Thursday, 13 July 2023

विपश्यना में प्रेम

दयानंद पांडेय 

पूर्व पीठिका

प्रेम में विपश्यना

गौतम चटर्जी

गौतम चटर्जी 


संस्कृत शब्द पश्य का अर्थ है देखना और विपश्य का अपने अंतस को देखना। बाहर की ओर न देख कर अपने मन यानी विचारों को देखना।  और इसे विचारशून्य करना बुद्ध की ध्यानविधि का प्रथम चरण है, प्रारंभिक भूमि जिसे विपश्यना कहा गया। पालि में संस्कृत का ही शब्द लिया गया था। बुद्ध ने मन को ही सब कुछ कहा है। जब यह विचार यानी संसार से रिक्त है तो सत्य का प्रकाश इसी अंतस में प्रकाशित है। यही फिर वैदिक मानस है, आत्म या आत्मा है, हृदय है, ईश्वर अनुभूति है। आधुनिक दौर में विपश्यना के ध्यानशिविर भारत में लगते रहे हैं, लगते रहते हैं। हालांकि इसके लिए किसी शिविर में जाने की ज़रुरत  नहीं। जहां हम हैं वही शिविर हो सकता है, वही बोधिवृक्ष हो सकता है ।

उपन्यास

वरिष्ठ कथाकार दयानंद पांडेय के इस नये उपन्यास विपश्यना में प्रेम में इसी संदर्भ को उपन्यास का परिवेश बनाया गया है। शिविर-संदर्भ को वास्तविक जीवन से लिया गया है फिर लेखक की कल्पनाशीलता ने इसे अपनी कथावस्तु का आकाश दिया है। कथासार भी वास्तविक जीवन के अपरिचय से नहीं है। ऐसा परिचित जीवन में घटता है इससे हम परिचित हैं। जीवन-घटना की कल्पना और जीवन-घटना दो अलग प्रसंग हैं। जीवन-घटना की कल्पना इस तरह की जाय कि वह अविकल जीवन-घटना लगे, यही साहित्यरचना का उत्कर्ष है। रामायण और महाभारत का उत्कृष्ट उदाहरण वर्षों से हमारे सामने है। आज कोई मानने को ही तैयार नहीं कि यह वाल्मीकि और वेदव्यास की साहित्य रचना है। महाकाव्य और गाथा का यही चरित्र भारतीय मानस के रचनाकारों ने हमें सौंपा है। जिसके वातायन में ही हम दयानंद की इस औपन्यासिक कृति को देखते हैं और प्रशंसा करते हैं।

सिर्फ देखना होता और पूरा पढ़ने के बाद आस्वाद का अनुभव वह नहीं होता जो हम भारतीय महाकाव्य के प्रस्थान बिंदु से आधुनिक हिंदी उपन्यासों की सरणि तक हम लेते आए हैं तो फिर प्रशंसा की बात नहीं बनती, न इस लघु आलेख को लिखने की उत्कंठा बन पाती। महाकाव्य का उदाहरण हमने रखा। दोनों महाकाव्य इसी अर्थ में इतिहास हैं और इसी लिए इनके रचनाकाल को इतिहासकाल भी कहा गया है। तो हम यहां से उपन्यासधर्मिता को देखते हैं। आधुनिक भारतीय उपन्यास के उदाहरण हमारे आगे हैं रबींद्रनाथ ठाकुर का उपन्यास शेष कविता, मानिक बंदोपाध्याय का पुतुलनाच की इतिकथा, शरतचंद्र  का श्रीकांत की वसीयत, प्रेमचंद का देवस्थान रहस्य, जयशंकर प्रसाद का इरावती और निर्मल वर्मा का वे दिन। 2023 में अब उपन्यास विपश्यना में प्रेम को हम इसी वातायन में इसी ऊंचाई से देखते हैं।

उपन्यास में कथावस्तु के साथ दो महत्वपूर्ण अवयवों की परख की जाती है वह है भाषा और शैली। किसी कहानी को उपन्यास का रूप देने में यदि विस्तार की भाषा है तो यह सरस नहीं बनी रहती। लेकिन यदि यह भाषा में विस्तृत होता हुआ है और दिलचस्पी सिर्फ कथा-मोड़ के कारण ही नहीं बल्कि शैली यानी शिल्पगत वैशिष्ट्य के कारण भी है तो दिलचस्पी पूरा पढ़ लेने के बाद भी बनी रहती है उत्सुकता का उत्साह भी भाषा के स्तर पर वाग्जाल नहीं है। कथा के विस्तार में अन्योक्ति नहीं है, और शैली के स्तर पर सामासिक अभिव्यक्ति है, आलंकारिक सौंदर्य की शाब्दिक उपमाएं हैं। देखिए :

साधना और साधन में इतना संघर्ष क्या हमारे सारे जीवन में ही उथल पुथल नहीं मचाए है ? इस शोर का कोई कुछ नहीं कर सकता था। वह भी नहीं।

यह कौन सा शोर है? शोर है कि विलाप ? कि शोर और विलाप के बीच का कुछ ? विपश्यना तो नहीं ही है तो फिर क्या है ?

विराट दुनिया है स्त्री की देह। स्त्री का मन उसकी देह से भी विराट ।

चंदन है तो वह महकेगा ही वह महक उठता है।

बाहर हल्की धूप है , मन में ढेर सारी ठंड। 

नींद में ध्यान। 

विपश्यना में वासना का कौन सा संगीत है यह ?

शब्द-शब्द हम कथा में आगे बढ़ते हैं। ऐसे वाक्य सिर्फ़ अभिव्यक्ति भर नहीं हैं बल्कि ये कथा के प्रवाह को आगे बढ़ाते हैं बिल्कुल अलग आस्वाद के प्रभाव के साथ कथाप्रवाह के आगे बढ़ने के लिए विभिन्न चरित्र भी हैं, लोकेशन भी और लेखक की दृष्टिआधारित टिप्पणियां भी स्त्रियों के पक्ष में सोचते हुए यशोधरा और सीता की ओर से भी सोचा गया है। और लेखक ने अपने कुछ प्रश्न उठाए हैं। यह समझने के लिए कि यदि कोई स्त्री अपने मौन विलाप में इस शिविर में आयी है तो उसका आत्यन्तिक कारण क्या हो सकता है। इसे ढूंढने लेखक सिद्धार्थ की मानसिकता में जाता है और मैथिलीशरण गुप्त की कविता के जरिये यशोधरा के विलाप तक भी द्रौपदी तक भी यह जाना फिर लोकेशन में भी बदल सकता है। दार्जिलिंग या फिर गोभी की खेत का चबूतरा या युवा दिन या नदी की तलहटी या बॉटनिकल गार्डेन, और फिर लौट के आना, रहना। चुप की राजधानी में लगभग हर तीसरे अनुच्छेद में स्त्री के विलाप पर ध्यान है। चरित्रों में मुस्लिम महिला मित्र भी है, अंग्रेज लड़का भी, आस्ट्रेलियाई भी, फ्रांसीसी भी और साधु-साधु बोलता साधु भी। रुसी चरित्र तो कथा की नायिका ही है।

कथा की भाषा का संगीत की भाषा में भी अनुवाद हुआ है। परस्पर संपर्क के विवरण विशेष कर देहसंसर्ग की सूक्ष्म सक्रियता को संगीत की भाषा में मर्यादा दी गयी है। कभी बांसुरी के स्वर से तो कभी मालकौंस के राग विस्तार से। 

भाषा और शैली ही कथा को क्रमशः विस्तार देते हैं और पूरा उपन्यास एक ही बार में पूरा पढ़ जाता है। लगता है, किसी लंबी यात्रा से लौटे हों, बिना थके। अंतिम बार 'नीला चांद' पढ़ कर भी थोड़ा थके थे। विनय और मल्लिका का प्रेम जुड़ाव विपश्यना शिविर के अनुशासित मौन में घटता और पल्लिवत होता है। यहां भी भाषा एक बड़ी भूमिका में है। भारतीय और रुसी भाषा, मौन की भाषा, देह की भाषा और विपश्यना की भाषा। इस भाषिक कथामयता पर फिल्म भी बहुत अच्छी बन सकती है। देह के स्तर पर अंततः आ जाने के परिणति निकष पर उपन्यास पाठक को सावधान भी करता है। विपश्यना में मन से संसार ही छूटता है लेकिन यहां कथा संसार को कस कर पकड़ना और पकड़े रखना चाहती है और अंततः परिणति पाठक को उसके ध्यानशिविर में पहुंचा देती है, संसार के प्रति सावधान कर प्रेम में विपश्यना की ओर ध्यान अब जाता है। प्रशंसा यहां इसी कारण उपन्यास की है।

साधु साधु !


संपर्क 

एन 11 / 38 बी , रानीपुर , महमूरगंज 

वाराणसी - 221010 

मोबाइल : 7052306296 


[ वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली से प्रकाशित उपन्यास विपश्यना में प्रेम की भूमिका ]


अमेज़न (भारत)
हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl



प्रेम में विपश्यना 
लेखक : दयानंद पांडेय 
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन 
4695 , 21 - ए दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 
आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र 
पृष्ठ : 106 
हार्ड बाऊंड : 499 रुपए 
पेपरबैक : 299 रुपए 
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[ रामदेव शुक्ल के लिए ]

वह जैसे कोई चुप की राजधानी थी। आदमी तो आदमी पेड़ , पौधे, फूल, पत्ते, प्रकृति, वनस्पति सब चुप थे। जाने क्यों कोई चिड़िया भी नहीं चहकती थी। न भीतर की आवाज़ बाहर जाती थी, न बाहर की आवाज़ भीतर। अगर कोई आवाज़ कभी-कभार सुनाई देती थी तो आचार्य की। या टेप पर आचार्य के निर्देश। निर्देशों की झड़ी सी। या फिर घंटे या घंटी की। जो भी कुछ कहना-सुनना था, आचार्य कहें, आचार्य सुनें। या फिर घंटा कहें या रुनझुन बजती घंटी। या फिर लिखित निर्देश थे, जिन को पढ़ कर मान लेना और जान लेना था। लेकिन उस का इज़हार नहीं करना था। संकेतों में भी नहीं। आंखों-आंखों या संकेतों में भी किसी से कुछ कहना या सुनना  नियमों की अवहेलना थी। आप शिविर से बाहर हो सकते थे, किए जा सकते थे। मन के भीतर का शोर था कि थमता ही नहीं था। लेकिन आचार्य कहते थे कि मन को नियंत्रित करना ही हमारा ध्येय है। मन को नियंत्रित करना था और मन में बसा शोर था कि थमता ही नहीं था। लगता था गोया शोर का ही निवास हो मन में। इस शोर का क्या करें आचार्य ? वह कई बार यह पूछने की सोचता था। पर जाने कोई भीतर एक और बैठा था इस शोर के सिवाय भी जो पूछने ही नहीं देता था।

कौन था यह ?

शोर तो बहुत थे। उन की कैफ़ियत भी बहुत थी। किसिम-किसिम की। पर शांति नहीं थी। मन की शांति। और वह मन की शांति ही की तलाश में घर से लगभग पगहा तुड़ा कर, भाग कर इस शिविर में आया था। विपश्यना शिविर। पर क्या कोई शिविर किसी को शांति दे सकता है? यहां इस विपश्यना शिविर के ध्यान कक्ष में बैठा विनय यही सोच रहा था। आचार्य की आवाज़ में निरंतर बजता टेप सांस को समझने तटस्थ भाव से देखने के बहाने मन को नियंत्रित करने के निर्देश पर निर्देश ध्वनित करता जा रहा था। आना-पान चल रहा है। आना-पान मतलब सांस लेना, सांस छोड़ना। सांस पर नियंत्रण, सांस को तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से देखना सिखा रहे हैं आचार्य। सांस को स्पर्श करने को निर्देशित कर रहे हैं। वह कह रहे हैं नाक पर केंद्रित होने को। स्पर्श को महसूस करने को। पर यहां तो थोड़ी दूर पर ध्यान कक्ष में बैठी अंगरेज बाला का सौंदर्य महसूस हो रहा है। सारा ध्यान उस पर ही केंद्रित हो जा रहा है। वह लंदन से अपने ब्वाय फ़्रेंड के साथ आई है शिविर में। पर दोनों अलग-अलग ठहराए गए हैं। आपस में मिलने-बतियाने की मनाही है। पूरी सख्ती से। सो जब ध्यान कक्ष में होते हैं दोनों तो ध्यान छोड़ कर कर एक दूसरे में ध्यान लगाते हैं। नज़रें चुरा कर एक दूसरे को देखते हैं। लड़का विनय के ठीक आगे एक लाइन छोड़ कर रोज बैठता है। सब के बैठने की जगह तय है।

रोज एक ही जगह बैठना होता है। तो पहले दिन तो क्या पहली शाम बस परिचय था। और हलका सा ध्यान। उस शाम सब जान गए कि कहां बैठना है, क्या और कैसे करना है। इंट्रोड्यूसिंग मीटिंग कहिए। और मौन शुरु हो गया था।

अब मौन में ही सोना था, मौन में ही जगना था। मौन में ही नहाना था, मौन में ही खाना था। मौन क्या था मन के शोर में और-और जलना था। तो क्या मौन मन को जला डालता है? पता नहीं, पर अभी तो यह मौन मन को सुलगा रहा था। बिना धुएं और बिना आंच के। धीमी आंच पर जैसे सांस दहक रही थी। मौन की मीठी आंच एक अजीब सी दुनिया में ले जा रही थी। आंखें बंद थीं और जैसे मदहोशी सी छा रही थी। यह कौन सी दुनिया थी? दुनिया थी कि सपना थी? सपना कि कोई और लोक? मदहोशी की यह खुमारी भीतर-भीतर जैसे गा रही थी, 'आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन, मेरा मन,....मुसकुराए रे मेरा मन !' शाम होते न होते यह मदहोशी भी टूटने लगी थी। ध्यान कक्ष में ध्यान , अब देह की थकान में तब्दील हो रही थी यह मदहोशी। कमर टूट रही थी। शाम के नाश्ते ने कुछ थकान मद्धिम तो की पर प्रवचन में यह बिलकुल ही उतर गई। प्रवचन में विचारों की खिड़की थी, जो भावों की शुद्धता थी और तर्किकता की जो कड़ी दर कड़ी थी, विनय को मोह गई।

बहुत समय बाद रात को बिना भोजन किए ही सोने का समय आ गया। विधान ही था इस शिविर का कि रात का भोजन नहीं मिलेगा। न ही करना है किसी तरह। रात बिना भोजन के सोने के विद्यार्थी दिनों के दिन याद आ गए। तब तो रात क्या कई बार दिन भी बिना भोजन के गुज़र जाते थे। चेहरे पर जैसे भूख टंगी रहती थी किसी सिनेमा के पोस्टर की तरह। पेट में भूख की मरोड़ उठती रहती थी। पर उस दिन मन में तो कहीं था कि भोजन नहीं किया है पर पेट में मरोड़ नहीं उठी।  उस ने आइने में चेहरा देखा। चेहरे पर भूख का पोस्टर नहीं दिखा।

वह सो गया।

सुबह चार बजे जगने का घंटा बजा। वह नहीं उठा। थोड़ी देर बाद एक व्यक्ति हाथ में रुनझुन घंटी बजाते आया। विनय फिर भी नहीं उठा। घंटी अब की वह व्यक्ति उस के कमरे के सामने तब तक बजाता रहा, जब तक कि विनय उठ कर खड़ा नहीं हो गया। लेकिन वह व्यक्ति बोला कुछ नहीं। ब्रश आदि और स्नान के बाद वह पहुंचा ध्यान कक्ष। सभी ध्यानस्थ थे। उसे सचमुच बहुत देर हो गई थी। आचार्य ने उसे बस एक नज़र देखा। और ध्यानस्थ हो गए। विनय ने देखा वह अंगरेज बालिका भी ध्यानस्थ थी और उस का ब्वायफ़्रेंड भी। बाकी औरतें और मर्द भी ध्यानस्थ थे। वैसे भी इस शिविर में आधे से भी अधिक विदेशी थे। रुस, आस्ट्रेलिया, फ़्रांस, लंदन, सिंगापुर आदि देशों के औरत-मर्द थे। ज़्यादातर जोड़े में। पति-पत्नी भी एकाध थे। लेकिन महिला मित्रों वाले ज़्यादा थे। दो या तीन सिंगल भी थे। अपने आप में खोए। लगभग हारे हुए से। एकांत में भी एकांत खोजते हुए से। ध्यान में भी ध्यान खोजते हुए से। हिंदुस्तानी भी जो थे उस में ज़्यादातर मराठी थे। महाराष्ट्र से 15 लोगों का दल ही आया हुआ था। कुछ हिंदुस्तानी स्त्रियां भी थीं। पर लगभग गंवई या कस्बाई पृष्ठभूमि वाली। सीधे पल्ले में। सिर पर पल्लू लिए हुए। सिर्फ़ एक स्त्री कुछ-कुछ शहरी दीखती थी। लेकिन हिंदी वह भी नहीं जानती थी। लगभग सभी स्त्री-पुरुष यहां ध्यान के बहाने तनाव छांटने आए थे। हर कोई स्ट्रेस का मारा हुआ था। कोई साइंटिस्ट था, कोई प्राध्यापक, कोई डाक्टर, कोई व्यापारी, कोई ठेकेदार, कोई किसान, कोई नौकरीपेशा। ज़्यादातर  मध्यवर्गीय रहन-सहन वाले थे। तो कुछ उच्च मध्यवर्ग के भी। कुछ निम्न वर्ग के भी। पर सब के सब एक साथ एक ही ध्येय लिए आए थे - तनाव तंबू को तोड़ने। चुप रहना तनाव तोड़ने में कितना काम आ सकता है, विनय ने यहीं इसी शिविर में आ कर जाना। आप बोलेंगे नहीं तो विवाद होंगे ही नहीं। चुप रहना और एक बंधे हुए अनुशासन में रहना बहुत कुछ आसान कर देता है। और तिस पर ध्यान। विपश्यना की पद्धति आप को जैसे नहला देती है।

विनय भी नहा रहा था। पर आधा-अधूरा। आधा-अधूरा अनुशासन और आधा-अधूरा ही ध्यान वह कर पा रहा था। विनय के पास कोई ऐसा-वैसा तनाव भी नहीं था। वह तो सिर्फ़ घर की कुछ समस्याओं से आजिज आ कर आया था। यह सोच कर भी कि इस बहाने वह बुद्ध की शरण में जाएगा और कि बुद्ध के बारे में कुछ और जान-समझ पाएगा। बुद्ध को जान कर कुछ शुद्ध हो लेगा। कुछ शांति मिल जाएगी। पर यहां तो बुद्ध या बुद्ध के बारे में कुछ था ही नहीं। थी तो बुद्ध की तपस्या थी। लगभग अधेड़ हो चले विनय के वश की यह तपस्या बिलकुल ही नहीं थी। रोज-ब-रोज बारह-बारह घंटे बैठ कर ध्यान करना कुछ नहीं , बहुत कठिन था। ध्यान तो बाद की बात थी, पालथी मार कर आसन जमा कर लगातार बैठना एक विकट समस्या थी। अंग-अंग, पोर-पोर दुख से, दर्द से सराबोर था। भला बैठने भर से भी देह दुख सकती है? लेकिन विनय की देह तो दुख रही थी। पीठ तो लगता था जैसे टूट ही जाएगी। दूसरे ही दिन शाम को प्रवचन के बाद उस ने वहां उपस्थित आचार्य से यह बात बताई। वह मुसकुराए। और बोले, 'विकार निकल रहा है मन के भीतर से तो तकलीफ़ तो होगी।'

'विकार?' विनय चकित होता हुआ बोला, 'मैं कोई पापी नहीं हूं। पाप नहीं किए मैं ने कोई।'

'विकार कई तरह के होते हैं।' आचार्य ने कहा, 'पाप या दुष्कर्म ही विकार नहीं होता।' जैसे उन्हों ने जोड़ा , 'विकार निकलते ही तकलीफ़ खत्म हो जाएगी। देह नहीं टूटेगी।' और जैसे उन्हों ने इशारा किया कि बात ख़त्म। अब आप जाएं।

इस चुप की राजधानी में जैसे बोलने की यही एक खिड़की थी कि आप आचार्य से सीमित बात सवाल-समाधान की कर सकते थे। अकेले में। सब के जाने के बाद। धीमी आवाज़ में।

अब वह देखता कि कुछ लोग अचानक ध्यान कक्ष से गायब होने लगे। एक रशियन आदमी बाक़ायदा दीवार से टेक लगा कर बैठने लगा। विनय ने भी दीवार से टेक लगा कर बैठने की कोशिश की। शिविर का एक कार्यकर्ता आया और इशारे से मना कर अपनी जगह बैठने को कहने लगा। उस शाम उस ने आचार्य से दीवार से टेक लगा कर बैठने की फ़रियाद की। आचार्य ने सख़्ती से मना कर दिया। विनय ने उस रशियन आदमी का हवाला दिया तो आचार्य ने कहा कि, 'उसे कोई मेडिकल प्राब्लम है।'

'तो प्राब्लम तो मुझे भी है।' विनय ने विनयपूर्वक लगभग विनती की।

'यह कोई प्राब्लम नहीं है।'

बात ख़त्म हो गई।

फिर उस ने देखा कि एक फ्रांसीसी व्यक्ति बैठे-बैठे अचानक ग़ायब होने लगा। फिर उस ने चेक किया कि उस की महिला मित्र भी थोड़ी देर में उठ कर चल देती। यह सब देख कर उस का ध्यान खंडित होने लगा। देह का दर्द तो था ही भटकाने के लिए अब यह विदेशी जोड़ों का नैन मटक्का भी उस का ध्यान भटकाने लगा। तब जब कि महिला क्या पुरुष से भी संकेतों में भी बात करना मना था। मोबाइल, लैपटॉप , किताबें, कागज, पेन तक जमा करवा ली गई थीं। बिस्किट , नमकीन आदि भी जमा कर ली गई। कपड़ा , साबुन और दवाई के अलावा कोई अतिरिक्त चीज़ किसी भी के पास नहीं रहने दी गई थी। यहां तक की कोई माला तक ले ली गई थी। किसी भी किस्म के पूजा पाठ या एक्सरसाइज़ तक पर कड़ी पाबंदी थी। क्या तो ध्यान भंग होने का खतरा था। कोई और पद्धति ध्यान में मिल कर खलल डाल सकती थी, नुकसान हो सकता था। मानसिक और शारीरिक भी। ऐसा ही बताया गया था। चंचल मन को काबू करने के तमाम उपाय किए गए थे। पर विनय देख रहा था कि तमाम उपाय अब धराशायी होने लगे थे। वह अंगरेज लड़का थोड़ी दूर पर एक झाड़ के पास बैठ जाता। उस से कुछ ही दूर पर उस की गर्ल फ़्रेंड भी। अब इशारे शुरु। एक दिन टहलते हुए विनय ने देखा ऐसा करते उन दोनों को। और मुसकुरा कर रह गया। जाने क्यों उस अंगरेज लड़के को देख कर विनय को अपने बेटे की याद आ जाती। इस लड़के की हाइट, उस की बाडी लैंगवेज़, उस की मासूमियत, और बहुत कुछ बेटे से मिलती थी।

तो उसे बेटे की याद आ जाती। एक दिन वह जब सामने से गुज़रा तो वह दोनों हाथ जोड़ कर, हाथ माथे से सटा कर, झुक कर प्रणाम की मुद्रा में आ गया। बिन कुछ बोले। विनय का मन हुआ कि बढ़ कर उसे अपने गले से लगा ले। सटा ले अपने सीने से। लेकिन अनुशासन याद आ गया। वह रुक गया। अब वह लड़का अकसर ही जब भी उसे देखता हाथ जोड़ कर प्रणाम की मुद्रा में आ जाता। तो उसे उस पर दुलार आ जाता। बेटे की याद में वह डूब जाता। पत्नी और बेटियों की याद आ जाती। अम्मा-पिता जी की याद आ जाती। जो घर छोड़ कर वह आया था, उस घर फ़ौरन सेकेंड भर में पहुंच जाने की इच्छा में वह तड़प कर रह जाता।

वह अब आचार्य से मिल कर कहना चाहता था कि, 'घर जाना चाहता हूं। यह ध्यान-व्यान मेरे वश का नहीं है।' लेकिन शिविर ज्वाइन करते समय भरे हुए बांड की इबारत और अनुशासन में बंधे रहने की इबारत रोक लेती। लेकिन जब वह अंगरेज लड़का सामने पड़ जाता हाथ जोड़े , उस का सारा संयम , सारी इबारत जवाब दे जाती।
तो क्या जब बुद्ध ने घर छोड़ा रहा होगा तो क्या उन्हें भी अपने बेटे और पत्नी की सुधि नहीं आई होगी? माता-पिता, कुटुंब याद नहीं आए होंगे। वह महल, वह ऐश्वर्य, वह सुविधा-साधन और भोग नहीं याद आए होंगे?

ज़रुर याद आए होंगे।

तब फिर क्यों नहीं लौटे बुद्ध? अपने घर क्यों नहीं लौटे बुद्ध? बुद्ध नहीं लौटे और कि वह दो चार दिनों में ही लौट जाना चाहता है? क्या यह मौन रहने की, अनुशासन में रहने का नतीज़ा है। कि मन में, जैसा कि आचार्य कहते हैं-विकार, उस विकार की पुकार है कि घर लौट चलो। घर लौट चलो विनय, घर लौट चलो! यह तप-तपस्या तुम्हारे वश का नहीं। न कोई अखबार, न टी.वी., न फ़ोन, न मोबाइल, न लैपटॉप , न घर परिवार, न बाकी दुनिया से कोई संपर्क। बस शिविर है, सांस है, सांस का स्पर्श है। आना-पान है यह। कड़ी दिनचर्या है। सुबह चार बजे उठना, ध्यान तपस्या, सुबह छ बजे ही नाश्ता। सूर्य उगता नहीं और नाश्ता हो जाता है। नहा-धो कर फिर ध्यान। भोजन के बाद थोड़ा विश्राम। फिर ध्यान। ध्यान, ध्यान और सिर्फ़ ध्यान। खुद को अनुपस्थित मान लेना ही ध्यान है। आचार्य कहते हैं कि साक्षी भाव से खुद को देखना, तटस्थ भाव से देखना ही ध्यान है। अगर कहीं सनसनाहट भी हो, खुजली भी हो, कुछ भी हो, उस पर प्रतिक्रिया न करें। तटस्थ भाव से महसूस करें। जो भी कुछ होता है, उसे होने दें। गुज़र जाने दें।

यह कैसे संभव है भला? विनय आचार्य से यह पूछना चाहता है। कि यहां तो एक भाव या एक मुद्रा में थोड़ी देर बैठना भी नहीं हो पा रहा। बैठने की दिशा और दशा बार-बर बदलनी पड़ रही है। और आप कहते हैं आचार्य कि तटस्थ भाव से, साक्षी भाव से सिर्फ़ देखिए! यह कैसे करें आचार्य?

विनय को याद आता है, बचपन में सुनी या पढ़ी कई बातें। जैसे कि दुशमन की सेना आ कर लड़ कर, जीत कर चली गई। पर बौद्ध अपने ध्यान में ही लगे रह गए। उन्हें कुछ पता ही नहीं चला। यह कि बौद्ध ध्यान में इतना खो गया कि उस की देह से चींटियां गुज़रने लगीं। चीटियों ने आने-जाने का रास्ता बना लिया। पर बौद्ध भिक्षुक की साधना समाप्त नहीं हुई। तो क्या विनय भी इस या ऐसी किसी साधना में समा सकता है? वह सोचता है और सिर्फ़ सोच कर ही रह जाता है। साधु -साधु !

तो क्या आज की तारीख़ में भी ऐसा कोई बौद्ध होगा दुनिया में कि वह साधना में हो और चीटियां उस की देह से गुज़रती हुई आने-जाने की राह बना लें? कि दुश्मन की सेना फ़तह कर जाए और बौद्ध की साधना न टूटॆ? आज मुमकिन भी है भला यह सब? अगर है तो अपना चीन क्या कर रहा है? सीमा पर भी और विश्व बाज़ार में भी। कोरोना जैसी महामारी पूरी दुनिया में फैला कर , अपने आस-पास आतंक का पर्याय बना चीन कर क्या रहा है ? आख़िर चीन अपने को बौद्ध देश मानता है। विनय अपने आप ही से पूछता है। तो क्या चीन और चीन के लोग यह विपश्यना और इस साधना से, इस ध्यान से अपरिचित हैं? वह नहीं जानते साक्षी भाव? यह तटस्थ भाव? कि अपने आप को भी अपने से अलग कर के देखे? विनय पूछ्ता है। और निरुत्तर हो जाता है। कि वामपंथी तानाशाही और फ़ासिज्म का मारा चीन अपने साम्राज्यवादी स्वभाव में भूल बैठा है , बुद्ध , उन की अहिंसा और उन के विचार को। 

चीन?

चीन छोड़िए , अपने भारत में भी कई जगहों पर गया है विनय। पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग या सिक्किम के गैंगटोक जैसी जगहों में। जहां अधिकांश लोग बौद्ध हैं। बौद्ध विहार और बौद्ध मठों की बहार है। पर शराब और गाय के मांस उन की दिनचर्या है। मेघालय के शिलांग से लगायत गैंगटोक तक उस ने यही देखा है। और सब कुछ खुले-आम। न त्याग, न तपस्या, न साधना।  बस साधन और ऐश्वर्य की दौड़ में लगे लोग ही मिले। अधिकांश।

साधना और साधन में इतना संघर्ष क्या हमारे सारे जीवन में ही उथल-पुथल नहीं मचाए है? विनय सोचता है।

शिविर में एक और फ़्रांसिसी है। वह अपने आप में ही खोया रहता है। किसी की तरफ़ भूल कर भी नहीं देखता। वह अकसर ही जब ख़ाली होता है तो किसी झाड़ या किसी छोटे पेड़ के पास चला जाता है, किसी फूल के पास चला जाता है। पत्तियों को चूमता है। उन्हें बड़े ध्यान से , बड़े मनोयोग से देखता है। गोया वह कोई पत्ती नहीं उस की माशूका हो। वह कोई नन्हा बच्चा हो, और पत्ती उस की मां हो। मंत्रमुग्ध वह वनस्पतियों से ऐसे ही मिलता है इस चुप की राजधानी में। विनय उसे ऐसा करते देख विह्वल हो जाता है।

बुद्ध की एक तपोस्थली की गोद में बसे सुदूर एक गांव में स्थित यह शिविर है भी ऐसे एकांत में कि आस-पास से कोई शोर नहीं आता। कोई गाना, कोई संगीत भी नहीं। दूर-दूर कुछ गांव दिखते हैं। नहर भी है एक पास में। गेहूं और गन्ने के हरियाली भरे खेतों के बीच बसे इस शिविर में कुछ फूल हैं, कुछ पौधे हैं, वृक्ष और वनस्पतियां हैं। जैसे उन्हीं के पत्तों की सरसराहट है, उन्हीं की ध्वनि है, उन्हीं की बोली है। तो क्या यह फ़्रासिसी उन की भाषा समझता है?

क्या पता?

एक आस्ट्रेलियायी है। दोपहर के भोजन के समय जब वह बैठता है डाइनिंग हाल में तो विनय उस के खाने के अंदाज़ को देखता रहता है। बड़े निर्विकार ढंग से वह रोटी को मेज़ पर फैलाता है। पहले थोड़ा दाल-चावल खा लेता है। फिर सब्जी भी उस में सान लेता है। और फिर रोटी में लपेट कर रोटी-रोल बनाता है और जैसे वह कोई शिशु हो , इतने चाव से खाता है कि मन मगन हो जाता है। कोई अधेड़ व्यक्ति शिशु बन कर इस तरह खाना खा सकता है और वह भी रोज-रोज? जैसे खुद ही मां हो, खुद ही बच्चा। यह शिशु सी अबोधता और रोटी-रोल में मां का दुलार का कंट्रास्ट भी अदभुत है। एक साधु है गेरुवाधारी है। युवा है और सिंगापुर से आया है। वह जाने क्यों दोनों हाथ से खाता है। ऐसे जैसे खाना नहीं खा रहा हो दोनों हाथ से गेंद खेल रहा हो। ऐसे जैसे भोजन से पहली बार भेंट हो रही हो। किसी जादूगर की तरह। कई बार कुछ उस की दाढ़ी में भी लग जाता है। पर उसे इस सब की परवाह नहीं। वह तो बस युद्धस्तर पर भोजन में निमग्न रहता है। ठीक इसी तर्ज़ पर ध्यान कक्ष में वह औरतों को भी अपलक देखता रहता है। बिना किसी शील-संकोच के। विनय सोचता है कि जब मौन टूटेगा तो वह उस से एक बार कहेगा ज़रुर कि अभी यह साधू बाना छोड़ दे। हालां कि उस की यह व्यग्रता सिर्फ़ भोजन और औरतों तक ही दीखती है। बाक़ी तो वह अपने ओढ़ने का कंबल तक रोज धो डालता है। साफ-सफाई का भी ख़ास ख़याल रखता है। पर उस का रोज-रोज कंबल धोना उसे समझ नहीं आता। ऐसा तो नहीं कि जिस व्यग्रता से वह औरतों को देखने में अपनी आंखें खर्च करता है तो रात में सोने में स्खलित हो कर अपने कपड़े ख़राब कर डालता है। सो पाप-बोध में रोज कपड़ों के साथ कंबल भी धो डालता है। क्या पता? पर यहां साधना में तो ब्रह्मचर्य का पालन भी अनिवार्य है। तो क्या उस का ब्रह्मचर्य रोज-ब-रोज खंडित होता जाता है? क्या भोजन और स्त्री से वंचित रहना इतना व्यग्र बना देता है आदमी को?

अब ध्यान कक्ष में वह फ्रांसीसी व्यक्ति अचानक दिखना बंद हो गया है। उस की महिला मित्र भी नदारद है। अचानक ही दो महाराष्ट्रियन भी अनुपस्थित मिलने लगे हैं। धीरे-धीरे और भी दो एक लोग। यहां बीमारी के बहाने भी ध्यान से छुट्टी नहीं मिलती किसी भी को।

विनय को याद है कि एक बार जब वह विद्यार्थी जीवन में एन.सी.सी. के कैंप में गया था तब वहां भी सुबह-सुबह चार बजे उठा कर दौड़ा दिया जाता था। सुबह चार बजे से रात नौ बजे तक लगातार व्यस्त रखने की दिनचर्या थी। बहुत ही मेहनत, दौड़-भाग आदि की। बस भोजन, नाश्ता का ब्रेक और दोपहर में एक घंटे का विश्राम। ज़रा-ज़रा सी ग़लती पर राइफ़ल हाथों में उठा कर खड़े होने या दौड़ने की सज़ा मिल जाती थी। कई बार कोई लड़का अगर बीमारी का बहाना ले कर परेड में जाने से छुट्टी पाना चाहता था तो छुट्टी तो मिल जाती थी। पर साथ ही वह भोजन से वंचित भी कर दिया जाता था। अंडा, दूध, ब्रेड के भरोसे। वह भी बहुत सीमित मात्रा में। तो भूख सताती थी। तो रास्ता यह निकाला जाता था कि  दो-तीन लड़के खाने के समय एक-एक या दो-दो रोटी चुरा कर अपनी ज़ेब में रख लेते थे। और 'बीमार' को ला कर दे देते थे। पर यहां यह सब मुमकिन नहीं था।

एन.सी.सी.कैंप में जाने से पहले विनय सेना में जाने के सपने देखता था। पर उस कैंप में इतनी भूसी छूट गई कि विनय ने सेना में जाने का इरादा बदल दिया। तो इसी तरह इस विपश्यना शिविर में आने के पहले वह पत्नी से जब नाराज होता तो गुस्से में कहता रहता था कि घर छोड़ कर संन्यासी बन जाऊंगा। पर अब यहां भी बैठे-बैठे ध्यान में ही इतनी भूसी छूट गई थी कुछ दिन में ही कि संन्यासी बनने का उस का इरादा हमेशा के लिए मुल्तवी हो चुका था। अब तो यह था कि जल्दी से जल्दी शिविर समाप्त हो और वह घर भागे। सांस, सांस का स्पर्श, ध्यान, मन पर नियंत्रण, तटस्थ भाव या साक्षी भाव से खुद को देखना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा था। आंख बंद कर चार पांच मिनट तो किसी तरह आधा-अधूरा निभ जाता, सांस और सांस से खुद को स्पर्श करना, साक्षी भाव से खुद का निरीक्षण करना। एकाध बार इस प्रक्रिया में स्वर्गानुभूति भी होती भीतर से। लगता कि किसी दूसरी ही दुनिया में आ गए हैं। पर जल्दी ही मन भटक जाता। 

मन देह को साक्षी भाव से देखने, देह की भंगिमा या स्फुरण को तटस्थ भाव से देखने के बजाय घर-परिवार की समस्याओं, व्यक्तिगत बातों, दफ़्तर के कमीनों से कैसे छुट्टी पाएं, पार पाएं आदि की बातों में भटकने लगता। या फिर इस सब से भी छुट्टी मिलती किसी तरह तो आंख बंद किए-किए विनय नींद के हवाले हो जाता। कभी आधी नींद, आधी चेतना में वह डूबता-उतराता, नाक बजाने लगता। तो कोई कार्यकर्ता आ कर हाथ पकड़ कर जगाता। लेकिन सब कुछ हो जाता, ध्यान ही क़ायदे से , ईमानदारी से नहीं हो पाता। वह सोचता कि कोई गृहस्थ भला घंटों-घंटों ध्यान कैसे कर सकता है? वह अपने आप से ही पूछता कि संन्यासी होना भला इतना कठिन होता है? और फिर यहां तो बस एक ध्यान के अलावा किसी और बात की चिंता भी नहीं करनी थी। बना-बनाया भोजन-पानी, आवास, बिजली आदि की व्यवस्था थी। जंगल आदि में होने वाली किसी किस्म की समस्या नहीं थी। सारी सुरक्षा थी। तो पर्वत, वन आदि जगहों पर जब लोग तपस्या करते होंगे तो भला कैसे करते होंगे? कैसे खाते-पीते होंगे ?

विनय यह सोच कर ही मुश्किल में आ जाता। जैसे किसी युवा होती लड़की के लिए उस का वक्ष ही भार हो जाता है, ठीक वैसे ही विनय के लिए यह साधना भी भार हो चली थी। वह बैठा है ध्यानकक्ष में और एक विदेशी महिला को आना-पान करते निहार रहा है। आना-पान करते यानी सांस लेते-छोड़ते उस के भारी वक्ष भी तेज़ी से हिल रहे हैं ऊपर नीचे होते हुए। जैसे कोई केले का पत्ता हिले। ध्यान छोड़ कर वह यही सब देख रहा है, समझ रहा है। किसी का नितंब , किसी का वक्ष। और सोच रहा है कि गोरी चमड़ी आख़िर इतनी उन्मुक्त कैसे हो जाती है? क्या यह उन्मुक्त होना गोरे-काले के नस्लभेद से भी कहीं जुड़ा है? वह अचानक सामने बैठे आचार्य को देख रहा है और पा रहा है कि चोर नज़रों ही से सही वह भी गोरी चमड़ी की उन्मुक्तता का भरपूर लाभ ले रहे हैं। विनय ने उन को यह लाभ लेते देख लिया है, यह बात जानते ही आचार्य ने आंखें कस कर मींच ली हैं। विनय ने भी। आचार्य के टेप की आवाज़ में वह डूब गया है। अजब आनंद है इस आवाज़ में भी। इतनी सतर्क, इतनी स्पष्ट और इतने व्यौरे में सनी, किसी नाव की तरह थपेड़े खाती, बलखाती आवाज़ से इस से पहले वह कभी नहीं मिला था। आरोह-अवरोह और श्रद्धा का ऐसा मेल, जैसे कानों में जलतरंग बज जाए, जैसे कोई मीठी सी हवा कानों में चुपके से स्पर्श कर जाए। लगता है वह देवलोक में पहुंच गया है। आचार्य की आवाज़ पंडित शिव कुमार शर्मा के संतूर सी शहद घोलती कानों से दिल में उतरती जाती है। आंख बंद कर उसे सुनते और गुनते जाने का अलौकिक आनंद उसे तर-बतर किए जा रहा है। आहिस्ता-आहिस्ता। और आहिस्ता।  पर थोड़ी देर में उस की नाक बज गई है।

वह उठ कर बाहर आ गया है।

अंगरेज लड़का बाहर से भीतर जा रहा है, मुसकुराता, हाथ जोड़ कर झुक कर विनय को, विनय भाव से प्रणाम करता हुआ। वह भीतर चला गया है और विनय को सहसा बेटे की याद आ गई है। फ़र्क बस यही है के इस के चेहरे पर दाढ़ी है, बेटे के नहीं। पर यही मासूमियत, यही बेलौसपन, यही लोच, यही विनम्रता और लंबाई भी यही है। विनय एक चबूतरे पर बैठ जाता है। आंखें बंद कर बेटे की याद में खो जाता है। उस बेटे की याद में जिस से आज़िज़ आ कर वह इस विपश्यना शिविर में आ गया है। शांति की तलाश में। और शांति है कि मिलती नहीं। नींद मिलती है। जैसे माघ महीने की धूप उसे लोरी गा कर सुला रही है। वह बैठे-बैठे फिर सो गया है।

विनय को इतनी नींद क्यों आती है भला? वह शायद सपने में ही अपने आप से ही पूछ रहा है। कि सोने के कमरे में तो सोता ही है। सुबह हो या दोपहर जैसे कोई मां लोरी गा कर बच्चे को सुलाती है, कोई एक कार्यकर्ता उसे रुनझुन घंटी बजा -बजा कर जगाता है। लगभग रोज ही। बड़े वाले घंटे से तो वह सिर्फ़ सोचता है कि जग जाए। पर सोच कर सो जाता है। फिर बेचारा कार्यकर्ता रुनझुन घंटी बजाता है। दो-तीन मिनट में वह उठता है तो कार्यकर्ता झल्लाता नहीं मुसकुराता है। कश्मीरी है। और उस के चेहरे पर जैसे कश्मीरी सेव की लाली छा जाती है। ध्यान कक्ष में भी वह जब तब नाक बजा देता है। और अब ध्यान कक्ष छोड़ वह चबूतरे पर बैठा ऊंघ रहा है। विपश्यना की जगह एन.सी.सी कैंप होता यह तो राइफ़ल उठा कर फ़ील्ड के जाने कितने चक्कर काटने को उस्ताद बोल देते। पर यहां इस विपश्यना में आचार्य ऐसा कुछ नहीं करते।

कमरे में कैलेंडर भी नहीं है कि वह तारीख़ देख कर तय करे कि कब जाना है। मन में वह दिन की गिनती भूल गया है कि कब आया और कब लौटना है? अख़बार , टी.वी. से भी मुलाक़ात नहीं है। बैठे-बैठे पीठ और कमर टूट कर दर्द के मारे जैसे धनुष बन जाना चाहते हैं। तो ऐसे में किसे और कैसे भला दिन की भी याद रहे? कम से कम विनय को तो याद नहीं। किसी और को हो तो हो। तो क्या इसी तरह अगर वह कुछ दिन और जो रहा तो सब कुछ भूल जाएगा? भूल जाएगा अपनी यशोधरा, अपने पुत्र  को भी? हो जाएगा बुद्ध? बुद्ध बन कर शुद्ध हो जाएगा? क्या ऐसे ही भूल गए थे बुद्ध अपने परिजनों को? अगर भूल ही गए थे तो वह तप कर के किस को ढूंढ रहे थे? यह कुछ ढूंढने का तप था या कुछ भूलने का?  कभी कपिलवस्तु,  कभी श्रावस्ती, कभी सारनाथ तो कभी कुशीनगर। डगर-डगर, नगर-नगर घूम कर वह सब को भूल रहे थे कि याद कर रहे थे? वह तो अपने ही को भूलना सीख रहे थे, सिखा रहे थे कि भूल जाओ अपने आप को भी। साक्षी भाव से, तटस्थ भाव से देखो। खुद को भी। दुख हो, सुख हो, उस को महसूस मत करो। बस देखो और आगे निकल जाओ। कितना आसान है यह बता देना और सिखा देना? और कितना कठिन है इसे अंगीकार करना?

सच बतलाना बुद्ध तुम इसे कैसे स्वीकर कर पाए थे? कैसे सीख पाए थे? क्या सिर्फ़ विपश्यना से? अच्छा जो सीख ही गए थे , भूल ही गए थे अपने आप को भी तो क्या करने गए थे बरसों बाद अपने उस राजमहल में भी? क्या सिर्फ़ भिक्षा मांगने ही? और यशोधरा से भी उस का बेटा ले लिया था भीख में? यह तुम्हारा तप था बुद्ध? कि यशोधरा का त्याग? कि उस ने दिया भी तो तुम्हें अपना एकमात्र आसरा अपना प्रिय बेटा ही दिया। यह कह कर कि इस से अमूल्य और इस के सिवाय मेरे पास और क्या है जो तुम्हें दे दूं? और तुम ने ले लिया था बेटे को। सच-सच बतलाना बुद्ध क्या तुम बेटा लेने ही तो नहीं गए थे अपने राजमहल? अच्छा जो वह संतान बेटा नहीं बेटी होती, तो भी क्या तुम उसे भिक्षा में ले लेते?  विनय मन ही मन पूछता है। वह एक शाम आचार्य से इस पर चर्चा भी करना चाहता है। पर आचार्य इस बिंदु पर बहस से , चर्चा से कतरा जाते हैं। यह कह कर कि बात सिर्फ़ विपश्यना पर ही हो सकती है। वह भी बहस भाव में नहीं। सिर्फ़ प्रश्न और उत्तर की शकल में। संक्षिप्त में। और उन के पास हर सवाल का जवाब सिर्फ़ विकार और विकार मुक्ति में ही होता है। विनय को यह बात कुछ जमती नहीं।

वह फिर साधना में डूब गया है। भूल गया है देह का दर्द। मन से अब वह बैरागी हो रहा है। बैराग से अनुराग हो गया है। अब वह सांस को आते-जाते सिर्फ़ साक्षी भाव से देखने लगा है, देखना सीखने लगा है। आचार्य सत्यनारायण गोयनका का वीडियो प्रवचन उसे लुभाने लगा है। आचार्य अपनी हर बात के लिए तर्क में डूबी उपकथाओं का सहारा लेते ही रहते हैं। किसिम-किसिम की कथाएं। रोचक कथाएं। बिल्कुल आचार्य रजनीश की शैली में। पहले कथा फिर तर्क और अकाट्य तर्क। कि जैसे आप बात को गांठ बांध लें। भूलें नहीं। कथा रस में पगी बातें सीधे मन को छूती हुई भीतर तक जाती हैं। तो अगर यह कथा याद रह जाती है तो देह में या मन में हो रही प्रतिक्रियाओं को वह कैसे भूल जाए? या भूल जाने का नाटक करे? कि हां मैं साक्षी भाव से देख रहा हूं। खुजली हो रही है देह में भी और मन में भी और भूलने का स्वांग चल रहा है। तो यह ध्यान अभिनय है कि साधना? विनय मन ही मन पूछ रहा है। आचार्य हर कथा या बात के बाद जैसे संपुट के तौर पर या कहिए सूत्र  वाक्य या स्लोगन के तौर पर दुहराते या तिहराते ही रहते हैं कि, 'यह भी गुज़र जाएगा !'  और फिर विनय हर बार मन में पूछता है अपने आप से कि जब सब कुछ गुज़र ही जाएगा तो बाक़ी क्या रहेगा? समय अच्छा हो, बुरा हो गुज़र ही जाता है। पानी गुज़र जाता है पर पत्थर पर निशान छोड़ जाता है। तो क्या यह निशान ही इतिहास होता है? तो इतिहास शेष रह जाता है। हार जीत शेष रह जाती है। उस की कथाएं शेष रह जाती हैं। और जब इतिहास शेष रह जाता है, कथाएं शेष रह जाती हैं , तब गुज़र क्या जाता है? सिर्फ़ दुख या सुख? कि कुछ और?  उस के इस सवाल का समुचित जवाब उसे नहीं मिलता। मन के किसी कोने-अतरे से भी नहीं।

वह अनुत्तरित बैठा है ध्यान कक्ष में। ध्यान में लीन। अब वह गोरी अधखुली-अधनंगी विदेशी औरतों को भी नहीं देखता, नहीं देखता उन की देह  के उभार या उतार-चढ़ाव। देह का बुखार और उस की खुमारी उतर गई है उस के मन से। वह ध्यान में रमा हुआ साक्षी भाव से अपना ही निरीक्षण करता है। उसे लगता है , अपने मक़सद में क़ामयाब  है वह। इस शिविर को साध लेगा अब वह। 

पर क्या सचमुच ?

सचमुच ऐसा नहीं था। सच तो यह था कि वह खुद को ही नहीं साध पा रहा था। शिविर क्या ख़ाक साधता। लेकिन शिविर में वह था। ख़ुद वह भले ठहरा हुआ था पर शिविर जैसे उस के भीतर नदी की तरह बह रहा था। इस नदी को वह संभाल नहीं पा रहा था। नदी उस के भीतर तनाव रोप रही थी। अपना निरिक्षण करने की जगह अब वह इस अपने भीतर के तनाव का निरीक्षण कर रहा था। तनाव का निरीक्षण करते-करते वह इतना ध्यानमग्न हो जाता कि बैठे-बैठे ऊंघने लगता। ऊंघते-ऊंघते उस की नाक बजने लगती। ध्यान की यह कौन सी नदी है भला। जो तनाव में भी नींद की नाव में बिठा देती है। अचानक आचार्य का सहयोगी उसे हिला कर नींद की इस नाव से उतार लेता है। जब-तब वह ऐसा करता रहता है। क्यों कि नींद की नाव जैसे उस की सहयात्री है। सुख हो दुःख हो , कुछ भी हो नींद की नाव उसे बड़े मनुहार से बुला कर बिठा लेती है। कभी नदी पार नहीं होती पर नाव , नींद की नाव , नदी में मिलती रहती है। वह कभी मना नहीं करता। नींद से बड़ा सुख है कौन सा भला। क्यों मना करे भला। नदी भीतर तनाव भरे और नींद की नाव मिल जाए , नदी पार हो न हो , तनाव पार हो जाता है। फिर नदी पार करने की सुधि है भी किसे। चुप की इस राजधानी में शिविर की नदी भीतर तनाव रोपे , ऐसे में नींद की नाव मिल जाना भी क्या है भला। शिविर के लक्ष्य को , ध्यान की डगर को डग भर सही भटकाना और भटकाना ही है। मन के भीतर मचे शोर को मौन दबा सकता है ? लोग कहते हैं , मौन में बड़ी शक्ति होती है। तो मौन , मन के शोर को क्यों नहीं शांत कर पाता। किसी चट्टान से सागर की लहरों की तरह पछाड़ खाता यह शोर बढ़ता ही जाता है। विपश्यना के वश का भी नहीं लगता यह शोर। 

शोर !

बचपन में घर में एक तोता था। चाचा जी ले आए थे। तोते का पिंजरा जाने क्यों वह विनय से ही धुलवाते। तोते को नहलाते समय कई बार विनय का मन होता कि पिंजरा धीरे से खोल कर तोते को उड़ा दे। यह रोज-रोज उसे नहलाने-धुलाने की बेवकूफी से छुट्टी। फिर घर में घूमती बिल्ली दिख जाती या याद आ जाती तो तोते की जान का ख़तरा दिख जाता। तो वह तोते को उड़ाने का फ़ैसला लगभग रोज ही मुल्तवी कर देता। कि कहीं बिल्ली का शिकार न बन जाए तोता। जाने उड़ना भी भूल गया हो। क्यों कि बंद कमरे में पिंजड़े से निकाल कर तोते को टहलाना भी उस का खेल था। पिंजड़े से निकल कर भी तोता किसी शिशु की तरह , ठुमक-ठुमक कर चलता। इतना कि ठुमक चलत रामचंद्र , बाजत पैजनिया ! का भजन गायन याद आ जाता। लेकिन तोता कमरे में उड़ता नहीं था। तो क्या वह उड़ना भूल गया था या खुली हवा नहीं मिलती थी , इस लिए नहीं उड़ता था। चाचा को उन्हीं दिनों सप्ताह में एक दिन मौन व्रत रहने का भी सूझ गया था। किसी ने उन्हें सलाह दी थी कि एक दिन मौन व्रत रहने से झूठ बोलने में कमी आती है। मन शांत रहता है। आदि-इत्यादि। दिन भर मौन व्रत रह कर रात में बिना नमक का भोजन कर वह मौन व्रत तोड़ते थे। अमूमन दूध रोटी या पूड़ी-हलवा वह खाते। लेकिन विनय ने देखा कि चाचा मौन व्रत में संकेतों में ज़्यादा झूठ बोलते थे। जैसे कि अगर कोई उन से पूछ ले कि फला को अभी देखा है क्या ? तो भले ही उन्हों ने उसे देखा हो , संकेतों में हाथ हिला कर या सिर हिला कर , मुंह पिचका कर , मना कर देते। तो इस तरह वह भले बोलते नहीं थे पर झूठ बहुत बोलते थे। उन के मौन व्रत का झूठ न बोलने का लक्ष्य इस तरह बार-बार टूट जाता था। बल्कि ज़्यादा टूट जाता था। पर उन के मन में यह शोर रहता कि वह झूठ से एक दिन बचे रहे। 

इस शोर का कोई कुछ नहीं कर सकता था। वह भी नहीं। 

विपश्यना शिविर में विनय भी अपने मौन के शोर को अब संभाल नहीं पा रहा था। मौन का बांध जैसे रिस-रिस कर टूटना चाहता था। शोर की नदी का प्रवाह तेज़ और तेज़ होता जाता था। देह का दर्द अब बर्दाश्त होने लगा था। ध्यान का कुछ आनंद भी आने लगा था। पर शोर का सुर ? 

शाम का ध्यान सत्र चल रहा था। रोज की तरह सिंगापुरी साधू बात-बेबात साधु-साधु उच्चार ही रहा था कि अचानक एक स्त्री , ' का करबे रे ! का कै लेबे हमार ! हमें जिए देबे कि नाईं ! यह स्त्री ऊंची आवाज़ में लगातार बोले जा रही थी , ' हमहूं तोंके नाईं रहे देब ! मारि देब ! मारि देब ! अब हमार टाइम आ गइल ! हमार टाइम आ गइल ! ' कहती हुई लगभग झूमने लगी। झूमती हुई लगातार ऐसे ही सब कुछ एब्सर्ड बोलती रही। बेसुध हो कर झूमती हुई। पूरे ध्यान कक्ष का पिन ड्राप सन्नाटा एक सांघातिक तनाव में डूब गया ! उस स्त्री का विलाप जैसे ध्यान कक्ष की छत को तोड़ते हुए आकाश में छेद कर देना चाहता था। स्त्री के विलाप में पूरा ध्यान सत्र डूब गया। तमाम विदेशी तो औचक उस स्त्री को देखने लगे। मुंह बा कर देखने लगे। एकदम चकित भाव से। विनय लेकिन चकित नहीं था। वह बचपन में अपने गांव में ऐसे अनेक दृश्य देखने का अभ्यस्त रहा था। अमूमन स्त्रियों को जब चुड़ैल या भूत पकड़ता था तो सोखा-ओझा लोग बुलाए जाते। चुड़ैल और भूत भगाने के लिए। यह सोखा-ओझा टाइप लोग स्त्रियों को मार-पीट कर भूत और चुड़ैल भगाते थे। लोहबान , लाल मिर्च आदि आग में जला कर स्त्री के मुख के पास एक मिट्टी के बर्तन में ले जाते थे। स्त्री मिर्च को आग में बर्दाश्त नहीं कर पाती। चीख़ने-चिल्लाने लगती। सोखा उसे गंदे से चमरौधा जूते से मारते। लगातार मारते। स्त्री झूमने लगती। चिल्लाने लगती। ऐसे ही कुछ एब्सर्ड बातें करने लगती। कि अब की छोड़ब नाईं ! सोखा पूछता कहां से अइली , कब जइबी ! जल्दी जो ! फिर कुछ अस्पष्ट बातें बुदबुदाता। झाड़-फूंक करता। चला जाता। यह क्रम कई बार कुछ दिन तक चलता और अंतत: चुड़ैल या भूत भाग जाने का ऐलान सोखा कर जाता। लेकिन चुड़ैल कब फिर से स्त्री को पकड़ ले कोई नहीं जानता था। फिर वही सोखा , वही आग में लाल मिर्च , लोहबान और सोखा के चमरौधा जूते। स्त्री बेबस हो जाती। हार जाती सिर पर जूते खाते-खाते। बेसुध हो जाती। 

जाने क्या था कि यह चुड़ैल अमूमन युवा स्त्रियों को ही शिकार बनाती। कभी-कभी बरम आदि का भी नाम लिया जाता। वह तो वयस्क होने के बाद इस चुड़ैल , भूत और बरम की असलियत पता चली। कुछ स्त्रियों का मानसिक संताप चुड़ैल के बहाने ही विगलित होता। कुछ स्त्रियां हिस्टीरिया की शिकार होती थीं। कुछ बचपन में शादी होने के बाद गौने की प्रतीक्षा में वासना की आग में झुलसती हुई अपनी ऐसी अभिव्यक्ति करतीं। कुछ युवा स्त्रियों के पति कमाने के लिए कोलकाता , मुंबई जाते। वहां से बरसों नहीं लौटते तो इन स्त्रियों की भी अपनी देह की आग थी। कुछ स्त्रियों के अवैध गर्भ को गिराने के लिए भी चुड़ैल , भूत , बरम के बहाने झाड़-फूंक मार-पीट का ड्रामा होता। ऐसी स्थितियों में सोखा स्त्री को लात से भी मारता। कई बार पेट पर भी लात मारता। कमोवेश सभी गांव में चुड़ैल , भूत , बरम के कुछ क़िस्से होते रहते थे। तब के दिनों यह आम बात थी। पर यह सब बरसों पहले से अब गांव में पूरी तरह समाप्त हो चुका है। ज़माने बाद अब वह इस विपश्यना के ध्यान सत्र में यह सब देख रहा था। स्त्री ग्रामीण पृष्ठभूमि की ही निम्न मध्य वर्ग की लग रही थी। सांवली सी सामान्य सी उस जैसी ही सीधा पल्ला लिए , माथ पर पल्लू रखे , उस के साथ दो और स्त्रियां भी थीं। शायद उस का मानसिक संताप ठीक करने के लिए परिवार के लोगों ने उसे इस विपश्यना शिविर में भेजा था। यह तीनों स्त्रियां स्थानीय स्त्रियां लग रही थीं। बोली , वस्त्र आदि उन का सब कुछ देशज ही था। 

यह सब कुछ जब घटा तो उपस्थित आचार्य भी क्षण भर के लिए सकते में आ गए। बज रहा आडियो लेकिन बजता रहा। ध्यान के बाबत निर्देश देता हुआ। पर आचार्य तुरंत सक्रिय हुए। जल्दी ही वह सभी को संबोधित कर कहने लगे कि आप सभी अपने-अपने ध्यान में संलग्न रहें। आंख बंद रखें। सांस को नियंत्रित रखें। सांस का स्पर्श करें। आदि-इत्यादि। जल्दी ही वहां उपस्थित कार्यकर्ताओं ने उस स्त्री को उठा लिया। स्त्री बोलती रही , ' हम कहीं नाईं जाइब ! हम सब एहीं बताइब ! कुल बताइब ! ' वह पूरी विकलता और उग्रता के साथ झूम रही थी। स्त्री के सब्र और ध्यान का बांध पूरी तरह टूट चुका था। पर कार्यकर्ताओं ने स्त्री की एक न सुनी। ध्यान कक्ष से उसे बाहर उठा ले गए। उस के साथ की दोनों स्त्रियां भी बहुत संकोच और खीझ के साथ उठीं उस के साथ बाहर जाने के लिए। पर आचार्य ने उन्हें बोल कर रोक दिया। कहा कि , ' आप लोग यहीं रुकें। अपना ध्यान जारी रखें। ' दोनों स्त्रियां रुक गईं। पर लाचार देखती रहीं , उस स्त्री का ध्यान कक्ष से जाना देखती रहीं। ऐसे जैसे बकरे की अम्मा हों , वह दोनों। बकरे की अम्मा , कब तक ख़ैर मनाएगी , कहावत को चरितार्थ करती हुई। 

जाहिर है कि साथ की यह स्त्रियां उस स्त्री का दुःख , संताप और कष्ट भी ज़रुर जानती रही होंगी। 

क्या दुःख रहा होगा उस स्त्री का भला ?

विनय भी आंख बंद किए उस स्त्री के ध्यान में डूब गया है। वह सोच रहा है कि सीधे पल्ले में सिर पर पल्लू रख कर रहने वाली इस गंवई स्त्री को कौन सा तनाव इस विपश्यना शिविर तक ले आया है। कहीं यह भी यशोधरा तो नहीं है। अपने बुद्ध से बिछड़ी यशोधरा। इस का सिद्धार्थ भी इसे छोड़ कर कहीं दूर चला गया है ? उस अपने बुद्ध के विरह में झूमने , झूम कर अपना दुःख बता गई। पर ध्यान सत्र जारी है। निर्बाध। वह सांस नियंत्रित करते-करते ध्यानस्थ हो गया है। इतना कि नींद की नाव पर सवार हो कर अपने गांव पहुंच गया है। सोखा मार रहा है एक युवा स्त्री को अपने जूते से धड़ाधड़। मारता ही जा रहा है। स्त्री कह रही है , पूरे ज़ोर से कह रही है , ' हम नाईं जाइब ! ' उस की नाक बज रही है और ध्यान सत्र भी जारी है। एक कार्यकर्ता उसे झिझोड़ रहा है। ध्यान सत्र समाप्त हो गया है। 

ध्यान सत्र के बाद दो-तीन लोग रुक गए हैं , आचार्य से अपनी कुछ जिज्ञासाओं के समाधान ख़ातिर। एक-एक कर लोग अलग-अलग बात कर रहे हैं आचार्य से। एक आदमी धीरे से पूछता है , ' उस औरत को क्या हो गया था ?'

' कुछ नहीं। ' आचार्य संक्षिप्त सा जवाब देते हुए कहते हैं , ' विकार था उस के मन में। निकल गया। '

' ऐसे भी कभी विकार निकलता है किसी का ? ' वह आचार्य से पूछना चाहता है। पर नहीं पूछता। चुपचाप उठ कर चल देता है। बिना कुछ पूछे। आचार्य टोकते भी हैं कि , ' आप को कुछ पूछना था ? ' वह न में सिर हिला कर हाथ जोड़ लेता है। आचार्य ' साधु-साधु ! ' कह कर विदा देते हैं। 

आचार्य ख़ुद भी पढ़े-लिखे हैं। इंजीनियर हैं। एक बड़े प्रतिष्ठान में उच्च पद पर नियुक्त हैं। पर विपश्यना के लिए वह नौकरी से कुछ समय छुट्टी ले कर हर साल किसी न किसी शिविर में बतौर आचार्य उपस्थित रहते हैं। आचार्य ने आचार्य सत्यनारायण गोयनका से विपश्यना सिखाने की शिक्षा ली है। समर्पित हैं विपश्यना के लिए। निःशुल्क। अपने खर्च पर आना-जाना भी। मक़सद एक ही है विपश्यना के मार्फ़त लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना। आचार्य के चेहरे पर संतोष और संतुष्टि की रेखाएं परिलक्षित होती हैं। ध्यान के समय भी वह कम बोलते हैं। ज़्यादातर दिशा-निर्देश और विधियां तो आडियो से ही बताए जाते हैं। आचार्य बस परीक्षा में इनविजिलेटर की तरह उपस्थित रहते हैं। कि लोग ध्यान ठीक से न कर रहे हों , तो ठीक करवा दें। अनुशासन क़ायम रखें। ज़्यादातर लोग अनुशासन में वैसे ही निबद्ध रहते हैं जैसे सुर में संगीत और उस के साज़। होते हैं एकाध विनय जैसे अव्यवस्थित तो उन्हें आचार्य व्यवस्थित कर देते हैं। करते ही रहते हैं। ठीक वैसे ही जैसे लोकसभा अध्यक्ष , लोकसभा में सांसदों , मंत्रियों को व्यवस्थित करता रहता है। 

वह आचार्य के पास से दूर चला आया है। क्यारियों में लगी फूल गोभी के फूल को देखता हुआ उस स्त्री के विलाप में डूबा हुआ है। कि अचानक एक गौरैया फुदकती हुई गोभी के फूल पर बैठ गई है। पंख फ़ड़फ़ड़ाती हुई। बेचैन सी। व्याकुल सी। तो क्या यह गौरैया भी अपने बुद्ध के विरह में है ?

क्या पता ?

