Monday, 10 August 2026

लेखन में अश्लीलता का आरोप ही अपने आप में बहुत अश्लील है

दयानंद पांडेय से विजय पुष्पम पाठक की बातचीत  


आप की लेखकीय अभिरुचि कब और कैसे उत्पन्न हुई? 

- जब टीनएज था। तभी से। अचानक। विद्यार्थी जीवन में अंत्याक्षरी , वाद विवाद प्रतियोगिता में दिलचस्पी थी। अंत्याक्षरी में स्कूल में नियम था कि कविताओं को ही पढ़ना था। फ़िल्मी या इधर उधर के गाने नहीं। फिर भी कविताओं में बस स्कूली कविताओं तक ही दिलचस्पी थी। लिखने की तो कभी सोचा ही नहीं था। मुझे याद है कि एक रात स्कूल में कवि सम्मलेन सुन कर घर लौटा तो सोम ठाकुर का एक गीत मन में बस गया था। जाओ पर संध्या के संग लौट आना तुम ! घर लौट कर तभी लालटेन जला कर बैठ गया। कविता लिखने। सोम ठाकुर और उन का गीत मन में छाए हुए ज़रूर थे पर कविता लिखी। गीत नहीं। कविता का शीर्षक अभी तक याद है : एक किरन। तब ग्यारहवीं कक्षा में था। फिर भूल गया कविता और कविता की उत्तेजना। फिर उन्हीं दिनों लव एट फर्स्ट साइट हुआ। फ़िल्मी गाने गाने लगा। उन दिनों एक फ़िल्मी गाना दिल तो लइ गवा आया था। गाने लगा। एक गाना और था : उल्फत में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ। गाता ज़रूर था कि उल्फत में ज़माने की हर रस्म को ठुकराओ पर ठुकरा नहीं पाया। उस लड़की से प्यार का इज़हार भी नहीं कर पाया। हिम्मत ही नहीं पड़ी। वन वे ही रह गया। ख़ुद ही प्यार किया , ख़ुद ही ख़ुश हुआ। बाद में लगा कि लड़की से न सही , कविता में तो बात कर ही सकता हूं। कविता लिखने लगा। और यह देखिए कहानी भी लिखने लगा। अख़बारों और पत्रिकाओं में छपने लगा। आकाशवाणी पर कविता , कहानी पढ़ने लगा। आज तक यह सिलसिला रुक रुक कर सही क़ायम है। वह एक गाना है न : रुके रुके से कदम रुक कर बार बार चले। 

समकालीन हिंदी लेखकों में आपके पसंदीदा लेखक कौन - कौन हैं? 

- पसंदीदा लेखक बहुत से हैं। कथा में भाषा के स्तर पर हजारी प्रसाद द्विवेदी , अमृतलाल नागर , मोहन राकेश , मनोहर श्याम जोशी। 

आप के इतने अधिक उपन्यास , कहानी संग्रह , संस्मरण और साक्षात्कारों पर पुस्तकें हैं लेकिन हम समकालीन हिंदी साहित्य के समाचारों में आपका नाम ढूंढते ही रह जाते हैं जबकि अमीश त्रिवेदी , चेतन भगत जैसे युवा लेखक एक दो किताबों से ही इतनी अधिक प्रसिद्धि पा जाते हैं और उनकी किताबें बेस्ट सेलर का दर्ज़ा, आपकी इसपर क्या प्रतिक्रिया है? 

