Monday, 29 December 2014

कोहरे का घेरा , ट्रेनों की लेट-लतीफ़ी, आज़म ख़ान और स्टेशन के भीतर-बाहर चकाचक सफ़ाई


भारतीय रेल से चलना इन दिनों कड़ी परीक्षा से गुज़रना है। कोहरे के फेर में लेट-चपेट अपनी जगह है , ट्रेन कैंसिल भी खूब हो रही हैं । क्या तो कोहरे का कहर है ! तो भी मुझे जाना पड़ा ट्रेनों की इस लेट-चपेट में हल्द्वानी। लखनऊ से हल्द्वानी जाने वाली बाघ एक्सप्रेस लखनऊ से काठगोदाम पांच घंटे से भी विलंब से रोज चल रही है। कोहरा न हो तो भी यह ट्रेन लेट रहना अपनी आदत बना चुकी है । रात बारह बज कर पांच मिनट पर हावड़ा से लखनऊ आने वाली यह ट्रेन पकड़ने का मतलब है कि इस सर्दी में पूरी रात आप प्लेटफ़ार्म पर गुज़ारिए। लखनऊ से काठगोदाम जाने के लिए एक यही सीधी ट्रेन है । एक गरीब रथ भी है जो हफ़्ते में सिर्फ़ एक दिन चलती है । छोटी लाइन यानी ऐशबाग से एक नैनीताल एक्सप्रेस है जो हल्द्वानी से अस्सी किलोमीटर पहले भोजीपुरा में उतार देती है । मुझे पचीस दिसंबर को ही हल्द्वानी जाना था । बाघ एक्सप्रेस से । रात बारह बजे की इस ट्रेन के बारे में शाम 6 बजे जब पता किया तो पता चला कि  तीन घंटे लेट है । मैं ने टिकट रद्द करवा दिया । इस ट्रेन का डी आर एम कोटा भी लखनऊ से ए सी सेकेंड में नहीं है । यह भी एक फ़ज़ीहत है।  ख़ैर  दूसरे दिन रात रात भर प्लेटफार्म पर ठिठुरने के बजाय जाते समय रेल के अधिकारी की सलाह पर मैं ने फिर छब्बीस दिसंबर के नैनीताल एक्सप्रेस का टिकट लिया ।

नैनीताल एक्सप्रेस लखनऊ से चली तो ठीक समय से  पर भोजीपुरा देर से पहुंची। यानी चार पचीस पर पहुंचने वाली ट्रेन सात बजे पहुंची । बरेली से हल्द्वानी जाने वाली पैसेंजर ट्रेन साढ़े छ बजे जा चुकी थी । दूसरी ट्रेन दिन बारह बजे की थी । अब बाई रोड का सहारा था । और सामने गहरा घना कोहरा । ट्रेन की सारी झुंझलाहट दिलकश कोहरे ने दूर कर दी । स्टेशन से बाहर आए तो ढेर सारे लोग सवारी के इंतज़ार में थे । सवारी ही लेकिन नहीं थी कोई । थोड़ी देर में देखा कि कुछ लोग वहां से गुज़र रहे ट्रकों में सवार होने लगे । कोई टैक्सी या जीप नहीं थी । एक घंटे बाद अचानक एक उत्तर प्रदेश रोडवेज की बस आ गई । संयोग से लगभग ख़ाली थी । लेकिन एक झटके में भर गई । वैसे भी ज़्यादातर लोग ट्रकों में लद कर जा चुके थे । ख़ैर बैठने पर पता चला कि बस हल्द्वानी नहीं पंत नगर जा रही है । कंडक्टर ने सलाह दी कि किच्छा तक इस से चले चलिए। वहां से हल्द्वानी की बस आसानी से मिल जाएगी । चल पड़ा । मेरी सीट के बगल की खिड़की का शीशा ठीक से बंद नहीं हुआ । सो कोहरा और ठंडी हवा दोनों का लुत्फ़ एक साथ शुरू हुआ । ठंडी हवा लगातार जारी थी । कई बार लगा कि  कुल्फी की तरह जम जाऊंगा । लेकिन सामने के घने कोहरे और इस कोहरे के रोमांस ने इस हवा को बेमानी कर दिया । फिर अचानक मुहम्मद ख़लील की गायकी याद आ गई । वह एक गीत गाते थे , ' झिर -झिर बहे पुरवैया मैं का करूं ! / बलमा बहुतै गवैया मैं का करूं ! ' बस की खिड़की से आ रही इस हवा को मैं ने ख़लील की गायकी की पुरवैया मान कर मजे ले कर महसूस करने लगा । ऐसे जैसे कोहरे और हवा की कॉकटेल हो ! और फिर सड़क किनारे खेतों में गेहूं , गन्ने और सरसो के खेतों की लहक । इन खेतों में भी सागौन और बिना पत्तों के खड़े सीना ताने पॉपुलर के पेड़ । जैसे इस पूस में पतझर की याद दिला रहे हों । बस धीरे-धीरे कोहरे से जैसे लड़ती हुई चल रही है । मैं अपलक कोहरे में डूबे इन खेतों और वृक्षों को देख रहा हूं और कंडक्टर जैसे मेरे भीतर कोहरा देख रहा है । बता रहा है कि घबराइए नहीं , जहां आप जा रहे हैं हल्द्वानी ! वहां आप को चटक धूप मिलेगी । 

