Friday, 3 May 2019

लेकिन कभी ज़रुरत पड़ ही गई तो आख़िर रवीश कुमार अपने दिल को समझाने कहां जाएंगे !


हमारे गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में एक प्रोफ़ेसर थे डाक्टर जगदीश नारायण तिवारी। बेधड़क , बेख़ौफ़ और बेलाग बोलते थे। बेहिसाब बोलते थे। गोरखपुर शहर में एक बार सोशलिस्ट पार्टी के उदघाटन के लिए उन्हें बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया। जगदीश नारायण तिवारी ने अपने भाषण में कहा कि मेरा एक लड़का है। जब तब घर से गायब हो जाता है। दो-चार दिन इंतज़ार करने के बाद मैं सीधे सोशलिस्ट पार्टी के दफ़्तर चला जाता हूं। वह सोशलिस्ट पार्टी के दफ़्तर में ही मिल जाता है। और उसे वापस घर ले आता हूं। तो यह बहुत अच्छा है कि शहर-शहर सोशलिस्ट पार्टी के दफ़्तर हैं। सो काम चल जाता है । सोशलिस्ट पार्टी वाले जगह-जगह पार्टी कार्यालय खोल कर बहुत बड़ी समाज सेवा करते हैं। नहीं जगह-जगह पागलखाने खोलने पड़ते।

एन डी टी वी पर रवीश कुमार का प्राइम टाइम देखते हुए अकसर मुझे वही जगदीश नारायण तिवारी और तब के समय के सोशलिस्ट पार्टी के दफ़्तर याद आ जाते हैं। सोचता हूं कि अगर रवीश कुमार , उन की एजेंडा पत्रकारिता और उन का प्राइम टाइम नहीं होता तो यह तमाम परेशान , बीमार और कुंठित लोग कहां जाते भला। कौन सी दवा खाते , किस के कंधे पर अपना सिर रखते , रोते और अपना गम गलत करते । रवीश कुमार ने अपनी कांस्टेच्वेंसी बना रखा है इन लोगों को। सारी ख़बरें , सारी दुनिया छोड़ कर रवीश कुमार इन्हीं कुछ मुट्ठी भर लोगों को रोज संबोधित करते मिलते हैं। इन की पीठ खुजाते रहते हैं। किसी मनोवैज्ञानिक की तरह इन लोगों के मन को बहुत समझते हैं रवीश कुमार। रवीश जानते हैं कि इन को कौन सी दवा देनी है। कितनी देनी है। रवीश की जो भी थोड़ी बहुत टी आर पी शेष है , इन्हीं परेशान और बीमार आत्माओं की बदौलत।

पागलखाने वैसे भी अब बहुत मंहगे हो गए हैं। दवाएं भी , डाक्टर भी बहुत मंहगे हो गए हैं । लेकिन 3 रुपए महीने पर रवीश कुमार मिल जाते हैं। तो यह सस्ता भी है और सुविधाजनक भी। घर बैठे-बैठे इलाज मिलता रहता है। अब और क्या चाहिए भला। सोचिए कि रवीश कुमार की एजेंडा पत्रकारिता और उन का प्राइम टाइम न होता तो फिर कितने पागलखाने खोलने पड़ते भला। सो देश को एन डी टी वी और रवीश कुमार को उन के प्राइम टाइम के लिए बहुत धन्यवाद देना चाहिए और एहसान मानना चाहिए। इस देश सेवा के लिए। बल्कि अगली बार रवीश कुमार को उन की इस सेवा के लिए पदम् पुरस्कार दिया जाना चाहिए। रवीश कुमार की फैन फालोइंग तमाम डिस्टर्ब , तमाम तबाह , परेशान लोगों की वैसे ही तो है नहीं है। कुछ तो बात है । सारी निगेटिव खबरें इन की खुराक हैं। कभी ठंडे दिमाग से सोच कर देखिए कि रवीश कुमार का प्राइम टाइम न होता तो यह लोग कहां जाते। शकील बदायूनी का लिखा वह फ़िल्मी गाना है न , भरी दुनिया में दिल को समझाने कहां जाएं कहां जाते। रवि के संगीत में मोहम्मद रफ़ी ने क्या तो गाया है ।

वैसे भी अब सोशलिस्ट पार्टी के वह दफ़्तर भी नहीं रहे। जो कुछ रह गए हैं , कारपोरेट दफ़्तर में तब्दील हैं। क्यों कि देश से आंदोलन और संघर्ष की राजनीति समाप्त हो चुकी है । ठेकेदारी , लायजनिंग वाली राजनीति शुरू हो गई है। तो सोशलिस्ट पार्टी के उन दफ़्तरों और दफ़्तरों की वह तासीर भी समाप्त हो गई। समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव जैसे लोगों के हाथ आ गई है । और इन के दफ़्तरों में भटका हुआ तो क्या सामान्य आदमी भी घुस नहीं सकता। ठहरना वगैरह तो बहुत दूर की कौड़ी है। सो यह कमी , यह गैप रवीश कुमार और उन का प्राइम टाइम बखूबी पूरी कर रहा है । सैल्यूट यू मिस्टर रवीश कुमार । ख़ूब बड़ा वाला सैल्यूट ! बस फिकर एक ही है कि परेशान लोग अभी तो रवीश कुमार के प्राइम टाइम में आते हैं लेकिन कभी ज़रुरत पड़ ही गई तो आख़िर रवीश कुमार अपने दिल को समझाने कहां जाएंगे ! इस भरी दुनिया में।

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2 comments:

  1. सैलूट तो बनता है ,अगर रवीश कुमार न होता तो इतना लिखते किसपर?? आखिर ठलुआ लोगों को भी कोई काम मिल गया है,भले ही 2 करोड़ लोगों को रोजगार मिल हो या न मिला हो।

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  2. पत्रकारिता एवं लेखन का उद्देश्य होता है। आपके ब्लाग का उद्देश्य समझ नहीं पाया। परछिद्रान्वेषण या मानसिक मैथुन। दोनों में ही क्षणिक अानंद है कुछ हासिल नहीं है न कोई क्रियेटिविटी। बस खाली पीली!

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