Thursday, 31 May 2012

अनिल यादव, अब ऐतराज भी सुनिए

दयानंद पांडेय

कहानी का साजन तो उस पार था : माफ़ करिए डियर अनिल यादव क्योंकि ''...क्योंकि नगर वधुएं अखबार नहीं पढतीं'' को लेकर अभी तक आप प्रार्थना सुन रहे थे, अब ऐतराज़ भी सुनिए। अव्वल तो इस विषय की स्थापना ही बसियाई हुई है। आप जानिए कि आज की नगर वधुएं अखबार ही नहीं, इंटरनेट भी बांचती हैं। यकीन न हो तो आप कुछ साइटों पर जाइए, बाकायदा उनकी प्रोफ़ाइल की भरमार है, किसिम-किसिम की फ़ोटो, व्योरे और देश, शहर सहित। डालर फूंकिए और इस नरक में कूद जाइए।

चैटिंग में भी आप को यह नगर वधुएं मिल जाएंगी। नेट पर भी और मोबाइल चैट में भी। नगर वधुएं अब हाइटेक हो चुकी हैं कि सिस्टम ने बना दिया है, दोनों ही बातें हैं। अखबारों में मित्र बनाने के विज्ञापन का रैकेट भी इन्हीं नगर वधुओं का विस्तार है। इस छल-कपट में लुटे-पिटे लोग बहुतेरे मिल जाएंगे। रही बात मंडुवाडीह की तो सुनते हैं मंडुवाडीह का शिवदासपुर तो अब भी आबाद है। कोई बिल्डर, कोई सिस्टम अभी हिला नहीं पाया है। खैर। कहानी पर आते हैं।

विषय निश्चित ही तलवार की धार पर चलने वाला है। और अच्छी बात यह है कि अनिल ने इसे शुचितावादियों के आक्रमण से बचा लिया है। मतलब इसे अश्लीलता की रेखा भी नहीं छूने दी है, बस एक कविताई को छोड़ कर। पर दिक्कत यह है कि इस बहाने कई मह्त्वपूर्ण चीज़ें गुम हो गई हैं। बहुतेरे लोग जानते हैं- रांड़-सांड़-संन्यासी की काशी को। और कि वहां नगर वधुओं को बसाने में कुछ राजाओं और पंडों का खासा योगदान भी। अनिल उनको भी फ़्लैशबैक के बहाने बांच सकते थे, नहीं बांचे। बांचे होते तो इस कथा में काशी का वैभव और उस वैभव में नगर वधुओं का लगा पैबंद और भी लोमहर्षक बयान लेकर उपस्थित होता।

आज़ादी के तुरंत बाद १९४७ में जब पंडित नेहरू ने देश भर में वेश्यालयों को शहर से बाहर करने की मुहिम शुरू की थी तब काशी का चौक कैसे बचाने के लिए लोग सामने आए, खासकर कुछ संगीत की दुनिया के लोग। दालमंडी की उपकथा भी जुड़ सकती थी, फिर कैसे बसा मंडुवाडीह! वगैरह-वगैरह का जोड़-घटाना इस कथा को और समृद्ध बना सकता था।

जाने क्यों यह कहानी पढ़ते समय एक फ़िल्मी गाना भी लगातार याद आता रहा- नदी नारे न जाओ श्याम पैंया परूं ! इसी गाने में एक बंद है- बीच धारे जो जाओ तो जइबै करो, उस पारे न जाओ श्याम पैयां परूं! तो कुल मुश्किल यही है कि अनिल इस कहानी में नदी के किनारे-किनारे ही घूमे-घुमाए हैं। न बीच धारे गए-ले गए हैं, न उस पार ले गए हैं। ले जाना चाहिए था। क्योंकि कहानी का साजन तो उस पार ही था। जो उसे मिला नहीं। कहानी अधूरी रह गई।

माफ़ करिए मित्रों, मैं अपनी बात कहने के लिए एक पाठक के पत्र की याद करना चाहता हूं। बहुत पहले संभवतः १९८२ में दिनमान पत्रिका में कवि समीच्छक विनोद भारद्वाज ने दिल्ली में चल रहे देह व्यापार पर एक आमुख कथा लिखी थी और बताया था कि ऐसी भी लडकियां हैं जो एक रात के दस हज़ार रूपए लेती हैं। तब का दस हज़ार आज दस लाख रूपए में इस देह बाज़ार में बदल चुका जानिए। बहुत लोगों की तब साल भर की तनख्वाह भी साल भर की दस हज़ार रूपए नहीं होती थी। खैर तब एक पाठक ने दिनमान को चिट्ठी लिख कर कहा था कि ठीक है लडकियां एक रात के दस हज़ार रूपए लेती हैं पर वह हैं कौन लोग जो एक रात के दस हज़ार रूपए खर्च कर देते हैं? और अनुरोध किया था कि कृपया इन लोगों के बारे में भी एक स्टोरी छापें।

