दयानंद पांडेय
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Saturday, 23 May 2026
मेलोनी से आगे क़िस्सों की दुनिया और भी है
मोदी , मेलोनी के पहुनवा राघो की मेलोडी !
दयानंद पांडेय
हम आरक्षण की इसी बैसाखी को तोड़ देना चाहते हैं
दयानंद पांडेय
सामाजिक समता के नाम पर चल रहे पाखंड और कमीनेपन को, झूठी बातों को , कुतर्क को ग़लत साबित करने की मूर्खता आप कीजिए l मैं परीक्षार्थी नहीं हूं l आप को जिन बातों को ग़लत सही साबित करना हो कीजिए l
आरक्षण वाला वोट बैंक भी टूटेगा
दयानंद पांडेय
Wednesday, 20 May 2026
मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है
दयानंद पांडेय
अफ़सोस कि आप अपने को पढ़ा लिखा भी मानते हैं l नहीं जानते तो अब से जानिए कि पहले सिर्फ़ चार वर्ण थे l जाति नहीं l जाति बनाई मुग़लों ने l अपनी सेवा के लिए l फिर ब्रिटिशर्स ने इस जाति प्रथा को खाद पानी दे के बांटो और राज करो में तब्दील किया l फिर राजनीतिज्ञों ने आरक्षण दे कर जातियों को भस्मासुर बना दिया है l आप जैसे तमाम दलित बड़ा संविधान की माला रटते हैं आरक्षण की बैसाखी की रक्षा के लिए l जो लोग पढ़ना नहीं जानते , संविधान की माला फेरते मिलते हैं l संविधान में किसी भी अनुच्छेद में जाति का ज़िक्र नहीं है l पिछड़े और कमज़ोर का ज़िक्र है l कांग्रेस ने अपने स्वार्थ में जाति जाति करना शुरू किया l इंदिरा गांधी के समय में l मोदी और ज़्यादा कर रहा है जाति जाति l नेहरू ने तो आरक्षण का डट कर विरोध किया था l नेहरू को गांधी ने ठेल दिया l आज आरक्षण में देश प्रतिभाहीन हो गया है l नौबत माइनस चालीस वाले डाक्टर की आ गई है l गुड है l
मनुस्मृति की बात पर आते हैं l जहरीले और निकम्मे दलित मनुस्मृति बहुत जलाते हैं l आरक्षण की बैसाखी की और ज़ोर से पकड़ने के लिए l
मनु कौन थे ?
राजा थे l ब्राह्मण नहीं , क्षत्रिय थे l मनुस्मृति , मनु ने ही लिखी है। उन्हों ने एक व्यवस्था बनाई थी राज करने के लिए l मनुस्मृति पढ़े हुए लोग जानते हैं कि मनुस्मृति सब से ज़्यादा ब्राह्मणों के विरोध में है l ब्राह्मण का काम सर्फ मुफ़्त में शिक्षा था और भिक्षा मांग कर भोजन करना था l कोई अन्य काम नहीं करना था l अगर ग़लती से भी कुछ धनार्जन किया तो बहुत सख़्त सज़ा थी l ब्राह्मणों के लिए इतने निषेध और सज़ा हैं मनुस्मृति में कि क्या ही कहा जाए l शरिया में भी ऐसी सजा नहीं दर्ज है।
लेकिन क्रिश्चियन मिशनरी ने ऐसा गुल खिलाया कि लालच में दलित लोग क्रिश्चियन बनने लगे l पूरा नार्थईस्ट क्रिश्चियन क्यों है ? कभी सोचा है ?
क्या ब्राह्मणों के कारण ?
यह अंबेडकर कौन है ?
अंबेडकर ब्राह्मण सरनेम है l क्यों लिखता था , अंबेडकर ?
ऐश से रहता था , अंबेडकर सरनेम लिख कर l ब्रिटिश एजेंट था l क्रिश्चियन मिशनरी के लिए काम करता था l पढ़िए अंबेडकर की जीवनी l बड़ा नेता बनने के लिए पहले मुसलमान बनना चाहता था l आंबेडकर की लिखी कभी वोटिंग फॉर वीजा पढ़िए। खास कर 1934 की उन की दौलताबाद यात्रा के विवरण पढ़िए। फिर सामने जिन्ना था l जिन्ना के आगे भला क्या चलती। फिर क्रिश्चियन बनना चाहता था l पर क्रिश्चियन बनने से मिशनरी का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता था l हिंदुओं में फूट डालने का लक्ष्य l फिर अंबेडकर बौद्ध बन गया l हाला कि फिर भी वह कामयाबी नहीं मिली जो लक्ष्य था l
इस लिए भी कि बुद्ध आध्यात्मिक व्यक्ति थे l अंबेडकर राजनीतिक l बुद्ध और अंबेडकर में कोई मेल नहीं था l बुद्ध कर्मकांड के ख़िलाफ़ थे l अंबेडकर पूरी तरह कर्मकांडी l अपना ब्राह्मण सरनेम तक नहीं बदल सका l
आरक्षण क्या अंबेडकर की देन है ?
