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प्रेम में विपश्यना
गौतम चटर्जी
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| गौतम चटर्जी |
संस्कृत शब्द पश्य का अर्थ है देखना और विपश्य का अपने अंतस को देखना। बाहर की ओर न देख कर अपने मन यानी विचारों को देखना। और इसे विचारशून्य करना बुद्ध की ध्यानविधि का प्रथम चरण है, प्रारंभिक भूमि जिसे विपश्यना कहा गया। पालि में संस्कृत का ही शब्द लिया गया था। बुद्ध ने मन को ही सब कुछ कहा है। जब यह विचार यानी संसार से रिक्त है तो सत्य का प्रकाश इसी अंतस में प्रकाशित है। यही फिर वैदिक मानस है, आत्म या आत्मा है, हृदय है, ईश्वर अनुभूति है। आधुनिक दौर में विपश्यना के ध्यानशिविर भारत में लगते रहे हैं, लगते रहते हैं। हालांकि इसके लिए किसी शिविर में जाने की ज़रुरत नहीं। जहां हम हैं वही शिविर हो सकता है, वही बोधिवृक्ष हो सकता है ।
उपन्यास
वरिष्ठ कथाकार दयानंद पांडेय के इस नये उपन्यास विपश्यना में प्रेम में इसी संदर्भ को उपन्यास का परिवेश बनाया गया है। शिविर-संदर्भ को वास्तविक जीवन से लिया गया है फिर लेखक की कल्पनाशीलता ने इसे अपनी कथावस्तु का आकाश दिया है। कथासार भी वास्तविक जीवन के अपरिचय से नहीं है। ऐसा परिचित जीवन में घटता है इससे हम परिचित हैं। जीवन-घटना की कल्पना और जीवन-घटना दो अलग प्रसंग हैं। जीवन-घटना की कल्पना इस तरह की जाय कि वह अविकल जीवन-घटना लगे, यही साहित्यरचना का उत्कर्ष है। रामायण और महाभारत का उत्कृष्ट उदाहरण वर्षों से हमारे सामने है। आज कोई मानने को ही तैयार नहीं कि यह वाल्मीकि और वेदव्यास की साहित्य रचना है। महाकाव्य और गाथा का यही चरित्र भारतीय मानस के रचनाकारों ने हमें सौंपा है। जिसके वातायन में ही हम दयानंद की इस औपन्यासिक कृति को देखते हैं और प्रशंसा करते हैं।
सिर्फ देखना होता और पूरा पढ़ने के बाद आस्वाद का अनुभव वह नहीं होता जो हम भारतीय महाकाव्य के प्रस्थान बिंदु से आधुनिक हिंदी उपन्यासों की सरणि तक हम लेते आए हैं तो फिर प्रशंसा की बात नहीं बनती, न इस लघु आलेख को लिखने की उत्कंठा बन पाती। महाकाव्य का उदाहरण हमने रखा। दोनों महाकाव्य इसी अर्थ में इतिहास हैं और इसी लिए इनके रचनाकाल को इतिहासकाल भी कहा गया है। तो हम यहां से उपन्यासधर्मिता को देखते हैं। आधुनिक भारतीय उपन्यास के उदाहरण हमारे आगे हैं रबींद्रनाथ ठाकुर का उपन्यास शेष कविता, मानिक बंदोपाध्याय का पुतुलनाच की इतिकथा, शरतचंद्र का श्रीकांत की वसीयत, प्रेमचंद का देवस्थान रहस्य, जयशंकर प्रसाद का इरावती और निर्मल वर्मा का वे दिन। 2023 में अब उपन्यास विपश्यना में प्रेम को हम इसी वातायन में इसी ऊंचाई से देखते हैं।
उपन्यास में कथावस्तु के साथ दो महत्वपूर्ण अवयवों की परख की जाती है वह है भाषा और शैली। किसी कहानी को उपन्यास का रूप देने में यदि विस्तार की भाषा है तो यह सरस नहीं बनी रहती। लेकिन यदि यह भाषा में विस्तृत होता हुआ है और दिलचस्पी सिर्फ कथा-मोड़ के कारण ही नहीं बल्कि शैली यानी शिल्पगत वैशिष्ट्य के कारण भी है तो दिलचस्पी पूरा पढ़ लेने के बाद भी बनी रहती है उत्सुकता का उत्साह भी भाषा के स्तर पर वाग्जाल नहीं है। कथा के विस्तार में अन्योक्ति नहीं है, और शैली के स्तर पर सामासिक अभिव्यक्ति है, आलंकारिक सौंदर्य की शाब्दिक उपमाएं हैं। देखिए :
साधना और साधन में इतना संघर्ष क्या हमारे सारे जीवन में ही उथल पुथल नहीं मचाए है ? इस शोर का कोई कुछ नहीं कर सकता था। वह भी नहीं।
यह कौन सा शोर है? शोर है कि विलाप ? कि शोर और विलाप के बीच का कुछ ? विपश्यना तो नहीं ही है तो फिर क्या है ?
विराट दुनिया है स्त्री की देह। स्त्री का मन उसकी देह से भी विराट ।
चंदन है तो वह महकेगा ही वह महक उठता है।
बाहर हल्की धूप है , मन में ढेर सारी ठंड।
नींद में ध्यान।
विपश्यना में वासना का कौन सा संगीत है यह ?
शब्द-शब्द हम कथा में आगे बढ़ते हैं। ऐसे वाक्य सिर्फ़ अभिव्यक्ति भर नहीं हैं बल्कि ये कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हैं बिल्कुल अलग आस्वाद के प्रभाव के साथ कथाप्रवाह के आगे बढ़ने के लिए विभिन्न चरित्र भी हैं, लोकेशन भी और लेखक की दृष्टिआधारित टिप्पणियां भी स्त्रियों के पक्ष में सोचते हुए यशोधरा और सीता की ओर से भी सोचा गया है। और लेखक ने अपने कुछ प्रश्न उठाए हैं। यह समझने के लिए कि यदि कोई स्त्री अपने मौन विलाप में इस शिविर में आयी है तो उसका आत्यन्तिक कारण क्या हो सकता है। इसे ढूंढने लेखक सिद्धार्थ की मानसिकता में जाता है और मैथिलीशरण गुप्त की कविता के जरिये यशोधरा के विलाप तक भी द्रौपदी तक भी यह जाना फिर लोकेशन में भी बदल सकता है। दार्जिलिंग या फिर गोभी की खेत का चबूतरा या युवा दिन या नदी की तलहटी या बॉटनिकल गार्डेन, और फिर लौट के आना, रहना। चुप की राजधानी में लगभग हर तीसरे अनुच्छेद में स्त्री के विलाप पर ध्यान है। चरित्रों में मुस्लिम महिला मित्र भी है, अंग्रेज लड़का भी, आस्ट्रेलियाई भी, फ्रांसीसी भी और साधु-साधु बोलता साधु भी। रुसी चरित्र तो कथा की नायिका ही है।
कथा की भाषा का संगीत की भाषा में भी अनुवाद हुआ है। परस्पर संपर्क के विवरण विशेष कर देहसंसर्ग की सूक्ष्म सक्रियता को संगीत की भाषा में मर्यादा दी गयी है। कभी बांसुरी के स्वर से तो कभी मालकौंस के राग विस्तार से।
भाषा और शैली ही कथा को क्रमशः विस्तार देते हैं और पूरा उपन्यास एक ही बार में पूरा पढ़ जाता है। लगता है, किसी लंबी यात्रा से लौटे हों, बिना थके। अंतिम बार 'नीला चांद' पढ़ कर भी थोड़ा थके थे। विनय और मल्लिका का प्रेम जुड़ाव विपश्यना शिविर के अनुशासित मौन में घटता और पल्लिवत होता है। यहां भी भाषा एक बड़ी भूमिका में है। भारतीय और रुसी भाषा, मौन की भाषा, देह की भाषा और विपश्यना की भाषा। इस भाषिक कथामयता पर फिल्म भी बहुत अच्छी बन सकती है। देह के स्तर पर अंततः आ जाने के परिणति निकष पर उपन्यास पाठक को सावधान भी करता है। विपश्यना में मन से संसार ही छूटता है लेकिन यहां कथा संसार को कस कर पकड़ना और पकड़े रखना चाहती है और अंततः परिणति पाठक को उसके ध्यानशिविर में पहुंचा देती है, संसार के प्रति सावधान कर प्रेम में विपश्यना की ओर ध्यान अब जाता है। प्रशंसा यहां इसी कारण उपन्यास की है।
साधु साधु !
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मोबाइल : 7052306296
[ वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली से प्रकाशित उपन्यास विपश्यना में प्रेम की भूमिका ]
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| प्रेम में विपश्यना लेखक : दयानंद पांडेय प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 4695 , 21 - ए दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र पृष्ठ : 106 हार्ड बाऊंड : 499 रुपए पेपरबैक : 299 रुपए अमेज़न (भारत) हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl |
कौन था यह ?
शोर तो बहुत थे। उन की कैफ़ियत भी बहुत थी। किसिम-किसिम की। पर शांति नहीं थी। मन की शांति। और वह मन की शांति ही की तलाश में घर से लगभग पगहा तुड़ा कर, भाग कर इस शिविर में आया था। विपश्यना शिविर। पर क्या कोई शिविर किसी को शांति दे सकता है? यहां इस विपश्यना शिविर के ध्यान कक्ष में बैठा विनय यही सोच रहा था। आचार्य की आवाज़ में निरंतर बजता टेप सांस को समझने तटस्थ भाव से देखने के बहाने मन को नियंत्रित करने के निर्देश पर निर्देश ध्वनित करता जा रहा था। आना-पान चल रहा है। आना-पान मतलब सांस लेना, सांस छोड़ना। सांस पर नियंत्रण, सांस को तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से देखना सिखा रहे हैं आचार्य। सांस को स्पर्श करने को निर्देशित कर रहे हैं। वह कह रहे हैं नाक पर केंद्रित होने को। स्पर्श को महसूस करने को। पर यहां तो थोड़ी दूर पर ध्यान कक्ष में बैठी अंगरेज बाला का सौंदर्य महसूस हो रहा है। सारा ध्यान उस पर ही केंद्रित हो जा रहा है। वह लंदन से अपने ब्वाय फ़्रेंड के साथ आई है शिविर में। पर दोनों अलग-अलग ठहराए गए हैं। आपस में मिलने-बतियाने की मनाही है। पूरी सख्ती से। सो जब ध्यान कक्ष में होते हैं दोनों तो ध्यान छोड़ कर कर एक दूसरे में ध्यान लगाते हैं। नज़रें चुरा कर एक दूसरे को देखते हैं। लड़का विनय के ठीक आगे एक लाइन छोड़ कर रोज बैठता है। सब के बैठने की जगह तय है।
रोज एक ही जगह बैठना होता है। तो पहले दिन तो क्या पहली शाम बस परिचय था। और हलका सा ध्यान। उस शाम सब जान गए कि कहां बैठना है, क्या और कैसे करना है। इंट्रोड्यूसिंग मीटिंग कहिए। और मौन शुरु हो गया था।
अब मौन में ही सोना था, मौन में ही जगना था। मौन में ही नहाना था, मौन में ही खाना था। मौन क्या था मन के शोर में और-और जलना था। तो क्या मौन मन को जला डालता है? पता नहीं, पर अभी तो यह मौन मन को सुलगा रहा था। बिना धुएं और बिना आंच के। धीमी आंच पर जैसे सांस दहक रही थी। मौन की मीठी आंच एक अजीब सी दुनिया में ले जा रही थी। आंखें बंद थीं और जैसे मदहोशी सी छा रही थी। यह कौन सी दुनिया थी? दुनिया थी कि सपना थी? सपना कि कोई और लोक? मदहोशी की यह खुमारी भीतर-भीतर जैसे गा रही थी, 'आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन,....मुसकुराए रे मेरा मन !' शाम होते न होते यह मदहोशी भी टूटने लगी थी। ध्यान कक्ष में ध्यान , अब देह की थकान में तब्दील हो रही थी यह मदहोशी। कमर टूट रही थी। शाम के नाश्ते ने कुछ थकान मद्धिम तो की पर प्रवचन में यह बिलकुल ही उतर गई। प्रवचन में विचारों की खिड़की थी, जो भावों की शुद्धता थी और तर्किकता की जो कड़ी दर कड़ी थी, विनय को मोह गई।
बहुत समय बाद रात को बिना भोजन किए ही सोने का समय आ गया। विधान ही था इस शिविर का कि रात का भोजन नहीं मिलेगा। न ही करना है किसी तरह। रात बिना भोजन के सोने के विद्यार्थी दिनों के दिन याद आ गए। तब तो रात क्या कई बार दिन भी बिना भोजन के गुज़र जाते थे। चेहरे पर जैसे भूख टंगी रहती थी किसी सिनेमा के पोस्टर की तरह। पेट में भूख की मरोड़ उठती रहती थी। पर उस दिन मन में तो कहीं था कि भोजन नहीं किया है पर पेट में मरोड़ नहीं उठी। उस ने आइने में चेहरा देखा। चेहरे पर भूख का पोस्टर नहीं दिखा।
वह सो गया।
सुबह चार बजे जगने का घंटा बजा। वह नहीं उठा। थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति हाथ में रुनझुन घंटी बजाते आया। विनय फिर भी नहीं उठा। घंटी अब की वह व्यक्ति उस के कमरे के सामने तब तक बजाता रहा, जब तक कि विनय उठ कर खड़ा नहीं हो गया। लेकिन वह व्यक्ति बोला कुछ नहीं। ब्रश आदि और स्नान के बाद वह पहुंचा ध्यान कक्ष। सभी ध्यानस्थ थे। उसे सचमुच बहुत देर हो गई थी। आचार्य ने उसे बस एक नज़र देखा। और ध्यानस्थ हो गए। विनय ने देखा वह अंगरेज बालिका भी ध्यानस्थ थी और उस का ब्वायफ़्रेंड भी। बाकी औरतें और मर्द भी ध्यानस्थ थे। वैसे भी इस शिविर में आधे से भी अधिक विदेशी थे। रुस, आस्ट्रेलिया, फ़्रांस, लंदन, सिंगापुर आदि देशों के औरत-मर्द थे। ज़्यादातर जोड़े में। पति-पत्नी भी एकाध थे। लेकिन महिला मित्रों वाले ज़्यादा थे। दो या तीन सिंगल भी थे। अपने आप में खोए। लगभग हारे हुए से। एकांत में भी एकांत खोजते हुए से। ध्यान में भी ध्यान खोजते हुए से। हिंदुस्तानी भी जो थे उस में ज़्यादातर मराठी थे। महाराष्ट्र से 15 लोगों का दल ही आया हुआ था। कुछ हिंदुस्तानी स्त्रियां भी थीं। पर लगभग गंवई या कस्बाई पृष्ठभूमि वाली। सीधे पल्ले में। सिर पर पल्लू लिए हुए। सिर्फ़ एक स्त्री कुछ-कुछ शहरी दीखती थी। लेकिन हिंदी वह भी नहीं जानती थी। लगभग सभी स्त्री-पुरुष यहां ध्यान के बहाने तनाव छांटने आए थे। हर कोई स्ट्रेस का मारा हुआ था। कोई साइंटिस्ट था, कोई प्राध्यापक, कोई डाक्टर, कोई व्यापारी, कोई ठेकेदार, कोई किसान, कोई नौकरीपेशा। ज़्यादातर मध्यवर्गीय रहन-सहन वाले थे। तो कुछ उच्च मध्यवर्ग के भी। कुछ निम्न वर्ग के भी। पर सब के सब एक साथ एक ही ध्येय लिए आए थे - तनाव तंबू को तोड़ने। चुप रहना तनाव तोड़ने में कितना काम आ सकता है, विनय ने यहीं इसी शिविर में आ कर जाना। आप बोलेंगे नहीं तो विवाद होंगे ही नहीं। चुप रहना और एक बंधे हुए अनुशासन में रहना बहुत कुछ आसान कर देता है। और तिस पर ध्यान। विपश्यना की पद्धति आप को जैसे नहला देती है।
विनय भी नहा रहा था। पर आधा-अधूरा। आधा-अधूरा अनुशासन और आधा-अधूरा ही ध्यान वह कर पा रहा था। विनय के पास कोई ऐसा-वैसा तनाव भी नहीं था। वह तो सिर्फ़ घर की कुछ समस्याओं से आजिज आ कर आया था। यह सोच कर भी कि इस बहाने वह बुद्ध की शरण में जाएगा और कि बुद्ध के बारे में कुछ और जान-समझ पाएगा। बुद्ध को जान कर कुछ शुद्ध हो लेगा। कुछ शांति मिल जाएगी। पर यहां तो बुद्ध या बुद्ध के बारे में कुछ था ही नहीं। थी तो बुद्ध की तपस्या थी। लगभग अधेड़ हो चले विनय के वश की यह तपस्या बिलकुल ही नहीं थी। रोज-ब-रोज बारह-बारह घंटे बैठ कर ध्यान करना कुछ नहीं , बहुत कठिन था। ध्यान तो बाद की बात थी, पालथी मार कर आसन जमा कर लगातार बैठना एक विकट समस्या थी। अंग-अंग, पोर-पोर दुख से, दर्द से सराबोर था। भला बैठने भर से भी देह दुख सकती है? लेकिन विनय की देह तो दुख रही थी। पीठ तो लगता था जैसे टूट ही जाएगी। दूसरे ही दिन शाम को प्रवचन के बाद उस ने वहां उपस्थित आचार्य से यह बात बताई। वह मुसकुराए। और बोले, 'विकार निकल रहा है मन के भीतर से तो तकलीफ़ तो होगी।'
'विकार?' विनय चकित होता हुआ बोला, 'मैं कोई पापी नहीं हूं। पाप नहीं किए मैं ने कोई।'
'विकार कई तरह के होते हैं।' आचार्य ने कहा, 'पाप या दुष्कर्म ही विकार नहीं होता।' जैसे उन्हों ने जोड़ा , 'विकार निकलते ही तकलीफ़ खत्म हो जाएगी। देह नहीं टूटेगी।' और जैसे उन्हों ने इशारा किया कि बात ख़त्म। अब आप जाएं।
इस चुप की राजधानी में जैसे बोलने की यही एक खिड़की थी कि आप आचार्य से सीमित बात सवाल-समाधान की कर सकते थे। अकेले में। सब के जाने के बाद। धीमी आवाज़ में।
अब वह देखता कि कुछ लोग अचानक ध्यान कक्ष से गायब होने लगे। एक रशियन आदमी बाक़ायदा दीवार से टेक लगा कर बैठने लगा। विनय ने भी दीवार से टेक लगा कर बैठने की कोशिश की। शिविर का एक कार्यकर्ता आया और इशारे से मना कर अपनी जगह बैठने को कहने लगा। उस शाम उस ने आचार्य से दीवार से टेक लगा कर बैठने की फ़रियाद की। आचार्य ने सख़्ती से मना कर दिया। विनय ने उस रशियन आदमी का हवाला दिया तो आचार्य ने कहा कि, 'उसे कोई मेडिकल प्राब्लम है।'
'तो प्राब्लम तो मुझे भी है।' विनय ने विनयपूर्वक लगभग विनती की।
'यह कोई प्राब्लम नहीं है।'
बात ख़त्म हो गई।
फिर उस ने देखा कि एक फ्रांसीसी व्यक्ति बैठे-बैठे अचानक ग़ायब होने लगा। फिर उस ने चेक किया कि उस की महिला मित्र भी थोड़ी देर में उठ कर चल देती। यह सब देख कर उस का ध्यान खंडित होने लगा। देह का दर्द तो था ही भटकाने के लिए अब यह विदेशी जोड़ों का नैन मटक्का भी उस का ध्यान भटकाने लगा। तब जब कि महिला क्या पुरुष से भी संकेतों में भी बात करना मना था। मोबाइल, लैपटॉप , किताबें, कागज, पेन तक जमा करवा ली गई थीं। बिस्किट , नमकीन आदि भी जमा कर ली गई। कपड़ा , साबुन और दवाई के अलावा कोई अतिरिक्त चीज़ किसी भी के पास नहीं रहने दी गई थी। यहां तक की कोई माला तक ले ली गई थी। किसी भी किस्म के पूजा पाठ या एक्सरसाइज़ तक पर कड़ी पाबंदी थी। क्या तो ध्यान भंग होने का खतरा था। कोई और पद्धति ध्यान में मिल कर खलल डाल सकती थी, नुकसान हो सकता था। मानसिक और शारीरिक भी। ऐसा ही बताया गया था। चंचल मन को काबू करने के तमाम उपाय किए गए थे। पर विनय देख रहा था कि तमाम उपाय अब धराशायी होने लगे थे। वह अंगरेज लड़का थोड़ी दूर पर एक झाड़ के पास बैठ जाता। उस से कुछ ही दूर पर उस की गर्ल फ़्रेंड भी। अब इशारे शुरु। एक दिन टहलते हुए विनय ने देखा ऐसा करते उन दोनों को। और मुसकुरा कर रह गया। जाने क्यों उस अंगरेज लड़के को देख कर विनय को अपने बेटे की याद आ जाती। इस लड़के की हाइट, उस की बाडी लैंगवेज़, उस की मासूमियत, और बहुत कुछ बेटे से मिलती थी।
तो उसे बेटे की याद आ जाती। एक दिन वह जब सामने से गुज़रा तो वह दोनों हाथ जोड़ कर, हाथ माथे से सटा कर, झुक कर प्रणाम की मुद्रा में आ गया। बिन कुछ बोले। विनय का मन हुआ कि बढ़ कर उसे अपने गले से लगा ले। सटा ले अपने सीने से। लेकिन अनुशासन याद आ गया। वह रुक गया। अब वह लड़का अकसर ही जब भी उसे देखता हाथ जोड़ कर प्रणाम की मुद्रा में आ जाता। तो उसे उस पर दुलार आ जाता। बेटे की याद में वह डूब जाता। पत्नी और बेटियों की याद आ जाती। अम्मा-पिता जी की याद आ जाती। जो घर छोड़ कर वह आया था, उस घर फ़ौरन सेकेंड भर में पहुंच जाने की इच्छा में वह तड़प कर रह जाता।
वह अब आचार्य से मिल कर कहना चाहता था कि, 'घर जाना चाहता हूं। यह ध्यान-व्यान मेरे वश का नहीं है।' लेकिन शिविर ज्वाइन करते समय भरे हुए बांड की इबारत और अनुशासन में बंधे रहने की इबारत रोक लेती। लेकिन जब वह अंगरेज लड़का सामने पड़ जाता हाथ जोड़े , उस का सारा संयम , सारी इबारत जवाब दे जाती।
तो क्या जब बुद्ध ने घर छोड़ा रहा होगा तो क्या उन्हें भी अपने बेटे और पत्नी की सुधि नहीं आई होगी? माता-पिता, कुटुंब याद नहीं आए होंगे। वह महल, वह ऐश्वर्य, वह सुविधा-साधन और भोग नहीं याद आए होंगे?
ज़रुर याद आए होंगे।
तब फिर क्यों नहीं लौटे बुद्ध? अपने घर क्यों नहीं लौटे बुद्ध? बुद्ध नहीं लौटे और कि वह दो चार दिनों में ही लौट जाना चाहता है? क्या यह मौन रहने की, अनुशासन में रहने का नतीज़ा है। कि मन में, जैसा कि आचार्य कहते हैं-विकार, उस विकार की पुकार है कि घर लौट चलो। घर लौट चलो विनय, घर लौट चलो! यह तप-तपस्या तुम्हारे वश का नहीं। न कोई अखबार, न टी.वी., न फ़ोन, न मोबाइल, न लैपटॉप , न घर परिवार, न बाकी दुनिया से कोई संपर्क। बस शिविर है, सांस है, सांस का स्पर्श है। आना-पान है यह। कड़ी दिनचर्या है। सुबह चार बजे उठना, ध्यान तपस्या, सुबह छ बजे ही नाश्ता। सूर्य उगता नहीं और नाश्ता हो जाता है। नहा-धो कर फिर ध्यान। भोजन के बाद थोड़ा विश्राम। फिर ध्यान। ध्यान, ध्यान और सिर्फ़ ध्यान। खुद को अनुपस्थित मान लेना ही ध्यान है। आचार्य कहते हैं कि साक्षी भाव से खुद को देखना, तटस्थ भाव से देखना ही ध्यान है। अगर कहीं सनसनाहट भी हो, खुजली भी हो, कुछ भी हो, उस पर प्रतिक्रिया न करें। तटस्थ भाव से महसूस करें। जो भी कुछ होता है, उसे होने दें। गुज़र जाने दें।
यह कैसे संभव है भला? विनय आचार्य से यह पूछना चाहता है। कि यहां तो एक भाव या एक मुद्रा में थोड़ी देर बैठना भी नहीं हो पा रहा। बैठने की दिशा और दशा बार-बर बदलनी पड़ रही है। और आप कहते हैं आचार्य कि तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से सिर्फ़ देखिए! यह कैसे करें आचार्य?
विनय को याद आता है, बचपन में सुनी या पढ़ी कई बातें। जैसे कि दुशमन की सेना आ कर लड़ कर, जीत कर चली गई। पर बौद्ध अपने ध्यान में ही लगे रह गए। उन्हें कुछ पता ही नहीं चला। यह कि बौद्ध ध्यान में इतना खो गया कि उस की देह से चींटियां गुज़रने लगीं। चीटियों ने आने-जाने का रास्ता बना लिया। पर बौद्ध भिक्षुक की साधना समाप्त नहीं हुई। तो क्या विनय भी इस या ऐसी किसी साधना में समा सकता है? वह सोचता है और सिर्फ़ सोच कर ही रह जाता है। साधु -साधु !
तो क्या आज की तारीख़ में भी ऐसा कोई बौद्ध होगा दुनिया में कि वह साधना में हो और चीटियां उस की देह से गुज़रती हुई आने-जाने की राह बना लें? कि दुश्मन की सेना फ़तह कर जाए और बौद्ध की साधना न टूटॆ? आज मुमकिन भी है भला यह सब? अगर है तो अपना चीन क्या कर रहा है? सीमा पर भी और विश्व बाज़ार में भी। कोरोना जैसी महामारी पूरी दुनिया में फैला कर , अपने आस-पास आतंक का पर्याय बना चीन कर क्या रहा है ? आख़िर चीन अपने को बौद्ध देश मानता है। विनय अपने आप ही से पूछता है। तो क्या चीन और चीन के लोग यह विपश्यना और इस साधना से, इस ध्यान से अपरिचित हैं? वह नहीं जानते साक्षी भाव? यह तटस्थ भाव? कि अपने आप को भी अपने से अलग कर के देखे? विनय पूछ्ता है। और निरुत्तर हो जाता है। कि वामपंथी तानाशाही और फ़ासिज्म का मारा चीन अपने साम्राज्यवादी स्वभाव में भूल बैठा है , बुद्ध , उन की अहिंसा और उन के विचार को।
चीन?
चीन छोड़िए , अपने भारत में भी कई जगहों पर गया है विनय। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग या सिक्किम के गैंगटोक जैसी जगहों में। जहां अधिकांश लोग बौद्ध हैं। बौद्ध विहार और बौद्ध मठों की बहार है। पर शराब और गाय के मांस उन की दिनचर्या है। मेघालय के शिलांग से लगायत गैंगटोक तक उस ने यही देखा है। और सब कुछ खुले-आम। न त्याग, न तपस्या, न साधना। बस साधन और ऐश्वर्य की दौड़ में लगे लोग ही मिले। अधिकांश।
साधना और साधन में इतना संघर्ष क्या हमारे सारे जीवन में ही उथल-पुथल नहीं मचाए है? विनय सोचता है।
शिविर में एक और फ़्रांसिसी है। वह अपने आप में ही खोया रहता है। किसी की तरफ़ भूल कर भी नहीं देखता। वह अकसर ही जब ख़ाली होता है तो किसी झाड़ या किसी छोटे पेड़ के पास चला जाता है, किसी फूल के पास चला जाता है। पत्तियों को चूमता है। उन्हें बड़े ध्यान से , बड़े मनोयोग से देखता है। गोया वह कोई पत्ती नहीं उस की माशूका हो। वह कोई नन्हा बच्चा हो, और पत्ती उस की मां हो। मंत्रमुग्ध वह वनस्पतियों से ऐसे ही मिलता है इस चुप की राजधानी में। विनय उसे ऐसा करते देख विह्वल हो जाता है।
बुद्ध की एक तपोस्थली की गोद में बसे सुदूर एक गांव में स्थित यह शिविर है भी ऐसे एकांत में कि आस-पास से कोई शोर नहीं आता। कोई गाना, कोई संगीत भी नहीं। दूर-दूर कुछ गांव दिखते हैं। नहर भी है एक पास में। गेहूं और गन्ने के हरियाली भरे खेतों के बीच बसे इस शिविर में कुछ फूल हैं, कुछ पौधे हैं, वृक्ष और वनस्पतियां हैं। जैसे उन्हीं के पत्तों की सरसराहट है, उन्हीं की ध्वनि है, उन्हीं की बोली है। तो क्या यह फ़्रासिसी उन की भाषा समझता है?
क्या पता?
एक आस्ट्रेलियायी है। दोपहर के भोजन के समय जब वह बैठता है डाइनिंग हाल में तो विनय उस के खाने के अंदाज़ को देखता रहता है। बड़े निर्विकार ढंग से वह रोटी को मेज़ पर फैलाता है। पहले थोड़ा दाल-चावल खा लेता है। फिर सब्जी भी उस में सान लेता है। और फिर रोटी में लपेट कर रोटी-रोल बनाता है और जैसे वह कोई शिशु हो , इतने चाव से खाता है कि मन मगन हो जाता है। कोई अधेड़ व्यक्ति शिशु बन कर इस तरह खाना खा सकता है और वह भी रोज-रोज? जैसे खुद ही मां हो, खुद ही बच्चा। यह शिशु सी अबोधता और रोटी-रोल में मां का दुलार का कंट्रास्ट भी अदभुत है। एक साधु है गेरुवाधारी है। युवा है और सिंगापुर से आया है। वह जाने क्यों दोनों हाथ से खाता है। ऐसे जैसे खाना नहीं खा रहा हो दोनों हाथ से गेंद खेल रहा हो। ऐसे जैसे भोजन से पहली बार भेंट हो रही हो। किसी जादूगर की तरह। कई बार कुछ उस की दाढ़ी में भी लग जाता है। पर उसे इस सब की परवाह नहीं। वह तो बस युद्धस्तर पर भोजन में निमग्न रहता है। ठीक इसी तर्ज़ पर ध्यान कक्ष में वह औरतों को भी अपलक देखता रहता है। बिना किसी शील-संकोच के। विनय सोचता है कि जब मौन टूटेगा तो वह उस से एक बार कहेगा ज़रुर कि अभी यह साधू बाना छोड़ दे। हालां कि उस की यह व्यग्रता सिर्फ़ भोजन और औरतों तक ही दीखती है। बाक़ी तो वह अपने ओढ़ने का कंबल तक रोज धो डालता है। साफ-सफाई का भी ख़ास ख़याल रखता है। पर उस का रोज-रोज कंबल धोना उसे समझ नहीं आता। ऐसा तो नहीं कि जिस व्यग्रता से वह औरतों को देखने में अपनी आंखें खर्च करता है तो रात में सोने में स्खलित हो कर अपने कपड़े ख़राब कर डालता है। सो पाप-बोध में रोज कपड़ों के साथ कंबल भी धो डालता है। क्या पता? पर यहां साधना में तो ब्रह्मचर्य का पालन भी अनिवार्य है। तो क्या उस का ब्रह्मचर्य रोज-ब-रोज खंडित होता जाता है? क्या भोजन और स्त्री से वंचित रहना इतना व्यग्र बना देता है आदमी को?
अब ध्यान कक्ष में वह फ्रांसीसी व्यक्ति अचानक दिखना बंद हो गया है। उस की महिला मित्र भी नदारद है। अचानक ही दो महाराष्ट्रियन भी अनुपस्थित मिलने लगे हैं। धीरे-धीरे और भी दो एक लोग। यहां बीमारी के बहाने भी ध्यान से छुट्टी नहीं मिलती किसी भी को।
विनय को याद है कि एक बार जब वह विद्यार्थी जीवन में एन.सी.सी. के कैंप में गया था तब वहां भी सुबह-सुबह चार बजे उठा कर दौड़ा दिया जाता था। सुबह चार बजे से रात नौ बजे तक लगातार व्यस्त रखने की दिनचर्या थी। बहुत ही मेहनत, दौड़-भाग आदि की। बस भोजन, नाश्ता का ब्रेक और दोपहर में एक घंटे का विश्राम। ज़रा-ज़रा सी ग़लती पर राइफ़ल हाथों में उठा कर खड़े होने या दौड़ने की सज़ा मिल जाती थी। कई बार कोई लड़का अगर बीमारी का बहाना ले कर परेड में जाने से छुट्टी पाना चाहता था तो छुट्टी तो मिल जाती थी। पर साथ ही वह भोजन से वंचित भी कर दिया जाता था। अंडा, दूध, ब्रेड के भरोसे। वह भी बहुत सीमित मात्रा में। तो भूख सताती थी। तो रास्ता यह निकाला जाता था कि दो-तीन लड़के खाने के समय एक-एक या दो-दो रोटी चुरा कर अपनी ज़ेब में रख लेते थे। और 'बीमार' को ला कर दे देते थे। पर यहां यह सब मुमकिन नहीं था।
एन.सी.सी.कैंप में जाने से पहले विनय सेना में जाने के सपने देखता था। पर उस कैंप में इतनी भूसी छूट गई कि विनय ने सेना में जाने का इरादा बदल दिया। तो इसी तरह इस विपश्यना शिविर में आने के पहले वह पत्नी से जब नाराज होता तो गुस्से में कहता रहता था कि घर छोड़ कर संन्यासी बन जाऊंगा। पर अब यहां भी बैठे-बैठे ध्यान में ही इतनी भूसी छूट गई थी कुछ दिन में ही कि संन्यासी बनने का उस का इरादा हमेशा के लिए मुल्तवी हो चुका था। अब तो यह था कि जल्दी से जल्दी शिविर समाप्त हो और वह घर भागे। सांस, सांस का स्पर्श, ध्यान, मन पर नियंत्रण, तटस्थ भाव या साक्षी भाव से खुद को देखना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा था। आंख बंद कर चार पांच मिनट तो किसी तरह आधा-अधूरा निभ जाता, सांस और सांस से खुद को स्पर्श करना, साक्षी भाव से खुद का निरीक्षण करना। एकाध बार इस प्रक्रिया में स्वर्गानुभूति भी होती भीतर से। लगता कि किसी दूसरी ही दुनिया में आ गए हैं। पर जल्दी ही मन भटक जाता।
वह उठ कर बाहर आ गया है।
अंगरेज लड़का बाहर से भीतर जा रहा है, मुसकुराता, हाथ जोड़ कर झुक कर विनय को, विनय भाव से प्रणाम करता हुआ। वह भीतर चला गया है और विनय को सहसा बेटे की याद आ गई है। फ़र्क बस यही है के इस के चेहरे पर दाढ़ी है, बेटे के नहीं। पर यही मासूमियत, यही बेलौसपन, यही लोच, यही विनम्रता और लंबाई भी यही है। विनय एक चबूतरे पर बैठ जाता है। आंखें बंद कर बेटे की याद में खो जाता है। उस बेटे की याद में जिस से आज़िज़ आ कर वह इस विपश्यना शिविर में आ गया है। शांति की तलाश में। और शांति है कि मिलती नहीं। नींद मिलती है। जैसे माघ महीने की धूप उसे लोरी गा कर सुला रही है। वह बैठे-बैठे फिर सो गया है।
विनय को इतनी नींद क्यों आती है भला? वह शायद सपने में ही अपने आप से ही पूछ रहा है। कि सोने के कमरे में तो सोता ही है। सुबह हो या दोपहर जैसे कोई मां लोरी गा कर बच्चे को सुलाती है, कोई एक कार्यकर्ता उसे रुनझुन घंटी बजा -बजा कर जगाता है। लगभग रोज ही। बड़े वाले घंटे से तो वह सिर्फ़ सोचता है कि जग जाए। पर सोच कर सो जाता है। फिर बेचारा कार्यकर्ता रुनझुन घंटी बजाता है। दो-तीन मिनट में वह उठता है तो कार्यकर्ता झल्लाता नहीं मुसकुराता है। कश्मीरी है। और उस के चेहरे पर जैसे कश्मीरी सेव की लाली छा जाती है। ध्यान कक्ष में भी वह जब तब नाक बजा देता है। और अब ध्यान कक्ष छोड़ वह चबूतरे पर बैठा ऊंघ रहा है। विपश्यना की जगह एन.सी.सी कैंप होता यह तो राइफ़ल उठा कर फ़ील्ड के जाने कितने चक्कर काटने को उस्ताद बोल देते। पर यहां इस विपश्यना में आचार्य ऐसा कुछ नहीं करते।
कमरे में कैलेंडर भी नहीं है कि वह तारीख़ देख कर तय करे कि कब जाना है। मन में वह दिन की गिनती भूल गया है कि कब आया और कब लौटना है? अख़बार , टी.वी. से भी मुलाक़ात नहीं है। बैठे-बैठे पीठ और कमर टूट कर दर्द के मारे जैसे धनुष बन जाना चाहते हैं। तो ऐसे में किसे और कैसे भला दिन की भी याद रहे? कम से कम विनय को तो याद नहीं। किसी और को हो तो हो। तो क्या इसी तरह अगर वह कुछ दिन और जो रहा तो सब कुछ भूल जाएगा? भूल जाएगा अपनी यशोधरा, अपने पुत्र को भी? हो जाएगा बुद्ध? बुद्ध बन कर शुद्ध हो जाएगा? क्या ऐसे ही भूल गए थे बुद्ध अपने परिजनों को? अगर भूल ही गए थे तो वह तप कर के किस को ढूंढ रहे थे? यह कुछ ढूंढने का तप था या कुछ भूलने का? कभी कपिलवस्तु, कभी श्रावस्ती, कभी सारनाथ तो कभी कुशीनगर। डगर-डगर, नगर-नगर घूम कर वह सब को भूल रहे थे कि याद कर रहे थे? वह तो अपने ही को भूलना सीख रहे थे, सिखा रहे थे कि भूल जाओ अपने आप को भी। साक्षी भाव से, तटस्थ भाव से देखो। खुद को भी। दुख हो, सुख हो, उस को महसूस मत करो। बस देखो और आगे निकल जाओ। कितना आसान है यह बता देना और सिखा देना? और कितना कठिन है इसे अंगीकार करना?
सच बतलाना बुद्ध तुम इसे कैसे स्वीकर कर पाए थे? कैसे सीख पाए थे? क्या सिर्फ़ विपश्यना से? अच्छा जो सीख ही गए थे , भूल ही गए थे अपने आप को भी तो क्या करने गए थे बरसों बाद अपने उस राजमहल में भी? क्या सिर्फ़ भिक्षा मांगने ही? और यशोधरा से भी उस का बेटा ले लिया था भीख में? यह तुम्हारा तप था बुद्ध? कि यशोधरा का त्याग? कि उस ने दिया भी तो तुम्हें अपना एकमात्र आसरा अपना प्रिय बेटा ही दिया। यह कह कर कि इस से अमूल्य और इस के सिवाय मेरे पास और क्या है जो तुम्हें दे दूं? और तुम ने ले लिया था बेटे को। सच-सच बतलाना बुद्ध क्या तुम बेटा लेने ही तो नहीं गए थे अपने राजमहल? अच्छा जो वह संतान बेटा नहीं बेटी होती, तो भी क्या तुम उसे भिक्षा में ले लेते? विनय मन ही मन पूछता है। वह एक शाम आचार्य से इस पर चर्चा भी करना चाहता है। पर आचार्य इस बिंदु पर बहस से , चर्चा से कतरा जाते हैं। यह कह कर कि बात सिर्फ़ विपश्यना पर ही हो सकती है। वह भी बहस भाव में नहीं। सिर्फ़ प्रश्न और उत्तर की शकल में। संक्षिप्त में। और उन के पास हर सवाल का जवाब सिर्फ़ विकार और विकार मुक्ति में ही होता है। विनय को यह बात कुछ जमती नहीं।
वह फिर साधना में डूब गया है। भूल गया है देह का दर्द। मन से अब वह बैरागी हो रहा है। बैराग से अनुराग हो गया है। अब वह सांस को आते-जाते सिर्फ़ साक्षी भाव से देखने लगा है, देखना सीखने लगा है। आचार्य सत्यनारायण गोयनका का वीडियो प्रवचन उसे लुभाने लगा है। आचार्य अपनी हर बात के लिए तर्क में डूबी उपकथाओं का सहारा लेते ही रहते हैं। किसिम-किसिम की कथाएं। रोचक कथाएं। बिल्कुल आचार्य रजनीश की शैली में। पहले कथा फिर तर्क और अकाट्य तर्क। कि जैसे आप बात को गांठ बांध लें। भूलें नहीं। कथा रस में पगी बातें सीधे मन को छूती हुई भीतर तक जाती हैं। तो अगर यह कथा याद रह जाती है तो देह में या मन में हो रही प्रतिक्रियाओं को वह कैसे भूल जाए? या भूल जाने का नाटक करे? कि हां मैं साक्षी भाव से देख रहा हूं। खुजली हो रही है देह में भी और मन में भी और भूलने का स्वांग चल रहा है। तो यह ध्यान अभिनय है कि साधना? विनय मन ही मन पूछ रहा है। आचार्य हर कथा या बात के बाद जैसे संपुट के तौर पर या कहिए सूत्र वाक्य या स्लोगन के तौर पर दुहराते या तिहराते ही रहते हैं कि, 'यह भी गुज़र जाएगा !' और फिर विनय हर बार मन में पूछता है अपने आप से कि जब सब कुछ गुज़र ही जाएगा तो बाक़ी क्या रहेगा? समय अच्छा हो, बुरा हो गुज़र ही जाता है। पानी गुज़र जाता है पर पत्थर पर निशान छोड़ जाता है। तो क्या यह निशान ही इतिहास होता है? तो इतिहास शेष रह जाता है। हार जीत शेष रह जाती है। उस की कथाएं शेष रह जाती हैं। और जब इतिहास शेष रह जाता है, कथाएं शेष रह जाती हैं , तब गुज़र क्या जाता है? सिर्फ़ दुख या सुख? कि कुछ और? उस के इस सवाल का समुचित जवाब उसे नहीं मिलता। मन के किसी कोने-अतरे से भी नहीं।
वह अनुत्तरित बैठा है ध्यान कक्ष में। ध्यान में लीन। अब वह गोरी अधखुली-अधनंगी विदेशी औरतों को भी नहीं देखता, नहीं देखता उन की देह के उभार या उतार-चढ़ाव। देह का बुखार और उस की खुमारी उतर गई है उस के मन से। वह ध्यान में रमा हुआ साक्षी भाव से अपना ही निरीक्षण करता है। उसे लगता है , अपने मक़सद में क़ामयाब है वह। इस शिविर को साध लेगा अब वह।
विपश्यना में प्रेम का मराठी अनुवाद
विपश्यनेतील प्रेम विपश्यना
में प्रेम
मराठी अनुवाद मूळ
हिंदी कादंबरी
अनुवादक -प्रिया जलतारे दयानंद
पांडेय
प्रस्तावना
भारतीय संस्कृती ही मातृपूजक संस्कृती आहे. आकाश, वायू, अग्नी, जल आणि पृथ्वी ही पंचमहाभूते म्हणजे
प्रचंड शक्तिस्रोत आहेत. या पंचमहाभूतांच्या एकत्रित परिणामातून पृथ्वीवर सजीव
सृष्टी निर्माण झाली आणि चराचर विश्व साकारले.
