Monday, 9 March 2026

हत्यारा

दयानंद पांडेय 


तुम मुझे ऐसे मिली थी जैसे किसी मछुआरे को बिना जाल की मछली। मछुआरे के हाथ में आ कर भी तुम मरी नहीं थी। क्यों कि जैसे एक जल से निकल कर दूसरे जल में आ गई थी। तो मरती भी कैसे भला। तुम्हें शायद उस जल से निकल कर दूसरे जल की ज़रूरत थी। ऐसे जैसे किसी बहती नदी को दूसरी नदी से मिलने की। जल बदलना , मछली के जीवन को कैसे बदलता है यह तुम्हारे साथ जल बन कर जाना। तुम किसी पोखर के जल से निकल कर नदी के जल में आ मिली थी। उस पोखर का जल सड़ने लगा था और कि उस जल में तुम्हारा सांस लेना कठिन हो गया था। ऐसा तुम बताती थी। छटपटाती हुई इसी लिए मिली थी। जल बदलने की तुम्हारी यह छटपटाहट , यह अकुलाहट इतनी तीव्र थी कि मैं इसे प्यार समझने लगा। पुरुष अकसर ऐसे धोखे में आ जाते हैं। मैं भी तुम्हारे प्यार में आ गया। लेकिन स्त्रियां मछली बन कर मछुआरे को मझधार में छोड़ कर फिर किसी और जल में अपना जीवन खोज लेती हैं। मछली खुल कर मिलती है। हंस कर मिलती है। लोग धोखा खा जाते हैं। वह आहिस्ता से जल बदल लेती है। 

लेकिन जल ? 

जिस जल ने किसी मछली को अपना जीवन बना लिया हो , अपना संसार और और सर्वस्व बदल लिया हो उस के लिए बहना कठिन हो जाता है। जल की तलहटी भी उस की लहरों को बांध-बांध लेती है। आगे नहीं बढ़ने देती। 

तुम मेरे जाल में भी इसी लिए नहीं थी। बहुत बाद में समझ आया था कि मछुआरा ही मछली के जाल में था। लेकिन यह जाल बहुत मज़बूत था। तो क्या तुम बहेलिया थी। प्रेम का दाना बिछा कर ऊपर जाल बिछा दिया था ? प्यार का जाल। कितने तो जाल थे तुम्हारे पास। मोह के , देह के , नेह के , आशा , उमंग और अभिलाषा के। जन्म - दिन तुम्हारा हो , हमारा हो हम साथ मनाते ही मनाते थे। सारी अड़चन , सारी जकड़न तोड़ कर मिलते थे। मिलना ही जन्म - दिन मनाना था। अवसर कोई भी हो प्रेम के पान हम खा ही लेते थे। यह जल और मछली का रिश्ता था कि मिलते ही हम बहने लगते थे। बहाने सारे जल में विगलित हो जाते। हमारा प्यार सयाना हो जाता। दुनिया जान भी नहीं पाती। मछली पालने वाले जानते हैं कि तालाब अगर किसी रेल पटरी के किनारे हो तो मछली जल्दी बड़ी हो जाती है। रेल गुज़रती रहती है , रेल की आवाज़ सुन कर मछली दिन-रात नहीं देखती , तैरती रहती है ,निरंतर तैरती रहती है। और बड़ी होती रहती है। हमारा प्यार भी जैसे किसी रेल पटरी के किनारे का तालाब था। बढ़ता रहा। इतना बढ़ा कि मछली बहुत बड़ी हो गई। अपने जल से निकल गई। 

हम जब मिले तो लगा हमारी भाषा अलग - अलग है। इच्छाएं और कामनाएं अलग हैं। न तुम हमारी भाषा जानती थी , न हम तुम्हारी भाषा। बिलकुल अनजानी और अजनबी भाषा। फिर भी मिलते रहे। शौक़ और समझ भी अलहदा। हाथ में हाथ लिए एक दिन अचानक तुम बोली , ' आज नाव पर घूमते हैं। ' फिर भाड़े की नाव ली। दिन भर की पिकनिक मनी हमारी नाव पर। नाव वाले ने पैसा भरपूर लिया पर हमारा दिन बना दिया। कितने तो गाने गए थे तुम ने। 

याद है ?