- सच तो यह है कि लिखने वाले दीखते नहीं हैं। दिखना प्रदर्शनकारी विधा में होता है। फिल्म , थिएटर , संगीत , गायन और अन्य कलाएं प्रदर्शनकारी कलाएं हैं। लोग ख़ूब दीखते हैं। खेल और राजनीति भी अब ऐसी ही कलाएं हैं। फिर आप ने जिन दो लेखकों का नाम लिया है , यह एक तो अंग्रेजी के लेखक हैं दूसरे , बाज़ार की नब्ज़ पहचानते हैं। और अब बाज़ार से ही ज़िंदगी है। संयोग कहिए या दुर्योग , मैं लेखन के बाज़ार में नहीं आ पाया हूं। बाज़ार को बुरा नहीं मानता पर बाज़ार ही सब कुछ नहीं है। वैसे भी हिंदी के प्रकाशक अपने लेखकों और उन की किताबों की मार्केटिंग नहीं करते। लेखकों से पैसा ले कर किताब छापने के अभ्यस्त हो गए हैं। सरकारी ख़रीद में किताबों को लाइब्रेरियों में दफना कर हिंदी प्रकाशक अपना व्यापार कर रहे हैं। बाज़ार में जब प्रकाशक किताब नहीं ले जाएंगे , कोई कैसे जानेगा किसी लेखक और किसी किताब को। अंग्रेजी के प्रकाशक बाज़ार में किताब ले कर जाते हैं। लेखक और किताब की ब्रांडिंग करते हैं। प्रचार करते हैं। लोग उन्हें जानने लगते हैं। बस इतनी सी बात है। 

लेखन का जिस प्रकार वर्गीकरण हो रहा है मसलन स्त्री लेखन, दलित लेखन, दाहिना बायां लेखन आदि .. क्या लेखन को इस तरह खांचों में बांटना उचित है? 

- लेखन , लेखन होता है। लेखन का कोई चौखटा या सरहद नहीं होती। दाहिना-बायां नहीं होता। दलित-फलित नहीं होता। स्त्री-पुरुष नहीं होता। खांचे में लेखन को वही लोग बांटते हैं जिन्हें लेखन से नहीं , राजनीति से , लेखकीय राजनीति से सरोकार होता है। प्रपंची लोग हैं यह। प्रोपगंडा मास्टर। 

मुक्तिबोध की कविता की एक पंक्ति है 

' अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे 

तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब '

आपके लेखन में यह उक्ति कहां तक सच साबित होती है ? 

- लिखना अपने आप में ख़तरा उठाना ही होता है। अभिव्यक्ति के ख़तरे कब नहीं थे जो अब नहीं हैं। तुलसीदास के रामचरित मानस पर एक समय अकबर प्रतिबंध लगाने पर आमादा था। यह बात कितने लोग जानते हैं ? तुलसी को अकबर ने कैद किया था। अपमानित किया था। मीरा का विद्रोह कौन नहीं जानता ? मीरा ने क्या अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाए ? बग़ावत कर राजमहल छोड़ कर नाचती गाती पगडंडियों से वृंदावन आईं। द्वारिका गईं। नाचती गाती कृष्ण की मूर्ति में समा गईं। इस के पहले कबीर को तब के शासकों ने जाने कितनी बार क़ैद किया। मारा पीटा , अपमानित किया। जब कि कबीर के ही समय के अमीर खुसरो को राजदरबार प्राप्त था। ऐसे अनेक और अनगिन क़िस्से हैं अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने के। प्रेमचंद को अपना नाम धनपत राय से प्रेमचंद क्यों करना पड़ा ? सोज़ेवतन की जब्ती करते हुए हमीरपुर के तत्कालीन कलक्टर ने प्रेमचंद को फटकार लगाते हुए कहा था :अपने भाग्य को बखानो कि अंग्रेज़ी अमलदारी में हो। मुग़लों का राज होता तो हाथ काट दिए जाते। दाराशिकोह के साथ औरंगज़ेब ने क्या किया ? अभिव्यक्ति का ही तो मामला था। सोवियत संघ में विद्रोही लेखकों को साइबेरिया भेज दिया जाता था। बहुत से लेखक सोवियत संघ छोड़ कर भाग गए थे। टालस्टाय जैसे लेखक को कितना तो उपेक्षित किया गया था। टालस्टाय के बरक्स गोर्की को उछाला गया। ऐसे अनेक किस्से हैं , दुनिया भर में। क्या महादेवी वर्मा ने अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाए ? कि चंद्रकिरण सोनरिक्सा ने नहीं उठाए ? कि अजित कौर , मन्नू भंडारी और प्रभा खेतान ने नहीं उठाए ? अभिव्यक्ति के खतरे उठाए बिना लेखक , लेखक नहीं हो सकता। बाकी पोस्टरबाजी और राजनीति भी लेखन में इसी तरह चलती रहती है। 

आप के स्त्री पात्र जुझारू और बेबाक हैं जैसे 'बांसगांव की मुनमुन ' हो या सुमि या फिर वह औरत जो जेल में अपनी डायरी लिखती है कि व्यवस्था की पोल खोल सके , उन्हें रचने की प्रेरणा आपको कहां से मिली? 