सिद्धार्थ ने जब घर-परिवार छोड़ा था तब वह 29 वर्ष के ही तो थे। नवजात शिशु राहुल , पत्नी यशोधरा , माता-पिता और राजपाट छोड़ कर निकल गए थे। तो क्या उन के मन में भी कोई शोर था ? पर सिद्धार्थ के जाने के बाद यशोधरा के मन में जो शोर उठा , उस शोर का क्या ? क्या नवजात शिशु राहुल के मन में भी शोर नहीं उठा होगा। पिता से  विछोह का शोर। 

सीता याद आती हैं। जब लक्ष्मण उन्हें वन छोड़ने गए हैं। लक्ष्मण वन में पहुंच कर अचानक रथ को रोक देते हैं। रथ से सीता को उतारते हुए बताते हैं कि भइया का आदेश है कि आप को यहीं छोड़ दूं। पर सीता विचलित नहीं होतीं। क्यों कि लक्ष्मण उन के पास हैं। लेकिन जब लक्ष्मण रथ पर चढ़ कर चल देते हैं तब भी सीता विचलित नहीं होतीं। लक्ष्मण अचानक आंख से ओझल होते हैं तो जब तक उन का रथ दिखता रहता है , सीता तब तक विचलित नहीं होतीं। रथ ओझल होता है तो रथ का ध्वज दिखने लगता है। जब तक रथ का ध्वज दिखता रहता है , सीता विचलित नहीं होतीं। लेकिन जब रथ का ध्वज भी ओझल हो जाता है , सीता विलाप करती हैं। इतना ज़ोर से विलाप करती हैं कि दूब चर रहे मृग के मुंह से दूब गिर जाती है। आकाश में उड़ते पक्षी ठहर जाते हैं। वृक्ष की शाखाएं आपस में रगड़ खाने लगती हैं। मानो पूरा वन ही सीता के शोक में डूब जाता है। समूचा वन सीता के साथ विलाप करने लगता है। 

तो क्या जब सिद्धार्थ यशोधरा को छोड़ कर गए तो लुंबिनी भी यशोधरा के साथ विलाप में डूबी थी ? यशोधरा के शोक में संलग्न हुई थी लुंबिनी ? कोई उत्तर नहीं है। 

फिर अभी-अभी ध्यान कक्ष में जब वह स्त्री विलाप कर रही थी , तब कितने लोग उस स्त्री के विलाप में शामिल हुए ? क्यों नहीं हुए ? क्या इतने तटस्थ हो गए , विपश्यना के रंग में इतने रंग गए। सांस में इतना रम गए कि विलाप की संवेदना से भी सुन्न हो गए। इतनी सफल विपश्यना। फिर तो बहुत ही सुंदर। मैथिलीशरण गुप्त यशोधरा में याद आते हैं ; लिख रहे हैं :

सखि, वे मुझ से कह कर जाते,
कह, तो क्या मुझ को वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?

मुझ को बहुत उन्होंने माना
फिर भी क्या पूरा पहचाना?
मैंने मुख्य उसी को जाना
जो वे मन में लाते।
सखि, वे मुझ से कह कर जाते।

यशोधरा की संवेदना में मैथिलीशरण गुप्त इतना खो जाते हैं कि इस एक कविता के मार्फ़त वह बुद्ध को भगोड़ा साबित कर देते हैं। लोक बुद्ध को भगोड़ा मान लेता है। तब जब कि सिद्धार्थ महीनों तैयारी करते हैं , संन्यास की। यशोधरा के साथ मिल कर तैयारी करते हैं। यशोधरा की सहमति ले कर घर छोड़ते हैं। जब रात घर छोड़ते हैं सिद्धार्थ तो यशोधरा जाग रही हैं। लेकिन एक कवि की कविता की ताक़त उसे भगोड़ा घोषित कर देती है। सिद्धार्थ को पत्नी का त्याग नहीं करना था यह सही है। पर भगोड़ा ?

तो क्या इस स्त्री के विलाप में भी कोई रहस्य है ? बुद्ध क्या रहस्य नहीं हैं ? रहस्य ही है यह विपश्यना भी। रात के प्रवचन वाले वीडियो में भी वह अनमना बैठा रहता है। रात में वह ठीक से सो नहीं पाता। रह-रह कर विलाप करती स्त्री सामने उपस्थित हो जाती है। कभी वह स्त्री , कभी यशोधरा। तो क्या वह भी अपनी पत्नी को छोड़ कर इसी तरह नहीं आया है। अपनी पत्नी का विलाप क्या वह ठीक से सुन पाता है। बिना विलाप के भी विलाप करती हैं स्त्रियां , क्या यह बात वह नहीं जानता। जानता है। पर पत्नी का विलाप अनसुना क्यों कर देता है। यशोधरा का विलाप सुन लेता है। विपश्यना में इस स्त्री का विलाप उसे परेशान कर देता है। वह इधर से उधर अपने मन को मथ  डालता है। जैसे दही को मथनी से मथे कोई स्त्री। पर पत्नी तो छोड़िए , क्या अपने ही विलाप को कभी स्वर दे पाता है। जब कि विलाप ही विलाप है ज़िंदगी में। किस की ज़िंदगी में विलाप नहीं है। वह सोचता रहता है लेटे-लेटे। करवट बदलते। भोर हो जाती है। घंटा बज जाता है। आदतन वह नहीं उठता। जगा हो कर भी नहीं उठता। यह कौन सा विलाप है। ख़ुद ही जवाब देता है , आलस का विलाप। विपश्यना में ही विलाप नहीं होता। आलस का भी विलाप होता है। आलस का भी अपना सौंदर्यशास्त्र है। यह कम लोग जानते हैं। उस के दरवाज़े पर कार्यकर्ता घंटी बजा रहा है। लगातार। वह उठता है। हाथ जोड़ कर उस से क्षमा के स्वर में। कार्यकर्ता मुस्कुराता हुआ चला जाता है। 

वह ध्यान सत्र में देर से पहुंचता है। आचार्य उसे ख़ास नज़र से घूरते हैं। यह कौन सा विलाप है। वह देख रहा है कल विलाप करने वाली स्त्री अनुपस्थित है। जब कि उस के साथ की दोनों स्त्रियां उपस्थित हैं। अब वह नेत्र बंद कर ध्यान में निमग्न हो जाना चाहता है। हो गया है। ध्यान के भीतर भी एक विलाप मुसलसल जारी है। जैसे मूसलाधार बारिश हो। अचानक उस का ध्यान टूटता है। आंख खुलती है। एक गोरी सी रशियन स्त्री के अकुलाए वक्ष पर उस की आंख धंस गई है। उस की स्लीवलेस बाहें जैसे बुला रही हैं। अब ऐसे में कैसे कोई ध्यान करे। जब मन में देह का ध्यान आ जाए तो सारे ध्यान बिला जाते हैं। सारे विलाप बिला जाते हैं। सारी विपश्यना बिला जाती है। बिलबिला जाती है। 

नाश्ते का समय हो गया है। और यह देखिए वह अकुलाए वक्ष वाली रशियन स्त्री उस की मेज़ पर ही आ कर नाश्ता शुरु कर देती है। मुस्कुराती हुई। किसी पुष्प की तरह खिली हुई यह गोरी स्त्री भाषा से बहुत दूर है पर देह भाषा उस की बड़ी विकल है। उस की कोंपलों सी नर्म बाहें जैसे उसे उकसा रही हैं। इस डाइनिंग हाल में अब दोनों बाक़ी लोगों के ध्यान का केंद्र बन गए हैं। जैसे एक ध्यान सत्र यहां भी शुरू हो गया है। यह हुस्न से ईर्ष्या का विलाप है। स्त्रियां ऐसे ही उसे जब-तब भटकाती रहती हैं। कभी-कभार वह भटक भी जाता है। स्त्रियों के साथ उस के यह भटकाव उसे चैन देते हैं। चुप-चुप। यह चैन वह भी इस चुप की राजधानी में बहुत अर्थवान हो गया है। 

यह कौन सा शोर है। शोर है कि विलाप। कि शोर और विलाप के बीच का कुछ। विपश्यना तो नहीं ही है। तो फिर क्या है ? क्या है यह ? 

वह नाश्ते का बर्तन धोने सिंक के पास खड़ा है , अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए। यहां अपने जूठे बर्तन धो कर , सूखे कपड़े से पोंछ कर रखना , सभी के लिए समान रुप से अनिवार्य है। उसे बर्तन धोने का बहुत अनुभव नहीं है। पर यहां दिन-प्रतिदिन हो रहा है। वह देख रहा है कि वह गोरी रशियन स्त्री भी अपने बर्तन लिए , ठीक उस के बग़ल में खड़ी हो गई है। मुस्कान में मृदुता है और आंखों में अकुलाहट। भूखी देह की अकुलाहट। वह ऐसे मिल रही है जैसे सोशल मीडिया पर स्त्रियां मिलती हैं। अपरिचय के समुद्र में गोता मारती , परिचय की मोती तलाशती हुई। संकोच के समुद्र में खोया वह स्त्री की इस भंगिमा और मुद्रा के पाठ को ठीक से पढ़ नहीं पाता। वैसे भी स्त्रियां सर्वदा से ही उसे अपठनीय लगती रही हैं। जैसे उस का नाम विनय है , वैसे ही वह अपने विनय भाव में परिचय के मोती में ख़ुद को गंवाने के लिए परिचित पाता है। 

सोशल मीडिया पर भी वह लंपटई की बैटिंग नहीं कर पाता तो वास्तविक जीवन में भी उस के लिए यह मुमकिन नहीं हो पाता। विनय भाव में तमाम लालसाएं दम तोड़ जाती हैं। फिर यह स्त्री तो वैसे भी समंदर पार वाली है। रशियन है। पर जाने क्यों उस के विनय के सागर में लहर बन कर उपस्थित हो गई है। हरहराती लहर। अपने औचक सौंदर्य में नहलाती हुई। कृपालु हो गई है। इतना कि बर्तन धोते हुए उस की कोंपल सी नर्म बाहें , उस की बाहों से स्पर्श कर जाती हैं , रह-रह कर। उस के नितंब भी उस के जंघा प्रदेश को स्पर्श कर गए हैं। अचानक। विनय को स्त्री के मादक स्पर्श का एहसास है। आनंद भी ले रहा है। वह बर्तन धोते समय उस के उठते-गिरते-हिलते , धक-धक करते वक्ष पर भी मोहित हुआ जा रहा है। पर विनय को पूरा एहसास है अपनी गरिमा का भी। एहसास है कि चुप की इस राजधानी में आवाज़ भले सब की अनुपस्थित है पर आंखों का कैमरा , ध्यान और सांस से भी ज़्यादा सक्रिय है। यहां भी अन्य साधकों की आंख के कैमरे लांग शॉट , क्लोज शॉट लेते हुए तैनात हैं। वह अचानक सतर्क हो जाता है। वह इस विपश्यना शिविर में चरित्र नहीं बनना चाहता। चर्चा का केंद्र नहीं बनना चाहता। फिर सागर की लहरों का क्या है भला। लहरों को तो आता ही है यहां-वहां छोड़ना। स्त्रियों को देख कर मन में उठी लहरें भी कब कहां छोड़ दें , कौन जानता है। 

बर्तन धो कर , पोंछ कर यथास्थान रख कर वह बहुत तेज़ी से डाइनिंग हाल से निकलता है। सीधे अपने कमरे में ही आ कर वह रुकता है। बिस्तर पर बैठते ही वह उस अनाम , अपरिचित स्त्री के मादक स्पर्श में खो जाता है। नयन मूंद लेता है। ऐसे जैसे वह रशियन स्त्री उस की बाहों में हो। वह लेट जाता है। खो जाता है बीते हुए अभी के पल में। ऐसे-जैसे अभी भी बर्तन ही धो रहा हो। उसे ध्यान कक्ष में पहुंचना है। पर वह बिस्तर पर नींद की आग़ोश में है। आग़ोश में है , उस रशियन सुंदरी के औचक सौंदर्य में। ऐसे , जैसे वह भी इस बिस्तर पर साथ हो। प्रेम के आकाश में पेंग मारती हुई। वह जैसे कोई झूला हो और वह रशियन स्त्री झूले पर बैठ कर पेंग मार रही हो। प्रेम के आकाश को छूने की लालसा में। वह जैसे ऐसे ही किसी सपने में खो गया है। नाक बज रही है और कमरे के दरवाज़े पर कार्यकर्ता घंटी बजाते हुए गुज़र गया है। ध्यान के लिए घंटा कब बजा , उसे पता ही नहीं चला। लोग नाश्ता कर के नहाते-धोते हैं। वह सोता है। रोज ही सोता है। क्यों कि वह भोर में उठ कर दैनंदिन कार्यों के बाद नहा-धो कर , क्षण भर की सही पूजा कर के ही ध्यान कक्ष पहुंचता है। भोर में नहाने का एक नुकसान यह होता है कि इस सर्दी में गरम पानी नहीं मिलता। बाथरुम बिना गीजर का है। सुबह नहाने पर लकड़ी के चूल्हे पर गरम पानी मिल जाता है। पर  गरम पानी के चक्कर में वह अपने नहाने का नियम नहीं बदलता। बर्दाश्त कर लेता है , ठंडा पानी इस सर्दी में भी। पानी डालते ही सिर सुन्न हो जाता है। देह गनगना जाती है। पर क्या करे वह। इसी तरह पूजा की भी मुश्किल है। किसी भी तरह की पूजा पर यहां सख़्त पाबंदी है। क्या तो ध्यान में भ्रम होता है और कि ध्यान खंडित होता है। क्या तो एक साथ दो पद्धति ठीक नहीं। मन घायल हो जाता है। पर मन ही मन पूजा करता है , वह हाथ जोड़ कर। मन पर किस की पाबंदी भला। मन कभी घायल नहीं होता। फिर मन और प्रेम पर किस की पाबंदी चली है कभी। जो अब चलेगी। बिना नहाए ध्यान करना भी उसे समझ नहीं आता। 


गया था एक बार दार्जिलिंग। एक सुबह टाइगर हिल पर सूर्योदय देखना था। भोर में निकलना था। सूर्योदय देखना भी बिना नहाए मंज़ूर नहीं था उसे। ख़ुद तो वह नहाया ही ,बच्चों को भी नहाने को कह दिया। थोड़ी देर हो गई। होटल और टैक्सी वाले शोर मचाते रहे , फ़ोन कर-कर के कि जल्दी-जल्दी ! पर थोड़ी क्या पूरी देरी हो गई। सूर्योदय देखा तो नहा कर ही देखा , टाइगर हिल पर। बिना नहाए सूर्य की उपासना कैसे हो सकती थी भला। जब पहुंचा टाइगर हिल तो सूर्य की लाली अभी फूट ही रही थी। कंचनजंघा की बर्फीली पहाड़ी पर सूर्य का वह उदय आज बरसों बाद भी मन में टटका है। ऐसे जैसे किसी कटोरे में सूर्य। श्वेत-धवल कटोरे में लाल-लाल सूर्य। सूर्य , जैसे शिशु। मन मुदित हो गया , प्रकृति की इस प्रार्थना पर। सूर्य की इस लालिमा पर। पर पता चला कि लोग सूर्योदय के पहले ही से , रात से ही वहां पहुंच कर डेरा डाले हुए थे। सूर्य के उगने से पहले ही। फिर देखा कि लोग पौ फटते ही चाय , पकौड़ी पर टूट पड़े थे। पिकनिक था टाइगर हिल पर सूर्योदय भी उन सभी टूरिस्टों के लिए। लेकिन विनय के लिए सूर्योदय , सूर्य की उपासना थी। सूर्य को प्रणाम करना था उसे। उगते सूरज को प्रणाम के मुहावरे को बिना छुए या सोचे उसे सूर्य भगवान को प्रणाम करना था। इस लिए बिना नहाए वह नहीं गया। बिना नहाए वह कुछ खाता-पीता भी नहीं। नहा कर ही उस की सुबह होती है। नहा कर ही उस का दिन शुरु होता है। चाहे जब उठे। जल्दी उठे , देर से उठे। तो इस विपश्यना शिविर में नाश्ते के बाद सोना ही होता है। नहाना नहीं। सो कर वह उठता है और सीधे ध्यान कक्ष। 

ध्यान कक्ष पहुंच कर वह पहले उस रशियन स्त्री को तलाशता है। वह तुरंत दिख जाती है। स्मित मुस्कान प्रस्फुटित करती हुई। जैसे स्वागत करती हुई अपनी इस डिवाइन मुस्कान से। आचार्य उस का रशियन स्त्री को देखना , उस रशियन स्त्री की डिवाइन मुस्कान को एक साथ दर्ज कर रहे हैं अपने आंखों के कैमरे में। तो क्या डाइनिंग हाल के कैमरों ने उन तक बात पहुंचा दी है ? 

क्या पता ? 

आज विनय का मन ध्यान में कुछ ज़्यादा ही लग गया है। ध्यान का जैसे स्वाद मिल गया है उसे। सांस-सांस उसे प्रेम में डूबी हुई मिलती है। सांस भी , सांस का स्पर्श भी। सांस का ऐसा स्पर्श जो स्वर्ग की अनुभूति करवाता चल रहा है। निगाहों और बाहों में खो गया है विनय। सांस के सागर में वक्ष जैसे नौका है। वह आना-पान में विकल है और सोच रहा है महिलाएं जब इश्क करती हैं तो समझ आता है पर जब इश्क़ पर बात करती हैं तो हंसी आती है। इश्क करने के लिए है , बतियाने के लिए नहीं । इश्क की कोई परिभाषा नहीं होती । इश्क़ का कोई एक सेटिल्ड ला नहीं है । कि ऐसे करो तो होगा , वैसे नहीं होगा । इश्क़ की कोई एक राह नहीं होती । यह हाई वे भी हो सकता है , पगडंडी भी , गड्ढे वाली सड़क भी , कोई तंग गली भी , खेत भी , तालाब भी , बाग़ भी , आकाश , धरती , पानी कोई भी राह दे सकता है। हवा भी। चांद , तारे , सूरज भी। विपश्यना भी। विपश्यना में भी प्रेम का आकाश अचानक उपस्थित हो सकता है , विपश्यना को फिर से खोज-खाज कर , धो-पोंछ कर पुन : उपस्थित करने वाले आचार्य सत्यनारायण गोयनका ने भी कभी नहीं सोचा होगा। हो सकता है कोई भी राह न दे इश्क़ की। सारे रास्ते बंद हो सकते हैं । घुप अंधेरे में भी राह मिल जाती है । चाह और राह में फ़ासला हो भी सकता है , नहीं भी । 

इश्क़ सेक्स नहीं है कि ऐसे भी हो सकता है और वैसे भी या कैसे भी । इश्क़ तो जगजीत सिंह की गाई कोई ग़ज़ल सुन कर भी हो सकता है। लेकिन इश्क़ जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल भी नहीं है। इश्क़ तो तकिए पर टूटा हुआ बाल भी नहीं है कि कभी मिल जाता है , कभी नहीं मिलता। तकिए पर मिला काजल भी नहीं। इश्क़ काजल की धार भी हो सकती है , उन्नत वक्ष भी , दिल की तरह धुकुर-पुकुर करता किसी स्त्री का नितंब भी हो सकता है , किसी की आवाज़ भी , अंदाज़ भी। या ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता है। इश्क़ तो गिलहरी है। इश्क़ तो बुलबुल है , कोयल भी , तितली भी। कब कहां गा दे , गुलाब के कांटे की तरह कब चुभ जाए , कौन जानता है। तुम भी नहीं , हम भी नहीं। लता मंगेशकर भी नहीं। इश्क़ एक अनबूझ यात्रा है। बूझ , समझ कर नहीं होती यह यात्रा। यह तो बस हो जाती है तो हो जाती है। नहीं होती तो नहीं होती। होती रहती है तो आनंद है। अलौकिक आनंद। वह एक मिसरा भी है न , इधर तो जल्दी-जल्दी है , उधर आहिस्ता-आहिस्ता। तो आहिस्ता-आहिस्ता भी एक फैक्टर है और जल्दी-जल्दी के भी क्या कहने। बस अपनी-अपनी सहूलियत है और अपना-अपना सलीक़ा। प्रेम हल्दीघाटी या पानीपत की लड़ाई भी नहीं है। यहां कोई तर्क काम नहीं आता। कुछ लोगों का शग़ल ही है बतिया कर ही रह जाना , सुन कर मजा लेना । बहुत से लोग थियरी से काम चलाते हैं , प्रैक्टिकल में उन की दिलचस्पी या क्षमता नहीं होती। अपना-अपना शौक़ है , अपनी-अपनी क्षमता। विनय की दिलचस्पी प्रैक्टिकल में रहती है। लंपटई की बैटिंग में नहीं। 

तो क्या अभी आज सुबह से जो भी कुछ घट रहा है , उस रशियन स्त्री के साथ , क्या यह इश्क़ है ? विनय अपने आप से पूछ रहा है। वह जवाब भी देता है , ' क्या पता ? ' फिर कहे किस से ?

मुमकिन है देह का आकर्षण भर हो। 

उसे एक नन्हा बच्चा याद आता है। एक वीडियो याद आता है। नन्हा बच्चा , ठुमक चलत वाली उम्र में है। चलना बस सीखा ही है। एक साथ चार स्त्रियां घूंघट काढ़े एक ही जगह , एक ही रंग की साड़ी में उपस्थित हैं। अपनी मां को तलाश करते हुए वह नन्हा बच्चा इन स्त्रियों में अपनी मां तलाश करता भटकता है। सभी चारो स्त्रियां उसे मां बन कर बुला रही हैं , हाथ के इशारे से। वह इधर-उधर भटकता हुए एक स्त्री के पास जाता है , मम्मा , मम्मा करते हुए। वह स्त्री उसे उठा कर अपनी गोद में बिठाना ही चाहती है कि नन्हा बच्चा छटक कर उस स्त्री की गोद से कूद जाता है। फिर उन स्त्रियों में अपनी मां पहचानने की कोशिश फिर से करता है। सभी स्त्रियां अभी भी घूंघट में है। पर वह हेरते-हेरते अपनी मां को पा जाता है और उस का हाथ पकड़ कर अपनी मां की गोद में समा जाता है , मम्मा , मम्मा कहते हुए। हंसती हुई वह स्त्री अपना घूंघट हटा देती है और खिलखिला कर बच्चे को चूम लेती है। बाक़ी स्त्रियां भी अपना-अपना घूंघट हटाते हुई हंसने लगती हैं। तो प्रेम तो असल में नन्हें बच्चे द्वारा घूंघट में सभी स्त्रियों के बीच अपनी मां को तलाश लेना ही है। प्रेम में अगर लोभ नहीं है , छल-कपट , गुणा-भाग , जोड़-घटाना नहीं है , शोषण और शंका नहीं है तो। प्रेम नन्हें बच्चे का प्रेम है। किसी दूब पर गिरे ओस के बूंद की तरह टटका। 

रशियन स्त्री को यह सब कुछ बता देना चाहता है। पर कैसे बताए। संकेत में भी बात नहीं हो सकती। रशियन उसे आती नहीं। जाने उसे हिंदी आती है या नहीं। अंगरेजी भी उसे टूटी-फूटी ही आती है। तो कैसे ? कैसे भला वह अपनी बात रखे , उस के सामने ? कागज़ और पेन है नहीं पास में कि लिख कर दे दे। मोबाइल भी नहीं कि लिख कर वाट्सअप कर दे। तो क्या पत्ते पर किसी मिट्टी या ईंट के ढेले से लिखे ? फिर उसे याद आता है कि कोई बच्चा पहले अर्थ समझता है , शब्द और भाषा बाद में समझता है। तो क्या यह सब बताने की अकुलाहट उस रशियन स्त्री में भी है ? होगी ? या कि सब कुछ तात्कालिक है। उस की नाक फिर बज गई है। कार्यकर्ता उसे झिझोड़ कर जगा रहा है। पता नहीं क्यों जब कुछ ज़्यादा सोचता है विनय तो विचारों की सरणी में उसे नींद का नील गगन मिल ही जाता है। और वह किसी पंछी की तरह उड़ जाता है। 

ध्यान का यह सत्र समाप्त हो गया है। दस मिनट का ब्रेक है। ध्यान कक्ष से निकल कर वह एक ऐसे चबूतरे पर बैठ गया है जहां से फूल गोभी का खेत मनमोहक दिख रहा है। हरी-हरी पत्तियों के बीच गोभी का फूल , अपनी देह फैलाता हुआ। पास ही गेंदे और गुलाब के फूल भी खिलखिला रहे हैं। बस सब की क्यारी अलग-अलग है। ऐसे जैसे एक आना हो , दूसरी पान हो। आना-पान। विनय अब फूल भी विपश्यना पद्धति से देखने लगा है। फिर यह सोच कर हंसने लगता है। कि इतना विपश्यनामय ? शिविर के प्रबंधक भी खेत के दूसरी तरफ आराम कुर्सी पर पसरे अख़बार कम पढ़ रहे हैं , धूप ज़्यादा सेंक रहे हैं। कि तभी वह रशियन स्त्री भी आ कर उसी चबूतरे पर दूसरे कोने पर बैठ जाती है। वह उसे कनखियों से देखते हुए भी ऐसे ऐक्ट करता है , गोया उसे देखा ही नहीं। वह लंदन वाला लड़का उस के सामने से गुज़रता है। सर्वदा की तरह झुक कर दोनों हाथ जोड़े प्रणाम की मुद्रा में मंद-मंद मुस्काता हुआ चलता चला जाता है। चबूतरे पर दूसरे कोने पर बैठी रशियन स्त्री को कनखियों से देखता हुआ निकल जाता है। अब वह स्त्री उस से मुख़ातिब है। उस के नयन कुछ बोलते , बुदबुदाते से उसे देखते हैं। अधर बंद हैं जैसे पैंट की जिप हो। और यह जिप खुल जाने पर आमादा है। पर खुलती नहीं है। एक गिलहरी फुदकती हुई आती है और उस के पैरों के पास से निकल जाती है। वह मुस्कुरा पड़ता है , गिलहरी को फुदकते हुए देख कर। स्त्री को भर आंख देख कर मुस्कुराता है। स्त्री का मुंह गोल हुआ है , जीभ टहलती हुई मिलती है। घूमती हुई दांतों के बीच। यह इसरार का इशारा है। वह कोई शेर पढ़ना चाहता है। पर इस चुप की राजधानी में पढ़े तो कैसे पढ़े भला। बज जाता है घंटा। ध्यान सत्र में पुकार का घंटा। ऐसे जैसे अज़ान होती है , नमाज़ के लिए। उसे आफिस के एक सहयोगी की याद आ जाती है। उस सहयोगी को अपने को सेक्यूलर दिखाने की बीमारी सी है। एक बार उस के अभिन्न मुस्लिम मित्र के सामने ही चुहुल में विनय ने पूछ लिया है कि नमाज़ और अज़ान में क्या फ़र्क़ है ? वह बोला , ' वेरी सिंपल ! सुबह वाली को अज़ान कहते हैं , शाम वाली को नमाज़ कहते हैं। '

' और दोपहर वाली को ? ' विनय ने मज़ा लेते हुए पूछा लेते हुए पूछा है। मुस्लिम मित्र को आंख मार कर चुप रहने का इशारा कर दिया है।  

' अब इस बारे में पक्का नहीं मालूम कि अज़ान कहते हैं कि नमाज़ ? ' वह बड़ी मासूमियत से बोला। इसी तरह वह एक बार अपने मुस्लिम मित्र को मोहर्रम की भी बधाई देने लगा , ' मोहर्रम मुबारक़ हो ! ' मुस्लिम मित्र शिया था। यह सुनते ही अकबका गया। और माथा पीट लिया। समझाया विनय ने कि , ' काहे मुबारक़वाद दे रहे हो ? '

' हमारी मर्जी ! ' वह भड़का , ' हमारी मर्जी ! ' आप की तरह संकुचित हृदय नहीं हूं। त्यौहार पर मुबारक़ पेश करना , हमारा फ़र्ज़ बनता है। '

' अरे यह मोहर्रम त्यौहार नहीं है। ' विनय ने चिढ़ते हुए बताया। 

' तो क्या है ? ' वह और भड़का। 

' ग़मी का दिन है ! शोक का दिन है ! '

' ओह ! ' वह मुस्लिम मित्र से हाथ जोड़ कर , ' सारी ! ' कह कर चुप हो गया। 

इसी तरह फिर उसे बताना पड़ा कि अज़ान पांचों समय की नमाज़ के लिए होता है। अज़ान मतलब नमाज़ के लिए मस्ज़िद तुरंत पहुंचिए। एक तरह की पुकार है। निमंत्रण है अज़ान। नमाज़ तो चुपचाप होती है। वह फिर मुंह लटका कर बैठ गया। बोला , ' आप को तो बस कोई बहाना चाहिए मुझे अपमानित करने के लिए। '

अब विनय इस पर क्या कहता भला। वैसे ही इस स्त्री को भी इसरार का बस कोई बहाना चाहिए। वह मुस्कुरा रही है। प्रत्युत्तर में वह भी उसे भर आंख देख कर मुस्कुरा रहा है। मुस्कुरा रहा है और चबूतरे से उठ रहा है ध्यान कक्ष में पहुंचने के लिए। ध्यान कक्ष के रास्ते में वह सोच रहा है कि इस रशियन स्त्री के वक्ष ज़्यादा पुष्ट हैं या नितंब ज़्यादा पुष्ट हैं। तय नहीं कर पाता। अपने स्थान पर बैठ जाता है। वह देख रहा है कि अभी ध्यान कक्ष में ज़्यादा लोग नहीं आए हैं। आचार्य भी नहीं। पीछे-पीछे लेकिन वह रशियन स्त्री आ गई है। अपने हुस्न की बहार लुटाती हुई वह भी अपनी निर्धारित जगह बैठ गई है। धीरे-धीरे ध्यान कक्ष में सब लोग आ जाते हैं। आचार्य भी। आडियो बजने लगा है। उस ने नयन बंद कर लिए हैं सभी लोगों की तरह। नयन बंद हैं। नयन बंद कर लगता है ऐसे जैसे किसी अंधेरी गुफा में वह प्रविष्ट हो गया है। अंधेरा ही अंधेरा है। घुप्प अंधेरा। इस अंधेरे में अलौकिक आनंद है। आहिस्ता-आहिस्ता वह अंधेरे में दाख़िल हो रहा है। आना-पान जारी है और अंधेरे का सफ़र भी। सांस भीतर आ रही है , सांस बाहर जा रही है। वह सांस को आते-जाते स्पर्श कर रहा है। तटस्थ होने की सायास कोशिश भी जारी है। कभी सफल होती है यह कोशिश , कभी असफल। पर सफ़र जारी है। सिलसिलेवार जारी है। अचानक उसे इस अंधेरे में भी उजाला दिखता है। बंद नयन के भीतर उजाला। अलौकिक सुख है यह तो। वह पाता है जैसे गहरे जल के भीतर है। और जल के भीतर उजाला है। तो वह अंधेरी गुफा से कब बाहर निकला। कि गुफा के भीतर ही का यह जल है। वह जैसे अफना जाता है। पर नयन नहीं खोलता। नहीं खोलता कि कहीं यह अलौकिक सपना टूट न जाए। फिर सोचता है कि कहीं वह नींद की नौका में तो नहीं सवार हो गया है और यह अलौकिक स्वप्न उसे घेर बैठा है। पर आना-पान जारी है। सो वह समझ जाता है कि यह नींद नहीं , समाधि है। वह ध्यान की पुष्पित-पल्ल्वित अवस्था को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। सतत अग्रसर। ध्यान धारण करने का सुख है यह। 

वह अपने युवा समय में अच्छा तैराक रहा है। अकसर नदी के गहरे पानी में जाता रहा है। कभी बीच नदी में नाव से कूद कर , कभी किसी ऊंचाई से कूद कर। नदी की तलहटी में जा कर , धरती स्पर्श कर जल को चीरते हुए जल के ऊपर आने की यात्रा भी ऐसे ही अंधेरे से उजाले में आने की यात्रा बनती रही है। अलौकिक आनंद का सुख मिलता रहा है। रोमांच भी और आनंद भी। तो क्या नदी की तलहटी में जाना और गहरे जल में पैठ कर बाहर आना भी कोई साधना थी। अनजाने की साधना यात्रा। या यह विपश्यना की साधना , गहरे जल में उतरने की साधना है। जो उसे एक अलौकिक यात्रा पर ले जा रही है। नहीं जानता वह। पर उसे याद आता है कि शुगर के देह में आते ही डाक्टर की सलाह पर जब शुरू-शुरू में सुबह टहलने जाने लगा था बॉटेनिकल गार्डेन तो वहां एक छोटी सी झील थी। टहलने के मध्य ही वह उस झील के जल को ठहर कर थोड़ी देर रोज देखने लगा था। उस झील में कमल के फूल के बीच नीले खुले आकाश को देखना मन मगन कर देता था। झील में झुक कर , थोड़ी देर आंख बंद कर अचानक आंख खोल कर जब वह सीधे जल को निहारता था तो लगता था जैसे कितना उजाला भर गया है उस के मन में। एक अलौकिक सुख से भर जाता था वह क्षण भर के लिए। तो क्या जल के भीतर देखना भी कोई साधना है। नहीं जानता। पर यह विपश्यना तो साधना है। मान्यता है इसे साधना की। ध्यान का नाम दे दिया गया है। अंगरेजी में लोग मेडिटेशन भी कहते हैं। मेडिटेशन और भी तरह के उस ने किए हैं। पर वहां यह अलौकिकता नहीं थी। ऐसी अलौकिकता। यह अलौकिक सुख उसे या तो संभोग में मिला है , मिलता रहा है या फिर इस ध्यान में। हालां कि दोनों ही अतुलनीय हैं। अलग-अलग हैं। गहरे जल में ही उतरना है संभोग भी। गहरे जल में ही उतरना है यह ध्यान भी। मार्ग दो हैं। सुख भी दो। अलग-अलग परिणतियां और अलग-अलग परिणाम भी। 

फ़िलहाल वह ध्यान में है।

ध्यान है कि अमृत है। लगता है जैसे देह की सारी टूटन , सारी थकन इस ध्यान में विगलित हो गई है। दंभ , अहंकार , लोभ सब जैसे खंडित हुए जा रहे हैं। लगता है जैसे वह मर रहा है। मर कर मार रहा है अपने सारे दुःख।  सारा विकार। गोरख जैसे कहते ही हैं , मरो वै जोगी मरौ, मरण है मीठा। / मरणी मरौ जिस मरणी, गोरख मरि दीठा॥  यह मरना ही अमृत है। उसे लगता है जैसे विपश्यना की पहली सीढ़ी उस ने पा ली है। विपश्यना के आनंद और अमृत का स्वाद उसे मिल गया है। सांस-सांस वह ख़ुद को ख़ुद से अलग पाता जा रहा है। यह यात्रा नई है और रोमांचक। बिलकुल निजी यात्रा है। मन की यात्रा ऐसे ही होती है। अचेतन मन की यात्रा। 

लंच के लिए यह ध्यान सत्र समाप्त हो गया है। वह फिर भी बैठा है। नयन बंद किए। लोगों के उठने , जाने की हलचल उसे महसूस हो रही है। सहसा उस की यात्रा बंट गई है। एकाग्रता टूट गई है। उस की तटस्थता तिरोहित हो गई है। मन के भीतर बरस रहा अमृत ज़रा छलक कर रत्ती भर बाहर हो गया सा लगता है। वह उठ गया है।  डाइनिंग हाल में जाने के बजाय वह अपने कमरे की तरफ चल पड़ा है। सब लोग डाइनिंग हाल की तरफ जा रहे हैं। वह अपने मन की यात्रा को अभी ज़रा जारी रखना चाहता है। कमरे में आ कर बिस्तर पर आंख मूंद कर लेट जाता है। यात्रा पुन : जारी है। मन की यात्रा। वह फिर जैसे गहरे जल में डूब गया है। अचानक वह रशियन स्त्री कूद पड़ती है इस बीच यात्रा में। वह टाल जाता है उस की उपस्थिति को। यात्रा लेकिन भंग हो गई है। अंतर्यात्रा। फिर भी वह लेटा हुआ है। अचानक उसे मां की याद आ जाती है। मां को याद करते-करते भोजन याद आ जाता है। वह उठता है , आहिस्ता-आहिस्ता। उठ कर चल देता है डाइनिंग हाल की तरफ। कुछ लोग डाइनिंग हाल से भोजन कर निकल रहे हैं। वह जा कर थाली उठा कर अपने लिए भोजन निकालने लगता है। भोजन ले कर एक मेज़ की तरफ बढ़ता है। बैठ कर इधर-उधर नज़र दौड़ाता है। रशियन स्त्री कहीं नहीं दिख रही। सिर झुका कर वह भोजन शुरू कर देता है। वैसे भी डाइनिंग हाल में अब चार-छ लोग ही शेष हैं। वह जल्दी से भोजन कर कमरे में आ कर सो जाता है। नाक बज रही है। पर ध्यान के लिए बुलाने ख़ातिर घंटा बजने से नाक का बजना बंद हो जाता है। 

हंसते हुए चेहरे के पीछे की उदासियां पढ़ने वाला विनय अब अपनी उदासियों के पीछे का सबब जानना चाहता है। ख़ुद को जैसे समझा रहा है कि बंधु , सच को स्वीकार करना सीखिए। सीख लीजिएगा तो कुछ गलतफहमियां दूर होंगी। अहंकार , तंज , कुंठा और कटुता से मुक्ति मिलेगी। नहीं , इन्हीं सब में टूट जाइएगा। सो वह अपनी ही सीख को सीख रहा है। तो क्या विपश्यना भी इस में कारगर हो सकती है ? मिल सकती है अहंकार , तंज , कुंठा और कटुता से मुक्ति ?

क्या पता !

ध्यान कक्ष में घुसते ही वह रशियन स्त्री बैठे-बैठे , मीठी से स्माइल मारती हुई जैसे स्वागत करती है। आंखें भी उस की वाचाल हैं। विनय की चाल स्लो हो जाती है। यह कौन सा सच है बंधु ? कौन सी विपश्यना है यह ? वह जैसे ख़ुद से पूछता हुआ अपने आसन पर बैठ गया है। स्त्री होती ही है विकट। वह करे भी तो क्या करे। किसी तरह नयन बंद कर ध्यान मार्ग पर जाने की कोशिश करता है। पर बंद पलकों में आती-जाती सांस में वह स्त्री समा गई है। भटक गया है वह। ध्यान से। आना-पान जारी है और भटकना भी। उस के खुले कानों में आचार्य का आडियो नहीं , वह स्त्री बोल रही है। उस के बंद नयनों में वह स्त्री आ कर बैठ गई है। सांसों में वह ही आ रही है और जा रही है। कान , नाक और नयन पर उस ने कब्ज़ा कर लिया है। विपश्यना को जैसे विस्थापित कर दिया है। जैसे बाढ़ आ गई हो और उस का घर बह गया हो। वह बेघर हो गया हो। बेबस विपश्यना उस के भीतर कहीं ठौर खोज रही हो जैसे। और वह किसी बच्चे की तरह विपश्यना की उंगली थाम लेना चाहता है। जैसे मेले में खोया बच्चा हो और मां की उंगली खोज रहा हो। कि किसी तरह ठौर मिले। बिलखता बच्चा। जैसे किसी वैद्य को नब्ज़ मिल गई हो , रोगी की। उसे सांस का स्पर्श मिल गया है। मां की उंगली मिल गई है। उसे ठौर मिल गया है। आती-जाती सांस अब उसे गहरे जल में जैसे फिर खींच कर ले जा रही है। ले जा रही है आनंद के सागर में। अमृत पान की यात्रा पर। वह जाने किस यान पर सवार है। यान है कि वायुयान। समझ नहीं पाता। समझना भी नहीं चाहता। साधन कोई भी हो , साध्य ही साधना है। सुख और शांति की आनंद यात्रा। एक सांस का स्पर्श , एक आना-पान इतनी मुश्किल यात्रा को इतना आसान बना सकता है , वह नहीं जानता था। कहां जानता था कि सांस सिर्फ़ जीवन जीने का , जीवन चलने की सूचक नहीं है। सांस है तो जीवन है यह तो जानता ही था , सभी जानते हैं। पर सांस का यह सुख , तटस्थ भी बना सकता है , अमृत यात्रा की अनुभूति भी जीते जी करवा सकता है , कहां जानता था। 

ध्यान सत्र समाप्त हो गया है। शाम का सत्र जब समाप्त होता है तो डाइनिंग हाल में चाय और लइया चना का सत्र होता है। जो साधक विपश्यना शिविर में दूसरी बार या तीसरी बार आए हैं यानी सीनियर साधक हैं , उन्हें सिर्फ़ नींबू-पानी मिलता है। विनय चाय नहीं पीता है तो चाय बराबर वह दूध ले लेता है , छोटी गिलास में। संक्षिप्त जलपान के बाद वह कमरे में थोड़ी देर आराम करता है। फिर ध्यान का एक सत्र होता है। छोटा सत्र। इस के बाद फिर अवकाश। देर शाम अंधेरा हो जाने के बाद आचार्य गोयनका का प्रवचन। वीडियो पर। हिंदी समझने वाले हिंदी में सुनते हैं। बाक़ी के लोग अंगरेजी में सुनते हैं। दोनों के लिए अलग-अलग व्यवस्था होती है। कोई डेढ़ घंटे का प्रवचन सुन कर विनय समृद्ध हो जाता है। रोज-रोज यह समृद्धि का कोष बढ़ता जाता है। ध्यान से ज़्यादा यह आचार्य सत्यनारायण गोयनका का प्रवचन आनंद देता है। 

प्रवचन सुनने के बाद लोग सोने चले जाते हैं। जब कि विनय रोज टहलने के लिए निकलता है। परिसर बड़ा है विपश्यना शिविर का तो वह अकसर मार्ग बदलता रहता है , टहलने का। अकेले ही टहलता है। चुपचाप। सब लोग सो रहे होते हैं , वह टहल रहा होता है। ध्यान से ज़्यादा एकांत और एकाग्रता इस टहलने में होती है। आसपास और दूर-दूर भी कोई नहीं। अजब सी निर्जनता होती है। यह निर्जन वातावरण मन में उछाह भरता है। अपना अकेले का यह स्पेस उसे आह्लादित करता है। इस चुप की राजधानी में यह निर्जन स्पेस उसे और मोहित करता है। सामान्य दिनों में टहलते समय वह अकसर पसंदीदा गीत-संगीत सुनते हुए टहलता है। पर यहां तो यह सब कुछ अलाऊ नहीं है। सो तरह-तरह की बातें सोचते हुआ टहलता है। 

आज हवा में कुछ ज़्यादा खुनक है। कान को हवा रह-रह कर चुभती है। ओवर कोट पहन कर उस ने सिर पर मफ़लर लपेट लिया है। पॉकेट में हाथ डाले टहल रहा है। याद आता है उसे एन सी सी शिविर। उस शिविर में सुबह-सुबह दौड़ना होता था। उस्ताद जी लोग , मफ़लर , दस्ताना कुछ भी नहीं पहनने देते थे। सब कुछ खुला रखने को कहते। पर यह विपश्यना शिविर है। यहां उस्ताद जी लोग नहीं। पर अनुशासन वहां भी होता था। कड़ा अनुशासन। अनुशासन यहां भी है। सुबह चार बजे से रात नौ बजे तक वहां भी व्यस्त रखा जाता था। यहां भी। हां , एन सी सी शिविर में कुछ सोचने का अवकाश नहीं था। यहां विपश्यना में सोचने का , समझने का अवसर बहुत है। ख़ुद के बारे में सोचने का अवकाश ही अवकाश है। वहां श्रम की साधना थी , यहां ध्यान की साधना है। तब विनय युवा था। टीनएज था। अब अधेड़ है। वह उस रशियन स्त्री के बाबत सोचता हुआ टहल रहा है। खंभों पर लटकी मद्धिम बिजली वाले बल्ब की रोशनी में , इस ठंडी हवा में टहलना सुखद लगता है। ऐसे-जैसे अपने एकांत में टहल रहा हो। अपने मन के भीतर टहल रहा हो। सोचता है कि और भी कई देशी-विदेशी स्त्रियां है इस विपश्यना शिविर में। युवा भी हैं , अधेड़ भी और वृद्ध भी। तो इस युवा रशियन स्त्री ने ही उस में अचानक दिलचस्पी क्यों ली ? और कि वह भी उस की ओर लगातार आकृष्ट क्यों हुआ जा रहा है। विपश्यना के लिए वह आया है यहां। रोमांस या लंपटई के लिए नहीं। 

बुद्ध ने यशोधरा को छोड़ दिया था। घर-बार छोड़ दिया था। और वह यहां अलकजाल में उलझा हुआ है। विपश्यना के आनंद की पहली सीढ़ी चढ़ चुकने और उस अमृतपान के बाद भी स्त्री सुख की लालसा में डूबा जा रहा है। अचानक उसे लगता है कि कोई उस के पीछे आ रहा है। यह पहली बार है। सो मुड़ कर देखता है। वही रशियन स्त्री है। वह अपने क़दम धीमे कर लेता है। धीरे-धीरे वह स्त्री उस के बगल में चलने लगी है। विनय ने मुड़ कर फिर पीछे देखा है कि क्या कोई और भी है क्या पीछे। देखा तो पाया कि कोई नहीं है। वह निश्चिंत हो जाता है। वह स्त्री आहिस्ता-आहिस्ता चलते हुए उस के क़रीब आती जाती है। स्पर्श की हद तक। विनय अब क्या करे भला ? यह सोचते ही उस के भीतर कोई बिजली सी चमक जाती है। ऐसे जैसे कोई शार्ट सर्किट हो गया हो। बिजली गुम हो गई हो। सहसा उस ने बढ़ कर उसे बाहों में भर कर चूम लिया है। वह रशियन स्त्री अवाक रह गई है। उसे विनय इस तरह इतनी जल्दी चूम लेगा , इस का बिलकुल अंदाजा नहीं था। प्रत्युत्तर में वह भी चूम लेती है विनय को। दोनों ज़रा देर आलिंगनबद्ध हो कर एक दूसरे को चूमते रहते हैं। आहिस्ता-आहिस्ता फिर बेतहाशा। बाहों के दरमियां रात गहरी हो रही है। वह दोनों लिली के फूल की झाड़ की ओट ले लेते हैं। फिर आम के वृक्ष की तरफ सरक जाते हैं। जहां बिजली की हलकी रौशनी भी नहीं पहुंच पा रही। दोनों में कोई शाब्दिक संवाद नहीं है। दोनों की देह संवादरत हैं। अजब कश्मकश है। यह देह का संघर्ष है , मन का संघर्ष है , वासना का संघर्ष है कि विपश्यना के कारण निकले विकार का संघर्ष है ? और यह लीजिए जो नहीं होना था , होने लगा है। अकस्मात। आहिस्ता-आहिस्ता वह स्त्री विनय को निर्वस्त्र करने लगी है। विनय उसे विपश्यना के अनुशासन की याद दिलाना चाहता है। बताना चाहता है कि विपश्यना की वर्जनाओं को निभाना ज़रुरी है। पर भटक गया है। पूरी तरह भटक गया है। जैसे युगलबंदी चल रही हो गायन और वादन की। सेजिया चढ़त डर लागे ! अधर , कपोल , वक्ष सभी जैसे साज बन गए हैं। और वह उन्हें , उन के तार को मद्धम स्वर में बजा रहा है। स्त्री जब ऐसे उन्माद में आती है तो उस के अधर स्वत: बांसुरी बन जाते हैं। बस आप के अधरों में उसे बजाने की कला आती हो। सांस का अभ्यास ही यहां भी काम आता है। वही आना-पान। 

बांसुरी जब सुर में आती है तो कपोल को संतूर की मिठास में तब्दील होने में देर नहीं लगती। वक्ष पियानो और नितंब तबला बन गया है। यह स्त्री जैसे इन सारे वाद्यों का लय-ताल जानती है , भली भांति समझती है । निष्णात है। संकोच की सिलवट पहले ही इसरार में हटा देती है। विनय जैसे जब चाहता है , वह उसी में ढलती जाती है। सारंगी का सुर भी यह रशियन स्त्री बहुत अच्छे से जानती है। स्त्री उस पर झुक आई है। झुकती ही जा रही है। सरकती जा रही है। गोया सरकती जाए है नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता ! गोया उस के मुख गागर बन गए हैं। वह डूब रहा है , अलौकिक सुख के गागर में। अधर जो बांसुरी थे , अब माऊथ आर्गन बन गए हैं। बीन की तरह बजा रही है। जैसे वायलिन बन कर वह बज रहा है। न इधर जल्दी-जल्दी है , न उधर आहिस्ता-आहिस्ता है। देह-संगीत की इस सभा में सभी सुर , सभी आलाप , आरोह-अवरोह अपनी गति में हैं। अपने पूरे लोच और खटके के साथ। अपनी संपूर्णता के साथ। संभोग का सितार ऐसे ही तो बजता है। सितार अपने सभी सुरों के साथ व्यवस्थित हो कर बजने लगता है। बज रहा है विपश्यना शिविर में लिली के फूल के इस झाड़ के पीछे। आम के वृक्ष के नीचे। आम के पल्लव जैसे आचमन करवा रहे हैं। 

सारी ठंड , सारी हवा बेअसर है इस देह-संगीत की सभा में। अब विनय उस रशियन स्त्री को फिर से चूम रहा है। बेतहाशा। जैसे उस की पूरी देह अब बांसुरी है। वह उस के ऊपर झुक आया है। जैसे आसमान धरती पर झुके। बादल बन कर वह जैसे अब उस की देह में उमड़-घुमड़ रहा है। हांफ रहा है ऐसे जैसे बादल बन कर बरस जाना चाहता है उस के भीतर। सर्दी में सावन बरस रहा है। रशियन स्त्री , जिस का नाम भी उसे नहीं मालूम उस से ऐसे लिपटी पड़ी है जैसे कोई अमरलता किसी वृक्ष से। वृक्ष कितना भी बड़ा हो , अमरलता जब उसे घेर लेती है तो वह अमरलता ही दिखती है , वृक्ष नहीं। वृक्ष छुप गया है , इस अमरलता के पीछे। विनय भी इस अमरलता के नेह में जैसे नत हो कर छुप गया है। उस के वक्ष पर सिर रखे जैसे सुस्ताता हुआ। ठंडी हवा उस की देह को अब छूने लगी है। ओवरकोट उठा कर वह अपने ऊपर डाल लेता है। जल्दी ही स्त्री को चूम कर वह धीरे से उठ गया है। उठते-उठते उस के माथे को चूमा है , कृतज्ञ भाव में। ऐसे जैसे लव यू कह रहा हो। दोनों अपने-अपने कपड़े पहन कर चलने को होते हैं। स्त्री उंगली के इशारों से रोकती है उसे। और उसे अकेले जाने को कहती है। वह लेडीज फर्स्ट को ध्यान रख कर उसे पहले जाने को कहता है। यह भी सोचता है कि अगर कुछ अप्रिय घटता है तो उसी के साथ घटे। स्त्री के साथ नहीं। वह आलिंगन में उसे भर कर एक बार फिर चूमती है , कस कर। और धीरे-धीरे चल देती है। वह उसे जाते हुए देखता रहता है। और सोचता है संभोग से समाधि क्या इसे ही कहते हैं ? कि विपश्यना में वासना है यह। 

साधु-साधु ! 

वह अपने कमरे की तरफ चल पड़ा है। चारो तरफ असीम सन्नाटा है। ठंड भी। निर्जनता की सारी सरहदें सुन्न हैं।ज़्यादातर दिन भर के ध्यान के बाद लोग इतना थक जाते हैं कि बिस्तर पर जाते ही आंख बंद हो जाती है। नाक बजने लगती है। रोज बारह घंटे बैठना , बैठ कर ध्यान करना भी अपने आप में बहुत होता है। सो बाहर तो कहीं कोई नहीं मिला पर कमरे के बरामदे में सिंगापुरी साधु उसे बाहर से आते हुए देखता है। देखते हुए घूरता है। ऐसे जैसे जानना चाहता है कि आज इतनी देर तक टहलने का राज़ क्या है। विनय उस के इस घूरने को इग्नोर करते हुए बाथरूम में घुस जाता है। वह फिर भी नहीं मानता। साधु-साधु ! बोलने लगता है। ऐसे जैसे कोई चौकीदार हर किसी को ख़बरदार करने के लिए सीटी बजा रहा हो। 

हाथ-पैर , मुंह धो कर , कपड़े बदल कर बिस्तर पर लेट गया है। कंबल ओढ़ लेता है। 

जाने क्या है विनय के साथ कि स्त्रियां उस के जीवन में इसी तरह अचानक उपस्थित हो जाती हैं। स्त्रियां ही उसे अपनी गिरफ़्त में ले लेती हैं। और वह नदी बन कर उन के साथ बहने लगता है। बह जाता है। जैसे कि यह रशियन स्त्री। जब तक स्त्रियां चाहती हैं , वह बहता रहता है। नदी के जल की तरह कल-कल। अपने-अपने कारणों और मुश्किलों के चलते स्त्री जब बांध बनाने लगती है , सरहद निर्धारित करने लगती है तो वह न तो तो बांध तोड़ता है , न सरहद लांघता है। अकेला हो जाता है। चुपचाप। समझ जाता है कि कारवां गुज़र गया है। ग़ुबार देखने में उस की कोई दिलचस्पी नहीं रहती। जैसे चुप की इस राजधानी में यह स्त्री चुपके से आ गई। और चली गई। ऐसे रिश्ते चुपचाप ही चल पाते हैं। बैंड बजा कर नहीं। हां , भीतर से अगर हां नहीं हुई तो कुछ स्त्रियों को उस ने निराश भी किया है। क्यों कि स्त्री पसंद की भी होनी ज़रुरी होती है। और भी बहुत सी बातें होती हैं। सब के लिए सुलभ नहीं हो पाता। कोई भी नहीं हो सकता। एक मेंटल हार्मनी होती है , जो जोड़ती है। यह जुड़ना ज़रुरी है। बहुत ज़रुरी। यह सब सोचते-सोचते जाने कब वह सो गया। रात भर वह विभिन्न सपनों में डूबता-उतराता रहा। पर वह रशियन स्त्री सपने में नहीं आई। मिल जाने के बाद सपनों में आता भी कौन है भला। 

सुबह घंटा बजा है और वह हमेशा की तरह करवट बदल कर फिर सो गया है। आलस का नया सौंदर्यशास्त्र रचते हुए। उस रशियन स्त्री के संसर्ग को याद करते हुए वह मुदित हो गया है। ऐसा मीठा और नैसर्गिक संसर्ग ज़माने बाद उसे नसीब हुआ। निर्बाध। वह सर्वदा ऋणी रहेगा उस रशियन स्त्री का। इस नैसर्गिक सुख और सुख के इस स्वाद के लिए। मनभावन मन के लिए। अब कार्यकर्ता की घंटी बज रही है बिलकुल सिर पर। रुनझुन घंटी। वह उठ गया है। नहा-धो कर ध्यान कक्ष सर्वदा की तरह विलंब से पहुंचा है। उस रशियन स्त्री को देख कर उस का जी जुड़ा गया है। वह भी प्रफुल्लित है। खिले फूल की तरह मुस्कुराई है। आंखों ही आंखों में प्यार छलकाया है। स्वागत किया है। जैसे सपने जैसी रात को याद कर कृतज्ञता ज्ञापित कर रही हो। सचमुच वह रात थी कि सपना थी। वह सोचता है। सर्द रात की गर्म यादों को मन ही मन फिर से पढ़ता है। पढ़ते-पढ़ते ही नयन बंद कर सांस की तरफ ख़ुद को केंद्रित कर लेता है। आना-पान की राह पर है वह। गहरे जल में उतरता हुआ। जल के भीतर जल का उजाला उसे फिर मोहित करने लगा है। ऐसे जैसे जल से निकलना न हो। कभी न हो। जल है कि जाल है। वह समझ नहीं पाता। ध्यान की यह ध्वजा फहराते हुए वह किसी और लोक में पहुंच गया है। जहां न कोई स्त्री है , न कोई शिविर। सिर्फ़ बर्फ़ है। बर्फ़ ही बर्फ़ है। जैसे फ़ोटो में देखा हुआ हिमालय हो। गहरे जल के भीतर हिमालय ? वह डर जाता है। पर नयन नहीं खोलता। उस के भीतर बर्फ़ पिघल नहीं रही धड़क रही है। जैसे दिल धड़के। यह हिमालय की बर्फ़ है। 

ऐंद्रिक सुख बड़ा है कि आध्यात्मिक सुख। यह उसे तय करना है। पर अभी इसे तय करने को वह मुल्तवी करता है। क्यों कि यह विषय बहुत विशद है। विषाद भी बहुत। चुनौती और ख़तरे बहुत हैं इसे अभी-अभी तय करने में। फिर सोचता है स्त्री अपने आप में आध्यात्म है। स्त्री से बड़ी कोई किताब नहीं। आप किसी भी विषय को किसी भी तरह से पढ़ कर जान सकते हैं। पर स्त्री को जितना पढ़िए , लगता है कितना कम पढ़ा है। कुछ जानते ही नहीं। फिर स्त्री आप को पढ़ने भी कहां देती है , पूरी तरह। उतना ही पढ़ने और जानने देती है , जितना वह चाहती है। और आप भरे-भरे हो कर भी रिक्त हो जाते हैं। 

अपनी मां को भी कोई कितना जानता है। जानने की ज़रुरत ही नहीं समझता। ममत्व के आगे का दरवाज़ा बंद है , मां का भी। जिस की कोख में नौ महीने रह कर भी नहीं जाना जा सकता। जीवन भर मां-मां कह कर भी नहीं जाना जा सकता। मां जानने भी कहां देती है। मातृभक्त गणेश भी अपनी मां पार्वती को कितना जानते थे भला। जानते होते तो पिता के हाथ अपना सिर कटवा कर हाथी का सिर क्यों लगवाते। मातृभक्ति में इतना चूर कि मां के आदेश के आगे पिता से टकरा गए। शिव भी कितने चतुर थे कि पार्वती के कहने पर गणेश को जीवित तो किया पर हाथी का सिर लगा कर। जानते थे कि हाथी बड़ा विवेकवान होता है। बुद्धिमान होता है। गणेश का सिर यानी मस्तिष्क विवेक नहीं जानता था। शिव इतना तो जानते थे पर पहली पत्नी सती को भी कितना जानते थे ? जानते होते तो शिव के हाथों में सती के शव को काटने की ज़रुरत क्यों पड़ती विष्णु को। इसी लिए स्त्री दुनिया की सब से बड़ी किताब है। दुनिया की सब से बड़ी लाइब्रेरी है स्त्री। 

और स्त्री की देह ?

विराट दुनिया है , स्त्री की देह। स्त्री का मन उस की देह से भी विराट। शेक्सपियर कहते हैं धरती के पास संगीत उनके लिए है जो सुनते हैं। इसी तर्ज़ पर विनय मानता है कि देह संगीत उन के लिए है जो इस में ख़ुद को विगलित करना जानते हैं। कर देते हैं। स्व को समाप्त कर देते हैं। हिमालय गलता है तो गंगा बनती है। देह-संगीत की श्रद्धा में नत लोग ही जानते हैं इस संगीत को। जो नत नहीं होते , वह अभागे लोग होते हैं। अहंकार में जीने वाले लोग होते हैं। स्त्री को उपभोग की वस्तु मानने वाले लोग होते हैं। 

ध्यान जारी है और इधर-उधर के सवाल भी। ध्यान की गुफा में वह स्थिर हो कर नहीं , पानी बन कर बहता रहता है। बुद्ध बताते हैं कि अगर कोई मुझे और मेरे विचारों को समझ गया है तो वह मुझे छोड़ कर आगे बढ़े। मेरे विचार के खूंटे से न बंधे। विनय सांस के स्पर्श , तटस्थ होने के अकेलेपन को चीर रहा है। जैसे इस सन्नाटे को और सघन कर देना चाहता है। जाने यह पौ फटने का सौंदर्य है , आगत सुबह का सौंदर्य है या होने वाले सूर्योदय की दस्तक की देहरी है। यह कौन सा टाइगर हिल है ? कौन सी कंचनजंघा है जिस की गोद में बैठ कर सूर्य शिशु बन कर झांक रहा है। मां की गोद में बैठा , आहिस्ता से झांकता शिशु। टुकुर-टुकुर। सूर्य की लाली लावण्य बन कर उपस्थित है और यह ध्यान सत्र समाप्त है। वह उठ कर खड़ा हो गया है। अंगड़ाई लेते हुए जम्हाई भी लेता है। कुछ लोग साधु-साधु ! बोलते हैं , रोज की तरह। रशियन स्त्री अभी भी बैठी है। वह उस के पास से गुज़रता है। वह अचानक उस के पैर में मीठी सी चुटकी काट लेती है। वह आहिस्ता से उस की ओर मुड़ कर देखता है। वह आंखों में मुस्कुरा रही है। उसे स्पर्श करते हुई उठ कर खड़ी हो जाती है। कोई कुछ समझे , विनय चल देता है। यह कौन सा मनुहार है ? स्मृतियों का यह कौन सा चंदन है। 

चंदन है तो महकेगा ही। वह महक उठता है। 

गोभी के खेत के पास के चबूतरे पर बैठे हुए वह सूर्य की लालिमा को निहार रहा है। उगते सूर्य को हाथ जोड़ कर प्रणाम कर रहा है। ठुमक-ठुमक कर चलते सूर्य को इस तरह उगते हुए देखना भी एक सुख है। अविरल और अविकल सुख। अभिराम कर देने वाला। शिशु सा सूर्य और चंदन की सुगंध सा सुख कहां मिलता है भला ! यह इस तरह की बिलकुल नई सुबह है। रात की देह में दहक कर हुआ है यह सूर्योदय। रात जब वह उस सुंदरी की बाहों में था तो लगता था शोलों की बाहों में है। अब सूर्योदय का यह औचक सौंदर्य उसे अपने जाल में बांध रहा है। वह सोच रहा है कि जब रात सुंदर गुज़रती है तो क्या सुबह ऐसे ही सुंदर बन जाती है। उस के भीतर एक पुलक सी जाग जाती है। सप्तक सा बज जाता है। तार सप्तक। जाने यह पुलक विपश्यना की है कि वासना की। वह समझ नहीं पाता। वह कहीं जल देखना चाहता है। किसी झील , किसी नदी का जल। उस जल में सूर्य को , ख़ुद को देखना चाहता है। ख़ुद को जल में देखे बहुत दिन हो गए। पर इस शिविर परिसर में बहुत कुछ है , झील नहीं है। तो क्या अगर झील होती तो वह उस रशियन स्त्री का हाथ थामे उस झील में उतर जाता ? फ़िलहाल वह अचानक सामने खड़ी है। और वह उस की नीली आंखों की झील में खो जाता है। खो जाता है बीती रात की स्मृतियों की सुगंध में। उस की देह की सुगंध और सौंदर्य में। स्त्री उसे ज़रा ठहर कर देखती है और चल देती है। उस का गाऊन रात वाला ही है। उठ कर वह कमरे में आ गया है। तकिया को बाहों में भींच कर लेट जाता है। गोया तकिया न हो , वह रशियन स्त्री हो। वह उसे चूम कर झील बना देना चाहता है जिस के जल में ख़ुद को निहार सके। ख़ुद को निहारते हुए मन की किसी यात्रा पर जा सके। 


घंटा बज गया है। ध्यान सत्र बस शुरू ही होने वाला है। और विनय उस स्त्री को ध्यान में बसाए हुए है। जो बीती रात उस की बाहों में मोगरा की सुगंध भर कर उसे सुख से भर गई है। उसे याद आता है कि संस्कृत में मोगरा को मल्लिका भी कहा गया है और मालती भी। तो वह उसे मल्लिका कहे कि मालती। मल्लिका कहना वह तय करता है और उठ खड़ा होता है। ध्यान कक्ष की तरफ वह चल पड़ा है। झूमती हुई हवा की तरह। बाहर भी हल्की हवा है। जो देह में ठंड सी भरती है। पर ध्यान कक्ष में मल्लिका तो स्लीवलेस वसन में है। नीचे भी स्कर्ट है। उसे इस तरह देख कर उसे एक पुराना गीत याद आ जाता है। रुपदंभा बड़ी कृपण हो तुम / अल्पव्यसना कैसे वसन हो तुम। तो क्या मल्लिका को ठंड नहीं लगती ? 

नहीं लगती होगी तभी तो। तभी तो अकसर वह स्लीवलेस दिखती है। 

आडियो बज रहा है। निर्देश मिल रहे हैं ध्यान को धारण करने के लिए। कुछ लोग हैं जो वस्त्र भी पूरे धारण नहीं करते। जाने ध्यान कैसे धारण करते होंगे। एक मल्लिका ही नहीं , कुछ और परदेसी भी हैं जो कम वस्त्र धारण करते हैं। जैसे उन्हें ठंड नहीं लगती। तो क्या भूख और प्यास की मारी हुई दुनिया के लोगों को ही ठंड लगती है। बुद्ध को भी ठंड लगती थी कि नहीं। वह सोचता है। सांस आ रही है , जा रही है। सांस समझा रही है कि किसी और के बारे में नहीं सोचो। सांस के इस स्वरुप से विनय को इश्क़ हो गया है। मल्लिका से भी इश्क़ हो गया है। किस-किस से वह इश्क़ करेगा वह। ऐसा वह कई बार सोचता है। यह सोचते-सोचते ही वह ध्यान के जल में उतर गया है। गहरे जल में। डूब रहा है। डूबता ही जा रहा है। जल के ऊपर नहीं आना चाहता। जल की तलहटी में आ गया है। स्थिर हो गया है। तो क्या इसे ही पाताल कहते हैं। कब तक रहेगा वह इस पाताल में डूबा हुआ। बुद्ध कहते हैं दुनिया में कुछ भी स्थिर नहीं है। स्थाई नहीं है। सब गुज़र जाएगा। सब बदल जाएगा। तो क्या ध्यान की यह मुद्रा भी , गहरे जल में अकसर उतर जाना भी कभी बदल जाएगा। वह सोचता है। जो हो , चाहे जब जो कुछ बदले। उसे क्या। वह तो गहरे जल में है। ध्यान में डूबा हुआ। 

कि जल में डूबा हुआ ?

