेकिन एक रात शराब के नशे में कुछ गोरखपुरिया दोस्तों ने चढ़ा दिया कि टी एन सिंह को हराया तुम ने , और मुख्य मंत्री बन कर मज़ा ले रहे हैं कमलापति त्रिपाठी । तुम को डिप्टी मिनिस्टर बना दिया , यह तो तुम्हारा अपमान है , कम से कम कैबिनेट मिनिस्टर बनाना था । तो दोस्तों के चढ़ाने पर रामकृष्ण द्विवेदी ट्रंककाल कर कमलापति त्रिपाठी को फोन पर अभद्रता पूर्वक यही बातें कह बैठे । कमलापति जी ने उन्हें लखनऊ बुला कर इस्तीफ़ा मांग लिया । कहा कि शराब के नशे में जब तुम मेरे साथ बदतमीजी कर सकते हो , तो बाक़ी के साथ क्या करते होगे । रामकृष्ण द्विवेदी उन के चरणों में लेट कर बहुत गिड़गिड़ाए । कमलापति जी ने कहा , तुम होम के लायक तो अब रहे नहीं , चलो , तुम्हारे होम में , गार्ड जोड़ देता हूं । और रामकृष्ण द्विवेदी डिप्टी मिनिस्टर होमगार्ड बन गए । लिखते भले अब भी वह अपने नाम के साथ पूर्व गृह मंत्री हैं । लेकिन गलत लिखते हैं । गृह मंत्री तो वह कभी रहे ही नहीं।

तब वीरबहादुर के खिलाफ चुनाव लड़ रहे दयाशंकर दुबे चुनाव के पहले ही पोस्टर कबाड़ी को बेच रहे थे



दयानंद पांडेय 



1985 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव हो रहे थे। तब मैं जनसत्ता, दिल्ली छोड़ कर नया-नया स्वतंत्र भारत, लखनऊ आया था। तत्कालीन सिंचाई मंत्री वीरबहादुर सिंह तब गोरखपुर में पनियरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे। स्वतंत्र भारत के सर्वेसर्वा और मालिकान में से एक जयपुरिया ने मुझे बुलाया और बड़ी शालीनता से कहा कि , ' आप जनसता, दिल्ली से आए हैं, उस तरह की रिपोर्टिंग में वीरबहादुर के खिलाफ़ कुछ मत लिख दीजिएगा। वीरबहादुर सिंह उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री हैं। तो ज़रा ध्यान रखिएगा। हमारे पचास काम पड़ते हैं मुख्यमंत्री से।' खैर मैं गया पनियरा। फरवरी का महीना था । गुलाबी जाड़ा लिए हुए ।

पनियरा में वीरबहादुर ने विकास के इतने सारे काम कर दिए थे कि पूछिए मत। जहां पुलिया बननी चाहिए थी, वहां भी पुल बना दिया था। दिल्ली, लखनऊ के लिए सीधी बसें थीं। गांव-गांव बिजली के खभे। नहरें, ट्यूबवेल। उस धुर तराई और पिछड़े इलाके में विकास की रोशनी दूर से ही दिख जाती थी। और चुनाव में भी उन के अलावा किसी और का प्रचार कहीं नहीं दिखा। जब कि उम्मीदवार कई थे वहां से। वीरबहादुर सिंह के मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे चौधरी चरण सिंह की पार्टी भारतीय क्रांति दल से दयाशंकर दुबे। दुबे जी से मेरी व्यक्तिगत मित्रता भी थी। उन को प्रचार में भी शून्य देख कर मुझे तकलीफ़ हुई। गोरखपुर शहर में उन के घर गया। लगातार दो दिन। वह नहीं मिले। जब कि वीरबहादुर सिंह रोज मिल जाते थे। खैर एक दिन एकदम सुबह पहुंचा दयाशंकर दुबे के घर। बताया गया कि हैं। उन के बैठके में मैं बठ गया। थोड़ी देर में वह आए। उन के चेहरे का भाव देख कर मैं समझ गया कि मेरा आना उन्हें बिलकुल अच्छा नहीं लगा है। तो भी मेरे पुराने मित्र थे। सो अपनी अकुलाहट नहीं छुपा पाया। और पूछ ही बैठा कि , ' अगर इसी तरह चुनाव लड़ना था तो क्या ज़रुरत थी यह चुनाव लड़ने की भी ? '