- प्रेरणा जैसी कोई बात नहीं है। मुनमुन हो या सुमि सब हमारे आसपास की ही हैं। घर , दुआर की ही हैं। इन को गढ़ना नहीं पड़ा। बस इन्हें उठा कर कागज पर कलम के सहारे उठा कर रख दिया है। बहुत आहिस्ता से। बिना किसी हस्तक्षेप के। बिना किसी तोड़-मरोड़ के। एक औरत की जेल डायरी भी जस की तस उठा कर रख दी है। बेईमानी नहीं की है। आप ध्यान से देखेंगी तो पाएंगी कि हमारी रचनाओं में काल्पनिक पात्र खोजे नहीं मिलेंगे। नकली पात्र या नकलीपन नहीं मिलेगा। मुझे नकलीपन सुहाता नहीं है। इसी लिए यह या अन्य और पात्रों में नुकीलापन सहज ही आ गया है। कागज पर उतरते समय पात्र हमारे भीतर आ कर जैसे बस जाते हैं। हम उन्हें नहीं , वह हमें रचने लगते हैं। पात्रों की अंगुली पकड़ कर किसी बच्चे की तरह मैं उन के साथ चल पड़ता हूं । वह हमारे वश में नहीं रहते , मैं उन के वश में हो जाता हूं। अवश हो जाता हूं , उन के आगे। ऐसे जैसे प्रेम में अवश हो जाता हूं । सच अपने पात्रों से बहुत प्रेम करता हूं। 

आप के अधिकांश पात्र काल्पनिक न हो कर आस पास की दुनिया के ही होते हैं , जैसा कि मुझे आपकी रचनाओं को पढ़ते हुए लगा , तो कभी ऐसा भी हुआ कि आपको उनका विरोध झेलना पड़ा हो? 

- हां , अनेक बार। बवाल हो गए हैं। मुकदमे भी। कंटेम्प्ट आफ कोर्ट तक हुआ है। जेल जाने की नौबत आ गई है। विरोध शब्द बहुत छोटा है , इन सारे विरोध को ले कर। कुछ जीवित पात्र और मृतक पात्रों के परिजन भी बेतरह नाराज हो गए हैं। अपने-अपने युद्ध को ले कर बहुत सारे पत्रकार मित्र नाराज हुए। थिएटर के लोग भी। राजनीति के लोग भी। सब से ज़्यादा वकील और जस्टिस लोग नाराज हुए। कंटेम्प्ट आफ कोर्ट का मुकदमा एक महिला वकील ने करवा दिया। किसी और वकील से। एक डमी आदमी से। कोई वकील हमारी तरफ से यह कंटेम्प्ट का मुकदमा लड़ने को तैयार नहीं था। बड़े से बड़े और छोटे से छोटे वकील ने भी हाथ जोड़ लिए। कि इसी हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करनी है। जस्टिस लोगों से पंगा कौन ले भला। और तो और कोई जस्टिस यह कंटेम्प्ट का मुकदमा सुनने को तैयार नहीं था। कि कौन बर्रैया के छत्ते में हाथ डाले। बड़ी मुश्किल से एक बड़े वकील डाक्टर एल पी मिश्रा तैयार हुए। पहले बहुत पैसा मांगा। लाखों की फीस थी। हमारे पास पैसा था नहीं। फिर बिना पैसे के पूरा मुकदमा लड़ा डाक्टर एल पी मिश्रा ने। हिंदी प्रेमी होने के कारण। एक जस्टिस त्रिवेदी के यहां मुकदमा लगा। हमारे पुराने मित्र थे। पर कोर्ट में जैसा डरा दिया। मित्रता भूल गए। पूरी सख्ती से पेश आए। काउंटर रिज्वाइंडर हुआ। कि तभी उन का निधन हो गया। अब कोई और जस्टिस यह मुकदमा सुनने को तैयार नहीं। सब ने नाट बिफोर कर दिया। अंतत: चीफ जस्टिस के यहां मुकदमा लगा। बड़ी लंबी कहानी है इस की भी। ख़ैर कुछ सालों में मुकदमा ख़त्म हुआ। जेल नहीं जाना पड़ा। बहुत से लेखक मित्र ईर्ष्यालु हो गए। अपने-अपने युद्ध उपन्यास की देशव्यापी चर्चा से। मेरे जेल जानी की बड़ी उम्मीद थी लेखक मित्रों को। यह उम्मीद भी टूट गई। घुमा फिरा कर अपने-अपने युद्ध को अश्लील घोषित करने लगे। आप किसी व्यक्ति से तो लड़ सकते हैं। लंबा लड़ सकते हैं। किसी रचना से कब तक लड़ सकते हैं ? मित्र लोग हार गए। अपने-अपने युद्ध 26 बरस से आज भी पढ़ा जाता है। छपता रहता है। लोग चर्चा करते रहते हैं। तब जब अपने-अपने युद्ध छप न सके , इस के बड़े यत्न कुछ लेखक मित्र करते रहे थे। प्रकाशकों को निरंतर भड़काते रहे थे। लेकिन उन की साज़िश पर पानी पड़ गया। 