हम चाहते थे कि नाव वाला शहर की सरहद छोड़ कर कहीं दूर देहात की तरफ चले। पहले तो तुम चुप रही। अचानक बोली , ' आज नहीं। कभी और। ' तुम्हारी ख़ासियत थी , संक्षिप्त बोलना। कम बोलने वाली स्त्रियां बहुत अच्छी लगती हैं मुझे। तुम्हारी यह एक बात मुझे बहुत प्रिय थी कि तुम कभी किसी बात पर लड़ती नहीं थी। सिर्फ़ फ़ैसला देती थी। गोया कोई न्यायाधीश। 

तुम इतनी रूपवती थी , इतनी गोरी , इतनी अबोध थी कि तुम्हें देखने में तो नहीं , पर छूने में तनिक डर लगता था। तुम्हारे रूप का इतना ज़ोर था कि तुम्हें देख कर आइना टूट जाए। चांद की अजोरिया में नदी की धार में तुम्हारी धवलता जैसे मुझे पुकार लेती कि आओ मुझ से लिपट जाओ। लिपट कर लगता कि कोई गुनाह तो नहीं कर दिया। हमारे प्यार की धार पर नदी की धार न्यौछावर हो जाती। हवा की तरह यह गुनाह भी लेकिन छुप जाता था। लेकिन प्यार का चिराग नहीं बुझता। जलता रहता। मद्धिम - मद्धिम। 

इस सेल्फी युग में तुम ने हमारे साथ कभी कोई फ़ोटो अपने मोबाइल में नहीं रखी। फ़ोटो खींचती। देखती , मुझे दिखाती और चट मिटा देती। यह मुझे बहुत बुरा लगता। तुम इस बुरा लगने की परवाह नहीं करती। यह डर था कि एहतियात ? वाट्सअप चैट भी मिटा और मिटवा देती। कोई रिकार्ड नहीं रहने देना चाहती थी। अजब प्यार था यह। टूट कर मिलना और अचानक चल देना। कई बार शक़ होता कि स्रीजनोफेनिया की मरीज तो नहीं हो। नहीं थी। पर थी ऐसी ही। 

मेरे जन्म - दिन पर एक बार तुम ने मंहगी सी कलाई घड़ी दी मुझे। कहा कि यह तोहफ़ा नहीं प्यार है। तुम्हें मेरे सिगरेट पर बहुत ऐतराज था पर जब तुम्हें पता चला कि पाइप पीने का हमारा मन करता है तो तुम ने एक नहीं , दो - दो पाइप मुझे प्यार के तौर भेंट किए। कहा कि जब-जब तुम इन्हें अपने होठ से लगाओगे , समझूंगी कि मेरे होठ , तुम्हारे होठों से मिल रहे हैं। और मैं तुम्हारे लिए सुलगने लगूंगी। तुम मेरे पास दौड़े चले आओगे। ग़ज़ब थी तुम्हारी यह तलब भी। अजब था तुम्हारा यह इसरार भी। पर मुझे क़ुबूल था तो था। तुम को अचानक लगा कि हमारी नौकरी छोटी है। तुम ने एक बड़ी कंपनी के चेयरमैन से कह कर मुझे बढ़िया नौकरी दिलवा दिया। बढ़िया सेलरी के साथ ही कंपनी की तरफ से मुझे कार वगैरह की सुविधा भी मिल गई। मुझ से ज़्यादा तुम ख़ुश हो गई। ऐसी ही अनेक छोटी - मोटी सुविधाओं से मुझे तुम लादती गई। कहने को मैं बहेलिया था , तुम चिड़िया। ऐसा तुम ही कहती फिरती। पर अब चिड़िया के जाल में बहेलिया था। किसी बहेलिये के जाल से चिड़िया फिर भी निकल सकती है। कोई निकाल सकता है। पर चिड़िया के जाल से निकलना ? 

नामुमकिन। 

कोई मान ही नहीं सकता कि चिड़िया भी जाल बिछा सकती है तो निकालेगा भी कैसे भला। निकालने की सोचेगा भी कैसे ? लेकिन तुम जाल थी। जल के नीचे भी , जल के ऊपर भी। 

तुम्हारे अफ़सर पति के पास तुम्हारे लिए समय ही नहीं होता। बेटा कहीं बाहर पढ़ता था। तो तुम्हें किसी भद्र पुरुष के साथ समय बिताने की तलब लगी। मुझ मछुआरे से बढ़िया कौन मिलता तुम्हें। बेक़रारी में पहले इसरार करती थी। क़रार आने लगा तब आहिस्ता - आहिस्ता तुम आदेश देने लगी। यहां मिलो। वहां मिलो। तो कभी घर आ जाओ। मुझे भी अच्छा लगता यह तुम्हारा बुलाना। लगता था गोया तुम्हारे लिए ही पैदा हुआ हूं। तुम्हीं मेरा जीवन हो। तुम्हीं मेरा लक्ष्य। तुम्हीं मेरा सब कुछ। सर्वस्व तुम ही। नितांत निजी क्षणों में भी तुम मुझे ऐसे दुलारती जैसे मैं तुम्हारा शिशु। तुम हमारी मां। तुम्हारी गोद में लेटना , खेलना और तुम्हें पाना मेरा सौभाग्य बन गया था जैसे। मन ही मन भगवान से कृतज्ञता ज्ञापित करता। लाख - लाख शुक्रिया अदा करता रहता। तुम इतना खिलाती - पिलाती और प्यार करती कि मुझे ख़ुद अपने आप से रश्क़ होने लगा। 

