Saturday, 26 December 2015

मैं आऊंगा चोटों के निशान पहने कभी



मित्र पंकज सिंह नहीं रहे , इस ख़बर पर बिलकुल यकीन नहीं हो रहा। कुछ खबरें ऐसी होती हैं जो धक से लग जाती हैं कि अरे ! यह ऐसी ही ख़बर है । बहुत सारी यादें हैं । फ़िल्मकार प्रकाश झा और उन के साथ गुज़री कुछ न भुला पाने वाली साझी यादें हैं । दिल्ली में जब रहता था , तब की मुलाक़ातें हैं । लखनऊ की मुलाक़ातें हैं । मदिरा में भीगी हुई रातें हैं । फ़ेसबुक की बातें हैं । भाषा और शब्दों के प्रति अतिशय सतर्क रहने और सचेत करने वाले पंकज सिंह कामा और पूर्ण विराम तक की संवेदना को समझते थे , बहुत शालीनता से समझाते भी थे । लेकिन अभी कुछ भी कह पाने का दिल नहीं हो रहा। मुझ से कुल दस साल ही बड़े थे । यह भी कोई जाने की उम्र थी भला ? मैं आऊंगा चोटों के निशान पहने कभी लिखने वाले भी जानते हैं कि जाने के बाद कोई नहीं लौटता। सर्वदा कविता के सुखद आनंद में जीने वाले पंकज सिंह को उन की ही कविता में विनम्र श्रद्धांजलि !




गेरू से बनाओगी तुम फिर
इस साल भी
घर की किसी दीवार पर ढेर-ढेर फूल
और लिखोगी मेरा नाम
चिन्ता करोगी
कि कहाँ तक जाएंगी शुभकामनाएँ
हज़ारों वर्गमीलों के जंगल में
कहाँ-कहाँ भटक रहा होऊंगा मैं
एक ख़ानाबदोश शब्द-सा गूँजता हुआ
शब्द-सा गूँजता हुआ
सारी पृथ्वी जिसका घर है
चिन्ता करोगी
कब तक तुम्हारे पास लौट पाऊंगा मैं 

भाटे के जल-सा तुम्हारे बरामदे पर
मैं महसूस करता हूँ
तुलसी चबूतरे पर जलाए तुम्हारे दिये
अपनी आँखों में
जिनमें डालते हैं अनेक-अनेक शहर
अनेक-अनेक बार धूल
थामे-थामे सूरज का हाथ
थामे हुए धूप का हाथ
पशम की तरह मुलायम उजालों से भरा हुआ

मैं आऊंगा चोटों के निशान पहने कभी

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