लोक कवि अब गाते नहीं उपन्यास भोजपुरी के लोक गायक बालेश्वर के जीवन पर आधारित है। सब जानते हैं। छुपाने जैसी कोई बात नहीं। भोजपुरी हमारी मातृभाषा है। भोजपुरी की यातना को स्वर देने की कोशिश की है इस उपन्यास में। बालेश्वर मेरे गहरे मित्र थे। आए दिन का साथ उठना बैठना था। लोक कवि अब गाते नहीं को ले कर लोगों ने बालेश्वर को भी भड़का दिया। कोई दो साल तक हमारी बोलचाल बंद थी। एक सुबह अचानक बालेश्वर हमारे घर आए। मेरे पैर पकड़ कर बैठ गए। रोते-रोते कहने लगे , पांडेय जी बड़ी भारी गलती हो गई। आप ने तो हम को जीते जी अमर कर दिया। हम समझ नहीं पाए। अनपढ़ आदमी हूं। लोगों ने भड़का दिया था। लेकिन अब पूरी किताब हम पढ़वा कर सुन लिया हूं। आप से कोई शिकायत नहीं है। हम को माफ़ कर दीजिए। हम फिर साथ उठने बैठने लगे। उन के मरते दम तक हमारा साथ बना रहा। अंतिम समय अस्पताल में हमारे हाथ में हाथ डाल कर विदा हुए। बालेश्वर के परिवार से आज भी पारिवारिक रिश्ता है। बालेश्वर के संगी साथी और उन के बच्चे हमारा बहुत आदर करते हैं। उन की हर जन्म-तिथि और पुण्य-तिथि पर हम उन के घर आयोजित कार्यक्रम में सर्वदा उपस्थित रहते हैं। 

