Saturday, 23 May 2026

मेलोनी से आगे क़िस्सों की दुनिया और भी है

दयानंद पांडेय


अभी इस भरी गर्मी में मोदी और मेलोनी की चर्चा , कुचर्चा में लोग व्यस्त हैं l बुरी तरह l लोग भूल गए हैं कि कभी राजीव गांधी और बेनज़ीर भुट्टो पर भी कहानियां चलीं l तब के समय सोशल मीडिया नहीं था l राजीव गांधी के भारतीय किस्से भी बहुत थे l पर किस्से थे कि थमते नहीं थे l इतना ही नहीं , इंदिरा गांधी को ले कर भी अनेक किस्से चले l ब्रेजनेव, रीगन , फ़िदेल कास्त्रो आदि के साथ इंदिरा गांधी की भी चर्चा और कुचर्चा हुई l दिल्ली के मोहन सिंह प्लेस काफ़ी हाऊस के बाथरूम में किसी ने इंदिरा गांधी और ब्रेजनेव के कई पॉकेट स्केच कोयले से बना रखे थे l लोग आनंद लेते थे l कुछ नाराज भी रहते थे l यह अस्सी का दशक था l इंदिरा गांधी के भारतीय क़िस्सों का तो पूछिए मत l संजय गांधी इन सब में सब से आगे l इन किस्सों में हकीकत भी है l क्यों कि बिना आग के धुआँ नहीं होता l

भारत क़िस्सों का देश है l

ऐसे तमाम पौराणिक और ऐतिहासिक किस्से आज भी हवा में तैरते और सांस लेते हैं l भारतीय राजनीति में तो सरोजनी नायडू , तारकेश्वरी सिन्हा तक से जुड़े अनेक किस्से हैं l गांधी, नेहरू , फिरोज गांधी , लोहिया, मोरारजी देसाई , अटल बिहारी वाजपेयी , चंद्रशेखर, नरसिंहा राव , जार्ज फ़र्नांडीज़, नारायण दत्त तिवारी, एन टी रामाराव, रामचंद्रन, जय ललिता, ममता बनर्जी, सोनिया गांधी , कल्याण सिंह , मुलायम, लालू , कांशीराम, नीतीश, मायावती, उमा भारती, राहुल गांधी , अखिलेश यादव , तेज प्रताप, तेजस्वी आदि के अनेक किस्से भी कहे सुने जाते हैं l बहुत कम लाल बहादुर शास्त्री , दीनदयाल उपाध्याय , नाना जी देशमुख या योगी आदित्यनाथ होते हैं जिन के ऐसे किस्से नहीं होते l टैगोर, सुभाषचंद्र बोस तक के किस्से हैं l अन्य अनेक भी l हर हलके में l वह कहते हैं न :

हम हुए तुम हुए कि मीर हुए
सब इसी ज़ुल्फ़ के असीर हुए l

लंबी फ़ेहरिस्त है l

मोदी , मेलोनी के पहुनवा राघो की मेलोडी !

दयानंद पांडेय


हम जब बच्चे थे कुछ वाक़ये ग़ज़ब घटते थे l जब अम्मा के साथ बैलगाड़ी से ननिहाल जाते थे तो चलते समय गांव में हमारे बाबा यानी पितामह बड़े प्यार से मुस्कुराते हुए कहते थे कि बाबू अपनी नानी से कहना कि तैयार रहेंगी, हम जल्दी ही उन्हें विदा कराने आने वाले हैं l उधर से वापस आते समय, नाना कहते कि नाती अपनी इया यानी दादी से कहना कि हम जल्दी ही उन को विदा कराने आ रहे हैं l और हम किसी कबूतर की तरह बाल सुलभ अंदाज़ दोनों को यह संदेश दे देते थे l सुन कर इधर इया हंसतीं, उधर नानी हंसतीं l

ग़ज़ब तो तब होता जब ननिहाल का हलवाह , नाई या कहार बड़े प्यार से कहता कि फूफा कहो l ददिहाल में भी यही लोग कहते मौसा कहो l हम किसी छोटी मोटी लालच में आ कर कह देते l तो पाता कि अम्मा दोनों तरफ़ नाराज हो जाती l दुखी हो जाती l ददिहाल में भी , ननिहाल में भी l बात तब समझ नहीं आती थी l कि माजरा क्या है ?

इसी तरह गांव के कुछ चाचा लोग फुआ पक्ष के लोगों को देखते ही कहते थे , पहुना कहो ! पहुना मतलब बहनोई ! मतलब दामाद ! ननिहाल पक्ष के लोग तो लोग पहुना कहते ही थे l गांव में इस तरह की ठिठोली, हँसी, मज़ाक़ रिश्तों में मिठास , अपनापन और आत्मीयता घोलते थे l एक दूसरे के प्रति सम्मान और मर्यादा का भाव रखते l

एक समय हरिशंकर तिवारी जब गोरखपुर के चिल्लूपार से विधायक चुन कर लखनऊ आए तो पार्क रोड पर बलिया के विधायक भोला पांडेय के बगल में ही उन्हें आवास आवंटित हुआ l दोनों ब्राह्मण , दोनों माफिया l दोनों में ही गहरा मेलजोल और हँसी मज़ाक इसी भाव में होता l कोई 1986-1987 की बात होगी यह l

भोला पांडेय से हरिशंकर तिवारी कहते , पहुना नहीं कहा l पहुना कहिए l तो यही संवाद भोला पांडेय भी दुहराते l देखा कि अकसर भोला पांडेय को ही पहुना कहना पड़ता l चुहुल चलती रहती l मिठास बनी रहती l भोला पांडेय, तिवारी के पांव भी छूते थे l पहुना भाव बना रहता l

भोला पांडेय के ऊपर बैडमिंटन खिलाड़ी सैय्यद मोदी और अमिता मोदी भी रहते थे l फर्स्ट फ्लोर पर l संजय सिंह का मोदी के घर आना जाना बना रहता था l सैय्यद मोदी के फ्लैट के सामने ही न्यूज एजेंसी यू एन आई का दफ़्तर था l सदाशिव द्विवेदी वहाँ संवाददाता थे l बलिया के ही थे l हमारी अच्छी दोस्ती थी l तो अकसर देखता था कि संजय सिंह आते l जिप्सी चलाते हुए l बिना ड्राइवर के l

सैय्यद मोदी दरवाज़ा खोलता और बाहर निकल कर सीढ़ी उतर जाता l संजय सिंह अंदर जा कर दरवाज़ा बंद कर लेते l एक बार भोला पांडेय से इस की चर्चा की l चुहुल में l वह हँसे l भोला पांडेय भले विधायक थे l माफिया थे l पर रंगबाजी और लौंडपना भी बहुत था l उन्हीं दिनों भोला पांडेय ने एक महिला विधायक सुमनलता दीक्षित से दूसरा विवाह भी कर लिया था l

सुमन लता दीक्षित सुंदर भी थीं और हट्ठी कट्ठी भी l लंबी सी l इस लिए भी भोला पांडेय चर्चा में थे l यह वही भोला पांडेय थे जो जनता पार्टी की मोरार जी देसाई सरकार के समय एक बार आकाशवाणी लखनऊ के स्टूडियो में जबरिया घुस कर इंदिरा गांधी जिंदाबाद का नारा लगा दिया था l जो प्रसारित हो गया था l उन के साथ सुल्तानपुर के देवेंद्र पांडेय भी थे l जल्दी ही भोला पांडेय और देवेंद्र पांडेय ने एक फ़्लाइट में टेनिस बाल को बम बता कर इंदिरा गांधी की पैरवी में हाईजैक कर लिया था l बाद में कांग्रेस ने दोनों को टिकट दिया और दोनों विधायक चुने गए l

ख़ैर एक दिन भोला पांडेय ने संजय सिंह के भीतर जाते ही बाहर से बेलन लगा कर दरवाज़ा बंद कर पुलिस को फ़ोन कर दिया कि फला फ़्लैट में रंडीबाजी हो रही है l आनन फानन पुलिस ने फ़्लैट घेर लिया l दरवाज़ा खुलवाने पर संजय सिंह बाहर निकले l सरकार में ताक़तवर मंत्री थे l तत्कालीन मुख्य मंत्री वीर बहादुर सिंह को चुनौती देते हुए , मुख्य मंत्री पद के दावेदार l पुलिस उन्हें देखते ही सकपका गई l उल्टे पांव लौट गई l पर हंगामा हो गया l पूरा पार्क रोड जुट गया l

उस दिन भोला पांडेय ने बिना टोके हरिशंकर तिवारी से हंसते हुए कहा , पहुना आज त मजा आ गईल ! हरिशंकर तिवारी अपनी मूंछों में मुस्कुराए और बोले , सरऊ हम के बदनाम करे ख़ातिर हमरे घरे आ गईलs !