जी नहीं l संविधान सभा के 319 सदस्यों की देन है l जिस संविधान सभा के अध्यक्ष थे राजेंद्र प्रसाद और सलाहकार वी एन राव l गांधी का परामर्श था l वह भी देश के पिछड़े और कमज़ोर वर्ग के लिए l जाति विशेष के लिए नहीं l
लेकिन इंदिरा गांधी से लगायत मोदी तक ने दलितों का वोट हथियाने का टूल बना लिया अंबेडकर को l अंबेडकर सिर्फ़ ड्राफ्ट कमेटी का मामूली सा अध्यक्ष था l
अंबेडकर की माला जपते हुए आरक्षण की बैसाखी थामने वाले दलित किसी क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचे हों तो सूचित कीजिएगा l पता कीजिएगा कि कितने प्रतिभावान लोग हर साल देश छोड़ रहे हैं l फिर इस में दलित कितने हैं l
आरक्षण का इतना बैंड बजने के बावजूद कितने विशेषज्ञ दलित डाक्टर हुए हैं ? कितने बड़े वकील हैं ? कितने वैज्ञानिक ? क्रिकेटर , उद्योगपति, अभिनेता या प्रोफेशनल?
हाँ, माइनस चालीस की बदबू वाले डाक्टर हींगे l पाँच साल का एम बी बी एस पंद्रह साल , बीस साल में कर ही रहे हैं l गोरखपुर में बाबा राघवदास मेडिकल कालेज से एक खबर छपी थी पिछले दिनों। एम बी बी एस के पहले ही साल में एक दलित ने ग्यारह साल लगा दिए पर पास नहीं हुआ। मेडिकल कालेज छोड़ने को भी तैयार नहीं। फीस देनी नहीं। हॉस्टल , भोजन सब मुफ्त। और क्या चाहिए।
लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में कुछ छात्रों ने धरना प्रदर्शन किया। उन्हीं दिनों मनमोहन सरकार बनी थी। पी एल पुनिया बाराबंकी से सांसद थे। अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष बना दिए गए थे। कैबिनेट मंत्री का दर्जा। पहुंचे एक दिन मेडिकल कालेज उक्त धरना स्थल पर। मेडिकल कालेज के तब के प्रिंसिपल पुनिया से मिलने धरना स्थल पहुंचे। धरना पर बैठे छात्रों ने पुनिया से शिकायत की कि अभी तक यह कभी हम से बात करने नहीं आए। आज आए हैं। पुनिया ने प्रिंसिपल को तरेरते हुए पूछा , अभी तक क्यों नहीं आए ? प्रिंसिपल ने कहा , आज भी नहीं आता अगर आप नहीं आए होते। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा आप रिटायर्ड आई ए एस हैं। पढ़े लिखे आदमी हैं। सिस्टम समझते हैं। इस लिए आ गया। प्रिंसिपल ने कहा कि इन दलित छात्रों की शिकायत है कि दस-दस , पंद्रह-पंद्रह साल से इन्हें फेल कर दिया जा रहा है। पास नहीं होने दिया जा रहा है। प्रिंसिपल ने पूनिया से कहा कि सर आप सक्षम हैं। ऐसा कीजिए कि देश में जो भी दलित प्रोफ़ेसर मौजूद हैं , उन से ही इन का पेपर बनवा दीजिए। दलित प्रोफेसरों से ही इन सभी की कापियां जंचवा दीजिए। मुझे कोई दिक्कत नहीं। पूरा सहयोग रहेगा हमारा। इतना सुनते ही पूनिया निरुत्तर हो गए। धीरे से उठ कर चले गए। फिर कभी नहीं लौटे। धरना खत्म हो गया था। ऐसे अनेक किस्से हैं। एक डाक्टर यादव थे उन दिनों। सर्जन थे लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में। लेकिन देखता था कि शाम को अक्सर वह कभी दूरदर्शन , कभी आकाशवाणी पर समाचार पढ़ते मिलते थे। बलरामपुर में एक डाक्टर मित्र से एक दिन पूछ लिया कि इन को इतना टाइम कैसे मिल जाता है। कि महीने में पंद्रह दिन आकाशवाणी , पंद्रह दिन दूरदर्शन पर रहते हैं। डाक्टर मित्र बोले , डाक्टर यादव के पास टाइम ही टाइम है। दो साल का एम एस पंद्रह साल में किया है। आरक्षण में नौकरी मिल गई है। मरीज लेकिन आरक्षण में नहीं मिलते। कोई इन से आपरेशन करवाना ही नहीं चाहता। कोई सर्जन इन को अपना असिस्टेंट भी नहीं बनाना चाहता। कौन मरीज के स्वास्थ्य का रिस्क ले ? सो टाइम ही टाइम है इन के पास। डाक्टर यादव की लेकिन एक बड़ी खासियत थी कि यादव होने के बावजूद मृदु भाषी थे। बहुत ही मिलनसार। बाद में हमारे मित्र भी बन गए।
सारी बड़ी नौकरियां अब प्राइवेट सेक्टर में हैं l कितने दलित सी ई ओ हैं ? प्रेसिडेंट , वाइस प्रेसिडेंट हैं ?