बताता चलूं कि गोरखपुर विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में दयाशंकर दुबे वीरबहादुर सिंह से बहुत सीनियर थे। और कल्पनाथ राय से भी पहले वह छात्र संघ के अध्यक्ष रह चुके थे। तब छात्र राजनीति का बहुत महत्व था और कि प्रतिष्ठा भी। लेकिन कुछ अहंकार और कुछ गलत फ़ैसलों के चलते दयाशंकर दुबे की यह गति बन गई थी। खैर , जब मैं एकाधिक बार उन के इस तरह चुनाव लड़ने की बात पर अपना अफ़सोस ज़ाहिर कर चुका तो वह थोड़ा असहज होते हुए भी कुछ सहज बनने की कोशिश करते हुए बोले कि , ' हुआ क्या कुछ बताओगे भी ! कि बस ऐसे ही डांटते रहोगे ? ' मैं ने उन्हें बताया कि , ' दो दिन से पनियरा घूम रहा हूं और आप का कहीं नामोनिशान नहीं है। न प्रचार गाडियां हैं, न पोस्टर, न बैनर। एकदम शून्य की स्थिति है।' तो वह धीरे से हंसे और बोले कि , ' देखो मैं पनियरा में वीरबहदुरा से क्या चुनाव लड़ूंगा ? पनियरा चुनाव में वीरबहदुरा से मेरा बाजना वैसे ही बाजना है जैसे बाघ से कोई बिलार बाज जाए ! तो क्या लड़ना ? '

' फिर चुनाव लड़ने की ज़रुरत क्या थी? ' सुन कर दयाशंकर दुबे बोले, ' मैं तो दिल्ली गया था गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट मांगने। बड़ा उछल कूद के बाद भी जब गोरखपुर शहर से कांग्रेस का टिकट नहीं मिला तो घूमते-घामते चौधरी चरण सिंह से जा कर मिला और गोरखपुर शहर से उन की पार्टी का टिकट मांगा तो वह बोले कि गोरखपुर शहर से तो नहीं लेकिन जो पनियरा से लड़ो तो मैं तुम्हें अपना टिकट दे सकता हूं। तुम्हें चुनाव लड़ने का खर्चा, झंडा, पोस्टर, गाड़ी भी दूंगा और खुद आ कर एक बढ़िया लेक्चर भी दूंगा। तो मैं मान गया। और लड़ गया। यह सोच कर कि चलो इस में से कुछ आगे का खर्चा भी बचा लूंगा। ' मैं ने कहा कि , ' आप की एक भी गाड़ी दिखी नहीं क्षेत्र में।' तो वह बोले कि , ' कैसे दिखेगी? दो गाड़ी मिली है। एक पर खुद चढ़ रहा हूं दूसरी को टैक्सी में चलवा दिया है।' कह कर वह फ़िक्क से हंसे। मैं ने पूछा, ' और पोस्टर, बैनर? ' वह थोड़ा गंभीर हुए पर मुस्कुराए और उठ कर खड़े हो गए। धीरे से बोले, ' मेरे साथ आओ ! '

फिर वह भीतर के एक कमरे में ले गए। अजब नज़ारा था। एक कबाड़ी उन के पोस्टर तौल रहा था। उन्हों ने हाथ के इशारे से दिखाया और फिर मुझ से धीरे से बोले, ' यह रहा पोस्टर ! ' मैं अवाक रह गया। फिर वह मुझे ले कर बाहर के कमरे में आ गए। मै ने पूछा कि , ' यह क्या है? चुनाव के पहले ही पोस्टर तौलवा दे रहे हैं? ' वह बोले , '  अभी अच्छा भाव मिल जा रहा है। चुनाव बाद तो सभी बेचेंगे और भाव गिर जाएगा। ' मैं ने कहा , ' चिपकवाया क्यों नहीं? ' वह बोले , '  व्यर्थ में पोस्टर भी जाता, चिपकाने के लिए मज़दूरी देनी पड़ती, लेई बनवानी पड़ती। बड़ा झमेला है। और फिर वीरबहदुरा भी अपना मित्र है, वह भी अपने ढंग से मदद कर रहा है। ' कह कर वह मुसकुराए। मैं समझ गया। और उन से विदा ले कर चला आया। बाद के दिनों में जैसा कि जयपुरिया ने कहा था वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री भी बने। और यही दयाशंकर दुबे उन के साथ-साथ घूमते देखे जाते थे। अब सोचिए कि जैसे वीरबहादुर सिंह के साथ दयाशंकर दुबे लड़े थे , इस बार के चुनाव में भी तमाम उम्मीदवार बिलार की तरह बाघ से लड़ने के लिए के लिए मुंह बाए बैठे हैं । चुनाव का फ़ैसला चाहे जो हो , अगले पांच साल का खर्च तो निकल ही आएगा । हां , लेकिन जैसे दयाशंकर दुबे जो एक सच देख रहे थे और कह भी रहे थे बेलाग हो कर कि वीरबहदुरा से बाजना वैसे ही है जैसे किसी बाघ से बिलार बाज जाए ! जाने यह कांग्रेसी भी देख रहे हैं कि नहीं , यह जानना भी दिलचस्प है ।