पहुना ! कह कर हाथ जोड़ कर भोला पांडेय भी ठठा कर हंस पड़े l

यह पहुना प्रकरण इटली में मेलोनी को मोदी ने जो मेलोडी खिलाई उस संदर्भ में याद आ गया l मेलोनी और मोदी की मिठास के किसिम-किसिम के रिश्ते गढ़ने , मिठास और ठिठोली के बीच ही कोई राहुल की मौसी का मज़ा ले रहा है , कोई ममेरी बहन का रिश्ता खोज रहा है , कोई कुछ l इंदिरा गांधी की भी याद आ गई है l कभी ब्रेजनेव , कभी फ़िदेल कास्त्रो के साथ उन की भी बड़ी चर्चा हुई l रीगन के साथ भी l

मोदी, मेलोनी के क़िस्से पहले भी ख़ूब गढ़े गए , गाए और बताए गए हैं l पर अब की राहुल गांधी की बौखलाहट ने इस में एक नया और चटक रंग भर दिया है l राहुल गांधी के भक्तों ने इस रंग में फिटकिरी डाल-डाल कर इसे और चटक कर दिया है l इतना कि शारदा सिन्हा का गाया मैथिली गीत, पहुनवा राघो ! याद आ गया है l पहुनवा राघो की सोंधी मिठास मन में घुल गई है l किसी राजनयिक यात्रा में पहुनवा राघो भी हो सकता है भला ! यह ठीक ही कहा जाता है कि मोदी दिल , दिमाग़ और ड्रामा एक साथ ले कर चलता है l पहुनवा राघो गाने को मजबूर कर देता है l

हम आरक्षण की इसी बैसाखी को तोड़ देना चाहते हैं

दयानंद पांडेय

सामाजिक समता के नाम पर चल रहे पाखंड और कमीनेपन को, झूठी बातों को , कुतर्क को ग़लत साबित करने की मूर्खता आप कीजिए l मैं परीक्षार्थी नहीं हूं l आप को जिन बातों को ग़लत सही साबित करना हो कीजिए l

अपना एजेंडा , अपना ट्रैप अपने पास रखिए l मैं जो भी कुछ लिखता हूं तथ्य और तर्क के साथ लिखता हूं l मुझे मालूम है कि मेरा गंतव्य क्या है l रास्ते में कई सारे कुत्ते अकारण भौंकते हुए दौड़ते रहते हैं , उन सभी को चुप कराना हमारा काम नहीं है l

आप कीजिए l किसी ने रोका ?

आप अपने सच , अपने आरक्षण की बैसाखी के साथ रहिए न ! हम आरक्षण की इसी बैसाखी को तोड़ देना चाहते हैं l हमारा सीधा लक्ष्य यही है l आप अपनी बैसाखी बचाइए l

हम स्वस्थ और सामाजिक समता वाला समाज बनाना चाहते हैं l माइनस चालीस वाला डाक्टर किसी सूरत मंज़ूर नहीं है l

ठीक ?

90 और 99 प्रतिशत वाला किनारे हो जाए और माइनस चालीस वाला सिर पर आग मूते l यह तो नहीं चलेगा l अस्सी साल बहुत होते हैं किसी को आग मूतने के लिए l

अब और नहीं l

————

मतलब आरक्षण की भीख में माइनस चालीस वाला डाक्टर बनोगे और आग भी मूतोगे ? पांडव से मुकाबला करोगे , आरक्षण की बैसाखी से ? यह बैसाखी अब तोड़ देंगे l समय की प्रतीक्षा करो l कौरव हो , पांडव बनने का अभिनय कर के बैसाखी नहीं बचेगी l अस्सी साल हो गए बैसाखी पर लंगड़ाते हुए l शर्म नहीं आती कि अभी तक खड़े नहीं हो सके l

( अपनी पोस्ट पर आए एक कमेंट पर मेरा यह जवाब l )

आरक्षण वाला वोट बैंक भी टूटेगा

दयानंद पांडेय


अभी मुस्लिम वोट बैंक ख़त्म हुआ है न ? बहुत गुमान था , मुसलमानों को अपने मुस्लिम वोट बैंक पर l अपनी हिंसा पर l अपने आतंक पर l तीन तलाक और हलाला पर l शरिया, मदरसा और मस्जिद पर l सारा गुमान टूट गया है l चकनाचूर हो गया है l एक समय अभेद्य मान लिया गया था इसे l

ऐसे ही बहुत गुमान है आरक्षण वाले देश पर बोझ बने लोगों को अपने वोट बैंक पर l अपने आरक्षण की बैसाखी पर l जय भीम, जय मीम वाली अपनी हिंसा पर l बात बेबात देश में आग लगाने की सनक पर l जल्दी ही इस वोट बैंक का तिलिस्म भी टूटेगा l गुमान टूटेगा l टूट कर चकनाचूर होगा l किसी शीशे की तरह टूट कर चुभेगा l किरिच-किरिच l

ठीक वैसे ही जैसे पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का गुमान टूटा l देश में सोनिया गांधी और कांग्रेस का l बिहार में लालू का l उत्तर प्रदेश में मायावती , अखिलेश यादव का l

बस थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए l नामुमकिन कुछ भी नहीं है l आरक्षण के पाप का घड़ा लगभग भर चुका है l मोदी के वश का भी नहीं है अब कुछ रोक पाना l माइनस चालीस वाले डाक्टर को ताबूत का निर्णायक कील मान लेने में बहुत नुक़सान नहीं है l कंस , रावण और धृतराष्ट्र को भी कभी लगता था कि उन के राज का कभी अंत नहीं होगा l हुआ l ब्रिटेन का सूरज भी डूबा l इस्लामिक आतंक पर लगाम लगी है l

आरक्षण वाला वोट बैंक भी टूटेगा l आरक्षण की ब्लैकमेलिंग भी ख़त्म होगी l क्यों कि अब अति हो गई है l जनमत तैयार हो रहा है l और जनमत आग की नदी है l

Wednesday, 20 May 2026

मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है

दयानंद पांडेय 


अफ़सोस कि आप अपने को पढ़ा लिखा भी मानते हैं l नहीं जानते तो अब से जानिए कि पहले सिर्फ़ चार वर्ण थे l जाति नहीं l जाति बनाई मुग़लों ने l अपनी सेवा के लिए l फिर ब्रिटिशर्स ने इस जाति प्रथा को खाद पानी दे के बांटो और राज करो में तब्दील किया l फिर राजनीतिज्ञों ने आरक्षण दे कर जातियों को भस्मासुर बना दिया है l आप जैसे तमाम दलित बड़ा संविधान की माला रटते हैं आरक्षण की बैसाखी की रक्षा के लिए l जो लोग पढ़ना नहीं जानते , संविधान की माला फेरते मिलते हैं l संविधान में किसी भी अनुच्छेद में जाति का ज़िक्र नहीं है l पिछड़े और कमज़ोर का ज़िक्र है l कांग्रेस ने अपने स्वार्थ में जाति जाति करना शुरू किया l इंदिरा गांधी के समय में l मोदी और ज़्यादा कर रहा है जाति जाति l नेहरू ने तो आरक्षण का डट कर विरोध किया था l नेहरू को गांधी ने ठेल दिया l आज आरक्षण में देश प्रतिभाहीन हो गया है l नौबत माइनस चालीस वाले डाक्टर की आ गई है l गुड है l 

मनुस्मृति की बात पर आते हैं l जहरीले और निकम्मे दलित मनुस्मृति बहुत जलाते हैं l आरक्षण की बैसाखी की और ज़ोर से पकड़ने के लिए l 

मनु कौन थे ? 