तुम शायद शहर में गिनती की सर्वाधिक सुंदर स्त्रियों में से एक थी। धनवान भी थी। सलीक़ेदार भी।  इस से भी बड़ी बात कि मेरा सौभाग्य बन कर मेरे जीवन में उपस्थित थी। तुम्हारे जितना सुख मुझे किसी और स्त्री ने नहीं दिया था। कभी वह दिन था कि तुम्हें देख कर ही ख़ुश रहता था। तुम्हें छूने से डर लगता था। लेकिन वह कहते हैं न सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता। मेरा डर भी आहिस्ता - आहिस्ता सरकता गया। तुम को सहसा छू लिया एक दिन। ऐसे जैसे चांदनी को छू लिया हो। किसी बहती हुई वेगवती धारा को थाम लिया हो। समय को शिला बना लिया हो। समय जैसे रुक गया हो। मन में एक नई मिठास सी घुल गई। ऐसा स्वाद मिल गया जो कभी पहले नहीं मिला हो। सोने - चांदी जैसे दिन हो गए। लेकिन वह कहते हैं न कि इश्क़ और मुश्क छिपाए नहीं छिपते। फिर तुम्हारी सुंदरता की सुगंध वैसे भी किसी से नहीं छुपी थी। इश्क़ की सुगंध भी नहीं छुपी। इश्क़ था कि कुछ और था यह तब न तुम्हें पता था , न मुझे। पर लोगों को बहुत कुछ पता हो गया था। 

हमारे तुम्हारे संबंध को ले कर बात तुम्हारे पति तक भी पहुंची। ऐसा तुम ने ही बताया एक बार। मुझे लगा कि अब शायद तुम मुझ से दूर हो जाओगी। दूर हो जाओगी , यह डर सताने लगा। लेकिन देखा कि अब तुम मुझे ले कर बहुत पजेसिव रहने लगी। इतना कि मैं परेशान रहने लगा। कई बार किसी ड्रोन कैमरे की तरह काम करती तुम। हमारी सारी गतिविधियां तुम्हारी जानकारी में रहतीं। जाने कितने जासूस थे तुम्हारे पास। ख़ास कर अगर शहर में किसी स्त्री से हमारी बात मुलाक़ात हो जाए तो तुम्हारी जासूसी देखते बनती थी। लगता जैसे कोई तुम्हारी द्वारिका लूट ले गई हो वह स्त्री । समझ नहीं आता कि इतनी पजेसिव क्यों थी तुम ? 

क्या था मैं तुम्हारा ? 

तुम्हारे प्यार के साम्राज्य का एक मामूली सा नागरिक ? 

तुम्हारा प्यार मुझ में पुलक भरता था। पर यह तुम्हारा साम्रज्यवादी रवैया काट खाता था। तुम्हारा ज़रूरत से ज़्यादा पजेसिव रहना मुझे बुरा लगने लगा। किसी अपहरणकर्ता जैसा व्यवहार हो गया तुम्हारा। खुल कर तो नहीं पर चुपचाप तुम्हारे हुक़्म की तामील करने से बचने लगा। नतीज़ा यह था कि आफिस में मुझे अकारण नोटिस मिलने लगी। अचानक इंक्वायरी शुरू हो गई। एक दोस्त से तुम ने कहलवाया कि कह दो मुझ से आ कर मिले। सब ठीक हो जाएगा। दोस्त ने यह सब मुझ से कहा और बताया कि , ' भाभी जी से जा कर मिल क्यों नहीं लेते ? शायद ठीक करवा दें। ' मैं ने उसे बताया कि , 'भाभी जी ही यह सब करवा रही हैं ? ' तो उस का माथा ठनका। बोला , ' क्या कह रहे हो ? ' हम ने कहा , ' ठीक कह रहा हूं। ' कह कर फ़ोन रख दिया। तुम्हें शहर में ज़्यादातर लोग तुम्हारे पति की प्रतिष्ठा और तुम्हारी सुंदरता को देखते हुए भाभी जी ही कहते थे। मैं भी तो निजी क्षणों के अलावा तुम्हें लोगों के सामने भाभी जी ही कहता था। पर कहते हैं न कि हुस्नो इश्क़ का संगम कब तक ? समझ आने लगा था कि अब हमारा सफ़र ख़त्म होने को है। इस लिए भी कि तुम भूल गई कि प्यार में ज़ुल्म और जब्र से काम नहीं चलता। तुम्हारा नहीं जानता पर मैं नया मुसाफ़िर था इस पथ का। चाहत की चोट से अब बचने की तरक़ीब तलाशने लगा। कुछ दूर साथ चल कर हम बिछड़ने के मोड़ पर खड़े हो गए थे। तुम्हारे एक वाट्सअप संदेश का जवाब भेज दिया : ' सारे भाव , सारी भावना , भंगिमा और सारी संभावना गोमती में विसर्जित कर तुम्हें मुक्त कर ख़ुद को भी मुक्त कर लिया है। बहुत जी लिया तुम्हें। ' तुम्हारा रिप्लाई आया , ' सब भूल जाओ। लव यू ! प्लीज मीट मी !'