Tuesday, 15 November 2016

जब नाबालिग हो कर भी मैं ने हरिकेश बाबू के लिए ढेर सारे वोट डाले


दयानंद पांडेय 


वह संपूर्ण क्रांति के दिन थे । दूसरी आज़ादी के दिन थे । जे पी की आंधी के दिन थे । गांधी , लोहिया और जय प्रकाश जैसे प्रकाश बन कर समाज में छा गए थे । यानी 1977 के वह चुनावी दिन थे । तब हम विद्यार्थी थे । लेकिन इस से भी पहले वह काली इमरजेंसी के दिनों का ज़िक्र कैसे छोड़ दें ? उन दिनों कविताएं  लिखते थे और लगता था कि तब अपनी कविताओं से हम इस काली दुनिया में आग लगा देंगे । आग तो नहीं लगी हां , हम ने लाठियां बार-बार ज़रुर खाईं । इस के पहले अंगरेजी हटाओ आंदोलन में भी खा चुके थे । सड़क पर पुलिस की तो घर में पिता की । शहर में इमरजेंसी के ख़िलाफ़ कोई भी जुलूस निकले हम उस में इंकलाब ज़िंदाबाद , इमरजेंसी मुर्दाबाद , मुर्दाबाद ! का नारा लगाने के लिए घुस जाते थे । गांधी , लोहिया , जयप्रकाश की नारेबाजी , इस की आग और आग में झुलसने की चिंगारी में हम खड़े थे । टीनएज थे तब । कुछ खोने का भय नहीं था । पुलिस को धर-पकड़ और लाठी चार्ज करनी ही होती थी , करती थी । लेकिन हम या हमारे जैसे कुछ और हमारे साथी नाबालिग होने के कारण जेल जाने से बच जाते थे । मुझे एक दारोगा की वह सूरत आज भी नहीं भूलती जिस ने बहुत कस कर खींच कर लाठी मेरी जांघों पर मारी थी । लेकिन मेरी शकल देखते ही उस दारोगा ने कैसे अपनी लाठी रोक कर मेरे ऊपर न सिर्फ़ ख़ुद अपनी लाठी रोक ली थी , बल्कि दूसरे पुलिसकर्मी की लाठी भी अपनी लाठी पर रोक ली थी और चीख़ कर बोला था अरे यह तो बिलकुल बच्चा है । फिर उस दारोगा ने मुझे बड़ी आत्मीयता से डपटा और भाग जाओ , अपने घर जाओ ! लेकिन यहां तो लाठी की मार के बावजूद इंकलाब जिंदाबाद जुबान पर बसा हुआ था । अंततः मुझे थाने ले जाया गया । थोड़ी देर बाद बिठाए रखने के बाद एक और दारोगा आए । मुझे स्नेहवत समझाया और कहा घर जाओ , पढ़ो - लिखो , अपनी ज़िंदगी ख़राब मत करो । मैं किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह फिर भी अड़ा रहा । दारोगा ने खींच कर थप्पड़ लगाया । मेरा पता पूछा और कहा कि इस के बाप को पकड़ कर लाओ । अब मेरी हिम्मत टूट गई कि बात जैसे भी हो घर तक न जाए । इंकलाब ज़िंदाबाद का जूनून पिता के डर से उड़न छू हो गया । मैं चुपचाप घर आ गया । घर आ कर भी पिटा । थाने और पुलिस से पिटाई की बात तो नहीं पर जुलूस में जाने की बात घर तक पहुंच चुकी थी । उन दिनों धूमिल सवार थे दिल और दिमाग पर । धूमिल लिखते थे :

क्या आज़ादी सिर्फ़ तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई खास मतलब होता है?

इसी उधेड़बुन और ऐसे ही सवालों में उलझते उलझाते दुष्यंत कुमार भी सामने आ खड़े हुए । वह कह रहे थे :

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो
ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं

जुलूस , लाठी और नारेबाजी के दिन अंतत: बीते । तालाब का पानी भी बदल गया । कंवल के फूल अब फिर खिलने लगे । इमरजेंसी की काली रात बीत गई । चुनाव का ऐलान भी हो गया । जनता पार्टी बन गई । चुनावी रैलियां शुरु हो गईं । बड़े-बड़े नेताओं का जमघट । कभी चरण सिंह , चंद्रशेखर , हेमवती नंदन बहुगुणा , नंदिनी सतपथी , तो कभी जगजीवन राम , अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता आए दिन शहर में आने लगे । हम उन्हें घंटों इंतजार कर के सुनते । जैसे कोई जश्न चल रहा था , शहर में भी , हमारी ज़िंदगी में भी । हमारे शहर गोरखपुर में हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह जनता पार्टी के उम्मीदवार  थे । हालां कि इस के पहले जनसंघ धड़े के हरीशचंद्र श्रीवास्तव उम्मीदवार घोषित हुए थे । लेकिन चूंकि हरिकेश बहादुर सिंह हेमवती नंदन बहुगुणा धड़े से थे , बहुगुणा के साथ ही कांग्रेस को लात मार कर जनता पार्टी में आए थे सो बहुगुणा ने वीटो लगाया । हरिकेश जी , उम्मीदवार हो गए ।  हरिकेश बहादुर सिंह युवा थे । उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे , बनारस हिंदू विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष रहे थे , एम टेक टापर थे । ईमानदार और सरल राजनीति के पक्षधर थे । और इस सब से बड़ी बात यह थी कि एक समय हमारे निकट पड़ोसी रहे थे । एक ही कैम्पस में हम लोग अगल बगल रहे थे । बतौर किरायेदार । बरसों । इलाहीबाग के जमींदार साहब के हाता में । ख़ूब बड़ा सा हाता । बड़ा सा मकान । हम उन्हें जब बाबू साहब कहते तो वह टोकते और नाम से पुकारने की बात कहते । हम उन्हें हरिकेश बाबू कहते । भोजपुरी ही हमारी बतियाने की भाषा थी । वह हम से आठ-दस साल बड़े थे लेकिन फिर भी हम साथ खेले थे । बतौर जूनियर गोल । वह सीनियर गोल के थे । रस्सी कूद को हम लोग तब उबहन कूद कहते । उबहन मतलब कुंए से पानी निकालने वाली रस्सी । कोई और रस्सी तब सुलभ नहीं होती थी । तो दो उबहन आपस में बांध कर लंबी रस्सी बनाई जाती । दो लोग , दोनों किनारों पर उसे पकड़ कर खड़े होते । बाक़ी लोग कूदते । जूनियर गोल के लिए अलग ऊंचाई और सीनियर गोल के लिए अलग । उन दिनों सेवन टाइम्स भी हम लोग बहुत खेलते । खपड़े के सात बराबर-बराबर टुकड़े बटोर कर ऊपर नीचे जोड़ कर सात टुकड़े खड़े किए जाते और एक निश्चित दूरी से उसे रबर की गेंद से निशाना साध कर मार गिराना होता था ।

ऐसे और भी कई खेल थे । खेलते तो हम लोग आईस-पाईस और एक्खट-दुक्खट भी थे । पर यह जूनियर गोल का खेल था । क्रिकेट भी , गुल्ली डंडा भी । हरिकेश बहादुर की इन सब में भी दिलचस्पी नहीं थी । हां लेकिन हरिकेश बहादुर सिंह की ज़्यादा दिलचस्पी उबहन कूद में होती थी । वह तकरीबन रोज उबहन ऊंची करवाते थे अपने लिए । इस उबहन कूद में कूदते समय अगर उबहन देह से ज़रा भी छू जाए तो वह फाऊल मान लिया जाता था । इस खेल में हरिकेश बहादुर ज़रा भी किसी को बेईमानी नहीं करने देते थे । न किसी को , किसी का फेवर । बाद के दिनों में राजनीति में भी खेल के इस नियम को पूरी तरह उन को पालन करते देखा । डी बी इंटर कालेज से इंटर पास करते ही वह बी ई करने बी एच यू चले गए । जल्दी ही वह वहीं से एम टेक करने लगे । लेकिन छुट्टियों में जब वह अपने गांव बढ़याचौक जाते तो इलाहीबाग भी ज़रूर आते । उन के चचेरे भाई रामप्रताप सिंह तब यहीं रहते थे । वकील थे , कांग्रेसी भी । प्रैक्टिस नहीं चलती थी । लेकिन वह सजधज कर कचहरी जाते रोज जाते थे । रिक्शे से । जमींदार थे सो रहते ठाट-बाट से ही थे । ऐंठ भी जमींदारी वाली थी । हरिकेश बहादुर इसी नाते उन्हें बिलकुल पसंद नहीं करते थे । कई बार हरिकेश उन से पिट भी जाते थे लेकिन झुकते नहीं थे । नौकर चाकर वाले थे वह लोग । तो भी एक बार चौराहे से सिगरेट लाने के लिए हरिकेश बहादुर से बड़े भाई रामप्रताप बहादुर ने कह दिया। हरिकेश तब पढ़ाई कर रहे थे । सुबह नौ बजे के आस-पास का समय था । अभी पढ़ रहा हूं कह कर हरिकेश ने मना कर दिया । रामप्रताप बहादुर ने न सिर्फ़ बुरा माना बल्कि दिल पर भी ले लिया । बहुत पिटाई की हरिकेश की । लातों से , चप्पल से । लेकिन हरिकेश नहीं गए तो नहीं गए । इसी फेर में हरिकेश बहादुर राजनीति और राजनीतिज्ञों से दुराव भी रखने लगे थे । बल्कि एक हद तक नफ़रत । लेकिन अचानक देखा कि एम टेक करने वाले , राजनीति से नफ़रत करने हरिकेश बहादुर बी एच यू छात्र संघ के अध्यक्ष निर्वाचित हो गए । अख़बारों में फ़ोटो और ख़बर छपी थी । उन दिनों हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री थे । हरिकेश उन के संपर्क में आ गए । और यह देखिए वह उत्तर प्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष बन गए । संजय गांधी के संपर्क में भी वह आ गए । कि तभी इमरजेंसी भी लग गई । हरिकेश बहादुर इलाहीबाग तब भी आते रहे । वह किसी होटल आदि में ठहरने के बजाय इलाहीबाग में उस किराये के मकान में ही ठहरते । सब से मिलने के लिए वह पार्टी कार्यालय जाते । खैर इमरजेंसी हटी । हेमवती नंदन बहुगुणा कांग्रेस से बगावत कर जनता पार्टी में आ गए । साथ ही हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह भी ।