बांसगांव की मुनमुन की मुनमुन और उस के परिवारीजन बहुत नाराज हैं। उन की नाराजगी लगता नहीं कि कभी ख़त्म होगी। बस मुकदमा नहीं हुआ। बाकी सब हुआ। तब जब कि मुनमुन हमारी रचनाओं की सब से चमकदार चरित्र है। सर्वाधिक चर्चित। पर है तो है। सब का अपना निजी होता है। हालां कि जो कहते हैं न कि हर कथाकार दूधिया होता है। पानी मिलाता ज़रूर है दूध में। पर दूध कहां से बदल देगा। कहीं का ईंट , कहीं का रोड़ा , भानुमति ने कुनबा जोड़ा। लिखने में यह होता ही है। पर खुशबू कहां छुपती है भला। ऐसे ही अन्य कई रचनाओं में भी हुआ है। होता रहता है। घोड़े वाले बाऊ साहब कहानी पर तो मुझे बहुत धमकियां मिलीं। बम से उड़ा देना , फोन पर गाली गलौज भी सुनना पड़ा। सुंदर भ्रम कहानी में भी कुछ लोगों ने मारने के लिए एक बार घेर लिया। सुंदर भ्रम प्रेम कहानी है। ख़बरों को ले कर धमकियों , मुकदमों का अभ्यास था। पर कहानी , उपन्यास के लिए भी यह सब भुगतना पड़ा है। पता नहीं कब यह सिलसिला ख़त्म होगा। हारमोनियम के हज़ार टुकड़े उपन्यास को ले कर बहुत से पत्रकार मित्र आज तक नाराज हैं। आजीवन रहेंगे। कुछ पत्रकारों ने गाली गलौज की। कानपुर के एक कथाकार मित्र तो हमारे बड़े प्रशंसक थे। पर हारमोनियम के हज़ार टुकड़े के एक खल पात्र उन के प्रिय मित्र थे। उन्हों ने मुझे ही अपना खल मित्र मान लिया। लखनऊ के कुछ पत्रकारों ने भी उन के सुर में सुर मिला लिया। नफ़रत करने लगे। ऐसे अनेक विवरण हैं। तुम्हारे बिना कहानी की मुख्य पात्र ने भी मुंह फुला लिया। 

और तो और तीन साल पहले आया उपन्यास विपश्यना में प्रेम पढ़ कर भी कोई नाराज हो सकता है भला ? हमारे एक अभिन्न कथाकार मित्र न सिर्फ नाराज हुए बल्कि संबंध ही ख़त्म कर लिए। प्रेम में डूबे एक मनोवैज्ञानिक उपन्यास ने उन का दिल तोड़ दिया। क्या तो उन का एक बेटा विपश्यना शिविर से जुड़ा हुआ है और हम ने यह उपन्यास लिख कर विपश्यना को बदनाम करने का काम किया है। अब इस लांछन का भी क्या करें। आप को बताऊं कि भारत में सब से ज़्यादा विपश्यना शिविर महाराष्ट्र में लगते हैं। और विपश्यना में प्रेम का मराठी में अनुवाद हुआ है। बहुत पसंद किया गया है , मराठी में। हिंदी में भी बहुत स्वीकार्यता और प्रशंसा मिली है। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने इसे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया है। 

लेखन जगत में शीघ्र स्वीकार्यता और प्रसिद्धि के लिए अनावश्यक अश्लीलता भी परोसी जा रही है जिसे प्रगतिशीलता और खुलेपन का नाम दिया जाता है , लेकिन क्या वास्तव में ऐसे लेखन के ज़रिए कोई लंबी दौड़ का घोड़ा बन सकता है? 

- लेखन में अश्लीलता का आरोप ही अपने आप में बहुत अश्लील है। अश्लीलता को सिर्फ़ देह तक सीमित करना नादानी है। स्त्री देह प्रकृति द्वारा रचित अनूठी कृति है। हम जिस स्त्री कोख से पैदा हो कर , उस का दूध पी कर जीवन पाते हैं , वह अश्लील कैसे हो सकती है भला ? मंटो की कहानी ठंडा गोश्त पर अश्लीलता का मुकदमा चला , पाकिस्तान में। फैज अहमद फैज ने मंटो की इस कहानी को अश्लील बताते हुए , मंटो के खिलाफ सिर्फ इस लिए गवाही दी कि मंटो ने प्रगतिशील लेखक संघ में सदस्य बनने का उन का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। मंटो को जेल हो गई। मंटो टूट गए। पहले भी बहुत शराब पीते थे। जेल से बाहर आ कर और पीने लगे। मर गए। बताइए कि फैज का आरोप अश्लील था कि मंटो की कहानी ? पढ़िए न कभी ठंडा गोश्त। रोयां-रोयां सिहर उठता है। दिल कचोट उठता है। कोई अश्लील कहानी पढ़ कर यह भाव उमड़ सकता है भला ? अश्लीलता आप की आंख और व्यवहार में है। साहित्य में नहीं। अगर सचमुच कोई नीली कथा है , कोई नीली फिल्म है तो बात और है। वह तो है अश्लील। अश्लील साहित्य और साहित्य में अश्लीलता दोनों दो बात है। साहित्य में कई बार स्त्री देह की यातना को भी , बलात्कार दृश्य , रूमानी दृश्य को भी लोग अश्लीलता का सर्टिफिकेट थमा देते हैं। यह गुड बात नहीं है। यहां दो फिल्मों का ज़िक्र कर बात को स्पष्ट किए देता हूं। एक फिल्म है घर। दूसरी फिल्म है बैंडिट क्वीन। घर में रेखा हैं और बैंडिट क्वीन में सीमा विश्वास। दोनों फिल्म में बलात्कार दृश्य देख कर मन हिल जाता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। रोना आ जाता है। कलेजा मुंह को आ जाता है। पर लोगों ने पर यहां भी अश्लीलता का सर्टिफिकेट थमा दिया। बाकी देखना ही है तो साहित्य से ज़्यादा अश्लीलता हमारे आस-पास है। भ्रष्टाचार , आरक्षण , न्याय में देरी , हिंसा , सांप्रदायिकता , राजनीतिक पतन , बेरोजगारी , मंहगाई , स्कैम आदि कहीं ज़्यादा अश्लील हैं। 