लेकिन नहीं आया तुम से मिलने। तुम ने और भी कई लोगों से कहलाया। ख़ामोश रहा। तुम मुझे फ़ोन पर फ़ोन , वाट्सअप पर वाट्सअप संदेश भेजती रही। एक बार तो मिल लो। मेरे घर भी गई। मैं नहीं था तब घर पर। घर पहुंचने पर तुम्हारे आने कि ख़बर मिली और मिल लेने का संदेश भी। नहीं आया तुम से मिलने। कठोर हो गया था मैं। कह सकती हो निर्मोही। आख़िर मैं क्या था तुम्हारा ?  

प्रेमी ? सेक्सटीशियन ? जिगोलो ? 

तुम से , तुम्हारे प्यार से बग़ावत इतनी भारी पड़ जाएगी , नहीं जानता था। दूसरे दिन पता चला कि तुम ने अपने हाथ की नस काट ली है। अस्पताल ले जाया गया। डाक्टरों ने तुम्हें मृत घोषित कर दिया। तुम्हारे अफ़सर पति का रुआब भी कुछ काम नहीं आया। तुम ने अपनी हत्या के पहले एक नोट लिख कर बता दिया था कि मैं तुम से मिलने नहीं आया , नहीं आ रहा था इस लिए तुम दुनिया से जा रही हो।  तुम्हारे पति ने फ़ोन कर मुझे यह बताया और डपटते हुए कहा , ' इतना बिजी थे कि आए नहीं ? ' उस ने जोड़ा , ' तुम मेरी पत्नी के हत्यारे हो ! ' 

मैं घर छोड़ कर नहीं गया कहीं। पुलिस के आने की प्रतीक्षा में रहा। पुलिस नहीं आई। वाट्सअप पर तुम्हारी अंत्येष्टि के समय का संदेश आया। गया। लोग मुझे घूरते रहे। पर मैं ने इस की परवाह नहीं की। तुम्हारे पति को बाहों में भर कर तसल्ली दी। फूट-फूट कर रोया। वह भी रोया। एक दूसरे को ढाढस बंधाया। तुम्हारे पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ा कर तुम्हें अंतिम प्रणाम किया। रखना चाहता था पुष्प से घिरे तुम्हारे कपोल पर अपना कपोल और रोना चाहता था तुम्हारे पार्थिव शरीर से लिपट कर। पर लोगों की आंखें धधक रही थीं। श्मशान घाट पर प्यार से बड़ा होता है लोकलाज। सो रुक गया। तुम्हारे चरणों पर माथा रख कर अपने आंसुओं का जल अर्पण किया। गोया सूर्य को अर्घ्य दिया हो। हां , तुम मेरे प्रेम का सूर्य ही तो थी। मुझे प्यार की चांदनी में नहलाती मेरा चंद्रमा भी थी। सहसा तुम्हारी धधकती चिता में ख़ुद को जलते पाया। तुम तो अग्नि और जल में विलीन हो गई। जल के साथ तुम्हारी अस्थियां बह गईं। किसी और जल में मिलने के लिए। क्या पता बहती - बहती सागर के जल में मिल जाओ। गंगा सागर में। जल बदलने का अभ्यास है तुम्हें। लेकिन तुम्हारे मन का यह मछुआरा अब कहां जाए। तुम्हारे प्रेम जाल से कैसे निकलूं ? कितना अभागा हूं , अपराधी हूं कि तुम्हारे प्यार , तुम्हारी चाहत की क़द्र नहीं कर पाया। ख़ुद को तुम्हें समर्पित नहीं कर पाया। तुम्हारे पति ने ठीक ही कहा कि मैं तुम्हारा हत्यारा हूं।

  [ साहित्य अकादेमी , नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित समकालीन भारतीय साहित्य के जनवरी-फ़रवरी , 2026 अंक में प्रकाशित। ]