वह नहीं जानता। बस डूबे रहना चाहता है। बाहर बहुत कुछ बदलता रहता है। भीतर उस से भी ज़्यादा उथल-पुथल है। न बाहर का हिसाब है , न भीतर का। हिसाब-किताब में वैसे भी वह सर्वदा-सर्वदा से कमज़ोर रहा है। अचानक नींद की नाव में सवार हो गया है। नाक बजने लगी हैं। ऊंघते -ऊंघते हुए वह बैठे-बैठे गिर गया है। गिरते ही तंद्रा टूटती है। वह सहसा उठ कर बैठ गया है। वह देख रहा कि सभी साधक मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं , उस के इस तरह सोते-सोते गिर जाने से। तो क्या यह साधक तटस्थ नहीं हो पा रहे। भीतर क्या बाहर की दुनिया से भी तटस्थ नहीं हो पा रहे। अगर यह साधक ध्यान में थे तो विनय का यह गिरना कैसे देख पाए। बस ठठा कर नहीं हंसे पर हंसे तो। ख़ैर वह फिर ध्यान की मुद्रा में आ गया है। नींद की नाव में अकसर सफ़र करना उस का व्यसन है , यह वह जानता है। विद्यार्थी जीवन से है। क्लास में अकसर अध्यापक लोग उसे चाक मार कर जगाते थे। घर में भी पढ़ते समय घर के लोग जगाते थे। आफ़िस में भी वह रोज ही बैठे-बैठे नींद की नाव में सवार हो जाता है। लोग मोबाइल से उस की फ़ोटो , वीडियो बनाते रहते हैं। भेजते रहते हैं इधर-उधर शिकायत के लहज़े में। वह लेकिन लाचार है। क्या करे भला !

सारे सत्र , भोजन , प्रवचन पार कर रात फिर आई है। कल की तरह। रोज की तरह। वह टहल रहा है। सोच रहा है कि क्या आज वह फिर आएगी। मल्लिका के आने की प्रतीक्षा वह टहलते हुए कर रहा है। ऐसे जैसे नींद की नाव उसे जब-तब आग़ोश में ले लेती है , वह मल्लिका को आग़ोश में ले लेना चाहता है। चांद भी इस सर्दी में जैसे स्लीवलेस हो गया है। जैसे अपनी मां की गोद में बैठ कर , मां के आंचल में छुपा हुआ आहिस्ता से झांक रहा है। टुकुर-टुकुर। तो क्या चांद को भी मल्लिका की प्रतीक्षा है। प्रतीक्षा तो इन ठंडी हवाओं को भी है। लिली के फूल की झाड़ियों को भी है। आम के वृक्ष को भी। आचमन करते पल्लव को भी। इस नीरव सन्नाटे को भी। टहलते-टहलते विनय थक गया है। पर मल्लिका की पदचाप नहीं सुनाई दी है। वह रह-रह कर मुड़-मुड़ कर रास्ता देखता रहता है। पर नहीं आती। मल्लिका नहीं आती तो ग़ालिब याद आते हैं : हम वहां हैं जहां से हम को भी/ कुछ हमारी ख़बर नहीं आती। ग़ालिब को याद करते-करते वह कमरे में आ गया है। हाथ मुंह धो कर वह बिस्तर पर तकिया को आग़ोश में ले कर मल्लिका के बारे में सोचते-सोचते सो गया है। जनम एक छल है , मिलन एक सपना सोचते-सोचते वह सो गया है। और यह देखिए मल्लिका अब आई है। सपने में। उस के आने से मन में शोर बहुत बढ़ गया है। इधर-उधर चहुं ओर शोर ही शोर। सुबह घंटी से आंख खुलती है। नहा-धो कर वह ध्यान कक्ष पहुंचता है। काफी विलंब हो गया है। आचार्य उसे घूरते हुए देखते हैं। वह हाथ जोड़ कर , अपनी जगह बैठ जाता है। मल्लिका ने भी प्रत्युत्तर में हाथ जोड़ लिया है। आचार्य यह नहीं देख पाते। वह विनय की तरफ ही अपनी आंख का कैमरा तैनात किए पड़े हैं। गोया वह नर्सरी का स्टूडेंट हो और वह उसे दंडित कर देना चाहते हैं। मुर्गा बना देना चाहते हैं। उसे यह सोच कर हंसी आ जाती है। ध्यान में आज बहुत मन नहीं लग रहा विनय का। रात में मल्लिका से मिलन न होने के कारण वह खिन्न बहुत है। अनमना भी। कहां तो प्रणय की पुकार थी। अभिसार की रात थी। पर मानिनी ही अनुपस्थित थी। मल्लिका के अनुपस्थित रहने से सारा कुछ जैसे अनुपस्थित हो गया है। सपने में आने से क्या होता है भला। सपना तो छल है। पर मिलन भी तो सपना ही है। बहुत घालमेल है इस मिलने न मिलने में। सोचते-सोचते वह फिर नींद की नाव में चढ़ गया है। मल्लिका फिर उपस्थित है। और वह बेबस। लाचार। नाक बज गई है। कार्यकर्ता झिझोड़ रहा है। 

वह नाश्ते की मेज़ पर है। वह आते ही जाना चाहती है। वह उसे रोकता भी नहीं है। बोलना है नहीं। कोई संकेत तक करना नहीं है। वह रोके भी उसे तो कैसे रोके भला। कोई संबंध वह स्वत:स्फूर्त ही पसंद करता है। स्वत:स्फूर्त नहीं है संबंध तो उस का कोई मतलब नहीं। विवाहेतर संबंध को वैसे भी कभी स्थाई नहीं होना चाहिए। स्थाई होते ही संबंध पारिवारिक क्लेश और अपराध की तरफ चले जाते हैं। मर्डर वग़ैरह तक हो जाते हैं। छीछालेदर तक हो जाती है। सो बचना चाहिए इस से। विवाहेतर संबंधों में भी मर्यादा और शुचिता बहुत आवश्यक है। फिर इस मल्लिका , इस रशियन स्त्री से तो बस एक अनायास गुज़र गया क्षण है। एक मानसिक संबंध है। किसी पीपे के पुल की तरह। अस्थाई पुल। वह पुल जो नदी में बाढ़ की संभावना मात्र से तोड़ दिया जाता है। 

तो क्या मल्लिका का यह पुल टूट गया है ? पता नहीं। पर विनय ज़रुर टूट गया है। 

वह डाइनिंग हाल से बाहर आ गया है। वह लंदन वाला लड़का उस के सामने हाथ जोड़े विनयवत उपस्थित है। विनय मुस्कुरा देता है। सिंगापुरी साधू , साधु-साधु बोलते हुए गुज़र जाता है। वह पापीते के पेड़ पर लदे अधपके पपीते की तरफ देखने लगता है। आज नाश्ते में मिला पपीता भी बहुत मीठा था। किसी दशहरी आम की तरह। मल्लिका का वक्ष भी तो दशहरी की तरह ही था। मोगरे की सी सुगंध लिए। तभी तो उस ने उस का काल्पनिक नाम मल्लिका रख दिया है। जाने उस का असल नाम क्या है। विनय अपरिचित लोगों के काल्पनिक नाम इसी तरह रखता रहता है। ख़ास कर स्त्रियों के। जैसे उस की बेटी कभी बचपन में लोगों के नाम सब्जियों के नाम पर रख दिया करती थी। किसी को गोभी , किसी को मटर , किसी को टमाटर , किसी को आलू , कटहल , प्याज , धनिया आदि। उस का एक दोस्त लड़कियों के आर डी एक्स जैसे नाम रख देता था। लेकिन विनय स्त्रियों के नाम रखते समय सौंदर्यबोध को तिलांजलि नहीं देता। स्त्रियों का काल्पनिक नामकरण ही सही , सम्मान सहित रखता है। सौंदर्यबोध का सहज ध्यान रखता है। कई सारे देशज नाम भी। गानों में आने वाले संबोधन भी ऐसे काल्पनिक नामकरण में वह बेहिचक रख देता है। घर में पत्नी के भी कई सारे नाम रखे हुए है। बिल्लो रानी कहने पर उस की महिला मित्र बहुत ख़ुश हो जाती है। बालम चिरई कहने पर भी। नाम लेकिन वह कभी भी किसी का बिगाड़ता नहीं। सम्मान और सौंदर्यबोध सहज ही मन में आ जाता है। स्त्रियों का वह बहुत सम्मान करता है। क्यों कि उस की मां भी स्त्री है। तो मां का अपमान तो बनता नहीं है। सम्मान ही सम्मान बनता है। तो हर स्त्री का सम्मान सहज ही सध जाता है विनय से। कहां-कहां से गुज़र जाता है। पर स्त्री का सम्मान वह नहीं भूलता। 

वह फिर ध्यान में है। वही गहरा जल , वही आनंदमयी अनुभूति। ममतामयी अनुभूति। वही सुख , वही सांद्रता। सांस का यह भी अजब प्रयोग है। विपश्यना के पहले वह कभी नहीं जानता था। कि एक सुख कंधे पर है , दूसरा भी आ कर लद जाता है। तीसरा , चौथा , पांचवां भी। अनगिन सुख आते-जाते रहते हैं। ऐसे , जैसे वह कोई अलगनी हो। और अनगिन कपड़े लदे हुए हों उस पर। ऐसे ही सुख विपश्यना के इस ध्यान में उसे अलगनी बना कर लटकते रहते हैं। जैसी किसी आम के वृक्ष पर ढेर सारे टिकोरे। सेव के वृक्ष पर सेव। अंगूर की लता पर अंगूर के गुच्छे। किसी कटहल के पेड़ पर असंख्य कटहल। सुख ऐसे ही मिलते हैं और गुज़र जाते हैं। लौट कर नहीं आते फिर कभी। जैसे मनुष्य मृत्यु के बाद नहीं लौटता। गाते रह जाते हैं लोग दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां।  चिट्ठी ना कोई सन्देश / जाने वो कौन सा देश / जहाँ तुम चले गए / जहाँ तुम चले गए / इस दिल पे लगा के ठेस। ऐसे ही निर्मोही यह सुख भी होते हैं। ठेस लगाएं या न लगाएं पर लौटते नहीं। कभी नहीं लौटते। बुद्ध कहते ही हैं , सुख हो या दुःख , सब गुज़र जाएगा। दुःख गुज़रे तो अच्छा है। पर सुख को तो नहीं गुज़रना चाहिए। पर गुज़र जाता है। थोड़ी धूप , तनिक सी छाया बन कर रह जाता है जीवन। मल्लिका भी तनिक सी छाया बन कर ही आई। 

और यह लीजिए मल्लिका इस रात फिर आई है। सपने में नहीं , टहलने में। टहलते-टहलते वह फिर लिपट गई है। लिपट कर बेतहाशा चूमने लगी है। ऐसे जैसे वह स्त्री नहीं , पुरुष हो। एक ही बार के अनुभव में , दूसरी बार में सारे संकोच , झिझक और मनुहार की सारी देहरी , सारी सरहद लांघ गई है। सुख सिर्फ़ गुज़रता ही नहीं , सुख ऐसे आता भी है। चुपके से। चुप की राजधानी में चुपके से। तो क्या सांस और सुख का कोई अनजान रिश्ता भी है ? पता नहीं। पर अब वह गहरे जल में नहीं , गहरे मन में है। धंस कर प्यार करता हुआ। मल्लिका की देह में जगह-जगह तोड़-फोड़ करता हुआ। एक नई सी राह हेरता हुआ। मल्लिका की देह और मन के बीच की पगडंडी में राह बनाता हुआ। आते-जाते वृक्ष के बीच राह बनाता , सरपट घोड़े की तरह दौड़ता हुआ। हांफता हुआ सा। संभोग से समाधि की धरती में जैसे कोई अंकुर फूटना चाहता है। जैसे किसी वृक्ष में कोई कल्ला फूटना चाहता है। ओस की कोई बूंद किसी पत्ते पर गिरी है। पत्ते से छिटक कर उस की नग्न देह पर। कठोर वक्ष पर। वक्ष पर गिर कर टूट जाती है , ओस की बूंद । यह नेह में नत प्यार की बूंद है। एक रात के विरह में बौराई मल्लिका अपने भीतर बसी कामना के सारे हिमालय जैसे खंड-खंड कर पिघला देना चाहती है। पिघला कर पानी-पानी होना चाहती है। मल्लिका के भीतर जैसे मेघ बरस रहा है। उमड़-घुमड़ कर बरस रहा है। इस सर्दी में भी वह अपनी देह में कोई समंदर लिए मचल रही है। समंदर की लहरें हरहराती हुई आती हैं और चट्टान से टकरा कर भारी शोर कर रही हैं। जैसे वह कोलंबो हो और वह समंदर। मल्लिका की देह के समंदर का शोर वह साफ़ सुन पा रहा है। वह इस शोर में अपने भीतर के शोर को विगलित कर देना चाहता है। विपश्यना शिविर के परिसर की यह शीत में भीगी सड़क मल्लिका की पीठ में पर्वत का एक नया प्राचीर रच रही है। मल्लिका लेकिन इस से बेख़बर है। बेसुध है किसी शराबी की तरह। नदी की तरह विकल है। इस विकलता में पूरे वेग से बहती हुई , धारा-धारा किनारा तोड़ती हुई विनय के गांव में दाखिल हो जाना चाहती है। सुख की नदी की तरह। पानी-पानी हो कर विनय के गांव से गुज़र जाना चाहती है। फिर-फिर लौट आने के लिए। 

राग मालकौंस में मधुरता का यह देह संवाद मध्यम पर निषाद, धैवत तथा गंधार स्वरों पर पूरे आरोह और अवरोह में सां नि ध नि ध म की यह बंदिश इस रात में जो बेला महका रही है , विनय उस में बेसुध है। मल्लिका के केश बहुत छोटे हैं। विनय की ज़ुल्फ़ों से भी छोटे। नहीं उन में वह समा कर छुप जाता। विकल्प में वह मल्लिका के दोनों विशाल वक्ष की संधि में समा जाता है। लगता है जैसे फूलों के गद्दे पर है वह। मल्लिका की गुलगुली देह में गुझिया सा स्वाद है। बिना किसी संवाद के वह राग मालकौंस जैसे किसी इंस्ट्रूमेंट पर बज रही है। बांसुरी बनी मल्लिका की देह अब जैसे शिथिल हो रही है। जैसे वह अपनी मंज़िल पा गई है। विनय की मंज़िल भी धार पर है। अधरों से जिह्वा तक वह इस देह सागर को धांगते हुए हांफ रहा है। अचानक जैसे बेला महक कर उसे निढाल कर देती है। मल्लिका आज कंबल ओढ़ कर आई है। कंबल इस शीत भरी सर्दी में जैसे सांस बन कर उपस्थित है। जैसे बारिश में छाता। मल्लिका को जाड़ा नहीं लगता। विनय को जाड़ा बहुत लगता है। मल्लिका की आग में वह जाड़ा भूल जाता है। आज देर ज़्यादा हो गई है। पर वह उठना नहीं चाहता मल्लिका की देह के ऊपर से। निर्वसन देह को निर्वासन नहीं देना चाहता। विपश्यना और वासना की यह शानदार युगलबंदी विनय को भा गई है। 

साधु-साधु !

वह जब कमरे पर लौटा तो उसे कोई नहीं मिला। वह सिंगापुरी साधू भी नहीं , जो साधु-साधु कहता। 

विपश्यना और वासना का व्यसन विनय की ज़िंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। आए थे हरि-भजन को, ओटन लगे कपास जैसी बात तो नहीं हो गई है ? यही सोचते-सोचते विनय कब सो गया , पता ही नहीं चला। ध्यान सत्र में जब वह पहुंचा तो मल्लिका अपनी जगह पर उपस्थित नहीं मिली। पर बाद में कब आई पता नहीं चला। क्यों कि वह तो ध्यानमग्न था। सुबह वह जब नाश्ते पर है तो कुछ लोग उसे ख़ास नज़र से घूर रहे मिलते हैं। उसे रहीम याद आ गए हैं। खैर, ख़ून, खांसी , खुसी , बैर , प्रीति , मदपान / रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान। रहीम का यह दोहा याद करते ही वह भयभीत हो जाता है। जल्दी-जल्दी नाश्ता कर कमरे में आ जाता है। सोचता है कि कहीं किसी ने कुछ देख तो नहीं लिया। किसी ने कोई वीडियो तो नहीं बना लिया ? क्या पता। उस रशियन स्त्री का क्या , वह तो अपने देश चली जाएगी। भारत में तो उसी को लोग देखेंगे। उस की सामाजिक ज़िंदगी में बट्टा लग जाएगा। घर , परिवार और समाज में कहीं मुंह दिखाने लायक़ नहीं रहेगा। आजकल ऐसे वीडियो और फ़ोटो वायरल होते क्षण भर भी नहीं लगता। फिर जल्दी ही वीडियो का भय ख़त्म हो जाता है। क्यों कि मोबाइल तो हर किसी का जमा करवा लिया गया है। तो कोई वीडियो कैसे बना सकता है भला। वह अचानक अपनी मूर्खता पर मुस्कुरा पड़ता है। वह ध्यान कक्ष में पहुंचा तो उस की नज़र उस दिन विलाप करने वाली स्त्री पर पड़ गई। अपनी साथी स्त्रियों के साथ स्वस्थ दिख रही थी। उसे यह देख कर अच्छा लगा। लंदन वाला लड़का भी उसे देखते ही स्माइल मारने लगा। मल्लिका भी दिखी। पर मल्लिका ने उसे नहीं देखा। आज सुबह सर्दी बढ़ गई थी। सब लोग ख़ूब ओढ़-पहन कर आए थे। पर वह आदतन स्लीवलेस थी। एक बिहारी ने तो मफलर इतनी कस कर बांध रखी थी कि बस नाक सांस ले सके और आंख देख सके। कार्यकर्ता ने आ कर उस का मफलर खुलवा दिया है। ध्यान की कक्षा शुरू हो गई है। आडियो पर निर्देश शुरू हो गया है। हिंदी और अंगरेजी में। वह डूब गया है ध्यान में। पेट और पेट के नीचे तृप्ति रहे तो सब कुछ अच्छा लगता है। हर काम में मन लगता है। भूखे भजन नहीं होय गोपाला , ले तेरी कंठी ले तेरी माला ! वैसे ही तो नहीं कहा जाता। 

ध्यान की धरती पर वह उनमुक्त और तृप्त हो कर उपस्थित है। कहा जाता है कि बच्चा अर्थ पहले समझता है , शब्द बाद में। तो विनय के साथ भी यही हो रहा है। ध्यान पहले समझ आया उसे। ध्यान समझने के बाद ध्यान का आनंद अब समझ आ रहा है। अलौकिक आनंद। तो क्या अगर इस विपश्यना शिविर में उसे वासना का आनंद न मिला होता तो वह इस परिपूर्णता में नहीं ध्यान नहीं कर पाता। वंचित रह जाता। क्या पता। आज वह गहरे जल में नहीं , ध्यान के आकाश में उड़ रहा है। किसी पक्षी की तरह नील गगन में। जल का अपना आनंद है। आकाश का अपना आनंद है। तुलना करना ठीक नहीं। अलौकिक दोनों ही हैं। अलौकिक आनंद। कभी सुबह-सुबह उठ कर आकाश देखना भी विस्मृत कर देता है। जैसे झील के जल में ख़ुद को देखना होता है वैसे ही आकाश देख कर आकाश में उड़ना होता है। जैसे नयन , वैसे गगन। पंछी की तरह गगन में खो जाना भी एक सुख है। अविरल सुख। आज के ध्यान में वह गगन में पंछी की तरह ही उड़ता जा रहा है। खोता जा रहा है। उड़ान बढ़ती ही जा रही है। जैसे धरती की कक्षा से निकल कर वह आकाश की कक्षा में पहुंच जाना चाहता है। 

तो क्या वह कोई यान बन गया है ? यान बन गया है कि कोई उपग्रह ?

क्या पता !

ध्यान भी यान ही है। आकाश में यान ही उड़ता है। ध्यान में मन। मन का उड़ना भी तो ध्यान है। सांस का आना-जाना , सांस का स्पर्श क्या है आख़िर। जब वह गहरे जल में डूबता है तो क्या पनडुब्बी बन जाता है। लगता तो ऐसे ही है। अच्छा जो उपग्रह बन गया तो क्या फिर कभी धरती पर लौट सकेगा। वह सोचता रहता है। सोचता रहता है और नींद की नाव मिल जाती है। वह अपने टीनएज दिनों में लौट जाता है। मां अकसर टोकती रहती थी , झिझोड़ कर पूछती , ' कितना सोओगे बेटा ! ' वह मां की बात काटते हुए कहता था , ' सो नहीं रहा , सोच रहा हूं। ' यह उस के साथ अकसर ही होता रहता है कि जब वह बहुत सोचता है तो सो जाता है। सोता रहता है। सोचता रहता है। सोचना और सोना दोनों गुत्थमगुत्था रहते हैं। एक दूसरे के पूरक। सोना जैसे सोचने की खाद है। पानी है। सोने से स्फूर्ति मिलती है। ताज़गी मिलती है। नाक बज रही है। कार्यकर्ता आ कर झिझोड़ रहा है। यह आए दिन का दृश्य है विनय के लिए। घटना भी कह सकते हैं। दुर्घटना भी। हर सत्र में यह नींद की नाव उसे मिल ही जाती है। कभी पिता कहते थे , ' कितना सोते हो ! ' पिता को वह कभी जवाब नहीं देता था। मां से तो बता देता था कि सो नहीं रहा , सोच रहा हूं। वह जब सुबह भी देर तक सोने लगा तो एक बार पिता ने उसे समझाते हुए कहा , ' सुबह उठ कर देखो , स्वर्ग जैसा एहसास होगा। ' ऐसा जब कई बार कहा पिता ने तो एक दिन विनय ने पिता से कहा , ' कभी आप सुबह देर तक सो कर देखिए , स्वर्ग से भी ज़्यादा आनंद मिलेगा इस में। ' पिता भड़क गए थे। बुआ से कहने लगे , ' बहुत बेशर्म हो गया है ! '

बेशर्म ही हो गया है विनय इस विपश्यना शिविर में भी। चौतरफा बेशर्मी। नींद के कारण ध्यान कक्ष में रोज ही देर से आना। फिर ध्यान में भी जब-तब नाक का बजना। ऊंघते-ऊंघते बैठे-बैठे गिर पड़ना। रुटीन है यह। फिर स्त्रियों को जब-तब नज़र बचा कर देखना। उन की मांसलता को निहारना। तिस पर वासना में संलग्न हो जाना। यह तो बहुत बड़ी बेशर्मी है। जिस शिविर में बोलना मना हो। संकेतों में भी कुछ कहना मना हो। वहां यह वासना। विपश्यना में वासना। हद दर्जे की बेशर्मी है यह। अगर कोई देख ले तो विपश्यना शिविर से बाहर का रास्ता तुरंत दिखा दिया जाएगा। यह भारी अनुशासनहीनता है। पर क्या करे विनय। वासना विषय ही ऐसा है। आग का दरिया है ही। सारे ख़तरे खेल कर ही यह खेल खेला जा सकता है। ताज़ , तख़्त सब बेमानी है इस के आगे। एक भदेस कहावत उसे याद आ जाती है ; ताज़ चाहिए , न तख़्त....! 

जब कोई उस की नींद तोड़ता है तो बहुत बुरा लगता है। दुश्मन नज़र आता है , नींद तोड़ने वाला। सारी दुनिया एक तरफ , नींद एक तरफ। पर यहां इस विपश्यना में नींद की नाव बहुत सुहानी लगती है। बारह-बारह घंटे की साधना में नींद ही तो एक है जो सारी थकान और ऊब को बिजली के झटके जैसी गति से दूर कर देती है। तरोताज़ा बना देती है। वह दो की ही सुन पाता है। एक दिल की , दूसरे नींद की। एक नींद ही है जो तमाम तनाव और मुश्किलों से ब्रेक दिला देती है। ध्यान को और घना , और माकूल बना देती है। ऐसे जैसे एयरकंडीशन , कंडीशन कर देता है। उस के मन की हरियाली और हरी-भरी हो जाती है। संभोग और नींद दोनों ही आदमी को तरोताज़ा बना देने वाले कारक हैं। दोनों ही में खलल , दिमाग में खलल डालता है। 

ध्यान की उड़ान में वह जाने क्या-क्या सोचता चला जाता है। तो क्या पंछी भी उड़ते हुए कुछ सोचते हैं। वह नहीं जानता। पर उस ने अकसर कई जगह देखा है कि सारे पक्षी हर शाम इकट्ठे हो जाते हैं। झुंड के झुंड। बिजली के किसी लंबे तार पर। रेलवे स्टेशन के किसी प्लेटफ़ार्म की छत पर। किसी विशाल वृक्ष पर। सैकड़ों की संख्या में। रोज लगभग एक ही समय। ऐसे जैसे उन की संसद लगती हो। एक दूसरे से इधर-उधर फुदक-फुदक कर बतियाते हैं। फिर कोई दस-बीस मिनट में फुर्र हो जाते हैं। दिन भर की थकान उतारते हुए , एक दूसरे का हालचाल ले कर अलग-अलग दिशाओं में थोड़े-थोड़े कर उड़ते जाते हैं। ऐसे ही शहर में कुछ मूक-बधिर लोगों को भी किसी न किसी अड्डे पर इकट्ठे होते देखा है। आते हैं। इशारों में बतियाते हैं। हंसते हैं। लड़ते-झगड़ते हैं। फिर धीरे-धीरे निकल लेते हैं। तो क्या इस विपश्यना शिविर में इकट्ठा हुए लोग , ध्यान करते हुए लोग पंछी हैं। कि मूक बधिर हैं। पर यहां तो बोलना-बतियाना सब मना है। संकेतों में भी बतियाना मना है। तो फिर यह सारे साधक क्या हैं। और इस विपश्यना शिविर में जो घंटा बजता है , कभी स्कूल के घंटे की याद दिलाता है तो कभी जेल के घंटे की याद। स्कूल में क्लास और विषय की बात घंटे से समझ में आती है। जेल में उठने , सोने , खाने का घंटा बजता है। तो क्या यह एक क़िस्म की जेल है ? ऐसी जेल जिस में बतियाना , मिलना आदि भी निषेध है। ऐसे गोया सिगरेट के डब्बे और शराब की बोतल पर इंज्यूरियस फॉर हेल्थ लिखा होता है। सिगरेट और शराब फिर भी लोग पीते हैं। 

और यहां ? 

इतनी बंदिश में ध्यान। बंदिश में ध्यान कैसे हो सकता है। लेकिन हो तो रहा है। विनय जैसे ख़ुद से ही सवाल-जवाब करता है। चुप की इस राजधानी में तर्क नहीं , निर्देश लागू होते हैं। सेना की तरह का अनुशासन लागू होता है। नो तर्क , नो वितर्क। वनली आर्डर। मन कई बार बाग़ी हो जाना चाहता है। सच बोलना अगर बग़ावत है तो हां , हम भी बाग़ी हैं ! कहना चाहता है। लेकिन कहां और किस से कहे विनय। यहां कोई सुनने वाला नहीं है। कोई कहने वाला भी नहीं है। सवाल करने पर विपश्यना शिविर से बाहर कर दिए जाने का ख़तरा मंडराता रहता है। ऐसा लिखित अनुबंध पत्र पर दस्तख़त करवाया जा चुका है। फिर ध्यान में जो सुख मिल रहा है , जो तनाव तंबू टूट रहा है , पल-पल टूट रहा है , यह लाभ भी कोई छोड़े तो कैसे भला। एक डाक्टर का लड़का है। बीस-बाइस बरस का। वह भी विपश्यना करने आया है। नशे की सारी सरहद तोड़ कर ज़िंदगी बर्बाद कर सुधरने आया है। डाक्टर सारे इलाज कर के हार गए तो उम्मीद की आख़िरी किरण उन्हें विपश्यना की सीढ़ियों पर दिखी। शराब , ड्रग , मसाला स्मैक , हेरोइन आदि कुछ भी इस लड़के ने नहीं छोड़ा है। अब विपश्यना शिविर में वह यह सब छोड़ना सीख रहा है। दूसरी बार आया है। पहली बार में आंशिक सफलता मिली थी। इस बार सफलता का ग्राफ कुछ और बढ़ने की उम्मीद ले कर डाक्टर ने बेटे को यहां भेजा है। ख़ूब सुंदर सा। चॉकलेटी चेहरे वाले इस लड़के को देख कर नहीं लगता कि इतना बड़ा नशेड़ी रहा होगा। बस यहां ऐसे ही लोग अपनी-अपनी व्याधियों से मुक्ति पाने आए हैं। तनाव मुक्त होने आए हैं। जाने कितना हो रहे हैं , लोग ही जानें। कितनों के कितने घाव हैं , कोई नहीं जानता। विपश्यना का ध्यान कितनों के घाव सुखा रहा है , कोई नहीं जानता। विनय भी नहीं जानता। 

विनय यह ज़रुर जानता है कि इस विपश्यना शिविर में आ कर वह दो नशे की गिरफ़्त में आ गया है। एक ध्यान का नशा। दूसरे मल्लिका का नशा। नशा किसी भी चीज़ का हो बुरा ही होता है , विनय यह बात भी जानता है। फिलहाल तो वह ध्यान में है और गगन को गा रहा है। बंद नयन से नील गगन का गान। गगन में मगन विनय का ध्यान अचानक साधु-साधु ! की आवाज़ से टूटता है। ध्यान सत्र समाप्त हो गया है। 

बाहर हल्की धूप है। मन में ढेर सारी ठंड। 

इस शिविर में कुछ और स्त्रियां भी हैं। ऐसे जैसे वह अपनी स्त्री को , अपनी देह को ढो रही हों। पता नहीं क्यों ?

असल में कुछ स्त्रियां अपने संध्याकाल में देह के बिना भी प्रेम की परिकल्पना करती हैं। बल्कि अपने इस अमूर्त प्रेम की पैरवी भी करती मिलती हैं। तो क्या यह स्त्रियां मीरा बनने की चाह रखती हैं। लेकिन मीरा तो बचपन से ही कृष्ण जानती है। साक्षात नहीं , मूर्ति जानती है। प्रेम का यह आध्यात्मिक पक्ष है। अलौकिक है यह प्रेम। अगाध है यह। इसी लिए रजनीश कहते थे कि मीरा तो एक शराब है। विनय का मानना है कि प्रेम भी एक शराब है। एक नशा है। शाश्वत है। लेकिन देह के बिना प्रेम की परिकल्पना करना प्रेम का पलायन काल है। अपने आप से झूठ बोलना है । जिस को शौक हो बोले। सच यह है कि प्रेम पलायन नहीं जीना सिखाता है। देह भी इस में महत्वपूर्ण फैक्टर है । देह को बिसरा रही स्त्रियों की बात और है। पर देह के बिना प्रेम सोचना अपने आप में प्रेम को खंडित करना है। बिना देह के प्रेम मुकम्मल नहीं होता। भोजन कैसा भी हो , कितना भी स्वादिष्ट हो , देख कर पेट नहीं भरता। देह सामने हो , प्रेम भी हो , आप फिर भी अमूर्त की कल्पना करें तो आप से बड़ा अभागा कोई नहीं है। बाकी तुम्हीं हो माता , पिता तुम्हीं हो , तुम्हीं हो बंधु . सखा तुम्हीं हो ! हाथ जोड़ कर गाते रहने में भी कोई बुराई नहीं है। प्रेम इस में भी है । कोई भी गा सकता है। मनाही थोड़े ही है। अपनी-अपनी खुमारी है।

वह कंबल ओढ़े कमरे में पड़ा हुआ है। जी उचट गया है। सुबह नाश्ते में लोगों का घूरना उसे भीतर तक बेध गया है। जैसे जाड़ा बेध रहा है। भय और ज़्यादा बेध रहा है। कलंक से वह बहुत डरता है। तो क्या अब वह मल्लिका से नहीं मिलेगा ? पूछता है विनय , अपने आप ही से। जवाब नहीं दे पाता। कोई जवाब हो भी कैसे सकता है। ऐसी बातों का कोई जवाब नहीं होता। घंटा बज गया है। वह बिना कोई देर किए बिस्तर छोड़ कर ध्यान कक्ष की तरफ चल पड़ा है। रास्ते में उसे घंटी बजा कर जगाने वाला कार्यकर्ता दिख गया है। वह विनय को देख कर अचरज में पड़ कर मुस्कुराने लगा है। वह भी सहज ही मुस्कुरा देता है। ध्यान कक्ष में मल्लिका भी आती दिख जाती है। उसे देखते ही वह ठहर सा जाता है। ठिठक कर खड़ा हो जाता है। वह अनायास उस के पास से गुज़रती है। ठहर कर उसे चुटकी काट कर किसी गौरैया की तरह फुदकती हुई चली जाती है। पीछे-पीछे वह भी उस के नितंबों को निहारता हुआ चल देता है। उस के नितंब में एक अजीब सी हलचल दिखती है उसे। उथलपुथल सी। जैसे उस के भीतर। आज वह लाल टोपी भी लगाए हुई है। सर पे लाल टोपी रुसी गाने की याद आ जाती है विनय को। वह गाने में वर्णित किसी बिगड़े दिल शहजादे की तरह अपने आसन पर बैठ जाता है। आडियो अभी नहीं बजा है। आचार्य भी अभी नहीं आए हैं। इसी से पता चलता है कि आज वह अच्छे बच्चों की तरह समय से ध्यान कक्ष में आ गया है। वह किसी की तरफ देखना नहीं चाहता। वह नहीं चाहता कि कोई उसे घूर कर देखे। उस के नयन बंद हो गए हैं। आना-पान की सीढ़ियों पर है वह। सुख के सागर की अनुभूति हो रही है उसे। आडियो शुरु हो गया है। निर्देश मिलने लगे हैं। वह गगन की ओर अग्रसर है। पंछी बना हुआ वह ध्यान के शिखर को महसूस कर रहा है। अचानक जाने कैसे वह जल में आ गया है। ऐसे जैसे यान हवाई पट्टी पर उतर गया हो। उतर कर दौड़ रहा हो। बेतहाशा। 

यह क्या है ? कौन सी यात्रा है यह। 

वह समझ नहीं पाता। समझने की कोशिश भी नहीं करता। ध्यान है। चाहे जहां , जैसे भी ले जाए। जिस दिशा भी ले जाए। उस ने अपने आप को मुक्त छोड़ दिया है। जैसे डेंटिस्ट कहता है , मुंह ढीला छोड़ दीजिए। इंजेक्शन लगाने वाला कंपाउंडर कहता है , हाथ ढीला छोड़ दीजिए। उस ने उसी तरह ख़ुद को उनमुक्त छोड़ दिया है। अड़ना छोड़ दिया है। बरास्ता सांस। जैसे रात में ख़ुद को मल्लिका के हवाले कर बैठा था। तो क्या वह बिना पतवार की नाव है। जो चाहे , जैसे चाहे , जहां चाहे बहा ले जाए। कभी सांस , कभी नींद , कभी मल्लिका। ऐसे जैसे उस का कोई अस्तित्व ही नहीं है। वह सोचता है। सोचता है कि यह अस्तित्व ही तो उसे नष्ट कर देना है। मक़सद तो यही है इस विपश्यना का। आख़िर अस्तित्व रहेगा तो वह तटस्थ कैसे रहेगा। कैसे हो पाएगा तटस्थ। यही तो उसे सीखना है। गोरखनाथ कहते ही हैं , मरो वै जोगी मरौ , मरण है मीठा / मरणी मरौ जिस मरणी , गोरख मरि दीठा। गोरख अहंकार को मारने की बात कहते हैं। अहंकार मर जाएगा तो आदमी ख़ुद ब ख़ुद तटस्थ हो जाएगा। अस्तित्वहीन , अहंकार रहित व्यक्ति ही ख़ुद से , दुनिया से तटस्थ हो सकता है। दुःख-सुख सब से मुक्त हो सकता है। हमारा-तुम्हारा जब रहेगा ही नहीं तो दुःख कैसा और सुख कैसा ! सुख की इस उजास में ख़ुद को पा कर विनय विनयवत हो गया है। 

घंटा बज गया है। लंच का। विनय आसन छोड़ कर उठ रहा है। उठते हुए सोच रहा है कि कैसे लोगों का सामना करेगा डाइनिंग हाल में। फिर सोचता है कि क्या पता लोग घूर रहे हैं , यह उस के मन का कोई भ्रम हो। क्यों कि अगर किसी ने कुछ जाना था तो वह शिकायत कर सकता था। आचार्य या शिविर प्रबंधन बुला कर उस से पूछताछ कर सकते थे। जो नहीं किया गया है अभी तक। इस का मतलब है कि कहीं कुछ भी नहीं है। जो भी है , उस का भ्रम है। उस के मन में बैठा अपराध है। पाप है। यह सोचते ही वह मुस्कुरा पड़ता है। निर्द्वंद्व हो जाता है। डाइनिंग हाल में वह सीना तान कर बैठा भोजन कर रहा है। इन को , उन को घूर रहा है। ऐसे जैसे उल्टा चोर , कोतवाल को डांटे। उसे कोई नहीं घूर रहा है। तो क्या चोर की दाढ़ी में तिनका था वह सुबह का लोगों का घूरना। यह दृश्य देख कर वह निरापद हो जाता है। उस के मन में बैठा डर भाग जाता है। भोजन के बाद वह कमरे में आ कर सो जाता है। बेफिक्र। 

ध्यान और नींद। नींद और ध्यान। नींद में ध्यान। ध्यान में नींद। ऐसे जैसे सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है / नारी ही कि सारी है कि सारी ही कि नारी है। वाली भूषण की उक्ति दुहरा रही हो ख़ुद को। तो क्या वह द्रौपदी की तरह चीर हरण में घिर गया है। फिर यह मल्लिका कौन है। कौन कृष्ण है जो उस की लाज बचा रहा है। कहीं द्रौपदी का कर्ज़ तो नहीं उतार रहा कोई कृष्ण। कितने लोग जानते हैं कि एक बार कृष्ण कुंड में  पांडवों के साथ नहा रहे थे तो उन की लंगोटी खुल कर गुम हो गई। बगल के कुंड में द्रौपदी सखियों के साथ नहा रही हैं। द्रौपदी को जब यह पता चलता है तो वह अपनी साड़ी को फाड़ कर उस की एक चीर कृष्ण की तरफ फेंक देती हैं। कृतज्ञ कृष्ण वही कर्ज़ उतारते हैं , भरी सभा में द्रौपदी की लाज बचा कर। ध्यान , नींद , मल्लिका का अजब त्रिकोण रच गया है विनय का इस विपश्यना शिविर में। विपश्यना में वासना की यह युगलबंदी विनय को किस ठौर ले जाएगी , विनय भी नहीं जानता। वह तो बस जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये / विधि का विधान जान हानि लाभ सहिए। में यक़ीन करता आया है। फिर यहां तो वह बुद्धम शरणं गच्छामि धम्मम शरणं गच्छामि संघम शरणं गच्छामि मंत्र में निबद्ध है। और बुद्ध कहते ही हैं , कुछ भी स्थाई नहीं है। सब बदल जाएगा। सब गुज़र जाएगा। उस ने बुद्ध की इस बात को स्वीकार कर रखा है। 

तो क्या मल्लिका भी गुज़र जाएगी ?

मल्लिका नाम ही अस्थाई है। जो उस ने अपनी सुविधा के तौर पर गढ़ रखा है। जाने उस का असल नाम क्या है। उस का असल नाम वह कभी जान भी पाएगा , नहीं जानता। किसी अनाम स्त्री से , रुसी स्त्री से बिना किसी संवाद के वह इतना जुड़ जाएगा , इतना प्रगाढ़ संबंध बना लेगा , वह भला कहां जानता था। उन दोनों के अलावा कोई तीसरा भी नहीं जानता। न जाने तो ही बेहतर। अभी ध्यान के दो सत्र और प्रवचन का एक सत्र शेष है। पर वह रात में मोगरे की महक की प्रतीक्षा में विकल है। प्रतीक्षारत है। आया है ध्यान करने। विपश्यना करने। और वासना में डूब गया है। जैसे वासना ही ध्यान है। ध्यान ही वासना है। बैरागी बनने आया था , मल्लिका के चक्कर में रांझा बन गया है। 

साधु-साधु !

यह मल्लिका है कि मेनका ? जो भी हो विनय विश्वामित्र नहीं है। मेनका का तलबगार ज़रुर है। तो क्या मल्लिका रुपी मेनका भी किसी विश्वामित्र की तपस्या तोड़ने में न्यस्त है। पर विनय तो तपस्वी भी नहीं है। किसी तपस्या में भी लीन नहीं है। तो तपस्या भी कोई क्या तोड़ेगा। यह तो एक संयोग है। एक खिंचाव और प्रारब्ध है। प्रेम है। ऐसे जैसे कोई फूल खिले। यह फूल खिलना ही चाहत बन गया। भूख और प्यास बन गई। फूल खिलने में प्रकृति का हाथ होता है। तो मल्लिका और विनय की अनायास प्रगाढ़ता भी प्रकृति की ही देन है। यह संबंध सायास नहीं , अनायास हो गया है। मल्लिका अगर मोगरे की तरह महकती मिलती है विनय से तो विनय भी मल्लिका के प्रेम के आगे विनयवत बिछ जाता है। चार-पांच दिन और कुल दो ही रात का यह संबंध इतना सुगंधित , इतना सुवासित , इतना सुरभित बन जाएगा विनय भी कहां जानता था। 

तो क्या मल्लिका जानती है ?

ध्यान के सत्र में मल्लिका जब स्लीवलेस मिलती है तो उस की कोंपलों सी नर्म बाहों में जाने कितने फूल खिल जाते हैं। प्रवचन के सत्र में वह नहीं मिलती। वह अंगरेजी वाले प्रवचन कक्ष में होती है और विनय हिंदी वाले प्रवचन कक्ष में। इस प्रवचन सत्र में वह मल्लिका के बारे में बिलकुल नहीं सोचता। आचार्य सत्यनारायण गोयनका का प्रवचन इतना दिलचस्प और कसा हुआ होता है , कि कुछ और सोचने का अवकाश ही नहीं देता। मल्लिका को भी वह भूल जाता है। प्रवचन के थोड़ी देर बाद ही तमाम थकान के बावजूद विनय थोड़ी देर टहलता है। इस टहलने में ही मल्लिका उसे मिलती है। नाश्ते और लंच में फ्लर्ट के बाद , ध्यान कक्ष में चिकोटी के बाद वह टहलने में मिलती है। अचानक मिलती है। दो जुड़वा होठों में आग है , सांसों में राग। बेतहाशा चूमती है और इस सर्द रात में निर्वसन हो जाती है। बिना किसी नखरे के। असंभव भी संभव बन जाता है। संभोग के आवेग में वह बह जाता है। आज फिर वही रात है और वही मल्लिका। उस की बांहों में मल्लिका कसमसा रही है और रात भी। सर्द रात में यह सनसनी विनय के लिए आमोद का अंग बनी हुई है। वासना की लहरों का मेला लगा हुआ है। वह आकाश बन कर विनय पर छा रही है। छाती जा रही है। ऐसे जैसे आसमान , धरती पर झुका जा रहा हो। विनय धरती बना , मल्लिका के आकाश में खो रहा है। आकाश ने जैसे धरती को ढक लिया है। मल्लिका उसे चूम रही है किसी पुरुष की तरह। चूमते-चूमते उस के अधर बेक़ाबू हो जाते हैं। उस की जिह्वा लपलपाने लगती है। वह चूम रही है। विनय की देह पर मल्लिका के अधर और जिह्वा इधर-उधर घूम रहे हैं। जैसे लांग ड्राइव पर हों। जैसे कोई भंवरा , कोई पुष्प से पराग कण चूस रहा हो। मल्लिका ऐसे ही पराग कण चूस रही है। जाने कौन सा शहद बटोर रही है। 

विनय आनंद में है। निर्मल आनंद। 

मल्लिका अचानक मिट्टी बन गई है। विनय को कुम्हार का चाक बना लिया है। जैसे कोई मिट्टी का बर्तन बना रही हो। वह चाक पर आहिस्ता-आहिस्ता घूम रही है। जाने घड़ा बना रही है कि सुराही या कुछ और। वही जाने। वह चाक पर निरंतर नाच रही है। घूम रही है। गोल-गोल। आहिस्ता-आहिस्ता। आहिस्ता-आहिस्ता रफ़्तार बढ़ा रही है। गोया ट्रैफिक में हो। दो नंबर के गेयर पर आहिस्ता-आहिस्ता। कार चल रही हो। रुक-रुक कर। क्लच ले-ले कर। गेयर बदल-बदल कर। कभी एक नंबर , कभी दो , कभी तीन। फिर अचानक दो। लगता है ट्रैफिक जाम ख़त्म हो गया है। वह टॉप गेयर में आ कर स्पीड बढ़ा चुकी है। स्पीड इतनी है कि कुम्हार की चाक पर बन रहा घड़ा , घोड़ा बन गया है। वह हांफ रही है। हांफ रही है कि झूला झूल रही है। गोया घोड़े पर बैठी हो और घोड़ा दौड़ रहा हो। वह सारी धरती नाप लेना चाहती है। किसी उद्दंड घुड़सवार की तरह वह बेपरवाह हो गई है। अस्त-व्यस्त हो कर वह निढाल हो कर जैसे घोड़े की गर्दन पकड़ कर लेट गई है। धरती और आकाश की दूरी समाप्त हो गई है। सफल संभोग की ख़ुशी मल्लिका की देह की पोर-पोर से छलक रही थी। विनय सराबोर है। उस की इस ख़ुशी से। अपनी तृप्ति से तरबतर। 

और तो कोई नहीं पर चांद जैसे दूर से दोनों को निहार रहा था। शीत में सनी यह चांदनी जैसे मल्लिका के चंदन से बदन को स्पर्श कर रही थी। विनय इस देह चूमती चांदनी को देख कर विभोर हो गया। 

सुबह जब घंटा बजा तो वह बिस्तर छोड़ कर तुरंत उठ खड़ा हुआ। नहा-धो कर ध्यान कक्ष पहुंचा तो मुश्किल से पांच-सात साधक ही उपस्थित थे। सब के सब उसे देख कर मुस्कुराने लगे। कि रोज सब से देर में आने वाला , इतनी जल्दी कैसे आ गया। विनय तो मल्लिका के दीदार ख़ातिर भागा-भागा आया था। नींद को तिलांजलि दे कर। आलस को लात मार कर। पर सब विफल हो गया। पर मायूस नहीं हुआ विनय। दरवाज़े की तरफ नयन लगा कर बैठ गया। जैसे मल्लिका के स्वागत ख़ातिर पलक-पांवड़े बिछा कर बैठ गया। मन की अलगनी पर बैठी प्रतीक्षा मल्लिका की मनुहार में तैनात हो गई। जाने कौन सा परफ्यूम लगाती थी मल्लिका कि दरवाज़े पर आने से पहले ही आहट मिल गई। वह भीतर आई और विनय को पहले से ही बैठे देख कर चौंक गई। आंखों ही आंखों में विनय ने उस का स्वागत किया। वह जाने क्यों उस के पास तक आई और बड़ी तेज़ी से मुड़ कर अपने आसन पर बैठ गई। यह सब कुछ इतनी तेज़ी से घटा कि कोई कुछ समझ ही नहीं पाया। आज उस की कोंपलों सी नर्म बाहें स्लीवलेस नहीं थीं। बंद थीं। कुहनी तक। बालों पर स्कार्फ़ था। तो क्या रात उसे ठंड लग गई ? यह सोच कर वह किंचित चिंतित हुआ। तब तक आचार्य आ गए। आचार्य भी विनय को बैठे देख कर चकित हुए। ख़ास ढंग से आंखें फैला  कर अपना आश्चर्य जाहिर किया और संतोष भी जताया। कि एक बिगड़ैल विद्यार्थी सुधर गया। ऐसा ही कुछ भाव था। आचार्य नहीं जानते कि विनय तो परीक्षा कक्ष में भी देर से पहुंचता रहा है। आफ़िस भी रोज देर से ही पहुंचता है। वह गाना है न , मैं देर करता नहीं , देर हो जाती है। तो कोई भी आलसी हो , उसे देर तो होनी ही है। हर जगह होनी है। फिर विनय की तो अकसर ट्रेन और फ्लाइट भी इसी देर में छूट जाती है। अकसर छूट जाती है। पर आचार्य और लोग यह सब क्या जानें। क्या जानें कि आलस का सौंदर्य ऐसे ही होता है। और चौंक पड़ते हैं लोग विनय के देर से आने या जल्दी आने पर। आंख फैल जाती है लोगों की। व्यर्थ ही यह नियम बना दिया गया है इस विपश्यना शिविर में कि कोई संकेतों में भी बात न करे। आंख तो लोगों की बोलती ही रहती है। अभी जैसे आचार्य की आंख बोली। जैसे जब विनय आया तब उपस्थित लोगों की बोली। मल्लिका की आंख भी बोली। बॉडी लैंग्वेज भी लोगों की बोलती ही रहती है। मल्लिका की ही नहीं और भी स्त्रियों के नयन , वक्ष , नितंब बोलते ही रहते हैं। कुछ स्त्रियों की उदास देह भी दिखती ही है। लगता है जैसे उन स्त्रियों के जीवन में जीवन ही शेष नहीं है। किसी शव की तरह हिलती-डुलती दिखती हैं। सारी हंसी-ख़ुशी उन की स्वाहा हो गई लगती है। ख़ुद तो निर्जीव और मनहूस बनी ही रहती हैं , देखने वालों को , आसपास के लोगों को भी निर्जीव और मनहूस बना देती हैं। उन का भी जीवन छीन लेती हैं , अपनी मनहूसियत से। 

मल्लिका जैसी हंसती-खिलखिलाती स्त्रियां ही पसंद हैं विनय को। जिन की लचकती देह ललचाती है। महकती और महकाती हुई। नित नई सृष्टि रचती हुई। 

गहरे ध्यान में है वह। आज ध्यान में वह न जल में पहुंचा है न , गगन में। हिमालय पहुंचा है। वह हिमालय जहां कभी गया ही नहीं। सिर्फ़ फ़ोटो और सिनेमा में ही देखा है। गया तो वह गगन में भी नहीं कभी। पर जहाज में बहुत गया है। बादलों के पार गया है। बहुत दूर से ही सही गगन को देखा तो है। बादलों के जंगल को देखा है। धरती से भी रोज देखता ही है। गगन के बहाने सूर्य , चंद्रमा और तमाम तारों को देखता है। बादल भी। गगन में बादलों के अंबार एक अलग ही दुनिया रचते हैं। जैसे बादलों का घना जंगल हो। बादलों की ही बस्ती हो। गोया लोग भी बादल ही हों। बादल , बिजली और सागर कभी प्यास नहीं बुझाते। पर हिमालय से पिघल कर बहती हुई आती गंगा तो प्यास बुझाती है। मनुष्य की भी , धरती की भी। अमृत भी माना जाता है गंगा जल को। तो अगर ध्यान में आती-जाती सांसों के बीच हिमालय आ खड़ा हुआ है तो कुछ तो बात है। बात है तो महत्वपूर्ण भी होगी। हिमालय ध्यान में आते ही टाइगर हिल और कंचजंघा का भी ध्यान आ गया। बर्फ़ बहुत पसंद है विनय को। बर्फीली जगहें भी। पर इस ठंड के मौसम में हिमालय का ध्यान उस में और ज़्यादा जाड़ा भर देता है। ऐसे जैसे कोई टायर में ज़्यादा हवा भर दे। वैसे ही। यह हिमालय है या सिर्फ़ बर्फ़। सिर्फ़ बर्फ़ उत्तुंग शिखर तो नहीं हो सकती। यह हिमालय ही है। कहीं ऐसा तो नहीं कि मल्लिका बर्फ़ीली जगह से आती है इस लिए उसे ध्यान में बर्फ़ ही दिखता है। हिमालय और गगन में कितनी तो कम दूरी है। कम से कम फ़ोटो में तो ऐसे ही दिखता है। फिर तो धरती से भी दूर गगन बहुत पास दिखता है। वह इधर-उधर भटकता फिरता है। पर घूम फिर कर फिर हिमालय। जैसे उड़ि जहाज की पंछी, फिरि जहाज पै आवै वाली स्थिति है। 

घर में होता तो पत्नी से पूछता कि इस का क्या मतलब ? पता नहीं क्या है कि हर सपने के प्रतीक का कुछ न कुछ उत्तर पत्नी के पास होता है। कि इस के यह मतलब हैं। सपने में जो स्त्रियां कभी-कभार आ जाती हैं , विनय कभी उन के बारे में कुछ नहीं पूछता। क्यों कि जीवन में उसे शांति पसंद है। और ध्यान में यह हिमालय भी उसे असीम शांति दे रहा है। ध्यान का कुल लक्ष्य ही यही है कि शांति। मन की शांति। जल में , गहरे जल में मिले , नील गगन में मिले , श्वेत धवल हिमालय में मिले , कि लचकती , ललचाती मल्लिका में मिले। मतलब और मक़सद तो बस शांति से है। चिर शांति। सारी साधना , सारा ध्यान बस शांति के लिए है। शांति है तो सुख है। सुख है तो संतुष्टि है। शांति इतनी नीरवता दे गई है कि नींद की नाव पुन: उपस्थित है। स्तब्ध विनय अपनी ही नाक की आवाज़ से हिल जाता है। नींद की नाव जैसे सहसा उलट गई है। धारा के तेज़ बहाव में। ध्यान की धारा में धरती पर आना भी आसान नहीं होता। वह तो डूबा है हिमालय में। हिमालय की धवलता में। हिमालय की बर्फ़ में पिघलती बर्फ़ में ख़ुद को भीगता हुआ , गलता हुआ , डूबता हुआ पा रहा है। कोई बात ऐसी हो गई है आडियो में जिसे वह सुन नहीं सका है ध्यान में डूबा रहने के कारण। पर साधु-साधु ! बोलते हुए कुछ साधक झूम गए हैं। साधकों के स्वर में साधना की सुगंध है। साधना की लहर और लोच है। एक मद्धिम सा संगीत है। 

साधु-साधु !


वह नाश्ते की मेज़ पर है। अकेला। सामने की मेज़ पर मल्लिका है। कटे हुए पपीते की लंबी-लंबी फांक है उस की प्लेट में। पपीता ऐसे अर्थपूर्ण ढंग से उसे दिखाते हुए वह खा रही है गोया विनय को खा रही हो। खा जाना चाहती हो। विनय को मल्लिका की यह अश्लील अदा अच्छी नहीं लगी है। मुंह फेर लिया है , मल्लिका से। आख़िर डाइनिंग हाल भरा पड़ा है लोगों से। एक से एक लोग हैं यहां। ख़ूब पढ़े-लिखे लोग भी , साक्षर भी। एक साइंटिस्ट भी है। कई सारे प्रोफेशनल्स हैं। विभिन्न क्षेत्र के। वह नाश्ता जल्दी से ख़त्म कर अचानक उठ खड़ा हुआ है। कमरे में आ कर तकिया बांह में ले कर लेट गया है। आज वह मल्लिका की उस एक हरकत से इतना खिन्न हुआ है कि उगते हुए सूर्य की लाली देखने के लिए रोज की तरह गोभी वाले खेत के पास चबूतरे पर भी नहीं बैठा। 

विपश्यना में वासना का यह कौन सा संगीत है  ?

वैसे भी मल्लिका क़द में विनय से लंबी है। विनय से तीन- चार इंच ज़्यादा तो होगी ही। कोई छ फ़ीट की तो होगी। ख़ूब गोरी। अपेक्षतया युवा। वासना के व्यसन में ज़्यादा पारंगत। ज़्यादा आक्रामक। उस के वक्ष और नितंब भी पुष्ट हैं। तन्वंगी नहीं है पर थुलथुल भी नहीं है। मांसल बहुत है। उस की मांसलता की मादकता में ही रीझ गया है वह। रांझा बन गया है। विनय के पास बस विनय ही है। विनयवत ही समर्पित है वह। जानता है कि यह संबंध ज़्यादा नहीं चलना। विपश्यना शिविर में सत्र समाप्त , यह संबंध समाप्त। इस संबंध का जितना रोमांच और जितना सुख मिल सके , चुपचाप प्रसाद की तरह ग्रहण कर चुप रहना ही निरापद है। चुप की इस राजधानी में बिना किसी संवाद के , बिना किसी प्रयास के यह अलौकिक सुख मिल जाना सिर्फ़ सुखद संयोग ही है। सो इस में बहुत डिमांडिंग होना , बहुत ज़्यादा शुचिता और सलीक़ा की तलाश करना , ज़रा-ज़रा सी बात पर भड़कना गुड बात तो नहीं ही है। अंतत : अजनबी  बन कर विदा हो जाना है। तिस पर मल्लिका ठहरी परदेसी। परदेसियों से न अंखियां मिलाना वाला गाना वह अरसे से सुनता आया है। सुनता आया है चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं। जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए में भी वह यक़ीन करता ही है। कुल मिला कर यह कि मल्लिका के प्रति वह कृतज्ञ है। पूरी तरह कृतज्ञ। नत है उस से मिले इस सुख के प्रति। मधुर मिलन के इस सुख के प्रति। वह न होती तो इस विपश्यना शिविर में शायद इतना मन नहीं लगा पाता वह। उस के मन में एक उदासी और शुष्कता का भाव आने लगा था। मल्लिका से मिलने के बाद शुष्कता समाप्त हो गई। उदासी फुर्र हो गई। ध्यान का निर्मल आनंद मिलने लगा। ध्यान के प्रति वह ज़्यादा समर्पित हो गया।  इस साधना में विनय नाम के साधक का जीवन सुंदर हो गया। सुंदरतम। ठंडी हवाओं के बीच ऊष्मा का संचार वह कभी कैसे भूल सकेगा। 

घंटा बज रहा है। 

पर वह तकिया बांह में दबोचे हुए पड़ा है। गोया तकिया नहीं , बाहों में मल्लिका हो। 

ध्यान कक्ष में वह यंत्रवत पहुंच गया। बिना किसी की तरफ देखे अपने आसन पर सिट डाऊन हो गया है। मल्लिका को खोजने और देखने की भी तलब भी उसे नहीं लगी है। नयन बंद कर वह मन के किवाड़ भी बंद कर लेता है। उधो, मन न भए दस बीस। सोच कर सिर्फ़ सांस और सांस का स्पर्श। तटस्थ होने का दैनंदिन अभ्यास। बंद नयन की गगरी में जैसे सागर आ गया हो। सुख का सागर। 

वह गहरे जल में है पर जैसे हिमालय की किसी कंदरा में बैठा हुआ। 

ध्यान में मान तो है , जान भी बहुत है। बस इसे साधना ही कठिन है। साधना कठिन ही होती है। चाहे जिस भी किसी की हो। विपश्यना की साधना बहुत कठिन। फिर विपश्यना की साधना में वासना। और कठिन। बहुत दुर्लभ। लगभग असंभव। जैसे उस दिन वह गंवई स्त्री विपश्यना में विलाप कर बैठी थी। वह विलाप भी बहुत बेधक था। बहुत कठिन। विनय ही नहीं , बहुतों का मन द्रवित हो गया था उस स्त्री के उस विलाप में। फिर वह लंदन वाला लड़का। जो बहुत ही आदर के साथ हाथ जोड़ कर उस के सामने जब-तब झुक कर उपस्थित हो जाता है। शिशुवत। जैसे मन को गुदगुदा जाता है। 

क्या यह भी किसी साधना का कोई क़िस्सा है ?

वह विभोर है साधना के इस द्वार पर उपस्थित हो कर। हिमालय सा शिखर , शिखर की अनुभूति में गदगद है। साधना के स्वर का एक साधक आज अचानक साधु-साधु बोलने लगता है। ध्यान अब सरल हो गया है। जिस ध्यान के लिए बैठना मुश्किल लगता था। देह दुखने लगती थी। पीठ अकड़ने लगती थी। आचार्य कहते थे यह विकार है , जो निकल रहा है। पीठ को दीवार से टिकाने नहीं देते थे। कार्यकर्ता आ कर रोक देते थे। अब वह पीठ का अकड़ना , देह का दुखना , दीवार से पीठ लगा कर बैठने की इच्छा कहां चली गई है ? 

हां , बस नींद की नाव अभी भी साथ है। नींद की नाव नहीं छूटी। जाने छूटेगी भी या नहीं। वह खो गया है विपश्यना में। मल्लिका में। मल्लिका , विपश्यना और नींद की नाव यही उस की ज़िंदगी के , साधना के तीन केंद्र बिंदु हैं। दिन भूल गया है। रात में मल्लिका मिलती है यदा-कदा। सो रात नहीं भूलता। लंच , ध्यान और प्रवचन की सारी सरहद लांघ कर रात फिर लौट आई है। टहलने वाली रात। मल्लिका से मिलने वाली रात। वह हरदम की तरह फिर चुपके से आ कर सट कर टहलने लगी है। उस के परफ्यूम की सुगंध उसे बहका रही है। मल्लिका की मांसलता , उस की मादकता में महकता विनय उसे बाहों में भर चुका है। उस की कमर में हाथ डाल कर कुछ टटोलता हुआ सा उस के गले को चूम रहा है। वह चूम रहा है और मल्लिका बेसुध हुई जा रही है। उस पर झुकी जा रही है। जैसे नदी की चंचल धारा उछलती हुई बह रही हो। वैसे ही मल्लिका की देह उछल रही है। क़ाबू से बाहर जाती हुई देह धारा जैसे सारे बांध तोड़ कर विनय के गांव को डुबो लेना चाहती है। ख़तरे के सारे निशान पार करती हुई यह देह धारा बाढ़ के विकराल रुप में उपस्थित है। 

यह कौन सी बाढ़ है ?

यह कौन सा अनुराग है कि विनय खुद को इस बाढ़ के हवाले कर देता है। कोई प्रतिरोध नहीं। वह जानता है पानी , बिजली और आग से कभी लड़ना नहीं चाहिए। फिर यहां तो आग भी है , बिजली भी , पानी भी। किस-किस से कैसे लड़े। और क्यों लड़े। बिजली रौशनी दे रही है। आग शीत से राहत। पानी प्यास बुझा रहा है। थोड़ी देर में बाढ़ का पानी लौट जाता है। धारा नदी के पेट में चली जाती है। पर गांव में बाढ़ के निशान छोड़ जाती है। मिट्टी को और उपजाऊ बना जाती है। बाढ़ का पानी सर्वदा ही लौटते समय मिट्टी में उपजाऊपन के तत्व छोड़ कर जाता है। यह उस के स्वभाव में है। ख़ास कर अगर देह की नदी में बाढ़ आई हो। यह बाढ़ विनाश नहीं , विकास ले कर आती है। आज मल्लिका को जाने की जल्दी नहीं है। वह सारी चिंताएं छोड़ कर एक गहरी आश्वस्ति में है। विनय को अपनी बाहों में भरे ऐसे बेसुध पड़ी है जैसे वह धरती हो , विनय दूब। दूब की प्रकृति ही है कि लाख आंधी-पानी या बाढ़ आए। वह जीवंत बनी रहती है। बड़े-बड़े वृक्ष धराशाई हो जाते हैं। क्यों कि वह अकड़ कर खड़े रहते हैं। उन की अकड़ उन्हें तोड़ देती है। दूब लचीली होती है। ख़तरे को देखते हुए इधर-उधर हो लेती है। झुक लेती है। बच जाती है। तपती धूप में सूखती भी है तो ज़रा सा जल पाते ही फिर हरी हो जाती है। जीवन पा लेती है। हर मौसम दूब सह लेती है। विनय वही दूब है। दूब बन कर , मल्लिका जैसी धरती की बाहों में अंकुआता हुआ। मल्लिका के बड़े-बड़े स्तन में अपना चेहरा ऐसे धंसाए पड़ा हुआ है गोया शुतुरमुर्ग रेत में सिर धंसाए हुए हो। और यह देखिए मल्लिका की बाहों के घेरे मैं बंधा हुआ वह नींद की नाव में सवार हो गया है। 

यह कौन सी आश्वस्ति है ?

