Sunday, 6 December 2015

जैसे मां की याद में डूबी यह कविताएं , कविताएं न हों मां की लोरी हों

दयानंद पांडेय

मेरी नायिका में संग्रहित कविताएं एकालाप में डूबी कविताएं हैं । लेकिन इन कविताओं में रह-रह कर मां , पिता ,  और अन्य लोग भी ऐसे मिलते रहते हैं गोया वह किसी नदी में डूब रहे हों और रह-रह कर पानी में से एक गहरी छटपटाहट  के साथ बाहर भीतर होते दीखते हैं । प्यार की बयार भी बादर बन कर बहती मिलती है । अर्चना की इन कविताओं की छटपटाहट की असल ताप और सहज संवेदना भी इसी अर्थ में मिलती हैं जैसे अंगुलियां गुनगुने पानी में तिर जाएं और मन को एक गहरा सुकून दे जाएं :
अब तो मां की कही बात भी झूठी लगती है
कि प्यार में होता है रब का वास,
ये मेरे आंसू ही तो मेरे अपने थे
जो बहकर कुछ ढाढ़स तो बंधा देते थे
अब तो वो भी बहने से इनकार सा ही करते हैं,
तुम ऐसे तो कभी नहीं गए पहले
हमेशा आने को बोलकर जाते थे
जाकर वापस नहीं आना था कोई बात नहीं
इतना तो बोलकर जाते कि मै इतंजार न करूं

मां बहुतरे लोगों की नायिका होती हैं पर अर्चना की इन कविताओं में मां का नायिका रूप कुछ विरल है , कुछ सरल भी। अर्चना की कविताओं में मां की याद और उस की दस्तक में डूबी एक अनगूंज और उस की यातना निरंतर गश्त करती मिलती है। मां पर बहुतेरी कविताएं लिखी गई हैं पर मां को ले कर ऐसी दैनंदिन कविताएं पहले नहीं पढ़ीं । अर्चना की कविताओं में मां की उपस्थिति मंदिर की घंटियों की तरह है जो लगातार रुनझुन-रुनझुन बजती मिलती है। ऐसे जैसे यह कविताएं मां की आरती में न्यस्त हों । अर्चना की कब किस कविता में मां की परछाईं अचानक उभर कर हिलने लगे , मिलने लगे , शायद यह अर्चना भी नहीं जानतीं । तो क्या यह कविताएं मां से एक अंतिम समय बात न कर पाने के प्रायश्चित में लिखी गई कविताएं हैं ? कि उठते-बैठते , जागते-सोते , कविताओं में मां की हंसी, आंखें , उस का यह , उस का वह उस की विवशता,  उस का तैयार होना , उस का पल्लू , उस का जेवर , उस की सांस-सांस इन कविताओं में समाई मिलती है । उस की हर आहट अर्चना की कविता में दर्ज है जैसे किसी सलाई में स्वेटर का फंदा:

मां तो हर रोज़ यही कहती है कि
इस बार जब कबाड़ वाला आएगा
इन टूटती यादों को उसे सौंप देना,
सब कुछ फिर से नया नया हो जाएगा

कई बार लगता है कि जैसे अर्चना यह कविताएं नहीं लिख रही हैं ,मां को तर्पण लिख रही हैं ,मां को उन की यादों में भिंगो कर उन की लोरी उन्हीं को सुना रही हैं। तेरा तुझ को अर्पण जैसा कुछ! 


बस फर्क इतना ही तो है
तब मै मां की गोदी में हुआ करती थी
और अब मां मेरी गोद में है

 शायद इसी लिए मेरी नायिका में अर्चना की इन कविताओं में मां लगातार आती रहती हैं , उन की याद आती रहती हैं । जैसे मां की याद में डूबी यह कविताएं , कविताएं न हों मां की लोरी हों , मां की प्रतिछाया हों;

आजकल छत पर भी कबूतरों का आना जाना कम सा हो गया
कुछ रोज़ पहले तक तो ये हर रोज
मां का हाल पूछने आ जाया करते थे

ज़िंदगी की इबारत और उस की सीवन को उधेड़ती-बुनती अर्चना की कविताएं कई बार जैसे शीशे की किरिच सी चुभन भी देती मिलती हैं और उस में लहू-लुहान हो कर लथ-पथ ऐसे निहारती हैं गोया वह इन घाव के पैबंद बन जाना चाहती हों :