हत्यारा कहानी का भोजपुरी अनुवाद 

लेखक : दयानंद पांडेय 

भोजपुरी अनुवाद : डाक्टर ओमप्रकाश सिंह 



तूं अइसे भेंटाइल रहलू जइसे कवनो मछुआरा के बिना जाल डलले मछरी भेंटा गइल होखे। मछुआरा का हाथ में अइला का बादो तू मरलू ना। काहें कि जइसे एगो पानी से निकल के दोसरा पानी में आ गइल होखो। त मरे कइसे भला। तोहरा शायद जरुरतो रहल ओह पानी से निकल के दोसरा पानी के। अइसे जइसे कवनो बहत नदी दोसरा नदी में मिले आइल होखे। पानी बदलल, मछरी के जिनिगी कइसे बदलेला ई हम तोहरा साथे पानी बन के जननी। तूं त कवनो पोखरी का पानी से निकल के नदी में आ गइल रहलू। ओह पोखरी के जल सड़ाँध मारे लागल रहे आ ओह पानी में तोहार जीयल मुश्किल हो गइल रहुवे। ई तूंही बतावत रहलू। एही चलते छटपटात हमरा से मिलल रहलू। पानी बदले के तोहार ई छटपटाहट, ई बेचैनी अस तेज रहल कि हम एकरा के प्यार समझे लगनी। मरद अइसन धोखा में अकसरहाँ आ जालें। हमहूं तोहरा प्यार में आ गइल रहीं। बाकिर मेहरारू मछरी बन के कवनो मछुआरा के मझदार में छोड़ के फेरु कवनो दोसरा पानी में आपन जिनिगी खोज लेलीं सँ। मछरी खुल के मिलेली सँ, हँस के मिलेली सँ। लोग धोखा खा जाला आ ऊ आहिस्ता पानी बदल लेली सँ।

बाकिर पानी ?

जवन पानी कवनो मछरी के आपम जीवन बना लेले होखो, आपन संसार आ सर्वस्व बदल लेले होखे ओकरा ला बहल बहुत मुश्किल हो जाला। पानी के तलहटिओ ओकरा लहरन के बाँध-बाँध लेली सँ। आगे ना बढ़े द सँ।

तूं हमरो जाल में एही चलते ना रहलू। बहुत बाद ई बुझाइल रहुवे कि मछुअरवे मछरी का जाल में रहुवे। बाकिर ई जाल बहुते बरियार रहल। त का तूं बहेलिया रहलू। प्रेम के दाना बिछा के ऊपर जाल डाल देले रहलू ? प्यार के जाल। कतना त जाल रहली सँ तोहरा लगे। मोह के , देह के , नेह के , आशा , उमंग अउर अभिलाषा के। जनमदिन तोहार होखे, हमार होखे मनावत संगही रहनी सँ। सगरी अड़चन , सगरी जकड़न तूड़ के मिलत रहनी सँ। मिललके जनमदिन मनावल रहत रहुवे। मौका कवनो होखे प्रेम के पान हमनी का खाइए लेत रहनी सँ। ई पानी आ मछरी के रिश्ते रहल कि मिलते हमनी का बहे लागत रहनी सँ। सगरी बहाना पानी में दहा जात रहली सँ। हमनी के प्यार सयान हो जाइल करे। दुनिया जानियो के ना जान पावत रहल। मछरी पाले वाला जानेलें कि पोखरी अगर कवनो रेल पटरी का किनारे होखो त मछरी जल्दी से बड़ हो जाली सँ। रेल गुज़रत रहेली सँ, रेल के आवाज़ सुन के मछरी दिन-रात ना देखत, पँवड़त रहेली सँ, लगातार आ बड़ होखत जाली सँ। हमनियो के प्यार अइसने कवनो रेल का पटरी का किनारे के पोखरी रहल। बढ़ते गइल। अतना बढ़ल कि मछरी बहुते बड़ हो गइल आ अपना पानी से बाहर निकल गइल।

हमनी का जब मिलल रहीं त लागल रहल कि हमनी के भाषा अलग-अलग बा। इच्छा अउर कामना अलग बाड़ी सँ। ना तूं हमार भाषा जानऽ, ना हम तोहार। बिलकुल अनजान आ अजनबी भाषा। तबहियहों मिलत रहनी सँ। शौक़ अउर समझो अलहदा। हाथ में हाथ लिहले एक दिन तूं अचके बोललू, ‘ आज नाव पर घूमल जाव।’ फेर भाड़ा पर नाव लिहनी सँ। दिन भर के पिकनिक मनवनी सँ ओह नाव पर। नाव वाला दाम त भरपूर लिहलस बाकिर हमनी के दिन बना दिहलस। कतना त गाना गवले रहलू तूं।

याद बा ?