और यह देखिए हरिकेश बहादुर उबहनकूद भी कूद गए । बहुत ऊंची कूद । गोरखपुर संसदीय सीट से जनता पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार घोषित हो गए । हालां कि इस के पहले जनसंघ धड़े के हरीशचंद्र श्रीवास्तव को उम्मीदवार घोषित किया गया था । लेकिन हरिकेश के लिए बहुगुणा ने एड़ी चोटी एक कर दी । सो हरीशचंद्र श्रीवास्तव का टिकट रद्द कर हरिकेश का नाम घोषित किया गया । पूरे गोरखपुर में हर्ष की लहर छा गई । ख़ास कर इलाहीबाग में तो ज़बरदस्त । लगता था कि हरिकेश नहीं , इलाहीबाग ही चुनाव लड़ रहा था । लेकिन इधर हरिकेश का नाम जनता पार्टी से घोषित हुआ उधर उन के चचेरे भाई रामप्रताप बहादुर सिंह को दिल का दौरा पड़ गया । जाने यह संयोग था , बीमारी थी या हरिकेश से जलन जो भी हो कहना मुश्किल था , तब भी आज भी । लेकिन रामप्रताप बहादुर सिंह गोरखपुर शहर कांग्रेस के कई बार सचिव , मंत्री जैसे पदों पर रहे थे । कई बार विधान सभा चुनाव में टिकट के लिए भी वह जद्दोजहद कर चुके थे पर असफल रहे थे । और अब उन का छोटा चचेरा भाई जनता पार्टी का उम्मीदवार घोषित था गोरखपुर संसदीय सीट से । जनता पार्टी का टिकट मतलब सांसद होना निश्चित । जो हो रामप्रताप बहादुर सिंह के हार्ट अटैक को तब इसी तरह देखा गया था । हरिकेश बहादुर और डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद रामप्रताप बहादुर सिंह को आख़िर बचाया नहीं जा सका । 1977  में क्या आज भी गोरखपुर में हार्ट पेशेंट का कोई इलाज नहीं है , न कोई कायदे का डॉक्टर । तो वह बचते भी भला तो कैसे ? ले दे कर उन दिनों एक सिविल हॉस्पिटल ही था । जहां  खांसी , जुकाम , फोड़ा , फुंसी से लगायत हार्ट पेशेंट सभी का आधा-अधूरा इलाज ही था , आज भी यही आलम है । खैर तब कहने वालों ने कहा भी कि भाई की लाश पर हरिकेश चुनाव लड़ रहे हैं । तब तक रामप्रताप बहादुर सिंह इलाहीबाग छोड़ कर बेतियाहाता में आवास विकास कालोनी में शिफ्ट हो चुके थे । ज़िक्र ज़रुरी है कि कभी कांग्रेसी रहे वर्तमान में भाजपा के सांसद और पूर्व मंत्री जगदंबिका पाल के सगे जीजा थे रामप्रताप बहादुर सिंह । बाद के दिनों में रामप्रताप बहादुर सिंह के इकलौते बेटे को पढ़ाने के लिए जगदंबिका पाल लखनऊ ले आए । सेंट फ्रांसिस जैसे स्कूल में नाम लिखवाया । रामप्रताप बहादुर सिंह का यह बेटा और जगदंबिका पाल का भांजा पढ़-लिख कर आई ए एस बना । पिता की असफलता को धो दिया । हरिकेश की उंगली पकड़ कर जगदंबिका पाल भी राजनीति में आ चुके थे युवक कांग्रेस में । अलग बात है अब राजनीति में हरिकेश बहादुर को लोग भूल चुके हैं , जगदंबिका पाल को ज़रुर जानते हैं । हरिकेश अभी भी कांग्रेस में सिद्धांत की राजनीति की धुन में हाशिए से भी बाहर हैं । दो बार सांसद रहने के बावजूद ।