समाज, राजनीति, कला, संगीत, मीडिया , हर क्षेत्र पर आपका लेखन है लेकिन सबसे अधिक रुचिकर आपके लिए किस पर लिखना है?

- राजनीति , मीडिया , सिनेमा , संगीत , अपराध आदि पर हम रोज लिख सकते हैं। निरंतर लिख सकते हैं। लिखते ही रहते हैं। पर यह सब एक सीमा के बाद ऊब और चिढ़ पैदा कर सकते हैं। करते ही हैं। पर कहानी , कविता या उपन्यास आप रोज नहीं लिख सकते। ख़ास कर उपन्यास। उपन्यास लिखना साधना है। निजी तौर पर उपन्यास को ही लिखना मानता हूं। बाक़ी सब टाइम पास है। मूंगफली खाना है। ताश खेलना है। फेसबुक और इंस्टाग्राम है। रील देखना है। 

अदब और गंगा जमुनी तहज़ीब के इस शहर में तमाम साहित्यिक समरोह और गतिविधियां होते रहते हैं।साल भर सरगर्मियां बनी रहती हैं लेकिन देखने में अक्सर आता है कि आयोजकों के अपने सेलेक्टेड वक्ता और श्रोता होते हैं । इस का अर्थ तो यही हुआ कि अदब के साथ जबरदस्त बेअदबी हो रही है । इस मुद्दे पर आप क्या कहना चाहेंगे ? 

- यह बेअदबी वामपंथी संगठनों की देन है। लखनऊ ही नहीं , भारत के कमोवेश हर शहर में है। वामपंथी संगठनों , प्रलेस , जलेस , जसम में आपस में भी बहुत मारकाट है। नफ़रत है। अभी देखिए न तस्लीमा नसरीन कोई बीस साल बाद कोलकोता गईं। बांग्लादेश से निर्वासित हो कर भारत आईं तब कोलकोता में ही वह रहना चाहती थीं। पर पश्चिम बंगाल की तब की वामपंथी सरकार ने मुस्लिम सांप्रदायिकता के तुष्टिकरण में तस्लीमा नसरीन को कोलकोता में रहने नहीं दिया। खदेड़ बाहर कर दिया। किसी प्रलेस , जलेस या जसम ने तस्लीमा नसरीन का साथ नहीं दिया। उलटे तस्लीमा नसरीन का विरोध किया। डट कर विरोध किया। प्रतिरोध की बात करने वाले इन पाखंडी लेखकों ने सरकार के सुर में सुर मिला कर तस्लीमा का विरोध किया। सिर्फ़ इस लिए कि तस्लीमा नसरीन मुस्लिम सांप्रदायिकता के ख़िलाफ़ लिखने के लिए परिचित हैं। बाद में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी सरकार ने भी तस्लीमा को पश्चिम बंगाल में घुसने नहीं दिया। वही मुस्लिम सांप्रदायिकता का तुष्टिकरण। क्या तो तस्लीमा के वहां आने और रहने से आग लग जाएगी। लेकिन अब जब ममता बनर्जी के बाद नई सरकार आई है। भाजपा की शुभेंदु सरकार ने तस्लीमा नसरीन को कोलकोता आने दिया। वह गईं। वही मुसलमान हैं , वही क़ानून है। वही पश्चिम बंगाल है , वही कोलकोता भी। एक पैसा का दंगा फसाद नहीं हुआ। कोई विरोध नहीं। विरोध में किसी का एक बयान तक नहीं दिखा। एकदम शांति रही। यह क्या है ? सलमान रश्दी के साथ भी इन्हीं वामपंथी लेखक संगठनों ने भेदभाव किया। मुस्लिम सांप्रदायिकता के साथ सुर में सुर मिला कर खड़े हो गए। जो सलमान रश्दी या तस्लीमा नसरीन के साथ खड़ा हो जाए , वह संघी है। भाजपाई है। लेखक नहीं। अजब नैरेटिव है। 