राजा थे l ब्राह्मण नहीं , क्षत्रिय थे l मनुस्मृति , मनु ने ही लिखी है। उन्हों ने एक व्यवस्था बनाई थी राज करने के लिए l मनुस्मृति पढ़े हुए लोग जानते हैं कि मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है l ब्राह्मण का काम सर्फ मुफ़्त में शिक्षा था और भिक्षा मांग कर भोजन करना था l कोई अन्य काम नहीं करना था l अगर ग़लती से भी कुछ धनार्जन किया तो बहुत सख़्त सज़ा थी l ब्राह्मणों के लिए इतने निषेध और सज़ा हैं मनुस्मृति में कि क्या ही कहा जाए l शरिया में भी ऐसी सजा नहीं दर्ज है। 

लेकिन क्रिश्चियन मिशनरी ने ऐसा गुल खिलाया कि लालच में दलित लोग क्रिश्चियन बनने लगे l पूरा नार्थईस्ट क्रिश्चियन क्यों है ? कभी सोचा है ? 

क्या ब्राह्मणों के कारण ? 

यह अंबेडकर कौन है ? 

अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है l क्यों लिखता था , अंबेडकर ? 

ऐश से रहता था , अंबेडकर सरनेम लिख कर l ब्रिटिश एजेंट था l क्रिश्चियन मिशनरी के लिए काम करता था l पढ़िए अंबेडकर की जीवनी l बड़ा नेता बनने के लिए पहले मुसलमान बनना चाहता था l आंबेडकर की लिखी कभी वोटिंग फॉर वीजा पढ़िए। खास कर 1934 की उन की दौलताबाद यात्रा के विवरण पढ़िए। फिर सामने जिन्ना था l जिन्ना के आगे भला क्या चलती। फिर क्रिश्चियन बनना चाहता था l पर क्रिश्चियन बनने से मिशनरी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता था l हिंदुओं में फूट डालने का लक्ष्य l फिर अंबेडकर बौद्ध बन गया l हाला कि फिर भी वह कामयाबी नहीं मिली जो लक्ष्य था l 

इस लिए भी कि बुद्ध आध्यात्मिक व्यक्ति थे l अंबेडकर राजनीतिक l बुद्ध और अंबेडकर में कोई मेल नहीं था l बुद्ध कर्मकांड के ख़िलाफ़ थे l अंबेडकर पूरी तरह कर्मकांडी l अपना ब्राह्मण सरनेम तक नहीं बदल सका l 

आरक्षण क्या अंबेडकर की देन है ? 

जी नहीं l संविधान सभा के 319 सदस्यों की देन है l जिस संविधान सभा के अध्यक्ष थे राजेंद्र प्रसाद और सलाहकार वी एन राव l गांधी का परामर्श था l वह भी देश के पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के लिए l जाति विशेष के लिए नहीं l 

लेकिन इंदिरा गांधी से लगायत मोदी तक ने दलितों का वोट हथियाने का टूल बना लिया अंबेडकर को l अंबेडकर सिर्फ़ ड्राफ्ट कमेटी का मामूली सा अध्यक्ष था l 

अंबेडकर की माला जपते हुए आरक्षण की बैसाखी थामने वाले दलित किसी क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचे हों तो सूचित कीजिएगा l पता कीजिएगा कि कितने प्रतिभावान लोग हर साल देश छोड़ रहे हैं l फिर इस में दलित कितने हैं l 

आरक्षण का इतना बैंड बजने के बावजूद कितने विशेषज्ञ दलित डाक्टर हुए हैं ? कितने बड़े वकील हैं ? कितने वैज्ञानिक ? क्रिकेटर , उद्योगपति, अभिनेता या प्रोफेशनल? 

हाँ, माइनस चालीस की बदबू वाले डाक्टर हींगे l पाँच साल का एम बी बी एस पंद्रह साल , बीस साल में कर ही रहे हैं l गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कालेज से एक खबर छपी थी पिछले दिनों। एम बी बी एस के पहले ही साल में एक दलित ने ग्यारह साल लगा दिए पर पास नहीं हुआ। मेडिकल कालेज छोड़ने को भी तैयार नहीं। फीस देनी नहीं। हॉस्टल , भोजन सब मुफ्त। और क्या चाहिए। 

लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में कुछ छात्रों ने धरना प्रदर्शन किया। उन्हीं दिनों मनमोहन सरकार बनी थी। पी एल पुनिया बाराबंकी से सांसद थे। अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए थे। कैबिनेट मंत्री का दर्जा। पहुंचे एक दिन मेडिकल कालेज उक्त धरना स्थल पर। मेडिकल कालेज के तब के प्रिंसिपल पुनिया से मिलने धरना स्थल पहुंचे। धरना पर बैठे छात्रों ने पुनिया से शिकायत की कि अभी तक यह कभी हम से बात करने नहीं आए। आज आए हैं। पुनिया ने प्रिंसिपल को तरेरते हुए पूछा , अभी तक क्यों नहीं आए ? प्रिंसिपल ने कहा , आज भी नहीं आता अगर आप नहीं आए होते। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा आप रिटायर्ड आई ए एस हैं। पढ़े लिखे आदमी हैं। सिस्टम समझते हैं। इस लिए आ गया। प्रिंसिपल ने कहा कि इन दलित छात्रों की शिकायत है कि दस-दस , पंद्रह-पंद्रह साल से इन्हें फेल कर दिया जा रहा है। पास नहीं होने दिया जा रहा है। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा कि सर आप सक्षम हैं। ऐसा कीजिए कि देश में जो भी दलित प्रोफ़ेसर मौजूद हैं , उन से ही इन का पेपर बनवा दीजिए। दलित प्रोफेसरों से ही इन सभी की कापियां जंचवा दीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं। पूरा सहयोग रहेगा हमारा। इतना सुनते ही पूनिया निरुत्तर हो गए। धीरे से उठ कर चले गए। फिर कभी नहीं लौटे। धरना खत्म हो गया था। ऐसे अनेक किस्से हैं। एक डाक्टर यादव थे उन दिनों। सर्जन थे लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में। लेकिन देखता था कि शाम को अक्सर वह कभी दूरदर्शन , कभी आकाशवाणी पर समाचार पढ़ते मिलते थे। बलरामपुर में एक डाक्टर मित्र से एक दिन पूछ लिया कि इन को इतना टाइम कैसे मिल जाता है। कि महीने में पंद्रह दिन आकाशवाणी , पंद्रह दिन दूरदर्शन पर रहते हैं। डाक्टर मित्र बोले , डाक्टर यादव के पास टाइम ही टाइम है। दो साल का एम एस पंद्रह साल में किया है। आरक्षण में नौकरी मिल गई है। मरीज लेकिन आरक्षण में नहीं मिलते। कोई इन से आपरेशन करवाना ही नहीं चाहता। कोई सर्जन इन को अपना असिस्टेंट भी नहीं बनाना चाहता। कौन मरीज के स्वास्थ्य का रिस्क ले ? सो टाइम ही टाइम है इन के पास। डाक्टर यादव की लेकिन एक बड़ी खासियत थी कि यादव होने के बावजूद मृदु भाषी थे। बहुत ही मिलनसार। बाद में हमारे मित्र भी बन गए। 

सारी बड़ी नौकरियां अब प्राइवेट सेक्टर में हैं l कितने दलित सी ई ओ हैं ? प्रेसिडेंट , वाइस प्रेसिडेंट हैं ?

आरक्षण देश ही नहीं आरक्षणधारियों को भी नष्ट कर चुका है l 

चेत जाइए l यह ब्राह्मण विरोध की कुंठा आप को खा जाएगी l ब्राह्मण का कुछ नहीं बिगड़ेगा l वह तो मांग के खाईबो , मसीत में सोने वाला जीव है l मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद है l तिलक और गोखले है l बहुत लंबी सूची है ऐसे ब्राह्मणों की। 

कितने दलित आज़ादी के लिए कुर्बान हुए ? 

