Friday, 19 April 2019

जब अंबानी बंधु मुलायम को प्रधान मंत्री बनाने के लिए दिल्ली आए और सोनिया के साथ चाय पीने लगे

अभी तक लोग राजनीति में रामविलास पासवान को मौसम विज्ञानी बताते थे। बेधड़क। लेकिन व्यापारियों को संबोधित करते दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में नरेंद्र मोदी ने कहा कि व्यापारी बहुत बड़े मौसम विज्ञानी होते हैं । मोदी ने हालां कि यह बात व्यापरियों के व्यापार के बाबत कही। लेकिन मेरा आकलन है कि व्यापारी राजनीति का मौसम विज्ञान भी ख़ूब जानते हैं।

2004 के लोकसभा चुनाव के दौरान लगभग स्पष्ट हो गया था कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का कंटीन्यू करना मुश्किल है और कि हंग पार्लियामेंट होगी। पहले के समय लालू और वी पी सिंह का दोहरा दांव खा कर , चित्त हो जाने और प्रधान मंत्री न बन पाने की कसक मुलायम के मन में बहुत गहरे बैठ गई थी । देवगौड़ा और गुजराल बारी-बारी प्रधान मंत्री बन गए और मुलायम वामपंथी हरकिशन सिंह सुरजीत की तमाम पैरोकारी के खड़े-खड़े देखते रह गए थे । बतर्ज़ कारवां गुज़र गया , गुबार देखते रहे। हरकिशन सिंह सुरजीत उन दिनों मुलायम के लगभग दलाल बन गए थे , सेक्यूलर राजनीति के नाम पर। खैर , 2004 में वामपंथ का कंधा छोड़ कर मुलायम ने कारपोरेट सेक्टर का कंधा पकड़ा। बतौर मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश , अंबानी परिवार की उन्हों ने खूब सेवा की थी। सुरजीत मुलायम के लिए भले राजनीतिक दलाली करते थे पर उन दिनों मुलायम अंबानी , अमिताभ बच्चन , अमर सिंह और सहारा के लिए जाने जाते थे और इन के लिए ही जीते-मरते थे। अमर सिंह इन के सेतु थे। तब के दिनों मुलायम को बिगाड़ने और उन को अय्याश बनाने में अमर सिंह ने धरती-आसमान एक कर दिया था। सो अमर सिंह के नेतृत्व में मुलायम ने अंबानी परिवार को साधा और मकसद बताया कि प्रधान मंत्री बनना है । मदद करो । मदद मतलब सांसदों की ख़रीद-फरोख्त के लिए अपनी तिजोरी खोल दो। तब के दिनों अंबानी बंधु एक साथ थे , अलग नहीं हुए थे। उत्तर प्रदेश में सरकारी संसाधनों की लूट में मुलायम की कुर्बानियां और सुविधाएं उन्हें याद थीं। उम्मीद थी कि प्रधान मंत्री बनने के बाद भी उन्हें वह लूट की छूट देते रहेंगे।

सो चुनाव परिणाम आने के एक दिन पहले ही अंबानी बंधु दिल्ली में डेरा डाल दिए। मय तिजोरी के। मकसद था मुलायम सिंह यादव को प्रधान मंत्री बनवाना। तैयारी में कोई कमी नहीं थी। दलाल पत्रकारों सहित किसिम-किसिम के लायजनर तैनात थे। दूसरे दिन सुबह आठ बजे से चुनाव परिणाम आने शुरु हो गए। साढ़े आठ बजते-बजते अंबानी बंधु समझ गए कि मुलायम सिंह यादव का खेल खत्म हो गया है। और मुकेश अंबानी ने 10 जनपथ पर सोनिया गांधी को फ़ोन किया कि आप के साथ चाय पीना चाहते हैं। और सुबह नौ बजे अंबानी बंधु सोनिया गांधी के साथ चाय पी रहे थे। उस के बाद का सारा खेल सब को मालूम है। सोनिया के घर बिना बुलाए सुरजीत के साथ पहुंचे अमर सिंह की बेइज्जती सहित। सोचिए कि मकसद था , तब मुलायम को प्रधान मंत्री बनाना और अंबानी बंधु मूल मकसद पानी में डाल कर अपने व्यावसायिक मकसद साधने निकल गए। सुबह साढ़े आठ बजे तक बहुत मामूली रुझान आते हैं , बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित भी तब तक नहीं कुछ समझ पाते । लेकिन अंबानी बंधु समझ गए थे कि क्या होने जा रहा है।