ऋग्वेदात वाक् आंभृणी यांनी रचलेल्या देवीसुक्तात
स्त्रीशक्तीचे विराट स्वरूप व्यक्त झाले आहे. स्त्री-पुरुष कामेच्छेने एकत्र येऊन
नवनिर्मिती घडवावी आणि दरत्यातून
सृष्टीचे चक्र अखंडपणे सुरू राहावे, हीच
या मागील मूलभूत प्रेरणा असल्याचे जाणवते.
अथर्ववेदातही कामदेव यांना उद्देशून पवित्र मंत्र
आढळतात. चराचर सृष्टीच्या निर्मितीमागील मूळ प्रेरणाच प्रेम मिलन ही आहे. त्यामुळे काम भावना ही केवळ व्यक्तिगत भावना नसून
सृष्टीच्या सातत्याशी जोडलेली एक आदिम आणि पवित्र शक्ती आहे.
महाभारताच्या काळात नियोग पद्धती अस्तित्वात होती.
तिच्याकडे केवळ कामतृष्णेच्या दृष्टिकोनातून पाहिले जात नव्हते; विशिष्ट सामाजिक आणि कौटुंबिक
परिस्थितीत ती समाजमान्य, पवित्र
आणि कर्तव्यभावनेतून स्वीकारलेली पद्धत होती. त्यामागे वंशसातत्य आणि सृजनाची
भावना होती.
जीवोत्पत्तीच्या प्रक्रियेत सर्वप्रथम मनाचा निश्चय
आवश्यक असतो. ‘विपश्यने
दरम्यान प्रेम’ या
कादंबरीतील नायिका मल्लिका ऊर्फ दारिया हिने विनयला आपला जोडीदार म्हणून निवडले.
विपश्यनेच्या कठोर शिस्तीमध्येही तिने मोठी जोखीम पत्करून विनयला भेटत राहण्याचा
निर्णय घेतला. तिच्या मनातील नितांत मंगल हेतूला अखेरीस यश मिळाले आणि तिला
मातृत्वाचे परमपवित्र दान लाभले.
स्त्रीच्या जीवनात मातृत्व हाच परम आनंद असतो हा विचार या कादंबरीतून मनाला स्पर्शून
जातो. प्रेम, धैर्य, सृजन आणि मातृत्व यांचा सुंदर संगम
मल्लिकेच्या व्यक्तिरेखेतून अनुभवायला मिळतो.
आदरणीय दयानंद पांडेय सरांचे मी मनःपूर्वक आभार मानते.
स्नेहाने आणि विश्वासाने त्यांच्या हिंदी कादंबरीचे मराठी भाषांतर करण्याचे कार्य
त्यांनी माझ्यावर सोपवले. माझ्यासाठी हे कार्य एखाद्या शिवधनुष्याप्रमाणे होते.
त्यांच्या विश्वासाला न्याय देण्याचा मी मनापासून प्रयत्न केला आहे.
प्रेमरसाने ओथंबलेल्या या कादंबरीचे मराठी वाचक मनापासून आणि
आनंदाने स्वागत करतील, अशी
माझी मनःपूर्वक अपेक्षा आहे.
— प्रिया
जलतारे
—————————————
प्रस्तावना
प्रेमात विपश्यना
गौतम चटर्जी
संस्कृत शब्द ‘पश्य’चा अर्थ आहे ‘पाहणे’ आणि ‘विपश्य’चा अर्थ आहे ‘अंतर्निरीक्षण
करणे’. बाहेर
न पाहता आपल्या मनात डोकावणे, म्हणजेच
स्वतःच्या विचारांचे निरीक्षण करणे. मनाला विचारशून्य करणे हे बुद्धाच्या
ध्यानपद्धतीतील प्रथम चरण आहे, प्रारंभिक
बिंदू, ज्याला ‘विपश्यना’ संबोधले गेले. संस्कृत भाषेतून हा
शब्द पाली भाषेत रूढ झाला .बुद्धाने मनालाच सगळे काही सांगितले आहे. हे मन
विचारांपासून रिक्त होते, जणु
विश्व रिक्त होते आणि सत्याचा प्रकाश याच मनाच्या गाभाऱ्यात तेजाळत राहतो . हेच
वैदिक मानस आहे, आत्म
किंवा आत्मा आहे, हृदय
आहे, ईश्वरानुभूती
आहे.आधुनिक युगात
विपश्यना ध्यानशिबिरे भारतात अनेक ठिकाणी चालूच असतात. खरे तर यासाठी कुठल्याही
शिबिरात जाण्याची आवश्यकता नाही. जिथे आपण आहोत, तिथे शिबिर होऊ शकते; तिथेच बोधिवृक्ष असू शकतो.
कादंबरी
वरिष्ठ लेखक दयानंद पांडेय यांच्या या नव्या कादंबरीत ‘विपश्यना में प्रेम’मध्ये याच संबंधित वातावरणाचे चित्रण केले आहे. कथेचा
संदर्भ वास्तविक जीवनातून घेतला आहे. त्यावर लेखकाने आपल्या कल्पनाशक्तीने या
कथावस्तूला आकाश दिले आहे. कथासार सुद्धा वास्तविक जीवनापासून अपरिचित नाही. असे
काही जीवनामध्ये घडू शकते, हे
आपल्याला परिचित आहे.
जीवनातील घटनेची कल्पना आणि जीवनात घडणाऱ्या घटना या
दोन भिन्न गोष्टी आहेत. जीवनातील घटनेची कल्पना अशा प्रकारे मांडली जाते की ती
हुबेहूब जीवनातील सत्य घटना वाटते. हाच साहित्यकृतीतील उत्कर्षबिंदू आहे.रामायण
आणि महाभारत ही उत्कृष्ट उदाहरणे अनेक वर्षांपासून आपल्या समोर आहेत. आज कोणी
मान्यच करत नाही की ऋषी वाल्मीकी आणि वेदव्यास यांच्या या साहित्यिक रचना आहेत.
महाकाव्य आणि गाथा यांचे हे चरित्र भारतीय मानसिकतेच्या रचनाकारांनी आम्हाला
सोपवले आहे. याच गवाक्षातून, झरोक्यातून
आम्ही दयानंद यांच्या या कृतीकडे पाहत आहोत आणि प्रशंसा करत आहोत.
जर कोणी केवळ ते पाहिले असते, आणि ते पूर्ण वाचल्यानंतर त्याचा
आस्वाद घेण्याचा अनुभव, भारतीय
महाकाव्यांच्या आरंभबिंदूपासून ते आधुनिक कादंबऱ्यांच्या मार्गापर्यंत आपण जो
अनुभव जपला आहे, त्याच्यासारखा
नसता, तर
त्याची प्रशंसा करण्यात काहीच अर्थ उरला नसता, आणि हे प्रस्ताविक लिहिण्याची
इच्छाही झाली नसती. आपण महाकाव्यांचे उदाहरण दिले. दोन्ही महाकाव्ये या अर्थाने
इतिहासच आहेत आणि म्हणून त्यांच्या रचनाकाळाला इतिहासकाळ मानले गेले आहे. आपण
इथपासून कादंबरीचे गुणधर्म आणि स्वरूप जाणून घेतो.
आधुनिक भारतीय कादंबऱ्यांची काही उदाहरणे पुढे आहेत—रवींद्रनाथ टागोर यांची कादंबरी ‘शेष कविता’, माणिक बंदोपाध्याय यांची ‘पुतुलनाचा इतिकथा’, शरदचंद्र यांचे ‘श्रीकांत’, प्रेमचंद यांचे ‘देवस्थानाचे रहस्य’, जयशंकर प्रसाद यांचे ‘इरावती’ आणि निर्मल वर्मा यांचे ‘वे दिन’. आता २०२३ मध्ये ‘विपश्यना में प्रेम’ ‘विपश्यने दरम्यान प्रेम’या कादंबरी ला याच वातावरणात, याच उंचीवरून पाहता येते.
कादंबरीमध्ये कथावस्तूसोबत दोन महत्त्वपूर्ण अवयवांची
पारख केली जाते; ते
म्हणजे भाषा आणि शैली.
कहाणीला जड, अलंकारिक
भाषेचा विस्तार देऊन कादंबरीचे रूप दिले असते, तर ती प्रभावी ठरली नसती. भाषा
व्यापक, विस्तृत
असली तरी रंजकता केवळ कथेतील वेगवेगळ्या वळणांमुळे नव्हे, तर शैली आणि निरनिराळ्या
पात्रांच्या वैशिष्ट्यांमुळेही आहे.कादंबरी पूर्ण वाचल्यानंतरही तिच्यातील रस
टिकून राहतो. उत्सुकतेचा उत्साह भाषा-स्तरावर वाग्जाल वाटत नाही. कथा-विस्तारात
अन्योक्ती नाही. शैली स्तरावर सामासिक अभिव्यक्ती आहे. अलंकारिक सौंदर्य, शाब्दिक उपमा दिसतात. जसे पाहा—
साधन आणि साधना यातील तीव्र संघर्षामुळे आपल्या
आयुष्यामध्ये अशांतता निर्माण झाली नाही का?
या कोलाहलाचे कोणी काही करू शकत नाही. तोसुद्धा नाही.
हा कुठला गोंगाट? गोंगाट की रडारड? की या दोन्हींच्या मधील अजून काही!
विपश्यना तर नाहीच नाही, मग काय आहे?
विराट दुनिया आहे स्त्रीचा देह.
स्त्रीमन तिच्या देहापेक्षाही विराट.
चंदन आहे, तर
त्याला नक्कीच सुगंध येईल! सुगंध दरवळत राहिल!
बाहेर कोवळे ऊन आहे. मनात मात्र अतिशय गारठा.
झोपेत ध्यान.
विपश्यनेत वासनेचे हे कोणते संगीत आहे?
शब्दाशब्दाने आपण कथेत पुढे पुढे सरकत जातो. ही वरील
सर्व वाक्ये फक्त अभिव्यक्ती नाहीत, तर ती
कथा-प्रवाहाला रंगतदारपणे पुढे नेतात.वेगळ्याच आस्वादाच्या प्रभावात कथा-प्रवाह
पुढे नेण्यासाठी विभिन्न चरित्रे घेतली आहेत. निरनिराळ्या जागा, वेगवेगळी स्थळे आणि प्रसंग आहेत.
लेखकाच्या दृष्टिकोनावर आधारित नोंदी, स्पष्टीकरणे
आणि टिपणी आहेत.यशोधरा आणि सीता यांच्या बाजूनेही विचार मांडले आहेत. लेखकाने काही
प्रश्नही विचारले आहेत. एखादी स्त्री आपल्या मूक शोकात या शिबिरात आली आहे, तर त्यामागे निश्चित काय कारण असेल, हे समजून घ्यायचे आहे.या शोधासाठी
लेखक सिद्धार्थच्या मानसिकतेचा विचार करतात. मैथिलीशरण गुप्त यांच्या कवितेतून
यशोधरेच्या अश्रूंपर्यंतही जातात, द्रौपदीपर्यंतही
जातात. स्थळांमध्येही बदल होतात.दार्जिलिंग किंवा कोबीच्या शेतातील बसण्याचा ओटा, युवा अवस्थेतील दिवस, नदीचे खोल पात्र अथवा बोटॅनिकल गार्डन आणि
पुन्हा परत येणे.मौनाच्या राजधानीत दर तिसऱ्या परिच्छेदात स्त्रीच्या विलापावर
लक्ष केंद्रित केले आहे. पात्रांमध्ये मुस्लिम मित्र, इंग्रज मुलगा, ऑस्ट्रेलियन, फ्रेंच व्यक्ती आहेत. साधू-साधू असे
प्रशंसात्मक बोलणारा साधू आहे. रशियन स्त्री तर नायिका आहे.
कथेच्या भाषेचा संगीताच्या भाषेत अनुवाद केला आहे.
परस्पर संबंधांचा तपशील, विशेष
करून देहसंबंधाच्या सूक्ष्म सक्रियतेला संगीताच्या भाषेत मर्यादा घालून दिली आहे.
कधी बासरीच्या स्वरात, तर
कधी मालकौंस रागाच्या विस्तारातील मर्यादेत.
भाषा आणि शैली कथेला क्रमशः विस्तार देत आहेत आणि
पूर्ण कादंबरी एकाच वेळी पूर्ण वाचली जाते. असे वाटते की जणू कुठल्या लांबच्या
प्रवासाहून न थकता परत येत आहोत.
यापूर्वी ‘नीला
चाँद’ वाचून
थोडा थकवा आला होता. विनय आणि मल्लिका यांचे प्रेम विपश्यना शिबिराच्या कडक
शिस्तीच्या मौनात घडत आहे आणि बहरत आहे. इथेही भाषेची प्रमुख भूमिका आहे.
भारतीय भाषा आणि रशियन भाषा, मौनाची भाषा, देहाची भाषा आणि विपश्यनेची भाषा—या सर्व भाषिक कथामयतेवर चित्रपटाची निर्मितीही फार
सुंदर बनेल.
शेवटी देहस्तरावर येण्याची परिणती निकषावर कादंबरी
वाचकाला सावध करत आहे. विपश्यनेमध्ये मनातून हे जग सुटत जाते; परंतु इथे मात्र ही कथा या जगाला
खिळवून ठेवते आहे, घट्ट
बांधून ठेवते आहे, पकडून
ठेवते आहे आणि शेवटी वाचकाला त्याच्या ध्यानशिबिरात पोहोचवून देते.
जगरहाटी आणि कालचक्र सुरू ठेवण्याची सावधानता बाळगत
आता विपश्यनेकडे लक्ष जाते. याचसाठी या कादंबरीच्या निर्मितीची प्रशंसा करावी
तेवढी कमीच आहे.
उत्कृष्ट,अति
उत्कृष्ट!
संपर्क
एन 11/38
बी, रानीपूर, महमूरगंज
वाराणसी – २२१०१०
मोबाइल : ७०५२३०६२९६
* [वाणी
प्रकाशन, नवी
दिल्ली प्रकाशित कादंबरी ‘विपश्यना
में प्रेम’ यातील
प्रस्तावना ]
—————————————-
[रामदेव शुक्ल ह्यांच्यासाठी]
——————————————
विपश्यनेतील प्रेम
मराठी अनुवाद
प्रिया राजेंद्र जलतारे
मूळ
हिंदी कादंबरी
विपश्यना में प्रेम
दयानंद पांडेय
ती जणू वाचाहीन राजधानी होती. माणसे तर माणसे , अगदी झाडे, झुडुपे, फूल ,पाने, निसर्ग,वनस्पती सगळे मूक होते.का कोण जाणे पण चिमणी सुद्धा
चिवचिवत नव्हती. ना आतून आवाज बाहेर जात होता ,ना बाहेरून आवाज आत येत होता.जर कुठला आवाज अधून मधून
ऐकू येत होता तर तो फक्त आचार्यांचा. किंवा ध्वनी मुद्रिकेवर वर आचार्यांचे
निर्देश. निर्देशांचा भडीमार. नाहीतर घंटी अथवा घंटा.जे ही काही सांगणे वा ऐकणे
होते ते आचार्यांनी सांगायचे आणि आचार्यांनी ऐकायचे. नाहीतर मोठी घंटा वाजायची
किंवा छोटी रुण झुण वाजणारी घंटी. नाहीतर मग लिखित निर्देश असायचे, जे वाचून जाणून घ्यायचे आणि स्वीकार
करायचे. परंतु त्यावर कुठलीही प्रतिक्रिया द्यायची नव्हती, अगदी इशाऱ्याने सुद्धा
नाही.डोळ्यांनी अथवा कुठल्याही संकेतांनी कोणाला काही सांगणे वा कोणाचे काही
ऐकणे नियमांची अवहेलना होत होती. त्यामुळे तुम्हाला शिबिराबाहेर काढल्या जाऊ शकत
होते. मनाच्या आत कल्लोळ होता जो थांबत नव्हता. पण आचार्य म्हणत होते मनाला
नियंत्रित करणे हेच आपले ध्येय आहे. मनावर नियंत्रण आणायचे होते पण मनातील कल्लोळ
मात्र कमी होत नव्हता.वाटत होते की हे मन हेच ह्या कोलाहलाचे घर आहे. या कल्लोळाचे
,या
कोलाहलाचे, काय
करू आचार्य? त्याला
खूप वेळा असे वाटते की आचार्यांना हा प्रश्न विचारावा. पण शरीराच्या आत मध्ये असा
कोणी दुसरा होता, ह्या
कल्लोळाच्या शिवाय ही,जो हा
प्रश्न विचारू देत नव्हता.
तो कोण होता?
कोलाहल खूप होता. कैफीयती खूप होत्या तऱ्हे तऱ्हेच्या
.पण शांती नव्हती. मनाची शांती. आणि तो तर मनाच्या शांतीच्या शोधात घरातून वेसण
तोडून, बेलगाम
होऊनच घराबाहेर पडला होता. विपश्यना शिबीर . पण कुठले ही शिबीर मनाला शांती देत
असते का? इथे
या शिबीरातल्या ध्यान कक्षात बसून विनय हाच विचार करत होता. आचार्यांच्या आवाजातील
ध्वनी मुद्रिका निरंतर वाजत होती .
श्वासोच्छवास क्रिया समजून घेणे, तठस्थ भावनेने पाहणे, त्याद्वारे मनाला नियंत्रित
करण्याचे निर्देशांवर निर्देश ध्वनीत करत होते .सामान्य श्वासोच्छवास चालू आहे.
आना पान म्हणजे श्वासावर लक्ष केंद्रित करून केली जाणारी ध्यान पद्धती. श्वास घेणे
आणि श्वास सोडणे. श्वासावर नियंत्रण, श्वासाकडे
तटस्थ भावनेने पाहणे ,साक्षी
भावनेने पाहणे,आचार्य
शिकवत आहेत. श्वासाला स्पर्श करणे निर्देशित करत आहेत. नाकावर लक्ष केंद्रित
करण्याचे आदेश आचार्य देत आहेत. नाकाशी, श्वासाशी
स्पर्श जाणवून घेण्यासाठी आचार्य निर्देश देत आहेत. पण इथे तर ध्यान कक्षात थोडी
दूर बसलेल्या इंग्रज बालेचे सौंदर्य जाणवत आहे . सगळे लक्ष तिच्यावरच केंद्रित होत
आहे. ती लंडनहून तिच्या पुरुष मित्रासोबत शिबीरात आली आहे. ते दोघे वेगवेगळ्या
ठिकाणी उतरवले गेले आहेत. एकमेकांना भेटण्याची, बोलण्याची परवानगी नाही. कडक शिस्त.
त्यामुळे दोघेही जेव्हा ध्यान कक्षात असतात एक दुसऱ्याचे ध्यान करतात. सगळ्यांच्या
नजरा चुकवून एकमेकांना पाहतात. रोज तो मुलगा एक रांग सोडून विनयच्या पुढच्या रांगेत बसतो. सगळ्यांची आसन
व्यवस्था ठरलेली आहे.
रोज एका जागेवर बसायचे आहे. तर पहिल्या दिवशी नव्हे
पहिल्या संध्याकाळी सगळ्यांचा परिचय होता आणि साधे सोप्प ध्यान. त्या संध्याकाळीच
प्रत्येकाला आपली जागा ठरवून दिली गेली होती. कुठे बसायचे काय करायचे कसे करायचे
हे सगळ्यांना समजावून सांगितले होते. परिचय सभा समजा. आणि मौन सुरू झाले.
आता मौनावस्थेतच झोप, मौनावस्थेतच जागृती. मौनातच स्नान, मौनातच भोजन. ते मौन तरी काय होते, मनाच्या कोलाहलात आणखी आणखी जळत
राहणे होते. तर मग हे मौन काय मनाला जाळून टाकत आहे?माहिती नाही पण आता तरी मौन मनाला धगधगत ठेवत
होते.बीना धूर आणि बीना विस्तवाने.मंद अग्नीवर जसा श्वास धगधगता.मूकपणाची गोड उब
एका अनोख्या जगात घेऊन जात होती. डोळे बंद होते आणि धुंदी पसरली होती. ही कोणती
दुनिया होती? दुनिया
की स्वप्न? स्वप्न
की आणखीन कोणता वेगळा लोक? बेहोशीची
धुंदी उतरता उतरता आतल्या आतच गात होती,’आज
मदहोश हुआ जाये रे मेरा मन ,मेरा
मन, मेरा
मन ।बीना ही ,बात
मुस्कुराये रे मेरा मन ,मेरा
मन, मेरा
मन!’ संध्याकाळ
होता होता ही बेहोशी उतरत होती. ध्यान कक्षातील ध्यान, आता शारीरिक थकव्यामध्ये बदलले होते
हे बेभान पण. कंबर दुखत होती. संध्याकाळच्या नाश्त्याने थोडा थकवा कमी झाला होता, प्रवचनानंतर मात्र पूर्णच थकवा
नाहीसा झाला. प्रवचनामध्ये विचारांची जी दिशा होती, त्यात भावाची शुद्धता होती, तार्किकतेची पुढे नेणारी साखळी होती, विनयला मोहवत होती.
खूप वर्षानंतर रात्री न जेवताच झोपण्याची वेळ आली
होती. नियमच होता या शिबिराचा, रात्री
जेवण मिळणार नाही. कुठल्याही तऱ्हेने रात्री खायचे नाही. रात्री न जेवता झोपण्याचे
विद्यार्थी दशेचे दिवस आठवले. त्या काळात रात्री तर काय कधी कधी दिवसही बिना अन्न पाण्याचे जात
होते. चेहऱ्यावर जणू काही भूक दिसत असायची चित्रपटाच्या जाहिराती वरच्या
चित्रासारखी. भुकेने पोटात गोळा उठायचा. पण त्यादिवशी मनात तर होते की भोजन मिळाले
नाही पण पोटात भुकेचा गोळा मात्र उठला नाही. त्यानी आरशात चेहरा पाहिला. चेहऱ्यावर
भुकेच्या जाहिराती सारखे चित्र दिसले नाही.
तो झोपला.
पहाटेच्या राम प्रहरी चार वाजता सर्वांना उठवण्याकरता
घंटा वाजवल्या गेला. तो उठला नाही. थोड्यावेळाने एक व्यक्ती हातामध्ये रुणझुण घंटी वाजवत आला. विनय तरी
सुद्धा उठला नाही. आता तो माणूस विनयच्या खोलीसमोर तोपर्यंत घंटी वाजवत उभा राहिला
जोपर्यंत विनय उठून उभा राहिला नाही. परंतु तो व्यक्ती तोंडाने काहीही बोलला नाही.
दात घासणे इत्यादी आणि स्नानानंतर विनय ध्यान कक्षात पोहोचला. सगळे ध्यानस्थ होते.
त्याला खरोखरच खूप उशीर झाला ‘होता.
आचार्यांनी त्याच्यावर एक नजर टाकली आणि परत ध्यानस्थ झाले. विनयने पाहिले ते
इंग्रज यौवना आणि तिचा पुरुष मित्र ध्यानस्थ होते. बाकी सगळ्या महिला आणि पुरुष
सुद्धा ध्यानस्थ होते. तसेही या शिबिरामध्ये अर्ध्याहून अधिक जास्त विदेशी
होते.रशिया,ऑस्ट्रेलिया,फ्रान्स, लंडन, सिंगापूर इत्यादी देशातील स्त्रिया
आणि पुरुष होते. जास्त करून जोडीने होते. पती-पत्नी एक-दोन होते. परंतु महिला
मैत्रिणींसोबत अनेक जण होते. दोघे तिघे एकटे सुद्धा होते. स्वतःच मग्न असलेले.
जवळपास हरल्यासारखे. एकांतात सुद्धा अजून एकांत शोधणारे. ध्यानात सुद्धा ध्यान
शोधणारे. भारतीय सुद्धा जे होते त्यात जास्त लोक मराठी होते. महाराष्ट्रातून पंधरा
लोकांचा समूह आलेला होता. काही स्त्रिया देखील होत्या. खूप महिला वाडी अथवा
ग्रामीण भागातून आलेल्या, डोक्यावर
पदर घेतलेल्या होत्या. फक्त एकच स्त्री शहरी दिसत होती.तिला पण हिंदी भाषा येत
नव्हती. जवळपास सगळेच स्त्री-पुरुष इथे ध्यान करण्याच्या बहाण्याने ताण तणाव कमी
करायलाच आले होते. प्रत्येक जण तणावात होता. कोणी सायंटिस्ट, कोणी प्राध्यापक, कोणी डॉक्टर, कुणी व्यापारी, कोणी ठेकेदार, कोणी शेतकरी, कोणी नोकरदार वर्गातील. मध्यमवर्गीय
स्तरातील जास्त, ,काही
उच्च मध्यमवर्गीय तर काही नीच मध्यमवर्गीय. पण सगळ्यांचे ध्येय एकच निश्चित होते
तणाव कमी करणे . चूप बसणे हे तणाव कमी करण्यामध्ये किती मदत करू शकते हे या
शिबिरात आल्यावरच विनयला समजले होते. तुम्ही बोलणारच नाहीत तर वादविवाद अजिबात
होणार नाहीत. चूप राहणे आणि शिस्तबद्ध राहणे ह्यामुळे बरेच काही सोपे होते.आणि वर परत ध्यान
करणे.विपश्यना पद्धती जणू काही आपल्याला स्नानच घालत आहे.
विनय सुद्धा नहातच होता.पण अर्धवट. अर्धवटच
शिस्तबद्धपण आणि अर्धवटच ध्यान करू शकत होता. विनय कडे फार काही तणावही नव्हता. तो
तर फक्त घरातील समस्यांना कंटाळून आला होता. ह्या विचाराने देखील की जणू काही या
पाहण्याने तो बुद्धाला शरण जाऊ शकेल आणि बुद्धा विषय काही समजू शकेल. बुद्धाला
समजून घेऊन शुद्ध होऊ शकेल. थोडीफार शांती मिळेल. पण इथे तर बुद्ध अथवा
बुद्धाविषयी काहीही नव्हते. होती तर फक्त बुद्धाची तपस्या. प्रौढत्वाकडे झुकणाऱ्या
विनयच्या काबू मध्ये हे काहीच नव्हते. रोजच्या रोज बारा बारा तास एका जागी बसून
ध्यान करणे अतिशय कठीण होते. त्यानंतर बाजूलाच राहू दे पण बारा तास मांडी घालून
एका जागेवर बसणे हे सुद्धा विकट समस्या होते. प्रत्येक अवयव, प्रत्येक पेशी वेदनेने ठसठसत होते.
नुसते बसूनही कुणाचे शरीर दुखते का? हो ,विनयचे शरीर दुखत होते. पाठ तर आता तुटून जाईल असे
वाटत होते. दुसऱ्या दिवशी संध्याकाळच्या प्रवचनानंतर त्याने तिथे उपस्थित असलेल्या
आचार्यांना ही गोष्ट सांगितली. ते हसून बोलले, “विकार निघत आहेत मनातून बाहेर, त्रास तर होणारच’.”
“विकार?” विनय चकित होत बोलला ,”मी कोणी पापी नाही .पाप नाही केले
मी कोणतेही.” “विकार
अनेक प्रकारचे असतात.”आचार्य
म्हणाले,”पाप
किंवा दुष्कर्म हे विकार नाही.” तसे
त्यांनी पुढचे म्हणणे अधिक जोडले,“विकार
निघून गेल्यावर कष्ट संपून जातील. देह जाणार नाही.”आणि मग त्यांनी इशाऱ्यातून सुचवलं की हा संवाद
संपला.आता तुम्ही जा.अबोलपणाच्या या राजधानीत बोलण्याचा एकच अनुभव येत होता की
आचार्यांची सीमित चर्चा प्रश्न समाधान करू शकत होतो. एकट्याने. सगळेजण गेल्यानंतर.
अगदी हळू आवाजात.
आता त्याच्या लक्षात आले काही लोक अचानक ध्यान
कक्षातून गायब झाले आहेत.
एक रशियन माणूस भिंतीशी टेकून बसला. त्याने सुद्धा
भिंतीशी टेकून बसण्याचा प्रयत्न केला. शिबिराचा एक कार्यकर्ता आला. इशाऱ्यानेच
मनाई करत आपल्या जागेवर जाऊन बसायला त्यांनी सुचवले. त्या संध्याकाळी त्याने
आचार्यांना भिंतीशी टेकून बसण्याविषयी विनंती केली. आचार्यांनी सक्त मनाई केली.
विनयने रशियन माणसाचा हवाला दिला. आचार्य म्हणाले,”त्याला काही मेडिकल प्रॉब्लेम आहे.”“प्रॉब्लेम मलाही आहे,”विनयने विनंती केली. “हा काही प्रॉब्लेम नाही.”चर्चा तिथेच संपली.
मग त्याने पाहिले की एक फ्रान्सिसी व्यक्ती अचानक
ध्यान कक्षातून गायब व्हायचा. मग त्याने निरीक्षण केले की त्याची महिला मित्र
सुद्धा थोड्या वेळात उठून बाहेर जायची. हे सगळे बघून त्याचे ध्यान खंडित व्हायला
लागले. शारीरिक क्लेषांमुळे तर मन भटकत होते आता ही विदेशी जोडप्याचे प्रेम चाळे
ही मन भटकवत होते. जेव्हा की स्त्रियांशीच काय पण पुरुषांशी सुद्धा संकेतांमध्ये
संवाद करणे मान्य नव्हते. मोबाईल लॅपटॉप पुस्तके कागद पेन सगळे काही जमा केले गेले
होते. बिस्किट, नमकीन, खाण्याजोगे पदार्थ जमा केले होते.
कपडे, साबण
आणि औषध या व्यतिरिक्त कुठलीही गोष्ट कोणाही जवळ राहू दिली नव्हती. इतकं की अगदी
जपमाळ सुद्धा जमा केली होती. कुठल्याही प्रकारचा तुमच्या पूजापाठ अथवा व्यायाम
यावर प्रतिबंध होते. कारण काय तर ध्यान भंग होणे याचा धोका होता. कुठल्या दुसऱ्या
पद्धती ध्यानमार्गात अडथळा ठरल्या असत्या, नुकसान झाले असते. मानसिक आणि
शारीरिक सुद्धा. असेच सांगितले गेले होते. चंचल मनाला ताब्यात ठेवण्यासाठी अनेक
प्रकार केले गेले होते. पण विनय पाहत होता की तमाम उपाय आता धराशायी होत होते. तो
इंग्रज मुलगा थोडा दूर एका झाडाजवळ जाऊन बसायचा. त्याच्यापासून थोड्याच अंतरावर
त्याची महिला मैत्रीण बसायची. त्यांचे इशारे सुरू व्हायचे. एके दिवशी फेरफटका
मारताना विनयने त्या दोघांना पाहिले. त्याच्या चेहऱ्यावर हसू उमटले. का कोण जाणे
पण त्या इंग्रज मुलाला पाहिले की विनयला स्वतःच्या मुलाची आठवण यायची. या मुलाची
उंची, त्याची
देह बोली, त्याचे
निष्पाप दिसणं आणि बरंच काही विनयच्या मुलासारखंच होतं.
त्यामुळे त्याला मुलाची आठवण यायची. एक दिवस जेव्हा तो
समोरून गेला, त्याने
आपले दोन्ही
हात कपाळावरती ठेवत, थोडेसे
झुकून मला नमस्कार करण्याचा मुद्रेत आला. काहीही न बोलता. विनयच्या मनात आले समोर
जाऊन त्याला आलिंगन द्यावे.आपल्या छातीशी घट्ट आवळून धरावे. परंतु अनुशासनाची आठवण
आली. तो तिथेच थांबला. आता तो मुलगा जेव्हा पण विनयला पाहायचा, आपले दोन्ही हात कपाळावर घेऊन
नमस्कार मुद्रेत यायचा. विनयला तेव्हा त्याच्याबद्दल खूप प्रेम वाटायचे. स्वतःच्या
मुलाच्या आठवणीत तो डुबून जायचा. पत्नी आणि मुलींची सुद्धा त्याला खूप आठवण यायची.
आपल्या माता-पित्यांची सुद्धा तीव्र आठवण येत होती. जे घर तो सोडून आला होता, आता त्याच घरी अगदी क्षणातच
पोहोचावे या इच्छेने तो तळमळत होता.
आता तो आचार्यांना भेटून हे सांगणार होता की ,’मला घरी जावेसे वाटत आहे. हे
ध्यानधारणा यात माझे मन लागत नाही. हे माझ्या काबूमध्ये नाहीं.’परंतु शिबीरात नाव नोंदणी करताना भरलेल्या बॉण्ड चा
मजकूर, कडक
शिस्त, त्याला
भारून टाकायचे. पण जेव्हा हात जोडलेला इंग्रज मुलगा समोर दिसायचा,त्याचा सगळा संयम गळून पडायचा.बॉण्ड मधील सारा मजकूर
तो विसरून जायचा.
तर
मग काय जेव्हा बुद्धाने घर सोडले तेव्हा त्यांना पत्नी
आणि मुलाची शुद्ध नव्हती? माता
पिता आणि कुटुंबाची आठवण आली नाही?तो
राजमहाल ,ते
ऐश्वर्य ,सुविधा
साधने ,तेथील
भोग विलास आठवले नाहीत का?
नक्कीच आठवले असतील.
मग बुद्ध परत का फिरले नाहीत? आपल्या घरी बुद्ध का आले नाहीत? बुद्ध घरी आलेच नाहीत आणि तो तर
दोन-चार दिवसातच घरी परत जायची
इच्छा करत आहे. मौन आणि नियमबद्ध आचरण याचाच परिणाम
होता का? की
मनामध्ये, जसे
की आचार्य म्हणतात, त्या
विकाराचेच निमंत्रण आहे, घरी
परत ये, घरी
परत ये विनय, घरी
परत ये ! हे तप साधना, तुझ्या
ताब्यामध्ये नाही. ना कोणते वर्तमानपत्र ,ना टीव्ही, ना
फोन ,ना
मोबाईल, ना लॅपटॉप, ना घर परिवार ,ना बाकी दुनियेशी कुठला संपर्क.फक्त शिबिर आहे, श्वास आहे ,श्वासाचा स्पर्श आहे. येणाऱ्या जाणाऱ्या श्वासावर लक्ष
केंद्रित करणे आहे. शिस्तबद्ध दिनचर्या आहे. पहाटे चार वाजता उठायचे, ध्यानधारणा करायची, सकाळी सहा वाजता नाश्ता.
सूर्योदयापूर्वीच नाश्ता होऊन जातो. स्नान करून परत ध्यानाला बसायचं. भोजनानंतर
थोडी विश्रांती. परत ध्यान. ध्यान, ध्यान
आणि फक्त ध्यान. स्वतःची उपस्थिती जाणवू न देणे हे ध्यान आहे. आचार्य म्हणतात
साक्षी भावाने स्वतःला पाहणे, तटस्थ
भावाने स्वतःला पाहणे हेच ध्यान आहे. जर हातापायाला मुंग्या आल्या, खाज सुटली, काहीही झाले तरी त्यावर प्रतिक्रिया
व्यक्त करायची नाही. तटस्थ राहायचे. तटस्थ भावाने ने जाणवून घ्यायचे. जेही काही
होत आहे ते होऊ द्या.
हे कसे शक्य आहे? विनय आचार्यांना विचारू इच्छित
होता. इथे तर एका मुद्रेत अथवा एका आसनात थोड्या वेळ सुद्धा बसणे होत नाही आहे, बसण्याची स्थिती आणि अवस्था सारखी
बदलावी लागत आहे. आणि आचार्य म्हणतात तटस्थ भावाने, साक्षी भावाने फक्त पाहायचे. हे कसे
करायचे?
विनयला आठवले, लहानपणी ऐकलेल्या अथवा वाचलेल्या
किती तरी गोष्टी. जसे की शत्रू सेना येऊन युद्ध लढून, युद्ध जिंकून परत गेली. परंतु बुद्ध
आपल्या ध्यानात मग्न होते. त्यांना काही कळलेही नाही. बुद्ध त्यावेळेस ध्यान मग्न
होते, त्यांच्या
शरीरावर मुंग्या येत जात होत्या. मुंग्यांनी मार्ग बनवला होता. परंतु त्या बुद्ध
भिक्षुकाची साधना संपली नाही. तर काय विनय सुद्धा अशा कुठल्या साधनेमध्ये मग्न
राहू शकतो? तो
विचार करतो आणि विचारच करत बसतो. खूपच कठीण आहे!
आजच्या तारखेला सुद्धा असा कोणी बुद्ध असेल का जगात जो
साधनेमध्ये लीन असेल आणि मुंग्या त्याच्या अंगावरून येण्या जाण्याची वाट बनवत
असतील. जशी शत्रुसेना युद्धात लढून जय मिळवून परत गेले आणि बुद्धाचे ध्यान भंग
झाले नाही. आज शक्य तरी आहे का असे काही? असे
असेल तर आपला चीन काय करत आहे? सीमेवरही
आणि विश्व बाजारामध्ये ही! कोरोना सारखी महामारी सबंध जगात पसरवून,आपल्या आजूबाजूला आतंकाचा पर्याय बनवून चीन काय करत
आहे? शेवटी
चीन तर स्वतःला
बौद्ध देश मानतो.विनय स्वतःलाच प्रश्न करत राहतो. मग काय चीन आणि चीन मधले लोक
विपश्यना आणि ही साधना पद्धत यापासून अनभिज्ञ आहेत? त्यांना साक्षी भाव माहिती नाही का?तटस्थ भाव त्यांना माहिती नाही का? की स्वतःपासूनच स्वतःला वेगळे करून
पाहायचे ?विनय
स्वतःलाच विचारतो. आणि मग निरत्तर होत जातो. की वामपंथी हुकूमशाही आणि फॅसिझम
मध्ये गुंतलेला चीन आपल्या साम्राज्यवादी स्वभावात स्वतःच विसरला आहे का, बुद्ध, त्यांची अहिंसा आणि त्यांचे विचार.
चीन?
चीन सोडाच, आपल्या
भारतातही खूपशा जागी विनय गेला आहे. पश्चिम बंगालमध्ये दार्जिलिंग अथवा सिक्कीम ला
गंगटोक अशा अनेक ठिकाणी . जिथे अधिकांश लोक बौद्ध आहेत. जिथे बौद्ध विहार आणि
बौद्ध मठ असंख्य आहे.दारू आणि गोमांस त्यांची दिनचर्या आहे.मेघालयच्या शिलॉंग
पासून गंगटोक पर्यंत सगळीकडे त्यानी हेच पाहिले. आणि सगळे काही खुलेआम. ना त्याग, ना तपस्या, ना साधना. बस चैनीचे साधन आणि
ऐश्वर्य यांची स्पर्धा लावलेले लोकच मिळाले.अधिकांश.
साधन आणि साधना यातील तीव्र संघर्षामुळे आपल्या
आयुष्यामध्ये अशांतता निर्माण झाली नाही का? विनय विचार करत आहे.
शिबिरामध्ये आणखीन एक फ्रान्सिसी आहे.तो स्वतःतच
हरवलेला राहतो. चुकूनही कुठे ही जात नाही .तो जेव्हा रिकामा असतो तेव्हा कुठल्याशा
रोपा जवळ, झाडा
जवळ जातो. कुठल्या फुलाजवळ जातो.झाडाच्या पानांवर ओठ टेकवतो.खूप लक्षपूर्वक, अतिशय प्रेमाने त्याकडे पाहतो.जणू
काही तो छोटा बालक असून ते झाडाचे पान त्याची आईच आहे. मंत्रमुग्ध होऊन त्या
झाडांना तो असाच भेटतो या मौनाच्या राजधानी मध्ये. विनयही त्याला पाहून भावुक
होतो.
एका बौद्ध तीर्थस्थळाच्या कुशीत वसलेले दुर्गम गाव, येथे शिबिर हे आहे.इथे अतिशय शांतता
आहे,एकांत
आहे.आजूबाजूला कोणताही आवाज नाही ,गाणी
नाही, संगीत
नाही. दूर दूर काही खेडेगाव दिसतात. जवळच एक कालवा आहे.गहू आणि ऊस यांचे हिरवेगार
शेते आहेत. शिबिरात काही जागी फुले, काही
झाडे झुडुपे , वनस्पती
दिसतात. असे वाटते की त्याच पानांची इथे सळसळ आहे, तोच त्यांचा ध्वनी आहे, तीच त्यांची बोली आहे. त्या फ्रेंच
माणसाला ही बोली कळते का?
कोण जाणे?
एक ऑस्ट्रेलियन आहे दुपारच्या जेवणाच्या वेळेस डायनिंग
हॉलमध्ये तो बसतो तेव्हा विनय त्याच्याकडे लक्ष ठेवतो अगदी निर्विकार पणाने ताटात
पोळी पसरवतो. पहिले भात वरण खातो. मग पोळी मध्ये भाजी पसरवून घेतो. त्या पोळीचा
रोल बनवतो. जसा एखादा लहान बाळ पोळीचा रोल हातात धरून खातो तसा तो अगदी आनंदाने तो
पोळीचा रोल खातो. एक प्रौढ माणूस लहान बाळासारखा हातात रोल धरून कसा आनंदाने जेवतो
आणि तेही दररोज? जसं
तो स्वतःच आई आहे आणि स्वतःच मूल आहे. ह्यात लहान बालकाचे निरागसपण आणि पोळी
भाजीचा रोल देणाऱ्या आईचे वात्सल्य दिसले ते विस्मयकारक होते. एक साधू, भगवे वस्त्र धारण केलेला युवक, सिंगापूरहून आला. का कोण जाणे तो
दोन्ही हाताने जेवतो. असे वाटते की तो जेवत नसून दोन्ही हातांनी चेंडू खेळत आहे.
जणू काही तो प्रथमच अन्न पाहत आहे. कुठल्या जादूगारा प्रमाणे. काही काही अन्न पण
त्याच्या दाढीमध्ये अडकत आहेत.पण त्याला त्याची पर्वा नाही. फक्त युद्ध स्तरावर तो
जेवणामध्ये मग्न झालेला आहे. ठीक आहे. याच पद्धतीने तो भोजन गृहातील स्त्रियांकडे
आणि अनिमीष नजरेने पाहत असतो विना संकोच. विनयला वाटते जेव्हा हे मौन व्रत संपेल, तेव्हा तो त्या साधूला वैराग्य
सोडण्याचे सांगेल.परंतु त्याचे हे वागणे, जेवण
आणि महिलांपर्यंतच मर्यादित आहे. बाकी तर तो दररोज त्याचे घोंगडे सुद्धा धुतो.
साफसफाईकडे त्याचा विशेष कल असतो. पण रोजच्या रोज घोंगडे का धुतो, विनयला कळत नाही. असे तर नाही ना की
महिलांकडे पाहताना ,ज्या
तीव्र ओढीने तो पाहतो, त्यामुळे
रात्री झोपेत स्खलीत होऊन कपडे खराब करत असेल. अपराध भावनेने, रोजच्या कपड्यांसह घोंगडे धूत
असावा. कुणाला माहिती? पण
इथे साधनेमध्ये ब्रह्मचर्याचे पालन आवश्यक आहे. त्याचे ब्रह्मचर्य खंडित होत आहे
का? अन्न
आणि स्त्री पासून
ची वंचना पुरुषाला इतकी अस्वस्थ करते?