एक नहीं l कभी नहीं l अंबेडकर भी नहीं। अंबेडकर फ्रीडम फाइटर नहीं , अंग्रेजों का दल्ला था। 

ठीक ? 

[ अपनी ही एक पोस्ट पर एक मित्र के कमेंट पर यह मेरा जवाब। ]

सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार है अब आरक्षण

दयानंद पांडेय


संविधान निर्माताओं ने दलित और वंचित समाज के लिए दस वर्ष के लिए आरक्षण का प्रावधान किया था कि यह लोग भी आर्थिक और सामाजिक तौर पर बराबरी में आ जाएं l देश के विकास में योगदान दें l बाद में मंडल की सिफारिशों के तहत पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण मिल गया l आज़ादी के इन आठ दशक में आरक्षण ने आरक्षणधारियों को इतना सबल बना दिया है कि अब वह इसे सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार बना चुके हैं l मरने-मारने पर आमादा हैं l

वोट बैंक के चक्कर में सभी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं ने आरक्षणधारियों को भस्मासुर बना दिया है l हिंसक और अराजक बना दिया है l होता रहे देश प्रतिभाहीन, होता रहे प्रतिभा पलायन, वह तो माइनस चालीस वाले डाक्टर भी बना कर रहेंगे l देश में सामाजिक समता के नाम पर गहरी सामाजिक खाई बन गई है तो उन की बला से l यह आरक्षण जेहाद का ज़हर है l

आरक्षणधारी अब सवर्ण समाज के ख़िलाफ़ आक्रमणकारी बन कर उपस्थित हैं l इस्लाम के शरिया क़ानून से भी ज़्यादा ख़तरनाक और जहरीला हो चला है यह आरक्षण l यू जी सी आदि ने इस आग में घी का काम किया है l आप एक बार कैंसर और एड्स का इलाज कर सकते हैं l आरक्षण प्राप्त जहरीले लोगों का नहीं l राजनीतिज्ञों और सरकारों ने तो इसे इस हद तक पहुंचाया ही है l पता नहीं किसी सामाजिक विज्ञानी को इस का भान है कि नहीं l

सुप्रीम कोर्ट को इस ज़हर और जहरीले समाज का स्वत: संज्ञान लेना चाहिए l आरक्षण पूरी तरह ख़त्म कर देना चाहिए l बहुत दया आए तो आरक्षण को दलितों और पिछड़ों के ई डब्लू एस तक सीमित कर देना एक उपाय हो सकता है l नहीं जातीय और राजनीतिक दुकानदारों को जो विष बोना था बो चुके हैं l फ़सल कटने को तैयार है l

ग़नीमत है कि सवर्ण समाज संयम से काम ले रहा है l नहीं आरक्षणधारी तो जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के लिए पूरी तरह तैयार हैं l देश एक ख़तरनाक मोड़ पर खड़ा है l हिंदू , मुसलमान से भी बड़ी आपदा सामने उपस्थित है l

इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं

दयानंद पांडेय 


आप का क्या है , अलहदादपुर को अल्लाहदादपुर बता देते हैं l कान इधर से पकड़िए या उधर से पकड़ना कान ही है l इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं l आप की सारी उदारता दिखावटी है l ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान बनाने के लिए सब से ज़्यादा सक्रिय उत्तर प्रदेश और बिहार के मुस्लिम लोग थे l पर जब पाकिस्तान जाने की बात हुई तो यहीं से लोग नहीं गए l जो मुट्ठी भर लोग गए भी पाकिस्तान से लात खा कर लौट आए l पर जीते एक और पाकिस्तान बनाने के लिए ही हैं l काफ़िर का कांसेप्ट है कि जाता ही नहीं l पूरी दुनिया को इस्लाम में कंवर्ट करने का ज़ज़्बा बड़ी नफ़ासत से क़ायम है l सिर तन से जुदा करने की तमन्ना है कि जाती ही नहीं l क्या पढ़े लिखे , क्या अनपढ़ l सब की एक गति है l


के आसिफ़ बहुत बड़े निर्देशक थे l कमाल अमरोही उन के सह लेखक l दोनों बहुत पढ़े लिखे और जीनियस थे l पर पूरी ज़िंदगी इस्लाम की ख़िदमत में ही लगे रहे l मनुष्यता की नहीं l मुग़ले आज़म जैसी बड़ी फ़िल्म में लेकिन मक्कारी से बाज नहीं आए l जोधा बाई नाम का एक फर्जी पात्र खड़ा किया , मान सिंह की बहन बना दिया l इतिहास में मान सिंह की कोई बहन है ही नहीं l न जोधा बाई नाम की कोई औरत , न इस नाम की कोई बेगम थी अकबर की l

और अनारकली ?

अनारकली, अकबर की एक रखैल थी l लाहौर में आज भी अनारकली की मजार है l अकबर का चेहरा साफ़ करने के लिए के आसिफ़ और कमाल अमरोही ने अनारकली को सलीम की माशूक़ा बना दिया l के आसिफ़ और कमाल अमरोही ने ऐसे कई ग़ज़ब किए हैं l बहुत प्यार और नफ़ासत से l सलीम जावेद जैसों ने के आसिफ़ और कमाल अमरोही के इस काम को और बेहतर ढंग से आगे बढ़ाया है l

अमीर ख़ुसरो और अल्लामा इक़बाल भी बहुत बड़े शायर हैं l आला दर्जे के l पर हैं यह दोनों भी अव्वल दर्जे के मक्कार और कमीने l इन की सारी शायरी इस्लाम के प्रचार के लिए ही है l मनुष्यता के लिए नहीं l अमीर ख़ुसरो तो दरबारी कवि ही था l इस्लाम के लिए तलवार और कलम दोनों हाथ में रखता था l अपने को सूफ़ी शायर बताते नहीं थकता था l पर सूफ़ी के लबादे में लीगी ही था l

अल्लामा इक़बाल भी अमीर ख़ुसरो की ही तरह था l सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा उस ने इस्लाम की ख़िदमत में लिखा है , हिंदुस्तान की ख़िदमत में नहीं l पर मूर्ख लोग बिना इसे पूरे पढ़े हिंदुस्तान का तराना मान लेते हैं l भूल जाते हैं कि पाकिस्तान का संस्थापको में से मुख्य है यह अल्लामा इक़बाल l इस्लाम का गायक l सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तान हमारा का गायक और शायर नहीं l

आप भी यह काम बखूबी अंजाम दे रहे l बड़ी नफ़ासत , बड़े एहतराम और बड़े शातिर ढंग से l दिखावटी उदारता के रैपर में लपेट कर l

कुछ ग़लत कहा हो तो ज़रूर बता दीजिए l

( अपनी ही पोस्ट पर आए एक कमेंट पर मेरा यह जवाब l )

शेर को आरक्षण क्यों चाहिए ?

दयानंद पांडेय 

कृष्ण में यादव लिखा है ? कि दशरथ, लक्ष्मण , भरत आदि में सिंह ? बुद्ध भी क्षत्रिय थे l लिखते थे क्या सिंह ? हीनता और कुंठा वश दलित लोग सीना तान कर सिंह लिखते हैं l तो क्या सिंह बन जाते हैं ?


आप ही की मान लें तो क्या दलित शेर हैं ? शेर को आरक्षण क्यों चाहिए ? मुलायम कौन सा सिंह था ? यह सब कुतर्क है l बुद्ध तो जातिविहीन समाज और समता मूलक समाज की कल्पना करते थे l पर आज के यह नए वाले सिंह ? जाति ही ओढ़ते बिछाते हैं l आरक्षण का कटोरा लिए घूमते हैं l

आरक्षण का कटोरा , आरक्षण तक ही रखिए l बाक़ी जगह ले कर घूमने पर दुत्कारे जाइएगा l माइनस चालीस वाले डाक्टर से फिर इलाज करवाना पड़ेगा l करवाइएगा ?

