Wednesday, 24 February 2016

लगता है कामरेड तुम्हारी काठ की हाड़ी उतर गई है

फ़ोटो : संतोष जाना


ग़ज़ल 

छल-कपट किया बहुत पर लाल पगड़ी उतर गई है 
लगता है कामरेड तुम्हारी काठ की हाड़ी उतर गई है

देश को कितना चिढ़ाओगे तुम्हारे पास आधार नहीं 
अराजकता ही बची है उस की लाल कलई उतर गई है 

संघी गोडसे वगैरह बासी कढ़ी है मीनू नया तैयार करो 
इस थेथरई में कुछ नहीं रखा आंच इस की उतर गई है 

कोरी नारेबाजी से न्याय नहीं मिलता देश भले जलता 
देशद्रोह की लाल छतरी अब हर नज़र से उतर गई है 

देश का मौसम बदला गया है लाल चश्मा उतर गया है 
कुतर्क की खेती सूख गई है क्रांति पटरी से उतर गई है 

बहुत हो गया तू-तू मैं-मैं देशद्रोह के नारे  विष वमन भी
भारत की धरती पर अब उम्मीद की बदली उतर गई है

[ 25 फ़रवरी , 2016 ]

2 comments:

  1. Vaah! इस भाषा में आप को लिखते पढ़ पाता हूँ।

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  2. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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