आता ध्यान कक्षातून फ्रान्सिस माणूस सुद्धा दिसेनासा
झालाय. त्याची महिला मैत्रीण सुद्धा दिसत नाही. अचानक दोन महाराष्ट्रीयन सुद्धा
अनुपस्थित झाले. हळूहळू अजून एक दोन लोक. इथे तर आजारपणात देखील ध्यानापासून
कोणालाही सुट्टी मिळत नाही.
विनयला आठवले एकदा विद्यार्थी जीवनात असताना एनसीसी
कॅम्पला गेला होता. तिथे पहाटे चार वाजताच उठून धावायला पाठवत होते. पहाटे चार
वाजेपासून तर रात्री नऊ वाजेपर्यंत सतत कामात व्यग्र ठेवणारी दिनचर्या होती. खूप
मेहनत. धावण्याची
पळण्याची. फक्त भोजन, नाश्ता ब्रेक आणि दुपारी एक तास
विश्रांती. छोट्या छोट्या चुकांवर हातात रायफल उचलून उभे राहणे अथवा धावणे अशा
शिक्षा मिळत असत.काही वेळा कोणी मुलगा आजारी असण्याचा बहाणा करत परेड ला अनुपस्थित
राहिला तर सुट्टी मिळायची पण त्याला जेवण नाकारले जायचे. अंड दूध ब्रेड यावरच दिवस
काढायचा, ते ही
अतिशय मर्यादित दिले जायचे. मग खूप भूक लागायची. मग सगळ्यांनी एक उपाय शोधला. बाकी
दोन-तीन मित्र जेवताना
दोन-तीन पोळ्या आपल्या खिशात लपवून आणत. आपल्या आजारी मित्राला ते खायला घालत. इथे
तर असे काही शक्य नव्हते.
एनसीसी कॅम्प मध्ये जाण्यापूर्वी विनय सैन्यात भरती
होण्याचे स्वप्न पाहत होता. पण एनसीसी कॅम्प मध्ये
कडक शिस्त आणि आणि तावून सुलाखून घेतलेले मुलं. विनयने
सैन्यात भरती होण्याचा विचार बदलला. याप्रमाणेच विपश्यना शिबिरात येण्यापूर्वी
विनय पत्नीवर जेव्हा नाराज होत होता, तेव्हा
रागाने म्हणायचा आता मी हे घर सोडून जातो,संन्यासी होतो. पण आता इथे आल्यावर, ध्यान करताना त्याला इतका त्रास वाटत होता की
त्याला संन्यासी होण्याचा विचार सुद्धा करवत नव्हता. आता तर एवढेच हवे होते की लवकरात लवकर शिबिर
संपावे आणि घरी जावे. श्वास, श्वासाचा
स्पर्श, मनोनिग्रह, तटस्थ क्रिया, साक्षी भाव, स्वनिरीक्षण दिवसेंदिवस अधिकाधिक
कठीण होत होते. तो कसा बसा चार ते पाच मिनिटे डोळे बंद करून ध्यान कसेतरी अर्धवट
निभवत होता, श्वास
आणि श्वासाद्वारे स्वतःला स्पर्श करणे, साक्षी
भावाने स्वतःचे निरीक्षण करणे.एखाद्या वेळेस या प्रक्रियेतून अंतस्थ स्वर्ग
अनुभूती जाणवली. वाटायचं की कुठल्या दुसऱ्याच दुनियेत आपण प्रवेश केला आहे. पण
लगेच मन भटकत राहायचं.
मन देहाला साक्षी भावाने पाहण्या ऐवजी,देहाच्या हालचाली,देहाचेच
स्फुरण ,तटस्थ
भावाने पाहाण्याऐवजी कौटुंबिक समस्या, व्यक्तिगत
गोष्टी, कार्यालयातील
बदमाश लोकांपासून दूर कसे जावे याचा विचार करत राही. यातून कसाबसा सुटला तर तो
डोळे मिटून झोप घ्यायचा. कधी अर्धवट झोप,अर्धवट
जागृती,पेंगत
पडायचा. मग कोणी कार्यकर्ता येऊन त्याला उठवायचा. सगळं काही नीट होत होतं फक्त
ध्यानच प्रामाणिकपणाने आणि योग्य रीतीने होत नव्हते. तो विचार करायचा कोणी व्यक्ती
तासनतास ध्यान कसे करू शकतो. तो स्वतःलाच विचारायचा संन्यासी बनणे इतकी अवघड आहे
का? आणि
इथे तर ध्यानाशिवाय कशाचीही चिंता नव्हती. तयार अन्न, पाणी, राहण्याची जागा, विज सर्व व्यवस्था होती. जंगल आणि इतर तपस्या स्थलासारखी कोणती ही
समस्या नव्हती.पूर्ण सुरक्षा होती.पर्वत, जंगल
इत्यादी जागांवर जाऊन लोक तपस्या करतात तरी कसे करत असतील?काय खात पीत असतील?
विनय ही याचाच विचार करत त्रासून गेला. जसे काही
एखाद्या तरुण मुलीला तिच्या वक्षांचा भार होत आहे,त्याप्रमाणे विनयला त्याच्या साधनेचा भार वाटत होता.
तो ध्यान कक्षात बसून एका विदेशी महिलेचे श्वासोच्छवास क्रिया निरखत होता. श्वास
घेताना आणि सोडताना तिचे भारी वक्ष सुद्धा जोरजोरात वर खाली हलत होते.जसे केळीचे
पाने वर खाली हलतात. ध्यान सोडून तो हेच पाहत होता, समजून घेत होता.कोणाचे नितंब, कोणाचे वक्ष. तो विचारात पडला, गोरी त्वचा एवढी उन्मुक्त कशी आहे? ही उन्मुक्तता, गोरे आणि काळे या वंश भेदाशी ह्याची नाळ जोडली आहे का? अचानक समोर बसलेल्या आचार्यांकडे
त्याची नजर गेली. त्याच्या लक्षात आले चोर नजरेने का होईना आचार्य ही त्या गोऱ्या
कातडीचा मुक्ततेचा
लाभ घेत होते.असे करताना विनयने त्यांना पाहिले हे आचार्यांच्या लक्षात आले
त्याबरोबर त्यांनी डोळे घट्ट मिटून घेतले. विनयने सुद्धा. नंतर आचार्यांच्या ध्वनी
मुद्रिकेच्या आवाजात तो हरवून गेला. खूप आनंद आहे या आवाजात. इतका सतर्क, इतका स्पष्ट आणि तपशीलाने भरलेला, एखाद्या नावेप्रमाणे पाण्यावर
हेलकावणारा आवाज त्याने यापूर्वी ऐकला नव्हता. आरोह -अवरोह आणि श्रद्धा असे मिलन, जणू कानामध्ये जलतरंग वाजत होते, जणू मधुर , शांत वाऱ्याची झुळूक कानाला
स्पर्शून जात होती. असे भासत होते की तो देव लोकात पोहोचला. आचार्यांचा आवाज पंडित
शिवकुमार शर्मा यांच्या संतूर प्रमाणेच,मधात
घोळलेला ,कानातून
हृदयात प्रवेश करत गेला. डोळे बंद करून, दिव्य
आनंदाने ऐकत ऐकत, अलौकिक
आनंदाने तो भरून गेला होता. हळूहळू आणि हळूहळू तो पेंगू लागला.
तो उठून बाहेर आला आहे.
तो इंग्रज मुलगा बाहेरून आत येतोय, हसत हसत हात जोडून, थोडासा झुकून, विनयला अभिवादन करतो. तो आत जातो
आणि विनायला स्वतःच्या मुलाची आठवण येते. या दोन्ही मुलांमध्ये फरक एवढाच आहे की
इंग्रज मुलाच्या चेहऱ्यावर दाढी आहे, विनयच्या
मुलाला दाढी नाही. निष्पाप, निरागसपणा
,साधेपणा, विनम्रता आणि त्याची उंची अगदी हेच
सर्व विनयच्या मुलात आहे. विनय एका ओट्यावर बसतो डोळे बंद करतो आणि मुलाच्या
आठवणीत सर्व काही विसरून जातो. त्याच मुलाच्या आठवणीत हरवतो ज्याच्या त्रासाने, त्राग्यानेच तो विपश्यना केंद्राला
आला आहे. शांततेच्या शोधात. आणि शांतता अशी आहे की जी मिळतच नाही. झोप मिळते. जणू
माघातले कोवळे ऊनच त्याला अंगाई म्हणत झोपवून देत आहे. बसल्या जागीच तो परत झोपला.
विनयला इतकी झोप का बरं येते? स्वप्नातही स्वतःलाच कदाचित तो हा
प्रश्न विचारतो . शयन कक्षात तर तो झोपतोच.सकाळ असो अथवा दुपार जशी कोणी आई बाळाला
अंगाई गाऊन झोपवते. तसा एक कार्यकर्ता रूणझूण घंटी वाजवत वाजवत त्याला उठवायला
येतो.अगदी रोजच. मोठी घंटा वाजते तेव्हा तो फक्त विचार करतो आता उठायला हवे, असा विचार करूनही तो परत झोपतो. परत
बिचारा कार्यकर्ता मधुर आवाजातली रुण झुण घंटी वाजवतो. दोन-तीन मिनिटानंतर तो
उठतो. कार्यकर्ता अजिबात चिडचिड करत नाही. हसतो. तो काश्मिरी आहे. त्याच्या
चेहऱ्यावर काश्मिरी सफरचंदाची लाली पसरल्यासारखे आहे. ध्यान कक्षातही विनय अधून
मधून डुलक्या घेतो .आता ध्यान कक्षाच्या बाहेरही ओट्यावर बसून तो डुलकी घेत आहे.
इथे आता जर विपश्यना शिबिरा ऐवजी एनसीसी कॅम्प असता तर गुरूजनांकडून त्याला रायफल घेऊन
पूर्ण मैदानाला कितीतरी फेऱ्या मारायला सांगितल्या गेल्या असत्या. पण इथे
विपश्यनेमध्ये मात्र आचार्य असे काही सांगत नाहीत.
खोलीत एक कॅलेंडर सुद्धा नाही, जे पाहून घरी कधी जायचे हे कळू
शकेल. मनातल्या मनात दिवसांची गणना सुद्धा तो विसरला आहे. तो कधी आला आणि केव्हा
परत जायचे आहे? वर्तमानपत्र, टीव्ही सुद्धा पाहिल्या जात नाही.
बसून बसून पाठ ,कंबर
भयंकर दुखत आहे. धनुष्यासारखी वाकल्यासारखी झाली
वाटते. अशा परिस्थितीत कुणाला कसे कुठला दिवस आहे हे आठवेल? विनयला तर हे आठवत नाही. दुसऱ्या
कोणाला आठवतही असेल. जर ह्याप्रमाणेच आणखीन काही दिवस तो इथे राहिला तर तो असे
सगळे विसरेल का? विसरून
जाईल आपल्या यशोधरेला आणि पुत्राला? तो
बुद्ध होईल का? बुद्ध
बनून शुद्ध होईल का? बुद्ध
सुद्धा आपल्या कुटुंबाला असेच विसरले होते का? आणि अगदी विसरलेच होते तर ते तप
करताना कोणाला शोधत होते? काही
शोधण्यासाठी तप होते की काही विसरण्यासाठी? कधी कपिलवस्तू, कधी श्रावस्ती, कधी सारनाथ, तर कधी कुशीनगर,गल्ली गल्ली,रस्ते
रस्ते ,नगर
नगर ते सगळं काही विसरत फिरत होते की परत परत आठवत फिरत होते? ते तर स्वतःलाच विसरायला शिकत होते, शिकवत ही होते,स्वतःला विसरून जा. साक्षी भावाने, तटस्थ भावाने स्वतःकडे पहा. दुःख
असो वा सुख, स्वतःला
त्याची जाणीव होऊ देऊ नका. फक्त पहा आणि पुढे जा. किती सोपे आहे हे कोणाला सांगणे
आणि शिकवणे! किती कठीण आहे हे आचरणात आणणे?
खरं सांगा,बुद्ध
तुम्ही याचा कसा स्वीकार केला होता?कसे
शिकले?फक्त
विपश्यने द्वारे?
बरे ,जे
तुम्ही शिकलेच होते, विसरले
होते अगदी स्वतःलाही, तरी
पण मग तुम्ही अनेक वर्षानंतर आपल्या त्या राजमहालात कश्या करता गेले होते? फक्त भिक्षा मागण्यासाठीच? आणि यशोधरे कडून तिचा पुत्रच
मागितलात भिक्षेमध्ये? ही
तुमची साधना होती का,बुद्ध? की यशोधरेचा त्याग?ते असं म्हणतात की तिने तुम्हाला पुत्र दिला देखील ,तिचा एक मात्र आसरा,तिचा प्रिय पुत्र. हे करताना ती असं म्हणाली की ,यापेक्षा अमूल्य आणि याशिवाय माझ्याजवळ आहे तरी काय जे
मी तुम्हाला देऊ? आणि
तुम्ही घेतलात तिचा पुत्र. खरं खरं सांगा बुद्ध मुलाला घ्यायसाठीच तर तुम्ही ‘राजमहालात गेले नव्हते ना?आणि ती संतती मुलगा नसता, मुलगी असती तर तुम्ही भिक्षेत
स्वीकारले असते का? विनय
स्वतःच्याच मनातल्या मनात प्रश्न विचारत होता. एका संध्याकाळी या विषयावर त्याला
आचार्यांशी सुद्धा चर्चा करायची आहे. पण आचार्य मात्र या विषयी वादविवाद चर्चा
करण्यास घाबरतात, ते
म्हणतात इथे चर्चा फक्त विपश्यने बाबत होईल. ते सुद्धा विवादास्पद नाही. फक्त
प्रश्न आणि उत्तर या रूपात होईल.संक्षिप्त स्वरूपात. आणि त्यांच्याकडे प्रश्नाचे
उत्तर फक्त विकार आणि विकार मुक्ती हेच असतात. विनयला हे आवडत नाही.
तो पुन्हा साधनेमध्ये डुबून गेला. शरीर क्लेश विसरून
गेला. मनाने आता वैरागी होत चालला.आता वैराग्याशी अनुराग झाला. आता तो श्वासाला
फक्त येता जाताना, साक्षी
भावाने पाहायला शिकत आहे. आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांचा व्हिडिओ प्रवचन त्याला
आवडत आहे. आचार्य आपली प्रत्येक गोष्ट सांगताना तार्किक कशा उपकथानकांची ही जोड
देतात. तर्हेतर्हेच्या कथा. मनोरंजक. अगदी आचार्य रजनीश यांच्या शैलीत.पहिले कथा
मग तर्क आणि मग अकाट्य तर्क. जणू काही आपण त्या गोष्टी नंतर गाठ बांधावी. परत
विसरू नये.कथानकात बुडलेल्या गोष्टी अगदी अंतर्मनाला, हृदयाला स्पर्श करून जातात. जर ही
कथा स्मरणात राहून जाते तर देहात अथवा मनात उठणाऱ्या प्रतिक्रिया यांना कसे
विसरावे? का
विसरण्याचे नाटक करायचे?
हो मी साक्षी भावाने पहात आहे. खाज सुटत आहे देहाला
आणि मनाला देखील, विसरण्याचे
सोंग सुरू आहे. मग हे ध्यान म्हणजे अभिनय आहे की साधना? विनय मनातल्या मनातच हे विचारत आहे.
आचार्य प्रत्येक चर्चेनंतर अथवा प्रत्येक गोष्टीनंतर जसे संपुट असते वा सूत्र अथवा
घोषवाक्य याप्रमाणे दोनदा, तीनदा
सांगत राहतात, ‘ ही वेळ पण निघून जाईल .’आणि मग विनय प्रत्येक वेळेस मनातल्या मनात स्वतःलाच
विचारतो की जर सगळेच निघून जाईल तर उरेल काय? काळ चांगला असो अथवा वाईट निघून
जातोच. पाणी वाहून जाते पण कातळांवर त्याचे चिन्ह उमटतेच. तर काय हे निशाण ,चिन्ह हेच इतिहास आहे का? म्हणजे इतिहास मागे उरतोच. हारजीत
इथे शिल्लक राहतेच. त्याविषयीच्या कथा इथे राहतातच. मग जेव्हा इतिहास बाकी उरतो.
कथानके,गोष्टी
राहतातच,तर मग
ते निघून काय जाते, बाकी,शेष उरते काय,फक्त दुःख अथवा सुख? की आणखीन काही? आणि या प्रश्नाचे उचित उत्तर त्याला
मिळतच नाही. अगदी मनाच्या कुठल्या ही कानाकोपऱ्यातही नाही.
तो अनुत्तरीत बसला आहे ध्यान कक्षामध्ये. ध्यानामध्ये
व्यस्त आहे. आता तो गोऱ्या, अर्धवट
कपडे घातलेल्या, अर्धवट
उघड्या विदेशी महिलांकडे पण पाहात नाही, नाही
पाहत त्यांच्या शरीराचे उभार अथवा उतार चढाव. शरीराचा ज्वर आणि नशा त्याच्या
मनातून उतरले आहे. ध्यानात रमलेला तो आता साक्षीभावाने स्वतःचे निरीक्षण करू
लागला. त्याला वाटले आपला हेतू साध्य झाला आहे. या शिबीरात तो यशस्वी झाला आहे.
पण हे खरेच आहे का?
खरोखर हे असे नव्हते. खरंतर तो स्वतःवरच नियंत्रण ठेवू
शकत नव्हता? शिबीरात
यश कसे मिळवेल? पण तो
तिथे राहात होता.भले तो तिथे राहायला आला होता परंतु शिबीर त्याच्या शरीरात
नदीसारखे वाहत होते. यावर त्याचे नियंत्रण नव्हते. नदी तर जणू त्याच्या मनात
ताणतणावाचे बीज रोपत होती. स्वतःचे निरीक्षण करण्याऐवजी तो आता स्वतःमध्ये
भिनलेल्या ताणतणावाचे निरीक्षण करत होता. तणावाचे निरीक्षण करता करताच तो ध्यान
मग्न व्हायचा आणि मग पेंगत राहायचा. डुलकी यायची. ध्यानाची ही अशी कुठली नदी आहे
बरं. जी तणावात सुद्धा निद्रेच्या नौकेत बसवून देते. अचानकच आचार्यांची सहयोगी
त्याला हलवून या निद्रेच्या नौकेतून उतरवून घेत असत. सारखं सारखं तो असेच करत असतो. जणू काही
निद्रेची नौका त्याची सहप्रवासी आहे. सुख असो दुःख असो काहीही असो निद्रेची नौका
अत्यंत प्रेमाने त्याला बोलावते आणि बसवते. ध्यानाची नदी तर कधी पार होत नाही पण
नौका, निद्रेची
नौका ध्यानात मिळत राहते. त्या नौकेला तो कधी मनाई करत नाही.झोपेपेक्षा अधिक सुख
कोणते आहे बरे? या
सुखाला का नाकारायचे? नदी
आपल्यात ताण तणाव भरेल, आणि
निद्रेची नौका मिळेल
तर नदी पार होवो ना होवो पण ताणतणाव पार होतो. आणि नदी पार करण्याची शुद्ध आहे
कुणाला? या
अबोल अश्या राजधानीत ध्यानाची नदी आपल्यात ताणतणाव बीजे पेरत आहे, अशा वेळेस निद्रेची नौका मिळून तरी
काय फायदा! शिबिराच्या ध्येयाला, ध्यानमार्गाला
प्रत्येक पावलावर विचलित आणि दिशाभूल करते. मनातल्या कोलाहलाला ही शांतता दाबून
टाकू शकेल काय? लोक
म्हणतात, मौनात
खूप शक्ती आहे. मग मौन मनातील गोंगाटाला, कल्लोळाला
का शांत करू शकत नाही? एखाद्या
शिळेवर समुद्राच्या लाटा आदळून परत फिरतात, त्याप्रमाणेच मनातील पराभूत कल्लोळ
वाढतच आहे. विपश्यनेच्या सुद्धा ताब्यामध्ये नाही वाटते मनातील कोलाहलावर नियंत्रण
.
गलबलाट !
लहानपणी घरात एक पोपट होता. काकांनी आणला होता. का कोण
जाणे पण पोपटाचा पिंजरा काका विनय कडूनच धुवून घ्यायचे. पोपटाला आंघोळ घालताना कैक
वेळा विनयच्या मनात आले पिंजऱ्याचे दार हळूच उघडून ठेवून पोपटाला उडवून द्यायला
हवे. रोजच्या रोज त्याला आंघोळ घालण्याच्या त्रासातून सुटका. पण मग घरात फिरणारी मांजर
पाहिले की आठवायचे पोपटाच्या जीवाला धोका होईल. मग तो पोपटाला उडवून लावण्याचा
विचार जवळपास रोजच पुढे ढकलायचा. पोपट मांजरीची शिकार होऊ नये. कदाचित आता तर पोपट
उडायचेही विसरला असेल. कारण बंद खोलीमध्ये पिंजरा उघडून पोपटाला फेरफटका मारायला
लावायचा हा त्याचा खेळ होता. पिंजऱ्यातून बाहेर आल्यावर पोपटही लहान बाळासारखा
ठुमक ठुमक करत चालायचा.इतके की अगदी, ठुमक
चलत रामचंद्र बाजत पैंजनिया!
ह्या भजनाची आठवण यायची. पण पोपटाला खोलीत उडता यायचे
नाही. मग काय तो उडणे विसरून गेला असेल? की
मोकळी हवा मिळत नव्हती म्हणून तो उडत नसेल? त्याच दिवसांत काकाला सप्ताहामध्ये
एक दिवस मौन व्रत राखण्याचा विचार सुचला होता. कोणीतरी त्यांना सुचवले होते की एक
दिवस मौनव्रत धारण केले तर खोटे बोलणे कमी होते. मन शांत राहते इत्यादी इत्यादी
दिवसभर मौनव्रतात राहून रात्री आळणी भोजन करून ते उपास,मौनव्रत सोडत असत. बहुतेक वेळेस दूध पोळी अथवा शिरा
पुरी खात असत. पण विनयने पाहिले होते काका मौन व्रतामध्ये संकेतांद्वारे जास्त
खोटे बोलत होते. जसे की त्यांना कोणी विचारले अमुक अमुक इसमाला आता आपण पाहिले काय? भलेही त्यांनी पाहिले असेल, संकेत आणि हात हलवून अथवा डोके
हलवून, मान
फिरवून मना करून नकार सांगत. या तऱ्हेने ते बोलत तर नव्हते ,पण खोटे मात्र भयंकर बोलत होते. त्यांच्या मौनव्रताचे ,खोटे न बोलण्याचे व्रत ते वारंवार तोडत असत. जास्तीत
जास्त तोडत असत. पण त्यांच्या मनामध्ये मात्र हा भाव होता की एक दिवस तरी ते
खोट्या पासून वाचले
मनात हा असा
कोलाहल असला तर कोणी काहीच करू शकत नाही, विनय सुद्धा नाही.
विपश्यना शिबिरामध्ये विनय सुद्धा आपल्या मौनाच्या गडबड गोंधळाला सांभाळू शकत नव्हता.
मनाचा बांध आता गळून गळून तुटत आला होता. मनातला गलबला मात्र तीव्र वेगाने वाहत
होता. शारीरिक वेदना आता सहन करण्याजोग्या झाल्या होत्या. ध्यानाचाही आनंद मिळत
होता .परंतु मनातल्या कोलाहलाचा सूर मात्र वाढलेला.
संध्याकाळचे ध्यान सत्र चालू झाले. नेहमीप्रमाणे
सिंगापूरचा साधू सतत ‘उत्तम, उत्तम’ असा जप करत होता. तेव्हा अचानक एक
स्त्री,”तू
काय करशील, तू
माझं काय घेशील तू मला जगू देशील का?”ती
महिला मोठ्या मोठ्या आवाजात ओरडत होती,”मी
पूर्वी सारखी जगणार नाही आता, मी
तुला मारीन,मी
तुला ठार मारून टाकीन, आता
माझी वेळ आली आहे ,माझी
वेळ आली आहे.”ती
आता डोलत होती, चित्र
विचित्र गोष्टी बोलत होती , ती
बेहोश होऊन डोलत होती. पूर्ण ध्यान कक्षातील पिन ड्रॉप सायलेन्स ,टाचणी जरी पडली तरी पण मोठा आवाज होईल अशी शांतता पसरली होती.सगळे सामूहिक
तणावात बुडून
गेले. त्या स्त्रीचा विलाप जणू काही ध्यान कक्षातील छताला तोडून आकाशाला छेद करेल
असा भासणारा होता.त्या महिलेच्या विलापात सर्व ध्यान कक्ष बुडून गेले. सगळे परदेशी
तिच्याकडे तोंड वासून पाहायला लागले. आश्चर्यचकित भाव होता. विनयला काही आश्चर्य
वाटले नाही.त्याच्या लहानपणी त्याच्या गावात असे दृश्य त्याने अनेकदा पाहिले होते.
अनेकदा स्त्रियांना जेव्हा भूतबाधा होते,चुडेल,जाखीणी, डाकिणी
यांची बाधा होते, तेव्हा
लोक मांत्रिकांना बोलवत. चुडेल आणि भूतांना पळवून लावण्यासाठी. हे मांत्रिक लोक
स्त्रियांना मार पीट करून भूत आणि चुडेल यांना हाकलून लावत. धूप , लाल मिरच्या असे पदार्थ ते
धूपपात्रामध्ये आगीत जाळत असत. त्या महिलेच्या तोंडापाशी ते पात्र नेत असतात.
मिरच्यांचा धूर सहन न झाल्याने ती महिला ओरडत असे. मांत्रिक तिला घाणेरड्या
चामड्याच्या जोड्याने मारत असे. तो तिला सतत मारहाण करत असे. महिला झुलत डोलत ओरडत
असे. विचित्र विचित्र गोष्टी ती बोलत असे. “मी आता तुला सोडणार नाही?”असं म्हणत असे. मांत्रिक विचारायचा, “तू कुठून आलीस,कधी जाणार आहेस, लवकर जा.” मग तो काहीतरी विचित्र विचित्र शब्द
बोलायचा. झाड फुक करून तो निघून जायचा. असे बरेचदा, खूप खूप दिवस चालायचे. मग काही
दिवसांनी मांत्रिक चुडेल अथवा भूत निघून गेले आहे असे जाहीर करायचा. पण ती चुडेल
परत त्या स्त्रीला केव्हा पकडेल याचा काही नेम नव्हता.मग परत तेच विषचक्र,
मांत्रिक, धूप, लाल मिरच्या मांत्रिकाचे घाणेरडे
जोडे आणि तीच आग. ती स्त्री विवश व्हायची. तिच्या डोक्यावर चामड्याच्या जोड्यांचा
मार बसायचा. मग ती हार मानून बेशुद्ध व्हायची.
का कोण जाणे पण चुडेल तरुणींच्याच शरीरात प्रवेश करत.
कधीकधी ब्रह्म सबंध याचेही नाव घेतले जायचे. त्या तरुणींचे प्रौढत्व आल्यानंतरच
चुडेल,चेटकीण
आहे, भूत
आहे की ब्रह्मा आहे यांचे खरे स्वरूप उघड व्हायचे. काही स्त्रियांचा मानसिक त्रास
चुडेलच्या स्वरूपात बाहेर पडायचा. काही स्त्रियांना हिस्टेरिया झाला होता. काही
मुली बालपणीच लग्न झाल्या नंतर गौन्याची, सासरी
जाण्याची वाट पाहत, वासनेच्या
आगीचे असे प्रदर्शन करत. काही तरुण स्त्रियांचे पती मुंबई, कलकत्ता मोठ्या शहरांमध्ये कामाला
जात होते, तिथून
ते अनेक वर्ष परत यायचे नाहीत.. अशा स्त्रियांची देखील शारीरिक गरज होती. काही
स्त्रियांचा अवैध गर्भपात करण्यासाठी चुडेल, भूत, ब्रह्म हे बहाणे करून झाड फुक आणि
मारपीट असे नाटक करावे लागे. अशा परिस्थितीत मांत्रिक त्या स्त्रीला लाथा मारत
असे. कधी कधी पोटावर सुद्धा लाथ मारत असे. जवळपास सगळ्याच गावांमध्ये भूत, चुडेल, ब्रह्मभूत यांच्या कथा रंगत.
त्याकाळी ही अगदी सामान्य बाब होती. पण अनेक वर्षांपासून हे सगळे काही नाहीसे झाले होते. बऱ्याच दिवसानंतर
तो हे ह्या विपश्यना ध्यान सत्रात पाहत होता. ग्रामीण पार्श्वभूमीतील ती स्त्री
निम्न मध्यमवर्गीय होती. सावळी, सामान्य
दिसणारी स्त्री,तिच्या
सारख्याच तिच्यासोबत आणखी दोन डोक्यावरून पदर घेतलेल्या बायका होत्या. तिचा मानसिक
ताण तणाव कमी होण्याकरताच तिच्या कुटुंबाने तिला विपश्यना केंद्रात पाठवले असावे.
या तिन्ही स्त्रिया स्थानिक असल्यासारखे दिसत होत्या. त्यांचे बोलणे,त्यांचे कपडे तेथील लोकांसारखेच होते.
हे सर्व घडत असताना तिथे उपस्थित असलेले आचार्य हेही
क्षणभरासाठी स्तब्ध झाले. ध्वनी मुद्रिका वाजतच होती .ध्यानाचे निर्देश देणे सुरू
होते. आचार्य लगेच सक्रिय झाले. लगेचच त्यांनी संबोधन करून सर्वांना सांगितले
तुम्ही सर्वजण ध्यान सुरू करा ,डोळे
बंद ठेवा ,श्वासावर
नियंत्रण ठेवा. श्वासाची जाणीव अनुभवत रहा. इत्यादी इत्यादी. लगेचच तेथील
कार्यकर्त्यांनी त्या स्त्रीला धरले. ती म्हणत राहिली,”मी कुठेही जात नाही, मी सारं काही सांगते ,मी तुम्हाला सर्व काही सविस्तर सांगते.”अतिशय व्याकुळतेने तरीही त्यात संतापाने ती बोलत होती.
त्या महिलेचा धीर आणि संयम संपला होता.कार्यकर्त्यांनी तिचे काहीही ऐकले नाही.
तिला ध्यान कक्षातून बाहेर आणले. तिच्या समवेतच्या दोन बायकाही नाराजीनेच चिडून
उठल्या.तिच्यासोबत बाहेर जाण्याची त्यांची इच्छा होती. आचार्यांनी त्यांना तिथेच
थांबवले आणि म्हणाले ,”तुम्ही
इथेच थांबा, ध्यान
सुरू ठेवा.” त्या
दोघी स्त्रिया तिथेच थांबल्या. असहायपणे त्या स्त्रीला ध्यान कक्षाबाहेर नेणे पाहत
राहिल्या. जणू काही त्या बळीच्या बकरीची आई आहेत त्या दोघीही. म्हणतात ना,बळी जाणाऱ्या बकरीची आई किती काळ प्रार्थना करू शकेल?
ही म्हण आता उचित ठरत होती.सोबत असलेल्या दोन्ही
स्त्रियांना त्या स्त्रीचे दुःख ,संताप
आणि वेदना माहितीच असणार.
काय बरे दुःख असेल त्या स्त्रीचे?
डोळे बंद करून विनय देखील त्या स्त्रीच्या ध्यानात
बुडून गेला. तो विचार करत होता डोक्यावरून पदर घेतलेल्या त्या खेडवळ स्त्रीला
कोणता बरे असा ताणतणाव आहे जो तिला विपश्यना शिबिरापर्यंत घेऊन आला.ही सुद्धा
यशोधरा तर नाही ना? आपल्या
बुद्धापासून दूर झालेली यशोधरा. तिचा सिद्धार्थही तिला सोडून गेला आहे का? ते आपल्या बुद्धाच्या विरहाचे दुःख
तिने झुलत डोलत सांगितले असेल . पण ध्यान सत्र मात्र सुरूच होते. निर्बाध. श्वासावर नियंत्रण करत करत विनय
ध्यानस्थ झाला. इतका की तो निद्रेच्या नौके वर स्वार होऊन त्याच्या गावाला पोहोचला
देखील. मांत्रिक एका तरुणीला त्याच्या जोड्यांनी मारत आहे. धडाधड मारणे सुरूच आहे.
सगळ्या शक्तीनिशी ती स्त्री ओरडत आहे “मी
जाणार नाही.” विनय
आता गाढ झोपेत घोरत आहे ,ध्यान
सत्र चालू आहे. एक कार्यकर्ता त्याला हलवत आहे. ध्यान सत्र संपले.
ध्यान सत्र संपल्या नंतरनंतर दोन-तीन जण तिथेच थांबले.
आचार्यांकडून काही आपल्या प्रश्नांवर उत्तरे जाणून घेण्यासाठी उत्सुकतेने थांबले
होते. एक एक करत वेगवेगळ्या गोष्टी आचार्यांना विचारत होते. हळूच एका माणसाने
विचारले ,”त्या
स्त्रीचे काय झाले?”
“काही
नाही,” आचार्यांनी
संक्षिप्त उत्तर दिले “ मानसिक
विकार होता तिच्या मनात,विकार
निघून गेला.”
“असा
कधी कोणाचा मानसिक विकार निघून जातो का?”तो
आचार्यांना विचारू इच्छित होता पण तो विचारत नाही. चुपचाप उठून चालायला
लागतो.आचार्य म्हणतात,”तुम्हाला
काही विचारायचे होते का,” नकारार्थी
डोके हलवून तो हात जोडतो. आचार्य ही धन्यवाद ,धन्यवाद म्हणून निरोप घेतात.
आचार्य स्वतः सुशिक्षित आहेत. अभियंता असून एका मोठ्या
संस्थेत उच्च पदावर नियुक्त आहेत. विपश्यनेसाठी दरवर्षी ते नोकरीतून काही दिवस रजा
टाकून कुठल्या ना कुठल्या शिबिरामध्ये आचार्य म्हणून उपस्थित राहतात. आचार्यांनी
आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांच्याकडून विपश्यना पद्धती शिकवण्याची दीक्षा घेतली
आहे. ते विपश्यनेसाठी समर्पित आहेत. निशुल्क. प्रवासाचा येण्या-जाण्याचा खर्च ते
स्वतः करतात. त्यांचा हेतू एकच आहे विपश्यनेद्वारे सामान्य लोकांच्या जीवनामध्ये
सकारात्मक बदल घडवणे. आचार्यांच्या चेहऱ्यावर संतोष आणि समाधानाच्या रेषा दिसून
पडतात. ध्यानाच्या वेळेतही ते अतिशय कमी बोलतात. बहुतेक वेळेस तर सूचना, निर्देश, पद्धत हे ध्वनी मुद्रिके द्वारे
सांगितले जातात. आचार्य परीक्षांमधील इनव्हिजिलेटर,परीक्षक सारखे उपस्थित असतात. ध्यान व्यवस्थित करत
नसतील तर त्यांना ते समजावून सांगणे, त्यांच्याकडून
करून घेणे हे करतात. शिस्त राखतात. बहुतेक लोक शिस्तीत राहतात जसे सूर संगीत आणि
वाद्याला धरून ठेवतात. कोणी एखाद दोन ,विनय
सारखे अव्यवस्थित असलेच तर आचार्य त्यांना ठीक करतात .करतच राहतात. अगदी तसेच जसे
लोकसभा अध्यक्ष लोकसभेत मंत्री आणि खासदार, सदस्य यांचे व्यवस्थापन करतात.
तो आचार्यांपासून दूर गेला. वाफ्यात लावलेल्या
फुलकोबीच्या फुलाकडे पहात, त्या
स्त्रीच्या विलापामध्ये बुडाला आहे. अचानकच एक चिमणी उड्या मारतच कोबीच्या फुलावर
येऊन बसली. पंख फडफडत होते .बेचैन वाटत होती. ही चिमणी देखील तिच्या बुद्धाच्या
विरहात तळमळत होती का?
कुणास ठाऊक!
सिद्धार्थने जेव्हा घर परिवार सोडले तेव्हा तो एकोणतीस
वर्षाचा होता. नवजात शिशू राहुल, पत्नी
यशोधरा, आई-वडील, राज्य सारे काही मागे टाकून गेला.
त्याच्या मनात काही क्लेश होते का? पण
सिद्धार्थ गेल्यावर यशोधरेच्या मनात जी वेदना झाली त्याचे काय? ती कालवाकालव, त्याचे काय? नवजात शिशु राहुल यालाही त्रास झाला
असेल का? त्याच्या
वडिलांपासून दूर होण्याचा त्रास?
त्याला सीतेची आठवण येते .लक्ष्मण जेव्हा तिला जंगलात
सोडायला गेला लक्ष्मण वनात पोहोचल्यावर अचानक रथ थांबवतो.रथातून सीतेला उतरवताना
लक्ष्मण सांगतो, माझ्या
भावाचा आदेश आहे की मी तुम्हाला इथे सोडावे. परंतु सीता विचलित होत नाही. कारण
लक्ष्मण तिच्यासोबत आहे. पण लक्ष्मण रथात बसतो, समोर जायला निघतो, तेव्हाही सीता विचलित होत नाही, लक्ष्मण अचानक नजरेच्या टप्प्या
बाहेर जातो नंतर त्याचा फक्त रथ दिसत राहतो सीता तेव्हाही विचलित होत नाही. रथ
दिसेनासा होतो पण रथावरचा ध्वज दिसतो. जोवर रथाचा ध्वज दिसतो तोवर सीता अविचल
असते. शेवटी रथाचा ध्वजही दिसेनासा झाला, सीता
शोक करायला लागते. इतका जोरात हंबरडा
फोडून रडते की कुरणावर गवत चरणारे हरीण तोंडातील गवत
टाकून देते. आकाशात विहरणारे पक्षी थांबून जातात. झाडाच्या फांद्या एकमेकावर
घासल्या जातात. सारे अरण्य सीतेच्या शोकामध्ये डुबून जाते. सारं वन सीतेसोबत विलाप
करू लागते.
सिद्धार्थ यशोधरेला सोडून गेले तेव्हा लुंबिनी शहर
यशोधराच्या विलापात डुबले होते का? यशोधरेच्या
शोकामध्ये लुंबिनी शोकग्रस्त झाली का? काहीच
उत्तर नाही.
आणि मग आता ध्यान कक्षामध्ये जेव्हा ती स्त्री दुःख
व्यक्त करत होती, तेव्हा
किती लोक तिच्या दुःखात सामील
झाले? की
नाही झाले? इतके
तटस्थ झाले का,विपश्यनेच्या
रंगात रंगून गेले! श्वास उच्छ्वासाच्या गतीत इतके रमले की दुःखाची संवेदना ही
सुन्न होऊन गेली. इतकी सफल विपश्यना! मग तर खूपच छान. मैथिलीशरण गुप्त यशोधरेवर
लिहितात :
सखि, वे
मुझ से कह कर जाते,
कह, तो
क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?
सखी ,ते
मला सांगून गेले असते तर
काय मी त्यांना अडवले असते?
मी त्यांच्या मार्गात बाधा ठरले असते?
मुझको बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते
सखि ,वे
मुझसे कह कर जाते।
ते माझा आदर करत होते पण त्यांनी मला पूर्णपणे ओळखले
होते का ?
मी तर नेहमीच त्यांच्या मनातील विचारांना प्राधान्य
दिले.
सखी,ते
मला सांगून गेले असते…,
यशोधरेच्या संवेदनेमध्ये मैथिलीशरण गुप्त इतके हरवले
जातात की या कविते मार्फत ते बुद्धाला पलायनवादी सिद्ध करतात. लोक बुद्धाला पळपुटा
म्हणतात. जेव्हा की बुद्ध महिनोंमहीने संन्यासाची तयारी करत आहेत. यशोधरेला सोबत
घेऊनच सगळी तयारी करत आहेत. यशोधरेची संमती घेऊनच ते घर सोडतात. जेव्हा रात्री
सिद्धार्थ घर सोडून जातात, यशोधरा
जागी असते. परंतु एका कवीच्या कवितेची ताकद त्याला पळपुटा घोषित करते. सिद्धार्थने
पत्नीचा त्याग करायला नको होता. परंतु पळपुटा?
मग या स्त्रीच्या शोकात ही काही रहस्य आहे का? बुद्ध काय रहस्य नाहीत? रहस्यच आहे ही विपश्यना देखील.
रात्रीच्या प्रवचनाच्या चित्रफीतीत, वीडियो
सत्रात त्याचे लक्ष नव्हते. तो उदास होता. रात्री धड झोपला सुद्धा नाही. वारंवार
ती विलाप करणारी स्त्री त्याच्या डोळ्यापुढे येत होती. कधी ती स्त्री तर कधी
यशोधरा. तर मग काय तो सुद्धा याच पद्धतीने त्याच्या पत्नीला सोडून नाही आला का!
आपल्या पत्नीचा शोक, आपल्या
पत्नीचे दुःख तो नीट ऐकून तरी घेतो का! विना आकांताने सुद्धा शोक करतात स्त्रिया.
हे काय त्याला माहिती नाही. माहित आहे.मग पत्नीचा आक्रोश न ऐकल्या सारखा तो का
वागतो? यशोधरेचे
दुःख त्याला समजते. विपश्यनेत आलेल्या या स्त्रीचा टाहो त्याला अस्वस्थ करत आहेत.
सर्व बाजूंनी आपले मन तो घुसळून काढतो. जशी कोण एखादी स्त्री दह्याला रवी लावते
आणि घुसळून काढते. पत्नीचा तर सोडाच पण स्वतःच्याही दुःखाला त्यांनी कधी वाचा
फोडली का? जेव्हा
की त्याच्या ही मनात आक्रंदनच आक्रंदन आहे . कुणाच्या आयुष्यामध्ये आकांत नाहीये? तो विचार करत राहतो पडल्या पडल्या ,कड बदलत राहतो. पहाट होते. घंटा वाजवल्या जातो. सवयी
प्रमाणेच तो उठत नाही. जागा असूनही उठत नाही. हे कुठले दुःख आहे? स्वतः स्वतःला उत्तर देतो आळसाचा
शोक, हाहा:कार.
फक्त विपश्यने मधेच दुःख नाही. आळसामध्ये देखील दुःख आहे. आळसाचे सुद्धा वेगळेच
सौंदर्यशास्त्र आहे. हे अगदी कमी लोक जाणतात. त्याच्या दरवाज्यावर कार्यकर्ता घंटी
वाजवत आहे. सतत. तो उठतो. हात जोडून त्याची क्षमा मागतो. हसत हसत कार्यकर्ता तिथून
निघून जातो.
ध्यान सत्रात तो उशिरा पोहोचतो. आचार्य त्याच्याकडे
रोखून पाहतात. हा कोणता शोक आहे. तो पाहतोय काल आकांत करणारी स्त्री आज अनुपस्थित
आहे. तिच्या सोबतच्या दोन स्त्रिया मात्र उपस्थित आहेत. आता डोळे बंद करून तो
ध्यानात मग्न होण्याचा विचार करतो. ध्यानमग्न झाला आहे. ध्यानात सुद्धा निरंतर
आक्रोश सुरू आहे, जसा
मुसळधार पाऊस.अचानक त्याचे ध्यान
भंगते. डोळे उघडतात. एका गोऱ्या रशियन स्त्रीच्या
बेचैन करणाऱ्या वक्षांवर त्याची नजर स्थिर झाली. तिचे बिना बाहीचे बाहू जणू त्याला
बोलवत होते. अशा परिस्थितीत तो काय ध्यान करणार? जेव्हा मन देह आकर्षणात रमते ,तेव्हा ध्यान भंगून जाते .सगळा शोक शांत होतो. सारी
विपश्यना
लयाला जाते. नष्ट होते.