मालूम है , अंबेडकर पहले मुस्लिम बनना चाहता था l अंग्रेजों का एजेंट था तो क्रिश्चियन बनने की भी पड़ताल की l पर उसे लगा कि बौद्ध बन कर हिंदू धर्म को ज़्यादा नुक़सान पहुंचा सकेगा l बौद्ध बन गया l बुद्ध राज परिवार से होते हुए भी राजनीतिक प्राणी नहीं थे l क्षत्रिय हो कर भी भिक्षाटन से काम चलाते थे l वृक्ष के नीचे रहते थे l महल छोड़ , कुटिया में रहते थे l संन्यासी थे l सुविधा रहित l

बुद्ध से अंबेडकर का क्या लेना देना ? अंबेडकर तो सुविधाखोर दलित था l ऐश से रहने वाला l अंग्रेजों और राजाओं के टुकड़ों पर पलने वाला l लेकिन बहुत शातिर था l

बुद्ध का राजनीतिक इस्तेमाल किया l

जैसे जिन्ना ख़ुद काफ़िर था l शराब पीता था l सुअर खाता था l पर पाकिस्तान बनाने के लिए , प्रधान मंत्री बनने के लिए , इस्लाम और मुसलमान का इस्तेमाल किया l अंबेडकर भी कभी दलितों का अलग देश बनाना चाहता था l

अच्छा हुआ होता जो पाकिस्तान की तरह एक दलितिस्तान भी बन गया होता l वह लोग भी ख़ुश रहते जैसे पाकिस्तान ख़ुश है l भारत में रह कर बहुत तकलीफ़ है l कम से कम आरक्षण जैसा कोढ़ और कैंसर तो नहीं होता l माइनस चालीस वाला डाक्टर तो नहीं मिलता l यह नफ़रत और यह दोमुंहापन तो नहीं मिलता l कि बहुत अन्याय हुआ l न्याय मिल गया होता l पर गांधी ने सब गुड़ गोबर कर दिया l पाकिस्तान बनने से नहीं रोक पाए , यह रोक लिया l

आज दलितों समेत तमाम राजनीतिक पार्टियां और नेता अंबेडकर को संविधान निर्माता बताते नहीं थकते l क्या सचमुच अंबेडकर संविधान निर्माता है ? अकेले ? 319 सदस्यों वाली संविधान सभा थी l इस संविधान सभा के अध्यक्ष थे राजेंद्र प्रसाद l वी एन राव सलाहकार l अंबेडकर सिर्फ़ एक ड्राफ्ट कमेटी का अध्यक्ष l दर्जनों कमेटियां थीं इस संविधान सभा की l तो बाक़ी लोग क्या घास छील रहे थे जो अंबेडकर संविधान निर्माता बन गया l फिर आरक्षण का प्राविधान तो गांधी के कहे पर किया गया था l सिर्फ़ दस बरस के लिए l फिर यह जन्म जन्मांतर के लिए हो गया है l

आरक्षण अब नासूर बन गया है l कैंसर और एड्स से भी ज़्यादा ख़तरनाक l

( अपनी ही पोस्ट पर आए एक कमेंट का यह जवाब l)

हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी

दयानंद पांडेय 

हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी l मुक़दमा करने वाले लोग भुगत कर गए l फिर लौटे नहीं l नोटिस भी बहुत मिलती हैं l पाँच करोड़ से कम की मानहानि की कोई धमकी नहीं देता l ऐसी फ़ालतू नोटिस का जवाब भी नहीं देता l आप के पास प्रमाण है , बात में दम है तो कोई पंगा नहीं लेता अमूमन l

एक ख़बर को ले कर उत्तर प्रदेश विधान परिषद् में मेरे खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव भी पेश हुआ। फिर अपने ही कर्मों से ध्वनि मत से गिर भी गया।

हाई कोर्ट में कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट भी हो चुका है अपने-अपने युद्ध उपन्यास के बाबत l मुक़दमा लंबा चला l लेकिन चीफ़ जस्टिस भी जेल भेजने से कतरा गए l क्यों कि फिर जजों की पोल पट्टी और ज़्यादा खुलती l इसी तरह अगर आप सिर्फ़ सच लिखेंगे , प्रमाण होंगे तो किस की हैसियत है मानहानि का मुक़दमा करने की l करेगा तो भुगतेगा l जो अध्याय नहीं खुला है , वह भी खुलेगा l होशियार लोग इसी लिए चुप रहते हैं l बात ख़त्म हो जाती है l फिर पढ़ता कौन है अब , यह बात भी है l

हाँ, इसी पोस्ट पर आए कुछ कमेंट देख लीजिए यादव ब्रिगेड और सपाई किस तरह गाली गलौज पर उतर आए हैं l

तो यह सब होता रहता है l सच लिखने की क़ीमत चुकानी तो होती है l जब रिपोर्टर था तब ज़्यादा धमकी मिलती थी l हत्या से ले कर बच्चों के अपहरण तक की l इस लिए जैसे भी हो बच्चों को स्कूल छोड़ने और लेने ख़ुद जाता था l लीगल नोटिस की तो तब भी भरमार थी l

इस सब से दुख तो लेकिन होता है l प्रशंसा सभी को अच्छी लगती है पर गाली किसी को अच्छी नहीं लगती l

मुझे भी नहीं लगती l

( अपनी ही एक पोस्ट पर आए एक कमेंट पर मेरा यह जवाब l )

भारत में ग़लत , पाकिस्तान में ठीक

दयानंद पांडेय


पाकिस्तान में कुछ जगहों के नाम बदलने पर हमारे कुछ सेक्युलर टाइप के हिप्पोक्रेट दोस्त फ़िदा हो गए हैं l यह गिरे हुए दोगले लोग दो एक हिंदी नाम पर लहालोट हो गए हैं l यही काम कभी कभार भारत में होता है तो इन के पृष्ठ भाग में दर्द बहुत होता है l फिर यह कमज़र्फ़ अपनी दोगलई में भूल जा रहे है कि पाकिस्तान में हिंदू आबादी साफ़ हो गई है l सफ़ाचट l बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर यही लोग लब सिले हुए थे l सांस नहीं ले रहे थे l

एक समाजवादी लेकिन अब कांग्रेसी मित्र की ऐसी ही एक पोस्ट पर उन की इस मानसिकता को नंगा करते एक कमेंट लिखा और उन्हें बताया कि लोहिया की आत्मा कलप रही होगी l मित्र को जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन याद दिलाया था l बताया था कि खुशवंत सिंह का ए ट्रेन टू पाकिस्तान पढ़िए l यह भी कि खुशवंत सिंह , संघी या भाजपाई नहीं थे l भीष्म साहनी कम्युनिस्ट थे l भीष्म साहनी का तमस पढ़ने की सलाह दी थी l मित्र को जवाब देते नहीं बना l वैसे भी कभी जवाब नहीं दे पाते l क्यों कि तर्क और तथ्य से सर्वदा च्युत रहते हैं l

लेकिन आज अभी थोड़ी देर पहले का वह कमेंट , मित्र बर्दाश्त नहीं कर पाए , मिटा दिया l ग़ज़ब समाजवादी चरित्र है l क्या कांग्रेस में जाते ही आदमी राहुल गांधी की तरह फ़ासिस्ट हो जाता है ? एकतरफ़ा बात करने की बीमारी घेर लेती है ? सच को स्वीकार करने की क्षमता नष्ट हो जाती है ?

जो भी हो बंगाल का ग़म दूर करने के लिए मरियम का यह मरहम भी बहुत है l बाक़ी योगी का काढ़ा भी आ गया है l जिस को जो लेना हो सहर्ष ले !




लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है

दयानंद पांडेय 


लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है l सिर्फ़ अपनी पसंद और सुविधा ही में आप की आस्था शेष रह गई है l बाई द वे जो आप कह रहे हैं तो इस हिसाब से तमिलनाडु और केरल में भी भाजपा की सरकार होनी चाहिए थी l ममता और वाम दलों की हिंसा आप को कितनी तो प्यारी है l


फिर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस इतने सालों से कहां और क्यों गुम है ? किस भाजपा और किस चुनाव आयोग ने खा लिया ?
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इतनी बौखलाहट गुड बात नहीं l कि आप को तू तड़ाक पर आना पड़ा गया l

कितनी हत्या और हिंसा हुई ? कुछ आन रिकार्ड भी है कि बस बयान बहादुरी ही है l

ममता का यह कहना इस्तीफ़ा नहीं दूंगी l यह हज़म हो गया है ? कि संविधान की किताब गुम हो गई है ?

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क्या बात करते हैं ?

कब अजेय कांग्रेस से लड़े ? इंदिरा और राजीव के बाद कांग्रेस ख़ुद बैसाखी पर टिकी रही l अजेय कब रही ?

लड़े थे कभी लोहिया कांग्रेस से l ग़ैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था l पर अपने को लोहियावादी बताने वाले मुलायम कभी नहीं लड़े कांग्रेस से l और आप मुलायम के साथ थे l मुलायम पहली बार मुख्य मंत्री बने तो भाजपा के समर्थन से l

भाजपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया तो तुरंत कांग्रेस से समर्थन ले लिया l तय मानिए कि राजीव गांधी की कांग्रेस ने अगर तब मुलायम को समर्थन नहीं दिया होता तो कांग्रेस उत्तर प्रदेश से इस तरह कभी साफ़ नहीं हुई होती l भ्रष्ट और जातिवादी मुलायम ने सिर्फ़ लोगों का इस्तेमाल किया सत्ता के लिए l आप का भी l भाजपा और कांग्रेस का भी l

अमरीका से समझौते के विरोध में वाम दलों ने जब मनमोहन सरकार से समर्थन वापस लिया तो मुलायम ने कांग्रेस को तुरंत समर्थन दे कर एक साथ दो काम किया l एक मनमोहन सरकार को बचा लिया l दूसरे , अपने को जेल जाने से बचा लिया l जब तक मनमोहन सरकार रही , मुलायम घुटने टेके रहे , मनमोहन सरकार के आगे l और आप मुलायम के साथ थे l

मनमोहन सरकार विदा होते ही भाजपा की मोदी सरकार आई l खरबपति मुलायम ने जेल जाने से बचने के लिए मोदी के आगे घुटने टेक दिए l आप तब भी मुलायम के साथ थे l

आप ही बता दीजिए कि कब किस अजेय से लड़े ?

( पहले सपा में रहे और अब कांग्रेसी हुए एक समाजवादी मित्र की पोस्ट पर मेरा यह कमेंट l )

कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप

दयानंद पांडेय 


कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप l तमिलनाडु में विजय जोसेफ़ के लिए कितना तो दुख है आप को l राज्यपाल के लिए कितनी घृणा l


उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे रोमेश भंडारी को इतनी जल्दी भूल गए ? भाजपा तब सब से बड़ी पार्टी थी l लेकिन रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह के दावे पर भरोसा करने के बजाय राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी और राष्ट्रपति शासन लग गया l ऐसे अनेक किस्से और राज्यपाल हैं l

हरियाणा के राज्यपाल जी डी तपासे भी नहीं याद होंगे l सब से बड़ी पार्टी के नेता देवीलाल मुख्य मंत्री की शपथ के लिए राजभवन में बैठे रहे और किसी और कमरे में तपासे ने कांग्रेस के भजनलाल को शपथ दिलवा दिया l

देवीलाल ने राज भवन में ही तपासे को एक जोरदार थप्पड़ मार दिया था l कहा था , इंदिरा के इशारे पर तुम ने लोकतंत्र की हत्या कर दी है l

बिहार के राज्यपाल बूटा सिंह भी आप को नहीं याद होंगे l उन का छल भी l कितनों की याद दिलाऊं?

चुनाव हार जाने पर भी ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने के ऐलान पर भी क्या लिखा आप ने ?

फिर भी अपने को पत्रकार कहने की बेशर्मी करते हैं l

धन्य हैं आप और आप की यह एकपक्षीय पत्रकारिता और आप का एजेंडा l

एजेंडा यानी दलाली l बंद भी कीजिए प्रतिपक्ष के नाम पर यह दलाली l

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इतना एकपक्षीय विचार ? विचार और दलाली में फ़र्क़ होता है l फिर तमिलनाडु के राज्यपाल ने तपासे, रोमेश भंडारी या बूटा सिंह की तरह कोई अनुचित फ़ैसला तो लिया नहीं है l सिर्फ़ बहुमत की सूची मांगी है l

( सेक्यूलरिज्म के नाम पर प्रतिपक्ष की दलाली करने वाले एक जातिवादी पत्रकार मित्र की पोस्ट पर मेरा यह कमेंट l )

Thursday, 14 May 2026

अटल वाली कटहल की खेती और ममता

दयानंद पांडेय 

कल का चुनाव परिणाम चाहे जो हो l पर अटल बिहारी वाजपेयी बहुत याद आएंगे l भाजपा में तो वह मुख्य मंत्री और मंत्री बनाते बिगाड़ते रहे थे l जैसे नरेंद्र मोदी को भी गुजरात में मुख्य मंत्री अटल जी ने ही बनाया था l लेकिन अटल जी भाजपा को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा से इतर भी लोगों को मुख्य मंत्री या मंत्री बनाते रहे l क़ुर्बानी दे कर भी l दबी ज़ुबान भाजपा में तब हर बार अटल जी का विरोध भी ख़ूब हुआ l पर अटल जी अपनी दूर दृष्टि से डिगे नहीं l 

तीन लोग ऐसे थे जो भाजपा में नहीं थे पर बारी-बारी उन्हें भाजपा के सहयोग से मुख्य मंत्री बनाया l और वह तीनों भाजपा के लिए खाद बन कर काम आए l भाजपा को फूलने फलने में अनायास मदद कर बैठे l हाला कि तब के समय विधान सभाओं में संख्या बल में भाजपा बड़ी थी बावजूद इस के l जैसे मायावती और नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनवाया l ममता बनर्जी को पहले केंद्र में मंत्री बनाया l कांग्रेस को कमजोर किया l फिर पश्चिम बंगाल का मुख्य मंत्री बनवाया l वाया नंदीग्राम और सिंगूर l 

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का काँटा भाजपा कभी सीधे नहीं निकाल सकती थी l वामपंथियों की सशस्त्र क्रांति और गोली बंदूक का जवाब भाजपा कभी नहीं दे सकती थी l भाजपा के लोग संघ में सीखी लाठियां भांजने से अधिक कुछ कर नहीं सकते थे l तो वामपंथियों की बेहूदगी और गुंडई का काँटा निकालने के लिए अटल जी ने ममता बनर्जी नाम का कांटा तैयार किया l परिणाम देखिए कि वामपंथी पश्चिम बंगाल में अब गूलर के फूल बन चुके हैं l अलग बात है कि ममता बनर्जी ख़ुद आहिस्ता आहिस्ता भस्मासुर बन गईं l 

लेकिन अब ? 