फ़रवरी , 1985 में जब मैं लखनऊ स्वतंत्र भारत में आया था तब उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव हो रहे थे। तब के सिचाई मंत्री वीर बहादुर सिंह गोरखपुर के पनियारा से चुनाव लड़ रहे थे । मुझे कवरेज के लिए जाने के लिए कहा गया । गोरखपुर जाने के पहले अख़बार मालिक शिशिर जयपुरिया ने मुझे बुलाया और कहा कि सुना है आप गोरखपुर जा रहे हैं ? मैं ने हामी भरी तो जयपुरिया ने कहा कि आप जनसत्ता से आए हैं तो जनसत्ता वाली टेढ़ी रिपोर्टिंग मत कीजिएगा। वीर बहादुर सिंह होने वाले मुख्य मंत्री हैं , ज़रा ख़याल रख लीजिएगा। सुन कर मुझे बहुत ख़राब लगा। संपादक वीरेंद्र सिंह से मिल कर मैं ने जयपुरिया की बात बताई और गोरखपुर जाने से स्पष्ट मना कर दिया। गोरखपुर मेरा गृह नगर भी है , यह वह जानते थे । खैर , वीरेंद्र सिंह ने कहा , आप जाइए और जैसा लगे वैसे ही लिखिए। संपादक मैं हूं , जयपुरिया नहीं। गया गोरखपुर। पनियरा गया तो देखा कि पनियरा में वीर बहादुर सिंह ने गज़ब का काम किया था। सड़क , बिजली , परिवहन सब दुरुस्त । जहां पुलिया चाहिए थी , वहां पुल था। उस धुर पिछड़े और तराई क्षेत्र से लखनऊ और दिल्ली की सीधी बस थी। सिनेमा घर थे । उन के सामने जो चुनाव लड़ रहे थे , किसी का क्षेत्र में नामलेवा भी नहीं था। न कोई प्रचार । चहु ओर वीर बहादुर ही वीर बहादुर थे। रिपोर्ट अपने आप वीर बहादुर के पक्ष में गई। तुरंत तो नहीं पर दिलचस्प यह कि साल भर बाद वीर बहादुर सिंह मुख्य मंत्री बन गए। जयपुरिया की बात सच हो गई।