नाक बज रही है और मल्लिका उसे झिझोड़ रही है। विनय को एक बार लगता है कि वह ध्यान सत्र में है। लेकिन नयन के पट खुलते ही , नींद की नाव से उतरते ही वह ख़ुद को मल्लिका नाम की नदी में तैरता पाता है। वही नदी जो थोड़ी देर पहले विनय के गांव को अपनी बाढ़ में डुबो कर लौटी है। विनय को इस चांदनी में नदी की यह बांह और बांध लेती है। मल्लिका की दोनों बाहें जैसे नदी का दो किनारा लगती हैं। वह तय नहीं कर पाता कि नदी के इस पार रहे कि नदी के उस पार। चांदनी में नहाती शीत उसे भले नहला रही है पर उस की देह में अभी भी ऊष्मा है। तभी तो आहिस्ता-आहिस्ता वह मल्लिका के स्तन से अपने कपोल हटा कर अधर रख देता है। अधर जैसे मुखर हो कर मल्लिका की अलसाई देह को जगा रहे हैं। वह कुनमुना रही है। विनय उस की बाहों को हटा कर किनारा छोड़ देता है। धीरे-धीरे बीच धार की और अग्रसर है। मल्लिका की गुदाज देह उसे जैसे आमंत्रित कर रही है। अभिमंत्रित कर रही है। उस की देह में वेग है। जैसे हरिद्वार में हरकी पैड़ी पर गंगा की धारा जैसा वेग हो। अपनी मादक देह के मंत्रों से अभिमंत्रित कर रही है। अभिमंत्रित कर विनय की इच्छा को और मज़बूत कर रही है। अलकजाल से रिझा रही है। जाने क्या हुआ है कि वह माऊथ आर्गन के फ़न पर आ गई है। जाने किस धुन में बजाती जा रही है। जल्दी ही भैरवी के ठाठ में है वह। अविकल। विनय की विकलता से ताल मिलाती हुई। विनय मल्लिका की देह पर अब झुक आया है। भैरवी बजे और मालकौन्स न बजे , यह नामुमकिन है। जल्दी ही दोनों मिल कर मालकौन्स की मधुरता में खो गए हैं। ऐसे जैसे युगलबंदी चल रही हो। मल्लिका जैसे उस से उस का सारा रस निचोड़ लेना चाहती है। सब कुछ ही नहीं , बहुत कुछ अतिरिक्त भी पा लेना चाहती है। सारा कुछ उलीच लेना चाहती है। जाने कब की प्यास है , जो अभी और अभी बुझा लेना चाहती है। गोया अनंतकाल की प्यास है। प्यास मिटाती हुई हरहराती नदी की तरह सारे तटबंध तोड़ती हुई बहती जा रही है वह। 

चुप की इस राजधानी में दोनों देह की युगलबंदी राग मालकौन्स में अनुपम है। अनुपम ही है इस देहभाषा की दुनिया। मल्लिका की देह का आरोह-अवरोह भी बिलकुल संगीतमय है। मिठास ऐसी जैसे शिव कुमार शर्मा का संतूर। ऐसे जैसे कोई संगीत निर्देशक देह संगीत की यह अकल्पनीय धुन रच कर अनुपस्थित हो गया हो। अनिर्वचनीय बनाने के लिए। बिना किसी संवाद के। दोनों एक दूसरे की भावना समझ रहे हैं। दैहिक और मानसिक ज़रुरत समझ रहे हैं। पूरी कर रहे हैं। ऐसा सामंजस्य , ऐसा तालमेल कैसे मुमकिन हो गया है , विनय की समझ से परे है। संभोग के उस के विभिन्न आसनों का जाल , मल्लिका की अबोधता में और रंग भर गए हैं। पुरुष हो कर भी विनय कई सारी स्थितियों से , आसन से अनभिज्ञ था पर मल्लिका परिचित। न सिर्फ़ परिचित बल्कि निष्णात। विनय चकित है उस के अनेक प्रयोग और उन के अमल पर। वह समझ गया है कि देह संगीत को मधुर और मधुर बनाने के लिए दोनों तरफ से पूर्ण समर्पण कितना ज़रुरी होता है। तालमेल और सामंजस्य तो ख़ुद-ब-ख़ुद बन जाता है। इफ-बट के बैरियर इस संगीत को कितना कष्टदाई बना देते हैं , वह जानता ही है। पर मल्लिका की डिक्शनरी में कोई बैरियर नहीं है। प्रेमी क्या चाहता है , वह प्रेमी से ज़्यादा जानती है। 

जानती है कि शबनम से प्यास नहीं मिटती। 

सुबह वह ध्यान सत्र में पहले की तरह फिर लेट हो गया है। पहले राग भैरवी का गायन , फिर राग मालकौन्स का गायन , युगलबंदी ने देर रात तक क्या भोर तक जगा दिया। स्वाभाविक थी यह देरी। पर मल्लिका भी तो साथ थी इस गायन में। एक सुर उस का भी था। पंचम में था। पर वह क्यों नहीं लेट हुई ? पूछ रहा है , विनय अपने आप से ही। पर कोई जवाब नहीं है उस के पास। आलस्य के सौंदर्यशास्त्र में वह मुंह छुपा लेता है। यह ज़रुर हुआ कि दिन भर वह ध्यान कम कर पाया , नींद की नाव की सवारी ज़्यादा। फिर जब शाम हुई तो प्रवचन सत्र के बाद आचार्य ने बताया कि सभी साधकों की साधना अब आज पूरी हुई। यह सुनते ही विनय का दिल धक से रह गया। इतनी जल्दी कैसे ख़त्म हो गई साधना। यह तो ठीक नहीं हुआ। जीना आया जब तलक तो ज़िंदगी फिसल गई वाली बात हो गई यह तो। कारवां गुज़र गया , गुबार देखते रहे वाली बात हो गई। अब तो विपश्यना की साधना का स्वर समझ आ रहा था। शुरू के दिन तो समझने और सीखने में खर्च हो गए। अब साधना के दिन आए तो साधना के सत्र ही समाप्त हो गए। यह क्या बात हुई भला। साधना , मल्लिका की साधना में उस ने दिन ही गिनने छोड़ दिए थे। उसे अपने एक आई ए एस मित्र की याद आ गई। वह कहते जब किसी विभाग में ट्रांसफर होता है तो थोड़ा समय लगता है वहां का कामकाज समझने-जानने में। जब कामकाज समझ में आने लगता है , तभी फिर ट्रांसफर हो जाता है। किसी दूसरे विभाग में। काम क्या ख़ाक करेंगे। यहां विनय के साथ भी यही हो गया है। ध्यान जब समझ आ गया तो ख़त्म। विनय को ध्यान ही नहीं , मल्लिका से बिछड़ने का भी मलाल हो रहा है। लेकिन वह क्या करे अब। कर भी क्या सकता है। 

आचार्य बता रहे हैं कि अब इसी समय से सारे निषेध समाप्त हुए। अब आप लोग एक दूसरे से मिल बतिया सकते हैं। परिसर में कहीं भी घूम-फिर सकते हैं। सिर्फ़ महिला निवास में पुरुष नहीं जा सकते और न महिलाएं पुरुषों के निवास में जाएंगी। यह निषेध जारी रहेगा। साधक का जीवन अब बीत गया है। सामान्य जीवन शुरू कर सकते हैं। लेकिन अभी कल तक घर या परिसर से बाहर नहीं जा सकते। अभी आज और कल रात तक इसी परिसर में रहना अनिवार्य है। क्यों कि इतने दिन तक आप लोग इस शिविर में बिना बोले रहे हैं। ध्यान में संलग्न रहे हैं तो आप सभी का मन कोमल हो गया है। अचानक बाहर जाएंगे तो मन पर घाव लग सकता है। विपरीत परिणाम मिल सकता है। कुछ अनिष्ट हो सकता है। इस लिए अभी दो दिन तक इसी परिसर में रहिए। मन मज़बूत होने के बाद फिर परसों सुबह नाश्ते के बाद जब चाहें जहां चाहें जा सकते हैं। विनय आचार्य से कहना चाहता है कि घाव तो अभी लग गया है , मन को। क्या करें ?

पर चुप रहता है। 

अब किसी से कुछ कहने-सुनने का कोई मतलब नहीं है। ज़माने बाद डिनर मिला है आज। भले खिचड़ी ही सही। डाइनिंग हाल में लेकिन मल्लिका अनुपस्थित है। खिचड़ी उसे वैसे भी पसंद नहीं है। चख कर चला आया है। कमरे में वह बेचैन टहल रहा है। यह उस के बाहर टहलने का समय है। लेकिन वह कमरे में टहल रहा है। टहल रहा है कि घुट रहा है। 

यह कौन सी घुटन है ? 

समझ नहीं पाता। बिस्तर पर लेट जाता है। चुप की यह राजधानी अचानक कोलाहल में डूब गई है। अब चुप ग़ायब है। सब को सब के मोबाइल मिल गए हैं। लैपटॉप मिल गए हैं। सारे सामान मिल गए हैं। जैसे सन्नाटा टूट गया है। कोलाहल के किलोल में वह खो गया है। तुमुल कोलाहल के कलह में हृदय की बात गुम हुई जा रही है। सारी तटस्थता का अपहरण हो गया है। अराजकता का जैसे साम्राज्य चहुं ओर छा गया है। नीरव शांति में आग लग गई है। हर कमरे से शोर ही शोर आ रहा है। मन का शोर क्या कम था जो ज़रा सी ढील मिलते ही दबे हुए स्प्रिंग की तरह लोग उछल पड़े हैं। कोई ठठा रहा है। कोई मोबाइल पर बतिया रहा है। कोई मोबाइल पर गाने सुन रहा है। कोई मूवी देख रहा है। शोर है कि शोर का कोलाज। विनय इस शोर में सुन्न हो गया है। बग़ल के कमरे में महाराष्ट्र से आए लोग इकट्ठे हो गए हैं। शोर का जैसे प्रकोप है। वह टोकता भी है। पर कोई सुनने वाला नहीं है। बहुत कहने पर लोग झगड़ा करने पर आमादा हो गए हैं। यह लोग ध्यान में कैसे और क्या सीख रहे थे। विनय के लिए समझना मुश्किल हो गया है। वह रोज की तरह इस रात भी टहलने के लिए निकल गया है। यह जानते हुए भी कि आज मल्लिका से मिलन कठिन है। माहौल ही कुछ ऐसा हो गया है। कि चुप की राजधानी अब शोर की राजधानी में तब्दील है। फिर भी सोचता है कि अगर मल्लिका मिली तो आज उस से बात भी होगी। अभी तक बिन बोले , बिन सुने अर्थ समझता था। खग जाने खग ही की भाषा वाली बात थी जैसे। अब उस के शब्द सुनेगा और समझेगा। खग तो वह अब भी है मल्लिका के लिए। बाहर लोग कम , ठंड ज़्यादा है। इक्का-दुक्का लोग ही दिखे। मल्लिका नहीं। विनय गोभी वाले खेत के पास के चबूतरे पर बैठ गया है। खेत ख़ाली दिखता है। गोभी कट चुकी है। पहले गोभी देखता था तो मल्लिका के गदराए वक्ष याद आ जाते थे। गोभी नहीं है अब। फिर भी मल्लिका का गदराया यौवन याद आ गया है। विनय अचानक उठ खड़ा हुआ है। टहलने लगा है। मफ़लर कस के बांध लिया है। दोनों हाथ जाकेट की ज़ेब में डाल लिए हैं। 

' हे यू ! ' पीछे से धीरे से खुसफुसाती हुई लेकिन मिसरी सी मीठी और खनकती हुई आवाज़ आती है। वह पलट कर देखता है। अरे , यह तो मल्लिका है ! विनय जैसे उछल पड़ता है। वह कूदती हुई सी विनय के गले में झूल जाती है। माथा चूम लेती है। मन में जैसे सैलाब आ जाता है। दोनों एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले टहलने लगे हैं। धीरे-धीरे। पतली सी सड़क उन्हें और पतली लगती है। रात और रास्ते कम लगने लगे हैं। अचानक जैसे हवा तेज़ हो गई है। देह में सिहरन सी उठ गई है। ठंडी हवा भले चल रही हो , मल्लिका के मादक स्पर्श की गर्मी भी साथ है। मल्लिका की एक छुअन उस के भीतर जाने कितनी ऊष्मा भर देती है। इन सर्द रातों में खुले आसमान के नीचे निर्वसन होने के बावजूद किसी दिन ठंड नहीं लगी। ठंड से बीमार नहीं पड़ा। जब कि उसे ठंड बहुत लगती है। साथ ही ठंड अच्छी लगती है। सर्दियों के दिन उस के प्रिय दिन होते हैं। फिर इस समय तो मल्लिका भी उस के साथ है। बिलकुल सटी हुई। मन से मन और तन से तन मिलाती हुई। ऐसे जैसे पानी से पानी। ऐसे जैसे माटी से माटी। जैसे हवा से हवा। जैसे धरती से आकाश। जैसे आग से आग। कहते ही हैं कि जब संग गर्म जवानी हो तो काहे का जाड़ा , काहे का पाला। 

आह ! यह कैसी मादक रात है। 

पूर्णमासी का चांद भी दोनों को निहार रहा है बड़े रश्क से। आंखों-आंखों में मल्लिका से बतियाता हुआ। जाने क्यों वह उस से कुछ कहना नहीं चाहता। बस चुप-चुप बतियाना चाहता है। गो कि बोलने का निषेध इस परिसर में समाप्त हो गया है। बस स्त्री परिसर में जाने का निषेध बना हुआ है। पर वह इस परिसर की सब से सुंदर स्त्री के स्पर्श में है। ऐसे जैसे ध्यान में सांस का स्पर्श। मल्लिका लगातार खुसफुसा रही है। टूटी-फूटी अंगरेजी में। वह कुछ समझ रहा है , ज़्यादा कुछ नहीं समझ पा रहा। फिर भी वह चुप-चुप है। मल्लिका में खोया हुआ। विनय को मुसलसल चुप देख कर वह भी चुप हो जाती है। स्त्री जब आलिंगनबद्ध हो और पुरुष चुप हो तो स्त्री की देह बहुत बोलती है। बोलती ही रहती है। यह स्त्री देह का चुपचाप बोलना भी शांति देता है। ध्यान जैसी शांति। असीम शांति। नीरवता में स्तब्धता की शांति। आप कभी ध्यान से देखें सागर की उछलती , शोर मचाती  लहरों में भी एक अजीब शांति होती है। लहर उछल कर गिरते ही जैसे शांत हो जाती है , वही शांति। मल्लिका की बोलती हुई देह वही शांति रच रही है। उछलती हुई देह। अरमान ऐसे ही तो जागते हैं। जग रहा है आहिस्ता-आहिस्ता विनय भी। विनय की देह भी। चॉकलेट का सा कुरकुरापन और मिठास जाग रही है मल्लिका की देह से। वह अचानक अंगड़ाई लेती है। जैसे मधुबाला लगने लगती है वह इस अंगड़ाई में भी। वह लपक कर उसे चूम लेना चाहता है। पर उस की अंगड़ाई में खलल नहीं डालना चाहता। उधर जैसे पूर्णमासी का चांद भी अंगड़ाई ले रहा है। दिशा बदल रहा है। कि पृथ्वी थोड़ा सा घूम गई है। दिशा बदल गई है। कि मल्लिका की देह की दिशा और दशा बदल गई है। 

क्या पता। 

पर अब और नहीं रहा जाता विनय से। वह दबे पांव टूट पड़ता है मल्लिका पर। मल्लिका की देह पर। उस की आंखें इस औचक घटना से फैल जाती हैं। कुछ बुदबुदाती है वह। पर वह समझ नहीं पाता। कि क्या कह रही है वह। वह फिर चुप हो गई है। विनय की देह भाषा को समझती हुई युगलबंदी के लिए। चली गोरी पी से मिलन को चली वाले भाव में सक्रिय हो जाती है। ज़िंदगी को ख़ूबसूरत बनाने के पथ पर है वह।  जैसे कोई मुहूर्त देख रही हो , वह गर्दन उठा कर ऊपर आकाश को एकबारगी निहारती है। फिर विनय की देह में समा जाती है। सिमट जाती है , बाहों में। एक करंट सा मारती हुई। उस के हाथ जैसे बहुत जल्दी में मालूम पड़ते हैं। विनय लेकिन जल्दी में नहीं है। बिलकुल नहीं है। दीवाना हो गया है वह मल्लिका का। मल्लिका की अदाओं का। उस की अंडरस्टैंडिंग का। वह देह संगीत में माउथ ऑर्गन की बड़ी शौक़ीन है। विनय को भी यह बहुत प्रिय है। इस के संगीत , इस के सुर , स्वर और राग की अवर्णनीय स्थितियां हैं। विनय को यह संगीत सूर्य बना देता है। 

मल्लिका जैसे कोयल की तरह कूक रही है। उस की उत्तेजना का ज्वार बढ़ता ही जा रहा है। सागर की लहरें जैसे उछाल मार रही हैं। चट्टान से टकराने के लिए व्याकुल। विनय मल्लिका की आसक्ति और अभिलाषा को समझ गया है। वह जानता है कि मल्लिका की देह की यह लहरें उसे उठा कर पटक देना चाहती हैं। यहां-वहां छोड़ देना चाहती हैं। फिर भी विनय मल्लिका की देह में उठती सारी लहरों को लूट लेना चाहता है। आत्मसात कर लेना चाहता है। वह चुपचाप मल्लिका की देह को अपने ऊपर उढ़ा लेता है। गोया वह रजाई हो। ठंड से बचने और उस के स्तन से खेलने का भी यही रास्ता है। लहरें लूट लेने की एक तरक़ीब है यह। वह अपने स्तन विनय के मुंह में रख देती है। बांसुरी और सारंगी की तरह बजाने के लिए। विनय के अधर पूरी सरगम में अभ्यस्त हैं। सा रे ग म प ध नि सां सां नि ध प म ग रे सा। वह आज लेकिन मल्लिका की देह को सितार की तरह बजाना चाहता है। सप्तक के स्वरों में। लेकिन मल्लिका आज जैसे कोई रुसी वाद्य बन जाना चाहती है। उसी धुन पर देह संगीत रचना चाहती है। संगीत कैसा भी हो सुरीला हो तो सब समझ में आने लगता है। भाषा की अज्ञानता , बाधा नहीं बनती। बैरियर नहीं बनती। जैसे कि विनय को अंगरेजी नहीं आती। पर माइकल जैक्सन का गाना वह समझता है। बहुत सी लोकभाषाएं वह नहीं जानता। पर लोकसंगीत समझ आ जाता है। मल्लिका का संगीत भी समझ आ जाता है। फिर देह संगीत वैसे भी किसी भी शब्द , किसी भाषा का मुहताज़ नहीं होता। हर किसी को समझ आ जाता है। करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान रसरी आवत जात ते सिल पर परत निशान वाली उक्ति देह संगीत में सब से फिट पड़ती है। सभी जीव इसे अनायास सीख जाते हैं। मनुष्य नए-नए ढंग से पारंगत होता जाता है। अविष्कार की हद तक। 

मल्लिका आज उसी अविष्कार को आज़माना चाहती है। और विनय सितार की तरफ जाना चाहता है। आहिस्ता-आहिस्ता यह देह संगीत फ्यूजन की तरफ बढ़ता जाता है। देह संगीत में फ्यूजन की राह भी बड़ी सुखद होती जाती है। अपनी-अपनी धुन , अपने-अपने प्रयोग। पर गंतव्य तो वही सत्यम , शिवम् , सुंदरम ही है। वही सूर्य , वही धरती। मल्लिका अब जल्दी में नहीं है। लगता है जैसे अपना शिखर पा कर वह नया शिखर पाने की लालसा में है। इसी लिए अब उस ने अपने को पूर्णतया विनय के हवाले कर दिया है। विनय चाहे सितार आजमाए या वीणा , बांसुरी या गिटार। लेकिन वह अब संतूर आज़माता है। मल्लिका इस नए बदलाव से मगन है। मुस्कुरा रही है। सो स्वीट ! उच्चार रही है। विनय अब जैसे साधना में है। गहरे जल में। देह के ध्यान की यह कौन सी विधि है , वह ख़ुद नहीं जानता। पर उसे लगता है वह अनंत की ओर है। अनंत सत्ता की ओर। अनंत सत्ता का अनुभव ही तो ध्यान है। मल्लिका के साथ विनय इसी अनंत सत्ता का अनुभव करते हुए समाधि की ओर अग्रसर है। सत्यम , शिवम् , सुंदरम की प्राप्ति यही तो है !

अचानक मल्लिका विनय को कस कर जकड़ लेती है। दांत भींच कर आंख मूंद लेती है। विनय के साथ उस की युगलबंदी जारी है। सागर की लहरें जैसे ठाठ मार रही हैं। चट्टान से टकरा रही हैं। बहुत विकल है मल्लिका। मल्लिका से ज़्यादा विनय व्याकुल है। 

साधु-साधु ! 

मल्लिका जैसे बोल पड़ती है। संभोग में भी साधु-साधु ! विनय यह सुन कर चकित हो जाता है। सोचने लगता है कि क्या मल्लिका भी संभोग से समाधि की अवस्था में आ गई है। 

विनय सर्वदा की तरह मल्लिका के वक्ष पर चेहरा रख कर उस की देह पर लद गया है। ऐसे जैसे कोई मतवाला मधुशाला में विश्वविजयी बन कर बेसुध पड़ा हो। मल्लिका उस की ज़ुल्फ़ों से खेल रही है। पूर्णमासी के चांद को साक्षी मान कर चांदनी बन कर दुलरा रही है। जैसे कोई मां , शिशु को दुलार रही हो। मल्लिका का यह ममत्व विनय को भिगो गया है। बहुत भीतर तक भिगो गया है। स्त्री चाहे जैसी हो , जो हो , होती तो वह अंतत: मां ही है। 

विनय को एक बार लगता है कि कहीं यह सब कोई सपना तो नहीं है। वह खुद को चिकोट लेता है। फिर मल्लिका के नितंब पर चिकोटी काटता है। वह उसे , ' अस्स ! ' कह कर मना सी करती है। विनय मान जाता है। जान जाता है यह सपना नहीं , सच है। विनय मल्लिका को कस कर पकड़ कर बारी-बारी उस के दोनों कपोल चूम लेता है। दोनों वक्ष दबाते हुए उस का माथा चूम लेता है। वह उसे बड़े मनुहार से देख रही है। ऐसे जैसे पूछ रही हो , ' फिर कब मिलोगे ?'

चलते-चलते वह विनय को फिर अपने आलिंगन में ले लेती है। प्यार करते हुए कहती है , ' माई सेल्फ दारिया , एंड यू ? '

' विनय ! '

' तुम इंग्लिश नहीं समझते ? ' वह अंगरेजी में ही पूछती है। 

' लिटिल-लिटिल ! ' अपनी हथेली को सिकोड़ते हुए बताता है। 

' इधर भी लिटिल-लिटिल ! ' वह भी अपनी हथेली को सिकोड़ कर बताते हुई हंसती है। 

वह चलना चाहती है। पर विनय उसे अभी न जाओ छोड़ कर कि दिल अभी भरा नहीं के अंदाज़ में रोकना चाहता है। पर वह नहीं रुकती। आकाश में पूर्णिमा के चांद को निहारते हुए बोलती है , ' अब चलना चाहिए। '  वह ज़रा रुकी और बोली , ' कल फिर मिलेंगे। ' 

' हां , अब बस एक और रात ही तो हम और हैं यहां। ' वह बताता है उसे कि , ' मैं ने तुम्हारा एक काल्पनिक नाम भी रखा है। '

' क्या ?'

' मल्लिका ! '

' मॉलिका ! ' वह जोड़ती है , ' ब्यूटीफुल ! '

विनय उसे थोड़ी देर बाहों में भरे आहिस्ता-आहिस्ता उसे थपथपाता रहता है। कभी पीठ , कभी नितंब। कभी कपोल , कभी कुछ। दोनों एक दूसरे को चूमते हुए विदा लेते हैं। हमेशा की तरह मल्लिका पहले चली जाती है। 

सुबह डाइनिंग हाल में दारिया नहीं दिखती। या तो वह नाश्ता कर के निकल गई है। या अभी आई नहीं है। नाश्ता कर के वह बाहर आ जाता है। चारो तरफ चहल-पहल है। लोग एक दूसरे से परिचय कर रहे हैं। फ़ोन नंबर का आदान-प्रदान हो रहा है। वह अंगरेज लड़का सामने से आता दिखता है। दूर से ही हाथ जोड़ लेता है , सिर झुका लेता है। पास आ कर भी उस के हाथ जोड़े हुए है। ब्रिटिश लहज़े में नमस्कार ! बोलता है और झुक कर विनय के पांव छू लेता है। विनय बढ़ कर उसे उठा कर गले लगा लेता है। वह मचल कर ख़ुश हो जाता है। तभी आस्ट्रेलियन  लड़की आती है। वह उस से मिलवाता है , ' दिस इज माई गर्ल फ्रेंड। ' वह आदर में सिर झुका कर बताता है , ' फ्रॉम आस्ट्रेलिया ! ' लड़की अपना कुछ नाम बताती है। विनय समझ नहीं पाता। 

बातचीत शुरू हो गई है। विनय ने पूछ लिया है , ' कैसा रहा , ध्यान ? '

' सो-सो ! '

' इतनी कम उम्र में ध्यान की कैसे सूझी तुम लोगों को ? '

' सूझी ? ' वह चौंकता है। बोलता है , ' इंज्वाय किया। कुछ टाइम बचा था। लंदन वापसी में समय था। तो सर्च किया। सब से सस्ती जगह यही मिली। '

' क्या ? ' विनय जैसे आसमान से ज़मीन पर आ गया। वह बोला , ' सस्ती क्या लगभग मुफ़्त है यह जगह। '

' यस सर ! ' वह बोला , ' फिर एक तजुर्बा भी मिला। हमारा बिजनेस भी इस से प्रमोट होगा। '

' क्या बिजनेस है ?

' टूरिज्म। ' वह बोला , ' हमारी टूरिस्ट एजेंसी है। दुनिया घुमाते हैं सब को। ' वह अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर देता है। और कहता है , ' आइए आप को यूरोप घुमवाते हैं। ' वह पैकेज के डिटेल बताने लगता है। लड़की भी अपना विजिटिंग कार्ड देती है। वह अपना पैकेज और डिटेल बताने लगती है। विनय बताता है कि , ' अभी उस का ऐसा कोई इरादा नहीं है। ' और पूछता है ,  ' फिर भी कैसा लगा यहां ध्यान में आ कर ? '

' कुछ नहीं। ' वह सांस भीतर ले कर , सांस फिर बाहर छोड़ते हुए हथेली फैला कर उस पर फिर सांस बाहर छोड़ते हुए , एक लंबी फूंक मारता है और बोलता है , ' ब्रेथिंग ? ' फिर हथेली पर फूंक मार कर उड़ा देता है। 

विनय यह देख कर सकते में आ जाता है। क्या-क्या सोचता था वह इस लड़के के बारे में। मन ही मन कितना तो प्यार करता रहा था इस लड़के को। पर इस ने तो दिल ही तोड़ दिया। अपमानित कर दिया ध्यान को। विपश्यना का इस तरह मज़ाक उड़ाना विनय को अच्छा नहीं लगा। विनय के मन में आया कि उसे एक थप्पड़ लगा दे। पर ज़ब्त कर गया है , किसी तरह। वह लड़का समझ गया है कि विनय को उस की बातें बुरी लग गई हैं। सो अचानक चुप लगा गया है। लड़की ने मामला संभालने की कोशिश की है। और बता रही है कि उस का एक्सपीरिएंस बहुत बेटर रहा है। और कि वह अपने क्लाइंट्स के लिए इंडिया के पैकेज में विपश्यना को भी ऐड करेगी। ख़ास कर सीनियर सिटिजंस को। इस के फ़ायदे भी बताएगी। बताएगी कि विपश्यना से स्ट्रेस बहुत जल्दी दूर होता है। मेडिकल साइंस से बेटर है यह मेडिटेशन। वह बता रही है कि विपश्यना से रिलेटेड लिट्रेचर और डी वी डी वग़ैरह ले लिए हैं , क्लाइंट्स को कनविंस करने के लिए। सब अपनी साइट्स पर जल्दी ही डाल देगी। फिर वह विनय को आस्ट्रेलिया का पैकेज समझाने लग जाती है। विनय बोर हो जाता है। लड़का अचानक विनय के पैर छू कर चल देता है। उस के चेहरे पर फिर वही मासूमियत छा गई है। जो पहले के दिनों में हुआ करती थी। 

लड़की भी उस के पीछे-पीछे चली गई है। शायद कोई नया क्लाइंट जुगाड़ने। 

विनय सोचता है कि कहीं दारिया भी टूरिज़्म इंडस्ट्री वाली तो नहीं है ? कौन दारिया ? विनय जैसे ख़ुद से पूछता है। और हंसते हुए ख़ुद ही को जवाब देता है , अरे वही मोगरे सी महकती हुई मल्लिका ! 

वह सोचता है अभी पूरा एक दिन , पूरी एक रात ऐसे ही व्यावसाइयों और जाहिलों के साथ गुज़ारना है। कैसे गुज़ारेगा ? उस के बग़ल के कमरे का एक आदमी मिलता है। महाराष्ट्र से आया है। बता रहा है कि , ' महाराष्ट्र से दो टीम आई हैं। अलग-अलग बेल्ट से। इस विपश्यना शिविर में सब से ज़्यादा महाराष्ट्र से ही लोग आए हैं। '

' तो इतना शोर क्यों मचा रहे हैं आप लोग रात ही से ? ' पूछता है विनय। 

' बोर हो गए थे हम लोग ध्यान करते-करते। ' वह बोला , ' अभी थोड़ा सा अपना स्पेस मिला है। 

' तो दूसरों का स्पेस क्यों छीन रहे हैं आप लोग ? ' वह जैसे जोड़ता है , ' बहुसंख्यक हैं आप लोग , इस लिए ?'

' नो सर ! '

' ऐसा ही था तो यहां इतना दूर आना ही क्यों था ? '

' आप कुछ ज़्यादा ही डिस्टर्ब लग रहे हो सर ? ' वह बोला , ' किसी और को तो कोई प्रॉब्लम नहीं हुई। आप रात में भी सब को टोक रहे थे। '

' चलिए आप लोग इंज्वाय कीजिए। ' विनय ने बात को बहुत बढ़ाना नहीं चाहा। वह बोला , ' मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। '

' ओ के सर ! '

एक और मराठी मिल गया है। विनय की उम्र का है। वह विनय की मुश्किल समझ रहा है और ख़ुद को उस की मुश्किल के साथ जोड़ रहा है। बता रहा है कि , ' इतने दिनों से कितना सुख और शांति थी। इन सब लौंडों की अराजकता ने सब बेकार कर दिया है। वह बता रहा है कि यह सब विपश्यना करने आए भी नहीं थे। यह तो घूमने आए थे। '

' यह घूमने की जगह है ?'

' घूमने की जगह नहीं है। पर यह घूमने ही आए हैं। ' वह बोला , ' यह सब सरकारी कर्मचारी हैं। महाराष्ट्र में सरकारी कर्मचारियों को विपश्यना करने के लिए स्पेशल छुट्टी और स्पेशल एलाउंस मिलता है। उसे ही इंज्वाय करने आए हैं यह लोग। '

' ओह ! '

वह बता रहा है कि , ' महाराष्ट्र में बहुत सारे विपश्यना सेंटर हैं। पर उसे छोड़ यहां आए हैं तो घूमने ही आए हैं। बस यहां का सर्टिफिकेट लगाएंगे यह लोग। ' 

विनय कितनी गंभीरता से आया था विपश्यना के लिए। इस विपश्यना में कितना तो सुख , कितना तो आनंद मिला। एक नया अनुभव मिला ध्यान का। ख़ुद को देखने और जानने का। जांचने का। और तो और मोगरे से महकती मल्लिका मिली। जीवन महक गया उस का। अब यह मूर्ख शोर मचा कर , बेवकूफी की बातें कर सारा ध्यान , सारा सुख खंडित किए दे रहे हैं। तहस-नहस किए दे रहे हैं। 

विनय कमरे में आ गया है। हाथ मुंह धो कर ध्यान के लिए बैठ गया है। निर्विकार और निरापद। वह फिर गहरे जल में है। पूरी आश्वस्ति के साथ। गहरे जल में समा गया है। समाता ही जा रहा है। 

लंच में भी डाइनिंग हाल में शोर है। किसी रेस्टोरेंट जैसा। दारिया लंच में भी नहीं मिलती। उस ने दारिया का मोबाईल नंबर भी नहीं मांगा है , न उस ने दिया है। बस नाम बताया , नाम पूछा। यह परिचय भी कोई परिचय होता है भला। फिर सोचता है कि मन और देह के परिचय से बड़ा क्या परिचय होता है भला। 

अब तो बस सोना ही सोना है। बहुत परिचय-वरिचय के मूड में वह है भी नहीं। शाम को सो कर जब विनय उठा तो मन में कुछ ताज़गी आई। बाहर आ कर गोभी के खेत वाले चबूतरे पर बैठा है वह। दो-एक लोग और आ जाते हैं उसे बैठा देख कर। शाम तक चर्चा का शोर गॉसिप में तब्दील है। जैसे कि वह फ्रांसीसी अचानक विपश्यना शिविर से इस लिए अनुपस्थित हो गया कि एक रात वह अपनी गर्लफ्रेंड के साथ उस के कमरे में बिस्तरबाज़ी करते पाया गया। कार्यकर्ताओं ने पकड़ लिया और उसी रात कमरे से दोनों को बाहर कर दिया गया। सुबह विपश्यना शिविर से बाहर कर दिया गया। क्यों कि उन दोनों ने विपश्यना शिविर का नियम तोड़ा था। निषेध भंग कर दिया था। एक जोड़ा समलैंगिकता में पकड़ा गया। वह दोनों भी बाहर कर दिए गए। ऐसे ही और तीन जोड़ों को बाहर किया गया। सभी विदेशी जोड़े थे। 

तो क्या यह सभी लोग सस्ता टूरिज़्म करने यहां आए थे। विपश्यना करने नहीं ? खर्च कम कर समय गुज़ारने आए थे। लेकिन यह सब सुन कर विनय डर गया है। बुरी तरह डर गया है। कि कहीं वह भी दारिया के साथ कभी पकड़ गया होता तो ? 

तो ?

इस शिविर परिसर में सी सी कैमरे भी लगे हैं जहां तहां। सुरक्षा के लिहाज़ से। सभी आवासीय परिसर में यह कैमरे तैनात हैं। लगता है जिस इलाक़े में टहलते-टहलते विनय अपनी मल्लिका से मिलता था , उस के साथ इस विपश्यना में वासना की युगलबंदी करता था , वहां सी सी कैमरे और कार्यकर्ताओं की निगाह नहीं थी। होती तो वह भी अवश्य पकड़ा गया होता। पकड़ा जाता तो अपमान की दरिया वह दारिया के साथ कैसे पार करता भला ? यह सब सोच कर ही वह सहम गया है। हाथ जोड़ कर मन ही मन वह भगवान को धन्यवाद देता है। लेकिन लोग अब शोर बंद कर यही सारी बातें खुसफुसा कर बतिया रहे हैं। वाट्सअप पर एक दूसरे को डिटेल फारवर्ड कर रहे हैं। 

हां , दो भारतीय भी अचानक बाहर गए थे। उन के परिवार में कोई ग़मी हो गई थी। 

डिनर में दारिया दिखी। आंख मटकाती हुई। उस की मेज़ पर कोई पुरुष पहले से ही था। कौन था ? पीछे से उस की पीठ दिखती है। वह डिनर के बाद कमरे में आ गया है। जाने क्यों रात में ही ठंडी हवा बहने लगती है। थोड़ी देर बाद वह लेट गया है। दुनिया भर के विवरण सुन कर वह डर गया है। कि कहीं दारिया मिल गई और वह उस के साथ युगलबंदी करता हुआ पकड़ा गया तो। 

तो ?

पर थोड़ी देर बाद उसे एक गीत याद आ जाता है। प्यार है तो ज़माने का डर छोड़ दो। तुम भी घर छोड़ दो , हम भी घर छोड़ दें। वह कमरा छोड़ देता है। बाहर आ कर लंबे-लंबे डग भरता थोड़ी देर इधर-उधर घूमता रहता है। जब आश्वस्त हो जाता है कि अब परिसर में सन्नाटा है। कहीं कोई दिख नहीं रहा तो अपने युगलबंदी के अड्डे की तरफ धीरे-धीरे बढ़ लेता है। हलकी सी रौशनी में कोई परछाईं दिखती है। वह और धीरे हो जाता है। नज़दीक जा कर देखता है तो पाता है कि यह तो दारिया है। मोगरे की महक में महकती मल्लिका है। उस का परफ्यूम नाक में आते ही उस की देह में गमक सी आ जाती है। वह झूम जाता है। वह अपना स्कार्फ खोलती हुई विनय की तरफ दौड़ आती है। किसी हवा की मानिंद उस से लिपट जाती है। चूमती हुई बुदबुदाती हुई बोली , ' बहुत देर कर दी आज ! ' वह बोली , ' मुझे लगा आज आओगे ही नहीं। '

' आता कैसे नहीं। ' भीतर का भय दबाते हुए विनय बोला। 

विनय बैठ गया है। मल्लिका लपक कर उस की गोद में बैठ जाती है। विनय की ज़ुल्फ़ों से खेलने लगती है। वह  उसे आलिंगन में ले कर उस के नितंब सहलाता रहता है। आहिस्ता-आहिस्ता। लेकिन सरगम के सुर में नहीं आ पाता। पकड़े जाने का भय उसे विचलित किए हुए है। पर ठंडी हवाओं का बांध उस के भय को धीरे-धीरे निर्भय करता जाता है। दारिया अचानक विनय को निष्क्रिय देख कर पूछती है , ' आज क्या हो गया है तुम को ? तबीयत तो ठीक है न ? '

' हां , सब ठीक है। ' विनय संक्षिप्त सा बोल कर उस के वक्ष से खेलने लगता है। ऐसे जैसे कोई नन्हा बच्चा कोई खिलौना खेल रहा हो। कि दारिया अचानक दरिया बन जाती है। कल-कल करती हुई बहने लगती है। मंथर गति से। उस के वक्ष पर नील गगन की तरह वह झुक गया है। गोया वक्ष नहीं , धरती हो। वह सिहर-सिहर जाती है। किसी लहर की तरह। उस की देह से उठती लहर से उस का ओर-छोर हिल रहा है। उस के विशाल वक्ष , उस के नीले नयन विनय के अस्तित्व को जैसे समाप्त कर देना चाहते हैं। विह्वल विनय दारिया की दरिया में डुबकी मारने के लिए उद्धत हो जाता है। बस एक आरोह की ज़रुरत है। साज़ को जैसे आवाज़ की दरकार हो। दारिया समझ जाती है। बिन कुछ कहे समझ जाती है। निर्वसन स्त्री देह भाषा बहुत समझती है। बहुत जल्दी समझती है। देह के मन की भाषा। और दाहकता में दहकने लगती है। जैसे बटुली में अदहन। दारिया करवट ले कर दरिया बनी लेट गई है विनय की जांघों पर। ऐसे जैसे कोई नदी बल खाती हुई मोड़ लेती है अचानक किसी धार को ले कर। सारी धाराएं उस के पीछे-पीछे चल पड़ती हैं। और नदी जिस तरफ भी चल पड़ती है उसे रास्ता मिल जाता है। रास्ता बन जाता है। रास्ता बनाते-बनाते वह अचानक पेट के बल लेट जाती है। विनय उस की आकांक्षा पर न्यौछावर हुआ उस की पीठ से लिपट जाता है। जैसे कोई धारा अचानक हिलोर मारती हुए उछाल मारती है , दारिया वैसे ही हिलोर मारती हुई कमर को लहर की तरह उछाल देती है। नितंब का तंबू तान देती है। ऐसे जैसे नाव की पाल चढ़ते ही लंगर उठ जाए। गहरे जल में नाव उतर जाए। पतवार घुमा कर नाविक नाव को विपरीत धार पर खेने लगे , विनय दारिया की दरिया में उसी तरह नाव खेने लगता है। ऐसे जैसे कोई लोकगीत गा रहा हो। दारिया के देह-गांव में। दारिया के देह-गांव में गलियां बहुत हैं। संकरी-संकरी गलियां। गीत गूंजते हैं। तनी धीरे खोलो केंवड़िया, रस की बूंदें पड़ें वाला मंज़र है। 

सुबह विदाई का दृश्य है। हर कोई जल्दी से जल्दी निकल जाने की हड़बड़ी में है। विनय वहां विपश्यना साहित्य खोज रहा है। दिक़्क़त यह है कि यहां विपश्यना साहित्य हिंदी में कम , अंगरेजी में ज़्यादा है। वह जो भी हिंदी साहित्य मिलता है , सारा ख़रीद लेता है। आचार्य सत्यनारायण गोयनका के हिंदी वाले प्रवचन की डी वी डी भी। कि तभी दारिया आती हुई दिखती है। वह सब कुछ वहीं स्टाल पर छोड़ कर लपकता है। दारिया आती है। हंसती हुई। हवा की तरह झूमती हुई। खिलखिलाती हुई। आते ही वह विनय से लिपट जाती है। उस के इस सार्वजनिक आलिंगन में विनय को लगता है कि वह पुशपाश में है। दारिया के परफ़्यूम में आज फिर मोगरे जैसी सुगंध है। वह उस का माथा चूम लेती है। विनय उस के कपोल। लोग चौंधिया कर देख रहे हैं दोनों को आलिंगनबद्ध। दारिया के पीछे-पीछे एक पुरुष भी आ रहा है। दारिया उस पुरुष से विनय को मिलवाती है , ' मीट माई हसबैंड ! ' विनय अचकचा कर रहा जाता है। जैसे भहरा जाता है। उसे ध्यान से देखता है। यह तो वही रशियन पुरुष है जिसे आचार्य ने ध्यान सत्र में मेडिकल प्रॉब्लम बताते हुए दीवार से सट कर बैठने की अनुमति दे रखी थी। विनय को मना कर दिया था। वह कभी दारिया और रशियन पुरुष को एक साथ सोच ही नहीं पाया। सोच ही नहीं पाया कि वह पति-पत्नी हो सकते हैं। उसे कभी यह सब ध्यान ही नहीं आया। 

' हेलो ! ' कह कर उस ने हाथ आगे बढ़ा दिया है , मिलाने के लिए। 

' नमस्कार ! ' कह कर विनय ने हाथ जोड़ कर अभिवादन कर हाथ मिला लिया है , दारिया के हसबैंड से। वह भीतर से असहज होते हुए भी बाहर से सहज बना हुआ है। 

' नमस्कार ! ' टूटी-फूटी हिंदी में वह भी जवाब देता है। 

अंगरेजी तंग होने के कारण विनय बहुत बात नहीं कर पाता। 

गेट के बाहर दारिया की टैक्सी खड़ी है। वह उसे टैक्सी तक छोड़ने जाता है। न दारिया फोन नंबर या पता मांगती है , न विनय मांग पाता है। वह हाथ हिलाती हुई , खिलखिलाती हुई , ' बब्बाय विनय !'  बोलती है। टैक्सी धूल उड़ाती हुई चली जाती है।

चुप की राजधानी में बना यह संबंध चुपके से समाप्त हो गया है। होठों की आग और सांसों की राग रात के अंधेरे में बना संबंध , दिन के उजाले में भस्म हो गया है। मल्लिका के मोगरे की महक उड़ गई है। बिसर गई है।  दारिया नामक दरिया जैसे अचानक सूख गई है। इश्क़ का यह कौन सा तर्जे बयां है।

साधु-साधु ! 

वह घर के लिए अब फ़ौरन लौट जाना चाहता है। पर जो विपश्यना से संबंधित साहित्य और डी वी डी ख़रीदा है , उस के भुगतान भर का पैसा उस के पास नहीं है। ग़लती उस से यह हुई कि जाते समय शिविर में सहयोग के लिए ज़रुरत से ज़्यादा सहयोग राशि भुगतान कर दिया। सिर्फ़ स्टेशन जाने भर का खर्च रख कर सारा पैसा दे दिया। रसीद मिल चुकी है। हालां कि यहां कितना पैसा आप सहयोग के लिए दें , कुछ तय नहीं है। आप की अपनी श्रद्धा पर है। आप एक भी पैसा न दें तो भी कोई कुछ कहने वाला नहीं है। आप अपनी ख़ुशी और अपनी क्षमता से जो देना चाहें। तो विपश्यना से मिली ख़ुशी और शांति के मद में जो भी पैसा था दे देना भी कम लगा। सो राह खर्च निकाल कर दे दिया। ट्रेन का टिकट पहले ही से था उस के पास। विपश्यना साहित्य बाद में दिखा। यह भी ज़रुरी लगा है। पर कार्ड से पेमेंट की व्यवस्था नहीं है। आन लाइन पेमेंट करना भी उसे नहीं आता। ए टी एम से पैसा निकालने के लिए उसे पास के क़स्बे जाना होगा। कोई सवारी नहीं मिल पा रही। उसे ओला , उबर कुछ भी बुक करने नहीं आता। एक टैंपो है जो बहुत ज़्यादा पैसा मांग रहा है। चारगुना ज़्यादा। कोई बताता है कि थोड़ी दूर पैदल जाने पर शेयर्ड टैंपो मिल सकता है। वह पैदल चल पड़ता है। शेयर्ड टैंपो से क़स्बे पहुंचने पर तमाम ए टी एम मशीन ख़राब मिलीं। किसी ने बताया कि थोड़ी दूर और दूसरे क़स्बे में जाने पर ए टी एम है। वह दूसरे क़स्बे पहुंचा। वहां ए टी एम ठीक भी था और उस में पैसा भी। अब उस ने यहीं से एक टैंपो बुक कर लिया। शिविर स्थल और वहां से वापस स्टेशन की वापसी के लिए। विपश्यना शिविर वापस आते समय विनय ने देखा कि एक विदेशी अपना विस्तर आदि अपने कंधे पर लादे पैदल ही क़स्बे की तरफ चला जा रहा है। बेफ़िक्र। हालां कि वह सिगरेट नहीं पी रहा पर उस की बेफिक्री देख कर विनय को एक फ़िल्मी गाना याद आ जाता है। मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया / हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया ! विनय ने उसे हाथ हिला कर अभिवादन किया है। पर अपनी धुन में मगन उस ने विनय को देखा ही नहीं। 

तो क्या वह पूरी तरह तटस्थ हो गया है ? 

हर किसी चीज़ , हर किसी बात , हर किसी घटना से। क्या पता। पर अब विनय ख़ुद से ही पूछ रहा है कि क्या कोई इस तरह तटस्थ भी हो सकता है कि ख़ुद को ही ख़ुद की ख़बर न हो। एक सुंदर स्त्री देखते ही दिल में खलबली बढ़ जाती है। तन-मन विकल हो जाता है। भटकाव बढ़ जाता है। तो तटस्थता कैसे हो सकती है भला। ऐसे में तटस्थता किस चिड़िया का नाम है। तटस्थ भाव से ख़ुद को कैसे देखा जा सकता है भला। घर-संसार सब कुछ सामने आते ही सारी जद्दोजहद , सारा संघर्ष उपस्थित हो जाता है। 

विनय घर लौट आया है। 

थोड़ी देर रोज ध्यान करता है। कभी-कभी डी वी डी लगा कर प्रवचन भी सुनता है। ध्यान का समय निरंतर कम होता जाता है। ज़िंदगी के मेले और झमेले में ध्यान का समय निकालना भी एक नई विपश्यना है। एक नया ध्यान है। सांस के स्पर्श से ज़्यादा जीवन-संघर्ष का स्पर्श है। सांस से ज़्यादा संघर्ष आता-जाता है। संघर्ष का आना-पान और सांस का आना-पान एकमेव हो गए हैं। तो भी वह समय निकालता है विपश्यना के लिए। ध्यान के समय वह कभी गहरे जल में होता है , कभी आकाश , कभी हिमालय में। बर्फ़ की गलन महसूस करता हुआ। कई बार वह नींद के नाव में बैठ जाता है। फिर सो जाता है। ध्यान में अकसर कई चीज़ें उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं। पर अकसर वह स्त्री , विपश्यना में विलाप करती गंवई स्त्री , आ कर सामने बैठ जाती है। विलाप करती हुई अकसर वह कहती रहती है , हम नाईं जाइब ! सपने में , ध्यान में विलाप करती स्त्री के अलावा भी बहुत कुछ आता है। कभी-कभार साक्षात बुद्ध भी ! पर सपनों की इस दरिया में कभी दारिया नहीं आती। मोगरे सी महकती मल्लिका नहीं आती है। आती है तो जागते समय उस की याद आती है। उस के दिए सुख याद आते हैं। विपश्यना की यह कौन सी प्यास है। ज़िंदगी की कौन सी आस है। दारिदा की दरिया में बहता हुआ विनय अकसर सोचता रहता है। लेकिन यह बहना कभी बंद नहीं होता। 

कई महीने बीत गए। अचानक एक दिन दारिया का फ़ोन आया। फ़ोन पर वह विह्वल थी। ख़ुशी में ऊभ-चूभ। विनय ने पूछा , ' तुम्हें मेरा नंबर कहां से मिला ? मैं ने तो दिया नहीं था। '

' विपश्यना शिविर के आफ़िस से तुम्हारा नंबर लिया था , तभी। ' वह ज़रा रुकी और बोली , ' पर तुम्हें बताया नहीं। '

' ओ के। ओ के। ' विनय ने पूछा , ' और कैसी हो ?'

' बहुत अच्छी ! ' वह बोली , ' तुम्हारा दिया हुआ गिफ़्ट मैं कभी भूल नहीं सकती ! '

' पर मैं ने तो तुम्हें कुछ दिया ही नहीं था। कोई गिफ़्ट भी नहीं। ' वह बोला , ' एक फूल भी नहीं। '

' सब कुछ तो दे दिया था मुझे , तुम ने ! '

' क्या ? '

' हां , मैं तुम्हारे बेटे की मां बन गई हूं। ' 

' क्या ?' विनय घबराते हुए बोला। 

' हां , बिलकुल तुम पर गया है। बस रंग मेरा गया है। कलर छोड़ कर सब कुछ तुम्हारा। '

' क्या-क्या ? ' विनय थोड़ा ख़ुश , थोड़ा घबराया हुआ बोला। 

' कभी आऊंगी इंडिया तो तुम्हारे बेटे से तुम्हें मिलाऊंगी। ' वह बोली , ' या फिर तुम्हें ही कभी मास्को बुलाऊंगी। '

' क्या ? ' विनय की घबराहट में घिघ्घी बंध गई। 

' तुम्हें मालूम नहीं विनय , मैं बहुत परेशान थी , मां बनने के लिए। ' वह बोली , ' बहुत ट्राई किया। इलाज पर इलाज। पर हार गई थी। डाक्टर ने टेस्ट ट्यूब बेबी का भी बताया था। ' वह बोलती जा रही थी , ' बीच विपश्यना में तुम क्लिक कर गए। तो ट्राई कर लिया। सारा रिस्क ले कर ट्राई किया। और सक्सेस रही। थैंक यू , माई लव !' 

विनय चुप ही रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि अपने रुसी बच्चे के लिए दारिदा से वह कहे भी तो क्या कहे। फिर धीरे से वह बोला , ' हो सके तो बच्चे को हिंदी भी ज़रुर सिखाना। ताकि जब भी कभी उस से मिलूं तो उस से बात कर सकूं। '

' इट्स ओके। ' वह बोली , ' बट उसे कभी यह नहीं बताऊंगी कि तुम उस के फ़ादर हो। न कभी तुम बताना। ' वह कहने लगी , ' बस तुम जानो और हम जानें। डोंट नो वन एनीवन। ' 

' ओके। ' विनय बोला , ' इट्स ओके। ' विनय को न तुम हमें जानो , न हम तुम्हें जानें गीत की याद आ गई। 

'ओ के डार्लिंग ! '

' बेटे की कुछ फ़ोटो भेजना। ' विनय ने कहा। 

' श्योर ! ' वह बोली , ' मालूम है , बेटे का नाम विपश्यना ही रखा है। ' दारिदा चहकती हुई बोली , ' मेरे हस्बैंड को भी यह नाम पसंद है। बहुत पसंद है। '

' क्या ? '

' यस माई लव ! ' 

' वेरी गुड ! '

' साधु-साधु ! ' कह कर वह दारिदा ने फ़ोन रख दिया। 


विनय अपनी एक भूल से , एक अलौकिक सुख से इस तरह पिता बन जाएगा , कहां जानता था। दारिदा ने बेटे की कुछ फ़ोटो वाट्सअप से भेज दी है। 

वह अब ध्यान में अपने उस रुसी बेटे विपश्यना को किलकिलाते हुए देखता है। अकसर देखता है। जल , आकाश और हिमालय के साथ अब यह उस का रुसी बेटा विपश्यना भी ध्यान में उपस्थित हो जाता है। बार-बार। कहीं ज़्यादा। हरदम किलकिलाता और खिलखिलाता हुआ। वह दारिदा के पास उड़ कर पहुंच जाना चाहता है। ताकि विपश्यना नाम के शिशु को जल्दी से जल्दी देख सके। विपश्यना के लिए उस के भीतर अजीब सी तड़प उठती है। युगलबंदी के बाद यह कौन सी बंदिश है जो उसे गाते-गाते रुलाने लगी है। 

यह कौन सा विलाप है। विपश्यना में विलाप का यह आलाप विनय को विकल कर देता है। विपश्यना की यह कौन सी साधना है ? साधना है कि आराधना ? सहसा विपश्यना शिविर के ध्यान कक्ष में उस स्त्री का विलाप याद आ जाता है विनय को। वह समझ नहीं पाता कि साधना में है कि विलाप में। दारिया कभी-कभार अब वाट्सअप काल करती रहती है। विपश्यना बेटे को दिखाती रहती है। कभी किलकारी मारते , कभी सोते हुए। वह बताती है कि , ' यह जब भी दूध पीता है तो तुम्हारी याद आती है। '

' वैसे नहीं आती क्या ?'

' क्यों नहीं आएगी ? ' वह बोली , ' हरदम आती है। '

' अच्छा तुम्हारे हस्बैंड को मालूम है कि विपश्यना किस का बेटा है ?'

' हां , मालूम है। '

' क्या ? ' वह अचकचा जाता है। 

' उसे मालूम है कि विपश्यना उसी का बेटा है। ' वह जैसे जोड़ती है , ' पर मुझे मालूम है कि हमारा-तुम्हारा बेटा है। पर किसी को क्यों कुछ बताना ? ' वह बोली , ' मैं मां बन गई हूं , मेरे लिए इस से ख़ुशी की बात दुनिया में और कोई बात नहीं है। '

' बस तुम से एक बार मिलना है। विपश्यना को देखना है। ' विनय बोला। 

दारिया बोली , ' साधु-साधु  ! ' 


[ समाप्त ]

[ वाणी प्रकाशन , नई दिल्ली से प्रकाशित ]

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विपश्यना में प्रेम का मराठी अनुवाद


विपश्यनेमधील प्रेम


मराठी अनुवाद : प्रिया जलतारे



ती जणू वाचा हीन राजधानी होती. माणसे तर माणसे , अगदी झाडे, झुडुपे, फूल ,पाने, निसर्ग,वनस्पती सगळे मूक होते.का कोण जाणे पण चिमणी सुद्धा चिवचिवत नव्हती. ना आतून आवाज बाहेर जात होता ,ना बाहेरून आवाज आत येत होता.जर कुठला आवाज अधून मधून ऐकू येत होता तर तो फक्त आचार्यांचा. किंवा टेप वर आचार्यांचे निर्देश.निर्देशांचा भडीमार. नाहीतर घंटी अथवा घंटा.जे ही काही सांगणे वा ऐकणे होते ते आचार्यांनी सांगायचे आणि आचार्यांनी ऐकायचे. नाहीतर मोठी घंटा वाजायची किंवा छोटी रुण झुण वाजणारी घंटी. नाहीतर मग लिखित निर्देश असायचे, जे वाचून जाणून घ्यायचे आणि स्वीकार करायचे. परंतु त्यावर कुठलीही प्रतिक्रिया द्यायची नव्हती, अगदी इशाऱ्याने सुद्धा नाही.डोळ्यांनी अथवा कुठल्याही संकेतांनी  कोणाला काही सांगणे वा कोणाचे काही ऐकणे नियमांची अवहेलना होत होती. त्यामुळे तुम्हाला शिबिरा बाहेर काढल्या जाऊ शकत होते. मनाच्या आत कल्लोळ होता जो थांबत नव्हता. पण आचार्य म्हणत होते मनाला नियंत्रित करणे हेच आपले ध्येय आहे. मनावर नियंत्रण आणायचे होते पण मनातील कल्लोळ मात्र कमी होत नव्हता.वाटत होते की हे मन हे च ह्या कोलाहलाचेच घर आहे. या कल्लोळाचे ,या कोलाहलाचे, काय करू आचार्य? त्याला खूप वेळा असे वाटते की आचार्यांना हा प्रश्न विचारावा. पण शरीराच्या आत मध्ये असा  कोणी दुसरा  होता, ह्या कल्लोळाशिवाय ही ,.जो हा प्रश्न विचारू देत नव्हता.


तो कोण होता? 


 कोलाहल खूप होता. कैफीयती  खूप होत्या तऱ्हे तऱ्हेच्या .पण शांती नव्हती. मनाची शांती. आणि तो तर मनाच्या शांतीच्या शोधात घरातून वेसण तोडून , बेलगाम होऊनच घराबाहेर पडला होता. विपश्यना शिबिर. पण कुठले ही शिबिर मनाला शांती देत असते का? इथे या शिबिरातल्या ध्यान कक्षात बसून विनय हाच विचार करत होता. आचार्यांच्या आवाजातील टेप निरंतर वाजत होता श्वासोच्छवास क्रिया समजून घेणे, तठस्थ भावनेने पाहणे, त्याद्वारे मनाला नियंत्रित करण्याचे निर्देशांवर निर्देश ध्वनीत करत होता.सामान्य श्वासोच्छवास चालू आहे. आना पान म्हणजे श्वासावर लक्ष केंद्रित करून केली जाणारी ध्यान पद्धती. श्वास घेणे आणि श्वास सोडणे. श्वासावर नियंत्रण, श्वासाकडे तटस्थ भावनेने पाहणे ,साक्षी भावनेने पाहणे,आचार्य शिकवत आहेत. श्वासाला स्पर्श करणे निर्देशित करत आहेत. नाकावर लक्ष केंद्रित करण्याचे आदेश आचार्य देत आहेत. नाकाशी, श्वासाशी स्पर्श जाणवून घेण्यासाठी आचार्य निर्देश देत आहेत. पण इथे तर ध्यान कक्षात थोडी दूर बसलेल्या इंग्रज बालेचे सौंदर्य जाणवत आहे . सगळे लक्ष तिच्यावरच केंद्रित होत आहे. ती लंडन हून तिच्या बॉयफ्रेंड सोबत शिबिरात आली आहे. ते दोघे वेगवेगळ्या ठिकाणी उतरवले गेले आहेत. एकमेकांशी भेटण्या बोलण्याची परवानगी नाही. कडक शिस्त. त्यामुळे दोघेही जेव्हा ध्यान कक्षात असतात एक दुसऱ्याचे ध्यान करतात. सगळ्यांच्या नजरा चुकवून एकमेकांना पाहतात. रोज तो मुलगा एक रांग सोडून विनयच्या पुढच्या  रांगेत बसतो. सगळ्यांची आसन व्यवस्था ठरलेली आहे. 


रोज एका जागेवर बसायचे आहे. तर पहिल्या दिवशी नव्हे पहिल्या संध्याकाळी सगळ्यांचा परिचय होता आणि साधे सोप्प ध्यान. त्या संध्याकाळीच प्रत्येकाला आपली जागा ठरवून दिली गेली होती.  कुठे बसायचे काय करायचे कसे करायचे हे सगळ्यांना समजावून सांगितले होते. इंट्रोड्युसिंग मीटिंगच समजा. आणि मौन सुरू झाले. 


आता मौनावस्थेतच झोप, मौन अवस्थेतच जागृती. मौनातच स्नान, मौनातच भोजन. ते मौन तरी काय होते, मनाच्या कोलाहलात आणखी आणखी जळत राहणे होते. तर मग हे मौन काय मनाला जाळून टाकत आहे?माहिती नाही पण आता तरी मौन मनाला धगधगत ठेवत होते.बीना धूर आणि बीना विस्तवाने.मंद अग्नीवर जसा श्वास धगधगता.मूकपणाची  गोड उब एका अनोख्या जगात घेऊन जात होती. डोळे बंद होते आणि धुंदी पसरली होती. ही कोणती दुनिया होती? दुनिया की स्वप्न? स्वप्न की आणखीन कोणता वेगळा लोक? बेहोशीची धुंदी उतरता उतरता आतल्या आतच गात होती,’आज मदहोश हुआ जाये रे मेरा मन ,मेरा मन, मेरा मन ।बीना ही ,बात मुस्कुराये रे मेरा मन ,मेरा मन, मेरा मन!’ संध्याकाळ होता होता ही बेहोशी उतरत होती. ध्यान कक्षातील ध्यान, आता शारीरिक थकव्यामध्ये बदलले होते हे बेभान पण. कंबर दुखत होती. संध्याकाळच्या नाश्त्याने थोडा थकवा कमी झाला होता, प्रवचनानंतर मात्र पूर्णच थकवा नाहीसा झाला. प्रवचनामध्ये विचारांची जी दिशा होती, त्यात भावाची शुद्धता होती, तार्किकतेची पुढे नेणारी साखळी होती, विनयला मोहवत होती. 


खूप वर्षानंतर रात्री न जेवताच झोपण्याची वेळ आली होती. नियमच होता या शिबिराचा, रात्री जेवण मिळणार नाही. कुठल्याही तऱ्हेने रात्री खायचे नाही. रात्री न जेवता झोपण्याचे विद्यार्थी दशेचे दिवस आठवले. त्या काळात रात्री तर काय कधी कधी  दिवसही बिना अन्न पाण्याचे जात होते. चेहऱ्यावर जणू काही भूक दिसत असायची सिनेमाच्या पोस्टर सारखी. भुकेने पोटात गोळा उठायचा. पण त्यादिवशी मनात तर होते की भोजन मिळाले नाही पण पोटात भुकेचा गोळा उठला नाही. त्यांनी आरशात चेहरा पाहिला. चेहऱ्यावर भुकेचे पोस्टर दिसले नाही. 


तो झोपला. 


पहाटेच्या राम प्रहरी चार वाजता सर्वांना उठवण्याकरता घंटा वाजवल्या गेला. तो उठला नाही. थोड्यावेळाने एक व्यक्ती हातामध्ये  रुणझुण घंटी वाजवत आला. विनय तरी सुद्धा उठला नाही. आता तो माणूस विनयच्या खोलीसमोर तोपर्यंत घंटी वाजवत उभा राहिला जोपर्यंत विनय उठून उभा राहिला नाही. परंतु तो व्यक्ती तोंडाने काहीही बोलला नाही. ब्रश इत्यादी आणि स्नानानंतर विनय ध्यान कक्षात पोहोचला. सगळे ध्यानस्थ होते. त्याला खरोखरच खूप उशीर झाला ‘होता. आचार्यांनी त्याच्यावर एक नजर टाकली आणि परत ध्यानस्थ झाले. विनयने पाहिले ते इंग्रज यौवना आणि तिचा बॉयफ्रेंड ध्यानस्थ होते. बाकी सगळ्या महिला आणि पुरुष सुद्धा ध्यानस्थ होते. तसेही या शिबिरामध्ये अर्ध्याहून अधिक जास्त विदेशी होते. रशिया,ऑस्ट्रेलिया,फ्रान्स, लंडन, सिंगापूर इत्यादी देशातील स्त्रिया आणि पुरुष होते. जास्त करून जोडीने होते. पती-पत्नी एक-दोन होते. परंतु महिला मैत्रिणींसोबत अनेक जण होते. दोघे तिघे सिंगल सुद्धा होते. स्वतःच मग्न असलेले. जवळपास हरल्यासारखे. एकांतात सुद्धा अजून एकांत शोधणारे. ध्यानात सुद्धा ध्यान शोधणारे. भारतीय सुद्धा जे होते त्यात जास्त लोक मराठी होते. महाराष्ट्रातून पंधरा लोकांचा समूह आलेला होता. काही स्त्रिया देखील होत्या. खूप महिला वाडी अथवा ग्रामीण भागातून आलेल्या, डोक्यावर पदर घेतलेल्या होत्या. फक्त एकच स्त्री शहरी दिसत होती.तिला पण हिंदी भाषा येत नव्हती. जवळपास सगळेच स्त्री-पुरुष इथे ध्यान करण्याच्या बहाण्याने ताण तणाव कमी करायलाच आले होते. प्रत्येक जण स्ट्रेस मध्ये होता. कोणी सायंटिस्ट, कोणी प्राध्यापक, कोणी डॉक्टर, कुणी व्यापारी, कोणी ठेकेदार, कोणी शेतकरी, कोणी नोकरदार वर्गातील. मध्यमवर्गीय स्तरातील जास्त , काही उच्च मध्यमवर्गीय तर काही नीच मध्यमवर्गीय. पण सगळ्यांचे ध्येय एकच निश्चित होते तणाव कमी करणे . चूप रहाणे हे तणाव कमी करण्यामध्ये किती मदत करू शकते हे या शिबिरात आल्यावरच विनयला समजले होते. तुम्ही बोलणारच  नाहीत तर वादविवाद अजिबात होणार नाहीत. चूप राहणे आणि शिस्तबद्ध राहणे ह्यामुळे बरेच काही सोपे  होते. आणि वर परत ध्यान करणे. विपश्यना पद्धती जणू काही आपल्याला स्नानच घालत आहे. 


विनय सुद्धा नहातच होता. पण अर्धवट. अर्धवटच शिस्तबद्धपण आणि अर्धवटच ध्यान करू शकत होता. विनय कडे असा तसा काही तणावही नव्हता. तो तर फक्त घरातील समस्यांना कंटाळून आला होता. ह्या विचाराने देखील की जणू काही या पाहण्याने तो बुद्धाला शरण जाऊ शकेल आणि बुद्धा विषय काही समजू शकेल. बुद्धाला समजून घेऊन शुद्ध होऊ शकेल. थोडीफार शांती मिळेल. पण इथे तर बुद्ध अथवा बुद्धाविषयी काहीही नव्हते. होती तर फक्त बुद्धाची तपस्या. प्रौढत्वाकडे झुकणाऱ्या विनयच्या वश मध्ये हे काहीच नव्हते. रोजच्या रोज बारा बारा तास एका जागी बसून ध्यान करणे अतिशय कठीण होते. त्यानंतर बाजूलाच राहू दे पण बारा तास मांडी घालून एका जागेवर बसणे हे सुद्धा विकट समस्या होते. प्रत्येक अवयव, प्रत्येक पेशी वेदनेने दुखत होते. नुसते बसूनही कुणाचे शरीर दुखते का? पण हो , विनयचे शरीर दुखत होते. पाठ तर आता तुटून जाईल असे वाटत होते. दुसऱ्या दिवशी संध्याकाळच्या प्रवचनानंतर त्याने तिथे उपस्थित असलेल्या आचार्यांना ही गोष्ट सांगितली. ते हसून बोलले, “विकार निघत आहेत मनातून बाहेर, त्रास तर होणारच’.”


“विकार?” विनय चकित होत बोलला ,”मी कोणी पापी नाही .पाप नाही केले मी कोणतेही.” “विकार अनेक प्रकारचे असतात.”आचार्य म्हणाले,”पाप किंवा दुष्कर्म हे विकार नाही.” तसे त्यांनी पुढचे म्हणणे अधिक जोडले,“विकार निघून गेल्यावर कष्ट संपून जातील. देह जाणार नाही.”आणि मग त्यांनी इशाऱ्यातून सुचवलं की हा संवाद संपला. आता तुम्ही जा. अबोलपणाच्या या राजधानीत बोलण्याचा एकच अनुभव येत होता की आचार्यांची सीमित चर्चा प्रश्न समाधान करू शकत होतो. एकट्याने. सगळेजण गेल्यानंतर. अगदी हळू आवाजात. 


आता त्याच्या लक्षात आले काही लोक अचानक ध्यान कक्षातून गायब झाले आहेत. 