नाश्त्याची वेळ झाली आहे. ती पहा भरगच्च वक्षांची
स्त्री त्याच्याच मेज वर येऊन नाश्ता सुरू करते. एखाद्या फुलाप्रमाणे प्रफुल्लित
ही गोरी स्त्री आपल्या भाषेपासून तर खूप दूर आहे परंतु तिची देहबोली आव्हानात्मक
आहे. कोवळ्या कोंबाप्रमाणे तिचे बाहू त्याला उत्तेजित करत आहेत. ह्या भोजन
कक्षामध्ये ते दोघं इतरांच्या ध्यानाचे लक्ष बनले आहेत. जणू इथेही ध्यान सत्र सुरू
आहे. स्त्री सौंदर्याच्या मोहाचा अभिशाप आहे.स्त्रिया नेहमीच त्याला भुरळ घालतात .खूपदा तो
विचलित होतो. ही त्याची वृत्तीच त्याला सुख देते.चुपचाप. ही सुखद अस्वस्थता या
मुक्याच्या राजधानी मध्ये खूपच अर्थपूर्ण झाली.
ही कुठली गडबड? कोणता गोंगाट? गोंगाट आहे की रडारड? की या दोन्हीच्या मधील अजून काही!
विपश्यना तर नाहीच ना! मग काय आहे ?आहे
काय हे?
नाश्त्याचे ताट धुण्यासाठी तो सिंक जवळ उभा आहे, या रांगेत आपल्या पाळीची वाट पाहत
होता. आपले उष्टे खरकटे भांडे धुवून ,कोरड्या
फडक्याने पुसून ठेवायचे, सगळ्यांसाठीच
समान रूपात, अनिवार्य
असा हा नियम आहे. भांडी घासायचा त्याला अनुभव नाही. पण इथे मात्र रोजच भांडी
घासावी लागतात. तो पाहतो गोरी रशियन स्त्री स्वतःचे ताट घेऊन त्याच्या बाजूला उभी
आहे. तिच्या हसण्यामध्ये मार्दव आहे. डोळ्यांत आतुरता. उपाशी देहाची व्याकुळता.ती
अशी भेटते आहे की जशा काही सोशल मीडियावर स्त्रिया भेटतात.अपरिचित समुद्रामध्ये
गोता मारत,परिचयातून
मोती शोधत आहे. संकोच्याच्या असीम समुद्रात हरवलेला विनय स्त्रीच्या या लाजाळू
वर्तवणुकीला आणि हावभावाला नीट समजून घेऊ शकत नाही. तश्याही
स्त्रिया नेहमीच अनाकलनीय , अपठनीय वाटत असतात. जसे त्याचे नाव
विनय आहे. तसेच विनय भावाने परिचित मोती शोधत स्वतःला हरवून जाणे त्याला सोयीस्कर
वाटते.
सोशल मीडियावर अश्लीलतेची बैटिंग तो करू शकत नाही.
त्याला आवडत नाही. वास्तविक जीवनात सुद्धा त्यालाही शक्य नाही. त्याच्या नम्र
वागण्याने सगळ्या वासना नष्ट होतात. ही स्त्री तर रशियन,समुद्रापारची. विनयच्या विनयशील,सोज्वळ आयुष्यामध्ये ही स्त्री का कोण जाणे पण एक लाट
बनून आली आहे. भरभरून आलेली लाट. तिच्या मोहक सौंदर्यामध्ये ती न्हाऊन निघाली आहे.
कृपाळू झाली आहे. भांडी धुताना तिचे लुसलुशीत,मांसल बाहू ,त्याच्या
बाहूंना स्पर्श करतात. पुन्हा पुन्हा.तिचे नितंब त्याच्या मांडीला स्पर्श करतात.
अचानक. विनयला त्या स्त्रीचा मादक स्पर्श जाणवतो. त्याला त्याचे सुखही जाणवते.
भांडी घासताना तिच्या वर उठणाऱ्या, खाली
झुकणाऱ्या, डुलणाऱ्या
स्तनांवर तो मोहित होतो. पण विनयला स्वतःच्या पद प्रतिष्ठेची जाणीव आहे. त्यालाही
जाण आहे की या शांतीच्या राजधानीत आवाज भलेही अनुपस्थित आहे, पण दृष्टीचा कॅमेरा,ध्यान आणि श्वास याहीपेक्षा खूप जास्त सक्रिय आहे. इथे
अन्य साधकांचे डोळ्यांचे कॅमेरे लॉन्ग शॉट, क्लोज शॉट घेण्यासाठी तैनात आहेत.
तो एकदम सतर्क होतो.या विपश्यनेच्या शिबीरामध्ये त्याला एक पात्र बनायचे नाही.
चर्चेचा विषय व्हायचे नाही. मग समुद्राच्या या लाटांचे काय? लाटांचे काय त्या तर येतील आणि
जातील. स्त्रियांना पाहून मनात उठणाऱ्या लहरी कधी कुठे नेऊन सोडतील कोणास ठाऊक!
भांडी धुवून, विसळून, कपड्याने पुसून योग्य जागेवर ठेवून
घाई घाईने तो भोजन कक्षाच्या बाहेर येतो. सरळ आपल्या खोलीमध्ये येऊन थांबतो.
बिछान्यावर बसताच , तो
त्या अनाम, अपरिचित
स्त्रीच्या मादक स्पर्शामध्ये रमून जातो. डोळे बंद करतो. असे की जसे ती रशियन
स्त्री त्याच्या आलिंगनात आहे. तो पलंगावर पहुडतो. आताच्या या क्षणाच्या
प्रेमाच्या अनुभवामध्ये तो हरखून जातो. जसे तो आताही भांडे धूत आहे. त्याला ध्यान
कक्षात पोहोचायचे आहे .परंतु तो आता बिछान्यात पहुडला आहे. झोपेच्या विळख्यात.
आलिंगनबध्द आहे जणू काही, रशियन
सुंदरीच्या विलक्षण लावण्यात.जशी ती आता या बिछान्यात त्याच्यासोबत आहे.
प्रेमाच्या आकाशात विहरत आहे. जसा तो एखादा झुला आहे आणि त्या झुल्यावर बसून ती
रशियन सुंदरी झुलत आहे. प्रेमाच्या आकाशाला स्पर्श करण्याची तिची लालसा.तो असाच
स्वप्नाच्या आधीन झाला. तो झोपेत घोरत आहे आणि खोलीच्या बाहेरून कार्यकर्ता रुणझुण
घंटी वाजवत जात आहे. ध्यान कक्षात सगळ्यांना बोलावण्या साठी वाजणारा मोठा घंटा
केव्हा वाजला त्याच्या लक्षात आले नाही. लोक नाश्ता झाल्यावर स्नान करतात. तो
झोपतो. अगदी दररोज. कारण की अगदी पहाटे उठून दैनंदिन कार्यक्रमा नंतर स्नान करून
क्षणभर का होईना पूजा करूनच तो ध्यान कक्षात पोहोचतो. पहाटे नाहण्याचा एकच त्रास
आहे की इथे इतक्या थंडीत सुद्धा गरम पाणी मिळत नाही. बाथरूम बिना गिझरचे आहे.
पहाटे पहाटे स्नानासाठी लाकडं पेटवलेल्या चुलीवरचे कोमट पाणी मिळते.पण गरम
पाण्याच्या भानगडीत तो त्याचा स्नानाचा नियम बदलत नाही. थंड पाण्याने अंघोळ सहन
करतो या हिवाळ्यातही.. अंगावर पाणी घेतल्याबरोबर डोके सुन्न होते. शरीर थरथर
कापायला लागते. पण काय करणार? पूजेचे
देखील असेच आहे. कुठल्याही तर्हेच्या पूजेवर इथे सक्त मनाई आहे. काय तर म्हणे की
ध्यानामध्ये अडथळा येतो आणि ध्यान खंडित होते. एक साथ दोन पद्धती बरोबर नाहीत. मन
उदास होते. तो मनातल्या मनातच पूजा करतो आणि हात जोडतो. मनावर कोण सक्ती करणार आहे? मनावर आणि प्रेमावर कुठले निर्बंध
कधी चालले ,जे
आता चालतील. आंघोळ न करता ध्यान करणे हेही त्याला जमत नाही, समजत नाही.
एकदा तो दार्जिलिंगला गेला होता. एका पहाटे टायगर
हिलवर सूर्योदय पहायचा होता.अगदी पहाटेच निघायचे होते. सूर्योदय पाहणे सुद्धा बिना
स्नानाचे त्याला मान्यच नव्हते. स्वतः तर आंघोळ केलीच केली पण मुलांच्याही मागे
लागला.थोडा उशीर झाला. हॉटेल मधील कर्मचारी आणि टॅक्सीवाला सगळे ओरडत होते.लवकर
चला,फोन
करून सांगत होते.थोडा थोडका नव्हे बराच उशीर झाला होता. सूर्योदय पाहिला तो
स्नानानंतरच, टायगर
हिलवर. बिना स्नानाची सूर्याची उपासना कशी करणार. जेव्हा टायगर हिलवर पोहोचला
तेव्हा सूर्याची लालीमा पसरत चालली होती. कांचनगंगेच्या बर्फाच्छादित पहाडांवर
सूर्याचा उदय आज किती तरी वर्षानंतर सुद्धा मनाला तजेला देत आहे. जसा काही एखाद्या
वाडग्यातला सूर्य. पांढऱ्या शुभ्र वाडग्यात लाल लाल सूर्य. सूर्य जसे एखादे तान्हे
बाळ. मन आनंदित होऊन गेले निसर्गाच्या या प्रार्थनेवर. सूर्याच्या लालीमेवर. नंतर
माहिती झाले की लोक सूर्योदयाच्या पूर्वीच रात्रीपासूनच तिथे पोहोचून तळ ठोकून
थांबले होते. सूर्योदयाच्याही अगोदरच. सूर्योदय झाल्याबरोबर ते चहा,पकोडे ह्यावर तुटून पडले. इतर पर्यटकांसाठी टायगर
हिलवर सूर्योदय देखील सहलच होती. विनय साठी सूर्योदय ही सूर्याची उपासना होती.
सूर्याला नमस्कार करायचा होता. ‘उगवत्या
सूर्याला नमस्कार’ या
वाक्प्रचाराला बाजूला सारून भक्ती भावाने त्याला सूर्याला नमस्कार करायचा होता.
यासाठीच विना स्नानाचा तो तिथे गेला नाही. पारोश्याने तो काही खात पित ही नाही.
स्नानानंतरच त्याची सकाळ चालू होते. स्नानानंतरच दिवस
चालू होतो. अगदी केव्हाही उठला तरी. लवकर उठो अथवा उशिरा. म्हणूनच या विपश्यना
शिबीरात नाश्त्यानंतर त्याला झोपायचे असते. स्नान नाही. झोपून तो उठतो आणि सरळ
ध्यान कक्षात जातो.
ध्यान कक्षात गेल्यावर पहिले तो रशियन सुंदरीला शोधतो.
आणि लगेच त्याला ती दिसते ही. स्मित हास्य करत. जणू ती त्याचे स्वागत करत आहे
आपल्या दैवी स्मिताने. आचार्य त्याचे ते रशियन स्त्रीकडे पाहणे आणि त्या रशियन
स्त्रीचे विलोभनीय हास्य आपल्या डोळ्यांच्या कॅमेऱ्यामध्ये कैद करत आहेत. भोजन
कक्षामधील कॅमेऱ्यांनी त्यांच्यापर्यंत ही गोष्ट पोहोचवली होती का?
कोण जाणे?
आज विनयचे मन ध्यानात जरा जास्तच लागले. ध्यानाचा
त्याला स्वादच चाखायला मिळाला. श्वास अन श्वास त्याला प्रेमाने भिजलेला मिळाला.
श्वास आणि श्वासाची जाणीव सुद्धा स्वर्गीय अनुभूती देत होता. तिच्या नजरेत आणि
बाहूंच्या आलिंगनात विनय बद्ध होता. श्वासाच्या अथांग सागरात तिचे वक्ष म्हणजे जणू
एखादी नौका. श्वासोच्छवास सुरू आहे.तो विचार करत आहे, स्त्रिया प्रेम करतात तेव्हा समजून
येते परंतु प्रेमावर वार्तालाप करतात तेव्हा हसू येते. प्रेम कृतीने करता येते,केवळ बोलण्याने नाही. प्रेमाची कुठली व्याख्या नाही.
प्रेमाची कुठली निश्चित ठरवलेली अशी चौकट नाही. अगदी असंच करा तर होईल, अथवा होणार नाही. प्रेमाची कुठली
काही एक वाट नाही. प्रेम महामार्ग पण असू शकते, पाऊलवाट देखील,खड्डया खड्ड्यांची सडक सुद्धा,अरुंद गल्ली सुद्धा, शेत पण,तलाव पण, बाग
पण, आकाश, धरती, पाणी कुठलाही मार्गाने प्रेम मिळते.
हवा पण, चंद्र, तारे, सूर्य पण, विपश्यनापण. विपश्यनेत देखील
प्रेमाचे असे आकाश अचानकच उपस्थित होऊ शकते. विपश्यनेला परत धुंडाळून आणून धुवून
पुसून स्वच्छ करून उपस्थित करणाऱ्या आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांनी सुद्धा कधी
विचार केला नसेल.होऊ शकतं कुठलाच मार्ग दिला नसेल प्रेमाला. सगळे रस्ते बंद होऊ
शकतात. पण मिट्ट काळोखात देखील वाट मिळतेच प्रेमाला. इच्छा आणि मार्ग यामध्ये अंतर असू शकते किंवा नाही पण.
प्रेम म्हणजे सेक्स नाही म्हणजे या तऱ्हेने अथवा त्या
तऱ्हेने होऊ शकते अथवा कुठल्याही तर्हेने असे नाही. प्रेम तर जगजीत सिंगची गायलेली
कोणती गझल ऐकून सुद्धा होऊ शकते. पण प्रेम म्हणजे जगजीत सिंग ची गायलेली गझल
सुद्धा नाहीये. प्रेम तर उशी वर सापडलेला एखादा केसही नाहीये , कधी सापडतो ,कधी नाही..उशीवर सापडलेले काजळ ही नाही. प्रेम काजळाची
बारीक रेघ होऊ शकते . उन्नत वक्षांमध्ये, स्पंदन
करणाऱ्या हृदयासारखेच धक धक करणारे कुणा स्त्रीचे नितंब पण असू शकते ,कुणाच्या आवाजातही, कुणाच्या शैलीतही. किंवा हे असे
काहीच नाही. प्रेम म्हणजे एखादी खार. प्रेम म्हणजे बुलबुल, कोकिळा, फुलपाखरू सुद्धा. ते कधी कुठे गाईल
आणि कधी गुलाबाच्या काट्यासारखे रुतेल, कोण
जाणते ! तुम्ही नाही ,आम्ही
नाही,अगदी
लता मंगेशकर ही नाही .प्रेम एक अनंत अबोध यात्रा आहे. समजून ऊमजून प्रेम यात्रा
होत नाही. ही यात्रा तर फक्त होते तर होते.नाहीतर नाही होत.प्रेम घडले तर आनंद
असतो .अलौकिक. एका गझलेतील एक मिसरा आहे ना, इधर तो है सब जल्दी जल्दी, उधर आहिस्ता आहिस्ता …तर आहिस्ता आहिस्ता सुद्धा एक प्रकार आहे आणि जल्दी
जल्दी वर काय बोलणार? बाकी
आपली आपली सुविधा आणि आपली अशी शैली ,आपली
पद्धत असते. प्रेम हळदी घाट अथवा पानिपत सारखी लढाई नाही.इथे कुठला तर्क कामी पडत
नाही. काही लोकांचा छंद असतो, बोलत
राहणे आणि ऐकत राहणे ह्यात मजा घेणे. काही लोक थियरीनेच काम चालवतात. प्रॅक्टिकल
मध्ये त्यांना रस नाही अथवा क्षमता नाही.आपले आपले छंद ,आपल्या आपल्या क्षमता. विनयला प्रॅक्टिकल मध्ये रस
आहे. अश्लीलतेच्या बैटिंग मध्ये नाही.
तर मग आज सकाळपासून जे काय घडत आहे त्या रशियन
स्त्रीसोबत, हे
प्रेम आहे का? विनय
स्वतःला प्रश्न विचारतो आणि उत्तर देतो, ‘काय
माहित? मग
कोणाला विचारायचे?’
शक्य आहे की हे फक्त देहाकर्षण आहे.
त्याला एक लहान मूल आठवतं. एक व्हिडिओ आठवतो. छोटासा
बाळ ठुमकत ठुमकत चालण्याच्या वयातला. चालणे शिकत आहे . एक साथ चार स्त्रिया
डोक्यावरून पदर ,घुंघट
घेतलेल्या, एका
जागेवर ,एकाच
रंगाच्या साडीत उपस्थित होत्या. बाळ या सगळ्या स्त्रियांमध्ये आपली आई शोधत होता.
चार ही स्त्रिया त्याला आईसारख्या जवळ बोलवत होत्या, हाताच्या इशाऱ्याने. इकडे तिकडे
फिरत फिरत तो एका स्त्री जवळ जातो,आई, आई करत. ती स्त्री त्याला उचलून
आपल्या मांडीवर घेणार असते, तेवढ्यात
बाळ उडी मारून सटकतो. मग त्या सगळ्या स्त्रियांमध्ये तो परत आपल्या आईला शोधायला
लागतो. सगळ्या स्त्रिया अजूनही घुंगट ओढूनच आहेत. शोध घेता घेता त्याला त्याची आई
सापडते तिचा हात पकडून तिच्या मांडीवर जाऊन बसतो,आई,आई
करत. हसत हसत ती स्त्री घुंगट मागे करते. खूप आनंदाने बाळाचे मुके घेते. बाकी
स्त्रिया पण आपला आपला घुंगट मागे करतात आणि हसतात. मग प्रेम म्हणजे तर लहान बाळा
द्वारे,घुंगट
घेतलेल्या अनेक स्त्रियांमधून आपल्या आईला शोधणे हेच आहे. प्रेमात लोभ नाही, छळ कपट, गुणाकार, भागाकार, बेरीज, वजाबाकी नाही .शोषण आणि शंका नाही
.प्रेम असे आहे, जसे
छोट्या बाळाचे प्रेम. गवतावर पडलेल्या दवबिंदूंसारखं तजेलदार,पवित्र प्रेम!
रशियन स्त्रीला हे सगळं काही त्याला सांगावसं वाटतं.
पण कसे सांगावे? इशाऱ्याने
सुद्धा संवाद होऊ शकत नाही. रशियन भाषा त्याला येत नाही. तिला हिंदी भाषा येते की
नाही माहिती नाही. इंग्रजी सुद्धा त्याची अगदी तुटकी फुटकी. मग काय करावे?आता कशी स्वतःच्या मनातील गोष्ट तो तिच्या समोर मांडेल? जवळ कागद आणि पेन सुद्धा नाही की
लिहून संदेश देता येईल.मोबाईल सुद्धा नाही की टाईप करून तिला व्हाट्सअप करता येईल.
तर काय एखाद्या झाडाच्या पानावर मातीने अथवा विटेच्या तुकड्याने लिहिता येईल का? मग त्याला आठवतं की लहान बाळ कसा पहिले अर्थ समजावून घेतात
नंतर शब्द आणि भाषा समजतात. मग काय हे सगळं सांगायची व्याकुळता त्या रशियन स्त्री
मध्ये देखील आहे. हे सगळे
अगदी तात्पुरते आहे. तो परत पेंगायला लागला. कार्यकर्ता त्याला हलवून हलवून जागा
करत होता. का कुणास ठाऊक पण विनय जेव्हा जास्त विचार करतो तेव्हा विचारांच्या
गर्तेत निळ्या आकाशापर्यंत पोहोचतो आणि एखाद्या पक्षासारखा घिरट्या घालतो.
ध्यानाचे हे सत्र समाप्त झाले. दहा मिनिटाची सुट्टी
आहे. ध्यान कक्षातून निघून तो एका मोठ्या ओट्यावर जाऊन बसला जिथून त्याला
फुलकोबीचे मनमोहक शेत दिसत आहे.हिरव्यागार पानांच्या मध्ये फुल कोबीचे फुल. आपले
शरीर फुलवत. बाजूलाच झेंडू आणि गुलाबाचे फुल उमलले आहेत. सगळ्यांचे वाफे वेगळे
वेगळे. जसे की एक आनाआहे तर दुसरे पान. आनापान. विनय आता फुलाकडे सुद्धा
विपश्यनेच्या नजरेने पाहतो. ह्या विचाराने तो हसायला लागतो. इतका का विपश्यनामय
झाला आहे? शिबीराचे
व्यवस्थापक सुद्धा शेताच्या दुसऱ्या बाजूला आराम खुर्चीवर बसून पेपर वाचत आहेत कमी आणि उन्हाने शेक घेत आहेत जास्त . तेवढ्यात ती
रशियन स्त्री देखील त्या ओट्यावर दुसऱ्या बाजूस जाऊन बसते.डोळ्यांच्या
कोपऱ्यांमधून तो तिच्याकडे पाहतो, असे
की जणू पाहिलेच नाही. लंडनचा मुलगा आहे त्याच्या समोरून जातो. नेहमीप्रमाणेच,थोडेसे वाकून, हात जोडून नमस्कार करून ,मंद मंद हसत चालत राहतो. ओट्याच्या दुसऱ्या कोपऱ्यावर
वर बसलेल्या रशियन स्त्रीला डोळ्यांच्या कोपऱ्यातून पहात तो निघून जातो. आता ती
स्त्री त्याच्या अगदी समोर आहे. तिचे डोळे बोलके आहेत. अस्पष्ट असे काहीतरी
बोलल्यासारखे वाटते. ओठ बंद आहेत
पॅन्टच्या झिप सारखे. झिप खुलायला उत्सुक. पण खुलत
नाही. एक खार नाचत नाचत येते, त्याच्या
पायांच्या जवळून जाते. त्याला हसू. फुटतं, नाचणाऱ्या खारीला पाहून.त्या
महिलेकडेही तो आता डोळे भरून पाहतो आणि
हसतो. तिचा चेहरा गोलाकार वाटतो . तिची जीभ तिच्या
तोंडात फिरत आहे. दातांच्या मध्ये. हा कुठला आग्रहाचा इशारा आहे का? त्याला तिला एक शेर ऐकवायचा आहे. पण
या मुक्यांच्या राजधानी मध्ये कसे सांगणार? भला थोरला घंटा वाजायला लागतो.
ध्यान सत्रात बोलवले आहे. अशा तऱ्हेने की जसे अजान होते आहे नमाज साठी. ऑफिसमधल्या
एका सहयोगी मित्राची त्याला आठवण आली. त्या सहयोगी मित्राला स्वतःला धर्मनिरपेक्ष
दाखवायची फार वाईट सवय होती. एकदा त्याच्या मुस्लिम मित्रासमोर विनयने सहजच
विचारले,”नमाज
आणि अजान यामध्ये काय फरक?”
तेव्हा त्याने उत्तर दिले खूपच सोपे आहे, “सकाळच्या अजानला अजान म्हणतात
संध्याकाळच्या अजानला नमाज म्हणतात.”
“आणि
दुपारच्या वेळेस,”हसत
खेळत विनयने विचारले. मुस्लिम मित्राला डोळा घालत चूप राहण्याचा इशारा केला.
“आता
याबाबत मला पक्के माहिती नाही की अजान म्हणतात की नमाज,” त्याने निरागसपणाने सांगितले. असेच
एकदा तो आपल्या मुस्लिम मित्राला मोहरम बद्दल अभिनंदन करत म्हणाला , “मोहरम मुबारक.’मुस्लिम मित्र शिया होता. हे ऐकून तो आश्चर्यचकित
झाला. त्याने कपाळावर हात मारला. मग विनयने त्याला विचारले, “मुबारक का म्हणत आहेस ?”
“माझी
मर्जी!” तो भडकला, “माझी मर्जी. तुमच्यासारखा संकुचित
हृदयाचा नाही मी. सणावाराला अभिनंदन, शुभेच्छा
देणे आपले कर्तव्य आहे.”
“अरे ,मोहरम सण नाही .” विनय चिडून म्हणाला.
“मग
काय आहे?”तो
अजूनच संतापला.
“दुःखाचा
दिवस आहे !शोक दिवस आहे!”
“ओह!”मुस्लिम मित्रासमोर हात जोडून “सॉरी!” म्हणत तो चूप बसला.
ह्या
प्रमाणेच त्याला सांगावे लागले की अजान पाच ही वेळेस नमाज पठण करायला असते . अजान
म्हणजे ताबडतोब मस्जिदला पोहोचा.एक तर्हेचा आदेश ,गजर म्हणा ना.निमंत्रण आहे अजान.नमाज तर न बोलता करतात
. मग तो तोंड पाडून बसला .
आणि म्हणाला,”तुम्हाला
तर फक्त बहाणाच पाहिजे माझा अपमान करायला.”
विनय ह्या वर काय म्हणणार ? त्या महिलेला तिचा रस दाखवण्यासाठी
फक्त एक इशारा
हवा आहे. ती हसत आहे. प्रत्युत्तरादाखल तो ही हसतो, तिच्या डोळ्यात पाहतो. हसतो .हसत
हसत तो ध्यान कक्षात पोहोचण्यासाठी ओट्यावरून उठतो. ध्यान कक्षाकडे जाताना, तो विचार करतो की या रशियन महिलेचे
स्तन अधिक पुष्ट आहेत की तिचे नितंब अधिक पुष्ट आहेत? तो ठरवू शकत नाही. तो त्याच्या
नेहमीच्या आसनावर बसतो. तो बघतो की अद्याप जास्त लोक ध्यान कक्षात आलेले नाहीत.
आचार्यही आले नाहीत. पण पाठोपाठ ती रशियन महिला आली आहे. ती देखील तिच्या
सौंदर्याची उधळण करत तिच्या नियुक्त जागी बसली आहे. हळूहळू, सर्वजण आचार्यांसह ध्यान कक्षात
प्रवेश करतात. ध्वनी क्षेपक वाजू लागतो. तो इतरांप्रमाणे डोळे बंद करतो. त्याचे
डोळे बंद आहेत. डोळे बंद केल्यावर त्याला असे वाटते की त्याने एका अंधाऱ्या गुहेत
प्रवेश केला आहे. सर्वत्र अंधार आहे. काळोख आहे. या अंधारात एक अलौकिक आनंद आहे.
हळूहळू, तो
अंधारात प्रवेश करत आहे. श्वासोच्छवास चालू आहे, आणि अंधार्या गुहेतला प्रवासही चालू
आहे. श्वास आत येत आहे, श्वास
बाहेर जात आहे. तो श्वास आत आणि बाहेर येत असताना त्याला जाणवत असतो. तटस्थ राहण्याचा जाणीवपूर्वक
प्रयत्न सुरूच असतो. कधीकधी हा प्रयत्न यशस्वी होतो, कधीकधी तो अयशस्वी होतो. पण प्रवास
सुरूच राहतो. तो अखंड चालू राहतो. अचानक, या
अंधारातही त्याला प्रकाश दिसतो. बंद डोळ्यांत प्रकाश. हा एक अलौकिक परम आनंद आहे.
त्याला असे वाटते की तो खोल पाण्यात आहे. आणि पाण्यात उजाळा आहे. तर तो त्या
अंधाराच्या गुहेतून कधी बाहेर पडला? की हे
पाणी गुहेतच आहे. तो उत्साहित झाला आहे. पण तो डोळे उघडत नाही. तो डोळे उघडत नाही, जेणेकरून हे अलौकिक स्वप्न तुटू
नये. मग तो विचार करतो की तो निद्रेच्या नौकेत चढला आहे का आणि या अलौकिक
स्वप्नाने त्याला वेढले आहे की काय? पण
आनापान,श्वास
घेणे आणि सोडणे चालूच आहे.म्हणून त्याला समजते की ही झोप नाही तर समाधी आहे. तो
ध्यानाच्या पुष्पित,पल्लवित
पुढच्या अवस्थेकडे प्रफुल्ल वाटचाल करत आहे. सतत अग्रेसर आहे. हाच तर ध्यानाचा
आनंद आहे.
तो तरुणपणी पट्टीचा पोहणारा होता. तो नेहमीच नदीच्या
खोल पाण्यात जायचा, कधी
होडीतून नदीच्या मध्यभागी उडी मारायचा, तर
कधी खूप उंचावरून. नदीच्या तळाशी पोहोचण्याचा, जमिनीला स्पर्श करून आणि नंतर
जलप्रवाह कापत नदीच्या पृष्ठभागावर येण्याचा प्रवास हा अंधारापासून प्रकाशाकडे
जाण्याचा प्रवास होता. त्याने अलौकिक आनंद अनुभवला, जो रोमांचक आणि उत्साहवर्धक होता.
तर,नदीच्या
तळाशी जाणे आणि खोल पाण्यातून वर येणे हे देखील आध्यात्मिक साधने चे एक रूप होते
का? नकळत
आध्यात्मिक साधनेचा प्रवास. की ही विपश्यना साधना खोल पाण्यात उतरण्याची साधना
आहे. जी त्याला एका अलौकिक प्रवासावर घेऊन जात होती ? त्याला माहित नाही. पण त्याला आठवते
की, मधुमेह
झाल्यानंतर, तो
त्याच्या डॉक्टरांच्या सल्ल्यानुसार बोटॅनिकल गार्डनमध्ये सकाळी फिरायला जाऊ लागला
होता. त्याच्या फिरण्याच्या दरम्यान, तो
दररोज थांबून तलावाच्या पाण्याकडे पाहत असे. त्या तलावातील कमळाच्या फुलांमध्ये
निळे, मोकळे
आकाश पाहणे खूप आनंददायी होते. सरोवरात झुकून, क्षणभर डोळे बंद करून, नंतर अचानक डोळे उघडून थेट
पाण्याकडे पाहत असताना, त्याला
असे वाटले की त्याचे मन प्रकाशाने भरले आहे. क्षणभर तो एका दिव्य आनंदाने भारला
जात असे. तर,पाण्यात
खोल पाहणे हा आध्यात्मिक साधनेचा एक प्रकार आहे का? माहित नाही. पण विपश्यना ही एक
आध्यात्मिक साधना आहे. ती आध्यात्मिक साधना म्हणून ओळखली जाते. त्याला ध्यान
म्हणतात. इंग्रजीत लोक त्याला मेडिटेशन असेही म्हणतात. त्याने इतर प्रकारचे मेडिटेशन केले आहेत. पण तिथे हा
अलौकिक गुण नव्हता. असा दिव्य आनंद, त्याला
प्रणयात मिळत होता, मिळत
राहिला आहे .या ध्यानात सापडला आहे आणि तो अजूनही सापडत आहे. तथापि,दोन्ही अतुलनीय आहेत. ते वेगळे आहेत. प्रणय म्हणजे खोल
पाण्यात उतरणे आणि हे ध्यान म्हणजे खोल पाण्यात बुडी मारणे. दोन मार्ग आहेत. दोन
प्रकारचे आनंद. वेगवेगळे चरमोत्कर्ष आणि वेगवेगळे परिणाम.
तो सध्या ध्यानात आहे.
ध्यान हे अमृतसारखे आहे. जसे काही शरीराचा सर्व ताण
आणि थकवा या ध्यानात विरघळून गेला आहे असे वाटते. अभिमान, अहंकार, लोभ, सर्वकाही तुटत गेले आहे असे वाटते. जणू काही
तो मरत आहे असे वाटते. मरून तो त्याचे सर्व दुःख आणि त्याचे सर्व दुर्गुण मारत
आहे. जसे गोरक्षनाथ म्हणतात,”मरो
वै जोगी मरौ,मरण
है मीठा,मरणी
मरौ,जिस
मरणी गोरख मरि दिठा !”
"मर, अरे योगी, मर, मृत्यू गोड आहे. मर, गोरक्ष सारखा मरण मर." हा मृत्यू च अमृत आहे. त्याला असे
वाटते की तो विपश्यनेच्या पहिल्या पायरीवर पोहोचला आहे. त्याने विपश्यनेचा आनंद
आणि अमृत चाखले आहे. प्रत्येक श्वासागणिक तो स्वतःला स्वतःपासून वेगळे झालेले
पाहतो. हा प्रवास नवीन आणि रोमांचक आहे. हा पूर्णपणे वैयक्तिक प्रवास आहे. मनाचा
प्रवास असा आहे. अचेतन मनाचा प्रवास.
जेवणासाठी ध्यान सत्र संपले आहे. तो अजूनही बसला आहे, त्याचे डोळे मिटले आहेत. त्याला
उठणाऱ्या आणि जाणाऱ्या लोकांची हालचाल जाणवत आहे. अचानक, त्याचा प्रवास खंडित होतो. त्याची
एकाग्रता भंग पावते. त्याची तटस्थता नाहीशी होते. त्याच्या मनात जे अमृत बरसत होते
ते थोडेसे बाहेर पडल्यासारखे वाटते. तो उठतो. जेवणाच्या खोलीत जाण्याऐवजी, तो त्याच्या खोलीकडे जातो. सर्वजण
जेवणाच्या खोलीकडे जात आहेत. त्याला त्याच्या मनाचा प्रवास काही काळ चालू ठेवायचा
आहे. त्याच्या खोलीत परत
आल्यावर ,तो
डोळे मिटून बिछान्यावर वर झोपतो. प्रवास पुन्हा सुरू होतो. मनाचा प्रवास. जणू तो
पुन्हा खोल पाण्यात बुडाला आहे. अचानक, रशियन
स्त्री त्याच्या ह्या प्रवासात उडी मारते. तो तिच्या उपस्थितीला टाळतो. पण प्रवास भंगली . एक आंतरिक प्रवास. तरीही, तो तसाच झोपून राहतो. अचानक, त्याला त्याची आई आठवते. तिची आठवण
येत असताना, त्याला
जेवण आठवते. तो हळू हळू उठतो. तो उठतो आणि जेवणाच्या खोलीकडे चालतो. काही लोक
जेवल्यानंतर निघून जात आहेत. तो जातो आणि एक ताट उचलतो आणि स्वतःसाठी अन्न काढू
लागतो. जेवण घेऊन तो एका टेबलाकडे जातो. तो बसतो आणि आजूबाजूला पाहतो. ती रशियन
महिला कुठेच दिसत नाही. तो डोके झुकवून जेवू लागतो. असो, जेवणाच्या हॉलमध्ये फक्त चार,सहा लोक असतात. तो पटकन जेवतो आणि त्याच्या खोलीत परत
येतो आणि झोपी जातो. तो गाढ झोपेत घोरत पडतो . पण ध्यानासाठी बोलावलेल्या घंटेच्या
आवाजाने घोरणे बंद होते.
हसऱ्या चेहऱ्यामागील दुःख वाचणारा विनय आता त्याच्या
स्वतःच्या उदासी मागील कारण जाणून घेऊ इच्छितो. जणू तो स्वतःला सांगत आहे, "मित्रा, सत्य स्वीकारायला शिक. जर तू शिकलास
तर काही गैरसमज दूर होतील. तू अहंकार, व्यंग, निराशा आणि कटुता यापासून मुक्त
होशील." नाहीतर
,तू या
सर्वांत भरडला जाशील. तो स्वतःच स्वतःला शिकवत आहे. तर ह्या साठी विपश्यना देखील प्रभावी ठरू शकते का? अहंकार, व्यंग, निराशा आणि कटुतेपासून मुक्तता मिळू
शकते का?
माहित नाही!
ध्यान कक्षात प्रवेश करताच, ती रशियन महिला तिथे बसल्या जागे
वरून गोड हसते , जणू
त्याचे स्वागत करत आहे. तिचे डोळेही भावपूर्ण, बोलके आहेत. विनयची चाल मंदावते. "हे कोणते सत्य आहे, भाऊ? ही कोणत्या प्रकारची विपश्यना आहे?" तो त्याच्या आसनावर बसून स्वतःला
विचारतो. एक स्त्री स्वभावतःच अनाकलनीय, समजायला
कठीण आहे. तो करून करून काय करणार ? कसे
तरी, तो
डोळे बंद करतो आणि ध्यानाच्या मार्गावर जाण्याचा प्रयत्न करतो. पण ती स्त्री
त्याच्या बंद पापण्यांत येणाऱ्या आणि बाहेर जाणाऱ्या श्वासात मिसळून गेली आहे.
आपला मार्ग त्याने गमावला आहे. ध्यानातून. श्वासाचे येणे आणि जाणे चालूच राहते आणि त्याची भटकंती देखील चालू राहते.
त्याच्या कानांशी आचार्यांची ध्वनी मुद्रिका बोलत नाही तर ती स्त्री बोलत आहे. ती
त्याच्या बंद डोळ्यांत येऊन स्थिरावली आहे.त्याच्या श्वासात येणारी आणि जाणारी तीच आहे.
तिने त्याचे कान, नाक
आणि डोळे ताब्यात घेतले आहेत. जणू काही तिने विपश्यनाला विस्थापित केले आहे. जणू
काही पूर येऊन त्याचे घर दार वाहून गेले आहे. तो बेघर झाला आहे. जणू काही बेघर,हताश विपश्यना, असहाय्य, त्याच्या आत कुठेतरी जागा शोधत आहे.
आणि एखाद्या लहान मुलाप्रमाणे, त्याला
विपश्यनेचे बोट धरायचे आहे. जत्रेत हरवलेल्या मुलाप्रमाणे, तो त्याच्या आईच्या बोटाच्या शोधात.
रडणारे मूल, रुग्णाच्या
नाडीचा शोध घेणाऱ्या वैद्यासारखे. त्याला त्याचा श्वास स्पर्श सापडला आहे. त्याला
त्याच्या आईचे बोट सापडले आहे. त्याला एक सुरक्षित जागा सापडली आहे. येणारा
आणि जाणारा श्वास आता त्याला पुन्हा खोल पाण्यात ओढत आहे. त्याला आनंदाच्या
महासागरात घेऊन जात आहे. अमृत पानाच्या प्रवासात. तो विचार करतो की तो कोणत्या
वाहनावर स्वार आहे. ते वाहन आहे की विमान? तो समजू शकत नाही. त्याला समजून
घ्यायचे ही नाही. साधन काहीही असो, साधना
हाच खरा मार्ग आहे. सुख आणि शांतीचा आनंददायी प्रवास. त्याला माहित नव्हते की एका
श्वासाचा स्पर्श, एक
येणारा आणि जाणारा श्वास, इतका
कठीण प्रवास इतका सोपा करू शकतो. त्याला कुठे ठाऊक होते की श्वास हा केवळ जीवनाचा, जीवनाच्या प्रगतीचा सूचक नाही. जर
श्वास असेल तर जीवन आहे. त्याला हे माहित होते, सर्वांना हे माहित आहे. पण श्वास
घेण्याचा हा आनंद एखाद्याला तटस्थ देखील बनवू शकतो, जिवंतपणी अमृतयात्रेचा अनुभव देखील
घेऊ शकतो, हे
कोणाला माहित होते?
ध्यान सत्र संपले. संध्याकाळचे सत्र संपले की, जेवणाच्या खोलीत चहा आणि लाह्या
फुटाणे ठेवलेले असते.जे दुसऱ्या किंवा तिसऱ्यांदा विपश्यना अभ्यासक्रमाला आले आहेत, म्हणजेच ज्येष्ठ साधकांना फक्त
लिंबू पाणी मिळते. विनय चहा पीत नाही, म्हणून
तो चहाऐवजी एक छोटा ग्लास दूध घेतो. थोड्या नाश्त्यानंतर, तो त्याच्या खोलीत थोडा वेळ
विश्रांती घेतो.नंतर ध्यान सत्र होते. एक छोटे सत्र.नंतर विश्रांती असते
संध्याकाळी उशिरा, अंधार
पडल्यानंतर,आचार्य
गोयनका यांचे प्रवचन असते. चित्रफीतीवर, व्हिडिओवर.ज्यांना
हिंदी समजते ते हिंदीत ऐकतात, तर
बाकीचे इंग्रजीत ऐकतात. दोघांसाठीही स्वतंत्र व्यवस्था आहे. दीड तासाचे प्रवचन
ऐकल्यानंतर विनय समृद्ध होतो. समृद्धीचे हे भांडार दररोज वाढते. ध्यानापेक्षाही
अधिक, आचार्य
सत्यनारायण गोयनका यांचे हे प्रवचन आनंद देणारे असते.
‘प्रवचन
ऐकल्यानंतर, लोक
झोपी जातात. विनय दररोज फिरायला जातो. विपश्यना शिबिराचा परिसर मोठा आहे, म्हणून तो अनेकदा त्याचा फिरण्याचा मार्ग बदलतो. तो एकटाच
चालतो, शांतपणे.
सर्वजण झोपलेले असतात आणि तो चालत असतो. या चालण्यामुळे ध्यानापेक्षा जास्त एकांत
आणि एकाग्रता येते. आजूबाजूला किंवा दूरवरही कोणी नसते. ह्या निर्जन भागात
एकांताची शांतीची भावना असते. एकांत वातावरण मनाला, आनंदाने भारून टाकते. ही एकांत जागा
स्पेसचा आनंद देते. या शांत शांत राजधानीत, ही निर्जन जागा त्याला आणखीच मोहित
करते. सामान्य दिवसांत, तो
अनेकदा त्याची आवडती गाणी आणि संगीत ऐकत फिरतो. पण इथे, हे सर्व करण्यास परवानगी नाही.
म्हणून, तो
विविध गोष्टींचा विचार करत करत फिरतो.
आज हवेत थोडी जास्त थंडी आहे. थंड वारा राहून राहून
त्याच्या कानांना त्रास देतो. त्याने ओव्हरकोट घातला आहे आणि डोक्याभोवती मफलर
गुंडाळला आहे. तो खिशात हात घालून फिरत आहे. त्याला एनसीसी शिबीर आठवते. त्यामध्ये
सकाळी सकाळी लवकर पळावे लागत असे. शिक्षक मफलर किंवा हातमोजे असे काहीही घालू देत
नव्हते. त्यांनी आम्हाला सर्वकाही मोकळे ,उघडे ठेवण्यास सांगितले. पण हे विपश्यना शिबीर आहे.
इथे शिक्षक नाहीत. पण तिथेही शिस्त होती. कडक शिस्त. इथेही शिस्त आहे. आम्हाला
पहाटे चार वाजल्यापासून रात्री नऊ वाजेपर्यंत व्यग्र ठेवण्यात आले होते. इथेही. हो, एनसीसी शिबीरामध्ये विचार करायला
वेळ नव्हता. इथे, विपश्यनेमध्ये, विचार करण्याची आणि समजून घेण्याची
भरपूर संधी आहे. स्वतःबद्दल विचार करण्याची एकमेव फुरसत. तिथे, कठोर परिश्रम करण्याची पद्धत होती.