आरक्षण देश ही नहीं आरक्षणधारियों को भी नष्ट कर चुका है l
चेत जाइए l यह ब्राह्मण विरोध की कुंठा आप को खा जाएगी l ब्राह्मण का कुछ नहीं बिगड़ेगा l वह तो मांग के खाईबो , मसीत में सोने वाला जीव है l मंगल पांडेय, चित्तू पांडेय, बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद है l तिलक और गोखले है l बहुत लंबी सूची है ऐसे ब्राह्मणों की।
कितने दलित आज़ादी के लिए कुर्बान हुए ?
एक नहीं l कभी नहीं l अंबेडकर भी नहीं। अंबेडकर फ्रीडम फाइटर नहीं , अंग्रेजों का दल्ला था।
ठीक ?
[ अपनी ही एक पोस्ट पर एक मित्र के कमेंट पर यह मेरा जवाब। ]
सवर्णों के ख़िलाफ़ जहरीला हथियार है अब आरक्षण
दयानंद पांडेय
इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं
दयानंद पांडेय
आप का क्या है , अलहदादपुर को अल्लाहदादपुर बता देते हैं l कान इधर से पकड़िए या उधर से पकड़ना कान ही है l इस्लाम और मुस्लिम लीग के वफ़ादार हैं आप , देश के नहीं l आप की सारी उदारता दिखावटी है l ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान बनाने के लिए सब से ज़्यादा सक्रिय उत्तर प्रदेश और बिहार के मुस्लिम लोग थे l पर जब पाकिस्तान जाने की बात हुई तो यहीं से लोग नहीं गए l जो मुट्ठी भर लोग गए भी पाकिस्तान से लात खा कर लौट आए l पर जीते एक और पाकिस्तान बनाने के लिए ही हैं l काफ़िर का कांसेप्ट है कि जाता ही नहीं l पूरी दुनिया को इस्लाम में कंवर्ट करने का ज़ज़्बा बड़ी नफ़ासत से क़ायम है l सिर तन से जुदा करने की तमन्ना है कि जाती ही नहीं l क्या पढ़े लिखे , क्या अनपढ़ l सब की एक गति है l
शेर को आरक्षण क्यों चाहिए ?
दयानंद पांडेय
कृष्ण में यादव लिखा है ? कि दशरथ, लक्ष्मण , भरत आदि में सिंह ? बुद्ध भी क्षत्रिय थे l लिखते थे क्या सिंह ? हीनता और कुंठा वश दलित लोग सीना तान कर सिंह लिखते हैं l तो क्या सिंह बन जाते हैं ?
हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी
दयानंद पांडेय
हुए हैं मानहानि के मुकदमे भी l मुक़दमा करने वाले लोग भुगत कर गए l फिर लौटे नहीं l नोटिस भी बहुत मिलती हैं l पाँच करोड़ से कम की मानहानि की कोई धमकी नहीं देता l ऐसी फ़ालतू नोटिस का जवाब भी नहीं देता l आप के पास प्रमाण है , बात में दम है तो कोई पंगा नहीं लेता अमूमन l
भारत में ग़लत , पाकिस्तान में ठीक
दयानंद पांडेय
पाकिस्तान में कुछ जगहों के नाम बदलने पर हमारे कुछ सेक्युलर टाइप के हिप्पोक्रेट दोस्त फ़िदा हो गए हैं l यह गिरे हुए दोगले लोग दो एक हिंदी नाम पर लहालोट हो गए हैं l यही काम कभी कभार भारत में होता है तो इन के पृष्ठ भाग में दर्द बहुत होता है l फिर यह कमज़र्फ़ अपनी दोगलई में भूल जा रहे है कि पाकिस्तान में हिंदू आबादी साफ़ हो गई है l सफ़ाचट l बांग्लादेश में हिंदुओं पर हुए अत्याचार पर यही लोग लब सिले हुए थे l सांस नहीं ले रहे थे l
एक समाजवादी लेकिन अब कांग्रेसी मित्र की ऐसी ही एक पोस्ट पर उन की इस मानसिकता को नंगा करते एक कमेंट लिखा और उन्हें बताया कि लोहिया की आत्मा कलप रही होगी l मित्र को जिन्ना का डायरेक्ट एक्शन याद दिलाया था l बताया था कि खुशवंत सिंह का ए ट्रेन टू पाकिस्तान पढ़िए l यह भी कि खुशवंत सिंह , संघी या भाजपाई नहीं थे l भीष्म साहनी कम्युनिस्ट थे l भीष्म साहनी का तमस पढ़ने की सलाह दी थी l मित्र को जवाब देते नहीं बना l वैसे भी कभी जवाब नहीं दे पाते l क्यों कि तर्क और तथ्य से सर्वदा च्युत रहते हैं l
लेकिन आज अभी थोड़ी देर पहले का वह कमेंट , मित्र बर्दाश्त नहीं कर पाए , मिटा दिया l ग़ज़ब समाजवादी चरित्र है l क्या कांग्रेस में जाते ही आदमी राहुल गांधी की तरह फ़ासिस्ट हो जाता है ? एकतरफ़ा बात करने की बीमारी घेर लेती है ? सच को स्वीकार करने की क्षमता नष्ट हो जाती है ?
जो भी हो बंगाल का ग़म दूर करने के लिए मरियम का यह मरहम भी बहुत है l बाक़ी योगी का काढ़ा भी आ गया है l जिस को जो लेना हो सहर्ष ले !
लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है
दयानंद पांडेय
लोकतंत्र में आप की आस्था ख़त्म हो गई है l सिर्फ़ अपनी पसंद और सुविधा ही में आप की आस्था शेष रह गई है l बाई द वे जो आप कह रहे हैं तो इस हिसाब से तमिलनाडु और केरल में भी भाजपा की सरकार होनी चाहिए थी l ममता और वाम दलों की हिंसा आप को कितनी तो प्यारी है l
कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप
दयानंद पांडेय
कितने दोमुंहे और एकपक्षीय हैं आप l तमिलनाडु में विजय जोसेफ़ के लिए कितना तो दुख है आप को l राज्यपाल के लिए कितनी घृणा l
Thursday, 14 May 2026
अटल वाली कटहल की खेती और ममता
दयानंद पांडेय
कल का चुनाव परिणाम चाहे जो हो l पर अटल बिहारी वाजपेयी बहुत याद आएंगे l भाजपा में तो वह मुख्य मंत्री और मंत्री बनाते बिगाड़ते रहे थे l जैसे नरेंद्र मोदी को भी गुजरात में मुख्य मंत्री अटल जी ने ही बनाया था l लेकिन अटल जी भाजपा को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा से इतर भी लोगों को मुख्य मंत्री या मंत्री बनाते रहे l क़ुर्बानी दे कर भी l दबी ज़ुबान भाजपा में तब हर बार अटल जी का विरोध भी ख़ूब हुआ l पर अटल जी अपनी दूर दृष्टि से डिगे नहीं l
तीन लोग ऐसे थे जो भाजपा में नहीं थे पर बारी-बारी उन्हें भाजपा के सहयोग से मुख्य मंत्री बनाया l और वह तीनों भाजपा के लिए खाद बन कर काम आए l भाजपा को फूलने फलने में अनायास मदद कर बैठे l हाला कि तब के समय विधान सभाओं में संख्या बल में भाजपा बड़ी थी बावजूद इस के l जैसे मायावती और नीतीश कुमार को मुख्य मंत्री बनवाया l ममता बनर्जी को पहले केंद्र में मंत्री बनाया l कांग्रेस को कमजोर किया l फिर पश्चिम बंगाल का मुख्य मंत्री बनवाया l वाया नंदीग्राम और सिंगूर l
पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का काँटा भाजपा कभी सीधे नहीं निकाल सकती थी l वामपंथियों की सशस्त्र क्रांति और गोली बंदूक का जवाब भाजपा कभी नहीं दे सकती थी l भाजपा के लोग संघ में सीखी लाठियां भांजने से अधिक कुछ कर नहीं सकते थे l तो वामपंथियों की बेहूदगी और गुंडई का काँटा निकालने के लिए अटल जी ने ममता बनर्जी नाम का कांटा तैयार किया l परिणाम देखिए कि वामपंथी पश्चिम बंगाल में अब गूलर के फूल बन चुके हैं l अलग बात है कि ममता बनर्जी ख़ुद आहिस्ता आहिस्ता भस्मासुर बन गईं l
लेकिन अब ?