एक रशियन माणूस भिंतीशी टेकून बसला.मी सुद्धा भिंतीशी टेकून बसण्याचा प्रयत्न केला. शिबिराचा एक कार्यकर्ता आला. इशाऱ्यानेच मनाई करत आपल्या जागेवर जाऊन बसायला त्यांनी सुचवले. त्या संध्याकाळी त्याने आचार्यांना भिंतीशी टेकून बसण्याविषयी विनंती केली. आचार्यांनी सक्त मनाई केली. विनयने रशियन माणसाचा हवाला दिला. आचार्य म्हणाले,”त्याला काही मेडिकल प्रॉब्लेम आहे.”“प्रॉब्लेम मलाही आहे,”विनयने विनंती केली. “हा काही प्रॉब्लेम नाही.”चर्चा तिथेच संपली. 


मग त्याने पाहिले की एक फ्रान्सिसी व्यक्ती अचानक ध्यान कक्षातून गायब व्हायचा. मग त्याने निरीक्षण केले की त्याची महिला मित्र सुद्धा थोड्या वेळात उठून बाहेर जायची. हे सगळे  बघून त्याचे ध्यान खंडित व्हायला लागले. शारीरिक क्लेषांमुळे तर मन भटकत होते आता ही विदेशी जोडप्याचे प्रेम चाळे ही मन भटकवत होते. जेव्हा की स्त्रियांशीच काय पण पुरुषांशी सुद्धा संकेतांमध्ये संवाद करणे मान्य नव्हते. मोबाईल लॅपटॉप पुस्तके कागद पेन सगळे काही जमा केले गेले होते. बिस्किट, नमकीन, खाण्याजोगी पदार्थ जमा केले होते. कपडे साबण आणि औषध या व्यतिरिक्त कुठलीही गोष्ट कोणाही जवळ राहू दिली नव्हती. इतकं की अगदी जपमाळ सुद्धा जमा केली होती. कुठल्याही प्रकारचा तुमच्या पूजापाठ अथवा व्यायाम यावर प्रतिबंध होते. कारण काय तर ध्यान भंग होणे याचा धोका होता. कुठल्या दुसऱ्या पद्धती ध्यानमार्गात अडथळा ठरल्या असत्या, नुकसान झाले असते. मानसिक आणि शारीरिक सुद्धा. असेच सांगितले गेले होते. चंचल मनाला काबूत ठेवण्यासाठी अनेक प्रकार केले गेले होते. पण विनय पाहत होता की तमाम उपाय आता धराशायी होत होते. तो इंग्रज मुलगा थोडा दूर एका झाडाजवळ जाऊन बसायचा. त्याच्यापासून थोड्याच अंतरावर त्याची गर्लफ्रेंड बसायची. त्यांचे इशारे सुरू व्हायचे. एके दिवशी फेरफटका मारताना विनयने त्या दोघांना पाहिले. त्याच्या चेहऱ्यावर हसू उमटले. का कोण जाणे पण त्या इंग्रज मुलाला पाहिले की विनयला स्वतःच्या मुलाची आठवण यायची. या मुलाची उंची, त्याची देह बोली, त्याचे निष्पाप दिसणं आणि बरं च काही विनयच्या मुलासारखंच होतं. 


त्यामुळे त्याला मुलाची आठवण यायची. एक दिवस जेव्हा तो समोरून गेला, त्याने आपले  दोन्ही हात कपाळावरती ठेवत, थोडेसे झुकून मला नमस्कार करण्याचा मुद्रेत आला. काहीही न बोलता. विनयच्या मनात आले समोर जाऊन त्याला आलिंगन द्यावे.आपल्या छातीशी घट्ट आवळून धरावे. परंतु अनुशासनाची आठवण आली. तो तिथेच थांबला. आता तो मुलगा जेव्हा पण विनयला पाहायचा, आपले दोन्ही हात कपाळावर घेऊन नमस्कार मुद्रित यायचा. विनयला तेव्हा त्याच्याबद्दल खूप प्रेम वाटायचे. स्वतःच्या मुलाच्या आठवणीत तो डुबून जायचा. पत्नी आणि मुलींची सुद्धा त्याला खूप आठवण यायची. आपल्या माता-पित्यांची सुद्धा तीव्र आठवण येत होती. जे घर तो सोडून आला होता, आता त्याच घरी अगदी क्षणातच पोहोचावे या इच्छेने तो तळमळत होता. 


आता तो आचार्यांना भेटून हे सांगणार होता की ,’मला घरी जावेसे वाटत आहे. हे ध्यानधारणा यात माझे मन लागत नाही. हे माझ्या वशमध्ये नाहीं.’परंतु शिबीरात नाव  नोंदणी करताना भरलेल्या बॉण्ड चा मजकूर, कडक शिस्त, त्याला भारून टाकायचे. पण जेव्हा हात जोडलेला इंग्रज मुलगा समोर दिसायचा,त्याचा सगळा संयम गळून पडायचा . बॉण्ड मधील सारा मजकूर तो विसरून जायचा. 


तर काय जेव्हा बुद्धाने घर सोडले तेव्हा त्यांना पत्नी आणि मुलाची शुद्ध नव्हती? माता पिता आणि कुटुंबाची आठवण आली नाही? तू राजमहाल ,ते ऐश्वर्य ,त्या सुविधा साधन, तेथील भोग विलास आठवले नाहीत का? 


नक्कीच आठवले असतील. 


मग बुद्ध परत का फिरले नाहीत? आपल्या घरी बुद्ध का आले नाहीत? बुद्ध घरी आलेच नाहीत आणि तो दोन-चार दिवसातच घरी परत जायची कामना करत आहे. मौन आणि नियमबद्ध आचरण याचाच परिणाम होता का? की मनामध्ये, जसे की आचार्य म्हणतात, त्या विकाराचे निमंत्रण आहे की घरी परत ये, घरी परत ये विनय ,घरी परत ये ! हे तप साधना, तुझ्या वश मध्ये नाही. ना कोणते वर्तमानपत्र ,ना टीव्ही, ना फोन ,ना मोबाईल, ना  लॅपटॉप, ना घर परिवार , ना बाकी दुनियेशी कुठला संपर्क. फक्त शिबिर आहे, श्वास आहे ,श्वासाचा स्पर्श आहे. येणाऱ्या जाणाऱ्या श्वासावर लक्ष केंद्रित करणे आहे. शिस्तबद्ध दिनचर्या आहे. पहाटे चार वाजता उठायचे, ध्यानधारणा करायची, सकाळी सहा वाजता नाश्ता. सूर्योदयापूर्वीच नाश्ता होऊन जातो. स्नान करून परत ध्यानाला बसायचं. भोजना नंतर थोडी विश्रांती. परत ध्यान. ध्यान, ध्यान आणि फक्त ध्यान. स्वतःची उपस्थिती जाणवू न देणे हे ध्यान आहे. आचार्य म्हणतात साक्षी भावाने स्वतःला पाहणे, तटस्थ भावाने स्वतःला पाहणे हेच ध्यान आहे. जर हातापायाला मुंग्या आल्या, खाज सुटली, काहीही झाले तरी त्यावर प्रतिक्रिया व्यक्त करायची नाही. तटस्थ राहायचे. तटस्थ भावाने ने जाणवून घ्यायचे. जेही काही होत आहे ते होऊ द्या. 


हे कसे शक्य आहे? विनय आचार्यांना विचारू इच्छित होता. इथे तर एका मुद्रेत अथवा एका आसनात थोड्या वेळ सुद्धा बसणे होत नाही आहे, बसण्याची स्थिती आणि अवस्था सारखी बदलावी लागत आहे. आणि आचार्य म्हणतात तटस्थ भावाने, साक्षी भावाने फक्त पाहायचे. हे कसे करायचे? 


विनयलाआठवले, लहानपणी ऐकलेल्या अथवा वाचलेल्या किती तरी गोष्टी. जसे की शत्रू सेना येऊन युद्ध लढून, युद्ध जिंकून परत गेली. परंतु बुद्ध आपल्या ध्यानात मग्न होते. त्यांना काही कळलेही नाही.  बुद्ध त्यावेळेस ध्यान मग्न होते, त्यांच्या शरीरावर मुंग्या येत  जात होत्या. मुंग्यांनी मार्ग बनवला होता. परंतु त्या बुद्ध भिक्षुकाची साधना संपली नाही. तर काय विनय सुद्धा अशा कुठल्या साधनेमध्ये मग्न राहू शकतो? तो विचार करतो आणि विचारच करत बसतो. खूपच कठीण आहे!


आजच्या तारखेला सुद्धा असा कोणी बुद्ध असेल का जगात जो साधनेमध्ये लीन असेल आणि मुंग्या त्याच्या अंगावरून येण्या जाण्याची वाट बनवत असतील. जशी शत्रुसेना युद्धात लढून जय मिळवून परत गेले आणि बुद्धाचे ध्यान भंग झाले नाही. आज शक्य तरी आहे का असे काही? असे असेल तर आपला चीन काय करत आहे? सीमेवरही आणि विश्व बाजारामध्ये ही! कोरोना सारखी महामारी सबंध जगात पसरवून,आपल्या आजूबाजूला आतंकाचा पर्याय बनवून चीन काय करत आहे? शेवटी चीन तर स्वतःला बौद्ध देश मानतो. विनय स्वतःलाच प्रश्न करत राहतो. मग  का चीन आणि चीन मधले लोक विपश्यना आणि ही साधना पद्धत यापासून अनभिज्ञ आहेत? त्यांना साक्षी भाव माहिती नाही का?तटस्थ भाव त्यांना माहिती नाही का? की स्वतःपासूनच स्वतःला वेगळे करून पाहायचे ?विनय स्वतःलाच विचारतो. आणि मग निरत्तर होत जातो. की वामपंथी हुकूमशाही आणि फॅसिझम मध्ये गुंतलेला चीन आपल्या साम्राज्यवादी स्वभावात स्वतःच विसरला आहे का, बुद्ध, त्यांची अहिंसा आणि त्यांचे विचार. 


चीन?


चीन सोडाच, आपल्या भारतातही खूपशा जागी विनाय गेला आहे. पश्चिम बंगालमध्ये दार्जिलिंग अथवा सिक्कीम ला गंगटोक अशा  अनेक जागी. जिथे अधिकांश लोक बौद्ध आहेत. जिथे बौद्ध विहार आणि बौद्ध मठ असंख्य आहे.दारू आणि गोमांस त्यांची दिनचर्या आहे.मेघालयच्या शिलॉंग पासून गंगटोक पर्यंत सगळीकडे त्यांनी हेच पाहिले. आणि सगळे काही खुलेआम. ना त्याग, ना तपस्या, ना साधना. बस साधन आणि ऐश्वर्य यांची स्पर्धा लावलेले लोकच मिळाले. अधिकांश. 


साधन आणि साधना यातील तीव्र संघर्षामुळे आपल्या आयुष्यामध्ये अशांतता निर्माण झाली नाही का? विनय विचार करत आहे.


शिबिरामध्ये आणखीन एक फ्रान्सिसी आहे.तो स्वतःतच हरवलेला राहतो. चुकूनही कोणाकडेही जात नाही .तो जेव्हा रिकामा असतो तेव्हा कुठल्याशा रोपा जवळ, झाडा जवळ जातो. कुठल्या फुलाजवळ जातो.झाडाच्या पानांवर ओठ टेकवतो.खूप लक्षपूर्वक, अतिशय प्रेमाने त्याकडे पाहतो.जणू काही तो छोटा बालक असून ते झाडाचे पान त्याची आईच आहे. मंत्रमुग्ध होऊन त्या झाडांना तो असाच भेटतो या मौनाच्या राजधानी मध्ये. विनयही त्याला पाहून भावुक होतो. 


एका बौद्ध तीर्थस्थळाच्या कुशीत वसलेले दुर्गम गाव, येथे शिबिर आहे.इथे अतिशय शांतता आहे,एकांत आहे.आजूबाजूला कोणताही आवाज नाही ,गाणी नाही, संगीत नाही. दूर दूर काही खेडेगाव दिसतात. जवळच एक कालवा आहे.गहू आणि ऊस यांचे हिरवेगार शेते आहेत. शिबिरात काही जागी फुले, काही झाडे झुडुपे , वनस्पती दिसतात. असे वाटते की त्याच पानांची इथे सळसळ आहे, तोच त्यांचा ध्वनी आहे, तीच त्यांची बोली आहे. त्या फ्रेंच माणसाला ही बोली कळते का? 


कोण जाणे? 


एक ऑस्ट्रेलियन आहे दुपारच्या जेवणाच्या वेळेस डायनिंग हॉलमध्ये तो बसतो तेव्हा विनय त्याच्याकडे लक्ष ठेवतो अगदी निर्विकार पणाने ताटात पोळी पसरवतो. पहिले भात वरण खातो. मग पोळी मध्ये भाजी पसरवून घेतो. त्या पोळीचा रोल बनवतो. जसा एखादा लहान बाळ पोळीचा रोल हातात धरून खातो तसा तो अगदी आनंदाने तो पोळीचा रोल खातो. एक प्रौढ माणूस लहान बाळासारखा हातात रोल धरून कसा आनंदाने जेवतो आणि तेही दररोज? जसं तो स्वतःच आई आहे आणि स्वतःच मूल आहे. ह्यात लहान बालकाचे निरागस पण आणि पोळी  भाजीचा रोल देणाऱ्या आईचे वात्सल्य  दिसले ते विस्मयकारक होते. एक साधू, भगवे वस्त्र धारण केलेला युवक, सिंगापूरहून आला. का कोण जाणे तो दोन्ही हाताने जेवतो. असे वाटते की तो जेवत नसून दोन्ही हातांनी चेंडू खेळत आहे. जणू काही तो प्रथमच अन्न पाहत आहे. कुठल्या जादूगाराप्रमाणे. काही काही अन्न पण त्याच्या दाढीमध्ये अडकत आहेत. पण त्याला त्याची पर्वा नाही. फक्त युद्ध स्तरावर तो जेवणामध्ये मग्न झालेला आहे. ठीक आहे. याच पद्धतीने तो भोजनगृहातील स्त्रियांकडे आणि अनिमीष नजरेने पाहत असतो विना संकोच. विनयला वाटते जेव्हा हे मौन व्रत संपेल, तेव्हा तो त्या साधूला वैराग्य सोडण्याचे सांगेल. परंतु त्याचे हे वागणे ,जेवण आणि महिलांपर्यंतच मर्यादित आहे. बाकी तर तो दररोज त्याचे घोंगडे सुद्धा धुतो. साफसफाईकडे त्याचा विशेष कल असतो. पण रोजच्या रोज घोंगडे का धुतो, विनयला कळत नाही. असे तर नाही ना की महिलांकडे पाहताना ,ज्या तीव्र ओढीने तो पाहतो, त्यामुळे रात्री झोपेत स्खलीत होऊन कपडे खराब करत असेल. अपराध भावनेने, रोजच्या कपड्यांसह घोंगडे धूत असावा. कुणाला माहिती? पण इथे साधनेमध्ये ब्रह्मचर्याचे पालन आवश्यक आहे. त्याचे ब्रह्मचर्य खंडित होत आहे का? अन्न आणि स्त्री  पासून ची वंचना पुरुषाला इतकी अस्वस्थ करते? 


आता ध्यान कक्षातून फ्रान्सिस माणूस सुद्धा दिसेनासा झालाय. त्याची महिला मित्र सुद्धा दिसत नाहीये. अचानक दोन महाराष्ट्रीयन सुद्धा अनुपस्थित झाले. हळूहळू अजून एक दोन लोक. इथे तर आजारपणात देखील ध्यानापासून कोणालाही सुट्टी मिळत नाही.


 विनयला आठवले एकदा विद्यार्थी जीवनात असताना एनसीसी कॅम्पला गेला होता. तिथे पहाटे चार वाजताच उठून धावायला पाठवत होते. पहाटे चार वाजेपासून तर रात्री नऊ वाजेपर्यंत सतत कामात व्यग्र ठेवणारी दिनचर्या होती. खूप मेहनत धावण्याची,पळण्याची. फक्त भोजन, नाश्ता ब्रेक आणि दुपारी एक तास विश्रांती. छोट्या छोट्या चुकांवर हातात रायफल उचलून उभे राहणे अथवा धावणे अशा शिक्षा मिळत. काही वेळा कोणी मुलगा आजारी असण्याचा  बहाणा करत परेड ला अनुपस्थित राहिला तर सुट्टी मिळायची पण त्याला जेवण नाकारले जायचे. अंड दूध ब्रेड यावरच दिवस काढायचा, ते ही अतिशय मर्यादित दिले जायचे. मग खूप भूक लागायची. मग सगळ्यांनी एक उपाय शोधला. बाकी दोन-तीन मित्र  जेवताना दोन-तीन पोळ्या आपल्या खिशात लपवून आणत. आपल्या आजारी मित्राला ते खायला घालत. इथे तर असे काही शक्य नव्हते. 


एनसीसी कॅम्प मध्ये जाण्यापूर्वी विनय सैन्यात भरती होण्याचे स्वप्न पाहत होता. पण एनसीसी कॅम्प मध्ये इतका गोंधळ झाला की विनयने सैन्यात भरती होण्याचा विचार बदलला. याप्रमाणेच विपश्यना शिबिरात येण्यापूर्वी विनय पत्नीवर जेव्हा नाराज होत होता, तेव्हा रागाने म्हणायचा आता मी हे घर सोडून संन्यासी होतो. पण आता इथे आल्यावर, ध्यान करताना सुद्धा त्याला इतका त्रास वाटत होता की त्याला संन्यासी होण्याचा विचार सुद्धा करवत नव्हता. आता तर एवढेच  हवे होते की लवकरात लवकर शिबिर संपावे आणि घरी जावे. श्वास, श्वासा चा स्पर्श, मनोनिग्रह, तटस्थ क्रिया, साक्षी भाव, स्वनिरीक्षण दिवसेंदिवस अधिकाधिक कठीण होत होते. तो कसा बसा चार ते पाच मिनिटे डोळे बंद करून कसेतरी अर्धवट निभवत होता, श्वास आणि श्वासाद्वारे स्वतःला स्पर्श करणे, साक्षी भावाने स्वतःचे निरीक्षण करणे.एखाद्या वेळेस या प्रक्रियेतून अंतस्थ स्वर्ग अनुभूती जाणवली. वाटायचं की कुठल्या दुसऱ्याच दुनियेत आपण प्रवेश केला आहे. पण लगेच मन भटकत राहायचं. 


मन देहाला साक्षी भावाने पाहण्याऐवजी, देहाच्या हालचाली, देहाचेच स्फुरण ,तटस्थ भावाने पाहाण्याऐवजी कौटुंबिक समस्या, व्यक्तिगत गोष्टी, कार्यालयातील बदमाश लोकांपासून दूर कसे जावे याचा विचार करत राही. यातून कसाबसा सुटला तर तो डोळे मिटून झोप घ्यायचा. कधी अर्धवट झोप,अर्धवट जागृती,पेंगत पडायचा. मग कोणी कार्यकर्ता येऊन त्याला उठवायचा. सगळं काही नीट होत होतं फक्त ध्यानच प्रामाणिकपणाने आणि योग्य रीतीने होत नव्हते. तो विचार करायचा कोणी व्यक्ती तासनतास ध्यान कसे करू शकतो. तो स्वतःलाच विचारायचा संन्यासी बनणे इतकी अवघड आहे का? आणि इथे तर ध्यानाशिवाय कशाचीही चिंता नव्हती. तयार अन्न, पाणी, राहण्याची जागा, विज सर्व व्यवस्था होती. जंगल  आणि इतर तपस्या स्थलासारखी कोणती ही समस्या नव्हती.पूर्ण सुरक्षा होती.पर्वत ,जंगल इत्यादी जागांवर जाऊन लोक तपस्या करतात तर कसे करत असतील? काय खात पीत असतील? 


विनय ही याचाच विचार करत त्रासून गेला. जसे काही एखाद्या तरुण मुलीला तिच्या वक्षांचा भार होत आहे,त्याप्रमाणे विनयला त्याच्या साधनेचा भार वाटत होता. तो ध्यान कक्षात बसून एका विदेशी महिलेचे श्वासोच्छवास क्रिया निरखत होता. श्वास घेताना आणि सोडताना तिचे भारी वक्ष सुद्धा जोरजोरात वर खाली हलत होते. जसे केळीचे पाने वर खाली हलतात. ध्यान सोडून तो हेच पाहत होता, समजून घेत होता.कोणाचे नितंब, कोणाचे वक्ष. तो विचारत पडला, गोरी त्वचा एवढी उन्मुक्त कशी आहे? ही उन्मुक्तता, गोरे आणि काळे या वंश भेदाशी  ह्याची नाळ जोडली आहे का? अचानक समोर बसलेल्या आचार्यांकडे त्याची नजर गेली. त्याच्या लक्षात आले चोर नजरेने का होईना आचार्य ही त्या गोऱ्या कातडीचा  मुक्ततेचा लाभ घेत होते.असे करताना विनयने त्यांना पाहिले हे आचार्यांच्या लक्षात आले त्याबरोबर त्यांनी डोळे घट्ट मिटून घेतले. विनय ने सुद्धा. नंतर आचार्यांच्या टेपच्या आवाजात तो हरवून गेला. खूप आनंद आहे या टेपच्या आवाजात. इतका सतर्क, इतका स्पष्ट आणि तपशीलाने भरलेला, एखाद्या नावे प्रमाणे पाण्यावर हेलकावणारा आवाज त्याने यापूर्वी ऐकला नव्हता. आरोह -अवरोह आणि श्रद्धा असे मिलन, जणू कानामध्ये जलतरंग वाजत होते, जणू मधुर , शांत वाऱ्याची झुळूक कानाला स्पर्शून जात होती. असे भासत होते की तो देव लोकात पोहोचला. आचार्यांचा आवाज पंडित शिवकुमार शर्मा यांच्या संतूर प्रमाणेच,मधात घोळलेला ,कानातून हृदयात प्रवेश करत गेला. डोळे बंद करून, दिव्य आनंदाने ऐकत ऐकत, अलौकिक आनंदाने तो भरून गेला होता. हळूहळू आणि हळूहळू तो पेंगू लागला. 


तो उठून बाहेर आला आहे. 


तो इंग्रज मुलगा बाहेरून आत येतोय, हसत हसत हात जोडून, थोडासा झुकून , विनयला अभिवादन करतो. तो आज जातो आणि विनायला स्वतःच्या मुलाची आठवण येते. या दोन्ही मुलांमध्ये फरक एवढाच आहे की इंग्रज मुलाच्या चेहऱ्यावर दाढी आहे, विनयच्या स्वतःच्या मुलाला दाढी नाही. निष्पाप, निरागसपणा ,साधेपणा, विनम्रता आणि त्याची उंची अगदी हेच सर्व विनयच्या मुलात आहे. विनय एका ओट्यावर बसतो डोळे बंद करतो आणि मुलाच्या आठवणीत सर्व काही विसरून जातो. त्याच मुलाच्या आठवणीत हरवतो ज्याच्या त्रासाने, त्राग्यानेच तो विपश्यना केंद्राला आला आहे. शांततेच्या शोधात. आणि शांतता अशी आहे की जी मिळतच नाही. झोप मिळते. जणू माघातले कोवळे ऊनच त्याला अंगाई म्हणत झोपवून देत आहे. बसल्या जागीच तो परत झोपला. 


विनयला इतकी झोप का  बरं येते? स्वप्नातही स्वतःलाच कदाचित तो हा प्रश्न विचारतो . शयन कक्षात तर तो झोपतोच.सकाळ असो अथवा दुपार जशी कोणी आई बाळाला अंगाई गाऊन झोपवते. तसा एक कार्यकर्ता रूणझूण घंटी वाजवत वाजवत त्याला उठवायला येतो.अगदी रोजच. मोठी घंटा वाजते तेव्हा तो फक्त विचार करतो आता उठायला हवे, असा विचार करूनही तो परत झोपतो. परत बिचारा कार्यकर्ता मधुरा आवाजातली घंटी वाजवतो. दोन-तीन मिनिटानंतर तो उठतो. कार्यकर्ता अजिबात चिडचिड करत नाही. हसतो. तो काश्मिरी आहे. त्याच्या चेहऱ्यावर काश्मिरी सफरचंदाची लाली पसरल्यासारखे आहे. ध्यान कक्षातही विनय अधून मधून.नाक  शिंकरतो.आता ध्यान कक्षाच्या बाहेरही ओट्यावर बसून तो डुलकी घेत आहे. इथे आता जर विपश्यना शिबिरा ऐवजी एनसीसी कॅम्प असता तर  गुरूजनांकडून त्याला रायफल घेऊन पूर्ण मैदानाला कितीतरी फेऱ्या मारायला सांगितल्या गेल्या असत्या. पण इथे विपश्यनेमध्ये मात्र आचार्य असे काही सांगत नाहीत. 


खोलीत एक कॅलेंडर सुद्धा नाही, जे पाहून घरी कधी जायचे हे कळू शकेल. मनातल्या मनात दिवसांची गणना सुद्धा तो विसरला आहे. तो कधी आला आणि केव्हा परत जायचे आहे? वर्तमानपत्र, टीव्ही सुद्धा पाहिल्या जात नाही. बसून बसून पाठ ,कंबर 

भयंकर दुखत आहे. धनुष्यासारखी वाकल्यासारखी झाली वाटते. अशा परिस्थितीत कुणाला कसे कुठला दिवस आहे हे आठवेल? विनयला तर हे आठवत नाही. दुसऱ्या कोणाला आठवतही असेल. जर ह्याप्रमाणेच आणखीन काही दिवस तो इथे राहिला तर तो असे सगळे विसरेल का? विसरून जाईल आपल्या यशोधरेला आणि पुत्राला? तो बुद्ध होईल का? बुद्ध बनून शुद्ध होईल का? बुद्ध सुद्धा आपल्या कुटुंबाला असेच विसरले होते का? आणि अगदी विसरलेच होते तर ते तप करताना कोणाला शोधत होते? काही शोधण्यासाठी तप होते की काही विसरण्यासाठी? कधी कपिलवस्तू,कधी श्रावस्ती, कधी सारनाथ, तर कधी कुशीनगर,गल्ली गल्ली, रस्ते रस्ते ,नगर नगर ते सगळं काही विसरत फिरत होते होते की परत आठवत फिरत होते? ते तर स्वतःलाच विसरायला शिकत होते, शिकवत ही होते ,स्वतःला विसरून जा. साक्षी भावाने, तटस्थ भावाने स्वतःकडे पहा. दुःख असो वा सुख, स्वतःला त्याची जाणीव होऊ देऊ नका. फक्त पहा आणि पुढे जा. किती सोपे आहे हे कोणाला सांगणे आणि शिकवणे! किती कठीण आहे हे आचरणात आणणे?


खरं सांगा,बुद्ध तुम्ही याचा कसा स्वीकार केला होता?कसे शिकले?फक्त विपश्यने द्वारे?

अच्छा,जे तुम्ही शिकलेच होते, विसरले होते अगदी स्वतःलाही, तरी पण मग तुम्ही अनेक वर्षानंतर आपल्या त्या राजमहालात कश्या करता गेले होते? फक्त भिक्षा मागण्यासाठीच? आणि यशोधरे कडून तिचा पुत्रच मागितलात भिक्षेमध्ये? ही तुमची साधना होती का,बुद्ध?ती यशोधरेचा त्याग?ते असं म्हणतात की  तिने तुम्हाला पुत्र दिला देखील ,तिचा एक मात्र आसरा,तिचा प्रिय पुत्र. हे करताना ती असं म्हणाली की ,यापेक्षा अमूल्य आणि याशिवाय माझ्याजवळ आहे तरी काय जे मी तुम्हाला देऊ? आणि तुम्ही घेतलात तिचा पुत्र. खरं खरं सांगा बुद्ध मुलाला घ्यायसाठीच तर तुम्ही ‘राजमहालात गेले नव्हते ना? अच्छा, आणि ती संतती मुलगा नसता मुलगी असती तर तुम्ही भिक्षेत स्वीकारले असते का? विनय स्वतःच्याच मनातल्या मनात प्रश्न विचारत होता. एका संध्याकाळी या विषयावर त्याला आचार्यांशी सुद्धा चर्चा करायची आहे. पण आचार्य मात्र या विषयी वादविवाद चर्चा करण्यास घाबरतात, ते म्हणतात इथे चर्चा फक्त विपश्यने बाबत होईल. ते सुद्धा विवादास्पद नाही. फक्त प्रश्न आणि उत्तर या रूपात होईल. संक्षिप्त स्वरूपात. आणि त्यांच्याकडे प्रश्नाचे उत्तर फक्त विकार आणि विकार मुक्ती हेच असतात. विनयला हे आवडत नाही. 


तो पुन्हा साधनेमध्ये डुबून गेला. शरीर क्लेश विसरून गेला. मनाने आता वैरागी होत चालला.आता वैराग्याशी अनुराग झाला. आता तो श्वासाला फक्त येता जाताना, साक्षी भावाने पाहायला शिकत आहे. आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांचा व्हिडिओ प्रवचन त्याला आवडत आहे. आचार्य आपली प्रत्येक गोष्ट सांगताना तार्किक कशा उपकथानकांची ही जोड देतात. तर्हेतर्हेच्या कथा. मनोरंजक. अगदी आचार्य रजनीश यांच्या शैलीत. पहिले कथा मग तर्क आणि मग अकाट्य तर्क. जणू काही आपण त्या गोष्टी नंतर गाठ बांधावी. परत विसरू नये. कथानकात बुडलेल्या गोष्टी अगदी  अंतर्मनाला,हृदयाला स्पर्श करून जातात. जर ही कथा स्मरणात राहून जाते तर देहात अथवा मनात उठणाऱ्या प्रतिक्रिया यांना कसे विसरावे? ही विसरण्याचे नाटक करायचे? की हो मी साक्षी भावाने पहात आहे. खाज सुटत आहे देहाला आणि मनाला देखील, विसरण्याचे सोंग सुरू आहे. मग हे ध्यान म्हणजे अभिनय आहे की साधना? विनय मनातल्या मनातच हे विचारत आहे. आचार्य प्रत्येक चर्चेनंतर अथवा प्रत्येक गोष्टीनंतर जसे संपुट असते वा सूत्र अथवा स्लोगन याप्रमाणे दोनदा, तीनदा सांगत राहतात, ‘ ही  वेळ पण निघून जाईल .’आणि मग विनय प्रत्येक वेळेस मनातल्या मनात स्वतःलाच विचारतो की जर सगळेच निघून जाईल तर उरेल काय? काळ चांगला असो अथवा वाईट निघून जातोच. पाणी वाहून जाते पण कातळांवर त्याचे चिन्ह उमटतेच. तर काय हे निशाण ,चिन्ह हेच इतिहास आहे का? म्हणजे इतिहास मागे उरतोच. हारजीत इथे शिल्लक राहतेच. त्याविषयीच्या कथा इथे राहतातच. मग जेव्हा इतिहास बाकी उरतो. कथानके,गोष्टी राहतातच,तर मग  ते निघून काय जाते, शेष उरते काय,फक्त दुःख अथवा सुख? की आणखीन काही? आणि या प्रश्नाचे उचित उत्तर त्याला मिळतच नाही. अगदी मनाच्या कुठल्या कानाकोपऱ्यातही नाही. 


तो अनुत्तरीत बसला आहे ध्यान कक्षामध्ये. ध्यानामध्ये व्यस्त आहे. आता तो गोऱ्या, अर्धवट कपडे घातलेल्या, अर्धवट उघड्या विदेशी महिलांकडे पण पाहात नाही, नाही पाहत त्यांच्या शरीराचे उभार अथवा उतार चढाव. शरीराचा ज्वर आणि नशा त्याच्या मनातून उतरले आहे. ध्यानात रामलेला आता तो साक्षी भावाने स्वतःचे निरीक्षण करू लागला. त्याला वाटले आपला हेतू साध्य झाला आहे. या शिबिरात तो यशस्वी झाला आहे. 


पण हे खरेच आहे का? 


खरोखर हे असे नव्हते. खरंतर तो स्वतःवरच नियंत्रण ठेवू शकत नव्हता? शिबिरात यश कसे मिळवेल? पण तो तिथे राहात होता.भले तो तिथे राहायला आला होता परंतु शिबिर त्याच्या शरीरात नदीसारखे वाहत होते. यावर त्याचे नियंत्रण नव्हते. नदी तर जणू त्याच्या मनात ताणतणावाचे बीज रोपत होती. स्वतःचे निरीक्षण करण्याऐवजी तो आता स्वतःमध्ये भिनलेल्या ताण-तणावाचे निरीक्षण करत होता. तणावाचे निरीक्षण करता करताच तो ध्यान मग्न व्हायचा आणि मग पेंगत राहायचा. पेंगता पेंगता  कधी  शिंक यायची . ध्यानाची ही अशी कुठली नदी आहे बरं. जी तणावात सुद्धा निद्रेच्या नौकेत बसवून देते. अचानकच आचार्यांची सहयोगी त्याला हलवून या निद्रेच्या नौकेतून उतरवून घेत असत. सारखं सारखं  तो असेच करत असतो. जणू काही निद्रेची नौका त्याची सहप्रवासी आहे. सुख असो दुःख असो काहीही असो निद्रेची नौका अत्यंत प्रेमाने त्याला बोलावते आणि बसवते. ध्यानाची नदी तर कधी पार होत नाही पण नौका, निद्रेची नौका ध्यानात मिळत राहते. त्या नौकेला तो कधी मनाई करत नाही.झोपेपेक्षा अधिक सुख कोणते आहे बरे? या सुखाला का नाकारायचे? नदी आपल्यात ताण तणाव भरेल, आणि निद्रेची नौका  मिळेल तर नदी पार होवो ना होवो पण ताण तणाव पार होतो. आणि नदी पार करण्याची शुद्ध आहे कुणाला? या अबोल अश्या राजधानीत ध्यानाची नदी आपल्यात ताणतणाव बीजे पेरत आहे, अशा वेळेस निद्रेची नौका मिळून तरी काय फायदा! शिबिराच्या ध्येयाला, ध्यानमार्गाला प्रत्येक पावलावर विचलित आणि दिशाभूल करते. मनातल्या कोलाहलाला ही शांतता दाबून टाकू शकेल काय? लोक म्हणतात, मौनात खूप शक्ती आहे. मग मौन मनातील गोंगाटाला, कल्लोळाला का शांत करू शकत नाही? एखाद्या शिळेवर समुद्राच्या लाटा आदळून परत फिरतात, त्याप्रमाणेच मनातील पराभूत कल्लोळ वाढतच आहे. विपश्यनेच्या सुद्धा वश मध्ये नाही वाटत मनातील कोलाहलावर नियंत्रण .


गलबलाट!


लहानपणी घरात एक पोपट होता .काकांनी आणला होता. का कोण जाणे पण पोपटाचा पिंजरा काका विनय कडूनच धुवून घ्यायचे. पोपटाला आंघोळ घालताना कैक वेळा विनयच्या मनात आले पिंजऱ्याचे दार हळूच उघडून ठेवून पोपटाला उडवून द्यायला हवे. रोजच्या रोज त्याला आंघोळ घालण्याच्या त्रासातून  सुटका. पण मग घरात फिरणारी मांजर पाहिले की आठवायचे पोपटाच्या जीवाला धोका होईल. मग तो पोपटाला उडवून लावण्याचा विचार जवळपास रोजच पुढे ढकलायचा. पोपट मांजरीची शिकार होऊ नये. कदाचित आता तर पोपट उडायचेही विसरला असेल. कारण बंद खोलीमध्ये पिंजरा उघडून पोपटाला फेरफटका मारायला लावायचा हा त्याचा खेळ होता. पिंजऱ्यातून बाहेर आल्यावर पोपटही लहान बाळासारखा ठुमक ठुमक करत चालायचा.इतके की अगदी, ठुमक चलत रामचंद्र बाजत पैंजनिया!  ह्या भजनाची आठवण यायची. पण पोपटाला खोलीत उडता यायचे नाही. मग काय तो उडणे विसरून गेला असेल? की मोकळी हवा मिळत नव्हती म्हणून तो उडत नसेल? त्याच दिवसांत काकाला सप्ताहामध्ये एक दिवस मौन व्रत राखण्याचा विचार सुचला होता. कोणीतरी त्यांना सुचवले होते की एक दिवस मौनव्रत धारण केले तर खोटे बोलणे कमी होते. मन शांत राहते इत्यादी इत्यादी दिवसभर मौनव्रतात राहून रात्री आळणी भोजन करून ते उपास,मौनव्रत सोडत असत. बहुतेक वेळेस दूध पोळी अथवा शिरा पुरी खात असत. पण विनयने पाहिले होते काका मौन व्रतामध्ये संकेतांद्वारे जास्त खोटे बोलत होते. जसे की त्यांना कोणी विचारले अमुक अमुक इसमाला आता आपण पाहिले काय? भलेही त्यांनी पाहिले असेल, संकेत आणि हात हलवून अथवा डोके हलवून, मान फिरवून मना करून नकार सांगत. या तऱ्हेने ते बोलत तर नव्हते ,पण खोटे मात्र भयंकर बोलत होते. त्यांच्या मौनव्रताचे ,खोटे न बोलण्याचे व्रत ते वारंवार तोडत असत. जास्तीत जास्त तोडत असत. पण त्यांच्या मनामध्ये मात्र हा भाव होता की एक दिवस तरी ते खोट्या पासून वाचले 


मनात हा असा  कोलाहल असला तर कोणी काहीच करू शकत नाही, विनय सुद्धा नाही.


विपश्यना शिबिरामध्ये विनय सुद्धा आपल्या मौनाच्या  गडबड गोंधळाला सांभाळू शकत नव्हता. मनाचा बांध आता गळून गळून तुटत आला होता. मनातला गलबला मात्र तीव्र वेगाने वाहत होता. शारीरिक वेदना आता सहन करण्याजोग्या झाल्या होत्या. ध्यानाचाही आनंद मिळत होता .परंतु मनातल्या कोलाहलाचा सूर मात्र वाढलेला.


संध्याकाळचे ध्यान सत्र चालू झाले .नेहमीप्रमाणे सिंगापूरचा साधू सतत साधू- साधू असा जप करत होता. तेव्हा अचानक एक स्त्री ,”तू काय करशील, तू माझं काय घेशील तू मला जगू देशील का?” ती महिला मोठ्या मोठ्या आवाजात ओरडत होती ,”मी पूर्वी  सारखी जगणार नाही आता , मी तुला मारीन ,मी तुला मारून टाकीन, आता माझी वेळ आली आहे ,माझी वेळ आली आहे.” ती आता डोलत होती , चित्र विचित्र गोष्टी बोलत होती , ती बेहोश होऊन डोलत होती. पूर्ण ध्यान कक्षातील पिन ड्रॉप सायलेन्स सामूहिक तणावात  बुडून गेले. त्या स्त्रीचा विलाप जणू काही ध्यान कक्षातील छताला तोडून आकाशाला छेद करेल असा भासणारा होता.त्या महिलेच्या विलापात सर्व ध्यान कक्ष बुडून गेले. सगळे परदेशी तिच्याकडे तोंड वासून पाहायला लागले. आश्चर्यचकित भाव होता. विनयला काही आश्चर्य वाटले नाही.त्याच्या लहानपणी त्याच्या गावात असे दृश्य त्याने अनेकदा पाहिले होते. अनेकदा स्त्रियांना जेव्हा भूतबाधा होते,चुडेल,जाखीणी, डाकिणी यांची बाधा होते, तेव्हा लोक मांत्रिकांना बोलवत. चुडेल आणि भूतांना पळवून लावण्यासाठी. हे मांत्रिक लोक स्त्रियांना मार पीट करून भूत आणि चुडेल यांना हाकलून लावत. धूप , लाल मिरच्या असे पदार्थ ते धूपपात्रामध्ये आगीत जाळत असत. त्या महिलेच्या तोंडापाशी ते पात्र नेत असतात. मिरच्यांचा धूर सहन न झाल्याने ती महिला ओरडत असे. मांत्रिक तिला घाणेरड्या चामड्याच्या जोड्याने मारत असे. तो तिला सतत मारहाण करत असे. महिला झुलत डोलत ओरडत असे. विचित्र विचित्र गोष्टी ती बोलत असे. “ मी आता तुला सोडणार नाही ?”असं म्हणत असे. मांत्रिक विचारायचा, “तू कुठूनआलीस ,कधी जाणार आहेस, लवकर जा .” मग तोही काहीतरी विचित्र विचित्र शब्द बोलायचा. झाड फुक करून तो निघून जायचा. असे बरेचदा, खूप खूप दिवस चालायचे. मग काही दिवसांनी मांत्रिक चुडेल अथवा भूत निघून गेले आहे असे जाहीर करायचा. पण ती चुडेल परत त्या स्त्रीला केव्हा पकडेल याचा काही नेम नव्हता.मग परत तेच विषचक्र,मांत्रिक, धूप, लाल मिरच्या मांत्रिकाचे घाणेरडे जोडे आणि तीच आग. ती स्त्री विवश व्हायची. तिच्या डोक्यावर चामड्याच्या जोड्यांचा मार बसायचा. मग ती हार मानून बेशुद्ध व्हायची.


का कोण जाणे पण चुडेल तरुणींच्याच शरीरात प्रवेश करत. कधीकधी ब्रह्म सबंध याचेही नाव घेतले जायचे. त्या तरुणींचे प्रौढत्व आल्यानंतरच चुडेल,चेटकीण आहे, भूत आहे की ब्रह्मा आहे यांचे खरे स्वरूप उघड व्हायचे. काही स्त्रियांचा मानसिक त्रास चुडेलच्या स्वरूपात बाहेर पडायचा. काही स्त्रियांना हिस्टेरिया झाला होता. काही मुली बालपणीच लग्न झाल्यानंतर गौन्याची, सासरी जाण्याची वाट पाहत, वासनेच्या आगीचे असे प्रदर्शन करत. काही तरुण स्त्रियांचे पती मुंबई, कलकत्ता मोठ्या शहरांमध्ये कामाला जात होते, तिथून ते अनेक वर्ष परत यायचे नाहीत.. अशा स्त्रियांची देखील शारीरिक गरज होती. काही स्त्रियांचा अवैध गर्भपात करण्यासाठी चुडेल, भूत, ब्रह्म हे बहाणे करून झाड फुक आणि मारपीट असे नाटक करावे लागे. अशा परिस्थितीत मांत्रिक त्या स्त्रीला लाथा मारत असे. कधी कधी पोटावर सुद्धा लाथ मारत असे. जवळपास सगळ्याच गावांमध्ये भूत, चुडेल, ब्रह्मभूत यांच्या कथा रंगत. त्याकाळी ही अगदी सामान्य बाब होती. पण अनेक वर्षांपासून हे सगळे काही  नाहीसे झाले होते. बऱ्याच दिवसानंतर तो हे ह्या विपश्यना ध्यान सत्रात पाहत होता. ग्रामीण पार्श्वभूमीतील ती स्त्री निम्न मध्यमवर्गीय होती. सावळी,सामान्य दिसणारी स्त्री ,तिच्यासारख्याच तिच्यासोबत आणखी दोन डोक्यावरून पदर घेतलेल्या बायका होत्या. तिचा मानसिक ताण तणाव कमी होण्याकरताच तिच्या कुटुंबाने तिला विपश्यना केंद्रात पाठवले असावे. या तिन्ही स्त्रिया स्थानिक असल्यासारखे दिसत होत्या. त्यांचे बोलणे,त्यांचे कपडे तेथील लोकांसारखेच होते.


हे सर्व घडत असताना तिथे उपस्थित असलेले आचार्य हेही क्षणभरासाठी स्तब्ध झाले. ऑडिओ टेप वाजतच होता. ध्यानाचे निर्देश देत होता. आचार्य लगेच सक्रिय झाले. लगेचच त्यांनी संबोधन करून सर्वांना सांगितले तुम्ही सर्वजण ध्यान सुरू करा ,डोळे बंद ठेवा ,श्वासावर नियंत्रण ठेवा. श्वासाची जाणीव अनुभवत रहा. इत्यादी इत्यादी. 

लगेचच तेथील कार्यकर्त्यांनी त्या स्त्रीला धरले. ती म्हणत राहिली,”मी कुठेही जात नाही, मी सारं काही सांगते ,मी तुम्हाला सर्व काही सविस्तर सांगते.”अतिशय व्याकुळतेने आणि संतापाने ती बोलत होती. त्या महिलेचा एकाग्रता आणि संयम बेकाबू  झाला होता.

कार्यकर्त्यांनी तिचे काहीही ऐकले नाही. तिला ध्यान कक्षातून बाहेर आणले. तिच्या समवेतच्या दोन बायकाही नाराजीनेच चिडून उठल्या. तिच्यासोबत बाहेर जाण्याची त्यांची इच्छा होती. आचार्यांनी त्यांना तिथेच थांबवले आणि म्हणाले ,”तुम्ही इथेच थांबा, ध्यान सुरू ठेवा.” त्या दोघी स्त्रिया तिथेच थांबल्या. असहायपणे त्या स्त्रीला ध्यान कक्षाबाहेर नेणे पाहत राहिल्या. जणू काही त्या बळीच्या बकरीची आई आहेत त्या दोघीही. म्हणतात ना,बळी जाणाऱ्या बकरीची आई किती काळ प्रार्थना करू शकेल? 

ही म्हण आता उचित ठरत होती.सोबत असलेल्या दोन्ही स्त्रियांना त्या स्त्रीचे दुःख , संताप आणि वेदना माहितीच असणार.


काय बरे दुःख असेल त्या स्त्रीचे? 


डोळे बंद करून विनय देखील त्या स्त्रीच्या ध्यानात बुडून गेला. तो विचार करत होता डोक्यावरून पदर घेतलेल्या त्या खेडवळ स्त्रीला कोणता बरे असा ताणतणाव आहे जो तिला विपश्यना शिबिरापर्यंत घेऊन आला.ही सुद्धा यशोधरा तर नाही ना? आपल्या बुद्धापासून दूर झालेली यशोधरा. तिचा सिद्धार्थही तिला सोडून गेला आहे का? ते आपल्या बुद्धाच्या विरहाचे दुःख तिने झुलत डोलत सांगितले असेल . पण ध्यान सत्र मात्र सुरूच होते. निर्बंध .श्वासावर नियंत्रण करत करत विनय ध्यानस्थ झाला. इतका की तो निद्रेच्या नौके वर स्वार होऊन त्याच्या गावाला पोहोचला देखील. मांत्रिक एका तरुणीला त्याच्या जोड्यांनी मारत आहे. धडाधड मारणे सुरूच आहे. सगळ्या शक्तीनिशी ती स्त्री ओरडत आहे “मी जाणार नाही.” विनय आता गाढ झोपेत घोरत आहे ,ध्यान सत्र चालू आहे. एक कार्यकर्ता त्याला हलवत आहे. ध्यान सत्र संपले. 


ध्यान सत्र  संपल्या नंतरनंतर दोन-तीन जण तिथेच थांबले. आचार्यांकडून काही आपल्या प्रश्नांवर उत्तरे जाणून घेण्यासाठी उत्सुकतेने थांबले होते. एक एक करत वेगवेगळ्या गोष्टी आचार्यांना विचारत होते. हळूच एका माणसाने विचारले ,”त्या स्त्रीचे काय झाले?” 

“काही नाही,” आचार्यांनी संक्षिप्त उत्तर दिले “ मानसिक विकार होता तिच्या मनात,विकार निघून गेला.”


“असा कधी कोणाचा मानसिक विकार निघून जातो का?”तो आचार्यांना विचारू इच्छित होता पण तो विचारत नाही. चुपचाप उठून चालायला लागतो.आचार्य म्हणतात,”तुम्हाला काही विचारायचे होते का,” नकारार्थी डोके हलवून तो हात जोडतो. आचार्य ही 

धन्यवाद ,धन्यवाद म्हणून निरोप घेतात.


आचार्य स्वतः सुशिक्षित आहेत. अभियंता असून एका मोठ्या संस्थेत उच्च पदावर नियुक्त आहेत. विपश्यनेसाठी दरवर्षी ते नोकरीतून काही दिवस रजा टाकून कुठल्या ना कुठल्या शिबिरामध्ये आचार्य म्हणून उपस्थित राहतात. आचार्यांनी आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांच्याकडून विपश्यना पद्धती शिकवण्याची दीक्षा घेतली आहे. ते विपश्यनेसाठी समर्पित आहेत. निशुल्क. प्रवासाचा येण्या-जाण्याचा खर्च ते स्वतः करतात. त्यांचा हेतू एकच आहे विपश्यनेद्वारे सामान्य लोकांच्या जीवनामध्ये सकारात्मक बदल घडवणे. आचार्यांच्या चेहऱ्यावर संतोष आणि समाधानाच्या रेषा दिसून पडतात. ध्यानाच्या वेळेतही ते अतिशय कमी बोलतात. बहुतेक वेळेस तर सूचना, निर्देश, पद्धत हे ऑडिओ टेप द्वारे सांगितले जाते. आचार्य परीक्षांमधील इनव्हिजिलेटर सारखे उपस्थित असतात. ध्यान व्यवस्थित करत नसतील तर त्यांना ते समजावून सांगणे, त्यांच्याकडून करून घेणे हे करतात. शिस्त राखतात. बहुतेक लोक शिस्तीत राहतात जसे सूर संगीत आणि वाद्याला धरून ठेवतात. कोणी एखाद दोन ,विनय सारखे अव्यवस्थित असलेच तर आचार्य त्यांना ठीक करतात .करतच राहतात. अगदी तसेच जसे लोकसभा अध्यक्ष लोकसभेत मंत्री आणि खासदार यांचे व्यवस्थापन करतात. 


तो आचार्यांपासून दूर गेला. वाफ्यात लावलेल्या फुलकोबी च्या फुलाकडे पहात, त्या स्त्रीच्या विलापामध्ये बुडाला आहे. अचानकच एक चिमणी उड्या मारतच कोबीच्या फुलावर येऊन बसली. पंख फडफडत होते .बेचैन वाटत होती. ही चिमणी देखील तिच्या बुद्धाच्या विरहात तळमळत होती का?


कुणास ठाऊक! 


सिद्धार्थने जेव्हा घर परिवार सोडले तेव्हा तो 29 वर्षाचा होता. नवजात शिशू राहुल, पत्नी यशोधरा ,आई-वडील , राज्य सारे काही मागे टाकून गेला. त्याच्या मनात काही क्लेश होते का? पण सिद्धार्थ गेल्यावर यशोधरेच्या मनात जी वेदना झाली त्याचे काय? ती कालवा कालव, त्याचे काय? नवजात शिशु राहुल यालाही त्रास झाला असेल का? त्याच्या वडिलांपासून दूर होण्याचा त्रास? 


 त्याला सीतेची आठवण येते .लक्ष्मण जेव्हा तिला जंगलात सोडायला गेला लक्ष्मण वनात पोहोचल्यावर अचानक रथ थांबवतो. रथातून सीतेला उतरवताना लक्ष्मण सांगतो, माझ्या भावाचा आदेश आहे की मी तुम्हाला इथे सोडावे. परंतु सीता विचलित होत नाही. कारण लक्ष्मण तिच्यासोबत आहे. पण लक्ष्मण रथात बसतो, समोर जायला निघतो, तेव्हाही सीता विचलित होत नाही, लक्ष्मण अचानक नजरेच्या टप्प्या बाहेर जातो नंतर त्याचा फक्त रथ दिसत राहतो सीता तेव्हाही विचलित होत नाही. रथ दिसेनासा होतो पण रथावरचा ध्वज दिसतो. जोवर रथाचा ध्वज दिसतो तोवर सीता अविचल असते. शेवटी रथाचा ध्वजही दिसेनासा झाला, सीता शोक करायला लागते. इतका जोरात हंबरडा  फोडून रडते की कुरणावर गवत चरणारे हरीण तोंडातील गवत टाकून देते. आकाशात विहरणारे पक्षी थांबून जातात. झाडाच्या फांद्या एकमेकावर घासल्या जातात. सारे अरण्य सीतेच्या शोकामध्ये डुबून जाते. सारं वन सीतेसोबत विलाप करू लागते. 


सिद्धार्थ यशोधरेला सोडून गेले तेव्हा लुंबिनी शहर यशोधराच्या विलापात डुबले होते का? यशोधरेच्या शोकामध्ये लुंबिनी शोकग्रस्त झाली का? काहीच उत्तर नाही. 


आणि मग आता ध्यान कक्षामध्ये जेव्हा ती स्त्री  दुःख व्यक्त करत होती, तेव्हा किती लोक तिच्या दुःखात सामील झाले? की नाही झाले? इतके तटस्थ झाले का,विपश्यनेच्या रंगात रंगून गेले! श्वास उच्छ्वासाच्या गतीत इतके रमले की दुःखाची संवेदना ही सुन्न होऊन गेली. इतकी सफल विपश्यना! मग तर खूपच छान. मैथिलीशरण गुप्त यशोधरेवर लिहितात :


सखि, वे मुझ से कह कर जाते, 

कह, तो क्या मुझको वे अपनी पथ-बाधा ही पाते?


मुझको बहुत उन्होंने माना 

फिर भी क्या पूरा पहचाना?

मैंने मुख्य उसी को जाना 

जो वे मन में लाते 

सखि ,वे मुझसे कह कर जाते।


यशोधरेच्या संवेदनेमध्ये मैथिलीशरण गुप्त इतके हरवले जातात की या कविते मार्फत ते बुद्धाला पलायनवादी सिद्ध करतात. लोक बुद्धाला पळपुटा म्हणतात. जेव्हा की बुद्ध महिनों महीने संन्यासाची तयारी करत आहेत.यशोधरेला सोबत घेऊनच तयारी करत आहेत. यशोधरेची सहमती घेऊनच ते घर सोडतात. जेव्हा रात्री सिद्धार्थ घर सोडून जातात यशोधरा जागी असते. परंतु एका कवीच्या कवितेची ताकद त्याला पळपुटा घोषित करते. 

सिद्धार्थने पत्नीचा त्याग करायला नको होता. परंतु पळपुटा? 


मग या स्त्रीच्या शोकातही काही रहस्य आहे का? बुद्ध काय रहस्य नाहीत? रहस्यच आहे ही विपश्यना देखील. रात्रीच्या प्रवचन व्हिडिओ सत्रात त्याचे लक्ष नव्हते. तो उदास होता. रात्री धड झोपला सुद्धा नाही. वारंवार ती विलाप करणारी स्त्री त्याच्या डोळ्यापुढे येत होती. कधी ती स्त्री तर कधी यशोधरा. तर मग काय तो सुद्धा याच पद्धतीने त्याच्या पत्नीला सोडून नाही आला का! आपल्या पत्नीचा शोक, आपल्या पत्नीचे दुःख तो नीट ऐकून तरी घेतो का! विना आकांताने सुद्धा शोक करतात स्त्रिया. हे काय त्याला माहिती नाही. माहित आहे.मग पत्नीचा आक्रोश न ऐकल्यासारखा तो का वागतो? यशोधरेचे दुःख त्याला समजते. विपश्यनेत आलेल्या या स्त्रीचा टाहो त्याला अस्वस्थ करत आहेत. सर्व बाजूंनी आपले मन तो घुसळून काढतो. जशी कोण एखादी स्त्री दह्याला रवी लावते आणि घुसळून काढते. पत्नीचा तर सोडाच पण स्वतःच्याही दुःखाला त्यांनी कधी वाचा फोडली का? जेव्हा कीत्याचा मनात आक्रंदनच आक्रंदन आहे . कुणाच्या आयुष्यामध्ये आकांत नाहीये ? तो विचार करत राहतो पडल्या पडल्या.कड बदलत राहतो. पहाट होते .घंटा वाजवल्या जातो. सवयीप्रमाणेच तो उठत नाही. जागा असूनही उठत नाही. हे कुठले दुःख आहे? स्वतः स्वतःला उत्तर देतो आळसाचा शोक, हाहा:कार. फक्त विपश्यने मधेच दुःख नाही. आळसामध्ये देखील दुःख आहे. आळसाचे सुद्धा वेगळेच सौंदर्यशास्त्र आहे. हे अगदी कमी लोक जाणतात. त्याच्या दरवाज्यावर कार्यकर्ता घंटी वाजवत आहे. सतत. तो उठतो. हात जोडून त्याची क्षमा मागतो. हसत हसत कार्यकर्ता तिथून निघून जातो. 


ध्यान सत्रात तो उशिरा पोहोचतो. आचार्य त्याच्याकडे रोखून पाहतात. हा कोणता शोक आहे. तो पाहतोय काल आकांत करणारी स्त्री आज अनुपस्थित आहे. तिच्या सोबतच्या दोन स्त्रिया मात्र उपस्थित आहेत. आता डोळे बंद करून तो ध्यानात मग्न होण्याचा विचार करतो. ध्यानमग्न झाला आहे. ध्यानात सुद्धा निरंतर आक्रोश सुरू आहे, जसा मुसळधार पाऊस. अचानक त्याचे ध्यान तुटते. डोळे उघडतात. एका गोऱ्या रशियन स्त्रीच्या बेचैन करणाऱ्या वक्षांवर त्याची नजर स्थिर झाली. तिचे बिना बाहीचे बाहू जणू त्याला बोलवत होते. अशा परिस्थितीत तो काय ध्यान करणार? जेव्हा मन देह आकर्षणात रमले ,तेव्हा ध्यान गळून होते. सगळा शोक नष्ट पावतो. सारी विपश्यना थांबून जाते. नष्ट होते. 


नाश्त्याचा वेळ झाला आहे. ती पहा भरगच्च स्तनांची स्त्री त्याच्याच मेज वर येऊन नाश्ता सुरू करते. एखाद्या फुलाप्रमाणे प्रफुल्लित ही गोरी स्त्री आपल्या भाषेपासून तर खूप दूर आहे परंतु तिची देहबोली आव्हानात्मक आहे. कोवळ्या कोंबाप्रमाणे तिचे बाहू त्याला उत्तेजित करत आहेत. ह्या भोजन कक्षामध्ये ते दोघं इतरांच्या ध्यानाचे लक्ष बनले आहेत. जणू इथेही ध्यान सत्र सुरू आहे. स्त्रीसौंदर्याच्या मोहाचा अभिशापआहे.स्त्रिया नेहमीच  त्याला भुरळ घालतात . खूपदा तो विचलित होतो. ही त्याची वृत्तीच त्याला सुख देते.चुपचाप. ही सुखद अस्वस्थता या मुक्याच्या राजधानी मध्ये खूपच अर्थपूर्ण झाली.


ही कुठली गडबड? गडबड की रडारड? की या दोन्हीच्या मधील अजून काही! विपश्यना तर नाही ना! मग काय आहे ?आहे काय हे? 


नाश्त्याचे ताट धुण्यासाठी तो सिंक जवळ उभा आहे , या रांगेत आपल्या पाळीची वाट पाहत होता. आपले उष्टे खरकटे भांडे धुवून कोरड्या फडक्याने पुसून ठेवायचे, सगळ्यांसाठीच समान रूपात, अनिवार्य असा हा नियम आहे. भांडी घासायचा त्याला अनुभव नाही. पण इथे मात्र रोजच भांडी घासावी लागतात. तो पाहतो गोरी रशियन स्त्री स्वतःचे ताट घेऊन त्याच्या बाजूला उभी आहे. तिच्या हसण्यामध्ये मार्दव आहे. डोळ्यांत आतुरता. उपाशी देहाची व्याकुळता.ती अशी भेटते आहे की जशा काही सोशल मीडियावर स्त्रिया भेटतात . अपरिचित समुद्रामध्ये गोता मारत ,परिचयातून मोती शोधत आहे. संकोच्याच्या असीम समुद्रात हरवलेला विनय स्त्रीच्या या लाजाळू वर्तवणुकीला आणि  हावभाव ठीक ठीक समजून घेऊ शकत नाही. तशाही स्त्रिया नेहमीच अवाचनीय , अपठनीय वाटत असतात. जसे त्याचे नाव विनय आहे. तसेच विनय भावाने परिचित मोती शोधत स्वतःला हरवून जाणे त्याला सोयीस्कर वाटते.


सोशल मीडियावर अश्लीलतेची बैटिंग तो करू शकत नाही. त्याला आवडत नाही. वास्तविक जीवनात सुद्धा त्यालाही शक्य नाही. त्याच्या नम्र वागण्याने सगळ्या वासना  नष्ट होतात . ही स्त्री तर रशियन ,समुद्रपारची. विनयच्या विनयशील,सोज्वळ आयुष्यामध्ये ही स्त्री का कोण जाणे पण  एक लाट बनून आली आहे. भरभरून आलेली लाट. तिच्या मोहक सौंदर्यामध्ये ती न्हाऊन निघाली आहे. कृपाळू झाली आहे. भांडी धुताना तिचे लुसलुशीत,मांसल बाहू ,त्याच्या बाहूंना स्पर्श करतात. पुन्हा पुन्हा. तिचे नितंब त्याच्या मांडीला स्पर्श करतात. अचानक. विनयला त्या स्त्रीचा मादक स्पर्श जाणवतो. त्याला त्याचे सुखही जाणवते. भांडी घासताना तिच्या वर उठणाऱ्या, खाली झुकणाऱ्या, डुलणाऱ्या स्तनांवर तो मोहित होतो. पण विनयला स्वतःच्या पद प्रतिष्ठेची जाणीव आहे. त्यालाही जाण आहे की या शांतीच्या राजधानीत आवाज भलेही अनुपस्थित आहे, पण दृष्टीचा कॅमेरा,ध्यान आणि श्वास याहीपेक्षा खूप जास्त सक्रिय आहे. इथे अन्य साधकांचे डोळ्यांचे कॅमेरे लॉन्ग शॉट ,क्लोज शॉट घेण्यासाठी तैनात आहेत. तो एकदम सतर्क होतो. या विपश्यनेच्या शिबिरामध्ये त्याला एक पात्र बनायचे नाही. चर्चेचा विषय व्हायचे नाही. मग समुद्राच्या या लाटांचे काय? लाटांचे काय त्या तर येतील आणि जातील. स्त्रियांना पाहून मनात उठणाऱ्या लहरी कधी कुठे नेऊन सोडतील कोणास ठाऊक!


भांडी धुवून, विसळून, कपड्याने पुसून योग्य जागेवर ठेवून घाई घाईने तो भोजन कक्षाच्या बाहेर येतो. सरळ आपल्या खोलीमध्ये येऊन  थांबतो .बिछान्यावर बसताच , तो त्या अनाम,अपरिचित स्त्री च्या मादक स्पर्शामध्ये रमून जातो. डोळे बंद करतो. असे की जसे ती रशियन स्त्री त्याच्या आलिंगनात आहे. तो पलंगावर पहुडतो .आताच्या या क्षणाच्या प्रेमाच्या अनुभवामध्ये तो हरखून जातो. जसे तो आताही भांडे धूत आहे. त्याला ध्यान कक्षात पोहोचायचे आहे .परंतु तो आता बिछान्यात पहुडला आहे. झोपेच्या विळख्यात. आलिंगनबध्द आहे जणू काही, रशियन सुंदरीच्या विलक्षण लावण्यात.जशी ती आता या बिछान्यात त्याच्यासोबत आहे. प्रेमाच्या आकाशात विहरत आहे. जसा तो एखादा झुला आहे आणि त्या झुल्यावर बसून ती रशियन सुंदरी झुलत आहे. प्रेमाच्या आकाशाला स्पर्श करण्याची तिची लालसा.तो असाच स्वप्नाच्या आधीन झाला. तो झोपेत घोरत आहे आणि खोलीच्या बाहेरून कार्यकर्ता रुणझुण घंटी वाजवत जात आहे. ध्यान कक्षात सगळ्यांना बोलवण्यासाठी वाजणारा मोठा घंटा केव्हा वाजला त्याच्या लक्षात आले नाही. लोक नाश्ता झाल्यावर स्नान करतात .तो झोपतो. अगदी दररोज. कारण की अगदी पहाटे उठून दैनंदिन कार्यक्रमानंतर स्नान करून क्षणभर का होईना पूजा करूनच तो ध्यान कक्षात पोहोचतो. पहाटे नाहण्याचा एकच त्रास आहे की इथे इतक्या थंडीत सुद्धा गरम पाणी मिळत नाही. बाथरूम बिना गिझरचे आहे. पहाटे पहाटे स्नानासाठी लाकडं पेटवलेल्या चुलीवरचे कोमट पाणी मिळते. पण गरम पाण्याच्या भानगडीत तो त्याचा स्नानाचा नियम बदलत नाही. थंड पाण्याचे अंघोळ सहन करतो या हिवाळ्यातही.. अंगावर पाणी घेतल्याबरोबर डोके सुन्न होते. शरीर थरथर कापायला लागते. पण काय करणार? पूजेचे देखील असेच आहे. कुठल्याही तर्हेच्या पूजेवर इथे सक्त मनाई आहे. काय तर म्हणे की ध्यानामध्ये अडथळा येतो आणि ध्यान खंडित होते. एक साथ दोन पद्धती बरोबर नाहीत. मन उदास होते. तो मनातल्या मनातच पूजा करतो आणि हात जोडतो. मनावर कोण सक्ती करणार आहे? मनावर आणि प्रेमावर कुठले निर्बंध कधी चालले ,जे आता चालतील. आंघोळ न करता ध्यान करणे हेही त्याला जमत नाही, समजत नाही.