हम चाहत रहनी कि नाव वाला शहर के सरहद छोड़ कतहीं दूर देहात ओर चले। पहिले त तूं चुप रहलु। अचके बोलली, ‘ आज ना। कहियो दोसरा दिने। ‘ तोहार ख़ासियत रहल , कम में बोलल। कम बोले वाली नेहरारू बहुते नीक लागेली सँ हमरा। तोहार इहे एक बात हमरा ला बहुते नीमन लागे कि तूं कबो कवनो बात पर लड़त ना रहलू। सिर्फ़ फ़ैसला दे दिहत रहलू कवनो न्यायाधीश का तरह।

तूं अतना रूपवती रहलू, अतना गोर, अतना अबोध कि तोहरा के निरखे त ना बाकिर छुए में तनी डर लागत रहल। तोहरा रूप के अतना जोर रहल करे कि तोहरा के देख के आइना टूट जाव। चांद के अँजोरिआ में नदी के धार में तोहार गोराई जइसे हमरा के बोला लेव कि आवऽ हमरा से लपटा जा। लिपट के लागे कि कवनो गुनाह त ना कर दिहनी। हमनी के प्यार के धार पर नदी के धार न्यौछावर हो जाइल करे। हवा का तरह हमनी के गुनाहो लुका जात रहल। बाकिर प्यार के दीया बुताव ना। जलते रहे। मद्धिम – मद्धिम।

एह सेल्फी युग में तूं कबो हमरा साथ के कवनो फोटो अपना मोबाइल में ना राखत रहलू। फ़ोटो खींचतू, देखतू , हमरा के देखवतू आ चट से मिटा देत रहलू। ई हमरा बहुते बाउर लागे। तूं हमरा बाउर लगला के कवनो परवाह ना करत रहलू। ई डर रहल कि एहतियात ? वाट्सअप चैटो मिटा आ मिटवा देत रहलू। कवनो रिकार्ड ना रहे देत रहलू। गजबे के प्यार रहल ई। टूट के मिलल आ अचके चल दीहल। कई बेर शको होखे कि सिजोफ्रेनिया के मरीज त ना हऊ। ना रहली। बाकिर रहलू त अइसने। हीं थी। पर थी ऐसी ही।

हमरा जनमदिन पर एक बेर तूं हमरा के एगो कलाई घड़ी दिहले रहलू। कहलू कि ई तोहफा ना ह,प्यार हवे। हमरा सिगरेट पीयला पर तोहरा बहुते एतराज रहल। बाकि जब तोहरा पता चलल कि पाइप पीये के हमार मन करत बा त तूं एगो ना, दू गो पाइप हमरा के बतौर प्यार दिहले रहलू। कहलू कि जब-जब तूं एहनी के अपना होंठ से लगईबऽ. समझब कि हमार होंठ, तोहरा होंठ से मिलत बाड़ी सँ। आ हम तोहरा ला सुनगे लागब। तूं हमरा लगे दउड़त चल अइबऽ। गजबे के तलब रहुवे ई तोहार। अजबे रहल तोहार इसरारो। बाकिर कुबूल त रहबे कइल हमरा। तोहरा एकदिन लागल कि हमार नौकरी छोटहन बा त तूं एगो बड़हन कंपनी के चेयरमैन से कह के हमरा के बढ़िया नौकरी पर लगवा दिहलू। बढ़िया सेलरी का साथे कंपनी का तरफ से हमरा कार वगैरह के सुविधो हो गइल। हमरा से बेसी खूश तूं हो गइलू। अइसने अनेके छोट-मोट सुविधन से तूं हमरा के लादत गइलू। कहे ला त हम बहेलिया रहनी, तूं चिड़िया। अइसन तूंही कहत रहलू। बाकिर अब चिरई के जाल में बहेलिया रहुवे। कवनो बहेलिया का जाल से चिरई त तबहियों निकल सकेले। केहू निकाल सकेला। बाकिर चिरई के जाल से निकालल ?

नामुमकिन।

केही मानिये ना सके कि चिरइओ जाल बिछा सकेले त भला निकली कइसे। निकले के सोचबो कइसे करी ? बाकिर तूं जाल रहलू। पानी का निचहीं, पानी का ऊपरो।

तोहरा अफ़सर पति का लगे तोहरा ला समये ना रहल। बेटा कहीं बाहर पढ़त रहुवे। त तोहरा कवनो मरद का साथे समय बितावे के तलब लागल। हमरा जइसन मछुआरा से बढ़िया के भेंटाइत तोहरा । बेक़रारी में पहिले इसरार करतू। क़रार आवे लागल त आहिस्ता-आहिस्ता तूं हुकुम देबे लगलू। एहिजा आवऽ। ओहिजा आवऽ। त कबो घरहीं आ जा। हमरो नीक लागत रहल तोहार ई बोलहटा। लागे जइसे तोहरे ला जनमल होखीं हम। तूंही हमार जिनिगी हऊ। तूंं ही हमार मकसद। तूं ही हमार सब कुछ। सर्वस्व तूंही। नितांत निजी मौकनो पर तूं हमरा के अइसे दुलरावत रहलू जइसे हमार तोहार दूध पिअना बेटा होखीं। तूं हमार महतारी। तोहरा गोदी में पटाइल, खेलल आ तोहरा के पावल हमार सौभाग्य बन गइल रहल जइसे। मन ही मन भगवान के पूजल करीं हम। लाख-लाख शुक्रिया दिहल करीं। तूं अतना खिआवत-पिआवत रहलू कि हमरा ख़ुद अपने से जरतवाही होखे लागल रहुवे।