ज़िंदगी भर इस्लाम की सेवा में हर रचना लिखने वाले अमीर खुसरो सूफी बता दिए जाते हैं। सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा जैसे गीत में भी इस्लाम की बादशाही का जहर उगलने वाले पाकिस्तान के संस्थापक और कट्टर मुस्लिम लीगी अल्लामा इक़बाल या फिर बस नाम रहेगा अल्ला का लिखने वाले फैज प्रगतिशील घोषित रहते हैं। लेकिन तुलसीदास , मीरा , सूर , मैथिलीशरण गुप्त , रामधारी सिंह दिनकर , श्याम नारायण पांडेय आदि की बात करने वाला हिंदुत्ववादी है। दुनिया के सब से बड़े कवि तुलसीदास के साथ उन का यह घटिया रवैया है। तो बाक़ी का क्या ही कहें। राहुल सांकृत्यायन , रामविलास शर्मा , निर्मल वर्मा आदि तो घोषित कम्युनिस्ट लेखक थे। अपनी जड़ों की बात करते ही यह लोग भी बारी-बारी हिंदू घोषित हो गए। घटिया हो गए। बाद में तो नामवर सिंह के साथ भी यही सुलूक़ हुआ। बस दबी जुबान। बस हिंदू घोषित नहीं किया गया नामवर सिंह को पर उपेक्षित भरपूर किया गया। नामवर सिंह एक टी वी इंटरव्यू में कह दिया था कि हमारा भगवान किसी से कमज़ोर तो नहीं है। लेकिन क्या किसी के उपेक्षित करने से कोई तुलसीदास , कोई राहुल सांकृत्यायन , कोई रामविलास शर्मा , कोई निर्मल वर्मा या कोई नामवर सिंह ख़त्म हो जाता है ? परिणाम आप के सामने है। 

  आजकल  जैसा  कि ट्रेंड चल रहा है सेलेक्टिव विरोध का , आपकी विचारधारा से यदि किसी का इतर विचार हुआ तो विरोध करना ही है , चाहे आप गलत ही क्यों  न हों, जैसा कि पुरस्कार , सम्मान वापसी गिरोह कर रहा है , इसपर आप का विचार जानना चाहूंगी ! 