दिनमान ने उस पाठक का पत्र तो छाप दिया लेकिन उस के अनुरोध पर खामोशी मिली। एक पूंजीवादी पत्रिका में वैसे भी हिम्मत की कमी होती है, कैसे छापती भला उन सफ़ेदपोशों के बारे में जो एक रात के दस हज़ार किसी देह पर लुटा देते थे। उन लोगों के बारे में, जिन पर सिस्टम टिका है, न्यौछावर है ! पत्रिका और पत्रकार न सही पर एक कहानीकार तो यह काम कर ही सकता है। अनिल यादव तो कर ही सकते थे। उन के पास भाषा भी थी, हिम्मत भी। पर जाने क्यों वह नदी के किनारे-किनारे ही टहल-टहला कर छुट्टी ले बैठे? एक डीआईजी इस सिस्टम में क्या होता है? बच्चों के खेलने वाले साइकिल के टायर से ज़्यादा कुछ नहीं। उसकी हैसियत ही क्या होती है? काशी जैसे नगर में?

कहानी इस बात की चुगली ज़रूर खाती है कि अब पूरा शहर ही वेश्यालय में तब्दील हो चला है। सच यह है कि दुनिया के सारे शहर अपनी पूरी उपस्थिति में अब वेश्यालयों में तब्दील हैं। यह ठेकेदारी, यह मैनेजमेंट बिना औरतबाज़ी के चलता ही नहीं। यह राजनीति, यह फ़िल्म, यह समाज भी नहीं चलता। अब लोग दो ही चीज़ देखते हैं। या तो क्रिकेट या लड़कियों का डांस। कहानी में निचले दर्जे की लगभग रिटायर और बूढी वेश्याओं की यातना के तार ज़रूर ठीक से छुए गए हैं, उनकी उधड़ी तिरूपन दिखाई भी देती है। बिल्डरों और सत्ता की सीवन भी उसी तरह जो उधेड़ी होती तो बात में और ताब आया होता। सी. अंतरात्मा की यातना की कैफ़ियत को भी और कातना चहिए था। एक रिपोर्टर सारे तथ्य हाथ में होने के बावजूद किसी दबाववश सही खबर नहीं, लिख छाप सकता। जैसा कि यहां फ़ोटोग्राफ़र प्रकाश के साथ होता भी है और कि वह लांछन भी भोगता है। पर एक कहानीकार? सब कुछ जान कर भी? (यहीं आचार्य चतुरसेन शास्त्री की गोली की याद आ जाती है। फासिस्ट आलोचकों की साज़िश भले चतुरसेन शास्त्री को खारिज़ करती रहे पर नारी विमर्श पर हिंदी में इस से सशक्त उपन्यास या कथा अभी भी दुर्लभ है। गोली मतलब दासी। बंधुआ। पीढी दर पीढी की बंधुआ दासी। छुपे शब्दों में लगभग वेश्या। राजाओं और उनके कारिंदों के लिए। जब धारावाहिक रूप से गोली साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपी थी तब चतुरसेन शास्त्री पर दबाव, धमकी और लांछन सभी अपनी पूरी ताकत के साथ उपस्थित थे। ब्लैकमेलर तक कहा गया था उन्हें। पर वह झुके नहीं थे)

अखबार का प्रबंधन अब अखबार को पाठकों के लिए नहीं, अपने विज्ञापनदाताओं, अपनी तिजोरी, और अपने एसोसिएट्स के लिए छापता है, यह हकीकत भी उभर कर सामने नहीं आ पाई है इस कहानी में। कुल मिला कर यह जो व्यवस्था नाम की वेश्या है, अनिल यादव उस को उजाड़ नहीं पाए हैं। तोड़-फोड़ तो खूब की है पर वह जो कहते हैं कि सीधी चोट, वह इस कहानी में अनुपस्थित दिखती है। और यह जो भडास4मीडिया के संपादक हैं यशवंत सिंह, कंडोम गुरु का काम कर गए हैं। सेक्स में कंडोम को मैं स्पीड ब्रेकर मानता हूं। सारा मज़ा सत्यानाश कर देता है। इस कहानी को छोटी-छोटी किश्तों में परोस कर यशवंत सिंह ने यही किया। स्पीड ब्रेकर का काम। एक साथ दे सकते थे। ज़्यादा से ज़्यादा दो किश्त। गनीमत बस यही रही कि जल्दी-जल्दी दिए। महीनों नहीं लगाया। लगाते तो निरोध गुब्बारा हो जाता।

डियर अनिल यादव फिर भी बधाई तलवार की धार पर चढ़ कर यह कहानी कहने के लिए। बस थोड़ी जल्दबाज़ी से बचना चाहिए था और कि चटकीली हेडिंग की पैकेजबाज़ी से भी। आमीन!

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