भस्मासुर अब भस्म होने को तैयार बैठी है l नीतीश कुमार , अब ख़बर से भी बाहर हैं l मायावती राजनीति के हाशिए से भी बाहर हैं l भाजपा का सूर्योदय अगर आज भाजपाइयों को उत्तर प्रदेश , बिहार में दिख रहा हो तो भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l जातिवादी बिहार में भाजपा का मुख्य मंत्री आसान तो नहीं था l ऐसे ही कल की सुबह अगर पश्चिम बंगाल में भी भाजपा का सूर्योदय होता दिखे तो एक बार फिर भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l अटल जी ने ममता के कांटे से वाम का लाल क़िला तोड़ दिया था l अब ममता की खाद , भाजपा की फसल को लहलहाने वाली है l देखते जाइए l मोदी का धैर्य भी बहुत महत्वपूर्ण है l ममता नाम की भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखवा कर नचाना आसान तो नहीं था l 

बहुतेरे लोग अकसर कहा करते थे कि पश्चिम बंगाल में बिना राष्ट्रपति शासन लगाए निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते l लेकिन नरेंद्र मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन की बदनामी सिर लिए , पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव करवा कर दिखा दिया है l वह कहते हैं न कि आप अपनी माँ को माँ कहिए या पिता की पत्नी बात एक ही है l ग़लत कुछ भी नहीं l तथ्य है यह l 

पर कहने सुनने में माँ कहना ही अच्छा लगता है l पिता की पत्नी , गाली और अपमानजनक लगता है l सो मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन लगाए पश्चिम बंगाल में वह सब कर दिया है जो राष्ट्रपति शासन लगा कर भी नहीं किया जा सकता था l बदनामी का दाग अलग लगता l केंद्रीय सुरक्षा बलों के मार्फ़त ममता बनर्जी की गुंडई को जिस ख़ूबी से काबू किया है मोदी ने कि ममता भी लाजवाब हो गई हैं l उन की सारी उछल कूद मंकी एफ़र्ट में तब्दील हो गई है l 

अब 4 मई के परिणाम की प्रतीक्षा कीजिए l अटल जी की राजनीतिक खेती करने की विधि का आनंद लीजिए l और जानिए कि राजनीति कटहल की खेती है l पपीता छ महीने में फल देने लगता है पर छ महीने बाद ख़त्म हो जाता है l देखिए न मायावती को l पपीता बन कर रह गई हैं l पर कटहल बहुत साल बाद फल देता है l देता है तो बरसो बरस देता है l पीढ़ियां खाती हैं l 

राजनीति की खेती में भी खाद पानी की बहुत ज़रूरत होती है l समय से खाद पानी देते रहिए तो अटल बिहारी जैसे कटहल लगाने वाले युगों तक याद आते रहते हैं l इस की तपिश में झुलस कर राहुल गांधी जैसे लोग झुनझुना बन जाते हैं l जो चाहता है झुनझुना बजा कर चल देता है l यही वह तपिश है जो घुंघरू बांध कर आदमी को अरविंद केजरीवाल बना देती है l 

Wednesday, 13 May 2026

कर्ण द्वापर में ही नहीं कलयुग में भी होते हैं कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम के हिस्से

दयानंद पांडेय 

कर्ण द्वापर में ही नहीं , कलयुग में भी होते हैं। कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम सिंह यादव के हिस्से। द्वापर में भी कर्ण की स्वीकार्यता नहीं थी , कलयुग में भी नहीं है। शायद कभी नहीं होगी। कर्ण सर्वदा से शापित है रहेगा। परशुराम से लगायत धरती तक के शाप हैं। प्रतीक यादव की यातना इतनी भर नहीं है। प्रतीक की स्वीकार्यता तो प्रेम विवाह के बावजूद पत्नी के पास भी स्वभावतः नहीं थी। जो भी कुछ था बस मुलायम की नंबर दो की संपत्ति का सहारा था। चाहे 5 करोड़ की फरारी कार हो , करोड़ो का जिम , अरबों के फ़ार्म हाऊस और रियल स्टेट व्यवसाय के भरोसे भी जीना आसान नहीं था। यह कर्ण होने की तोहमत ही थी कि प्रतीक कभी राजनीति में आने की सोच नहीं पाए। राजनीति में आते तो इतने प्रश्न पूछे जाते कि उन का जवाब मुलायम भी तब नहीं दे पाते। कर्ण तो फिर भी जानता था और लोग भी कि वह सूर्य पुत्र है। 

पर प्रतीक ? 

प्रतीक मिस्टर गुप्ता के बेटे थे कि मुलायम के , पब्लिक डोमेन में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है। राजनीति में आते तो यह सवाल विपक्ष पूछता या नहीं पूछता , अखिलेश यादव के लोग दाएं , बाएं से पूछते ज़रूर। जैसे कि आज ही अखिलेश यादव ने जिस शातिरपने से प्रतीक के बाबत प्रेस से बात की वह चौकाने वाला हरगिज नहीं था। अखिलेश ने कहा कि क़ानून और परिवार जो कहेगा वह करेंगे। यह कह कर अखिलेश कहना क्या चाहते थे ? सब को समझ आ गया। बाक़ी रहा सहा सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने प्रतीक की मृत्यु को संकेतों में हत्या और जांच करवाने की मांग कर सब कुछ कह दिया। ग़नीमत बस यही थी कि अपर्णा आसाम में थीं। लखनऊ में नहीं। अपर्णा अगर लखनऊ में होतीं तो सपा के लोग उन को फंसाने के लिए , लांछन लगाने के लिए कुछ भी कर गुज़र गए होते। 

क्यों कि राजनीति का कीचड़ सिर्फ़ कमल ही नहीं खिलाता , और भी कई गुल खिला देता है। नारायणदत्त तिवारी , उज्ज्वला , राहुल प्रसंग हम देख चुके हैं। सारा खेल और व्यूह नरसिंहा राव ने तिवारी को मात देने के लिए रचा था। फिर राहुल का क्या हुआ , उज्ज्वला किस दुर्गति को प्राप्त हुई और कि नारायणदत्त तिवारी किस तरह अंतिम समय में अपमान को प्राप्त हुए किसी से छुपा हुआ नहीं है। हर कोई अटल बिहारी वाजपेयी जैसी किस्मत ले कर नहीं पैदा होता कि दागदार ज़िंदगी जी कर भी बेदाग़ निकल जाए राजनीति की इस काजल कोठरी से। सब को अटल जी जैसी गरिमा नहीं मिलती। छीछालेदर मिलती है। मुझे याद है जब राजीव गांधी राजनीति में आए तो कालाकाकर के राजा दिनेश सिंह से , जो तब सांसद भी थे , लोग उन के डी एन ए टेस्ट की बात करने लगे थे। इंदिरा गांधी तब प्रधान मंत्री थीं। ऐसी अनेक बातें हैं। अनेक क़िस्से हैं। 

शायद इसी लिए प्रतीक हरगिज नहीं चाहते थे कि अपर्णा विष्ट भी राजनीति में आएं। लेकिन भातखंडे से संगीत की शिक्षा लिए अपर्णा पति के मन का यह संगीत नहीं सुन सकीं। अपर्णा की अपनी महत्वाकांक्षा थी l राजनीति में  उन की महत्वाकांक्षा की पतंग नहीं उड़ सकी है अभी तक यह अलग बात है। प्रतीक और अपर्णा का संबंध , विवाह    से पहले भी चर्चा में रहा था। अपर्णा के पिता पत्रकार हैं। हमारे कुलीग रहे हैं। 

बचपन से ही प्रतीक सिर्फ़ संपत्ति की दुनिया में जीते रहे। सामाजिक , पारिवारिक और राजनीतिक जीवन उन्हें नहीं मिला। माँ के पूर्व पति गुप्ता परिवार में कभी पूछ नहीं हुई। मुलायम के सैफ़ई में यादव परिवार ने कभी साधना को ही स्वीकार नहीं किया तो प्रतीक को भी कौन स्वीकार करता। प्रतीक-अपर्णा की शादी भले सैफई में हुई पर सैफई ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। प्रतीक ने कोशिश भी नहीं की कि सैफई परिवार उन्हें अपना मान ले। न ही साधना गुप्ता ने। अभी जल्दी ही मुलायम की मृत्यु से ख़ाली हुई सीट पर उपचुनाव में डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाने की चर्चा में प्रेस से बातचीत में अपर्णा की बात चली तो रामगोपाल यादव ने प्रेस से स्पष्ट कहा कि वह हमारे परिवार की नहीं हैं। और बड़ी तल्खी से यह बात कही रामगोपाल यादव ने। गौरतलब है कि रामगोपाल यादव मुलायम के चचेरे भाई नहीं हैं जैसा कि लोग समझते हैं। सैफई के ही हैं पर मौसेरे भाई हैं रामगोपाल , मुलायम के। जिन के लिए मुलायम ने नाराज हो कर कहा था कि रामगोपाल ने अखिलेश का राजनीतिक कैरियर खा लिया। अखिलेश को कहीं का नहीं छोड़ा। लोग रामगोपाल को प्रोफ़ेसर रामगोपाल क्यों कहते हैं , समझ नहीं आता। रामगोपाल यादव कभी कहीं प्रोफ़ेसर नहीं रहे। यह भी जान लीजिए। 