गेला होता एकदा तो दार्जिलिंगला. एका पहाटे टायगर हिलवर सूर्योदय पहायचा होता.अगदी पहाटेच निघायचे होते. सूर्योदय पाहणे सुद्धा बिना स्नानाचे त्याला मान्यच नव्हते. स्वतः तर आंघोळ केलीच केली पण मुलांच्याही मागे लागला.थोडा उशीर झाला. हॉटेल मधील कर्मचारी आणि टॅक्सीवाला सगळे ओरडत होते .लवकर चला ,फोन करून सांगत होते.थोडा थोडका नव्हे बराच उशीर झाला होता. सूर्योदय पाहिला तो स्नानानंतरच, टायगर हिलवर. बिना स्नानाची सूर्याची उपासना कशी करणार. जेव्हा टायगर हिलवर पोहोचला तेव्हा सूर्याची लालीमा पसरत चालली होती.कांचनगंगेच्या बर्फाच्छादित पहाडांवर सूर्याचा उदय आज किती तरी वर्षानंतर सुद्धा मनाला तजेला देत आहे. जसा काही एखाद्या वाडग्यातला सूर्य. पांढऱ्या शुभ्र वाडग्यात लाल लाल सूर्य. सूर्य जसे एखादे तान्हे बाळ. मन आनंदित होऊन गेले निसर्गाच्या या प्रार्थनेवर. सूर्याच्या लालीमेवर. नंतर माहिती झाले की लोक सूर्योदयाच्यापूर्वीच रात्रीपासूनच तिथे पोहोचून तळ ठोकून थांबले होते. सूर्योदयाच्याही अगोदरच. सूर्योदय झाल्याबरोबर ते चहा,पकोडे ह्यावर तुटून पडले. इतर पर्यटकांसाठी टायगर हिलवर सूर्योदय देखील सहलच होती. विनय साठी सूर्योदय ही सूर्याची उपासना होती. सूर्याला नमस्कार करायचा होता. उगवत्या सूर्याला नमस्कार या वाक्प्रचाराला बाजूला सारून भक्ती भावाने त्याला सूर्याला नमस्कार करायचा होता. यासाठीच विना स्नानाचा तो तिथे गेला नाही. पारोश्याने तो काही खात पित ही नाही. स्नानानंतरच त्याची सकाळ चालू होते. स्नानानंतरच दिवस चालू होतो. अगदी केव्हाही उठला तरी. लवकर उठो अथवा उशिरा. म्हणूनच या विपश्यना शिबिरात नाश्त्यानंतर त्याला झोपायचे असते. स्नान नाही. झोपून तो उठतो आणि सरळ ध्यान कक्षात जातो. 


धन कक्षात गेल्यावर पहिले तो रशियन सुंदरीला शोधतो. आणि लगेच त्याला ती दिसते ही. स्मित हास्य करत. जणू ती त्याचे स्वागत करत आहे आपल्या दैवी स्मिताने. आचार्य त्याचे ते रशियन स्त्रीकडे पाहणे आणि त्या रशियन स्त्री चे विलोभनीय हास्य आपल्या डोळ्यांच्या कॅमेऱ्यामध्ये कैद करत आहेत. भोजन कक्षामधील कॅमेऱ्यांनी त्यांच्यापर्यंत ही गोष्ट पोहोचवली होती का? 


कोण जाणे? 


आज विनयचे मन ध्यानात जरा जास्तच लागले. ध्यानाचा त्याला स्वादच चाखायला मिळाला. श्वास अन श्वास त्याला प्रेमाने भिजलेला मिळाला. श्वास आणि श्वासाची जाणीव सुद्धा स्वर्गीय अनुभूती देत होता. तिच्या नजरेत आणि बाहूंच्या आलिंगनात विनय बद्ध होता. श्वासाच्या अथांग सागरात तिचे वक्ष म्हणजे जणू एखादी नौका. श्वासोच्छवास सुरू आहे.तो विचार करत आहे, स्त्रिया प्रेम करतात तेव्हा समजून येते परंतु प्रेमावर वार्तालाप करतात तेव्हा हसू येते. प्रेम कृतीने करता येते केवळ बोलण्याने नाही. प्रेमाची कुठली व्याख्या नाही. प्रेमाची कुठली निश्चित ठरवलेली अशी चौकट नाही.  अगदी असंच करा तर होईल, अथवा होणार नाही. प्रेमाची कुठली काही एक वाट नाही. प्रेम 

महामार्ग पण असू शकते, पाऊलवाट देखील, खड्डा खड्ड्यांची सडक सुद्धा , अरुंद गल्ली सुद्धा, शेत पण,तलाव पण, बाग पण, आकाश, धरती, पाणी कुठलाही मार्गाने प्रेम

मिळते. हवा पण, चंद्र, तारे, सूर्य पण, विपश्यनापण. विपश्यनेत देखील प्रेमाचे असे आकाश अचानकच उपस्थित होऊ शकते. विपश्यनेला परत धुंडाळून आणून धुवून स्वच्छ करून उपस्थित करणाऱ्या आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांनी सुद्धा कधी विचार केला नसेल.होऊ शकतं कुठलाच मार्ग नसेल प्रेमाला. सगळे रस्ते बंद होऊ शकतात. मिट्ट काळोखात देखील वाट मिळतेच प्रेमाला. इच्छा आणि मार्ग यामध्ये अंतर असू शकते किंवा नाही पण. 


प्रेम म्हणजे सेक्स नाही म्हणजे या तऱ्हेने अथवा त्या तऱ्हेने होऊ शकते अथवा कुठल्याही तर्हेने असे नाही. प्रेम तर जगजीत सिंग ची गायलेली कोणती गझल ऐकून सुद्धा होऊ शकते. पण प्रेम म्हणजे जगजीत सिंग ची गायलेली गझल सुद्धा नाहीये. प्रेम तर उशी वर सापडलेला एखादा केसही नाहीये , कधी सापडतो ,कधी नाही..उशीवर सापडलेले काजळ ही नाही. प्रेम काजळाची बारीक रेघ होऊ शकते . उन्नत वक्षांमध्ये, स्पंदन करणाऱ्या हृदयासारखेच धक धक करणारे कुणा स्त्री चे नितंब पण असू शकते ,कुणाच्या आवाजातही, कुणाच्या शैलीतही. किंवा हे असे काहीच नाही. प्रेम म्हणजे एखादी खार. प्रेम म्हणजे बुलबुल, कोकिळा, फुलपाखरू सुद्धा. ते कधी कुठे गाईल आणि कधी गुलाबाच्या काट्यासारखे रुतेल, कोण जाणते ! तुम्ही नाही ,आम्ही नाही ,अगदी लता मंगेशकर ही नाही .प्रेम एक अनंत अबोध यात्रा आहे. समजून ऊमजून प्रेम यात्रा होत नाही.  ही यात्रा तर फक्त होते तर होते. नाहीतर नाही होत. प्रेम घडले तर आनंद असतो .अलौकिक. एका गझलेतील एक मिसरा आहे ना,इधर तो है  सब जल्दी जल्दी, उधर आहिस्ता आहिस्ता …तर आहिस्ता आहिस्ता  सुद्धा एक फॅक्टर आहे आणि जल्दी जल्दी वर काय बोलणार? बाकी आपली आपली सुविधा आणि आपली अशी शैली ,आपली पद्धत असते. प्रेम हळदी घाट अथवा पानिपत सारखी लढाई नाही.इथे कुठला तर्क कामी पडत नाही. काही लोकांचा छंद असतो, बोलत राहणे आणि ऐकत राहणे ह्यात मजा घेणे. काही लोक थियरीनेच काम चालवतात. प्रॅक्टिकल मध्ये त्यांना रस नाही अथवा क्षमता नाही.आपल्या आपले शौक,आपल्या आपल्या क्षमता. विनयला प्रॅक्टिकल मध्ये रस आहे. अश्लीलतेच्या बैटिंग मध्ये नाही.


तर मग आज सकाळपासून जे काय घडत आहे त्या रशियन स्त्रीसोबत, हे प्रेम आहे का? 

विनय स्वतःला प्रश्न विचारतो आणि उत्तर देतो, ‘काय माहित? मग कोणाला विचारायचे?’


शक्य आहे की हे देहाकर्षण आहे. 


त्याला एक लहान मूल आठवतं. एक व्हिडिओ आठवतो. छोटासा बाळ ठुमकत ठुमकत चालण्याच्या वयातला. चालणे शिकत आहे . एक साथ चार स्त्रिया घुंगट घेतलेल्या, एका जागेवर ,एकाच रंगाच्या साडीत उपस्थित होत्या. बाळ या सगळ्या स्त्रियांमध्ये आपली आई शोधत होता. चार ही स्त्रिया त्याला आईसारख्या जवळ बोलवत होत्या, हाताच्या इशाऱ्याने. इकडे तिकडे फिरत फिरत तो एका स्त्री जवळ जातो, आई ,आई करत. ती स्त्री त्याला उचलून आपल्या मांडीवर घेणार असते तेवढ्यात बाळ उडी मारून सटकतो. मग त्या सगळ्या स्त्रियांमध्ये तो परत आपल्या आईला शोधायला लागतो. सगळ्या स्त्रिया अजूनही घुंगट ओढूनच आहेत. शोध घेता घेता त्याला त्याची आई सापडते तिचा हात पकडून तिच्या मांडीवर जाऊन बसतो ,आई ,आई करत. हसत हसत ती स्त्री घुंगट मागे करते. खूप आनंदाने बाळाचे मुके घेते. बाकी स्त्रिया पण आपला आपला घुंगट मागे करतात आणि हसतात. मग प्रेम म्हणजे तर लहान बाळा द्वारे,घुंगट घेतलेल्या अनेक स्त्रियांमधून आपल्या आईला शोधणे हेच आहे. प्रेमात लोभ नाही, छळ कपट, गुणाकार, भागाकार, बेरीज, वजाबाकी नाही .शोषण आणि शंका नाही .प्रेम असे आहे, जसे छोट्या बाळाचे प्रेम. गवतावर पडलेल्या दवबिंदूंसारखं तजेलदार, पवित्र प्रेम!


रशियन स्त्रीला हे सगळं काही त्याला सांगावसं वाटतं. पण कसे सांगावे? इशाऱ्याने सुद्धा संवाद होऊ शकत नाही. रशियन भाषा त्याला येत नाही. तिला हिंदी भाषा येते की नाही माहिती नाही. इंग्रजी सुद्धा त्याची अगदी तुटकी फुटकी. मग काय करावे?आता कशी स्वतःच्या मनातील गोष्ट तो तिच्यासमोर मांडेल? जवळ कागद आणि पेन सुद्धा नाही की लिहून संदेश देता येईल.मोबाईल सुद्धा नाही की टाईप करून तिला व्हाट्सअप करता येईल. तर काय एखाद्या झाडाच्या पानावर मातीने अथवा विटेच्या तुकड्याने लिहिता येईल का? मग त्याला आठवतं की लहान  बाळ कसा पहिले अर्थ समजावून घेतात नंतर शब्द आणि भाषा समजतात. मग काय हे सगळं सांगायची व्याकुळता त्या रशियन स्त्रीमध्ये देखील आहे. हे सगळे अगदी तात्पुरते आहे. तो परत पेंगायला लागला. कार्यकर्ता त्याला हलवून हलवून जागा करत होता. का कुणास ठाऊक पण विनय जेव्हा जास्त विचार करतो तेव्हा विचारांच्या गर्तेत निळ्या आकाशापर्यंत पोहोचतो आणि एखाद्या पक्षासारखा घिरट्या घालतो.


ध्यानाचे हे सत्र समाप्त झाले. दहा मिनिटाचा ब्रेक आहे. ध्यान कक्षातून निघून तो एका मोठ्या  ओट्यावर जाऊन बसला जिथून त्याला फुलकोबीचे मनमोहक शेत दिसत आहे. हिरव्यागार पानांच्या मध्ये फुलकोबीचे फुल. आपले शरीर फुलवत. बाजूलाच झेंडू आणि गुलाबाचे फुल उमलले आहेत. सगळ्यांचे वाफे वेगळे वेगळे. जसे की एक आनाआहे तर दुसरे पान. आना-पान. विनय आता फुलाकडे सुद्धा विपश्यनेच्या नजरेने पाहतो. ह्या विचाराने तो हसायला लागतो. इतका का विपश्यनामय झाला आहे? शिबिराचे व्यवस्थापक सुद्धा शेताच्या दुसऱ्या बाजूला आराम खुर्चीवर बसून पेपर कमी वाचत आहेत आणि उन्हाने जास्त शेक घेत आहेत. तेवढ्यात ती रशियन स्त्री देखील त्या ओट्यावर दुसऱ्या बाजूस जाऊन बसते. डोळ्यांच्या कोपऱ्यांमधून तो तिच्याकडे पाहतो, असे की जणू पाहिलेच नाही. लंडनचा मुलगा आहे त्याच्या समोरून जातो. नेहमीप्रमाणेच,थोडेसे वाकून, हात जोडून नमस्कार करून ,मंद मंद हसत चालत राहतो. ओट्याच्या दुसऱ्या कोपऱ्यावर वर बसलेल्या रशियन स्त्रीला डोळ्यांच्या कोपऱ्यातून पहात तो निघून जातो. आता ती स्त्री त्याच्यासमोर आहे. तिचे डोळे बोलके आहेत. अस्पष्ट असे काहीतरी बोलल्यासारखे वाटते. ओठ बंद आहेत  पॅन्टच्या झिप सारखे. झिप खुलायला उत्सुक. पण खुलत नाही. एक खार नाचत नाचत येते, त्याच्या पायांच्या जवळून जाते. त्याला हसू फुटतं ,नाचणाऱ्या खारीला पाहून.त्या महिलेकडेही तो आता डोळे भरून पाहतो आणि  हसतो. तिचा चेहरा गोलाकार वाटतो . तिची जीभ तिच्या तोंडात फिरत आहे. दातांच्या मध्ये. हा कुठला आग्रहाचा इशारा आहे का? त्याला तिला एक शेर ऐकवायचा आहे. पण या मुक्यांच्या राजधानी मध्ये कसे सांगणार? भला थोरला घंटा वाजायला लागतो. ध्यान सत्रात बोलवले आहे. अशा तऱ्हेने की जसे अजान होते आहे नमाज साठी. ऑफिसमधल्या एका सहयोगी मित्राची त्याला आठवण आली. त्या सहयोगी मित्राला स्वतःला धर्मनिरपेक्ष दाखवायची फार वाईट सवय होती. एकदा त्याच्या मुस्लिम मित्रासमोर विनयने सहजच विचारले,”नमाज आणि अजान यामध्ये काय फरक?” 

तेव्हा त्याने उत्तर दिले खूपच सोपे आहे, “सकाळच्या अजान ला अजान म्हणतात संध्याकाळच्या अजानला नमाज म्हणतात.”


“आणि दुपारच्या वेळेस,”हसत खेळत विनयने विचारले. मुस्लिम मित्राला डोळा घालत चूप राहण्याचा इशारा केला. 


“आता याबाबत मला पक्के माहिती नाही की अजान म्हणतात की नमाज,” त्याने निरागसपणाने सांगितले. असेच एकदा तो आपल्या मुस्लिम मित्राला मोहरम बद्दल अभिनंदन  करत म्हणाला , “मोहरम मुबारक.’मुस्लिम मित्र शिया होता. हे ऐकून तो आश्चर्यचकित झाला. त्याने कपाळावर हात मारला. मग विनयने त्याला  विचारले, “मुबारक का म्हणत आहेस ?”

“माझी मर्जी!” तो  भडकला, “माझी मर्जी. तुमच्यासारखा संकुचित हृदयाचा नाही मी. सणावाराला अभिनंदन, शुभेच्छा देणे आपले कर्तव्य आहे.”

“अरे ,मोहरम सण नाही .” विनय चिडून म्हणाला. 

“मग काय आहे?”तो अजूनच संतापला.

“दुःखाचा दिवस आहे !शोक दिवस आहे!”

“ओह!”मुस्लिम मित्रासमोर हात जोडून “सॉरी!” म्हणत तो चूप बसला.


 ह्या प्रमाणेच त्याला सांगावे लागले की अजान पाच ही वेळेस नमाज पठण करायला असते . अजान म्हणजे ताबडतोब मस्जिदला पोहोचा.एक तर्हेचा आदेश ,गजर म्हणा ना.निमंत्रण आहे अजान.नमाज तर न बोलता करतात . मग तो तोंड पाडून बसला .

आणि म्हणाला,”तुम्हाला तर फक्त बहाणाच पाहिजे माझा अपमान करायला.”


विनय ह्या वर काय म्हणणार ? त्या महिलेला तिचा रस दाखवण्यासाठी फक्त एक  इशारा हवा आहे. ती हसत आहे. प्रत्युत्तरादाखल तो ही हसतो, तिच्या डोळ्यात पाहतो.   हसतो .हसत हसत तो ध्यान कक्षात पोहोचण्यासाठी ओट्या वरून उठतो. ध्यान कक्षाकडे जाताना, तो विचार करतो की या रशियन महिलेचे स्तन अधिक पुष्ट आहेत की तिचे नितंब अधिक पुष्ट आहेत. तो ठरवू शकत नाही. तो त्याच्या नेहमीच्या आसनावर बसतो. तो बघतो की अद्याप जास्त लोक ध्यान कक्षात आलेले नाहीत. आचार्यही आले नाहीत. पण पाठोपाठ ती रशियन महिला आली आहे. ती देखील तिच्या सौंदर्याची उधळण करत तिच्या नियुक्त जागी बसली आहे. हळूहळू, सर्वजण आचार्यांसह ध्यान कक्षात प्रवेश करतात. ऑडियो वाजू लागतो. तो इतरांप्रमाणे डोळे बंद करतो. त्याचे डोळे बंद आहेत. डोळे बंद केल्यावर त्याला असे वाटते की त्याने एका अंधाऱ्या गुहेत प्रवेश केला आहे. सर्वत्र अंधार आहे. काळोख आहे. या अंधारात एक अलौकिक आनंद आहे. हळूहळू, तो अंधारात प्रवेश करत आहे. श्वासोच्छवास चालू आहे, आणि अंधार्या गुहेतला प्रवासही चालू आहे. श्वास आत येत आहे, श्वास बाहेर जात आहे. तो श्वास आत आणि बाहेर येत असताना त्याला  जाणवत  असतो. तटस्थ राहण्याचा जाणीवपूर्वक प्रयत्न सुरूच असतो. कधीकधी हा प्रयत्न यशस्वी होतो, कधीकधी तो अयशस्वी होतो. पण प्रवास सुरूच राहतो. तो अखंड चालू राहतो. अचानक, या अंधारातही त्याला प्रकाश दिसतो. बंद डोळ्यांत प्रकाश. हा एक अलौकिक परम आनंद आहे. त्याला असे वाटते की तो खोल पाण्यात आहे. आणि पाण्यात उजाळा आहे. तर तो त्या अंधाराच्या गुहेतून कधी बाहेर पडला? की हे पाणी गुहेतच आहे. तो उत्साहित झाला आहे. पण तो डोळे उघडत नाही. तो डोळे उघडत नाही, जेणेकरून हे अलौकिक स्वप्न तुटू नये. मग तो विचार करतो की तो निद्रेच्या  नौकेत चढला आहे का आणि या अलौकिक स्वप्नाने त्याला वेढले आहे  की काय? पण आना- पान , श्वास घेणे आणि सोडणे चालूच आहे.म्हणून त्याला समजते की ही झोप नाही तर समाधी आहे. तो ध्यानाच्या पुष्पित,पल्लवित पुढच्या अवस्थेकडे प्रफुल्ल वाटचाल करत आहे. सतत अग्रेसर आहे. हाच तर ध्यानाचा आनंद आहे.


तो तरुणपणी पट्टीचा पोहणारा होता. तो नेहमीच नदीच्या खोल पाण्यात जायचा, कधी होडीतून नदीच्या मध्यभागी उडी मारायचा, तर कधी खूप उंचावरून. नदीच्या तळाशी पोहोचण्याचा, जमिनीला स्पर्श करून आणि नंतर जलप्रवाह कापत नदीच्या पृष्ठभागावर येण्याचा प्रवास हा अंधारापासून प्रकाशाकडे जाण्याचा प्रवास होता. त्याने अलौकिक आनंद अनुभवला, जो रोमांचक आणि उत्साहवर्धक होता. तर, नदीच्या तळाशी जाणे आणि खोल पाण्यातून वर येणे हे देखील आध्यात्मिक साधने चे एक रूप होते का? नकळत आध्यात्मिक साधनेचा प्रवास. की ही विपश्यना साधना खोल पाण्यात उतरण्याची साधना आहे. जी त्याला एका अलौकिक प्रवासावर घेऊन जात होती ? त्याला माहित नाही. पण त्याला आठवते की, मधुमेह झाल्यानंतर, तो त्याच्या डॉक्टरांच्या सल्ल्यानुसार बोटॅनिकल गार्डनमध्ये सकाळी फिरायला जाऊ लागला होता. त्याच्या फिरण्याच्या दरम्यान, तो दररोज थांबून तलावाच्या पाण्याकडे पाहत असे. त्या तलावातील कमळाच्या फुलांमध्ये निळे, मोकळे आकाश पाहणे खूप आनंददायी होते. सरोवरात झुकून, क्षणभर डोळे बंद करून, नंतर अचानक डोळे उघडून थेट पाण्याकडे पाहत असताना, त्याला असे वाटले की त्याचे मन प्रकाशाने भरले आहे. क्षणभर तो एका दिव्य आनंदाने भारला जात असे . तर,पाण्यात खोल पाहणे हा आध्यात्मिक साधनेचा एक प्रकार आहे का? माहित नाही. पण विपश्यना ही एक आध्यात्मिक साधना आहे. ती आध्यात्मिक साधना म्हणून ओळखली जाते. त्याला ध्यान म्हणतात. इंग्रजीत लोक त्याला मेडिटेशन असेही म्हणतात. त्याने इतर प्रकारचे  मेडिटेशन केले आहेत. पण तिथे हा अलौकिक गुण नव्हता. असा दिव्य आनंद, त्याला प्रणयात मिळत होता ,मिळत राहिला आहे .या ध्यानात सापडला आहे आणि तो अजूनही सापडत आहे. तथापि, दोन्ही अतुलनीय आहेत. ते वेगळे आहेत. प्रणय म्हणजे खोल पाण्यात उतरणे आणि हे ध्यान म्हणजे खोल पाण्यात बुडी मारणे. दोन मार्ग आहेत. दोन प्रकारचे आनंद. वेगवेगळे चरमोत्कर्ष आणि वेगवेगळे परिणाम. 


तो सध्या ध्यानात आहे.


ध्यान हे अमृतसारखे आहे. जसे काही शरीराचा सर्व ताण आणि थकवा या ध्यानात विरघळून गेला आहे असे वाटते. अभिमान, अहंकार, लोभ, सर्वकाही  तुटत गेले आहे असे वाटते. जणू काही तो मरत आहे असे वाटते. मरून तो त्याचे सर्व दुःख आणि त्याचे सर्व दुर्गुण मारत आहे. जसे गोरक्षनाथ म्हणतात , "मर, अरे योगी, मर, मृत्यू गोड आहे. मर, गोरक्ष सारखा मरण मर." हा मृत्यू स्वतः अमृत आहे. त्याला असे वाटते की तो विपश्यनेच्या पहिल्या पायरीवर पोहोचला आहे. त्याने विपश्यनेचा आनंद आणि अमृत चाखले आहे. प्रत्येक श्वासागणिक तो स्वतःला स्वतःपासून वेगळे झालेले पाहतो. हा प्रवास नवीन आणि रोमांचक आहे. हा पूर्णपणे वैयक्तिक प्रवास आहे. मनाचा प्रवास असा आहे. अचेतन मनाचा प्रवास. 


जेवणासाठी ध्यान सत्र संपले आहे. तो अजूनही बसला आहे, त्याचे डोळे मिटले आहेत. त्याला उठणाऱ्या आणि जाणाऱ्या लोकांची हालचाल जाणवत आहे. अचानक, त्याचा प्रवास खंडित होतो. त्याची एकाग्रता भंग पावते. त्याची तटस्थता नाहीशी होते. त्याच्या मनात जे अमृत बरसत होते ते थोडे से बाहेर पडल्यासारखे वाटते. तो उठतो. जेवणाच्या खोलीत जाण्याऐवजी, तो त्याच्या खोलीकडे जातो. सर्वजण जेवणाच्या खोलीकडे जात आहेत. त्याला त्याच्या मनाचा प्रवास काही काळ चालू ठेवायचा आहे. त्याच्या खोलीत परत  आल्यावर ,तो डोळे मिटून बिछान्यावर वर झोपतो. प्रवास पुन्हा सुरू होतो. मनाचा प्रवास. जणू तो पुन्हा खोल पाण्यात बुडाला आहे. अचानक, रशियन स्त्री त्याच्या ह्या प्रवासात उडी मारते. तो तिच्या उपस्थितीला टाळतो. पण प्रवास थांबतो. एक आंतरिक प्रवास. तरीही, तो तसाच झोपून राहतो. अचानक, त्याला त्याची आई आठवते. तिची आठवण येत असताना, त्याला जेवण आठवते. तो हळू हळू उठतो. तो उठतो आणि जेवणाच्या खोलीकडे चालतो. काही लोक जेवल्यानंतर निघून जात आहेत. तो जातो आणि एक ताट उचलतो आणि स्वतःसाठी अन्न काढू लागतो. जेवण घेऊन तो एका टेबलाकडे जातो. तो बसतो आणि आजूबाजूला पाहतो. ती रशियन महिला कुठेच दिसत नाही. तो डोके झुकवून जेवू लागतो. असो, जेवणाच्या हॉलमध्ये फक्त चार-सहा लोक उरतात. तो पटकन जेवतो आणि त्याच्या खोलीत परत येतो आणि झोपी जातो. तो गाढ झोपेत घोरत पडतो . पण ध्यानासाठी बोलावलेल्या घंटेच्या आवाजाने घोरणे  बंद होते.


हसऱ्या चेहऱ्यामागील दुःख वाचणारा विनय आता त्याच्या स्वतःच्या उदासी मागील कारण जाणून घेऊ इच्छितो. जणू तो स्वतःला सांगत आहे, "मित्रा, सत्य स्वीकारायला शिक. जर तू शिकलास तर काही गैरसमज दूर होतील. तू अहंकार, व्यंग, निराशा आणि कटुता यापासून मुक्त होशील." नाहीतर ,तू या सर्वांमुळे भरडला जाशील. म्हणजे तो स्वतःच स्वतःला धडा शिकवत आहे. तर, विपश्यना देखील यामध्ये प्रभावी ठरू शकते का? अहंकार, व्यंग, निराशा आणि कटुतेपासून मुक्तता मिळू शकते का?


माहित नाही!


ध्यान कक्षात प्रवेश करताच, ती रशियन महिला तिथे बसल्या जागे वरून गोड हसते , जणू त्याचे स्वागत करत आहे. तिचे डोळेही भावपूर्ण ,बोलके आहेत. विनयची चाल मंदावते. "हे कोणते सत्य आहे, भाऊ? ही कोणत्या प्रकारची विपश्यना आहे?" तो त्याच्या आसनावर बसून स्वतःला विचारतो. एक स्त्री स्वभावतःच  समजायला कठीण आहे. तो करून करून काय करणार ? कसे तरी, तो डोळे बंद करतो आणि ध्यानाच्या मार्गावर जाण्याचा प्रयत्न करतो. पण ती स्त्री त्याच्या बंद पापण्यांमागील येणाऱ्या आणि बाहेर जाणाऱ्या श्वासात मिसळून गेली आहे. आपला मार्ग त्याने गमावला आहे. ध्यानातून. श्वासाचे येणे आणि जाणे चालूच राहते आणि  त्याची भटकंती देखील चालू राहते. आचार्यांची ऑडियो टेप त्याच्या कानांशी बोलत नाही तर ती स्त्री बोलत आहे. ती त्याच्या बंद डोळ्यांत येऊन स्थिरावली आहे. त्याच्या श्वासात येणारी आणि जाणारी तीच आहे. तिने त्याचे कान, नाक आणि डोळे ताब्यात घेतले आहेत. जणू काही तिने विपश्यनाला विस्थापित केले आहे. जणू काही पूर येऊन त्याचे घर दार वाहून गेले आहे. तो बेघर झाला आहे. जणू काही बेघर,हताश विपश्यना, असहाय्य, त्याच्या आत कुठेतरी जागा शोधत आहे. आणि एखाद्या लहान मुलाप्रमाणे, त्याला विपश्यनेचे बोट धरायचे आहे. जत्रेत हरवलेल्या मुलाप्रमाणे, तो त्याच्या आईच्या बोटाच्या शोधात. रडणारे मूल, रुग्णाच्या नाडीचा शोध घेणाऱ्या वैद्यासारखे. त्याला त्याचा श्वासस्पर्श सापडला आहे. त्याला त्याच्या आईचे बोट सापडले आहे. त्याला एक  सुरक्षित जागा सापडली आहे. येणारा आणि जाणारा श्वास आता त्याला पुन्हा खोल पाण्यात ओढत आहे. त्याला आनंदाच्या महासागरात घेऊन जात आहे. अमृत पानाच्या प्रवासात. तो विचार करतो की तो कोणत्या वाहनावर  स्वार आहे. ते वाहन आहे की विमान? तो समजू शकत नाही. त्याला समजून घ्यायचेही नाही. साधन काहीही असो, साधना हाच खरा मार्ग आहे. सुख आणि शांतीचा आनंददायी प्रवास. त्याला माहित नव्हते की एका श्वासाचा स्पर्श, एका येणारा आणि जाणारा श्वास, इतका कठीण प्रवास इतका सोपा करू शकतो. त्याला कुठे ठाऊक होते की श्वास हा केवळ जीवनाचा, जीवनाच्या प्रगतीचा सूचक नाही. जर श्वास असेल तर जीवन आहे. त्याला हे माहित होते, सर्वांना हे माहित आहे. पण श्वास घेण्याचा हा आनंद एखाद्याला तटस्थ देखील बनवू शकतो, जिवंतपणी अमृतयात्रेचा अनुभव देखील घेऊ शकतो, हे कोणाला माहित होते? 


ध्यान सत्र संपले. संध्याकाळचे सत्र संपले की, जेवणाच्या खोलीत चहा आणि लाह्या फुटाणे  ठेवलेले असते.जे दुसऱ्या किंवा तिसऱ्यांदा विपश्यना अभ्यासक्रमाला आले आहेत, म्हणजेच ज्येष्ठ साधकांना फक्त लिंबू पाणी मिळते. विनय चहा पीत नाही, म्हणून तो चहाऐवजी एक छोटा ग्लास दूध घेतो. थोड्या नाश्त्यानंतर, तो त्याच्या खोलीत थोडा वेळ विश्रांती घेतो.नंतर ध्यान सत्र होते. एक छोटे सत्र.नंतर विश्रांती असते संध्याकाळी उशिरा,अंधार पडल्यानंतर,आचार्य गोयनका यांचे प्रवचन असते. व्हिडिओवर.ज्यांना हिंदी समजते ते हिंदीत ऐकतात, तर बाकीचे इंग्रजीत ऐकतात. दोघांसाठीही स्वतंत्र व्यवस्था आहे. दीड तासाचे प्रवचन ऐकल्यानंतर विनय समृद्ध होतो. समृद्धीचे हे भांडार दररोज वाढते. ध्यानापेक्षाही अधिक, आचार्य सत्यनारायण गोयनका यांचे हे प्रवचन आनंद देणारे असते.


‘प्रवचन ऐकल्यानंतर, लोक झोपी जातात. विनय दररोज फिरायला जातो. विपश्यना शिबिराचा परिसर मोठा आहे, म्हणून तो अनेकदा त्याचा  फिरण्याचा मार्ग बदलतो. तो एकटाच चालतो, शांतपणे. सर्वजण झोपलेले असतात आणि तो चालत असतो. या चालण्यामुळे ध्यानापेक्षा जास्त एकांत आणि एकाग्रता येते. आजूबाजूला किंवा दूरवरही कोणी नसते.  ह्या निर्जन भागात एकांताची शांतीची भावना असते. एकांत वातावरण मनाला आनंदाने भारून टाकते. ही एकांत जागा स्पेसचा आनंद देते. या शांत राजधानीत, ही निर्जन जागा त्याला आणखीच मोहित करते. सामान्य दिवसांत, तो अनेकदा त्याची आवडती गाणी आणि संगीत ऐकत फिरतो. पण इथे, हे सर्व करण्यास परवानगी नाही. म्हणून, तो विविध गोष्टींचा विचार करत करत फिरतो. 


आज हवेत थोडी जास्त थंडी आहे. थंड वारा राहून राहून त्याच्या कानांना त्रास देतो. त्याने ओव्हरकोट घातला आहे आणि डोक्याभोवती मफलर गुंडाळला आहे. तो खिशात हात घालून फिरत आहे. त्याला एनसीसी शिबीर आठवते . त्यामध्ये सकाळी सकाळी लवकर पळावे लागत असे. शिक्षक मफलर किंवा हातमोजे असे काहीही घालू देत नव्हते. त्यांनी आम्हाला सर्वकाही मोकळे ,उघडे ठेवण्यास सांगितले. पण हे विपश्यना शिबिर आहे. इथे शिक्षक नाहीत. पण तिथेही शिस्त होती. कडक शिस्त. इथेही शिस्त आहे. आम्हाला पहाटे चार वाजल्यापासून रात्री नऊ वाजेपर्यंत व्यग्र ठेवण्यात आले होते. इथेही. हो, एनसीसी शिबिरामध्ये विचार करायला वेळ नव्हता. इथे,विपश्यनेमध्ये, विचार करण्याची आणि समजून घेण्याची भरपूर संधी आहे. स्वतःबद्दल विचार करण्याची एकमेव फुरसत. तिथे, कठोर परिश्रम करण्याची पद्धत होती. इथे ध्यानाची पद्धत आहे. विनय तेव्हा युवक होता. तो किशोरवयीन होता. आता तो मध्यमवयीन आहे. तो त्या रशियन महिलेबद्दल विचार करत फिरत आहे. खांबांवर लटकणाऱ्या मंद विजेच्या दिव्यांनी उजळलेल्या, थंड वाऱ्यात फिरणे आनंददायी आहे. जणू तो स्वतःच्या एकांतात फिरत आहे. तो स्वतःच्या मनात फिरत आहे. त्याला वाटते की या विपश्यना शिबिरात भारतीय आणि परदेशी अशा अनेक महिला आहेत. तरुण, मध्यमवयीन आणि अगदी वृद्धही. मग या तरुण रशियन महिलेला अचानक त्याच्यात रस का वाटू लागला आहे? आणि तोही तिच्याकडे का अधिकाधिक आकर्षित होत आहे? तो येथे विपश्यनेसाठी आला आहे, प्रेम किंवा अश्लील चाळ्यांसाठी नाही.


बुद्ध यशोधरेला सोडून गेले होते. त्यांनी त्यांचे घर दार सोडले होते. आणि तो तर येथे   मोकळ्या केसांच्या जाळ्यात अडकला आहे. विपश्यनेच्या आनंदाची पहिली पायरी चढून आणि ते अमृत प्यायल्यानंतरही, तो अजूनही स्त्रीसुखाच्या लालसेत बुडत आहे. अचानक, त्याला कोणीतरी त्याच्या मागे येत असल्याचे जाणवते. हे पहिल्यांदाच घडत आहे. म्हणून तो वळतो आणि पाहतो. ती तीच रशियन स्त्री आहे. तो आपली पावले मंदावतो. हळूहळू, ती स्त्री त्याच्या बाजूने चालायला लागते. विनय मागे वळून ,पुन्हा मागे वळून पाहतो की कोणी मागे आहे की  काय!त्याला कोणीही दिसत नाही. तो निश्चिंत होतो. ती स्त्री हळूहळू त्याच्या जवळ जाते.अगदी जवळ त्याला स्पर्श करण्यासाठी.विनय आता काय करणार? हा विचार करत असतानाच त्याच्या आत वीज चमकून गेली . जणू काही शॉर्ट सर्किट झाले आहे. जणू काही वीज प्रवाह बंद झाला आहे.अचानक, तो पुढे जातो, तिला आपल्या मिठीत घेतो आणि तिचे चुंबन घेतो. रशियन स्त्री स्तब्ध होते. तिला कल्पनाच नव्हती की विनय इतक्या लवकर तिचे चुंबन घेईल. प्रतिसादात, ती विनयचे चुंबन घेते. ते काही वेळ एकमेकांच्या मिठीत बद्ध होतात , हळूहळू, नंतर बेभानपणे चुंबने घेतात पुन्हा पुन्हा, कुठला ही विचार न करता! त्यांच्या मिठीत रात्र अधिकच गडद होते. ते लिलीच्या झुडुपाच्या आडोश्यात लपतात. पुढे ते एका आंब्याच्या झाडाकडे जातात, जिथे विजेचा मंद प्रकाशही पोहोचू शकत नाही. त्यांच्यात कोणताही शाब्दिक संवाद होत नाही. त्यांचे शरीर संवाद करत आहेत. एका विचित्र द्विधा मनःस्थितीत आहे. हा शरीराचा संघर्ष आहे, मनाचा संघर्ष आहे, वासनेचा संघर्ष आहे की विपश्यनेमुळे निर्माण झालेल्या विकाराचा संघर्ष आहे? आणि पाहा,जे घडायला नको होते ते घडू लागले आहे. अचानक. हळूहळू, ती स्त्री विनयचे कपडे उतरवू लागते. विनय तिला विपश्यनेतील शिस्तीची आठवण करून देऊ इच्छितो. तो तिला सांगू इच्छितो की विपश्यनेचे प्रतिबंधात्मक नियम पाळणे महत्वाचे आहे. पण तो आपला मार्ग चुकला आहे. तो पूर्णपणे हरवला आहे. जणू काही  गायन आणि वादनाची जुगलबंदी चालू आहे.  सेजिया चढत डर लागे लोकगीत आहे ना!आनंद वाढत आहे, पण भीती ही वाटते! ओठ, गाल, गात्र सर्व वाद्ये बनले आहेत. आणि तो त्यांना, त्यांच्या तारांना, मध्यम स्वरात वाजवत आहे. जेव्हा एखादी स्त्री अशा उन्मादात असते तेव्हा तिचे ओठ स्वतः च बासरी बनतात. तुमच्याकडे फक्त तुमच्या ओठांमध्ये ते वाजवण्याची कला पाहिजे. श्वासोच्छवासाचा अभ्यास येथे देखील कामी पडला आहे.  तेच आना-पान, श्वास घेणे आणि श्वास सोडणे.


जेव्हा बासरी सुरात असते तेव्हा गालाचे संतूरच्या गोडव्यात रूपांतरित होण्यास वेळ लागत नाही. वक्ष पियानो बनले आहेत आणि नितंब तबला बनले आहेत. ही स्त्री या सर्व वाद्यांची लय आणि ताल जाणते, त्याची तिला चांगली समज आहे असे दिसते. ती निष्णात आहे. ती आता संकोचाचा पडदा तत्क्षणीच दूर करते. विनयला जसे हवे तसे ती त्याच्या इच्छेनुसार जुळवून घेते. या रशियन महिलेला सारंगीचा ही सूर खूप चांगला माहित आहे. ती त्याच्यावर झुकली आहे. ती झुकत राहते. ती सरकत राहते. जणू काही  सरकती जाए है नकाब ,आहिस्ता आहिस्ता! पडदा हळूहळू सरकत आहे! जणू तिचे तोंड घागर बनले आहे. तो अलौकिक आनंदात घागरीत बुडत आहे. बासरी असलेले ओठ आता माऊथ ऑर्गन बनले आहेत. ती जणू  बिन वाद्य वाजवते.  तो जणू व्हायोलिन बनून वाजत आहे. इकडे घाई नाही आणि तिकडे कोणतीही  सुस्ती नाही. देह संगीताच्या या मेळाव्यात, सर्व स्वर, सर्व आलाप , चढ-उतार, आरोह अवरोह त्यांच्या स्वतःच्या गतीने आहेत. त्यांच्या सर्व लवचिकता आणि लयीसह. त्यांच्या संपूर्णतेत. मिलनाची सतार अशीच तर वाजते. सतार तिच्या सर्व स्वरांना व्यवस्थित मांडून वाजवू लागते. विपश्यना शिबिरात ,या लिलीच्या झुडुपा जवळ, आंब्याच्या झाडाखाली  सतार वाजत आहे . जणू आंब्याची पाने आचमन करवून देत आहेत . 


शरीर संगीताच्या या मिलनात सर्व थंडी, सर्व गारवा निष्प्रभ आहेत. आता विनय पुन्हा त्या रशियन महिलेचे चुंबन घेत आहे. बेभानपणे. जणू त्याचे संपूर्ण शरीर बासरीसारखे आहे. तो तिच्यावर झुकला आहे, जणू आकाश धरती वर वाकले आहे. जणू तो ढग आहे, तो आता तिच्या शरीरात गडगडाट करत आहे. तो मेघ बनून तिच्यात बरसणार आहे,तो धापा टाकत आहे. हिवाळ्यात श्रावण  बरसत आहे. ज्या रशियन महिलेचे नावही त्याला माहित नाही, ती  वृक्षाला बिलगलेल्या अमरलतेसारखी त्याला चिकटून आहे. वृक्ष कितीही मोठा असला तरी, जेव्हा अमरलता त्याला वेढते तेव्हा फक्त अमरलता दिसते, वृक्ष नाही. वृक्ष या अमरलते च्या मागे लपलेला आहे. विनय देखील जणू या अमरलतेच्या प्रेमात वाकून लपला आहे, तिच्या छातीवर डोके ठेवून, जणू काही विश्रांती घेत आहे. थंड वारा त्याच्या शरीराला स्पर्श करू लागला आहे. तो त्याचा ओव्हरकोट उचलतो आणि तो स्वतःवर ओढून घेतो. घाईने चुंबन घेतल्यानंतर, तो हळू हळू उठतो. उठताना, त्याने कृतज्ञतेच्या भावनेने तिच्या कपाळाचे चुंबन घेतले. जणू काही मी तुला प्रेम करतो असे म्हणत आहे. दोघेही आपले कपडे घालतात आणि निघून जाणार आहेत. ती स्त्री त्याला बोटाच्या इशाराने थांबवते. आणि त्याला एकटे जाण्यास सांगते. महिला प्रथम तत्व लक्षात ठेवून, तो तिला प्रथम जाण्यास सांगतो. तो असाही विचार करतो की जर काही अप्रिय घडले तर ते त्याच्यासोबत घडले पाहिजे, त्या स्त्री सोबत नाही. ती त्याला परत एकदा मिठी मारते आणि पुन्हा एकदा घट्ट चुंबन घेते. आणि हळू हळू निघून जाते. तो तिला जाताना पाहत राहतो. विचार करतो, यालाच मिलनामधून समाधी म्हणतात का? की विपश्यनेतील ही वासना आहे.  


 वाहवा! फारच छान! 


तो त्याच्या खोलीकडे चालतो.सगळीकडे असीम शांतता आहे. थंडीही आहे. निर्जनतेच्या सर्व सीमा सुन्न झाल्या आहेत. बहुतेक लोक दिवसभर ध्यान केल्यानंतर इतके थकलेले असतात की ते  डोळे बंद केले की झोपी जातात. त्यांचे घोरणे सुरू होते. दिवसातून बारा तास बसणे , बसून ध्यान करणे हे खूप कष्टदायक आहे. म्हणून, त्याला बाहेर कोणीही दिसत नाही, परंतु त्याच्या खोलीच्या व्हरांड्यात, एक सिंगापूरचा साधू त्याला बाहेरून येताना पाहतो. तो पाहतच राहतो,जणू काही त्याला आजच्या त्याच्या खूपच वेळ  फिरायला जाण्यामागील रहस्य जाणून घ्यायचे आहे. विनय त्याच्या टक लावून पाहण्याकडे दुर्लक्ष करतो आणि  स्नानगृहामध्ये प्रवेश करतो. तो साधू अजूनही त्याच्या वर लक्ष ठेवून आहे. " वाहवा ,वाहवा !" तो म्हणू लागतो, जणू काही एक पहारेकरी सर्वांना सावध करण्यासाठी शिट्टी वाजवत आहे. 


तो हात, पाय आणि चेहरा धुतो, कपडे बदलतो आणि बिछान्यात झोपतो. तो  ब्लँकेटने

पांघरून घेतो.


 कोण जाणे ,कुणास ठाऊक काय घडते की विनयच्या आयुष्यात अचानकच स्त्रिया अशा प्रकारे  उपस्थित होतात. त्याच त्याला पकडतात. त्याचा ताबाच घेतात.आणि तो नदी बनतो आणि त्यांच्यासोबत  प्रवाहित होतो . वाहत जातो . रशियन महिले सोबत गेला तसा . जोपर्यंत स्त्रिया इच्छितात तोपर्यंत तो वाहत राहतो. नदीच्या खळखळत्या पाण्यासारखा. जेव्हा स्त्रिया, त्यांच्या स्वतःच्या कारणांसाठी आणि अडचणींसाठी, सीमा बांधू लागतात आणि सरहद्द ठरवू लागतात, तेव्हा तो बांध तोडत नाही किंवा सीमा ओलांडत नाही. तो एकटा असतो . शांतपणे दूर होतो . त्याला समजते की आनंदाचे क्षण निघून गेले आहे. त्याला आठवणी जपण्यात रस नाही. ज्याप्रमाणे ही महिला शांततेच्या या राजधानीत  चुपचाप आली. आणि नंतर निघून गेली. असे संबंध फक्त लपून छपून, चोरून चालू शकतात, वाजत गाजत नाही. हो,जर आतून होकार नसेल तर त्याने काही महिलांना निराश ही केले आहे. कारण ती स्त्री आवडली पाहिजे. इतरही अनेक गोष्टी आहेत. प्रत्येकीशी जवळीक होऊ शकत नाही. काहीही होऊ शकत नाही. मानसिक सामंजस्य आहे हे जे कुणाशी जोडून ठेवते . हे जुळणे महत्वाचे आहे. खूप महत्वाचे. हे सर्व विचार करत तो कधी झोपी गेला हे त्याला कळले नाही. तो रात्रभर अनेक स्वप्नांमध्ये विहार करून गेला. पण ती रशियन महिला  त्याच्या स्वप्नात आली नाही. खरोखरच्या मिलनानंतर तिचे स्वप्ने कोणाला येणार आहेत ?


सकाळची घंटा वाजते आणि तो कड बदलून पुन्हा झोपी जातो, नेहमीप्रमाणे, आळसात एक नवीन सौंदर्य शास्त्र निर्माण करतो. तो त्या रशियन महिलेच्या सहवासाची आठवण करून आनंदित होतो. अनेक युगानंतर त्याला असा गोड आणि नैसर्गिक मादक प्रणय  अनुभवायला मिळाला आहे. निर्बंध.या नैसर्गिक आनंदासाठी आणि मनमुराद आनंदाच्या या  स्वादासाठी तो त्या रशियन महिलेचा कायमचा ऋणी राहील.मनाला प्रसन्नता मिळाल्यासाठी. आता कार्यकर्त्याची रुण झुण घंटी अगदी दारावर वाजते. मंजुळ घंटीचा नाद. तो जागा होतो. आंघोळ केल्यानंतर, तो नेहमीप्रमाणे ध्यान कक्षात उशिरा पोहोचतो. त्या रशियन महिलेला पाहून तो ध्यान कक्षात बसायला आनंदाने तयार होतो . ती देखील आनंदित होते. ती फुललेल्या फुलासारखी हसते. तिच्या डोळ्यांतून प्रेम पाझरते . ती त्याचे स्वागत करते. जणू स्वप्नासारखी ती रात्र आठवून ती कृतज्ञता व्यक्त करत आहे. ती रात्र होती की स्वप्न, तो विचार करतो. थंडगार रात्रीच्या उबदार आठवणींना पुन्हा एकवार वाचत राहतो. ते वाचताना, तो डोळे बंद करतो आणि  श्वासावर लक्ष केंद्रित करतो. तो श्वासाच्या येण्या-जाण्याच्या मार्गावर आहे. लक्ष्य केंद्रीत करतो. खोल पाण्यात उतरत आहे.  त्या पाण्यातील लख्ख प्रकाश त्याला पुन्हा मोहित करू लागला आहे. जणू त्याला पाण्यातून बाहेर यायचे नाही. तो कधीच बाहेर येऊ नये. पाणी आहे की जाळे? तो समजू शकत नाही.ध्यानाचा हा झेंडा फडकवत तो दुसऱ्याच जगात पोहोचला आहे.जिथे कोणती  ही स्त्री नाही, ना कुठले शिबीर. तिथे केवळ बर्फ आहे. बर्फच बर्फ आहे.  जसा फोटोत दिसणारा हिमालय. खोल खोल पाण्यात हिमालय? तो घाबरतो. पण तो डोळे उघडत नाही. त्याच्या आतला बर्फ वितळत नाहीये, तो धड धड करत आहे. जणू  त्याचे हृदय धडधडत आहे. हा हिमालयाचा बर्फ आहे.


इंद्रियसुख मोठे आहे की आध्यात्मिक सूख ! हे त्याला ठरवायचे आहे. पण सध्या तो हे ठरवणे पुढे ढकलतो. कारण हा विषय खूप विस्तृत आहे. खूप निराशा आहे. आत्ता हे ठरवण्यात अनेक आव्हाने आणि धोके आहेत. मग त्याला वाटते की स्त्री ही स्वतःमध्ये अध्यात्म आहे. स्त्रीपेक्षा मोठे कोणतेही पुस्तक नाही. तुम्ही कोणताही विषय कोणत्याही प्रकारे वाचून समजू शकता.पण तुम्ही स्त्रीबद्दल कितीही वाचले तरी असे दिसते की तुम्ही खूप कमी वाचले आहे. तुम्हाला काही माहिती नाही. आणि स्त्री तुम्हाला पूर्णत: वाचूही  तरी कुठे देते! ती तुम्हाला  ती तिला हवे तितकेच वाचू देते आणि जाणून घेऊ देते. आणि  पूर्णत्व अजूनही तुम्ही रिकामे होता.


स्वतःच्या आईबद्दल आपल्याला किती माहिती असते? आपल्याला माहिती असण्याची गरजही नाही. मातृत्वाच्या पुढील दार बंद आहे, अगदी आईचेही. नऊ महिने तिच्या पोटात राहूनही तिला खऱ्या अर्थाने ओळखता येत नाही.आयुष्यभर तिला"आई ,आई "  म्हणून ही ओळखता येत नाही. आई तिला ओळखूही देत ​​नाही. मातृभक्त गणेशाला त्याची आई पार्वतीबद्दल किती माहिती होती? जर त्याला माहीत असते तर त्याने त्त्याच्या वडिलांच्या हातून त्याचे स्वतः चे डोके कापून हत्तीचे डोके का लावून घेतले असते? तो त्याच्या आईचा भक्तीत बुडाला होता ,त्याने आईच्या आज्ञेचे पालन करताना, पित्याशी युद्ध केले. शिव इतका हुशार होता की, पार्वतीच्या सांगण्यावरून त्याने गणेशाला पुन्हा जिवंत केले, पण त्याच्या  देहावर हत्तीचे मस्तक बसवले. त्याला माहित होते की हत्ती खूप विवेकी, बुद्धिमान आहे. गणेशाच्या डोक्यात किंवा मेंदूत विवेकबुद्धीचा अभाव होता. शिवाला हे माहिती होते, पण त्याला त्याची पहिली पत्नी सतीबद्दल किती माहिती होती? जर त्याला माहिती असती तर विष्णूला शिवाच्या हातातील सतीचे शरीर विच्छेदन करण्याची आवश्यकता का पडली असती? म्हणूनच स्त्री ही जगातील सर्वात मोठी पुस्तक आहे.स्त्री ही जगातील सर्वात मोठे ग्रंथालय आहे. 


आणि त्या स्त्रीचे शरीर?


विराट दुनिया आहे स्त्रीचे शरीर. स्त्रीचे मन तिच्या शरीरापेक्षाही विराट आहे. शेक्सपियर म्हणतो की पृथ्वीवर संगीत  त्यांच्या साठी आहे ज्यांना ते ऐकायचे आहे. त्याचप्रमाणे, विनयचा असा विश्वास आहे की शरीर संगीत त्यांच्यासाठी आहे ज्यांना त्यात स्वतःला कसे विरघळवायचे हे माहित आहे. ते स्वत: विरघळवून स्वतः संपवतात. जेव्हा हिमालय वितळतो तेव्हा गंगा तयार होते. शरीर संगीत आदराने, श्रद्धेने, विनीत होऊन स्वीकार करणाऱ्यांनाच हे संगीत कळते. जे विनम्रतेने स्वीकारत नाहीत ते दुर्दैवी लोक आहेत. ते अहंकारात जगणारे लोक आहेत. ते असे लोक आहेत जे स्त्रियांना उपभोगाची वस्तू मानतात. 


ध्यान चालू राहते आणि इकडचे तिकडचे प्रश्नही येतात. ध्यानाच्या गुहेत तो स्थिर राहत नाही; तो पाण्यासारखा वाहतो. बुद्ध म्हणतात की जर कोणी मला आणि माझ्या विचारांना समजून घेतले असेल तर त्यांनी पुढे जावे.माझ्या विचारांच्या खुंटीत बांधून राहू नका. विनय त्याच्या तटस्थ राहण्याला, एकटेपणाला, श्वासाच्या स्पर्शाला छेद देतो.जणू काही तो ही शांतता अधिकच घनदाट करू इच्छितो. आश्चर्य वाटते की हे पहाटेचे सूर्योदयापूर्वीचे सौंदर्य आहे, येणाऱ्या सकाळचे सौंदर्य आहे की जवळ येणाऱ्या सूर्योदयाच्या उंबरठ्यावर हलकीशी  चाहूल आहे. ही कोणती टायगर हिल आहे? ही कोणती कांचनगंगा आहे, जिच्या मांडीवर बसलेला सूर्य लहान मुलासारखा बाहेर डोकावत आहे. आईच्या मांडीवर बसलेला, एक शिशू हळू हळू बाहेर डोकावत आहे. टुकू टुकू बघतोय.सूर्याची लालिमा लावण्या सारखी उपस्थित आहे आणि हे ध्यान सत्र संपले आहे. तो उभा राहतो. आळसाने जांभई देत. काही लोक नेहमीप्रमाणे  ‘साधू साधू ‘ 

‘उत्तम उत्तम,’ म्हणतात . रशियन महिला अजूनही बसलेली आहे. तो तिच्या जवळून जातो. अचानक, ती त्याच्या पायाला हळूच चिमटा काढते.तो हळू हळू तिच्याकडे पाहण्यासाठी वळतो. ती मिस्किल डोळ्यांनी हसते. त्याच्या पायाला स्पर्श करून ती उभी राहते. कोणी काही समजण्यापूर्वीच विनय निघून जातो. ही कसली विनवणी आहे ? स्मृतींचे हे कसले चंदन आहे? 


चंदन आहे तर त्याला नक्कीच सुगंध येईल! सुगंध दरवळत राहीला! 


 फुल कोबीच्या शेताजवळच्या एका ओट्यावर बसून तो सूर्याच्या लाल लाल प्रकाशाकडे टक लावून पाहतो. तो हात जोडून उगवत्या सूर्याला नमस्कार करतो. सूर्याला अशाप्रकारे  ठुमकत ठुमकत उगवताना, डोलताना पाहणे हे मोठेच सुख आहे. निरंतर आणि अक्षत आनंद. उल्हासित करणारा, मनमोहक . विलोभनीय बालसूर्याचा आनंद आणि चंदनाचा सुगंधासारखे सुख आणखी कुठे मिळेल? ही अशी एक पूर्णपणे नवीन तजेलदार सकाळ आहे. या रात्र रूपी देहाला प्रज्वलित केले,तेव्हा कुठे असा मनोहर सूर्योदय झाला आहे. रात्री जेव्हा तो त्या सुंदर स्त्रीच्या आलिंगनात बद्ध होता, तेव्हा जणू काही आपण अग्नी ज्वाला सम बाहूंमध्ये आलिंगन बद्ध आहोत असे त्याला वाटले होते. आता, सूर्योदयाचे हे   मनोहारी सौंदर्य त्याला आपल्यात जाळ्यात गुंतवून टाकत आहे. रात्र रोमांचकारी स्वरुपात सरली म्हणून सकाळ ही सुंदर होते का, असा त्याला प्रश्न पडतो. त्याच्या आत एक रोमांच जागा होतो. एखाद्या सप्तकासारखा, सुमधुर नाद जागतो . तार सप्तक. हा रोमांच विपश्यनेमुळे आहे की कामवासनेमुळे, हे त्याला कळत नाही. त्याला कुठेतरी पाणी पाहायचे आहे. एखाद्या सरोवराचे, नदीचे पाणी. त्याला त्या पाण्यात सूर्याला, स्वतःला निरखायचे आहे. स्वतः चे पाण्यातील प्रतिबिंब पाहून खूप काळ लोटला आहे. पण या शिबिराच्या आवारात खूप काही आहे, मात्र तलाव नाही. मग जर इथे तलाव असता, तर त्या रशियन स्त्रीचा हात धरून तो त्यात उतरला असता का? आत्ता ह्या क्षणी, ती अचानक त्याच्यासमोर उभी आहे. आणि तो तिच्या निळ्या डोळ्यांच्या तलावात हरवून गेला आहे.   हरवून गेला गत रात्रीच्या आठवणींच्या सुगंधात. तिच्या शरीराच्या सुगंधात आणि सौंदर्यात. ती स्त्री  थांबून त्याच्याकडे क्षणभर पाहते आणि मग निघून जाते. तिचा गाऊन काल रात्रीचाच आहे. तो उठून खोलीत येतो. तो उशीला हातांत घट्ट धरून आडवा होतो. जणू काही ती उशी नसून, ती रशियन स्त्रीच आहे. तो तिचे चुंबन घेवून तिला एका तलावातच्या रूपात बदलू इच्छितो आहे, ज्याच्या पाण्यात तो स्वतःला निरखू शकेल. स्वतःकडे पहात पहात तो मनाच्या कुठल्याश्या प्रवासाला निघू शकेल. 


घंटा वाजली आहे. ध्यानसत्र बस सुरूच होणार आहे.आणि विनयने त्या स्त्रीवर लक्ष केंद्रित केले आहे, जिने काल रात्री मोगऱ्याच्या मादक मत्त सुगंध , आणि त्याच्या बाहुंमध्ये आनंद भरून टाकला होता. त्याला आठवते की संस्कृतमध्ये मोगऱ्याला मल्लिका आणि मालती दोन्ही म्हणतात. म्हणून त्याने तिला मल्लिका किंवा मालती म्हणावे. तो तिला मल्लिका म्हणायचे ठरवतो आणि उठतो. तो एखाद्या शीत झुळकेसारखा ध्यानकक्षाकडे चालू लागतो. बाहेरही एक मंद झुळूक वाहत आहे, जी शरीराला गारवा देते. पण ध्यानकक्षात,मल्लिकाने बिनाबाह्यांचा पोलका घातला आहे आणि त्या खाली स्कर्ट आहे. तिला असे पाहून त्याला एका जुन्या गाण्याची आठवण येते,’रूपदंभा बडी कृपण हो तुम , अल्पव्यसना कैसे वसन हो तुम!’ तर मग,मल्लिकाला थंडी वाजत नाही का? 


नसेलच  थंडी वाजत ,म्हणून तर…त्यामुळेच ती अनेकदा बाही नसलेले कपडे घालताना दिसते.


ऑडिओ वाजत आहे. ध्यान धारण करण्यासाठी सूचना दिल्या जात आहेत. काही काही लोक तर पूर्ण कपडेही धारण करत नाहीत. त्याला आश्चर्य वाटते की ते ध्यान कसे धारण करतात. मल्लिका एकटीच नाही; इतरही परदेशी लोक आहेत जे अगदी कमी कपडे घालतात, जणू त्यांना थंडी जाणवतच नाही. मग, भूक आणि तहानने व्याकूळ झालेल्या या जगातील लोकांनाच फक्त थंडी जाणवते का? बुद्धांनाही थंडी जाणवत होती का? तो विचार करतो. श्वास येत आहे, जात आहे..हा श्वास त्याला समजावून सांगत आहे की दुसऱ्या कोणाचाही विचार करू नकोस.विनय श्वासाच्या या रूपाच्या प्रेमात पडला आहे. तो मल्लिकाच्याही प्रेमात पडला आहे .तो आणखी कोणा कोणाच्या प्रेमात पडणार ? तो असा अनेकदा विचार करतो. असा विचार करत तो ध्यानाच्या पाण्यात उतरला आहे.  खोल खोल पाण्यात. तो बुडत आहे. तो सतत खाली जात आहे. त्याला पाण्याच्या पृष्ठभागावर यायचे नाही. तो पाण्याच्या तळाशी पोहोचला आहे. तो स्थिर झाला आहे. मग, यालाच पाताळ म्हणतात का? तो या पाताळात किती काळ बुडून राहील? बुद्ध म्हणतात की या जगात काहीही स्थिर नाही. काहीही कायमचे नाही. सर्व काही नाशवंत आहे. सर्व काही बदलेल. मग ध्यानाची ही मुद्रा, खोल पाण्यात वारंवार उतरण्याची ही उर्मी कधी बदलेल का? तो विचार करतो. काहीही होवो, कधीही होवो, काहीही बदलो. त्याला  कश्याने काय फरक पडतो? तो तर खूप खोल खोल पाण्यात बुडाला आहे. ध्यानात 

बुडलेला!


की पाण्यात बुडाला आहे?


त्याला माहीत नाही. त्याला फक्त मग्न राहायचे आहे. बाहेर खूप काही बदलतं.आत मध्ये तर त्याहूनही जास्त गोंधळ आहे. तो बाहेरच्या जगाचा विचार करत नाही, ना आतल्या. तो हिशोबात नेहमीच कच्चा राहिला आहे. अचानक,तो झोपेच्या नावेत चढला आहे. घोरत, बसलेल्या अवस्थेत डुलकी घेत असताना तो खाली पडतो.ज्या क्षणी तो पडतो, त्याच क्षणी त्याची समाधी भंग पावते. तो अचानक उठून बसतो. त्याला दिसतं की, तो झोपी गेल्यामुळे सर्व  ध्यानस्थ साधक हलकेच हसत आहेत. मग, हे ध्यानस्थ साधक तटस्थ राहू   शकत नाहीत! स्वतःच्या आतूनच नव्हे, तर बाह्य जगापासूनही तटस्थ राहू शकत नाहीत का? जर हे साधक ध्यानात होते, तर त्यांनी विनयचे पडणे कसे पाहिले असेल? ते मोठ्या मोठ्याने हसले नाहीत, पण ते हसले तर होते. असो, तो पुन्हा ध्यानावस्थेत परत आला आहे. त्याला माहीत आहे की वारंवार झोपेची झापड येणे ही त्याचे व्यसन आहे. ही सवय त्याच्या विद्यार्थीदशेपासूनची आहे. वर्गात, शिक्षक त्याला अनेकदा खडूने मारून उठवत असत. अगदी घरीसुद्धा, अभ्यास करताना त्याला घरातले कुणी तरी उठवत असायचे. ऑफिसमध्ये, तो रोज बसल्या बसल्या झोपी जायचा. लोक त्यांच्या मोबाईलवर त्याचे फोटो आणि व्हिडिओ काढायचे, आणि इतरांना तक्रारीचे संदेश पाठवायचे. पण तो हतबल होता. तो तरी काय करणार होता?


सर्व सत्रे, जेवणे आणि प्रवचनांनंतर, पुन्हा रात्र झाली आहे. कालसारखीच. रोजच्यासारखीच. ती आज परत येईल का, या विचारात तो फेरफटका मारत आहे. तो मल्लिकाच्या येण्याची वाट पाहत आहे, तिच्या येण्याची वाट पाहत तो फिरत आहे. जशी झोपेची डुलकी अधूनमधून त्याला मिठीत घेते, तशीच त्याला मल्लिकाला मिठीत घेण्याची ओढ लागली आहे. या हिवाळ्यात चंद्रसुद्धा जणू बाही नसलेला झाला आहे. जणू आपल्या आईच्या मांडीवर बसून, तिच्या शालीत लपून, तो हळूच डोकावत आहे. एकटक पाहत आहे. तर मग, चंद्रसुद्धा मल्लिकाची वाट पाहत आहे का?  प्रतिक्षा तर ही थंड गार हवा सुद्धा करत आहे,तसेच लिलीच्या झुडूपांना सुद्धा आहे . आंब्याची झाडे वाट पाहत आहेत.तसेच आचमन करणाऱ्या झाडाच्या पानांना सुद्धा प्रतिक्षा आहे.तसेच  ह्या निरव शांततेला सुद्धा प्रतिक्षा आहे.विनय चालून चालून थकला आहे. पण त्याला मल्लिकाच्या पावलांचा आवाज ऐकू आलेला नाही. तो सतत मागे वळून रस्त्याकडे पाहत राहतो. पण ती येत नाही. जेव्हा मल्लिका येत नाही, तेव्हा त्याला गालिबची आठवण येते: "हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी/ कुछ हमारी ख़बर नहीं आती !”गालिबची आठवण काढत तो आपल्या खोलीत येतो. हात-पाय धुतल्यानंतर, तो मल्लिकाचा विचार करत उशीला कवटाळून पलंगावर झोपी जातो. "जन्म एक फसवणूक आहे, मिलन एक स्वप्न आहे," असा विचार करत तो झोपी जातो. आणि बघा, मल्लिका आता आली आहे. स्वप्नात. तिच्या येण्याने त्याच्या मनातील गोंधळ वाढला आहे.  इकडे तिकडे,सगळीकडे गोंधळ आहे. सकाळच्या घंटेने त्याचे डोळे उघडले . स्नान करून तो ध्यानकक्षात पोहोचतो. बराच उशीर झाला आहे. आचार्य त्याच्याकडे रोखून पाहतात. तो हात जोडून खाली बसतो.  प्रतिसाद म्हणून मल्लिकानेही हात जोडले आहेत. आचार्यांच्या हे लक्षात येत नाही. त्यांच्या नजरेचा कॅमेरा विनयवरच खिळला आहे, जणू काही तो बालवाडीतला विद्यार्थी आहे आणि त्यांना त्याला शिक्षा करायची आहे. त्याला कोंबड्यासारखं उभं करायचं आहे. हा विचार करून तो हसतो . विनयला आज ध्यान करण्याची इच्छा होत नाहीये. काल रात्री मल्लिकाला भेटू न शकल्यामुळे तो खूप दुःखी आहे. तो निराशही झाला आहे. प्रणयाची आर्त साद होती. ती अभिसाराची रात्र होती. पण मानिनी अनुपस्थित होती. जणू काही सर्वच काही अनुपस्थित होते मल्लिकेच्या अनुपस्थिती मुळे.स्वप्नात येऊन काय फायदा? स्वप्न म्हणजे शुद्ध फसवणूक. पण मिलन ,हे ही सुद्धा एक स्वप्नच असते.  मिलन आणि विरह याबद्दल  विनयच्या मनात खूप गोंधळ आहे. याचाच विचार करत तो पुन्हा झोपेच्या भरात आहे. मल्लिका पुन्हा हजर आहे. आणि तो हतबल आहे. हतबल. तो परत पेंगत आहे .कार्यकर्ता,स्वयंसेवक त्याला हलवत आहे. 