इथे ध्यानाची पद्धत आहे. विनय तेव्हा युवक होता. तो किशोरवयीन होता. आता तो
मध्यमवयीन आहे. तो त्या रशियन महिलेबद्दल विचार करत फिरत आहे. खांबांवर लटकणाऱ्या
मंद विजेच्या दिव्यांनी उजळलेल्या, थंड
वाऱ्यात फिरणे आनंददायी आहे. जणू तो स्वतःच्या एकांतात फिरत आहे. तो स्वतःच्या
मनात फिरत आहे. त्याला वाटते की या विपश्यना शिबीरात भारतीय आणि परदेशी अशा अनेक
महिला आहेत. तरुण, मध्यमवयीन
आणि अगदी वृद्धही. मग या तरुण रशियन महिलेला अचानक त्याच्यात रस का वाटू लागला आहे? आणि तोही तिच्याकडे का अधिकाधिक
आकर्षित होत आहे? तो
येथे विपश्यनेसाठी आला आहे, प्रेम
किंवा अश्लील चाळ्यांसाठी नाही.
बुद्ध यशोधरेला सोडून गेले होते. त्यांनी त्यांचे घर
दार सोडले होते. आणि तो तर येथे
मोकळ्या केसांच्या जाळ्यात अडकला आहे. विपश्यनेच्या
आनंदाची पहिली पायरी चढून आणि ते अमृत प्यायल्यानंतरही, तो अजूनही स्त्री सुखाच्या लालसेत
बुडत आहे. अचानक, त्याला
कोणीतरी त्याच्या मागे येत असल्याचे जाणवते. हे पहिल्यांदाच घडत आहे. म्हणून तो
वळतो आणि पाहतो. ती तीच रशियन स्त्री आहे. तो आपली पावले मंदावतो. हळूहळू, ती स्त्री त्याच्या बाजूने चालायला
लागते. विनय मागे वळून, पुन्हा
मागे वळून पाहतो की कोणी मागे आहे की
काय! त्याला कोणीही दिसत नाही. तो निश्चिंत होतो. ती
स्त्री हळूहळू त्याच्या जवळ जाते.अगदी
खूप जवळ, त्याला
स्पर्श करण्यासाठी.विनय आता काय करणार? हा
विचार करत असतानाच त्याच्या आत वीज चमकून गेली .जणू काही शॉर्ट सर्किट झाले आहे.
जणू काही वीज प्रवाह बंद झाला आहे. अचानक, तो पुढे जातो, तिला आपल्या मिठीत घेतो आणि तिचे
चुंबन घेतो. रशियन स्त्री स्तब्ध होते. तिला कल्पनाच नव्हती की विनय इतक्या लवकर
तिचे चुंबन घेईल. प्रतिसादात, ती
विनयचे चुंबन घेते. ते काही वेळ एकमेकांच्या मिठीत बद्ध होतात , हळूहळू, नंतर बेभानपणे चुंबने घेतात पुन्हा
पुन्हा, कुठला
ही विचार न करता! त्यांच्या मिठीत रात्र अधिकच गडद होते. ते लिलीच्या झुडुपाच्या
आडोश्यात लपतात. पुढे ते एका आंब्याच्या झाडाकडे जातात, जिथे विजेचा मंद प्रकाशही पोहोचू
शकत नाही. त्यांच्यात कोणताही शाब्दिक संवाद होत नाही. त्यांचे शरीर संवाद करत
आहेत. एका विचित्र द्विधा मनःस्थितीत आहे. हा शरीराचा संघर्ष आहे, मनाचा संघर्ष आहे, वासनेचा संघर्ष आहे की विपश्यनेमुळे
निर्माण झालेल्या विकाराचा संघर्ष आहे? आणि
पाहा,जे
घडायला नको होते ते घडू लागले आहे. अचानक. हळूहळू, ती स्त्री विनयचे कपडे उतरवू लागते.
विनय तिला विपश्यनेतील शिस्तीची आठवण करून देऊ इच्छितो. तो तिला सांगू इच्छितो की
विपश्यनेचे प्रतिबंधात्मक नियम पाळणे महत्वाचे आहे. पण विनयला समजते, आपला मार्ग चुकला आहे. तो पूर्णपणे
हरवला आहे. जणू काही गायन
आणि वादनाची जुगलबंदी चालू आहे.
सेजिया चढत डर लागे लोकगीत आहे ना!आनंद वाढत आहे, पण भीती ही वाटते! ओठ, गाल, गात्र सर्व वाद्ये बनले आहेत. आणि
तो त्यांना, त्यांच्या
तारांना, मध्यम
स्वरात वाजवत आहे. जेव्हा एखादी स्त्री अशा उन्मादात असते तेव्हा तिचे ओठ स्वतः च
बासरी बनतात. तुमच्याकडे फक्त तुमच्या ओठांमध्ये ते वाजवण्याची कला पाहिजे.
श्वासोच्छवासाचा अभ्यास येथे देखील कामी पडला आहे. तेच आनापान, श्वास घेणे आणि श्वास सोडणे.
जेव्हा बासरी सुरात असते तेव्हा गालाचे संतूरच्या
गोडव्यात रूपांतरित होण्यास वेळ लागत नाही. वक्ष पियानो बनले आहेत आणि नितंब तबला
बनले आहेत. ही स्त्री या सर्व वाद्यांची लय आणि ताल जाणते, त्याची तिला चांगली समज आहे असे
दिसते. ती निष्णात आहे. ती आता संकोचाचा पडदा तत्क्षणीच दूर करते. विनयला जसे हवे
तसे ती त्याच्या इच्छेनुसार जुळवून घेते. या रशियन महिलेला सारंगीचा ही सूर खूप
चांगला माहित आहे. ती त्याच्यावर झुकली आहे. ती झुकत राहते. ती सरकत राहते. जणू
काही ‘सरकती
जाए है नकाब, आहिस्ता
आहिस्ता!’पडदा
हळूहळू सरकत आहे! जणू तिचे तोंड घागर बनले आहे. तो अलौकिक आनंदात घागरीत बुडत आहे.
बासरी असलेले ओठ आता माऊथ ऑर्गन बनले आहेत. ती जणू बिन हे वाद्य वाजवते. तो जणू व्हायोलिन बनून वाजत आहे.
इकडे घाई नाही आणि तिकडे कोणतीही
सुस्ती नाही. देह संगीताच्या या मेळाव्यात, सर्व स्वर, सर्व आलाप , चढ-उतार, आरोह अवरोह त्यांच्या स्वतःच्या
गतीने आहेत. त्यांच्या सर्व लवचिकता आणि लयीसह. त्यांच्या संपूर्णतेत. मिलनाची
सतार अशीच तर वाजते. सतार तिच्या सर्व स्वरांना व्यवस्थित मांडून वाजवू लागते.
विपश्यना शिबिरात ,या
लिलीच्या झुडुपा जवळ, आंब्याच्या
झाडाखाली सतार
वाजत आहे . जणू आंब्याची पाने आचमन करवून देत आहेत .
शरीर संगीताच्या या मिलनात थंडी, सर्व गारठा निष्प्रभ आहेत. आता विनय
पुन्हा त्या रशियन महिलेचे चुंबन घेत आहे. बेभानपणे. जणू त्याचे संपूर्ण शरीर
बासरीसारखे आहे. तो तिच्यावर झुकला आहे, जणू
आकाश धरती वर वाकले आहे. जणू तो ढग आहे, तो
आता तिच्या शरीरात गडगडाट करत आहे. तो मेघ बनून तिच्यात बरसणार आहे,तो धापा टाकत आहे. हिवाळ्यात श्रावण बरसत आहे. ज्या रशियन महिलेचे नावही
त्याला माहित नाही, ती वृक्षाला बिलगलेल्या अमरलतेसारखी
त्याला चिकटून आहे. वृक्ष कितीही मोठा असला तरी, जेव्हा अमरलता त्याला वेढते तेव्हा
फक्त अमरलता दिसते, वृक्ष
नाही. वृक्ष या अमरलतेच्या मागे लपलेला आहे. विनय देखील जणू या अमरलतेच्या प्रेमात
वाकून लपला आहे, तिच्या
छातीवर डोके ठेवून, जणू
काही विश्रांती घेत आहे. थंड वारा त्याच्या शरीराला स्पर्श करू लागला आहे. तो
त्याचा ओव्हरकोट उचलतो आणि तो स्वतःवर ओढून घेतो. घाईने चुंबन घेतल्यानंतर, तो हळू हळू उठतो. उठताना, त्याने कृतज्ञतेच्या भावनेने तिच्या
कपाळाचे चुंबन घेतले. जणू काही मी तुला प्रेम करतो असे म्हणत आहे. दोघेही आपले
कपडे घालतात आणि निघून जाणार आहेत. ती स्त्री त्याला बोटाच्या इशाराने थांबवते.
आणि त्याला एकटे जाण्यास सांगते. महिला प्रथम तत्व लक्षात ठेवून, तो तिला प्रथम जाण्यास सांगतो. तो
असाही विचार करतो की जर काही अप्रिय घडले तर ते त्याच्यासोबत घडले पाहिजे, त्या स्त्री सोबत नाही. ती त्याला
परत एकदा मिठी मारते आणि पुन्हा एकदा घट्ट चुंबन घेते. आणि हळू हळू निघून जाते. तो
तिला जाताना पाहत राहतो. विचार करतो, यालाच
मिलनामधून समाधी म्हणतात का? की
विपश्यनेतील ही वासना आहे.
वाहवा!
फारच छान!
तो त्याच्या खोलीकडे चालतो. सगळीकडे असीम शांतता आहे.
थंडीही आहे. निर्जनतेच्या सर्व सीमा सुन्न झाल्या आहेत. बहुतेक लोक दिवसभर ध्यान
केल्यानंतर इतके थकलेले असतात की ते डोळे बंद केले की झोपी जातात. त्यांचे घोरणे
सुरू होते. दिवसातून बारा तास बसणे, बसून
ध्यान करणे हे खूप कष्टदायक आहे. म्हणून, त्याला
बाहेर कोणीही दिसत नाही, परंतु
त्याच्या खोलीच्या व्हरांड्यात, एक
सिंगापूरचा साधू त्याला बाहेरून येताना पाहतो. तो पाहतच राहतो,जणू काही त्याला आजच्या त्याच्या खूपच वेळ फिरायला जाण्यामागील रहस्य जाणून घ्यायचे
आहे. विनय त्याच्या टक लावून पाहण्याकडे दुर्लक्ष करतो आणि स्नानगृहामध्ये प्रवेश करतो. तो
साधू अजूनही त्याच्या वर लक्ष ठेवून आहे. " वाहवा ,वाहवा !"
तो म्हणू लागतो, जणू काही एक पहारेकरी सर्वांना सावध
करण्यासाठी शिट्टी वाजवत आहे.
तो हात, पाय
आणि चेहरा धुतो, कपडे
बदलतो आणि बिछान्यात झोपतो. तो
ब्लँकेट पांघरून घेतो.
कोण
जाणे ,कुणास
ठाऊक काय घडते की विनयच्या आयुष्यात अचानकच स्त्रिया अशा प्रकारे उपस्थित होतात. त्याच त्याला
पकडतात. त्याचा ताबाच घेतात.आणि तो नदी बनतो आणि त्यांच्यासोबत प्रवाहित होतो . वाहत जातो . रशियन
महिले सोबत गेला तसा . जोपर्यंत स्त्रिया इच्छितात तोपर्यंत तो वाहत राहतो.
नदीच्या खळखळत्या पाण्यासारखा. जेव्हा स्त्रिया, त्यांच्या स्वतःच्या कारणांसाठी आणि
अडचणींसाठी, सीमा
बांधू लागतात आणि सरहद्द ठरवू लागतात, तेव्हा
तो बांध तोडत नाही किंवा सीमा ओलांडत नाही. तो एकटा असतो . शांतपणे दूर होतो .
त्याला समजते की आनंदाचे क्षण निघून गेले आहे. त्याला आठवणी जपण्यात रस नाही. ही
महिला शांततेच्या या राजधानीत चुपचाप आली आणि नंतर ती निघून जाईल. असे संबंध फक्त
लपून छपून, चोरून
चालू शकतात, वाजत
गाजत नाही. हो,जर
आतून होकार नसेल तर त्याने काही महिलांना निराश ही केले आहे. कारण ती स्त्री आवडली
पाहिजे. इतरही अनेक गोष्टी आहेत. प्रत्येकीशी जवळीक होऊ शकत नाही. काहीही होऊ शकत
नाही. मानसिक सामंजस्य आहे हे जे कुणाशी जोडून ठेवते. हे जुळणे महत्वाचे आहे. खूप
महत्वाचे. हे सर्व विचार करत तो कधी झोपी गेला हे त्याला कळले नाही. तो रात्रभर
अनेक स्वप्नांमध्ये विहार करून गेला. पण ती रशियन महिला त्याच्या स्वप्नात आली नाही.
खरोखरच्या मिलनानंतर तिचे स्वप्ने कोणाला येणार आहेत ?
सकाळची घंटा वाजते आणि तो कड बदलून पुन्हा झोपी जातो, नेहमीप्रमाणे, आळसात एक नवीन सौंदर्य शास्त्र
निर्माण करतो. तो त्या रशियन महिलेच्या सहवासाची आठवण करून आनंदित होतो. अनेक
युगानंतर त्याला असा गोड आणि नैसर्गिक मादक प्रणय अनुभवायला मिळाला आहे. निर्बंध.या
नैसर्गिक आनंदासाठी आणि मनमुराद आनंदाच्या या स्वादासाठी तो त्या रशियन महिलेचा
कायमचा ऋणी राहील.मनाला प्रसन्नता मिळाल्या साठी. आता कार्यकर्त्याची रुण झुण घंटी
अगदी दारावर वाजते. मंजुळ घंटीचा नाद. तो जागा होतो. आंघोळ केल्यानंतर, तो नेहमीप्रमाणे ध्यान कक्षात उशिरा
पोहोचतो. त्या रशियन महिलेला पाहून तो ध्यान कक्षात बसायला आनंदाने तयार होतो . ती
देखील आनंदित होते. ती फुललेल्या फुलासारखी हसते. तिच्या डोळ्यांतून प्रेम पाझरते.
ती त्याचे स्वागत करते. जणू स्वप्नासारखी ती रात्र आठवून ती कृतज्ञता व्यक्त करत
आहे. ती रात्र होती की स्वप्न, तो
विचार करतो. थंडगार रात्रीच्या उबदार आठवणींना पुन्हा एकवार वाचत राहतो. ते
वाचताना, तो
डोळे बंद करतो आणि श्वासावर
लक्ष केंद्रित करतो. तो श्वासाच्या येण्या-जाण्याच्या मार्गावर आहे. लक्ष्य
केंद्रीत करतो. खोल पाण्यात उतरत आहे. त्या पाण्यातील लख्ख प्रकाश त्याला पुन्हा
मोहित करू लागला आहे. जणू त्याला पाण्यातून बाहेर यायचे नाही. तो कधीच बाहेर येऊ
नये. पाणी आहे की जाळे? तो
समजू शकत नाही.ध्यानाचा हा झेंडा फडकवत तो दुसऱ्याच जगात पोहोचला आहे.जिथे कोणती
ही स्त्री नाही, ना
कुठले शिबीर. तिथे केवळ बर्फ आहे. बर्फच बर्फ आहे.जसा फोटोत दिसणारा हिमालय.खोल
खोल पाण्यात हिमालय? तो
घाबरतो. पण तो डोळे उघडत नाही. त्याच्या आतला बर्फ वितळत नाहीये, तो धड धड करत आहे. जणू त्याचे हृदय
धडधडत आहे. हा हिमालयाचा बर्फ आहे.
इंद्रियसुख मोठे आहे की आध्यात्मिक सुख ! हे त्याला
ठरवायचे आहे. पण सध्या तो हे ठरवणे पुढे ढकलतो. कारण हा विषय खूप विस्तृत आहे. खूप
निराशा आहे. आत्ता हे ठरवण्यात अनेक आव्हाने आणि धोके आहेत. मग त्याला वाटते की
स्त्री ही स्वतःमध्ये अध्यात्म आहे.स्त्रीपेक्षा मोठे कोणतेही पुस्तक नाही. तुम्ही
कोणताही विषय कोणत्याही प्रकारे वाचून समजू शकता.पण तुम्ही स्त्रीबद्दल कितीही
वाचले तरी असे दिसते की तुम्ही खूप कमी वाचले आहे. तुम्हाला काही माहिती नाही. आणि
स्त्री तुम्हाला पूर्णत: वाचूही तरी कुठे देते! ती तुम्हाला तिला हवे तितकेच वाचू
देते आणि जाणून घेऊ देते.आणि तुम्ही भरलेले असूनही तुम्ही रिक्त होता.
स्वतःच्या आईबद्दल आपल्याला किती माहिती असते? आपल्याला माहिती असण्याची गरजही
नाही. मातृत्वाच्या पुढील दार बंद आहे, अगदी
आईचेही. नऊ महिने तिच्या पोटात राहूनही तिला खऱ्या अर्थाने ओळखता येत नाही.
आयुष्यभर तिला आई, आई म्हणून ही ओळखता येत नाही. आई तिला
ओळखू ही देत नाही. मातृभक्त गणेशाला त्याची आई पार्वतीबद्दल किती माहिती होती? जर त्याला माहीत असते तर त्याने
त्त्याच्या वडिलांच्या हातून त्याचे स्वतः चे डोके कापून हत्तीचे डोके का लावून
घेतले असते? तो
त्याच्या आईचा भक्तीत बुडाला होता ,त्याने
आईच्या आज्ञेचे पालन करताना, पित्याशी
युद्ध केले. शिव इतका हुशार होता की, पार्वतीच्या
सांगण्यावरून त्याने गणेशाला पुन्हा जिवंत केले, पण त्याच्या देहावर हत्तीचे मस्तक
बसवले. त्याला माहित होते की हत्ती खूप विवेकी, बुद्धिमान आहे. गणेशाच्या डोक्यात
किंवा मेंदूत विवेकबुद्धीचा अभाव होता. शिवाला हे माहिती होते, पण त्याला त्याची पहिली पत्नी
सतीबद्दल किती माहिती होती? जर
त्याला माहिती असती तर विष्णूला शिवाच्या हातातील सतीचे शरीर विच्छेदन करण्याची
आवश्यकता का पडली असती? म्हणूनच
स्त्री ही जगातील सर्वात मोठी पुस्तक आहे.स्त्री ही जगातील सर्वात मोठे ग्रंथालय
आहे.
आणि त्या स्त्री चे शरीर?
विराट दुनिया आहे स्त्री चे शरीर. स्त्रीचे मन तिच्या
शरीरापेक्षाही विराट आहे. शेक्सपियर म्हणतो की पृथ्वीवर संगीत त्यांच्या साठी आहे ज्यांना ते
ऐकायचे आहे. त्याचप्रमाणे, विनयचा
असा विश्वास आहे की शरीर संगीत त्यांच्यासाठी आहे ज्यांना त्यात स्वतःला कसे
विरघळवायचे हे माहित आहे. ते स्वत: विरघळवून स्वतः संपवतात. जेव्हा हिमालय वितळतो
तेव्हा गंगा तयार होते. शरीर संगीत आदराने, श्रद्धेने, विनीत होऊन स्वीकार करणाऱ्यांनाच हे
संगीत कळते. जे विनम्रतेने स्वीकारत नाहीत ते दुर्दैवी लोक आहेत. ते अहंकारात
जगणारे लोक आहेत. ते असे लोक आहेत जे स्त्रियांना उपभोगाची वस्तू मानतात.
ध्यान चालू राहते आणि इकडचे तिकडचे प्रश्नही येतात.
ध्यानाच्या गुहेत तो स्थिर राहत नाही; तो
पाण्यासारखा वाहतो. बुद्ध म्हणतात की जर कोणी मला आणि माझ्या विचारांना समजून
घेतले असेल तर त्यांनी पुढे जावे.माझ्या विचारांच्या खुंटीत बांधून राहू नका. विनय
त्याच्या तटस्थ राहण्याला, एकटेपणाला, श्वासाच्या स्पर्शाला छेद देतो.जणू
काही तो ही शांतता अधिकच घनदाट करू इच्छितो. आश्चर्य वाटते की हे पहाटेचे
सूर्योदयापूर्वीचे सौंदर्य आहे,
हळूच येणाऱ्या सकाळचे सौंदर्य आहे की जवळ येणाऱ्या
सूर्योदयाच्या उंबरठ्यावर हलकीशी चाहूल आहे. ही कोणती टायगर हिल आहे? ही कोणती कांचनगंगा आहे, जिच्या मांडीवर बसलेला सूर्य लहान
मुलासारखा बाहेर डोकावत आहे. आईच्या मांडीवर बसलेला, एक शिशू हळू हळू बाहेर डोकावत आहे.
टुकू टुकू बघतोय. सूर्याची लालिमा लावण्यासारखी उपस्थित आहे आणि हे ध्यान सत्र
संपले आहे. तो उभा राहतो. आळसाने जांभई देत. काही लोक नेहमीप्रमाणे ‘साधू साधू ‘ ‘उत्तम उत्तम,’ म्हणतात . रशियन महिला अजूनही
बसलेली आहे. तो तिच्या जवळून जातो. अचानक, ती त्याच्या पायाला हळूच चिमटा
काढते.तो हळू हळू तिच्याकडे पाहण्यासाठी वळतो. ती मिस्किल डोळ्यांनी हसते. त्याच्या
पायाला स्पर्श करून ती उभी राहते. कोणी काही समजण्यापूर्वीच विनय निघून जातो. ही
कसली विनवणी आहे ? स्मृतींचे
हे कसले चंदन आहे?
चंदन आहे तर त्याला नक्कीच सुगंध येईल! सुगंध दरवळत
राहील !
फुल
कोबीच्या शेताजवळच्या एका ओट्यावर बसून तो सूर्याच्या लाल लाल प्रकाशाकडे टक लावून
पाहतो. तो हात जोडून उगवत्या सूर्याला नमस्कार करतो. सूर्याला अशाप्रकारे ठुमकत ठुमकत उगवताना, डोलताना पाहणे हे मोठेच सुख आहे.
निरंतर आणि अक्षत आनंद. उल्हासित करणारा, मनमोहक
. विलोभनीय बालसूर्याचा आनंद आणि चंदनाचा सुगंधासारखे सुख आणखी कुठे मिळेल? ही अशी एक पूर्णपणे नवीन तजेलदार
सकाळ आहे. या रात्र रूपी देहाला प्रज्वलित केले,तेव्हा कुठे असा मनोहर सूर्योदय झाला आहे. रात्री
जेव्हा तो त्या सुंदर स्त्रीच्या आलिंगनात बद्ध होता, तेव्हा जणू काही आपण अग्नी ज्वालासम
बाहूंमध्ये आलिंगन बद्ध आहोत असे त्याला वाटले होते. आता, सूर्योदयाचे हे मनोहारी सौंदर्य
त्याला आपल्यात जाळ्यात गुंतवून टाकत आहे. रात्र रोमांचकारी स्वरुपात सरली म्हणून
सकाळ ही सुंदर होते का, असा
त्याला प्रश्न पडतो. त्याच्या आत एक रोमांच जागा होतो. एखाद्या सप्तकासारखा, सुमधुर नाद जागतो . तार सप्तक. हा
रोमांच विपश्यनेमुळे आहे की कामवासनेमुळे, हे त्याला कळत नाही. त्याला कुठेतरी
पाणी पाहायचे आहे. एखाद्या सरोवराचे, नदीचे
पाणी. त्याला त्या पाण्यात सूर्याला, स्वतःला
निरखायचे आहे. स्वतःचे पाण्यातील प्रतिबिंब पाहून खूप काळ लोटला आहे. पण या
शिबीराच्या आवारात खूप काही आहे, मात्र
तलाव नाही. मग जर इथे तलाव असता, तर
त्या रशियन स्त्रीचा हात धरून तो त्यात उतरला असता का? आत्ता ह्या क्षणी, ती अचानक त्याच्यासमोर उभी आहे. आणि
तो तिच्या निळ्या डोळ्यांच्या तलावात हरवून गेला आहे. हरवून गेला गत रात्रीच्या
आठवणींच्या सुगंधात. तिच्या शरीराच्या सुगंधात आणि सौंदर्यात. ती स्त्री थांबून त्याच्याकडे क्षणभर पाहते
आणि मग निघून जाते. तिचा गाऊन काल रात्रीचाच आहे. तो उठून खोलीत येतो. तो उशीला
हातांत घट्ट धरून आडवा होतो. जणू काही ती उशी नसून, ती रशियन स्त्रीच आहे. तो तिचे
चुंबन घेवून तिला एका तलावाच्या रूपात बदलू इच्छितो आहे, ज्याच्या पाण्यात तो स्वतःला निरखू
शकेल. स्वतःकडे पहात पहात तो मनाच्या कुठल्याश्या प्रवासाला निघू शकेल.
घंटा वाजली आहे. ध्यानसत्र बस सुरूच होणार आहे.आणि
विनयने त्या स्त्रीवर लक्ष केंद्रित केले आहे, जिने काल रात्री मोगऱ्याच्या मादक
मत्त सुगंध,आणि
त्याच्या बाहुंमध्ये आनंद भरून टाकला होता. त्याला आठवते की संस्कृतमध्ये
मोगऱ्याला मल्लिका आणि मालती दोन्ही म्हणतात. म्हणून त्याने तिला मल्लिका किंवा
मालती म्हणावे. तो तिला मल्लिका म्हणायचे ठरवतो आणि उठतो. तो एखाद्या शीत झुळूके
सारखा ध्यानकक्षाकडे चालू लागतो. बाहेरही एक मंद झुळूक वाहत आहे, जी शरीराला गारवा देते. पण ध्यान
कक्षात,मल्लिकाने
बिना बाह्यांचा पोलका घातला आहे आणि त्या खाली स्कर्ट आहे. तिला असे पाहून त्याला
एका जुन्या गाण्याची आठवण येते,’रूपदंभा
बडी कृपण हो तुम , अल्पव्यसना
कैसे वसन हो तुम!’ तर मग,मल्लिकाला थंडी वाजत नाही का?
नसेलच
थंडी वाजत ,म्हणून
तर…त्यामुळेच
ती अनेकदा बाही नसलेले कपडे घालताना दिसते.
ध्वनी मुद्रिका वाजत आहे. ध्यान धारणा करण्यासाठी
सूचना दिल्या जात आहेत. काही काही लोक तर पूर्ण कपडेही धारण करत नाहीत. त्याला
आश्चर्य वाटते की ते ध्यान कसे धारण करतात. मल्लिका एकटीच नाही; इतरही परदेशी लोक आहेत जे अगदी कमी
कपडे घालतात, जणू
त्यांना थंडी जाणवतच नाही. मग, भूक
आणि तहानने व्याकूळ झालेल्या या जगातील लोकांनाच फक्त थंडी जाणवते का? बुद्धांनाही थंडी जाणवत होती का? तो विचार करतो. श्वास येत आहे, जात आहे..हा श्वास त्याला समजावून
सांगत आहे की दुसऱ्या कोणाचाही विचार करू नकोस.विनय श्वासाच्या या रूपाच्या प्रेमात
पडला आहे. तो मल्लिकाच्याही प्रेमात पडला आहे .तो आणखी कोणा कोणाच्या प्रेमात
पडणार ? तो
असा अनेकदा विचार करतो. असा विचार करत तो ध्यानाच्या पाण्यात उतरला आहे. खोल खोल
पाण्यात. तो बुडत आहे. तो सतत खाली जात आहे. त्याला पाण्याच्या पृष्ठभागावर यायचे
नाही. तो पाण्याच्या तळाशी पोहोचला आहे. तो स्थिर झाला आहे. मग, यालाच पाताळ म्हणतात का? तो या पाताळात किती काळ बुडून राहील? बुद्ध म्हणतात की या जगात काहीही
स्थिर नाही. काहीही शाश्वत
नाही. सर्व काही नाशवंत आहे. सर्व काही बदलेल. मग ध्यानाची ही मुद्रा, खोल पाण्यात वारंवार उतरण्याची ही
उर्मी कधी बदलेल का? तो
विचार करतो. काहीही होवो, कधीही
होवो, काहीही
बदलो. त्याला कश्याने
काय फरक पडतो? तो तर
खूप खोल खोल पाण्यात बुडाला आहे. ध्यानात बुडलेला!
की पाण्यात बुडाला आहे?
त्याला माहीत नाही. त्याला फक्त मग्न राहायचे आहे.
बाहेर खूप काही बदलतं.आत मध्ये तर त्याहूनही जास्त गोंधळ आहे. तो बाहेरच्या जगाचा
विचार करत नाही, ना
आतल्या. तो हिशोबात नेहमीच कच्चा राहिला आहे. अचानक,तो झोपेच्या नावेत चढला आहे. घोरत, बसलेल्या अवस्थेत डुलकी घेत असताना
तो खाली पडतो.ज्या क्षणी तो पडतो, त्याच
क्षणी त्याची समाधी भंग पावते. तो अचानक उठून बसतो. त्याला दिसतं की, तो झोपी गेल्यामुळे सर्व ध्यानस्थ
साधक हलकेच हसत आहेत.मग,हे
ध्यानस्थ साधक तटस्थ राहू शकत नाहीत! स्वतःच्या आतूनच नव्हे, तर बाह्य जगापासूनही तटस्थ राहू शकत
नाहीत का? जर हे
साधक ध्यानात होते, तर
त्यांनी विनयचे पडणे कसे पाहिले असेल? ते
मोठ्या मोठ्याने हसले नाहीत, पण ते
हसले तर होते. असो, तो
पुन्हा ध्यानावस्थेत परत आला आहे. त्याला माहीत आहे की वारंवार झोपेची झापड येणे
ही त्याचे व्यसन आहे. ही सवय त्याच्या विद्यार्थीदशे पासूनची आहे. वर्गात, शिक्षक त्याला अनेकदा खडू फेकून
मारून उठवत असत. अगदी घरीसुद्धा, अभ्यास
करताना त्याला घरातले कुणी तरी उठवत असायचे. कार्यालयात,तो रोज बसल्या बसल्या झोपी जायचा.लोक त्यांच्या मोबाईल
वर त्याचे फोटो आणि व्हिडिओ काढायचे, आणि
इतरांना तक्रारीचे संदेश पाठवायचे. पण तो हतबल होता. तो तरी काय करणार होता?
सर्व सत्रे, जेवणे
आणि प्रवचनांनंतर, पुन्हा
रात्र झाली आहे. काल सारखीच. रोजच्या सारखीच. ती आज परत येईल का, या विचारात तो फेरफटका मारत आहे. तो
मल्लिकाच्या येण्याची वाट पाहत आहे, तिच्या
येण्याची वाट पाहत तो फिरत आहे.जशी झोपेची डुलकी अधूनमधून त्याला मिठीत घेते, तशीच त्याला मल्लिकाला मिठीत
घेण्याची ओढ लागली आहे. या हिवाळ्यात चंद्र सुद्धा जणू बाही नसलेला झाला आहे. जणू
आपल्या आईच्या मांडीवर बसून, तिच्या
शालीत लपून, तो
हळूच डोकावत आहे. एकटक पाहत आहे. तर मग, चंद्रसुद्धा
मल्लिकाची वाट पाहत आहे का? प्रतिक्षा
तर ही थंड गार हवा सुद्धा करत आहे, तसेच
लिलीच्या झुडूपांना सुद्धा आहे. आंब्याची झाडे वाट पाहत आहेत.तसेच आचमन करणाऱ्या
झाडाच्या पानांना सुद्धा प्रतिक्षा आहे.तसेच ह्या निरव शांततेला सुद्धा
प्रतिक्षा आहे.विनय चालून चालून थकला आहे. पण त्याला मल्लिकाच्या पावलांचा आवाज
ऐकू आलेला नाही. तो सतत मागे वळून रस्त्याकडे पाहत राहतो.पण ती येत नाही.जेव्हा
मल्लिका येत नाही, तेव्हा
त्याला गालिबची आठवण येते:
"हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी/ कुछ हमारी ख़बर नहीं
आती !”गालिबची
आठवण काढत तो आपल्या खोलीत येतो. हात-पाय धुतल्यानंतर, तो मल्लिकाचा विचार करत उशीला
कवटाळून पलंगावर झोपी जातो."जन्म
एक फसवणूक आहे, मिलन
एक स्वप्न आहे," असा
विचार करत तो झोपी जातो.आणि बघा,मल्लिका
आता आली आहे. स्वप्नात. तिच्या येण्याने त्याच्या मनातील गोंधळ वाढला आहे. इकडे तिकडे,सगळीकडे गोंधळ आहे. सकाळच्या घंटेने त्याचे डोळे उघडले
. स्नान करून तो ध्यानकक्षात पोहोचतो. बराच उशीर झाला आहे. आचार्य त्याच्याकडे
रोखून पाहतात. तो हात जोडून खाली बसतो. प्रतिसाद म्हणून मल्लिकानेही हात जोडले
आहेत. आचार्यांच्या हे लक्षात येत नाही. त्यांच्या नजरेचा कॅमेरा विनयवरच खिळला
आहे, जणू
काही तो बालवाडीतला विद्यार्थी आहे आणि त्यांना त्याला शिक्षा करायची आहे. त्याला
कोंबड्यासारखं उभं करायचं आहे. हा विचार करून तो हसतो . विनयला आज ध्यान करण्याची
इच्छा होत नाहीये. काल रात्री मल्लिकाला भेटू न शकल्यामुळे तो खूप दुःखी आहे. तो
निराशही झाला आहे. प्रणयाची आर्त साद होती. ती अभिसाराची रात्र होती. पण मानिनी
अनुपस्थित होती. जणू काही सर्वच काही अनुपस्थित होते मल्लिकेच्या अनुपस्थिती मुळे.
स्वप्नात येऊन काय फायदा? स्वप्न
म्हणजे शुद्ध फसवणूक. पण मिलन,हे ही
सुद्धा एक स्वप्नच असते. मिलन आणि विरह याबद्दल विनयच्या मनात खूप गोंधळ आहे.याचाच
विचार करत तो पुन्हा झोपेच्या भरात आहे.मल्लिका पुन्हा हजर आहे.आणि तो हतबल आहे.
हतबल. तो परत पेंगत आहे. कार्यकर्ता, स्वयंसेवक
त्याला हलवत आहे.
ती नाश्त्याच्या टेबलापाशी आहे.आल्या आल्या तिला निघून
जायचे आहे. तो तिला थांबवतही नाही. तो बोलत नाही. तो साधा इशाराही देत नाही. जरी
त्याला तिला थांबवायचे असले, तरी
तो कसे थांबवू शकणार? त्याला
नातं उत्स्फूर्त असावं असं वाटतं. जर ते उत्स्फूर्त नसेल, तर त्याला काही अर्थ नाही.
विवाहबाह्य संबंध कधीही कायमस्वरूपी असू नयेत. एकदा कायमस्वरूपी झाले की, ते कौटुंबिक कलह आणि गुन्हेगारीला
कारणीभूत ठरतात. खून आणि तत्सम गोष्टी. अगदी बदनामीसुद्धा. म्हणून, हे टाळले पाहिजे. विवाहबाह्य
संबंधांमध्येही मर्यादा,प्रतिष्ठा
आणि पवित्रता आवश्यक आहे. मग,मल्लिका, या रशियन स्त्रीसोबत, तो फक्त एक क्षण असतो जो अलगद पणे
निघून जातो. एक मानसिक नाते. एखाद्या तरंगत्या पुलासारखे. एक तात्पुरता पूल. नदीला
पूर येण्याच्या नुसत्या शक्यतेनेही तुटणारा.
तर मग मल्लिकाचा पूल तुटला आहे का? माहीत नाही. पण विनय नक्कीच तुटला
आहे.
तो भोजन कक्षातून बाहेर आला आहे. लंडनहून आलेला तो
मुलगा हात जोडून, विनम्रपणे
त्याच्यासमोर उभा आहे. विनय हसतो. सिंगापूरचा तो मुलगा, "धन्यवाद," असे म्हणत जवळून जातो. तो पपईच्या
झाडावर लगडलेल्या अर्धवट पिकलेल्या पपईंकडे एकटक पाहतो.आज नाश्त्याला खाल्लेली पपई
कमालीची गोड होती. अगदी दशहरी आंब्या सारखी.मल्लिकाचे वक्ष ही दशहरी आंब्यासारखेच
होते, मोगऱ्याच्या
सुगंधासारखे. म्हणूनच त्याने तिला मल्लिका हे काल्पनिक नाव दिले आहे. तिचे खरे नाव
काय असेल कोणास ठाऊक? विनय
अशा प्रकारे अनोळखी लोकांना, विशेषतः
स्त्रियांना, काल्पनिक
नावे देतच राहतो. जसे की, त्याची
मुलगी लहानपणी लोकांना भाज्यांची नावे देत असे. कुणाला कोबी, कुणाला वाटाणा , कुणाला टोमॅटो, कुणाला बटाटा , फणस, कांदा, कोथिंबीर इत्यादी नावे होती. त्याचा
एक मित्र मुलींना आरडीएक्स सारखी नावे देत असे. पण स्त्रियांची नावे ठेवताना विनय
सौंदर्याशी तडजोड करत नाही. जरी ती स्त्रियांची काल्पनिक नावे असली तरी ही, तो त्यांना अतिव आदराने संबोधतो. तो
स्वाभाविकपणे सौंदर्यदृष्टीकडे लक्ष देतो. अनेक स्थानिक नावांकडेही. गाण्यांमध्ये
वापरलेली संबोधनेसुद्धा तो अशा काल्पनिक नावांनीच न डगमगता वापरतो. घरी त्याने
आपल्या पत्नीला अनेक नावे ठेवले आहे. जेव्हा तो 'बिल्लो राणी' म्हणतो, तेव्हा त्याची मैत्रीण पण खूप आनंदी
होते. अगदी जेव्हा तो तिला 'बालम
चिरई' म्हणतो
तेव्हाही. पण तो कधीही कोणाचे
नाव बिघडवत नाही.आदर आणि सौंदर्यदृष्टी त्याच्या मनात
नैसर्गिकरित्या असतो. तो स्त्रियांचा खूप आदर करतो. कारण त्याची आई सुद्धा एक
स्त्री आहे.त्यामुळे आईचा अपमान करणे योग्य नाही.आदर हाच एकमेव आदर आहे.त्यामुळे
प्रत्येक स्त्रीचा आदर नम्रतेने सहज साधला जातो. तो अनेक गोष्टींमधून जातो. पण तो
स्त्रीचा आदर कधीही विसरत नाही.
तो पुन्हा ध्यानात आहे. तेच खोल पाणी, तीच परमानंदाची भावना. एक प्रेमळ
भावना. तोच आनंद, तीच
एकाग्रता. हा श्वासाचा एक विलक्षण प्रयोग आहे. विपश्यनेपूर्वी त्याला हे कधीच कळले
नव्हते की एकसुख त्याच्या खांद्यावर विसावत आहे आणि दुसरे ही येत आहे आणि लादले
जात आहे . तिसरे, चौथे,पाचवे .अगणित सुख येतात आणि जातात. जणू काही तो एक
हँगर आहे आणि त्यावर अगणित कपडे लादलेले आहेत. विपश्यनेच्या या ध्यानात,असेच आनंद हँगरप्रमाणे लटकलेले असतात. सफरचंदांनी
भरलेल्या झाडा वर सफरचंदे लगडलेले,आंब्याच्या
झाडावर आंबेच आंबे. द्राक्षवेलीवर द्राक्षांचे घड. फणसाच्या झाडावर अगणित फणस. सुख
ही असेच येते आणि जाते, कधीही
परत न येण्यासाठी. जसे मृत्यूनंतर माणूस कधीच परत येत नाही. जे लोक हे जग सोडून
जातात त्यांच्यासाठी इतर जण गात राहतात,
"चिठ्ठी
न कोई सन्देश ,जाने
वो कौन सा देश ,जहाँ
तुम चले गये,
इस दिल पे लगा के ठेस ,जहाँ तुम चले गये!” हे सुख देखील त्याचप्रमाणे निर्मोही
आहे. वेदना दिल्या असोत वा नसोत, ते
परत येत नाहीत. कधीच परत येत नाहीत. बुद्ध म्हणतात,सुख असो वा दुःख, सर्व काही निघून जाते. दुःख निघून
गेले तर बरे, पण
सुख निघून जाता कामा नये. पण ते निघून जाते. जीवन म्हणजे एक थोडे ऊन आणि लहानशी
सावली.मल्लिकासुद्धा अगदी लहानशी सावली बनून आली.
आणि ही पहा,मल्लिका
ह्या रात्री परत आली आहे. स्वप्नात नाही, तर
फिरायला.चालता चालता तिने त्याला पुन्हा मिठी मारली आहे.मिठी मारत ती त्याचे
वेड्यासारखं चुंबने घेऊ लागली आहे. जणू काही ती स्त्री नसून पुरुषच आहे. एका
अनुभवानंतर, दुसऱ्या
अनुभवात, तिने
संकोच, लाज
आणि मनधरणीच्या सर्व मर्यादा ओलांडल्या आहेत. सुखं असेच निघून जात नाही, ते असे येतेही.चुपचाप.शांततेच्या
राजधानीत अगदी चुपचाप. तर मग, श्वास
आणि सुख यांच्यात काही अज्ञात संबंध आहे का? माहीत नाही. पण आता तो खोल पाण्यात
नाही, तर
हृदयात खोलवर आहे. उफाळून येणारा आणि प्रेम करणारा. मल्लिकाच्या शरीराला
वेगवेगळ्या ठिकाणी भेदणारा. एक नवीन वाट शोधणारा. मल्लिकाच्या शरीरातून मनाच्या
वाटेवर एक नवीन मार्ग तयार करणारा. सुसाट धावणाऱ्या घोड्याप्रमाणे धावत ये-जा
करणारा, मार्गातील
झाडांमधून वाट काढणारा. धापा टाकत. जणू काही प्रेम मिलनाच्या या भ्रमंतीतून एक
अंकुर समाधीच्या भूमीत रुजायला उत्सुक आहे. जणू एखाद्या वृक्षावर कोवळा अंकुर
फुटण्यासाठी आतुर झाला आहे. एक दवबिंदू झाडाच्या पानावर पडतो. पानावरून तो तिच्या
नग्न शरीरावर, तिच्या
घट्ट वक्षावर येऊन पडतो. वक्षावरून तो दवबिंदू तुटून जातो.तो प्रेमात ओथंबलेला
स्नेहबिंदू आहे. एका रात्रीच्या विरहाने गोंधळलेली मल्लिका, तिच्या आत असलेल्या वासनेचा हिमालय
फोडून त्याचे तुकडे तुकडे करू इच्छिते. हिमालय विरघळवून तिला पाणी पाणी करायचे आहे. जणू
काही मल्लिकाच्या आत मेघ बरसत आहे. गडगडाट करत लखलखत आहे. या थंडगार वातावरणात
तिच्या शरीरात एक महासागर उधाणलेला आहे. समुद्राच्या लाटा गर्जना करत खडकांवर आदळत
मोठा आवाज करत आहेत. जणू काही ती कोलंबो आहे आणि तो समुद्र. मल्लिकेच्या शरीरातील
समुद्राची गर्जना त्याला स्पष्टपणे ऐकू येते. त्याला ह्या तुफानी लाटेच्या
गरजणाऱ्या आवाजात स्वत:ला विलीन करायचे आहे. विपश्यना शिबीराच्या परिसरातील ही थंड,ओलसर वाट मल्लिकाच्या पाठीवर एक नवीन पर्वताची तटबंदी
तयार करत आहे. पण मल्लिका याबद्दल अनभिज्ञ आहे.ती दारूच्या नशेत असल्या सारखी
बेशुद्ध आहे. नदीसारखी अस्वस्थ आहे. पूर्ण ताकदीने, किनारा सोडून, एकामागून एक प्रवाह स्वतः त सामावून
घेत तिला विनयच्या गावात शिरायचे आहे.जणू सुखाची नदीच. तिला विनयच्या गावातून
जलप्रवाह होऊन वाहत जाऊन, पुन्हा
पुन्हा परत यायचे आहे.