तूं शायद शहर के गिनल-चुनल सुन्नर मेहरारुवन में रहलू। धनवानो रहलू। सलीक़ेदारो। एहू ले बड़ बात रहल कि हमार सौभाग्य बन के हमरा जिनिगी में हाजिर रहलू। तोहरा जतना सुख हमरा कवनो दोसर मेहरारू ना दिहलस। कबो उहो दिन रहल कि तोहरा के देखिये के खुश रहल करीं। तोहरा के छूए से डर लागल करे। बाकिर ऊ कहल जाला नू कि, सरकती जाए है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता आहिस्ता। हमरो डर आहिस्ता-आहिस्ता सरकत गइल। एक दिन तोहरा के सहसे छू लिहनी। अइसे जइसे कवनो अँजोरिआ के छू लिहले होखीं। कवनो बहत वेगवती धारा के थाम लिहले होखीं। समय के शिला बना दिहले होखीं। समय जइसे थथम गइल होखो। मन में एगो नया मिठास जस घोरा गइल। अइसन स्वाद मिलल जइसन पहिले कबो ना मिलल रहुवे। सोना-चांदी जइसन दिन हो गइल। बाकिर ऊ कहाला नू कि इश्क़ आ मुश्क लुकवले ना लुकाव। ऊपर से तोहरा सुन्दरता के सुगंध वइसहीं केहू से लुकाइल ना रहल। इश्क़ के सुगंधो ना छुपल। इश्क़ रहल कि कुछ अउर, ई तब ना तोहरा पता रहल, ना हमरा। बाकिर लोग-बाग के बहुते कुछ मालूम हो गइल रहल।

हमार तोहार आशिकि के खबर तोहरा मरदो ले चहुँपल। अइसन एक बेर तूंही बतवले रहलू। हमार लागल कि तूं अब हमरा से बिलग हो जइबू। दूर हो जइबू, ई डर लागे लागल रहल। बाकिर देखनी कि अब तूं हमरा के लेके बहुते पजेसिव रहे लागल रहलू। अतना कि हमहीं परेशान होखे लगनी। कई बेर कवनो ड्रोन कैमरा का तरह काम करत रहलू तूं। हमार अतना कुछ तोहरा जानकरी में रहल करे। जाने कतना जासूस रहलें तोहरा लगे। खास कर अगर शहर में कवनो मेहरारू से हमार भेंट हो जाव त तोहार जासूसी देखल बने। बुझाव जइसे केहू तोहार द्वारिका लूट ले गइल होखे। बुझइबे ना करे कि तूं अतना पजेसिव काहे रहलू ?

हम रहनी के तोहार ?

तोहरा प्यार के साम्राज्य के एगो मामूली नागरिक ?

तोहार प्यार हमरा मे उछाल मारल करे। बाकिर तोहार साम्रज्यवादी रवैया काट खात रहुवे। तोहार ज़रूरत से अधिका पजेसिव रहल हमरा बाउर लागे रहल। कवनो किडनैपर जइसन व्यवहार हो गइल रहुवे तोहार। खुल के त ना बाकिर चुपचाप तोहरा हुकुम के तामील करे से बाचे लगनी। नतीजा भइल कि आफिस में हमरा बेवजह के नोटिस मिले लागल। अचानके इंक्वायरी शुरू हो गइल। एगो दोस्त से तूं खबर पेठवलू कि कि आ के हमरा से मिलऽ। सब ठीक हो जाई। दोस्त ई सब हमरा से कहलसि आ बतवलस कि, ‘भाभी जी से जा के भेंट काहें नइखऽ कर लेत? शायद ठीक करवा देस।’ हम ओकरा के बतवनी कि, ‘भाभिए जी ई सब करवा रहल बाड़ी।’ त ओकर माथा ठनकल। बोलल, ‘ का कहत बाड़ऽ ? ‘ हम कहनी , ‘ ठीके कहत बानी।’ कह के फ़ोन रख दिहनी। शहर में अधिकतर लोग तोहरा पति के प्रतिष्ठा आ तोहार सुंदरता देखत तोहरा के भाभी जी कहल करे। हमहूं सबका सोझा तोहरा के भाभिए जी कहल करीं। बाकिर कहल जाला नू कि हुस्नो इश्क़ के संगम कहिया ले ? बुझाए लागल कि अब हमार सफर खतम होखे वाला बा। एहू चलते कि तूं बिसरा दिहले रहलू कि जुल्म आ जबर से काम ना चले। तोहार नइखीं जानत बाकिर हम एह राह के नया मुसाफिर रहनी। चाहत का चोट से अब बचाव के तरकीब खोजे लागल रहनी। कुछ दूर साथ चल के हमनी का बिछड़े वाला मोड़ पर खड़ा हो गइल रहनी सँ। तोहार एगो वाट्सअप संदेश के जवाब भेज दिहले रहनी : ‘ सगरी भाव , सगरी भावना , भंगिमा आ सगरी संभावना गोमती में विसर्जित कर के तोहरा के आजाद कर के अपनो के आजाद कर लिहले बानी। बहुते जी लिहलू तूं हमरा के।’ तुम्हारा रिप्लाई आइल रहे , ‘ सब भूला द। लव यू ! प्लीज आ जा !’