ती नाश्त्याच्या टेबलापाशी आहे.आल्या आल्या तिला निघून जायचे आहे. तो तिला थांबवतही नाही. तो बोलत नाही. तो साधा इशाराही देत ​​नाही. जरी त्याला तिला थांबवायचे असले, तरी तो कसे थांबवू शकणार? त्याला नातं उत्स्फूर्त असावं असं वाटतं. जर ते उत्स्फूर्त नसेल, तर त्याला काही अर्थ नाही. विवाहबाह्य संबंध कधीही कायमस्वरूपी असू नयेत. एकदा कायमस्वरूपी झाले की, ते कौटुंबिक कलह आणि गुन्हेगारीला कारणीभूत ठरतात. खून आणि तत्सम गोष्टी. अगदी बदनामीसुद्धा. म्हणून, हे टाळले पाहिजे. विवाहबाह्य संबंधांमध्येही मर्यादा,प्रतिष्ठा आणि पवित्रता आवश्यक आहे. मग,मल्लिका, या रशियन स्त्रीसोबत, तो फक्त एक क्षण असतो जो अलगद पणे निघून जातो. एक मानसिक नाते. एखाद्या तरंगत्या पुलासारखे. एक तात्पुरता पूल. नदीला पूर येण्याच्या नुसत्या शक्यतेनेही तुटणारा.


तर मग मल्लिकाचा पूल तुटला आहे का? माहीत नाही. पण विनय नक्कीच तुटला आहे.


तो भोजन कक्षातून बाहेर आला आहे. लंडनहून आलेला तो मुलगा हात जोडून, ​​विनम्रपणे त्याच्यासमोर उभा आहे. विनय हसतो. सिंगापूरचा तो मुलगा " धन्यवाद " असे म्हणत जवळून जातो. तो पपईच्या झाडावर लगडलेल्या अर्धवट पिकलेल्या पपईंकडे एकटक पाहतो.आज नाश्त्याला खाल्लेली पपई कमालीची गोड होती. अगदी दशहरी आंब्यासारखी. मल्लिकाचे वक्ष ही दशहरी आंब्यासारखेच होते, मोगऱ्याच्या सुगंधासारखे. म्हणूनच त्याने तिला मल्लिका हे काल्पनिक नाव दिले आहे. तिचे खरे नाव काय असेल कोणास ठाऊक? विनय अशा प्रकारे अनोळखी लोकांना, विशेषतः स्त्रियांना, काल्पनिक नावे देतच राहतो. जसे की, त्याची मुलगी लहानपणी लोकांना भाज्यांची नावे देत असे. कुणाला कोबी, कुणाला वाटाणा , कुणाला टोमॅटो, कुणाला बटाटा , फणस, कांदा, कोथिंबीर इत्यादी नावे होती. त्याचा एक मित्र मुलींना आरडीएक्ससारखी नावे देत असे. पण स्त्रियांची नावे ठेवताना विनय सौंदर्याशी तडजोड करत नाही. जरी ती स्त्रियांची काल्पनिक नावे असली तरी ही , तो त्यांना  अतिव आदराने संबोधतो. तो स्वाभाविकपणे सौंदर्यदृष्टीकडे लक्ष देतो. अनेक स्थानिक नावांकडेही. गाण्यांमध्ये वापरलेली संबोधनेसुद्धा तो अशा काल्पनिक नावांनीच न डगमगता वापरतो. घरी त्याने आपल्या पत्नीला अनेक नावे ठेवले आहे. जेव्हा तो 'बिल्लो राणी' म्हणतो, तेव्हा त्याची मैत्रीण पण खूप आनंदी होते. अगदी जेव्हा तो तिला 'बालम चिरई' म्हणतो तेव्हाही. पण तो कधीही कोणाचे  नाव बिघडवत नाही. आदर आणि सौंदर्यदृष्टी त्याच्या मनात नैसर्गिकरित्या  असते . तो स्त्रियांचा खूप आदर करतो. कारण त्याची आईसुद्धा एक स्त्री आहे. त्यामुळे आईचा अपमान करणे योग्य नाही. आदर हाच एकमेव आदर आहे. त्यामुळे प्रत्येक स्त्रीचा आदर नम्रतेने सहज साधला जातो. तो अनेक गोष्टींमधून जातो. पण तो स्त्रीचा आदर कधीही विसरत नाही. 


तो पुन्हा ध्यानात आहे. तेच खोल पाणी, तीच परमानंदाची भावना. एक प्रेमळ भावना. तोच आनंद, तीच एकाग्रता. हा श्वासाचा एक विलक्षण प्रयोग आहे. विपश्यनेपूर्वी त्याला हे कधीच कळले नव्हते की एकसुख त्याच्या खांद्यावर विसावत आहे आणि दुसरे ही येत आहे आणि लादले जात आहे . तिसरे, चौथे,पाचवे .अगणित सुख येतात आणि जातात. जणू काही तो एक हँगर आहे आणि त्यावर अगणित कपडे लादलेले आहेत. विपश्यनेच्या या ध्यानात, असेच आनंद हँगरप्रमाणे लटकलेले असतात. सफरचंदांनी भरलेल्या झाडा वर सफरचंदे लगडलेले,आंब्याच्या झाडावर आंबेच आंबे . द्राक्षवेलीवर द्राक्षांचे घड. फणसाच्या झाडावर अगणित फणस. सुख ही असेच येते आणि जाते, कधीही परत न येण्यासाठी. जसे मृत्यूनंतर माणूस कधीच परत येत नाही. जे लोक हे जग सोडून जातात त्यांच्यासाठी इतर जण गात राहतात, "चिठ्ठी न कोई सन्देश ,जाने वो कौन सा देश ,

जहाँ तुम चले गये, इस दिल पे लगा के ठेस ,जहाँ तुम चले गये! “हे सुख देखील त्याचप्रमाणे निर्मोही आहे. वेदना दिल्या असोत वा नसोत, ते परत येत नाहीत. कधीच परत येत नाहीत. बुद्ध म्हणतात, सुख असो वा दुःख, सर्व काही निघून जाते. दुःख निघून गेले तर बरे, पण सुख निघून जाता कामा नये. पण ते निघून जाते. जीवन म्हणजे एक  थोडे ऊन आणि लहानशी सावली.मल्लिकासुद्धा अगदी लहानशी सावली बनून आली. 


आणि ही पहा,मल्लिका ह्या रात्री परत आली आहे. स्वप्नात नाही, तर फिरायला.चालता  चालता तिने त्याला पुन्हा मिठी मारली आहे.मिठी मारत ती त्याचे वेड्यासारखं चुंबने घेऊ लागली आहे. जणू काही ती स्त्री नसून पुरुषच आहे. एका अनुभवानंतर, दुसऱ्या अनुभवात, तिने संकोच, लाज आणि मनधरणीच्या सर्व मर्यादा ओलांडल्या आहेत. सुखं असेच 

निघून जात नाही, ते असे येतेही.चुपचाप.शांततेच्या राजधानीत अगदी चुपचाप. तर मग, श्वास आणि सुख यांच्यात काही अज्ञात संबंध आहे का? माहीत नाही. पण आता तो खोल पाण्यात नाही, तर हृदयात खोलवर आहे. उफाळून येणारा आणि प्रेम करणारा. मल्लिकाच्या शरीराला वेगवेगळ्या ठिकाणी भेदणारा. एक नवीन वाट शोधणारा. मल्लिकाच्या शरीरातून मनाच्या वाटेवर एक नवीन मार्ग तयार करणारा. सुसाट धावणाऱ्या घोड्याप्रमाणे धावत ये-जा करणारा, मार्गातील झाडांमधून वाट काढणारा. धापा टाकत. जणू काही प्रेम मिलनाच्या या भ्रमंतीतून एक अंकुर समाधीच्या भूमीत रुजायला उत्सुक आहे. जणू एखाद्या वृक्षावर अंकुर फुटण्यासाठी आतुर झाला आहे. एक दवबिंदू झाडाच्या पानावर पडतो. पानावरून तो तिच्या नग्न शरीरावर, तिच्या घट्ट वक्षावर येऊन पडतो. वक्षावरून तो दवबिंदू  तुटून फुटून जातो.तो प्रेमात ओथंबलेला स्नेहबिंदू आहे. एका रात्रीच्या विरहाने गोंधळलेली मल्लिका, तिच्या आत असलेल्या वासनेचे हिमालय फोडून त्याचे तुकडे तुकडे करू इच्छिते. ते विरघळवून पाणी पाणी करायचे आहे. जणू काही मल्लिकाच्या आत मेघ बरसत आहे. मेघ गडगडाट करत लखलखत आहे. या थंड  वातावरणात तिच्या शरीरात एक महासागर उधाणलेला आहे. समुद्राच्या लाटा गर्जना करत खडकांवर आदळत मोठा आवाज करत आहेत .जणू काही ती कोलंबो आहे आणि तो समुद्र. मल्लिकाच्या शरीरातील समुद्राची गर्जना त्याला स्पष्टपणे ऐकू येते. त्याला ह्या तुफानी लाटेच्या गरजणाऱ्या आवाजात स्वत:ला विलीन करायचे आहे. विपश्यना शिबिराच्या परिसरातील ही थंड,ओलसर वाट मल्लिकाच्या पाठीवर एक नवीन पर्वताची तटबंदी तयार करत आहे. पण मल्लिका याबद्दल अनभिज्ञ आहे. ती नशेत बेशुद्ध आहे.  नदीसारखी अस्वस्थ आहे. पूर्ण ताकदीने, किनारा सोडून, एकामागून एक प्रवाह  सामावून  घेत तिला विनयच्या गावात शिरायचे आहे. जणू सुखाची नदीच. तिला विनयच्या गावातून वाहत जाऊन, जलप्रलय होऊन, पुन्हा पुन्हा परत यायचे आहे.


राग मालकौंस मधील हा मधुर शारीरिक संवाद, मध्यम, निषाद, धैवत आणि गंधार स्वर, पूर्ण आरोह आणि अवरोहाने युक्त 'सा नी ध नी ध म’ ची ही रचना, ह्या रात्री मोगऱ्याच्या सुगंध दरवळत आहे त्यात हरवून गेलेला विनय.मल्लिकाचे केस खूपच छोटे आहेत. विनयच्या केसांपेक्षाही लहान . नाहीतर, तो त्यांच्यातच लपला असता. पर्यायाने तो मल्लिकाच्या दोन भरगच्च वक्षांच्या संगमात सामावला जातो.जणू काही तो फुलांच्या उशीवरच आहे असे वाटते. मल्लिकाच्या गुबगुबीत शरीराला गोड करंजीची चव आहे. कोणताही संवाद नसताना, राग मालकौंस एखाद्या वाद्यावर वाजवल्यासारखा वाजत आहे. बासरीत रूपांतरित झालेले मल्लिकाचे शरीर आता शिथिल होत आहे. जणू काही ती तिच्या गंतव्यस्थानी पोहोचली आहे. विनयचे गंतव्यस्थानही उंबरठ्यावर आहे. ओठांपासून  जिव्हेपर्यंत, या देहाच्या सागरात केलेल्या मस्तीने तो आता धापा टाकत  आहे. जणू काही मोगऱ्याचा सुगंध अचानक दरवळून त्याला थकवून टाकतो. मल्लिका आज शाल गुंडाळून आली आहे. या कडाक्याच्या थंडीत ती शाल म्हणजे श्वासासारखी, पावसात छत्रीसारखी आहे. मल्लिकाला थंडी जाणवत नाही, पण विनयला मात्र खूप थंडी जाणवते. मल्लिकाच्या उबदारपणात तो थंडी विसरून जातो. आज उशीर झाला आहे. पण त्याला मल्लिकाच्या शरीरावरून उठायचे नाही. त्याला तिच्या निर्वस्त्र शरीरापासून दूर जायचे नाही. विपश्यना आणि कामवासनेच्या या अद्भुत संयोगाने विनय मोहित झाला आहे. 


वाहवा! वाहवा! 


जेव्हा तो आपल्या खोलीत परत आला, तेव्हा त्याला तिथे कोणीही आढळले नाही, 'उत्तम उत्तम ‘ म्हणणारा सिंगापूरचा भिक्षूही नव्हता. 


विपश्यना आणि कामवासनेचे व्यसन हे विनयच्या आयुष्याचा एक अविभाज्य भाग बनले होते. तो हरीनामाचा जप करायला आला होता, पण कापूस वेचत राहिला,असे काहीतरी घडले होते का? याचा विचार करत करत, विनयला झोप कधी लागली हे कळलेच नाही. जेव्हा तो ध्यान सत्रासाठी पोहोचला, तेव्हा मल्लिका तिथे नव्हती. पण नंतर ती कधी परत आली हे त्याला कळले नाही, कारण तो ध्यानात मग्न होता. सकाळी, नाश्ता करत असताना, काही लोक त्याच्याकडे एका विशेष नजरेने पाहत असल्याचे त्याच्या लक्षात येते. त्याला रहीमची आठवण येते. “ खैर,ख़ून, खांसी, खुसी ,बैर प्रीति ,मदपान / रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान।रहीमचा दोहा आठवून त्याला खूप भीती वाटते. कोणी काही पाहिले असेल का, या विचारात तो पटकन नाश्ता संपवून आपल्या खोलीत परत येतो. कोणी व्हिडिओ बनवला असेल का? कुणास ठाऊक. त्या रशियन बाईचं काय? ती तिच्या देशात परत जाईल. भारतात सगळे त्यालाच पाहतील. त्याचे सामाजिक आयुष्य उद्ध्वस्त होईल. तो कुठेही तोंड दाखवू शकणार नाही, घरी, कुटुंबात किंवा समाजात. आजकाल व्हिडिओ आणि फोटो क्षणात व्हायरल होतात. त्याची व्हिडिओची भीती पटकन नाहीशी होते. प्रत्येकाचे मोबाईल फोन जप्त केले आहेत. मग कोणी व्हिडिओ कसा काय बनवू शकेल? तो अचानक स्वतःच्या मूर्खपणावर हसतो. जेव्हा तो ध्यानकक्षात पोहोचला, तेव्हा त्याने आदल्या दिवशी शोक करणाऱ्या त्या स्त्रीला पाहिले. तिच्या सहकारी स्त्रियांमध्ये ती स्वस्थ बसली होती. हे पाहून त्याचे मन सुखावले . लंडनहून आलेला तो मुलगाही त्याच्याकडे पाहून हसला. मल्लिकालाही दिसली, पण मल्लिकाने त्याच्याकडे पाहीले नाही. आज सकाळी थंडी वाढली होती. सर्वजण व्यवस्थित कपडे घालून आले होते, पण तिने मात्र नेहमीप्रमाणे बाही नसलेला पोशाख घातला होता. एका बिहारीने मफलर इतका घट्ट बांधला होता की फक्त नाकातून श्वास घेता येत होता आणि डोळे दिसत होते. कार्यकर्ता आला आणि त्याने त्याचा मफलर सोडवला. ध्यानाचा वर्ग सुरू झाला होता. हिंदी आणि इंग्रजीमध्ये ध्वनिमुद्रिका सूचना सुरू झाल्या होत्या. तो ध्यानात मग्न झाला होता.जेव्हा पोट आणि इतर अवयव तृप्त होतात तेव्हा सर्व काही चांगले वाटते. मन प्रत्येक कामात गुंतलेले असते. " भूखे भजन नही गोपाला,ले तेरी कंठी,ले तेरी माला!”असं नुसतंच म्हटलं जात नाही.


ध्यानाच्या  या धरतीवर तो मुक्त आणि समाधानी असा उपस्थीत आहे. असे म्हटले जाते की लहान मुलाला आधी अर्थ कळतो, नंतर शब्द. तसेच विनयच्या बाबतीतही घडत आहे. त्याला आधी ध्यान समजले. ध्यान समजल्यानंतर, आता त्याला ध्यानाचा आनंद समजला आहे. एक अलौकिक आनंद. म्हणून, जर त्याने या विपश्यना अभ्यासक्रमात इंद्रियसुखाचा आनंद अनुभवला नसता, तर तो या परिपूर्णतेत ध्यान करू शकला नसता. तो वंचित राहिला असता. कुणास ठाऊक? आज तो खोल पाण्यात नाही, तर ध्यानाच्या आकाशात उंच भरारी घेत आहे. निळ्या आकाशात पक्ष्याप्रमाणे. पाण्याचा स्वतःचा आनंद असतो. आकाशाचा स्वतःचा आनंद असतो. तुलना करणे योग्य नाही. दोन्ही अलौकिक आहेत. अलौकिक आनंद. कधीकधी, सकाळी लवकर उठून आकाशाकडे पाहिल्याने माणूस सर्व काही विसरून जातो. जसे आपण तलावाच्या पाण्यात स्वतःला पाहतो, तसेच आपण आकाश पाहतो आणि  त्यात उडतो. जसे डोळे, तसेच आकाश. पक्ष्याप्रमाणे आकाशात हरवून जाणे हा देखील एक आनंद आहे. अखंड आनंद. आजच्या ध्यानात, तो पक्ष्याप्रमाणे आकाशात उंच भरारी घेत आहे. तो दिशाहीन होत आहे. त्याचा उड्डाणाचा वेग वाढतच आहे, जणू काही त्याला पृथ्वीची कक्षा सोडून आकाशात पोहोचायचे आहे. 


तर मग तो अंतराळयान बनला आहे का? अंतराळयान की कुठलासा उपग्रह?


माहित नाही!


ध्यान हे सुद्धा एक यान आहे. यान आकाशातउंच उडते. ध्यानातील मन. मनाची भरारी ही सुद्धा एक ध्यानच आहे. श्वासाचे येणे-जाणे, श्वासाचा स्पर्श  अखेर काय आहे?. जेव्हा ते  यान खोल पाण्यात बुडते, तेव्हा ते पाणबुडी बनते का? तसे वाटते. बरं, जर ते उपग्रह बनले, तर ते कधी पृथ्वीवर परत येईल का! तो विचार करत राहतो. तो विचार करत राहतो, आणि त्याला झोप यायला लागते . तो त्याच्या किशोरवयीन दिवसांमध्ये परत जातो. त्याची आई त्याला अनेकदा मध्येच थांबवून, हलवून विचारायची, "बाळा, तू किती झोपणार आहेस?" तो तिला मध्येच थांबवून म्हणायचा, "मी झोपत नाहीये, मी विचार करतोय." हे त्याच्या बाबतीत अनेकदा घडते: जेव्हा तो खूप विचार करतो, तेव्हा त्याला झोप येते. तो झोपत राहतो. तो विचार करत राहतो. विचार करणे आणि झोपणे एकमेकांत गुंतलेले, एकमेकांना पूरक आहेत. झोप ही विचारांसाठी खतासारखी आहे. ती पाण्यासारखी आहे. झोप ऊर्जा देते. ताजेपणा देते. झोपेत तो घोरायला लागतो आहे. कार्यकर्ता येतो आणि त्याला हलवतो. विनयसाठी ही रोजचीच गोष्ट आहे. तुम्ही याला एक घटना म्हणू शकता. एक अपघात. प्रत्येक सत्रात त्याला झोपेची ही नौका सापडते. कधीकधी त्याचे वडील म्हणायचे, "तू किती झोपतोस?" तो वडिलांना कधीच उत्तर देत नसे. तो आईला सांगायचा की, तो झोपत नाही, विचार करत असतो. जेव्हा तो सकाळी उशिरा पर्यंत झोपू लागला, तेव्हा एकदा त्याच्या वडिलांनी त्याला सल्ला दिला, "सकाळी उठून बघ, स्वर्गात असल्यासारखं वाटेल." जेव्हा त्याचे वडील हे अनेकदा म्हणाले, तेव्हा एके दिवशी विनय वडिलांना म्हणाला, "कधीतरी सकाळी उशिरा  पर्यन्त झोपून बघा; तुम्हाला त्यात स्वर्गापेक्षाही जास्त आनंद मिळेल." त्याचे वडील संतापले. ते त्याच्या आत्याला म्हणाले, " तो खूप निर्लज्ज झाला आहे!"


विनय या विपश्यना शिबिरातही निर्लज्ज झाला आहे. सर्व बाबतीतच निर्लज्जता . रोज झोपेमुळे ध्यानकक्षात उशिरा पोहोचणे. मग, ध्यान करतानाही तो अधूनमधून पेंगतो. बसल्या बसल्या झोपी जाणे आणि  खाली झोक जाणे हे तर नित्याचेच झाले आहे. मग, अधूनमधून स्त्रियांकडे चोरून पाहणे. त्यांच्या शरीराकडे टक लावून पाहणे. आणि मग, कामवासनेत रमून जाणे. ही तर निव्वळ निर्लज्जता आहे. अशा शिबिरात जिथे बोलण्यास मनाई आहे. अगदी इशारे देण्यासही मनाई आहे.  तिथे ही कामवासना. विपश्यनेतली कामवासना. ही निर्लज्जतेची परिसीमा आहे. जर कोणी त्याला पाहिले, तर त्याला ताबडतोब विपश्यना शिबिरातून बाहेरचा रस्ता दाखवला जाईल. अतिशय बेशिस्त आहे. पण विनय तरी काय करणार? कामवासना हा विषयच असा आहे. अग्नीचा सागर आहे. हा खेळ फक्त सर्व धोके पत्करूनच खेळला जाऊ शकतो. याच्यापुढे राज मुकुट आणि सिंहासन देखील निरर्थक आहेत. त्याला मनात एक असभ्य गाणे आठवते:ताज चाहिये ,ना  तख़्त … तेरा प्यार चाहिये , हर वक्त चाहिये….!


जेव्हा कोणी त्याची झोपमोड करते, तेव्हा त्याला खूप वाईट वाटते. जो त्याची झोपमोड करतो, तो जणू शत्रूच वाटतो. संपूर्ण जग एका बाजूला, तर झोप दुसऱ्या बाजूला. पण इथे, विपश्यनेत, झोपेची डुलकी खूप सुखद वाटते. बारा तासांच्या ध्यानात, झोप ही एकमेव गोष्ट आहे जी विजेच्या  झटक्या प्रमाणे सर्व थकवा आणि कंटाळा दूर करते. ती त्याला ताजेतवाने करते. तो फक्त दोन गोष्टी ऐकू शकतो: एक त्याच्या हृदयातील  आणि दुसरी झोपे बाबत.झोप ही एकमेव गोष्ट आहे जी सर्व ताणतणाव आणि अडचणींपासून विश्रांती देते. ती त्याचे ध्यान अधिक गहीरे आणि परिपूर्ण बनवते,  जसे  ए सी वातानुकूलन करते . त्याच्या मनाची हिरवळ अधिक बहरते.  प्रणय आणि झोप हे दोन्ही व्यक्तीला ताजेतवाने करणारे घटक आहेत. या दोन्हींमध्ये व्यत्यय आल्यास मन विचलित होते. 


आपल्या ध्यानमय उड्डाणात तो काय विचार करत असतो , कोण जाणे. तर मग, पक्षीसुद्धा उडताना विचार करतात का? त्याला माहीत नाही. पण त्याने अनेकदा पाहिले आहे की, दररोज संध्याकाळी अनेक ठिकाणी खूप पक्षी एकत्र जमतात. त्यांचे थवेच्या थवे. एका लांब विजेच्या तारेवर. रेल्वे प्लॅटफॉर्मच्या छतावर. एखाद्या प्रचंड झाडावर. शेकडोच्या संख्येने. दररोज जवळजवळ त्याच वेळी. जणू काही त्यांची संसदच भरली आहे. ते इकडेतिकडे उड्या मारतात आणि एकमेकांशी गप्पा मारतात. मग, दहा-वीस मिनिटांनी ते निघून जातात. दिवसाचा थकवा दूर करून, एकमेकांची विचारपूस करून, ते वेगवेगळ्या दिशांना उडून जातात. त्याचप्रमाणे, त्याने काही मूक बधीर लोक कुठे ना कुठे एकत्र जमलेले पाहिले आहेत. ते येतात, हावभावांनी संवाद साधतात, हसतात, भांडतात आणि मग हळूच निघून जातात. तर मग, या विपश्यना शिबिरात जमलेले हे लोक, ध्यान करणारे हे लोक, काय  पक्षी आहेत ? की ते  मूक बधीर आहेत? इथे तर बोलण्यास सक्त मनाई आहे. हावभावांनी बोलण्यासही मनाई आहे. मग हे सर्व साधक तरी कोण आहेत? आणि या विपश्यना शिबिरात वाजणारी घंटा, कधी शाळेच्या घंटेची तर कधी तुरुंगाच्या घंटेची आठवण करून देते. शाळेत, घंटेवरून वर्ग आणि विषय समजतो. तुरुंगात, उठण्यासाठी, झोपण्यासाठी आणि जेवण्यासाठी घंटा वाजते. मग विपश्यना  केंद्र एक प्रकारचा तुरुंगच आहे का? असा तुरुंग जिथे बोलण्यावर, भेटण्यावर वगैरेही बंदी आहे. जणू काही सिगारेटच्या पाकिटांवर आणि दारूच्या बाटल्यांवर 'आरोग्यासाठी हानिकारक' असे लिहिलेले आहे. तरीही लोक सिगारेट ओढतात आणि दारू पितात. 


आणि इथे?


अशा इतक्या निर्बंधांखाली ध्यान. निर्बंधांखाली ध्यान कसे होऊ शकते? पण ते होत आहे. विनय स्वतःलाच प्रश्न विचारत असावा. या शांततेच्या राजधानीत, तर्काला स्थान नाही, तर आदेशांना आहे. लष्करी शिस्त ठासून भरलेली आहे. तर्क नाही, वितर्क नाही.युक्तिवाद नाही. फक्त आदेश. मनाला अनेकदा बंड करावेसे वाटते. जर सत्य बोलणे हे बंड असेल, तर होय, आम्हीही बंडखोर आहोत! विनयला म्हणावेसे वाटते. पण हे कुठे आणि कोणाला सांगावे? इथे कोणी ऐकणार नाही. कोणी बोलणारही नाही. जर त्याने प्रश्न विचारला, तर विपश्यना शिबिरातून हकालपट्टीची धमकी त्याच्यावर टांगती तलवार आहे. असा लेखी करार झाला आहे. मग ध्यानाचा आनंद, प्रत्येक क्षणी कमी होणारा ताण तणाव , हा लाभ कोणी कसा सोडू शकेल? एक डॉक्टरचा मुलगा आहे. बावीस वर्षांचा. तोही विपश्यनेचा सराव करायला आला आहे. व्यसनाच्या सर्व मर्यादा ओलांडून आयुष्य उद्ध्वस्त केल्यानंतर तो सुधारणा करण्यासाठी आला आहे. जेव्हा डॉक्टरांचे सर्व उपचार संपले, तेव्हा त्यांना विपश्यनेच्या पायरी वर आशेचा शेवटचा किरण सापडला. या मुलाने दारू, ड्रग्स, मसाला स्मॅक, हेरॉईन इत्यादी काहीही सोडले नव्हते. आता तो विपश्यना शिबिरात हे सर्व सोडायला शिकत आहे. तो इथे दुसऱ्यांदा आला आहे. पहिल्या वेळी त्याला फक्त अंशतः यश मिळाले होते. या वेळी, त्याचे यश आणखी वाढेल या आशेने, डॉक्टरांनी आपल्या मुलाला इथे पाठवले आहे. तो खूप देखणा आहे. या चॉकलेटसारख्या चेहऱ्याच्या मुलाकडे पाहून, तो इतका गंभीर व्यसनी असेल याची कल्पना करणे कठीण आहे. त्याच्यासारखे लोक आपल्या आजारांपासून मुक्ती मिळवण्यासाठी इथे आले आहेत. ते तणाव कमी करण्यासाठी आले आहेत.किती प्रमाणात यश मिळते ,त्यांचे त्यांनाच माहीत! 

किती लोक दुःखी कष्टी आहेत हे फक्त त्या लोकांनाच माहीत आहे. विपश्यना ध्यान किती जखमा भरून काढत आहे हे कोणालाच माहीत नाही . विनयलाही माहीत नाही. 


विनयला हे नक्कीच माहीत आहे की या विपश्यना शिबिरात येऊन तो दोन प्रकारच्या नशेच्या आहारी गेला आहे. एक आहे ध्यानाची नशा. दुसरी आहे मल्लिकेची नशा. व्यसन, मग ते कोणतेही असो, नेहमीच वाईट असते; हे विनयला माहीत आहे. सध्या तो ध्यानात   गर्क आहे, आकाशाला उद्देशून गात आहे. डोळे मिटून, निळ्या आकाशाला उद्देशून गात आहे. आकाशात हरवून गेलेल्या विनयला अचानक "उत्तम उत्तम !" या आवाजाने व्यत्यय येतो. ध्यानसत्र संपले आहे. 


बाहेर  कोवळे ऊन आहे, पण मनात  खूप खूप थंडी आहे. 


या शिबिरात इतर काही स्त्रियाही आहेत. जणू काही त्या आपलं स्त्रीत्व,आपल्या शरीराचे   ओझे उचलून घेऊन फिरत आहेत. का, माहीत नाही.


खरं तर, काही स्त्रिया, त्यांच्या आयुष्याच्या संध्याकाळी, शरीरा शिवाय प्रेमाची

परीकल्पना करतात. किंबहुना, त्या या अमूर्त प्रेमाचे समर्थनही करतात. मग, या स्त्रिया मीरा बनण्याची आकांक्षा बाळगतात का? पण मीरा कृष्णाला बालपणापासून ओळखते. शारीरिक कृष्णाला नाही, तर मूर्तीला. हा प्रेमाचा आध्यात्मिक पैलू आहे. हे प्रेम अलौकिक आहे. ते गहन आहे. म्हणूनच रजनीश म्हणायचे की मीरा मद्यासारखी आहे. विनयचा विश्वास आहे की प्रेमसुद्धा एक मद्यच आहे. एक नशा. शाश्वत. पण शरीराशिवाय प्रेमाची परीकल्पना करणे म्हणजे प्रेमापासून पळ काढणे आहे. हे स्वतःशी खोटे बोलण्यासारखे आहे. ज्याला वाटेल तो हे बोलू शकतो. सत्य हे आहे की प्रेम जीवन जगणे शिकवते, पळवाट नाही. यात शरीरसुद्धा एक महत्त्वाचा घटक आहे. ज्या स्त्रिया शरीर विसरतात त्यांचे प्रकरण वेगळे आहे. पण शरीराशिवाय प्रेमाचा विचार करणे म्हणजे प्रेमाचेच विभाजन आहे. शरीरा शिवाय प्रेम अपूर्ण आहे. अन्न कितीही चांगले असले, कितीही स्वादिष्ट असले तरी, केवळ पाहिल्याने पोट भरत नाही. जरी देह तुमच्या समोर असला, जरी तुम्ही कोणावर प्रेम करत असलात, तरीही तुम्ही अमूर्त गोष्टींची कल्पना करत असाल, तर तुमच्यापेक्षा दुर्दैवी कोणी नाही.  तुम्हीं हो माता,पिता तुम्हीं हो,तुम्हीं हो बंधु, सखा तुम्हीं हो! हात जोडून गाण्यात काहीच हरकत नाही. यातही प्रेम आहे. कोणीही गाऊ शकतो. त्यावर कोणतीही बंदी नाही. आपली आपली  नशा असते.


तो आपल्या खोलीत घोंगडीत गुंडाळून पडून आहे. त्याला अस्वस्थ वाटत आहे. नाश्त्याच्या वेळी लोकांच्या नजरा त्याला काळजाला हुडहुडी भरणाऱ्या थंडीसारख्या   त्याला बोचत आहेत. भीती तर त्याहूनही जास्त  आहे. त्याला कलंकाची प्रचंड भीती वाटत आहे. "मग, तो आता मल्लिकाला भेटणार नाही का?" विनय जवळजवळ स्वतःशीच विचारतो. त्याला उत्तर देता येत नाही. उत्तर कसं असू शकतं? अशा गोष्टींना उत्तर नसतं. घंटा वाजली आहे. जास्त विचार न करता, तो अंथरुणातून उठतो आणि ध्यानकक्षाकडे जातो. वाटेत, त्याला घंटा वाजवून लोकांना उठवणारा कामगार दिसतो. तो विनयकडे पाहून आश्चर्याने हसतो. विनयही सहजपणे हसतो. मल्लिकासुद्धा ध्यानकक्षात येते. तिला पाहताच तो थांबतो. तो स्तब्ध उभा राहतो. ती अनपेक्षितपणे त्याच्या जवळून जाते. ती त्याला चिमटा काढते, आणि मग चिमणीसारखी उडी मारून निघून जाते. तो तिच्या नितंबांकडे पाहत तिचा पाठलाग करतो. त्याला तिच्या नितंबांमध्ये एक आकर्षक हालचाल जाणवते. एक प्रकारची घालमेल, जणू काही तिच्या आत काहीतरी आहे. आज तिनेही लाल रंगाची टोपी घातली आहे. विनयला, ‘सर पे टोपी लाल रेशमी, गाणे आठवते. गाण्यात वर्णन केलेल्या एखाद्या राजकुमाराप्रमाणे तो आपल्या आसनावर स्थिरावतो. ऑडिओ अजून वाजलेला नाही. आचार्य अजून आलेले नाहीत. यावरून हे दिसून येते की, आज एका चांगल्या मुलाप्रमाणे तो ध्यानकक्षात वेळेवर आला आहे. त्याला कोणाकडेही बघायचे नाही. कोणी त्याच्याकडे एकटक पाहावे असे त्याला वाटत नाही. त्याचे डोळे मिटलेले आहेत. तो आना-पानाच्या पायऱ्यांवर आहे. तो परमानंदाच्या सागराचा अनुभव घेत आहे. ऑडिओ सुरू झाला आहे. त्याला सूचना मिळत आहेत. तो आकाशाकडे झेपावत आहे. पक्ष्याप्रमाणे तो ध्यानाच्या परमोच्च बिंदूचा अनुभव घेत आहे. अचानक, कसा कोण जाणे, तो पाण्यावर उतरला आहे. जणू काही एखादे विमान धावपट्टीवर उतरले आहे. उतरल्यानंतर, तो वेगाने धावत आहे. बेभान होऊन. 


हे काय आहे? हा कसला प्रवास आहे?


त्याला समजत नाही. तो प्रयत्नही करत नाही. हे ध्यान आहे. ते त्याला कुठेही, कसेही घेऊन जावो. कोणत्याही दिशेने. त्याने स्वतःला मुक्त केले आहे. जसे दंतवैद्य म्हणतात, "तोंड सैल सोडा." इंजेक्शन देणारा म्हणतो, "हात सैल सोडा." त्यानेही स्वतःला त्याच प्रकारे मुक्त केले आहे. त्याने आपला हट्टीपणा सोडून दिला आहे. आपल्या श्वासाद्वारे. जसे त्याने काल रात्री स्वतःला मल्लिकेला समर्पित केले. तर मग, तो सुकाणू नसलेली नाव आहे का? जी त्याला पाहिजे तिथे, पाहिजे तसे घेऊन जाऊ शकते. कधी त्याचा श्वास, कधी त्याची झोप, कधी मल्लिका. जणू काही त्याचे अस्तित्वच नाही. तो विचार करतो. तो विचार करतो की हे अस्तित्वच तर त्याला नष्ट करायचे आहे. हाच या विपश्यनेचा उद्देश आहे. अखेर, जर त्याचे अस्तित्व असेल, तर तो तटस्थ कसा राहू शकतो? तो तटस्थ कसा होऊ शकतो! हेच त्याला शिकायचे आहे. गोरखनाथ म्हणतात,

“मरो वै जोगी मरो,मरण है मिठा  /मरणी मरौ जिस मरणी, गोरख मरि  दीठा!." गोरख अहंकाराच्या संहाराबद्दल बोलतात. अहंकार मेला की माणूस आपोआप तटस्थ होतो. केवळ अहंकार विरहित व्यक्तीच स्वतःप्रति आणि जगाप्रती तटस्थ राहू शकते. दुःख आणि सुख या दोन्हींपासून मुक्त होऊ शकते. जेव्हा 'माझे' किंवा 'तुझे' असे काही नसते, तेव्हा दुःख आणि सुखाचा काय उपयोग? आनंदाच्या या तेजात स्वतःला पाहून विनय विनम्र झाला आहे. 


जेवणाची घंटा वाजली आहे. विनय आपल्या जागेवरून उठत आहे. उठताना त्याला प्रश्न पडतो की, जेवणाच्या हॉलमधल्या लोकांना तो कसा सामोरा जाईल. मग तो विचार करतो, कुणास ठाऊक, कदाचित त्याच्याकडे टक लावून पाहणारे लोक केवळ एक भ्रम असतील. कारण जर कोणाच्या लक्षात आले असते, तर त्यांनी तक्रार केली असती.  आचार्य किंवा कॅम्प व्यवस्थापनाने त्याला बोलावून चौकशी केली असती. जे अजून झालेलं नाही. याचा अर्थ तिथे काहीच नाहीये. जे काही आहे, तो केवळ एक भ्रम आहे. त्याच्या मनात अपराधीपणाची भावना आहे. एक पाप. असा विचार करून तो हसतो. तो निर्धास्त होतो. तो छाती फुगवून जेवणाच्या हॉलमध्ये बसून जेवतो. ह्या व्यक्तीकडे आणि त्या व्यक्तीकडे टक लावून पाहत. जणू एखादा चोर पोलिस अधिकाऱ्याला ओरडत आहे. त्याच्याकडे कोणीही पाहत नाहीये. मग, सकाळची ती नजर त्या चोराच्या मनातले चांदणे होत का? हे दृश्य पाहून त्याला शांत वाटते. त्याच्या मनातील भीती नाहीशी होते. जेवण झाल्यावर तो आपल्या खोलीत परत येतो आणि निश्चिंतपणे झोपी जातो.

ध्यान आणि झोप. झोप आणि ध्यान. झोपेत ध्यान. ध्यानात झोप. जणू काही तो भूषण ची  उक्ती स्वतःशी पुन्हा पुन्हा म्हणत आहे, "साडी ने स्त्री ला परिधान केले असते, किंवा स्त्रीने साडी परिधान केलेली असते ! " तर मग, द्रौपदीप्रमाणेच तोही वस्त्रहरणाच्या त्याच सापळ्यात अडकला आहे का? मग ही मल्लिका कोण आहे? तिचा सन्मान जपणारा तो कृष्ण कोण आहे? हा कृष्ण द्रौपदीचे ऋण फेडत आहे का? किती लोकांना हे माहीत आहे की, एकदा कृष्ण पांडवांसोबत एका तलावात स्नान करत असताना, त्याचे लंगोट सुटून हरवले. द्रौपदी तिच्या मैत्रिणींसोबत शेजारच्याच तलावात स्नान करत होती. जेव्हा द्रौपदीला हे कळले, तेव्हा तिने आपली साडी फाडली आणि तिचा एक तुकडा कृष्णाच्या दिशेने फेकला. कृतज्ञ कृष्ण संपूर्ण सभेसमोर द्रौपदीचा सन्मान वाचवून ते ऋण फेडतो. ध्यान, झोप आणि मल्लिका यांनी या विपश्यना शिबिरात नम्रतेचा एक विचित्र त्रिकोण निर्माण केला आहे. विपश्यनेतील कामवासनेची ही जुगलबंदी त्याला कुठे घेऊन जाईल हे विनयला स्वतःलाही माहीत नाही. तो तर  बस ‘जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये / विधि का विधान जान हानि लाभ सहिए। ‘ ह्या वर विश्वास करत आला. आणि इथे  तर आता  बुद्धम शरणं गच्छामि धम्मम शरणं गच्छामि संघम शरणं गच्छामि  ह्या मंत्रात निबद्ध है। आणि बुद्ध म्हणतात, काहीही शाश्वत नाही. सर्व काही बदलणार आहे.सर्व काही नष्ट होईल. त्याने बुद्धांचे हे वचन स्वीकारले आहे. 


तर मग मल्लिकाचाही मृत्यू होईल का?


मल्लिका हे नाव तात्पुरतं आहे. त्याने ते स्वतःच्या सोयीसाठी ठेवलं आहे. तिचं खरं नाव काय आहे हे कोणाला माहीत? त्यालाही माहीत नाही की त्याला तिचं खरं नाव कधी कळेल की नाही. त्याला हे कसं कळणार होतं की, कोणताही संवाद न साधता, तो एका अज्ञात, रशियन स्त्रीशी इतका जोडला जाईल, इतका खोलवर गुंतून जाईल. त्यांच्याशिवाय दुसऱ्या कोणालाही माहीत नाही. न कळलेलंच बरं. दोन ध्यानसत्रं आणि एक प्रवचनसत्र बाकी आहेत. पण तो रात्री मोगऱ्याच्या फुलांच्या सुगंधाची आतुरतेने वाट पाहत आहे. तो वाट पाहत आहे. तो ध्यान करायला आला आहे. विपश्यनेचा सराव करायला. आणि तो कामवासनेत बुडाला आहे. जणू काही कामवासना हेच ध्यान आहे. ध्यान हीच कामवासना आहे. तो बैरागी व्हायला आला होता, पण मल्लिकाच्या प्रेमप्रकरणात तो रांझा बनला आहे. 


 धन्य आहे.


ही मल्लिका आहे की मेनका? काहीही असो, विनय विश्वामित्र नाही. तो निश्चितच मेनकाचा प्रियकर आहे. मग, मेनकाच्या रूपात असलेली मल्लिकासुद्धा विश्वामित्राची तपश्चर्या मोडू पाहतेय का? पण विनय काही तपस्वी नाही. तो कोणतीही कठोर तपश्चर्या करत नाही. मग त्याची तपश्चर्या कोण मोडेल? हा एक योगायोग आहे. एक आकर्षण आणि नियती. हे प्रेम आहे. एखाद्या फुलाच्या उमलण्यासारखं. हे उमलणंच एक इच्छा बनलं. भूक आणि तहान त्याचाच एक भाग बनले. फुलांच्या उमलण्यात निसर्गाची भूमिका असते. त्यामुळे, मल्लिका आणि विनय यांच्यातील ही उत्स्फूर्त जवळीकसुद्धा निसर्गाचीच देणगी आहे. हे नातं हेतुपुरस्सर नाही, ते उत्स्फूर्त आहे. जर मोगऱ्याच्या फुलासारखी सुगंधित मल्लिका विनयला भेटते, तर विनय, विनयवत , नम्रतेने मल्लिकाच्या प्रेमापुढे शरण जातो. विनयला कसे कळणार होते की चार-पाच दिवस आणि केवळ दोन रात्रींचे हे नाते इतके सुगंधित, इतके सुवासिक, इतके मोहक होईल.


तर मग मल्लिकाला माहीत आहे का?


जेव्हा मल्लिका ध्यानसत्रादरम्यान बीना बाहीच्या कपड्यांत त्याला भेटते, तेव्हा तिच्या  कोमल, मृदुल बाहूंमध्ये असंख्य फुले उमलतात. प्रवचनाच्या वेळी ती तिथे नसते. ती इंग्रजी प्रवचन कक्षात असते आणि विनय हिंदी प्रवचन कक्षात असतो. या प्रवचनादरम्यान तो मल्लिकाचा अजिबात विचार करत नाही. आचार्य सत्यनारायण गोयनकांचे प्रवचन इतके मनमोहक आणि परिपक्व असते की ते  इतर विचारांना जागाच सोडत नाही. तो मल्लिकाला विसरतो. प्रवचनानंतर थोड्याच वेळात, विनय, थकलेला असूनही, थोडा वेळ फिरायला जातो. याच फिरण्यादरम्यान मल्लिका त्याला भेटते. सकाळच्या आणि दुपारच्या जेवणावेळी चेष्टामस्करी केल्यानंतर, ध्यान कक्षात एकमेकांना चिडवल्यानंतर, ती त्याला फिरताना भेटते. ते अचानक भेटतात.  दोघांच्या ओठांत आग असते, श्वासात उत्कटता असते. ते बेभान होऊन चुंबन घेतात आणि या थंड गार हवेत रात्रीत  निर्वस्त्र होतात. कोणता ही संकोच न करता! अशक्य गोष्ट शक्य होते.मिलनाच्या आवेगात तो वाहून जातो. आज पुन्हा तीच रात्र आहे आणि तीच मल्लिका. मल्लिका त्याच्या मिठीत  सुखावत आहे आणि रात्रही. या थंड गार वातावरणात रात्रीची ही संवेदना विनयसाठी आनंदाचा स्रोत बनली आहे. कामवासनेच्या लाटा विनयच्या शरीरातून उसळत आहेत.  आकाशा प्रमाणे सर्व बाजूंनी त्याला घेरून टाकले आहे. जणू काही आकाश पृथ्वीवर झुकत आहे. विनय, पृथ्वी बनून, मल्लिकाच्या आकाशात हरवून जात आहे. जणू काही आकाशाने पृथ्वीला वेढले आहे. मल्लिका पुरुषाप्रमाणे चुंबन घेत आहे. चुंबन घेताना, तिचे ओठ अनियंत्रित होतात. ती जिभेने चाटू लागते. ती चुंबन घेत आहे. मल्लिकाचे ओठ आणि जीभ विनयच्या शरीरावर इकडे तिकडे फिरत आहेत, जणू काही ते लाँग ड्राईव्हवर आहेत. जसा एखादा भुंगा फुलातून परागकण शोषतो, त्याचप्रमाणे मल्लिका परागकण शोषत आहे. कोण जाणे ती कोणत्या प्रकारचे मध गोळा करत आहे. 


विनय  अतिशय आनंदात आहे. शुद्ध परमानंद. 


मल्लिका अचानक माती बनली आहे. तिने विनयला कुंभाराचे चाक बनवले आहे. जणू काही ती मातीचे भांडे बनवत आहे. ती हळूहळू चाकावर फिरत आहे. ती भांडे बनवत आहे, घागर, सुरई की आणखी काही, हे फक्त तिलाच माहीत आहे. ती सतत चाकावर नाचत आहे. गोल गोल फिरत आहे. हळूहळू. हळूहळू, सावकाशपणे वेग वाढवत आहे. जणू काही ती वाहतुकीत अडकली आहे. हळूहळू, सावकाश, दुसऱ्या गिअरमध्ये. एक गाडी पुढे जात आहे. थांबत आहे आणि थांबत आहे. क्लच सोडत आहे. गिअर बदलत आहे. कधी पहिला, कधी दुसरा, कधी तिसरा . मग अचानक दुसरा . जणू काही वाहतूक कोंडी संपली आहे. ती टॉप गिअरमध्ये आहे आणि तिने वेग वाढवला आहे. वेग इतका जास्त आहे की कुंभाराच्या चाकावर तयार होणारे भांडे घोडा बनले आहे. ती धापा टाकत आहे. धापा टाकत, झोपाळ्यासारखी झुलत आहे. जणू काही ती घोड्यावर बसली आहे आणि घोडा धावत आहे. तिला संपूर्ण पृथ्वी फिरायची आहे. एका बेदरकार घोडेस्वाराप्रमाणे, ती बेदरकार झाली आहे. गोंधळलेली ती घोड्याची मान धरून खाली पडली आहे. पृथ्वी आणि आकाश यांतील अंतर नाहीसे झाले आहे. यश, सफल मिलनाचा आनंद मल्लिकाच्या शरीराच्या प्रत्येक रोमछिद्रातून ओसंडून वाहत आहे. विनय तिच्या तृप्तीच्या आनंदात भिजून गेला आहे.स्वतःच्या ही सुखाने तृप्त झाला आहे. 


दूरवरून चंद्राशिवाय दुसरे कोणीही त्यांना पाहत नव्हते असे वाटत होते.शीतल चांदणे जणू मल्लिकाच्या चंदनी शरीराला स्पर्श करत होते.देहाला स्पर्श करणाऱ्या या चांदण्यांच्या दृश्याने विनय मंत्रमुग्ध झाला होता.


सकाळी घंटा वाजताच तो लगेच अंथरुणातून उठला.आंघोळ करून ध्यानकक्षात पोहोचल्यावर, तिथे जेमतेम पाच-सात ध्यानस्थ साधक उपस्थित होते. नेहमी उशिरा येणारा इतक्या लवकर कसा आला असेल या विचारात सगळे त्याच्याकडे पाहून हसले. विनय मल्लिका च्या दर्शनासाठी धावत आला होता. झोपेला तिलांजली देवून. आळसाला दूर सारून. पण सगळं काही अयशस्वी ठरलं होतं. पण विनय निराश झाला नव्हता. तो खाली बसला,त्याची नजर दारावर खिळली होती,जणू काही मल्लिकाच्या स्वागता साठीच त्याचे डोळे वाटे कडे लागले होते.आपल्या मनाच्या हिंदोळ्यावर बसून, मल्लिकाला रिझवण्यासाठी तो तिची प्रतिक्षा करत होता. मल्लिकाने कोणता अत्तर लावला होता कोणास ठाऊक, पण  ती दारापर्यंत पोहोचण्याआधीच चाहूल लागली. ती आत आली आणि विनयला आधीच बसलेला पाहून दचकली. विनयने डोळ्यांनीच तिचे स्वागत केले. काही कारणास्तव, ती त्याच्या जवळ गेली, पटकन वळली आणि आपल्या आसनावर बसली. हे सर्व इतक्या पटकन घडले की कोणालाही ते कळले नाही. आज, तिचे कळीसारखे, कोमल बाहू बाही नसलेले नव्हते. ते झाकलेले होते, कोपरापर्यंत पोहोचलेले. तिने केसांवर स्कार्फ घातला होता. मग, तिला काल रात्री थंडी वाजली का? या विचाराने त्याला थोडी काळजी वाटली. तोपर्यंत आचार्य आले होते. विनयला बसलेला पाहून आचार्यांनाही आश्चर्य वाटले. विशेष रीतीने डोळे मोठे करून त्यांनी आपले आश्चर्य आणि समाधान व्यक्त केले. ती भावना अशी होती की, एक बिघडलेला विद्यार्थी सुधारला होता. ते काहीसे असे होते. विनय परीक्षा हॉलमध्ये उशिरा येत असे हे आचार्यांना माहीत नव्हते. तो रोज ऑफिसला उशिरा यायचा. एक गाणं आहे, '  मैं देर करता नहीं,देर हो जाती है .’ त्यामुळे, जो कोणी आळशी असतो त्याला उशीर होणारच. तो सगळीकडे असतो. या विलंबामुळे विनयच्या अनेकदा ट्रेन आणि विमान चुकतात. तो अनेकदा चुकतो. पण आचार्यांना आणि लोकांना हे सगळं कसं कळणार? त्यांना कसं कळणार की ही आळशीपणाचीच सुंदरता आहे? आणि जेव्हा विनय उशिरा किंवा लवकर येतो तेव्हा लोक चकित होतात. त्यांचे डोळे मोठे होतात. या विपश्यना शिबिरात कोणीही हावभावांनीसुद्धा संवाद साधू नये असा नियम करून काही उपयोग नाही. लोकांचे डोळे नेहमी बोलतात. जसे आचार्यांचे डोळे आत्ता बोलले. जसे विनय आला तेव्हा तिथे उपस्थित असलेले लोक बोलले.मल्लिकाचे डोळेही बोलले. देहबोलीसुद्धा बोलत राहते. केवळ मल्लिकाचेच नाही, तर इतर स्त्रियांचे डोळे, स्तन, नितंबसुद्धा बोलत राहतात. काही स्त्रियांची दुःखी शरीरंही दिसतात. जणू त्यांच्या आयुष्यात जीवच उरला नाही. त्या मृतदेहांप्रमाणे हालचाल करताना दिसतात. त्यांचे सर्व हास्य आणि आनंद जणू नाहीसा झाला आहे. त्या स्वतः निर्जीव आणि अशुभ राहतात, त्या पाहणाऱ्यांना आणि त्यांच्या सभोवतालच्या लोकांनाही निर्जीव आणि अशुभ बनवतात. त्या आपल्या अशुभतेने त्यांचा आनंद हिसकावून घेतात. 


विनयला मल्लिकासारख्या आनंदी आणि उत्साही स्त्रिया आवडतात. त्यांचे भरगच्च शरीर मोहक असते. त्या सुगंधी असतात आणि दुसर्याला ही सुवासिक बनवतात .त्या नित्य नवीन सृष्टी निर्माण करतात.


तो गहन ध्यानात आहे. आज, ध्यानात असताना, तो पाण्यापर्यंत किंवा आकाशापर्यंत पोहोचलेला नाही. तो हिमालयात पोहोचला आहे. हिमालय, एक असे ठिकाण जिथे तो कधीच गेला नाही. त्याने ते फक्त फोटो आणि चित्रपटांमध्ये पाहिले आहे. तोआकाशातही कधी गेला नाही.पण तो अनेकदा विमानातून प्रवास करून आला आहे.तो ढगांच्या पलीकडे गेला आहे. खूप दूरवरूनही त्याने आकाश पाहिले आहे. त्याने ढगांचे जंगल पाहिले आहे. तो हे दररोज पृथ्वीवरून पाहतो. आकाशाच्या रूपात तो सूर्य, चंद्र आणि सर्व तारे पाहतो. ढगसुद्धा. आकाशातील ढगांचे समूह एक वेगळेच जग निर्माण करतात. ते ढगांच्या घनदाट जंगलासारखे आहे. ढगांची वस्ती. जणू काही माणसेही ढगच आहेत. ढग, वीज आणि समुद्र कधीही तहान भागवत नाहीत. पण हिमालयातून वाहणारी गंगा तहान भागवते. माणसांची आणि पृथ्वीचीही. गंगेच्या पाण्याला अमृत मानले जाते. तर, ध्यान करताना त्याच्या श्वासासोबत हिमालय प्रकट झाला असेल, तर त्यात काहीतरी विशेष आहे. जर काही असेल, तर ते नक्कीच महत्त्वपूर्ण असले पाहिजे. हिमालयाचा विचार मनात येताच, टायगर हिल आणि कांचनजंगा सुद्धा मनात आले. विनयला बर्फ आवडतो. बर्फाळ ठिकाणेही. पण या थंड वातावरणात, हिमालयाचा विचार त्याला अधिकच गारठवून टाकतो. हे अगदी एखाद्याने टायरमध्ये गरजेपेक्षा जास्त हवा भरण्यासारखं आहे. अगदी तसंच. हा हिमालय आहे की फक्त बर्फ? केवळ बर्फ म्हणजे उंच शिखर असू शकत नाही. हा हिमालय आहे. मल्लिका बर्फाळ प्रदेशातून आली आहे आणि म्हणूनच तिच्या विचारांमध्ये फक्त बर्फच दिसतो, असं शक्य आहे का? हिमालय आणि आकाश यांच्यात खूप कमी अंतर आहे. किमान फोटोंमध्ये तरी तसंच दिसतं. पृथ्वीवरून सुद्धा आकाश खूप जवळ वाटतं. तो इकडेतिकडे भटकतो. पण भटकल्यानंतर  तो पुनः पुनः हिमालया वर पोहोचतो .जसं एखादा पक्षी विमानावरुन उडून जातो आणि मग परत विमानावरच येतो. 


मी घरी असतो तर माझ्या बायकोला विचारलं असतं की याचा अर्थ काय आहे. मला माहित नाही की प्रत्येक स्वप्न-प्रतीकाचे काहीतरी उत्तर तिच्या कडे कसं असतं. की त्याचा हा अर्थ असतो. विनय त्याच्या स्वप्नात कधीकधी दिसणाऱ्या स्त्रियांबद्दल कधीच विचारत नाही. कारण आयुष्यात त्याला शांती आवडते. आणि ध्यानात, हा हिमालयसुद्धा त्याला अथांग शांती देत ​​आहे. ध्यानाचे अंतिम ध्येय शांती आहे. मनाची शांती. मग ती पाण्यात, खोल पाण्यात, निळ्या आकाशात, शुभ्र हिमालयात, किंवा डोलणाऱ्या, मोहक मल्लिकेत सापडो. त्याचा अर्थ आणि उद्देश केवळ शांती आहे. शाश्वत शांती. सर्व साधना, सर्व ध्यान हे शांतीसाठीच आहे. जिथे शांती आहे, तिथे  सुख,आनंद आहे. जिथे आनंद आहे, तिथे समाधान आहे. शांतीने इतकी नीरवता आणली आहे की झोपेची नाव पुन्हा प्रकट झाली आहे. स्तब्ध झालेला विनय स्वतःच्या घोरण्याच्या आवाजाने हादरला आहे. जणू काही झोपेची नाव जोरदार प्रवाहात अचानक उलटली आहे. ध्यानाच्या प्रवाहात पृथ्वीवर परत येणेही सोपे नाही. तो हिमालयात बुडाला आहे. हिमालयाच्या शुभ्रतेत. तो स्वतःला हिमालयाच्या वितळणाऱ्या बर्फात भिजलेला, विरघळणारा, बुडताना अनुभवतो. ऑडिओमध्ये असे काहीतरी घडले आहे जे ध्यानात मग्न असल्यामुळे त्याला ऐकू आले नाही. पण काही साधक 'साधू-साधू!' म्हणत नाचू लागले आहेत. त्या साधकांच्या आवाजात साधनेचा सुगंध आहे. साधनेची एक लहर आणि लवचिकता आहे. एक मधुर संगीत आहे. 


वाहवा! वाहवा! 


तो नाश्त्याच्या टेबलापाशी आहे. एकटाच. मल्लिका समोरच्या टेबलापाशी आहे. तिच्या ताटात कापलेल्या पपईच्या लांब फोडी आहेत. ती पपई खात आहे आणि अर्थपूर्ण नजरेने विनयला दाखवत आहे. जणू तिला  विनयला खायचे आहे. मल्लिकाचा हा अश्लील हावभाव विनयला आवडत नाही. तो दुसरीकडे वळतो. अखेर, जेवणाचे सभागृह लोकांच्या गर्दीने खचाखच भरलेले आहे. ते सर्व अद्भुत लोक आहेत. सुशिक्षित, साक्षर लोक. तिथे एक शास्त्रज्ञसुद्धा आहे. विविध क्षेत्रांतील अनेक व्यावसायिक. तो पटकन नाश्ता संपवतो आणि अचानक उठतो. तो खोलीत येतो आणि हातात उशी घेऊन आडवा होतो. आज तो मल्लिकाच्या एका कृतीने इतका अस्वस्थ झाला आहे की, नेहमीप्रमाणे उगवता सूर्य पाहण्यासाठी तो कोबीच्या शेताजवळच्या ओट्यावरसुद्धा बसलेला नाही. 


विपश्यनेतील हे कामवासनेचे संगीत काय आहे?


मल्लिका विनयपेक्षा उंच आहे, किमान तीन-चार इंच तरी उंच. ती अंदाजे सहा फूट उंच असावी. खूप गोरी. बऱ्यापैकी तरुण. कामवासनेच्या मोहात अधिक पटाईत. अधिक आक्रमक. तिचे वक्ष आणि नितंब घट्ट आहेत. ती बारीक नाही, पण ढिलीही नाही. ती खूप स्नायुबध्द आहे. तिच्या मांसलपणाच्या धुंद करणाऱ्या आकर्षणाने तो मोहित झाला आहे. तो रांझा बनला आहे. विनयकडे फक्त विनयच आहे. तो विनयप्रमाणेच तिला समर्पित आहे. त्याला माहित आहे की हे नाते फार काळ टिकणार नाही. विपश्यना सत्र संपले आहे आणि हे नातेही संपले आहे. शांत राहणे, या नात्यातून जेवढा रोमांच आणि आनंद मिळू शकेल ते  प्रसादा प्रमाणे  स्वीकारणे अधिक सुरक्षित आहे. या शांततेच्या राजधानीत, कोणताही संवाद किंवा प्रयत्न न करता मिळणारा हा अलौकिक आनंद, केवळ एक सुखद योगायोग आहे. त्यामुळे, जास्त अपेक्षा ठेवणे, जास्त पावित्र्य आणि सभ्यतेचा शोध घेणे, आणि क्षुल्लक गोष्टीवरून संतापणे, हे निश्चितच चांगले नाही. सरतेशेवटी, त्याला एका अनोळखी व्यक्तीप्रमाणेच निघून जावे लागेल. शिवाय, मल्लिका एक परदेशी व्यक्ती आहे. ' परदेसियों से ना अखियाँ मिलाना' ,हे गाणं त्याने खूप पूर्वीपासून ऐकलं आहे. ' ‘चलो,एक बार फिर से अजनबी बन जाए हम दोनों’ चला, हेही त्याने ऐकलं आहे. 'जाहि विधी रखे राम तहि विधी रहिये' यावरही त्याचा विश्वास आहे. एकंदरीत, तो मल्लिकाचा आभारी आहे. पूर्णपणे आभारी. तिने त्याला दिलेल्या आनंदापुढे तो नतमस्तक होतो. या मधुर मिलनाच्या आनंदापुढे. तिच्याशिवाय, या विपश्यना शिबिरात तो कदाचित इतकं एकाग्र होऊ शकला नसता. त्याच्या मनात उदासी आणि कोरडेपणाची भावना डोकावू लागली होती. मल्लिकाला भेटल्यानंतर, तो कोरडेपणा नाहीसा झाला. ती उदासी नाहीशी झाली. त्याला ध्यानाचा शुद्ध आनंद अनुभवता येऊ लागला. तो ध्यानासाठी अधिक समर्पित झाला. या साधनेत, विनय नावाच्या साधकाचे जीवन सुंदर झाले. अतिशय सुंदर. त्या थंड वाऱ्यातून वाहणारी ऊब तो कसा विसरू शकेल? 


घंटा वाजत आहे. 


पण तो आपल्या हातांतील उशीला अशाप्रकारे घट्ट धरून पडला होता, जणू ती उशी नसून, त्याच्या मिठीत मल्लिकाच होती. 


तो यंत्रवतपणे ध्यानकक्षात पोहोचला. कोणाकडेही न पाहता तो आपल्या आसनावर बसला. त्याला मल्लिकाला शोधण्याची इच्छाही झाली नाही. डोळे मिटून त्याने आपल्या मनाचे दरवाजे बंद केले. "अरे, माझे मन गोंधळलेल्या अवस्थेत नाही. केवळ श्वासाचा आणि श्वासाच्या स्पर्शाचाच विचार. तटस्थतेचा रोजचा सराव.जणू काही त्याच्या मिटलेल्या डोळ्यांच्या  घड्यात समुद्र शिरला होता. 


आनंदाचा महासागर. 


तो खोल पाण्यात आहे, पण जणू काही तो हिमालयातील एखाद्या गुहेत बसला आहे.


ध्यानात मान आहे, त्यात खूप जान आहे. फक्त त्याचा सराव करणे कठीण आहे. साधना कठीणच असते, मग ती कोणती ही असो. विपश्यना साधना खूप कठीण आहे. मग विपश्यना साधनेतील कामवासना. त्याहूनही कठीण. खूप दुर्मिळ. जवळजवळ अशक्य. जसे की त्या दिवशी ती गावची बाई विपश्यनेत बसली आणि आक्रोश करू लागली. तो विलापही खूप भेदक होता. खूप कठीण. केवळ विनय नाही, तर त्या बाईच्या विलापाने अनेक हृदये हेलावली. मग तो लंडनचा मुलगा. जो मोठ्या आदराने हात जोडून, ​​अधूनमधून त्याच्यासमोर येतो. एखाद्या लहान मुलासारखा. जणू काही तो मनाला गुदगुल्या करतो. 


ही सुद्धा कोणत्यातरी साधनेची कथा आहे का?


साधनेच्या या दाराशी उपस्थित राहिल्याने तो परमानंदात आहे. हिमालयासारखे शिखर. या शिखराच्या भावनेने भारावून गेले आहे. आज, साधनेच्या वाणीचा साधक अचानक 'साधू-साधू' म्हणू लागतो. ध्यान आता सोपे झाले आहे. ज्या ध्यानासाठी बसणे कठीण वाटायचे. अंग दुखायचे. पाठ आखडायची. आचार्य म्हणायचे की हा एक विकार आहे, जो बाहेर येत आहे. तो पाठ भिंतीला टेकू देत नसे. कामगार येऊन त्याला थांबवत असत. आता, पाठीचा तो आखडलेपणा, अंगदुखी, पाठ भिंतीला टेकवून बसण्याची ती इच्छा कुठे गेली? 


हो, फक्त झोपेची नावच अजून त्याच्यासोबत आहे. त्याने झोपेची नाव सोडलेली नाही. कोण जाणे, तो ती कधी सोडेल की नाही. तो विपश्यनेत हरवून गेला आहे. मल्लिकामध्ये. मल्लिका, विपश्यना आणि झोपेची नाव हे त्याच्या आयुष्याचे, त्याच्या आध्यात्मिक साधनेचे तीन केंद्रबिंदू आहेत. तो दिवस विसरला आहे. तो अधूनमधून रात्री मल्लिकाला पाहतो. त्यामुळे तो रात्र विसरत नाही. जेवण, ध्यान आणि चर्चा यांच्या सर्व सीमा ओलांडून रात्र परत आली आहे. फिरण्याची रात्र. मल्लिकाला भेटण्याची रात्र. नेहमीप्रमाणे, ती शांतपणे आली आहे आणि त्याच्या जवळून चालू लागली आहे. तिच्या अत्तराचा सुगंध त्याला मोहवत आहे. मल्लिकाच्या मांसलपणात, तिच्या धुंद करणाऱ्या सौंदर्यात रमून विनयने तिला आपल्या मिठीत घेतले आहे. तो तिच्या मानेचे चुंबन घेत आहे, त्याचा हात तिच्या कमरेभोवती फिरत आहे. तो चुंबन घेत आहे आणि मल्लिका बेहोश होत आहे. ती त्याच्यावर विसावली आहे, जणू नदीचा खेळकर प्रवाह, वाहत आणि उड्या मारत. मल्लिकाचे शरीरही त्याचप्रमाणे उसळत आहे. तिच्या शरीराचा अनियंत्रित प्रवाह जणू सर्व अडथळे तोडून विनयच्या गावाला बुडवून टाकतो. धोक्याच्या सर्व खुणा ओलांडणारा हा देहप्रवाह एका अक्राळविक्राळ पुराच्या रूपात प्रकट झाला आहे. 