राग मालकौंस मधील हा मधुर शारीरिक संवाद, मध्यम, निषाद, धैवत आणि गंधार स्वर, पूर्ण आरोह आणि अवरोहाने युक्त 'सा नी ध नी ध म’ ची ही रचना, ह्या रात्री मोगऱ्याच्या सुगंध
दरवळत आहे. त्यातच हरवून गेलेला विनय.मल्लिकाचे केस खूपच छोटे आहेत.विनयच्या
केसांपेक्षाही लहान . नाहीतर, तो
त्यांच्यातच लपला असता. पर्यायाने तो मल्लिकाच्या दोन भरगच्च वक्षांत सामावला
जातो.जणू काही तो फुलांच्या उशीवरच आहे असे वाटते. मल्लिकाच्या गुबगुबीत शरीराला
गोड पदार्थांची चव आहे. कोणताही संवाद नसताना, राग मालकौंस एखाद्या वाद्यावर
वाजवल्या सारखा वाजत आहे. बासरीत रूपांतरित झालेले मल्लिकाचे शरीर आता शिथिल होत
आहे. जणू काही ती तिच्या गंतव्य स्थानी पोहोचली आहे. विनयचे गंतव्यस्थानही
उंबरठ्यावर आहे. ओठांपासून
जिव्हेपर्यंत, या देहाच्या सागरात केलेल्या
मस्तीने तो आता धापा टाकत आहे. जणू काही मोगऱ्याचा सुगंध अचानक दरवळून त्याला
थकवून टाकतो. मल्लिका आज शाल गुंडाळून आली आहे. या कडाक्याच्या थंडीत ती शाल
म्हणजे श्वासासारखी, पावसात
छत्रीसारखी आहे. मल्लिकाला थंडी जाणवत नाही, पण विनयला मात्र खूप थंडी जाणवते.
मल्लिकाच्या उबदारपणात तो थंडी विसरून जातो.आज उशीर झाला आहे. पण त्याला
मल्लिकाच्या शरीरावरून उठायचे नाही.त्याला तिच्या निर्वस्त्र शरीरापासून दूर जायचे
नाही. विपश्यना आणि कामवासनेच्या या अद्भुत संयोगाने विनय मोहित झाला आहे.
वाहवा! वाहवा!
जेव्हा तो आपल्या खोलीत परत आला, तेव्हा त्याला तिथे कोणीही आढळले
नाही, 'उत्तम
उत्तम ‘ म्हणणारा
सिंगापूरचा भिक्षूही नव्हता.
विपश्यना आणि कामवासनेचे व्यसन हे विनयच्या आयुष्याचा
एक अविभाज्य भाग बनले होते. तो हरीनामाचा जप करायला आला होता, पण कापूस वेचत राहिला,असे काहीतरी घडले होते का? याचा विचार करत करत, विनयला झोप कधी लागली हे कळलेच नाही.
जेव्हा तो ध्यान सत्रा साठी पोहोचला, तेव्हा
मल्लिका तिथे नव्हती. पण नंतर ती कधी परत आली हे त्याला कळले नाही, कारण तो ध्यानात मग्न होता. सकाळी, नाश्ता करत असताना, काही लोक त्याच्याकडे एका विशेष
नजरेने पाहत असल्याचे त्याच्या लक्षात येते. त्याला रहीमची आठवण येते. “ खैर,ख़ून, खुसी ,बैर प्रीति ,मदपान
/ रहिमन दाबे ना दबैं, जानत
सकल जहान।रहीमचा दोहा आठवून त्याला खूप भीती वाटते. कोणी काही पाहिले असेल का, या विचारात तो पटकन नाश्ता संपवून
आपल्या खोलीत परत येतो. कोणी व्हिडिओ बनवला असेल का? कुणास ठाऊक. त्या रशियन बाईचं काय? ती तिच्या देशात परत जाईल. भारतात
सगळे त्यालाच पाहतील. त्याचे सामाजिक आयुष्य उद्ध्वस्त होईल. तो कुठेही तोंड दाखवू
शकणार नाही, घरी, कुटुंबात किंवा समाजात. आजकाल
व्हिडिओ आणि फोटो क्षणात व्हायरल होतात. त्याची व्हिडिओची भीती पटकन नाहीशी होते.
प्रत्येकाचे मोबाईल फोन जप्त केले आहेत. मग कोणी व्हिडिओ कसा काय बनवू शकेल? तो अचानक स्वतःच्या मूर्खपणावर
हसतो.जेव्हा तो ध्यान कक्षात पोहोचला, तेव्हा
त्याने आदल्या दिवशी शोक करणाऱ्या त्या स्त्रीला पाहिले. तिच्या सहकारी
स्त्रियांमध्ये ती स्वस्थ बसली होती. हे पाहून त्याचे मन सुखावले . लंडनहून आलेला
तो मुलगाही त्याच्याकडे पाहून हसला. मल्लिकालाही दिसली, पण मल्लिकाने त्याच्याकडे पाहीले
नाही. आज सकाळी थंडी वाढली होती. सर्वजण व्यवस्थित कपडे घालून आले होते, पण तिने मात्र नेहमीप्रमाणे बाही
नसलेला पोशाख घातला होता. एका बिहारीने मफलर इतका घट्ट बांधला होता की फक्त
नाकातून श्वास घेता येत होता आणि डोळे दिसत होते. कार्यकर्ता आला आणि त्याने
त्याचा मफलर सोडवला. ध्यानाचा वर्ग सुरू झाला होता. हिंदी आणि इंग्रजीमध्ये
ध्वनिमुद्रिका सूचना सुरू झाल्या होत्या. तो ध्यानात मग्न झाला होता.जेव्हा पोट
आणि इतर अवयव तृप्त होतात तेव्हा सर्व काही चांगले वाटते. मन प्रत्येक कामात
गुंतलेले असते.’ भूखे
भजन नही गोपाला,ले
तेरी कंठी,ले
तेरी माला!’ असं
नुसतंच म्हटलं जात नाही.
ध्यानाच्या या धरतीवर तो मुक्त आणि समाधानी असा
उपस्थीत आहे.असे म्हटले जाते की लहान मुलाला आधी अर्थ कळतो, नंतर शब्द. तसेच विनयच्या बाबतीतही
घडत आहे. त्याला आधी ध्यान समजले. ध्यान समजल्यानंतर, आता त्याला ध्यानाचा आनंद समजला
आहे. एक अलौकिक आनंद. म्हणून, जर
त्याने या विपश्यना अभ्यासक्रमात इंद्रियसुखाचा आनंद अनुभवला नसता,तर तो या परिपूर्णतेत ध्यान करू शकला नसता.तो वंचित
राहिला असता.कुणास ठाऊक?आज तो
खोल पाण्यात नाही, तर
ध्यानाच्या आकाशात उंच भरारी घेत आहे. निळ्या आकाशात पक्ष्याप्रमाणे.पाण्याचा
स्वतःचा आनंद असतो. आकाशाचा स्वतःचा आनंद असतो. तुलना करणे योग्य नाही.दोन्ही
अलौकिक आहेत. अलौकिक आनंद. कधीकधी, सकाळी
लवकर उठून आकाशाकडे पाहिल्याने माणूस सर्व काही विसरून जातो.जसे आपण तलावाच्या
पाण्यात स्वतःला पाहतो, तसेच
आपण आकाश पाहतो आणि त्यात उडतो.जसे डोळे, तसेच
आकाश.पक्ष्याप्रमाणे आकाशात हरवून जाणे हा देखील एक आनंद आहे. अखंड आनंद. आजच्या
ध्यानात, तो
पक्ष्याप्रमाणे आकाशात उंच भरारी घेत आहे. तो दिशाहीन होत आहे. त्याचा उड्डाणाचा
वेग वाढतच आहे, जणू
काही त्याला पृथ्वीची कक्षा सोडून आकाशात पोहोचायचे आहे.
तर मग तो अंतराळयान बनला आहे का? अंतराळयान की कुठलासा उपग्रह?
माहित नाही!
ध्यान हे सुद्धा एक यान आहे. यान आकाशात उंच उडते.
ध्यानातील मन. मनाची भरारी ही सुद्धा एक ध्यानच आहे. श्वासाचे येणे-जाणे, श्वासाचा स्पर्श अखेर काय आहे?. जेव्हा ते यान खोल पाण्यात बुडते, तेव्हा ते पाणबुडी बनते का? तसे वाटते. बरं, जर ते उपग्रह बनले, तर ते कधी पृथ्वीवर परत येईल का! तो
विचार करत राहतो. तो विचार करत राहतो, आणि
त्याला झोप यायला लागते . तो त्याच्या किशोरवयीन दिवसांमध्ये परत जातो. त्याची आई
त्याला अनेकदा मध्येच थांबवून, हलवून
विचारायची, "बाळा, तू किती झोपणार आहेस?" तो तिला मध्येच थांबवून म्हणायचा, "मी झोपत नाहीये, मी विचार करतोय." हे त्याच्या बाबतीत अनेकदा घडते:
जेव्हा तो खूप विचार करतो, तेव्हा
त्याला झोप येते. तो झोपत राहतो. तो विचार करत राहतो. विचार करणे आणि झोपणे
एकमेकांत गुंतलेले, एकमेकांना
पूरक आहेत. झोप ही विचारांसाठी खतासारखी आहे. ती पाण्यासारखी आहे. झोप ऊर्जा देते.
ताजेपणा देते. झोपेत तो घोरायला लागतो आहे. कार्यकर्ता येतो आणि त्याला हलवतो.
विनयसाठी ही रोजचीच गोष्ट आहे. तुम्ही याला एक घटना म्हणू शकता. एक अपघात.
प्रत्येक सत्रात त्याला झोपेची ही नौका सापडते. कधीकधी त्याचे वडील म्हणायचे, "तू किती झोपतोस?" तो वडिलांना कधीच उत्तर देत नसे. तो
आईला सांगायचा की, तो
झोपत नाही, विचार
करत असतो. जेव्हा तो सकाळी उशिरा पर्यंत झोपू लागला, तेव्हा एकदा त्याच्या वडिलांनी
त्याला सल्ला दिला, "सकाळी
उठून बघ, स्वर्गात
असल्यासारखं वाटेल." जेव्हा
त्याचे वडील हे अनेकदा म्हणाले, तेव्हा
एके दिवशी विनय वडिलांना म्हणाला,
"कधीतरी सकाळी उशिरा पर्यन्त झोपून बघा; तुम्हाला त्यात स्वर्गापेक्षाही
जास्त आनंद मिळेल." त्याचे
वडील संतापले. ते त्याच्या आत्याला म्हणाले, " तो खूप निर्लज्ज झाला आहे!"
विनय या विपश्यना शिबीरात ही निर्लज्ज झाला आहे. सर्व
बाबतीतच निर्लज्जता . रोज झोपेमुळे ध्यानकक्षात उशिरा पोहोचणे. मग, ध्यान करताना ही तो अधूनमधून
पेंगतो. बसल्या बसल्या झोपी जाणे आणि खाली झोक जाणे हे तर नित्याचेच झाले आहे. मग, अधूनमधून स्त्रियांकडे चोरून पाहणे.
त्यांच्या शरीराकडे टक लावून पाहणे. आणि मग, कामवासनेत रमून जाणे. ही तर निव्वळ
निर्लज्जता आहे. अशा शिबीरात जिथे बोलण्यास मनाई आहे. अगदी इशारे देण्यासही मनाई
आहे. तिथे ही कामवासना ,विपश्यने
तली कामवासना. ही निर्लज्जतेची परिसीमा आहे. जर कोणी
त्याला पाहिले, तर
त्याला ताबडतोब विपश्यना शिबीरातून बाहेरचा रस्ता दाखवला जाईल. अतिशय बेशिस्त आहे.
पण विनय तरी काय करणार? कामवासना
हा विषयच असा आहे. अग्नीचा सागर आहे. हा खेळ फक्त सर्व धोके पत्करूनच खेळला जाऊ
शकतो. याच्यापुढे राज मुकुट आणि सिंहासन देखील निरर्थक आहेत. त्याला मनात एक असभ्य
गाणे आठवते ताज चाहिये ,ना तख़्त … तेरा प्यार चाहिये , हर वक्त चाहिये….!
जेव्हा कोणी त्याची झोपमोड करते, तेव्हा त्याला खूप वाईट वाटते. जो
त्याची झोपमोड करतो, तो
जणू शत्रूच वाटतो. संपूर्ण जग एका बाजूला, तर झोप दुसऱ्या बाजूला. पण इथे, विपश्यनेत, झोपेची डुलकी खूप सुखद वाटते. बारा
तासांच्या ध्यानात, झोप
ही एकमेव गोष्ट आहे जी विजेच्या
झटक्या प्रमाणे सर्व थकवा आणि कंटाळा दूर करते. ती
त्याला ताजेतवाने करते. तो फक्त
दोन गोष्टी ऐकू शकतो: एक त्याच्या हृदयातील आणि दुसरी झोपे बाबत.झोप ही एकमेव
गोष्ट आहे जी सर्व ताणतणाव आणि अडचणींपासून विश्रांती देते. ती त्याचे ध्यान अधिक
गहीरे आणि परिपूर्ण बनवते, जसे ए
सी वातानुकूलन करते . त्याच्या मनाची हिरवळ अधिक बहरते. प्रणय आणि झोप हे दोन्ही व्यक्तीला
ताजेतवाने करणारे घटक आहेत. या दोन्हींमध्ये व्यत्यय आल्यास मन विचलित होते.
आपल्या ध्यानमय उड्डाणात तो काय विचार करत असतो , कोण जाणे. तर मग, पक्षीसुद्धा उडताना विचार करतात का? त्याला माहीत नाही. पण त्याने
अनेकदा पाहिले आहे की, दररोज
संध्याकाळी अनेक ठिकाणी खूप पक्षी एकत्र जमतात. त्यांचे थवेच्या थवे. एका लांब
विजेच्या तारेवर. रेल्वे प्लॅटफॉर्मच्या छतावर. एखाद्या प्रचंड झाडावर. शेकडोच्या
संख्येने. दररोज जवळजवळ त्याच वेळी. जणू काही त्यांची संसदच भरली आहे. ते इकडे
तिकडे उड्या मारतात आणि एकमेकांशी गप्पा मारतात. मग, दहा-वीस मिनिटांनी ते निघून जातात.
दिवसाचा थकवा दूर करून, एकमेकांची
विचारपूस करून, ते
वेगवेगळ्या दिशांना उडून जातात. त्याचप्रमाणे, त्याने काही मूक बधीर लोक कुठे ना
कुठे एकत्र जमलेले पाहिले आहेत. ते येतात, हावभावांनी संवाद साधतात, हसतात, भांडतात आणि मग हळूच निघून जातात.
तर मग, या
विपश्यना शिबीरात जमलेले हे लोक, ध्यान
करणारे हे लोक,हे
काय पक्षी
आहेत ? की ते
मूक बधीर आहेत? इथे
तर बोलण्यास सक्त मनाई आहे. हावभावांनी बोलण्यासही मनाई आहे. मग हे सर्व साधक तरी
कोण आहेत? आणि
या विपश्यना शिबिरात वाजणारी घंटा, कधी
शाळेच्या घंटेची तर कधी तुरुंगाच्या घंटेची आठवण करून देते. शाळेत, घंटेवरून वर्ग आणि विषय समजतो.
तुरुंगात, उठण्यासाठी, झोपण्यासाठी आणि जेवण्यासाठी घंटा
वाजते. मग विपश्यना केंद्र एक प्रकारचा तुरुंगच आहे का? असा तुरुंग जिथे बोलण्यावर, भेटण्यावर वगैरेही बंदी आहे. जणू
काही सिगारेटच्या पाकिटांवर आणि दारूच्या बाटल्यांवर 'आरोग्यासाठी हानिकारक' असे लिहिलेले आहे. तरीही लोक
सिगारेट ओढतात आणि दारू पितात.
आणि इथे?
अशा इतक्या निर्बंधांखाली ध्यान. निर्बंधांखाली ध्यान
कसे होऊ शकते? पण ते
होत आहे. विनय स्वतःलाच प्रश्न विचारत असावा. या शांततेच्या राजधानीत, तर्काला स्थान नाही, तर आदेशांना आहे. लष्करी शिस्त
ठासून भरलेली आहे. तर्क नाही, वितर्क
नाही.युक्तिवाद नाही. फक्त आदेश. मनाला अनेकदा बंड करावेसे वाटते. जर सत्य बोलणे
हे बंड असेल, तर
होय, आम्हीही
बंडखोर आहोत! विनयला म्हणावेसे वाटते. पण हे कुठे आणि कोणाला सांगावे? इथे कोणी ऐकणार नाही. कोणी बोलणारही
नाही. जर त्याने प्रश्न विचारला, तर
विपश्यना शिबिरातून हकालपट्टीची धमकी त्याच्यावर टांगती तलवार आहे.असा लेखी करार
झाला आहे. मग ध्यानाचा आनंद, प्रत्येक
क्षणी कमी होणारा ताण तणाव , हा
लाभ कोणी कसा सोडू शकेल? एक
डॉक्टरचा मुलगा आहे. बावीस वर्षांचा. तोही विपश्यनेचा सराव करायला आला आहे.
व्यसनाच्या सर्व मर्यादा ओलांडून आयुष्य उद्ध्वस्त केल्यानंतर तो सुधारणा
करण्यासाठी आला आहे. जेव्हा डॉक्टरांचे सर्व उपचार संपले, तेव्हा त्यांना विपश्यनेच्या पायरी
वर आशेचा शेवटचा किरण सापडला. या मुलाने दारू, ड्रग्स, मसाला स्मॅक, हेरॉईन इत्यादी काहीही सोडले
नव्हते. आता तो विपश्यना शिबिरात हे सर्व सोडायला शिकत आहे. तो इथे दुसऱ्यांदा आला
आहे.पहिल्या वेळी त्याला फक्त अंशतः यश मिळाले होते. या वेळी, त्याचे यश आणखी वाढेल या आशेने, डॉक्टरांनी आपल्या मुलाला इथे
पाठवले आहे. तो खूप देखणा आहे. या चॉकलेटसारख्या चेहऱ्याच्या मुलाकडे पाहून, तो इतका गंभीर व्यसनी असेल याची
कल्पना करणे कठीण आहे. त्याच्यासारखे लोक आपल्या आजारांपासून मुक्ती मिळवण्यासाठी
इथे आले आहेत. ते तणाव कमी करण्यासाठी आले आहेत.किती प्रमाणात यश मिळते, त्यांचे त्यांनाच माहीत! किती लोक दुःखी कष्टी आहेत हे फक्त त्या
लोकांनाच माहीत आहे. विपश्यनेतील ध्यान किती जखमा भरून काढत आहे हे कोणालाच माहीत
नाही. विनयलाही माहीत नाही.
विनयला हे नक्कीच माहीत आहे की या विपश्यना शिबीरात
येऊन तो दोन प्रकारच्या नशेच्या आहारी गेला आहे. एक आहे ध्यानाची नशा. दुसरी आहे
मल्लिकेची नशा. व्यसन, मग ते
कोणतेही असो, नेहमीच
वाईट असते; हे
विनयला माहीत आहे. सध्या तो ध्यानात गर्क आहे, आकाशाला उद्देशून गात आहे. डोळे
मिटून, निळ्या
आकाशाला उद्देशून गात आहे. आकाशात हरवून गेलेल्या विनयला अचानक "उत्तम उत्तम !" या आवाजाने व्यत्यय येतो. ध्यानसत्र
संपले आहे.
बाहेर
कोवळे ऊन आहे, पण मनात खूप खूप गारठा आहे.
या शिबीरात इतर काही स्त्रियाही आहेत. जणू काही त्या
आपलं स्त्रीत्व, आपल्या
शरीराचे ओझे उचलून घेऊन फिरत आहेत. का,माहीत
नाही.
खरं तर, काही
स्त्रिया, त्यांच्या
आयुष्याच्या संध्याकाळी,
शरीरा
शिवाय प्रेमाची परी कल्पना करतात. किंबहुना, त्या या अमूर्त प्रेमाचे समर्थनही
करतात. मग, या
स्त्रिया मीरा बनण्याची आकांक्षा बाळगतात का? पण मीरा कृष्णाला बालपणापासून
ओळखते. शारीरिक कृष्णाला नाही, तर
मूर्तीला. हा प्रेमाचा आध्यात्मिक पैलू आहे. हे प्रेम अलौकिक आहे. ते गहन आहे.
म्हणूनच रजनीश म्हणायचे की मीरा मद्यासारखी आहे. विनयचा विश्वास आहे की प्रेम
सुद्धा एक मद्यच आहे. एक नशा. शाश्वत. पण शरीरा शिवाय प्रेमाची परी कल्पना करणे
म्हणजे प्रेमापासून पळ काढणे आहे. हे स्वतःशी खोटे बोलण्यासारखे आहे. ज्याला वाटेल
तो हे बोलू शकतो. सत्य हे आहे की प्रेम जीवन जगणे शिकवते, पळवाट नाही. यात शरीरसुद्धा एक
महत्त्वाचा घटक आहे. ज्या स्त्रिया शरीर विसरतात त्यांचे प्रकरण वेगळे आहे. पण
शरीरा शिवाय प्रेमाचा विचार करणे म्हणजे प्रेमाचेच विभाजन आहे. शरीरा शिवाय प्रेम
अपूर्ण आहे. अन्न कितीही चांगले असले, कितीही
स्वादिष्ट असले तरी, केवळ
पाहिल्याने पोट भरत नाही. जरी देह तुमच्या समोर असला,जरी तुम्ही कोणावर प्रेम करत असलात, तरीही तुम्ही अमूर्त गोष्टींची
कल्पना करत असाल, तर
तुमच्यापेक्षा दुर्दैवी कोणी नाही. ‘तुम्हीं
हो माता, पिता
तुम्हीं हो,तुम्हीं
हो बंधु, सखा
तुम्हीं हो!’ हात
जोडून गाण्यात काहीच हरकत नाही. यातही प्रेम आहे.कोणीही गाऊ शकतो. त्यावर कोणतीही
बंदी नाही. आपली आपली नशा असते.
तो आपल्या खोलीत घोंगडीत गुंडाळून पडून आहे. त्याला
अस्वस्थ वाटत आहे. नाश्त्याच्या वेळी लोकांच्या नजरा त्याला काळजाला हुडहुडी
भरणाऱ्या थंडीसारख्या त्याला बोचत आहेत. भीती तर त्याहूनही जास्त आहे. त्याला
कलंकाची प्रचंड भीती वाटत आहे.
"मग, तो
आता मल्लिकाला भेटणार नाही का?"
विनय जवळ जवळ स्वतःशीच विचारतो. त्याला उत्तर देता येत
नाही. उत्तर कसं असू शकतं? अशा
गोष्टींना उत्तर नसतं. घंटा वाजली आहे. जास्त विचार न करता, तो अंथरुणातून उठतो आणि
ध्यानकक्षाकडे जातो. वाटेत, त्याला
घंटा वाजवून लोकांना उठवणारा कामगार दिसतो. तो विनयकडे पाहून आश्चर्याने हसतो.
विनयही सहजपणे हसतो. मल्लिकासुद्धा ध्यानकक्षात येते. तिला पाहताच तो थांबतो. तो
स्तब्ध उभा राहतो. ती अनपेक्षितपणे त्याच्या जवळून जाते. ती त्याला चिमटा काढते, आणि मग चिमणीसारखी उडी मारून निघून
जाते. तो तिच्या नितंबांकडे पाहत तिचा पाठलाग करतो. त्याला तिच्या नितंबांमध्ये एक
आकर्षक हालचाल जाणवते. एक प्रकारची घालमेल, जणू काही तिच्या आत काहीतरी आहे. आज
तिनेही लाल रंगाची टोपी घातली आहे. विनयला, ‘सर पे टोपी लाल रेशमी, गाणे आठवते. गाण्यात वर्णन केलेल्या
एखाद्या राजकुमाराप्रमाणे तो आपल्या आसनावर स्थिरावतो. ध्वनी मुद्रिका अजून वाजली
नाही. आचार्य अजून आलेले नाहीत. यावरून हे दिसून येते की, आज एका चांगल्या मुलाप्रमाणे तो
ध्यानकक्षात वेळेवर आला आहे. त्याला कोणाकडेही बघायचे नाही. कोणी त्याच्याकडे एकटक
पाहावे असे त्याला वाटत नाही. त्याचे डोळे मिटलेले आहेत. तो आनापानाच्या
पायऱ्यांवर आहे. तो परमानंदाच्या सागराचा अनुभव घेत आहे. ध्वनी मुद्रिका सुरू आहे. त्याला सूचना मिळत आहेत. तो
आकाशाकडे झेपावत आहे. पक्ष्याप्रमाणे तो ध्यानाच्या परमोच्च बिंदूचा अनुभव घेत
आहे. अचानक, कसा
कोण जाणे, तो
पाण्यावर उतरला आहे. जणू काही एखादे विमान धावपट्टीवर उतरले आहे. उतरल्यानंतर, तो वेगाने धावत आहे. बेभान होऊन.
हे काय आहे? हा
कसला प्रवास आहे?
त्याला समजत नाही. तो प्रयत्नही करत नाही. हे ध्यान
आहे. ते त्याला कुठेही, कसेही
घेऊन जावो. कोणत्याही दिशेने. त्याने स्वतःला मुक्त केले आहे. जसे दंतवैद्य
म्हणतात, "तोंड
सैल सोडा." इंजेक्शन
देणारा म्हणतो, "हात
सैल सोडा." त्यानेही
स्वतःला त्याच प्रकारे मुक्त केले आहे. त्याने आपला हट्टीपणा सोडून दिला आहे.
आपल्या श्वासाद्वारे. जसे त्याने काल रात्री स्वतःला मल्लिकेला समर्पित केले. तर
मग, तो
सुकाणू नसलेली नाव आहे का? जी
त्याला पाहिजे तिथे, पाहिजे
तसे घेऊन जाऊ शकते. कधी त्याचा श्वास, कधी
त्याची झोप, कधी
मल्लिका. जणू काही त्याचे अस्तित्वच नाही. तो विचार करतो. तो विचार करतो की हे
अस्तित्वच तर त्याला नष्ट करायचे आहे. हाच या विपश्यनेचा उद्देश आहे. अखेर, जर त्याचे अस्तित्व असेल, तर तो तटस्थ कसा राहू शकतो? तो तटस्थ कसा होऊ शकतो! हेच त्याला
शिकायचे आहे. गोरखनाथ म्हणतात,
“मरो
वै जोगी मरो,मरण
है मिठा /मरणी
मरौ जिस मरणी, गोरख
मरि दीठा!." गोरख अहंकाराच्या संहाराबद्दल
बोलतात. अहंकार मेला की माणूस आपोआप तटस्थ होतो. केवळ अहंकार विरहित व्यक्तीच
स्वतःप्रति आणि जगाप्रती तटस्थ राहू शकते. दुःख आणि सुख या दोन्हींपासून मुक्त होऊ
शकते. जेव्हा 'माझे' किंवा 'तुझे' असे
काही नसते, तेव्हा
दुःख आणि सुखाचा काय उपयोग? आनंदाच्या
या तेजात स्वतःला पाहून विनय विनम्र झाला आहे.
जेवणाची घंटा वाजली आहे. विनय आपल्या जागेवरून उठत
आहे. उठताना त्याला प्रश्न पडतो की,जेवणाच्या
हॉलमधल्या लोकांना तो कसा सामोरा जाईल. मग तो विचार करतो, कुणास ठाऊक, कदाचित त्याच्याकडे टक लावून
पाहणारे लोक केवळ एक भ्रम असतील. कारण जर कोणाच्या लक्षात आले असते, तर त्यांनी तक्रार केली असती.
आचार्य किंवा कॅम्प व्यवस्थापनाने त्याला बोलावून चौकशी केली असती. जे अजून झालेलं
नाही. याचा अर्थ तिथे काहीच नाहीये. जे काही आहे, तो केवळ एक भ्रम आहे. त्याच्या मनात
अपराधीपणाची भावना आहे. एक पाप. असा विचार करून तो हसतो. तो निर्धास्त होतो. तो
छाती फुगवून जेवणाच्या हॉलमध्ये बसून जेवतो. ह्या व्यक्तीकडे आणि त्या व्यक्तीकडे
टक लावून पाहत. जणू एखादा चोर पोलिस अधिकाऱ्याला ओरडत आहे. त्याच्याकडे कोणीही
पाहत नाहीये. मग, सकाळची
ती नजर त्या चोराच्या मनातले चांदणे होत का? हे दृश्य पाहून त्याला शांत वाटते.
त्याच्या मनातील भीती नाहीशी होते. जेवण झाल्यावर तो आपल्या खोलीत परत येतो आणि
निश्चिंतपणे झोपी जातो.
ध्यान आणि झोप. झोप आणि ध्यान. झोपेत ध्यान. ध्यानात
झोप. जणू काही तो भूषण ची उक्ती स्वतःशी पुन्हा पुन्हा म्हणत आहे, "साडी ने स्त्री ला परिधान केले असते, किंवा स्त्रीने साडी परिधान केलेली
असते ! " तर मग, द्रौपदी प्रमाणेच तोही
वस्त्रहरणाच्या त्याच सापळ्यात अडकला आहे का? मग ही मल्लिका कोण आहे? तिचा सन्मान जपणारा तो कृष्ण कोण
आहे? हा
कृष्ण द्रौपदीचे ऋण फेडत आहे का? किती
लोकांना हे माहीत आहे की, एकदा
कृष्ण पांडवांसोबत एका तलावात स्नान करत असताना, त्याचे लंगोट सुटून हरवले. द्रौपदी
तिच्या मैत्रिणींसोबत शेजारच्याच तलावात स्नान करत होती. जेव्हा द्रौपदीला हे कळले, तेव्हा तिने आपली साडी फाडली आणि
तिचा एक तुकडा कृष्णाच्या दिशेने फेकला. कृतज्ञ कृष्ण संपूर्ण सभेसमोर द्रौपदीचा
सन्मान वाचवून ते ऋण फेडतो. ध्यान, झोप
आणि मल्लिका यांनी या विपश्यना शिबीरात नम्रतेचा एक विचित्र त्रिकोण निर्माण केला
आहे. विपश्यनेतील कामवासनेची ही जुगलबंदी त्याला कुठे घेऊन जाईल हे विनयला
स्वतःलाही माहीत नाही. तो तर
बस ‘जाहि
विधि राखे राम, ताहि
विधि रहिये / विधि का विधान जान हानि लाभ सहिए। ‘ ह्या वर विश्वास करत आला. आणि इथे तर आता बुद्धम शरणं गच्छामि
धम्मम
शरणं गच्छामि संघम शरणं गच्छामि
ह्या मंत्रात निबद्ध आहे आणि बुद्ध म्हणतात, काहीही शाश्वत नाही. सर्व काही
बदलणार आहे.सर्व काही नष्ट होईल. त्याने बुद्धांचे हे वचन स्वीकारले आहे.
तर मग मल्लिकाचाही मृत्यू होईल का?
मल्लिका हे नाव तात्पुरतं आहे. त्याने ते स्वतःच्या
सोयीसाठी ठेवलं आहे. तिचं खरं नाव काय आहे हे कोणाला माहीत? त्यालाही माहीत नाही की त्याला तिचं
खरं नाव कधी कळेल की नाही. त्याला हे कसं कळणार होतं की, कोणताही संवाद न साधता, तो एका अज्ञात, रशियन स्त्रीशी इतका जोडला जाईल, इतका खोलवर गुंतून जाईल.
त्यांच्याशिवाय दुसऱ्या कोणालाही माहीत नाही. न कळलेलंच बरं. दोन ध्यानसत्रं आणि
एक प्रवचनसत्र बाकी आहेत. पण तो रात्री मोगऱ्याच्या फुलांच्या सुगंधाची आतुरतेने
वाट पाहत आहे. तो वाट पाहत आहे. तो ध्यान करायला आला आहे.विपश्यनेचा सराव करायला.
आणि तो कामवासनेत बुडाला आहे. जणू काही कामवासना हेच ध्यान आहे. ध्यान हीच
कामवासना आहे. तो बैरागी व्हायला आला होता, पण मल्लिकाच्या प्रेमप्रकरणात तो
रांझा बनला आहे.
धन्य
आहे.
ही मल्लिका आहे की मेनका? काहीही असो, विनय विश्वामित्र नाही. तो निश्चितच
मेनकेचा प्रियकर आहे. मग, मेनकेच्या
रूपात असलेली मल्लिका सुद्धा विश्वामित्राची तपश्चर्या मोडू पाहतेय का? पण विनय काही तपस्वी नाही. तो
कोणतीही कठोर तपश्चर्या करत नाही. मग त्याची तपश्चर्या कोण मोडेल? हा एक योगायोग आहे. एक आकर्षण आणि
नियती. हे प्रेम आहे. एखाद्या फुलाच्या उमलण्यासारखं. हे उमलणंच एक इच्छा बनलं.
भूक आणि तहान त्याचाच एक भाग बनले. फुलांच्या उमलण्यात निसर्गाची भूमिका असते.
त्यामुळे, मल्लिका
आणि विनय यांच्यातील ही उत्स्फूर्त जवळीकसुद्धा निसर्गाचीच देणगी आहे. हे नातं
हेतु पुरस्सर नाही, ते
उत्स्फूर्त आहे. जर मोगऱ्याच्या फुलासारखी सुगंधित मल्लिका विनयला भेटते, तर विनय, विनयवत , नम्रतेने मल्लिकाच्या प्रेमापुढे
शरण जातो. विनयला कसे कळणार होते की चार-पाच दिवस आणि केवळ दोन रात्रींचे हे नाते
इतके सुगंधित, इतके
सुवासिक, इतके
मोहक होईल.
तर मग मल्लिकाला माहीत आहे का?
जेव्हा मल्लिका ध्यानसत्रादरम्यान बीना बाहीच्या
कपड्यांत त्याला भेटते, तेव्हा
तिच्या कोमल, मृदुल बाहूंमध्ये असंख्य फुले
उमलतात. प्रवचनाच्या वेळी ती तिथे नसते. ती इंग्रजी प्रवचन कक्षात असते आणि विनय
हिंदी प्रवचन कक्षात असतो. या प्रवचना दरम्यान तो मल्लिकाचा अजिबात विचार करत
नाही. आचार्य सत्यनारायण गोयनकांचे प्रवचन इतके मनमोहक आणि परिपक्व असते की ते इतर विचारांना जागाच सोडत नाही. तो
मल्लिकाला विसरतो. प्रवचनानंतर थोड्याच वेळात, विनय, थकलेला असूनही, थोडा वेळ फिरायला जातो. याच
फिरण्यादरम्यान मल्लिका त्याला भेटते. सकाळच्या आणि दुपारच्या जेवणावेळी
चेष्टामस्करी केल्यानंतर, ध्यान
कक्षात एकमेकांना चिडवल्या नंतर, ती
त्याला फिरताना भेटते. ते अचानक भेटतात. दोघांच्या ओठांत आग असते, श्वासात उत्कटता असते. ते बेभान
होऊन चुंबन घेतात आणि या थंड गार हवेत रात्रीत निर्वस्त्र होतात. कोणता ही संकोच न
करता! अशक्य गोष्ट शक्य होते.मिलनाच्या आवेगात तो वाहून जातो. आज पुन्हा तीच रात्र
आहे आणि तीच मल्लिका. मल्लिका त्याच्या मिठीत सुखावत आहे आणि रात्र ही. या थंड गार
वातावरणात रात्रीची ही संवेदना विनयसाठी आनंदाचा स्रोत बनली आहे. कामवासनेच्या लाटा
विनयच्या शरीरातून उसळत आहेत. आकाशा प्रमाणे सर्व बाजूंनी त्याला घेरून टाकले आहे.
जणू काही आकाश पृथ्वीवर झुकत आहे. विनय, पृथ्वी
बनून, मल्लिकाच्या
आकाशात हरवून जात आहे. जणू काही आकाशाने पृथ्वीला वेढले आहे. मल्लिका
पुरुषाप्रमाणे चुंबन घेत आहे. चुंबन घेताना, तिचे ओठ अनियंत्रित होतात. ती
जिभेने चाटू लागते. ती चुंबन घेत आहे. मल्लिकाचे ओठ आणि जीभ विनयच्या शरीरावर इकडे
तिकडे फिरत आहेत, जणू
काही ते लाँग ड्राईव्हवर आहेत. जसा एखादा भुंगा फुलातून परागकण शोषतो, त्याचप्रमाणे मल्लिका परागकण शोषत
आहे. कोण जाणे ती कोणत्या प्रकारचे मध गोळा करत आहे.
विनय अतिशय आनंदात आहे. शुद्ध परमानंद.
मल्लिका अचानक माती बनली आहे. तिने विनयला कुंभाराचे
चाक बनवले आहे. जणू काही ती मातीचे भांडे बनवत आहे. ती हळूहळू चाकावर फिरत आहे. ती
भांडे बनवत आहे, घागर, सुरई की आणखी काही, हे फक्त तिलाच माहीत आहे. ती सतत
चाकावर नाचत आहे. गोल गोल फिरत आहे. हळूहळू. हळूहळू, सावकाशपणे वेग वाढवत आहे. जणू काही
ती वाहतुकीत अडकली आहे. हळूहळू, सावकाश, दुसऱ्या गिअरमध्ये. एक गाडी पुढे
जात आहे. थांबत आहे आणि थांबत आहे. क्लच सोडत आहे. गिअर बदलत आहे. कधी पहिला, कधी दुसरा, कधी तिसरा . मग अचानक दुसरा . जणू
काही वाहतूक कोंडी संपली आहे. ती टॉप गिअरमध्ये आहे आणि तिने वेग वाढवला आहे. वेग
इतका जास्त आहे की कुंभाराच्या चाकावर तयार होणारे भांडे घोडा बनले आहे. ती धापा
टाकत आहे. धापा टाकत, झोपाळ्यासारखी
झुलत आहे. जणू काही ती घोड्यावर बसली आहे आणि घोडा धावत आहे. तिला संपूर्ण पृथ्वी
फिरायची आहे. एका बेदरकार घोडेस्वाराप्रमाणे, ती बेदरकार झाली आहे. गोंधळलेली ती
घोड्याची मान धरून खाली पडली आहे. पृथ्वी आणि आकाश यांतील अंतर नाहीसे झाले आहे.
यश, सफल
मिलनाचा आनंद मल्लिकाच्या शरीराच्या प्रत्येक रोमछिद्रातून ओसंडून वाहत आहे. विनय
तिच्या तृप्तीच्या आनंदात भिजून गेला आहे.स्वतःच्या ही सुखाने तृप्त झाला आहे.
दूरवरून चंद्राशिवाय दुसरे कोणीही त्यांना पाहत नव्हते
असे वाटत होते.शीतल चांदणे जणू मल्लिकाच्या चंदनी शरीराला स्पर्श करत होते.देहाला
स्पर्श करणाऱ्या या चांदण्यांच्या दृश्याने विनय मंत्रमुग्ध झाला होता.
सकाळी घंटा वाजताच तो लगेच अंथरुणातून उठला.आंघोळ करून
ध्यानकक्षात पोहोचल्यावर, तिथे
जेमतेम पाच-सात ध्यानस्थ साधक उपस्थित होते. नेहमी उशिरा येणारा इतक्या लवकर कसा
आला असेल या विचारात सगळे त्याच्याकडे पाहून हसले. विनय मल्लिकाच्या दर्शनासाठी
धावत आला होता. झोपेला तिलांजली देवून. आळसाला दूर सारून.पण सगळं काही अयशस्वी
ठरलं होतं. पण विनय निराश झाला नव्हता. तो खाली बसला,त्याची नजर दारावर खिळली होती,जणू काही मल्लिकाच्या स्वागता साठीच त्याचे डोळे वाटे
कडे लागले होते.आपल्या मनाच्या हिंदोळ्यावर बसून, मल्लिकाला रिझवण्यासाठी तो तिची
प्रतिक्षा करत होता. मल्लिकाने कोणता अत्तर लावला होता कोणास ठाऊक, पण ती दारापर्यंत पोहोचण्या आधीच
चाहूल लागली. ती आत आली आणि विनयला आधीच बसलेला पाहून दचकली. विनयने डोळ्यांनीच
तिचे स्वागत केले. काही कारणास्तव, ती
त्याच्या जवळ गेली, पटकन
वळली आणि आपल्या आसनावर बसली. हे सर्व इतक्या पटकन घडले की कोणालाही ते कळले नाही.
आज, तिचे
कळीसारखे, कोमल
बाहू बाही नसलेले नव्हते. ते झाकलेले होते, कोपरापर्यंत पोहोचलेले. तिने
केसांवर स्कार्फ घातला होता. मग, तिला
काल रात्री थंडी वाजली का? या
विचाराने त्याला थोडी काळजी वाटली. तोपर्यंत आचार्य आले होते. विनयला बसलेला पाहून
आचार्यांनाही आश्चर्य वाटले. विशेष रीतीने डोळे मोठे करून त्यांनी आपले आश्चर्य
आणि समाधान व्यक्त केले. ती भावना अशी होती की, एक बिघडलेला विद्यार्थी सुधारला
होता. ते काहीसे असे होते. विनय परीक्षा हॉल मध्ये उशिरा येत असे हे आचार्यांना
माहीत नव्हते. तो रोज ऑफिसला उशिरा यायचा. एक गाणं आहे, 'मैं देर करता नहीं,देर हो जाती है.’ त्यामुळे जो कोणी आळशी असतो त्याला
उशीर होणारच. तो सगळीकडे असतो. या विलंबामुळे विनयच्या अनेकदा ट्रेन आणि विमान
चुकतात. तो अनेकदा चुकतो. पण आचार्यांना आणि लोकांना हे सगळं कसं कळणार? त्यांना कसं कळणार की ही आळशीपणाचीच
सुंदरता आहे? आणि
जेव्हा विनय उशिरा किंवा लवकर येतो तेव्हा लोक चकित होतात. त्यांचे डोळे मोठे
होतात. या विपश्यना शिबिरात कोणीही हावभावांनी सुद्धा संवाद साधू नये असा नियम
करून काही उपयोग नाही. लोकांचे डोळे नेहमी बोलतात. जसे आचार्यांचे डोळे आत्ता
बोलले. जसे विनय आला तेव्हा तिथे उपस्थित असलेले लोक बोलले.मल्लिकाचे डोळेही
बोलले. देहबोली सुद्धा बोलत राहते. केवळ मल्लिकाचेच नाही, तर इतर स्त्रियांचे डोळे, स्तन, नितंब सुद्धा बोलत राहतात.काही
स्त्रियांची दुःखी शरीरंही दिसतात. जणू त्यांच्या आयुष्यात जीवच उरला नाही. त्या
मृतदेहांप्रमाणे हालचाल करताना दिसतात. त्यांचे सर्व हास्य आणि आनंद जणू नाहीसा
झाला आहे. त्या स्वतः निर्जीव आणि अशुभ राहतात, त्या पाहणाऱ्यांना आणि त्यांच्या
सभोवतालच्या लोकांनाही निर्जीव आणि अशुभ बनवतात. त्या आपल्या अशुभतेने त्यांचा
आनंद हिसकावून घेतात.