बहरहाल , बचपन प्रतीक का लखनऊ के इंदिरा नगर की राज्य संपत्ति विभाग के सरकारी कालोनी के एक घर में बीता। जहां साधना गुप्ता को बतौर पत्रकार कार्नर का एक बढ़िया घर आवंटित था l गो कि साधना गुप्ता कभी पत्रकार नहीं रहीं। उस सरकारी कालोनी में भी वह कटी-कटी सी रहती थीं l एक बार कीर्तन में पड़ोस की स्त्रियों को साधना ने बुला लिया। मुलायम ने इस का बहुत बुरा मान लिया। स्पष्ट बता दिया कि वहां लोगों में मिक्स अप नहीं होना है। तो जब साधना पर इतनी पाबंदी थी तो प्रतीक पर भी रही होगी। मुलायम ने साधना को रखैल होने की सीमा बता दी थी। 

बाद के समय में अमर सिंह मुलायम के जीवन में आए। फिर जब सैफ़ई में अखिलेश यादव की माँ मालती यादव का निधन हो गया तो अमर सिंह ने साधना गुप्ता से मुलायम का गंधर्व विवाह करवा दिया। वह अब साधना यादव हो गईं। अखिलेश छोटे थे पर इतने भी नहीं कि मुलायम की इस हरकत का विरोध न कर सकें। किया। लेकिन मुलायम के दूसरे कार्यकाल में साधना गुप्ता बतौर पत्नी मुख्य मंत्री निवास में पूजा में शामिल हुईं और रहने लगीं l अखिलेश के डिफ्रेंसेज बने रहे l बल्कि बाद के समय में अखिलेश मुख्य मंत्री बने ही साधना गुप्ता के कारण। अखिलेश यादव के निरंतर ब्लैकमेलिंग से परेशान सौतेली मां साधना ने ही मुलायम को सलाह दी कि अखिलेश को मुख्य मंत्री बना दीजिए। रोज रोज की चिक चिक से फुर्सत मिले। 

मुलायम बिलकुल नहीं चाहते थे अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री बनाना। पर जैसे कैकेयी के आगे दशरथ झुक गए थे , मुलायम साधना के आगे झुक गए। मुलायम की यह बहुत बड़ी राजनीतिक ग़लती थी। फिर तो मुख्य मंत्री बन कर अखिलेश जल्दी ही औरंगज़ेब बन गए और मुलायम को शाहजहां बना दिया। टाइम्स आफ इंडिया ने इस बात को जब छापा तो अखिलेश ने टाइम्स आफ इंडिया के संपादक को मुख्य मंत्री निवास में बुलाया। मारे गुस्से में संपादक की गरदन पर तलवार रख दी। बाद के समय में मुलायम को किस तरह पार्टी अध्यक्ष पद से हटा कर ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अखिलेश यादव , अब यह एक इतिहास है। मुलायम ख़ून के आंसू पी कर रह गए। मुलायम की ज़िंदगी में मालती और साधना के अलावा भी कई स्त्रियां आईं गईं। यथा आई ए एस अफसर रही अनीता सिंह आदि। कुछ राजनीतिक स्त्रियां भी। कई फ़िल्मी हीरोइने भी। सहारा शहर उन की ऐशगाह थी ही। पर सब कुछ के बावजूद उन का गुलमोहर साधना ही रहीं। वह दुष्यंत कुमार का एक शेर है न : 

जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।

अच्छा हुआ कि साधना मुलायम के रहते ही चली गईं। नहीं प्रतीक से ज़्यादा मुश्किल उन्हें होती। अखिलेश यादव उन्हें रखैल डिक्लेयर करवा कर अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो अपने पिता की इज्जत नहीं कर सका , सौतेली मां , जिस ने उन की मां मालती यादव का जीते जी हक़ छीन लिया था , उस की इज्जत क्या ख़ाक करता ? सौतेले भाई ने खुद एक लक्ष्मण रेखा खींच ली थी। कोई दावेदारी नहीं की। न राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए , न आर्थिक उत्तराधिकार के लिए। मुलायम प्रतीक को इटावा के सैफई में भले प्रतीक को कुछ नहीं दे पाए पारिवारिक विरोध के चलते पर लखनऊ में भी विक्रमादित्य मार्ग पर जो सैफई बसाया और इक्का दुक्का सरकारी बंगलों को छोड़ कर , अपने मुख्य मंत्री काल में विक्रमादित्य मार्ग के सारे बंगले अपने परिवारीजनों के नाम पर ज़ोर ज़बर से रजिस्ट्री करवा लिया। नया-नया निर्माण करवा लिया। विक्रमादित्य मार्ग के इस सैफई में प्रतीक यादव को भी एक बड़ा सा बंगला दे दिया। बी आर चोपड़ा निर्मित धारावाहिक महाभारत की याद आती है। इस महाभारत की पटकथा और संवाद राही मासूम रज़ा ने लिखा था। सभी जानते हैं कि सिर्फ कर्ण ही नहीं सभी पांडव पुत्र पांडु से नहीं थे। सूर्य पुत्र , इंद्र पुत्र आदि की गाथा है। पर राही मासूम रज़ा ने इंद्र पुत्र , यह पुत्र , वह पुत्र आदि कहने की बजाय सभी को सिर्फ़ कुंती पुत्र लिखा। मुलायम ने भी यही कोशिश की। 

महाभारत का एक क़िस्सा है जो सभी जानते हैं कि कृष्ण के पास अर्जुन और दुर्योधन एक ही दिन युद्ध में सहयोग मांगने गए थे। दुर्योधन पहले पहुंचा था। सो मारे अकड़ और मूर्खता के कृष्ण के सिरहाने बैठ गया। अर्जुन बाद में पहुंचा और पैताने बैठा। पहले अर्जुन को देख कर कृष्ण ने अर्जुन से बात की। यह कथा सभी जानते हैं। पर उसी  बीच एक कथा और घटी थी। जब अर्जुन पहंचे तो दुर्योधन ने अर्जुन से तंज में पूछा , कहिए , इंद्र पुत्र कैसे आना हुआ। अर्जुन सिर झुका कर खून के घूंट पी कर चुप ही रहे। पर सोए हुए कृष्ण सचमुच सोए हुए नहीं थे। सब सुन रहे थे। तो जब अर्जुन से बात हो गई कृष्ण की तो वह दुर्योधन की तरफ मुखातिब हुए और बोले , कहिए व्यास नंदन , आप का कैसे आना हुआ ?

कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन से संबोधित कर बिना कुछ कहे बता दिया कि बेटा दुर्योधन , अर्जुन ही नहीं , तुम भी वही हो। मुलायम के यहां की महाभारत की कथा में भी ऐसे कई पेंच और कई मोड़ हैं। जो महाभारत से भी ज़्यादा रोमांचक और दिलचस्प हैं। कहने का कुल आशय यह कि प्रतीक की उम्र अभी ज़िंदगी जीने की थी। 38 वर्ष की उम्र जाने की नहीं होती। पर फरारी की सवारी गांठने वाले प्रतीक को अचानक जाना पड़ा तो इस में उन का कर्ण जैसा अभिशप्त जीवन भी एक बड़ा कारण है। बड़ा फैक्टर है। जिम का शौक़ , फिट रहने का नशा भी काम नहीं आया। इतनी सी उम्र में अरबपति खरबपति होने का दर्प भी नहीं बचा पाया। कर्ण हो या युधिष्ठिर हर किसी को इसी हिम में गल जाना है। बाक़ी सब मोह माया है। लोकलाज है। दिखावा है। दिखावटी आंसू हैं। दिखावटी ही शोकालाप है। सपा का हो , भाजपा का हो , किसी और का। रमानाथ अवस्थी लिख गए हैं : चाहे हवन का हो चाहे कफ़न का हो / धुएं का रंग एक है। 

लेकिन कर्ण बहुत हैं। एक प्रतीक यादव ही नहीं।