भस्मासुर अब भस्म होने को तैयार बैठी है l नीतीश कुमार , अब ख़बर से भी बाहर हैं l मायावती राजनीति के हाशिए से भी बाहर हैं l भाजपा का सूर्योदय अगर आज भाजपाइयों को उत्तर प्रदेश , बिहार में दिख रहा हो तो भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l जातिवादी बिहार में भाजपा का मुख्य मंत्री आसान तो नहीं था l ऐसे ही कल की सुबह अगर पश्चिम बंगाल में भी भाजपा का सूर्योदय होता दिखे तो एक बार फिर भाजपाइयों को अटल जी को प्रणाम करना चाहिए l अटल जी ने ममता के कांटे से वाम का लाल क़िला तोड़ दिया था l अब ममता की खाद , भाजपा की फसल को लहलहाने वाली है l देखते जाइए l मोदी का धैर्य भी बहुत महत्वपूर्ण है l ममता नाम की भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखवा कर नचाना आसान तो नहीं था l
बहुतेरे लोग अकसर कहा करते थे कि पश्चिम बंगाल में बिना राष्ट्रपति शासन लगाए निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते l लेकिन नरेंद्र मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन की बदनामी सिर लिए , पश्चिम बंगाल में निष्पक्ष चुनाव करवा कर दिखा दिया है l वह कहते हैं न कि आप अपनी माँ को माँ कहिए या पिता की पत्नी बात एक ही है l ग़लत कुछ भी नहीं l तथ्य है यह l
पर कहने सुनने में माँ कहना ही अच्छा लगता है l पिता की पत्नी , गाली और अपमानजनक लगता है l सो मोदी ने बिना राष्ट्रपति शासन लगाए पश्चिम बंगाल में वह सब कर दिया है जो राष्ट्रपति शासन लगा कर भी नहीं किया जा सकता था l बदनामी का दाग अलग लगता l केंद्रीय सुरक्षा बलों के मार्फ़त ममता बनर्जी की गुंडई को जिस ख़ूबी से काबू किया है मोदी ने कि ममता भी लाजवाब हो गई हैं l उन की सारी उछल कूद मंकी एफ़र्ट में तब्दील हो गई है l
अब 4 मई के परिणाम की प्रतीक्षा कीजिए l अटल जी की राजनीतिक खेती करने की विधि का आनंद लीजिए l और जानिए कि राजनीति कटहल की खेती है l पपीता छ महीने में फल देने लगता है पर छ महीने बाद ख़त्म हो जाता है l देखिए न मायावती को l पपीता बन कर रह गई हैं l पर कटहल बहुत साल बाद फल देता है l देता है तो बरसो बरस देता है l पीढ़ियां खाती हैं l
राजनीति की खेती में भी खाद पानी की बहुत ज़रूरत होती है l समय से खाद पानी देते रहिए तो अटल बिहारी जैसे कटहल लगाने वाले युगों तक याद आते रहते हैं l इस की तपिश में झुलस कर राहुल गांधी जैसे लोग झुनझुना बन जाते हैं l जो चाहता है झुनझुना बजा कर चल देता है l यही वह तपिश है जो घुंघरू बांध कर आदमी को अरविंद केजरीवाल बना देती है l
Wednesday, 13 May 2026
कर्ण द्वापर में ही नहीं कलयुग में भी होते हैं कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम के हिस्से
दयानंद पांडेय
कर्ण द्वापर में ही नहीं , कलयुग में भी होते हैं। कभी कुंती के हिस्से , कभी मुलायम सिंह यादव के हिस्से। द्वापर में भी कर्ण की स्वीकार्यता नहीं थी , कलयुग में भी नहीं है। शायद कभी नहीं होगी। कर्ण सर्वदा से शापित है रहेगा। परशुराम से लगायत धरती तक के शाप हैं। प्रतीक यादव की यातना इतनी भर नहीं है। प्रतीक की स्वीकार्यता तो प्रेम विवाह के बावजूद पत्नी के पास भी स्वभावतः नहीं थी। जो भी कुछ था बस मुलायम की नंबर दो की संपत्ति का सहारा था। चाहे 5 करोड़ की फरारी कार हो , करोड़ो का जिम , अरबों के फ़ार्म हाऊस और रियल स्टेट व्यवसाय के भरोसे भी जीना आसान नहीं था। यह कर्ण होने की तोहमत ही थी कि प्रतीक कभी राजनीति में आने की सोच नहीं पाए। राजनीति में आते तो इतने प्रश्न पूछे जाते कि उन का जवाब मुलायम भी तब नहीं दे पाते। कर्ण तो फिर भी जानता था और लोग भी कि वह सूर्य पुत्र है।
पर प्रतीक ?