बहरहाल , हरिकेश तब जनता पार्टी के टिकट पर सवार थे । और जनता पार्टी पूरे देश पर सवार थी । मोरार जी देसाई , चरण सिंह , चंद्रशेखर , हेमवती नंदन बहुगुणा , नंदिनी सतपथी , तो कभी जगजीवन राम , अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के भाषण सुन-सुन कर हम उत्साहित और ऊर्ज्वसित हो रहे थे । पुलिस की लाठियों के घाव को सुखा रहे थे । तब हमारे पास साईकिल भी नहीं थी सो छह सात किलोमीटर पैदल जा-जा कर भाषण सुनते फिर पैदल ही लौटते । दो-दो , तीन-तीन , चार-चार घंटे इंतज़ार भी करते खड़े-खड़े । बिना कुछ खाए-पिए । चंद्रशेखर , चरण सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के तब के भाषणों की जो गहरी छाप मन पर पड़ी वह आज भी ताज़ादम है । बिना चीख़े-चिल्लाए जिस तरह यह लोग इमरजेंसी की ज़्यादतियों को तरतीब देते , मंत्रमुग्ध हो हम सुनते । भारी भीड़ होती । पुलिस बहुत-बहुत कम । लेकिन कहीं कोई अराजकता नहीं । कोई भगदड़ नहीं । हम जैसे युवा भी मंच से सट कर खड़े होते । तब न फ़ोटो खिंचवाने के लिए फ़ोटोग्राफ़र उपलब्ध थे , न मोबाईल था , न सेल्फी कल्चर । न नेताओं के पास सिक्योरिटी का तामझाम , न अहंकार , न दिखावा । सो कई बार तो मंच पर चढ़ कर भी इन नेताओं को करीब से देखा । चंद्रशेखर और जगजीवन राम जैसे नेताओं को मंच पर आपसी बातचीत में भोजपुरी में बतियाते देखा हरिकेश जी से । का हो ! कह कर इन से , उन से भी । इस के पहले इमरजेंसी के पहले इसी सहजता से भाषण देते और बतियाते जय प्रकाश नारायण को भी बहुत करीब से देख चुका था । लेकिन तब लोगों में गुस्सा था लेकिन सुरुर भी । और अब गुस्सा ग़ायब था , ख़ुशी तारी थी मय सुरुर के ।

भाषण सुनने के अलावा हम लोग कभी-कभी जुलूस भी निकालते , नारे लगाते । झंडा लिए , बिल्ला लगाए । जिन पर हल लिए किसान छपा होता था । जनता पार्टी का चुनाव निशान 1977 में यही था । इस के पहले के चुनाव में भी हम बच्चे थे ज़रुर लेकिन मुहल्ले के चुनाव कार्यालयों में जा कर लाईन लगा कर बिल्ले लेने का शौक था । पार्टी कोई भी हो बस उस के बिल्ले से मतलब था । बिल्लों का ख़ासा संग्रह करते थे हम मुहल्ले के बच्चे । पर अब हम बच्चे नहीं थे , किशोर थे , युवा हो रहे थे । इमरजेंसी से इंदिरा गांधी से टकराने का एक जूनून था साथ में । कह सकते हैं एक मकसद था साथ में । एक भावना थी । यह वही इंदिरा गांधी थीं जिन को हम लोग कभी सैल्यूट करते नहीं थकते थे । तब नौवीं में पढ़ते थे और पंडित रुप नारायण त्रिपाठी का लिखा गीत गाते-फिरते थे , आमार दीदी , तोमार दीदी , इंदिरा दीदी ज़िंदाबाद ! सड़कों पर विजय जुलूस निकालते थे । इंदिरा गांधी ज़िंदाबाद , मानेक शा ज़िंदाबाद के नारे लगाते थे । यह 1971 का दिसंबर था । हम एक गाना और गाते थे और झूम कर गाते थे , सोलह दिसंबर आया ले के जवानी सोलह साल की ! गो कि हम तब तेरह साल के ही थे । और सोचते थे कि जल्दी ही से सोलह के हम भी हो जाएं । और गज़ब यह कि जब सोलह के हुए तो यह ज़ज़्बा बदल रहा था । इमरजेंसी बस लगना ही चाहती ही थी । बेताब थी जैसे । जे पी आंदोलन अपने चरम पर था । कि जस्टिस जगमोहन सिनहा का फ़ैसला आ गया । राजनारायन की याचिका पर इंदिरा गांधी का रायबरेली से चुनाव अवैध घोषित हो गई थी । फ़ौरन इमरजेंसी लग गई । और हम पुलिस और पिता की लाठियां खाने लगे थे । पुलिस कहती , घर भाग जाओ ! पिता कहते थे , जुलूस में गए ही क्यों थे और जो गए ही थे तो घर क्यों आए ? अब पुलिस घर आ गई तो ? सरकारी नौकरी का डर था । कहीं नौकरी पर बन आई तो ? पिता का बड़ा ऐतराज यह भी था कि पढ़ने-लिखने की उम्र में यह सब ठीक नहीं । अभी  बच्चे हो । पढ़-लिख कर जो चाहो करो । यही बात और ऐतराज वह कविता लिखने और कवि गोष्ठियों में जाने को ले कर भी करते । यह ऐतराज किसी भी पिता का हो सकता है , था । ख़ास कर पारंपरिक पिता का । लेकिन मैं तब पिता नहीं , पुत्र था । बग़ावती पुत्र ।