बस किच्छा आ गई है । किच्छा भी गहरे कोहरे में डूबा हुआ है । थोड़ी देर में उत्तराखंड रोडवेज की बस मिल गई है । इस बस की कंडक्टर एक लड़की है जिसे मैं  ने पहले यात्री समझा था । लेकिन जब वह मेरे पास आ कर टिकट काटने लगती है तब पता चलता है कि वह कंडक्टर है । बस चलती जा रही है , जैसे - जैसे बस आगे  बढ़ रही है , कोहरा कम होता जा रहा है । और जब बस हल्द्वानी पहुंची तो सचमुच एक नरम धूप की चादर बिछी मिली । बिलकुल लखनऊ जैसा नरम और मस्ताना मौसम है हल्द्वानी में भी । लेकिन जब दूसरे दिन हल्द्वानी से तीस किलोमीटर पर बसे रुद्रपुर गया तो वहां भी फिर वही घना कोहरा और प्रचंड ठंड मिली । मौसम ऐसे ही बदलता है । जैसे जगह बदलती है । वापस आने पर हल्द्वानी फिर वैसे ही मिलता है। खिली धूप में लिपटा हुआ । 

महंत आदित्यनाथ आज़म खान को बरेली या रांची के पागलखाने में इलाज की दरकार बताते फिर रहे हों लेकिन इस बड़बोले आदमी में कुछ तो ख़ासियत है ही । उन की हनक के तो कहने ही क्या ! आज सुबह हल्द्वानी से बाघ एक्सप्रेस से लखनऊ लौटा । आज़म खान का पहला झटका कल हल्द्वानी में ही मिला । टिकट वेटिंग में था । सो डी आर एम कोटे से कंफर्म करवाने की कवायद लाज़िमी थी । बरेली से रेल के संबंधित अधकारी ने फ़ोन पर बातचीत में हाथ खड़े किए और बताया कि रामपुर से आज आज़म खान भी इसी ट्रेन से जा रहे हैं , कोटे की सारी सीटें उन के और उन के साथियों के नाम हो जाएंगी। सो ए सी सेकेंड क्लास में टिकट कंफर्म होना बहुत मुश्किल है। हां कहिए तो ए सी थर्ड में कोशिश करूं ? और अंतत: ए सी सेकेंड के टिकट पर ए सी थर्ड में सफ़र करना पड़ा । रिजर्वेशन का डिफ़रेंस किराया भी नहीं मिला । हल्द्वानी स्टेशन पर स्टेशन मास्टर ने कहा कि टी टी या तो रिफंड देगा या सर्टिफ़िकेट देगा जिस के आधार पर लखनऊ में पैसा वापस मिल जाएगा । ट्रेन में टी टी भड़क गया कि हम न तो रिफंड देंगे न सर्टिफ़िकेट ! लखनऊ स्टेशन पर कहा गया कि टी टी का सर्टिफिकेट लाइए । अब जब टी टी ने दिया ही नहीं कोई सर्टिफ़िकेट  कहां से लाता भला ?