हा कसला पूर आहे?


हे कसलं प्रेम आहे की विनय स्वतःला या पुराच्या स्वाधीन करतो? कोणताही प्रतिकार नाही. त्याला माहीत आहे की पाणी, वीज किंवा अग्नीशी कधीही लढू नये. आणि तरीही, इथे अग्नी, वीज आणि पाणी आहे. प्रत्येकाशी कसे लढावे? आणि का? वीज प्रकाश देते. अग्नी थंडीपासून दिलासा देतो. पाणी तहान भागवते. पुराचे पाणी लवकरच ओसरते. ओढा नदीला जाऊन मिळतो, पण तो गावावर आपली छाप सोडून जातो, ज्यामुळे जमीन अधिक सुपीक होते. पुराचे पाणी परत जाताना नेहमीच जमिनीत सुपीकतेचे घटक मागे सोडून जाते. हा त्याचा स्वभावच आहे, विशेषतः जेव्हा तो शरीराच्या नदीला पूर आणतो. हा पूर विकास आणतो, विनाश नाही. आज मल्लिकाला जायची घाई नाही. ती सर्व चिंता बाजूला सारते आणि तिला गहन शांती लाभली आहे. विनयला आपल्या बाहूंमध्ये घेऊन, ती बेशुद्ध पडली आहे, जणू काही ती पृथ्वी आहे आणि विनय गवत. गवताचा स्वभावच हा आहे की कितीही वादळे, पाऊस किंवा पूर आले तरी ते टवटवीत राहते. मोठी झाडे पडतात कारण ती ताठ उभी असतात. त्यांचा ताठरपणाच त्यांना मोडतो. गवत लवचिक असते. धोका जाणवताच ते इकडेतिकडे हलते. ते वाकते. ते टिकून राहते. कडक उन्हात वाळून गेले तरी, थोडे पाणी मिळताच ते पुन्हा हिरवेगार होते. त्याला जीवन मिळते. गवत प्रत्येक ऋतू सहन करते. विनय तेच गवत आहे. गवता प्रमाणे , मल्लिकाच्या ,पृथ्वीच्या मिठीत आहे. जणू काही शहामृगाने वाळूत आपले डोके खुपसावे, त्याप्रमाणे तो मल्लिकाच्या विशाल स्तनांमध्ये चेहरा खुपसून पहुडला आहे. आणि बघा, मल्लिकाच्या बाहूंच्या वर्तुळात जखडलेला, तो झोपेच्या नावेत चढला आहे. 


ही कसली आश्वस्ती आहे?


 तो झोपेत घोरत आहे, आणि मल्लिका त्याला हलवत आहे. विनयला जणू काही तो ध्यान करत आहे असे वाटते. पण जसे त्याचे डोळे उघडतात, झोपेच्या तंद्रीतून बाहेर पडतो, तेव्हा तो स्वतःला मल्लिका नावाच्या नदीत तरंगताना पाहतो. ही तीच नदी आहे, जिने काही वेळापूर्वीच विनयचे गाव आपल्या पुरात बुडवून पुन्हा जोर धरला होता. या चांदण्यात, नदीची ही एक धारा विनयला आणखी बांधून ठेवते. मल्लिकाचे दोन बाहू नदीच्या दोन काठांसारख्या वाटतात. या बाजूला राहावे की दुसऱ्या, हे त्याला ठरवता येत नाही. थंड चांदणे त्याला न्हाऊ घालतात, पण त्याचे शरीर अजूनही गरम वाटते. म्हणूनच तो हळूच आपले गाल मल्लिकाच्या स्तनांवरून बाजूला करतो आणि ओठांवर ठेवतो. त्याचे ओठ, जणू काही बोलू लागल्याप्रमाणे, मल्लिकाच्या झोपलेल्या शरीराला जागे करतात. ती काहीतरी पुटपुटते. विनय तिचे बाहू बाजूला करतो आणि काठ सोडतो. हळूच, तो प्रवाहाच्या मधोमध सरकतो. मल्लिकाचे कामुक शरीर जणू त्याला आमंत्रित करत आहे. ती जणू काही जादू करत आहे. तिचे शरीर शक्तीने भारलेले आहे, जणू हरिद्वारच्या हर की पौडी येथील गंगेचा प्रवाह. ती आपल्या मादक शरीराची जादू करत आहे. या जादूने ती विनयची इच्छा अधिक तीव्र करत आहे. ती त्याला आपल्या मोहकतेने भुरळ घालत आहे. कोण जाणे काय झाले आहे, की तिने माउथ ऑर्गन हातात घेतला आहे. कोण जाणे ती कोणती धून वाजवत आहे. लवकरच, ती भैरवीच्या तल्लीनतेत हरवून जाते. अचूक, विनयच्या अस्वस्थतेशी एकरूप. विनय आता मल्लिकाच्या शरीरावर टेकला आहे. मालकौंसशिवाय भैरवी वाजवणे अशक्य आहे. लवकरच, ते दोघे  ही मालकौंसच्या मधुरतेत हरवून जातात. जणू काही ते जुगलबंदी गात आहेत. मल्लिकाला त्याच्यातील प्रत्येक कण पिळून काढायचा आहे असे वाटते. तिला केवळ थोडे थोडके नाही, तर त्याहूनही अधिक हवे आहे. तिला सर्व काही ग्रहण करायचे आहे.कुणास ठाऊक केव्हापासूनची तहान, तिला ती आत्ताच शमवायची आहे. जणू काही ती एक अनंत काळ ची तहान आहे. तहान भागवत ,वाहत्या नदीप्रमाणे, ती सर्व बंधारे तोडून वाहतच राहते.


या शांततेच्या राजधानीत, राग मालकौंसमधील दोन शरीरांचे द्वंद्वगीत अप्रतिम आहे. देहबोलीचे हे जग अनुपम आहे. मल्लिकाच्या शरीरात आरोह अवरोह अगदी संगीतमय आहे. तो गोडवा शिवकुमार शर्मांच्या संतूरासारखा आहे. जणू काही एखाद्या संगीत दिग्दर्शकाने देहसंगीताची ही अकल्पनीय धून रचली आहे आणि मग तो अदृश्य झाला आहे. त्याला अवर्णनीय बनवण्यासाठी. कोणत्याही संवादाशिवाय. दोघेही एकमेकांच्या भावना समजून घेतात. ते एकमेकांच्या शारीरिक आणि मानसिक गरजा समजून घेतात. ते त्या पूर्ण करतात. असा सुसंवाद, असा समन्वय कसा शक्य आहे, हे विनयच्या आकलनापलीकडचे आहे. त्याच्या विविध प्रणय-आसनांचे जाळे मल्लिकाच्या निरागसतेला अधिक रंगत आणते. पुरुष असूनही, विनय अनेक आसने आणि मुद्रांशी अपरिचित होता, पण मल्लिका परिचित होती. केवळ परिचितच नाही, तर त्यात पारंगत होती. तिच्या अनेक प्रयोगांनी आणि त्यांच्या अंमलबजावणीने विनय थक्क झाला आहे. देहसंगीताला मधुर आणि अधिक मधुर बनवण्यासाठी दोन्ही बाजूंनी पूर्ण समर्पण कसे आवश्यक आहे, हे त्याला समजले आहे. सुसंवाद आणि एकरूपता आपोआप निर्माण होते. 'जर-तर'चे अडथळे या संगीताला किती वेदनादायी बनवू शकतात, हे त्याला माहीत आहे. पण मल्लिकाच्या शब्दकोशात कोणतेही अडथळे नाहीत. त्याला काय हवं आहे, हे तिला तिच्या प्रियकरापेक्षाही जास्त चांगलं माहीत आहे. 


तिला माहीत आहे की दवबिंदूंनी तहान भागत नाही. 


सकाळी, त्याला ध्यानाच्या सत्रासाठी पुन्हा उशीर झाला होता. आधी राग भैरवी, मग राग मालकौंस. या द्वंद्वगीतामुळे तो रात्री उशिरापर्यंत, अगदी पहाटेपर्यंत जागा होता. हा उशीर स्वाभाविक होता. पण मल्लिकासुद्धा गाण्यात सहभागी होती.  गायनामध्ये तिचाही सूर होता. पण तिला उशीर का झाला नाही? विनय स्वतःला विचारतो. पण त्याच्याकडे उत्तर नाही. तो आळशीपणाच्या मुखवट्याआड आपला चेहरा लपवतो. हे खरं होतं की त्याने दिवसभरात कमी ध्यान केलं होतं, जास्त करून झोपेच्या प्रवासात वेळ गेला होता. मग, जेव्हा संध्याकाळ झाली, प्रवचन सत्रानंतर, आचार्यांनी जाहीर केलं की सर्व साधकांची साधना आता पूर्ण झाली आहे. विनयच्या हृदयाचा ठोका चुकला. साधना इतक्या लवकर कशी संपू शकते? हे बरोबर नव्हतं. जणू काही जगायला शिकण्याआधीच आयुष्य हातातून निसटून गेलं होतं. काफिला निघून गेला आणि आम्ही धूळ बघत राहिलो. आता कुठे त्याला विपश्यना साधनेचं सार कळू शकत होते . सुरुवातीचे दिवस समजून घेण्यात आणि शिकण्यात गेले. आता जेव्हा ध्यानाचा दिवस आला, तेव्हा ध्यान सत्रं संपली. हे काय होतं? त्याने मल्लिकाच्या ध्यानात ,विपश्यना ध्यानाचे दिवस मोजणे थांबवले होते. त्याला त्याचा एक आयएएस मित्र आठवला. तो म्हणाला होता की, जेव्हा एखाद्याची दुसऱ्या विभागात बदली होते, तेव्हा तिथले कामकाज समजायला थोडा वेळ लागतो. जेव्हा कामकाज समजू लागते, तेव्हा पुन्हा बदली होते. दुसऱ्याच कोणत्यातरी विभागात. मग काय काम करणार? इथे विनयसोबतही तेच घडले आहे. जेव्हा ध्यान समजले, तेव्हा ते संपले. विनय केवळ ध्यानामुळे दुःखी नाही, तर मल्लिकापासून दुरावल्याचे ही दुःख वाटत आहे. पण आता तो काय करू शकतो? तो काय करू शकतो? 


आचार्य सांगतात की, या क्षणापासून सर्व निर्बंध संपले आहेत. तुम्ही आता एकमेकांना भेटू शकता आणि गप्पा मारू शकता. तुम्ही परिसरात कुठेही फिरू शकता. फक्त पुरुष स्त्रियांच्या निवासस्थानात जाऊ शकत नाहीत, तसेच स्त्रिया पुरुषांच्या निवासस्थानात जाऊ शकत नाहीत. हा निर्बंध कायम राहील. साधकाचे जीवन संपले आहे. तुम्ही तुमचे सामान्य जीवन पुन्हा सुरू करू शकता. पण उद्यापर्यंत तुम्ही तुमचे घर किंवा परिसर सोडून जाऊ शकत नाही. आज आणि उद्या रात्री याच परिसरात राहणे अनिवार्य आहे. कारण तुम्ही या शिबिरात इतके दिवस मौन पाळले आहे. तुम्ही ध्यानात मग्न होता, त्यामुळे तुमची मने कोमल झाली आहेत. जर तुम्ही अचानक बाहेर गेलात, तर तुमच्या मनाला इजा होऊ शकते. उलट परिणाम होऊ शकतो. काहीतरी वाईट घडू शकते. म्हणून, दोन दिवस याच परिसरात राहा. तुमची मने मजबूत झाल्यावर, परवा सकाळी न्याहारीनंतर, तुम्हाला पाहिजे तिथे, पाहिजे तेव्हा तुम्ही जाऊ शकता. विनयला आचार्यांना सांगायचे आहे की, मन आधीच घायाळ झाले आहे. आता काय करावे?


पण तो गप्प राहतो.


आता कोणाशीही बोलण्यात काही अर्थ नाही. खूप दिवसांनी त्याला जेवण मिळालं आहे. जरी ती फक्त खिचडी असली तरी ही . मल्लिका जेवणाच्या खोलीत नाहीये. तसंही त्याला खिचडी आवडत नाही. त्याने फक्त चव घेतली आणि तो निघून गेला. तो खोलीत अस्वस्थपणे फेऱ्या मारत आहे. आता बाहेरच्या परिसरात जायची वेळ झाली आहे. पण तो खोलीत,आतमध्येच फेऱ्या मारत आहे. फेऱ्या मारता मारता त्याचा जीव गुदमरत आहे. 


हा कसला कोंडमारा आहे? 


त्याला काहीच कळत नाही. तो पलंगावर आडवा होतो. शांततेची ही राजधानी अचानक गोंगाटात बुडून गेली आहे. शांतता नाहीशी झाली आहे. प्रत्येकाकडे मोबाईल फोन, लॅपटॉप आणि इतर अनेक गोष्टी आहेत. त्या वस्तू सर्वांना परत मिळाल्या.शांतता भंग पावली आहे. तो गोंगाटाच्या कल्लोळात हरवून गेला आहे. हृदयाचे संवाद या प्रचंड कोलाहलात हरवून जात आहेत. सगळी तटस्थता पळवून नेली गेली आहे. जणू काही सर्वत्र अराजक माजले आहे. शांततेला आग लागली आहे. प्रत्येक खोलीतून गोंगाट येत आहे. त्याच्या मनातील गोंगाट पुरेसा नव्हता का? थोडासा दिलासा मिळाल्या बरोबर दाबलेल्या स्प्रिंगप्रमाणे लोक उसळून मिसळत आहेत.काही जण हसत आहेत. काही जण मोबाईल फोनवर गप्पा मारत आहेत. काही जण गाणी ऐकत आहेत. काही जण चित्रपट पाहत आहेत. हा गोंगाटाचा एक कोलाज आहे. विनय या गोंगाटाने सुन्न झाला आहे. बाजूच्या खोलीत महाराष्ट्रातील लोक जमले आहेत. तिथे प्रचंड गोंगाट आहे. तो त्यांना रागावतोसुद्धा, पण कोणी ऐकत नाही. खूप  सूचना केल्यावर लोक भांडायला लागले आहेत. हे लोक विपश्यना ध्यानात काय आणि कसे शिकत होते? विनयला हे समजायला अवघड जात आहे. आज मल्लिकाला भेटणे अवघड जाईल हे माहीत असूनही, तो नेहमीप्रमाणे रात्री फिरायला बाहेर पडतो. वातावरण असे झाले आहे की, एके काळी शांतता असलेली राजधानी आता गोंगाटाची राजधानी बनली आहे. तरीही, तो विचार करतो की जर मल्लिका सापडली, तर तो आज तिच्याशी बोलेल. आतापर्यंत तो न बोलता किंवा न ऐकता अर्थ समजून घेत होता. जणू काही फक्त पक्ष्यालाच पक्ष्याची भाषा कळते. आता तो तिचे शब्द ऐकून समजून घेणार होता. मल्लिकासाठी तो अजूनही एक पक्षीच आहे. बाहेर कमी लोक आहेत आणि थंडीही जास्त आहे. फक्त काही लोक दिसत आहेत. मल्लिका तिथे नाही. विनय कोबीच्या शेताजवळच्या ओट्यावर बसतो. शेत रिकामे दिसत आहे. कोबीची कापणी झाली आहे. पूर्वी, जेव्हा मी कोबी पाहायचो, तेव्हा मला मल्लिकाच्या भरगच्च स्तनांची आठवण यायची. आता कोबी नाही. तरीही, मल्लिकाच्या भरगच्च तारुण्याची आठवण येते. विनय अचानक उठून उभा राहिला. तो चालू लागला. त्याने आपला मफलर स्वतःभोवती घट्ट बांधला. त्याने आपले दोन्ही हात जॅकेटच्या खिशात घातले. 


"अरे तू!" मागून साखरेसारखी गोड आणि खळखळणारी कुजबुज येते. तो मागे वळतो. अरे, ही तर मल्लिका आहे! विनय दचकतो. ती विनयच्या मिठीत झेप घेते. ती त्याच्या कपाळावर चुंबन घेते. त्याच्या हृदयात आनंदाची एक लहर उसळते. ते दोघे एकमेकांच्या खांद्यावर हात टाकून चालू लागतात. हळूहळू. तो अरुंद रस्ता आणखीच अरुंद वाटू लागतो. रात्र आणि तो मार्ग अधिकच लहान वाटू लागतो. अचानक, वाऱ्याचा वेग वाढतो. त्याच्या अंगावर काटा येतो. वारा थंड असला तरी, मल्लिकाच्या धुंद करणाऱ्या स्पर्शाची ऊबही तिथे असते. मल्लिकाच्या स्पर्शानेच तो इतक्या उबदारपणाने भारून जातो. या थंड रात्रींमध्ये उघड्या आकाशाखाली नग्न असूनही,  कुठल्याच रात्री त्याला थंडी जाणवली नाही. तो थंडीने आजारी पडला नाही. त्याला थंडी खूप जाणवते.पण आता ती त्याला आवडतेही. हिवाळ्याचे दिवस त्याचे सर्वात आवडते दिवस आहेत. आणि आता, मल्लिका त्याच्यासोबत आहे. त्याच्या लगतच पहुडलेली. मनाला मनाशी आणि शरीराला शरीराशी एकरूप करत. जसे पाणी पाण्याशी. जशी माती मातीशी. जशी हवा हवेशी. जशी पृथ्वी आकाशाशी. आगीला आगच. असे म्हणतात की, जेव्हा तारुण्य  जोशात धगधगत असते, तेव्हा थंडी आणि  गारठलेल्या दंवाने काय फरक पडतो?


अहा! ही रात्र किती मादक आहे!


पौर्णिमेचा चंद्रही मोठ्या हेव्याने त्यांच्याकडे पाहत आहे. तो डोळ्यांनीच मल्लिकाशी बोलत आहे. त्याला तिच्याशी काही बोलायचं का नाहीये, हे मला कळत नाही. त्याला फक्त शांतपणे गप्पा मारायच्या आहेत. या भागात बोलण्यावरची बंदी संपली असली तरी, फक्त स्त्रियांच्या भागात प्रवेश करण्यावरची बंदीच उरली आहे. पण तो या भागातील सर्वात सुंदर स्त्रीच्या स्पर्शात आहे. जणू ध्यानातील श्वासाचा स्पर्श. मल्लिका तुटक इंग्रजीत सतत कुजबुजत आहे. त्याला काहीतरी कळतंय, पण फारसं नाही. तरीही तो शांत राहतो. मल्लिकामध्ये हरवून. विनयची अखंड शांतता पाहून तीही शांत होते. जेव्हा एखादी स्त्री मिठीत असते आणि पुरुष शांत असतो, तेव्हा त्या स्त्रीचं शरीर खूप काही बोलतं. ते बोलतच राहतं. स्त्रीच्या शरीराचं हे मूक बोलणं सुद्धा शांती आणतं. ध्यानाची शांती. अनंत शांती. शांततेतील स्थिरतेची शांती. तुम्ही कधीतरी काळजीपूर्वक निरीक्षण करायला हवं, समुद्राच्या उसळणाऱ्या, गोंगाट करणाऱ्या लाटांमध्येही एक विचित्र शांती असते. जणू काही ती लाट उसळताना आणि मागे परतताना शांत होते, तीच शांती. मल्लिकाचं बोलणारं शरीर ती शांती निर्माण करत आहे. एक उसळणारं शरीर. अशाप्रकारेच तर वासना जागृत होते. विनयसुद्धा हळूहळू जागा होत आहे. विनयचं शरीरसुद्धा. चॉकलेटचा कुरकुरीतपणा आणि गोडवा मल्लिकाच्या शरीरात जागा होत आहे. ती अचानक आळस देते. असं वाटतं की यातसुद्धा ती मधुबालासारखी दिसू लागली आहे. त्याला तिच्यावर झडप घालून तिचं चुंबन घ्यावंसं वाटतं, पण त्याला तिच्या आळस देण्यात व्यत्यय आणायचा नाही. तिथे, असं वाटतं की जणू पौर्णिमेचा चंद्रसुद्धा आळस देत आहे. तो दिशा बदलत आहे. जणू पृथ्वी थोडी फिरली आहे. तिने दिशा बदलली आहे. जणू मल्लिकाच्या शरीराची दिशा आणि दशाच बदलली आहे. 


माहित नाही. 


पण विनयला आता स्वतःला आवरता येत नाही. तो गुपचूप मल्लिकावर झडप घालतो. मल्लिकाच्या शरीरावर. या अनपेक्षित वळणाने ती सैलावते,त्याचे डोळे विस्फारतात. ती काहीतरी पुटपुटते, पण ती काय म्हणत आहे हे त्याला समजत नाही. ती पुन्हा शांत होते. विनयची देहबोली ओळखून, ती जुगलबंदीच्या भावनेने सक्रिय होते. ‘चली ,गोरी पी के मिलन को चली,’ ह्या धर्ती वर ती आयुष्य सुंदर बनवण्याच्या मार्गावर आहे. जणू काही शुभ मुहूर्ताच्या शोधात असल्याप्रमाणे, ती आपले डोके वर करते आणि आकाशाकडे पाहते. मग ती विनयच्या शरीरात विलीन होते. ती त्याच्या मिठीत विसावते, त्याला  जणू  विद्युत प्रवाह जाणवतो तो. तिचे हात जणू घाईत आहेत असे वाटते. पण विनयला घाई नाही. अजिबात नाही. तो मल्लिकाच्या प्रेमात पडला आहे. मल्लिकाच्या शैलीवर. तिच्या समजूतदारपणावर. देहबोलीतील संगीतासाठी ती  माउथ ऑर्गन ची मोठी चाहती आहे. विनयलाही ते खूप आवडते. त्याचे संगीत, त्याचे सूर, पट्टी आणि लय अवर्णनीय आहेत. हे संगीत विनयला संगीत सूर्य बनवते. 


मल्लिका कोकिळेसारखं गात आहे. तिच्या उत्साहाची लाट समुद्राच्या भरती च्या लाटांप्रमाणे उसळत आहे, जणू खडकांवर आदळण्यासाठी आतुर झालेल्या. विनयला मल्लिकेची उत्कटता आणि अभिलाषा समजली आहे. त्याला माहित आहे की मल्लिकाच्या शरीराच्या या लाटा त्याला पुन्हा पुन्हा उचलून फेकू इच्छितात, त्याला  सर्वत्र सोडू इच्छितात. विनयला मल्लिकेच्या शरीरात उसळणाऱ्या सर्व लाटा अनुभवायच्या आहेत. त्याला त्या स्वतःमध्ये सामावून घ्यायच्या आहेत. तो शांतपणे मल्लिकाच्या शरीराला पांघरूणाप्रमाणे पांघरून घेतो. जणू ती एक दुलई आहे.थंडीपासून वाचण्याचा आणि तिच्या स्तनांशी खेळण्याचा हाच एकमेव मार्ग आहे. तिच्या लाटांना पकडण्याचा हा एक मार्ग आहे. ती बासरी किंवा सारंगीप्रमाणे वाजवण्यासाठी आपले स्तन विनयच्या तोंडात ठेवते. विनयचे ओठ संपूर्ण संगीत स्वरांना सरावलेले आहेत. सा रे ग म प धा नी सा सा नी धा प म ग रे सा. पण आज, त्याला मल्लिकाच्या शरीराला सतारप्रमाणे वाजवायचे आहे. सप्तकाच्या सुरांमध्ये. पण आज, मल्लिकाला जणू एक रशियन वाद्य बनायचे आहे असे वाटते. तिला त्याच सुरावर देहसंगीत रचायचे आहे. संगीत कोणतेही असो, जर ते सुमधुर असेल, तर सर्व काही समजण्यासारखे होते. भाषेचे अज्ञान हा अडथळा ठरत नाही. तो एक अडथळा बनत नाही. जसे की, विनयला इंग्रजी येत नाही, पण त्याला मायकल जॅक्सनची गाणी समजतात. त्याला अनेक लोकभाषा येत नाहीत, पण त्याला लोकसंगीत समजते. त्याला मल्लिकाचे संगीतही समजते. शिवाय, देह संगीताला कोणत्याही शब्दांची, कोणत्याही भाषेची गरज नसते. ते सर्वांना समजते.

‘करत करत अभ्यास के जड़मति  होत सुजान 

रसरी  आवत जात ते सील पर परत निशान, ‘

ही उक्ती देह संगीताला अगदी चपखल लागू पडते. सर्व सजीव ते सहजपणे शिकतात. मानव नवनवीन शोधात  पारंगत होतो, अगदी नवनिर्मितीच्या पातळीपर्यंत.


मल्लिकाला आज तोच आविष्कार आजमावून पहायचा आहे. आणि विनयला सतार वाजवायची आहे. हळूहळू, हे देह संगीत संयोगा कडे वळते. देह संगीतातील मिलाफ  मार्गही खूप सुखद होतो. प्रत्येकाची स्वतःची धून, स्वतःचा प्रयोग. पण अंतिम ध्येय तेच आहे - सत्यम, शिवम, सुंदरम. तोच सूर्य, तीच पृथ्वी. मल्लिकाला आता कोणतीही घाई नाही. असे वाटते की, आपले शिखर गाठल्यावर, तिला आणखी एका नव्या शिखरावर पोहोचण्याची ओढ लागली आहे. म्हणूनच तिने आता स्वतःला पूर्णपणे विनयला समर्पित केले आहे. विनयला सतार किंवा वीणा, बासरी किंवा गिटार काही ही वाजवू दे . पण आता तो संतूर वाजवतो. या नव्या बदलाने मल्लिका खूप आनंदित झाली आहे. ती हसत आहे. ती म्हणत आहे, "किती मधुर!". विनय आता जणू ध्यानात आहे. खोल पाण्यात. ही देह-ध्यानाची कोणती पद्धत आहे, हे त्याला स्वतःलाही माहीत नाही. पण त्याला जाणवते की तो अनंताकडे जात आहे. अनंत शक्तीकडे. अनंत शक्तीचा अनुभव म्हणजे ध्यान. विनय, मल्लिकासोबत, या असीम शक्तीचा अनुभव घेत आहे आणि समाधीकडे वाटचाल करत आहे. सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् यांची अनुभूती हीच तर आहे!


अचानक, मल्लिका विनयला घट्ट पकडते. ती दात आवळते आणि डोळे मिटते. विनयसोबतचे तिची  जुगलबंदी सुरूच राहते. जणू काही समुद्राच्या लाटा खडकांवर आदळत आहेत. मल्लिका अत्यंत व्याकुळ आहे. विनय तर मल्लिकापेक्षाही जास्त अस्वस्थ आहे. 

   

अति उत्तम! 


मल्लिका जणू  उत्कटतेने म्हणत आहे," आहा! किती सुंदर!” मिलन ही समाधीच आहे ! हे ऐकून विनयला आश्चर्य वाटते. त्याला प्रश्न पडतो की, मल्लिकासुद्धा समाधी अवस्थेत पोहोचली आहे का?


विनय, नेहमीप्रमाणेच, आपला चेहरा मल्लिकाच्या छातीवर टेकवतो आणि तिच्या शरीरावर पहुडतो. हे अगदी एखाद्या मद्यशाळेत बेशुद्ध पडलेल्या दारुड्यासारखं आहे, जणू तो जगावर विजय मिळवून आलेला आहे. मल्लिका त्याच्या केसांशी खेळते. पौर्णिमेच्या चंद्राला साक्षी ठेवून, ती त्याला चांदणी  बनून कुरवाळते. जणू एखादी आई आपल्या बाळाला कुरवाळत आहे. मल्लिकाच्या प्रेमाने विनयला पूर्णपणे भिजवून टाकलं आहे. ते प्रेम त्याच्या अंतर्मनात खोलवर भिनलं आहे. स्त्री कशीही असो, कोणीही असो, अंतिमतः ती एक आईच असते. 


विनयला वाटतं की हे सगळं स्वप्न आहे का. तो स्वतःला चिमटा घेतो. मग तो मल्लिकाच्या नितंबांना चिमटा घेतो. 'उफ्फ!' असं म्हणत ती त्याला नकार देते. विनय तयार होतो. त्याला जाणवतं की हे स्वप्न नाही, तर खरं आहे. विनय मल्लिकाला घट्ट मिठीत घेतो आणि तिच्या दोन्ही गालांवर एकेक करून चुंबन घेतो. तिचे दोन्ही स्तन दाबून तो तिच्या कपाळावर चुंबन घेतो. ती त्याच्याकडे अगदी मंत्रमुग्ध नजरेने बघत असते. जणू काही विचारत आहे, 'आपण पुन्हा कधी भेटणार?'


जाताना ती विनयला पुन्हा मिठी मारते. ती प्रेमाने म्हणते, "मी, दारीया आणि तू?"


'विनय!'


'तुम्हाला इंग्रजी समजत नाही का?' ती इंग्रजीत विचारते. 


'अगदी थोडं!' तो तळहाताने मुद्रा करून म्हणतो. 


'इथेही अगदी चिमुकलं!' असं म्हणत ती आपला तळहात लहान करत हसते. 


तिला जायचे आहे. पण विनय तिला थांबवण्याचा प्रयत्न करतो, "अभी ना जाओ छोड़कर के दिल अभी भरा नहीं ." पण ती थांबत नाही. आकाशातील पौर्णिमेच्या चंद्राकडे पाहत ती म्हणते, "आपण आता निघायला हवं." ती क्षणभर थांबते आणि म्हणते, "उद्या भेटू." 


"हो, आपण अजून फक्त एका रात्रीसाठी इथे आहोत." तो तिला म्हणतो, "मी तुला एक काल्पनिक नावसुद्धा दिलं आहे."


काय?


'मल्लिका!'


'मोलिका!' ती पुढे म्हणाली, 'सुंदर!'


विनय तिला काही वेळ आपल्या मिठीत घेतो, हळुवारपणे तिच्या पाठीवर थोपटतो. कधी तिच्या पाठीवर, कधी तिच्या नितंबांवर, कधी तिच्या गालांवर, तर कधी कुठल्यातरी वेगळ्याच भागावर. ते एकमेकांचे चुंबन घेतात आणि निरोप घेतात. नेहमीप्रमाणे, मल्लिका आधी निघते.


सकाळी,दारिया जेवणाच्या हॉलमध्ये दिसत नाही. एकतर ती नाश्त्यानंतर निघून गेली आहे, किंवा अजून आलेली नाही. नाश्त्यानंतर तो बाहेर येतो. सगळीकडे लगबग सुरू असते. लोक एकमेकांची ओळख करून देत असतात. फोन नंबरची देवाणघेवाण होत असते. तो इंग्लिश मुलगा समोरून येताना दिसतो. दुरूनच तो हात जोडून मान झुकवतो. जवळ आल्यावरही त्याचे हात जोडलेलेच असतात. तो ब्रिटिश उच्चारात "हॅलो!" म्हणतो आणि विनयच्या पायांना स्पर्श करण्यासाठी खाली वाकतो. विनय हात पुढे करून त्याला उचलतो आणि मिठी मारतो. तो खूप आनंदित झालेला असतो. तेवढ्यात, एक ऑस्ट्रेलियन मुलगी आत येते. तो तिची ओळख करून देतो, "ही माझी गर्लफ्रेंड आहे." तो आदराने मान झुकवून म्हणतो, "ऑस्ट्रेलियाहून!" ती मुलगी तिचे नाव सांगते. विनयला काही समजत नाही. 


संभाषण सुरू झाले आहे. विनयने विचारले आहे, "ध्यान कसे होते?"


ठीकठाक!


 इतक्या लहान वयात ध्यानाची कल्पना कशी सुचली?


"तुला ही कल्पना  कशी सुचली ?" तो विचारतो. "मला ते आवडलं.टूर मधे माझ्याकडे थोडा वेळ उरला होता. मला लंडनला परत जायला वेळ होता. म्हणून मी शोधलं. मला इथे सर्वात स्वस्त जागा मिळाली."


"काय?" विनय जणू आकाशातून जमिनीवर कोसळला. तो म्हणाला, "स्वस्त काय आहे, ही जागा तर जवळजवळ फुकटच आहे."


"होय, साहेब!" तो म्हणाला, "हा देखील एक उत्तम अनुभव आहे. यामुळे आमच्या व्यवसायालाही चालना मिळेल."


काय काम आहे?


"पर्यटन," तो म्हणाला, "आमची एक टूरिस्ट कंपनी आहे. आम्ही सर्वांना जगभर फिरवतो." त्याने आपले व्हिजिटिंग कार्ड काढून तिला दिले. तो म्हणाला, "चल, मी तुला युरोप फिरवून आणतो." त्याने पॅकेजचा तपशील समजावून सांगायला सुरुवात केली. त्या मुलीनेही त्याला तिचे व्हिजिटिंग कार्ड दिले. तिने तिच्या पॅकेजचा आणि तपशिलाचा तपशील सांगायला सुरुवात केली. विनय म्हणाला, "सध्या तरी त्याचा तसा काही हेतू नाही." आणि विचारले, "इथे आल्यावर तुला कसे वाटले?"


'काही नाही.' तो श्वास आत घेतो, मग बाहेर सोडतो, तळहात ताणतो, पुन्हा श्वास बाहेर सोडतो, एक मोठा श्वास बाहेर सोडतो आणि म्हणतो, 'श्वास घेतो?' मग तो तळहाता वर फुंकर मारतो उडवून देतो.


हे पाहून विनयला धक्का बसला. त्या मुलाबद्दल त्याच्या मनात खूप विचार केले होते. त्याने मनापासून त्याच्यावर खूप प्रेम केले होते. पण त्याने  आता मात्र त्याचे हृदय विदीर्ण केले होते. त्याने ध्यानाचा अपमान केला होता. विपश्यनेची ही थट्टा विनयला आवडली नाही. त्याला त्याला एक थप्पड मारावीशी वाटली, पण त्याने स्वतःला कसेतरी आवरले. आपल्या शब्दांनी विनयला वाईट वाटले आहे हे त्या मुलाला समजले. म्हणून तो अचानक शांत झाला. त्या मुलीने परिस्थिती हाताळण्याचा प्रयत्न केला. तिने समजावून सांगितले की तिचा अनुभव खूप चांगला होता. आणि ती तिच्या ग्राहकांसाठी, विशेषतः ज्येष्ठ नागरिकांसाठी, तिच्या इंडिया पॅकेजेसमध्ये विपश्यनेचा समावेश करणार आहे. ती त्याचे फायदेही समजावून सांगणार होती. ती सांगणार होती की विपश्यनेमुळे तणाव खूप लवकर कमी होतो. हे ध्यान वैद्यकीय शास्त्रापेक्षाही उत्तम आहे. तिने सांगितले की तिने तिच्या ग्राहकांना पटवून देण्यासाठी विपश्यनेशी संबंधित साहित्य आणि डीव्हीडी खरेदी केल्या आहेत. ती लवकरच हे सर्व तिच्या वेबसाइटवर टाकेल. मग ती विनयला ऑस्ट्रेलिया पॅकेज समजावून सांगू लागते. विनयला कंटाळा येतो. तो मुलगा अचानक विनयच्या पायांना स्पर्श करतो आणि निघून जातो. त्याच्या चेहऱ्यावर तोच निरागसपणा भरलेला असतो जो पूर्वी होता. 


ती मुलगी त्याच्यामागे गेली, कदाचित नवीन गिऱ्हाईक मिळवण्यासाठी. 


विनयला आश्चर्य वाटते की दारिया सुद्धा पर्यटन क्षेत्रातलीच आहे का. कोणती दारिया? विनय स्वतःलाच विचारतो. आणि हसत हसत उत्तर देतो, "अरे, तीच मोगऱ्याचा सुगंध असलेली मल्लिका!" 


त्याला वाटते की, अशा व्यापाऱ्यांसोबत आणि अज्ञानी लोकांसोबत त्याला पूर्ण दिवस आणि रात्र काढावी लागेल. तो हे कसे सांभाळणार? त्याची त्याच्या शेजारच्या खोलीतील एका माणसाशी भेट होते. तो महाराष्ट्रातून आला आहे. तो म्हणतो, "महाराष्ट्रातून दोन पथके आली आहेत. वेगवेगळ्या भागांतून. या विपश्यना शिबिरातील बहुतेक लोक महाराष्ट्रातील आहेत."


"मग तुम्ही लोक काल रात्रीपासून एवढा गोंधळ का करत आहात?" विनय विचारतो. 


"ध्यान करताना आम्हाला कंटाळा आला होता," तो म्हणाला, "मला माझी स्वतःची थोडी जागा ,स्पेस मिळाली आहे." 


'मग तुम्ही लोक इतरांची स्पेस का हिसकावून घेत आहात?' तो पुढे म्हणाला, 'तुम्ही बहुसंख्य आहात म्हणून का?'


'नाही साहेब!'


जर तसे होते तर, तुम्हाला इथपर्यंत येण्याची काय गरज होती?


"तुम्ही थोडे अस्वस्थ दिसत आहात, साहेब?" तो म्हणाला. "इतरांना काही त्रास नव्हता. तुम्ही तर रात्रीसुद्धा सगळ्यांना टोकत होता."


"चला, तुम्ही मजा करा." विनयला त्याचं काही मोठं प्रकरण करायचं नव्हतं. तो म्हणाला, "मला काही अडचण नाही."


'ठीक आहे साहेब!'


आणखी एका मराठी माणूस भेटला . तो विनयच्याच वयाचा आहे. त्याला विनयची अडचण समजते आणि तो स्वतःला त्याच्या परिस्थितीत पाहतो. तो म्हणतोय, "इतके दिवस किती आनंद आणि शांतता होती. या सगळ्या मुलांच्या गोंधळाने सगळं काही उद्ध्वस्त केलं आहे." तो म्हणतोय की, ते विपश्यना करायला आलेच नव्हते. ते फक्त फिरायला आले होते.


“हे भेट देण्यासारखे, मजा करण्यासाठी ठिकाण आहे का?”


"  फिरायला  येण्यासारखी जागा नाही. पण ते  आले आहेत." तो म्हणाला, "हे सर्व सरकारी कर्मचारी आहेत. महाराष्ट्रात सरकारी कर्मचाऱ्यांना विपश्यना करण्यासाठी विशेष रजा आणि विशेष भत्ता मिळतो. हे लोक त्याचाच आनंद घेण्यासाठी आले आहेत."


ओह!


तो स्पष्ट करतो, "महाराष्ट्रामध्ये अनेक विपश्यना केंद्रे आहेत. पण  हे लोक फक्त  फिरण्यासाठी इथे आले आहेत. हे सगळे जण फक्त एक प्रमाणपत्र घेऊन जातील ." 


विनय विपश्यनेसाठी इतक्या गंभीरपणे आला होता. त्याला या विपश्यनेत खूप आनंद आणि सुख मिळाले. त्याला ध्यानाचा एक नवीन अनुभव मिळाला. स्वतःला पाहण्याचा आणि ओळखण्याचा. स्वतःची परीक्षा घेण्याचा. आणि इतकेच नव्हे तर, त्याला मोगऱ्याच्या फुलांसारखा सुगंध असलेली मल्लिका भेटली. त्याचे जीवन बहरले. आता हे मूर्ख लोक गोंधळ घालून आणि वायफळ बडबड करून, त्याचे सर्व ध्यान आणि आनंद उद्ध्वस्त करत आहेत. नष्ट करत आहेत. 


विनय खोलीत आला आहे. त्याने हातपाय धुतले आहेत आणि तो ध्यान करण्यासाठी बसला आहे. निर्विकार आणि निरापद . तो पुन्हा एकदा खोल पाण्यात बुडाला आहे. पूर्ण खात्रीने. तो खोल खोल पाण्यात बुडाला आहे. तो अधिकाधिक खोलवर बुडतच राहतो. 


दुपारच्या जेवणाच्या वेळीसुद्धा भोजनकक्षात गोंगाट असतो. अगदी एखाद्या रेस्टॉरंटसारखा. दारिया तर जेवणासाठी उपलब्धसुद्धा नाही. त्याने तिचा मोबाईल नंबर मागितला नाही, आणि तिने तो दिलाही नाही. त्याने फक्त त्याचे नाव सांगितले आणि तिचं नाव विचारले . ही काही ओळख तरी आहे का? मग त्याला प्रश्न पडतो की, तन आणि मन यांच्या जवळीकते पलिकडे आणखी मोठी ओळख तरी कोणती असू शकते? 


आता बस झोपायचे आहे. तो  जास्त ओळखी करून घेण्याच्या मनस्थितीत नाही. संध्याकाळी जेव्हा विनय जागा झाला, तेव्हा त्याला ताजेतवाने वाटले. तो बाहेर आला आणि कोबीच्या शेताकडे असलेल्या ओट्यावर बसला. त्याला तिथे पाहून आणखी दोन-तीन लोक तिथून गेले. संध्याकाळपर्यंत, चर्चेची कुजबुज गप्पांमध्ये बदलली होती. उदाहरणार्थ, तो फ्रेंच माणूस विपश्यना शिबिरातून अचानक गायब झाला होता, कारण एका रात्री तो त्याच्या मैत्रिणीसोबत तिच्या खोलीत प्रणय करताना आढळला होता. कार्यकर्त्यांनी त्यांना पकडले आणि त्याच रात्री त्यांना खोलीतून बाहेर काढले. सकाळी, त्यांना विपश्यना शिबिरातून काढून टाकण्यात आले कारण त्यांनी विपश्यनेचा एक नियम, तोडला होता.एक निषिद्ध गोष्ट घडली होती. एक जोडपे समलैंगिक संबंधात गुंतलेले आढळले. त्यांनाही काढून टाकण्यात आले. आणखी तीन जोडप्यांनाही अशाच प्रकारे काढून टाकण्यात आले. ती सर्व परदेशी जोडपी होती. 


तर मग, हे सगळे लोक इथे स्वस्त पर्यटनासाठी आले आहेत का? विपश्यना करण्यासाठी नाही? ते कमी खर्च करून वेळ घालवण्यासाठी आले आहेत. पण हे सगळं ऐकून विनय घाबरला आहे. भयंकर घाबरला आहे. जर तोसुद्धा दारियासोबत पकडला गेला असता तर? 


तर मग?


या कॅम्पच्या परिसरात सर्वत्र सीसीटीव्ही कॅमेरे बसवले आहेत. सुरक्षेच्या कारणास्तव. हे कॅमेरे सर्व निवासी संकुलांमध्ये लावण्यात आले आहेत. असे दिसते की, ज्या ठिकाणी विनय फिरताना त्याच्या मल्लिकाला भेटायचा आणि विपश्यनेदरम्यान तिच्यासोबत कामवासनेच्या जुगलबंदी चे  खेळ करायचा, तो परिसर सीसीटीव्ही कॅमेऱ्यांच्या आणि कर्मचाऱ्यांच्या निगराणीखाली नव्हता. जर ते तिथे असते, तर तोही पकडला गेला असता. जर तो पकडला गेला असता, तर त्याने दारियासोबत अपमानकारक दर्या कसा ओलांडला असता ? या सगळ्याचा नुसता विचार करूनच त्याला भीती वाटते. हात जोडून तो मनातल्या मनात देवाचे आभार मानतो. पण आता लोकांनी गोंधळ घालणे थांबवले आहे आणि या सगळ्या गोष्टी कुजबुजत बोलत आहेत. ते व्हॉट्सॲपवर एकमेकांना तपशील पाठवत आहेत. 


हो, दोन भारतीयही अचानक बाहेर गेले होते. त्यांच्या कुटुंबावर दुःखद प्रसंग ओढवला होता. 


दारिया डोळे मटकत जेवायला आली. तिच्या टेबलावर आधीच एक पुरुष बसला होता. तो कोण होता? मागून त्याची पाठ दिसत होती. जेवणानंतर तो खोलीत आला होता. रात्री  अचानक थंड वारा वाहू लागतो, का कोण जाणे!थोड्या वेळाने तो झोपून गेला.साधकांच्या अनेक रंगीन कहाण्या ऐकून तो घाबरला होता. जर दारियाने त्याला शोधले आणि तो तिच्यासोबत जुगलबंदी करताना पकडला गेला तर? 


तर मग?


पण थोड्या वेळाने त्याला एक गाणं आठवतं. " प्यार है तो जमाने का डर छोड़ दो ,तुम भी घर छोड़ दो, हम भी घर छोड़ दे ." तो खोलीतून बाहेर पडतो. तो बाहेर येतो आणि लांब पावले टाकत थोडा वेळ इकडे तिकडे फिरतो. जेव्हा त्याला खात्री पटते की परिसर शांत आहे आणि आजूबाजूला कोणीही दिसत नाही, तेव्हा तो हळूच त्याच्या जुगलबंदीच्या स्थानाकडे जातो. त्याला मंद प्रकाशात एक सावली दिसते. तो आणखीच हळू चालतो. जवळून पाहिल्यावर त्याच्या लक्षात येतं की ती दारिया आहे. ती मल्लिका आहे, जिच्या अंगातून मोगऱ्याचा सुगंध दरवळत आहे. तिच्या अत्तराचा सुगंध त्याच्या नाकात शिरतो आणि त्याच्या अंगात एक रोमांच उभे राहतात. तो डोलू लागतो. ती आपला स्कार्फ सोडवते आणि विनयकडे धावत येते. ती हवेच्या झोतासारखी त्याला मिठी मारते. त्याचे चुंबन घेत ती पुटपुटते, "आज तुम्हाला खूप उशीर झाला!" ती म्हणते, "मला वाटलं तुम्ही अजिबात येणार नाही."


"मी कसा येणार नाही ?" मनातली भीती दाबून विनय म्हणाला.


विनय खाली बसला आहे. मल्लिका त्याच्या जवळ जाऊन बसते आणि विनयच्या केसांशी खेळू लागते. तो तिला मिठी मारतो आणि हळुवारपणे तिच्या नितंबांवरून हात फिरवतो, पण त्याला संगीतात रमून जाता येत नाही. पकडले जाण्याची भीती त्याला सतावत आहे. पण थंड वाऱ्याची झुळूक हळूहळू त्याची भीती नाहीशी करते. विनयला अचानक  निष्क्रिय पाहून दारिया विचारते, "आज तुला काय झालंय? तुला बरं वाटतंय का?"


"हो, सगळं ठीक आहे." विनय थोडक्यात बोलतो आणि तिच्या वक्षांशी खेळू लागतो. जणू एखादं लहान मूल खेळण्याशी खेळतं. अचानक, दरिया एक नदी बनते. ती खळखळत, हळू हळू वाहू लागते. तो तिच्या वक्षांवर निळ्या निळ्या आकाशासारखा पसरतो . जणू ते तिचा. देह उभार नसून पृथ्वीच आहे. ती थरथरते. एखाद्या लाटेसारखी. लाटांमुळे तिचं शरीर हादरत आहे. तिचे विशाल वक्ष , तिचे निळे डोळे, जणू विनयचं अस्तित्वच नष्ट करू पाहत आहेत. विकल झालेला विनय दरियाच्या नदीत डुबकी मारण्यासाठी आतुर होतो. त्याला फक्त एका आरोहाची गरज आहे. जसं एखाद्या वाद्याला आवाजाची गरज असते. दरियाला समजतं. एकही शब्द न बोलता तिला समजतं. एक स्त्री शरीराची भाषा खूप चांगल्या प्रकारे समजते. तिला खूप लवकर समजतं. शरीराच्या मनाची भाषा. आणि ती उष्णतेने पेटू लागते. जणू पातेल्यातले आधण . दरिया पलटी मारून विनयच्या मांडीवर नदी बनून आडवी होते. जणू एखादी नदी अचानक वळण घेऊन प्रवाह आपल्यासोबत घेऊन जाते. सर्व प्रवाह तिच्यामागे जातात. आणि नदी ज्या दिशेने वाहते, ती आपला मार्ग शोधून काढते. एक मार्ग तयार होतो. मार्ग तयार करत असताना, ती अचानक पोटावर आडवी होते. विनय, तिच्या इच्छेपुढे शरणागत होऊन, तिच्या पाठीला बिलगतो. जसा एखादा प्रवाह अचानक उसळी मारतो, तशीच दारियाही डोलते, तिची कंबर लाटेसारखी डोलते. ती आपले नितंब ताणते. जसे शिड उभारल्यावर नांगर उचलला जातो, तशी नाव खोल पाण्यात बुडते. सुकाणू वळवून, खलाशी प्रवाहाच्या विरुद्ध दिशेने नाव वल्हवू लागतो. दारियाच्या नदीत, विनयही त्याचप्रकारे नाव वल्हवू लागतो. जणू काही एखादे लोकगीत गात असल्याप्रमाणे. दारियाच्या देह-गावात. दारियाच्या देह-गावात अनेक रस्ते आहेत. अरुंद रस्ते. गाण्यांचे पडसाद उमटतात.  तनिक धीरे खोलो केवडिया, रस की बुंदे पड़े  अशी  स्थिती.


सकाळचा निरोप समारंभ आहे. प्रत्येकजण शक्य तितक्या लवकर निघण्याच्या घाईत आहे. विनय विपश्यना साहित्य शोधत आहे. अडचण अशी आहे की हिंदीमध्ये विपश्यना साहित्य कमी आणि इंग्रजीमध्ये जास्त आहे. त्याला जे काही हिंदी साहित्य सापडते, ते तो विकत घेतो, अगदी आचार्य सत्यनारायण गोएंका यांच्या हिंदी प्रवचनाची डीव्हीडीसुद्धा. तेवढ्यात, दरिया येते. तो दुकानावर सर्व काही सोडून धावत येतो. दरिया येते. हसत. वाऱ्यासारखी डोलत. खळखळून हसत. आल्याबरोबर ती विनयला मिठी मारते. सर्वांसमोरच्या मिठी, औपचारिकता म्हणून मिठी मारली आहे असे विनयला वाटते. दरियाच्या  सुगंधामध्ये पुन्हा मोगऱ्याचा सुगंध आहे. ती त्याच्या कपाळावर चुंबन घेते, तर विनय तिच्या गालावर. त्यांना मिठीत पाहून लोक थक्क होतात. एक माणूसही दरियाच्या मागे येत असतो. दरिया विनयची त्या माणसाशी ओळख करून देते, "माझ्या पतींना भेटा!" विनयला धक्का बसतो. जणू काही तो स्तब्ध झाला आहे. तो त्याच्याकडे काळजीपूर्वक पाहतो. हा तोच रशियन माणूस आहे, ज्याला आचार्यांनी वैद्यकीय समस्येचे कारण सांगून ध्यानसत्रादरम्यान भिंतीला टेकून बसायला परवानगी दिली होती. विनयला नकार देण्यात आला होता. तो दारिया आणि त्या रशियन माणसाची एकत्र कल्पना कधीच करू शकला नाही. ते पती-पत्नी असतील याची तो कधीच कल्पना करू शकला नाही. हा विचार त्याच्या मनात कधी आलाच नाही. 


'नमस्कार!' म्हणत त्याने हस्तांदोलनासाठी हात पुढे केला. 


"नमस्कार!" विनयने हात जोडून नमस्कार केला. दारियाच्या पतीशी हस्तांदोलन केले. आतून अस्वस्थ वाटत असूनही, तो बाहेरून शांत दिसत होता. 


'हॅलो!' तो तुटक हिंदीत उत्तर देतो. 


विनयला इंग्रजी नीट येत नसल्यामुळे तो जास्त बोलू शकत नाही. 


दारियाची टॅक्सी गेटबाहेर उभी आहे. तो तिला सोडायला जातो. दारिया त्याचा फोन नंबर किंवा पत्ता विचारत नाही आणि विनय विचारूही शकत नाही. ती खुदकन हसत हात हलवते आणि हाक मारते, "बबाय विनय!" धूळ उडवत टॅक्सी निघून जाते.


या शांत राजधानीत जुळलेलं हे नातं, शांतपणे संपलं आहे. रात्रीच्या अंधारात, ओठांच्या आगीने आणि श्वासाच्या सुमधुर संगीताने जुळलेलं ते नातं, दिवसाच्या प्रकाशात जळून खाक झालं आहे. मल्लिकाच्या मोगऱ्याचा सुगंध विरून गेला आहे. तो विसरला गेला आहे. जणू काही दरिया नावाची नदी अचानक आटून गेली आहे.  ही  कसली प्रेमाची अभिव्यक्ती?


  आश्चर्य ! 


त्याला लगेच घरी परतायचे आहे. पण त्याने खरेदी केलेल्या विपश्यना साहित्य आणि डीव्हीडीचे पैसे देण्यासाठी त्याच्याकडे पुरेसे पैसे नाहीत. त्याची चूक ही होती की घरी परतताना त्याने शिबिराला सहयोग म्हणून आवश्यकतेपेक्षा जास्त पैसे दिले. त्याने संपूर्ण रक्कम देऊन फक्त स्टेशनला जाण्याकरता पैसे ठेवले बाकी पैसे शिबिरात जमा केले . त्याला पावती मिळाली आहे. तथापि, तुम्ही किती योगदान देऊ शकता यावर कोणतीही निश्चित मर्यादा नाही. ते तुमच्या श्रद्धेवर अवलंबून आहे. तुम्ही एक पैसाही दिला नाही तरी कोणी काही बोलणार नाही. तुम्ही तुमच्या स्वतःच्या आनंदानुसार आणि क्षमतेनुसार तुम्हाला जे हवे ते देऊ शकता. विपश्यनेमुळे मिळालेला आनंद आणि शांती पाहता, त्याच्याकडे असलेले पैसे अपुरे वाटले. म्हणून, त्याने प्रवासाचा खर्च वजा करून ते दिले. त्याच्याकडे ट्रेनचे तिकीट आधीच होते. विपश्यना साहित्य नंतर आले. तेही आवश्यक वाटले. पण कार्ड पेमेंटची सुविधा नाही. त्याला ऑनलाइन पेमेंट कसे करायचे हे देखील माहीत नाही. एटीएममधून पैसे काढण्यासाठी त्याला जवळच्या शहरात जावे लागेल. त्याला गाडी मिळत नाही. त्याला ओला किंवा उबर कसे बुक करायचे हे माहीत नाही. त्याला एक टेम्पो सापडतो, जो अवाजवी भाडे आकारत असतो—चौपट. कोणीतरी त्याला सांगते की थोडे पुढे चालत गेल्यास त्याला शेअर्ड टेम्पो मिळेल. तो पायी निघतो. शेअर्ड टेम्पोने शहरात पोहोचल्यावर त्याला कळते की सर्व एटीएम मशीन बंद आहेत. कोणीतरी त्याला सांगते की थोडे पुढे दुसऱ्या शहरात एक एटीएम आहे. तो दुसऱ्या शहरात पोहोचतो. तिथले एटीएम चालू असते आणि त्यात अजूनही पैसे असतात. मग तो तिथून  शिबिर केंद्रावर जाण्यासाठी आणि परत स्टेशनवर येण्यासाठी एक टेम्पो बुक करतो. विपश्यना केंद्राकडे परत येत असताना, विनयला एक परदेशी माणूस शहराच्या दिशेने चालताना दिसतो, ज्याने आपले अंथरूण आणि इतर सामान खांद्यावर घेतलेले असते. तो अगदी निश्चिंत असतो. तो धूम्रपान करत नसला तरी, त्याच्या निश्चिंत वृत्तीमुळे विनयला एका चित्रपटातील गाण्याची आठवण येते: "मैं जिंदगी का साथ निभता चला गया , हर फिक्र को धुवे में उड़ाता चला गया!" विनय त्याला हात दाखवतो. पण तो स्वतःच्याच विश्वात मग्न असल्याने, त्याचे विनयकडे लक्षही जात नाही. 


तर मग तो पूर्णपणे तटस्थ झाला आहे का? 


प्रत्येक गोष्टीतून, प्रत्येक बाबीतून, प्रत्येक घटनेतून... कुणास ठाऊक. पण आता विनय स्वतःलाच विचारत आहे की, कोणी इतका तटस्थ असू शकतो का, की ज्याला स्वतःचीच जाणीव नसेल. एका सुंदर स्त्रीला नुसते पाहिल्यानेही मनातील घालमेल वाढते. शरीर आणि मन अस्वस्थ होतात. लक्ष विचलित होते. मग तटस्थता कशी असू शकते? अशा परिस्थितीत तटस्थता कशी असावी ? माणूस स्वतःकडे तटस्थ वृत्तीने कसा पाहू शकतो? घर आणि संसाराबद्दलच्या सर्व गोष्टी समोर येताच, सगळा जीवन संघर्ष, सगळा कल्लोळ समोर येतो. 


विनय घरी परत आला आहे. 


तो रोज थोडा वेळ ध्यान करतो. कधीकधी तो डीव्हीडीवर प्रवचनही ऐकतो. त्याचा ध्यानाचा वेळ हळूहळू कमी होत चालला आहे. जीवनातील  संघर्ष,गोंधळ आणि अनागोंदीमध्ये ध्यानासाठी वेळ काढणे, हे विपश्यनेचे एक नवीन रूप आहे. एक नवीन ध्यान. श्वासाच्या स्पर्शापेक्षाही, जीवनातील संघर्षाचा स्पर्श अधिक जाणवतो. श्वासाच्या स्पर्शापेक्षाही, संघर्षाचे येणे-जाणे अधिक जाणवते. संघर्षाचे येणे-जाणे आणि श्वासाचे येणे-जाणे एकरूप झाले आहे. तरीही, तो विपश्यनेसाठी वेळ काढतो. ध्यानादरम्यान, तो कधी खोल पाण्यात असतो, कधी आकाशात, तर कधी हिमालयात, बर्फ वितळत असल्याचा अनुभव घेत असतो. कधीकधी तो झोपेच्या नावेत स्थिरावतो आणि त्याला झोप लागते. ध्यानात अनेक गोष्टी अनेकदा  स्मरतात .अनेकदा, ती स्त्री, विपश्यनेत विलाप करणारी ती खेडेगावची स्त्री, त्याच्यासमोर येऊन बसते. अनेकदा, विलाप करत ती म्हणते, "मी जाणार नाही!" स्वप्नात, ध्यानात, त्या विलाप करणाऱ्या स्त्रीव्यतिरिक्त अनेक गोष्टी दिसतात. कधीकधी तर साक्षात बुद्धसुद्धा! पण स्वप्नांच्या या दर्यात दारिया कधीच दिसत नाही. मोगऱ्याच्या फुलासारखा सुगंध असलेली मल्लिका  स्वप्नात येत नाही. जेव्हा ती येते, तेव्हा जाग आल्यावर ,तिची आठवण येते. तिने दिलेल्या आनंदाची आठवण येते. ही विपश्यनेची तहान काय आहे?आयुष्यात ही अशी आस तरी कशी काय आहे? दारिया च्या दर्यात तरंगणारा विनय अनेकदा असा विचार करतो. पण ह्या प्रवाहात तरंगत राहणे कधीच थांबत नाही. 


अनेक महिने उलटले. अचानक एके दिवशी दारियाचा फोन आला. ती फोनवर खूप आनंदित होती. विनयने विचारले, "तुला माझा नंबर कुठून मिळाला? मी तुला दिला नव्हता."


"मला तुझा नंबर विपश्यना शिबिराच्या कार्यालयातून मिळाला होता, तेव्हाच." ती क्षणभर थांबली आणि म्हणाली, "पण मी तुला सांगितलं नाही."


“ठीक आहे. ठीक आहे.” विनयने विचारले, “तू कशी आहेस ?”


“खूप छान!” ती म्हणाली, “तुम्ही दिलेली भेट मी कधीच विसरू शकत नाही!”


"पण मी  काहीच दिलं नाही. भेटवस्तू सुद्धा नाही," तो म्हणाला, "एक फूलसुद्धा नाही."


“तुम्हीच तर मला सर्व काही दिलं!”


“काय?”


“हो, मी तुमच्या मुलाची आई झाले आहे.”


“काय?” विनय घाबरून म्हणाला. 


“हो, हे पूर्णपणे तुमचे आहे. फक्त रंग माझा आहे. रंग सोडून बाकी सगळं तुमचे आहे.”


“काय,काय?”विनय थोडासा आनंदी आणि थोडासा घाबरलेला म्हणाला. 


"जर मी कधी भारतात आले, तर मी तुमची तुमच्या मुलाशी ओळख करून देईन," ती म्हणाली, "किंवा मी तुम्हाला कधीतरी मॉस्कोला आमंत्रित करेन."


“काय?”विनय घाबरून ओरडला.


“विनय, तुला माहीत नाही, मला आई होण्याची  खूप इच्छा  होती.”ती म्हणाली, “मी खूप प्रयत्न केले. एकामागून एक उपचार घेतले. पण मी हार मानली. डॉक्टरांनी तर टेस्ट ट्यूब बेबीचा सल्लाही दिला होता.” ती पुढे म्हणाली, “विपश्यना करत असतानाच तू आवडलास,माझं तुझं मन जुळलं. म्हणून मी प्रयत्न केला. मी सर्व धोके पत्करून प्रयत्न केला. आणि मी यशस्वी झाले. धन्यवाद, माझ्या प्रिया!”


विनय गप्प राहिला. आपल्या रशियन मुलाबद्दल दारियाला काय सांगावे हे त्याला सुचत नव्हते. मग तो हळूच म्हणाला, "शक्य झाल्यास, कृपया मुलाला हिंदीसुद्धा शिकव.म्हणजे जेव्हा कधी मी त्याला भेटेन, तेव्हा त्याच्याशी बोलू शकेन."


“काही हरकत नाही,” ती म्हणाली,”पण तू त्याचा पिता आहेस हे मी त्याला कधीच सांगणार नाही. आणि तू ही त्याला कधीच सांगू नको .” ती पुढे म्हणाली, “हे फक्त तुला आणि मलाच माहीत आहे.  इतर कोणालाही सांगू नकोस.” 


“ठीक आहे,” विनय म्हणाला, “काही हरकत नाही.” विनयला ‘ना तुम हमें जानो,ना हम तुम्हें जाने ' हे गाणे आठवले. 


“ठीक आहे, प्रिये!”


"मला मुलाचे काही फोटो पाठव," विनय म्हणाला. 


"नक्कीच!" ती म्हणाली, " माहीत आहे का,मी माझ्या मुलाचं नाव विपश्यना ठेवलं आहे." दारिया उत्साहाने म्हणाली, "माझ्या नवऱ्यालाही ते नाव आवडतं. खूपच आवडतं."


“काय?”


“हो, प्रियतमा!”


“खूप छान!”


“खूप छान”दरियाने फोन ठेवला. 


एका चुकीमुळे विनय पिता होईल आणि हा एक अलौकिक आनंद असेल, हे कोणाला ठाऊक होतं? दारियाने त्याच्या मुलाचे काही फोटो व्हॉट्सॲपवरून पाठवले आहेत. 


आता, ध्यानात असताना त्याला त्याचा रशियन मुलगा, विपश्यना,खळखळून हसताना दिसतो. तो त्याला वारंवार पाहतो. पाणी, आकाश आणि हिमालयासोबतच, त्याचा रशियन मुलगा, विपश्यना, त्याच्या ध्यानातही प्रकट होतो. पुन्हा पुन्हा. अधिकाधिक वेळा. नेहमी खळखळून हसत. त्याला दारियाकडे  उडत जायचे आहे, जेणेकरून तो विपश्यना नावाच्या  त्याच्या मुलाला लवकरात लवकर पाहू शकेल. त्याच्या मनात विपश्यना बाळा साठी एक विचित्र ओढ निर्माण होते. त्या जुगलबंदी नंतर, हा असा कोणता छोटाख्याल आहे जे गाताना त्याला रडायला येत आहे? 


हा कसला विलाप आहे? विपश्यनेतील हा आलाप विनयला विव्हळ करतो. विपश्यनेतील ही कसली साधना आहे? ही साधना आहे की उपासना? अचानक, विनयला विपश्यना शिबिरातील ध्यानकक्षातील त्या स्त्रीच्या विलापाची आठवण येते. ही साधना आहे की विलाप, हे त्याला कळत नाही. दरिया अधूनमधून व्हॉट्सॲपवर फोन करते. विपश्यना बाळ, आपला मुलगा दाखवत राहते. कधी खळखळून हसणारा, कधी झोपलेला. ती त्याला सांगते, 'जेव्हा जेव्हा तो दूध पितो, तेव्हा त्तुझी आठवण येते.'


“एरव्ही आठवण येत नाही का?”


"का येत नाही?" ती म्हणाली, "ती तर नेहमी येते."


“तर मग तुझ्या पतीला माहीत आहे का की विपश्यना कोणाचा मुलगा आहे?”


“हो,  माहीत आहे.”


“काय?” त्याला धक्का बसला. 


"त्याला माहीत आहे की विपश्यना त्याचाच मुलगा आहे," ती पुढे म्हणाली, "पण मला माहीत आहे की तो तुझा आणि माझा मुलगा आहे. पण कोणाला सांगायची गरज काय?" ती म्हणाली, "मी आई झाले आहे; जगात यापेक्षा जास्त आनंदाची गोष्ट दुसरी नाही."


"मला तुला फक्त एकदाच भेटायचं आहे. मला विपश्यनाला पाहायचे आहे," विनय म्हणाला. 


दारिया म्हणाली,”निश्चितच !”


[ समाप्त ]


 मराठी अनुवाद प्रिया जलतारे 

























































9 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. गम्भीर समीक्षा

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  3. ज़बरदस्त ♥️

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  4. ज़बरदस्त ♥️

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  5. साधु साधु

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  6. साधू साधू 😊🙏

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  7. बहुत बहुत अद्भुत

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  8. उत्कृष्ट सर!

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