लेकिन अब देख रहा था कि आपातकाल हटने के बाद पिता बदल रहे थे । उन के ऐतराज अब कम होते जा रहे थे । ख़ास कर जब किसी नेता की रैली से देर में वापस आने पर । कई बार रात के दस भी बज गए लौटने में । तो भी । तो इस में एक तो इमरजेंसी के डर का समाप्त हो जाना तो था ही इस से भी बड़ा फैक्टर हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह का इलाहीबाग में रहा होना भी था । यह हर्ष भी था । बहरहाल चुनाव का दिन आ गया । अब हम न तो तब वोटर लिस्ट में थे न बालिग़ थे । उम्र अभी उन्नीस साल की ही थी । तब इक्कीस साल पर लोग बालिग़ माने जाते थे क़ानूनी तौर पर । बालिग़ होने पर ही वोटर लिस्ट में नाम चढ़ता था । तो क्या करते ? जो करना था , कर चुके थे । लेकिन सुबह के नौ बजे तक एक काम मिल गया । एक रिक्शा दिया गया । जनता पार्टी का झंडा लगा हुआ ।  मुहल्ले के फला-फला को बारी-बारी पोलिंग बूथ से रिक्शे पर बिठा कर लिवा लाने के लिए  । उन दिनों रिक्शे की सवारी भी रौब की सवारी मानी जाती थी । सीना तान कर रिक्शे पर बैठ कर निकल पड़ा । मुहल्ले के और भी कुछ लड़कों को यह काम सौंपा गया । कुछ लोग मिले , कुछ लोगों के घर पर ताला लगा था । वह लोग अपने-अपने गांव जा चुके थे । कोई वोट डालने , कोई छुट्टी मनाने । अब यह एक काम और मिला कि किस-किस घर में ताला लगा है , उस की लिस्ट बनाने का । रिक्शा की शाही सवारी साथ थी ही । अब मुहल्ले से दस प्रतिशत से ज़्यादा मतदाता नदारद थे । अब सोचना शुरु किया गया कि इन के वोट भी बरबाद होने से कैसे रोका जाए । तय हुआ कि जो लोग वोटर लिस्ट में नहीं हैं , उन से इन नदारद लोगों के वोट डलवा दिया जाए । कुछ लोग तैयार हुए । वोट डाले भी इक्का-दुक्का लोगों ने । लेकिन ज़्यादातर लोग तैयार नहीं हुए । यह सरकारी नौकरियों में बाबू लोग थे । डरपोक लोग थे । नैतिकता और शुचिता वाले लोग भी थे । यह लोग किसी भी किस्म का रिस्क लेने को राजी नहीं थे । फिर तय हुआ कि बालिग़ होने की राह पर खड़े हम जैसे नौजवानों का उपयोग किया जाए । और हम नौजवान कैसा भी कोई भी रिश्क लेने को तैयार थे । लिया भी । ढेरों फर्जी वोट तो अकेले मैं ने ही डाले । कोई बीस वोट । सत्रह बरस का हो कर भी । पचास-पचपन बरस के लोगों के वोट । पोलिंग बूथ पर बैठे कांग्रेस के लोगों ने भी एक पैसे का ऐतराज नहीं किया । न वहां तैनात सरकारी बाबूओं ने । बस किसी के नाम की परची हाथ में होनी चाहिए । और अंगुली पर स्याही का निशान नहीं होना चाहिए था । स्याही हम बैलेट पेपर पाते ही मिटा देते थे। तब के दिनों वोटर आई डी नहीं थी । न किसी पहचान पात्र की दरकार थी । चुनाव आयोग भी तब सख़्त नहीं था । बाबू लोग पहचान भी लेते एकाध बार और हंसते हुए पूछते , अरे , तुम फिर आ गए ? अच्छा चलो , बस मुहर मारने में गलती मत करना । उन का इशारा होता कि हल लिए किसान पर ही वोट करना । मैं ने देखा कि सरकारी बाबू लोग इमरजेंसी से उतना नाराज नहीं थे , जितना नसबंदी और नसबंदी के टारगेट से नाराज थे । वह लोग खुल कर कहते कि बहुत कटवाई है संजय गांधी ने , सो अब इस की काट देना बहुत ज़रुरी है । वह लंबी-लंबी लाइनें मुझे अभी तक याद हैं । सुबह से शाम हो गई थी , लाइन नहीं खत्म हो रही थी । कोई थक नहीं रहा था । हर कोई उत्साह और उत्सव से भरा हुआ । मैं ने बहुत से चुनाव देखे हैं पर वैसा उत्सव जैसा चुनाव फिर कभी नहीं देखा । जश्ने चुनाव ही था वह । वैसी ख़ुशी , वैसी खनक और वैसी चहक किसी और चुनाव में फिर नहीं देखा । फर्जी वोट भी डाल रहे हैं , बार-बार डाल रहे हैं और पूरी ठसक से डाल रहे हैं । गरज यह कि चोरी भी पूरी सीनाजोरी से कर रहे हैं । क्या तो यह आपद धर्म है । ऐसा तो न भूतो , न भविष्यति !

