Monday, 29 October 2018

मंदिर तो आज बना लें पर दंगों से डर लगता है


ग़ज़ल / दयानंद पांडेय

सभी मिलजुल कर रहते हैं तो घर घर लगता है
मंदिर तो आज बना लें पर दंगों से डर लगता है

बम विस्फोटों का वह मुसलसल मंज़र भूला नहीं है देश 
सुप्रीम कोर्ट हो या सरकार अब सब को यह डर लगता है 

ढाए जुल्म बनाए चर्च पर मंदिर मस्जिद तोड़ा क्या अंगरेजों ने 
मेलजोल का यह ताना बाना हथौड़े से ज़्यादा असर करता है 

मक्का मदीना में मंदिर गिरजा बन सकता है क्या
अयोध्या किस लिहाज से बाबर का घर लगता है

रहते रहे हैं सदियों से राम अयोध्या में रहने दो अब भी
वनवास ख़त्म करो उन का यह अंधा सफ़र लगता है

चुनाव लड़ो तुम और हम को तोड़ो रोज हर्ज नहीं है
लेकिन मंदिर मस्जिद पर दिल टूटे तो डर लगता है

पाकिस्तान नहीं गए तुम यह मुल्क पर एहसान नहीं था
फिर रोज रोज यह एहसान जताओ तो जहर लगता है

मंदिर मस्जिद की नित नई इबारत तुम रोज लिखे हो
गंगा जमुनी तहज़ीब की दुहाई भी तो यह कहर लगता है

घोड़े सा दिमाग दौड़ाओ हर्ज नहीं है मेरे भाई दौड़ो और
जाति पाति और धर्म की भट्ठी से बचो यह जहर लगता है 

याद करो कबीरा की बानी राम रहीमा एक है
ढाई आखर का प्रेम ही जीवन में सहज लगता है


[ 30 अक्टूबर , 2018 ]