विनयला मल्लिकासारख्या आनंदी आणि उत्साही स्त्रिया
आवडतात. त्यांचे भरगच्च शरीर मोहक असते. त्या सुगंधी असतात आणि दुसर्याला ही
सुवासिक बनवतात .त्या नित्य नवीन सृष्टी निर्माण करतात.
तो गहन ध्यानात आहे. आज ध्यानात असताना, तो पाण्यापर्यंत किंवा आकाशापर्यंत
पोहोचलेला नाही. तो हिमालयात पोहोचला आहे. हिमालय, एक असे ठिकाण जिथे तो कधीच गेला
नाही. त्याने ते फक्त फोटो आणि चित्रपटांमध्ये पाहिले आहे. तो आकाशातही कधी गेला
नाही.पण तो अनेकदा विमानातून प्रवास करून आला आहे.तो ढगांच्या पलीकडे गेला आहे.
खूप दूर वरून ही त्याने आकाश पाहिले आहे. त्याने ढगांचे जंगल पाहिले आहे. तो हे
दररोज पृथ्वीवरून पाहतो.आकाशाच्या रूपात तो सूर्य, चंद्र आणि सर्व तारे पाहतो.
ढगसुद्धा. आकाशातील ढगांचे समूह एक वेगळेच जग निर्माण करतात. ते ढगांच्या घनदाट
जंगलासारखे आहे. ढगांची वस्ती. जणू काही माणसेही ढगच आहेत. ढग, वीज आणि समुद्र कधीही तहान भागवत
नाहीत. पण हिमालयातून वाहणारी गंगा तहान भागवते. माणसांची आणि पृथ्वीचीही.
गंगेच्या पाण्याला अमृत मानले जाते. तर, ध्यान
करताना त्याच्या श्वासासोबत हिमालय प्रकट झाला असेल, तर त्यात काहीतरी विशेष आहे. जर
काही असेल, तर ते
नक्कीच महत्त्वपूर्ण असले पाहिजे. हिमालयाचा विचार मनात येताच, टायगर हिल आणि कांचनजंगा सुद्धा
मनात आले. विनयला बर्फ आवडतो. बर्फाळ ठिकाणेही. पण या थंड वातावरणात, हिमालयाचा विचार त्याला अधिकच
गारठवून टाकतो. हे अगदी एखाद्याने टायरमध्ये गरजेपेक्षा जास्त हवा भरण्यासारखं
आहे. अगदी तसंच. हा हिमालय आहे की फक्त बर्फ? केवळ बर्फ म्हणजे उंच शिखर असू शकत
नाही. हा हिमालय आहे. मल्लिका बर्फाळ प्रदेशातून आली आहे आणि म्हणूनच तिच्या
विचारांमध्ये फक्त बर्फच दिसतो, असं
शक्य आहे का? हिमालय
आणि आकाश यांच्यात खूप कमी अंतर आहे. किमान फोटोंमध्ये तरी तसंच दिसतं. पृथ्वीवरून
सुद्धा आकाश खूप जवळ वाटतं. तो इकडे तिकडे भटकतो. पण भटकल्यानंतर तो पुनः पुनः हिमालयावर पोहोचतो
.जसं एखादा पक्षी विमानावरुन उडून जातो आणि मग परत विमानावरच येतो.
घरी असता तर बायकोला विचारलं असतं की याचा अर्थ काय
आहे. माहित
नाही की प्रत्येक स्वप्न-प्रतीकाचे काहीतरी उत्तर तिच्या कडे कसं असतं. की त्याचा
हा अर्थ असतो. विनय त्याच्या स्वप्नात कधीकधी दिसणाऱ्या स्त्रियांबद्दल कधीच
विचारत नाही. कारण आयुष्यात त्याला शांती आवडते. आणि ध्यानात, हा हिमालय सुद्धा त्याला अथांग
शांती देत आहे. ध्यानाचे अंतिम ध्येय शांती आहे. मनाची शांती. मग ती पाण्यात, खोल पाण्यात, निळ्या आकाशात, शुभ्र हिमालयात, किंवा डोलणाऱ्या, मोहक मल्लिकेत सापडो. त्याचा अर्थ
आणि उद्देश केवळ शांती आहे.शाश्वत शांती. सर्व साधना, सर्व ध्यान हे शांती साठीच आहे.
जिथे शांती आहे, तिथे
सुख, आनंद
आहे. जिथे आनंद आहे, तिथे
समाधान आहे. शांतीने इतकी नीरवता आणली आहे की झोपेची नौका पुन्हा प्रकट झाली आहे.
स्तब्ध झालेला विनय स्वतःच्या घोरण्याच्या आवाजाने हादरला आहे. जणू काही झोपेची
नाव जोरदार प्रवाहात अचानक उलटली आहे. ध्यानाच्या प्रवाहात पृथ्वीवर परत येणेही
सोपे नाही. तो हिमालयात बुडाला आहे. हिमालयाच्या शुभ्रतेत. तो स्वतःला हिमालयाच्या
वितळणाऱ्या बर्फात भिजलेला, विरघळणारा, बुडताना अनुभवतो. ध्वनी मुद्रिकेत
असे काहीतरी घडले आहे जे ध्यानात मग्न असल्यामुळे त्याला ऐकू आले नाही. पण काही
साधक छान ,छान !' म्हणत नाचू लागले आहेत. त्या
साधकांच्या आवाजात साधनेचा सुगंध आहे. साधनेची एक लहर आणि लवचिकता आहे. एक मधुर
संगीत आहे.
वाहवा! वाहवा!
तो नाश्त्याच्या टेबलापाशी आहे. एकटाच. मल्लिका
समोरच्या टेबलापाशी आहे. तिच्या ताटात कापलेल्या पपईच्या लांब फोडी आहेत. ती पपई
खात आहे आणि अर्थपूर्ण नजरेने विनयला दाखवत आहे. जणू तिला विनयला खायचे आहे.
मल्लिकाचा हा अश्लील हावभाव विनयला आवडत नाही. तो दुसरीकडे वळतो. अखेर, जेवणाचे सभागृह लोकांच्या गर्दीने
खचाखच भरलेले आहे. ते सर्व अद्भुत लोक आहेत. सुशिक्षित, साक्षर लोक. तिथे एक
शास्त्रज्ञसुद्धा आहे. विविध क्षेत्रांतील अनेक व्यावसायिक. तो पटकन नाश्ता संपवतो
आणि अचानक उठतो. तो खोलीत येतो आणि हातात उशी घेऊन आडवा होतो. आज तो मल्लिकाच्या
एका कृतीने इतका अस्वस्थ झाला आहे की, नेहमीप्रमाणे
उगवता सूर्य पाहण्यासाठी तो कोबीच्या शेता जवळच्या ओट्यावरसुद्धा बसलेला नाही.
विपश्यनेतील हे कामवासनेचे संगीत काय आहे?
मल्लिका विनयपेक्षा उंच आहे, किमान तीन-चार इंच तरी उंच. ती
अंदाजे सहा फूट उंच असावी. खूप गोरी. बऱ्यापैकी तरुण. कामवासनेत अधिक पटाईत. अधिक
आक्रमक. तिचे वक्ष आणि नितंब घट्ट आहेत. ती बारीक नाही, पण ढिलीही नाही. ती खूप स्नायुबध्द
आहे. तिच्या मांसलपणाच्या धुंद करणाऱ्या आकर्षणाने तो मोहित झाला आहे. तो रांझा
बनला आहे. विनयकडे फक्त विनयच आहे. तो विनयप्रमाणेच तिला समर्पित आहे. त्याला
माहित आहे की हे नाते फार काळ टिकणार नाही. विपश्यना सत्र संपत आहे आणि हे नातेही
संपत आहे. शांत राहणे, या
नात्यातून जेवढा रोमांच आणि आनंद मिळू शकेल ते प्रसादा प्रमाणे स्वीकारणे अधिक
सुरक्षित आहे. या शांततेच्या राजधानीत, कोणताही
संवाद किंवा प्रयत्न न करता मिळणारा हा अलौकिक आनंद, केवळ एक सुखद योगायोग आहे. त्यामुळे, जास्त अपेक्षा ठेवणे, जास्त पावित्र्य आणि सभ्यतेचा शोध
घेणे, आणि
क्षुल्लक गोष्टीवरून संतापणे, हे
निश्चितच चांगले नाही. सरतेशेवटी, त्याला
एका अनोळखी व्यक्तीप्रमाणेच निघून जावे लागेल. शिवाय, मल्लिका एक परदेशी व्यक्ती आहे.' परदेसियों से ना अखियाँ मिलाना' ,हे गाणं त्याने खूप पूर्वीपासून
ऐकलं आहे. ' ‘चलो,एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों’ चला, हेही त्याने ऐकलं आहे. 'जाहि विधी रखे राम तहि विधी रहिये' यावरही त्याचा विश्वास आहे. एकंदरीत, तो मल्लिका चा आभारी आहे. पूर्णपणे
आभारी. तिने त्याला दिलेल्या आनंदापुढे तो नतमस्तक होतो. या मधुर मिलनाच्या
आनंदापुढे. तिच्याशिवाय, या
विपश्यना शिबीरात तो कदाचित इतकं एकाग्र होऊ शकला नसता. त्याच्या मनात उदासी आणि
कोरडेपणाची भावना डोकावू लागली होती. मल्लिकाला भेटल्यानंतर, तो कोरडेपणा नाहीसा झाला. ती उदासी
नाहीशी झाली. त्याला ध्यानाचा शुद्ध आनंद अनुभवता येऊ लागला. तो ध्यानासाठी अधिक
समर्पित झाला. या साधनेत, विनय
नावाच्या साधकाचे जीवन सुंदर झाले. अतिशय सुंदर. त्या थंड वाऱ्यातून वाहणारी ऊब तो
कसा विसरू शकेल?
घंटा वाजत आहे.
पण तो आपल्या हातांतील उशीला अशाप्रकारे घट्ट धरून
पडला होता, जणू
ती उशी नसून, त्याच्या
मिठीत मल्लिकाच होती.
तो यंत्रवतपणे ध्यानकक्षात पोहोचला. कोणाकडेही न पाहता
तो आपल्या आसनावर बसला. त्याला मल्लिकाला शोधण्याची इच्छाही झाली नाही. डोळे मिटून
त्याने आपल्या मनाचे दरवाजे बंद केले.
"अरे, माझे
मन गोंधळलेल्या अवस्थेत नाही. केवळ श्वासाचा आणि श्वासाच्या स्पर्शाचाच विचार.
तटस्थतेचा रोजचा सराव.जणू काही त्याच्या मिटलेल्या डोळ्यांच्या घड्यात समुद्र
शिरला होता. आनंदाचा महासागर.
तो खोल पाण्यात आहे, पण जणू काही तो हिमालयातील एखाद्या
गुहेत बसला आहे.
ध्यानात मान आहे, त्यात खूप जान आहे. फक्त त्याचा
सराव करणे कठीण आहे. साधना कठीणच असते, मग ती
कोणती ही असो. विपश्यना साधना खूप कठीण आहे. मग विपश्यना साधनेतील कामवासना.
त्याहूनही कठीण. खूप दुर्मिळ. जवळ जवळ अशक्य. जसे की त्या दिवशी ती गावची बाई
विपश्यनेत बसली आणि आक्रोश करू लागली. तो विलापही खूप भेदक होता. खूप कठीण. केवळ
विनय नाही, तर
त्या बाईच्या विलापाने अनेक हृदये हेलावली. मग तो लंडनचा मुलगा. जो मोठ्या आदराने
हात जोडून, अधूनमधून
त्याच्यासमोर येतो. एखाद्या लहान मुलासारखा. जणू काही तो मनाला गुदगुल्या करतो.
ही सुद्धा कोणत्यातरी साधनेची कथा आहे का?
साधनेच्या या दाराशी उपस्थित राहिल्याने तो परमानंदात
आहे. हिमालयासारखे शिखर. या शिखराच्या भावनेने भारावून गेले आहे. आज, साधनेच्या वाणीचा साधक अचानक, ‘उत्तम, उत्तम,’ म्हणू लागतो. ध्यान आता सोपे झाले
आहे.ज्या ध्यानासाठी बसणे कठीण वाटायचे. अंग दुखायचे. पाठ आखडायची. आचार्य
म्हणायचे की हा एक विकार आहे, जो
बाहेर येत आहे. तो पाठ भिंतीला टेकू देत नसे. कामगार येऊन त्याला थांबवत असत. आता,पाठीचा तो आखडलेपणा, अंगदुखी, पाठ भिंतीला टेकवून बसण्याची ती
इच्छा कुठे गेली?
हो, फक्त
झोपेची नौकाच अजून त्याच्यासोबत आहे. त्याने झोपेची नाव सोडलेली नाही. कोण जाणे, तो ती कधी सोडेल की नाही. तो
विपश्यनेत हरवून गेला आहे. मल्लिकामध्ये. मल्लिका, विपश्यना आणि झोपेची नाव हे
त्याच्या आयुष्याचे, त्याच्या
आध्यात्मिक साधनेचे तीन केंद्रबिंदू आहेत. तो दिवस विसरला आहे. तो अधूनमधून रात्री
मल्लिकाला पाहतो. त्यामुळे तो रात्र विसरत नाही. जेवण, ध्यान आणि चर्चा यांच्या सर्व सीमा
ओलांडून रात्र परत आली आहे. फिरण्याची रात्र. मल्लिकाला भेटण्याची रात्र.
नेहमीप्रमाणे, ती
शांतपणे आली आहे आणि त्याच्या जवळून चालू लागली आहे. तिच्या अत्तराचा सुगंध त्याला
मोहवत आहे. मल्लिकाच्या मांसलपणात, तिच्या
धुंद करणाऱ्या सौंदर्यात रमून विनयने तिला आपल्या मिठीत घेतले आहे. तो तिच्या
मानेचे चुंबन घेत आहे, त्याचा
हात तिच्या कमरेभोवती फिरत आहे. तो चुंबन घेत आहे आणि मल्लिका बेहोश होत आहे. ती
त्याच्यावर विसावली आहे, जणू
नदीचा खेळकर प्रवाह, वाहत
आणि उड्या मारत.मल्लिकाचे शरीरही त्याचप्रमाणे उसळत आहे. तिच्या शरीराचा
अनियंत्रित प्रवाह जणू सर्व अडथळे तोडून विनयच्या गावाला जलमय करतो.. धोक्याच्या
सर्व खुणा ओलांडणारा हा देहप्रवाह एका अक्राळविक्राळ पुराच्या रूपात प्रकट झाला
आहे.
हा कसला पूर आहे?
हे कसलं प्रेम आहे की विनय स्वतःला या पुराच्या
स्वाधीन करतो? कोणताही
प्रतिकार नाही. त्याला माहीत आहे की पाणी, वीज किंवा अग्नीशी कधीही लढू नये.
आणि तरीही, इथे
अग्नी, वीज
आणि पाणी आहे. प्रत्येकाशी कसे लढावे? आणि
का? वीज
प्रकाश देते. अग्नी थंडीपासून दिलासा देतो. पाणी तहान भागवते. पुराचे पाणी लवकरच
ओसरते. ओढा नदीला जाऊन मिळतो, पण तो
गावावर आपली छाप सोडून जातो, ज्यामुळे
जमीन अधिक सुपीक होते. पुराचे पाणी परत जाताना नेहमीच जमिनीत सुपीकतेचे घटक मागे
सोडून जाते. हा त्याचा स्वभावच आहे, विशेषतः
जेव्हा तो शरीराच्या नदीला पूर आणतो. हा पूर विकास आणतो, विनाश नाही. आज मल्लिकाला जायची घाई
नाही. ती सर्व चिंता बाजूला सारते आणि तिला गहन शांती लाभली आहे. विनयला आपल्या
बाहूंमध्ये घेऊन, ती
बेशुद्ध पडली आहे, जणू
काही ती पृथ्वी आहे आणि विनय गवत. गवताचा स्वभावच हा आहे की कितीही वादळे, पाऊस किंवा पूर आले तरी ते टवटवीत
राहते. मोठी झाडे पडतात कारण ती ताठ उभी असतात. त्यांच्या ताठरपणामुळेच ते मोडतात,तुटतात.गवत लवचिक असते. धोका जाणवताच ते इकडेतिकडे
हलते. ते वाकते. ते टिकून राहते. कडक उन्हात वाळून गेले तरी, थोडे पाणी मिळताच ते पुन्हा हिरवेगार
होते. जीवन मिळते. गवत प्रत्येक ऋतू सहन करते. विनय तेच गवत आहे.गवता प्रमाणे , मल्लिकाच्या ,पृथ्वीच्या मिठीत आहे. जणू काही शहामृगाने वाळूत आपले
डोके खुपसावे, त्याप्रमाणे
तो मल्लिकाच्या विशाल स्तनांमध्ये चेहरा खुपसून पहुडला आहे. आणि बघा, मल्लिकाच्या बाहूंच्या वर्तुळात
जखडलेला, तो
झोपेच्या नावेत चढला आहे.
ही कसली आश्वस्ती आहे?
तो
झोपेत घोरत आहे, आणि
मल्लिका त्याला हलवत आहे. विनयला जणू काही तो ध्यान करत आहे असे वाटते. पण जसे
त्याचे डोळे उघडतात, झोपेच्या
तंद्रीतून बाहेर पडतो, तेव्हा
तो स्वतःला मल्लिका नावाच्या नदीत तरंगताना पाहतो. ही तीच नदी आहे, जिने काही वेळापूर्वीच विनयचे गाव
आपल्या पुरात बुडवून पुन्हा जोर धरला होता. या चांदण्यात, नदीची ही एक धारा विनयला आणखी
बांधून ठेवते. मल्लिकाचे दोन बाहू नदीच्या दोन काठांसारख्या वाटतात. या बाजूला
राहावे की दुसऱ्या, हे
त्याला ठरवता येत नाही. थंड चांदणे त्याला न्हाऊ घालतात, पण त्याचे शरीर अजूनही गरम वाटते.
म्हणूनच तो हळूच आपले गाल मल्लिकाच्या स्तनांवरून बाजूला करतो आणि ओठांवर ठेवतो.
त्याचे ओठ, जणू
काही बोलू लागल्याप्रमाणे, मल्लिकाच्या
झोपलेल्या शरीराला जागे करतात. ती काहीतरी पुटपुटते. विनय तिचे बाहू बाजूला करतो
आणि काठ सोडतो. हळूच,तो
प्रवाहाच्या मधोमध सरकतो. मल्लिकाचे कामुक शरीर जणू त्याला आमंत्रित करत आहे. ती
जणू काही जादू करत आहे. तिचे शरीर शक्तीने भारलेले आहे, जणू हरिद्वारच्या हर की पौडी येथील
गंगेचा प्रवाह. ती आपल्या मादक शरीराची जादू करत आहे. या जादूने ती विनयची इच्छा
अधिक तीव्र करत आहे. ती त्याला आपल्या मोहकतेने भुरळ घालत आहे. कोण जाणे काय झाले
आहे, की
तिने माउथ ऑर्गन हातात घेतला आहे. कोण जाणे ती कोणती धून वाजवत आहे. लवकरच, ती भैरवीच्या तल्लीनतेत हरवून जाते.
अचूक, विनयच्या
अस्वस्थतेशी एकरूप. विनय आता मल्लिकाच्या शरीरावर टेकला आहे. मालकौंसशिवाय भैरवी
वाजवणे अशक्य आहे. लवकरच, ते
दोघे ही मालकौंसच्या मधुरतेत हरवून जातात. जणू काही ते जुगलबंदी गात आहेत.
मल्लिकाला त्याच्यातील प्रत्येक कण पिळून काढायचा आहे असे वाटते. तिला केवळ थोडे
थोडके नाही, तर
त्याहूनही अधिक हवे आहे. तिला सर्व काही ग्रहण करायचे आहे.कुणास ठाऊक
केव्हापासूनची तहान, तिला
ती आत्ताच शमवायची आहे. जणू काही ती एक अनंत काळ ची तहान आहे. तहान भागवत ,वाहत्या नदीप्रमाणे, ती सर्व बंधारे तोडून वाहतच राहते.
या शांततेच्या राजधानीत, राग मालकौंसमधील दोन शरीरांचे
द्वंद्वगीत अप्रतिम आहे. देहबोलीचे हे जग अनुपम आहे. मल्लिकाच्या शरीरात आरोह
अवरोह अगदी संगीतमय आहे. तो गोडवा शिवकुमार शर्मांच्या संतूरासारखा आहे. जणू काही
एखाद्या संगीत दिग्दर्शकाने देहसंगीताची ही अकल्पनीय धून रचली आहे आणि मग तो
अदृश्य झाला आहे. त्याला अवर्णनीय बनवण्यासाठी. कोणत्याही संवादाशिवाय. दोघेही
एकमेकांच्या भावना समजून घेतात. ते एकमेकांच्या शारीरिक आणि मानसिक गरजा समजून
घेतात. ते त्या पूर्ण करतात. असा सुसंवाद, असा समन्वय कसा शक्य आहे, हे विनयच्या आकलना पलीकडचे आहे.
त्याच्या विविध प्रणय-आसनांचे जाळे मल्लिकाच्या निरागसतेला अधिक रंगत आणते. पुरुष
असूनही, विनय
अनेक आसने आणि मुद्रांशी अपरिचित होता, पण
मल्लिका परिचित होती. केवळ परिचितच नाही, तर
त्यात पारंगत होती. तिच्या अनेक प्रयोगांनी आणि त्यांच्या अंमलबजावणीने विनय थक्क
झाला आहे. देहसंगीताला मधुर आणि अधिक मधुर बनवण्यासाठी दोन्ही बाजूंनी पूर्ण
समर्पण कसे आवश्यक आहे, हे
त्याला समजले आहे. सुसंवाद आणि एकरूपता आपोआप निर्माण होते. 'जर-तर'चे
अडथळे या संगीताला किती वेदनादायी बनवू शकतात, हे त्याला माहीत आहे. पण मल्लिकाच्या
शब्दकोशात कोणतेही अडथळे नाहीत. त्याला काय हवं आहे, हे तिला तिच्या प्रियकरा पेक्षा ही
जास्त चांगलं माहीत आहे.
तिला माहीत आहे की दवबिंदूंनी तहान भागत नाही.
सकाळी, त्याला
ध्यानाच्या सत्रासाठी पुन्हा उशीर झाला होता. आधी राग भैरवी, मग राग मालकौंस. या द्वंद्वगीतामुळे
तो रात्री उशिरापर्यंत, अगदी
पहाटेपर्यंत जागा होता. हा उशीर स्वाभाविक होता. पण मल्लिकासुद्धा गाण्यात सहभागी
होती. गायनामध्ये तिचाही सूर होता. पण तिला उशीर का झाला नाही? विनय स्वतःला विचारतो. पण
त्याच्याकडे उत्तर नाही. तो आळशीपणाच्या मुखवट्याआड आपला चेहरा लपवतो. हे खरं होतं
की त्याने दिवसभरात कमी ध्यान केलं होतं, जास्त
करून झोपेच्या प्रवासात वेळ गेला होता. मग, जेव्हा संध्याकाळ झाली, प्रवचन सत्रानंतर, आचार्यांनी जाहीर केलं की सर्व
साधकांची साधना आता पूर्ण झाली आहे. विनयच्या हृदयाचा ठोका चुकला. साधना इतक्या
लवकर कशी संपू शकते? हे
बरोबर नव्हतं. जणू काही जगायला शिकण्या आधीच आयुष्य हातातून निसटून गेलं होतं.
काफिला निघून गेला आणि आम्ही धूळ बघत राहिलो. आता कुठे त्याला विपश्यना साधनेचं
सार कळू शकत होते. सुरुवातीचे दिवस समजून घेण्यात आणि शिकण्यात गेले. आता जेव्हा
ध्यानाचा दिवस आला, तेव्हा
ध्यान सत्रं संपले. हे काय होतं? त्याने
मल्लिकाच्या ध्यानात,विपश्यना
ध्यानाचे दिवस मोजणे थांबवले होते. त्याला त्याचा एक आयएएस मित्र आठवला. तो
म्हणाला होता की, जेव्हा
एखाद्याची दुसऱ्या विभागात बदली होते, तेव्हा
तिथले कामकाज समजायला थोडा वेळ लागतो. जेव्हा कामकाज समजू लागते, तेव्हा पुन्हा बदली होते. दुसऱ्याच
कोणत्यातरी विभागात. मग काय काम करणार? इथे
विनयसोबतही तेच घडले आहे. जेव्हा ध्यान समजले, तेव्हा ते संपले. विनय केवळ
ध्यानामुळे दुःखी नाही, तर
मल्लिकापासून दुरावल्याचे ही दुःख वाटत आहे. पण आता तो काय करू शकतो? तो काय करू शकतो?
आचार्य सांगतात की, या क्षणापासून सर्व निर्बंध संपले
आहेत. तुम्ही आता एकमेकांना भेटू शकता आणि गप्पा मारू शकता. तुम्ही परिसरात कुठेही
फिरू शकता. फक्त पुरुष स्त्रियांच्या निवासस्थानात जाऊ शकत नाहीत, तसेच स्त्रिया पुरुषांच्या
निवासस्थानात जाऊ शकत नाहीत. हा निर्बंध कायम राहील. साधकाचे जीवन संपले आहे.
तुम्ही तुमचे सामान्य जीवन पुन्हा सुरू करू शकता. पण उद्यापर्यंत तुम्ही तुमचे घर
किंवा परिसर सोडून जाऊ शकत नाही. आज आणि उद्या रात्री याच परिसरात राहणे अनिवार्य
आहे. कारण तुम्ही या शिबीरात इतके दिवस मौन पाळले आहे. तुम्ही ध्यानात मग्न होता, त्यामुळे तुमची मने कोमल झाली आहेत.
जर तुम्ही अचानक बाहेर गेलात, तर
तुमच्या मनाला इजा होऊ शकते. उलट परिणाम होऊ शकतो. काहीतरी वाईट घडू शकते. म्हणून, दोन दिवस याच परिसरात राहा. तुमची
मने मजबूत झाल्यावर, परवा
सकाळी न्याहारीनंतर, तुम्हाला
पाहिजे तिथे, पाहिजे
तेव्हा तुम्ही जाऊ शकता. विनयला आचार्यांना सांगायचे आहे की, मन आधीच घायाळ झाले आहे. आता काय
करावे?
पण तो गप्प राहतो.
आता कोणाशीही बोलण्यात काही अर्थ नाही. खूप दिवसांनी
त्याला जेवण मिळालं आहे. जरी ती फक्त खिचडी असली तरी ही. मल्लिका जेवणाच्या खोलीत
नाहीये. तसंही त्याला खिचडी आवडत नाही. त्याने फक्त चव घेतली आणि तो निघून गेला.
तो खोलीत अस्वस्थपणे फेऱ्या मारत आहे. आता बाहेरच्या परिसरात जायची वेळ झाली आहे.
पण तो खोलीत,आतमध्येच
फेऱ्या मारत आहे. फेऱ्या मारता मारता त्याचा जीव गुदमरत आहे.
हा कसला कोंडमारा आहे?
त्याला काहीच कळत नाही. तो पलंगावर आडवा होतो.
शांततेची ही राजधानी अचानक गोंगाटात बुडून गेली आहे. शांतता नाहीशी झाली आहे.
प्रत्येकाकडे मोबाईल फोन, लॅपटॉप
आणि इतर अनेक गोष्टी आहेत. त्या वस्तू सर्वांना परत मिळाल्या.शांतता भंग पावली
आहे. तो गोंगाटात, गजबजटात
हरवून गेला आहे. हृदयाचा संवाद या प्रचंड कोलाहलात हरवून जात आहेत. सगळी तटस्थता
पळवून नेली गेली आहे. जणू काही सर्वत्र अराजक माजले आहे. शांततेला आग लागली आहे.
प्रत्येक खोलीतून गोंधळ ऐकू येत आहे. त्याच्या मनातील कोलाहल पुरेसा नव्हता का? थोडासा दिलासा मिळाल्या बरोबर
दाबलेल्या स्प्रिंगप्रमाणे लोक उसळून मिसळत आहेत.काही जण हसत आहेत. काही जण मोबाईल
फोनवर गप्पा मारत आहेत. काही जण गाणी ऐकत आहेत. काही जण चित्रपट पाहत आहेत. हा
गोंगाटाचा एक कोलाज आहे. विनय या गोंगाटाने सुन्न झाला आहे. बाजूच्या खोलीत
महाराष्ट्रातील लोक जमले आहेत. तिथे प्रचंड कलकलाट आहे. तो त्यांना रागावतोसुद्धा, पण कोणी ऐकत नाही. खूप सूचना केल्यावर लोक भांडायला लागले
आहेत. हे लोक विपश्यना ध्यानात काय आणि कसे शिकत होते? विनयला हे समजायला अवघड जात आहे. आज
मल्लिकाला भेटणे अवघड जाईल हे माहीत असूनही, तो नेहमीप्रमाणे रात्री फिरायला
बाहेर पडतो. वातावरण असे झाले आहे की, एके
काळी शांतता असलेली राजधानी आता कलकलाटाची राजधानी बनली आहे. तरीही, तो विचार करतो की जर मल्लिका सापडली,तर तो आज तिच्याशी बोलेल.आतापर्यंत तो न बोलता किंवा न
ऐकता अर्थ समजून घेत होता. जणू काही फक्त पक्ष्यालाच पक्ष्याची भाषा कळते.आता तो
तिचे शब्द ऐकून समजून घेणार होता. मल्लिकासाठी तो अजूनही एक पक्षीच आहे. बाहेर कमी
लोक आहेत आणि थंडीही जास्त आहे.फक्त काही लोक दिसत आहेत. मल्लिका तिथे नाही. विनय
कोबीच्या शेताजवळच्या ओट्यावर बसतो. शेत रिकामे दिसत आहे. कोबीची कापणी झाली आहे.
पूर्वी, जेव्हा
कोबी पाहायचा , तेव्हा मल्लिकाच्या भरगच्च स्तनांची आठवण
यायची. आता कोबी नाही. तरीही, मल्लिकाच्या
भरगच्च तारुण्याची आठवण येते. विनय अचानक उठून उभा राहिला. तो चालू लागला. त्याने
आपला मफलर स्वतःभोवती घट्ट बांधला. त्याने आपले दोन्ही हात जॅकेटच्या खिशात घातले.
"अरे
तू!" मागून
साखरेसारखी गोड आणि खळखळणारी कुजबुज ऐकू येते. तो मागे वळतो. अरे, ही तर मल्लिका आहे! विनय दचकतो. ती
विनयच्या मिठीत झेप घेते. ती त्याच्या कपाळावर चुंबन घेते. त्याच्या हृदयात
आनंदाची एक लहर उसळते. ते दोघे एकमेकांच्या खांद्यावर हात टाकून चालू लागतात.
हळूहळू. तो अरुंद रस्ता आणखीच अरुंद वाटू लागतो. रात्र आणि तो मार्ग अधिकच लहान
वाटू लागतो.अचानक, वाऱ्याचा
वेग वाढतो. त्याच्या अंगावर काटा येतो. वारा थंड असला तरी, मल्लिकाच्या धुंद करणाऱ्या
स्पर्शाची ऊबही तिथे असते. मल्लिकाच्या स्पर्शानेच तो इतक्या उबदारपणाने भारून
जातो. या थंड रात्रींमध्ये उघड्या आकाशाखाली विवस्त्र असूनही, कुठल्याच रात्री त्याला थंडी जाणवली
नाही. तो थंडीने आजारी पडला नाही. त्याला थंडी खूप जाणवते.पण आता ती त्याला
आवडतेही. हिवाळ्याचे दिवस त्याचे सर्वात आवडते दिवस आहेत. आणि आता, मल्लिका त्याच्यासोबत आहे. त्याच्या
लगतच पहुडलेली. मनाला मनाशी आणि शरीराला शरीराशी एकरूप करत. जसे पाणी पाण्याशी.
जशी माती मातीशी. जशी हवा हवेशी. जशी पृथ्वी आकाशाशी. आगीला आगच. असे म्हणतात की, जेव्हा तारुण्य जोशात धगधगत असते, तेव्हा थंडी आणि गारठलेल्या दंवाने काय फरक पडतो?
अहा! ही रात्र किती मादक आहे!
पौर्णिमेचा चंद्रही मोठ्या हेव्याने त्यांच्याकडे पाहत
आहे. तो डोळ्यांनीच मल्लिकाशी बोलत आहे. त्याला तिच्याशी काही बोलायचे का नाहीये, हे कळत नाही. त्याला फक्त शांतपणे
गप्पा मारायच्या आहेत. या भागात बोलण्यावरची बंदी संपली असली तरी, फक्त स्त्रियांच्या भागात प्रवेश
करण्यावरची बंदीच उरली आहे. पण तो या भागातील सर्वात सुंदर स्त्रीच्या बाहुंत आहे.
जणू ध्यानातील श्वासाचा स्पर्श. मल्लिका तुटक इंग्रजीत सतत कुजबुजत आहे. त्याला
काहीतरी कळतंय, पण
फारसं नाही. तरीही तो शांत राहतो. मल्लिकामध्ये हरवून. विनयची अखंड शांतता पाहून
तीही शांत होते. जेव्हा एखादी स्त्री मिठीत असते आणि पुरुष शांत असतो, तेव्हा त्या स्त्रीचं शरीर खूप काही
बोलतं. ते बोलतच राहतं. स्त्रीच्या शरीराचं हे मूक बोलणं सुद्धा शांती आणतं.
ध्यानाची शांती. अनंत शांती. शांततेतील स्थिरतेची शांती. तुम्ही कधीतरी
काळजीपूर्वक निरीक्षण करायला हवं, समुद्राच्या
उसळणाऱ्या,गर्जना
करणाऱ्या लाटांमध्येही एक विचित्र शांती असते. जणू काही ती लाट उसळताना आणि मागे
परतताना शांत होते, तीच
शांती. मल्लिकाचं बोलणारं शरीर ती शांती निर्माण करत आहे. एक उसळणारं शरीर.
अशाप्रकारेच तर वासना जागृत होते. विनयसुद्धा हळूहळू जागा होत आहे. विनयचं
शरीरसुद्धा. चॉकलेटचा कुरकुरीतपणा आणि गोडवा मल्लिकाच्या शरीरात जागा होत आहे. ती
अचानक आळस देते. असं वाटतं की यात सुद्धा ती मधुबालासारखी दिसू लागली आहे. त्याला
तिच्यावर झडप घालून तिचं चुंबन घ्यावंसं वाटतं, पण त्याला तिच्या आळस देण्यात
व्यत्यय आणायचा नाही. तिथे, असं
वाटतं की जणू पौर्णिमेचा चंद्रसुद्धा आळस देत आहे. तो दिशा बदलत आहे. जणू पृथ्वी
थोडी फिरली आहे. तिने दिशा बदलली आहे. जणू मल्लिकाच्या शरीराची दिशा आणि दशाच
बदलली आहे.
माहित नाही.
पण विनयला आता स्वतःला आवरता येत नाही. तो गुपचूप
मल्लिकावर झडप घालतो. मल्लिकाच्या शरीरावर. या अनपेक्षित वळणाने ती सैलावते, त्याचे डोळे विस्फारतात. ती काहीतरी
पुटपुटते, पण ती
काय म्हणत आहे हे त्याला समजत नाही. ती पुन्हा शांत होते. विनयची देहबोली ओळखून, ती जुगलबंदीच्या भावनेने सक्रिय
होते. ‘चली ,गोरी पी के मिलन को चली,’ ह्या धर्ती वर ती आयुष्य सुंदर
बनवण्याच्या मार्गावर आहे. जणू काही शुभ मुहूर्ताच्या शोधात असल्याप्रमाणे, ती आपले डोके वर करते आणि आकाशाकडे
पाहते. मग ती विनयच्या शरीरात विलीन होते. ती त्याच्या मिठीत विसावते, त्याला जणू विद्युत प्रवाह जाणवतो तो. तिचे हात
जणू घाईत आहेत असे वाटते. पण विनयला घाई नाही. अजिबात नाही. तो मल्लिकाच्या
प्रेमात पडला आहे. मल्लिकाच्या शैलीवर. तिच्या समजूतदारपणावर. देहबोलीतील
संगीतासाठी ती माउथ ऑर्गनची मोठी चाहती आहे. विनयलाही ते खूप आवडते. त्याचे संगीत, त्याचे सूर, पट्टी आणि लय अवर्णनीय आहेत. हे
संगीत विनयला संगीत सूर्य बनवते.
मल्लिका कोकिळेसारखं गात आहे. तिच्या उत्साहाची लाट
समुद्राच्या भरती च्या लाटांप्रमाणे उसळत आहे, जणू खडकांवर आदळण्यासाठी आतुर
झालेली लाट.विनयला मल्लिकेची उत्कटता आणि अभिलाषा समजली आहे. त्याला माहित आहे की
मल्लिकाच्या शरीराच्या या लाटा त्याला पुन्हा पुन्हा उचलून फेकू इच्छितात, त्याला सर्वत्र सोडून देऊ इच्छितात.
विनयला मल्लिकेच्या शरीरात उसळणाऱ्या सर्व लाटा अनुभवायच्या आहेत. त्याला त्या
स्वतःमध्ये सामावून घ्यायच्या आहेत. तो शांतपणे मल्लिकाच्या शरीराला
पांघरूणाप्रमाणे पांघरून घेतो. जणू ती एक दुलई आहे.थंडीपासून वाचण्याचा आणि तिच्या
स्तनांशी खेळण्याचा हाच एकमेव मार्ग आहे. तिच्या लाटांना पकडण्याचा हा एक मार्ग
आहे. ती बासरी किंवा सारंगी प्रमाणे वाजवण्यासाठी आपले स्तन विनयच्या तोंडात
ठेवते. विनयचे ओठ संपूर्ण संगीत स्वरांना सरावलेले आहेत. सा रे ग म प धा नी सा सा
नी धा प म ग रे सा. पण आज, त्याला
मल्लिकाच्या शरीराला सतारी प्रमाणे वाजवायचे आहे. सप्तकाच्या सुरांमध्ये. पण आज, मल्लिकाला जणू एक रशियन वाद्य
बनायचे आहे असे वाटते. तिला त्याच सुरावर देहसंगीत रचायचे आहे. संगीत कोणतेही असो, जर ते सुमधुर असेल, तर सर्व काही समजण्यासारखे होते.
भाषेचे अज्ञान हा अडथळा ठरत नाही. तो एक अडथळा बनत नाही. जसे की, विनयला इंग्रजी येत नाही, पण त्याला मायकल जॅक्सनची गाणी
समजतात. त्याला अनेक लोकभाषा येत नाहीत, पण
त्याला लोकसंगीत समजते. त्याला मल्लिकाचे संगीतही समजते. शिवाय, देह संगीताला कोणत्याही शब्दांची, कोणत्याही भाषेची गरज नसते. ते
सर्वांना समजते.
‘करत
करत अभ्यास के जड़मति होत
सुजान
रसरी
आवत जात ते सील पर परत निशान, ‘
ही उक्ती देह संगीताला अगदी चपखल लागू पडते. सर्व सजीव
ते सहजपणे शिकतात. मानव नवनवीन शोधात
पारंगत होतो, अगदी
नवनिर्मितीच्या पातळीपर्यंत.
मल्लिकाला आज तोच आविष्कार आजमावून पहायचा आहे. आणि
विनयला सतार वाजवायची आहे. हळूहळू, हे
देह संगीत संयोगा कडे वळते. देह संगीतातील मिलाफ मार्गही खूप सुखद होतो. प्रत्येकाची
स्वतःची धून, स्वतःचा
प्रयोग. पण अंतिम ध्येय तेच आहे - सत्यम, शिवम, सुंदरम. तोच सूर्य, तीच पृथ्वी. मल्लिकाला आता कोणतीही
घाई नाही. असे वाटते की, आपले
शिखर गाठल्यावर, तिला
आणखी एका नव्या शिखरावर पोहोचण्याची ओढ लागली आहे. म्हणूनच तिने आता स्वतःला
पूर्णपणे विनयला समर्पित केले आहे. विनयला सतार किंवा वीणा, बासरी किंवा गिटार काही ही वाजवू दे
. पण आता तो संतूर वाजवतो. या नव्या बदलाने मल्लिका खूप आनंदित झाली आहे. ती हसत
आहे. ती म्हणत आहे, "किती
मधुर!". विनय
आता जणू ध्यानात आहे. खोल पाण्यात. ही देह-ध्यानाची कोणती पद्धत आहे, हे त्याला स्वतःलाही माहीत नाही. पण
त्याला जाणवते की तो अनंताकडे जात आहे. अनंत शक्तीकडे. अनंत शक्तीचा अनुभव म्हणजे
ध्यान. विनय, मल्लिकासोबत, या असीम शक्तीचा अनुभव घेत आहे आणि
समाधीकडे वाटचाल करत आहे. सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् यांची अनुभूती हीच तर आहे!
अचानक, मल्लिका
विनयला घट्ट पकडते. ती दात आवळते आणि डोळे मिटते. विनयसोबतचे तिची जुगलबंदी सुरूच राहते. जणू काही
समुद्राच्या लाटा खडकांवर आदळत आहेत. मल्लिका अत्यंत व्याकुळ आहे. विनय तर
मल्लिकापेक्षाही जास्त अस्वस्थ आहे.
अति उत्तम!
मल्लिका जणू
उत्कटतेने म्हणत आहे," आहा! किती सुंदर!” मिलन ही समाधीच आहे ! हे ऐकून
विनयला आश्चर्य वाटते. त्याला प्रश्न पडतो की, मल्लिकासुद्धा समाधी अवस्थेत
पोहोचली आहे का?
विनय, नेहमीप्रमाणेच, आपला चेहरा मल्लिकाच्या छातीवर
टेकवतो आणि तिच्या शरीरावर पहुडतो. हे अगदी एखाद्या मद्यशाळेत बेशुद्ध पडलेल्या
दारुड्यासारखं आहे, जणू
तो जगावर विजय मिळवून आलेला आहे. मल्लिका त्याच्या केसांशी खेळते. पौर्णिमेच्या
चंद्राला साक्षी ठेवून, ती
त्याला चांदणी बनून
कुरवाळते. जणू एखादी आई आपल्या बाळाला कुरवाळत आहे. मल्लिकाच्या प्रेमाने विनयला
पूर्णपणे भिजवून टाकलं आहे. ते प्रेम त्याच्या अंतर्मनात खोलवर भिनलं आहे. स्त्री
कशीही असो, कोणीही
असो, अंतिमतः
ती एक आईच असते.
विनयला वाटतं की हे सगळं स्वप्न आहे का. तो स्वतःला
चिमटा घेतो. मग तो मल्लिकाच्या नितंबांना चिमटा घेतो. 'उफ्फ!' असं
म्हणत ती त्याला नकार देते. विनय तयार होतो. त्याला जाणवतं की हे स्वप्न नाही, तर खरं आहे. विनय मल्लिकाला घट्ट
मिठीत घेतो आणि तिच्या दोन्ही गालांवर एकेक करून चुंबन घेतो. तिचे दोन्ही स्तन
दाबून तो तिच्या कपाळावर चुंबन घेतो. ती त्याच्याकडे अगदी मंत्रमुग्ध नजरेने बघत
असते. जणू काही विचारत आहे, 'आपण
पुन्हा कधी भेटणार?'