हालां कि अब जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तो अपनी उस फर्जी वोटिंग को सोच कर शर्म से गड़ जाता हूं । एक गहरे अपराधबोध से घिर जाता हूं । मैं ने जीवन में और भी कई गलतियां की हैं । लेकिन यह तो लोकतंत्र के नाम पर पाप किया है । भले तब उम्र कम थी , समझ विकसित नहीं थी लेकिन इस बिना पर मैं अपने को माफ़ नहीं कर पाता । कभी नहीं कर पाऊंगा । बाद में तो सभी जानते हैं , हमारे हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह भारी मतों से जीत गए थे । शेष कांग्रेस सहित सभी प्रत्याशियों की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी । कांग्रेस गोरखपुर से ही नहीं , पूरे देश से लगभग साफ हो गई थी । यह बात तो सभी लोग जानते हैं । लेकिन कांग्रेस को इस तरह साफ करने में नाबालिग होते हुए भी फर्जी वोट डालने वालों में एक अपराधी मैं भी था यह बात कम लोग जानते हैं । लेकिन जो होना था , हो चुका था । एक अख़बार में तब एक फ़ोटो छपी थी जिस में एक सफाई कर्मी झाड़ू लगा रहा है और इंदिरा गांधी की फ़ोटो वाला एक पोस्टर कूड़े में जा रहा था । यह रघु राय की खिंची हुई फ़ोटो थी ।

लेकिन इंदिरा गांधी कूड़े में सचमुच नहीं गईं । किसी पोस्टर के कूड़े में चले जाने से कोई कूड़े में नहीं चला जाता। यह इंदिरा गांधी ने अपनी दुबारा वापसी से साबित किया था । रघु राय की उस फ़ोटो का सच बदल गया था । या यह कहिए कि जनता पार्टी की आपसी कलह ने इंदिरा गांधी को सत्ता में वापसी करवा दी थी । ढाई साल में ही । लोहिया के कहे मुताबिक जनता ने तब पांच साल इंतज़ार नहीं किया था । हां एक बात ज़रुर यह कहना चाहूंगा कि हरिकेश प्रताप बहादुर सिंह जैसा विनयशील , विवेकवान , ईमानदार , सादगी पसंद , योग्य और शालीन सांसद गोरखपुर को फिर दुबारा नहीं मिला । अब आगे भी क्या मिलेगा । उन के जैसा पार्लियामेंटेरियन भी नहीं । संसद की बहसों में वह युवा होते हुए भी एक मानक थे । दिखावा , अहंकार और हिप्पोक्रेसी से वह बहुत दूर रहते रहे । वह बिना किसी तामझाम के अकेले रिक्शे से भी शहर में निकल लेते थे । एक बार तो वह दिल्ली से आए । गोरखपुर स्टेशन पर उतरे । ट्रेन बिफोर टाइम थी । कोई उन्हें रिसीव करने वाला भी नहीं था । वह चुपचाप रिक्शा पकड़ कर घर चले गए । उन की पार्टी के लोग आए तो वह नहीं मिले तो लोग घबराए । पर घर जाने पर वह मिल गए । 23 मीना बाग़ , नई दिल्ली में वह बतौर सांसद रहते थे। संसद जाने के लिए भी वह संसद ले जाने वाली बस का उपयोग करते थे । हरिकेश जी की ऐसी तमाम कहानियां हैं । मेरा एक उपन्यास है वे जो हारे हुए । 2011 में छपा था । इस में हरिकेश जी भी एक पात्र के रुप में उपस्थित हैं और विस्तार से । प्रभात ख़बर के प्रधान संपादक रहे और अब राज्य सभा के सदस्य हरिवंश , [ अब राज्यसभा के उपसभापति ] ने जब यह उपन्यास पढ़ा तो मुझ से फ़ोन कर के पूछा कि यह चरित्र कहीं हरिकेश बहादुर तो नहीं हैं ? मैं ने पूछा कि आप ने कैसे जान लिया तो वह बताने लगे कि उस वक़्त बी एच यू में मैं भी पढ़ता था । देखा है इसी तरह उन्हें । फिर वह बताने लगे कि कैसे कांग्रेस में झारखंड का जो प्रभारी होता है , वह भी करोड़ो-अरबो रुपए कुछ ही दिन में कमा लेता है लेकिन हरिकेश भी प्रभारी रहे और तब कांग्रेस की सरकार थी यहां लेकिन एक पैसा नहीं छुआ उन्हों ने । यह आसान बात नहीं है । सोचिए कि हरिकेश एक समय उत्तर प्रदेश कांग्रेस में प्रदेश उपाध्यक्ष थे । प्रदेश कार्यालय में किसी महिला से दुराचार की ख़बर अख़बारों में छपी । बाहरी लोग पकड़े गए । पर हरिकेश बहादुर सिंह ने तब उपाध्यक्ष पद से नैतिक आधार पर इस्तीफ़ा दे दिया । तब जब कि उस समय वह लखनऊ नहीं , दिल्ली में थे । आज की तारीख़ में ऐसे राजनीतिज्ञ तो सपना ही हैं ।