प्रतीक मिस्टर गुप्ता के बेटे थे कि मुलायम के , पब्लिक डोमेन में अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं है। राजनीति में आते तो यह सवाल विपक्ष पूछता या नहीं पूछता , अखिलेश यादव के लोग दाएं , बाएं से पूछते ज़रूर। जैसे कि आज ही अखिलेश यादव ने जिस शातिरपने से प्रतीक के बाबत प्रेस से बात की वह चौकाने वाला हरगिज नहीं था। अखिलेश ने कहा कि क़ानून और परिवार जो कहेगा वह करेंगे। यह कह कर अखिलेश कहना क्या चाहते थे ? सब को समझ आ गया। बाक़ी रहा सहा सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा ने प्रतीक की मृत्यु को संकेतों में हत्या और जांच करवाने की मांग कर सब कुछ कह दिया। ग़नीमत बस यही थी कि अपर्णा आसाम में थीं। लखनऊ में नहीं। अपर्णा अगर लखनऊ में होतीं तो सपा के लोग उन को फंसाने के लिए , लांछन लगाने के लिए कुछ भी कर गुज़र गए होते।
क्यों कि राजनीति का कीचड़ सिर्फ़ कमल ही नहीं खिलाता , और भी कई गुल खिला देता है। नारायणदत्त तिवारी , उज्ज्वला , राहुल प्रसंग हम देख चुके हैं। सारा खेल और व्यूह नरसिंहा राव ने तिवारी को मात देने के लिए रचा था। फिर राहुल का क्या हुआ , उज्ज्वला किस दुर्गति को प्राप्त हुई और कि नारायणदत्त तिवारी किस तरह अंतिम समय में अपमान को प्राप्त हुए किसी से छुपा हुआ नहीं है। हर कोई अटल बिहारी वाजपेयी जैसी किस्मत ले कर नहीं पैदा होता कि दागदार ज़िंदगी जी कर भी बेदाग़ निकल जाए राजनीति की इस काजल कोठरी से। सब को अटल जी जैसी गरिमा नहीं मिलती। छीछालेदर मिलती है। मुझे याद है जब राजीव गांधी राजनीति में आए तो कालाकाकर के राजा दिनेश सिंह से , जो तब सांसद भी थे , लोग उन के डी एन ए टेस्ट की बात करने लगे थे। इंदिरा गांधी तब प्रधान मंत्री थीं। ऐसी अनेक बातें हैं। अनेक क़िस्से हैं।
शायद इसी लिए प्रतीक हरगिज नहीं चाहते थे कि अपर्णा विष्ट भी राजनीति में आएं। लेकिन भातखंडे से संगीत की शिक्षा लिए अपर्णा पति के मन का यह संगीत नहीं सुन सकीं। अपर्णा की अपनी महत्वाकांक्षा थी l राजनीति में उन की महत्वाकांक्षा की पतंग नहीं उड़ सकी है अभी तक यह अलग बात है। प्रतीक और अपर्णा का संबंध , विवाह से पहले भी चर्चा में रहा था। अपर्णा के पिता पत्रकार हैं। हमारे कुलीग रहे हैं।
बचपन से ही प्रतीक सिर्फ़ संपत्ति की दुनिया में जीते रहे। सामाजिक , पारिवारिक और राजनीतिक जीवन उन्हें नहीं मिला। माँ के पूर्व पति गुप्ता परिवार में कभी पूछ नहीं हुई। मुलायम के सैफ़ई में यादव परिवार ने कभी साधना को ही स्वीकार नहीं किया तो प्रतीक को भी कौन स्वीकार करता। प्रतीक-अपर्णा की शादी भले सैफई में हुई पर सैफई ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। प्रतीक ने कोशिश भी नहीं की कि सैफई परिवार उन्हें अपना मान ले। न ही साधना गुप्ता ने। अभी जल्दी ही मुलायम की मृत्यु से ख़ाली हुई सीट पर उपचुनाव में डिंपल यादव को प्रत्याशी बनाने की चर्चा में प्रेस से बातचीत में अपर्णा की बात चली तो रामगोपाल यादव ने प्रेस से स्पष्ट कहा कि वह हमारे परिवार की नहीं हैं। और बड़ी तल्खी से यह बात कही रामगोपाल यादव ने। गौरतलब है कि रामगोपाल यादव मुलायम के चचेरे भाई नहीं हैं जैसा कि लोग समझते हैं। सैफई के ही हैं पर मौसेरे भाई हैं रामगोपाल , मुलायम के। जिन के लिए मुलायम ने नाराज हो कर कहा था कि रामगोपाल ने अखिलेश का राजनीतिक कैरियर खा लिया। अखिलेश को कहीं का नहीं छोड़ा। लोग रामगोपाल को प्रोफ़ेसर रामगोपाल क्यों कहते हैं , समझ नहीं आता। रामगोपाल यादव कभी कहीं प्रोफ़ेसर नहीं रहे। यह भी जान लीजिए।