तुम्हारे जाते हुए पैरों के निशान
अभी भी पायदान पर ज्यों के त्यों
बगीचे का झूला भी तुम्हारे बारे में बातें करता है


अर्चना की इन कविताओं में कोई इधर-उधर की और कि व्यर्थ की तोड़-फोड़ नहीं है , न ही दिखावटी मुहावरे और शिल्प की गुहार है । मन की अनगिन परतें हैं जो अनायास प्याज की तरह परत दर परत खुलती जाती हैं। बर्फ बन कर जमती जाती हैं । अर्चना के यहां संबंधों की बर्फ उदास नहीं करती , उदास अर्थ में नहीं मिलती , वह तो बर्फ की तरह जम कर शाश्वत बन जाना चाहती है । पर क्या कीजिएगा  बर्फ तो बर्फ ठहरी , पिघलेगी भी । तो अर्चना की कविताओं में भी संबंध पिघलते रहते हैं , तरल हो कर मिलते रहते हैं । इतनी कि मुहब्बत भी कब खंडहर होती जाती है ,पता नहीं चलता । यह जो खंडहर होने का डर है , इस की यातना और इस यातना का जो निरंतर गश्त है यही अर्चना की कविताओं की ताकत है । जो बिना किसी फूल-पत्ती के , बिना किसी बनाव-श्रृंगार के कविताओं को सुंदर बना देता है :

हे प्रभु हर जन्म में तूने भी मुझ से छल किया
अहसास तो मुझ को दे दिया पर रुप मेरा हर लिया,
मेरे साथ कितनी सदियों से हर जन्म में अत्याचार होता रहा
किन्तु हर बार अभियोगी बाइज़्ज़त हो जाता है बरी

यह जो जीवन की उथल-पुथल है अर्चना की कविताओं में कि यह कविताएं अपने आप में एक घटना बन जाती हैं । फिर यह घटनाएं इस सादगी से घटित होती हैं और बिना किसी शोर शराबे के जीवन में दाखिल होती हैं और किसी आलपिन की तरह चुभती हुई जैसे ज़िंदगी की खरखराहट को एक नए भूगोल में दर्ज करती मिलती हैं :

काश, ये बादल एक बार जमकर बरस जाते
फिर ये अधबुझे अलाव सुलगते तो न रहे होते।

टुकुर-टुकुर ताकते कबूतरों जैसा टटकापन लिए अर्चना की यह कविताएं प्रीति के चादर में भी लिपटी सिलवटें और इन सिलवटों की गवाही दर्ज करती आश्वस्त करती रहती हैं : 
 
जो मैं शब्द लिखती हूं
और तुम कह देते हो जाल बुनती हूं।

इन कविताओं में कहीं गहरे एक विश्वास की आंच भी न्यस्त है :

तुम जब जाओगे तो लौटकर भी जरूर आओगे,
तुम वापस लौटकर आने के लिए ही तो जाते हो
ये मौसम भी तो दोबारा आने के लिए ही जाते हैं।

अर्चना की इन कविताओं में पिता भी हैं और प्रेमी भी । आम भी है , ओस भी।, गांव भी है और चांद भी । रिश्ते और सपने भी । बरगद और उस की उदासी भी । चंदन, समर्पण , नींद , निहारना , झूला सब । तमाम याद और तमाम अन्य व्यौरे भी । लेकिन मां जैसी आकुलता , मां जैसी विह्वलता इन सब में नहीं है । मेरी नायिका की सारा दुलार , सारा भाव और सारा मनुहार नायिका मां में जितना न्यस्त और न्यौछावर है उस के आगे सब सून है । सब के सब मां के आंचल में समा जाते हैं । अर्चना श्रीवास्तव को उन के इस पहले कविता संग्रह के लिए अशेष शुभकामनाएं । वह और अच्छा लिखें , और जल्दी उन का दूसरा संग्रह भी आए तो अच्छा लगेगा । 

 [ मेरी नायिका की भूमिका ]


 
मेरी नायिका
कविता संग्रह

पृष्ठ 137 , मूल्य 350 रुपए 
प्रकाशक 
इंडियन बुक बैंक
आई -2 / 16 में अंसारी रोड , दरियागंज 
नई दिल्ली-110002

 

 



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