जाताना ती विनयला पुन्हा मिठी मारते. ती प्रेमाने
म्हणते, "मी, दारीया आणि तू?"
'विनय!'
'तुम्हाला
इंग्रजी समजत नाही का?' ती
इंग्रजीत विचारते.
'अगदी
थोडं!' तो
तळहाताने मुद्रा करून म्हणतो.
'इथेही
अगदी चिमुकलं!' असं
म्हणत ती आपला तळहात लहान करत हसते.
तिला जायचे आहे. पण विनय तिला थांबवण्याचा प्रयत्न
करतो, "अभी
ना जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं.” पण ती
थांबत नाही. आकाशातील पौर्णिमेच्या चंद्राकडे पाहत ती म्हणते, जे"आपण आता निघायला हवं." ती क्षणभर थांबते आणि म्हणते, "उद्या भेटू."
"हो, आपण अजून फक्त एका रात्रीसाठी इथे
आहोत." तो
तिला म्हणतो, "मी
तुला एक काल्पनिक नावसुद्धा दिलं आहे."
काय?
'मल्लिका!'
'मोलिका!' ती पुढे म्हणाली, 'सुंदर!'
विनय तिला काही वेळ आपल्या मिठीत घेतो, हळुवारपणे तिच्या पाठीवर थोपटतो.
कधी तिच्या पाठीवर, कधी
तिच्या नितंबांवर, कधी
तिच्या गालांवर, तर
कधी कुठल्यातरी वेगळ्याच भागावर. ते एकमेकांचे चुंबन घेतात आणि निरोप घेतात.
नेहमीप्रमाणे, मल्लिका
आधी निघते.
सकाळी,दारिया
जेवणाच्या हॉलमध्ये दिसत नाही. एकतर ती नाश्त्यानंतर निघून गेली आहे, किंवा अजून आलेली नाही.
नाश्त्यानंतर तो बाहेर येतो. सगळीकडे लगबग सुरू असते. लोक एकमेकांची ओळख करून देत
असतात. फोन नंबरची देवाणघेवाण होत असते. तो इंग्लिश मुलगा समोरून येताना दिसतो.
दुरूनच तो हात जोडून मान झुकवतो. जवळ आल्यावरही त्याचे हात जोडलेलेच असतात. तो
ब्रिटिश उच्चारात "हॅलो!" म्हणतो आणि विनयच्या पायांना स्पर्श
करण्यासाठी खाली वाकतो. विनय हात पुढे करून त्याला उचलतो आणि मिठी मारतो. तो खूप
आनंदित झालेला असतो. तेवढ्यात, एक
ऑस्ट्रेलियन मुलगी आत येते. तो तिची ओळख करून देतो, "ही माझी मैत्रीण आहे." तो आदराने मान झुकवून म्हणतो, "ऑस्ट्रेलियाहून!" ती मुलगी तिचे नाव सांगते. विनयला
काही समजत नाही.
संभाषण सुरू झाले आहे. विनयने विचारले आहे, "ध्यान कसे होते?"
ठीकठाक!
इतक्या
लहान वयात ध्यानाची कल्पना कशी सुचली?
"तुला
ही कल्पना कशी
सुचली ?" तो
विचारतो. "मला
ते आवडलं.टूर मधे माझ्याकडे थोडा वेळ उरला होता. मला लंडनला परत जायला वेळ होता.
म्हणून मी शोधलं. मला इथे सर्वात स्वस्त जागा मिळाली."
"काय?" विनय जणू आकाशातून जमिनीवर कोसळला.
तो म्हणाला, "स्वस्त
काय आहे, ही
जागा तर जवळजवळ फुकटच आहे."
"होय, साहेब!" तो म्हणाला, "हा देखील एक उत्तम अनुभव आहे.
यामुळे आमच्या व्यवसायालाही चालना मिळेल."
काय काम आहे?
"पर्यटन," तो म्हणाला, "आमची एक टूरिस्ट कंपनी आहे. आम्ही
सर्वांना जगभर फिरवतो."
त्याने आपले व्हिजिटिंग कार्ड काढून तिला दिले. तो
म्हणाला, "चल, मी तुला युरोप फिरवून आणतो." त्याने पॅकेजचा तपशील समजावून
सांगायला सुरुवात केली. त्या मुलीनेही त्याला तिचे व्हिजिटिंग कार्ड दिले. तिने
तिच्या पॅकेजचा आणि तपशिलाचा तपशील सांगायला सुरुवात केली. विनय म्हणाला, "सध्या तरी त्याचा तसा काही हेतू
नाही." आणि
विचारले, "इथे
आल्यावर तुला कसे वाटले?"
'काही
नाही.' तो
श्वास आत घेतो, मग
बाहेर सोडतो, तळहात
ताणतो, पुन्हा
श्वास बाहेर सोडतो, एक
मोठा श्वास बाहेर सोडतो आणि म्हणतो, 'श्वास
घेतो?' मग तो
तळहाता वर फुंकर मारतो उडवून देतो.
हे पाहून विनयला धक्का बसला. त्या मुलाबद्दल त्याच्या
मनात खूप विचार केले होते. त्याने मनापासून त्याच्यावर खूप प्रेम केले होते. पण
त्याने आता
मात्र त्याचे हृदय विदीर्ण केले होते. त्याने ध्यानाचा अपमान केला होता.
विपश्यनेची ही थट्टा विनयला आवडली नाही. त्याला त्याला एक थप्पड मारावीशी वाटली, पण त्याने स्वतःला कसेतरी आवरले.
आपल्या शब्दांनी विनयला वाईट वाटले आहे हे त्या मुलाला समजले. म्हणून तो अचानक
शांत झाला. त्या मुलीने परिस्थिती हाताळण्याचा प्रयत्न केला. तिने समजावून
सांगितले की तिचा अनुभव खूप चांगला होता. आणि ती तिच्या ग्राहकांसाठी, विशेषतः ज्येष्ठ नागरिकांसाठी, तिच्या इंडिया पॅकेजेसमध्ये
विपश्यनेचा समावेश करणार आहे. ती त्याचे फायदेही समजावून सांगणार होती. ती सांगणार
होती की विपश्यनेमुळे तणाव खूप लवकर कमी होतो. हे ध्यान वैद्यकीय शास्त्रापेक्षाही
उत्तम आहे. तिने सांगितले की तिने तिच्या ग्राहकांना पटवून देण्यासाठी विपश्यनेशी
संबंधित साहित्य आणि डीव्हीडी खरेदी केल्या आहेत. ती लवकरच हे सर्व तिच्या
वेबसाइटवर टाकेल. मग ती विनयला ऑस्ट्रेलिया पॅकेज समजावून सांगू लागते. विनयला
कंटाळा येतो. तो मुलगा अचानक विनयच्या पायांना स्पर्श करतो आणि निघून जातो.
त्याच्या चेहऱ्यावर तोच निरागसपणा भरलेला असतो जो पूर्वी होता.
ती मुलगी त्याच्यामागे गेली, कदाचित नवीन गिऱ्हाईक मिळवण्यासाठी.
विनयला आश्चर्य वाटते की दारिया सुद्धा पर्यटन
क्षेत्रातलीच आहे का. कोणती दारिया? विनय
स्वतःलाच विचारतो. आणि हसत हसत उत्तर देतो, "अरे, तीच मोगऱ्याचा सुगंध असलेली
मल्लिका!"
त्याला वाटते की, अशा व्यापाऱ्यांसोबत आणि अज्ञानी
लोकांसोबत त्याला पूर्ण दिवस आणि रात्र काढावी लागेल. तो हे कसे सांभाळणार? त्याची त्याच्या शेजारच्या खोलीतील
एका माणसाशी भेट होते. तो महाराष्ट्रातून आला आहे. तो म्हणतो, "महाराष्ट्रातून दोन पथके आली आहेत.
वेगवेगळ्या भागांतून. या विपश्यना शिबिरातील बहुतेक लोक महाराष्ट्रातील आहेत."
"मग
तुम्ही लोक काल रात्रीपासून एवढा गोंधळ का करत आहात?" विनय विचारतो.
"ध्यान
करताना आम्हाला कंटाळा आला होता,"
तो म्हणाला,
"मला माझी स्वतःची थोडी जागा ,स्पेस मिळाली आहे."
'मग
तुम्ही लोक इतरांची स्पेस का हिसकावून घेत आहात?' तो पुढे म्हणाला, 'तुम्ही बहुसंख्य आहात म्हणून का?'
'नाही
साहेब!'
जर तसे होते तर, तुम्हाला इथपर्यंत येण्याची काय गरज
होती?
"तुम्ही
थोडे अस्वस्थ दिसत आहात, साहेब?" तो म्हणाला. "इतरांना काही त्रास नव्हता. तुम्ही
तर रात्रीसुद्धा सगळ्यांना टोकत होता."
"चला, तुम्ही मजा करा." विनयला त्याचं काही मोठं प्रकरण
करायचं नव्हतं. तो म्हणाला,
"मला काही अडचण नाही."
'ठीक
आहे साहेब!'
आणखी एका मराठी माणूस भेटला . तो विनयच्याच वयाचा आहे.
त्याला विनयची अडचण समजते आणि तो स्वतःला त्याच्या परिस्थितीत पाहतो. तो म्हणतोय, "इतके दिवस किती आनंद आणि शांतता
होती. या सगळ्या मुलांच्या गोंधळाने सगळं काही उद्ध्वस्त केलं आहे." तो म्हणतोय की, ते विपश्यना करायला आलेच नव्हते. ते
फक्त फिरायला आले होते.
“हे
भेट देण्यासारखे, मजा
करण्यासाठी ठिकाण आहे का?”
" फिरायला
येण्यासारखी जागा नाही. पण ते आले आहेत."
तो म्हणाला,
"हे
सर्व सरकारी कर्मचारी आहेत. महाराष्ट्रात सरकारी कर्मचाऱ्यांना विपश्यना
करण्यासाठी विशेष रजा आणि विशेष भत्ता मिळतो. हे लोक त्याचाच आनंद घेण्यासाठी आले
आहेत."
ओह!
तो स्पष्ट करतो, "महाराष्ट्रामध्ये अनेक विपश्यना
केंद्रे आहेत. पण हे
लोक फक्त फिरण्यासाठी
इथे आले आहेत. हे सगळे जण फक्त एक प्रमाणपत्र घेऊन जातील."
विनय विपश्यनेसाठी इतक्या गंभीरपणे आला होता. त्याला
या विपश्यनेत खूप आनंद आणि सुख मिळाले. त्याला ध्यानाचा एक नवीन अनुभव मिळाला.
स्वतःला पाहण्याचा आणि ओळखण्याचा. स्वतःची परीक्षा घेण्याचा. आणि इतकेच नव्हे तर, त्याला मोगऱ्याच्या फुलांसारखा
सुगंध असलेली मल्लिका भेटली. त्याचे जीवन बहरले. आता हे मूर्ख लोक गोंधळ घालून आणि
वायफळ बडबड करून, त्याचे
सर्व ध्यान आणि आनंद उद्ध्वस्त करत आहेत. नष्ट करत आहेत.
विनय खोलीत आला आहे. त्याने हातपाय धुतले आहेत आणि तो
ध्यान करण्यासाठी बसला आहे. निर्विकार आणि निरापद . तो पुन्हा एकदा खोल पाण्यात
बुडाला आहे. पूर्ण खात्रीने. तो खोल खोल पाण्यात बुडाला आहे. तो अधिकाधिक खोलवर
बुडतच राहतो.
दुपारच्या जेवणाच्या वेळीसुद्धा भोजनकक्षात गोंधळ
असतो. अगदी एखाद्या रेस्टॉरंटसारखा. दारिया तर जेवणासाठी उपलब्धसुद्धा नाही.
त्याने तिचा मोबाईल नंबर मागितला नाही, आणि
तिने तो दिलाही नाही. त्याने फक्त त्याचे नाव सांगितले आणि तिचं नाव विचारले. ही
काही ओळख तरी आहे का? मग
त्याला प्रश्न पडतो की, तन
आणि मन यांच्या जवळीकते पलिकडे आणखी मोठी ओळख तरी कोणती असू शकते?
आता बस झोपायचे आहे. तो जास्त ओळखी करून घेण्याच्या
मनस्थितीत नाही. संध्याकाळी जेव्हा विनय जागा झाला, तेव्हा त्याला ताजेतवाने वाटले. तो
बाहेर आला आणि कोबीच्या शेताकडे असलेल्या ओट्यावर बसला. त्याला तिथे पाहून आणखी
दोन-तीन लोक तिथून गेले. संध्याकाळपर्यंत, चर्चेची कुजबुज गप्पांमध्ये बदलली
होती. उदाहरणार्थ, तो
फ्रेंच माणूस विपश्यना शिबिरातून अचानक गायब झाला होता, कारण एका रात्री तो त्याच्या
मैत्रिणीसोबत तिच्या खोलीत प्रणय करताना आढळला होता. कार्यकर्त्यांनी त्यांना
पकडले आणि त्याच रात्री त्यांना खोलीतून बाहेर काढले. सकाळी, त्यांना विपश्यना शिबीरातून काढून
टाकण्यात आले कारण त्यांनी विपश्यनेचा एक नियम, तोडला होता.एक निषिद्ध गोष्ट घडली
होती. एक जोडपे समलैंगिक संबंधात गुंतलेले आढळले. त्यांनाही काढून टाकण्यात आले.
आणखी तीन जोडप्यांनाही अशाच प्रकारे काढून टाकण्यात आले. ती सर्व परदेशी जोडपी
होती.
तर मग, हे
सगळे लोक इथे स्वस्त पर्यटनासाठी आले आहेत का? विपश्यना करण्यासाठी नाही? ते कमी खर्च करून वेळ घालवण्यासाठी
आले आहेत. पण हे सगळं ऐकून विनय घाबरला आहे. भयंकर घाबरला आहे. जर तोसुद्धा
दारियासोबत पकडला गेला असता तर?
तर मग?
या कॅम्पच्या परिसरात सर्वत्र सीसीटीव्ही कॅमेरे बसवले
आहेत. सुरक्षेच्या कारणास्तव. हे कॅमेरे सर्व निवासी संकुलांमध्ये लावण्यात आले
आहेत. असे दिसते की, ज्या
ठिकाणी विनय फिरता फिरता त्याच्या मल्लिकाला भेटायचा आणि विपश्यनेदरम्यान
तिच्यासोबत कामवासनेच्या जुगलबंदी चे खेळ करायचा, तो परिसर सीसीटीव्ही कॅमेऱ्यांच्या
आणि कर्मचाऱ्यांच्या निगराणीखाली नव्हता. जर ते तिथे असते, तर तोही पकडला गेला असता. जर तो
पकडला गेला असता, तर
त्याने दारिया सोबत अपमानकारक दर्या कसा ओलांडला असता ? या सगळ्याचा नुसता विचार करूनच
त्याला भीती वाटते. हात जोडून तो मनातल्या मनात देवाचे आभार मानतो. पण आता लोकांनी
गोंधळ घालणे थांबवले आहे आणि या सगळ्या गोष्टी कुजबुजत बोलत आहेत. ते व्हॉट्सॲपवर
एकमेकांना तपशील पाठवत आहेत.
हो, दोन
भारतीयही अचानक बाहेर गेले होते. त्यांच्या कुटुंबावर दुःखद प्रसंग ओढवला होता.
दारिया डोळे मटकत जेवायला आली. तिच्या टेबलावर आधीच एक
पुरुष बसला होता. तो कोण होता? मागून
त्याची पाठ दिसत होती. जेवणानंतर तो खोलीत आला होता. रात्री अचानक थंड वारा वाहू लागतो, का कोण जाणे! थोड्या वेळाने तो
झोपून गेला. साधकांच्या अनेक रंगीन कहाण्या ऐकून तो घाबरला होता. जर दारियाने
त्याला शोधले आणि तो तिच्यासोबत जुगलबंदी करताना पकडला गेला तर?
तर मग?
पण थोड्या वेळाने त्याला एक गाणं आठवतं. "प्यार है तो जमाने का डर छोड़ दो ,तुम भी घर छोड़ दो, हम भी घर छोड़ दे." तो खोलीतून बाहेर पडतो. तो बाहेर
येतो आणि लांब पावले टाकत थोडा वेळ इकडे तिकडे फिरतो. जेव्हा त्याला खात्री पटते
की परिसर शांत आहे आणि आजूबाजूला कोणीही दिसत नाही, तेव्हा तो हळूच त्याच्या
जुगलबंदीच्या स्थानाकडे जातो. त्याला मंद प्रकाशात एक सावली दिसते. तो आणखीच हळू
चालतो. जवळून पाहिल्यावर त्याच्या लक्षात येतं की ती दारिया आहे. ती मल्लिका आहे, जिच्या अंगातून मोगऱ्याचा सुगंध
दरवळत आहे. तिच्या अत्तराचा सुगंध त्याच्या नाकात शिरतो आणि त्याच्या अंगात एक
रोमांच उभे राहतात. तो डोलू लागतो. ती आपला स्कार्फ सोडवते आणि विनयकडे धावत येते.
ती हवेच्या झोतासारखी त्याला मिठी मारते. त्याचे चुंबन घेत ती पुटपुटते, "आज तुम्हाला खूप उशीर झाला!" ती म्हणते, "मला वाटलं तुम्ही अजिबात येणार
नाही."
"मी
कसा येणार नाही ?" मनातली
भीती दाबून विनय म्हणाला.
विनय खाली बसला आहे. मल्लिका त्याच्या जवळ जाऊन बसते
आणि विनयच्या केसांशी खेळू लागते. तो तिला मिठी मारतो आणि हळुवारपणे तिच्या
नितंबांवरून हात फिरवतो, पण
त्याला संगीतात रमून जाता येत नाही. पकडले जाण्याची भीती त्याला सतावत आहे. पण थंड
वाऱ्याची झुळूक हळूहळू त्याची भीती नाहीशी करते. विनयला अचानक निष्क्रिय पाहून
दारिया विचारते, "आज
तुला काय झालंय? तुला
बरं वाटतंय का?"
"हो, सगळं ठीक आहे." विनय थोडक्यात बोलतो आणि तिच्या
वक्षांशी खेळू लागतो. जणू एखादं लहान मूल खेळण्याशी खेळतं. अचानक, दरिया एक नदी बनते. ती खळखळत, हळू हळू वाहू लागते. तो तिच्या
वक्षांवर निळ्या निळ्या आकाशासारखा पसरतो. जणू तिचा देह उभार नसून पृथ्वीच आहे. ती
थरथरते. एखाद्या लाटेसारखी. लाटांमुळे तिचं शरीर हादरत आहे. तिचे विशाल वक्ष , तिचे निळे डोळे, जणू विनयचं अस्तित्वच नष्ट करू पाहत
आहेत. विकल झालेला विनय दरियाच्या नदीत डुबकी मारण्यासाठी आतुर होतो. त्याला फक्त
एका आरोहाची गरज आहे. जसं एखाद्या वाद्याला आवाजाची गरज असते. दरियाला समजतं.एकही
शब्द न बोलता तिला समजतं. एक स्त्री शरीराची भाषा खूप चांगल्या प्रकारे समजते.
तिला खूप लवकर समजतं. शरीराच्या मनाची भाषा. आणि ती उष्णतेने पेटू लागते. जणू
पातेल्यातले आधण . दरिया पलटी मारून विनयच्या मांडीवर नदी बनून आडवी होते. जणू
एखादी नदी अचानक वळण घेऊन प्रवाह आपल्यासोबत घेऊन जाते. सर्व प्रवाह तिच्यामागे
जातात. आणि नदी ज्या दिशेने वाहते, ती
आपला मार्ग शोधून काढते. एक मार्ग तयार होतो. मार्ग तयार करत असताना, ती अचानक पोटावर आडवी होते. विनय, तिच्या इच्छेपुढे शरणागत होऊन, तिच्या पाठीला बिलगतो. जसा एखादा
प्रवाह अचानक उसळी मारतो, तशीच
दारियाही डोलते, तिची
कंबर लाटेसारखी डोलते. ती आपले नितंब ताणते. जसे शिड उभारल्यावर नांगर उचलला जातो,तशी नाव खोल पाण्यात बुडते. सुकाणू वळवून, खलाशी प्रवाहाच्या विरुद्ध दिशेने
नाव वल्हवू लागतो.दारियाच्या नदीत, विनयही
त्याचप्रकारे नाव वल्हवू लागतो.जणू काही एखादे लोकगीत गात
असल्याप्रमाणे.दारियाच्या देह-गावात.दारियाच्या देह-गावात अनेक रस्ते आहेत. अरुंद
रस्ते. गाण्यांचे पडसाद उमटतात. तनिक धीरे खोलो केवडिया, रस की बुंदे पड़े अशी स्थिती.
सकाळचा निरोप समारंभ आहे. प्रत्येकजण शक्य तितक्या
लवकर निघण्याच्या घाईत आहे. विनय विपश्यना साहित्य शोधत आहे. अडचण अशी आहे की
हिंदीमध्ये विपश्यना साहित्य कमी आणि इंग्रजीमध्ये जास्त आहे. त्याला जे काही
हिंदी साहित्य सापडते, ते तो
विकत घेतो, अगदी
आचार्य सत्यनारायण गोएंका यांच्या हिंदी प्रवचनाची डीव्हीडीसुद्धा. तेवढ्यात, दारिया येते. तो दुकानावर सर्व काही
सोडून धावत येतो.दारिया येते. हसत. वाऱ्यासारखी डोलत.खळखळून हसत. आल्याबरोबर ती
विनयला मिठी मारते. सर्वांसमोरच्या मिठी, औपचारिकता
म्हणून मिठी मारली आहे असे विनयला वाटते. दारियाच्या सुगंधामध्ये पुन्हा मोगऱ्याचा
सुगंध आहे. ती त्याच्या कपाळावर चुंबन घेते, तर विनय तिच्या गालावर. त्यांना
मिठीत पाहून लोक थक्क होतात. एक माणूस ही दारियाच्या मागे येत असतो. दारिया विनयची
त्या माणसाशी ओळख करून देते,
"माझ्या पतींना भेटा!" विनयला धक्का बसतो. जणू काही तो
स्तब्ध झाला आहे. तो त्याच्याकडे काळजीपूर्वक पाहतो. हा तोच रशियन माणूस आहे, ज्याला आचार्यांनी वैद्यकीय
समस्येचे कारण सांगून ध्यान सत्रा दरम्यान भिंतीला टेकून बसायला परवानगी दिली
होती. विनयला नकार देण्यात आला होता. तो दारिया आणि त्या रशियन माणसाची एकत्र
कल्पना कधीच करू शकला नाही. ते पती-पत्नी असतील याची तो कधीच कल्पना करू शकला नाही.
हा विचार त्याच्या मनात कधी आलाच नाही.
'नमस्कार!' म्हणत त्याने हस्तांदोलनासाठी हात
पुढे केला.
"नमस्कार!" विनयने हात जोडून नमस्कार केला.
दारियाच्या पतीशी हस्तांदोलन केले. आतून अस्वस्थ वाटत असूनही, तो बाहेरून शांत दिसत होता.
'हॅलो!' तो तुटक हिंदीत उत्तर देतो.
विनयला इंग्रजी नीट येत नसल्यामुळे तो जास्त बोलू शकत
नाही.
दारियाची टॅक्सी गेटबाहेर उभी आहे. तो तिला सोडायला
जातो. दारिया त्याचा फोन नंबर किंवा पत्ता विचारत नाही आणि विनय विचारूही शकत
नाही. ती खुदकन हसत हात हलवते आणि हाक मारते, "बाय,बाय विनय!"
धूळ उडवत टॅक्सी निघून जाते.
या शांततेच्या राजधानीत जुळलेलं हे नातं, शांतपणे संपलं आहे. रात्रीच्या
अंधारात, ओठांच्या
आगीने आणि श्वासाच्या सुमधुर संगीताने जुळलेलं ते नातं, दिवसाच्या प्रकाशात जळून खाक झालं
आहे. मल्लिकाच्या मोगऱ्याचा सुगंध विरून गेला आहे. तो विसरला गेला आहे. जणू काही
दारिया नावाची नदी अचानक आटून गेली आहे. ही कसली प्रेमाची अभिव्यक्ती?
आश्चर्य
!
त्याला लगेच घरी परतायचे आहे. पण त्याने खरेदी
केलेल्या विपश्यना साहित्य आणि डीव्हीडीचे पैसे देण्यासाठी त्याच्याकडे पुरेसे
पैसे नाहीत. त्याची चूक ही होती की घरी परतताना त्याने शिबिराला सहयोग म्हणून
आवश्यकतेपेक्षा जास्त पैसे दिले. त्याने संपूर्ण रक्कम देऊन फक्त स्टेशनला
जाण्याकरता पैसे ठेवले बाकी पैसे शिबिरात जमा केले . त्याला पावती मिळाली आहे.
तथापि, तुम्ही
किती योगदान देऊ शकता यावर कोणतीही निश्चित मर्यादा नाही. ते तुमच्या श्रद्धेवर
अवलंबून आहे. तुम्ही एक पैसाही दिला नाही तरी कोणी काही बोलणार नाही. तुम्ही तुमच्या
स्वतःच्या आनंदानुसार आणि क्षमतेनुसार तुम्हाला जे हवे ते देऊ शकता. विपश्यनेमुळे
मिळालेला आनंद आणि शांती पाहता, त्याच्याकडे
असलेले पैसे अपुरे वाटले. म्हणून, त्याने
प्रवासाचा खर्च वजा करून ते दिले. त्याच्याकडे ट्रेनचे तिकीट आधीच होते. विपश्यना
साहित्य नंतर आले. तेही आवश्यक वाटले. पण कार्ड पेमेंटची सुविधा नाही. त्याला
ऑनलाइन पेमेंट कसे करायचे हे देखील माहीत नाही. एटीएममधून पैसे काढण्यासाठी त्याला
जवळच्या शहरात जावे लागेल. त्याला गाडी मिळत नाही. त्याला ओला किंवा उबर कसे बुक
करायचे हे माहीत नाही. त्याला एक टेम्पो सापडतो, जो अवाजवी भाडे आकारत असतो चौपट.
कोणीतरी त्याला सांगते की थोडे पुढे चालत गेल्यास त्याला शेअर्ड टेम्पो मिळेल. तो
पायी निघतो. शेअर्ड टेम्पोने शहरात पोहोचल्यावर त्याला कळते की सर्व एटीएम मशीन
बंद आहेत. कोणीतरी त्याला सांगते की थोडे पुढे दुसऱ्या शहरात एक एटीएम आहे. तो
दुसऱ्या शहरात पोहोचतो. तिथले एटीएम चालू असते आणि त्यात अजूनही पैसे असतात. मग तो
तिथून शिबीर
केंद्रावर जाण्यासाठी आणि परत स्टेशनवर येण्यासाठी एक टेम्पो करतो. विपश्यना
केंद्राकडे परत येत असताना, विनयला
एक परदेशी माणूस शहराच्या दिशेने चालताना दिसतो, ज्याने आपले अंथरूण आणि इतर सामान
खांद्यावर घेतलेले असते. तो अगदी निश्चिंत असतो. तो धूम्रपान करत नसला तरी, त्याच्या निश्चिंत वृत्तीमुळे
विनयला एका चित्रपटातील गाण्याची आठवण येते: "मैं जिंदगी का साथ निभता चला गया , हर फिक्र को धुवे में उड़ाता चला
गया!" विनय
त्याला हात दाखवतो. पण तो स्वतःच्याच विश्वात मग्न असल्याने, त्याचे विनयकडे लक्षही जात नाही.
तर मग तो पूर्णपणे तटस्थ झाला आहे का?
प्रत्येक गोष्टीतून, प्रत्येक बाबीतून, प्रत्येक घटनेतून... कुणास ठाऊक. पण
आता विनय स्वतःलाच विचारत आहे की, कोणी
इतका तटस्थ असू शकतो का, की
ज्याला स्वतःचीच जाणीव नसेल. एका सुंदर स्त्रीला नुसते पाहिल्यानेही मनातील घालमेल
वाढते. शरीर आणि मन अस्वस्थ होतात. लक्ष विचलित होते. मग तटस्थता कशी असू शकते? अशा परिस्थितीत तटस्थता कशी असावी ? माणूस स्वतःकडे तटस्थ वृत्तीने कसा
पाहू शकतो? घर
आणि संसाराबद्दलच्या सर्व गोष्टी समोर येताच, सगळा जीवन संघर्ष, सगळा कल्लोळ समोर येतो.
विनय घरी परत आला आहे.
तो रोज थोडा थोडा वेळ ध्यान करतो. कधीकधी तो
डीव्हीडीवर प्रवचनही ऐकतो. त्याचा ध्यानाचा वेळ हळूहळू कमी होत चालला आहे.
जीवनातील संघर्ष,गोंधळ आणि अनागोंदीमध्ये ध्यानासाठी वेळ काढणे, हे विपश्यनेचे एक नवीन रूप आहे. एक
नवीन ध्यान. श्वासाच्या स्पर्शापेक्षाही, जीवनातील
संघर्षाचा स्पर्श अधिक जाणवतो. श्वासाच्या स्पर्शापेक्षाही, संघर्षाचे येणे-जाणे अधिक जाणवते.
संघर्षाचे येणे-जाणे आणि श्वासाचे येणे-जाणे एकरूप झाले आहे. तरीही, तो विपश्यनेसाठी वेळ काढतो.
ध्यानादरम्यान, तो
कधी खोल पाण्यात असतो, कधी
आकाशात, तर
कधी हिमालयात, बर्फ
वितळत असल्याचा अनुभव घेत असतो. कधीकधी तो झोपेच्या नावेत स्थिरावतो आणि त्याला
झोप लागते. ध्यानात अनेक गोष्टी अनेकदा
स्मरतात .अनेकदा, ती स्त्री, विपश्यनेत विलाप करणारी ती
खेडेगावची स्त्री, त्याच्यासमोर
येऊन बसते. अनेकदा, विलाप
करत ती म्हणते, "मी
जाणार नाही!" स्वप्नात, ध्यानात, त्या विलाप करणाऱ्या
स्त्रीव्यतिरिक्त अनेक गोष्टी दिसतात. कधीकधी तर साक्षात बुद्ध सुद्धा! पण
स्वप्नांच्या या दर्यात दारिया कधीच दिसत नाही. मोगऱ्याच्या फुलासारखा सुगंध
असलेली मल्लिका स्वप्नात
येत नाही. जेव्हा ती येते, तेव्हा
जाग आल्यावर ,तिची
आठवण येते. तिने दिलेल्या आनंदाची आठवण येते. ही विपश्यनेची तहान काय आहे? आयुष्यात ही अशी आस तरी कशी काय आहे? दारियाच्या दर्यात तरंगणारा विनय
अनेकदा असा विचार करतो. पण ह्या प्रवाहात तरंगत राहणे कधीच थांबत नाही.
अनेक महिने उलटले. अचानक एके दिवशी दारियाचा फोन आला.
ती फोनवर खूप आनंदित होती. विनयने विचारले, "तुला माझा नंबर कुठून मिळाला? मी तुला दिला नव्हता."
"मला
तुझा नंबर विपश्यना शिबीराच्या कार्यालयातून मिळाला होता, तेव्हाच." ती क्षणभर थांबली आणि म्हणाली, "पण मी तुला सांगितलं नाही."
“ठीक
आहे. ठीक आहे.” विनयने
विचारले, “तू
कशी आहेस ?”
“खूप
छान!” ती
म्हणाली, “तुम्ही
दिलेली भेट मी कधीच विसरू शकत नाही!”
"पण मी काहीच दिलं नाही. भेटवस्तू सुद्धा
नाही," तो
म्हणाला, "एक
फूलसुद्धा नाही."
“तुम्हीच
तर मला सर्व काही दिलं!”
“काय?”
“हो, मी तुमच्या मुलाची आई झाले आहे.”
“काय?” विनय घाबरून म्हणाला.
“हो, हे बाळ पूर्णपणे तुमचे आहे. फक्त रंग
माझा आहे. रंग सोडून बाकी सगळं तुमचे आहे.”
“काय, काय?”विनय थोडासा आनंदी आणि थोडासा
घाबरलेला म्हणाला.
"जर मी
कधी भारतात आले, तर मी
तुमची तुमच्या मुलाशी ओळख करून देईन,"
ती म्हणाली,
"किंवा मी तुम्हाला कधीतरी मॉस्कोला आमंत्रित करेन."
“काय?”विनय घाबरून ओरडला.
“विनय, तुला माहीत नाही, मला आई होण्याची खूप इच्छा होती.”ती म्हणाली, “मी
खूप प्रयत्न केले. एकामागून एक उपचार घेतले. पण मी हार मानली. डॉक्टरांनी तर टेस्ट
ट्यूब बेबीचा सल्लाही दिला होता.” ती
पुढे म्हणाली, “विपश्यना
करत असतानाच तू आवडलास,माझं
तुझं मन जुळलं. म्हणून मी प्रयत्न केला. मी सर्व धोके पत्करून प्रयत्न केला. आणि
मी यशस्वी झाले. धन्यवाद, माझ्या
प्रिया!”
विनय गप्प राहिला. आपल्या रशियन मुलाबद्दल दारियाला
काय सांगावे हे त्याला सुचत नव्हते. मग तो हळूच म्हणाला, "शक्य झाल्यास, कृपया मुलाला हिंदीसुद्धा
शिकव.म्हणजे जेव्हा कधी मी त्याला भेटेन, तेव्हा
त्याच्याशी बोलू शकेन."
“काही
हरकत नाही,” ती
म्हणाली,”पण तू
त्याचा पिता आहेस हे मी त्याला कधीच सांगणार नाही. आणि तू ही त्याला कधीच सांगू
नको .” ती
पुढे म्हणाली, “हे
फक्त तुला आणि मलाच माहीत आहे.
इतर कोणालाही सांगू नकोस.”
“ठीक
आहे,” विनय
म्हणाला, “काही
हरकत नाही.” विनयला ‘ना तुम हमें जानो,ना हम तुम्हें जाने ' हे गाणे आठवले.
“ठीक
आहे, प्रिये!”
"मला
मुलाचे काही फोटो पाठव,"
विनय म्हणाला.
"नक्कीच!" ती म्हणाली, "माहीत आहे का,मी माझ्या मुलाचं नाव विपश्यना ठेवलं आहे." दारिया उत्साहाने म्हणाली, "माझ्या नवऱ्यालाही ते नाव आवडतं.
खूपच आवडतं."
“काय?”
“हो, प्रियतमा!”
“खूप
छान!”
“खूप
छान”दारियाने
फोन ठेवला.
एका चुकीमुळे विनय पिता होईल आणि हा एक अलौकिक आनंद
असेल, हे
कोणाला ठाऊक होतं? दारियाने
त्याच्या मुलाचे काही फोटो व्हॉट्सॲपवरून पाठवले आहेत.
आता, ध्यानात
असताना त्याला त्याचा रशियन मुलगा, विपश्यना,खळखळून हसताना दिसतो. तो त्याला वारंवार पाहतो. पाणी, आकाश आणि हिमालयासोबतच, त्याचा रशियन मुलगा, विपश्यना, त्याच्या ध्यानातही प्रकट होतो.
पुन्हा पुन्हा. अधिकाधिक वेळा. नेहमी खळखळून हसत. त्याला दारियाकडे उडत जायचे आहे, जेणेकरून तो विपश्यना नावाच्या त्याच्या मुलाला लवकरात लवकर पाहू
शकेल. त्याच्या मनात विपश्यना बाळा साठी एक विचित्र ओढ निर्माण होते. त्या
जुगलबंदी नंतर, हा
असा कोणता छोटाख्याल आहे जे गाताना त्याला रडायला येत आहे?
हा कसला विलाप आहे? विपश्यनेतील हा आलाप विनयला विव्हळ
करतो. विपश्यनेतील ही कसली साधना आहे? ही
साधना आहे की उपासना? अचानक, विनयला विपश्यना शिबीरातील
ध्यानकक्षातील त्या स्त्रीच्या विलापाची आठवण येते. ही साधना आहे की विलाप, हे त्याला कळत नाही. दरिया अधूनमधून
व्हॉट्सॲपवर फोन करते. विपश्यना बाळ, आपला
मुलगा दाखवत राहते. कधी खळखळून हसणारा, कधी
झोपलेला. ती त्याला सांगते, 'जेव्हा
जेव्हा तो दूध पितो, तेव्हा
त्तुझी आठवण येते.'
“एरव्ही आठवण येत नाही का?”
"का येत नाही?" ती म्हणाली, "ती तर नेहमी
येते."
“तर मग तुझ्या पतीला माहीत
आहे का की विपश्यना कोणाचा मुलगा आहे?”
“हो,
माहीत आहे.”
“काय?” त्याला धक्का बसला.
"त्याला
माहीत आहे की विपश्यना त्याचाच मुलगा आहे," ती पुढे म्हणाली, "पण मला माहीत आहे की तो तुझा आणि
माझा मुलगा आहे. पण कोणाला सांगायची गरज काय?" ती म्हणाली, "मी आई झाले आहे; जगात यापेक्षा जास्त आनंदाची गोष्ट
दुसरी नाही."
"मला
तुला फक्त एकदाच भेटायचं आहे. मला विपश्यनाला पाहायचे आहे," विनय म्हणाला.
दारिया म्हणाली,”निश्चितच भेटू !”
[ समाप्त ]
मराठी
अनुवाद :प्रिया जलतारे
परिचय
दयानंद
पांडेय
१३
कादंबऱ्या, १५ कथा संग्रह
५ संस्मरण-संग्रह समवेत कविता , गझला, लेख, मुलाखती,सिनेमा
सहित दयानंद पांडेय यांची निरनिराळ्या प्रकारच्या
साहित्य कृतींचे ८० च्या वर पुस्तके प्रकाशीत झाले आहेत. कथा-लखनऊ चे १० खंड आणि
कथा-गोरखपुरचे ६ खंड ह्याचे
संपादन केले आहे. 30 जानेवारी
१९५८ ला गोरखपूर जिल्ह्यातील बैदौली गावी जन्म झाला.वर्ष १९७८ पासून पत्रकारिता
करत आहेत. गोरखपुर , दिल्ली
आणि लखनऊ येथील विविध वर्तमानपत्र-पत्रिकांमध्ये संपादक, विशेष संवाददाता इत्यादी विभिन्न
पदांवर कार्यरत असणारे दयानंद पांडेय यांचे कादंबऱ्या,कथा,कहाण्या,कविता आणि गझलांचा विभिन्न भाषांमध्ये अनुवाद प्रकाशीत
झाले आहेत. ’विपश्यना
में प्रेम’ ह्या
कादंबरीचा प्रिया जलतारे यांनी मराठीत अनुवाद केला आहे .ते पुस्तक प्रकाशीत झाले
आहे. ‘लोक
कवि अब गाते नहीं, ‘आणि ‘बांसगांव की मुनमुन’ ह्या कादंबऱ्याचा भोजपुरी अनुवाद
डा. ओम प्रकाश सिंह यांनी लिहिला असून ते प्रकाशीत झाले आहेत.’बड़की दी का यक्ष प्रश्न ‘,’ सुमि का स्पेस’चा इंग्लिश मध्ये ,’बर्फ़ में फंसी मछली’चा पंजाबी मध्ये आणि ‘मन्ना जल्दी आना’चा उर्दू मध्ये अनुवाद प्रकाशीत झाला आहे. काही कविता, गझला आणि कथा ह्यांचा प्रिया जलतारे
यांनी मराठी भाषेत अनुवाद केला आहे.
उत्तर
प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारे प्रतिष्ठित सन्मान क्रमशः
लोहिया साहित्य सन्मान आणि साहित्य भूषण हे प्रतिष्ठित पुरस्कार मिळाले आहेत. ‘विपश्यना में प्रेम’,कादंबरीला मध्य प्रदेश साहित्य अकादमीचा राजा वीर
सिंह देव राष्ट्रीय सन्मान मिळाला आहे.उत्तर प्रदेश कर्मचारी संस्थान द्वारे
साहित्य गौरव.’लोक
कवि अब गाते नहीं’ कादंबरीला
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान चा प्रेमचंद सन्मान, कथा संग्रह ‘एक जीनियस की विवादास्पद मौत’ ला यशपाल सन्मान. ‘फ़ेसबुक में फंसे चेहरे ‘ला अमृतलाल नागर व अन्य अनेक सन्मान
मिळाले आहेत .
अन्य प्रकाशन :
दयानंद पांडेय का रचना संसार संपादक : अशोक मिश्र
दयानंद पांडेय का कथा संसार लेखिका - शन्नो अग्रवाल
अलौकिक प्रेम रसात ओथंबलेले ,’विपश्यना में प्रेम’ ह्यावरील समीक्षा
संपादक : डॉक्टर सुरभि सिंह
दयानंद
पांडेय की कहानियों में नारी विमर्श का नया वितान : डॉक्टर सुरभि सिंह
संपर्क :
● 2 / 276 विराम
खंड , गोमती
नगर , लखनऊ
- 226010
● टावर
- 1 / 201 श्री
राधा स्काई गार्डेंस सेक्टर 16 बी , ग्रेटर नोएडा वेस्ट - 201306
ब्लॉग : सरोकारनामा
मोबाइल : 9335233424
~~अनुवादक परिचय~~
अनुवादक : सौ. प्रिया राजेंद्र जलतारे
पूर्वाश्रमीचे नाव : प्रियदर्शिनी दत्तात्रय जोशी
शिक्षण : बी.एससी.
वास्तव्य : अमरावती, महाराष्ट्र
पिताश्री : स्वर्गीय
दत्तात्रय जोशी
निवृत्त
सहसंचालक, लेखा
व वित्त विभाग, महाराष्ट्र
शासन.
मातोश्री : विजया
जोशी
निवृत्त
शिक्षिका.
पती : श्री.
राजेंद्र जलतारे
निवृत्त
मुख्य अभियंता,महाराष्ट्र
शासन.
माझी आई, माझे
पती, माझा
मुलगा, माझी
सून, माझी
मुलगी आणि माझा गोड नातू यांच्या प्रेमळ सहवासाने माझे आयुष्य अधिकच गोड, समृद्ध आणि आनंदमय झाले आहे.
माहेर आणि सासर या दोन्ही घरांवर सरस्वतीचा वरदहस्त
लाभलेला आहे. दोन्ही कुटुंबांकडून मिळालेल्या प्रेम, प्रोत्साहन आणि पाठिंब्यामुळेच हे
अनुवादकार्य करण्याचे धाडस आणि प्रेरणा मला मिळाली.
~~~~अर्पण पत्रिका ~~~~
भागीरथीचे पाणी घ्यावे आणि भागीरथीलाच अर्पण करावे, त्याप्रमाणे ज्यांनी मला अक्षरांची ओळख करून दिली, ज्ञानाची वाट दाखवली आणि माझ्या जीवनाला संस्कारांची समृद्ध शिदोरी दिली,त्या माझ्या माता-पित्यांच्या पवित्र चरणी माझे
हे प्रथम साहित्यपुष्प सादर
अर्पण करते.







बहुत सुन्दर
ReplyDelete👌😊🙏
ReplyDeleteगम्भीर समीक्षा
ReplyDeleteज़बरदस्त ♥️
ReplyDeleteज़बरदस्त ♥️
ReplyDeleteसाधु साधु
ReplyDeleteसाधू साधू 😊🙏
ReplyDeleteबहुत बहुत अद्भुत
ReplyDeleteउत्कृष्ट सर!
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