बाकिर हम ना गइनी तोहरा से मिले। तूं कुछ अउर लोग से सनेसा पठवलू। हम खामोशे रहनी। तूंं हमरा के फोन पर, वाट्सअप पर वाट्सअप संदेश भेजल करऽ कि एक बेर त आ के मिल ल। हमरा घरहू गइल रहलू एक दिन। संजोग से हम रहनी ना तब। घरे चहुँपला पत तोहरा अइला के खबर मिलल रहल आ मिल लेबे के सनेशो। ना गइल रहनी तोहरा से मिले। कड़ेर हो गइल रहनी। कह सकेलू निर्मोही। आख़िर हम रहनी के तोहार?

प्रेमी ? सेक्सटीशियन ? जिगोलो ?

ना जानत रहनी कि तोहरा से, तोहरा प्यार से बगावत अतना भारी पड़ जाई। दोसरा दिने पता चलल कि तूं अपना हाथ के नस काट लिहले बाड़ू। अस्पताल ले गइल लोग। डॉक्टर मरल घोषित कर दिहलें। तोहरा मरद के रूआबो कुछ कामे ना आइल। तूं आत्म हत्या करे से पहिले लिख गइल रहलू कि हम तोहरा से मिले ना अइनी, एहसे तूं दुनिया से जात बाड़ू। तोहार मरद फोन कर के हमरा के बतवलस आ डपटत कहलस, ‘ अतना बिजी रहलऽ कि अइलऽ ना ? ‘ जोड़ले रहस, ‘ तूं हमरा पत्नी के हत्यारा हउवऽ ! ‘


हम घर छोड़ के ना गइनी कहीं। पुलिस के आवे के इन्तजार कइनी। पुलिस ना आइल। वाट्सअप पर तोहरा अंत्येष्टि के समय के जानकारी आइल। गइनी। लोग बाग हमरा के घूरलन। बाकिर हम एकर परवाह ना कइनी। तोहरा मरद के अँकवारी में भरत तोस दिहनी। पुक्का फाड़ के रोवनी। उहो रोवलस। एक दोसरा के ढाढस बधवनी जा। तोहरा पार्थिव शरीर पर फूल चढ़ा के तोहरा के अंतिम प्रणाम कइनी। राखल चाहत रहनी फूल से तोपाइल तोहरा गाल पर आपन गाल आ रोवल चाहत रहनी तोहरा देह से लिपट के। बाकिर लोग के आँख धधकत रहुवे। मसानघाट पर प्यार से बड़ होला लोकलाज। से रुक गइली। तोहरा गोड़ पर माथ रख के अपना लोर के जलअर्पण कइनी। जइसे सूरज के अरघ दिहले होखीं। तू हमरा प्रेम के सूरजे त रहलू। हमरा के प्यार के चांदनी में नहावत हमार चंद्रमो रहलूी तूं। लागल जइसे तोहरा धधकत चिता में हमहूं जरत बानी। तूं त अग्नि आ पानी मे समा गइलू। तोहार अस्थियो बहा दिहल गइल कवनो दोसरा पानी में समाए ला। का पता बहत-बहत सागर के पानी मे मिल जा। गंगासागर में। पानी बदले के अभ्यास बा तोहरा। बाकिर तोहरा मन के ई मछुआरा अब कहवाँ जाव। तोहरा प्रेम जाल से कइसे निकलीं ? कतना अभागा बानी, अपराधी बानी कि तोहरा प्यार, तोहरा चाहत के कद्र ना कर पवनी। अपना के समर्पित ना कर पवनी। तोहार मरद ठीके कहलन कि हम तोहार हत्यारा हईं।


(दयानंद पांडेय के लिखल हिंदी कहानी के भोजपुरी अनुवाद)

अंजोरिया डाट काम से साभार 

1 comment:

  1. निश्छल प्रेम। शानदार लेखन

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