बहरहाल , बचपन प्रतीक का लखनऊ के इंदिरा नगर की राज्य संपत्ति विभाग के सरकारी कालोनी के एक घर में बीता। जहां साधना गुप्ता को बतौर पत्रकार कार्नर का एक बढ़िया घर आवंटित था l गो कि साधना गुप्ता कभी पत्रकार नहीं रहीं। उस सरकारी कालोनी में भी वह कटी-कटी सी रहती थीं l एक बार कीर्तन में पड़ोस की स्त्रियों को साधना ने बुला लिया। मुलायम ने इस का बहुत बुरा मान लिया। स्पष्ट बता दिया कि वहां लोगों में मिक्स अप नहीं होना है। तो जब साधना पर इतनी पाबंदी थी तो प्रतीक पर भी रही होगी। मुलायम ने साधना को रखैल होने की सीमा बता दी थी।
बाद के समय में अमर सिंह मुलायम के जीवन में आए। फिर जब सैफ़ई में अखिलेश यादव की माँ मालती यादव का निधन हो गया तो अमर सिंह ने साधना गुप्ता से मुलायम का गंधर्व विवाह करवा दिया। वह अब साधना यादव हो गईं। अखिलेश छोटे थे पर इतने भी नहीं कि मुलायम की इस हरकत का विरोध न कर सकें। किया। लेकिन मुलायम के दूसरे कार्यकाल में साधना गुप्ता बतौर पत्नी मुख्य मंत्री निवास में पूजा में शामिल हुईं और रहने लगीं l अखिलेश के डिफ्रेंसेज बने रहे l बल्कि बाद के समय में अखिलेश मुख्य मंत्री बने ही साधना गुप्ता के कारण। अखिलेश यादव के निरंतर ब्लैकमेलिंग से परेशान सौतेली मां साधना ने ही मुलायम को सलाह दी कि अखिलेश को मुख्य मंत्री बना दीजिए। रोज रोज की चिक चिक से फुर्सत मिले।
मुलायम बिलकुल नहीं चाहते थे अखिलेश यादव को मुख्य मंत्री बनाना। पर जैसे कैकेयी के आगे दशरथ झुक गए थे , मुलायम साधना के आगे झुक गए। मुलायम की यह बहुत बड़ी राजनीतिक ग़लती थी। फिर तो मुख्य मंत्री बन कर अखिलेश जल्दी ही औरंगज़ेब बन गए और मुलायम को शाहजहां बना दिया। टाइम्स आफ इंडिया ने इस बात को जब छापा तो अखिलेश ने टाइम्स आफ इंडिया के संपादक को मुख्य मंत्री निवास में बुलाया। मारे गुस्से में संपादक की गरदन पर तलवार रख दी। बाद के समय में मुलायम को किस तरह पार्टी अध्यक्ष पद से हटा कर ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने अखिलेश यादव , अब यह एक इतिहास है। मुलायम ख़ून के आंसू पी कर रह गए। मुलायम की ज़िंदगी में मालती और साधना के अलावा भी कई स्त्रियां आईं गईं। यथा आई ए एस अफसर रही अनीता सिंह आदि। कुछ राजनीतिक स्त्रियां भी। कई फ़िल्मी हीरोइने भी। सहारा शहर उन की ऐशगाह थी ही। पर सब कुछ के बावजूद उन का गुलमोहर साधना ही रहीं। वह दुष्यंत कुमार का एक शेर है न :
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।