- सेलेक्टिव विरोध और सेलेक्टिव चुप्पी भी एक किस्म का कैंसर है। एड्स है। छुआछूत से बड़ी समस्या है यह। तथ्य और तर्क को लात मार कर यह लोग गुंडई करने लगते हैं। गिरोहबंदी के मारे यह लोग दिन को रात सिद्ध करने में एक्सपर्ट हैं। सामाजिक न्याय के नाम पर जातिवादियों और सेक्यूलरिज्म के नाम पर अतिवादियों का यह संयुक्त गठजोड़ है। इन की गैंगबाजी के आगे बड़े-बड़े अपराधी और माफिया गिरोह शर्मा जाएं। चित भी इन की , पट भी इन की। सरकार भले इस समय भाजपा वाली है पर व्यवस्था सारी अभी भी इन्हीं की है। विश्वविद्यालयों , कालेजों में नियुक्ति , पुरस्कार , सम्मान , यात्रा , पाठ्यक्रम , अकादमी सब इन के ही हाथ है। बस पाठक संसार नहीं है इन के पास। यहीं मार खा जाते हैं। खुद ही लिखते हैं , खुद ही पढ़ते हैं। आलोचना के नाम पर एक दूसरे की पीठ खुजाने का बहुत अच्छा अभ्यास है इन सभी को। रही बात साहित्य अकादमी पुरस्कार वापसी की तो वह मुहिम और खुन्नस अशोक वाजपेयी की थी। आई ए एस अफ़सर रहे अशोक वाजपेयी कांग्रेस के चाकर रहे हैं। उन की कांग्रेसी निष्ठा किसी से छुपी नहीं रही कभी। विश्व कविता समारोह के आयोजन को ले कर साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष रहे विश्वनाथ प्रसाद तिवारी से उन की अनबन हो गई। अशोक वाजपेयी को एक मुद्दा मिल गया। मोदी विरोध के नाम पर वामपंथियों को पिट्ठू बना कर कांग्रेस के पक्ष में बढ़िया इस्तेमाल किया। वामपंथियों को इस्तेमाल करना बहुत आसान रहता है। हमेशा से। पर यह पुरस्कार वापसी मुहिम जल्दी ही पिट गई। न विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की सेहत पर कोई असर पड़ा न ,साहित्य अकादमी , न नरेंद्र मोदी सरकार की सेहत पर। 

 अब अधिक सवाल न पूछते हुए जानना चाहूंगी लेखन से इतर आपकी गतिविधियों के विषय में ... 

- वह कहते हैं न कि और भी ग़म हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा ! तो लेखन के सिवा भी बहुत कुछ है मेरे हिस्से। लेखन बहुत-बहुत कम है जीवन में। आलस और सोना बहुत-बहुत है। किसी को आलस के सौंदर्यशास्त्र पर कुछ लिखना , जानना हो , रिसर्च करना हो तो मैं उस के लिए बेस्ट नमूना हूं। होते हैं कुछ लोग जो चौबीसों घंटे लेखक बने रहते हैं। उसी धुन में आकुल व्याकुल रहते हैं। मैं बिलकुल नहीं रहता। सामान्य आदमी हूं , सामान्य बना रहता हूं। पुरुषोचित खूबियां-खामियां भी भरपूर हैं मुझ में। पूरी तरह हैं। अच्छा खाना खाना , अच्छे कपड़े पहनना , अच्छी और सुंदर औरतों को देखना , शालीन और सुंदर स्त्रियों की संगत में रहना। मनपसंद गाने सुनना , फ़िल्में देखना। आनंद से रहना। फालतू की समस्याओं और टेंशन आदि की मूर्खताओं से कोसों दूर रहना। किसी के फटे में पांव भूल कर भी नहीं डालता। किसी का बुरा नहीं करता। किसी का बुरा नहीं सोचता। अपनी पूरी क्षमता से सब की मदद और सहयोग करता हूं। जीवन में ख़ुश रहना और आनंद से रहना , सब के नसीब में नहीं होता। भगवान की कृपा से मेरे नसीब में है। भरपूर है। ज़िंदगी का मक़सद भी यही है। इच्छाएं बहुत कम हैं। अपेक्षा किसी से कुछ करता नहीं। संघर्ष और मेहनत बहुत किया है जीवन में। पर वह कहते हैं न कि सुख से मेरा पुराना रिश्ता , दुःख का दावेदार नहीं हूं। क्यों कि जंह बैठे , तंह छांव !

● आप ने समय निकाला और अपने विचार रखे इस के लिए हम आपके आभारी हैं । मैं ने  प्रयास किया है वही सवाल आप के सामने रखने का जो तमाम  पाठक अपने  प्रिय लेखकों से जानना चाहते हैं  । आप का बहुत बहुत आभार व धन्यवाद।


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