Saturday, 10 October 2020

पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में अगर भाजपा को रोकना है तो


पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में अगर भाजपा को रोकना है तो आपसी अहंकार त्याग कर तृणमूल , वामपंथी और कांग्रेस को एक साथ तालमेल कर चुनाव लड़ना होगा। भाजपा विरोधी वोट बंटने से बचेगा। तो भाजपा रुकेगी। बाकी संविधान खत्म हो जाएगा आदि-इत्यादि बातें सब ख्याली पुलाव है। सोने का मृग है। इन बातों से जनता में कोई असर नहीं पड़ता। इस टोटके और तरकीब से भाजपा भी कहीं नहीं रूकती। चुनावी राजनीति में संविधान वगैरह वैसे भी हाथी के दांत हैं। तो संविधान खतरे में वैसे भी नहीं आता-जाता। 

इमरजेंसी लगी थी तब ज़रूर खतरे में था , संविधान । पर अब संविधान को खतरे में बताने वाले लोग तब चुप थे। तो जनता हकीकत समझ चुकी है। फिर चुनाव में सवाल संविधान का नहीं सत्ता का है। सत्ता पाने की ही बात करनी चाहिए। संविधान आदि का भजन किसी काम नहीं आने वाला। तथ्य यह है कि एकपक्षीय सेक्यूलरिज्म ने भाजपा को पश्चिम बंगाल में बड़ी ताकत दे दी है। इस बात को भाजपा विरोधी ताकतें जितनी जल्दी समझ लेंगी , उन के लिए बेहतर होगा। नहीं भाजपा-भाजपा करते रहने , सिर्फ भाजपा का डर दिखाने से , भाजपा आती है। रुकती नहीं। सोशल मीडिया पर क्रांति की जुगाली से तो कतई नहीं। 

यह छोटी सी बात जाने क्यों भाजपा विरोधी शक्तियां समझना नहीं चाहतीं। ध्यान यह भी देने की बात है कि ममता सरकार के खिलाफ इंकम्बेंसी भी ज़बरदस्त है। वामपंथी दल हांफ रहे हैं। और कांग्रेस की तो खैर बात ही क्या करनी। राहुल , प्रियंका , सोनिया से आगे कांग्रेसियों को कांग्रेस कहां दिखती है भला। फिर राहुल गांधी में जो लोग देश का भविष्य देखते हैं , उन पर मुझे तरस आता है। ख़ास कर वामपंथी बुद्धिजीवियों पर। मेरा स्पष्ट मानना है कि ऐसे लोगों को भारत की राजनीति की बिलकुल समझ नहीं है। और कि ऐसे लोगों को राजनीति पर बात करने से परहेज़ करना चाहिए। राहुल गांधी जैसे व्यक्ति के कसीदे पढ़ कर यह लोग अपनी सारी पढ़ाई-लिखाई , वैचारिकी , प्रतिबद्धता वगैरह चुटकी बजाते ही पानी में मिला देते हैं। ज़मीनी सचाई यह है कि राहुल कांग्रेस का ही भविष्य नहीं रह गए हैं। देश का भला क्या होंगे कभी। 

खैर , मुस्लिम तुष्टिकरण के चूल्हे पर , एकपक्षीय सेक्यूलरिज्म की आंच में भाजपा पश्चिम बंगाल में ही नहीं ,पूरे देश में मज़बूत  हुई है। इस तथ्य की अनदेखी करना ही बड़ी भूल है। फिर सच देखने , कहने वालों को संघी , भक्त करार देना और बड़ी भूल है। सुर में सुर मिला कर अपने से असहमत होने वालों को बहुत ज़ोर-ज़ोर से संघी , भक्त कह देने भर से भाजपा की चुनौती समाप्त नहीं होने वाली। चुनी हुई चुप्पियां , चुने हुए विरोध का खोल भी उतार ही देनी चाहिए। वोट देने वाली सामान्य जनता , कहीं की भी हो , पश्चिम बंगाल की भी , व्यवहार समझती है , सिद्धांत नहीं। सामान्य जनता बुद्धिजीवी नहीं होती। रोटी-दाल , सुविधा , मंहगाई , रोजगार , आत्म-सम्मान और क़ानून व्यवस्था आदि मोटे-मोटे तौर पर समझती है। और हां , धर्म और जाति भी। बहुत कस के।

तथ्य यह भी दिलचस्प है कि ;अगर 2014 में पश्चिम बंगाल से भाजपा के 2 सांसद थे तो 2019 में कुल 42 में से 18 सांसद कैसे हो गए भला भाजपा के ? स्पष्ट है , भाजपा बढ़ रही है। मेरा मानना है कि विधान सभा चुनाव में भी भाजपा तगड़ी बढ़त ले रही है। रही बात हिंसा की तो चार दशक से अधिक समय से हम पश्चिम बंगाल को हिंसा में निरंतर झुलसते देख रहे हैं। वह पश्चिम बंगाल जहां टैगोर की मूर्तियां तोड़ दी जाती हैं। नंदीग्राम और सिंगूर में यह हिंसा पराकाष्ठा पर दिखी। इसी चक्कर में वामपंथियों के हाथ से सत्ता छिन गई। अब ममता बनर्जी की तृणमूल ने हिंसा में वामपंथियों को भी पीछे छोड़ दिया है। और जो हालत दिख रही है उस के मुताबिक़ भाजपा , तृणमूल को हिंसा में पीछे छोड़ने वाली है। लोहा , लोहा काटता है की चाल चलते हुए। बिहार चुनाव से तो हिंसा की विदाई हो चुकी है। पश्चिम बंगाल से जाने कब चुनावी हिंसा विदा होगी , यह देखना होगा।


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