ग़ज़ल / दयानंद पांडेय
प्रगतिशीलता की आड़ में कट्टर लीगी होना बीमारी है
कम्युनिस्ट हो कर पूजा करना भी बहुत बड़ी लाचारी है
हिप्पोक्रेटों की दुनिया है चहुं ओर उन का ही बाज़ार है
बाहर कुछ भीतर कुछ होना उन की यही दुकानदारी है
बचपन से यही देखा यही भोगा और इसी से हारते आए हैं
चार सौ बीसी सर्वदा आगे रहती मार खाती ईमानदारी है
जाति की गणित में सांस लेता मज़हब की घृणा वही बांटता
सेक्यूलरिज्म की चादर पर नचाता बंदर वह बड़ा मदारी है
मंहगाई का असर नहीं है खर्चे की पैसा भर परवाह नहीं है
दुनिया जानती है आदमी ईमानदार नहीं पक्का भ्रष्टाचारी है
[ 1 अप्रैल , 2016 ]