अच्छा हुआ कि साधना मुलायम के रहते ही चली गईं। नहीं प्रतीक से ज़्यादा मुश्किल उन्हें होती। अखिलेश यादव उन्हें रखैल डिक्लेयर करवा कर अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जो अपने पिता की इज्जत नहीं कर सका , सौतेली मां , जिस ने उन की मां मालती यादव का जीते जी हक़ छीन लिया था , उस की इज्जत क्या ख़ाक करता ? सौतेले भाई ने खुद एक लक्ष्मण रेखा खींच ली थी। कोई दावेदारी नहीं की। न राजनीतिक उत्तराधिकार के लिए , न आर्थिक उत्तराधिकार के लिए। मुलायम प्रतीक को इटावा के सैफई में भले प्रतीक को कुछ नहीं दे पाए पारिवारिक विरोध के चलते पर लखनऊ में भी विक्रमादित्य मार्ग पर जो सैफई बसाया और इक्का दुक्का सरकारी बंगलों को छोड़ कर , अपने मुख्य मंत्री काल में विक्रमादित्य मार्ग के सारे बंगले अपने परिवारीजनों के नाम पर ज़ोर ज़बर से रजिस्ट्री करवा लिया। नया-नया निर्माण करवा लिया। विक्रमादित्य मार्ग के इस सैफई में प्रतीक यादव को भी एक बड़ा सा बंगला दे दिया। बी आर चोपड़ा निर्मित धारावाहिक महाभारत की याद आती है। इस महाभारत की पटकथा और संवाद राही मासूम रज़ा ने लिखा था। सभी जानते हैं कि सिर्फ कर्ण ही नहीं सभी पांडव पुत्र पांडु से नहीं थे। सूर्य पुत्र , इंद्र पुत्र आदि की गाथा है। पर राही मासूम रज़ा ने इंद्र पुत्र , यह पुत्र , वह पुत्र आदि कहने की बजाय सभी को सिर्फ़ कुंती पुत्र लिखा। मुलायम ने भी यही कोशिश की।
महाभारत का एक क़िस्सा है जो सभी जानते हैं कि कृष्ण के पास अर्जुन और दुर्योधन एक ही दिन युद्ध में सहयोग मांगने गए थे। दुर्योधन पहले पहुंचा था। सो मारे अकड़ और मूर्खता के कृष्ण के सिरहाने बैठ गया। अर्जुन बाद में पहुंचा और पैताने बैठा। पहले अर्जुन को देख कर कृष्ण ने अर्जुन से बात की। यह कथा सभी जानते हैं। पर उसी बीच एक कथा और घटी थी। जब अर्जुन पहंचे तो दुर्योधन ने अर्जुन से तंज में पूछा , कहिए , इंद्र पुत्र कैसे आना हुआ। अर्जुन सिर झुका कर खून के घूंट पी कर चुप ही रहे। पर सोए हुए कृष्ण सचमुच सोए हुए नहीं थे। सब सुन रहे थे। तो जब अर्जुन से बात हो गई कृष्ण की तो वह दुर्योधन की तरफ मुखातिब हुए और बोले , कहिए व्यास नंदन , आप का कैसे आना हुआ ?
कृष्ण ने दुर्योधन को व्यास नंदन से संबोधित कर बिना कुछ कहे बता दिया कि बेटा दुर्योधन , अर्जुन ही नहीं , तुम भी वही हो। मुलायम के यहां की महाभारत की कथा में भी ऐसे कई पेंच और कई मोड़ हैं। जो महाभारत से भी ज़्यादा रोमांचक और दिलचस्प हैं। कहने का कुल आशय यह कि प्रतीक की उम्र अभी ज़िंदगी जीने की थी। 38 वर्ष की उम्र जाने की नहीं होती। पर फरारी की सवारी गांठने वाले प्रतीक को अचानक जाना पड़ा तो इस में उन का कर्ण जैसा अभिशप्त जीवन भी एक बड़ा कारण है। बड़ा फैक्टर है। जिम का शौक़ , फिट रहने का नशा भी काम नहीं आया। इतनी सी उम्र में अरबपति खरबपति होने का दर्प भी नहीं बचा पाया। कर्ण हो या युधिष्ठिर हर किसी को इसी हिम में गल जाना है। बाक़ी सब मोह माया है। लोकलाज है। दिखावा है। दिखावटी आंसू हैं। दिखावटी ही शोकालाप है। सपा का हो , भाजपा का हो , किसी और का। रमानाथ अवस्थी लिख गए हैं : चाहे हवन का हो चाहे कफ़न का हो / धुएं का रंग एक है।
लेकिन कर्ण बहुत हैं। एक प्रतीक यादव ही नहीं।