चंद्रशेखर एक समय पद यात्रा कर रहे थे। जयपुरिया ने मुझे बुलाया। कहा कि चंद्रशेखर जी को मैं मिल कर चंदा देना चाहता हूं। मैं ने कहा कि दे दीजिए , इस में मैं क्या कर सकता हूं । उन का सारा कार्यक्रम पब्लिक डोमेन में है। चंद्रशेखर से मेरा ठीक ठाक परिचय था । कई बार उन का इंटरव्यू कर चुका था । इसी आधार पर जयपुरिया ने मुझ से चंद्रशेखर से मिलवाने से कहा। कहा कि यह आदमी होने वाला प्रधान मंत्री है । सुन कर मुझे हंसी आ गई। जयपुरिया ने मुझ से हंसी का कारण पूछा। बता दिया मैं ने कि नेता बहुत अच्छे हैं , समझदार हैं , पर चुनाव जीतने के तो उन के लाले रहते हैं , पार्टी उन की वैसे ही कमज़ोर है। सपने में भी प्रधान मंत्री नहीं बन सकते । लेकिन जयपुरिया अपनी बात पर अड़े रहे। और कहा कि बस आप मिलवा दीजिए। चंद्रशेखर के एक शिष्य थे गौरी भैया । बलिया के थे । जनता दल विधान मंडल के सचेतक थे । मेरे अच्छे मित्र थे । उन से मिल कर जयपुरिया की बात बताई। बात सुनते ही वह उछल गए। बोले , चंदा तो हम लोग खोज ही रहे हैं। चंद्रशेखर को उन दिनों अध्यक्ष जी कहते थे लोग। गौरी भैया बोले , ' अध्यक्ष जी ने टारगेट भी दिया है। कूपन बेच कर वह चंदा ले रहे थे। सो गौरी भैया ने तुरंत कूपन बुक निकाल लिया। मैं ने बताया कि वह अध्यक्ष जी से मिल कर ही चंदा देना चाहते हैं। गौरी भैया यह सुन कर बिदके । बोले , दस-पांच हज़ार का चंदा तो अध्यक्ष जी लेंगे नहीं। मोटी रकम देनी पड़ेगी।

जैसे ? 

लाख , पचास हज़ार से कम का लेंगे। मैं ने गौरी भैया से कहा कि आप मुझे इस चक्कर में मत डालिए।जयपुरिया से सीधे बतिया लीजिए मेरा रिफरेंस दे कर। कल फ़ोन पर। गौरी भैया ने दूसरे दिन जयपुरिया से बात की। उन की बात जम गई। जल्दी ही गौरी भैया ने जयपुरिया से चंद्रशेखर की मुलाकात करवा दी । बात आई-गई हो गई। कि कुछ समय बाद बोफ़ोर्स आ गया। चुनाव में राजीव गांधी जय हिंद हो गए। प्रधान मंत्री पद के दावेदार बने चंद्रशेखर भी लेकिन वी पी सिंह ने देवीलाल को आगे कर चंद्रशेखर को रेत दिया। चंद्रशेखर रह गए। तो मैं ने जयपुरिया को एक बार याद दिलाया। कहा कि अब कहां ! जयपुरिया ने सब्र लेकिन नहीं खोया। कहा कि देखते रहिए। संयोग देखिए कि कुछ महीने बाद सही चंद्रशेखर प्रधान मंत्री बन भी गए। अचानक। अफ़सोस कि जयपुरिया तब तक अख़बार बेच चुके थे। हुआ यह कि इस के पहले पायनियर की 125 वीं जयंती मनाने के लिए तब के प्रधान मंत्री राजीव गांधी को जयपुरिया ने समारोहपूर्वक बुलाया। दिल्ली के विज्ञान भवन में समारोह हुआ। फिर तो राजीव गांधी से केमिकल फैक्ट्री लगाने के चार-पांच लाइसेंस जयपुरिया ने झटक लिए। पूंजी थी नहीं। लोन लेने के लिए मार्जिन मनी भी नहीं थी। अंततः पायनियर और स्वतंत्र भारत अख़बार और उस की बिल्डिंग थापर ग्रुप को जयपुरिया बेच बैठे थे । अख़बार का यह बिकना अख़बार कर्मचारियों के लिए तो बुरा साबित हुआ ही , जयपुरिया के लिए भी घातक साबित हुआ। यह एक अलग कथा है ।

जो भी हो , व्यापारियों के राजनीतिक विज्ञान की ऐसी बहुत सी कहानियां हैं मेरे पास । जो फिर कभी। इस बार भी अगर राजनीतिक परिणाम की जानकारी लेनी हो तो किसी मीडिया , किसी पार्टी , किसी सर्वे के बजाय किसी ठेठ व्यवसाई से पता कीजिए।  

1 comment:

  1. चंद्रशेखर की पद यात्रा किस वर्ष हो रही थी?

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