Wednesday, 17 February 2016

मन यायावर है ठहरता ही नहीं पारे की तरह फिसलता बहुत है

फ़ोटो : निखिलेश त्रिवेदी

ग़ज़ल

तुम ने मुझे बिगाड़ दिया बहुत है आती तुम्हारी याद अब बहुत है
मन यायावर है ठहरता ही नहीं पारे की तरह फिसलता बहुत है

गौरैया की तरह फुदकती आ जाओ मन की गिलहरी पेड़ पर है
प्रेम के इस वन में वासंती हवाएं हैं जहां एक हाथी घूमता बहुत है

तुम हो तो वसंत है फागुन और सावन है वरना इन के क्या मायने
तुम्हीं से वसंत महकता है बहकता फागुन बरसता सावन बहुत है

सहजन के पेड़ों पर फूल आए हैं कटहल पर छोटे-छोटे फल हैं
प्यार जैसे कोई बहती हुई हवा है सुगंध भर कर बहती बहुत है
 
हमारी दोस्त हो तुम दुश्मन भी तुम्हीं हमारी ज़िंदगी और मौत भी 
इतना यकीन इतना भरोसा इतना इत्मीनान जीने के लिए बहुत है 

ज़िद के आगे तुम्हारी हम हार-हार जाते हैं मनाना बहुत मुश्किल
तुम्हारा मूड है कि कोई मौसम है बात बेबात बदलता अब बहुत है

अम्मा और तुम्हारे बीच में कोई फर्क है ही नहीं हम  करें भी क्या
विदा होते समय तुम भी रुलाती हो बहुत वह भी रुलाती बहुत है


[ 18 फ़रवरी , 2016 ]

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