 ख़ैर जब कोहरे में लिपटे रामपुर में आधी रात में ट्रेन रुकी तो जैसे पूरा प्लेटफ़ार्म आज़म ख़ान के इस्तक़बाल में छावनी में तब्दील था । अजब जलवा था । और जब ट्रेन लखनऊ आ कर रुकी तो फिर यहां भी आज़म ख़ान का जलवा क़ायम था । कोहरे के घेरे में लखनऊ भी था और पुलिस की पलटन यहां भी प्लेटफॉर्म पर आज़म ख़ान के इस्तक़बाल में खड़ी थी । आज़म ख़ान अपनी टोपी संभाले आहिस्ता-आहिस्ता पुलिस के घेरे में चल रहे हैं । उन के थोड़ा पीछे चल रही बुर्क़ा पहने हुई एक औरत चल रही हैं तेज़-तेज़ और मोबाईल पर किसी को मारे ख़ुशी के बताती हुई चल रही हैं कि, ' हम आज़म ख़ान के पीछे-पीछे चल रहे हैंगे !' एक मुस्लिम लड़का भी मोबाईल पर यही बात किसी को बता रहा है कि,  ' अरे ट्रेन आ गई है , पता है आज़म साहब भी इसी ट्रेन से आए हैं !' फिर धीरे-धीरे मोबाईल पर  सूचना परोसने वाले बढ़ते जाते हैं । ट्रेन यहां लखनऊ में भी सवा दो घंटे लेट थी । लेकिन प्लेटफ़ार्म से लगायत स्टेशन के बाहर तक साफ़ सफ़ाई बिलकुल चौचक अंदाज़ में चकाचक चमकती हुई । इतनी साफ़-सफ़ाई इस चारबाग़ स्टेशन के बाहर मैं ने कभी इस के पहले तो नहीं देखी । वह भी इतनी सुबह और इतने कोहरे में भी । सारे टैम्पो, रिक्शा आदि भी सब तरतीब से । क़रीने से ! सड़क बिलकुल ख़ाली । गोया कर्फ़्यू  की कोई सुबह हो ! सफाई को देखते हुए कहने को मन होता है कि आज़म ख़ान आप ऐसे ही रोज़ाना रामपुर से लखनऊ आया कीजिए ! ताकि स्टेशन रोज़ साफ़-सुथरा मिला करे ! बस डर यही है कि कहीं आज़म ख़ान को कहीं यह न समझ आ जाए कि यह सफ़ाई का एजेंडा तो नरेंद मोदी का एजेंडा बन चुका है ! फिर वह भड़क जाएं और ऐलान कर बैठें कि आइंदा कोई भी सफाई नहीं ! तो कोई क्या कर लेगा ? आख़िर आज़म ख़ान तो आज़म ख़ान ही हैं । काश कि आज़म ख़ान अपने इसी बड़बोलेपन और झख से मुक्ति पा जाते ! भड़कना छोड़ देते और भड़काऊ बयान न देते ।

हम स्टेशन से बाहर आ कर लखनऊ के अपने प्रिय कोहरे में खो गए हैं ! कोहरा मुझे सचमुच बहुत प्रिय है, ठंड भी । पर ट्रेन का लेट होना बिलकुल नहीं !  


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