Friday, 18 May 2012

स्त्री स्वतंत्रता और उस की अस्मिता को सही संदर्भों और अर्थों में पहचानने की एक सशक्त कोशिश

नमिता सुंदर

दयानंद पांडेय का उपन्यास बांसगांव की मुनमुन स्त्री स्वतंत्रता और उस की अस्मिता को सही संदर्भों और अर्थों में पहचानने की एक सशक्त कोशिश है। ऐसे अहम् मसलों पर चर्चा और बहस तो बड़े-बड़े शहरों के वातानुकूलित सभागारों में हो सकती है, जोशीले भाषण दिए जा सकते हैं, जुलूस निकाले जा सकते हैं पर इस सब आंदोलनों का समस्या की जड़ या उस के समाधान से कोई वास्ता नहीं होता, यह हम इतने दशकों के अनुभव से जान चुके हैं। औरत स्वतंत्र तब तक नहीं हो सकती जब तक उस का खुद अपनी सामर्थ्य पर विश्वास नहीं होता और यही विश्वास पुरजोर रूप से दिलाती है बांसगांव की कस्बाई माटी में पली बढ़ी मुनमुन।

सच पूछिए तो मुनमुन कोई काल्पनिक चरित्र नहीं है, अकेले अपने दम पर अपनी और दूसरों की भी लड़ाइयां लड़ने वाली ऐसी महिलाएं हमारे गांव, कस्बों में हर पीढ़ी में होती हैं, पर हां उन की आपबीती, उन का संघर्ष अकसर गांव-घर में दफ़न हो कर रह जाता है। मुनमुन की आवाज़ में हमें अपने आस-पास घूमती आवाज़ों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ती है जिन्हें बिना सुने ही चुप करा दिया जाता रहा है।

मुनमुन का संघर्ष पुरुषों की बराबरी का दर्जा पाने या अपने औरत होने के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाने मात्र का नहीं है वरन उस की लड़ाई अपने आप को एक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करने की लड़ाई है और सच पूछिए तो हर औरत को यह समझना चाहिए कि यही मांग उस की स्वतंत्रता और सम्मान का आधार है।

मुनमुन का जुझारूपन, उस की ललकार और दबंगई में एक अजब सा आकर्षण है। उसे अपनाने की हिम्मत न जुटा पाएं तो उसे नकारना भी संभव नहीं है। एक औरत के इर्द गिर्द घूमने के बावजूद इस उपन्यास का सरोकार केवल नारी से जुड़े हुए ही मुद्दे नहीं है। हमारे बदलते सामाजिक परिवेश, भौतिक सफलता के संग मानवीय संबंधों में पनपती क्रूरता की हद तक की संवेदनहीनता, शहरी चकाचौंध के बढ़ते आकर्षण के चलते गांव, कस्बों में ढहती चौखटों के संग ढूह होते बुजुर्गों की व्यथा की भी अभिव्यक्ति भीतर तक सोचने को मजबूर करती है।

लेखक की भाषा और शैली ने कहानी के परिवेश को पाठक के लिए सजीव बनाने में खासा सहयोग दिया है। कस्बाई माटी में पले बढ़े पात्रों का व्यक्तित्व, उनकी मानसिकता, भावनाओं के उतार-चढ़ाव उन्हें पाठकों के लिए विश्वसनीय बना देते हैं। कुल मिलाकर यह ऐसा उपन्यास है जिससे आप स्वयं को जुड़ा हुआ पाएंगे, जो आप को झकझोरेगा, दुखी करेगा, शर्मसार भी करेगा लेकिन कहीं यह विश्वास भी दिलाएगा कि रात कितनी भी लंबी हो, उस की सुबह होती है।

समीक्ष्य पुस्तक:

बांसगांव की मुनमुन
पृष्ठ सं.176
मूल्य-300 रुपए

प्रकाशक
संस्कृति साहित्य
30/35-ए,शाप न.2, गली नंबर- 9, विश्वास नगर
दिल्ली- 110032
प्रकाशन वर्ष-2012

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